मखान खानि ई मिथिला- भीमनाथ झा
मिथिलाक लोक एतेक सरस, मैथिली भाषा एते मृदुल, एहि ठामक भूमि एते उर्वर, उपवन एते सघन आ हरियर कंचन अछि- तकर कारण की? की ई नहि जे एतऽ जलाशयक आगार अछि, नदी पोखरि डबरा अपार अछि?
मिथिलामे समुद्र नहि छै, तेँ एहि भूमिक वासीक स्वभाव नोनछराइन नहि लागत, लोक “अथाह” नहि भेटत। मिथिलामे गंगा बहै छथि,तेँ समाज पवित्र अछि; मधुर जलक प्रवाह चलै छै, तेँ लोकोमे मधुरताक तरंग उछलैत देखब। पानिक एतऽ कमी नहि, लोकक आँखियोमे “पानि” भेटि जायत।
कवीश्वर चन्दा झा मिथिलाकेँ नदी-मातृक देश ओहिना नहि कहने छथि-
नदी-मातृक क्षेत्र सुन्दर शस्य सौं सम्पन्न
समय सिर पर होय वर्षा बहुत संचित अन्न
दयायुत नर सकल सुन्दर स्वच्छ सभ व्यवहार
सकल विद्या-उदधि मिथिला विदित भरि संसार
नदिए नहि, पोखरियोक प्रधानता अछि एतऽ। एहन कोनो गाम नहि, जतऽ दू-चारि दस-बीस छोट-पैघ पोखरि नहि हो। सैकड़ो वर्ष पुरान एहन-एहन सयक धक पोखरि एखनो एतऽ अछि जकरा “दैता पोखरि” कहल जाइछ, माने कोनो दैत्य आबिकऽ ओकरा खुनने छल! मनुक्ख बुते कतहु ओते टा पोखरि खूनल होइ! तहिना, बड़का पोखरिमे “महराजी पोखरि” सभ अछि। छोट-मोट तँ कैयन हजार होयत।
तेँ, मिथिलामे जलकरक चलनि बेसी। जलक सर्वप्रधान फसिल थिक- मखान। मखान- ई शब्द ध्यानमे अबितहिँ मिथिलाक अनुपम व्यक्तित्व साकार भऽ उठैछ। एहन व्यक्तित्व जकर जोड़ नहि- अद्वितीय।
मखान, कहल जाइछ, स्वर्गोमे नहि भेटैछ। देवतासभकेँ मखानक तस्मै लेऽ, पाग कयल मखानक फोँका लेऽ मन जखन ललचाय लगै छनि तँ मिथिलामे जन्म लै छथि आ जीहकेँ जुड़बै छथि।
मिथिलाक एक खास पाबनि थिक कोजगरा- उल्लासक पाबनि, उमंगक पाबनि, लक्ष्मीक आराधनाक पाबनि। ओहि दिन मखान परसबाक प्रथा अछि। से मिथिलेमे अछि।
मखान मिथिलाक खास वैशिष्ट्य बनि गेल अछि। तेँ, एहि ठामक साहित्योमे मखान प्रवेश कऽ गेल अछि। अनेक साहित्यकार कोनो-ने-कोनो प्रसंगमे एकर नाम लेने छथि। जाहि रचनामे मखान शब्द आबि गेल अछि, ओ रचना ओहने ललितगर-देखनगर, ओहने कोमल-निर्मल, ओहने हुलसगर-सुअदगर भऽ गेल अछि। कविवर सीतारामझाकेँ भगवानस रामक सुयशक निर्मलता आ महिमाक व्यापकता देखयबाक भेलनि तँ कहि उठला-
आश्विनीक चान जकाँ
दही ओ मखान जकाँ
राम-यश प्रान जकाँ
विश्वमे पसरि गेल।
कविवर सीतारामझा एक आनो प्रसंगमे, लक्ष्मी-पूजाक नैवेद्यक अंग-रूपमे, मखानक नाम लेने छथि-
पूजथि लक्ष्मी-पद नबेद दय मधुर मखानक।
अपनहुँ खाथि प्रसाद भाग धनि ताहि किसानक॥
मखानक उल्लेख कयनिहार मैथिली साहित्यकारक कमी नहि अछि, किन्तु एतऽ तीन कविक मात्र चर्चा करऽ चाहब। पहिल छथि कविचूड़ामणि मधुप, जनिक अविस्मरणीय कविता “कोजगराक मखान” अछि। दोसर छथि मंत्रेश्वर झा, जनिक गीतपोथीक नाम थिकनि- “पान एतैए मखान एलैए”। तेसर थिका गोपालजी झा “गोपेश” जे अपन पोथी “मखानक पात” सँ कतेको गोटेक मुहँ पोछऽ चाहलनि।
मधुपक “कोजगराक मखान”क विषयवस्तु उच्च वर्ग द्वारा दलितपर कयल गेल अत्याचारपर आधृत अछि। ई कविता वर्ग-वैषम्यकेँ उघारिकऽ राखि देने अछि। मधुप करुणरसक महान कवि थिका। एतऽ एक फोँका मखानसँ कवि करुणाक निर्झरिणी बहा देने छथि। किन्तु, ताहिसँ पहिने उत्सवक जीवन्तता देखल जाय-
आबालवृद्ध जुटि रहल-
आसमर्दे विदीर्ण जनु युग्म कान
मिलि हमहुँ ताहि मानव-निधिमे
बहि गेलहुँ न गुनि अपमान-मान,
कहुँ दू फोँका, कहुँ एक
कतहु नहि सेहो
तेहन महगिक विधान,
किछु हो,
आजुक निशिमे कहुना
निश्चय थिक खाइ मखान पान।
ता कि ओही भीड़मे एक अवांछित छौँड़ा सन्हिया गेलै। चीन्हि गेलापर छ्रपिटा देल गेलै। कविक नजरि पड़लनि-
जाकऽ समीप देखल निगाहि,
देखितहिँ हिय कहलक आहि! आहि!
