विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

इतिहास

डा. सुरेन्‍द्र लाभ · 2009-06-15 · अंक 36

३.७.सम्बन्धाक नव सूत्रक खोजीमे-सरस्वती चौधरी ‘रचना’
३.८. ज्योति-जीवन सोपान
आशीष अनचिन्हार
गजल ५
इहो अहाँक प्रेम छल पछाति जानल हम
खाली मूहँक छेम छल पछाति जानल हम
आगि लागल घर मे चिन्ताक गप्प नहि
कारण अपने टेम छल पछाति जानल हम
सड़ैत देखलिऐक किच्छो के कादो मे
अपने घरक हेम छल पछाति जानल हम
पिबैत रहलहुँ सदिखन विदेशी शीतल पानि
तैओ गरमी कम्म छल पछाति जानल हम
किछु तत्व कए दैत छैक अनचिन्हार सभ के
कथन मे दम्म छल पछाति जानल हम
गजल ६
अहाँ निरोध करु
अहाँ विरोध करु
लोक बढ़त आगाँ
अहाँ अवरोध करु
सुखी हएत गरीब
अहाँ क्रोध करु
धनी बनए धनी
एहने शोध करु
जनतंत्र अपने जन्मल
खूब ओध-बाध करु
सत्ता-सुरक्षा अपने
खूब अपराध करु
खाएब अहाँ फास्ट-फूड
बरबाद बाध करु
गजल ७
इजोतक दर्द अन्हार सँ पुछियौ
धारक दर्द कछेर सँ पुछियौ
नहि काटल गेल हएब जड़ि सँ
काठक दर्द कमार सँ पुछियौ
समदाउनो हमरा निर्गुणे बुझाएल
कनिञाक दर्द कहार सँ पुछियौ
सभ पुरुषक मोन जे सभ स्त्री हमरे भेटए
अवैध पेटक दर्द व्यभिचार सँ पुछियौ
करबै की हाथ आ गला मिला कए
अनचिन्हारक दर्द चिन्हार सँ पुछियौ
गजल ८
बेमार छी मुदा बेमार नहि लगैत छी
दवाइ खाइ से कहिओ ने चाहैत छी
हमरा अहाँ नीक लगलहुँ सभ दिन सँ
मुदा प्रेम अछि से कहि नहि पबैत छी
विसर्जनक पछाति बला मूर्ति छी हम
भसा देल गेलहुँ मुदा नहि डुबैत छी
सभ दिन हमरा लेल मधुश्रावनिए थिक
टेमी दगेलाक पछातिओ नहि कुहरैत छी
(अगिला अंकमे जारी)
गीत-
अशोक चौधरी
कहिया अहाँसँ होयत आब मिलन
एकहु घड़ी नहि मोनमे होइय चएन
अपन प्रेमके याद पारू प्रियतम
तरसि खून रहल छी, तरसिते रहबै अहाँके विना
कहिया अहाँसँ ..................
हमर सभटा अपराध माफ करब
जे हमरासँ भूलमे भेल हो
दुनियाक सभे खुसी, अहाँके भेटए
हमर अहाँ प्राण जीवन आ धन
अहीकेँ चरणमे लागल अछि लगन
हमरो हृदयपर विचारू प्रियतम
ई जेना बरसै, बरसिते रहत, अहाँके विना
कहिया अहाँसँ .......................
विरहके अनेको उठैत अछि तरंग
आउ उठाउ लगाउ अंगसँ अंग
अपना वियोगेमे नहि मारू प्रिय
भटकिते रहल मन भटकिते रहत, अहाँके विना
कहिया अहाँसँ ...................
बुढ़वा
उपेन्द्र भगत नागवंशी
बुढ़बा बड़बड़ाइत रहैत छल
टण्डेाली नइ कर,
एहिसँ की होतौ
देखै नइ छही समय
कमो खटो पाइ कमो
नइ तँ भुक्खेा मरबेँ ।
की करू
चोरी करू, डकैती करू
आ कि पाकेटमारी करू
नइ, मेहनति कर
इमानदारीसँ कमो
भुक्खेर नइ मरबेँ ।।
चलू अहीँक बात मानि लेलौँ
बड़ मोसकिलसँ भेटल काम
करऽ लगलौं मेहनति
कमाय लगलौं टका
बड्ड नीक,
मुदा कहाँ भरैत अछि
पाँचो परानीके पेट ।
गलल जाइय देह
धीया–पुता हमरा कहैत अछि
बुढबा ..... हमरालए की कएलह ?
हे, दीनानाथ ...........
हमहूँ आब बड़बड़ाइत छी ।
गीतकार : विनीत ठाकुर
गीत : उठू मैथिल भेलै भोर
जय जय मैथिल जय मिथिला
हर–हर गङ्गे जय कमला
उठू यौ मैथिल भेलै भोर
चुनमुन चिरैया करैय शोर
कोशि कमला अमृत जल धारा
आलश छोरु कहे भुरुकवा तारा
माईट पानिके लगाक छाती
बुढिया दादी गावे पराती
गाई महिश खोललक चरवाहा
हर लऽ विदाह भेल हरवाहा
मन्दिर मस्जिद मिथिलाके शान
रुप अनेक एकही भगवान
जनक शलहेशक ई कर्मभूमि
स्वर्ग समान वनाऊ मात्रिभूमि
सतीश चन्द्र झा,राम जानकी नगर,मधुबनी,एम0 ए0 दर्शन शास्त्र
समप्रति मिथिला जनता इन्टर कालेजमे व्याख्याता पद पर 10 वर्ष सँ कार्यरत, संगे 15 साल सं अप्पन एकटा एन0जी0ओ0 क सेहो संचालन।
चानक प्रेम
नहि उतरल छल चान गगन सँ
छलै आइ भारी जिद ठनने।
जागि गेल छल प्रात निन्न सँ
उदयाचल सिन्दुर सन रँगने।

