विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

लोरिक गाथामे समाज ओ संस्कृति

गजेन्द्र ठाकुर · 2009-06-01 · अंक 35

लोरिक गाथामे समाज ओ संस्कृति-गजेन्द्र ठाकुर
लोरिक गाथामे नहि तँ कोनो इतिहास प्रसिद्ध राजाक नाम आ नहिये लोरिकक जन्म आकि विवाहक तिथिक चरचा अछि। भाशाक स्वरूप मौखिक रहबाक कारणसँ गतिशील अछि। काल निर्धारण सेहो अनुमानपर आधारित अछि। लोरिकक जन्म-स्थान गौरा गाम अछि आ कार्य-कर्म क्षेत्र पंजाबसँ नेपाल आ बंगाल धरि अछि। सासुर अगोरी गाम अछि जे सोन धारक कातमे बताओल गेल अछि।
लोरिकक विवाह- पहिल विवाह अगोरी गामक मंजरीसँ दोसर बियाह चनमासँ जकरासँ चनरैता नाम्ना पुत्र।
तेसर बियाह हरदीगढ़क जादूगरनी जमुनी बनियाइनसँ जाहिसँ बोसारख नाम्ना पुत्र।
वीर लोरिकक पैघ भाए सँवरू सेहो वीर। ओ कोल राजा देवसिया द्वारा मारल गेलाह। बादमे लोरिक सेहो युद्ध करैत घायल भऽ जाइत छथि आ बोहा बथानपर लोरिकक बेटा भोरिक देवसियाकेँ पराजित करैत अछि। लोरिक बूढ़ भेलापर अग्नि समाधि लैत छथि।
लोरिकक कथा- साबौरक जन्म आ लोरिक वतार, सँवरूक विवाह, माँजैरक जन्म, लोरिक-माँजैर विवाह आ राजा मौलागत आ निरमलियासँ युद्ध, सँवरू आ सतियाक विवाह, झिमली-लोरिक युद्ध, चनैनिया-शिवहर विवाह आ लोरिक-बेंठा चमारक युद्ध। एहि गाथामे लोरिक-चनमा प्रेम आ हरदीगढ़ प्रस्थान आ राजा रणपाल आ महिपतसँ लोरिकक युद्ध। लोरिक आ चनमाक हरदीगढ़मे निवास, लोरिक गजभिमला युद्ध, नेऊरपुरक चढ़ाइ आ लोरिक-हरेबा-बरेबा युद्ध, संवरू आ कोल युद्धमे सँवरूक मृत्यु, लोरिकक बोहा बथान आगमन, पीपरीगढ़क चढ़ाई आ लोरिक आ देवसिया युद्ध, लोरिकक देहत्याग आ भोरिकक नेतृत्व। पिपरीक पहिल लड़ाइ सँवरूक संग, पिपरीक दोसर लड़ाइ लोरिकक संग भेल। फेर लोरिकक काशीवास आ मृत्यु होइत छन्हि।
लोरिकक असली हरदीगढ़ आ प्रसिद्ध कर्मक्षेत्र सहरसा जिलाक हरदीस्थान अछि कारण सुपौलक पूब स्थित हरदीक संग दुर्गास्थान शब्द सम्मिलित अछि। एहि हरदीक संग महीचन्द्र साहू, राजा महबैर, नेऊरपुर (नौहट्टा), गंजेरीपुर (गौरीपुर), खेरदहा (खैरा धार), रहुआ-चन्द्रायन-मैना-गाम, बैराघाट, तिलाबे धार, बैरा गाछी आ महबैरिया गामक चरचा अछि। लोरिक गाथा स्थल बैराघाटसँ प्राप्त पजेबा आ हरदी हाइस्कूलसँ सटल पश्चिम खुदाइमे प्राप्त पजेबामे पाओल समानता एकर व्याख्या करैत अछि।
सुपौल रेलवे स्टेशनपर रेलवे विभागक एकटा बोर्ड लागल अछि- एतएसँ पाँच किलोमीटर पूर्व हरदी दुर्गास्थानमे भगवती दुर्गा आ वीरपुरुष लोरिकक ऐतिहासिक स्थल दर्शनीय अछि।
नौहट्टा लग महर्षि आ ओतए पालीभाषाक शिलालेख- पालवंशीय- हरिद्रागढ़ चौदह कोसमे विस्तृत। तेरहम शताब्दीक ’वर्णरत्नाकर’मे लोरिकक चरचा अछि।
लोरिक मनुआर गाथाक धार्मिक सामाजिक आ राजनीतिक पक्ष। लोरिक अज्ञात नाम गोत्रसँ उत्पन्न। यादव जाति अपन पूज्य लोरिकक सम्मान छाँक पूजासँ करैत छथि आ लोकदेव, लोकनायक रूपेँ सम्मान दैत छथि।
