२.२.उपन्यास-जगदीश प्रसाद मंडल-जीवन संघर्ष
२.३.साकेतानन्द-कथा-कृतं न् मन्ये
२.४.सुजीत कुमार झा-कथाप्रियंका
२.५.कथा-दिन धराबय तीन नामकुमार मनोज कश्यप
२.६.हेमचन्द्र झा-एना किएक?
२.७.नवेन्दु कुमार झा-रिपोर्ताज
२.८.बिपिन झा-ये बान्धवाऽबान्धवा वा।
प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी (१५ फरबरी १९२१- १५ मार्च १९८५) अपन सम्पूर्ण जीवन बिहारक इतिहासक सामान्य रूपमे आ मिथिलाक इतिहासक विशिष्ट रूपमे अध्ययनमे बितेलन्हि। प्रोफेसर चौधरी गणेश दत्त कॉलेज, बेगुसरायमे अध्यापन केलन्हि आ ओ भारतीय इतिहास कांग्रेसक प्राचीन भारतीय इतिहास शाखाक अध्यक्ष रहल छथि। हुनकर लेखनीमे जे प्रवाह छै से प्रचंड विद्वताक कारणसँ। हुनकर लेखनीमे मिथिलाक आ मैथिलक (मैथिल ब्राह्मण वा कर्ण/ मैथिल कायस्थसँ जे एकर तादात्म्य होअए) अनर्गल महिमामंडन नहि भेटत। हुनकर विवेचन मौलिक आ टटका अछि आ हुनकर शैली आ कथ्य कौशलसँ पूर्ण। एतुक्का भाषाक कोमल आरोह-अवरोह, एतुक्का सर्वहारा वर्गक सर्वगुणसंपन्नता, संगहि एतुक्का रहन-सहन आ संस्कृतिक कट्टरता ई सभटा मिथिलाक इतिहासक अंग अछि। एहिमे सम्मिलित अछि राजनीति, दिनचर्या, सामाजिक मान्यता, आर्थिक स्थिति, नैतिकता, धर्म, दर्शन आ साहित्य सेहो। ई इतिहास साहित्य आ पुरातत्वक प्रमाणक आधारपर रचित भेल अछि, दंतकथापर नहि आ आह मिथिला! बाह मिथिला! बला इतिहाससँ फराक अछि। ओ चर्च करैत छथि जे एतए विद्यापति सन लोक भेलाह जे समाजक विभिन्न वर्गकेँ समेटि कऽ राखलन्हि तँ संगहि एतए कट्टर तत्त्व सेहो रहल। हुनकर लेखनमे मानवता आ धर्मनिरपेक्षता भेटत जे आइ काल्हिक साहित्यक लेल सेहो एकटा नूतन वस्तु थिक ! सर्वहारा मैथिल संस्कृतिक एहि इतिहासक प्रस्तुतिकरण, संगहि हुनकर सभटा अप्रकाशित साहित्यक विदेह द्वारा अंकन (हुनकर हाथक २५-३० साल पूर्वक पाण्डुलिपिक आधारपर) आ ई-प्रकाशन कट्टरवादी संस्था सभ जेना चित्रगुप्त समिति (कर्ण/ मैथिल कायस्थ) आ मैथिल (ब्राह्मण) सभा द्वारा प्रायोजित इतिहास आ साहित्येतिहास पर आ ओहि तरहक मानसिकतापर अंतिम मारक प्रहार सिद्ध हएत, ताहि आशाक संग।-सम्पादक
अध्याय – 1
मिथिला क इतिहास
वैदिक युग प्राचीन वैदिक साहित्य मे अंग मगध और मिथिला क कोनो स्पष्ट उल्लेख नहिं भेटइत अछि। ऋग्वेद संहिता मे उपरोक्त तीनू खण्ड मे सँ कोनो खण्ड क नाम उल्लिखित नहिं अछि। ऋग्वेद क तेसर अष्टक क पूउम सूक्त क चौदहम ऋचा मे ‘कीकट’ क उल्लेख अछि आर ओहिठाम क राजा ‘ प्रमगन्द’ क संबन्ध मे बहुत रास निन्दनीय बात से हो। यास्क क अनुसार‘कीकट’ देश मे अनार्थ लोकनिक निवास छल। सायणाचार्य अहि मत सँ सहमत होइत हुँ आगाँ कहैत छैथ जे ‘कीकट’ क निवासी नास्तिक छलाह आ योग, दान, होम इत्यादि पर हुनका लोकनि केँ एक्कोरत्ती विश्वास नहिं छलैन्ह। ओ लोकनि इहलोकिक छलाह आर परलोक मे हुनका लोकनि कें कोनो प्रकार क विश्वास नहिं छलैन्ह। ओ लोकनि भौतिकवादी छलाह। वायुपुराण क गया महातम्य सेँ कहल गेल अछि--
”कीकटेषु” गया पुण्या नदी पुण्या पुन: पुन: च्यवनस्या श्रमं पुण्यं पुण्यं राज गृहं वनम्” आहि सँ स्पष्ट अछि जे ‘कीकट’ दक्षिण विहार मे छल आर ओहिठाम क निवासी भौतिकवादी दर्शन मे विश्वास रखैत छलाह। ‘कीकट’ क संबध मे वैदिक विद्वान लोकनिक मध्य मतभेद अखनो बनल अछि आ आहि विवाद मे पड़ब हमरा लोकनिक हेतु एतए आवश्यक नहिं बुझना जाइछ।
एहन मानल जाइत अछि जे संहिता काल मे आर्य-सभ्यता क प्रधान केन्द्र सरस्वती आ ह्रषद्वली नदी क मध्य मे छल आर ओहि स्थान के मनु ब्रह्मावती कहने छथि। ब्राह्मण काल मे आहि संस्कृति क केन्द्र छल कुरू-पाँचल्ल जकरा मनु ब्रह्मर्षि देश कहने छथि। शतपथ ब्राह्मण मे कुरू पाँचल्ल देश क विशेष प्रशंसा भेल, अछि आर ऐतरेय ब्राह्मण मे आर्य देश क हेतु अस्याँ श्रुवायां प्रतिष्ठायां विशेषण क प्रयोग भेल अछि। सदानीरा नदी (गण्डक) पार कक जखन आर्य लोकनि मिथिला क क्षेत्र मे उतरलाह तखन अत्यंत द्रूतगति सँ आर्य संस्कृति क प्रसार आहि क्षेत्र मे भेल आ मिथिला विदेह समस्त पूर्वी भारत मे आर्य सभ्यता क प्रसार-प्रचार क एकटा प्रधान केन्द्र बनि गेल।
कोनो संहिता मे स्पष्ट रूपे विदेहक उल्लेख नहिं भेटइत अछि। तैत्तिरीय आर काठक संहिता मे“वैदेह्य ”, “वैदेही” एवं “वैदेह” शब्द क प्रयोग भैटेत अछि परञ्च आहि सभहिक व्यवहार गाय आर बरद क हेतु भेल अछि। ऐतरेय ब्राह्मण मे जाहिठाम आर्य देश क चर्चा भेलो अछि ताहुठाम “ विदेह’’ शब्द क पृथक उल्लेख नहिं भेटैत अछि। काशी, कोशल, मगध, अंग,आदि शब्द संग ‘ विदेहो’ के प्राच्य देश मे साटि देल गेल अछि। ‘विदेह’क पृथक उल्लेख स्पष्ट रूपें शतपथ ब्राह्मण मे भेटैत अछि ओहिठाम ई कहल गेल अछि जे विदेघ माथव अपन पुरोहित गौतम राहूगण क संग वैश्वानर अग्नि क अनुशरण करैत-करैत सरस्वती नदी क तीर सँ सदानीरा क तीर धरि पहुँचलाह। अहि सँ पूर्व आर्य लोकनि सदानीरा कँ पारकर पूब दिसि नहिं गेल छलाह तै तँ ई एक महत्व पूर्ण घटना मानल जाइत अछि। वैश्वानर विदेघ माथव केँ सदानीरा टपबाक आदेश देलथिन्ह । विदेघ अपन पुरोहित क संग आकरा पार केलन्हि आर तखने सँ ओ देश ‘विदेह’ कहबे लागल। सदानीरा विदेह आर कोशल कवीच क सीमा रेखा बनल।
ताहिदिन सँ विदेह आर्य सभ्यता क प्रधान केन्द्र बनि गेल। शतपथ बाह्मण क शेष अध्याय मे जनक क दरबार क कथा सुरक्षित अछि। मिथिला क राजा जनक अपना ओहिठाम देश क विभिन्न भाग सँ ब्रह्मज्ञानी लोकनि केँ आमंत्रित क केर् बजबैत छलाह, आर हुनक दरबार मे तँ कुरू पंचलि सँ बरोबरि ऋषि-मुनि लोकनि आबिते रहैत छलाह॥ ऋषि याज्ञवल्मय विदेह मे रहैत छलाह आर ताहु हेतु मिविला क प्रसिद्ध समस्त आर्यावर्त मे छल। जनक याज्ञवलम्य तँ बुझु जेना आर्य संस्कृति क धोतक बुझल जाइत छलाह आ ब्रह्मज्ञान क क्षेत्र मे हिनका लोकनि क कोनो ककरो सँ तुलना ताहिं दिन मे नहिं छल। कुरु पाँचाल क ऋषिगणक कुटिया मे शिक्षित रहितहुँ याज्ञवलम्य जखन जनक क ओहिठाम शास्त्रार्थ मे पहुँचलाह तखन ओ ओहिठाम उपस्थित कुरू पाँचलि क ऋषि गण केँ शास्त्रार्थ मे पराजित केलन्हि आर अपन विदूता क प्रकाश से हो। हुनक वचन मात्र अध्यात्म विघेटा मे नञ अपितु वैदिक क्रियाकलाप मे से हो सर्वथा प्रामाणिक मानल जाइत छल। परंपरा मे हिनका शुक्ल यजूर्वेदक प्रवर्तक मानल गेल अछि। शतपथ ब्राह्मण एवं बृहदा रण्यकोपनिषद –क अनेकानेक स्थल पर जनक- याज्ञवलम्य क ब्रह्मज्ञान क विवैचना क वर्णन अछि आर ठाम-ठाम विभिन्न ऋषि लोकनिक शास्त्रार्थ क सेहो। ब्रह्मज्ञान क हेतु तैतिरीय ब्राह्मण मेसे हो राजा जनक क प्रशंसा कैल गेल अछि। जनक ब्रह्मज्ञान क हेतु केहेन प्रसिद्ध रहल हेताह तकर एकटा सामान्य संकेत हमरा लोकनि के कौशीतकी उपनिषदक एक कथा मे भेटइत अछि जाहि मे कहल गेल अछि कि गर्गवंश क ‘बाल्मकि’ नामक एक ब्रह्मज्ञानी काशीराज अजानशुत्र क ओतए ब्रह्मज्ञान क निरूपण के जखन पहुँचलाह तँ राजा हुनका सँ प्रसन्न भए एक हजार गाय देलथिन्ह आर कहलथिन्ह जे देखु तइयो लोक सब “ जनक - जनक’’ चिकैरि रहल अछि। वैदिक युग मे ब्रह्मज्ञान क चरम उत्कर्ष विदेह मे भेल छल। ब्रह्मज्ञान आर्य संस्कृति क चरम उत्कर्ष बुझल जाइत छल - वैदिक मंत्र क उत्थान ब्रह्मावर्त मे, क्रिया कलाप क विकास ब्रह्मर्षि देश मे एवं “ब्रह्मविद्या” क विवेचन विदेह मे भेल। अहि हेतु ताहि दिन सँ समस्त आर्यावर्त क लोक केँ विदेह आवए पडैत छलैन्ह। विदेह पूर्वी भारत मे वैदिक काल मे आर्य सभ्यताक प्रधान केन्द्र छल। आहिठाम क्षत्रिय से हो वेदवक्ता होइत छलाह।
संस्कृत साहित्य मध्य मिथिला, विदेह एवं तीरभुक्ति क वर्णन:-
बालकाण्ड (बाल्मीकि) मे मिथिलाक वर्णन एवं प्रकारे अछि -
रामायण (बालकाण्ड) - “रामोडपि परमांपूजाँ गौतमस्य महामन:”
सकाशाद् विधिवत् प्राप्य जगाम मिथिलाचलः॥
अनर्ध राधव मे (अंक २)
“श्रृणोछि विदेहषु मिथिला
नामनगरीम”
जयदेव - प्रसन्न राधव (अंक २)
“तादह मिथिलायां पंचरात्र
निवासेन श्रमोपनेतव्य।
प्रसंगादयां राजा जनको द्रशः”
रघुवंश - (सर्ग – ११)
”संन्यमन्वयन सम्यृत हेतु मैथिलः
स मिथिलां व्रजन वशी। “
नैषधीयचरित - (सर्ग – १२)-
”अपीयमेनं मिथिला पुरन्दरं निपील
दृष्टि: शिथिला स्तुते वरम् ”
‘रामायण चम्पू’ (बालकाण्ड)
“ अथ मिथिलां प्रात प्रास्थन:
कौशिकस्त मित्थ म कथयतू ”
दशकुमार चरित (उतरपीढिका – उक्छवास )
“ एषो ब्रह्मस्मि पर्य्यटने कदा गतो
विदेहषु मिथिलाम प्रावस्यैव”
कथासरित सागर ( जम्बक उ, तरंग – ५)
” हदो वैदेह देशे च राज्यं गोपलिकायसः।
सत्कार हेतोहंति पतिः श्वसुर्यायानुगच्छतेः॥
भृंगदूत (गंगानंद झा) - १७ म शताब्दी।
“ गंगाती रावधि रधि गता यद भुओ भृंग भुक्ति
र्नाम्ना सैव त्रिभुवन तले विश्रुता तीर भुक्तिः॥
भृंगदूत मे दरभंगा क वर्णन एवं प्रकारे अछि –
नस्यापाथः परमाविमणं सांतिपियाभिरामा –
गारांकामायुध दरभंगा राजधानी - मुवैयाः॥
रघुवीर कवि –“ लक्ष्मीश्वरोपायन” मे –
“देशः संतु सहस्त्रोपि ममतु स्वाभाविक प्रीतये, श्रेयान देश बिशेष एवं मिथिलानामा क्षमा मंडले।” बदरी नाथ झा - ‘ गुणेश्वर चरित चम्पू’
“ आस्ति स्वस्ति समस्त भूमि बल श्रेय प्राशासी श्रुता प्रत्यार्थ स्मय मन्थना प्र मिथिला नामाडभिरामा कृति:। प्रेक्षाशालिविपा चिदालिल लिनो त्संगा डिभिषंगार्दिनी , नीवृद वृन्दम, चर्चिका र्चितलर श्रे स्तीरभुक्तिः सदा ।
गंगा गण्डकी संगम सँ पश्चिम सुप्रसिद्ध सोनपुर टीसनक समीप जे हरिहर क्षेत्र अछि तकरो उल्लेख भृंगादूत मे भेटेइत अछि। अहि भृंगदूतमे गाण्डवीश्वर स्थान , ब्रह्मपुर , वाग्वती (वाग्मती) एवं कमला नदी क उल्लेख से हो भेटइत अछि। कहबी छैक जे गाण्डवीश्वर महादेव राजा जनक क दक्षिण क द्वार पलि रहथिन्ह आर ओ स्थान सम्प्रति जोगिआरा टीशन क समीप अछि। ओना मिथिला नाम सँ प्राचीन जनक राजक राजधानी क ओध होइछ परञ्च एतए स्मरण राखबि आवश्यक जे मिथिला, तेरभुक्ति, विदेह, अछि शब्द एक एहन भौगोलिक इकाई क धोतक थिक जे गंगाक उत्तर मे छल आर विभिन्न छोट - छोट गणराज्य मे बटल छल। प्राचीन कविक बिहार मे गंगा क दक्षिण मेछल अंग आर मगध आर उत्तर मे छल मिथिला जकर अंतर्गत कैकटा छोट – छीन राज्य सब छल। जातक कथा आर जैन साहित्य क अतिरिक्त वृहद विष्णु पुराण क मिथिला महात्मय मे मिथिला क जे वर्णन अछि ताहि सँ एकर महत्व एवं जन प्रियता क पता लगेइयै। अहि मिथिला क अंतर्गत छल तँ प्राचीन कालक वैशाली जकर विस्तृत विवरण रामायण, रामायण चम्पू एवं भृंगादूत मे भेटैत अछि। प्राचीन ‘ विशाला ’ नगरिये बौद्ध कालक वैशाली थिक। विशाला क नाम क अद्धत्तन “बिसारा” परगना सँ होइत अछि । अहि क्षेत्र मे एकटा भैरव स्थान सेहो छल जकर चर्च भृंगादूत मे भेल अछि। नहिंयारी गाँव (कमतौल टीसन) सँ अघुना एकर बोध होइछ। भृंगदूत मे “ सरिसव” ग्राम आर कोहिश्वर महादेव क उल्लेख सेहो भेटइत अछि।
नाम एवं मिथिला क भौगोलिक सीमा : -
शतपथ ब्राह्मण क अनुसार नदी क बहुलता क कारणे मिथिला क भूमि दलदल जकाँ छल। कहल जाएछ जे अग्निदेव क आज्ञा सँ माथव विदेघ आर गोतम राहुगण सदानीरा (गण्डकी) क पूब मे जाक बस लाह आर और क्षेत्र इतिहास मे मिथिला, विदेह, तीरभुक्ति एवं तिरहुत क नाम सँ प्रसिद्ध भेल। दलदल भूमि कें अग्निदेव सुखा कें कठोर बनौलन्हि आर जंगल के जरा के अहि पूर्वी भूमि के रहबा योग्य स्थान से हो। आर्य ऋषि लोकनि ओहिठाम अगणित यज्ञ क आयोजन केलन्हि आर असंख्य यज्ञ आर होम होयबाक कारणें ओहिठाम भूमि रहबा योग्य बनि सकल। नदी क बाहुल्य क कारणे संभव जे अहि क्षेत्र के तीरभुक्ति कहल गेल छल। प्राचीन काल मे तीरभुक्ति समस्त उत्तरी बिहार क धोतक छल आर एकर सीमा पश्चिम मेश्रावस्ती भुक्ति आर पूब मे पुण्डवर्धन भुक्ति सँ मिलैत – जुलैत छल आर एकर अहि विशालता क परिचय हमरा आयनी – अम्बरी मे वाणैत तिरहुत सरकार क महल क नाम सब भेटइत अछि।
परंपरा गत साधन मे मिथिला क जे विवरण उपलब्ध अछि तकर सिंहावलोकन करब अपेक्षित। ओहि वर्णन मे एतिहासिकता क दुर –कतबा दूर धरि अछि से नहिं कहि सकैत छी तथापि पौराणिक आर आन क महत्व तँ एतिहासिक संक दृस्टिये अछिये अहि मे संदेहक कोनो गुंजाइश नहिं।
भविष्य पुराण क अनुसार अयोध्या क महाराज मनुक पुत्र निमि अहि यज्ञ भूमि मे आवि अपना के कृत्य – कृत्य बुझलन्हि आर ओहिठाम क ऋषि लोकनिक लय आर यज्ञ सँ लाभान्वित भेलाह। निमि क पुत्र ‘मिथि’ एक शक्तिशाली शासक भेलाह आर ओ अपन पराक्रम क प्रदशनार्थ ओहिठाम एकटा नगर क निर्माण केलन्हि जे ‘ मिथिला’ क नाम सँ प्रसिद्ध भेल। अहि मे कहलगेल अछि जे पुरी निर्माता होएबाक कारणें मिथिला क दोसर नाम ‘जनक’ पडल।