गोविन्द त्राहि!
ई आबि मखानक हेतु, गेल,
नहि पाबि सकल एको फोँका,
सौँसे शरीरमे छैक किन्तु
ककरो कुकृत्य-निर्मित फोँका!
एहि करुण प्रसंगक बाद उल्लासक चर्चा उचित थिक। सर्वाधिक मखानक बखान गीतकाव्यमे भेल अछि। मंत्रेश्वरझाक मखान-प्रेम तँ हुनक गीतपोथीक नामेसँ झलकैत अछि- “पान एलैए मखान एलैए”। कोनो करतेबताक अवसरपर ग्रामवासिनी मिथिलाक मध्यवर्गीय परिवारमे रहरहाँ देखब ई हूलिमालि-
बड़की पिसिया कुम्हरौड़ी अँचार बनाबथि बैसल
बुढ़बा काका दरबज्जापर पान चिबाबथि ओङठल
लछमन एलैए कि राम एलैए
टोल-पड़ोसक घर-घर के समाङ एलैए
पान एलैए मखान एलैए
धीया के बियाहके सामान एलैए।
मखान जहिना स्वच्छ कोमल चिक्कन होइछ, मखानक पात तहिना कँटाह खड़खड़ आ मैलमुँह। एहिपर कहबियो प्रसिद्ध भऽ गेल- मखानक पातसँ मुँह पोछब। एकक आकांक्षा जखन दोसराकेँ सोहाइ नहि छै तँ अपन खौँझ एहू तरहेँ व्यक्त करैछ। अर्थात, बड़ नीक-निकुत चाहै छथि तँ बुझथु, तेहन उपाय करबनि जे नोचैत रहिहथि अपन मुँह! एहि कहबीक प्रयोग व्यंग्योमे होइ अछि। शीर्षक- कवितामे कवि तिलक-दहेज लेनिहार बाप, समाजक चरित्रहीन मुँहपुरुष, स्वार्थी नेता, छद्मवेशी भद्रजन एवं समाजकेँ गर्तमे ठेलनिहार जते तत्व अछि, सभकेँ मखानक पातसँ मुँह पोछि देबऽ चाहै छथि।
आइ प्रयोजन अछि-
जे ओहन-ओहन शिखण्डीक मुँह
मखानक पातसँ पोछि दी
जे बेटाकेँ विक्रीक वस्तु बूझि कए
तिलक-दहेजकेँ बढ़बइत अछि
कन्यागत करेज खखोरि कए
अपन इष्टदेवताक अर्घ्य चढ़बइत अछि।
...................
बन्धु! तेँ आइ प्रयोजन अछि
जे समग्र परिवर्तन आनब सर्जन लेल
कोनो अवरोधक तत्त्वक मुख
मखानक पातसँ पोछि दी
जे कार्यपालिका, न्यायपालिका आ विधायिकाक
गरिमाकेँ भंग करैछ
आ विधि-व्यवस्थामे आस्था रखनिहार
शान्तिप्रिय लोककेँ अकारणहुँ तंग करैछ।
मखान जे जलतलमे, पंकक परिसरमे जन्म लै अछि, से अपन गुणसँ भगवानपर माला बनि चढ़ै अछि, भोग बनि अर्पित होइ अछि, श्रेष्ठ पदार्थक मापदण्ड बूझल जाइ अछि, ततबे नहि, मुहाबिरा बनिकऽ दुर्जनकेँ चेतौनियो दै अछि, अपन “पात”सँ कुत्सित तत्त्वक मुहोँ पोछै अछि। संसारक एहन दुर्लभ पदार्थ, जे मिथिलामे सुलभ अछि, तकर “मान” कतौ मैथिल साहित्यकार लोकनि नहि देथि! डॉ. बी.झाक धुनपर गुनगुनयबाक हेतु ककर मन नहि मचलि उठैत होयत?—
चन्द्रमा उतरल गगनसँ
चांदनीसँ नहाउ औ!
धान-पान-मखान-पूजित
मैथिलीकेँ जगाउ औ!
