विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

हास्य-व्यंग्य सम्राट प्रोफेसर हरिमोहन झा

प्रोफेसर प्रेमशंकर सिंह · 2009-05-15 · अंक 34

हास्‍यव्‍यंग्‍य सम्राट प्रोफेसर हरिमोहन झा
आधुनिक जीवन निश्‍चये विभिन्‍न प्रकारक विसंगति एवं विषमता द्वारा खंडित भेल जा रहल अछि। एहन स्थितिमे अभिव्‍यक्तिमे तिक्‍तता आयब अस्‍वाभाविक नहि। गंभीर रूपेँ आहत भेल मनुष्‍य जखन बाजत तखन ओ व्‍यंग्‍ये बाजत, जखन ओ किछु करत तखन प्रहारे करत। इऐह कारण अछि जे जखन रचनाकार आन्‍तरिक एवं बाह्य रूपेँ अपनाकेँ आहत अनुभव करैत छथि तखनओ व्‍यंग्‍यकार बनि जाइत छथि। व्‍यंग्‍यकारक उत्तरदायित्‍व भ’ जाइत छनि जे समसामयिक युगक समस्‍त विसंगतिक आलोचना प्रस्‍तुत करथि। वस्‍तुत: व्‍यंग्‍य एक एहन साहित्यिक अभिव्‍यक्ति अछि जाहिमे व्‍यक्ति तथा समाजक दुर्बलता, करनी-कथनीक अन्‍तरक समीक्षा वा निन्‍दाकेँ वऋभगिमा दए वार्णत: स्‍पष्‍ट शब्‍दक माध्‍यमे प्रहार कयल जाइत अछि। व्‍यंग्‍य र्णत: अगंभीर रहितहुँ गंभीर भ’ सकैछ, निर्दय रहितहुँ दयालु भ’ सकैछ, प्रहारात्‍मक होइतहुँ तटस्‍थ लागि सकैछ, मखौल लगितहुँ वौद्विक भ’ सकैछ, अतिश-योक्ति एवं अतिरंजनाक आभास देवाक बदला पूर्णत: सत्‍य भ’ सकैछ। व्‍यंग्‍यमे आक्रमणक मुद्रा तँ अनिवार्य अछि। प्राय व्‍यग्‍यकेँ उपहास, उपालभ्‍म, परिहास, प्रहसन, वाकू-वैदग्‍ध्‍य एवं वऋवित आदिसँ पृथक क’ देखबाक प्रचलन नहि अछि, किन्‍तु हास्‍य एवं व्‍यंग्‍यम किछु विपनता अछि। हास्‍य निप्‍प्रयोजन मुक्‍त एवं बाह्य धरातलक वस्‍तु होइछ तेँ ओ विशिष्‍ट नहि भ’सकैछ, परन्‍तु व्‍यंग्‍म कहियो निप्‍प्रयोजन नहि होइछ। व्‍यंग्‍यक प्रयोजन वस्‍तुत: गुढ़ एवं मार्तिक अछि।
हास्‍य मनकेँ सतेज एवं प्राणकेँ सजीव करैत अछि। प्राकृत-हास्‍य मानव स्‍वभावक उज्‍जवल गुण थीक। एहिमे घृणा वा विरक्तिक लेशो नहि रहैत छैक। सिद्वान्‍त, व्‍यवहार, धारणा एवं वस्‍तु स्‍वरूपक बीचक असंगति हमरा हँसवाक हेतु बाध्‍य करैछ। प्राकृत-हास्‍य कटुताक बोध नहि करबैत अछि, प्रत्‍सुत असीम सामान्‍यता एवं असंगति वा अन्‍तविरोध ‘हास्‍य-कर’ होइछ। गंभीर स्‍तर पर तँ ओ दु:ख, पीड़ा, वेदना उत्‍पन्‍न करैछ।
प्राकृत-हास्‍यमे एहि हेतु एक प्रकारक वृहत् अनुभतिक आशा रहैत अछि आ सामान्‍य अनभिज्ञता वा उपलब्धि सेहो। उच्‍चतम हास्‍यसँ कोमलता एवं करूणाचाक अभद संबंध रहैत अछि। हास्‍यसँ हमर अभिप्राय ओहि प्रत्‍येक मन: स्थि‍तिसँ अछि जकरा हास्‍य व्‍यंग्‍य, हँसी-ठट्टा कौतुक, विनोद-रसिकता आदि शब्‍दसेँ साहित्‍यमे व्‍यक्‍त कयल जाइत अछि। अंग्रैजीमे ह् युमर शब्‍दमे आअँरँनि, रौटाइअँ, फन, जोक्‍स, प्‍लेजन्ट्रि जेस्‍ट, विट, फारस, पैरडि, रिड्-इक्‍यूल, आदि द्वारा व्‍य‍क्‍त सम्‍पूर्ण मन:
स्थिति कोनो ने कोनो रूपसँ मिश्रित अछि। अतएब अंग्रेजीकहू युमर धारणसँ अर्वाचीन साहित्‍य अत्‍यधिक प्रभावित अछि।
रसमयी रचनाक सिद्वहस्‍त प्रर्ण हास्‍यरसावतार प्रोफेसर हरिमोहन झा आधुनिक मैथिली कयलनि अपन अद्वितीय प्रतिभाक परिचय देलनि अछि। एकरे फलस्‍वरूप ओ एतेक लोकप्रियता अजित कय‍‍लनि। एहिसँ सिद्व भ’ गेल अछि जे मिथिलाक पावन भूमि एहि क्षेतमे विद्यापतिक जन्‍म द’ सकैछ। हिनक उपलब्‍ध रचनामे गद्यक प्रधानता अछि हिक प्रदृत्ति कथा-साहित्‍य दिस विशेष रहल। हिनक पूर्ववर्ती कथाकार कथामे गद्यक उत्‍पन्‍न क’ अन्‍तमे पातक हत्‍या क’ दैत छलाह। अवसाद एवं निराशाक वातावरणसँ संपूर्ण मैथिली कथा साहित्‍य तिमिराच्‍छन्‍न भ’ रहल छल। मैथिली साहित्‍यमे ई श्रेय प्रो. हरिमोहन झाकेँ छनि जे सर्वप्रथम एहि प्रवृत्तिकेँ चिन्‍हलनिआ आ एहिसँ पृथक भ’हास्‍य-व्‍यंग्‍यक नव प्रवृत्तिक अवलम्‍बन कयलनि। मैथिलीक पाठककेँ अवसादमय वातावरणसँ फराक क’ हास्‍य व्‍यंग्‍यक एक नवीन मागेक रश्मि प्रदान कयलनि। मौथिलीमे हिनह हास्‍य-व्‍यंग्‍यसं युक्त रचनाम कन्‍यादान, द्विरागमत, प्रणम्‍य देवता, रंगशाला, खट्टर ककाक तरंग, चर्चरी, एवं एकादशी, पुस्‍तकाकार प्रकाशित अछि। एहिसँ अतिरिक्‍तो किछु कथा तथा स्‍फुट कविता समय-समय पर पतिकादिमे यत-तत प्रकाशित अछि जाहिमे हास्‍य-व्‍यंग्‍घक अजस्‍त्र धारा बहाओल