भविष्य पुराण : - निमः पुभस्तु तत्रैव मिथिला मे महान स्मृतः ।
प्रथमः भुजबलैयेन तैरहूतस्थ पार्श्वतः ॥
निर्म्मित स्वीयनाम्ना च मिथिला पुरमुन ममू।
पुरी जनन सामथ्यज्जिनकः सच कीर्तितः॥
वाल्मीकीय रामायण : - राजा भृतिषु लोकेषु विश्रुतः खेन कर्मणा निमि परमधर्मात्मा सर्व तत्व वतांवरः । तस्य पुत्रो मिथिर्नाम जनको मिथिपुत्रक कथन अछि जे जखन वशिष्ठ यज्ञाभिलाषी निमिक निमंत्रण अस्वीकार कए इन्द्रक पुरोहिताई करबाक हेतु स्वर्ग गेलाह तखन वशिष्ठ क अनुपस्थिति मे भृगु आदि आस्थिन ऋषि मुनि लोकनि क सहायता सँ निमि अपन यज्ञ क संपादन केलन्हि। वशिष्ठ स्वर्ग सँ घुरला पर जखन यज्ञ के सम्पादन भेल देखलन्हि तखन क्रुद्ध भए ओ राजा निमि के “ विदेह ” राजेबाक श्राप देलन्हि। वशिष्ठ क अति श्राप सँ चारूकात हाहाकार मचिगेल प्रजा लोकनि घबरा उठलाह। अराजकता क स्थिति देखि आस्थिन ऋषि गण निमि क मृत शरीर कें मथे लगलाह ओर मथला उत्तर जे शरीर उत्पन्न भेल तकर “ मिथिल” अथवा “ विदेह ” क संज्ञा देलगेल। बाद मे“जनक” नाम सँ सेहो प्रसिद्ध भेलाह।
श्रीमदभागवत : -
जन्मना जनकः सोऽभूद्धै वेह स्तु विवेहजः
मिथिलो मथनाज्जातो मिथिला येन निर्म्मिता॥
देवी भागवत: - सँ ज्ञान होइछ जे निमिक उन्नेसम पीढी मे राजर्षि सीरध्वज जनक भेल छलाह और श्रीमद - भागवत सँ ई बुझल जाइत अछि जे जनक वंशक शासक लोकनि एहेन वातावरण बना देने छलाह जे हुनक पार्श्ववती गृहस्थ सेहो सुख दुःख सँ मुक्त भ गेल छलाह। ‘विदेह’ जे कि महत्वपूर्ण कल्पना छल आर जकर प्राप्तिक हेतु लोग ललायत रहैत छल से ओहि देश क नामक संकेत से हो दैत अछि जाहिठाम जनक वंश क लोग अपन राज्य क स्थापना करने छलाह। शुक्रदेव जी ( व्यास क पुत्र ) जखन अपन पिता सँ तपश्या क हेतु आज्ञा माँगलन्हि तखन हुनका योगिराज जनक क दृष्यांत दैत ई कहल गेलन्हि जे ओ घरो मे रहिके तपस्या क सकैत छथि। शुक्रदेव जी असंतुष्ट देखि व्यास हुनका राजार्षि जनक क ओतए पठा देलथिन्ह।
देवी भागवतः - वंशेऽस्मिन्येऽपि राजा नस्ते सर्वे जनकास्तथा।
विख्याता ज्ञानिनः सर्वे वेदेहाः परिकीर्निताः॥
वर्षद्वयेन मेरूंच समुल्लङ्घ्य महामनिः।
हिमालये च वर्षेण जगाम मिथिलां पति॥
प्रविष्टो मिथिलां मध्ये पश्यंसर्यद्धैमुतम्।
प्रजाश्र्चः सुखिता सर्वाः सदाचाराः मुखन स्थताः॥
देवी मद् भागवत: - एते वै मैथिला राजन्नात्म विद्या विशारदाः
योगेश्वर प्रसादेन द्वन्दै मुक्ता गृहष्वेपि॥
मिथिला क सीमा क सबंध मे देवी भागवत मे निम्नांकित विवरण अछि।
एवं निमि सुतो राजा प्राथतोजन कोऽभवित।
नगरी निर्मिता तेन गंगातीरे मनोहरा।
मिथिलेति सुविख्याता गोपुरा हाल संयुता
धनधान्य समायुक्ताः हद्यशाला विराजिता॥
शक्तिसंगम तंत्र : -
गण्डकी तीरमारभ्य चमोआरण्यंतंग शिवे।
विदेहभूः समाख्याता तीर भुतयमिधः संतु॥
स्वद पुराण : -
गण्डकी कौशिकी चैव तयोमध्ये वरस्थलम्।
बृहद विष्णुपुराण : -
कौशिकीन्तु समारभ्य गण्डकीमधिगम्यवै।
योजनानि चतुविशंद व्यायामः परिकीर्तितः॥
गंगा प्रवाह मारभ्य यावद्धैमवतंवनम्।
विस्तारः षोडश प्रोक्तो देशस्य कुलनन्दन।
मिथिलानाम नगरी तत्रास्ते लोक विश्रुता॥
अगस्त्य रामायण : -
वैदेहोपवनस्यांते दिश्यै शान्यां मनोहरम्।
विशालं सरस्वतीरे गौरी मंदिर मुतमम्॥
वैदेही वाटिका तत्र नाना पुष्प सुगुम्फिता।
राक्षनामनलिकन्यामिः सर्वतु सुखदा शुभा॥
मिथिला क उत्तर मे हिमालय, दक्षिण मे गंगा, पूवमे कौशिकी आर पश्चिम मे गण्डकी अछि।
चन्दा झा :- गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिशि,
पूर्व कौशिकी धारा
पश्चिम बहथि गण्डकी,
उत्तर हिमवत बल विस्तारा।
प्राचीन मिथिला मे आधुनिक दरभंगा, मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, (दरद – गण्डकी देश), सहरसा, पुर्णियाँ, बेगुसराय, कटिहार, विहपुर, एवं नेपाल क दक्षिणी भाग सम्मिलित छल। नदी क प्रधानता हेवाक कारणे मिथिला के तीरभुक्ति से हो कहल गेल छैक –
वृहद विष्णु पुराण : - गंगा हिमवतोर्मध्ये नदी पञ्च दशांतरे।
तीर भुक्तिरिनति ख्यातो देशः परम पावनः॥
तीरभुक्ति नाम होएबाक निम्नलिखित कारण बताओल गेल अछि।
i. ) शाम्भकी, सुवर्ण एवं तपोवन सँ भुक्तमान
होएबाक कारणे ई तीरभुक्ति कहाओल।
ii. ) कौशिकी, गंगा आर गण्डकी क तीरधरि
एकर सीमा छलैक तै एकरा तीरभुक्ति क
संज्ञा देल गेलैक।
iii.) ऋक, यजु आर शाम तीनटुक वेद सब सँ
आहुति देवऽबला ब्राह्मण समूहक निवास
सँ त्रि आहुति अर्थात तिरहुतक नाम सँ
ई स्थान प्रख्यात भेल।
१६–१७ म शताब्दी क निव्वती यग्त्री लाभा तारनाथक विवरण मे तिरहुत कें “तिराहुति ”कहल गेल अछि। आर आयनी अकबरी मे तँ सहजहि एक विस्तृत विवरण भेटिते अछि। एतिहासिक दृष्टिकोण सँ भुक्ति शब्द प्रयोग गुप्त युग सँ प्रारंभ भेल आर शिलालेख मे एकर उल्लेख भेटैत अछि। वैशाली सँ प्राप्त कैकटा मोहर पर तीरभुक्ति शब्द क उल्लेख अछि आर संगहि कहरा सँ प्राप्त अभिलेख, नारायण पालक भागलपुर अभिलेख, वनगाँव ताम्रपत्र अभिलेख आदि सँ ‘तीरभुक्ति’ पर प्रकाश पडैयै आर ई बुझि पडैयै जे ताहि दिन मेतीरभुक्ति समस्त उत्तर विहार क धोतक छल जकरा पश्चिम मे छल आधुनिक उत्तर प्रदेश और पूव मे बंगाल। महानंदा क पश्चिम आर गण्डकी क पूव क समस्त भूमि तीरभुक्तिकहबैत छल, अहि मे कोनो संदेह नहिं। जातक मे मिथिला क क्षेत्र जे वर्णन अछि आरआयनी अम्बरी मे वर्णित तिरहुत सरकार क विवरण हमर उपरोक्त मतक समर्थन करैयै। देशक भूगोल आर सीमा राजनैतिक उथल - पुथल क कारणे बदलैत रहैत छैक आर मिथिला क राजनैतिक इतिहास मे सेहो एहेन कतैक परिवर्तन भेल छैक तथापि एकर जे एकटा साँस्कृतिक स्वरूप अछि से आविच्छन्न रूपें चलि आवि रहल अक्चिइ आर उवैह रूप एकर भौगोलिक सीमा क स्पष्ट आभास दैत अछि। प्राचीन साहित्य मे मिथिला आर जनकपुर नाम भेटैछ परञ्च गुप्तयुग सँ तीरभुक्ति नाम प्रशस्त भ गेल।
___ “ प्राग्ज्योतिषः कामरूपे तीरभुक्तिस्तु निच्छविः
विदेहा चाथ कश्मीरे ” =
लिंग पुराण :- “ तीर भुक्ति प्रदेशेतु हलुविर्त्ते हलेश्वरः ”
प्राचीन मिथिला क पुरातत्वक विश्लेषण एवं
अध्ययन अखनोधरि अपेक्षिते अछि।
