मणिपद्म क संस्मरण-संसार
विगत अनेक शताब्दीदसँ मैथिली भाषा ओ साहित्यणक सुदीर्घ एवं समृद्वशाली साहित्यिक परम्पअरा अवि छिन्नथ-अक्षुण्णय रूपेँ चलि आबि अछि; किन्तुw बीसम शताब्दी केँ जँ एकर साहित्यिक विकास-यात्राकेँ स्वार्णयुगक संज्ञासँ अभिहित कयल जाय तँ एहिमे कोनो अत्यु्क्ति नहि हैत, कारण विगत शताब्दीञमे एकर सर्वांगीण विकास-यात्रामे एक नव मोड़ आयल जे पत्र-पत्रिकाक उदय भेलैक तथा ओकर प्रकाशनक शुभारम्भद भेलैक जकर फलरूप गद्यक विभिन्नप रूप-विधानक प्रादुर्भाव पत्र-पत्रिकाक प्रकाशनसँ आ ओकर प्रयोग रूप-विधानक रूपमे पाठकक समक्ष प्रस्तुदत भेल। संघर्षमय युगक जीवनमे गद्यक मर्यादा एहि रूपेँ रूपायित कऽ देलक जे ओ अभिव्यपक्तिक असाधारण साधन बनि गेल। आधुनिक मैथिली गद्य-गंगाकेँ सम्पोजषित करबाक उद्देश्यस सँ साहित्य -पुरोध लोकनिक सत्प्र यासँ ओकर परिष्काूर परिमार्जन भेलैक। गत शताब्दीउमे आत्म कथा, आलोचना, उपन्याास, कथा, गाआ जीवनी, डायरी, निबन्धा, संस्मआरण, साक्षात्कारर आदि अनेक साहित्यिक विधा-जन्म) देलाआ साहित्य मे एक नव-स्पनन्द,न-स्पहन्दसन भरबामे महत्वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह कयलका। ई श्रेय वस्तु त: पत्रिकादिकेँ छैक जे आधुनिक गद्यक आविर्भाव एवं विकास-यात्राकेँ करबाका तथा साहित्यरक श्रीवृद्विक सहयोगमे अपेक्षित ध्यािन देलक। एहि निमति साहित्यत-सृजानिहार लोकनि नव-नव प्रवृत्तिक रचनाक दायित्वहक भार वहन कयलनि आ सम्पा्दक लोकनि ओकरा यत्नर पुरस्स-र प्रकाशति कयलनि जकर फलस्विरूप मैथिली गद्यक भेलैक आ ओकरा विविध रूप-विधानमे विन्या स्तय कयल जाय लागल। पत्रिकादिक माध्य मे सेहो नव-नव रचानाकारकेँ प्रोत्सा्हन भेटलनि तथा हुनका सभक ध्यायन ओहि विधा दिस आकर्षित भेलनि जकर एहि साहित्याान्तरर्गत सर्वथा अभाव छलैक। एहिसँ अतिरिक्त विगत साहित्यिक विकास-यात्रामे अनेक उल्लेअख योग्य काज भेल जकर ऐतिहासिक महत्त्व छैक। रचनाकारक भाव-प्रवणता, हार्दिकता, कल्पनाशीलता एवं स्वहछन्दछ प्रवृत्तिक परिणाम स्ववरूप मैथिली गद्य अपनाकेँ नव पल्लवसँ पल्लववित कयलक। विगत शताब्दीैमे एकर सर्वतोमुखी विकास विकास भेलैक जाहि आधार पर एकरा गद्य-युग कहब समीचीन होयत, कारण मैथिली गद्य-गंगा शत-शत धारा मे प्रवाहित होइत एकर साहित्यम सागरकेँ भरलक आ पूर्ण कयलक। उपर्युक्त पृष्ठकभमिक परिप्रेक्ष्यभमे मैथिलीमे एक अद्वितीय प्रतिभासमपत्रा तप : सपूत रचानाकारक प्रादुर्भाव भेल आ अपन अप्रतिम प्रतिभाक बल पर साहित्यक अनेक विधाकेँ संस्कादरित कयलनि आ ओकरा मिथिलांचल अभिज्ञानद’ कए भारतीय साहित्यपक समकक्ष स्था्पित कयलनि जे रचनाक प्रत्येाक क्षेत्रमे, सर्जनाक यावतो प्रस्थाकनमे ओ अपन कृतिमे ने केवल परवर्ती पीढ़ीक हेतु, प्रत्युमत् अपन समकालीनक हेतु सेहो शिखर पुरूष आ प्रेरक स्तपम्भर बनि गेलाह ओ रहथि डॉ. व्रजकिशोर वर्मा