गेल अछि। जीवनक प्रत्‍यक्ष देखल अनुभवगम्‍य रूपकेँ हास्‍य-व्‍यंग्‍यक माध्‍यमे चितित करब हिनक वैशिष्‍ट्य अछि। समकालीन मैथिल समाजक कुरूचिपूर्ण एवं सामाजिक विकृति पर कुठाराघात करैत-करैत ई अतिरजनाक आश्रय सेहो लेलनि अछि। जीबनमे अतविरोध, असंगति, क्षुद्र प्रव़त्ति, मूर्खतापूर्ण संघर्ष, बाबा वाक्‍य प्रमाणमूक हठधर्मिता, दम्‍भ, पाखण्‍ड, ढोंग, मिथ्‍या बड़प्‍पन, स्‍वार्थ-परता आदि हिनक हास्‍य-व्‍यंग्‍यक प्रमुख आलम्‍बन रहल अछि। हिनक रचनामे आचार, अनुष्‍ठान एवं धार्मिक वाह्याडम्‍बरक प्रति तीव्र आत्रोश भेटैत अछि। ई अपन रचनामे मानव मनक मोद, मोह, शोक, वेदनाकेँ एक मनोवैज्ञानिक जकाँ पर्यवेक्षण कयलनि अछि। वस्‍तुत: ग्राम्‍य परिवेशक यथार्थक अवतारणामे ई सिद्वहस्‍त छथि।
’कन्‍यादान’ एवं ‘द्विरागमन’ हिनक बहुचर्चित उपन्‍यास थीक। मैथिली उपन्‍यासमे‘कन्‍यादान’ क विशेष महत्‍व अछि। एहिमे अनमेल विवाहक समस्‍याकेँ उठाओल गेल अछि। पति-प‍त्‍नीक ई बेमेल ओकर अवस्‍था वा रूपक कारणे नहि, प्रत्‍युत शिक्षा दीक्षाकेँ ल’ कय अछि। एक एम.ए. पास युवकक विवाह ए.बी.सी. पर्यन्‍त नहि जननिहारि कनियाक संग होइत छैक। एहि प्रकारक विवाहकेँ उपन्‍यासकार नाटक काहेकद्ध भर्त्‍सना करैत छथि। अतएव स्‍त्री-शिक्षा ‘कन्‍यादान’ क प्रमुख स्‍वर थीक। एतय उपन्‍यासकार मैथिल समाजमे प्रचलित वैवाहिक विपमताकेँ अपन हास्‍य पृष्‍ठभूमि बनौलनि।
एकर नायक सी.बी. मिश्र अत्‍याधुनिक पाश्‍चात्‍य सभ्‍यताक प्र‍तीक थिकाह जे ग्रामीण परिवेशसँ अनभिज रहलाक कारणेँ अपन आतृभाषा पर्यन्‍तसँ अपरिचित भ’ जाइत छथि। नायिका बुच्‍ची दाइ प्राचीन मैथिल संस्‍कृतिक प्रतीक थिकीह जनिका पर पाश्‍चात्‍य सभ्‍यताक कोनो छाप नहि छनि। नायक-नायिका संधर्षमय परिस्थितिक चिद्रण कय उपन्‍यासकार हास्‍य-ध्‍यंग्‍यसेँ ओत-प्रोत वातावरएणक निर्माण पाठकक हेतु कय‍लनि अछि। कन्‍यादानक अवसर पर जखन नायकस नाम पुछल जाइत छनि तखन ओ उत्तर दँत छथि—‘हमर नाम छय सी. सी. मिश्रा।‘1 एहन उत्तर सुनि मिथिलाक अशिक्षित महिलावृन्‍दक अट्टहाससँ सम्‍पूर्ण वातावरण गुंजित भ’ जाइत अछि। एहि पर एक तरूणी जे अपनाकेँ सबसेँ कुधियारि बुझैत छवि ओ छथि ओ टिप्‍पणी करैत छथिन—‘नखन तँ बोतल मिसर हिंनक बापे होइथिन।द्धद्ध वस्‍तुत: एहि प्रकारक कथोपकथन उपन्‍यासमे अनेक स्‍थल पर आयल अछि, जतय उपन्‍यासकार हास्‍य-रससँ युक्‍त वातावरणक निर्माण करबामे सफल भेलाह् भेलाह् अछि, ओतडि अशिक्षित मैथिलानी पर व्‍यंग्‍य सेहो कयलनि अछि।
एकर किछु चरितकँ व्‍यग्‍यंकार एहि प्रकारेँ प्रस्‍तुत कयलनि अछि जे पाठक पर अपन अमि‍ट छाप छोड़ैत छथि। ‘कन्‍यादान’ क घटकराज टुन्‍नी झाक स्‍वरूप, बजबाक शैली एवं उच्‍चारण प्रऋियासँ लोक चीन्हि जाइत अछि जे घटकैती करबामे पूर्ण अनुभवी भ’ गेला पर कथा तीन प्रकारेँ स्थिर करैत छथि ‘’एकटा खनखनौआ जाहिमे कन्‍यागत खनखनाके टाका हँसोथि लैत छथि। दोसर मानि लिय टनटनौआ जाहिमे बर पक्ष टनटनाक’ हजार पाँच शैक तोरा गनबैत छथि। तेसर मानि लिय ठनठनौआ जाहिमे वर कन्‍यागत दुह ठनठन गोपाल भए काज करैत छथि। हिनक खनखनौआ, टन-टनौआ, ठनठनौआ बलाघटकैतीक वृत्तान्‍त सुनितहि पाठक हँसैत-हँसैत लोट-पोट भ’ जाइत अछि। घटक-राज अपन वाक्-पटुतासे सेहो मनोरंजन करैत छथि। घटकराजकेँ घटकैतीक प्रति ई वैज्ञानिक दृष्टिकोण देखाय उपन्‍यासकार हनका अपूर्व क्षमता प्रदान कयलनि अछि। जनैत एहिसै सफल चरिख कन्‍या-दानमे आर कोनो नहि अछि तकर कारण जे टुन्‍नी झा जकाँ अपन पक्षक प्रतिपादन बुते नहि भेलनि। ओ सामाजकि दोप तिलक-प्रथाक स्‍तम्‍भ स्‍वरूप थिकाह। एकरे फलस्‍वरूप मैथिल समाज दिन प्रतिदिन जजेरित भैल जा रहल अछि।
