चेतना समिति ओ नाट्यमंच
प्रोफेसर प्रेमशंकर सिंह
सांस्कृतिक, साहित्यिक आ कलाक मुख्य केन्द्र रहल अछि बिहारक प्रशासनिक राजधानी परना। जीवकोपार्जनार्थ मिथिलांचलवासी प्रचुर परिमाण में एहि महानगर में निवास करैत छथि। मैथिली भाषा-भाषीक एतेक विशाल जनसंख्या वाला महानगरक मातृभाषानुरागी लोकतिक सत्प्रयाससँ अपन भाषा आ साहित्यओ रंगमंचक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह कयलक अछि। मैथिली रंगमंचक विकास में एहि महानगरक चेतना समिति (1952) एक द्येसराक समानार्थी अछि, कारण् एहि क्षेत्र में जे किछु अवदान अछि ओ पटना आ वेतना समितिक योगदान एकहि बात थिक। आब ई प्रयोजनीय भ’ गेल अछि जे जनमानस ओहि अवदान केँ जानय आ जँ महत्वपूर्ण अछि तॅा ओकर मुक्त कण्ठे प्रशंसा क’ कए ओकरा स्वीकार करय। रंगमंचक क्षेत्रमें चेतना समितिक नाट्यमंचक अवदानक पूर्ण मिथिलाव्चल एवं मिथिलेकार क्षेत्र क अवदान सँ परिचित होयबाक हेतु प्रेमशंकर सिंह (1942) एवं नाट्यसान्वाचय (2002) क अवलोकन कयल जा सकैछ।
ई निर्विवाद सत्य थिक जे मिथिलाव्चल आ मिथिलेतर क्षेत्र में मैथिली रंगमंचक शौकिया रंगमंख्क संख्या अतयन्त सीमित अछि। यद्दपि बीसम शताब्दीक तृतीय,चतुर्थ आ वंचम दशक में समग्र भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम में संलिप्त रहला, जाहि कारणेँ नाटक सदृश्य समवेदक कलात्मक सृजन विकसित नहि भ’ पौलक, तथापि पत्र-तंत्र पौराणिक, ऐतिहासिक तथा सामाजिक नाटकक मंचन होइत रहल। एहन प्रस्तुतिक मूल उद्देश्य छलैक राष्ट्र आ समाजक समक्ष एक उच्च कोटिक आदर्श प्रस्तुत करब। एहन शौकिया रंगमंच अत्यन्त संख्या में समाजक संग जुडल आ एहि सँ आगॉं बढि क’ ओ बे तँ जीवनक अभिन्न अंगे बनि सकल आ ने सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं कलात्मक विकासक साघ्य में।स्वतंत्रात्मक पश्चात् व्यक्ति-व्यक्तिक दृष्टिकोण में परिवर्तन भेलैक आसमाज में सांस्कृतिक. साहित्यिक एवं कलात्मक विकासक अवस्द्ध द्वार खुजि गेलैक। स्वाधीनोतर युग में सांस्कृतिक एवं कलात्मक विकासक अवस्द्ध द्वार खुजि गेलैका। स्वाधीनोत्तर युग में सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं कलात्मक स्थितिक यथार्थ चित्रण जानबाक, बुझबाक आवश्यकता महसूस भेलैक समाज एवं जनमानस केँ। सामान्य जनमानसक सुख-दुख, आशा-निराशा, कुष्ठा संत्रास, असन्तोष, क्षोभ, क्रोध एवं जीजीविषा केॅा वाणी देवाक हेतु नाटक कारक अन्तर उद्रेलित भेलनि आ एहि दिशा में सोझे-सोझ स्थितिक वर्णन करबाक हेतु नाटकक आश्रय लेलनि शनै:-शनै: रंगमंच सामाजिक जीवनक सन्निकट अबैतगेल आ वर्तमान स्थिति में तँ ओ एक अभिकाव्य अंग बनि गेल अछि। एकर परिणाम एतबे नहि भेलैकते शौकियाक संगहि-संग अर्द्ध व्यावसायिक वा व्यावसायिक स्तर पर जनमानस रंगमंचक महत्व केँ स्वीरकारलक। एहि में सबसँ क्रान्ति परिवर्तन भेल जे महिला समुदाय एकहि में अपन सहभागिता देव प्रारम्भ कयलनि। हुनका सभक सक्रिय सहभागिताक फलस्वरूप शनै:-शनै: ई मरलव जीवनक अविभाज्य अंग बनाय लागला किन्तु अत्यन्त दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति थिक जे मिथिलाव्चल वा मिथिलेतर क्षेत्र में अद्यापि व्यावसायिक रंगमंचक प्रादुर्भावे नहि भेलैक।
पटना सदृश महानगर में चेतना समितिक तत्वावधान में नाट्यभिनयक यात्राक शुभारम्भ भेलैक तकरे फलस्वरूप नाट्यांचनक परम्पराक सूत्रपात भेलैक जाहि में गृहिणी महिला वर्ग क सहभागिताऍं एकर प्राण में नव स्पन्दन भरलक जे अनुर्वर छल। चेतना समितिक स्थापनोपरान्त सांस्कृतिक गतिविधिक संगहि-संग रंगमंचक क्षेत्र में नवजागरणक संचार भेलैक सन् 1954 ई. सँ। किन्तु आरम्भिक काल में अनभूत एंकाकींक मंचन होइंत ाकर विवरण्एा आगॉं प्रज्ञतुत कयल जायत, मुदा सन् 1973 ई. सँ अद्यपर्यन्त एंकाकी बा नाटकक मंचन होइत अाबि रहल अछि। भारतीय गणतंन्त्र से एहन कोनो महानगर, नगर का कस्बा नहि अछि जनय नियमित रूप से नाट्य-प्रस्तुति नहि होइत अछि, किन्तु नाट्यमंच अपन प्रस्तुति सँ एकरा मूर्त रूप प्रदान करबा में सक्षम सिद्ध भेज अछि।