कुमार मनोज कश्यप
जन्म मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। बाल्य काले सँ लेखन मे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवानी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित।
चौबटिया पर
' भैया ! हम कहैत छी आब अवस्था भेल, आबो तऽ चैनक साँस लिय । कहिया धरि कोंढ़ तोरैत रहब? आब तऽ बौआ वयस्क भऽ गेल छथि ; आबो तऽ किछु करथु कि सभ दिन पढ़ाई के नाम पर बापे के कमाई पर पुᆬटानी करैत रहताह । सभ के कोनो सरकारीये नोकरी भेटैत छैक? अपने गाम कि टोले मे देखियौ ने जे हुनका सँ कतेक छोट सभ जकरा नाक पोछबाक लुरि नहिं छलैक सेहो सभ दिल्ली-बम्बई जा कऽ हजारक-हजार रूपैया घर पठबैत आछ । साँच पुछि तऽ मैथिलक पछुएबाक कारण सरकारी नोकरी के पाछु भागब आछ । से जँ नहिं भेटल तऽ कतहु के नहिं रहि गेलहुँधोबिक गदहा बला परि़। हम तऽ कहैत छी कलियुग मे तपस्या केला सँ भगवान भने भेट जाथि ; मुदा सरकारी किन्नहुँ नहिं एकरा तऽ मरीचिका बुझु़ एतेक भाई-भतीजावाद आ घुसखोरीक जुग मे ओना कतऽ नोकरी राखल छै़ ओ तऽ जमाना रहई जे आहाँ सभ के सरकारी नोकरी भेट गेल़़आब ककरो नाम गनाउ गाम मे ?।' कक्का आरो बहुत किछु बजैत चलि गेलाह। मुदा दलानक कोनटा मे ठ़ाढ हमरा मे आर बेसी सुनबाक सामर्थ्य नहि रहि गेल छल हम झमा कऽ खसल छलहुँ मोश्किल सँ सम्हारि पओलहुँ अपना कें । बाबूक प्रतिव्रिᆬया हम बुझि नहि पओने छलहुँ ओ मुँह सँ साईत किछु बाजल नहि छलाह बाजलो हेताह तऽ सम्भव जे मनोद्वेगक कारणे हमहीं सुनि नहि पओने होईयैक।
कक्काक शब्द हमरा जमीन पर पटकि देने छल़़हमर सिविल सेवाक बुनल सभ टा सपना जेना एके चोट मे टुटि कऽ हमरे सोझँा मे खंड-खंड पसरि गेल आ हम ओहि पर ओंघरा कऽ अपन सर्वांग शरीर शोणिते-शोणित कऽ लेने छी ।
हमर बाबू परम शुद्ध़़बेसी बाजऽ वला नहिं । ओहि दिन कक्का के स्पष्ट जवाब नहि देबाक पाछु हुनका मोनक कोनो कोन मे नुकायल कोनो अनजान भय छलनि से हमरा ओहि दिन मायक बात सँ बुझायल - 'सरकारी नोकरी नहि भेल तऽ कतहु प्राईवेटो मे तऽ देखतियैक । बाबूये पर कतेक भार देबैऩ़पँाच-छौ महिना मे ओहो तऽ रिटायरे कऽ रहल छथि। वेतनक समुचा पाई मे तऽ घर चलिये नहि रहल छैक़़पेंसनक अधोर पाई मे कोना पार लगतैक ? मुनमुन तऽ अखन बी०ए० मे गेबे केलैयै, ओकर पढ़ाई तऽ कहुना पूरा करबैये पड़तैक़़। ' मायक स्वर मे जे एकटा चेतावनी छलैक से हम नहि बुझितियैक, एतबो अबोध हम नहि। हम ओहि राति कतेक कानल रहि से हमहीं जनैत छियैक। जाहि सपना के हम एक-एक विंदु सँ उकेरने रहि, जकर पँाखि पर बैसि कऽ हम कल्पना लोक मे निच्छंद विचरण करैत रहि, तकर जेना पँाखि कतरि कऽ भू-लुंठित कऽ देल गेल छलैक । हमरा अपन भविष्यक चिंता सँ बेसी दुख एहि बातक आछ जे कक्का अपन वुᆬटिल सिद्धांत - 'दुभि, दालि आ देयाद जतेक गलय ततेक नीक ' - हमरो परिवार पर अजमेबा मे सफल भऽ गेल छलाह। नहि तऽ जे बाबू एकटा सपना देखने रहथि अपन संतान के प्रशासनिक सेवा के उच्चत्तर स्तर पर पहुँचेबाक सदा प्रोत्साहित कयने रहथि एहि लेल, जे गर्व सँ कहथि जे साधनक अभाव मे हम स्वयं नहिं बनि सकलहुँ तऽ की ; अपन बेटा के आई०ए०एस० बना कऽ देखायब से एकाएक यू-टर्न लऽ लेताह से हम सपनो मे नहि सोचने रही । पहिल चाँस मे हम पी०टी० तऽ निकालिये लेने रही़एहि बेर दोसर चाँस एपियर होयब़़एतबे मे बाबू अगुता जेताह; ई हुनकर स्वभाव तऽ किन्नहुँ नहिं!