विश्मित पवन आँखि के मलि-मलि
देखि रहल छल दृष्य ठाढ़ भ’।
उगतै सुरुज चान जड़ि मरतै
आवि रहल छै किरण गाढ़ भ’।

मुशकि रहल छल चान, ठोर पर
छलै अपन स्नेहक शीतलता।
ताकि रहल छल बाट, मिलन कँे
छलै हृदय मे मधुर विकलता।

बनल नियम छै कालचक्र के
के जानत की हैत अशुभता।
के बाँचत, के भागत नभ सँ
हैत नष्ट किछु आइ अमरता।

प्रखर अग्नि सँ आइ सामना
करतै शीतल प्रभा चान केँ।
प्रेम समर्पण मे जीवन के
द’ देतै आहुति प्राण कँे।

अंग - अंग मे अग्नि पूँज सँ
फुटतै फोँका लाल-लाल भ’।
काँच देह नहि सहतै पीड़ा
सुन्दरता जड़तै सुडाह भ’।

पलक झपकिते घटित भेल किछु
सुखद् दृष्य नभ केँ प्राँगन मे।
शीश झुकौने सुरुज चान केँ
बाँधि लेलक निज आलिंगन मे।

भेल चान परितृप्त अंक मे
पूर्ण भेलै मोनक अभिलाषा।
पिघलि गेल छल सुरुज मिझेलै
कुटिल अग्नि के अहं पिपाशा।

