मिथिलाक इतिहासक अध्ययनक साधन
भारतीय इतिहासक अध्ययनक हेतु जतवा जे श्रोत उपलब्ध अछि तकर शतांशो मिथिलाक इतिहासक हितु नहिं अछि। मिथिलाक दुर्भाग्य इहो जे पुरातत्व वेता लोकनिक ध्यान आर्य सभ्यताक पूर्वी सीमाक प्राचीनतम केँन्द्र दिसि अद्यावधि नहिं गेल छन्हि। पता नहिं जेतैन्ह अथवा नहिं। मिथिलाक प्राचीन भौगोलिक सीमा, जाहि मे जनकपुर आर सिमरॉवगढ सेहो सम्मिलित अछि, विशेष भाग सम्प्रति नेपाल तराई मे पडैत अछि आर ओतए सरकारक दिसि सँ अहि क्षेत्रक प्राचीन ऐतिहासिक तत्वक पता लगेवाक हेतु अखन धरि कोनो सशक्त प्रयास नहिं भेल अछि। मोतिहारी, वैशाली, गोरहोघाट, पुर्णियाँ, आदि क्षेत्रक यदा – कदा पुरातत्वक खोज भेला उत्तए अहि दिसि ध्यान नहिं गेल अछि। आ तैं मिथिलाक इतिहासक अध्ययनक जे एकटा महत्वपूर्ण श्रोत होयबाक चाही से सम्प्रति अपूर्णे अछि।
आन – आन क्षेत्रक हेतु जतबो साधन उपलब्ध भेल छैक ततवो मिथिलाक हेतु नहिं भसकल अछि कारण अहि दिसि मैथिल - अमैथिल इतिहासकारक ध्यान नीक जकाँ आकृष्ट नहिं कैल गेल अछि। मिथिलाक प्राचीन गौरव आर साँस्कृतिक देनक अध्ययनक हेतु हमरा लोकनि अहुखन मात्र साहित्यिक साधने पर निर्भर करए पडैत अछि जकर नतीजा ई होईयै जे कोनो प्राचीन प्रश्न पर हमरा लोकनि एकटा निर्णयात्मक मत नहिं द सकैत छी। प्रत्येक प्रश्न विवादास्पद अछि आर निर्विवाद रूपें हम अखनो ई कहबाक स्थिति मे नहिं छी जे अमूक बातक निंदा, घटना, अमूक समय मे घटित भेले हैत। ई अनिश्चितताक स्थिति अखन मिथिलाक इतिहास मे बहुत दिन धरि बनले रहत। युनान जका हमरा ओतएअ नेऽ कोनो हिरोडोटस आर धुसीडाइड्स भेल छथि आर नेऽ मुसलमान शासकक इतिहासकार जकाँ कोनो इतिहास कारे। वेदेशी यात्रियो लोकनि जे विवरण अहि क्षेत्रक देने छथि से मात्र सामान्ये कहल जा सकइयै आर ओहि सँ स्थिति मे कोनो परिवर्तन नहिं अवइयै। एहना स्थिति मे अहि प्राचीन क्षेत्रक इतिहासक निर्माण करब एकटा जटिल समस्या बनल अछि आर ओहि समस्या मध्य हमरा लोकनि केँ ऐतिहासिक साधन खोजि केँ संकलित करबाक अछि।
मिथिला मे पैघ सँ पैघ दार्शनिक एवं तात्विक विषय पर ग्रंथक रचना भेल अछि जहि सँ ई प्रमाणित होइछ जे अहिठामक लोग विज्ञ एवं विद्वान छलाह परञ्च अपना सबंध मे किछु लिखबाक क्रम मे वो लोकनि राजर्षि जनकक विदेह नीति मे अपनौ लन्हि अछि अहि मे कोनो सन्देह नहिं। ‘मैथिल’ शब्द “वैदिक” युग सँ व्यवहृत होइत आएल अछि आर अहि सँ ई स्पष्ट होइत अछि जे ताहि दिन सँ मिथिलाक भौगोलिक इकाई स्वीकृत अछि आर अहि भौगोलिक क्षेत्र मे रहनिहार मैथिल कहबैत छलाह – बिहार मे एतेक प्राचीन गौरव आर कोनो क्षेत्र केँ प्राप्त नहिं छैक तथापि एकर इतिहास अखनो एतैक संदिग्ध आर अनिर्णयात्मक स्थिति मे अछि से एकटा विचारणीय विषय।
प्राचीन मिथिलाक इतिहासक अध्ययनक हेतु मुख्य साधन अछि वेद, उपनिषद, ब्राह्म साहित्य, अरण्यक, महाभारत, रामायण, पुराण, स्मृति, पाणिनि, पतञ्जलि, आदिक रचना एवं तत्कालीन बौद्ध आर जैन साहित्य। मिथिलाक संबध मे सूचना हमरा लोकनि केँ यजुर्वेद एवं अथर्ववेद सँ भेटए लगैत अछि यथापि अप्रत्यक्ष रूपें मिथिलाक ऐतिहासिक घटनाक विवरण ऋग्वेद मे सेहो देखल जा सकइयै। शतपथ ब्राह्मण, ऐतरेउअ ब्राह्मण, पंचविंश ब्राह्मण, बृहदारण्यकोपनिषद, एवं छन्दोग्योपनिषद मे मिथिलाक तत्कालीन राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, एवं धार्मिक अवस्थाक विस्तृत विवरण भेटैत अछि। आहि मे सब सँ महत्वपूर्ण विवरण शतपथ ब्राह्मणक अछि जाहि मे जनक केँ सम्राट कहल गेल अछि आर संगहि याज्ञवम्ल्यक संरक्षक सेहो। साँस्कृतिक स्थितिक अध्ययनक हेतु तँ उपरोक्त साधन अद्वितीय अछि आर अहि बात केँ विदेशी विद्वान सेहो मानैत छथि। अहि मे संदेह नहिं जे अहि युग मे ब्राह्मण वर्ग प्रधानता छल तथापि परिक्षितक बाद सँ जनक वंशक इतिहासक हेतु उपरोक्त साधनक अध्ययन अत्यावश्यक मानल जाइत अछि। एतरेय ब्राह्मण सँ तत्कालीन अवस्थाक विवरण भेटैत अछि आर उपनिषद तँ सहजहि दार्शनिक विचार-विमर्शक खान अछिये। ओहि मे जाहि ढंगे वाद – विवाद अछि से सर्वथा अद्वितीय कहल जा सकइयै। पाणिनि, पतञ्जलि एवं अर्थशास्त्र (कौटिल्यक ) से हो प्राचीन मिथिलाक इतिहासक विभिन्न अंश पर प्रकाश पड़इत अछि।
बौद्ध आर जैन साहित्यक सबंध मे ई सोचि कहल गेल अछि जे जखन कोनो आन साधन मिथिलाक इतिहासक हेतु नहिं प्राप्त होइत अछि तखन बौद्ध आर जैन साधन हमरा लोकनिक साहित्यक हेतु प्रस्तुत होइत अछि। दीपवंश, महावंश, अशोकविद्वान अश्वघोषक युद्धचरित, बुद्धघोषक रचना सभ, धभ्मयद्ध कथा, असंग, वरूवन्धु, दिगनाथा, धर्मकीर्ति, आदिक रचना सँ मिथिलाक सांस्कृतिक एवं दार्शनिक इतिहासक निर्माण मे बहु साहित्य भेटैत अछि। बौद्ध दार्शनिक लोकनि केँ कहबाक क्रम मे मिथिला मे नव – न्यायक जन्म भेल छल आर तै ७–८ शताब्दी सँ १५–१६म शताब्दी धरि जे बौद्ध एवं मैथिल दार्शनिकक मध्य वाद – विवाद भेल अछि से मिथिलाक साँस्कृतिक इतिहासक अध्ययनक हेतु परमाश्वयक मानल जाइत अछि। वाचस्पति मिश्र (वृद्ध) सँ ल केर शंकर मिश्र धरिक समस्त ग्रंथ आर नालंदा विक्रमशिलाक महान पंडित लोकनिक रचित ग्रंथक अध्ययन अहि हेतु सर्वथा अपेक्षित।
ओना बौद्धकालीन मिथिला सर्वांगीन इतिहासक हेतु समस्त जातकक अध्ययन आवश्यक बुझल जाइछ। महापदानक जातक, गाँधार जातक, सुरूचि जातक, महाजनक जातक, निमि जातक, महानारदकस्पा जातक इत्यादि तत्कालीन मिथिलाक राजनैतिक समाजक एवं साँस्कृतिक इतिहास पर वृहत प्रकाश पड़इयै– जाहि सँ सामान्य लोकक दैनन्दिनीक ज्ञान सेहो होइत अछि। जातक मे जे राजनैतिक श्रृंखला बताओल गेल अछि ताहि सँ पुराण वर्णित अवस्था मे काफी मतभेद अछि तैं राजनैतिक इतिहासक निर्माण मे जातकक अध्ययन मे सतर्कताक आवश्यकता अछि। सामाजिक–साँस्कृतिक–आर्थिक अवस्थाक अध्ययनक हेतु जातक प्रमुख साधन मानल गेल अछि। जैन श्रोत मे सेहो मिथिलाक विभिन्न स्थितिक विशेष विश्लेषण भेटैत अछि आर औहि दृष्टिकोण सँ उतरा ध्यायन सूत्र, उवासगदसाओ, कल्पसूत्र, स्थविरावली चरित्र (परिशिष्ट पर्वत) एवं त्रिशस्ति शेलाकार पुरूष आदि ग्रंथक अध्ययन अपेक्षित अछि। कखनो कखनो जैन एवं बौद्ध अपाख्यान मे समता से हो देखबिन मे अवइयै। जैन–बौद्ध साहित्य आर अन्यात्य साधन मिथिलाक सामाजिक–आर्थिक इतिहासक अध्ययनक हेतु बहु लाभदायक मानल गेल अछि कारण ओहि सब विवरण मे सामान्य लोकक जीवन पर सेहो प्रकाश पडैत अछि। जातक आदि सँ इहो ज्ञात होइछ जे कोना ताहि दिनक मैथिल अपन घर दुआर छोडि़ केँ व्यापार–व्यवसायक हेतु देश–विदेश जाइत छलाह आर ओहि मे बहुत गोटए ओहिठाम बैसिओ जाइत छलाह। वो लोकनि वेस उद्दमी आर परिश्रमी होइत छलाह आर समुद्र यात्राक हेतु कोनो संकीर्णता हुनका लोकनि मे नहिं छलैन्ह। महाभारत, रामायण, आर पुराण मे मिथिलाक सबंध मे प्रचुर सामग्री अछि परञ्च अहि तीनू मे वैज्ञानिकताक हिसाबें कतहु कोनो साम्य नहिं छैक। पुराणक विभिन्न खण्ड मे जलवा जे नामावली अथवा राजाक सूची भेटइत अछि ताहि मे एकरूपता नहिं देखबा सँ अवइयै आर अहि विरोधाभास सँ इतिहासक सामान्य विद्यार्थी अगुता केँ घबरा जाइत अछि। ब्रिट्रिश विद्वान पारजीटर महोदय आर बंगाली विद्वान प्रधान महोदय बड्ड परिश्रम कए पुराण रूपी जंगल सँ मिथिलाक राजवंशक इतिहासक एकटा रूपरेखा प्रस्तुत करबा मे समर्थ भेल छथि तथापि ओकरा सर्व सम्मत अखनो नहिं मानल जाइत छैक। प्राचीन – काल मे इतिहास – पुराण एकटा अध्ययनक महत्वपूर्ण विषय छल आर अध्ययनक दृष्टिकोण सँ एकरा पंचमवेद से हो कहल गेल छैक तथापि एकरा अध्ययन मे जे एकटा वस्तुनिष्ठताक अपेक्षा छल से प्राचीन विद्वान लोकनि नहिं राखि सकलाह आर पुराण मे ततेक रास एम्हर – ओम्हरक बात घुसिया गेल जे एकर एतिहासिकता मे लोग केँ संदेह होमए लगलैक। अहिठाम एतवा स्मरणीय जे एतवा भेल उत्तरो पुराण, रामायण आर महाभारतक एतिहासिक महत्व केँ काटल नहिं जा सकइयै। परंपरागत इतिहासक जे अपन महत्व छैक ताहि हिसाबे उपरोक्त सबंधक अध्ययन ककए हमरा लोकनि मिथिलाक इतिहासक निर्माण मे अहि सँ सहायक लसकैत छी।
मिथिलाक इतिहासक अध्ययनक हेतु लिगिट मे नुस्कृष्ट से हो आवश्यक बुझना जाइत अछि। अहि सँ मिथिला आर वैशाली दुनुक इतिहास पर प्रकाश पडैत अछि। अहि मे कहल गेल अछि जे जखन वैशाली मे गणराज्य छल तखन मिथिला मे राजतंत्र आर मिथिला मे ताहि दिन मे एकटा प्रधानमंत्री छलाह जिनक नाम खण्ड छलैन्ह आर हुनका अधीन मे ५०० अमात्य रहथिन्ह। संस्कृत साहित्यक विभिन्न अंश सँ मिथिलाक इतिहासक अध्ययन मे सहायता भेटैत अछि। कालिदास, भव भूति, दाण्डिन, राजशेखर, आदिक रचना सँ मिथिलाक इतिहासक विभिन्न पक्ष पर प्रकाश पडइयै। लक्ष्मीधरक कृत्य कल्पना सँ, श्रीनिवासक भद्रीकाव्यटीका, जयसिंहक लिंगवार्त्तिक, श्रीधर ठक्कुरक काव्य प्रकाशविवेक, नारायणक छांवोग्यपरिशिष्ट एवं मिथिला आर भारतक अन्य भाग सँ प्राप्त मिथिलाक्षरक पाण्डुलिपि अहि सँ मिथिलाक इतिहासक निर्माण मे सहायता भेटैत अछि। विल्हणक विक्रमाँइदेवचरित, विद्यापतिक समस्त रचना, वर्धमानक दण्डविवेक, अभिनव वाचस्पति मिश्रक समस्त रचना, गणेश्वरक सुगति सोपान, चण्डेश्वरक आठो रत्नाकर, ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्णन रत्नौकर आदि ग्रंथ मिथिलाक इतिहासक निर्माण मे उपादेय सिद्ध भेल अछि। बिहार रिसर्च सोसायटी द्वारा प्रकाशित “कैटलोग आफ मिथिला मे नुस्कृष्ट” (४ भाग), हरिप्रसाद शास्त्रीय द्वारा संपादित “कैटलोग आफ नेपाल दरबार मे नुस्कृष्ट ” इत्यादि सँ सेहो मिथिलाक इतिहासक सब पक्ष पर विशेष प्रकाश पडइयै। मिथिला मे सुरक्षित तालपत्र पर ब्राह्मण आर कायस्थक पाँजि से हो मिथिलाक सामाजिक इतिहासक एकटा मूलि श्रोत मानल गेल अछि। ओना पुरातात्विक साधनक अभाव तँ मिथिला मे अछि तथापि मोतिहारी सँ बंगालक सीमा धरि जे विभिन्न पुरातात्विक महत्वक स्थान अछि तकर सर्वेक्षण सँ मिथिलाक इतिहासक निर्माण मे सहायता भेटत। मिथिलाक प्रमुख क्षेत्रक उत्खनन अखनो नहिं भेल अछि तँ ओहिठाम सँ पर्याप्त मात्रा मे शिलालेख, सिक्का, आदि नहिं भेटल अछि। एम्हर मोतिहारी सँ कैकटा ताम्रलेख प्रकाशित भेल अछि, मुजफ्फरपुरक कहरा थाना सँ जीवगुप्तक एकटा अभिलेख भेटल अछि जाहि सँ पता लगैत अछि जे तीरभुक्ति मे चामुण्डा नामक एकटा विषय छल। इमादपुर सँ पाल कालीन अभिलेख भेटल अछि जाहि सँ ई सिद्ध होइछ जे पाल लोकनिक शासन मिथिला पर छल। नौलागढ (बेगुसराय) सँ दूटा पालकालीन अभिलेख भेटल अछि – जाहि मे एकटा शिमिला विषयक आर दोसर मे एकटा बिहारक उल्लेख अछि। अहिठाम इहो स्मरणीय जे अहि क्षेत्र सँ गुप्तकालीन मोहर एवं रक्षायुक्त विषयक एकटा गुप्तकालीन मोहर सेहो भेटल अछि जाहि सँ ई स्पष्ट होइछ जे मिथिलाक ई क्षेत्र शासनक प्रधान केन्द्र छल। बनगाँव सहरसाक गोरहोघाट, पटुआहा, आदि स्थान सँ पंचमार्ड सिक्का तँ बहुत पूर्वहिं भेटल छल आर एम्हर विग्रटपाल तृतीयक एकटा प्रमुख ताम्रपत्र बहरायल अछि जाहि मे ई कहल गेल अछि तीरभुक्तिक अंतर्गत हौद्रेय नामक एकटा विषय छल। इयैह हौद्रेय आधुनिक हरर्धथिक। अहि सँ पूर्व हमरा लोकनिकेँ तीरभुक्ति मे मात्र एक्केय विषयक ज्ञान छल आर वो छल ‘कक्ष’ विषय जकर उल्लेख नारायण पालक भागलपुर ताम्रलेख मे भेल अछि। ई कक्ष विषयक सबंध मे अखनो धरि इतिहासकार एकमत नहिं भेल छथि मुदा हमर अपन विचार ई अछि जे ई ‘कक्ष’ विषय प्राचीन अंगुतराय मे छल आर महाभारत मे वर्णित ‘कौशिकी कक्ष’ क प्रतीक छल। नारायण पालक ताम्रलेख मे अहि कक्ष विषयक विवरण भेटैत अछि। चामुण्डा विषय पश्चिम मे, हौद्रेय केन्द्र मे आर कक्ष विषय तीरभुक्तिक पूर्वी सीमाक संकेत छल। एकर अतिरिक्त पंचोभ सँ प्राप्त ताम्रपत्र सेहो मिथिलाक इतिहासक अध्य़यनक हेतु अत्यावश्यक अन्धराठाढी़ सँ प्राप्त श्रीधरक अभिलेख, कन्दाहा सँ नरसिंह देव ओइनवारक अभिलेख, भगीरथपुर सँ प्राप्त ओइनवार कालीन अभिलेख, मुहम्मद तुगलकक अभिलेख, वेदीवनक तुगलक कालीन अभिलेख, इव्राहिम शाह शर्रीक अभिलेख, शिवसिंहक सिक्का ओइनवार शाखा भैरव सिंह देवक चाँदी सिक्का आदि सँ मिथिलाक इतिहासक विभिन्न पक्ष पर प्रकाश पडैत अछि। नेपाल वंशावली आ नेपाल सँ प्राप्त अभिलेख जाहि मे सिमराँव गढ स्थित नान्य देवक तथाकथित अभिलेख एवं प्रताप मल्लक शिलालेख महत्वपूर्ण अछि। एम्हर आवि के वैशाली, बलिराजगढ, करिऔन आदि स्थानक उत्खनन सँ जे सामग्री प्राप्त भेल अछि सेहो मिथिलाक इतिहासक निर्माण मे सहायक सिद्ध भेल अछि। महेशवारा (बेगुसराय) सँ प्राप्त रूकनुद्दिन कैकशक अभिलेख तँ अन्यान्य दृष्टिकोण सँ महत्वपूर्ण अछि। मिथिलाक विभिन्न भाग सँ मुसलमानी सिक्का पर्याप्त मात्रा मे भेटल अछि जाहि सँ राजनैतिक इतिहासक निर्माण मे सहायता भेटैत अछि। मटिहानी (बेगुसराय) सँ बंगालक सुल्तान नसरत शाहक अभिलेख सेहो भेटल छल आर कहल जाइत अछि जे बेगुसरायक सभी चनूरपुर गॉव मे मीरजापुरक पुत्रक एकटा अभिलेख अछि। वेदेशी यात्री लोकनि सेहो मिथिला मे आएल छलाह आर अहि मे चीन सँ आयल यात्री लोकनिक विशेष महत्व अछि कारण वो लोकनि एतए बौद्धधर्म अध्ययनार्थ अवैत छलाह। फाहियान हियुएन – संग, सूंग – युन, इत्सिंग आदि यात्रीक नाम उल्लेखनीय अछि। ई लोकनि मिथिलाक विभिन्न क्षेत्रक भ्रमण कएने छलाह आर वो लोकनि जे अपन विवरण लिखने छथि ताहि सँ अहि क्षेत्र पर विशेष प्रकाश पडइयै। वृज्जी, लिच्छवी एवं तीरभुक्ति’क प्रसंग हिनका लोकनिक लेख उपादेय अछि। विदेशी धरती मे सर्व प्रमुख व्यक्ति, जे मिथिलाक हेतु सर्वतोभावेन महत्वपूर्ण कहल जा सकैत छथि, भेलाह, तिब्बती यात्री धर्मस्वामी जे १३ शताब्दीक पूर्वाद्ध मे मिथिला होइत नालंदा गेल छलाह। तखन मिथिला राजगद्दी पर कणरिवंशीय रामसिंह देव विराजमान छलाह। धर्मस्वामी मिथिलाक सबंध मे बहुत रास बात लिखने छथि। बहुत दिनधरि वो रामसिंह हुनका अपन पुरोहित बनबाक हेतु आग्रहो केने छलथि परञ्च ओकरा वो स्वीकार नहि केलन्हि। ताहि दिन मे मिथिला पर मुसलमानी आक्रमण प्रारंभ भचुकल छल तकर विवरण वो दैत छथि कारण जखन वैशा जी बाटे जाइत छलाह तखन वो अपना आँखिये ई सब घटना देखलन्हि। धर्मस्वामी मिथिलाक इतिहासक हेतु एकटा आवश्यक श्रोत भेला।
एकटा दोसर महत्वपूर्ण साधन भेल वसातिलुनउंस नकर लेखक छलाह मुहम्मद सद्र उला अहमद हसन दाबिर इदुसी (उर्फ ताज) आर वो इखतिसान उद देहलवीक नामे सेहो विख्यात छलाह। वो गयासुद्दीन तुगलकक संगे बंगाल आक्रमण मे गेल छलाह आर धुरती मिथिला गयासुद्दीन तुगलक आक्रमणक समय मे हुनके संग छलाह। तै इहो एकटा आँखि देखल साधन भेल आर ओहि हिसाबे महत्वपूर्ण सेहो। फोलियो १२ (एकर सम्पूर्ण पटनाक काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान मे सुरक्षित अछि आर ४ टा फोलियो जकर सबंध मिथिलाक इतिहास सँ छैक हमर हिस्ट्री आफ मुस्लिम रूलैन तिरहुत मे छपल अछि।) पर लिखल अछि जे हरिसिंह देव ककरो कोना सलाह नहिं सुनलन्हि आर परा के पहाड दिसि चलि गेलाह। गयासुद्दीन तुगलकक तिरहुत ताहि दिन विस्मृत आर सुखी संपन्न राज्य छल आर अखन धरि ककरो अधीन नहिं छल तैं गयासुद्दीन बंगाल सँ घुरबा काल अपना अधीन करबाक प्रयास केलक। इसामी अपन फुतुह–सालातीन मे लिखने छथि जे गयासुद्दीन तिरहुत कर्णाटवंशक अंतिम राजा पर आक्रमण केलन्हि आर वो बिना कोनो प्रकारक विरोध केने पहाड – जंगल दिसि भागि गेलाह। सुल्तान तीन दिन धरि ओतए ठहरलाह आर जंगल के काटि के सम्पूर्ण क्षेत्र के साफ करौलन्हि। तेसरदिन वो मिथिला राज्यक विशाल किला जकर दिवाल गगनचुम्बी छल आर जे सात टा गहिर खाधि स चारू कात सँ घेरल छल, पर आक्रमण केलन्हि आर ओहि पर विजय प्राप्त केला उत्तर ओहि किला मे दू या तीन सप्ताह रूकला आर चारू दिसक विरोध केँ दबैलन्हि आर एवं प्रकारें मिथिला पर अपन प्रभुत्व स्थापित केलन्हि। जेबा सँ पूर्व तो तवलिघाक पुत्र धर्मात्मा अहमद के तिरहुतक प्रधान बनौलन्हि। एवं प्रकारे एक–दू मासक बाद गयासुद्दीन अपन राजधानी दिसि चलि गेलाह। फरिस्ता आर मुल्लातरिया जे राजाक गिरफ्तारीक गप्प लिखैत छथि से गलती बुझि पडइयै। वसातिनुलउंसक अनुसार तिरहुतक राजा सम्मृद्धशाली छलाह, आर हुनका सैनिकक कोनो अभाव नहिं छलन्हि, विराट राजभवन छलैन्ह आर सब तरहें वो सुखी आर सम्पन्न छलाह। अपन अजेय दूर्ग – किलाबंदी आर सेना पर अटूट विश्वास छलैन्ह आर आई धरि कतहु हुनक माथ झुकल नहि छलैन्ह। गयासुद्दीनक पहुँचबाक समाचार सुनितहिं वो एतेक भयभीत भ गेलाह जे हुनक सब घमण्ड धूल – धुसरित भगेल। अपन प्रतिष्ठा बचेबाक हेतु वो अपन तेज घोडा पर चढि के भागि गेलाह। वसातिनुलउंसक लेखकक विचार अछि जे जँ राजा मेल सँ चाहतैथ तँ गयासुद्दीन हुनका संग बढिया व्यवहार करितथिन मुदा वो बिनु कोनो प्रकारक वार्ता कएने भागि गेल। अपन स्वतंत्रताक रक्षाक हेतु वो पहाडक कोरा मे नुका रहलाह। गयासुद्दीन ओहिठाम थोडेक दिन ठहरि समस्त राज्यक शासनक व्यवस्था अपने निर्देशन मे केलन्हि। ग्राम मुखिया (मकिद्दम) लोकनिक संग नीक व्यवहार दर्शौलन्हि आर तकर बाद सब प्रबंध केला उत्तर ओहिठाम सँ अपन राजधानी दिसि बढलाह।
एकर अतिरिक्त एकटा आर महत्वपूर्ण साधन अछि मुल्ला तकियाक वयाज । मुल्ला तकियाक वयाज पटनाक मासिक (पटना – १९४६) मे छपल अछि आर ‘मिथिला’ साप्ताहिक मे सेहो एकर मुख्य साराँश मैथिली मे छपल छल बहुत दिन पूर्वहिं जे आव उपलब्ध नहिं अछि। मुल्ला तकिया मुगल कालीन रइस छलाह आसाम जवाक क्रम मे मिथिला होइत गेल छलाह आर ताहि दिन मे अहिठाम जत्तेक गप किछु छल तकर विस्तृत विवरण संकलित कए वो मिथिलाक एकटा व्योरेवार इतिहास बनौने छलाह। एकर अतिरिक्त फरिता, अलवदाओनी, अबुल फजल, अब्दुल सलिम आर गुलाम होसेन हुसेनक पोथी सब सँ सेहो मिथिलाक इतिहास पर पर्याप्त प्रकाश पडैत अछि।
मुसलमानी साधनक अतिरिक्त ईस्ट इण्डिया कम्पनीक रेकार्डस, कलक्टरेटक कागज पत्र, अंग्रेज कर्मचारी लोकनिक मध्य भेल पत्राचार, जमीन्दारीक कागज आर दरभंगा राजक सचिवालय एवं रेकार्डस रूम मे सुरक्षित पुरान कागज सब सेहो मिथिलाक इतिहासक निर्माणक हेतु सहायक सिद्ध होएत। मिथिला मे जे बहुत रास जमीन्दारी छल।
ओहि सब जमीन्दारक ओतए विभिन्न प्रकार सरकारी गैर सरकारी कागज उपलब्ध अछि आर ओहि सब सँ मिथिलाक आधुनिक इतिहासक निर्माण मे काफी सहायता भेटल अछि। अहि सब केर संकलन एवं प्रकाशन आवश्यक अछि – दरभंगा राज्यक इतिहासक निर्माण अहि सँ बड्ड सहायता भेटल अछि। दरभंगा, बनैली, नरहन, वेतिया, सुरसंड, गंधवरिया, चकवार आदि राजवंशक वृहद एवं वैज्ञानिक इतिहास नहि लिखल जा सकल अछि। दरभंगा राज्यक अतिरिक्त बोंसी राज्य सब हक सबंध हमरा लोकनि केँ पूर्ण जानकारियों नहिं अछि कारण साधनक अभाव अछि। अहि सब साधनक वैज्ञानिक अध्ययन केला सँ मिथिलाक प्रमाणिक इतिहासक निर्माण भ सकइयै। सब साधनक समीचीन व्याख्या केला उत्तरे हमरा लोकनि मिथिलाक समीक्षात्मक सर्वेक्षण क सकैत छी। ओना आन प्रांतक तुलना अहिठाम साधनक सर्वथा अभावे कहल जाएत तथापि जतवा जे उपलब्ध अछि ताहि पर वैज्ञानिक रूपें अध्ययन करब आवश्यक मिथिलाक हेतु मैथिली साधन पर विशेष निर्भर करए पडत। अहि प्रसंग मे एकटा उदाहरण देव अ प्राँसगिक नहिं होइत। विद्यापति कवि होइतहुँ इतिहासक नीक ज्ञाता छलाह जकरा प्रमाण हमरा हुनक ग्रंथ सब सँ भेटैत अछि। पुरूष परीक्षा जाहि सिल – सिलेवार ढंग सँ वो एतिहासिक व्यक्तित्वक विवेचन कएने छथि ताहि सँ हुनक एतिहासिक वोध एवं वस्तुनिष्ठताक पता लगइयै। (अहि सबंध मे द्रष्टव्य – हमर लेख – विद्यापतिज पुरूष परीक्षा – जे हमर ‘हिस्ट्री आफ मुस्लिम रूल इन तिरहुत’ क परिशिष्ट मे छपल अछि।) ज्ञातब्य जे पुरूष परीक्षाक अध्ययन केला उपरांत स्वर्गीय चन्दा झा मिथिलाक इतिहासक अध्ययन दिसि आकृष्ट भेल छलाह आर ओहि सबंध मे बहुत रास सामग्री से हो जमा केने छलाह। कीर्तिलता, कीर्ति पतारा, लिखनावली आदि ग्रंथ से हो ओतवे महत्वपूर्ण अछि। मिथिलाक इतिहासक लेल मैथिली साधनक हेतु खोज करए पडत कारण एकर एकटा अविच्छिन्न प्रवाह वैदिक काल सँ अद्यावधि बनल अछि। यशस्तिल्कचम्पू मे तिरहुत रेजिमेटक विवरण मिथिलाक स्वतंत्र व्यक्तित्व केँ स्पष्ट करइत अछि। जकर स्पष्टोक्ति विद्यापति मे भेल अछि। मिथिलाक इतिहासक निर्माणक हेतु उपरोक्त सब साधनक वैज्ञानिक अध्ययन ओकर समीक्षात्मक विश्लेषण उपेक्षित अछि।
अघ्याषय – ३
जनकवंशक इतिहास
