गजेन्द्र ठाकुरक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पर डॉ. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"
गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डमे विभाजित कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एकहि संग कठिनसँ कठिन विषयपर सुचिन्तित विश्लेषण भेटत आ उपन्यासक जटिल कथा केर गुत्थी सेहो भेटत सुलझाएल आ संगहि प्रेमक कविता आ प्रकृतिक गीत सेहो । सात खण्ड एहि प्रकार छन्हि-
खण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना
खण्ड-२ उपन्यास-सहस्रबाढ़नि
खण्ड-३ पद्य-संग्रह-सहस्त्राब्दीक चौपड़पर
खण्ड-४ कथा-गल्प सग्रह-गल्प गुच्छ
खण्ड-५ नाटक-संकर्षण
खण्ड-६ महाकाव्य- १.त्वञ्चाहञ्च आ २.असञ्जाति मन
खण्ड-७ बालमंडली /किशोर जगत
सभसँ महत्त्वपूर्ण बात ई जे सभ विषयक पाठकक आ पाठिकाक लेल एतए किछु ने किछु भेटबे करत । पुछलियन्हि जे एहन संरचना किएक तँ जे किछु कहलन्हि ताहिसँ लागल जे ई हिन्दी केर तार-सप्तक आ तमिलक कुरुक्षेत्रम् केर बीच मे कतहु अपन जगह बनेबाक प्रयास कऽ रहल छथि । फराक एतबे जे हिन्दी आ तमिल मे कएक गोटे मिलि कए सन्कलित भेल छथि एकटा जिल्दमे, आ एतए कएक लेखकक द्वारा विभिन्न विधा केर रचना नहि रहि हिनके अपन रचना पोथीमे उपलब्ध कराओल गेल अछि ।
कतेको पंक्ति भरिसक पाठकक मोनमे ग्रंथित-मुद्रित भऽ जएतन्हि , जेना कि –
“ढहैत भावनाक देबाल
खाम्ह अदृढ़ताक ठाढ़
आकांक्षाक बखारी अछि भरल
प्रतीक बनि ठाढ़”।
अथवा , निम्नोक्त पंक्ति-येकेँ लऽ लिअ :
“सुनैत शून्यक दृश्य
प्रकृतिक कैनवासक
हहाइत समुद्रक चित्र
अन्हार खोहक चित्रकलाक पात्रक शब्द
क्यो नहि देखत हमर ई चित्र अन्हार मे...”
मिथिलेक नहि अपितु भारतक कतेको संस्कृतिक प्रभाव देखल जा सकैछ हिनक कथा कवितामे । एहिसँ मैथिली क्रियाशील रचनाक परिदृश्य आर बढ़ि जाइछ , आ नव-नव चित्र , ध्वनि आ कथानक सामने आबि जाइत अछि ।
कवि कोन मन्दाकिनी केर खोजमे छथि जे कहैत छथि-
“मन्दाकिनी जे आकाश मध्य
देखल आइ पृथ्वीक ऊपर...”
अपन विशाल भ्रमणक छाप लगैछ रचनामे नीक जकाँ प्रतीत होइत अछि । आ आर एकटा बात स्पष्ट अछि – कोषकार गजेन्द्र ठाकुर आ रचनाकार गजेन्द्र ठाकुर भिन्न व्यक्ति छथि , व्यक्तित्त्वमे सेहो फराक... जतए कोशकारितामे सम्पादकत्व तथा टेक्नोलोजी –सँ सम्बन्धित व्यक्तिक छाया भेटिते अछि , मुदा सृजनक मुहुर्तमे से सभटा हेरा जाइत छथि ।
एहिमे सँ कतेको टेक्स्ट ओ रखने छथि इन्टरनेटमे मैथिलीक बढ़ैत पाठककेँ ध्यानमे राखए , जेना कि विदेह-सदेह अछि
http://videha123.wordpress.com/- मे , आ देवनागरी आ तिरहुता – दुन्नु लिपिमे । जे क्यो मिथिलाक्षरक प्रेमी छथि तनिका सब लेखेँ तँ ई विरल उपहारे रहत ।
अनेको रचनामे मात्र गोल-मटोल कथे नहि , राजनीतिक भाष्य सेहो लखा दैत अछि । ताहिमे हिनका कोनो हिचकिचाहटि नहि छन्हि । ओना देखल जाए तँ कुरुक्षेत्र क कतेको महारथी छलाह = प्रत्येक वीर-योद्धा अपन-अपन क्षेत्र आ विधाक प्रसिद्ध पारंगद व्यक्ति छलाह – क्यो कतेको अक्षौहिणी सेनाक संचालनमे , तँ क्यो तीरन्दाजीमे , आदि आदि । सभ जनैत छलाह जे धर्म आ अधर्मक भेद की होइछ मुदा तैयो सभ क्यो जेना आसन्न विपर्यायक सामने निरुपाय भऽ गेल छलाह । आजुक सन्दर्भमे सेहो कथा मे तथा व्याख्यामे एहन परिस्थितिक झलक देखल जाइत अछि । सैह एहि महा-पाठ– क (मेटाटेक्सट) खूबी कहब । नहि तँ ओ कियेक लिखताह –
“देखैत देशवासीकेँ पछाड़ैत
मन्त्रतंत्रयुक्त दुपहरियामे जागल, गुनधुनी बला स्वप्न
बनैत अछि सभसँ तीव्र धावक, अखरहाक सभसँ फुर्तिगर पहलमान
दमसैत मालिकक स्वर तोड़ैत छैक ओकर एकान्त
कारिख-चित्रित रातिक निन्न,
टुटैत-अबैत-टूटैत निन्न आ स्वप्नक तारतम्य...”
एहि महापाठकेँ एकटा एक्सपेरीमेन्ट केर रूपमे देखी तँ सेहो ठीक , आ सप्तर्षि-मंडलक निचोड़ अथवा सप्त-काण्डमे विभाजित आधुनिक महा काव्य रूपमे देखी तँ सेहो ठीक हएत। जेना पढ़ी , सामग्री एहिमे भरपूर अछि, भरिसक किछु अतिउच्च मानक लागत, आ किछु किनको तत्तेक नहि पसिन्न परतन्हि । मुदा एहि ग्रन्थ निचयकेँ पाठक अवश्य स्वागत करताह , आ नवीन लेखक वर्गकेँ एकटा नव दिशा सेहो भेटतन्हि ।