मौन भेल छल दिनकर नभ मे
नव आनंद अपार उठा क’।
चान भेल किछु लज्जित,हर्षित
उतरि गेल अपने ओरिया क’।
डा. सुरेन्‍द्र लाभ-
इतिहास
इतिहास
अवाजक समुद्र
हल्‍लाक ज्‍वारभाटा
अनन्‍त ..............
अनन्‍त कालसँ होइत पुनरावृत्ति
पुनरावृत्ति बनैछ इतिहास
हल्‍लाक इतिहास ।
ध्‍वनिक अंकमे
समाहित लोक
मुक्त होएबाक हेतु
व्‍याकुल लोक !
आवाजहीनता !
शब्‍दहीनता !
मौनता !
स्‍तब्‍धता !
एकटा स्‍वप्‍न
दिवास्‍वप्‍न भऽ गेल अछि ।
इतिहास–सिंहासनक हो
वा हो संघर्षक
इतिहास दानवक हो
वा हो मानवक
सभ इतिहास
हँ प्रत्‍येक इतिहास
हल्‍लाक इतिहास थिक ।
हल्‍लेहल्‍लासँ भरल
जतए शून्‍यताक अभाव थिक
शान्‍तिक अभाव थिक
हँ, प्रत्‍येक इतिहास
हल्‍लाक इतिहास थिक ।
सम्बन्धक नव सूत्रक खोजिमे
सरस्वती चौधरी ‘रचना’
सम्बन्धक कोनो सूत्र
नहि राखऽ चाहै छी बान्हल अहाँक संग
रत्ती–रत्ती छहोछित्त कऽ
मुक्त होएबाक होइछ इच्छा
एकटा खूजल परिसरमे
विचरणक अप्पन फूट आनन्द होइछ ।
मुदा अहाँक संग हमर सम्बन्धक
नव–नव परिभाषा खोजबाक हमर इच्छाक ।
हमरा फेरसँ झटिआ देलक अछि
हम अपने घरक बाट
बिसरल जा रहल छी ।
कि अछि अहाँक संग सम्बन्ध क सूत्र
जतेक तोड़बाक कएल जाइछ प्रयत्न, प्रयास
ततबए झमटदार भऽ आँखिक आगू
भऽ जाइछ ठाढ़
आ देखलो बाट हेरा जाइछ
आगू रहि जाइछ अहाँक
मात्र अहाँक मुह आ
राग–अनुरागसँ तर–बतर भेल
सम्बन्धक मजबूत सूत्र
आब तँ लाज लागल अछि
मुक्तिक हमर इच्छो
मात्र लौलक रूपेँ कएल प्रयास अछि ।
हम तँ कहिया नहि
मन्दिरमे भजन करबा लेल
स्वयंकेँ प्रस्तुत क' चुकल छी ।
ज्योति
जीवन सोपाण
कखनो तीव्रता स गन्तव्योन्मुख
कखनो रस्ता रोकने बाधा
कखनो थम्हल कखनो दौगैत
कखनो गति भेल आधा
असंतोष जन्मल आ बढ़ैत रहल
जखन अभिलाषा रहल अपूर्ण
मोन छल अखनो आरोही
शरीर भने होयत गेल जीर्ण
एहेन आन्दोलनक प्रतीक्षा रहल
आन्तरिक कौतुहल के शान्ति हेतु
जाहिमे निर्मित भऽ सकय
आकांक्षा आर प्राप्ति के सेतु
एक-एक डेग सऽ टपैत रहब
जीवनक अन्तहीन सोपाण
लक्ष्य तऽ ओतहि मानब
जतय त्यागब अपन प्राण
तूलिका(दहिनासँ पहिल)साभार:दैनिक जागरण-फोटोग्राफर-दीपूराज
तूलिका:
विदेह:सदेह:१ मे विदेह ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक ११३ गोटेक रचना प्रकाशित भेल जाहिमे १४ वर्षीय तूलिकासँ लए ८८ वर्षीय श्री आद्याचरण झा धरि छलाह। तूलिका एहि बरख सी.बी.एस.ई.क १०म कक्षाक तैयारीमे लागल रहबाक कारण अपन रचना किछु दिनसँ नहि पठा रहल छलीह। आब ओहि परीक्षाक परिणाम आबि गेल अछि आ डी.ए.वी.,बी.एस.ई.वी.,पटनाक एहि छात्राकेँ ९६.८ प्रतिशत अंक भेटल अछि आ ओ आब इन्जीनियरिंगक तैयारीमे लागल छथि। विदेह लेल हुनकर रचना पुनः आएल अछि जे पाठकक समक्ष अछि।:-सम्पादक

बालानां कृते-
1.देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स); 2. मध्य-प्रदेश यात्रा आ देवीजी- ज्योति झा चौधरी;३.स्वास्तिका-कक्षा २
1.देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स)
देवांशु वत्स, जन्म- तुलापट्टी, सुपौल। मास कम्युनिकेशनमे एम.ए., हिन्दी, अंग्रेजी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्र्रिकामे कथा, लघुकथा, विज्ञान-कथा, चित्र-कथा, कार्टून, चित्र-प्रहेलिका इत्यादिक प्रकाशन।
विशेष: गुजरात राज्य शाला पाठ्य-पुस्तक मंडल द्वारा आठम कक्षाक लेल विज्ञान कथा “जंग” प्रकाशित (2004 ई.)
नताशा: मैथिलीक पहिल-चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स)
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नताशा नौ
नताशा दस
नताशा एगारह

Suggested citation: डा. सुरेन्‍द्र लाभ. “इतिहास.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 36, 2009-06-15. https://www.videha.co.in/research/2009/36/इतिहास.htm

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