चेतना समितिक तत्वावधान में आयोजित विद्यापति पर्वक प्रति शनै:-शनै:जनमानस में एक प्रबल ज्वारक उद्भावना होइेत देखि एकर कार्यकारिणी समितिक अघ्यक्ष दिवाकर झा (19141996) एवं सचिव फटाशंकर दास (19232006) अनुभ्व कयलनि जे ई संस्था मात्र साहित्यिक गतिविधि पर केन्द्रिंत नहि रहय, प्रत्युत एकरा में अत्यधिक गतिशीलता अनबाक हेतु आ ओइन जनमानसक संग
जोडबाक प्रयोजन बुझलान जकरा हेतु मनोरंजनक किछु एहन कार्यक्रम सुनिश्चित कयल जाय जे अधिकाधिक संख्या से जन्मानस एहि आयोजन में सहभागी बनि सकथि तथा एकर क्रिया-कलाप में अपन उपस्थिति दर्ज करा एकथि। एहि सोच केँ क्रिया रूप देबाक निमित कार्यकारिणी समिति एक उपसमित्यिक गठन कयलक जाहि से बाबू लक्ष्मीपति सिंह (1907-1979), आनन्द मिश्र (1क924-2006), गोपाल जी झा गोपेश (1क931) एवं कामेश्वर झा केँ ईभार देल गेलनि जे एकरा कोना क्रिययान्वित कयल जाय ताहि प्रसंग में अपन ठोस विचार कार्यकारिणी समितिक समक्ष प्रस्तुत करथि। उपसमितिक सदस्य लोकति एक स्वरेँ अपन विचार कार्यकारिणीक समक्ष प्रज्ञतुत कायलनि जे मिथिलांचलक गौरव-गीमाक पुनर्राख्यान आ नाट्यसाहित्यिक पुरातन परम्पराकेँ पुनरूजीवित करबाक हेतु एहि मंच सँ नाट्यभिनयक परम्पराक शुभारम्भ काय जाय। उपसमितिक विचार सँ सहसत भ’ कार्यकारिणी समिति जनमानसक हृदय में मातृभाषानुराग केँ जागृत करबाक निमित नाट्ययोजनक प्रयोजनीयताक आवश्यकता अनुभव कयलक तथा एकरा क्रियान्न्पिन करबाक दिशा में प्रयासरत भेल।
समिति अपन प्रयोगवस्था में नाट्ययोजनक शुभारम्भ नाटकाऍं नहि क’ कए एकांकी सँ करबाक निश्चय कयलक, कारण ओहि समय मैथिली में अभिनयोपयोगी नाटकक सर्वथा अभाव छलैक आ एकहि नाटक केँ बारम्बार अभिनीतकरण समुचित नहि बुझलका उपसमितिक ादज्ञस लोकति अभिनयोपयोगी एंकाकीक अन्वेष्सण करब प्रारम्भ कयलनि। अभिनयोपयोगी एंकाकीक हेतु मैथिलीक वरेण्य साहित्य-मनीषी लोकतिक संग सम्पर्क साधल गेल। एहि दिशा में उपसमिति केँ सफलता भेंटलैक जे समकालीन मैथिली साहित्य पर अपन अमिट छाप छोड निहार बहुविधावादी रचनाकार हरिमोहन झा (1908-1989) सँ सम्पर्क साधल गेल आ हुनकाऍं अनुरोध कयल गेल जे एक एहन एकांकी अभिनेयार्थ समिति केँ उपलबध कराबथि जाहिमे मिथिलाक विद्या-वदायन्ताक गौरव-गाथाक उल्लेख् हो। ओ समितिक एहि आग्रह केँ स्वीकार क’ मण्डन मिश्र (1958) एकांकीक रचना क’ कए ओकर पाण्डुलिपि समितिक तत्कानीन पदाधिकारी लोकनिके उपलब्ध करौलथिन जे मिथिबाक अतीत केँ उद्भाषित करैछ जाहिसँ जनमासपरिचित भ’ सकथि।
अभिनयोपयुक्त एकांकीक पाण्डुलिपि उपलब्ध भेलाक पश्चात् समितिक पदाधिकारी लोकति अत्याधिक उत्साहित भ’ निर्णय लेलनि जे अद्यपि मैथिली रंगमंच पर महिला अभिनेत्रीक भूमिका में मिथिलाव्चल वा मिथिलेतर क्षेत्र में पुरूष अभिनेतहि द्वारा अभिनेत्रीक भूमिकाक निष्पादन कराओल जाइत छल, ताहि परम्पराक खण्डित करबाक दिशा में समिति सोचब प्रारम्भ कयलका ई अनुभ्व कयल जाय लागलजँ महिला कलाकार उपलब्ध भ’ जाथि तँ नाट्य मंचन विशेष स्वाभाविक भ’ जाघत। मुदा ई एक जटिल समस्या छल। महिला कलाकार औतीह कतयऍं ? कोनो मैथिलानी मंच पर आबि अभिनय करथि से सोचनाइयो साहसक काज छल, तखन प्रस्ताव राखब आ मना क’ हुनका मंच पर उतारब आओर कठिन छल। समिति मैथिली रंगमंच पर एक क्रान्ति अनबाक दिशा में प्रयासरत भेज, कारण समितिक