नेपाल क सीमा जे सम्प्रति जनकपुर अछि तकरे प्राचीन विदेह मानल गेल अछि। सुरूचि आरगौधार जातक मे विदेह एवं मिथिला क भौगोलिक सीमा क विवरण भेटइत अछि। विदेह क चारू मुख्य फाटक पर चारिटा बाजार छल। महाजनक जातक मे तँ विदेह क राजधानी‘मिथिला’ क भव्य वर्णन अछि – मिथिला क नगरी क सोभा, वाजार आर राज दरबारक शोभा, सामान्य लोगक पहिरब, ओढब, खान, पान, रहन, सहन, सैनिक, संगठन, रथ, हाथी, घोडा, आदि एहेन कोनो अंश धुल्ल नहिं अछि जकर वर्णन ओहि मे नहिं भेटइत छै। अयोध्या सँ मिथिला पहुँचबामे विश्वामित्र कें चारि दिन लागल छलैन्ह परञ्च राजा दशरथ क ओतए जनक जाहि दूत के पठौने छलाह तकरा मात्र तीन दिन लागल छलाह। दशरथ चारि दिन मे अयोध्या सँ मिथिला पहुँचल छलाह। महावीर एवं बुद्ध क समय मे विदेहक सीमा एवं प्रकारे छल –
___ लम्बाई मे कौशिकी सँ गण्डक धरि २४ योजन –
___ चौडाई मे हिमालय सँ गंगा धरि १६ योजन –
___ मिथिला वैशाली ३५ मील उत्तर पश्चिम दिसि छल।
___ जातक क अनुसार विदेह राज्यक सीमा ३००० लीग छल, आर राजधानी
मिथिला क ६ लीग
___ मिथिला जमुद्वीप क एकटा प्रधान नगर छल।
___ सदानीरा नदी बुढी गण्डक क धोतक छल।
___ तीरभुक्ति नाम क संदर्भ मे भृंगादूत मे कहल गेल अछि –
“ गंगा तीरा वधि रधि गता यदभुओ
भृङ्गा भूक्तिनिमा सैब त्रिभुवन तले विश्रुताः तीरभुक्ति
आर शक्ति संगम तंत्र मे –
गण्डकी तीरमारभ्य चम्पारण्यांतकं
शिवे विदेहभूः समाख्याता तीरभुक्ति मिधो संतुः।
’भुक्ति’ शब्द सँ प्रान्त क ओध होइछ आर गुप्त युग मे समस्त मिथिला तीरभुक्ति नाम सँ प्रसिद्ध छल आर आहि सँ समस्त उत्तर विहार क बोध होइत छल। भोगौलिक दृष्टिये मिथिला क निम्नलिखित नाम सेहो महत्वपूर्ण अछि – विदेह, तीरभुक्ति , तपोभूमि,शाम्भवी, सुवर्णकानन, मालिनी, वैजयंती, जनकपुर इत्यादि परञ्च अहि रूप मे विदेह, मिथिला, तीरभुक्ति आर तिरहुत विशेष प्रचलित अछि। चारिम शताब्दी मे तीरभुक्ति नाम प्रसिद्ध भ चुकल छल। त्रिकाण्डशेष, गुप्त अभिलेख आर बारहम शताब्दी क एकटा अभिलेख एवं अन्य अभिलेख सब मे ‘तीरभुक्ति’ क नाम भेटइत अछि।
(iv.) मिथिला भूमि : -
सम्प्रति जे मोतिहारी, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, सहरसा, पूर्णियाँ, अररिया, बेगुसराय, आदि क्षेत्र अछि सैह प्राचीनकाल मे मिथिला, विदेह, तीरभुक्ति, कहबैत छल और वैशाली एकर अंतर्गत छल। गण्डकी सँ महानंदा आर हिमालय सँ गंगाधारक क्षेत्रक अंतर्गत मिथिला छल। मिथिला क सीमा लगभग २५००० वर्ग मील छल। हिपुए नस्मं जें ‘पूरा भारत’ क वर्णन कैने छथि ताहि मे मिथिलो ल उल्लेख अछि। मिथिला क नाम उत्पत्ति क संबध मे निम्नलिखित श्लोक प्रसिद्ध अछि –
“ निमिः पुवस्तु तत्रैव मिथिनमि महान स्मृतः
प्रथनं भुजबलेयैन त्रैहूतस्य पार्श्वलः।
निर्म्मितं स्वीय नाम्नाच मिथिलापुर मुलम्
पुरीजनन सामध्यति जनकः सच कीर्तितः ॥
(शब्दकल्पद्रूम-iii.७२३)
वृहद विष्णुपुराणक मिथिला महात्म्य खण्ड –
मिथिला नाम नगरी नमास्तं लोक विश्रुता
पंचभिः कारणैः पुण्या विख्याताजगतीत्रये
पाणिनिः- मन्यते शत्रओ यस्यां = मथ+”मिथिलादयश्च”
इति दूलच अकारस्यत्वं निपात्यते स्वनाम
ख्यातनगरी। सातु जनकराज पुरायथा। विदेहा
मिथिलाप्रोक्ता। इति हलायुधः-
मिथिला भूमि क विशेषता ई अछि जे अहिठाम नदी क बाहुल्य क कारणे जमीन उपजाउ अछि आर सब प्रकारक अन्न क खेती एतए होइत अछि। अहिठाम क जनसंख्या क विशेष भाग अहुखन खेती पर निर्भर करैत अछि। प्रतिवर्ष अहिठाम नदी क बाढि अबैत अछि, गाम घर दहा जाइत अछि, लोग वेलल्ला भजाइत अछि तथापि अपन माँटि-पानिक प्रति अहिठाम क लोक के ततेक प्रेम आर आशा तत्त छैक जो ओ एकरा तैयो छोडवा लेल तैयार नहिं अछि आर ओहि माँटि-पानि सँ सटि के रहब अपन जीवन क सार बुझैत अछि। गण्डक, वाग्मती, बलान, लखनदेई, कमला, करेहा, जीवछ, काशी, तिलयुगा, गंगा क मारि मिथिला क लोग जन्म- जन्मांतर सँ सहैत आवि रहल अछि। नदी क बिना मिथिला क भूमि क कल्पने नहिं भ सकइयै। नदी क कारणे तँ मिथिला क नामो तीरभुक्ति पडल छल कहियो। नदी मे सप्तगण्डकी आर सप्तकौशिकी क उल्लेख अछि आर एकर श्रोत नेपाल मे अछि। अवि हुनु नदी कें निमांत्रत करबाक हेतु कौशी आर गंडक योजना बनल अछि आर आन-आन नदी के पालतु बनेबाक प्रयास भ रहल अछि।
मिथिला भूमि क बनावट एकरा कैक अर्थ मे सुरक्षा प्रदान करैत छैक। एक दिसि हिमालय पर्वत छैक तँ तीन दिसि नदी आर तैं अहिठामक लोक किछु विशेष स्वभाव क होइत छथि जकर संकेत विद्यापति क पुरूष परीक्षा मे अछि। नदी क पूजा अहिठाम ओहिना होइछ जेना कोनो देवी देवता क आर सब नदी क पूजा क गीत सेहो उपलब्ध अछि। पावनि तिहार पर नदी मे स्नान करब आवश्यक बुझल जाइत अछि। अक्षय-तृतीया (वैशाख शुक्ल) क दिन नदी मे स्नान करबाक परम धार्मिक मानल गेल अछि। मिथिला क लोग अपन देश, संस्कृति, भाषा आर संस्कार क प्रति बड्ड कट्टर होइत छथि। भौगोलिक दृष्टिये मिथिला क क्षेत्र एकटा राजनैतिक ईकाई क रूप मे प्राचीन कालहिं सँ बनल रहल अछि आर तैं एकर साँस्कृतिक वैशिष्टय अखनो बचल छैक।
v) मिथिला क निवासीः-
जे केओ मिथिला अथवा मैथिल सँस्कृति सँ अपरिचित छथि हुनका ‘मिथिला’ सँ मात्र मैथिल ब्राह्मण क बोध होइत छन्हि परञ्च इ ओध हैव भ्रामक थिक कारण मिथिला एकटा भौगोलिक सीमा क धोतक थिक आर ओहि सीमा क अंतर्गत रहनिहार प्रत्येक ओहि भौगोलिक ईकाई क अंग भेलाह चाहे हुनक जाति, वर्ण, अथवा वर्ग जे हो। मिथिला क रहनिहार प्रत्येक व्यक्ति मैथिल कहौता अहि मे कोनो संदेह नहिं रहबाक चाही। धार्मिक क्षेत्रक प्रधान आर आध्यात्मिक रूपें प्रभुत्व रहला क कारणें ब्राह्मण क प्रधानता रहलैन्ह आर लगातार ७००–८०० वर्ष ब्राह्मण राजवंश क शासन रहबा क कारणें ब्राह्मण क राजनैतिक महत्व सेहो बनल रहल। ई फराक कथा जे सामान्य ब्राह्मण गरीब छथि परञ्च ई बात क सोंच जे ब्राह्मण क राज्य रहला सँ राजनीति मे ब्राह्मण के विशेष प्राधिकार भेटलन्हि आर ओ लोकनि सामंतवादी युग सँ अधावधि सब क्षेत्र मे महत्व केलन्हि। स्मरणीय जे आनवर्ण क तुलना मे मिथिला मे ब्राह्मण क जनसंख्या बहुत कम अछि।