कुरू – पाँचाल मे कुरूवंशक अंत भेला उत्तर भारत’क जे सर्व प्रसिद्ध राज्यवंश छल तकरे हमरा लोकनि जनक वंशक नाम सँ जनैत छे। अहि वंशक सर्वश्रेष्ठ एवं सर्व प्रसिद्ध राजा छलाह जनक जनिक दरबार दर्शनक प्रसिद्ध केन्द्र छल आर ओहि हेतु मिथिला मे जनकवंशक एतेक प्रसिद्धियो अछि। कुरू लोकनिक अवसानक काल मे पूर्वी भारत मे जनकवंश उत्थानक पथ पर छल। एकर सब सँ पैघ प्रमाण ई अछि जे ब्राह्मण साहित्य मे ताहि दिन मे कुरू राजकुमार लोकनि केँ ‘राजन’ क संज्ञा सँ सम्बोधित कैल जाइत छ्लन्हि आर जनक राजवंशक लोक केँ ‘सम्राट’ क संज्ञा सँ। शतपथ ब्राह्मण मे सम्राट केँ राजन् सँ पैघ मानल गेल अछि। पौराणिक चाकरायन आर निचलक समय मे कुरू लोकनिक पतन भेल छलैन्ह। राजा परिक्षितक अवसान भचुकल छल परञ्च हुनक स्मृति अखनो लोकक मध्य विराजमान छल आर मिथिलाक राजदरबार मे वो अहुखन श्रद्धाक संग चर्चित छलाह। जनकक सभा मे जे दार्शनिक विचार – विमर्श एवं एवं चिंतन’क क्रम चलैत छल ताहुठाम राजा परिक्षित एकटा विचारणीय विषय बनल छलाह जेना कि भुज्यु लाह्यायनि एवं याज्ञवल्म्यक विवाद सँ स्पष्ट होइछ। सम्प्रति हमरा लोकनिक समक्ष जे साधन मिलल अछि ताहि आधार ई कहब कठिन अछि जे जनमेजेय आर जनक वंशक मध्य कोनो प्रकारक सम्पर्क छल अथवा नहिं। पुराण एवं महाकाव्य मे जनक आर परिक्षित वंश केँ सम – सामयिक कहल गेल छैक। जनक केँ उद्धालक आरूणि आर याज्ञवल्म्यक सम – सामयिक कहल गेल छैक। महाभारत मे वर्णित अछि जे जनमेजेयक सर्पसत्र मे उद्धालक आरूणि एवं हुनक पुत्र स्वेतकेतु उपस्थित छलाह। विष्णुपुराण मे तँ एतवा धरि कहल गेल अछि जें जनमेजेयक पुत्र एवं अधिकारी शतानीक याज्ञवल्म्य सँ वेदक शिक्षा ग्रहण केलन्हि। उपरोक्त कथन केँ प्रामाणिक मानव असंभव कारण वैदिक साहित्य, पुराण आर महाकाव्यक मध्य तिथि निर्धारण एवं राजवंशक साक्ष्यक संबध मे एकटा विरोधाभास अछि आर तें अद्यावधि अहि सब शासक लोकनिक काल निर्धारण एकटा समस्ये बनल अछि। देश – विदेश मे अहि प्रश्न पर वेस विवाद भेल अछि परञ्च तइयो प्रामाणिकताक लेशमात्र कतहु देखबा मे नहिं अवइयै। शतपथ ब्राह्मणक अनुसार दैवापशौनक जनमेजेयक सम – सामयिक छलाह। जैमिनी उपनिषद एवं वंशब्राह्मणक अनुसार दैवाप शौनकक शिष्य छलाह दूनि एन्द्रोत आर एन्दोतक शिष्य छलाह पुलुप प्राचीन योग्य। पुलुप प्राचीन योग्य। पुलुपक शिष्य छलाह पौलुषी सत्ययज्ञ।छान्दोग्य उपनिषदक अनुसार सत्ययज्ञ उद्धालक आरूणि एवं बुडिल आश्वतराश्वीक समकालीन छलाह आर अहि हिसाबे तँ वो जनकक समकालीन सेहो रहलहेतहि। अहि सँ होइछ जे इन्द्रोत जनमजेयक समकालीन रहल हेताह आर सातयज्ञि जनकक। जनक जनमजेय सँ पाँच – छह पीढी बाद मे भेल होथि से संभव। विदेह राजक सर्वप्रथम उल्लेख हमरा लोकनि केँ यजुर्वेदक संहिता मे भेटैत अछि। वाल्मीकि रामायणक अनुसार एहि राजवंशक मूल संस्थापक छलाह राजा निमि। हुनके पुत्र छलाह मिथि आर मिथिक पुत्र जनक प्रथम। ओहि वंशक जे सीताक पिता छलाह उवैह भेलाह जनक द्वितीय आर हुनक भ्राता कुशध्वज साँकास्यक शासक छलाह। वायु एवं विष्णुपुराण मे निमि केँ इस्वाकुक पुत्र कहल गेल अछि आर ओहि निमि के विदेहक संज्ञा सेहो देल गेल अछि। ओहि ‘विदेह’ सँ ओहि क्षेत्रक नाम विदेह सेहो पडल। वायुपुराण मे वशिष्टक जाहि श्रापक उल्लेख अछि तकर वर्णन हमरा लोकनि केँ बृहद्धवता मे सेहो भेटैत अछि। उपरोक्त दुनु पुराणक अनुसार निमि’क पुत्र ‘मिथि’ केँ जनक प्रथम सेहो मानल जाइत अछि आर ओहि क्रम मे सीताक पिताक नाम सीरध्वज जनक सेहो भेटैत अछि। इवैह सीरध्वज संभवतः रामायणक द्वितीय जनक भसकैत छथि। पुराणक अनुसार अहिवंशक अंतिम राजा कृति छलाह। रामायण, महाभारत आर पुराणक अध्ययन सँ ई स्पष्ट होइछ जे जनक, व्यक्ति विशेषक नामक अतिरिक्त, वंशक नाम सेहो छल। अहिप्रसंग मे ई स्मरण राखब आवश्यक जे अहि वंशक क्रम मे जनकानाम, जनकै आदि शब्दक जे प्रयोग भेल अछि ताहु सँ उपरोक्त कथन प्रमाणित होइत अछि। वैदिक साहित्य मे नमिसाण्य नामक एकटा विदेहक राजाक उल्लेख सेहो भेटैत अछि। मुदा अहिठाम ई स्मरणीय जे नमिसाण्य कतहु कोनोठाम मिथिलाक राजवंशक संस्थापकक रूप नहिं उपस्थित कैल गेल अछि। शतपथ ब्राह्मणक कथा सँ एतवाधरि स्पष्ट अछि जें विदेघ माथव मिथिलाक राजवंशक ऐतिहासिक संस्थापक छलाह। वो सरस्वती नदीक तट सँ सदानीरा (गण्डकी) केँ तह धरि आएल छलाह। हुनका संग हुनक पुरोहित गौतम राहुगता। सरस्वतीक तट सँ जंगल के जरबैत वो लोकनि मिथिला धरि पहुँचलाह। आहि सँ पूर्व कोनो ब्राह्मण एम्हर एतए दूर धरि नहिं आएल छलाह कारण ताधरि अहि क्षेत्र के अग्निवैश्वानर द्वारा जराओल नहि गेल छल। एम्हुरका जमीन दल – दल छल आर किछु उपजा वारी नहिं होइत छल। अग्निदेव जखन अहि भूमि केँ जरा केँ पवित्र केलन्हि तखन माथव हुनका सँ पूछलथिन्ह जें हम आव कोम्हर जाईव ताहि पर अग्निदेव कहलथिन्ह जे अहां पूर्व दिस जाउ आर ओतहि अपन वास स्थापित करू तदुपरांत माथव विदेघ अथवा मिथि विदेह ओहिना काज केलन्हि आर उत्तरपूर्वी भारत मे एकमात्र आर्य राज्यक स्थापना संभव भेल। जँ हमरा लोकनि शतपथ ब्राह्मणक अहिकथाक ऐतिहासिकता केँ स्वीकार करैत छी तखन तँ ई स्पष्ट भ जाइछ जें ‘निमि साप्य’ मिथिलाक संस्थापक नहिं छलाह आर ने हुनका ई प्रतिष्ठे देल जा सकैत छन्हि। मज्झिम निकाय आर निमि जातक मे मखा देव केँ मिथिलाक राजवंशक संस्थापक कहल गेल छैक। जनक वंशक संबध मे एवं प्रकारे ततेक रास नेऽ मतभेद अछि जे ओहि प्रसंग मे कोनो निर्णयात्मक उत्तर देव असंभव। बृहद्देवता मे उल्लेख अछि जे विदेह लोकनि सरस्वती तट सँ मिथिला पहुँचला उपरांतो अपन वंश सँ सरस्वती नदी सबंध बहुत दिन धरि बनौने रहलाह आर अहि बातक पुष्टि तखन आर होइछ जखन हमरा लोकनि पंचावंश ब्राह्मणक निमि साप्य प्रकरण पर दृष्टिपात करैत छी। बौद्ध साहित्य मे मिथिला मे निमि केँ प्रथम शासक नहि मानिओ बाद’क शासक मानल गेल अछि। मिथिलाक राजवंश के सामान्यतः जनक वंश कहल गेल अछि तैं कोन जनक महान जनक छलाह जनिक पुत्री सीता छलथिन्ह अथवा जनिक दरबार मे विद्वानक गोष्ठी भेलछल से कहब असंभव। ओकर प्रामाणिकता सिद्ध करब सेहो असंभव।
विभिन्न श्रोत सँ उपलब्ध सामग्रीक अध्ययन केला संता हमरा लोकनि अहि निष्कर्ष पर पहुँचैत छी जे सीताक पिताक नाम छल सीरध्वज जनक। पुराण मे जनक राजवंशक जे सूची अछि ताहि आधार पर हमरा लोकनि उपरोक्त निर्णय पर पहुँचैत ची। अयोध्याक भरतक माम छलथिन्ह केकेयीक राजा अश्वपनि आर सीरध्वज जनक हुनके समकालीन छलाह। उद्धालक आरूणि आर बुडिल अहि दुनु राजाक दरबार मे बरोबरि जाइत छलाह। भयभूति सेहो अहिमतक समर्थक छथि जे सीरध्वज जनक सीताक पिता छलाह। जातक नं ५३९ मे जाहि महाजनकक चर्च अछि सैह संभवतः सीरध्वज जनक छलाह आर हुनके दरबार विद्वानक हेतु विश्वविख्यात छल। अहि महाजनकक संबध मे कहबी अछि –
“ मिथिलायाम् प्रदिप्रायाम्
नमे दहयनि किञ्चन। अपिच भवति मैथिलेन गीतम्
नगरम् आहितम् अग्निनऽभिविद्य,
न खलु मम हि द्य्यतेत्र किञ्चत्
स्वयमिदमाह किलस्म भूमिपालः”
अहि सं तँ स्पष्ट रूपे जनक विदेहक बोध होइछ।
महाभारत, शतपथ ब्राह्मण एवं वृहदारण्यकोपनिषद मे जनक केँ सम्राटक संज्ञा देल गेल छैक। सम्राट जनकक महानताक द्दोतक कहल जा सकइयै कारण बिनु वाजपेय यज्ञ केने केओ सम्राट नहि कहा सकैत छल। आश्वलायन श्रोत सूत्र मे जनक केँ महान यज्ञकर्ताक रूप मे वर्णन कैल गेल छैन्ह। सम्राटक हिसाबें कम आर चिंतक एवं दार्शनिक हिसाबें वेसी ई महान जनक इतिहास मे विशेष प्रसिद्ध छथि आर मिथिलाक अहुना जतवा जे सांस्कृतिक प्रतिष्ठा अछि ओकर जडि मे छथि इयैह राजा जनक आर हुनक राजदरबारक।ताहि दिन मे मिथिलाक राजदरबार संस्कृति आर दर्शनक प्रधान केन्द्र छल आर अहिठाम विजय प्राप्त करबाक अर्थ होइत छल समस्त भारत मे यश प्राप्त करब। कुरू पाँचलि, मद्र, कौशल आदि स्थानक विद्वान लोकनि जनकक दरबार के सुशोभित करैत छलाह। किछु प्रसिद्ध विद्वानक नाम एवं प्रकार छन्हि–अश्वल, जारतकारव, आर्तभाग, भुज्यु लाहयायनि, उवस्त चाकरायण, कहोड (कहोल) कौषीतकेय, गार्गी वाचक्नवी, उद्धालक आरूणि, आर विदग्ध शाकल्य इत्यादि। कुरू पाँचलिक ब्राह्मण संग जनकक संबध विलक्षण छलैन्ह आर ओहिठाम सँ तरह – तरहक विद्वान केँ वो अपना ओतए बजबैत छलाह। राजा जनकक सबंध मे ऐतिहासिकताक जतवा जे अभाव हो मुदा ओकर साँस्कृतिक महत्वक संबध मे ककरो कोनो प्रकारक सन्देह नहि छन्हि।
जेना कि उपर कहल जा चुकल अछि जनक वंशक प्रामाणिक इतिहास प्रस्तुत करब एकटा कठिन समस्या अहुखन बनले अछि आर सम्प्रति एकर कोनो निदानो देखवा मे नहि अवइयै।जाहि ‘कृत’ केँ कुलक्षण सँ तुलना कैल गेल अछि से संभवतः कराल जनक रहल हेताए कारण ऐतिहासिक दृष्टिकोण सँ हमरा लोकनि जनैत छी जे कराल जनक अजातशत्रुक समकालीन छलाह आर हुनके शासन काल मे जनक वंशक अंत भेल। इहो संभव जे ‘कृति’ आर ‘कएल’ दुनु दु जनक वंशक अंतिम शासक होथि।
वैदिक साहित्य मे माथव आर जनकक अतिरिक्त दू आर विदेह वंशक उल्लेख भेटैत अछि – निमि साप्य आर पर आहलारक। किछु विद्वान पर कोशलक शासक पर आतणार सँ मिलवैत छथि। पंचविंश ब्राह्मण मे निमि साप्य केँएक महान यज्ञकर्ता कहल गेल अछि आर तै किछु गोटए हुनका जनक सँ मिलवैत छथि। वैदिक निमि साप्यक तुलना उतराध्यायन सूत्रक राजा निमि सँ। विष्णुपुराणक नेमी सँ, मज्झिम निकायक मखादेव सुप्तक निमि सँ तथा कुम्भकार एवं निमिजातक मे वर्णित ओहि नामक राजा सँ करैत छथि। एकर प्रत्यक्षीकरण अखनो एकटा ऐतिहासिक समस्या बनल अछि। निमिजातकक अनुसार वो मैथिल राजवंशक अंतिम शासक छलाह आर संगहि पाँचालक राजा द्विमुख, गाँधारक नग्गति आर कलिंगक करण्डुक समकालीन सेहो। मज्झिम निकायक उपरोक्त सुत्र मे कराल(कलार) जनक केँ निमिक पुत्र कहल गेल अछि। कौटिल्यक अर्थ शास्त्र मे अहि कराल जनक केँ ‘वैदेह’ कहल गेल अछि। अहि राजक संग ‘वैदेह’ वंशक अंत भेल। वैदेह वंशक अंत होइतहिं अहिठाम कुलीनतंत्री गणतंत्रक स्थापना भेल आर ई वैशाली कुलीनतंत्र अथवा वृज्जिसंघक एकटा प्रमुख अंग बनि गेल। प्राचीन परंपरा सँ अहिबातक सबूत भेटैत अछि जे विदेह मे बरोबरि संघर्ष होइत रहैत छलैक। महाभारतक अनुसार काशीक प्रतरदन आर विदेहक जनकक मध्य संघर्ष भेल छल। परमथ्थजोतिक नामक बौद्ध ग्रंथ मे कहल गेल अछि जे जनक वंशक अंत भेला पर उत्तर विहार अथवा मिथिला मे लिचछवी लोकनिक शक्तिशाली शासन प्रारंभ भेल। लिच्छवीक संबध सेहो काशी सँ बताओल जाइत अछि। किछु श्रोत सब अहि बातक दिसि संकेत कैल गेल अछि जे वैशाली विदेह पर प्रत्यक्ष वा प्रत्यक्ष रूपें काशीक प्रभाव छल।
