लोकगाथा ओ मणिपद्म
अक्षरक आविष्कार सँ दीर्घकालावधि धारि मिथिलांचल मे मौखिक लोक साहित्यक परम्परा अनुवर्तमान हल जकरा आधुनिक सन्दर्भ मे हमरा लोकनि मात्र कल्पनाक ऑंखिए देखि सकैत ही, कारण कालक्रमेण लोक साहित्यक बहुलांश विलुप्त भेल जा रहल अहि। तथापि सुसंस्कृत रूप मे लिपिवद्ध साहित्य क संग-संग गीत. कविता, कथा, गाथा उपाख्यान, लोकोक्ति एवं मुहावराक विशाल भण्डार विद्यमान अहि आ ई परम्परा अनेकानेक शतक लोक साहित्य केँ आगों संसारैत-पसारल होइत रहल,भनहि काल क्रमंण एहि मे किहु परिवर्तन होइत रहल अहि। मैथिलीक साहित्य चिन्तक आगवेषक एहि अनुवाशिक सम्पदा क संकलन-परितुलन काज मे लागज छथि। वास्तव मे ई परम्परा कतेक समृद्ध अहि तकर वास्तविकताक जानकारी हुनके होयतनि जनिका एकर अघ्ययन मे रूचि हनि वा ग्रामीण परिवेश मे जनसाधारण क जीवनसँ निकट सम्पर्की हथि। पीढी-दर-पीढी स्मृतिक परम्परा मे प्रवाहमान विविध विधाक लोक साहित्य मनोरजन करैत शिक्षा दैत अहि आ पाठक वा श्रोताकेँ कनबैत,हँसबैत आ चेतबैत रहल अहि। मैथिली लोक साहित्य अपन आन्तरिक गुण एवं वैविघ्य मे अत्यन्त समृद्धशाली अहि। मिथिलांचल वासी जहिना-जहिना संचारित मेल अहि से एकर लोक साहित्यक विविदाता केँ नव आयाम देलक अहि। मिथिलांचल वासीक उद्भव के क्रम मे, विविध आर्य भाषाक रीति-नीति, कथा, गाथा आ रागरंगक जे अवदान अहि से एहि साहितयकेँ आर समृद्धतर बना ढोलक अहि। स्वभावत: एहि साहित्य मे एहन-एहन बात कहल गेल अहि जे दोसराकेँ अनसोहॉंत, जाति विशेषक वैच्त्रिय पर प्रहार करैत अहि, परन्तु एहि मे निन्दा सँ देशी षरिहासक पुट आदि आ जकरा पर कोनो कहनी, कोनो गीत वा कोनो किंवदन्ती चोट करैत अहि ओ सम एकरा विनोदमय मात्र बूझैत अहि। साहित्यक सर्वाधिक प्राचीनतम विधा लोक साहित्य थिक जाहि मे लोकगीत, लोकगाथा,लोकोक्ति, लोकनाट्य.लोकनृत्य, लोक अपवाय, लोक ज्ञान, लोक यात्रा, लोक परम्परा, लोक प्रवाह,लोक मानस, लोक प्रतिमा, लोक वाडष्मय, लोकवार्ता इत्यादि समाहित अहि। जहिना नदीक प्रवाह मान धारा मे पाथर क छोट-छोट टुकडी सभ घसाक’गोल आ सुन्दर आकार प्राप्त करैत अहि जे ककरो द्वारा प्रारम्भ भेल ओ लोक कंठ मे युग-युग धरि प्रवाहित होइत नित नवीन रूप धारण करैत गेल आ ताधरि विकसित होइत रहैह जाधारि पढत-गुनल व्यक्ति ओकरा संकलितक’ छाापि क’ ओकर रूप स्थिर नहि क’ सकैह। लोक गाथा लोककंठ उत्पन्न आ विकसित होइत अहि। लोकगाथाक सामान्य रूप-विधान केँ ल’ कए कोनो विशेष कवि क’ द्वारा रचित होइह