विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

‘हुगली ऊपर बहैत गंगा’: संवेदनशील मोनकेँ छुबैत कथा-संग्रह

चन्द्रेश · 2009-07-15 · अंक 38

चन्द्रेश
संवेनशील मोनकेँ छुबैत हुगली ऊपर बहैत गंगा
रामभरोस कापडि भ्रमरक ३२ गोट कथाक संग्रह थिक हुगली ऊपर बहैत गंगा । एहि संग्रहक नामक अन्‍तिम कथा थिक । हीरा आ सोना बाईक माध्‍यमे कथाकार नारी मोनक संवेदनाकेँ उभारिक भविष्‍यक सृजन दिस डेग उठाओल अछि । ई सत्‍य थिक जे नारीक देहक अवयवकेँ कामुक पुरुष अपन धन–सम्‍पत्ति बुझि ओएह व्‍यवहार करैत अछि जे नारीक मोनकेँ दुःख ओ पीडामे भरिक कुण्‍ठित करैत अछि । नारी मात्र देह नहि थिक । नारी आ पुरुषक साहचर्य अबस्‍से सृष्‍टिक निरन्‍तरता थिक । एकर अर्थ ई नहि जे नारीक देहकेँ खेलौना बूझिक खेलायल जाय । ओकर अंग–प्रत्‍यंगकेँ तोडि–मरोडि अर्थात् अत्‍याचार क प्रेम ओ विश्‍वासके तोडल जाय । ई सत्‍य अछि जे आजुक भौतिकबादी युगमे धनक अतिशय लिप्‍सा अबस्‍से मानवीय मूल्‍यबोधकेँ गिडने जा रहल अछि । जेँ कि मानवीय चेतना आ मनुष्‍यता कुण्‍ठित क देल गेल अछि तेँ अनैतिकताक अढमे छिडहरा खेलाओल जाइत अछि । धन–मदक एंठी पर नग्‍न कामुकताक ताण्‍डव मचल अछि । दैहिक जरुरतिसँ बेसिए काम क्रीडामे भोग आ लिप्‍सा नयन रंजन भ गेल अछि । तेँ विभिन्‍न मुद्रा अख्‍तियार क आवेग आ उच्‍छ्छासमे अमानवीयताक – क्रूर आ पैशाचिक रुपक दिग्‍दर्शन होइत अछि । लाचार मे विचार कतय ? फलतः वासनाक भ्रमजालमे ओझरा क नैतिकता ओ मर्यादाकेँ अतिक्रमण क कुत्‍सित मानसिकताक – क्रूर रुप झलकि अबैत अछि ।
एहि शीर्षक कथामे हीरा असन्‍तोष आ खौंझीकेँ मेटयबाक लेल सोनाबाइक ओहिठाम अबैत अछि । ओकर एकमात्र उद्देश्‍य रहैत छैक जे मोनकेँ बहटारि लेब । सोनाबाइ अपन पेशामे कतहु कोनो कोताही नै करैत अछि । ओ आवेशक स्‍नेहिल स्‍वरमे लगीच अयबाक आमंत्रण अपन परिधान खोलि क दैत अछि । हीराकेँ ठकमुहरी लागि जाइत छैक । ओकर हृदयमे नारीक प्रति सम्‍मान– भाव जागि जाइत छैक । ओकर मनोभावमे स्‍त्री संवेदना अस्‍मिताक पर्याय बनि उभरि अबैत छैक । सोनाकेँ हडबडी छैक जे एकटा ग्राहकसँ निपटत तँ दोसरक आश ? ओ बजैत अछि जे आउ ने,आनो ग्राहक खोज पडत ने (१४४) । हीरा हारल जुआडी सन मनोव्‍यथा की कहि दैत अछि जे सोनाक आँखि चमकि उठैत अछि । ओकर सबल मानवीय संवेदना उभरि अबैत छैक – हम आइ पहिल बेर कोनो सुच्‍चा मनुक्‍खक दर्शन कयलहुँ अछि (१४६) । परिणतिमे दुनूक सुरक्षा भावमे अपनत्‍वबोध जागि जाइत छैक ।