’कन्‍यादान’ एवं द्विरागमन अविस्‍मरणीय चरिख झारखण्‍डीनाथक क्रिया-कलाप, बाजब-भुकब, चलब-फिरब, खायब-पीयब सभमे हल्‍लुक हास्‍य भेटैत अछि। झारखण्‍डीकेँ वास्‍तवसे एतबा ज्ञान नहि छनि जे लाल काकीक तारक विपयमे ककरो आगूमे चर्चा नहि करबाक प्रतिज्ञा क’ एकर पालन करी। डाक्‍टरक संग हुनक कथोपकथनक एक अंश थवणीय अछि ‘’हमरा आङनमे कव्जियत बूझि पाता है। रामजीक परतापसँ कहियो-कहियो पेटो फूलि जाता है और लोक बेद नीके रहता है।‘’ जतेक बेर‘कन्‍यादान’ पाठक द्वारा बयम पुछला पर हुनक उत्तर तँ सुनू—‘’ सरकार ! हमरा लोक सभ दुलारसँ ‘खट्टर’ कहता है, लेकिन असल नाम झारखण्‍डी माय-बाप राखि दिया। और उमिरमे सरकार सब भाईसँ छोट है।‘’ ‘द्विरागमन’ मे झारखण्‍डीनाथ लाल ककाक ओतय बुच्‍ची दाइक शिक्षिका मेम साहेबक स्‍वागत करबाक हेतु प्रस्‍तुत होइत छथि। मेम साहेब हुनकासँ जिज्ञासा करैत छथिन—‘’ बाथ एहि ठामसँ बहुत दूर है। कोस छबेक-सातेकसँ कम नहि पड़ेगा। बाथ (गाम) मे आपका के रहता है ?‘6
बहवाँडि उत्तर तथा अपरिचित भाषाक नकलसँ एहिठाम हँसी लगैत अछि। उपन्‍यासकार हास्‍य उत्‍पन्‍न करबाक हेतु कतिपय चरित केँ अवलम्‍ब बनौलनि अछि। पुरोहित, जनिका लेल शुद्व उच्‍चारण करब गुण नहि, प्रत्‍युत आवश्‍यक छनि ; तोतराइत छथि। एहन पुरोहितक प्रसंगमे उपन्‍यासकार कहैत छथि—‘’ पंडित नवोनाथ झा तोताराइत-तोतराइत कंठरूपी बोरासँ उभड़-खाभड़ मंतक रोड़ा गड़गड़ा कए उझिलय लगलाह।‘’; मोहरिर जे लिखाइ-पढ़ाइ करैत-करैत बूढ़ भ’ गेल छथि, किन्‍तु तारक ‘क’ अक्षर पढ़बाक परिश्रममे परिश्रममे असफल भ’ जाइत छथि। बड़का गामवाली एवं बटुक जी प्राचीन परंपरागत रूढि़क झुंडमे रहितहुं शुद्व ओहि पक्षक पक्षपाती नहि छथि। हिनका सभक चरित्रमे साधारण बुद्वि उपन्‍यासक अन्‍य पात्रक अपेक्षेँ अधिक मात्रामे छनि। बटुक जी मूर्ख रहितहुँ अदूषित बुद्विक छथि। हिनक वार्तालय पाठकक मनोरंजन करैत अछि। एहि दृष्टिसँ सी. सी. मिश्रक प्रसंग हिनक कथ्‍य विलेक्षण अछि —‘’ हमरा लेखेँ त कुछ न छथ। ‘शंशकीरित’ मे हमरा साथ न बोल सकँ छथ। एगी कनी गो ‘जोतिश’के बाम पूछ देलिएन ता‍हीमे ढोकार हो गेलन। शीशूबोध के एगो इशलोक पूछलिऐन त चूड़ा अमौट दुन्‍नू खसे लगलैन। कुछ न छथ। मङनीमे महग छथ’’ ग्रामीण परिवेशमे रहितहुँ बड़का गामबाली पाश्‍चात्‍य सभ्‍यताक प्रतीक थिकीह जे सी. सी. मिश्रकेँ अपन हाथक कठपुतरी बना लैत छथि। हिनकेमे सी. सी. मिश्र अपन भावी पत्‍नीक मधुर कल्‍पना करय लगैत छथि जकर वास्‍तविकताक रहस्‍योदघाटन चतुर्थीक राति भ’जाइत अछि। उपर्युक्त नरित्र उपन्‍यासमे ‘कौमिक वातावरण उत्‍पन्‍न करबामे सहायक भेल अछि। भेल अछि। एहन-एहन पात्रक वृत्तान्‍त पढि़ क’ हँसी तँ लगबे करैछ, संगहि इही अनुभव होइछ जे समाजक प्रत्‍येक अंगमे सुधारक प्रयोजन अछि।
‘प्रणम्‍य-देवता काटाक्ष-पूर्ण रेखा-चित्र अछि जे प्रधानत: सामाजिक आलोचना प्रस्‍तुत करैत अछि। एहिमे ओ प्राचीन कथा-पद्वतिकेँ ग्रहण क’ गंभीर सँ-गंभीर विषयकेँ सरस-सुस्‍वादु बना क’ जनमन-रंजनक संग रूढि़-ग्रस्‍त जीर्ण-शीर्ण, विचारधारा परआधात‍ कय नवीन प्रगतिक प्रेरणा दैत छथि। हिनका ने तँ प्राचीन अन्‍ध-विश्‍वासक प्रति निष्‍ठा छनि आने नवीनताक प्रति आसक्ति। एहिमे हास्‍य-व्‍यंग्‍यक सबसँ उपयुक्‍त स्‍थल तखन अवैत अछि जखन ओ भोजन अथवा धर्माचरणक प्रसंगकेँ ल’ कय कथाक पुष्ठिभूमि बनबैत छथि। जेना ‘विकट-पाहुन’ क चित्रणमे भोजन-प्रियता एवं अव्‍यवहार-कुशलताक कारणेँ हिनका सभकेँ दोसराक असौकर्यक कोनो ध्‍यान नहि रहैत छनि। पाहुनलोकनि अपन परिचय प्रोफेसर साहेवक लग कोना दैत छथि से देखू—‘’हें-हें-हें-हें अपने जे किने से हमरा चिन्‍हने हैब1 चीन्‍हब कोना ? कहियो देखने रही तखन ने ! हम अपनेक मसियौतक जे किने से-साढ़ू क पिसिऔत भाय होयबैन्‍ह।‘’ एहि प्रकारक परिचये वास्‍तवमे हास्‍यास्‍पद भ’ जाइत अछि। अध्रपक्‍क कटहर, एक हत्‍था पाकल केरा, एक बोतल धृत, माल्‍टेड मिल्‍क, एक पसेरी दालमोट एवं एक धरिका अमोटसँ गजेन्‍रद्र नाथ, ब्रजेन्‍द्र नाथ, भीमेन्‍द्र नाथ एवं दिसम्‍बर नाथक पनरिआइ होइत छनि। आब भोजनक सूची दिस दृकूपात करू— ‘’किन्‍तु हमर सरबेटा दिगम्‍बर नाथ—हें-हें-हें बिनु सोजने भात कोना खैताह ? हिनका लेल छनुआ सोहारी, अनोन तरकारी बना देबँन्‍ह। मधुरक संग खा लेताह। हमरालोकनि तँ- हेँ-हेँ-हेँ-हेँ धरे थिक। भोजनमे जे किने से भात, दालि, तरकारी, धृत, दही, चीनी, सब, आर की। हमरा संगमे एकटा जमीरी नेबो अछि से दूरि भेल जाइत अछि। तेँ थोड़ँ क मोछो मंगा लेब।‘’ मैथिलक भोजनप्रियताक एलबम एहिमे भेटि जाइत अछि जे हास्‍य उत्‍पन्‍न करबामे सहायक सिद्व होइछ।