यजुर्वेद संहिताक अध्ययन सँ ज्ञात होइछ जे ब्राह्मण युग मे विदेहक राजनैतिक आर साँस्कृतिक महत्व एक्के रंग छल। ताहि दिन मे विदेहक गाय समस्त उत्तरी भारत मे प्रसिद्ध छल। पश्चिम मे जे स्थान कुरू – पाँचाल लोकनिक छलैन्ह से पूर्व मे कोशल – विदेह लोकनिक। कोशल आर विदेहक निवासी विदेघ माथव केँ अपन पूर्वज शाखा संस्थापक मनैत छथि। अहिठाम ई स्मरण रखबाक अछि जे विदेघ माथव (विदेह माधव) अपनामुँह मे अग्निवैश्वानर केँ लकऽ चलल छलाह। अहि सँ ई स्पष्ट अछि जे पूर्वी भारतक ई समस्त हिस्सा जंगल आर दलदल छल आर अग्निवैश्वानरक प्रतापें ओहि जंगल केँ जरा केँ विदेघ माथव एकरा रहबा योग्य भूमि बनौलन्हि। विदेह आर्यक प्रसारक पूर्वी सीमारेखा बनल। एकटा प्राचीन परंपरा मे तँ इहो कहल गेल अछि जे विदेहक आर्यकिरण भेलाक पछाति शतपथ ब्राह्मणक रचना विदेहे मे भेल। अहि संबध मे विद्वानक मध्य काफी मतभेद अछि। एतवाधरि निश्चित एवं निर्विवाद रूपें कहल जा सकइयै जे विदेहक साँस्कृतिक मान्य्ता समस्त उत्तर भारत मे छल। उपनिषदक युग विदेहक ब्राह्मणक प्रतिष्ठा कुरू – पाँचालक ब्राह्मण सँ विशेष छल। विदेहक महत्व एतेक छल जे वादो मे एकर च्गर्च विभिन्न साहित्य इत्यादि मे होइत रहल। जातक, बौद्ध साहित्य, अध्यात्म रामायण, रामायण आदि ग्रंथ सब मे विदेहक वैशिष्ट्यक विश्लेषण भेटैत अछि।
अपन दिग्विजयक क्रम मे भीम विदेहक राजा केँ पराजित कएने छलाह। विदेहक राजधानी मिथिला पर कर्ण अपन दिग्विजयक क्रम मे अपन आधिपत्य स्थापित कएने छलाह। शांति पर्व मे एक स्थल पर जनक – याज्ञवल्म्यक वार्तालापक प्रसंग आएल अछि। एकर अतिरिक्त महाभारत मे वेदेह राज जनकक प्रसंग मे निम्नलिखित बातक उल्लेख भेटइयै –
______ i) जनकक आध्यामिकताक विवरण
______ ii) पंचशिख आर शल्याक संग जनकक वार्तालाप
______ iii) शक केँ जनक द्वारा शिक्षा देवाक प्रसंग
भीम आर अर्जुनक संग जखन कृष्ण इन्द्रप्रस्थ सँ राजगीर जाइत छलाह तखन वो मिथिला सेहो आएल छलाह आर एहेन बुझि पडइयै जे ताहि दिन मे राजगीर जेवाक बाट मिथिले दकए छ्ल। भीष्म पर्व मे विदेह लोकनिक विश्लेषण अछि। भीष्म पर्वक एक स्थान पर विदेह लोकनिक संग आर दोसर वेर ताम्रलिप्तक लोकनिक संग भेल अछि। ‘विदेह’ शब्दक उत्पत्तिक विवरण विशुद्ध रूपेण विष्णु पुराण मे भेटइत अछि। विदेह निमि सँ उत्पन्न मिथि जे नगर बसौलन्हि सैह मिथिला कहा ओल। दीघनिकायक महागोविन्द सुत्तांत मे कहल गेल अछि जे गोविन्द नामक एक व्यक्ति मिथिलाक संस्थापक छलाह। विभिन्न श्रोत सँ विदेहक विभिन्न राजा लोकनिक नाम भेटइत अछि – सागर देव, भरत, अंगीरस, रूचि, सुरूचि, पताप, महामुचल, कल्यान द्वय, सनधनु, मखादेव, साधीन इत्यादि। स्वप्रवास्वदत्तम् (अंक ६) मे सेहो उद्यन केँ वैदेही पुत कहल गेल छन्हि। बिम्बिसारक पत्नी वासवी (अजातशत्रु माय) सेहो विदेह पुत्री छलीहे। वर्धमान महावीर विदेह पुत्री विदेह दत्ताक पुत्र छलाह आर वो स्वयं बहुत दिनधरि मिथिला – विदेह मे रहल छलाह। छह टा वर्षावास व्रो विदेह मे वितौने छलाह। महावीर आर बुद्धक समय मे जे वृज्जि संघ छल तकर दूटा प्रमुख सदस्य छलाह लिच्छवी आर विदेह लोकनि। अहि वृज्जि संघ के कौटिल्य राज शब्दोपजीवी संघ कहने छथि। विदेहक वन सम्पति महत्वपूर्ण छल आर अहिठामक प्राकृतिक साधन सेहो समृद्ध छल। धन, जन, पशुक कतहु कोनो अभाव नहि छल। जातकक अनुसार विदेह मे १६००० गाँव छल आर १६००० नाचै वाली छौडी। रथ, घोडा, हाथी, बरद, गाय, माल आदिक तें कथेऽ न ञ। चीनी यात्री लोकनि सेहो मिथिला – विदेह आर वृजीक विवरण उपस्थित कएने छथि आर ओहि आधार पर किछु विद्वान मिथिलाक राजधानी जनकपुर केँ मानैत छथि। जातक मे एवं जैन ग्रंथ सब मे विदेह संबधी असंख्य कथा सब सुरक्षित अछि। एक कथा मे कहल गेल अछि जे विदेहक राजा केँ गान्धार राज वोधिसत्वक संग मित्रताक संबध छलैन्ह। दुनु अपन राज केँ छोडि तपस्या करबाक हेतु हिमालय गेल छलाह। मखादेव, साधीन, सुरूचि आदिक संबध मे सेहो कैक प्रकारक कथा जातक मे सुरक्षित अछि। साधीन एक पवित्र आत्मा छलाह जनिक न्याय प्रियता सँ ईश्वर लोकनि सेहो प्रभावित छलाह। सुरूचिक पत्नीक नाम सुमेधा छलन्हि आर उहो दुनु गोटए परम धर्मात्मा छलाह। वैदिक युग मे काशी, कोशल आर विदेह प्रधान आर्य केन्द्र छल। मगध आर अंगक निवासी केँ व्रात्य बुनेल जाइत छलैक आर वाक्यक अर्थ होइत छल ‘पतित’। प्राच्यक सबटा आर्य केन्द्र सब मे विदेह सर्व प्रधान छल। गौतम, याज्ञवल्म्य, भृगु, वामदेव, कवि, अगस्त, भार्गव, भारद्वाज, इत्यादि ऋषिगण विदेह मे एकत्र भेल छलाह आर सत्प्रयास सँ वो निमि के जीवित केलन्हि। मिथिला – विदेहक शासक लोकनि जनक आर “वैदेह” पदवी सँ विभूषित होइत छलाह। राजा जनक ‘ब्रह्मज्ञानक अंवेषणार्थ कुरू पाँचाल सँ बहुत रास ब्राह्मण के बजौलन्हि आर ओहिक्रम वो याज्ञवल्म्य सँ ब्रह्मविद्याक उपदेश पऔलनि। याज्ञवल्म्य जनकक राजगुरू बनलाह आर विदेह मे ब्रह्मविद्याक केन्द्र स्थापित भेल। महाभारत युद्ध मे मिथिलाक राजा क्षेमधूर्त्ति दुर्योधनक पक्ष मे छलाह कियैक तँ पाण्डुवंश एक वेर मिथिला पर आक्रमण कएने छलाह। दुर्योधन मिथिले मे बलभद्रक ओतए गदा सिखने छलाह आर तखनहिं सँ मिथिलेश आर दुर्योधन मे वेस मित्रता भ गेल छलन्हि। महाभारत युद्धक समय मे मिथिला मे विराट नामक एकटा शासक छलाह।दरभंगा जिलाक बराँटपुर आर सहरसा जिलाक बराँटपुर दुनु अहि राजाक राजधानी कहल जाइयै। सहरसाक वराँटपुर सँ साबिकक वस्तु सेहो प्राप्त भेल अछिओ जाहि मे मध्य युगक एकटा शिलालेख सेहो अछि। नेपाल क्षेत्र मे सेहो एकटा विराटनगर छैक। मिथिला स्थित विराटनगर मे युधिष्ठिर राजा विराटक ओतए बहुत दिन धरि अज्ञातवास मे रहल छलाह। कहल जाइछ जे वराटपुर आर कीचकगढ प्रांत सहरसा जिलाक धर्मपुर परगना मे छल आर पच पडरिया ग्राम मे पाण्डव लोकनि अपन अज्ञातवासक समय वितौने छलाह। विदेहक संबध मे सामग्री उपलब्ध अछि ताहि आधार पर निर्णयात्मक इतिहासक निर्माण करब असंभव अछि। प्राच्य मे रहनिहार काशी, कोशल, मगध, आर विदेहक लोग मे विदेह वासी के विशिष्ट स्थान देल गेल छैक। मनुस्मृति मे वैश्य पिता आर ब्राह्मण माता सँ उत्पन्न व्यक्ति केँ “वैदेह” कहल गेल छैक। मनुस्मृति ब्रह्मर्षि देश केँ विशेष महत्व देल गेल छैक जतए भरत लोकनि रहैत छलाह। एकर अर्थ ई भेल जे मनु पूर्वी क्षेत्र केँ बहुत पवित्र नहिं मानैत छलाह। लिच्छविक संग वो विदेह लोकनि केँ सेहो व्रात्यक कोटि मे रखने छथि। मनु चाहे अहि क्षेत्र केँ जाहि हिसाबें देखने होथि, महाभारत मे मिथिला केँ विशेष प्रतिष्ठा देल गेल अछि। शखदेव तँ जनक सँ ब्रह्मविद्या सिखबाक हेतु मिथिला आएल छलाह। ‘जनक’ पदवीक प्रारंभ राजा मिथिलाक समय सँ भेल छल। I. जनक वंशक राजाक नामावली
____ निमि (विदेह) ____ मिथि –
____ अरिष्टनोमि –
____ सीरध्वज – (जनक द्वितीय), सीताक पिता (छोट भ्राता कुशध्वज) (हिनका सँकाश्च जीतला पर सीरध्वज ओतुका राजा बना देलक)
____ भानुमंत –
____ सतधुम्न – (प्रद्युम्न) ____ शुचि (मुनि) ____ उर्जवह
____ सुतध्वज (सत्वध्वज, सनध्वज) ____ शकुनी (कुणी) - (अहिठाम सँ जनक वंश दू भाग मे बँटि गेल) –
II. (पुराणक अनुसार बनाओल सूची)
____ निमि
____ मिथि
____ उदावसु ____ नन्दिवर्धन ____ सुकेतु ____ देवराट ____ बृहद्रथ (बृहदुक्त) ____ महावीर ____ सुधृति ____ धृष्टकेतु
____ हरयाश्व ____ मरू
____ प्रतिन्धक
____ कीर्तिस्थ
____ देवमिढ
____ विबुद्ध
____ महिधक्र
____ कीर्तिराट
____ महारोमा
____ स्वर्णरोमा
____ हस्वरोमा
____ सीरध्वज जनक (जनक द्वितीय)
III. (सीर ध्वज वंशज) ____ कृतिजनक (अपना समयक महान
शासक आर चिंतक) –
(बहुलाश्वक पुत्र)
उग्रायुध –
IV. साँकाश्च मे ____ कुशध्वज – (भरत आर शत्रुघ्नक ससूर) धर्मध्वज
कृतध्वज आर मितध्वज खाण्डिम्य – (हिनका केँशीध्वज सँ युद्ध भेल छलैन्ह)
____ पुराण मे साँकाश्चक जनक वंशक अंत अहिठाम भजइत
अछि। पार्जिटर महोदय अपन डायनस्टीज आफ द कलि एज मे
लिखने छथि –
कलिंगाश्चैव द्वात्रिशंद अश्मकाः पंचविशंतिः कुरवश्चापि षट् – त्रिशद अष्टावंशति मैथिलाः॥ महापद्मनन्द मैथिल राज्य के पराजित कएने छलाह – ताहि दिन पुराणक अनुसार २४ टा इद्वाकु, २७ टा पाँचाल, २४ टा काशी, ३६ टा कुरू आर २८ टा मैथिल शासक क्षत्रिय वंश मे शासन क चुकल छलाह।
V. जातक सूची : -
सुरूचि सुरूचि कुमार
महापणाद
संदिग्ध : - विदेह महाजनक
अस्थि जनक पोल जनक
महाजनक द्वितीय दिघावु कुमार VI. अन्यान्य राजाक नाम – (जातक सँ) _ कलार अथवा कराल जनक _ अंगति
_ साधीन
_ पर अहलार
VII. विदेह राजतंत्रक अवसान
अर्थशास्त्र मे –
दाण्डक्यो नाम भोजः कामाद ब्राह्मण कान्याममि मन्यमानः
सुबन्धुराष्ट्रो विनाशकएलश्च वैदेहः। अहि सँ स्पष्ट अछि जे कराल जनकक समय मे मिथिलाक राजतंत्रक अंत भेल राजा कराल व्यभिचारी छलाह आर अपन चरित्रक चलते हुनका राजगद्दी सँ हाथ धोमए पडलन्हि। अश्वघोष अपन बुद्धचरित मे सेहो अहि प्रसंग मे लिखने छथि –
“कराल जनकश्चैव हृत्वा ब्राह्मणकन्यकाम अवाप भ्रंशमप्येवं न तु से जे न मन्मधम्”
कहल जाइत अछि जे कराल जनकक प्रजा राजाक दुर्व्यहार सँ तंग आवि विद्रोह केलन्हि आर राजा के मारिओ देलन्हि आर विदेह राजतंत्रक ओहि दिन सँ भीतरे – भीतर काशीक हाथ सेहो रहल होएत एहन अन्दाज लगाओल जा सकइयै। सुरूचि जातकक अनुसार काशीक राजा ब्रह्मदत्त अपन पुत्री सुमेधाक विवाह विदेहक राजकुमार सँ करेबा लेल तैयार नहि भेला आर तकरा चलते विदेह राज काशी पर खिसिया गेलाह। आरो बहुत रास बात लकए काशी मिथिलाक उन्नति नहि देखए चाहैत छल आर तरे – तर मिथिला केँ नष्ट करबाक कुचक्र करैत रहैत छल। काशीक अतिरिक्त कुरू – पाँचाल सँ से हो मिथिला केँ मतभेद रहैत छलैक। कुरू – पाँचालक महत्व घटलाक बाद मिथिलाक प्रगति सँ कुरू – पाँचाल केँ ईर्ष्या होइत छलैक। कुरू – पाँचाल सँ पैघ विद्वानों के अहिठाम बजाओत जाइत छलैक। महाउमग्य जातक सँ ज्ञात होइछ जे उत्तर पाँचालक राजा ब्रह्मदत्त सँ मिथिलाक राजा के लडाई भेल छलैक आर अहि सब सँ दिनानुदिन मिथिला पर परेशानी बढले जाइत छलैक।
मिथिलाक राज्य मे सेहो आपसी संघर्ष होइते रहैत छलैक जाहि सँ ओहिठाम चारूकात असंतोष पसरल छल। इयैह कारण छल जे खण्ड सन सुयोग्य महामंत्री विदेह छोडि केँ वैशाली चलि गेल छलाह आर ओहिठाम सम्मानित भेल छलाह।
बुद्धघोषक अनुसारे जनक वंशक शासनक अंत भेला उपरांत लिच्छवी लोकनि ओकर उत्तराधिकारी भेलाह परञ्च अहि प्रश्न के लकए विद्वान कवीच अखनो मतभेद बनल अछि। पौराणिक आधार पर कहल जाइये जे वैशाली मे इद्वाकु वंशक अंत भेला पर वैशाली मिथिला मे मिलगेल परञ्च अहु पर विद्वान लोकनि एकमत नहिं छथि।