ब्राह्मण क अतिरिक्त मिथिला मे क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र(सब प्रकार), कायस्थ, मुसलमान, ईसाई आदि सब वर्णक लोग रहैत छथि। मिथिला क विशाल क्षेत्र मे सूरी, तेली, कलवार, यादव, राजपूत, वर्ण सँ कम धनी आर शक्तिशाली नहिं छथि। मिथिला मे कतेक वर्नक लोग मध्य युग मे रहैत छलाह तकर विश्लेषण ज्योतिरिश्वर ठाकुर क वर्णरतिकर सँ भेटैछ। मुसलमानो मे सैयद , पाठान, मोमिन, शेख, आदि शाखा सम्प्रदाय क लोग क वास छैन्ह। जमीन्दार मे ब्राह्मण क अतिरिक्त, भूमिहार ब्राह्मण, राजपूत, और यादव लोकनि एक्को पैसा कम नहिं छथि। यत्र-तत्र कायस्थ लोकनि के सेहो जमीन्दारी छलैन्ह मुदा ओ लोकनि आव विशेषतः कलमफरोती मे रहि गेल छथि। मिथिला क्षेत्र मे मुसलमानो जमीन्दार कैकटा छलाह।
बाकि हिसाबे मिथिला मे मूलरूपेण दूटा वर्ग अछि – गरीब क वर्ग आर धनिक क वर्ग। जे केओ धनमान छथि (चाहे जाति कोनो होहि) ओ धनी वर्ग मे छथि – आर गरीब क वर्ग। दुनु वर्ग क बीच संघर्ष चलि रहल अछि। जमीन्दारी उठला क उपरांत ई संघर्ष आर तीव्र भगेल अछि कारण आर्थिक हिसाबें मिथिला तुलनात्मक द्रष्टिये विशेष शोषित आर पीडित अछि। उत्तर भारत क अन्नागारक पदवी सँ विभूषित रहितहुँ मिथिला क सामान्य लोग कें अहुँ खन पावभरि क अन्न आर पाँच हाथ क वस्त्र नहिं भेटैत छैक आर ओ अपन पेट भरवा क लेल चारू कात बौआइत रहैत अछि। मिथिला क निम्नवर्ग क सामाजिक श्रृखंला करीब-करीब टुटि चुकल अछि आर ओ शोषण यंत्र मे नीक जकाँ पीसा रहल अछि। ई स्थिति आव क्रांति क आह्वान जहिया करे।
मिथिला क उत्तरी आर उत्तर-पूर्वी सीमा पर इण्डो-मंगोलाइड जाति क लग से हो बसैत छथि जे घास कहबैत छथि। हुनका लोकनि कें रहन-सहन अहुखन पुराने छन्हि यद्धपि ओ लोकनि परिश्रम करबा मे ककरो सँ कम नहिं छथि। शुद्ध मे शुद्ध आर अशुद्ध(अछूत) दुनु तरहक लोग अवैत छथि। डोम, चमार, दुसाध, मुशहर, हलाल खोर, धानुक, अमाढ, केओट, कुरमी, कहार, कोइरी आदि सेहो पर्याप्त संख्या मे मिथिला मे वसैत छथि। जनसंख्या कहि सवें यादव सब सँ आगाँ छथि, दुसाध, कोइरी, चमार, कुरमी आदि क जनसंख्या जोडि देला सँ तथाकथित पिछडावर्गक जनसंख्या तथाकथित अगुआवर्गक जनसंख्या सँ वेसी अछि। जनगणना क आधार पर निम्नलिखित जातक ज्ञान होइछ –
___ गोप(यादव), ब्राह्मण, राजपूत, दुसाध, कोइरी, चमार, शेख, भूमिहार, कुर्मी, मल्लाह, जोलहा, तेली, कन्दु(कानू), नोनिया, धानुख, मुशहर, तांती, कायस्थ, धोबी, कलवार, केओट, सोनार, कहार, कुँजरा, सुनरी, पठान, हलवाइ, तमौली, इत्यादि – ॥
जगदीश मंडल
उपन्यास:
जीवन संघर्ष :ः 1
कातिकक अन्हरिया पख। रौदियाह समय भेने जेठक रौद जेँका रौद तीख। उम्मस सेहो। दस बजेक उपरान्त बाध-बोन मे रहब कठिन। तेँ सवेर-सकाल सब चलि अबैत, मुदा घरो पर चैन कहाँ। माथ परक पसीना नाक पर होइत टप-टप खसैत आ देहक पसीना स कपड़ा भीजैत। मन औल-बौल करैत। आठमे दिन दिवाली, तहू मे काली-पूजा करैक विचार सेहो सैाँसे गैाँवा मिलि के क लेलक। दुनू अमबसिये दिन। ओना दिवाली एक दिना पावनि होइत मुदा काली पूजा धूम-धाम से मनबैक विचार भेने, पाँचो दिन सब अपना-अपना ऐठाम दीप जरवैक विचार क लेलक। सब अप्पन-अप्पन घर-आंगनक टाट-फड़क स ल’ क’ जते-जते गामक रस्ता-पेरा टूटल अछि ओकरो सरिअवै मे लागि गले। गाम मे पहिल बेरि काली-पूजा सेहो हैत तेँ सब वयस्त। सब मे तजगर उत्साह। अप्पन-अप्पन खेती-बाड़ी छोड़ि सब नीक जेँका ओहि काज मे भीड़ल। ओना खेत मे हालोक कमी किऐक त अधा भादो मे जे एकटा मझोलका अछार भेल तइ दिन से एक्को बुन बरखा नई भेल, खेत मे दरारि फाटि गेल। उपरका खेतक धान मरहन्ना भ’ गेल। केकरो-केकरो गरमा धान जे अगता रोपने छल, ओकर कम दिनक धान रहने सोलहन्नी, मुदा जे वेसी दिनक गरमा धान अछि ओ अधा-छिधा। पूजाक पैघ आयोजन तेँ विषेष वयवस्थाक जरुरत। मुदा लोकक उत्साहे तते जे कोढ़िला बोझ जेँका काज के बुझैत। अनठौला से हल्लुको काज भारी भ जाइ छै, मुदा उत्साहित भ केला से भारिओ काज हल्लुके बनि जाइ छै।
आइ तक अइ गाम मे(बँसपुरा मे) ने कहियो कोनो यज्ञ-जाप भेल आ ने कोनो पूजा-पाठ। तेँ इलाकाक लोक वँसपुराके पपीयाहा गाम बुझैत। ओना गोटे-गोटे साल, महावीर जी स्थान मे, अष्टयाम कीर्तन भ’ जायत। ओहो नियमित नहि। जइ साल उपजा-बाड़ी नीक होइत ओइ साल उत्साहित भ’ सब कीर्तन क लैत, मुदा जइ साल रौदी वा दाही भ जाइत तइ साल अष्टयामो या त रौदिया जाइत वा दहा जाइत। बेकता-बेकती कहियो काल भनडारा सेहो क लइत। अइ बेर काली पूजा करैक विचार सैाँसे गामक लोक मिलि क’ केलक। मेलो धुमधाम से हैत। पाँच दिनक मेला। नाच-तमाषा स ल’ क’ दोकान-दौरीक नीक व्यवस्था हैत। गाम मे काली-पूजा हैत, तेँ लोक मे विषेष जिज्ञसो आ उत्साहो। भिनसर से खाइ-पीवै राति धड़ि सब यैह चर्चा करैत। काली-पूजाक प्रति लोकक मन एते उड़ि गेल जे सब अप्पन-अप्पन काज-राज छोड़ि, अही पाछू बेहाल। मालो-जालक आ खेतो-पथारक भार स्त्रीगणे पर पड़ि गेल। मुदा ओहो सब खुषी। किअए खुषी? खुषी अइ दुआरे जे हम्मर घरबला धरमक काज मे लागल छथि, जे हमरो हैत। ओना दिवाली, एक दिना पावनि अदौ स होइत आयल, भलेही दिवालीक प्रात गोधन पूजा, दोसर दिन भरदुतिया-चित्रगुप्त पूजा होइत, मुदा एक-दोसर स अलग-अलग होइत। दषमी(दुर्गापूजा) जेँका नहि जे सप्तमी क’ भगवती केँ आखि(डिम्भा) पड़िते मेला शुरु भेल आ नेने-नेेने एक्के बेर जतरा दिन उसरल। मुदा अइबेर बँसपुराक दिवाली के काली-पूजा रंग चढ़ा देलक। किऐक त सब अपना मे विचार क लेलक जे जाबे तक काली पूजाक मेला चलत ताबे तक सब अप्पन-अप्पन घर-आंगन, दुआर-दरवज्जा स ल क’ पोखरिक घाट, इनार चापाकल, माल-जालक खूँटा पर सेहो दीप जरौत।