सतत प्रयास रहल अछि ले एहि मंच सँ एहन अभिनव कार्य कयलजाय जकर सुपरिणाम हैत जे जनमानसक हृदय में रंगमंचक प्रति आकर्षण भावनाक उदय होय तैक तथा नाट्य भिनय में स्वाभाविकता आओता कोनो मैथिलानी रंगमंचार आबि अभिनय करथि ई सोच बो निराधार छल। ई अत्यन्त साहसक काज छल, तखन किनको समक्ष एहन प्रस्ताच रखाब आ हुनका मनाक’ मंच पर उतारब ओहूसँ कठिन छल। समिति सोचलक जे ओही मैथिलीनीक समक्ष प्रस्ताव राखल जाय जनिका हृदय में मैथिल संस्कृतिक उत्कर्षमय परम्परा में आयोजित होहत सांस्कृतिक अनुष्गनवा कार्यक्रमक प्रति आकर्षण आ आगाध श्रद्धा होइत। समिति एहि विषस सँ पूर्ण परिचित छल जे हरिमोहन झा उदारवादी प्रगतिशील विचार-धाराक साहित्य-मनीषी छथितेँ समितिक पदाधिकारी लोकति हुनक आश्रय में उपस्थित भ’ अपन मलोभावना केँ रूपाचित करबाक निमित हुनका सविनय साग्रह अनुरोध कयलक जे एहि योजना केँ क्रियान्वित करबाक निमित कृपया अपन धर्म-पत्नी सुभद्रा झा (1911-1982) केँ अपन एकांकी में भारतीक भूमिका में अभिनय करबाक अनुमति प्रदान कयल जाय। किछु क्षण में ओ इनस्तत: क स्थिति में आबि गोलाह जे की कयल जाय ? ओ अपन रचनादि में मिथिलाव्चल नारी जागरणक खंखनाद करैम रहथि तेँ ओ अपन उदारवादी दृष्टिकोणक परिचय दैत सहर्ण सांस्कृतिक चेतना सम्पन्न, मैथिल समाजक समक्ष एहि चुनौती केँ स्वीकार क’ कए युग-युग सँ आबि रहल बन्धन केँ तोडि मंच पर अयलीह आ सुभद्रा केँ मण्डन मिश्रक पत्नी भारतीक भूमिका में रंगमंच पर उपस्थित हैबाक अनुमति देलथिन जे सर्वप्रथम मैथिलानी रंगकर्मीक रूप में मैथिली रंगमंच पर अवतारित भ’ एहि अवस्द्ध धाराक द्वार केँ भविष्यक हेतु खोलि देलनि जकरा एक ऐतिहासिक घटना कहब समुचिंत हैत आ मैथिल समाजक हेतु प्रकाश स्तम्भ बनि गेलीह।
मैथिली रंगमंच पर सुभद्रा झा पदार्पण महिला रंगकर्मी में एक क्रान्ति आनि देलका चेतना समिति एवं रंगमंच हेतु ई एक ऐतिहासिक घटना भेलैक आ मैथिली रंगमंचक इतिहास में एक नव अघ्याय क शुभारम्भ भेलैक। हुनका सँ अनुप्राणित भ’ पटना विश्वविद्यालक स्नातकोत्तर विभागक एक छात्रा पनिभरनीक भूमिका में रंगमंच पर उपस्थिति दर्ज करौलनि ओ छलीह अहिल्या चौधरी। एहि एकांकी अभिनय भेल छल लेडी स्टीफेन्स सहाल में। मण्डन मिश्रक भूमिका में उतरस रहथि आयविर्तक उपसम्पादक यदुनन्दन शर्मा आ हुनक पत्नी भारतीक भूमिका में सुभद्रा झा। पनिभरनीक भूमिका कथने रहथि अहिल्या चौधरी आ ठिठराक भूमिकाक निर्वाह कथने रहथि इण्डियन नेशनक इन्द्रकान्त झा।
बिगत शताब्दीक षष्ठ दशकक उतरार्द्ध अर्थात् सन् ई. में चेतना समितिक रंगमंच पर एहि एकांकीक सफलतापूर्वक मंचस्थकयलगेल तथा महिला रंगकर्मी अपन सहभागिता सँ एकरा अधिक प्राणवन्त बनोलनि। सुभद्रा झा एवं अहिल्या चौधरी क मैथ्रिली रंगमंच पर उपस्थिति आ हुनका सभक अभिनय कौशल एतेक बेसी प्रभावोत्पादक भेल जे महिला वर्ग एहि कलाक प्रदर्शन में अपन कुशल कलाकारिताक परिचय देलनि जाहि सँ प्रोत्साहित भ’ अधुनातन रंगमंच एतेक विकसित भ’ सकल अछि तकर श्रेय आ प्रेय हुनके लोकति केँ छनि। समाजक प्रति सोच, अपन उतरदरयित्वक प्रति प्रतिवद्धता, त्याग, सेवा-भावना आ कर्म निष्ठाक परिणाम थिकजे महिला रंगकर्मी सचेष्टता, तत्परता आ अपन अभिनय-कौशलक परिचय द’ रहल छथि। मैथिली रंगमंचक इतिहास में एकर ऐतिहासिक महत्व छैक।
समिति द्वारा प्रस्तुत एंकाकीक मंचन अनेक दिन धरि पटनाक अतिरिक्त अन्यो स्थान पर चर्चित-अर्चित होइत रहल, जाहिसँ अनुप्राणित भ’ समिति क पदाधिकारी लोकतिक विचार भेलनि जे प्रतिवर्ष विद्यापति सहित पर्पोत्सव पर कोना-ने-कोनो एउकांकीक मंचन अवश्य कयल जाय, कारण जनमानसक अभिरूचि नाट्यमंचन दिस विशेष जागृत भेल आ अधिकाधिक संख्या में जनमानसक सहभागिनी होमचलागल।