हम अपन पित्त के पीबि गेलहुँ। अपन सफाई मे किछु बाजब उचित नहिं बुझना गेल । सुतली राति मे अपन दु-चारि टा कपड़ा बैग मे राखि घर सँ चुपचाप निकसि गेलहुँ बिना ककरो जनेने । मोन मे रंग-विरंगक भवना आयल़़आत्म-हत्या तक के । अंत मे मोन स्वीकारलक़़चंडीगढ़ चल जाई दिनेश लग़़क़तेक जीद्द करैत छल ओ चंडीगढ़ एबाक लेल़़क़हैत छल बड नीक शहर छै । ट्रेन एबा मे एखन देरी छैक़़ फरीछ सेहो भऽ रहल छैक़़ हम दिनेश के फोन करैत छी - 'परसू हम चण्डीगढ़ पहुँच रहल छियौ भोर मे़ स्टेशन पर आबि कऽ अपना ओतऽ लऽ जैहैं । ' आर किछु हम नहि कहि सकलियै़ओ पुछिते रहि गेल़़ फोन काटि देलियै ।
स्टेशन पर ओ आयल छल हमरा आरयाति कऽ अपन घर लऽ जेबाक हेतु। दिनेश हमर लंगोटिया याऱ़पढ़लक-लिखलक कम्मे़ज़ल्दिये कोनो प्राईवेट मे नोकरी पकड़ि लेलक । सुनैत छियैक नीक कमाईत आछ । भरि रस्ता ओ हमर अकस्मात एबाक प्रयोजन पुछैत रहल हम बात के घुमबैत रहलियै । बस एतबे कहलियै जे हमरा कोनो नोकरी धरा दे़ज़े होई हम करै लेल तैयार छी। ओ हमरा अपना भरि बुझेबाक प्रयास करैत रहल य़ार ! तोरा मे प्रतिभा छौ़तों आई०ए०एस कऽ सकैत छैंतोरा पर गाम समाज के आँखि लागल छैक़़तों प्राईवेट नोकरी-चाकरी के झंझट छोड़़़तैयारी करैत रह़़ माँ भगवती के कृपा सँ सफलता अवस्से भेटतौ़। मुदा हमहुँ जिदियायल रही। ओ हारि मानि लेलक हमरा एकटा केबल-ऑपरेटर ओहिठाम नोकरी रखा देलक तीन हजार रूपैया महिना पर ।
गाम-घर, माय-बाप, भाय-बहिन सभ कें बिसरि जेबाक प्रयास कऽ रहल छी हम । कतऽ कहाँ सँ पता करैत-करैत एक दिन मायक फोन आयल़़बड़ कनैत छल़़हमरो बकोर लागि गेल़़ हम किछु बाजि नहिं सकल रहि फ़ोन काटि देलियै ।
बितैत समयक संगे एक दिन नरेंद्रजी सँ भेंट भेल़़ नरेंद्रजी अपने ओम्हर के समवयस्के जकाँ । दोस्ती बढ़ल़़पता चलल हुनकर पिता बैंक-मैनेजर छथिन समस्तीपुर मे । बैंक सँ लोन लऽ कऽ स्वयं के केबल शुरू करबाक विचार जागल । बात आगू बढ़ल़़क़ाज करबाक अनुभव आई दू साल मे भैये गेल । योजना पर काज करय लगलहुँएक-एक मुद्दा पर गहन सोच-विचार प्रोजेक्ट-रिपोर्ट तैयार भेल कतऽ सँ मशीन सभ कीनब क़ेहन आदमी सभ के काज पर राखब़़क़ोना प्रचार -प्रसार करब सभ किछुक योजना राति भरि जागि कऽ बना लेलहुँ । लोन भेटि गेल़़मशीन,आवश्यक वस्तु-जात सभ खरीद भऽ गेल। काल्हि धूम-धाम सँ उद्घाटन करबाक दिन छल । सोचलहुँ बाबू-कक्का सहित गामक सभ लोक के बजायब उद्घाटन-समारोह मे । अचानक सँ एहन पैघ योजना देखि कऽ घरक लोक गर्व सँ गद्-गद भऽ उठत़़क़क्का के जलन तऽ हेबे करतैन जे देयाद गलि नहिं, उठि रहल आछ मुदा ताहि सँ हमरा कि ? हुनकर मोने एहने छनि तऽ दोसर की करतैन ?। बुधना आबि कऽ समाद देलक - 'आहँ करैत रहू उद्घाटन, ओम्हर पायल-केबल सभ कें मुपत्त मे केबल देखेबाक घोषणा कऽ देलकैयै । जेहो एक-दू गोटे तैयार छल अपन केबल लेबाक लेल, सेहो पायले दिस चलि गेल । फ्री ककरा नहिं रूचतै ?' पायल केबल के मालिक भवेश तऽ हमरा संगे गामक स्वूᆬल मे पढ़ने आछ , ओकरा एना नहि करक चाहियैक । हम दौड़लहुँ भवेशक घर दिस। रस्ते मे भेटा गेल ओ। हम कहलियै - ' यार ! तोरा एना नहि करक चाहियौ । तों तऽ पुरान छैं ; कमा चुकल छैं, कनेक दिन फ्रीयो मे केबल देखा सकैत छैं । मुदा हम बैंक सँ लोन लऽ कऽ शुरूये करऽ जा रहल छी । हमरा पेट पर तऽ लात नहि मार । ' भवेश चौआनयँ मुस्कियायल छल। ओकर एहि मुस्की मे वुᆬटिलता हमरा साफ बुझा रहल छल। 'देखही दोस ! दोस्ती अपना जगह पर छैक आ बिजनेस अपना जगह पर । ने दोस्ती मे बिजनेस एबाक चाही ; ने बिजनेस मे दोस्ती । '
से बिजनेस मे दोस्ती नहिये एलै । हमर सभ मशीन, सामान ओ आधया दाम में खरीद लेलक । हमर सपना एक बेर पेᆬर सँ चकनाचूर भऽ कऽ हमरा आगँ छिड़िया गेल आछ । हम अपन मोन के बुझबैत छी---सपना टुटबे खातिर बुनल जाईत छैक़़आर कोनो बात नहिं।
मनोज झा मुक्ति
देशक अवस्था आ जनताक प्रवृति
— मनोज झा मुक्ति
अखुनक परिवेशमे ककरोसँ पुछियौक देशक अवस्था केहन अछि ? त, कहता कि
कहू सभ ठाम भ्रष्टाचारे भ्रष्टाचार व्याप्त अछि । देशक नेता भ्रष्ट, कर्मचारी तन्त्र
भ्रष्ट, पत्रकारिता जगत भ्रष्ट, व्यापारी भ्रष्ट...आर किदन किदन...सभचीज भ्रष्टे
भ्रष्ट, तहन देशक स्थितिके कि कहबैक...।
देशक स्थिति निश्चितरुपेण नीक त नहिंए अछि, मुदा एकर दोषी के ? सभ
जौं भ्रष्टाचारिए अछि त नीक व्यक्ति केओ नहिं ? आ देशक जनता कि दूधक
धोएल अछि ? सबकेँ एकवेर अपना छातीपर हाथ राखिकऽ सोंचहिटा पड़त । आखिर
किया देशक हालति एहि तरहें दिनानुदिन खसकैत जाऽरहल अछि ?