जाहि मे गीतात्मकता (जिरिकल क्वालिटी) आर कथात्मकता दुनूक मिश्रण होइह जकर प्रचार जनसाधारण मे मौखिक रूप सँ एक पीढी दोसर पीढी मे होइत अहि। लोकगाथा मानव समाजक आहिम साहित्यिक रूप अहि। एकर उत्पत्ति तखन भेल जखन समाज अविभक्त आ एक इकाई क रूप मे हल। अतएंव लोकगाथा प्रारम्भ मे सम्पूर्ण समाजक सम्पत्ति हल, सब एकरा गबैत हल आ अपना दिस सँ किहु ने किहु जोडैत-घटबैत हल। एहि प्रकारेँ एक स्थान सँ दोसर स्थान आ एक पुश्त सँ दोसर पुश्त कंठानुकंठ यात्रा करबाक कारणेँ ओकर स्वरूप परिवर्तित होइत गेल। लोकगाथाक उत्पत्ति क सम्बन्ध मे लोक साहित्यकं विशेषज्ञ लोकनिक अनुसारेँ लोकनिर्मितवाद (कम्यूनल ऑथरशिप). व्यक्ति निर्मितवाद (इनडिविडुअल ऑंयरशिप) आ विकासवाद (इमोलुसन) क मुख्य हाथ थिक एकर प्रचार-प्रसार मुख्यत- ग्राम्य्जीवन क अभाव आ अनिवार्यत- वस्तु् व्यंाजक (आब्ले टि भ एली भेंट) क प्रमुखता होइत अहि तथा श्रम साहय कलात्माकता नहि, प्रत्युुत यथार्थ चित्रणक प्रवृतिक प्रधानता रहैह। एहि मे अनावश्य क बाग्जादल नहि, परम्पयरा-प्रेम भावना, सहजोव्छािस, भावात्मएकता आ सरल कल्पवनाक मात्रा अधिक होइह जाहि मे बौद्धिकता, कल्पवनाशीलता आ श्रम साघ्या कलात्ममकताक नहि। एहि मे भाषायाविचारक सरलता एवं नैसर्गिकता एहन रहैह जे आरंभिक समाज मे उपलब्धत होइह। एहि रूढ,अस्वााभाविक आ श्रमसाघ्या अलंकारकआ शब्दमक अभाव होइह। एहि मे प्रयुक्त, अलंकार आ लोकाक्ति एवं मुहावराक बारम्बायर आवृत होइह। हन्दअ विन्या स सरल तथा तुक पर कोनो घ्यांन नहि देल जाइह। ओकर गेयता शास्त्री य संगीत सँ भिन्न होइह। मैथिली लोक साहित्या्नार्गत लोकगाथाक वास्तनविक संख्याो कतेक अहि एहि प्रसंग मे निर्विवाद रूपेँ किहु कहब वर्तमान सन्दलर्भ मे अप्रासंगिक प्रतीत होयत, कारण ने तँ इतिहासकार आ ने लोक साहित्य क विशेषश्र लोकति एहि सन्दतर्भ मे सुनिश्चित आ ने सुविचारित मनतव्य देलनि अहि। जयकान्तक मिश्र (1922) Introduction to the folk literature of Mithila (1950) मे लोरिक,सलहेस, दीनाभद्री एवं कमला मैया गीतक चर्चा कयलनि। ओ जकरा कमला मैयाक गीत कहलनि ओ वस्तुित: दुलरा दयाल लोकगाथा थिक जे नाम सम्भ वत: उनका ज्ञान नहि भेलनि, कारण एहि लोकगाथान्तबर्गत कमला नदी जे मिथिलाक मुख्यज नदी थिक ताहि पर केन्द्रित अहि तथा एकर गाथा नायक हथि महान साहसी वीर दुलरा दयाल। जेँ कमला नदीक आख्या न उनका एहि मे उपलब्ध भेलनि तेँ ओ एकरा कमला मैयाक गीतक नामे अभिहित कयलनि। मैथिली साहित्या