पुन: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर अधृत गोविन्द झा लडडाक एकांकी वीर कीर्ति सिंहक मंयब कयल गेल जाहि में कीर्ति सिंहक अग्रज वीर सिंह क राजतिलक कराय हुनके हाथे कीर्ति सिहं केँ सिंहासनारूढ करसबाक जटिल समस्या छल जे मौलिक एवं मातृस्नेह क विलक्षण आदर्श केँ रंगमंच पर प्रस्तुत करब कठिन समस्या छल। एहू एकांकीक मंचन स्थानीय लेडी स्टीफेन्सस हालक प्रागंन में भेल छल। समितिक तत्वकालीन सचिव स्पनारासण ठाकुर केँ आशंका छलनि जे ऐतिहासिकताक पृष्ठभूमि में लिखित एकांकीक मंचन कठिन होइछ, तेँ बारम्बार ओकर असफलताक आशंका व्यक्त करैत रहथि, किन्तु संयोग सँ एकट प्रस्तुति अत्यन्त सफल भेलन दर्शकक मानस पहल पर एकर स्वस्थ प्राव पडलैक। यद्यपि गणपति ठाकुरक महेँ असलान सँ दान रूप में प्राप्त राज्य स्वीकार करयबासँ हुनक उज्ज्वल वरित्र धूमिल भ’ जाइछ तथापि निर्देशक हुनक चारित्रिक उत्कर्ष केँ एकशन सँ प्रस्तुत कयलनि।
सामाजिक पृष्ठभूमि पर आधारित एकांकी गोविन्द झा क मोछसंहार (1965) फतोक घटना एहि रूपेँ विन्यस्त अछि जकरा मंच पर प्रस्तुत करब ओहि समय में मंचीय-कौ-राजक अभाव रहित हुँ अत्यन्त सफलता पूर्वक ओकर मंचन भेला। एहि एकांकी में महिला अभिनेत्रीक अभाव छल तेँ एकर प्रस्तुति में कोनो प्रकारक कठिनताक अनुभव निर्देशक केँ नहि भेजनि। एकर निर्देशन कथने रहथि गोपाल जी झा गोपेश (1931) मिथिलाक प्रतिनिधि (1963) एकांकीक मंचन से हो चेतनाक मंच पर भेल अछि जकर लेखक आ निर्देशन गोविन्द झा स्वयं कयलनि। एहि में दू महिला अभिनेत्रीक छैक जकर अभिनय में महिला अभिनेत्रीक भूमिका में पुन: प्राचीन परम्परा केँ स्थावित कयल गेल जे पुरूषों द्वारा महिला अभिनेत्री भूमिकाक निर्वाह काओल गेल।
सन् 1962 ई. में चीनी आक्रमणक पृष्ठभूमि में गोपालजी झा गोपेश लिखित गुडक चोट धोकड जानय तथा भारत-पाक युद्धक समय विनुविवाहे द्विरागत क मंख्न चेतनाक तत्वावधान में विद्यापति स्मृति पर्वोत्सव पर मंचित भेल छल लेटी स्टीफेन्सस हालक प्रंत्गन में। एहि प्रस्तुति में भारती ब्लाक वर्क्सक प्रोफाइटर मर्जुन ठाकुरक संगहि-संग नगीना कुमर एवं निरंजन झा महिला अभिनेत्रीक रूव में मंच पर उपस्थित भेल रहथि, पुरूष पात्र केँ महिलाक भूमिका में देखिक’ जनमानसॅ केँ कोनो आश्चर्य नहि होइत छलैक एवं नायक-नायिकाक क्रिया-कलाप में मर्यादाक वचन पर कोनो आश्चर्य वा व्यवधान नहि होइत छलैक। एहि अभिनय में भाग लेनिहार अन्य कलाकार में इण्डियन नेशानक बेचन झा. प्रियनारायण झा आ राजेन्द्र झा प्रभूति अपन-अपन भूमिकाक निर्वाह सफलता पूर्वक कयलनि। उक्त दुनू एकांकी में गीतगाइनिक भूमिका में कमला देवी एवं हुनक सरबी लोकतिक सहयोग चेतनाक मंच केँ उपलब्ध भेल छपैक।
चेतना द्वारा नियमित मंचक स्थापनाक पूर्व विद्यापति पर्वोत्सव पर जे एकांकी मंचित भेल ओ निम्नस्थ अछि:
वर्ष एकांकी एकांकीकार
1958 मण्डनमिश्र हरिमोहन झा
1959 मोछ सहांर गोविन्द झा
1960 मिथिलाक प्रतिनिधि गोविन्द झा
1961 धेराक सनेस गोविन्द नारायण झा
1962 गूडक चोट धाकडे जानय गोपाल जी झा गोपेश
1965 वीर कीर्ति सिंह गोविन्द झा
1966 बिनु विनोद द्विरागमन गोपाल जी झा गोपेश
उपर्युक्त परम्पराक जे शुभारम्भ भेल छलैक ताहि में कतिपय अपरिहार्य कारणेँ व्यतिक्रम भ’ गेलैक तथा समिति द्वारा रंगमंचक दिशा में जे प्रयास भेल छल ओ किछु अन्तरालक पश्चात् अवस्द्ध भ’ गेलैक।