देशमें सब तरहक लोक हाएव कोनो आश्चर्यक गप्प नहिं । सबहक कहब ई
छन्हि जे सभक्षेत्रमे भ्रष्टाचारीए लोकक चलाचल्ती छैक । अईसँ असहमत बहुत
कम्मेगोटे हएता । मुदा यहो सत्ये छैक जे सत्यक बाटपर धिरे—धिरे आगा ससरैत
लोक सेहो अई देशमे अछि । हँ, सत्यवादी धारमे लागल खाँटी राष्ट्रवादी सभक
सँख्या बहुत कम अछि आ दिनानुदिन ओहि सँख्यामे ह्रास होइत जाऽरहल अछि ।
तकर कारण कि ?
जौं स्पष्टरुपसँ कहल जाए त दशक एहि परिस्थितिक जिम्मेवार आन केओ
नहिं, हमहि आँहाँ छी । हमही आँहाँ देशक नेताके, व्यापारी आ कर्मचारीकेँ
भ्रष्टाचारी बनावि रहल छियैक ।
हम आँहाँ एकटा नेताके भ्रष्टाचार करबालेल विवश कऽ दैत छियैक । जौं
गाममे एकटा कोनो नेता साइकलपर चढिकऽ अवैत अछि या पैदल अवैत अछि त
ओकरा देखबाकले कोना जनता नहिं जाइत छियैक । एतवे नहिं ओई नेताके
अपना दरबज्जापर बैसऽदेवमें सेहो हमसब अपनाआपके हीन महशुस करैत छी । आ
हमरे आँहाँक गाममे जौं एकटा नेता महँग गाड़ीमे चढिकऽ अवैत अछि त ओकरा
पाछा या कहु स्वागत करबाकलेल माइए पुते दौड़ैत छियैक, ओकरा अपना
दरबज्जापर बैसबऽमे हमसब अपनाके गर्वान्वित भेल अनुभूति करैत छी । चुनावक
समयमे कतबो सकारात्मक सोंंचवला नेता किएक नहिं हुअए ओकरा भोंट देवाक
बदलामें हमसब मतपत्रमे अपन जातिक उम्मेदवारके चिन्हमे मोहर लगवैत छी ।
ओतवे नहिं अपन मतक महत्वके बुझितो हमसब अपना मतके पाई लऽ कऽ बेचि दैत
छियैक जकर कारणसँ जकरालग अपन जातिक जनसँख्या वेसी अछि आ वेसी पाई अछि
वएह नेता चुनाव जितैत छथि । कि हमर आँहाँक एहि तरहक व्यवहार एकटा नेताकेँ
भ्रष्ट बनवाकलेल विवश नहिं करैत छैक । जौं जातिक नामपर केओ जितैत अछि त
ओ अपना जातिक वाहेक आन जनताके वारेमे किया सोंचत ? आ अपना जातिकलेल
सेहो किछु नहिं कऽसकैया, कियाक त ओ ई नीक जकाँ बुझने रर्हैत अछि जे
अपना जातिकलेल हम काज नहिंयो करब तखनो हमर जाति हमरा भोंट देबेटा करत
। आ ओ जे पजेरोबला नेता आ पाईबला नेताक तुलनामें अपनाके निरीह
बुझैत अछि, ओहो हमरा आँहाँक सामिप्यता पएवाकलेल आ चुनाव जीतवाकलेल
पाईएके अपना जीवनक सभसँ पैघ लक्ष्य बुझि ‘एनि हाउ, पाई कमाऊ’ के नीति
अवलम्वन कऽलैत अछि । आ जखन ओ पाइएक बलपर हमरआँहाँक भोट लेत त किया
हमरा आँहाँक विकासकलेल ओ सोंचताह ?