विदेह वृज्जीगणराज्यक (जाहि मे आठ गणराज्य सम्मिलित छल) संघक रूप मे पतंजलि विदेहक वर्णन केने छथि – “ संधान्माभूत पंचालानाम पत्यम विदेहा नामपत्यमिति”। विदेह आर वैशाली मे ई. पू. ६ ठम शताब्दी गणराज्य छल से मानल जाइत अछि। कराल जनकक बाद संभवतः मिथिला मे गणराज्यक स्थापना भेला उत्तरो ओहिठाम शासक केँ राजा कहल जाइत होन्हि से संभव। उवासगद साओ (पूम शताब्दीक) मे मिथिलाक वर्णन अछि। १२म शताब्दीक अभिधानप्पदीपिका मे २४ प्रसिद्ध नगरक नाम मे मिथिला आर वैशालीक नाम अछि। जैन आर बौद्ध साहित्य मे मिथिला केँ गणराज्यक रूप मे वर्णन कैल गेल छैक आर ओहि सँ ओकर प्रसिद्धि छलैक से स्पष्ट अछि। वैशाली समेत जे दशटा गणराज्यक उल्लेख पालि साहित्य मे अछि ताहि मे मिथिलोक स्थान छल जाहि सँ बुझना जाइत अछि जे कराल जनकक पतनक बाद वैशाली समेत विदेह मे गणराज्यक स्थापना भगेल। बुद्धक समय मे विदेहक गणना गणराज्यक रूप मे कैल गेल अछि। अजातशत्रुक आक्रमण सँ वैशालीक अंत भेल आर महापद्मनन्दक आक्रमण सँ मिथिलाक। वैशालीक पतनक बादो लगभग २५० वर्ष धरि मिथिला अपना केँ मगध साम्राज्यवादक चाङुर सँ मुक्त रखबा मे सफल रहल छल। नंदवंशक बाद भारत मे मौर्यक तत्वावधान मे एकटा अखिल भारतीय साम्राज्यक स्थापना भेल आर मिथिला ओकरे अंग भगेल।
अध्याय – ४
वैशालीक इतिहास
i.) भौगोलिक विश्लेषण : - अति प्राचीन काल मे भौगोलिक क्षेत्रक हिसाबें वैशाली विदेह राज्यक अंतर्गत छल, आर विदेह जकाँ वैशाली मे सेहो पहिने राजतंत्र छल आर तत्पश्चात् गणतंत्र भेल। वैशाली गण्डक सँ पूर्व अछि आर एकर आर्यीकरण विदेहक संग भेल छल। प्राचीन उत्तर विहारक वैशाली और विदेह दूनू महत्वपूर्ण राज्य छल आर दुनूक अपन अलग – अलग ऐतिहासिक महत्व छैक। अति प्राचीन विदेहक अंग होइतहुँ, वैशालीक सेहो अपन एकटा निर्धारित क्षेत्र छैक। प्राचीन वैशालीक अंतर्गत चम्पारण आर मुजफ्फरपुर जिलाक विशेष भाग छल आर विदेहक अंतर्गत छल दरभंगा, कटिहार, समस्तीपुर, मधुबनी, सहरसा, पूर्णियाँ, अररिया, बेगुसराय, मूँगेरक उत्तरी भाग, भागलपुरक उत्तरी भाग आर नेपालक तराई सेहो विदेह वैशालीक अंश छल।
विदेह शब्दक अर्थ ताहि दिन मे वेस व्यापक छल – विदेह एकटा जातिक नामक संकेत सेहो दैत छल। विदेह एकटा भौगोलिक सीमाक प्रतीक छल एवं विदेह एकटा राज्य छल जकरा अंतर्गत ताहि दिन मे गण्डकीक पूव सँ महानंदा धरिक समस्त क्षेत्र सम्मिलित छल। आधुनिक उत्तर विहारक द्दोतक छल विदेह। इयैह कारण थिक जे अहि व्यायकताक कारणे महावीरक जन्मस्थान कुण्डग्राम केँ विदेह मे मानल गेल अछि, अजातशत्र्य केँ वैदेही पुत्र कहल गेल अछि। विदेहक व्यापकताक प्रभाव पाछाँ धरि बनल रहल कारण हम देखैत छी जें ‘ललित विस्तार’ मे विदेहक संगहि पूर्व विदेहक वर्णन सेहो अछि। शक्ति संगम तंत्र मे जें मिथिला क्षेत्रक वर्णन भेल अछि ताहि मे कहल गेल अछि गण्डकीक तीर सँ चम्पाक जंगल धरिक जे क्षेत्र अछि उयैह क्षेत्र विदेह अथवा तैरभुक्ति कहबैत अछि। चम्पाक जंगल सँ अहिठाम बहुत गोटए चम्पारणक उत्तरी जंगली भागक अर्थ लैत छथि मुदा जखन हम एकर सीमाक विश्लेषण समीचीन नहिं अछि कारण विदेहक सीमा एतबेटा नहिं भसकइयै। चम्पाक जंगल धरिक अर्थ भेल वो क्षेत्र जे चम्पाक उत्तरी भाग मे छल आर जकरा बौद्ध साहित्य मे अंगुतराय कहल गेल अछि। चम्पा आर विदेहक सीमा कोनो एक खास बिन्दु पर मिलैत छल अहि मे संदेह नहिं। पुरूषोत्तम देव अपन त्रिकाण्डशेष मे, वामन अपन लिंगावुशासन मे एवं विदेह आर तीरभुक्ति केँ पर्यायवाची शब्द मानने छथि। बारहम शताब्दीक एकटा शिलालेख मे वैशाली केँ तीरभुक्तिक अंतर्गत बताओल गेल अछि। जीनप्रभासूरी अपन विविध तीर्थकल्प मे सेहो किछु अहि प्रकारक संकेत दैत तीरभुक्तिक विवरण देने छथि। शक्ति संगम तंत्र मे सेहो विदेह आर तीरभुक्ति केँ पर्यायवाची शब्द मानल गेल अछि। बौद्ध लोकनि विदेह आर वैशाली केँ दू अलग – अलग राज्यक रूप मे वर्णन कएने छथि। बौद्ध साहित्य मे वैशाली आर वृज्जि केँ पर्यायवाची मानल गेल अछि।
मूँगेर आर भागलपुरक उत्तरी भाग के बौद्ध साहित्य मे अंगुतराय कहल गेल अछि जकर सीमा कोनो समय मे लिच्छवीक राज्य सँ मिलैत छल। अंगुतरायक सीमा कमला – कोशीक बीच छल। प्राचीन अंगक उत्तरी सीमा छल कोशी आर पश्चिम मे एकर क्षेत्र बेगुसरायक गण्डकी धरि पसरल छल। वैशालीक लिच्छवी लोकनिक अधिकार कमला नदी धरि बढि गेल छलन्हि अर तकर बाद मिथिलाक राज्य शुरू होइत छल जाहि मे ताहि दिनक अंगुतराय आर पुण्डवर्धन मुक्तिक किछु अंश समाहित छल। तैं हमरा बुझने शक्ति संगम तंत्र मे जे चम्पाक जंगल धरिक गप्प अछि तकरा सँ चम्पारण नहिं बुझि अंगुतराय एवं ओकर ओहि क्षेत्रक वोध होइछ जाहिठाम ताहिठाम खाली जंगले – जंगल छल आर जमीन सेहो दलदले छल। गण्डकी सँ अंगक जंगलक सीमा धरि विदेहक राज्य पसरल होएत ई वेसी तर्कसंगत बुझि पडइयै आर तैं अखनो ई परिभाषा एकटा विचारणीय विषय बनल अछि। ii.) ऐतिहासिक विवरण (राजतंत्र धरि) : - विदेहक प्राचीन इतिहास जकाँ वैशालीक प्राचीन इतिहास ओझरैले अछि। यद्धपि पौराणिक श्रोत सँ वैशालीक विवरण भेटैत अछि परञ्च वैदिक साहित्य मे वैशालीक कोनो श्रृंखलाबद्ध विवरण उपस्थित नहिं अछि। यत्र – तत्र एहन एकाधटा नाम वैदिक साहित्य अथवा वेद मे भेटैत अछि जकर सम्पर्क वैशाली सँ रहल हो परञ्च अहि आधार पर वैशालीक कोनो इतिहास निर्माण करब असंभव। अथर्ववेद मे तक्षक वैशालेयक उल्लेख अछि आर हुनका विशालान्मज विराजक पुत्र कहल गेल छन्हि। पंचविश ब्राह्मण मे हुनके (वैशालेय) केँ एकटा सर्वयज्ञक पुरोहितक रूप मे वर्णन कैल गेल अछि। पुराण मे वैशालीक इतिहासक संबध मे बहुत रास सामग्री अछि परंतु ओहि मे ततेक ने विरोधाभास अछि जे ओहि मे सँ कोनो ठोस सत्यक निर्माण करब एकटा कठिन कार्य। मार्कण्डेपुराण मे मनु आर हुनक पुत्र प्रियव्रत तथा उत्तानपादक कथा अछि। प्रियव्रतक संतानक घनिष्ट संबध वैशाली एवं हिमालय क्षेत्र सँ छलन्हि। वृद्धावस्था मे अग्निध्र (प्रियव्रतक पुत्र) गण्डकी पर अवस्थित शालग्राम (हिमालय) गेल छलाह। हुनक पुत्र नाभि तपस्याक हेतु वैशाली आएल छलाह। ताहि दिन मे वैशाली विशालक नाम सँ प्रसिद्ध छल। नाभिक पुत्र छलाह ऋषभ (संभवतः प्रथम जैन तीर्थकर ईयैह छलाह) आर हुनक पुत्र भेला भरत जिनका नाम पर अहि देशक नाम अछि। भारतवर्षक पुर्व’क नाम छल हिमवर्ष। भरत अपन राज्य सुमति के दए तपस्या मे चल गेलाह।मार्कण्डे, भागवत, विष्णु आदि पुराण मे वैशालीक इतिहास जे विवरण अवइयै ताहि मे तत्तेक नेऽ संशयात्मक बात सब अछि जे हमरा लोकनि कोनो एकटा निर्णयात्मक सत्य पर नहिं पहुँचि सकैत छी तथापि ओहि श्रोतक आधार पर एकटा वैज्ञानिक इतिहासक रूपरेखा ठाढ करबाक प्रयास केल गेल अछि। गजेन्द्र मोक्षक प्रसंग सेहो वैशालीक इतिहासक प्रसंग मे अवइयै। गजे – ग्राहक संघर्ष वैशालीक गण्डकी क्षेत्र मे भेल छल आर कहल गेल अछि जे विष्णु गज के ग्राहकक चाङ्गुर सँ वचाकेँ अहि क्षेत्र केँ एकटा तीर्थक थान बना देलन्हि। ई घटना गंगा – गण्डकक संगम पर भेल छ्ल आर तैं एकटा गजेन्द्र मोक्ष तीर्थ,हरिहर क्षेत्र, हरि क्षेत्र कहल गेल अछि आर पुराण मे अहि स्थान केँ विशाल क्षेत्रक अधीन राखल गेल अछि। दिप्तिक तपस्याक क्षेत्र सेहो वैशाली छल। दिप्तिक पुत्र मरूत लोकनि जे समुद्रमंथनक कार्य कएने छलाह ताहि सँ ई स्पष्ट होइछ जे अति प्राचीन कालहि सँ वैशालीक लोक समुद्र सँ परिचित छलाह। हिन्दु, जैन आर बौद्ध धर्मक दृष्टिये सेहो वैशालीक इतिहास महत्वपूर्ण मानल जाइयै।
विदेह – वैशालीक प्राक – इतिहासक संबध मे हमरा लोकनिक ज्ञान एकदम स्वल्पो सँ कम अछि तथापि जे किछु हम जानतो छी से रामायण, महाभारत, पुराण आदि ग्रंथक आधार पर। ओहु सब साधन मे सब मे अलग –अलग विवरण अछि। विदेहक आर्यीकरण सँ वैशालीक इतिहास प्रारंभ होइत अछि आर प्राचीन ग्रंथक आधार ई बुझना जाइत अछि जे मनुवैवस्वत केँ ९ टा पुत्र छलथिन्ह आर एकटा पुत्री जिनक नाम छलन्हि इला। नवो पुत्रक नाम अछि – इलाकु, नाभाग (नृग) , धृष्ट, शरयाति, नरिष्यंत, प्रांशु, नाभाने दिष्ठ, कारूष आर पृषधर। मनु भारत केँ १० भाग मे बटलन्हि। अहि ९ वो पुत्र मे नाभानेदिष्ठ वैशाली राज्यक संस्थापक भेलाह। हिनका वंश मे ३४ टा शासक भेलथिन्ह जाहि मे सन सँ अंतिम छलाह सुमति। सुमति अयोध्याक दशरथ आर विदेहक सीरध्वज जनकक समकालीन छलाह।
नाभाने दिष्ठक संबध मे सेहो प्राचीन साहित्य मे एकमत नहिं छैक। रामायण महाभारत अहि नाम पर गुम्म छथि। एहन बुझि पडइयै जे पाछाँ चलि के लोग अहि नाम के बिसैर गेल छल। राजा विशाल केँ वैशालीक संस्थापक मानल गेल छन्हि। रामायण मे वैशालीक राजा सुमतिक शासन क्षेत्र संबध मे कहल गेल अछि जे हुनक गण्डक सँ पुर्व आर विदेह सँ दक्षिण पश्चिम दिसि छल। अहि सँ स्पष्ट अछि जे नाभाने दिष्ठ जाहि राज्यक स्थापना वैशाली मे केने छलाह तकर सीमा ताहि दिन मे बड्ड छोट छल। हुनक पुत्र भेला नाभाग, जे वैश्य कन्या सँ विवाह केलाक कारणे, गद्दी सँ वंचित रहलाह। कृषि आर व्यवसाय मे वो वेसी रत रटए लगलाह आर हुनका भाई सब सँ सेहो नहिं पटलाक कारणे बरोबरि १२ घंटा लगले रहैत छलन्हि। नाभाग अपनी पत्नी प्रेमक चलते राजगद्दी केँ त्यागलन्हि आर क्षत्रियत्व छोडि वैश्यत्व ग्रहण केलन्हि। हुनका तीनटा पुत्र छलथिन्ह जाहि मे एकटाक नाम भालनंद छलन्हि आर दू भाई ब्राह्मणत्व प्राप्त कए ने छलाह। नाभागक अथक परिश्रमक कारणे वैशाली क्षेत्र मे कृषि आर व्यवसाय केँ प्रोत्साहन भेटलैक आर अति प्राचीन कालहि सँ वैशाली कृषि एवं उद्योगक प्रधान केन्द्र बनि गेल। एक विद्वानक तँ इहो मत छन्हि जे नाभागक वैश्यत्व ग्रहण करब वैशालीक नामक उत्पत्ति सँ संबध रखइयै। नगरक हिसाबें नाभाग अपना क्षेत्र केँ वैश्य लोकनिक हेतु सब सँ प्रमुख नगर बनैलन्हि आर उयैह नगर वाद मे वास्यु लोकनिक नगर अथवा वैशालीक नाम सँ प्रसिद्ध भेल। विदेह ब्रह्मविद्या आर आर्यसंस्कृतिक केन्द्र बनल आर वैशाली कृषि, उद्योग, वेद विरोधी धर्म आर कुलीनतंत्र शासन पद्धतिक केन्द्र। ओहि युग मे मात्र पत्नीक हेतु राजगद्दीक त्याग करब एवं ब्राह्मण व्यवस्थाक परित्याग कए वैश्यत्व ग्रहण करब एक महान – क्रांतिकारी कदम छल। अहि विवाहक एकटा दोसरो असर पडल सामाजिक व्यवस्था पर जकरा चलते वैशाली मे बादक राजा सब केँ “आयोगम” कहल गेल अछि। अहि सँ एक एहेन जातिक वोध होइछ जकर माय वैश्य आर पिता शूद्र रहल हो। शतपथ ब्राह्मण मे राजा मरूत्त केँ आयोगम कहल गेल अछि। नाभागक वैश्य पत्नीक नाम सुप्रभा छलैन्ह। सुप्रभा