लोरिकायनक मैथिली स्व्वरूप पुरातत्ववेता अलेक्जेन्डर कनिंघमक संकलनमे अछि। क्वार्टरली जर्नल ऑफ द मीथिक सोसाइटी (भाग-५ , पृ.१२२ सँ १३५) मे भागलपुरक लोरिकायनक चरचा।
आर्क्योलोजिकल दर्वे रिपोर्ट खण्ड 16 (1883 ई.) पृ.27-28 मे कनिँघमक यात्रा वृत्तानमे लोरिक आ सेउहर वा सरिकका नाम्ना दू टा पड़ोसी राजाकेँ गौरा गामक निवासी कहल गेल अछि।
भागलपुर गजेटियर (पृ.४८-५०) मे जॉन हन्टर लोरिक विषयक रिपोर्ट देने छथि।
लोरिक गाथा लोरिकायन, लोरिकी आ लोरिक मनिआर नामसँ प्रसिद्ध अछि। मिथिलामे एकर प्रशस्ति लोरिक मनिआर नामसँ अछि।
लोरिकक नैतक (बेटाक बेटा) नाम इन्दल रहए। मैथिलीक लोरिक मनिआरमे लोरिकक विवाह प्रसंग आ लोरिकक कनियाँ तकबासँ लऽ राजा सहदेवसँ युद्ध केर विस्तृत चरचा अछि।
महुअरि खण्डमे गजभीमलक अखाड़ा जएबाक लेल घोड़ा चुनब आ गजभीमलकेँ पटकि-पटकि कऽ मारबाक वर्णन।
लोरिक द्वारा हरबा-बरबाक वध। गाथाक प्रारम्भमे सुमिरन आ बन्हन।
सुमिरन- इनती करै छी दुरुगा मिनती तोहार।
बन्हन- आ-दुरुगा गइ पुरुब खण्ड हे गइ
१.विवाह खण्ड,२.महुअरि खण्ड,३.युद्ध खण्ड
मणिपद्मजी- १.जन्म खण्ड२.सती माँजरि खण्ड,३.चनैन खण्ड,४.रणखण्ड,५.सावर खण्ड,६.बाजिल खण्ड,७.सझौती खण्ड आ ८.नेपालसँ प्राप्त भैरवी खण्ड।
-गौरा गामक बुढ़कूवा राउत- तारक गाछक झठहा बनबैत रहथि। ५-७ सय पहलमानकेँ पीठपर लादि चौदह कोस टहलि आबथि। मुदा घर-घरारी किछुओ नहि छलन्हि। दू टा पुत्र लोरिक मनिआर आ साओद सरदार छलन्हि।
-अगौरीक मुखिया सेवाचन राउत – अस्सी गजक धोती आ बावन गजक मुरेठा- तेतलिया घोड़ा छलन्हि। पुत्री छलखिन्ह माँजरि जे सात सय संगी संगे सुपती-मौनी खेलाइत रहथि।ओकर बियाह लेल सेवाचन बुढ़कूबाक ओतय लोरिकसँ अखड़हापर- छप्पन मोन माटिसँ तरहत्थी मलनिहार सेवाचनकेँ लोरिक टालि-गुल्ली जेकाँ ऊपर फेकि देलक आ गेन जेकाँ लोकि कए काँख तर दबा लेलक। बियाह दिन राजा उगरा पमार बूढ़कूबाकेँ पकड़बाक प्रयास मुदा बूढ़कूबा भकुला पहलमानक गरदनि काटि लेलक। विवाह सम्पन्न भेल। राजा उगरा पमार सनिका-मनिकाकेँ बजेलक- लोरिक सनिका-मनिकाक मूड़ी काटि लेलक। गौरा घुमैत काल हरदीक राजा सहदेवक आक्रमण, लोरिक सहदेवकेँ हरा कए ओकर पुत्री चनाइकेँ महीचनक आँगन लऽ जाए विवाह कएल। तखन राजा महुअरि महीचनकेँ कारामे दऽ देलक मुदा फेर लोरिकसँ डरा कए छोड़ि देलक। मुदा सिलहट अखड़हाक सरदार गजभीमलकेँ पठाओल। मुदा लोरिक ओकर मूड़ी काटि लेलक आ फेर राजासँ मित्रता भेल। दुनू मिलि राजा हरबा-बरबासँ युद्ध कएलक। हरबा-बरबा भागल मुदा धुथरा पहलमानकेँ पहाओल- लोरिक ओकर दहिना आँखि निकालिओकर जीह काइ लेलक। हरबा-बरबाक पुनः आक्रमण आ पलायन मुदा फेर भागिन कुमर अनार- लोरिक मूड़ी काटि हरबा-बरबाक रानी पद्मा लग ओकर मूड़ी फेकलक। फेर हरबा-बरबाक आक्रमण-डिहुलीक रणक्षेत्रमे हावीगढ़क राजा हरबा-बरबाक मूड़ी काटि राजप्रसादक अन्तःपुरमे फेकलक। लोरिक छत्तीस टा युद्ध कएलन्हि। लोरिक कृषिक विकासमे सजग छलाह। कारण दोसराक भूमिक अधिग्रहण कए बहुसंख्यक चिड़ँइ, जानवर आ कीट-पतंग उजड़ि गेल आ इन्द्र लग गेल। वर्णरत्नाकर- द्वितीय कल्लोलमे लोरिक नाचो- पहिने नाच छल आइ-काल्हि गाथा।