तहिना देशक कर्मचारिके हमही आँहाँसब अपन काज जल्दीसँ जल्दी करेबाकलेल
या कानूनन नहिंयो होबऽवला काज गैरकानूनन रुपसँ करेबाकलेल घुस देल करैत
छियैक आ एहिं तरहें एकटा कर्मचारीकेँ जवरदस्ती हमसब भ्रष्टारी बना दैत छियैक
। ओनो कर्मचारीयो खासकऽ एकटा पुलिसमे जेबाकलेल हाकिम एकलाख टका लेल
करैत छैक, हाकिमके डाइरेक्टर बनेवाकलेल मन्त्रीद्वारा लाखो रुपैया घूस लेल जाइत
छैक । जहन ओ कर्ज पैंच लऽ कऽ बहाल भेल रहैत छैक त कोनो बहन्ने कमेबेटा
करतैक ।
एकटा व्यापारीकेँ काला बाज़ारी करबामे सेहो हमसब अपने बहुत बेसी
दोषी छी । हमसब बुझितो रहैत छि तइयो ओकर विरोधमे बजबाक हिम्मत नई
करैत छियैक ? हमरा आँहाँलेल के बाजि देत ? ककरो लग ओतेक फुरसति नहिं
छैक ।
हमसब सबके भ्रष्टाचारी त कहैत छियैक, मुदा अपन टेटर नहिं देखैत छी ।
सरकार अपन गाम अपने बनाबु कहिकऽ प्रत्येक गाममे १५ सँ ३० लाखधरि रुपैया
प्रतिवर्ष देल करैत अछि । गामक विकास कतेक भेल छैक, विशेषकऽ मधेशमे से
ककरोसँ छुपल नहिं अछि । सभ पार्टीक प्रतिनिधिसब अपन बपौटी(पैत्रृक) सम्पति
बुझि खुलेआम लुटैत अछि आ हम आँहाँ मौन भऽ सबकिछु देखैत रहैछी । जौं
कियो व्यक्ति ओइ काजक विरोध करैत छैक त हमहि आँहा केओ पार्टीक नामपर,
केओ जातिक नामपर ओहन भ्रष्टाचारीकेा दूधक धोएल बनाऽदैत छियैक । ओहन
भ्रष्टाचारीकलेल पार्टीयोसब अपन प्रतिष्ठाधरि दाओपर लगा दैत अछि ओकरा
बँचवऽमें । एकरा अरिक्त जे किछु कोनो गामठाममे जौं छोटछीन विकासक काज
होइत अछि त ओकरा विनाश करबामें हमसब बहादुरी बुझैत छी । अपना घरक
अगााक सडकपर राखलगेल ग्राभेलक पाथर अपना घरमे घुसियाबऽमे त हमरा सबके
जोरा सम्भवतः कतौ नहिं भेटत ।
एतेक धरि कि सरकार विद्यालयसबके व्यवस्थित करबाकलेल अपनेगामक स्थानिय
व्यक्तिक अनुसारे चलेवाकलेल विद्यालय व्यवस्थापन समीतिके निर्माण योजना लाबि
प्रायः सभ विद्यालयके समुदायमे हस्तान्तरण केलक, मुदा विद्यालय व्यवस्थापन समीति
अखन मात्र पाई कमेबाक एकटा स्थलक रुपमें परिणत भऽगेल अछि । चाहे विद्यालयमे
शिक्षकक रखबामे होय या शिक्षककेँ सरुवामें हुए, विशेष कऽ मधेशक प्रत्येक
विद्यालय व्यवस्थापन समीतिसभ एहि तरहक व्यापारमें लागिगेल अछि । विद्यालयक पढाई
केहन छैक, शिक्षक विद्यालयमें अवैत अछि कि नहिं, विधार्थी अवैत अछि कि नहिं
ताहिसँ व्यवस्थापन समीतिके कोनो मतलव नई रहल देखल जाऽरहल अछि ।
एहि तरहें देशक विकास कोना हायत ? जाधरि हमसब अपने नहिं सुधरब त
आन के सुधारत ? जौं हमसभ एकटा सत्य बाटपर चलनिहार, देशभकत आ जनताक
समस्याके अपन बुझऽबला नेताक बदलामे तामझामबला पँजेरो एनिहार नेताके
निरुत्साही नहिं करब त दिनानुदिन भ्रष्टाचारक दलदलमें हमसब धँसैत जाएब । सत्यक
पक्षधरके मनोबल बढेनाई जरुरी आ सभक कर्तव्य भऽगेल अछि । आन कियो किया
हमरा आँहाँक सम्बन्धमे सोंचि देत ? ताएँ आनके दोष देबासँ पहिने एकवेर
हमसभ अपने टेटर देखब कि ?