सँ उत्पन्न पुत्रक नाम छल भलंदन। वो राजर्षिनिप (काम्पिल्त) सँ सहायता लय अपन पैत्रिक राज्य केँ प्राप्त करबाक प्रयत्न केलन्हि आर अहि क्रम वो सफल भेलाह आर अपन सर संबन्धी केँ पराजित कए वो राज्य प्राप्त केलन्हि आर राजमुकुट अपना पिताक देलन्हि मुदा पिता वो ग्रहण करबा सँ अस्वीकार केलथिन्ह। तखन भलंदन स्वयं शासक भ गेलाह। न्यायपूर्वक ढंग सँ वो शासन केलन्हि आर अपन कर्तव्यपथ पर चलैत रहलाह। हुनका वत्सप्रि नामक एकटा योग्य पुत्र छलथिन्ह। वत्सप्रिक पत्नीक नाम छल मुदावती (सुनंदा)। अपना पिताक बाद वत्सप्रि शासक भेलाह। हुनक दोसर नाम अजवाहन सेहो छलैन्ह। वो मालवाक राजाक संग वैवाहिक संबधक कारणें वो एक पुश्तधरि मालवा पर सेहो शासन केलन्हि। हुनक शासन काल शांतिप्रिय छल आर वो अपन उदारता एवं महानताक हेतु प्रसिद्ध छलाह। सुनन्दा (मुदावती) सँ १२ टा पुत्र छलथिन्ह – प्रांशु, प्रचीर, सूर, सुचक्र, विक्रम, क्रम, बालीन, बलाक, चण्ड, प्रचण्ड, सुविक्रम, स्वरूप। पौराणिक श्रोत सँ इहो ज्ञात होइछ जे वेदक तीनटा वैश्य मंत्रकर्त्ता लोकनि वैश्यलियेक शासक छलाह जनिक नाम छलैन भलंदन, वत्सप्रि आर संकील। प्रांशु अपन पिताक पछति वैशालीक शासक भेलाह। वो एकटा सशक्त शासक छलाह। ओकर बाद प्रजानि, (प्रजापति, प्रमति) हुनक पुत्र, शासक भेलाह। अहि समय मे वैशाली राज्य मे किछु आपसी संघर्ष शुरू भेल। प्रजानिक पाँच पुत्र मे खनित्र महत्वपूर्ण भेलाह आर अपन पिताक बाद शासक सेहो। वो बहुत वीर आर वुधियार छलाह। अपना प्रजाक हेतु वो सब किछु करबा लेल प्रस्तुत रहैत छलाह। अपना भाई सबहिक प्रति वो दयावान आर विचारवान छलाह। वो अपन सब भाई केँ अपना अधीन मे छोट – छोट राजा बना देने छलाह। अंत मे हुनके एकटा छोट भाई हुनका विरोध मे विद्रोह कए राज्यक शांति केँ नष्ट कए देल। खनित्रक पछति हुनक पुत्र क्षुप शासक भेलाह। हुनका चाक्षुश सेहो कहल जाइत छन्हि। वो ब्राह्मण लोकनिकेँ प्रचुर दान दए यशक भागी बनलाह। हुनका बाद हुनक पुत्र विविंश राजा भेलाह। हुनका समय मे जनसंख्याक वृद्धिक कारण अन्याय बढि गेल छल। स्थिति’क सुधारक हेतु वो कैक प्रकारक यज्ञ सेहो केलन्हि।विविंश केँ १५टा पुत्र छलथिन्ह जाहि मे सब सँ पैघक नाम छलैन्ह खनीनेत्र । हुनका पुराण मे धार्मिक शासक कहल गेल छन्हि। वो ब्राह्मण केँ उदारतापूर्वक दान दैत छलाह। हुनका पुत्र नहि छलन्हि तँ पुत्र प्राप्तिक हेतु वो पशुयज्ञक त्याग केलन्हि गोमतीक तट पर पापहारिणी यज्ञक आयोजन केलन्हि। एकर फलस्वरूप हुनका एकटा पुत्र भेलन्हि जकरनाम बलाश्व छल। वैशालीक इक्ष्वाकु – मानव क्षेत्र मे बलाश्वक राज्यारोहण सँ ऐतिहासिक स्तर पर आर्यक तत्वक विस्तार भेल। अहि राजा के बलाश्व – करनधम सेहो कहल जाइत अछि। खनीनेत्र आर करनधमक बीच मे एकटा विभूति राजाक उल्लेख सेहो भेटइत अछि।
करनधम वैशालीक एकटा महत्वपूर्ण शासक छलाह। वो बहुत रास क्षेत्र केँ जीतलन्हि आर अपन राज्यक अंतर्गत केलन्हि। नव – नव प्रकार कर पराजित राज्य पर लगैलन्हि। वीरा नामक कात्या सँ स्वयंवक माध्यमे हुनक विवाह भेल छलैन्ह। आर ओहि सँ उत्पन्न पुत्रक नाम छल अविक्षित । अविक्षित एतक निपुण एवं योग्य छलाह जे सात ठाम स्वयंवर मे हुनके जयमाल पडलन्हि। जयमाल पहिरौनिहार कन्याक नाम एवं प्रकार अछि –
____ i.) हेमधर्मक पुत्री वरा
____ ii.) सुदेवक पुत्री गौरी (काशी) ____ iii.) बालिनक पुत्री सुभद्रा (अंग – वंग)
____ iv.) वीरक पुत्री लीलावती (अविक्षितक रायक बहिन) ____ v.) वीरभद्रक पुत्री अनिभा (ऐजन
____ vi.) भीमक पुत्री मान्यवती (विदर्भ)
____ vii.) दम्यक पुत्री कुमुदवती (मालवा) उपरोक्त सूची अहिबातक द्धोतक अछि जे वैशालीक सम्पर्क ताहि दिन मे सब प्रसिद्ध राज्य सब सँ छल आर अहि सँ वैशाली राज्यक महत्वक संकेत भेटैत अछि। अंग, वंग, विदर्भ, मालवा आदि राज्यक संग सम्पर्क तत्कालीन अंतर राज्य सम्बन्धक प्रतीक मानल जा सकइयै। नहि दिन हैहय राज्यक शासक लोकनि विदेह एवं वैशाली पर आक्रमणक सूरसार मे लगेल रहैत छलाह परञ्च हुनका लोकनि केँ अहि मे कोनो सफलता नहि भेटलन्हि कारण करनधर्म, अविक्षित, एवं मरूत्त सन् शासक वैशालीक राजगद्दी पर छलाह। करनधर्म अपना युगक एकटा प्रतिभाशाली व्यक्तित्व छलाह जे वैशाली एवं समस्त उत्तर भारतक इतिहास पर एकटा अमिट छाप छोडने छथि। महाभारत मे जे पाँचटा तीर्थक वर्णन अछि ताहि मे कारन्धमतीर्थक महत्वपूर्ण स्थान अछि। आन तीर्थक नाम अछि अगस्त्य, सौभद्र, पौलोम एवं भारद्वाजीय। महाभारत मे करन्धम के एकटा प्राचीन धर्मात्मा राजाक रूप मे वर्णन कैल गेल छैक। स्कन्धपुराण मे करन्धम केँ राजर्षि कहल गेल छैक। करन्धम एक महान शासक छलाह आर अपना राज्यक सब विद्रोही तत्व केँ दबा केँ एक सशक्त राज्यक स्थापना कएने छलाह आर बहुत दिन धरित शासन कएने छलाह। वैशालीक साम्राज्यवादी परंपराक जन्मदाता करन्धम के मानल जाइत अछि। हुनक पुरोहित छलथिन्ह अंगीरस। हुनके शासन काल सँ वैशालीक राजदरबार मे अंगीरस पुरोहित लोकनिक प्रभाव बढलन्हि। करन्धराक वाद हुनक पुत्र अविक्षित शासक भेला। वो हैहेय आक्रमण के रोकबा मे समर्थ भेलाह। विदिशाक संग सेहो हुनका किछु खटपट भेल छलैन्ह। तकरबाद हुनक पुत्र मरूत्त शासक भेला। पुराण मे मरूत्त केँ चक्रवर्त्तीक संज्ञा देल गेल छैक। महाभारत मे मरूत्त केँ भारतक १६ राजा मे सँ एक प्रमुख राजा मानल गेल छैक। एक किंवदंती छैक जे न्यायक तरूआरि मुचुफुन्द सँ लकए मरूत्त रैवत केँ देलथिन्ह आर अहि सँ ई ज्ञात होइत अछि जे वो एक न्याय–प्रिय शासक छलाह। हुनक अंगिरस पुरोहितक नाम छल सम्वर्त। वो बड्ड पैघ – पैघ यज्ञ कएने छलाह आर धर्मप्रिय शासक मे हुनक नाम अग्रगण्य छन्हि। मरूत्त अपन पुत्रीक विवाह संवर्तक संग केलन्हि।हिनका शासन काल मे ‘एन्द्रेमहाभिषेक’ क आयोजनक उल्लेख भेटइयै आर अश्वमैघ यज्ञक श्रेय हुनका देल जाइत छन्हि। विभिन्न स्थान पर पैघ – पैघ यज्ञ करबाक आर करेबाक श्रेय सेहो हिनका देल जाइत छन्हि। स्कन्दपुराणक अनुसार गण्डकी उपत्यमक राजा मरूत्त यज्ञ करबाक हेतु एक बेर जय आर विजय केँ आमंत्रित कएने छलाह आर हुनका लोकनि केँ प्रचूर दक्षिणा देने छलाह। कोनो अघटित घटनाक चलते हिनका दुनु गोटए केँ श्राप पडलन्हि आर इयैह दुनु गोटए ग्रज आर ग्राह मे अहि क्षेत्र मे परिवर्तित भ गेलाह आर वाद मे इयैह स्थान हरिहर क्षेत्रक नाम सँ प्रसिद्ध भेल। मरूत्त नाग आर हैटेय लोकनि केँ सेहो पराजित केलन्हि। मरूत्त के सात टा पत्नी छलथिन्ह –
____ i.) विदर्भ राजक पुत्री प्रभावती
____ ii.) सौवी राजक पुत्री – सुवीग
____ iii.) मागधकेतुवीर्भक पुत्री – सुकुशी
____ iv.) मद्रराजासिन्धुवीर्भक पुत्री – केकयी
____ v.) केकयी राजक पुत्री – सैरन्ध्री
____ vi.) सिन्धुक आनवराजक पुत्री – वपुषमती
____ vii.) चेद्री राज्यक पुत्री – सुशोमना
____ अहि वैवाहिक संबध सँ वैशालीक स्थिति सुदृढ छल आर भारतक विभिन्न राज्यक संग एकर संबध सेहो नीक छल। मरूत्तक अठारह पुत्र मे ज्येष्ठ पुत्रक नाम छल नरिष्यंत।
नरिष्यंत एक प्रमुख शासक छलाह आर उहो वैवाहिक सम्बन्धक माध्यमे अपन ताकत बढौलन्हि। ओकर बाद हुनक पुत्र दम शासक भेलाह। दमक बाद राज्यवर्द्धन आर वो दक्षिणापथ सँ अपन वैवाहिक संबध स्थापित केलन्हि। एकर बाद पुनः वैशालीक इतिहास अंधकारपूर्ण अछि आर तृणविन्दूक रज्यारोहण सँ पुनः हमरा लोकनि एकटा लीख पर पहुँचैत छी।
तृणबिन्दुक संबध मे कोनो विशेष जानकारी हमरा लोकनि केँ नहि अछि। संभव जे वो कोनो स्थानीय शासक रहल होथि आर राजनैतिक अस्थायित्वक स्थिति सँ लाभ उठाकए एकटा संशक्त राज्यक स्थापना मे समर्थ भेल होथि। पुराण सब मे तृण विन्दु महिपति आर राजर्षि दुनु कहल गेल छैक। हिनक पत्नीक नाम छल अलभकुषा आर हिनका लोकनिक केँ तीनटा पुत्र छलैन्ह – विशाल, शूत्यबंधु आर धूम्रकेतु। विशाल वैशाली नगरक संस्थापक मानल जाइत छथि। हिनक पुत्री इलविलाक विवाह पुलसय (दक्षिणक राक्षसवंश) सँ भेल छल। एवं प्रकारे अहि वेर क्षत्रिय कन्याक विवाह ब्राह्मण सँ भेल। बुझि पडइयै जे वैशालीक शासक लोकनि विवाह’क मामला मे उदार छलाह। अहि सँ उत्पन्न पुत्र विश्ववस मुनिक आश्रम नर्मदा तट पर छल। दक्षिण पौलस्य वंशक उत्पत्ति वैशालीक राजवंश सँ भेल छल।
तृणबिन्दुक पुत्र विशाल प्राचीन भारतीय इतिहासक प्रसिद्ध मील स्तंभ मानल जाइत छथि। वो अपना नाम पर अपन राजधानीक नाम विशाला रखलन्हि जे कालक्रमेण वैशालीक नाम सँ प्रसिद्ध भेल। मार्कण्डेपुराण मे सेहो एकटा विशालग्रामक उल्लेख भेटैत अछि आर अथर्ववेद मे वर्णित तक्षक वैशालेयक उल्लेख तँ हम पूर्वहिं क चुकल छी। राजा विशाल केँ विशालाक प्रभु, आर विशालापुरीक संस्थापकक रूप से बताओल गेल अछि। ओहि समय मे गया आर वैशालीक बीच घनिष्ट सम्पर्क छल। राजा विशाल पिण्डपूजा आर पिण्डदानक समर्थक छलाह आर ऐतिहासिक दृष्टिकोण सँ हुनका पिण्डदानक प्रवर्तको कहल जा सकइयै। ब्रह्माण्डपुराण मे राजा विशाल केँ धर्मात्मा पुरूष कहल गेल अछि। मार्कण्डेपुराण मे विशाल नामक एकटा ब्राह्मण आर हुनक पुत्र वैशालीक उल्लेख भेटैत अछि। वैशाली मे एकटा महावत छल जे गौतमबुद्धक समय धरि विराजमान छल। विशाल बहादुरीक द्धोतक सेहो बुझल जाइत अछि। आर संभवतः अहु अर्थ मे ‘वैशाली’ शब्दक उद्भव भेल हो। सम्प्रति ‘राजा विशालक गढ’ प्राचीन वैशालीक खण्डहरक रूप मे विराजमान अछि जकर उत्खनन सँ ताहि दिनक बहुत रास सामग्री उपलब्ध भेल अछि। विशालक बाद हेमचन्द्र शासक भेलाह, तखन क्रमिक रूपें सुचन्द्र, धूम्राश्व, श्रृंञय, सहदेव, वृशाश्व, सोमदत्त, जनमेजेय, आर सुमति। वैशालीक इतिहास मे सुमतिक शासन बड्ड महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। अपनावंशक वो सब सँ अंतिम राजा मानल गेल छथि। विश्वामित्र जखन राम लक्ष्मणक संग वैशाली पहुँचल छलाह तखन अहिठाम सुमति शासन करैत छलाह। वैशाली केँ ‘उत्तमपुरी’ कहल गेल अछि। देखबा मे वो एतेक सुन्दर एवं स्वर्गीय छल जे सामान्य लोग केँ बुझि पडैत होइक जे जेना ई स्वर्गे हो। सुमति आदरपूर्वक विश्वामित्र राम एवं लक्ष्मणक ठहरबाक प्रबंध केलथिन्ह आर यथायोग्य स्वागत सेहो। ओहिठाम सँ मिथिला पहुँचबाक बीच मे वो लोकनि गौतमाश्रम सेहो रूकल छलाह। सुमतिक बाद वैशालीक इतिहास पुनः अंधकारपूर्ण भगेल आर एकर कि स्थिति रहल तकर कोनो ज्ञान हमरा लोकनि केँ नहि अछि। राजतंत्रक अंत आर कुलीनतंत्रक प्रगति जे कोना अहि क्षेत्र मे भेल तकरा संबन्ध मे अखनो विशेष बात संदिग्ध एवं अनिश्चिते अछि।