मणिपदूम (1927-1986) हुनक प्रकाशित साहित्य वैविध्यिपूर्ण अछि, कारण साहित्यिक अभिक्तिक कोनोक विधा नहि बाचल रहल जकर सहज प्रयोगमे ओ उल्लेगख योग्य् सफलता नहि प्राप्त कयलानि। हुनका द्वारा रचित साहित्यगक प्रचुरता आ विचित्रता अछि, किन्तु ओहिमे सर्वाधिक महत्विपूर्ण तथ्यच थिक जे एहि परिमाण-प्राचुर्यमे हुनक अधिकांश साहित्यिक कृतियि कोटिक थिक। जहिना हिनक रचनाक विशदता पाठककेँ चकित आ विस्मित क’ रहल अछि तहिना हुनक व्याक्तित्वाक आध्याँत्मिक रहस्युमयता सेहो अधिक जोड़ पकड़लक। हुनक आभ्य न्तारिक शक्ति हुनका निरन्त र चिर-नूतन रचनाक हेतु उत्प्रे्रित करैत रहलनि तथा विश्राम करबाक लेल पलखति नहि देलकनि। ओ जीवनक विविध पथक पथिक रहथि तथा विषाद आ करूणाक बीच सौन्द र्यक अन्वेवषण करब हुनक लक्ष्या छलनि। हुनक मन आ मस्तिष्कआ क्षितिज जाग्रत छलयनि। ओ जीवन आ प्रकृतिक पक्षधर रहथि। ओ एक दूरदर्शी साहित्यर-मनीषी रहथि जे मैथिली मे जाहि विधाक अभाव हुनका परिलक्षित भेलनि तकर पूत्य्र्थ मनसा-वाचा- कर्मणा ओहि मे लागि गेलाह। हिनका द्वारा प्रयुक्त विधा साहित्यूक विधे नहि रहल, प्रत्युीत आकर्षक विधाक रूपमे ख्या ति अर्जित कयलक। चिरनूतनताक अन्वेहषी मणिण्द्य मैथिली साहित्यतमे संस्मररण साहितयान्तुर्गत चारि नव विधाक प्रवर्त्तन कयलनि जकर सम्बवन्धद अतीतसँ अछि, यद्ययपि संस्मेरणक संसार विषयक दृष्टिऍं व्यालपक नहि, तथापि संवेदनाक गाम्भीहर्य आ आत्मींय-स्पवर्शक दृष्टिऍं अत्यकन्त् श्रेष्ठण कोटिक साहित्यन-विधाक अन्त्र्गत अबैछ1 भारतीय भाषा आ साहित्य्मे एहि विधाक जन्म पाश्चात्या साहित्यहक संग-सम्पतर्कक फलस्वकरूप प्रारंम्भय भेल जे अधुनातम सन्दयर्भमे एक वेश चर्चित विधाक रूपमे प्रचलित भेल अछि। ओ एहि विधामे के विपुल परिमाणमे सहित्यम-सृजन कयलनि, किन्तुि दुर्योगक विषय थिक जे मैथिलीक तथाकथित इतिहासकार लोकनिक ध्या न एहि दिस नहि गेलनि आ ओकर चर्चा पर्यन्ति नहि कयलनि। भारतीय साहित्यध निर्माता सिरीज अन्तओर्गत साहित्यु अकादेमीसँ मणिपद्य (1969) पर एक मनोग्राफ प्रकाशित भेल अछि। ओकर लेखक एहि सिरीजक रचनाकेँ बिनु पढ़न।हि उपेन्द्र महारथीक बदला मे रामलोचन शरणक उल्ले्ख कयलनि। इएह तँ मनोग्राफ लेखकक स्थिति अछि। भारतक स्वलतन्त्रछता-संग्रामक इतिहासमेक सन् उन्नैलस सै वियालिसक ऐतिहासिक दृष्टिएँ अत्यकन्तव महत्वतपूर्ण स्थािन अछि। सन् वियालिसक महाक्रान्तिमे बूढ़-बूढ़ानुस नेतासँ अधिक जुआन-जहानक रक्तर विशेष गर्म छलैक आ अंग्रजी शासनक विरूद्व ओकरा लोकनिक स्व-र वेश मुखर भेल छलैक। उत्तर बिहार वा मिथिलांचलक नवयुवक लोकनि एहि यज्ञमे अपन प्राणक आहुति देलनि आ रक्तसँ तर्पण कयलनि। मणिपद्य स्वुयं सजग, सचेष्ट् आ निर्भीक स्व तन्त्रपता सेनामी रहथथि तहि परिप्रेक्ष्यकमे ओ मै थिली संस्मतरणक सर्वप्रथम डायरी शैलीक प्रवर्त्तन कयलनि अवश्य्, किन्तुा