तात्‍पर्य जे दैहिक भोगसँ बेसी–मोनक राग जे हल्‍लुको आँच पर बरकैत रहैत छैक वा बेसिए आँच पर किएक ने, मुदा दुनू स्‍थितिमे अनुशासित रहैत छैक । यैह कारण थिक जे जीवनकेँ गति आ उष्‍मा देबामे स्‍त्री–पुरुषक साहचर्य दोसरक पूरक बनैत अछि । आजुक समाजमे अमानवीयताक यैह स्‍थिति अछि जे स्‍त्रीकेँ चीरीचोँत क अपन पुरुषत्‍व देखयबाक दम्‍भ भरैत अछि ततय सोना आ हीराक बीचक घटित घटना कनेक अविश्‍वसनीयताकेँ पनुगबैत अछि । जतय सोनाक संग भेल अत्‍याचार स्‍वतः उघरैत व्‍यथा–कथा कहैत अछि ततय ई पंक्‍ति–सोना आन बाइ जकाँ तोडल–मचोडल नहि गेलि रहय, बाँचल छलीह (१४४) सेहो अविश्‍वसनीय बुझाइत अछि । शिल्‍पक दृष्‍टिएँ अवस्‍से ई कथा कनेक कमजोर अछि, मुदा कथ्‍यक दृष्‍टिएँ रक्‍त आ स्‍नेहसँ जे अपनत्‍व बोध जगाओल गेल अछि से अबस्‍से मनुष्‍यक मनुष्‍यताक स्‍वाद चीखबैत अछि ।
आब ई प्रश्‍न उठब स्‍वाभाविके जे मनुष्‍यक मनुष्‍यताकेँ अमानवीय बनयबाक दोषी के ? की जन समाज ? समाज तँ लोकेक थिक । ई सत्‍य अछि जे आइयो हीरा सन गनल–गूंथल लोक अछि । तथापि कामोत्तेजक भाव–भंगिमा नेने दैहिक जरुरति बुझि वा फैशनपरस्‍त भ कुटिल पुरुषक अहं अबस्‍से स्‍त्रीकेँ भोगक सामग्री बुझि पबैत अछि जे मोनक तुष्‍टि हेतु कुविचारेँ पाश्‍विक आचरण करैत अछि । जं हीरा आ सोना बाइसन एक दोसरक प्रति समर्पण आ निष्‍ठा–भावमे राग उभरय तँ निश्‍चिते अनैतिकताक अढमे होयत विकृतिक विषाक्‍त चद्दरि फाटत आ असली छवि जगजियार होयत । एतेक तँ निश्‍चिते जे विश्‍वास आ हार्दिकतामे स्‍त्री–पुरुषक आकर्षण अबस्‍से जीवन–सत्‍यक अढमे मानवीय आकांक्षाक पूर्तिमे सबल ओ सहायक सिद्ध होयत । हीरा आ सोनाक हृदयमे वास्‍तविक प्रेम–भाव की अंकुरित होइत अछि जे सहजता ओ सरलतामे आन्‍तरिक जटिलताकेँ आरो सघन बनबैत अछि । नारी पूरक बनैत अछि । जेंकि अभिजातीय संस्‍कृतिक विरोध स्‍वरुप सामाजिक अस्‍मिताक व्‍यापक बोध अर्थात् स्‍त्री पुरुषक सहज आकर्षणमे आत्‍मिक स्‍वर उभरिक आत्‍मस्‍फुलिंग छिटकबैत अछि तेँ दुनूक संघर्षमे सामाजिक जीवनक यथार्थ झलकि उठैत अछि ।
आधुनिक चकचोन्‍हीमे अन्‍हरायलि भगजोगनी कथामे रेखाक भोगबादी लिप्‍सा ततेक आगाँ बढि जाइत अछि जे अपन बसल–बसाओल घर उजारबासँ बाज नहि अबैत अछि । ओ बिसरि जाइत अछि जे अर्थलिप्‍सा सम्‍बन्‍धकेँ गीडि जाइत अछि । फल भेटैत छैक जे जखन जीवनक बोध होयत छैक तँ गत कर्मक तर्पण करैत अछि । ओ भ्रमजालमे जे अहुरिया कटैत छल से तोडि फेकैत अछि । यौन रुपमे उन्‍मत्त प्रेम आ घृणाक ढहैत देबालक बीच