iii.) सुमतिक पछति आर वज्जीकुलीनतंत्रक स्थापना धरिक इतिहास : -
सुमतिक शासनक अंत भेला पर लगभग ६०० वर्षक पछति वैशाली मे कुलीनतंत्रीय शासनक विकास भेल आर कमेण वृज्जीसंघ सेहो। अहि ६०० वर्ष केँ वैशालीक इतिहास मे अन्धकार युग कहल गेल अछि। साहित्य एवं पौराणिक परंपरा मे सुमतिक बाद कोनो राजाक नामक संकेत नहि अछि। महाभारत युद्धक समय मे विदेह, कोशल एवं मल्लराष्ट्रक विवरण तँ भेटैत अछि परञ्च वैशालीक संबध मे कोनो सूचना उपलब्ध नहि होइछ। एहेन बुझि पडइयै जे सुमतिक अवसानक पछाति विदेहक पराक्रम बढि गेल छल आर वैशालीक विशेष भाग पर संभवतः विदेहक अधिपत्य भगेल छल। उत्तर विहारक विदेह आर मल्लक उल्लेख महाभारत युद्धक प्रसंग मे अवैत अछि तँ संभव जे वैशालीक विशेष भाग पर विदेहक अधिपत्य (वैशाली पर विदेह राज्यक आधिपत्य) भगेल हो आर किछु अंश पर मल्ल लोकनिक। वैशालीक स्वतंत्र सत्ता समाप्त रहलाक कारणे वैशालीक स्वतंत्र उल्लेख नहि भेटल स्वाभाविके बुझि पडइत अछि। किछु विद्वानक मत छैन्ह जे राजा सुमतिक पछाति वैशाली पर किछु दिनक हेतु कोशलक आधिपत्य भगेल छल। कोशलक कमजोर भेला पर विदेह राज्य ओहि परिस्थिति सँ लाभ उठा केँ वैशाली केँ अपना अधीन कलेलैन्ह। ताहि दिन मे रामक सार भानुमंत मिथिला मे शासक छलाह। वैशालीक प्रभुत्व घटि चुकल छल। विदेहक आधिपत्य भेला संता वैशालीक अपन जे स्वतंत्र संबन्ध यादव अथवा पाण्डव लोकनि सँ रहल हेतैन्ह सेहो गौण भ गेल हेतैन्ह आर ई लोकनि अपन अधीनस्थ स्थितिक कारणें गुम – सुम भए अपन समय कटैत हेताह। भ सकइयै जे विदेहक राजतंत्रक अंत भेने दुनु ठाम एक्के वेर कुलीनतंत्रीय गणतंत्रक स्थापना भेल हो।
सुमतिक पछाति मिथिलाक इतिहासक जे क्रम उपलब्ध अछि ताहि आधार पर ई उचित बुझना जाइत अछि जे मिथिला अपन साम्राज्यवादी प्रसारक क्रम मे वैशाली केँ पराजित कए अपना अधीन कलेने होएत। साम्राज्यवादी प्रवृतिक प्रारंभ सीरध्वज जनक धरि जमवत छल आर वो साँकास्त धरि अपन राज्यक सीमाक विस्तार कएने छलाह। महाभारत युद्धक पश्चात जे एकटा अनिश्चितताक स्थिति उत्पन्न भेल ताहि सँ लाभ उठाके जनकवंशक शासक गण, उग्रसेन, जनदेव, धर्मध्वज, तथा आयुस्थन, अपन साम्राज्यवादी परंपरा केँ आगाँ बढौलन्हि आर करीब बारह पुस्त धरि एकरा जारी रखलन्हि। अयोध्याक राज्यक छिन्न – भिन्न भेल उत्तरो मिथिलाक राज्यक विस्तार होईते रहल। कोशल – काशी मे बरोबरि खटपट होइत रहल। वैशालीक वस्तुस्थितिक संबध मे कोनो ठोस ज्ञान हमरा लोकनि केँ अहि समय मे नहि अछि।
महाभारत मे प्राचीन भारतीय गणतंत्र एवं विभिन्न जातिक विवरण भेटइत अछि परञ्च ओहु सूची मे वैशाली अथवा ओहिठामक गणतंत्रक कोनो उल्लेख नहि अछि। एकमात्र उल्लेख जे वैशालीक संबध मे अछि से विशालाक पुत्री भद्रा – वैशाली – जाहि राजकुमारीक हेतु द्वारावतीक वासुदेव, वेदिक शिशुपाल, एवं कारूषक शासक लालायित रहैत छलाह। वैशाली मे नाग प्रधानक उल्लेख सेहो भेटैत अछि आर कहल जाइत अछि ई लोकनि अर्जुनक साहायता कएने छलथिन्ह। वैशाली मे नाग लोकनिक प्रधानताक विवरण दीर्घनिकाय आर महावंश मे सेहो भेटैत अछि। अथर्ववेद मे तक्षक वैशालेयक उल्लेख तँ हम पूर्वहिं क चुकल छी। वैशाली सँ गुप्तकालीन अवशेष मे बहुत रास सर्प मूर्ति भेटल अछि जाहि सँ ई स्पष्ट होइछ जे अहिक्षेत्र नाग लोकनिक प्रधानता रहल हेतैन्ह। [ कहल जाइत अछि जे भीमसेन अपन दिग्विजयक क्रम मे गण्डक लोकनि केँ पराजित कएने छलाह। अहुठाम वैशाली नाम नहि दए गण्डक लोकनिक (गण्डकक समीप रहनिहार) नाम अछि आर अहु सँ बुझि पडइयै जे वैशालीक राजनैतिक महत्व तादिन धरि समाप्त भ चुकल छल। ओहि दिग्विजयक क्रमक जे सूची अछि ताहि मे विदेहक पूर्वहिं गण्डक लोकनिक विवरण अछि। भीमसेन उत्तरी कोशल, मल्ल, जलोद्भव, जनक वैदेह, शक, वर्बर, एवं सातटा किराल प्रधान केँ पराजित कएने छलाह आर आर शरमक, वर्मक आर गोपालकक्ष लोकनि के सेहो। किछु गोटएक मत छन्हि जे ई तीनू वर्ग वैशलीक निवासी छलाह आर ओतहिक ब्राह्मण, क्षत्रिय आर वैश्यक द्धोतक सेहो। मुदा ठोस साधनक अभाव मे ई सब एकटा अंदाज मात्रथिक आर तै अहि पर पूर्ण विश्वास करब असंभव। सुमतिक वाद सँ लिच्छविक उत्थान धरिक इतिहास अंधकार पूर्ण अछि आर ओहि मे जे कोनो एकटा मान्य तथ्य अछियो तँ सए मात्र इयैह अहि ६०० वर्षक अभ्यंतर मे वैशाली कैक टुकडा मे बहि गेल छल आर मुख्य रूप सँ विदेह एवं मल्ल लोकनि एकर विशेष भाग पर अपन आधिपत्य स्थापित क लेने छल।
iv.) मिथिला मे गणराज्यक स्थापनाक इतिहास : - अन्धकार युग सँ जखन वैशाली अवतीर्ण होइछ तखन हम देखैत छी जे वैशालीक नेतृत्व मे समस्त उत्तर बिहार मे एकटा कुलीनतंत्रीय गणराज्यक परंपराक स्थापना होइत अछि। ई. पू. छठी शताब्दी समस्त विश्वक इतिहास मे अपन एकटा महत्वपूर्ण स्थान रखइयै आर भारत मे तँ सहजहि ई युग एकटा युगांतकारी युग छल राजनैतिक आर साँस्कृतिक दृष्टिये। मिथिलाक इतिहास दृष्टिये सेहो ई युग युगांतकारी कहल जा सकइयै। राजनीति मे राजतंत्रक उत्तराधिकारी गणतंत्र भेल आर विचारक क्षेत्र मे वर्धमान महावीर आर गौतमबुद्ध एकटा नव कीर्तिमान स्थापित केलन्हि। वैशाली मे कहिया आर कोना गणराज्यक स्थापना भेल एकर ठीक –ठीक पता हमरा लोकनि के नहि अछि मुदा एतवा हम सब जनैत छी जे महावीर आर बुद्धक समय मे वैशाली मे कुलीनतंत्रीय गणराज्यक प्रभुत्व छल। बुद्ध जाहि शब्द मे वैशालीक गणराज्यक प्रशंसा कएने छथि ताहि सँ बुझना जाइत अछि जे बुद्ध सँ १०० – २०० वर्ष पूर्वहिं सँ ई गणराज्य रहल हो। कराल जनकक अत्याचारी शासन सँ तंग आवि जखन प्रजा विद्रोह कए विदेह राज्य मे क्रांति मचौलक तखन ओहिठाम राजतंत्रक अवसान भेल आर गणराज्यक स्थापना। कहल जाइत अछि जे शि घटनाक फलस्वरूपे समस्त उत्तर विहार मे गणराज्यक परंपरा प्रारंभ भेल आर चूँकि वैशाली विदेहक अंग छल तै वैशालियो मे गणराज्यक स्थापना भेल। कराल जनक विदेहक जनक वंश अंतिम राजा छलाह आर हुनक अवसानक पछातिये सँ मिथिला मे गणतंत्रक स्थापना मानल जाइत अछि। कहल जाइत अछि महाभारत युद्धक २२ पुस्तक बाद बौद्ध धर्मक उत्थान भेल आर अहि बीच मे मिथिला मे गणतंत्रक स्थापना भेल होएत। पुराण मे अहि बीच २८ मैथिल राजाक उल्लेख भेटैत अछि।
बौद्ध धर्मक उत्थानक बहुत पूर्वहि मिथिला मे गणतंत्रक स्थापना भेल होएत तकर संकेत हम उपर दए चुकल छी। पुराण मे २८ मैथिल राजाक विवरण अछि आर जातक मे मात्र १५ राजाक २८ मे सँ जे १५ घटा देल जाइक ते १३ राजा बचि जाइत छथि आर महाभारत युद्ध आर गणराज्यक स्थापनाक बीच संभवतः इयैह १३ राजा मिथिला मे राज्य कएने होयताह। अहि १३ मे अंतिम राजा कराल जनक रहल हेताह। जातक मे मरवादेव केँ मिथिलाक राजतंत्रक संस्थापक मानल गेल अछि। मिथिला मे जातक सूचीक अनुसार राजाक नाम एवं प्रकारे अछि –
____ सुरूचि प्रथम, सुरूचि द्वितीय, सुरूचि तृतीय, महापनाद
(जातक नं - ४८९ + २६४)
____ महाजनक प्रथम, आरिद्वजनक, पोलजनक, महाजनकद्वितीय, दिघावु
(जातक नं – ५३९ )
____ साधीन, नारद (जातक नं - ४९४)
____ निमि, कलार (जातक नं – ९, ४०८, ५४१)
____ मरवादेव (जातक नं – ९० ५४१) ____ अंगात (जातक नं - ५४४)
वर्द्धमान महावीर सँ २५० वर्ष पूर्व मिथिला मे निमि नामक एकटा शासक भेल छलाह जे जैन धर्म ग्रहण कएने छलाह। ई. पू. ६५० क आसपास मिथिला मे जनक वंश अंतिम शासकक राज्यक अवसान भेल आर तकरावादे ओहिठाम गणतंत्रक स्थापना भेल। आर तकरावादे ओहिठाम गणतंत्रक स्थापना भेल। मिथिला मे गणराज्यक स्थापनाक संगहि वज्जीगण राजाक स्थापना सेहो भेल। मिथिला मे राजमंत्रक पश्चात गणतंत्रक स्थापना एकटा मह्त्वपूर्ण घटना मानल गेल अछि। कौटिल्यक अनुसार वज्मी (वृज्जी) आर लिच्छवी अलग अलग छल। महापरिनिवान्नसुत मे बुद्ध वज्जी लोकनिक गुणगाथा कएने छथि आर पाणिनि सेहो वज्जी लोकनिक विवरण देने छथि। वज्जीगण राज्यक संदर्भ मे अष्टकुलकक उल्लेख सँ ज्ञात होइत अछि जे अहि मे आठकुलक लोग संगठन रहल होइत। तथापि अहिठाम लिच्छवियेक प्रधानता रहल होइत। लिच्छवी लोकनि वैशालीक रहनिहार छलाह आर अष्टकुलकक सर्वशक्तिमान सदस्य सेहो। ज्ञात्रिक नामक जाति सेहो वज्जी गणराज्य मे प्रसिद्ध छल। अहि कुल मे वर्धमान महावीरक जन्म भेल छलैन्ह। सूत्रकृतांग मे ज्ञात्रिकक सम्पर्क उग्र, भोज, इक्ष्वाकु, कौरवा, लिच्छवी आदि सँ बताओल गेल अछि। अहि सँ बुझि पडैत अछि जे ई सब एक दोसराक समीपे रहैत छलाह आर उत्तर बिहारक विभिन्न क्षेत्र पर हिनका लोकनिक अधिकार छलैन्ह। ई सब गणराज्यक सदस्य छलाह अथवा नहि से कहब असंभव। मिथिला मे जे वज्जी गणराज्य छल तकर दूटा प्रमुख महारथी रहैथ वैशाली आर विदेह।
v.) गणराज्यक सदस्य जाति : - लिच्छवी वज्जी गणराज्यक सर्वश्रेष्ठ अंग रहैथ। बौद्ध साहित्य मे लिच्छवीक विशद विश्लेषण भेल अछि। हुनका लोकनिक प्रधान केन्द्र छल वैशाली आर राजनैतिक रूपे वो वैशाली आर नेपाल पर अपन अधिकार स्थापित कएने छलाह। चारिम शताब्दी मे जे गुप्त साम्राज्यक स्थापना मगध मे भेल छल ताहु मे लिच्छवी लोकनिक विशेष हाथ छलैन्ह। लगभग ८०० वर्ष धरि विहार आर नेपाल इतिहास केँ लिच्छवी लोकनि प्रभावित कएने छलाह। लिच्छवी जातिक उत्पत्तिक संबध मे अद्धतन विद्वान लोकनिक वीच मतभेद बनले अछि। लिच्छवि, निच्छवि, लिच्चिकि, लेच्छवी, लेच्छाई, लेच्छकी, आदि शब्द लिच्छविक द्धोतक मानल जाइत अछि। पालि साहित्य, सिनका, अभिलेख, आर अन्यान्य साधन सब मे लिच्छवी शव्दक प्रयोग भेटैत अछि जाहि ई ज्ञात होइछ जे इयैह शव्द इतिहास मे जनप्रिय भए स्वीकृत भ गेल। कैटिल्य मे धातिथी, गोविन्दराज आदि लिच्छवी शब्दक व्यवहार कएने छथि।