एकरा अन्त्र्गत ओ प्रचुर परिमाणमे रचना कयने रहितथि तँ ओ निश्चनये मैथिली साहित्यमक एक अभूतपूर्व कृति होइत । एकरा अन्तनर्गत हुनक ‘विलायसीक फारारीक सात दिन (1153) तथा ‘फरारीक पाँच दिन’ (1171) प्रकाशित अछि जाजिमे स्वीतन्त्रूता आन्दोयलनक क्रम मे ओ जे डायरी लिखलनि तकर दारूण पीड़ादायक वर्णन कयलनि। एहिमे रचनाकार सद्यय : स्फुतटितभाव वा विचारकेँ अभिव्यीक्ति देलनि वा अपन अनुभवक रेखांकन वा विगत अनुभवक पुनर्मूल्यांीकन कयलनि। एहिमे वियालिसमे फेरार भेल अपन स्थितिक चित्रण कयलनि संगहि नेपाल तराइक जन-जीवन पर सेहो प्रकाश देलनि। अपन दीर्घ सार्वजनिक जीवनमे ओ देशक राजनैतिक,सामाजिक, साहित्यरक आ सरकारी उपक्रमे काज कयनिहार व्यनक्तिक सम्परर्कमे अयलाह, ओहि स्मृतिकण केँ जोडि़क’ हुनका सँ भेट भेल छल सन् 1153ई सँ लिखब प्रारम्भल कयलनि जकर समापन 1183 ई. धरि अनवरत चलैत रहलनि जकरा एहिमे अभिव्यसक्तिक मूर्त्तरूप प्रदान कयलनि। हिनक उपर्युक्त संस्मिरण मात्र लेखकीय मनीषा पर नहि आधृत अछि; प्रत्युकत्त-प्रेम, ईश्वार-प्रेम, स्व्देश-प्रेम, महतक प्रति श्रद्वा विनोद-प्रियता आदिक समस्तत वैशिष्ट्रमयक झलक एहिमे भेटैछ। ओ अपन दीर्घ साहित्यिक जीवनान्तीर्गत जाहि-जाहि मातृभाषा आ साहित्या नुरागी साधक लोकनिक सम्पमर्कमे अयलाह ओकरा संगाहि अन्याआन्यस भाषानुरागी विद्वत् वर्गसँ अभिभूत भेलाह, जाहि रूपेँ हुनका हृदयंगम कयलनि, जाहि रूपेँ प्रभावित भेलाह तनिके ओ एहि श्रृंखलाक कड़ीक आधार बनौलनि। हिनक संस्मकरणात्मनक आलेख यद्यति विवरणात्मिक अछि तथापित ओ सत्यि घटना पर आध़त संगहि वर्णित व्यआक्तिक मातृभाषाक अनुराग आ साहित्यिक आन्दोपलनक परिचायक सेहो अछि। एहि सिरीजक अन्तभर्गत प्रकाशित संस्मदरण जीवनक एक पक्षकेँ उदूघाटित करैत अछि जे व्येक्ति अपन क्रिया-कलापसँ आकर्षित कयलनि तनिके पर ओ लिखलनि। एकरा अन्तार्गत वर्णित व्यिक्तिक व्य क्तित्व आ कृतित्व क ओही अंशकेँ ओ स्पतर्श कयलनि जे अपन उपस्थितिसँ अमृत वर्षा कयलनि आ सहज होथि आ ने केवल स्मृकति विषयक व्य क्तित्व केँ सेहो दीपित करैत हो, प्रत्यु त स्वकयं लेखकारक व्यषक्तित्वि कँ सेहो दीपित कयलक। एहिमे ओ वर्णित व्यतक्तिकक व्यतक्तित्वे ओही वैशिष्य् तथा स्थितिकेँ जनसामान्यसक समक्ष प्रस्तुओत-कयलनि जाहिसँ हिनक संस्मकरण वास्तकविक घटित घटनाक सन्निकट आ सम्भथवभ’ सकल। ओ स्पिष्टम रूपेँ पाठकक-समक्ष अपन यथार्थ प्रतिक्रिया वर्णित व्य क्ति पर व्य क्तप कयलमनि जकर वर्त्तमान परिपेक्ष्यटमे ऐतिहासिक महत्वअभ’ गेल अछि। एहि सिरीजक अन्तरर्गत मैथिली भाषा आ साहित्यपक निम्न स्थव व्यकक्तित्वक संग हुनका साक्षात्का र भेलनि तथा अपन अमिट छाप छोड़लनि यथा सीताराम झा, (1811-1175), बैद्यनाथ मिश्र यात्री (1111-1118) काञ्चीनाथ झा किरण (1103-1181) , चन्द्रटनाथ मिश्र अमर (1125), कुलानन्द- नन्द न (1108-1180) सुधांशु शेखर चौधरी (1120-1110) सामदेव (1134), सुरेन्द्र1 झा सुमन (1110-2002), नरेन्द्र नाथ दास विद्यालंकार (1104-1113) मायानन्द) मिश्र (1134) भोलालाल दास (1814-1199), लक्ष्मरण झा (1113-2002), गिरिन्द्र मोहन मिश्र (1810-1183), जगदीश्वकरी प्रसाद ओझा (?) महामहोपाध्या य उमेश मिश्र (1825-1139), अमरनाथ झा (1819-1144), राजकमल चौधरी (1129-1139), रामकृष्णर झा किसुन (1123-1190), रामनाथ झा (1103-1191) कविशेखर बदरीनाथ झा (1813-1198) ज्यो1तिषाचार्य बलदेव मिश्र (1180-1194), राजेश्व र झा (1122-1199), बाबू लक्ष्मी3पति सिंह (1109-1192), उपेन्द्र ठाकुर मोहन (1113-1180) एवं श्रीमती सुभद्रा झा (1111-1182), राधाकृष्ण1 चौधरी (1124-1184) इत्या1दि पर ओ हुनकासँ भेंट भेल छल क अन्त1र्गत लिखलनि1 कविवर सीताराम झा बाबू भोलालाल दास आ राधाकृष्ण1 चौधरी पर हुनक दुइ संस्म्रण हमरा उपलब्ध9 भेल जकरा यथावत् एहिमे समाहित कयल अछि। उपर्युक्तस महानुभावक संस्म्रण एक जीवितावस्थाह थिक आ दोसर मृत्यूपपरान्त1क। उपर्युक्त संस्मुणान्तमर्गत ओ हुनक जीवनवृतिक इतिहासे नहि प्रस्तुवत कयलनि; प्रत्युहत हुनक साहित्यिक अभिरूचि एवं अवदानक संगहि संग संगठनात्मतक प्रवृत्तिक लेखा-जोखा प्रस्तु्त कयलनि जे मातृभाषाक विकासमे उल्लेहख योग्यि अवदानक रूपमे चर्चित अछि। हनुका सँ भटँृ भेल छलक परिधि मात्र मैथिली साहित्य मनीषी लोकनि धरि सीमित नहि रहल, प्रत्युभत ओकर फलक विस्तृित छल तकर प्रारूप भेटेछ, जे विश्व्क प्रख्याात भाषा-शास्त्री विद्वतवरेण्यु डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी (1810-1199), हिन्दीि साहित्येक प्रख्याभत साहित्यँ मनीषी आचाय्र डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी (1109-1191), महान राजनेता जयप्रकाश नारायण (1102-1191), मिथिलाक प्रख्या त चित्रकार उपेन्द्रय महारथी (मृत्युि 1181), मिथिलाक यशस्वीर राजनेता ललित नरायण मिश्र (1122-1195), एवं दरभंगाक राजा बहादुर विश्वेलश्व1र सिंह (1108-1193) इत्या्दि व्यएक्तित्वमक प्रसंगमे अपन निजी धारणाकेँ रूपायित कयलनि। एहिसँ अतिरिक्त ओ अपन पूज्यक पिताश्री आ पूज्या माता पर सेहो संस्म1रणक रचना कयलनि1 एहि सिरीजक अन्त्र्गत समाजक उपेक्षित आ तिरस्कृोत वर्गक प्रति हुनकर हृदयमे असीम श्रद्वा, अगाध प्रेम आ अपार सहानुभूति छलसनि तकर यथार्थताक प्रतिरूप भेटैछ सोमन सदाइ, गोदपाडि़नी नट्टिन एवं नंगटू साँढ़ मे जाहिमे ओ ओकर वास्त्विक पृष्ठ भूमिक रेखांकन कयलनि। सरकारी तन्त्रवक परिवेशमे भ्रष्ट चारी थानेदारक संग कोन स्थितिमे साक्षात्कारर भेलनि तकर यथार्थ क्रिया-कलाप दिस हुनक ध्याान केन्द्रित भेलनि तकरो एहि सिरीजक अन्तर्गत अनलनि। व्ययवसायसँ ओ होमियोपैथ रहथि। ओ एक पहाड़ी रोगिणीक प्रसंगमे सेहो लिखलनि जे हुनकासँ इलाज कराबय आयल छलीह। हनुकाँ सँ भटँ भेल छल क अन्तोर्गत ओ स्मृलति-सूत्र आ साहित्यिक रिक्त ताक जीवन-परिचय विचार-धारा, साहित्यिक प्रवृत्ति आ सामाजिक गतिविधिक परिचय प्रस्तुकत कयलनि। एहि संस्म-रणात्मखक निबन्धवमे ओ ने केवल प्राचीन परिपाटीक परित्यानग कयलनि, प्रत्युात नव जीवन दष्टि आ नव पद्वतिक श्रीगणेश कयलनि। एहन अनुभति परक कृति सभमे ओ अपन अतीतक ओहि प्रसंगक उद्भभावना कयलनि जे हुनक साहित्यिक व्य क्तित्विक नियामक सिद्व भेल। एहि सिरीजमे जतबे संस्मअरण उपलब्धत अछि दवबे ओ तदयुगीन साहित्यिक गतिविधिक दस्तानवेज थिक जे मैथिली साहित्योेतिहासमे अत्य न्ता अहं भूमिकाक निर्वाह करैछ। भावनात्मिकता आ वैयक्तिकताक संगहि संग वैचारिकताक अद् भुत समन्वूय एहिमे भेल अछि। सैद्वान्तिक दृष्टिएँ, हुनक संस्म रण साहित्यम साहित्यिक संस्मकरणक विशिष्टच गुणसँ अलंकत आ महत्त्वपूर्ण अछि। एहिमे कथात्महकताक दृष्टिएँ कथा, वैचारिकताक दृष्टिएँ निबंध आ भावनात्मवकताक दृष्टिएँ कविता एहि तीनू विधाक त्रिवेणीक अभूतपूर्व संगम भेल अछि। हिनक संस्मूरणमे अनुभूति, वर्णन, विवरण, विचार, भाव, यथार्थ, आ कल्पिनाक अद् भुत समन्वसय भेल अछि। हिनक संस्मनरणात्मीक निबन्ध क मूलाधार भावना जे काव्यांत्मलकताक सहज गुणसँ अलंकृत अछि। एहि सिरीजक संस्ममरणक अनुशीलनसँ अवबोध होइछ जे मणिपद्यकेँ भारतीय साहित्यआक संगहि-संग पाश्चा।त्यी साहित्य क सेहो गहन अध्यधयन छलरनि जकर वास्तकविकताक परिचय हुनक उपर्युक्त संस्मणरणान्तअर्गत डेग-डेग पर उपलब्धल होइछ। ओ अपन एहि रचनान्तुर्गत एहन वातावरणक निर्माण कयलनि पाहिसँ पाश्चाोत्यल साहित्यछ चिन्तचक लोकनिक विश्वर प्रसिद्व रचना सभक सेहो विवरण प्रस्तुोत करबामे कनियो कुंठित नहि भेलाह जे ओहि अवसरक हेतु उपयुक्त हेतु उपयुक्त छल। एहिमे गांधीवादक संगहि-संग मार्क्सेवादक छौंक स्थतल-स्थिल पर भेटैछ। हुनका सँ भँट भेल छल मे तीव्र मानवीय संवेदना, व्याथपक सहानुभूति, सजल करूणा ममता आ आत्मी यता अछि जे अन्यंत्र दुर्लभ अछि। एहिमे नोर आ तीव्र आवेगक गम्भीआर चित्र तथा सामाजिक, राजनीतिक विचारक स्पिष्ट् फराकहिसँ चिन्हनल जा सकैछ। एहिमे साहित्यीकार, शिक्षाविद्, राजनीतिज्ञ मातृभाषाक उन्नाफयक, समाजसेवी, कलाकार आ विद्वत् वर्गसँ सम्बकन्धित व्यिक्तिक संग साक्षात्कातर अछि जे वर्त्तमान परिप्रेक्ष्येमे अतिशय ज्ञानवर्द्वक थिक।
मणिपद्य एक पैघ यायावर रहथि। साहित्यिक यायावरकेँ एक अद् भुत आकर्षण अपना दिस आकर्षित दिस आकर्षित करैछ, ओ मन्त्र मुग्धतभ’ कए ओहि दिस आकर्षित भ’ जाइछ। एहन साहित्यक सर्जनमे ओ संवेदनशील भ’ कए निरपेक्ष रहथि1 यायावरीक क्रममे हुनकर रस्तारमे पड़निहार मंदिर, मसजिद, मीनार, विजय स्त म्भ , स्मा रक, खण्डमहर, किला, कब्रीस्ता्न आ प्राचीन महलक संस्कृहतिक, कला आ इतिहासकँ एकत्रितक’ कए अपन यात्राक प़ष्ठ,भूमि तैयार कयलनि। हिनक उपलब्धज यात्रा-साहित्यि