टेष्ट परीक्षा आबऽलागल, मैथिलीक विद्यार्थी पुस्तक बिहीन
शैक्षिक वर्षक अन्त होमऽ लागल अछि, किछु दिनकवाद दशम कक्षाक टेष्ट परीक्षा सेहो हएत । आन आन विषयक विद्यार्थीक कोर्स अन्तो होमऽलागल अछि, मुदा हिलसि कऽ अथवा ककरो दबावसँ मैथिली विषय लेनिहार विद्यार्थी अखनो धरि पुस्तक केन्द्रक दुवारिपर हाजरी दैत बरोबरि भेटत । कारण जे दशम कक्षाक विधार्थी अखनो धरि नहि देखने अछि— दश किलासक मैथिली पोथी ।
धनुषा जिल्लाक लगभग एक दर्जन आ महोत्तरी जिल्लाक पर्सा पतैली लगायतक स्कूलमे मैथिली विषयक पढाई होइत अछि, मुदा विधार्थी आ शिक्षक दुनुगोटे मैथिलीक पुस्तक अखनधरि नई भेटलाकवाद फिरसान अछि । साझा प्रकाशनद्वारा प्रकाशित पुस्तक, जनक शिक्षा सामग्री केन्द्रद्वारा विधार्थीकलेल उपलब्ध कराओल जाइत अछि । जनकपुरधाम स्थित विद्यापति चौकपर रहल ‘विद्या पुस्तक केन्द्र’क विक्रेता कलानन्द झा कहलनि, ‘साझा प्रकाशनकेँ वेरवेर तगेदा कएलाकवादो मैथिलीक पुस्तक उपलब्ध नहि कराओल गेल’ ।
दुखक गप्प त ई अछि जे ताहिकालमे मैथिली विषयक पाठ्य पुस्तकक आभाव देखल गेल अछि, जाहिकालमे साझा प्रकाशनक अध्यक्ष छथि— मैथिलीक पैघ साहित्यकार/पत्रकार/कवि/फोरमक नेता/बहुतरास मैथिली संघ—संस्थाक अगुवा व्यक्तित्व श्री राम भरोस कापड़ि ‘भ्रमर’ । अपनाके मैथिलीक योद्धा आ साझा प्रकाशनक पहिल मैथिल/मधेशी चेयरमैन कहबामे गर्व कएनिहार कापड़िके पदपर पहुँचलाक वादो मैथिली पोथी नहि भेटव सर्वत्र आलोचनाक विषय बनल अछि ।
मैथिली विषयक पुस्तकक अभाव हएव, मैथिली भाषा आन्दोलनक व्यापकतामें सऽभसँ पैघ रोकावटकरुपमें देखाऽरहल अछि । मैथिलीक पाठ्य पुस्तकक सहज उपलब्धता जाधरि नई हएत ताधरि विद्यालयक शिक्षामें मैथिलीक पढाई मात्र भाषण धरि सीमित रहत । गणतन्त्र प्राप्तिकबाद मैथिलीकेा भजा कऽ भलेहिं कतेको मैथिल वरिष्ठ पदपर चलिगेल होथि, मुदा धरातलिय यथार्थ इएह अछि जे मैथिली काल्हियो पाछा छल आ एखनो सिसैकते अछि ।
-प्रकाश
रंगदृष्टि; दिल्ली
बांग्ला नाटक लेल कोलकाता आ मराठीक लेल मुम्बई, तहिना पहिने मात्र हिन्दीक लेल दिल्ली जानल जाइत छल । मुदा आब सम्पूर्ण भारतवर्षमे विविधतापूर्ण नाटक मंचनक लेल दिल्ली केन्द्रमे आबि चुकल अछि, ताहिमे कोनो शंखा नहि । दिल्लीक मंडी हाउस स्थित विभिन्न प्रेक्षागृहमे नित्य कोनो-ने-कोनो भाषाक नाटक मंचित होइते रहैत अछि । एहि ठाम हिन्दी, मराठी, बंगाली मात्र नहि बल्कि मणि पुरी, असमिया, उर्दू, पंजाबी,मैथिली, कन्नड़, मलयालम आदि भाषाक नाटक देखबाक मौक़ा प्राय: भेटैत रहैत छैक ।
एहि बीच दिल्लीक प्रेक्षक केँ एकटा अत्यंत सुखद अनुभव भेलनि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालयक प्रांगणमे । मराठी नाटककार विजय तेंडुलकर लिखित प्रसिद्ध नाटक जात ही पूछो साधु की आ बांग्ला लेखक रवीन्द्रनाथ ठाकुर लिखित अचलायतन; दुनूक मंचन हिन्दीमे, जेना तीनू रंगमंचक संगम भ’ रहल हो ।
जात ही पूछो साधु की राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडलक कलाकारक संग प्रसिद्ध नाट्य निर्देशक राजिन्दर नाथ आ अचलायतन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वितीय वर्ष छात्रक संग युवा निर्देशक शांतनु बोस कयने छलाह ।
नाटक जात जी पूछो साधु की एकटा स्वस्थ हास्य-व्यंग नाटक अछि । एहिमे महीपत नामक व्यक्ति कहुना क’ एम.ए. पास करैत अछि - थर्ड डिविजन सँ । बहुत दिन बेरोज़गार रहला बाद सिफारिशिज़्मक टेकनिक सीख कोनो कॉलेजमे लेक्चरार बनैत अछि आ नाटकक अंतमे कतेको उथल-पुथलक बाद एक बेर फेर बेरोजगार भ’जाइत अछि ।
एहि सोझा-सोझी कथ्यक लेल नाटकक संवादमे नाटककार ततेक ने द्वन्द ओ उत्सुकता भरि देने छथि, जे प्रेक्षक एकाग्र भ’ महीपतक सोलो लौगीमे हेरायल रहैत छथि । ई नाटककारक विशेषते ने जे आई सँ 40 वर्ष पहिने लिखल कथ्य आजुक संदर्भ सेहो समकालीने बुझना जाइछ । संवाद सेहो तेहेन ने चोटगर आ तीक्ष्ण छैक जे प्रेक्षागृहमे बैसल दर्शक केँ बेधैत अछि । हास्यक पुट द’ नाटककार अपन सभ गप्प कहि दैत छथि आ दर्शक ओकरा सहर्ष ग्रहण करैत छथि ।