’प्रणम्‍य-देवता’ मे धार्मिक आचरणक उल्‍लेख ‘धर्मशास्‍त्रचार्य’ एवं ‘ज्‍योतिषाचार्य मे विशेष रूपेँ भेल अछि। धर्मशास्‍त्रचार्य महामहोपाध्‍याय धुरन्‍धर शास्‍त्री अपन धार्मिक एवं आडम्‍बर ततेक ने पसारैत छथि जे पहिने ओ गामक लोक पर हँसैत छलाह; किन्‍तु बाह्याडम्‍बरक विरोध भेला पर आब हुनके पर संपूर्ण गाम हँसय लगैत अछि।‘ज्‍योतिपाचार्य ‘क अन्‍तर्गत ज्‍योतिप जनित आडम्‍बर पर व्‍यंग्‍य कयल गेल अछि। एहि दोपपूर्ण कारणेँ आदिस्‍यनाथ एवं मार्त्तण्‍डनाथक बीच टीका-‍टिकोअलि सेहो भ’ जाइत छनि।
एहिमे सामाजिक समस्‍याक अतिरिक्‍त पारिवारिक समस्‍या पर सेहो व्‍यंग्‍य कयल गेल अछि। ‘साझी आश्रम’ मे जे चित्र प्रस्‍तुत कयल गेल अछि ओहि आधार पर परिवार सुख-साधनक बदला दु:खक अपार सागर बनि गेल अछि। वस्‍तुत: साझी आश्रयक जे दुर्दशा होइत छैक तकर एलबम भगीरथ झाक परिवारमे भेटैत अछि।11
व्‍यग्‍यकार अत्‍याधुनिक युगमे फैशनक बढ़ैत स्‍वरूप पर दृष्टिगम करैत छथि तँ हुनक लेखनी अत्‍यधिक प्रखर भ’ जाइत छनि। एहि, प्रकारक फैशनक अत्‍यधिक प्रभाव समकालीन नवयुवक समुदाय पर पड़ल अछि। अत्‍यधिक बनने दुर्घटना भ’ जैबाक संभावना रहैत छैक। आइ काल्‍हुक अप-टुडेट लेडी’ क प्रतीक थिकीहु ‘मंजुला देवी।‘’12‘नकली लेडी’ कोना सहजहि गमा जाइत छथि से ‘प्रणम्‍य देवता’ क ‘अंगरेजिया बाबू’क पत्‍नी ‘चमेली दाइ छथि।13 हुनक नकली स्‍वरूप तँ देखू—‘’ हे भगवान ! ई की !श्रीमती जी सबटा चौपट कैलैन्हि। नाक पर ‘स्‍नो’ लागल। कनपटद्यटी पर ‘पाउडर’पोतल ! गाल पर ‘लिपिस्टिक’ ढेउरल ! ठोर पर ‘नेल पालिश लेभरल ! हाय ! हाय !बहुरूपियाक वेश बना लेलन्हि ।‘’ जे ‘हिन्‍दुस्‍तानी साहेब’ अंग्रेजक ‘प्रियतम सम्‍बन्‍धी बनय चाहैत छथि तनिक झलक मधुकान्‍त चारत्रमे भेटैत अछि।
’रंगशाला’ क प्रत्‍येक कथा ओना तँ हास्‍य-व्‍यंग्‍सँ ओत-प्रोत अछि, किन्‍तु एकरा हिनक अन्‍यान्‍य रचना सदृश लो‍कप्रियता नहि भेटलैक। एहि प्रसंगमे ओ लिखैत छथि—‘’ई तेहन मनोनुकूल नहि भेल आ ततबा लोकप्रियो नहि भ’ सकल। तथापि एकरा द्वारा एक ढर्रा कायम भ’ गेलँक और गोटा नव-नव पर कथा-कहानी लिखय लगलाह।‘’15एकर प्रत्‍येक कथा एक वर्ग विशेषक प्रतिनिधित्‍व करैछ। हास्‍य-व्‍यंगक माध्‍यमे कथाकार सामाजिक दुर्नीतिसँ समाजकेँ पथक करबाक प्रयास कयलनि अछि। पात्रक चयनमे कथाकारकेँ बीआय नहि पड़लनि कथाकार स्‍वयं एहि तथ्‍यकेँ स्‍वीकार करैत छथि—‘’ हँसि, हँसि कऽ आनन्‍द कियेक ने लेल जाय ? क्षणिके विनोद सही, रसक छिटका तँ भेटत। कोन ठेकान, कदाचित एतबे मात्र सत्‍य होइक।‘’16
हास्‍य व्‍यंग्‍यक अत्‍यन्‍त सजीव ‘खट्टर तरंग’ मे उपलब्‍ध होइछ। एकर कधा नायक खट्टर कका पूर्णत विनोदी प्रकृतिक व्‍यक्ति छथि। हिनक प्रत्‍येक बात विनोदपूर्ण होइत छनि। ई अपन प्रत्‍युत्‍पन्‍नमतित्‍वक कारणेँ सदिखन काव्‍य-शास्‍त्र:विनोदक धारा प्रवाहित करैत्‍ छथि। हिनक विनोदपूर्ण वार्तामे व्‍यंगयकार व्‍यक्ति, समाज धर्म, दर्शन आदिक कटू आलोचना करैत छथि। थैकरे जकरा ‘राउण्‍ड एबाउट पेपर्स’ कहलनि तकरा व्‍यंग्‍यकार खट्टर ककाक समक्ष परम्‍पर-के केन्‍द्र विन्‍दु बनबैत छथि। ओकर चारू भाग नवीन विचार-धारा प्रस्‍तुत करैत छथि। आधुनिक परिप्रेक्ष्‍यमे प्राचीन मान्‍यता कोनो अर्थ नहि रखैत अछि। ‘खट्टर ककाक तरंग’ मे वणित विषय विचारात्‍मक, सरस एवं मनोरंजक अछि। हिनक वात लुती सन होइत छनि। ई देशक मूर्खताक श्रेय पंडितकेँ दैत छथि। एहि कमये ई असली एवं नकली पंडितक सम्‍पक् विश्‍लेषण कयलनि अछि—‘’ असली पंडित विद्याक अन्‍वेषणमे रहैत छथि, नकली पंडित विदाइक अन्‍वेषणमे। असली ज्ञानक विस्‍तार करैत छथि, नकली पंडित धोधिक विस्‍तार असली पंडित सूर्खताक संहार करैत छथि, नकली पंडित केवल मधुरक।‘’ हिनका अनुसारे वैह वासतवमे पाडित्‍य प्राप्‍त कयने छाथे जे अपन बुद्विक प्रयोग नित-नूतन आविष्‍कार हेतु करैत छथि। क