समाज आ सत्‍यसँ जे साक्षात् कराओल गेल अछि से अबस्‍से वैयक्‍तिक चेतनाकेँ धार दैत दाम्‍पत्‍य जीवनकेँ सफल बनबैत अछि । एहिमे प्रेम आ यौन सम्‍वन्‍धी गेंठकेँ फोलैत कथाकार उपसंस्‍कृति पर जमिक प्रहार कयल अछि । ई सत्‍य थिक जे दैहिक भूख लोककेँ कामुकतामे जकडि अबस्‍से देह मैथुनकेँ प्रश्रय दैत अछि । एतेक दूर धरि जे आवेगमे मनोविकार अपन ठोस रुप तत्‍क्षण प्रभाव जनबैत अछि । मुदा, काम–भावक भूख सम्‍वन्‍धकेँ स्‍थायित्‍व नहि प्रदान करैत अछि तेँ असन्‍तोष पनुगैत अछि । सामाजिक दायित्‍व बोधक ई कथा थिक । ॅअन्‍हारमे भोतिआयल एकटा सिपाही गणेशक संस्‍मरण थिक । ई संस्‍मरणात्‍मक रिपोर्ताज थिक । कारण गणेशक संस्‍मरण उपस्‍थापितक ओकरे गुण–गौरवकेँ परोसल गेल अछि । तें कथा–सूत्रक निर्माण तेना भऽकऽ नहि भेल अछि जेना कि पात्रक परिप्रेक्ष्‍यमे घटना आ स्‍थितिक विवरणात्‍मक प्रस्‍तुति भेल अछि । साम्‍यबादी विचारधाराकेँ लऽकऽ कामरेड कथाक सृष्‍टि भेल अछि– गरीब गरीब सभ एक हो । अर्थात् धनी–गरीबक बीच जे असमानताक खधिया अछि से आरो चकरगर भेल जाइत अछि तकरे भरबाक भरपूर प्रयासमे ई कथा सृजित भेल अछि । सुपत–कुपत आब हमहु सब कहबै (३७) । आत्‍मचेतना जगयबाक उद्देश्‍येँ ई कथा सृजित भेल अछि ।
पाइक आगाँ बेइज्‍जति आ गारि कथीक एहि पृष्‍ठभूमि पर उडान-कथा सृजित भेल अछि । कतार दिस उडान भरबाक लोभेँ आ ढेर पाइ अर्जित करबाक सपना संजोगने रजिन्‍दर कापरकेँ पहिलु एजेन्‍ट दस हजार टाका, दोसर अस्‍सी हजार आ तेसर खेप पन्‍चान्‍वे हजारक कर्जा पर लेल टाका बोहाइत छैक । ओ ठकाइत अछि तैयो ओकरा उडान भरबाक आशा छैक । ओ हृदयक कोनो कोनमे दमित इच्‍छाकेँ संयोगने रहैत अछि जे कोना उडान भरी । जहिना धनक लेल जेबाक हाहुती तहिना एजेन्‍टकेँ चाही लाभ । माने ई उडान की, दस हजारसँ पच्‍चीस हजार धरिक चोखे नफा । तात्‍पर्य जे दुनू गर भिडौने । तेँ बेर बेर ठकाइतो लोक पुनि ठकाइत अछि । एहिमे पाखण्‍डी चरित्रक पर्दाफाशक संग केवल जीवन जीनाइयेक मात्र लुतुक नहि होयबाक प्रत्‍युत जीवन मूल्‍यबोधक लेल जीवाक ओकालति संकेत मात्रमे कयल गेल अछि ।
जय मधेशमे एक मधेश, एक प्रदेश लऽकऽ आन्‍दोलन अछि । मधेशी आ पहाडीक बीचक खधिया समानतामे पटि जाय । अयोधी मास्‍टरके जीवन कोहुनाक मास्‍टरीमे खेपायल आ एकमात्र बेटा अशोक केँ नोकरी नहि भेटब । तात्‍पर्य जे अपेक्षित योग्‍यता अछैतो व्‍यवस्‍थे तेहन वनल छैक जे मधेशकेँ के पूछओ ? तेँ आन्‍दोलनी जुलुसमे ओकर बुढायल देहक जोश की हिलोर मारय लगलैक जे