“मिथिलायदयश्च मध्यंते रिपवो इति मिथिला नगरी”।
-समाजक सीढ़ीक आइ-काल्हिक नीचाँक वर्ग आ नारी समाजक शक्तिक विस्तार, आध्यात्मिक आ लौकिक अर्थ दुनू तरहेँ।
- सामाजिक सीढ़ीक विभिन्न स्तरक जातिक अन्तर्विरोध, आइ-काल्हिक तथाकथित निम्न जातिक दुराचारी पात्रक विनाश लोरिक द्वारा। लोरिकक भगवतीपर भक्ति छल ओकर विजयक कारण।
मुदा लोरिकक शत्रुमे सामाजिक सीढ़ीपर ऊँच स्थान प्राप्त मोचनि आ गजभीमल छल तँ मित्रमे सेहो राजल सन सामाजिक सीढ़ीमे नीचाँ जातिक।
हरबा राजाक चपेटसँ दुहबी-सुहबी ब्राह्मणी आ गांगे क्षत्रीक मुक्ति।
उघरा पँवार, हरबा-बरबा, सोनिका, मनिका, बंठा, कोल्हमकड़ा, करना सभ जातीय सीढ़ीमे नीचाँक पात्र राजा छथि। मातृदेवीक उपासना, इन्द्रक पत्नीक दुर्गाक भेष बदलि आएब आ लोरिक द्वारा हुनका पत्नी बूझि छूबाक उपरान्त पीड़ा। लोरिक माँजरिक मिलन काशी-प्रयाण।
-गाथा मेला, हाट बजार, विशिष्ट लोकक घर, सार्वजनिक स्थलपर से यादव जातिक अतिरिक्त आनो श्रोता। सर्जक आ श्रोताक प्रत्यक्ष संबंध, श्रवणीय, कथाक अनायास अलंकरण, मुदा सभटा साहित्यिक लक्षण जेना सर्ग, छन्दबद्ध, नाट्य-संधि आ संध्यांगक योजना आ वस्तु निर्देशक अभाव। वस्तु संगठन सुगथित नहि। गारिक प्रयोग आ मद्यपानक यत्र-तत्र वर्णन, ग्रामीण व्यवस्थामे चोरक स्थान आ ओकर वर्णन, स्थानीय देवी-देवताक चरचा, जातीय अस्मिताक प्रतीक। कथा-गायक आशु कवि होइत छथि-एकटा अस्थिपञ्जर अवश्य रहैत अछि मुदा ताहिपर अपन हिसाबसँ ओ गबैत छथि। शब्दशः ओ कण्ठस्थ नहि करैत छथि। प्रारम्भमे ईश्वर, वन्दना आ बीच-बीचमे ईश्वरसँ क्षमायाचना, ई सभ गायन क्षमता स्थिर करबाक उद्देश्यसँ कएल जाइत अछि। घण्टासँ ऊपर गायन बीचमे हुक्का-चिलम, मद्यपान, परिवेशक वर्णन गायनमे। निरक्षर मुदा कोनो साक्षरसँ बेशी ज्ञान भण्डार। लोरिक मनुआरमे श्रोताक संख्या, तन्मयता आ एकिआग्रचित्तताक प्रभाव कथा-गायकक कथा वाचनपर पड़ैत अछि कारण ई श्रोताक सोझाँ कएल जाइत अछि। एहि अर्थेँ सल्हेस किअथावाचकसँ हिनकापर बेशी बाह्य प्रभाव पड़ैत छन्हि। सल्हेस गाथा श्रोताक समक्ष नहि वरन आराध्य देवक समक्ष वाचन कएल जाइत अछि।
गाथाक मूल कथा ओना तँ मोटा-मोटी समान रहैत अछि मुदा प्रस्तुतिकरण, विशिष्ट समाज, क्रियाकलाप आ सामाजिक मर्यादाक कारण विशिष्ट।
युद्ध,द्यूत,प्रेम आ विवाह-सांस्कृतिक तत्त्व सभ महाकाव्यमे, द्यूत –मानसिक युद्ध-द्यूतमे मनुक्खकेँ बाजी लगाएब, महाभारतमे आ लोरिकायनमे।
दुर्गा देवी द्वारा युद्धमे नायकक सहायता, चनैनक शिवधरकेँ छोड़ि लोरिक संग उढ़रि जाएब, दुसाध जातिक महपतियासँ लोरिकक जुआ खेलाएब आ लोरिक द्वारा चनैनकेँ जुआमे हारब-चनैन द्वारा प्रतिवाद-गहना गुरिया दाँवपर, चनैनक अश्लील हाव-भावसँ महपतियाक ध्यान बँटब आ लोरिकक जीतब। लोरिक द्वारा ओकर मूड़ी काअब। पति द्वारा अनुचित कएल जएबाक उपरान्तो पत्नी द्वारा बुझाएब।