गाम मे काली पूजा किअए हैत? तेकर कारण भेल। कारण इ भेल जे बँसपुरा से सटले(डेढ़ कोस पर) सिसौनी मे पच्चीसो बर्ख से दुर्गा-पूजा होइत अबैत अछि। चरिकोसीक लोक(मरद-मौगी) दुर्गा-पूजा देखै सिसौनी अबैत। अप्पन-अप्पन कबुला-पाती सेहो चढ़वैत आ मेलो देखैत। साँझो दैत। बलि प्रदान सेहो करैत। बलि-प्रदान मे सिसौनीक दुर्गा नामी। किऐक त एते बलि प्रदान कतौ ने होइत। किलो भरि-भरि छागरक दाम पँच-पँच सौ भ जाइत। अइ बेरक पूजा मे एकटा घटना घटल। घटना इ जे बँसपुराक एकटा अठारह-बीस बर्खक लड़की के, पूजा कमिटीक तीन गोटे, बलजोरी पकड़ी क’ भंडार घर ल जा भरि राति रखि लेलक। राति मे ते कियो ने बुझलक, मुदा भिनसर मे जखन ओइ लड़की के छोड़लकै आ लड़की कनैत-कनैत गाम पहुँचि सब के कहलकै तखन जना सबहक(जे सुनै) देह मे आगि लगैत गेलै। लड़कीक माए बताहि जेँका जोर-जोर से सरापबो करै, गारियो पढ़ै आ घर से फरुसा(फौरसा) निकालि सोझे सिसौनी दिसक रस्तो पकड़लै। साड़ीक अँचरा क’ उलटा पीठि पर बान्हि, जना सन मे सिपाही जाइत, तहिना विदा भेलि। लड़कीक बापो तहिना मुरेठा बान्हि हरोथिया लाठी ल अनधुन गरिअबैत, स्त्रीक पाछु-पाछु विदा भेल। मुदा समाजक मरदो आ जनिजातियो दुनू केँ पकड़ि क’ रोकलक। जेना-जेना समाचार पसरैत तेना-तेना गाम दलमलित हुअए लगल। रंग-बिरंगक गप-सप, गाम मे चलै लगलै। कियो बजैत जे चलै चलू सिसौनी मे आगि लगा सैाँसे गाम क’ जरा देब। त कियो बजैत जे सैाँसे गाम के लुटि सबहक बहू-बेटी क’ पकड़ि घिसिया क ल आनब। कियो कहैत जे ओइ सार(कमिटीक सदस्य) के खून क देब। मुदा इ सब विचार खुदरा-खुदरी छल, सामूहिक नहि। गामक बुद्धियार लोक सब सबके शान्ति करै मे लगल। एक्के-दुइये, गामक सब(मरद-मौगी) सड़क पर आबि थहा-थही करै लगल। मेला जेँका लोक सड़क पर भ’ गेल। ककरो-ककरो हाथ मे लाठी त ककरो-2 हाथमे भाला त ककरो-2 हाथ मे तीर-धनुष सेहो। गाम मे सबसे अधिक उमेरक मखन बाबा। नब्बे बर्ख से उपरे उमेर। हाथ मे फराठी नेने, देह थरथराइत, टुघरल-टुघरल आबि आखि उठा के देखलनि ते बुझि पड़लनि जे आइ दुनू गामक बीच मारि हेबे करत। केमहर से के मरत, तकर ठेकान नहि। मन पड़लनि, जे एहिना एक बेरि जूरषीतल मे एकटा नढ़िया खातिर बेला आ मैनहीक बीच मारि भेल, जइ मे तीनि टा खूनो भेल आ कते गोरे के जे जाँघ टुटलै, से जिनगी भरि ठाढ़ नै भेल। हो न हो कहीं आइयो ओहिना ने हुअए। फेरि मन मे भेलनि जे सबके मनाही क’ दियै। मुदा फेरि भेलनि जे हम्मर बात मानत के। विचित्र गुन-धून मे मखन बावा। थोड़े आगू बढ़ि मखन बाबा देखलनि जे जेस्त्रीगण आ मरदो धाक करै अए ओहो सब सोझे मे निधोक अन्ट-सन्ट बाजि रहल अछि। लाज-धाकक कोनो बिचारे नै। मन मे एलनि जे जहिना आगि मे जरैत लकड़ी पर पाइन देला से आगि त मिझा जाइत मुदा आगिक ताव(गरमी) त रहवे करैत। तहिना त लोकोक बीच हैत। गुन-धुन करैत मखन बाबा फराठी बले बीच रास्ता पर ठाढ़ भ, ने आगू बढ़ैत ने पाछु होइत। अपन दायित्व बुझि आ(मखन बावा) एक हाथ से फराठी पकड़ने आ दोसर हाथ उठा, सबके शान्त रहै ले कहथिन। मुदा हुनकर अवाजो आ हाथक इषारो भीड़ मे हरा जाइत। सब अपने सूरे। थोड़े आगू बढ़ि मखन बाबा पाछु घुरि तकलनि ते देखलखिन जे एते काल चेतने लोक सब के देखै छेलियै, आब ते जेरक-जेर धियो-पूतो सब आवि रहल अए। गामक जते कुत्ता अछि सेहो सब नाङरि डोला-डोला भुकै अए। एक त देहक अब्बल दोसर मन मे चिन्ता, बीचे रस्ता पर फराठी रखि मखन बावा वैसि, दुनू हाथ माथ पर ल सोचै लगलथि। मन एलनि जे घटना भेल अछि ओ त इज्जत स जुड़ल अछि। तेँ जँ लोक जान द बँचवै चाहै अए ते नीके करै अए। मुदा गामक भीतर त ऐहेन-ऐहेन किरदानी सब दिन होइ अए। तखन कहाँ कोइ किछु बजै अए। तइ काल मे छौँड़ा-छौउड़ीक खेल भ जाइ अए। इ बात मन मे अबिते मखन बावाक मुह स हँसी निकलल। हँसैत मखनबावा सोचलनि जे एक्के तरहक काज ले सैाँसे गामक लोक मारै-मरै पर तैयार अछि आ दोसर ठाम छउरा-छउरीक खेल बना दैत अछि। अजीव अछि लोकोक बुद्धि आ विचार। जँ एकरा इज्जति बुझै छै ते इज्जत बना राखह, नै जे खेल बुझै अए ते खेल बुझह। मुस्की दैत ओ सबसे आगू जा रास्ता पर पइर रहलाह। पड़ल-पड़ल कहै लगलखिन- ‘‘अगर तू सब अइ से(अपना के चेन्ह बना) आगू बढ़बह ते हम एतै परान गमा देब। नै ते अखैन शान्त हुअअ बाद मे रस्ता से जबाव देवइ।’’
मखन बाबाक बात सब मानि गेल। सब शान्त भ गेल। स्त्रीगण सब घर दिसक रास्ता धेलक। धीरे-धीरे लोको पतड़ाए लगल। बाकी जे लोक रहल ओ हुनका(मखन बाबा) लग जा पूछलकनि- ‘‘बाबा, कोना जबाव देबइ?’’
उत्साहित भ मखन बाबा कहलखिन- ‘‘अखन ते नहाइ-खाइ बेर भेल जाइ अए, तेँ अखन नहि। चारि बजेे मे सब कियो एक ठाम बैइसू। जे करैक हैत से सब विचारि के क लेब।’’
सैह भेल।
चारि बजे सब ब्रह्मस्थान मे बैसल। सबहक विचार एक दिषाहे। दू पार्टी(पक्ष-विपक्ष) रहला से बैसारक रुप अलग होइत, मुदा से त नहि अछि। अप्पन-अप्पन विचार के सब जोर-जोर से बाजि-बाजि रखै चाहैत। जइ से ककरो कियो बाते ने सुनैत। सब अपने सुरे अपन बात रखै मे बेहाल। बजैत-बजैत जब सबहक पेटक बात सबटा निकलि गेलै तब अपने सब चुप भ गेल। चुप भ सब सबहक मुह देखै लगल। होइत-हबाइत सब मखन बाबा केँ कहलक- ‘‘बाबा, अहाँ जे निर्णय करब, हम सब मानि लेब।’’
सबहक विचार सुनि मखन बावाक मन मे संतोष भेल। ओ अपन विचार दइ ले ठाढ़ भेला। मुदा बुढ़ापाक चलैत दुनू जाँघ थरथर कपैत। थरथराइत जाँघ देखि सब कहलकनि- ‘‘बैसिये के कहिऔ बाबा।’’
मुदा बैसि के कहला से सब सुनत की नहि, इ बात मन मे होइन। ठाढ़े-ठाढ़ अप्पन दुनू जाँघ के असथिर करैत मखन बावा कहै लगलखिन- ‘‘दू गामक झंझट असान नै होइत। दू गोटेक बीचक झंझट नइ छी। जहिना तू सब कहै छहक तहिना ते ओहू गामक लोक सब कहतै। अखन ते एक्के गोरेक संग घटना घटल अछि मुदा झंझट बढ़ौला से ऐहेन-ऐहेन कते घटना घटत। मारि करै जेबहक ते तोँहू मारबहक तोरो मारतह। तोँहू कपार फोड़बहक तोरो फोड़तह। हाथ-पाएर तोँहू तोड़बहक तोरो तोड़तह। अखन ने बुझि पड़ै छअ जे सोलहन्नी हमही सब मारबै आ ओ सब माइर खायत। मुदा माइर मे से थोड़े होइ छै। दुनू दिसक लोक मारबो करै छै आ माइरियो खाइ अए।’’
मखन बाबाक विचार सुनि सब मूड़ी डोला-डोला सोचै लगल। सब सब दिस तकैत। सबहक मन मे बिचारक गंभीरता अवै लगलै। मुदा तइओ मन मे सोलहन्नी क्रोध नै मेटेलै। मुदा मनक विचार मे गजपट हुअए लगलै। कखनो शान्तीक रास्ता मन मे जोर पकड़ै ते लगले मारि-दंगाक विचार। लगले मन मे खुषी अबै ते लगले तामस उठै। सबहक मुहक रुखि देखि मखन बावा आगू कहै लगलखिन- ‘‘गामे मे की देखै छहक? जे कने हुबगर अछि ओ गरीब-गुरबाक संग केहेन बेवहार करै अए। तहिना गामोक होइ छै। अप्पन गाम(वँसपुरा) भीतर मे फोंक अछि। देखते छहक जे सब अपन-अपन नून-रोटी मे भरि दिन लगल रहै अए। ने अपना पेट से छुट्टी होइ छै आने अनकर आ कि समाजक कोनो चिन्ता रहै छै। तेही ले बेइमानी-सयतानी सेहो करै अए। सब मिलि के कोनो समाजिक काज करी, इ विचार ककरो मे मन छइहे नहि। ओना सिसौनीयो मे बेसी नहिये छै मुदा अपना गाम से थोड़े बेसी जरुर छै। किऐक त सब मिलि दुर्गा पूजा क लइ अए। जइ से साल-भरिक जे रुसा-फुल्ली