वेद-पुराण, कमेकांड-धर्मशास्‍त्र गीता-वेदान्‍त, रामाण-महाभारत, ज्‍योतिष-आयुर्वेद, तंत्र-मंत्र, देवी-देवता स्‍वर्ग-नरक, पुनर्जन्‍म-मोक्ष, पाप-पण्‍य सभकेँ ई कोना लैत छथि से देखबाक एवं हँसबाक अवसर एहीमे भेटँत अछि। एकर मर्मस्‍पशी व्‍यंग्‍य अन्‍तस्‍तलमे पहुँचि सुरसुरी लगा दैत अछि। ओ अन्‍ध-विश्‍वास, धार्मिक पाखण्‍ड दोंग, रूढि़ आदिक प्रति व्‍यंग्‍यक माध्‍यमे भयानक विद्रोह करैत छथि। एहि प्रकारक मतक खण्‍डनमे हिनका ततवा रस भेटँत छनि जे सामाजिक रूढि़ वा अन्‍धविश्‍वास पर प्रहार करबाक हेतु ई संदिखन भंगघोटना लेने तत्‍पर रहैत छथि। जा‍धरि पाश्‍चात्‍य-प्राच्‍य सभ्‍यता एवं संस्‍कृतिक समन्‍वय नहि हैत ताधरि जीवनक कोनो मूल्‍य नहि। अतएव एहन समन्‍वय कोन प्रकारेँ होमक चाही ? युगक अनुसारेँ समन्‍वय अनिवार्य प्रतीत होइत अछि। एहि प्रसगमे खट्टरककाक दावा छनि जे ओ गोनू एवं गंगेश दुनूक वंशज थिकाह तखन पाश्‍चात्‍य सभ्‍यताक प्रतीक बूझब भ्रम थीक। हुनक कथन छनि जे ‘’ही इयैह बात तँ बुझबामे नहि अबैत अछि। कोन प्रकारेँ सम्‍न्‍वथ करै कहैत छह ? आबसँ शिवजीक माथ पर ‘सोडा वाटर’ ढारि दिऐन्‍ह ? भगव‍तीकेँ औचरक बदला ‘गाउन’ ओढ़ा दिऐन्‍ह? कुल देवताकेँ लिपिस्टिक लगा दिऐन्‍ह ? श्राद्वमे ‘केक’ ल’ कए पिंड दी? ब्राह्यण भोजन करा क’ ‘बिल’ द’ दिएन्‍ह ? जनउ धोबक हेतु ‘लोण्‍ड्री’ मे द’ दिऐक ? तारा काकीकेँ अंग्रेजीमे समदाउन गाबय कहिऐन्‍ह।‘18
एहि प्रकारेँ परम्‍परावादिताक जालमे ओझरयल समाज एवं व्‍यक्ति पर ओ जे व्‍यंस्‍य कयलनि अछि ताहिमे शाश्‍क्‍तक माधुर्य्य एवं कुनैनक तिक्तताक प्राचुर्य अछि। हुनक कथन छनि ‘’हमर बात् होइत अछि ओलक टोंटी कतेक गोटाकेँ भक द’ लगतँन्‍ह। कतेक गोटाकेँ अमाँशय उखडि़ जेतँन्‍ह।‘’19 हिनक विनोदपूर्ण विचार-पाठक विशेष रूपसेँ मनोरंजन करबे करैत अछि संगहि स्‍थल-स्‍थल पर व्‍यंग्‍य रूप तेहन झँसिगर भऽ गेल अछि जे औखि-नाकसँ पानि सेहो बहय लगैत । एहिसँ स्‍पष्‍ट जाइछ जे हिनक व्‍यंयक अत्‍एंत स्‍पष्‍ट रूप एहिमे उपलब्‍ध होइछ।
चर्चरी हिनक विविध रूपक रचना संग्रह थीक। एहिमे कथा-पिहानी, एकांकी-प्रहसन, गप्‍प-सप्‍प किछु संगृहीत ओछ जाहिमे प्राचीनता एवं आधुनिकता पर समान रूपेँ व्‍यंग्‍य कयल गेल अछि। परम्‍परावा एवं अन्‍धविश्‍वासी मैथिल संस्‍कृतिक प्रतीक थिकाह भोल बाबा, जे अपन वाक् चातुर्य्यसँ हास्‍य एवं व्‍यंग्‍यक धारा बहौलनि अछि। ओ पुरातनताक पृष्‍ठभूमिमे अर्वाचीनताक जन्‍म मानैत छथि। उपर्युक्‍त परिप्रेक्ष्‍पमे हिनक‘दलान परक गप्‍प’, ‘चौपाडि़ परक’, ‘धूर तरक गप्‍प’ एवं ‘पोखरि परक गप्‍प’ विशेष उल्‍लेखनीय अछि। हिनक मान्‍यता छनि जे प्राचीन महापुरूष लोकनिक आदर्शमय जीवन छलनि। ओ स्‍वाभिमान, मर्यादा एवं मनस्विताक सुरक्षार्थ सतत तत्‍पर रहैत छलाह। भोल बाबाक अनुसारेँ आधुनिक सभ्‍यता प्राचीन पृष्‍ठभूमिमे कोनो अर्थ नहि रखैछ। ई प्राचीनकेँ आदर्श-मानि आधुनिकता पर व्‍यंग्‍य करैत कहैत छथि जे आधुनिक समयमे सब प्राचीन वस्‍तु समाप्‍त भेल जा रहल अछि—‘’हाथीकेँ मोटर खयलक, धोड़ाकेँ साइकिल खयलक, रामलीलाकेँ सिनेमा खयलक, भोज केँ पार्टी खयलक, भाँगकेँ चाह खयलक तथा संस्‍कृतिकेँ अंग्रजी खयलक।‘’20’’
हरिमोहन झा हास्‍य-व्‍यंग्‍यक माध्‍यमे नारी जागरणक शंखनाद कयलनि। चर्चरीक अनेक कथाक माध्‍यमे ओ मिथिलाक तारीमे दुर्गाक रूप प्रतिष्ठिन करय चाहैत छलाह। ग्रेजुएट पुतोहु’21 मेमे जाग्रत नारीक प्रति समाजमे उत्‍पन्‍न प्रति‍कियासँ परिचय करबैत छथि। ‘ ग्राम सेविका’22 मे ओ जाग्रत नारीक मंजुल मंगलमयी मूर्तिकेँ प्रतिष्ठित करैत छथि। नारी जागरणक फलस्‍वरूप ओहो सब आब काटरक विरोधमे नारा लगबैत छथि। ‘एहि बाटे आबै छथि सुरसरि धार’23 मे मिथिलाक नारी अनमेल विवाह एवं तिलक दहेजक विरोधमे आवाज उठौलनि। ओ सब कहैत छथि जे ‘’ बिकी बला वर जाथु अपन घर। जे मँगताह हजार से रहताह कुमार। जे गनताह ओ कनताह। घटक पजियार होठ होशियार आब ने चलत ई रोजगार।‘24
किछुए दिनक पश्‍चात् नारीक एतेक बेशी जागरण भेल जे ओ सब आदर्श-विवाहक हेतु आन्‍दोलन प्रारंभ कयलनि। समाजक एहन कांति देखि व्‍यंग्‍यकार कहैत छथि ‘’ हरब तिलक ने तँ रहब कुमारि। जे नहि करताह द्रव्‍यक माँग, सैह भरता कन्‍याक माँग। तिलक करू दूर तखन दिअ सिन्‍दूर।‘’25 एहन परिवर्तित परिस्थितिमे नारी पुरूषक संग चलब प्रारंभ कयलनि तकरा देखि भोल बाबा चिन्तित भऽ जाइत छथि। ओ कहैत छ‍थि जे नारी जागरणक फलस्‍वरूप ‘’पुरूषक संग बैसि क’ दौड़ैत अछि, कुदैत अछि, फनैत अछि, हेलैत अछि, नचैत अछि।‘’26