किन्तु ताराकान्त झा (1927) जरक्त समितिक सचिवाचक पद भारग्रहण कयलनि तखन ओ एकर क्रियाकलाप केँ व्यापक फलक पर अनबाक प्रयास कयलनि। हुनक सोच छलनि समितिक विविध आयोनादि एकहि स्थान पर केन्द्रित नहि रहय: प्रत्युत प्रचार-प्रसार क दृष्टिऍं पटनास्थ विभिन्न मुहल्ला सभते एकर आयोजन केँ मूर्भ रूप प्रदान कयल जाया ओ अपन एहि योजनाकेँ क्रियान्वित करबाक निमित अमरनाथ झा जयन्तीक आयोजन कंकडबाग क लोहिया नगर में आयोजित करबाक निर्णय कयलनि जाहि में समिति केँ गजेन्द्र नारायण चौधरी, वासुकि नाथ झा, गणेशशंकर खर्गा सदृश्य कर्मठ कार्यकर्ता उपलबध भेलैक
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नाट्यमंच
शनै:-शनै: चेतना समितिक अपन उतरोत्तर विकास-यात्राक उत्थान वा उत्कर्ष में पहुँचि विविध रूपैँ मिथिलाक सांस्कृतिक एवं साहित्यिक विधा केँ सम्पोषित करबाक दिशा में प्रयासरत भेल । ई अपन गौरवमय परम्पराक अनुरूप विद्यापति स्मृति तत्कालीन अघ्यक्ष कुमार तारानन्द सिंह (1920-) एवं सचिव ताराकान्त झा सोचलनि जे समितिक गतिविधि अत्याधिक प्राणवन्त बनाओल जाय, कारण ओ लोकति यदूरदर्शी व्यक्ति रहथि जनिका कार्यकाल में समिति कतिपय नव-नव योजना केँ क्रियान्वित करबाक प्रयास कयलक। मैथिली नाटक ओ रंगमंच केँ विस्तृत एवं व्यापक रूप देबाक निमित कार्यकारिणी समिति एक अनौपचारिक समितिक गठन कयलक जकर थींक टैंकक सदस्य रहथि गजेन्द्रनारायण चौधरी, वासुकिनाथ झा (1940), छात्रानन्द सिहं झा (1946) एवं गोलकनाथ मिश्र केँ अधिकृत कयल गेलनि आ एहि योजना केँ कोना मूर्त रूप देल जाय ताहि हेतु प्रस्ताव देबाक भार देल गेलनि जकर सुपरिणाम भेल जे नाटक ओ रंगमंचक विकासार्थ रंगकर्मीक नाट्यमंच (1972) नामक एक प्रभावी प्रभाग क स्थापना कयलक जकर उद्देश्य भेलैक नवीन टेकनिक नाटकक अन्वेषण ओकर मंचन तथा प्रकाशन। नाट्यायोजन केँ मूर्त रूप प्रदान करबाक उत्तरदायित्व देल गेलनि नवयुवक नाट्य कर्मी छात्रानन्द सिंह झा केँ मूर्त रूप प्रदान करबाक उत्तरदायित्व देल गेलनि नवयुवक नाट्य कर्मी छात्रानन्द सिंह झा केँ जे रेडियो सँ सम्बद्ध रहथि आ नाट्यमंचक नकनिकक सैद्धान्तिक एवं व्यवहारिक पक्षक अधिकारिक जानकारी छलनि। अत्याधुनिक नाटक आ आ रंगमंच के दिशा में समिति क्रान्तिकारी डेग उठौलक जकर प्रयाससँ रंगमंच केँ नव-दिशा भेटलैक तथा नाट्यमंचनक परम्पराक शुभारम्भ भेलैक समिति द्वारा।
नाट्यमंचक स्थापनाक पश्चात् मौलिक नाट्य स्पना हेतु प्राचीन एवं अर्वाचीन नाटककारक आहृन क’ कए नव-नव नाटकक अन्वेषणक प्रक्रिया प्रारम्भ भेल। एहि प्रकारेँ रंगमंचक एक सुदृढ परम्पराक स्थापना भेल जे विद्यापति स्मृति पर्व समारोहक अवसर पर वा समिति द्वारा आयोजित कोनो महत्वपूर्ण अवसर पर नाट्यमंचनक एक सशक्त माघ्यम स्थापित भेल। समिति नाट्यमंच एक सार्थक भूमिकाक निर्वहण कयलक जकर लाभ नाटक कारक संगहि-संग रंगमंचकेँ निम्नस्थ लाभ भेटलैक:
1. आधुनिक परिप्रेक्ष्य में नवीन नाट्य-साहित्यक विकास यात्राक शुभारम्ीा।
1.2. आधुनिक तकनिकक रंगमंचक स्थापना।
1.3. राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मैथिली नाटक आ रंगमंच केँ स्थापित करबाक प्रयत्न।
1.4. अभिनेता-अभिनेत्रीक संगहि-संग कुशल निर्देशकक अन्वेषण।
1.5. नाटय-लेखनक दिशा में प्रतिभान नाटककार केँ प्रोत्साहन।
1.6. अमंचित एवं अप्रकाशित नाटकक पाण्डुलिपि केँ आमंत्रितक’ कए विशेषश्रक अनुशंसा पर मंचना।
1.7. मंचनोपरान्त नाटकक प्रकाशन।
1.श्रीसम शताब्दीक सप्तदशकोत्तर कालावधि में समिति क नाट्यमंच प्रभाग नाटक लेखक लोकनिसँ नव-नव प्रवृत्ति आ नव-शिल्पक नाट्य रचनाक अनुरोध करब प्रारम्भ कयलक तथा मंचोपरान्त ओकर प्रकाशनक भार वहन करबाक दायित्व स्वीकारलक। नाट्यमंच प्रभाग द्वारा विद्यापति स्मृति पर्वोत्सव बा अन्याय कोनो आयोजनोत्सव पर मौलिक, अनूदित वा उपन्यास वा कथाक नाट्य-रूप प्रस्तुत करबाक परम्पराक शुभारम्भ कयलकज नाट्यलेखन आ मंचनक दिशा में ऐतिहासिक घटना थिक ले नव-लव प्रतिभाशाली नाट्य-लेखक लोकत्ति केँ प्रोतसाहन भेटलनि तथा प्राचीन आ अर्वाचीन अभिनेता, अभिनेत्री आ निर्देशक लोकत्ति एकर प्रस्तुति में सहभागी बनलाह। अभिनयोपयोगी आ मंचोपयोगी नाटकक जे अभाव साहित्यान्तर्गत छस तकर पूत्यर्थ समितिक नाट्य प्रभागक ई निर्णय निश्चित रूपेण नाट्य-लेखन ओंकर मंचन तथा ओंकर प्रकाशत्न में नव-दिशाक संकेत कयलक।