लोरिकक अवतारवाद आ रहस्य
क्रोध-प्रेम दुनूमे गारि उन्मुक्त सांस्कृतिक काव्य चरित्र। प्रकृतिकेँ नुकाओल नहि गेल। नायक सेहो गारिक प्रयोग करैत अछि।
शिव-शक्तिक पूजा, महाकाव्यक पात्रक नाम आ आन तत्वक ग्रहण जे लोरिक मनुआर गायकक उदार आ सहिष्णु चरित्रकेँ देखबैत अछि। प्रस्तुति क्षमता आ ज्ञान क्षेत्र हिनका अनक्षर कहबासँ हमरा रोकैत अछि।
लोरिक मनुआरमे अलौकिक आ रहस्यमय घटना बेशी, वन्य जीवक (बोनमे)संख्या नहि केर बराबर, लोरिकक पात्र अवतारी मुदा विधिवत पूजा नहि।
धार्मिक विश्वास, नायकक चरित्र आ सामाजिक आचार। जीवन-संस्कृति दृढ़तापूर्वक, महाकाव्यक अधिकांश ल़क्षण जेना रस, छंद,गुण,अलंकार,सर्गक ध्यान,व्यवहृत धार्मिक मूल्य,संस्कृतिक सम्पूर्णता, सृजन-क्षमता(गायकक)।
लोकगाथा-नाचक फील्डवर्क-कथ्यमे बदलनाइ (जेना गारि), अपन संस्कृतिक नैतिक मानदण्डक आधारपर परिवर्तन अक्षम्य, अपनाकेँ ओहि समाजमे रखितहु उद्देश्यपर ध्यान, वाक्य शब्द रचनामे कोनो परिवर्तन नहि होएबाक चाही।
बाजिल कौआ अधजरुआ गोइठासँ कौल्हमकड़ाक गढ़केँ जरबैत अछि।
तिरिया, गामक रक्षा आ अनाचारीक विनाश-पशुपाल आ कृशिक समर्थन।
-उधरा-पँवारक हाथी-कज्जल गिरि
-लोरिकक कटरा घोड़ा
-सेनापति बरबाक घोड़ा बरछेबा
-बाजिल कौआ
मुदा लोरिक मनुआर महराइ मे ई सभ वन्य नहि वरल पोसुआ अछि।
लोरिकक मित्र बंठा चमार, वारू पहरेदार (पासवान), राजल धोबी, लोरिकक छोट भाइ साँवर।
सलहेसक कथा ताराइ क्षेत्रक। वन्य जीव आ वनक बेशी वर्णन, वन्यजीव द्वारा सलहेसक सहायता, आखेट आ बलि। सल्हेअक पूजा स्थलपर माटिक घोड़ा राखल जाइत अछि मुदा लोरिकायनमे नहि।
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रघुबीर मंडल said...
lorik gathak nik aa nootan vishleshan
Reply06/08/2009 at 09:42 AM
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Usha Yadav said...
नीक जेकाँ आ शोधपूर्ण लेख। लोरिक गाथाक लेखन लेल गजेन्द्रजी धन्यवाद।
Reply06/07/2009 at 12:20 PM
3
राहुल मधेसी said...
subhash ji ke estimate nik kelahu,
gahir adhyayan ker parinam etek nik samiksha,
chhichla knowledge se te panipat aa babar madhya yudh machat matra
Reply05/15/2009 at 09:41 PM
4
जितेन्द्र नागबंशी said...
bahut ras ideolism clear bhel,
subhash jik samiksha lel dhanyavad
Reply05/15/2009 at 09:39 PM

Suggested citation: गजेन्द्र ठाकुर. “लोरिक गाथामे समाज ओ संस्कृति.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 35, 2009-06-01. https://www.videha.co.in/research/2009/35/लोरिक-गाथामे-समाज-ओ-संस्कृति.htm

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