सुशान्त झा
मैथिली भाषा- संस्कृति के रक्षाक लेल एकटा संस्था जरुरी अछि
यूट्यूव पर भटकि रहल छलहूं। नौकरी के व्यस्तता के वजह सं एतेक फुरसति नहि भेटति अछि जे यूट्यूब पर अपन मनपसंद गीत सुनि सकी। कोशिश रहैत अछि जे फुरसति भेटय त मैथिली गीत सुनी। मैथिली गीत जे सब यूट्यूब पर उपलब्ध अछि ओहि में बेसीतर बियाहक गीत आ भक्ति गीत सब अछि। मैथिली के विराट संसार में जे छिडियाल लोकगीत सब अछि तकरा सब के एकठाम पौनाई मुश्किल अछि। दोसर बात ई जे सब गीत के रिर्काडिंग सेहो नहि भेल छैक, भेलो छैक त ओकरा संकलन के काज बड्ड कठिन। गीत सब सुनिक मन नास्टेल्जिक भ गेल...कमला-बलान के धार आ राजनगर के मंदिर यादि आबय लागल। गजेंद्रजी के फोन केलियन्हि। हम जानय चाहै छलहुं जे की समस्त लोकप्रिय मैथिली गीत के वेबसाईट पर डालल जा सकैत छौ की। लेकिन पता चलल जे अहि में कापीराईट के संकट छैक। एखन अगर कियो मैथिली गीत संगती सुनय चाहैत अछि त किछ वेबसाईट पर 10-20 टा गीत छैक या नहि त यूट्यूब पर ओकरा गीत खंगालय पड़तै। हम ई खोजै छलहु जे कोनो एकटा वेबसाईट होइत जतय दिल्ली बंबई स ल क अमेरिका तक में रहय बला मैथिल अपन भाषा में गीतसंगीत के आनॆंद ल सकितथि। दुनिया जहि हिसाब स बदलि रहल अछि ओहि में अंग्रेजी आ हिंदी के भाषाई साम्राज्यवाद स बचनाई बड्ड मुश्किल बुझना जाईत अछि। लेकिन अगर सतर्कता स नब तकनीक के उपयोग कयल जे त मैथिली गीतसंगीत के विराट संसार के मैथिल भाषी तक आसानी स पहुंचायल जाय सकैछ। मैथिली लोकगीत, नाटक, लोककथा आ आख्यान हमर बडड् पैघ धरोहर अछि। आ एकर सॆयोजन के जरुरत छैक। अगर अहि स हम सब आम मैथिल के जोड़ सकी त एखनो बडड् उम्मीद अछि। लेकिन अहिलेल हमरा सबके मैथिली के सब रुप के दिल खोलि क अपनाबय पड़त अ पंचकोसी के ग्रंथि स बाहर आब पडत। अहि मुद्दा पर हम पहिनौ लिखि चुकल छी। दोसर बात जे आब बला जमाना आडियो विजुअल के छैक। पूरा दुनिया में लोक पढ़ै में दुर्भाग्यजनक रुप सं रुचि घटि रहल छैक। लोक आडियो आ विजुअल बेसी देखय चाहैत अछि। ई आब बला जमाना में आर बढ़त। अहि स इंकार नै। एखनो जे मैथिल कहिय़ो अपन जिनगी में एकटा मैथिली पोथी नै पढ़लन्हि ओ मैथिली के गीत सुनि क विभोर भय जाय छथि। आवश्यकता अहि बात के अछि हम सब कोन प्रकारे अहि विशाल समुदाय के अपन संस्कृति के अहि मजबूत उपकरण स जोड़ि क राखी। छिटपुट स्तर पर मैथिली में गीत संगती के कैसेट बनैत अछि, फिल्मों बनि रहल अछि आ आब एकटा टीवी चैनल के सेहो सुनगुनी अछि। लेकिन एकर कोनो संस्थागत प्रयास नहि भ रहल अछि। संविधान में भाषा के स्थान भेट गेलाके बादो हम सब सरकार स बड्ड उम्मीद नहि क सकैत छी। लेकिन अगर अहि दिशा में कोनो गैरसरकारी प्रयास इमानदारी स कयल जाई त एखनों बहुत काज कयल जा सकैत अछि। अहि दिशा में गजेंद्रजी के प्रयास वास्तव में स्तुत्य छन्हि जे बुहत मेहनत क क अहि दिशा में काज क रहल छथि। मैथिल बुद्धीजीवी सबके अहि पर विचार करय के चाहियनि आ कोनो तरीका खोजय के चाहियनि। अहि में बाद में सरकारी अनुदान आ विदेशी अनुदान स ल क वैयक्तिक अनुदान के कमी नहि रहत-ई हमर दृढ़ निश्चय अछि। कोनो ट्रस्ट या सोसाईटी के अधीन अगर ई काज कयल जाय आ नया विचार सामने आबय त ओ स्वागतयोग्य कदम होयत।