ओहो कूदि पडल । ओकर अस्‍मिता की जागि उठलैक जे मधेशक लेल ओ किछुओ क सकैत अछि । राष्‍ट्रियताक परिप्रेक्ष्‍यमे अपन विचार, भावना आ समयके सत्‍य केँ उद्भासित कयल गेल अछि । जखन लोकक अस्‍मिता पर चोट लगैत छैक तँ ओकर मोन कचोटय की लगैत छैक जे स्‍वतंत्रताक हनन मंजूर नहि होइत छैक । मधेशी होयबा पर जे गौरवबोध होइत छैक से जखन एके देशमे विषमताक बोध होइत छैक तँ पीडाइत मोनमे आक्रोश पनुगैत छैक । एहिमे मानवीय जीवनक संवेदना झलकि उठैत अछि ।
गहनतम प्रश्‍नानुकूलतामे भहरैत नेओक जोड कथाक सृस्‍टि भेल अछि । एहिमे निरसन बाबूक पुत्री सरोजाक दुःस्‍थितिमे अन्‍त ओ रानीक संग छलाइत जीवनके कथाकार ओकर मार्मिक पीडाके उभारिक सामाजिक परिवर्तन दिस ध्‍यान आकृष्‍ट कराओल अछि । एतेक दूर धरि जे एकर जिम्‍मेवार के ? स्‍त्रीक त्रासक मार्मिक उद्घाटनक फलस्‍वरुप ई कथा फोकिला मानसिकताक दम्‍भकेँ आरो उघार करैत अछि । ओढल अभिभावकत्‍वक नीतिकेँ सरेआम चौबटिया पर नग्‍न क मानवीय जीवनक अनुभवसँ सम्‍पृक्‍त क निजी संवेदनाकेँ सार्वभौमिक बना देल गेल अछि । एहि प्रकारेँ एक दिस हृदयहीनता आ मूल्‍यहीनताकेँ देखार कयल गेल अछि तँ दोसर दिस परिवर्तनक सुगबुगीमे मानवीय सोच आ संवेदनाकें आजुक परिस्‍थितमे ठोस दृष्‍टि द अमानवीयताक खोलकें चीटीचोंत करबाक सनेस बिलहल अछि ।
अन्‍ततः मे किसुनमाक ऊहमपोहक स्‍थितिमे जतय पत्‍नी उत्तीमपुरवालीक प्रति अनुराग–भाव अछि से पंजाबमे कमाइत मनसूबा पोसने घर अबैत अछि तँ एकटा नेना? मासक फरक । आन बापक बच्‍चा अर्थात् अनकर जनमल बेटा । रहि रहिक ओकर हृदयकेँ ई बात टीसैत की छैक जे सभटा मनोरथ भग्‍न भ जाइत छैक आ अन्‍तिम परिणतिमे नेनाक मूडी छपाक् क दैत अछि । निर्दोष आ अबोध बच्‍चाक हत्‍या ।
ई सत्‍य थिक जे निशंस हत्‍याक फलस्‍वरुप हृदय भावमे परिवर्तन आयब स्‍वाभाविक थिक । मुदा, अबोध वच्‍चाक हत्‍या ? तकर परिनति ? कथा जाहि विन्‍दु पर आबिक छोडि देल गेल अछि से आगाँक अपेक्षा रखैत अछि । तैयो, एकटा प्रश्‍न पनुगबैत सोचबाक लेल वाध्‍य करैत अछि ।
अमरलत्ती कथामे रेखाक माध्‍यमे ओकर बहसलि उद्दाम छविक वीभत्‍स रुप देखार कयल गेल अछि । ओ अमरलती बनि चतरैत की अछि जे सहारा बनैत आनक बसल–बसाओल घरकेँ उजारि–पुजारि दैत अछि । अपन बनल घर तँ उपटाइये दैत अछि जे आनोक घरमे वास क ओकर सोनहल दुनियामे आगि पजारि दैत अछि । एहिमे रमेशक कामलोलुपताक रेखाक काम–भाव जाग्रत भ मायाजाल की पसारैत अछि जे आरो अहिमे ओझराइत जाइत अछि । एहि प्रकारें वासनाकेँ उभारिक पुरुष आ स्‍त्री वर्गक कुत्‍सित मानसिकताकें देखार कयल गेल अछि । सामाजिक कुव्‍यवस्‍था ओ एहिसं उपजल मानवीय व्‍यथाकें अवस्‍से कथाकार उभारल अछि ।