हिनक हास्‍य व्‍यंग्‍यक प्रतिभाक वास्‍ततिवक प्रस्‍फुटन हिनक काव्‍यमे भेल अछि। हिनक हास्‍य व्‍यंग्‍यक रूप अधिक स्‍पष्‍ट तखन होइत अछि जखन ओ समकालीन समाजमे प्रचलित अवस्‍थाक कारणेँ अनमेल विवाहक समस्‍या पर प्रहार करैत छथि। मिथिलाक सामाजिक जीवनमे ई मान्‍यता प्रचलित रहल अछि जे पुरूष कतबो विवाह किऐक ने करथु, किन्‍तुनारी एक‍हि विवाहक अधिकारिणी छथि। एकरे फलस्‍वरूप वृद्व व्‍यक्ति अपन कुलीनताक आधार पर अनेक विवाह करैत छथि। व्‍यंग्‍य-‍कवि एहि पृष्‍ठ भूमिक व्‍यंग्‍यात्‍मक शब्‍द चित्र अपन प्रसिद्व कविता ^ढालाझा’27 मे प्रसतुत कयलनि अछि। ढाला झाक स्‍वरूपक चित्रण करैत कहैत छथि जे हुनक माथ पर फाटल पुरान पाग तथा कान्‍ह पर गोबनौर सन अंगपोछा, माथ खल्‍वाट, त्रिपुण्‍डछक तीन ठोप तथा पैध रूद्राथ टीकमे बान्‍हल छनि। इऐह थिकाह ढाला झा, लुट्टी झाक प्रणैत्र, नरहा पौजि, ककड़ौड़क वासी एवं बेलौंचेक वंशज। हिनक यथार्थ स्‍वरूप कार्टून सदृश अछि जकरा देखतहि पाठकक हास्‍यक कोनो अन्‍त नहि रहैछ। औ बहुविवाहमे विश्‍वास रखनिहार ओहि प्राचीन परम्‍पराक अनुमो‍दक तथा कुलीन प्रथाक प्रतीक थिकाह जे सासुरकेँ आर्थिक आयक अजस्‍त्र स्त्रोत मानैत छथि। समय-समय पर ओ ओतय ओहिना प्रस्‍तुत होइत छथि जेना महाजन लहना-तगादाक हेतु खदुकाक ओतय जाइछ। ओ अपन श्‍वसुरक प्रसंगमे जिज्ञासा करैत छथि—
कहाँ गेलाह फल्‍लाँ झा कन्‍यादानी श्‍वशुर हुमर
हुनकासँ जरूरी खानगीमे गप्‍प करबाक अछि22
कुलीनताक कारणेँ ढाला झा अपन श्‍वसुरक प्रति एहन संबोधत दैत छथि। मैथिल समाज विभिन्‍न प्रकारक पाँजि एवं जातिक नाम पर विभाजित अछि। ओ श्‍वशुरसँ भरना छोड़ैबाक हेतु टाकाक मांग करैत छ‍थि, किन्‍तु हुनक अस्‍वीकारात्‍मक उत्तर पाबि बमकि उठैत छथि—
सासुरक अछि कोन कमी, जाइत छी दोसर ठाम
जे नहि रूपेया देत, भोगत भरि जन्‍म फल
बेटी हकन्‍न रहतइ कनैत ओकर जीवन भरि
हमरा की ? जेम्‍हरे जैब, सार कोनो भेटिए जैत।
ई कहि फराठी लैत, लग्‍गा सन डेग दैत
मैल किट्ट फाटल पुरान पाग माथ पर
लैत अङपोछा कान्‍ह, कुद्व कठकोंकाँडि़ जकाँ
विदा भेलाह ढाला झा पित्ते थर-थर कपैत 29
एतय हास्‍यमे सन्निहित व्‍यग्‍य द्वारा ओ सामाजिक दोष दिस सर्वसाधारणक दृष्टिकेँ आकृष्‍ट करैत छथि।
मिथिला मध्‍य एहि प्रकारक वैवाहिक प्रचलन मुख्‍यत: जाति-पाँति पर अवलंबित अछि। मैथिलके गर्व छनि जे ओ श्रीकान्‍त झा, महादेव झा, यजुआड़ै एवं बेलौचेक वंशज थिकाह। वस्‍तुत: मूल आर गोत्र पर समाज ततेक विश्‍वास करैत अछि जे ओहि वितण्‍डावादक फलस्‍वरूप ओकर अध: पतन शनै-शनै भेल जा रहल अछि। एहि प्रकारक परंपरावादीद वैवाहिक कुरीतिसँ जर्जरित समाजक पाँजि’ पाटि, सिद्वान्‍त पतड़ा, हरिसिंह देवी व्‍यवस्‍थाओ कर्मकाण्‍ड पर व्‍यंग्‍य कवि कहैत छथि जे आधुनिक परिप्रेक्ष्‍यमे ओ सब ‘आगि’ मे धू-धू क’ जरि रहल अछि—
रातिमे हम स्‍वप्‍न देखल, आगि लागल घर जरैये।
चार सभ पुरना धधकि कय जोर सँ धू-धू करैये।।31
जहिना जहिना आधुनिकताक अग्नि अत्‍यधिक प्रज्‍वलित भेल जा रहल अछि तहिना पुरातन-ताक धज्‍जी-धज्‍जी उडि़ रहल अछि। एतय ओ अन्‍धविश्‍वास, असमर्थता, आडम्‍बर, धर्म-नीति एवं संस्‍कृति पर निर्ममता र्वक व्‍यंग्‍य कयलनि अछि जतय फोंका पर्यन्‍त बहरा जाइत अछि।
अर्थाभावक कारणेँ समकालीन मैथिल समाजमे कन्‍या-विकयक प्रथा सेहो प्रचलित अछि। कन्‍या-विकयक कारणेँ अनमेल विवाहकेँ प्रोत्‍साहन भेटल अछि। एकरे परिणाम थीक जे कोमल कलीकेँ कोकनल ढेंगक संग विर्वाह करय पडैत छनि। व्‍यंग्‍यकार‘कन्‍याक नीलामी डाक’32 मे अध: पतित कुलीन प्रथा एवं समाज पर कुठारधात करैत छथि। वर पक्ष एवं कन्‍या पक्षक घटक उपस्थित भ’ कोना परस्‍पर वर्तालाप करैत छथि, कथा स्थिर करैत छथि, तकर रूप तँ देखू—
वर पक्षक घटक—
सिंह लग्‍न मे जन्‍म भेल छन्हि, वयस तीनिये श्रीस।
टीपनि अपने मिला लिय, संवत उनैस सै तीस।
कलम चारि बीधा अपन छन्हि, हर बड़द दुइ जोड़।
डेढ़ पाइ मासो किनलन्हि अछि, टका छैन्हि नहि थोड़।
बेस किमतिगर छथि पनिगर हिनका सन भेटत ने आन।