मे ई श्रेय डा. व्रजकिशोर वर्मा‘मणिपद्य’ (1918-1986) केँ हनि जे लोकगाथाक वास्तीविक स्वयरूपक संकलनार्थ गहन भावें डुब्बीवमारिक’ एहि दुलर्भ मोती सभक संग्रह कयल नि तथा उनका अनुसारेँ लोरिक, सलहेस, नैका बनिजारा, दीनाभद्री, दुलरा दयाल, अनंग कुसुमा, रायरणपाल एवं लवहँरिकुशहरि अहि। परवर्ती काल मे कतिपय लोकगाथाक चर्चा भेल अहि, किन्तुा ओकर एंतिहासिकता एवं प्रामाणिकता पर प्रश्नम-चिन्हग अहि। उपर्युक्तए लोकगाथान्ततर्गत द्विनेतर जाति पर केन्द्रित रहलाक कारणें मैथिली साहित्य क अनुसंधना लोकति एहि गाथा सभक संकलनार्थ उन्मु ख नहि भेलहि, कारण एहि साहित्यंक अधिष्ठालता लोकतिक मान्यथता हलनि जे मैथिली मात्र ब्राहमण भाषा थिक। किन्तुए मैथिली आइ जीवित अहि ओही ग्रामीण परिवेश मे रहविहार द्विलेतर जाति मे जनिक बोली-चाली मे पुष्श्तक-दर-पुश्तक एकरा अपना हदय मे अद्यापि संयोगिक रखने अहि। अन्याथा मैथिली तँ कहिया ने मारि गेल रहैत। द्विजेतर जाति सँ अभिप्राय थिक लोरिक गाथा मे गोप समालक, सजहेस गाथा मे दुसाध समाजक, दुतरादयाल गाथा मे मलाह समालक, दीलाभद्रीगाथा मे दलित मुसहर समाजक नैकाबनिजारा गाथा मे वैश्ये समाजक, छेछन गाथा मे डोम समाजक, रायरणपाल एवं लवहजरि कुशहरि गाथा मे क्षत्रिय सूाजक चित्रण अहि। एहि ऐतिहासिक विमूति लोकनिकेँ प्रकाश मे आनि मणिपद्य मैथिली भाषा आ साहित्यरक आ मिथिलांचलक सामाजिक जीवनक संगहि भारतीय साहित्य एवं समाजक एहेत प्रकाश स्तआम्भस आलोकित कयलनि जे कोरि-कोरि जनमानसक अन्धतकार मे टापर-टोइया द’ रहल हल। वस्तुित: मिथिलाक ई लोक महाकाव्याक ऐर्श्यर भारतीय लोकगाथा क अन्तार्गत अपन ऐतिहासिक, सांस्कृातिक, सामाजिक तथा साहित्यिक वैभवक गरिमा ओ दीपित हटाक कारणेँ अतुलनीय अहि। ई निर्विवाद सत्या थिक जे व्रजकिशोर वर्मा ‘मणिपद्य’ जतेक गहनता एवं तत्सियता क संग लोकगाथा अघ्यसयन-अनुशीलन, चिन्तणन-मनन आ संचयनक’ कए ओहि मे हेरायल भुतिआयल मणि माणिकय केँ जनसाधारण पाठकक हेतु सर्व सुलभ करौलनि तकर श्रेय ओ प्रेय हुनकहि हनि। हुनक मान्यजता हलनि जे जाहारि लोकगाथा समाहिक मूल्य् पाठ ले मिथिलांचलक विभिन्नि क्षेत्र मे जनकंठ से परिप्यारप्ता अहि तकर संकलन, सम्पािदन आ प्रकाशनक पथ प्रशस्तर नहि हैत ताहारि मिथिलांचलक लोक जीवनक इतिहास क रचना असंभव अहि। मैथिली लोकगाथा क प्रति मणिपद्य अपन जीवन केँ समर्वित कयंन रहथि तेँ मिथिलांचलक दिव्यल विभूतिक बिसरभोर भेल जीवन गाथा केँ ओ अयत श्रम आ कलम सँ जन सामान्यल केँ सुबोध करौलनि। ओ एक-एक विलुप्ता, भुति आयल गाथा सभकेँ ताकि हेरिक’ जीवन्तए कयलनि। ताहिसँ अनुमान कयल जा एकैह जे हुनक हदय मे जेना प्रेम आ सुषमाक राम वाटिका हलनि। हुनक रचनाक प्रधान उत्सकथिक असीम मानवतावाद, पवित्र-प्रेम आ शीतल सौन्दरर्य। हुनक भावनाक केन्द्रा मे अधिष्ठित हल परम-पुरूषार्थी, लोक परायण. निंहकार आ कर्तव्यदनिष्ठह आदर्शपुरूष आ सतत साधिका, लोकसेविका,प्रेरणा आ गरिमामयी आदर्श नारी। यद्यपि सौन्दहर्यक प्रतिओ अत्यठन्तर संवेदनशील रहथि तथापि हुनक कल्पपना, भावना आ विचारक परिधि कतहु अतिक्रमण नहि कयलक। मणिपद्यक भावना सौंदर्य केँ स्पार्शक’ चेतनाक अन्ति: पुर रहस्यकमय आवरण केँ अनावृतक’ विश्व् प्रेम क उन्मुरक्तर वातायन केँ खोलि देलनि। हिनक रचनादि मे लीवतक यथार्थ परिप्रेक्ष्यत मे मानव प्रेमक अनिवार्यताक सहज आ निश्छमल स्वीाकृति थिक। हिंसा मे प्रेम आ विपलव मे शान्तिक रश्मि विकीर्ण करबा मे ओ सफल रहथि। प्रवुद्ध चेतना, कोमल भावना, चित्रमयी कल्पतनाक संगहि जननी जन्मुभूमिक मर्यादा,प्रतिष्ठाे, एवं गरिमा तथा महिमाक प्रति सतत जागरूकता हुनका मे वर्तमान हलनि। हिनका नदी,पहाड. तुषार, शिकार, जंगल-झाड, चौर-चॉंचर, बाध-वोन, गामधर मे अशेष रूचि हलनि। ऐतिहासिक भग्नाावशेष, देवस्थडल, मूर्ति चित्र, नृत्यक, संगीत, तन्त्रममंत्र, रत्नि, पक्षी आ लोक साहित्यथक हेरायल भुतिआयल अन्येसषण, सशक्ता वक्तय, विसरल उपेक्षित मिथिलांचलक जन-जीवन तथा सामाजिक ओ सांस्कृितिक परम्प राकेँ युग-युगसँ प्रवाहित करैत आयल अहितकरा ताकि होरिक’ अपन सरस, सीलओ प्रवाहमय शैली मे लिपि वद्ध क’ मैथिली भाषा आ साहित्यिक श्रंगार कयलनि। ई श्रेय वस्तुओत: मणिपद्य केँ हनि जे मिथिलाक कंठसाहित्य मे युगयुगान्त्र सँ रचल-वसल गाथा सबकेँ जगजियार करबाक स्तुणत्यन प्रयास कमलनि। मानवताक मणि आ लोकगाथाक पाणित्यतक पद्यराग मस्तिपद्य मैथिली लोकगाथा केँ अमर बनवबाक दिशा मे ओ एक एहन महापुरूष रहथि जनिक चिरचिरन्त नाऍं ई विधा विनय पोर-पोर मे भरल हलनि। ओ जहराइत गॉंधीवादी, उद्भट साहित्यच-चिन्त क आ चतुर चिकित्सोक रहथि। हिनक अन्वेाषी प्रवृति लोक-भाषा, लोक-कवि,लोकगाथा,लोकगीत कोन प्रकारेँ भारतक उतरीय खण्ड मे भूखपियास त्या गि, वन प्रान्तगक जतय-ततय लौह लैत, बनैया जीव जन्तुसक आक्रमणसँ निराषद्, करवनो-करवतो सामना करैत लोक साहित्य,क प्रचुर संग्रह कयलनि। एहि विधाक प्रति उनका मे एतेक वेशी लगनशीलता हलनि जकर परिणाम भेल जे ओ अपन औपन्याचसिक कृति सभक