सम्‍बन्‍धक पीडामे आशाक हृदयमे बरकैत हृदयक उफान जे प्रेमक उपजामे मानसिक पीडा प्रतिफलित अछि तकर सशक्‍त चित्रण भेल अछि । प्रेम कहि–सुनिक नहि होइत छैक आ ने कीनल बेसाहल जाइत छैक । जखन दूटा हृदय मिलैत छैक वा मोन मिलानी भ जाइत छैक तँ बाटमे केहनो रोडा अटकाओल किएक ने जाउक तैयो दुनू–प्रेमी –प्रेमिका हँसैत–कनैत, संघर्ष पथ पर टकराइतो, खसितो–उठितो पार–घाट उतरिए जाइत छैक । सैह स्‍थिति आशा ओ संदीपक मोन–मिलानीमे भेलैक । फल भेटलैक जे आशाक माय–बापक हृदयमे उठैत विरक्‍ति भाव सम्‍बन्‍ध–सूत्रकें खण्‍डित क देलकैक । आ आशा प्रेमक पणिामसँ उपजल मानसिक पीडाकेँ सहबाक क्षमता अपनामे विकसित करबाक प्रयास क रहलीह अछि (१३८) । सामाजिक यथार्थक रुप झलकाक कथाकार सामाजिक व्‍यवस्‍थाकेँ उघेसिक आत्‍मीयता ढंगसं लोकजीवनक चित्र उभारबाक प्रयास कयल अछि ।
बालमोनक सुलभ चंचलता ओ नेनपनक निश्‍चछलताकेँ स्‍मरण करैत नरेशक मोनमे स्‍मृतिक तरंग की प्रवहित भ अबैत छैक जे होयत छैक जे हमही किए ने अपनाकेँ नेना बनाली (१४२) । फ्लैश बैक कथाक माध्‍यमे कथाकार बालपनक अढमे निडरता, निश्‍च्‍छलता आ सौहार्द्र भावमे वचपनक प्रेमक अनुभूति जगाओल अछि तँ उमेरक चारिम प्रहरक पनुगैत भय, सुरक्षा, षडयन्‍त्र, सामाजिक विद्रूपता आदिसँ अपनाकें बँचबा–बचयबाक प्रयासकेँ रेखाङ्कित करबाक । ई सत्‍य थिक जे नेनपनक बिताओल क्षणक मधुर स्‍मृतिमे लोकजीवन चाहैये, मुदा संघर्षमे सेहो जीवनकेँ फूट आनन्‍द अबैत अछि । सामाजिक व्‍यक्‍तित्‍वक दोगला मुंह अर्थात् सभ्‍य समाजक अंग बनबाक लेल लोक जे छल–क्षुद्रमक खोल ओढने रहैत अछि । से अवस्‍से मानसिक बुद्धिकें कुण्‍ठित करैत अछि, सामाजिक समरसताकें खण्‍डित करैत अछि ।
नेपालीय मैथिली कथा–साहित्‍यमे निस्‍सन्‍देह कथाकार भ्रमरक कथामे जीवनक राग अछि आ अछि नव युगक नारीक प्रति विशेष श्रद्धा–भाव । तेँ हिनक बेसिए कथामे नारी जीवनक संघर्ष अछि । युग यथार्थक त्रासदी जे सामाजिक विडम्‍बनामे उपजैत अछि आ एकर कारक थिक सामाजिक व्‍यवस्‍था । तेँ कथाकारक छटपटाइत मोन मे अबला नारीक चीख अछि आ परिवेशक दंशमे पीडाइत मानसिक व्‍यथा–कथा । देह–भोगमे टीसैत दर्द उभरि की अबैत अछि जे सामाजिक सत्‍यकेँ देखार करैत यथातथ्‍यक मोनक पीडाकेँ उगलि दैत अछि । टूटैत सम्‍बन्‍ध, छुटैत लोक, अर्थ लिप्‍साक मोह ओ दैहिक भोगमे पीडाइत कामुकता आ रोटीक समस्‍या नेने कथाकारक मोनमे कतेको प्रश्‍न छटपटी मचौने अछि तकरे सार्थक अभिव्‍यक्‍ति द सहज ओ सरल भाषा मे पाठकक सोझाँ परोसि देलनि अछि ।
कोनो सभ्‍यता–संस्‍कृतिकेँ गतिशील बनाक राखब समाजक लोक दायित्‍व थिक । से ताधरि जाधरि ओ सामाजिक जीवनमे सार्थक भूमिका निमाहय । ई नहि जे सडल गलल परम्‍पराकेँ उघने व्‍यवस्‍थाक तरमे पीसाइत जीवनसँ कटल व्‍यवस्‍थाकेँ सत्‍य मानि फोकिला मानसिकताकेँ उघैत रही । जे सभ्‍यता संस्‍कृति जीवनमे नहि उतरि सकय तकर परित्‍याग करब उचित–विहित थिक । ओ जीवनक अर्थक खोजमे प्रेमक आसरा लैत समयक परिवर्तनकेँ युगक अनुकूलेँ टांकिक नव समाज बनयबाक आकांक्षा रखैत छथि । तें कथाकार सामाजिक विसंगतिसं उत्‍पन्‍न विषमता ओ आर्थिक स्थितिक संग सांस्‍कृतिक आयाम पर जमिक विमर्श करबाक लेल प्रश्‍नकेँ पनुगबैत छथि । एहिमे हिनक परिवर्तनकारी सोच अबस्‍से उत्‍प्रेरक बनि नव सामाजिक मूल्‍यबोधक संवाहक बनैत अछि ।
हिनक लेखनी अबस्‍से शोषित–पीडितक अस्‍मिता–अधिकारक बात उठबैत अछि । ओ दबल–कुचलल लोकक पक्षमे भ जाय । ई सत्‍य अछि जे हिनक प्रेममूलक धारणामे वासना जन्‍य उभार कनेक बेसिए उभरि आयल अछि से सत्ते कामुक पुरुषक दम्‍भोचित उपजा थिक । किएक तँ पुरुषक पौरुषत्‍व वासनामे विशेषे केन्‍द्रित भ आयल अछि । कथाकारक बेचैन मोनमे समतामूलक ओ प्रेममूलक धारा रसप्‍लावित अछि तेँ अभावजन्‍य पीडामे पीडाइत शोषित वर्गक समस्‍या उभरि आयल अछि । स्‍त्री वर्गक प्रति जहिना पुरुष वर्गक दम्‍भ, क्रूर मानसिकता ओ व्‍यवस्‍थाकेँ उजागर करैत अछि तहिना सम–सामयिक प्रश्‍नक झडीमे रोटीक औकाति देखबैत अछि ।
एहि प्रकारेँ कथाकारक हृदयके व्‍यथासँ उपजैत अकूलाइत मोनक छटपटाहटिमे सुखाइत प्रेम भावनाकेँ खींचबाक आकांक्षा अछि तँ मूल्‍यहीनताबोधक प्रति तिक्‍ख आक्रोश । जीवनक व्‍यावहारिकता सँ सामाजिक मुद्दाकेँ उठबैत छथि । हँ, प्रश्‍नक झडीमे किछुक समाहार करैत छथि तँ यथातथ्‍य उपस्‍थापन सेहो । ओना, कथाक मूल स्‍वर हस्‍तक्षेप करिते अछि । ईहो सत्‍य अछि जे नारी अनुभूतिक रिक्‍त क्षणमे कथाकारकेँ रहि–रहिक� नारीक मानसिकताक भूख दैहिक काम–क्रीडामे ओझरा जाइत अछि । मुदा, ईहो सत्‍य थिक नारीक अन्‍तरमोनमे पैसिक जे मानसिक विकारकेँ स्‍वच्‍छ करबाक प्रयास भेल अछि से मात्र कामुकतामे नहि भऽकऽ सामाजिक मूल्‍यबोधक संवाहक बनिक उभरि अबैत अछि । उपसंस्‍कृतिक प्रति हिनक हृदयमे खोंझी आ असंतोष भाव अछि तं सामाजिक नैतिकता आ धार्मिकताक अढमे