(कानमे कहैत छथि)
तीस टका अपनहु के भेटत, खैब सुपारी पाम।
दुनू पक्षक घटकक पारस्‍परिक वार्तालापक कममे विवाह स्थिर भ’ जाइछ, कारण कन्‍याक पिता कन्‍या बिकी हेतु उताहुल छथि। व्‍यंग्‍यकार एहन कन्‍याक पिता पर व्‍यंग्‍य करैत छथि—
करब कथा पहिने जौँ हम्‍मर सभटा कर्ज सधावी
चारि सौ जे गनि दिय’ व्‍यवस्‍था झट सिद्वान्‍त लिखाबी 31
एहि पर वरक उत्तर छनि—
तावत तिन सै आनल, बाँकी देब सधाय 35
एहि पर कन्‍याक पिता उत्तर दैत छथि—
‘हैण्‍ड नोट लिखि देल जाय, अपनेकेँ कयल जमाय’ 36
जाहेना कोनो वस्‍तुक बिकीक हेतु बजारमे त्‍वंचाहंच होइछ तहिना वर एवं कन्‍यापक्षक घटक बीच सेहो होइछ। आश्‍चर्य तँ तखन होइछ जखन कन्‍याक पिता निर्ल ज्‍जतापूर्वक घोषणा करैत छथि जे जैह कर्ज सधा सकताह सैह कन्‍याक अधिकारी हेताह। समाजक आर्थिक दशा सुदृढ़ नहि रहलाक कारणेँ मिथिलामे एहि प्रकारक अनमेल विवाह प्रचलित अछि। एतय हास्‍य एवं व्‍यंग्‍य दुनूक रूप अत्‍यन्‍त तीव्र अछि।
मैथिल लोकनिक भोजनप्रियता जग‍तसिद्व अछि। एहन भोजलन-विन्‍यास पर प्रो. झा निश्चित रूपेँ व्‍यंग्‍य कयलनि अछि। मिथिलामे जमायक स्‍वागतार्थ कतेक विन्‍यास कयल आइद तकर स्‍पष्‍ट चित्र ‘ढाला झा’ मे भेटैछ :—
रातिमे सचार लागल ढाला झाक आर्गामे
बाटी अठारह टा हुनका आगाँ लगाओल गेल
बड़ बड़ी भटबड़ कदीमा तिलकोड़ और
पापड़ तिलौरी ओ दनौरी आदौरी भाँटा
एक बट्टा छल्हिगर दही एक बट्टा खोआ गाढ़
चीनी पर्याप्‍त, मालभोग केरा पाकल खूब
डेढ़ सेर मेही भात, जाँति कऽ छलैन्हि परसल
धृतसँ कँल चिक्‍कन तथा बाटीमे राहडि़ दालि
आमिल देल, ऊपर खूब घृत छह छह करैत
एहि प्रकारक भोजन-विन्‍यासक वर्णन सुनितहिँ निश्‍चये क्षुधाग्नि भऽ जाइछ। एतय व्‍यंग्‍यकार प्रचलित परंपरा पर प्रहार क’ हास्‍ये नहि, व्‍यंग्‍यक पर्याप्‍त सामग्री पाठककेँ देबाक प्रयास कयलनि अछि।
समाजक अन्‍यान्‍य अपेक्षा ढोंगी-पोंगा-पथी पंडित लोकनि हिनक हास्‍य-व्‍यंग्‍यक सबसँ बेशी शिकार भेलाह। तन्‍त्र-मन्‍त्र, शास्‍त्र-पुराणक वितण्‍डवादक कारणेँ सामाजिक जीवन दिन-प्रति-दिन विषम भेल जा रहल अछि। एहना स्थितिमे व्‍यंग्‍यकार कोना चुप्‍प बैसि सकैत छथि ? धर्मक नाम पर विषम भेल जा रहल अछि। एहना अपनाकेँ अग्रदूत बुझनिहार पाखंडी ‘पंडित लोकनि’ पर व्‍यंग्‍य कय व्‍यंग्‍यकार हुनक भंडा फौड़लनि अछि। यथार्थत: ओ लोकनि अपन ज्ञानक दुरूउपयोग निष्‍प्रयोजन शास्‍त्रार्थक चकमे समाप्‍त क’ दैत छथि। आधुनिक संदर्भमे पंडितलोकनिक किया-कलाप ठप पडि़ गेल, किएक तँ युग परिचतित भ’ गेल अछि। परिवत्तित परिस्थितिकेँ देखि पंडितलोकनिमे आत्रोशक भावना स्‍वाभाविक अछि। एहना हुनका सभक विलापक अतिरिक्‍त आन कोनो उपाय नहि रहि जाइछ1 ‘पंडित’ मे पाठकेँ प्रचूर सामग्री भेटँत छनि—
जमाना बदलि गेलैक, उनउलै बात सब पुरना।
उठै अछि पित्त तँ बहुतो करू की वृद्व अथबल छी
जहाँ बट्टाक धृत पड़ै छल भोजमे आगाँ
तहाँ आब डालडासँ दालि छौंकल देखि छी 35
‘बुचकुन बाबा’ केँ आधुनिक नारीक पहिरब-ओढ़ब, चलब-फिरब, लिखन-पढ़ब एवं उन्‍मुक्‍त जीवन फुटलो नहि सोहाइत छनि। हुनका अनुसार नारी सतत दासताक बेड़ीमे जकड़ल रहथि, सँह उत्तम। हुनकर कथन छनि जे लोक केचुआकेँ फूँकि-फूँ कि साँपक सर्जन रहल छथि। एहन परिस्थितिमे ओ हफीम खा क’ अपन प्राणान्‍त करय चाहैत छथि। व्‍यंग्‍यकार वस्‍तुत: एहन पण्डितक अन्‍ते चाहैत छथि।
पाश्‍चात्‍य सभ्‍यता एवं संस्‍कृतिक रगमे सँगाक’ नारी ग्रामीण परिवेशमे अत्‍यन्‍त उपहासात्‍मक बनि जाइछ। एकर स्‍पष्‍ट चित्रण व्‍यंग्‍यकार 'अँङरेजिया लड़कीक समदाउन’ मेकयलनि अछि—
आङनक बाहर घुमय नाह जयबैक
भैसुर जैताह पड़ाय
देब पितर किनको नहि हँसबैन्‍ह
सभ जँताह तमसाय
ओहिठाम जा अण्‍डा नहि मङबैक
तकर ने छैक उपाय
जो मन हो कहबैन्‍ह चुपचाताहे
आनि देताह हमर जमाय 39
पाश्‍चात्‍य सभ्‍यतामे लालित-पालित कन्‍याकेँ चेतावनी दैत छथि; किन्‍तु हुनक व्‍यवहार पर व्‍यंग्‍यकारक आक्षेप एकदम स्‍पष्‍ट अछि।