1.चेतना अपन कार्यक्रम केँ व्यापक बनयबाक हेतु पूर्व निर्णयापनुरूप सन् 1973 ई. में अमरनाथ झा जयन्ती क आयोजन कंकडबाग कॉलनीक लोहियानगर में इैबाक निर्णय भेलैक तथा इहो निर्णय भेलैक जे एहि अवसर पर एक नाट्यभिनयक आयोजन कयल जाय जाहिये सहयोगी भेलाह वासुकिनाथ झा, गणेशशंकर सर्गा, अमरनाथ झा एवं छात्रानन्दसिंह झा। जखन ई प्रचार भेलैक जेएहि कौलनी में अमरनाथ झा जयन्तीक अवसर पर नाट्यभिनयक सेहो योजना छैक तखत कौलनीवासी सभक सहयोग पर्याप्तमा =11 से भेंटय लागलनि। ओहि अवसर पर जनमानसक मनोरंजनाथ हवेली रानी नाटकक मंचन भेल छल, जाहिमे रोहिणी रमण झा जे आब मैथिलीक नाटककार आ अभिनेताक रूप में चर्चित छथि अभिनेत्री रूप से रंगमंच पर उतरल रहथि। एहि नाट्य योजना में कतिपय सहयोगीक बल भेटल जाहि में उल्लेखनीय छथि इण्डियन नेशनक इन्द्रकान्त झा. मिथिलेन्दु एवं वेदानन्द झा जनसम्पर्क विभाग का एहि आयोजनक ऐतिहासिक महत्व छैक जे विहारक तत्कालीन मुख्यमंत्री केदार पाण्डेय एही मंच सँ विहार पब्लिक सर्भिस कमीशन में मैथिलीक स्वीकृति आ मिथिला विश्वविद्यालयक स्थापनाक उद्घोषणा कराने रहथि। प्रारम्भिकावस्था में अभिनयोपयुक्त नाटक अभाव रहलैक ओकरा संगहि-संग रंगमंच केँ नवरूप देबाक प्रयास कोलैक। समयाभावक कारणेँ समितिक नाट्यमंच प्रभाग द्वारा एकर प्रयोग प्रारम्भ में लैक दिगम्बर झा लिखित एकांकी हुरैत लोकऍं। पुन: समितिकेँ महिला अभिनेत्रीक अन्वेषणक प्रक्रिया प्रारम्भ कयलक जाहि में ओंकरा कठिनताक सामना करय पडलैक, किन्तु संयोग सँ रेडियोक अभिनेत्री प्रेमलता मिश्र प्रेम कुमारी भारती मिश्र तथा अभिनेकताक रूप से छात्रानन्द सिंहझा, जगन्नाथ झा, नरसिंह प्रसाद आ वेदानन्द झा क अविस्मरणीय सहयोगक फलस्वरूप ई प्रदर्शन अत्यन्त सफल भेल जाहिऍ आयोजक संगहि-संगसंयोगकक सेहो उत्साहवर्द्धन भेलनि। एहि एकांकीक निर्देशन कराने रहथि गणेश प्रसाद सिन्हा तथा बिहार आर्ट थियेटर क संस्थापक अनिल कुमार मुखर्णीक अपरिमित तकनिक सहयोग भेटलनि। एहि एकांकीक मंचनक संगप्रथ में प्रथम आधुनिक रंगसंचक अवधारणाक एकरा बानगी प्रस्तुतभेल।
1.नाट्य संचक विधिवत स्थापानोपरान्त जनमानसक मनोवृति में नाटक आ रंगमंचक प्रति प्रतिवर्द्धताक संगहि संग नाट्यमंचनक हेतु प्रतीक्षानुसार रहब एक औत्सुकयक भावनाक उदय होइनहि समितिक पदाधिकारी लोकति एकरा प्रति अपन सचेष्टता आ तत्पारता देखायब प्रारम्भ कयलनि तकरे परिणाम थिक जे नाट्य मंच मौलिक आ ानव तकनिकक नाट्यक हेतु अन्वेषण करब प्रारम्भ कयलका नाट्यमंचक संयोगक छात्रा नन्द सिंह झा केँ ई गुरूतर भाद देल गेलनि जे अग्रिम वर्ष चेतनाक नाट्यमंचक तत्वावधान से समसामचिक समस्या सँ सम्बन्धित एहन मौलिक नाट्य लेखक सँ सम्पर्क क’ कए नव तकनिक क नाटकक हेतु प्रयास करथि। एहि हेतु ओ हिन्दीक वरिष्ठ नाटक कार आ मिथिला मिरिरक तत्कालीन सम्पादक सुधाशु शेखू चौधरी (192क0-1990) सँ सम्पर्क साधि हुनका सँ एक एहन नाटकक अनुरोध कयलनि जे जनमानसक हृदय केँ स्पर्श कयनिहार हो। एहि प्रसंग में नाटककारक कथन छनि, आकाशवाणी पटनाक बटुकभाइक आ चेतना समितिक वर्तमान सचिव गजेन्द्रनारायण चौधरी ठोंठ मोकि हमरासँ भफाइत चाहक जिनगी जिचाा लेलनि आ हम मैथिली नाटककारक रूप में चीन्हल आ जानल जा सफलहुँ। भफाइत चाहक जिनगीक आत्म-कश्य) ओ इनक अनुरोधमानि मैथिली में