रहै छै, ओ कमि जाइ छै। तेँ समाज के आगू बढ़ैक लेल दसनामा(सर्वजनिक) काज जरुरी अछि। जाबे तक लोकक मन मे दसनामा काजक प्रति सिनेह नइ आओत(औत) ताबे तक समाज आगू मुहे कोना ससरत? अइ नजरि से देखला पर बुझि पड़तह जे अपना गाम(बँसपुरा) से सिसौनी थोड़े अगुआइल अछि। सिसौनियो से अगुआइल अछि बरहरबा। किऐक त ओइ गाम(बरहरबा) मे दुर्गो-पूजा होइ छै आ पढ़ै-लिखै ले हाइयो स्कूल तक छै। बरहरबो से अगुआइल कटहरवा अछि। ऐखते छहक जे कटहरबा मे हाइयो स्कूल छै, अस्पतालो छै आ साल मे एक बेरि सब मिलि के चारि दिनक मेला सेहो काली-पूजा मे लगा लइ अए। यैह सब काज गामके आगू बढ़ैक रास्ता छी। जइ गाम मे जते बेसी दसनामा काज हैत ओइ गामक लोक मे ओते बेसी प्रेम बढ़त जखने लोकक बीच प्रेम बढ़त तखने छोट-छीन बात ले झगड़ा-झंझट कमत। झगड़ा-झंझट की होइछै? देखबे करै छहक जे सदिखन एक-दोसर मे गारि-गरौबलि, मारि-मरौबलि होइते रहैछै। जखने लोक झूठ-फूस मे ओझराइये तखने ओकर घरक काज(खेती-बाड़ी, माल-जालक सेवा) मारल जाइ छै। जखने आमदनीक काज मरल जेतइ तखने चारु कात से अभाव दौड़ल औतै। अभाव तेना भ क’ पकैड़ लेतै जे ओ बेवस भ जायत। जखने बेवस हैत तखने दुनिया मे अन्हार छोड़ि इजोत देखबे ने करत। तेँ जरुरी अछि जे लोकक मन दसनामा काज दिस बढ़ै। जइ गाम मे जते दसनामा काज हैत ओ गाम ओते तेजी से आगू बढ़त।’’
मखन बाबा बजिते छल कि सब अपना मे कन-फुसकी करै लगल। कन-फुसकी एते हुअए लगलै जे सबहक धियान मखन बाबाक विचार स हटि अपना दिस भ गेल। लोकक धियान हटैत देखि मखन बाबा ठाढ़े-ठाढ़ सोचै लगल जे भरिसक सबहक मन मे कोनो नव विचार उपकलै। बैसले-बैसल जोगिनदर जोर से बजै लगल- ‘‘दुर्गा-पूजा ते आब परुका(पौरकाँ) साल हैत, मुदा काली-पूजा त लगिचाइल अछि। तेँ हम सब आइये संकल्प ली जे हमहू सब काली-पूजा गाम मे करब।’’
जोगिनदरक बात सुनि सब कसि क’ थोंपड़ी बजा समर्थन देलक। अही प्रतिक्रियाक फल थिक गाम मे काली पूजा। ओना रौदीक चलैत गामक किसान आ बोनिहारक दषा दयनीय, मुदा सिसौनीक घटना लोकक उत्साह केँ एते ने बढ़ा देलक जे बोनिहारो सब एकावन-एकावन रुपैया चंदा अपने-अपने मुहे गछै लगल। बोनिहारक चंदा किसान के मुसकिल मे द देलक। मुदा एक त समाजक संग चलैक सवाल दोसर आइ धरिक परिवारक प्रतिष्ठा केँ बँचबैक, तेसर नव काज गाम मे भ रहल अछि, तइ मे पाछू हटब, उचित नहि। एक्के-दुइये किसानो सब उत्साहित भ गेल। एक स्वर से सब समर्थन द देलक। सबकेँ उत्साहित देखि प्रेमलाल ठाढ़ भ बजै लगल- ‘‘भाइ लोकनि, अपना गामक बहू-बेटी आन गामक मेला मे जा बेइज्जत होइ अए। एकर की करण छै? एक कारण अछि जे अपना गाम मे कोनो तेहेन काजे ने होइ अए। जखने अपनो गाम मे तेेहेन काज हुुअए लगत ते अनेरे ओहू सब गामबला के दहसति हेतइ जे जँ हमसब ओइ गाम(बँसपुरा) वला के किछु करबै ते ओहो सब ओहिना करत। जखने बराबरीक बिचार मन मे औते तखने चालि-ढालि बदलतै। जखने चालि ढालि बदलतै तखने सब बराबरीक रास्ता धरत। जँ से नइ करत ते हमहूँ सब ओहिना करबै जना ओ सब करत।’’ कहि प्रेमलाल बैसि रहल।
प्रेमलाल के बैसिते फेरि सब कन-फुस्की शुरु केलक। कनफुसकी एते हुअए लगलै जे सौजनिया भोज जेँका हल्ला बुझि पड़ै। कनफुसकी देखि छीतनलाल उठि क’ ठाढ़ भ खिसिया के बजै लगल- ‘‘देखू, गल्ल-गुल्ल केने किछु ने हैत। सिसौनीवला सबके एते गरमी किएअ चढ़ल रहै छै से बुझै छियै? ओ सब दस हजार रुपैआ खर्च क क’ दुर्गा-पूजा क लइ अए, तेँ। ओकरा सब के बुझि पड़ै छै जे अइ परोपट्टा मे हमही सब टा पुरुख छी। हमरे सब टा के रुपैआ अछि आ आन-आन गाम वला मौगी छी, ओकरा सव के रुपैआ छइहे नै। तेँ पुरुख बनि ओकरा सबके जबाव दिअए पड़त। ओ सब दस हजार रुपैया दुर्गा-पूजा मे करै अए हम सब पचास हजार रुपैया खर्च क क’ काली-पूजा करब। जँ सवैया-डयोढ़ा काज करब ते ओ सब मद्दिये ने देत। किऐक ते पच्चीस बर्ख से ओकर मुह अगुआइल छै। एक बेरि समधानि के दबैक काज अछि। तेँ तेना के दाबैक कोषिष करु जे ओ सब बुझत हमरो दादा कियो अछि। एक बेरि हरदा बजबैक अछि। तेँ, भने अखन सब बैसिले छी, अखने पूजा कमिटी बना लिअ। पूजा कमिटी मे सब टोल आ सब जाइतिक सदस्य बना लिअ। जँ सब टोल आ सब जाइतिक सदस्य नइ बनाएव ते अनेरे लोकक मन मे अनोन-विसनोन हुअए लगतै। ततबे नइ, सब जाइतिक सदस्य भेने काजो मे असान हैत किऐक त सब तरहक काज करैक लेल अनुभवी लोक भेटि जायत।’’
छीतन लालक कारगर विचार के सब एक मुहरी समर्थन देलक। कमिटी बनै लगल। सब टोल आ सब जाति मिला क एक्केस गोटेक कमिटी बनि गेल। एक्कैसो सदस्य बैसार मे। सब नौजवान। एक्के बेरि सब अपना-अपना जगह पर ठाढ़ भेल। सैाँसे गामक सब आखि उठा-उठा के बेरा-बेरी एक्कैसो के देखलक। एक्कैसोक मन मे खुषी जे हमसब परिवार स आगू बढ़ि समाज मे एलौ। तेँ सब मुस्कुराइत। एक्कैसो गोटे एक दिषि बैसल आ शेष समाजक दोसर दिस। किऐक त कमिटीक लेल अध्यक्ष, उपाध्यक्ष आ कोषाध्यक्षक जरुरत होइत। अध्यक्ष के बने? अइ सवाल पर सब सबहक मुह देखै लगल। किऐक त गाम मे पहिले-पहिल कमिटियो बनि रहल अछि आ तेकर अध्यक्षो बनत। तेँ जहिना अध्यक्ष बनैक इच्छा सबहक मन मे, तहिना अनभुआर काज बुझि डरो। गुनधुन करैत रघुनाथ अप्पन पितिऔत भाइ, देवनाथक नामक प्रस्ताव अध्यक्षक लेल केलक। देवनाथक परिवार गाम मे सबसे अगुआइल। अगुआयल अइ माने मे जे जाइतियो पैघ आ धनो बेसी। दोसर गोरेक नामक प्रस्ताव नइ देखि मंगल उठि क’ ठाढ़ भ अप्पन नाम अध्यक्षक लेल रखलक। जखने दू गोरेक नाम एलै कि बैसार मे गुनगुनी शुरु भेल। जाइतिक मामला मे मंगल पछुआइल।
देवनाथ आ मंगल, गामक स्कूल स ल क’ काओलेज संगे-संग पढ़ने। ओना पढ़ै मे मंगल तेज मुदा रिजल्ट देवनाथक नीक होय, किऐक त देवनाथ धुड़फन्दा। जना-जना दौड़-बरहा क क’ नीक रिजल्ट आनि लिअए। मंगलक नाम सुनि दुनू भाइ-देवनाथ आ रघुनाथ आखिक इषारा से गप-सप करै लगल। कनिये कालक बाद रघुनाथ, मंगल के पलौसी दैत कहलक- ‘‘भैया, हमरा लिये जेहने अहाँ तेहने देवनाथ भैया। अहूँ दुनू गोरे संगिये छी। संगे-संग पढ़नौ छी। तेँ हम कहब जे देवनाथ भैया के अध्यक्ष आ अहाँ उपाध्यक्ष बनि पूजा-कमिटी चलाउ।’’