आधुनिक सभ्‍यातामे प्रो. झा केँ जे दोष परिलक्षित होइत छनि तकरी ई व्‍यंग्‍यक माध्‍यम बनबैत छथि। हिनक प्रसिद्व कविता ‘टी-पार्टी विशुद्वा हास्‍य-रसक रचना थीक। टी-पार्टी आधुनिक सभ्‍यता एवं संस्‍कृतिक प्र‍तीक थीक। एहि कवितामे कृत्रिमताक अभाव् अछि व्‍यंग्‍यकार कोनो अलंकरणक चेष्‍टा नहि कयलनि अछि। एकर भाषामे अद्भभुत प्रवाह अछि। हास्‍य-रसक पुष्टिक हेतु जेहन भाषा आवश्‍यक अछि ताहि रूपक भाषाक प्रयोग एहिमे कयल गेल अछि। ‘टी-पार्टी’ क बाह्यडम्‍बरक प्रति कवि उपहास करैत छथि—
दूरे सँ देखँत छी जे अपूर्व अछि समारोह
कुर्सी ओ टेबुल कतार सँ सजाओल अछि
उज्‍जर दपादप श्‍वेत चादर ओछाओल और
नाना प्रकारक फुलदान अछि शोभायमान40
पार्टीक साज-सज्‍जा तथा अल्‍प भोजनकेँ देखि कवि व्‍यंग्‍य करैत छथि—
एकटा सिहारा और एक फक्‍का दालमोट
एक रसगुल्‍ला और बुनिया एक चौठी मात्र
तोला भरि सेबइ समतोला दुइ फाँक
एक चुटकी किशमिश तथा सोहल केरा टा41
पार्टीक पश्‍चात् व्‍यंग्‍यकारक मनमे आधुनिक सभ्‍यताक प्रति जे भावना जागत भेल ओ निश्‍चये उपहासात्‍मक थीक।
बस पार्टीक ने नाम लिय
सोझे जाड भानसमे पजारू गऽ आँच शीघ्र
खीचडि़ और साना बनाउ जतेक जल्‍दी हो
आर ई कार्ड लऽ कऽ चूल्हिमे झोंकि दिअ42
प्रोफेसर हरिमोहन झाक उपर्युक्‍त रचना समूहक विश्‍लेषणसँ एतबा एतब। निश्चित रूपेँ कहल जा सकैछ जे ई मैथिली हास्‍य-व्‍यंग्‍य-साहित्‍यक उज्‍जवल भविष्‍यक सूचक भेलाह। हिनक हास्‍य-व्‍यंग्‍य रचनाक प्रभाव मैथिली समाज पर तीन रूपेँ पड़लँक। प्रथम तँ ई मैथिलीमे पाठक वर्गक निर्माण कयलनि। द्वितीय, मिथिलाक कन्‍यालोकनिक व्‍यक्तिगत जीवन प्रभावित भेल जकर फलस्‍वरूप हजारक हजार शिक्षित भ’ रहलि छथि। तेसर प्रभाव मैथिलीक परवर्ती साहित्‍यकारलोकनि पर पड़लनि ये एहि मे उन्‍मुख भेलाह जहिना सुस्‍वादु, चर्व्‍य चोष्‍य, लेह्य, पेय भोजनकेँ प्राप्‍त कयला पर हौइत छनि तहिना हास्‍य-व्‍यंग्‍यमे अभिरूचि रखनिहार पाठककेँ हिनक रचनाक पारायणोत्तर हिनक रचनाक लोकप्रियताक अनुमान तँ एही सँ लगाओल जा सकैछ जे उपन्‍यास ‘चन्‍द्रकान्‍ता सं‍तति’ केँ पढ़बाक हेतु अनेक अहिन्‍दी भाषी पाठक प्रोफेसर हरिमोहन झाक चित्ताकर्षक हास्‍य-व्‍यंग्‍य-रचनाक रसास्‍वादनक लेल हिनक विभिन्‍न रचना समय-समय पर विभिन्‍न भार‍तीय एवं मासिक पित्रकादिमे अनूदित भ’ प्रकाशित होइत रहल अछि। श्रेय हिनके छनि सर्वाधिक रचना विभिन्‍न भाषामे सेहो अनूदित
प्रसंग-निर्देश
1. कन्‍यादान, पृष्‍ठ 18
2. तत्रैव, पृष्‍ठ- 19
3. तत्रैव, पृष्‍ठ— 21
4. तत्रैव, पृष्‍ठ— 37
5. तत्रवै, पृष्‍ठ — 38
6. द्विरागमन, पृष्‍ठ— 158
7. कन्‍यादान, पृष्‍ठ— 104
8. तत्रैव, पृष्‍ठ — 59
9. प्रणम्‍य देवता, पृष्‍ठ—3
10. तत्रँव, पृ — 12
11. तर्त्रव, पृष्‍ठ— 53
12. तत्रैव, पृष्‍ठ —232-245
13. तत्रँव, पृष्‍ठ—270
14. तत्रँव, पृष्‍ठ—274
15. प्रथम अखिल भारतीय मैथिली लेखक सम्‍मेलन, कथा विभागीय सभापतिक भाषण, वैदेही समिति, लाल बाग, दरभंगा-1853पृष्‍ठ-3
16. रंगशाला एक-झलक, पृष्‍ठ—‘ख’
17. खट्टर ककाक तरंग पृष्‍ठ- 293
18. तत्रँव भूमिका, पृष्‍ठ-छ
19. तत्रँव — पृष्‍ठ-ग
20. चर्चरी, पृष्‍ठ-220
21. तत्रैव, पृष्‍ठ-1
22. तत्रैब पृष्‍ठ -24
23. तत्रव, पृष्‍ठ-189
24. तत्रै व, पृष्‍ठ-189
25. तत्रै व, पृष्‍ठ-129
26. तत्रै व, पृष्‍ठ- 248
27. मासिक स्‍वदेश, वर्ष-1 अंक 4 विकास संवत् 2005 चैत्र, पृष्‍ठ-
28. तत्रैव, पृष्‍ठ-153
29. तत्रैव, पृष्‍ठ-153
30. वैदेही, अक्‍तूबर 1253, पृष्‍ठ-155
31. तत्रै व
32. मिथिला, वर्ष-1 अंक-4 जेठ, सन् 1336 पृष्‍ठ- 99.
33. तत्रै व
34. तत्रै व
35. तत्रै व
36. तत्रै व
37. मासिक स्‍वदेश, पृष्‍ठ-154.
38. मिथिला-दर्शन मार्च पृष्‍ठ- 1260, पृष्‍ठ-2
39. वैदेही विशेषांक-सन् पृष्‍ठ 1350 पृष्‍ठ 9.
40. मासिक स्‍वदेश, वर्ष-1 अंक 4, -वैशाख, विकम 2005र्सवत् पृष्‍ठ- 391
41. तत्रै व पृष्‍ठ- 220
42. तत्रै व, पृष्‍ठ- 222
(हरिमोहन झा अभिनन्‍दन ग्रन्‍थ 1983)।
1
Kundan Jha said...

Suggested citation: प्रोफेसर प्रेमशंकर सिंह. “हास्य-व्यंग्य सम्राट प्रोफेसर हरिमोहन झा.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 34, 2009-05-15. https://www.videha.co.in/research/2009/34/हास्य-व्यंग्य-सम्राट-प्रोफेसर-हरिमोहन-झा.htm

मूल विदेह अंक / Original issue