एकत’ सबस’ बेसी तेण्डुलकरजीक नाटकक मंचन सम्पूर्ण भारतमे भेलन्हि अछि ताहुमे जात ही पूछो साधु की नाटकक मंचन सबस’ बेसी भेल अछि । निर्देशकक रूपमे राजिन्दर नाथ जीक नाम हिन्दी रंगमंचक सुपरिचित नाम अछि । विजय तेण्डुलकरक प्राय: सभ नाटकक हिन्दीमे मंचन राजेन्दरजी कतेको बेर कयलथि अछि ।
एहि नाटक लेल मंच पर नाटकक संप्रेषणक जे विधि राजिन्दर नाथ अपनेने छथि ओ अति सरल अछि । मुदा, अभिनेताक अभिव्यक्ति पर अत्यंत बारीकी सँ कार्य कयल गेल अछि । मंच पर तीनू कात तीनटा दरवाज़ा, आधा मंच पर मात्र एक फूट ऊँच प्लेटफॉर्म आ सात-आठ टा ब्लॉक मात्र सँ एतेक जीवंत प्रस्तुति निर्देशकक दूर दृष्टिक परिणाम थिक ।
प्रस्तुतिमे प्रकाश परिकल्पना गोविन्द यादवक छनि । गोविन्दजी सेहो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय स’ प्रशिक्षित छथि । महीपत बनल अम्बरीश मात्र दू कदम चलि जखने दोसर प्रकाश बिम्बमे प्रवेश करैत छथि कि समुच्चा परिदृश्ये बदलि जाइत छैक । मात्र प्रकाशक प्रभाव सँ मंच कखनो समाचार पत्रिकाक दफ्तर, कखनो निछछ देहात त’कखनो गामक कॉलेज वाकि पिकनिक स्थलमे परिवर्तित होइत रहैत अछि ।
एहिना वस्त्राभूषण सभ सेहो तर्क संगत अछि । जेँ सभ किछु संतुलित अछि तेँ नाटक देख सभ दर्शक भरपूर पूर्णताक संग प्रेक्षागृह सँ बहराइत छथि ।
आब दोसर प्रस्तुति : अचलायतन । ई प्रस्तुति छात्रक प्रशिक्षणक हिस्सा अछि तेँ प्रस्तुतिमे तकनीकी पक्ष पर बेसी ध्यान गेल । भ’ सकैत अछि बहुतो दर्शक केँ ई प्रस्तुति बहुत बेसी आकर्षित नै केने होइन, मुदा ई प्रस्तुति तकनीकी दृष्टिए उत्कृष्ठ त’अछिए । नाटक देखबाकाल अभिनेता-अभिनेत्रीक शारीरिक शक्तिक क्षमता, देह गति,आवाज़ संतुलन आ पात्रक मानसिक अभिव्यक्ति रोमांचित करैत छल । रवीन्द्रनाथ जीक लिखल एतेक पुराण कथा केँ आजुक संदर्भमे प्रस्तुत केनाइ अति कठिन कार्य छल, जकरा निर्देशक अपन दृष्टि सँ समकलीन बनेबाक भरपूर कोशिश केलनि अछि ।
अचलायतन के कथा सार ई जे एहि नामक एकटा शिक्षा संस्था अछि जत’ शिक्षाक रूपमे सालों-साल पुरान रुढ़िकेँ जीवित रखनाए मात्र अछि । मुदा किछु नव सोचक विद्यार्थी आ गुरुक प्रयास स’ एहि परम्पराकेँ तोड़ि देल जाइत छै आ एकबेर फेर स’अचलायतन के पुन: स्थापित करैत अछि ।
नाटक जे प्राय: कंभेंशनल फॉर्ममे कयल जाइत अछि तकरा तोड़बाक पूरा-पूरा कोशिश केलनि अछि शांतनु बोस । शांतनु बोस लगातार एहि विधामे कार्य क’ रहल छथि । मुदा एखन एहि फॉर्म केँ सामान्य दर्शक स्वीकारबाक लेल तैयार नै छथि ।
नाटक जात ही पूछो साधु की अत्यधिक यथार्थवादी अछि जाहिमे समाजक जे रूप आइ जै स्थितिमे अछि ओकरा ओही रूपमे लेखक रखलन्हि अछि आ ओकरा हम सभ सहर्ष स्वीकरलहुँ अछि जाहिमे समजाक सभरूप एक्केठाम देखबामे अबैत अछि । तथाकथित सभ्य समाज आ निरक्षर समाज दुनूक वार्तालापमे आकाश-पतालक अंतर । नाटककार आ समीक्षक आ दर्शक; सभकेँ यथार्थवादक रूपमे एकरा स्वीकार करबाक चाही । हँ ! मिथिलाक लोक जीवन एकरा कहिया ने स्वीकारि चुकल अछि । एहि फॉर्ममे मैथिलीमे सेहो कतेको रचना भेल जेँ उत्कृष्ठ अछि मुदा एखनो तक मैथिल तथाकथित सभ्य साहित्यकार ओकरा स्वीकारबाक लेल तैयार नहि भेलखिन्ह । एहना स्थिति के की कहल जा सकैत अछि ?
एहिना दोसर रूप ई जे अपन रचनाकेँ कोनो काल मात्र केँ लक्ष्मण रेखा सँ मुक्त करबाक चाही । तखने ओ कालजयी भ’ पाओत । आ रचनाकेँ सेहो समकालीन परिप्रेक्ष्यमे देखबाक चाही । ओकरामे जँ कनी फेर-बदल कयला सँ आजुक’ पीढ़ीक लेल सार्थक बनि जायत त’ ई कोन बेजाय बात हेतैक ?
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प्रकाश झा
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय
भगवान दास रोड, नई दिल्ली-01.
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