प्रथमे-प्रथस काल खण्डी नाटक लिखलनि मफाइत चाहक जिनगी जकरा नाट्यमंचक तत्वावधान में सन् 1974 ई. में शहीद स्मारकक प्रांगण में प्रस्तुत कयल गेल जाहि में प्राय: पैंतीस हंजार सँ बेसी मैथिल समाजक छॉंटल-वीछल लोक दस साधि नाटककक एक-एक शब्द पीबैत रहल, एक-एक दृश्यकेँ अपलक देखैत रहल। एहि प्रदशनिक सफलता क प्रमुखकरण छलैक जे एहि प्रकारक नाट्यायोजन चेतना समिति द्वारा पूर्व में नहि भेल छल तेँ दर्शकेँ ई सर्वथा नवीनताक आभास भेंटलैक। नाटकक सफलता एहि में रहलैक ले अपेक्षित घ्वनि प्रकाशरस उपयुक्त यप्रेक्षागृहक अभावों में नाट्यमंच चुनल बीछल कलाकारक सक्रिय सहभागिताक फलस्वरूप एकरा रूपाचित कयल जा सकल। अग्रिम वर्ष ओंकर प्रकाशनक व्यवस्था कयलगेलैक जकर परिणाम भेलैक जे जनमानसक जन-मन-रंजनक साधनक संगहि समकालीन समाज में व्याप्त बेरोजगारीक समस्याक हृदयस्पर्शी कथानक जनमानसक आकर्षणक केन्द्र बिन्दु बनि गेलैक।
1.एहि प्रस्तुति में सहभागी रहथि छायानन्द सिंह झा, हृदयनाथ झा, वेदानन्दझा, अशर्फी पासवान आजनवी, बन्धु, फल्लतझा, परमानन्द झा, चन्द्रप्रकाश झा, मोदनाथ झा, मनमोहन चौधरी, शम्भुदेव झा, रामनरेश चौधरी, प्रेमलता मिश्र प्रेम, कुमारी रमाचन्द्र कान्ति, सुरजीत कुमार एवं सुनील कुमार अपार जन समुदायक उपस्थिति में ई नाठक प्रशंसिते नहि; प्रत्युत बहुतो दिन धरि चर्चाक विषय बनस रहस। नाटकक सफलता में नाटक में कलाकार लोकतिक ओ अदस्य उत्साहक संग-संग बिहार आर्ट थियेटर बिहार. जन सम्पर्क विभाग आ भारत सरकारक संगीत एवं नाटक विभागक कलाकार लोकतिक सहयोग केँ अस्वीकारल नहि जा सकैछ।
1.वस्तुत: एहि प्रस्तुतिक सफलताऍं समितिक पदाधिकारी लोकति पुन: हुनका सँ एक नव नाटकक रचनाक अनुरोध कयलक। आधुनिकताक सन्दर्भ में एक सेटक नाटक में सुधांशु शेखर चौधरी क कथा-वस्तु मूल प्रवाह संग-संग एक वा एकसँ अधिक अन्तर प्रवाहक प्रयोग रहल अछि। ओ नाट्य मंचक संयोजक छात्रानन्द सिंह झा क प्रस्तुति सँ एतेक प्रभावित भेलाह जे अपन दोसर नाटक दहैत देवाल। लेटाइत ऑचरक रचना क’ कए हुनका देलथिन प्रस्तुति करवाक हेतु। पुन: एहू काल-खण्डी नाटकक प्रदर्शन एतेक प्रभावकारी भेल आ जनमानस नव नाट्य प्रस्तुतिक हेतु वर्णभार प्रतीक्षातुर रहय लागल। एहि प्रकारेँ नाट्यमंच नाटक आ रंगमंच क दिशा में अपन डेग आगू बढबैत गेल। नाट्य-प्रदशनिक सफलताक पाछॉं नाट्याभिनय अपार जनमानसक समक्ष भेल। एहि नाटक में प्रतिभगी कलाकार लोकति में हृदयनाथ झा, मोहनाथ झा, अशर्फी पासवान अजनबी, शंभुदेव झा, रामनरेश चौधरी, सत्यनारायण राडत, वीरेन्द्र कुमारझा, फन्नत झा, बलाशंकर चौधरी, सुनीलकुमार झा, वीरेन्द्रकुमारझा, फन्नतझा, रामनरेश चौधरी, सत्यनारायण राडत, वीरेन्द्र कुमारझा, फन्नतझा, बलाशंकर चौधरी, सुनील कुमार झा, कल्पनादास एवं प्रेमलता मिश्र प्रेम। एहि नाट्ययोजनक सब श्रेय कलाकार लोकतिक परिश्रमिक संगहि-संग बिहार आर्ट थियेटर एवं जन सम्पर्क विभागक कलाकारकेँ रहलनि।
1.चेतना समितिक ई अभिनव प्रयास भेलैक जे मिथिलाव्चलक पुरातन सांस्कृतिक विरासत तथा नाट्य साहित्यक अविच्छिन्न स्मृद्धिशाली आ गौरवशाली परम्परा में एक नव प्राणक स्पन्दन भरबाक निमित नियमित रूपेँ प्राचीन एवं अर्वाचीन प्रतिभाशाली नाट्य-लेखकक आहवानक कए नाट्य –लेखनक दिशा में प्रोत्साहन, मंचोपरान्त ओंकर प्रकाशनक व्यवस्थित परम्पराक व्यवस्था कयलक सन् 1973 ई. सँ जे जनमानसक मनोरंजनक संगहि-संग नाट्य-साहित्यिक साबर्द्धनक दिशा में गतिशील भेल जे विद्यापति स्मृति पर्वोत्सव पर संगहि-संग अमरनाथ झा, हरिमोहन झा, ललितनारायण मिश्र एवं जयनाथ मिश्र जयन्तीक अवसरपर मौलिक, अन्य भारतीय भाषाएं अनूदित वा मैथिलीक प्रसिद्ध उपन्यास वा कथाक नाट्य रूपान्तरणक परम्पराक शुभारम्भ कयलक जे अद्यपर्यन्त अव्याहत रूपेँ चलि आबि रहल अछि। एकर सुपरिणाम एलबा अवश्य भेलैक जे अद्यापि निरस्थ नाटकक मंचन समितिक तत्वाधान में भेल अछि जकरा ऐतिहासिक घटना कहब विशेष समुचित हैत, कारण भंगिमा (1984) केँ छोडि क’ मिथिला अचल बा मिथिलेतर क्षेत्रक कोनो नाट्य संस्था अर्द्भाव एतेक परिभाषा में नाट्यायोजन नहि क’ सकल अछि। एकरा द्वारा रचित नाटककेँ विविध काल-खंड में सुविधानुसार विभन्न दशक में प्रदर्शित नाटकक तिथिक अनुसारेँ कयल जा रहल अछि।