मंगलक मन मे सिर्फ कमिटिये चलवैक बात टा नहि, समाज के आगू मुहे बढ़वैक विचार सेहो। बच्चे से देवनाथक चरित्र के मंगल देखने। मुदा समाज त पोखरिक पाइनिक सदृष्य होइत। जहिना पोखरि मे गोला फेकला से पाइन मे हिलकोर उठैत मुदा रसे-रसे असथिर होइत, पुनः पहिलुके रुप मे चलि अबैत। जे बात मंगल जनैत। मंगलक मन मे एकटा आरो बात घुरिआइत। ओ बात इ जे एक दिन(करीब तीनि साल पहिने) एकटा गामेक लड़की संग देवनाथ दुरबेवहार करैत रहए। ओहि समय मंगल हाट स अबैत छल। ओ लड़की मंगल के देखि कानि-कानि देवनाथक संबंध मे कहलकै। मंगलक तामस बेकावू भ गेलै। देवनाथ के बिना किछु पुछनहि चारि-पाँच थापर गाल मे लगा देलक। थापर लगौलाक उपरान्त तामसो कमलै। डर से देवनाथ थर-थर कपैत। ओना मंगलो थरथराइत। मुदा तामसे। मंगल देवनाथ के कहलकै- ‘‘बच्चा से अखन धरिक संगी छेँ छोड़ि दइ छियौ, नइ ते समाजक बेटी संग अतियाचार केनाइ केहेन होइ छै, से सिखा दैतियौ।’’
दुनू हाथ जोड़ने देवनाथ आगू मे ठाढ़। जिनगी भरि(अखन धरिक जिनगी) जे देवनाथ हँसी-मजाक से ल क’ सब रंगक बात मंगलक संग करैत आइल छल, ओइ देबनाथ के आइ मुह स बकार नै निकलि रहल छै। जहिना बोली थरथराइत तहिना करेज। जेना कोनो अपराधी न्यायालय मे न्यायाधीषक आगू अपना के बुझैत तहिना मंगलक आगू मे देवनाथ। आखि से नोर बहबैत देवनाथ दुनू हाथ जोड़नहि बाजल- ‘‘भैया, हम जे केलौ से पौलौ। संगी होइक नाते एकटा बात कहै छिअह जे अइ घटना के तीनि आदमी छोड़ि चारिम नै बुझै।’’
हँसैत मंगल कहलकै- ‘‘आइ कान पकड़ि ले जे ऐहेन काज समाजक बहीनि-बेटीक संग जिनगी मे कहियो ने करब। समाजक ककरो बहीनि वा बेटी समाजक होइ छै। जाबे तक ओकर विआह-दुरागमन नै भेल रहै छै ताबे तक ओ माए-बापक ऐठाम रहि समाजक बीच रहै अए, तकर बाद त ओ सदा-सदाक लेल समाज छोड़ि दोसर समाज मे मिलि जाइ अए।’’
यैह बात मंगलक मन मे घुरिआइत।
रघुनाथक बात के जबाब दैत मंगल कहै लगलै- ‘‘बौआ रघु दसनामा काजक(सार्वजनिक काजक) शुरुआत गाम मे भ रहल अछि। मुदा समाज त टुकड़ी-टुकड़ी भ छिड़िआयल अछि। तेँ सबसे पहिने ओइ टुकड़ी सब केँ बीछि-बीछि समेटए पड़त। जँ से नै हैत त स्वस्थ समाजक निरमान(निर्माण) कन्ना हैत। अखन धड़िक जे समाजक ढाँचा रहल ओ बेढ़ंग अछि। ओहि बेढ़ंग के ढंगर बनबैक अछि। जाबे तक से नै हैत ताबे तक वेइमान, शैतान, गुण्डा, बदमाष समाज पर हावी रहत। जाबे धरि ओ तत्व हावी रहत ताबे तक समाजक असली करता लुटाइत रहत। कमाइत कोइ आ खाइत कोइ। जे होइ अए। तेँ दसनामा काज मे समाजक बच्चा-बच्चा के बराबरीक हिस्सा हेवाक चाहियै। मुइल-टूटल कियो किअए ने हुअए मुदा ओकरा मन से इ बात निकलि जेबाक चाही जे इ काज(दसनामा) हम्मर नै फलनाक छियै। हम मात्र करैवला छी, करबैवला नहि। इ बात सत्य जे हमरा सबहक बाप-दादा हर जोतैत आयल जे हमहू सब करै छी। तहिना कियो मोटा उठबैत आयल, त कियो अप्पन श्रम के दोसराक हाथे बेचैत आयल। कियो पालकी उठबैत आयल ते कियो ढोल-पीपही बजवैत, नीच-स नीच काज हमरा सबहक बाप-दादा से समाजक किछु गोटे करवैत आयल, अखनो करबै अए। की हमरा शरीर मे ओ शक्ति नै अए जे ओकरा बदलि सकब। आजुक समयक इ मांग भ गेल अछि। तेँ नजरि स काज के आगू बढ़ौल जाय। अखन गामक सब बैसल छी तेँ आइये अइ बातक निरनय(निर्णय) भ जेवाक चाही। हम नइ चाहै छी गाम मे दसनामा काज नइ हुअए। मुदा जना आन-आन गाम मे देखै छी तना नै हुअए देब। जँ से हैत ते हमहू सब फुट भ दोसर जगह(ठाम) पूजा करब।’’
मंगलक बात सुनि सब चुपचुप भ मने-मन सोचै लगल। सबहक मन मे सब बात अँटबो ने करै। किऐक त अखन धरि जइ काजक अभ्यस्त भ गेल अछि आ आखिक सोझहा मे आन-आन गाम मे देखै अए, वैह बात मन मे नचैत। मुदा मंगलक विचार नव मनुक्ख, नव समाजक लेल अछि।
सबकेँ चुप देखि मंगल दोहरा क’ बाजल- ‘‘जहिना नव घर बनवै ले पुरान घर के उजाड़ै पड़ै छै। जँ से नै उजाड़त ते नवका घरक नीब(वुनियाद) कोना देत। अगर पुरने घरके नव ढंग से बनवै चाहत ते ओ नव घर नहि, पुरना घरक मरम्मत हैत। सब कियो देखै छियै जे जते-कतौ दुर्गा-पूजा वा काली पूजा होइ अए, ओइ ठाम मुरती कुम्हार बनवै अए। जे माइटिक काज छियै। मुरती बनबैक लेल चाल बढ़ही बनवै अए। घर गरीब-गुरबा बनवै अए। मुदा सब काज भेला ओ पूजाक हकदार कोन बात जे स्थानक भीतरो जेवाक अधिकारी नइ रहै अए। इ विषमता अखन धरि समाज मे अछि। तेँ हम ताबे तक विरोध करैत रहब जाबे तक इ विषमता मेटा जायत। हमर अध्यक्ष बनैक लिलसा नइ अछि, मुदा विषम के सम बनवैक जरुर अछि। तेँ हम कहब जे जते गोटे जते टोल आ जाइतिक छी ओ सब अपना-अपना मे विचार क निर्णय करु।’’
मंगलक बात सुनि सबहक मन मे द्वन्द्व उत्पन्न हुअए लगल। किऐक त समाजक अधिकांष लोक परजीवी बनि गेल अछि। परजीवी अइ माने मे जे कियो दोसराक कमाइ लुटि वा ठकि के जीवैत अछि। ते कियो दोसराक बले(जना कोट-कचहरीक पैरवी, थाना-बहाना, खरीद-विक्री, डाॅक्टर-वैद्य। ...?) जीवैत अछि। तेँ एक-दोसर स टूटै नहि चाहैत अछि। जे समाजक विषमताक जड़ि छी। पैइच-उधार, लेन-देन, एकर मुख्य अंग छियै। बड़ी काल धरि बैसार मे गुन-गुन, फुस-फुस होइत रहल। परोछ मे त उचित बात बजनिहारक कमी नहि मुदा सोझा-सोझी कियो नहि। एकरो दू कारण छैक। पहिल बुधियार लोक अनका कन्हा पर बन्दूक रखि चलबै चाहैत आ बूड़िबक डरे नै बजैत।
गुन-गुन, फुस-फुस होइत देखि मंगल बुझि गेल। मन पड़लै बुद्धदेवक ओ बात- जे बीणाक तार के ओते नै कड़ा कड़ी जे टुटि जाय आ ने ओते ढील राखी जे अवाजे ने निकलै। तेँ किछु इम्हरो आ कुछ ओम्हरो से(अर्थात् मध्य स) ल क’ डेग उठेबाक चाही। उठि क’ ठाढ़ भ बाजल- ‘‘हम अप्पन नाम वापस लइ छी। देवनाथे अध्यक्ष हेता। मुदा आइ स ल क’ जावे धरि पूजाक प्रकरण समाप्त नहि भ जायत ताबे तक सब काजक निर्णय कमिटीक बीच हैत। जँ कियो अपना विचारे बलधकेल कोनो काज क समाजक नोकसान करत त ओकर फैसला समाजक बीच हैत।’’
कहि मंगल बैसि गेल। मंगल क’ बैसिते देवनाथ उठि क’ ठाढ़ भ बजै लगल- ‘‘जिनगी मे पहिले-पहील दिन समाजक काज(सार्वजनिक) करैक मौका भेटल, तेँ मन मे बहुत खुषी अछि। मुदा हमहू त अनाड़िये छी, तेँ भुलचुक हेबे करत। हम चाहब जे पूजा-प्रकरणक जे मुख्य-मुख्य कार्य अछि ओ समाजेक बीच तय-तसफिया भ जाय। जहि स समाजक नजरि मे सब बात रहत।’’
बहुत बढ़िया! बहुत बढ़िया बात देवनाथ कहलक। आइये(अखने) पूजाक मुख्य-मुख्य काजक निर्णय हम सब मिलि के क ली। तर्क-वितर्क हुअए लगल। तर्क-वितर्क होइत-होइत निर्णय भेल-