संस्मनरणात्मठक थिक जाहिमे ओ एक सामान्यल यात्री जकाँ अपन प्रभाव, प्रतिक्रिया आ सम्वेनदनाकेँ महत्वम देलनि। एहि सिरीजकेँ ओ ओहीठाम गेल छलहुँ नामे यात्रा-वृतान्तत प्रस्तुयत कयलनि जकरा अन्तथर्गत कोर हाँस गढ़क सौझ (1162), ई आषाढ़क प्रथम दिन (1163) पुण्याभूमि सरिसव पाही (1168), कुलदेवी विश्वेजश्वपरी (1168), त्रिशुला तट प्रवास (1161), एकटा पावन प्रतिष्ठा न (1191), प्रसंग एकटा स्मारक का (1195), महिषी साधना/साधना/संकेत (1195) एवं विसफीसँ वनगाम धरि (1183) आदि उल्लेाखनीय अछि।
ओहिठाम गेल छलहुँ मे ओ साहित्य क समग्र जीवनक अभिव्यसक्ति रूपमे ग्रहण कयलनि। हिनका लेल प्रकृति सजीव अछि यात्रामे जे पात्र भेटलनि ओ हुनक आत्मीय आ स्व्जन बनि गेलथिन। हिनक यात्रा-साहित्यपमे महाकाव्यत आ उपन्याससक विराटत्तत्वस कथाक आकर्षण, गीति काव्य्क मोहक भावशीलता, संस्म रणक आत्मीसयता, निबन्ध क युक्ति सभ किछु अनायासहि भेटि जाइत अछि। ओ जे देखलनि, अनुभव कयलनि तकर यथार्थ चित्र एहिमे प्रस्तु त कयलनि। एकर सर्वोपरि वैशिष्ट्यत थिक-औत्सुलक्यन जे पाठक एकबेर पढ़ब प्रारम्भत करैछ तँ ओकर समाप्ति जा धरि नहिभ’ जाइछ ताधरि हुनका चैन नहि होइत छनि। हुनका भूगोलक विशद ज्ञान छलनि तेँ कोनो स्था्नक भौगोलिक वर्णन करबामे ओ निपुणता देखौलनि जकर यथार्थक परिचय एहिमे उपलब्धय एहिमे करौलनि1 एहि श्रृंखलान्त र्गत जे रचनादि उपलब्धा अछि ओकर चिन्तबन चिन्तकन-मननसँ स्पखष्ट प्रतिभाषितभ’ भ रहल अछि जे ओ वर्णित वस्तुधक फिल्मां कणक’ देलनि जे पाठकक समक्ष वर्णित वस्तुपक समग्र चित्र सोझाँ आबि जाइछ। हिनक यात्रा-वृतान्त् शौली पर औपन्या सिक शैलीक प्रभाव परिलक्षित होइत अछि जे ओहिमे स्थाान विशेषक विस्तृात चित्रण कयलनि जहिना ओ देखलनि तहिना तकर यथार्थ चित्रण पाठकक समक्ष प्रस्तु त कयलनि। पाठककेँ सहसा आभास होमय लगैत छनि जेना ओहो ओहीप यात्राक सहयात्री होथि। हिनक वर्णन-कौशल चित्रात्मगक होइत छलनि। एहन चित्रात्मठक वर्णण निश्चीये अप्रतिम प्रतिभाक परिचायक थिक जे सामान्यह रचनाकार द्वारा सम्भरव नहि। ओ जाहि वस्तुक वर्णन कयलनि तकर रनिंग कमेन्ट्रीा ओहिना प्रस्तुदत कयलनि जेना आइ काल्हि क्रिकेट खेलक मैटानसँ मैदानसँ रेडियो वा टेलिभीजन पर देल जाइछ। यात्रा-विवरणमे रोचकता अपरिहार्य गुण मानल जाइछ तकर सम्यिक निर्वाह हिनक ओहि ठाम गेल छलहुँ मे भेल अछि। ओ अत्यपन्त भावुक हृदयक व्यनक्ति रहथि तेँ बिनु कोनो राग-द्वेषक ओकर यथार्थ वर्णन कयलनि। अपनाकेँ सत्य आ ज्ञानक भण्डाथर बुझिक’ नहि तथा पाठककेँ शिक्षित करबाक मनसा हुनकर कदापि नहि छलनि, जेना ओ पञ्चभूत सँ भिन्ना-भिन्न चरितक सहायतासँ भिन्न -भिन्न् दृष्टिकोण उपस्थित कयलनि जाहि प्रकारेँ ओहि ठाम गेल छलहुँ मे जेना ओ अपनहि संग तर्क करैत यात्राक समापन कयलनि। एहि श्रृंखलान्तुर्गतक रचनामे ओ जे किछु मैथिली पाठक केँ द’ पौलनि ओ सभ हुनक आत्मश-परीक्षणक स्वचगत कथन थिक। मैथिलीक प्राचीन पत्रिकाक अनुशीलनसँ ज्ञात होइछ जे मणिपद्यक प्रबल इच्छान छलननि जे ओ अपन व्य्क्तिगत एवं साहित्यिक जीवनक आधार पर आत्मककथाक एक विस्तृ त पुस्त कक रचनाक रकथि तकर प्रतिमान उपलब्धा होइछ सांस्कृ तिक समिति, मधेपुर, मधुबनी द्वारा प्रकाशित स्मृतति नामक स्माारिकामे तथा मैथिली प्रकाश मे प्रकाशति बाटे-घाटे (1183) एवं अनजान क्षितिज (1183) मेा बाटे-घाटे पहिने प्रकाशित भेल स्मृमति मे जे पश्चा(त् जाक’ मैथिली प्रकाशमे पुन: प्रकाशित भेल1 एहि भेल। एहि दुनू आलेखसँ विषय स्प(ष्ट होइछ। वस्तुीत: ओ आत्मरकथा लिखलनि वा नहि से अनुसन्धेुय थिक। मणिपद्यकेँ भाषा पर जबरदस्तृ अधिकार छलनि। हुनक भाषाक चमक कहियो फिक्काि नहि पड़लनि। अपन विलक्षण भाषाक कारणेँ ओ मैथिलीमे अनुपम उदाहरण रहथि। मैथिलीमे ओ अपन भाषा आ वर्णन-कौशलक कारणेँ प्रख्या त रहथि। चाहे प्रकृतिक दृश्यि हो वा महानगरक कोलाहल पूर्ण वातावरण हो ओकर अत्येन्त मनोहारी वर्णन अपन भाषाक बल पर कयलनि। हुनक डायरी, हुनका सँ भेल भेल छल, ओहिठाम गेल छल हुँ एवं आत्मककथा सभक भाषा-शैली अलंकृत अछि जाहिमे कतहु अस्वाहभाविकताक आभास नहि भेटैछ। विम्ब-धार्मिता हुनक भाषाक सर्वाधिक वैशिष्ट्य् थिक1 एहन भाषामे संगीतात्म।कताक लय आ धाराक प्रवाह अछि। भाषाक धनी मणिपद्य अपन विचार-वल्लअरीक प्रत्या ख्यािनमे शब्द क एहन अनुपम विन्या स कयलनि जे हिनक गद्यमे सेहो पद्यक सौष्ठव परिलक्षित होइत अछि। हुनक भाषामे रूप, छन्दि आ सुस्वावदुता अछि जे पाठकक संग हुनक व्य्वहार, सौजन्य , आसक्ति आ हास्यआ-व्यंिग्युक बोध होइछ आ जगक संग ओकर व्युवहार मे राग ओ दूरदर्शी काल्पयनिकताक पुट भेटैछ। ओ तथ्युपूर्ण भाषाक प्रयोग कयलनि। प्रस्तुओत संकलनक भाषा काव्यामयी अछि जे स्थ ल-स्थहल पर ओ अनुप्रास, उपमा, उत्प्रेभक्षा आ रूपक का झड़ी लगा देलनि जे हिनक एहि साहित्यथक अनुपम उपलब्धि थिक।
हिनक भाषा मिथिलांचलक लोकक माटिक भाषा थिक। हिनक भाषा पर हिनक व्यकक्तित्व क एतेक गम्भी र छाप छलयनि जे ओ सुगमतापूर्वक चिन्ह ल जा सकैछ। हिनक भाषा मे एहन अद् भुत शक्ति आ वैभव पूर्ण अछि कारणेँ हिनक रचना सभकेँ बारम्बाेर पढ़बाक उत्सुअकता पाठकक मोनमे सतत जागृत होइत रहैछ चाहे ओ उपन्याबस हो, कथा हो, नाटक हो, एकांकी, कविता हो वा संस्मेरण हो। एहि मे ओ साधुभाषाक संगहि संग घरौआ ठेंठ चलन्त भाषाक स्त्रोातस्विनी प्रवाहित कयलनि। लोक शब्दारवलीकेँ मने मन स्वी कारक’ लेने रहथि जकर यथार्थ प्रतिरूप हुनक साहित्या न्तोर्गत प्रतिध्ववनित होइत अछि। शास्त्री य भाषाक संगहि ओ आंचलिक भाषाक अनुच्छिष्टू उपमानक प्रयोग प्रचुर परिमाणमे कयलनि। जनिका मिथिलांचलक ग्राम्यष-शब्दाकवलीक उपमानक रसास्वारदन करबाक होइन ओ मणिद्य-साहित्यलक अवगाहन करथु हुनका एहन-एहन शब्दा वलीक संग साक्षात्का र