1.अमरनाथ झा जयन्तीक आयोजन पर महेन्द्र सलंगिया (1946) क ओकरा आडन्नक बारहमासा, गुणनाथ झाक पाथेय, गंगेश गुंजन (1941) क चौबरियापर। बुधिबधिया एवं रोहिणी रमण झा क अन्तिम गहना, हरिमोहन झा जयन्तीपर हुनकहि द्वारा लिखित एकांकी अयाची मिश्र (1956), हुनक प्रसिद्ध कथा पॉंच पत्रक एकल अभ्निय एवं छात्रानन्द सिंह झा क आदर्श कुटुम्ब कनाट्य रूपान्तरण, ललित नारायण मिश्र जयन्ती पर तन्त्रनाथ झा (1क909-1974) क उपनयताक भोज (1949) एवं अरविन्द अक्कू गुलाब घडी तथा जयनाथ मिश्रक जयन्ती पर हरिमोहन झा क प्रसिद्ध कथा कन्याक जीवन क नाट्य रूपान्तरण विभूति आनन्द द्वारा तितिर दाइ केँ मंचस्थ कयल गेल जकर विवरण निम्नास्थ अछि:
1.
विपरीत शताब्दीक अष्टम दशक में मंचित एकांकी/नाटक:
तिथि नाटक नाटककार अभिनीत स्थान अवसर निर्देशक
10 नवम्बर 1973 ढठैत लोक दिगाम्बर झा शहीद स्मारक विद्यापतिपर्ण गणेशप्रसाद सिन्हा
10 नवम्बर 1974 मफाइत चाह जिनगी सुधांशु शेखर चौधरी शही स्मारक विद्यापतिपर्ण गणेशप्रसाद सिन्हा
18 नवम्बर 1975 ढहैत देवाल/लेटाइत ऑंचर सुधोंशु शेखर चौधरी शहीद स्मारक विद्यापतिपर्व गणेशप्रसाद सिन्हा
6 नवम्बर 1976 पसिझैत पाथर रामदेव झा शहीद स्मारक विद्यापतिपर्व नवीनचन्द्रामिश्र
6 नवम्बर 1976 एक दिन एकराति सीतासमझा श्याम शहीद स्मारक विद्यापति पर्व रवीन्द्रनाथ ठाकुर
23 नवम्बर 1977 एकरा अन्तर्यात्रा जर्नादन राय शहीद स्मारक विद्यापति पर्व जनार्दन राय
25 नवम्बर1977 इन्टरव्यू जनार्दन राय शहीद स्मारक विद्यापति पर्व जनार्दन राय
25 नवम्बर 1977 सिहर्सल रवीन्द्रनाथ ठाकुर शहीद स्मारक विद्यापतिपर्व रवीन्द्रनाथ ठाकुर
25 नवम्बर 1977 ओझाजी दमन कान्त झा शहीद स्मारक विद्यापती पर्व रवीन्द्रनाथ ठाकुर
14 नवम्बर 1978 पाहि सॉंझ सुधॉंशु शेखर चौधरी शहीद स्मारक विद्यापतिपर्व अखिलेखकर
14 नवम्बर 1978 हॉस्टल गेस्ट सच्चिदानन्द चौधरी शहीद स्मारक विद्यापति पर्व सच्चिदानन्द चौधरी
25 फरवरी 1979 ओंकरा आडव्नक बारहमासा महेन्द्र मलंगिया आइ. एम. ए. हॉल अमरनाथ झा जयन्ती अरिवलेरवर
4 नवम्बर 1979 ओंकरा आडव्तक बारहमासा महेन्द्र मंलगिया शहीद स्मारक विद्यापतिपर्व अखिलेखर
4 नवम्बर 1979 चानोदाइ उषाकिरण खाँ शहीद स्मारक विद्यापति पर्व अखिलेखर
22 नवम्बर1980 एक कमल नोइ में महेन्द्रमजंगिया शहीद स्मारक विद्यापति पर्व अखिलेखर
एहि दशक कालावधि में कुल पन्द्रह एकांकी/नाटकक प्रस्तुति कयल गेल जाहि में पॉंच नाटक आ शेष दस एकांकी अवधि। एहि दशाब्दक अन्तर्गत ख्याति अर्जित कयलक भफाइत चाहकजिनगी, ढहैत देवाल। लेटाइत ऑचर पहिल सॉंझ एवं ओंकरा आडव्नक बारहमासा कारण नाटककार सामाजिक परिप्रेक्ष्यकेँ घ्यान से राखि क’ एकर कथानक संयोजन कयलनि जे जनमानस पर अपन अमिट छाप छोडवसि सहायक सिद्ध भेल। उपर्युक्त नाटकादिक कथानक दुतगासिता, घटना-उपघटनादिक विस्तारक संग समन्वित क’ कए नाटककार नाटककार नाट्यसाहित्यान्तर्गत तेहन मानदण्ड स्थापित क’ देलनि जे में अन्यतम भ’ गेलाह। एहि संस्था द्वारा जखन जखन नाट्यायोजन कयल गेल तखन-तखन दर्शकक रूप में सम्पूर्ण मैथिल समाज उनहि आयल जे एकर लोक प्रियताक प्रतिमान थिक।