छिडहरा खेलाइत साम्राज्‍यवादी संस्‍कृति प्रति विद्रोह भाव मुखरित भेल अछि । मुदा, इहो देखल जाइत अछि जे भ्रमरक कथाकार कथा साहित्‍यमे जतेक कथ्‍यक प्रति सजग रहि पबैत अछि ततेक शिल्‍पक प्रति नहि । शैलिक दृष्‍टिएँ अवस्‍से हिनक कथाकार सजग नहि रहि पबैत अछि जे कथा–सौन्‍दर्यकेँ बाधित करैत अछि । तें की ? भ्रमरक अनुभववादी दृष्‍टि सतत चौकन्‍न रहैत अछि जे अपन गाम–घर, अडोसिया–पडोसियाक देखल भोगल यथार्थक चिक्‍कन–चुनमुन चित्रण करैत अछि । हिनकामे कहबाक क्षमता अछि जे शिल्‍पक विकासमे आरो सौन्‍दर्य आनि निखरत ।
जेँकि कथाकार भ्रमरक चौकन्‍न दृष्‍टि समाजक प्रति सजग अछि । तेँ जीवन मूल्‍यक संवाहक बनैत ओ ओहि पात्रक सृष्‍टि करैत छथि जे समाजमे आइयो निरीह अछि । खासक नारी पात्र हिनक संवेदनशील मोनकेँ छुबैत अछि । ओ नारीक अधिकार ओ चेतनाबोधक पक्षधर छथि । ओ कखनो नारीक पक्षमे छाती तानिक ठाढ होइत छथि । मुदा, उपसंस्‍कृतिमे घेरायल नारीक वीभत्‍स छवि अबस्‍से हिनक हृदयकें पीडित–सीदित करेत अछि । ओ कोनो परिस्‍थितिमे स्‍वाभाविक यथार्थक तहकें फोलिते छथि । तेँ शोषणक विरोधमे झंडा उठबिते छथि । हिनक संवेदनशील मोनमे जीवनक प्रति रागात्‍मक बोध अछि । हं, हिनक कथाकार यथातथ्‍यकेँ हू–बहू प्रस्‍तुति क दैत अछि से कैक स्‍तर पर । तें पात्रक चरित्र तेना भऽकऽ ठाढ नहि भऽ पबैत अछि जे होयबाक चाही । जाहि ठाम हिनक पात्रक चरित्र–चित्रण सजीव भऽ उठल अछि ताहि ठाम कथाक सौन्‍दर्य अपन अपूर्व छवि–छटा लऽ मुखरित भेल अछि ।
नेपालीय मैथिली कथा साहित्‍यमे भ्रमरक कथा मात्रात्‍यक ओ गुणात्‍मक दुनू दृष्‍टिएँ अपन प्रभाव छोडैत एकदिस जँ कथा–साहित्‍यक भण्‍डारकेँ भरैत अछि तँ दोसर दिस कथा दृष्‍टिमे मूल्‍यबोधक संवाहक बनैत अछि । तेँ मानवीय मूल्‍य बोधक जीवन–दृष्‍टि नेने भ्रमरक कथा सामाजिक परिवर्तनमे अपन औकाति सिद्ध करबे करत आ भविष्‍यमे ऐतिहासिक मूल्‍यक वस्‍तु बनबे करत से आशा ओ विश्‍वास जगबिते अछि ।
ई संग्रह छपाइ–सफाइक दृष्‍टिएँ देखनुक आ मनमोहक रहल अछि खासकऽ पोथीक आवरण विशेष आकर्षित करैत अछि ।
मनमीत कुटीर/राजपूत कालोनी
मौलागंज/दरभंगा–८४६०४
बिहार/भारत!

Suggested citation: चन्द्रेश. “‘हुगली ऊपर बहैत गंगा’: संवेदनशील मोनकेँ छुबैत कथा-संग्रह.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 38, 2009-07-15. https://www.videha.co.in/research/2009/38/हुगली-ऊपर-बहैत-गंगा-संवेदनशील-मोनकेँ-छुबैत-कथा-संग्रह.htm

मूल विदेह अंक / Original issue