होयत-नि तकर यथार्थ अर्थ-बोधमे अवश्ये- कठिता होयतनि। अन्यािय भारतीय भाषामे हिनक रचनादिक अनुवाद करबामे कतिपय समस्यान उत्पवन्नय होइछ जे ओकर समानर्थी शब्दच सुगमता पूर्वक नहि उपलब्धस होइ जाहि सन्दवर्भमे ओ प्रयोग कयलनि। विषयगत विविधताक अनुरूप हिनक भाषा-शैली सेहो विविध रूपा थिक। संस्कृ्त गर्भिता मिश्रित भाषा, काव्याषत्मैक आ भाव बहुत भाषा, सामान्य लोकक भाषाक संगहि संग ओ आलंकारिक भाषाक प्रयोग सेहो कयलनि। प्रस्तुैत रचना समूहमे मिथिलांचक माटि-पानिक अपूर्व सौष्ठयव अछि1 ई अत्यतन्तह छोट-छोट सरल वाक्यतक प्रयोग कयलनि जाहिसँ भाषामे चमत्कासर आबि गेल अछि। एहि रचना समूहमे ओ संलाप शैलीक प्रयोग कयलनि। काव्याक समानहि हिनक गद्य-भाषा सेहो अत्यैन्तग सरल, प्रवाह पूण्र आ माधुर्य युक्त अछि। भाव, भाषा आ संगीतक त्रिवेणीक संगम बनाक’ ओ गद्यक निर्माण कयलनि1 हिनक शब्द।-चयन अत्य न्तर शिष्टा, भावानुकूल तथा सरल वाक्यप-विन्यारस अत्य,न्ती सुदृढ़ अछि। हिनक गद्य-भाषामे सर्वत्र कविताक सरलता, तल्लीननता, तन्महयता आ तीव्रता अछि। फलत: पाठक कखनो कोनो पर अरूचिक अनुभव नहि करैछ; प्रत्यु त कलाकारक भावक संग बहैत चल जाइत अछि। ओ भाव-प्रवण रचनाकार। रहथि। अतएव जाहि स्थकल पर मार्मिक अनुभूति आ सुन्द्नर काल्पथनिकताक समन्वयय अछि ओतय भाषाक सौन्दसर्य प्रेक्षणीय अछि। अपन भावक अभिव्याक्तिमे ओ अत्यनन्तव आलंकारिक एवं व्य्ञ्जना पूर्ण शैलीक प्रयोग कयलनि। हुनक शैलीमे कल्पकना, भावुता, सजीवता आ भाषाक चमत्कायर दर्शनीय अछि। हुनक भाषा-शैलीमे स्पेन्द,न अछि, हृदयकेँ मथबाक शक्ति अछि, सुकुमारता आ तरलता अछि जे मैथिली मे अन्य त्र दुर्लभ अछि। मणिपद्यक गद्यक उदात्त रूप उपलब्धछ होइछ हुनक डायरी, हुनका सँ भँट भेल छल, ओहिठाम गेल छलहुँ आ आत्मद-कथा मे। ओ गद्य रचना कयलनि कविक समान, हिनक गद्यक गुण कविताक गुण थिक। प्रस्तुउत संग्रहक गद्यक तकर प्रतिमान प्रस्तुनत करैछ जे ओहिमे शब्दावलंकारक संगहि अर्थालंकारक अपूर्व चमत्कापर भेटैछ। हुनक गद्य-साहित्यए हो वा पद्य-साहित्यक हुनक व्यतक्तित्वचक अखण्डभता केँ प्रमाणित करैछ। जहिना स्मितफान मलार्भेक पालेरिक गद्यक समानहि सांकेतिक होइत छलनि मणिपद्यक गद्य-साहित्यह विषयोविशुद्वा आ आर रहित अछि। ओ अपन डायरी संस्मनरण, यात्रा वृतान्तँ आ आत्मोकथामे एकरे आधार बनौलनि आ अपन भावनाक, अपन कल्पयनाक, अपन बोध आ मत पक्षक विस्ताार कयलनि। प्रतिपाद्य संकलनक गद्य रचना एक रम्य् रचनाक प्रतिमान प्रस्तुत करैछ।
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preeti said...
premshankar singh jik aalek bad nik
Reply05/05/2009 at 02:05 PM
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Anand Priyadarshi said...
Premshankar Jik Manipadmak pothi par aalekh bad nik, pandityapoorna.
Reply05/05/2009 at 11:54 AM