बहुत रास विद्वानक कहब छैन्ह जे लिच्छवी लोकनि विदेशी छलाह – आर हुनक संबध तिब्बत, कोलारियन लोकनि सिथियन, तथा फारस सँ छलैन्ह। किछु विद्वानक मत छैन्ह जे लिच्छवीक संबध जारे देल जाइत अछि। लिच्छवीक आचार – विचार आर सामाजिक नियम आदिक आधार ई कहल गेल अछि जे हुनका लोकनिक उत्पत्ति तिब्बती श्रोत सँ भेल होएत। अहिमतक समर्थकक विचार छन्हि जे प्रागैतिहासिक काल मे किछु मंगोलियन – तिब्बती जाति अहि क्षेत्र मे आवि के वसल हेताह आर ओहि सँ लिच्छवी लोकनिक उत्पत्ति भेल होएतैन्ह। भारतीय विद्वान लोकनि लिच्छवी केँ भारतीय मनैत छथि परञ्च अपनहु सब मे किछु एहनो विद्वान छथि जनिक विचार छन्हि जे लिच्छवी लोकनिक उत्पत्ति परसिया (फारस) सँ भेल होएत। निच्छवि शब्दक उत्पत्ति फारसक ‘निसि विस’ नगर सँ भेल अछि आर ओहि सँ लिच्छवी क उत्पत्ति सेहो फारसक इतिहास विवरण मे कतहु एहेन उल्लेख नहि भेटैत अछि जाहि आधार पर ई कहल जाए जे फारसक लोग पूर्वी भारत मे आवि के कहियो हुनका लोकनि केँ कोनो प्रकारक सम्पर्क रहल होन्हि। प्राचीन भारतीय साहित्य मे लिच्छवी लोकनि केँ क्षत्रियक रूप मे वर्णन भेल छैक। महापरिनिव्याणसुत सँ ज्ञात होइछ जे वो लोकनि क्षत्रियक हिसाबे वुद्धक शवक अवशेष प्राप्त करबा लेल इच्छुक छलाह। सिगालजातक मे लिच्छवी कान्या के क्षत्रिय कहल गेल छैक। महालीनामक लिच्छवी अपना बुद्ध जकाँ क्षत्रिय घोषित करैत अछि। जैनकल्प सूत्र मे वैशालीक लिच्छवीनेता चेतकक बहिन। त्रिशला केँ क्षत्रियाणी कहल गेल छैक। लिच्छवीक उत्पत्तिक संबध मे बुद्धघोषक मत छन्हि जे वो लोकनि क्षत्रिय छलाह। नेपाल वंशावली मे लिच्छवी सूर्यवंशी क्षत्रिय कहल गेल छैक । मनु लिच्छवी के व्रात्य क्षत्रिय कहैत छथि। वज्जि आर लिच्छवीक मध्य कोन संबध छल अथवा दुनुक वीच कोनो सीमारेखा छल अथवा नहि से कहब असंभव वृज्जी – वज्जी गणराज्यक सर्वश्रेष्ठ सदस्य लिच्छवियेलोकनि छलाह। बुद्ध लिच्छवीक तुलना ताव तिंश देव सँ कएने छथि। वृजि (वज्जिका) आर लिच्छवी दुनु दू शब्द छल परञ्च लिच्छवीक प्रधानताक कारणे वज्जी सँ लिच्छवीक बोध होइत छल
नेपाल अभिलेख मे लिच्छवी कुलकेतु, लिच्छवी कुलांबरपूर्ण चन्द्र, लिच्छवी कुलानंदकारा, लिच्छवी कुलतिलको आदि शब्दक व्यवहार भेल अछि। चीनी आर तिब्बती श्रोत सँ ज्ञात होइछ जे ई लोकनि लिच्छवीक नाम सँ प्रसिद्ध छलाह। एक परंपराक अनुसार तिब्बतक राजवंश लिच्छवीक वंशज छलाह। प्राचीन काल मे संभव जे नेपालक बाटे तिब्बत आर मिथिलाक संबध घनिष्ट रहल ये आर राजनैतिक – साँस्कृतिक अदान – प्रदान होइत हो। हिमालयक तराई मे किरात लोकनिक वास छल आर ई लोकनिक बरोबरि पहाडक आर पार जाइत आवैत छलाह आर दुनु दिस सँ हिनका लोकनि केँ सम्पर्क छलैन्ह। अहि क्रम तिब्बत आर मिथिलाक संपर्क घनिष्ट भेल हो से संभव आर दुनुक वीच साँस्कृतिक आदान – प्रदान सेहो। लिच्छवी लोकनि विचार सँ प्रगतिशील छलाह आर तै जँ हिनक विचार तिब्बती विचारधारा केँ ताहि दिन मे प्रभावित केने हो तँ कोनो आश्चर्यक गप्प नहि। अहिठामक संस्कृति सँ प्रभावित होएब हुनका लोकनिक लेल स्वाभाविक छल कारण मिथिला तिब्बती नेपाली व्यापारीक बाट पर पडैत छल।
लिच्छवी केँ विदेशी नहि कहल जा सकइयै। लिच्छवी आर विदेह दुनु क्षत्रिय छलाह आर हुनका लोकनि केँ कोनो जातिगत विभिन्नता देखबा मे नहि अवइयै। अरुयुग मे वैशाली केँ विदेहक अंगे बुझल जाइत छल आर तै तँ त्रिशला केँ वैदेही कहल गेल अछि। लिच्छवी लोकनि देखबा सुनबा मे सुन्दर होइत छलाह आर हुनकर पहिरब ओढब अत्यंत सुन्दर होइत छलैन्ह। अंगुत्तर निकाय मे आन क्षत्रिय शासक जकाँ लिच्छवी लोकनि केँ अभिषिक्त मानल गेल छैन्ह। हियुएन संग लिच्छवी के क्षत्रिय कहने छथि। लिच्छवी लोकनि ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य, कार्तिकेय, वासुकी, लक्ष्मी आर अहु सँ ई स्पष्ट अछि जे वो विदेशी नहि छलाह। वैशाली मे जैन, बोद्ध आर ब्राह्मण धर्मक प्रधानता छल आर नेपाल मे सेहो ई लोकनि ओहि सब धर्मक पालन करैत छलाह। लिच्छवीक अतिरिक्त आर कैकटा जाति वैशाली मे रहैत छलाह जकर विवरण निम्नोकिंत अछि।
ज्ञात्रिक जाति ओहि मे सब सँ प्रसिद्ध छल आर अहि कुल मे जनधर्मक संस्थापक वर्द्धमान महावीरक जन्म भेल छलैन्ह। ज्ञात्रिक लोकनिक प्रधान केन्द्र छल कुन्द ग्राम आर कोलाग्ग। बौद्ध साहित्य मे महावीर केँ नात (नाट) पुत्र कहल गेल छन्हि। ई लोकनि काश्यप गोत्रक छलाह। वज्जीगण राज्यक विकास मे हिनका लोकनिक विशेष योगदान छलैन्ह। राहुल साँकृत्यायनक अनुसार आजक जथारिया भूमिहार ब्राह्मण अहि ज्ञात्रिक वंशजक छथि। राहूल जीक अहि मत केँ सब केओ नहि मानैत छथि। उग्र लोकनि सेहो एक प्रसिद्ध जाति छलाह। वैशाली सँ हिनका लोकनि केँ घनिष्ट सम्पर्क छलैन्ह। ‘हत्थीगाम’क समीप ई सब रहैथ होथि से संभव। बृहदारण्यकोपनिषद एवं धम्मपद्द ठीका मे उग्र लोकनिक विवरण भेटइत अछि मुदा वो लोकनि इयैह उग्र छलाह अथवा नहि से कहब असंभव। विदेह आर काशी मे उग्र लोकनिक प्रभुता आर सैन्यवलक चर्च भेटैत अछि। बुद्ध सेहो उग्र लोकनिक शहर मे गेल छलाह। सूत्रकृतांग मे उग्र केँ बड्ड पैघ स्थान देल गेल छैन्ह आर ललित विस्तार मे जे ६४ लिपिक विवरण अछि ताहि मे एकटा उग्र लिपिक विवरण सेहो अछि। ओहि ६४ मे एकटा पूर्व विदेहक लिपिक वर्णन सेहो भेटैत अछि। उग्र केँ मिश्रित जाति सेहो कहल गेल अछि।
जैन साहित्य मे उग्र जकाँ भोग केँ सेहो क्षत्रिय कहल गेल छैक। ई लोकनि प्रथम जैन तीर्थकंर ऋषभक वंशज छलाह महापरि निव्वानसुत्त सँ ज्ञात अछि जे वैशाली सँ पावा जेवाक रास्ता मे भोगनगर, जम्बुगाम, अम्बगाम, हत्थिगाम, भण्डगाम आदि भेटैत छल आर अहि सब सँ भोग लोकनिक घनिष्ट सम्पर्क छलैन्ह। सूत्रकृतांग मे ऐक्ष्वाकु लोकनिक विवरण अछि आर इहो लोकनि वज्जी क्षेत्र रहैत छलाह। संभवतः ई लोकनि सुमतिक वंशज होथि। चूँकि विदेह लओकनि इक्ष्वाकुक पुत्र निमिक वंशज छलाह तैं इहो संभव अछि जे इहो लोकनि अपना के इक्ष्वाकु कहैत होथि। इहो संभव जे अयोध्याक इक्ष्वाकु एम्हर आवि केँ बसि गेल होथि।
वज्जी संघ मे कौरव लोकनिक उपस्थिति एकटा समस्याक प्रश्न बनि गेल अछि। अहि संबध मे निम्नलिखित तथ्य केँ स्मरण राखब आवश्यक। महाभारतक अनुसार पाण्डु मिथिला जाकए विदेह केँ पराजित कएने छलाह। भीम गण्डक लोकनि केँ पराजित केला उत्तर वैदेहक जनक केँ पराजित केलन्हि। वो विदेह पर आधिपत्य स्थापित कए ओहिठाम अपन खुट्टा गारि अपन साम्राज्यवादी अभियान केँ आगाँ बढौलन्हि आर कौशिकी कच्छक राजा केँ पराजित केलन्हि। ई क्षेत्र सम्प्रति विहपुर – पूर्णियाँ क्षेत्रक संकेत दैत अछि। कौशिकी क्षेत्र आर अहि सँ पूर्वक क्षेत्र पर एकटा कौरव राजकुमार केँ लादि देल गेल। एम्हर विदेह जे विदेह मे कौरव वचि गेलाह से अहिठामक वासी बनि केँ रहि गेल। हस्तिनापुरक अंत भेला पर सेहो कौरव लोकनि अहि क्षेत्र मे आवि केँ बसलाह। राजा जनक दरबार मे तँ प्रारंभहि सँ कुरू पाँचालक ब्राह्मण लोकनिक अबरजात बनले छल।
वज्जी गणराज्यक अंतर्गत बहुत तरह लोग रहल होएत अहि मे संदेह नहि। त्रिकाण्डशेष मे लिच्छवी वैदेह आर तैरभुक्त केँ पर्यायवाची शब्द मानल गेल छैक आर वज्जी संघक अगुआर इयैह सब छलाह। कुछ विद्वानक कथन अछि जे कराल जनकक मृत्युक पश्चातो विदेह मे राजतंत्र बनल रहल आर महापद्म नंद जखन मिथिला केँ जीत लैन्ह तकर वादे मिथिला मे गणराज्य भेल मुदा हमरा ई बात मान्य नहि बुझि पडइयै कारण कराल जनकक मृत्यु भेला उपरांत मिथिला मे विद्रोहक आगि भभकि उठल आर ओतए राजतंत्र केँ समाप्त ककए गणतंत्रक स्थापना कैल गेल। बुद्धक समय मे विदेह एकटा गणतांत्रिक राज्य छल। अजातशत्रुक वैशाली आक्रमणक पछाति अहि क्षेत्रक सूर्यास्तक संकेत भेटए लागल। पतंजलि अहि बातक साक्षी छथि जे विदेह मे गणराज्य छल। अहि मे आठ कुलक संघ छल। मल्ल, विदेह, उग्र, भोग, इक्ष्वाकु, ज्ञात्रि, कौरव एवं लिच्छवी केँ मिला केँ एकटा शासन छल – जकरा हमरा लोकनि लिच्छवी, विदेह अथवा वज्जीसंघक नाम सँ जनैत छी।
vi.) बौद्ध साधन आर मिथिलाक इतिहास : - अंगुत्तर निकाय मे वज्जी संघक विवरण अछि मुदा विदेहक नाम नहि अछि। इहो संभव जे वज्जी संघक सदस्य रहलाक कारणे अहि मे एकर नाम नहि देल गेल हो। दीपवंश मे वर्णित परंपराक अनुसार कराल जनकक पुत्र छलाह समञ्कर आर हुनका बाद राजा भेलाह अशोक। ओहि परंपरा मे इहो कथा अछि जे चम्पानगरक राजा नागदेवक वंशज कैक पुस्त धरि मिथिलाक पर शासन केलन्हि। अहि मे सब सँ अंतिम राजा भेलाह बुद्धदत्त। दीपवंशक कथा सँ ई सिद्ध होइत अछि जे कलार जनकक बादो मिथिला मे राजा द्वारा शासन होइत रहल आर मिथिला नगर मे २५ टा राजा तकर बादो शासन केलन्हि जाहि मे बुद्धदत्त अंतिम छलाह। तकर बाद राज्य मगधक अंतर्गत चल गेल। एकर अतिरिक्त मिथिला मे अंगति, सुमित्र आर विरूधक नाम सेहो भेटैत अछि अंगतिक शिक्षक छलाह गुणकस्सप/ गुणकस्सयक विचार पुराणकस्सप आर मंखलि गोसाल्ल्क विचार सँ मिलैत – जुलैत अछि आर ई सब बुद्धक समकालीन छलाह। राजा सुमित्रक संबध मे ललित बिस्तार मे वर्णन भेटैत अछि। ललित विस्तार मे मिथिलाक सोन्दर्यक वर्णन अछि – आर ओहि मे इहो कहल गेल अछि जे सुमित्र केँ हाथी, घोडा, रथ आर पैदल सेनाक कोनो अभाव नहि छलन्हि। सबतरहे सुखी सम्पन्न रहैतहुँ राजा बड्ड बूढ छलाह आर शासन क्षमता हुनक घटि चुकल छलैन्ह। विदेहक तुलना मे ललित विस्तार मे वैशालीक गणराज्यक विशेष प्रशंसा अछि। इहो सूचना भेटैत अछि राजा विरूधक मंत्री सकल केँ विदेह छोडि केँ वैशाली भागेऽ पडल छलिन्ह कारण विदेह राज दरबार मे तरह – तरह षडयंत्र चलि रहल छल आन मंत्री सब हिनका सँ इर्ष्या करैत छलाह। सकल वैशाली मे आवि केँ प्रख्यात भेलाह आर अहिठाम नायकक पद पर निर्वाचित भगेलाह। गिलगिंट मैन्युसाकिष्ट मे सेहो मिथिलाक कोनो एक अनमा राजक प्रधानमंत्री खण्डक उल्लेख भेटैत अछि। खण्डक ५०० अमात्यक प्रधान छलाह। हुनक जनप्रियता सँ आन – आन मंत्री घबडा उठलाह आर हुनका समाप्त करबाक प्रयास करे लगलाह। वो लोकनि राजा केँ ई कहि केँ भरकावे लगलाह जे ‘खण्ड’ अपना केँ राजा बुझि रहल छथि आर तदनुसार काज क रहल छथि। खण्ड अहि सब सँ तंग आवि वैशाली (जे कि गणराज्य छल) चल गेलाह जाहिठाम लिच्छवी लोकनि हुनक स्वागत केलथिन्ह।
अहि सब सँ स्पष्ट होइत जे वैशाली विदेह सँ पूर्वहि गणराज्य भ चुकल होएत।
vii.) वज्जी गणराज्यक राजनैतिक संबध : -
ई. पू. छठी शताब्दीक १६ महाजनपद मे वज्जीक विवरण केँ सम्मिलित करब अहि बातक धोतक थिक जे ताहि काल तक एकर राजनैतिक प्रतिष्ठा स्थापित भए चुकल छल। अंगुत्तर निकाय मे सेहो एकर विवरण अछि।वज्जीसंघक स्थापना ताहि दिन मे भेल छल जखन नेऽ तँ काशी पर कोशलक अधिकार भेल छल आर ने अंग पर मगधक । वज्जीसंघ आर बिम्बिसारक राज्यक सीमा मिलैत – जुलैत छल। दुनुक बीच युद्ध भेल छल तकरो उल्लेख यदा कदा भेटैत अछि। दुनुक बीच युद्धक कारण कि छल से कहब असंभव अछि। संभव अछि जे मगध जखन अंग पर आक्रमण केलक तखन मगधक नजरि अंगक उत्तरी भाग अंगुतराय पर सेहो छलैक। अंगुतरायक सीमा वज्जीसंघक सीमा सँ मिलैत –जुलैत छलैक आर तै वज्जीसंघ केँ सतर्क रहब आवश्यक आवश्यक छलैक अहि अंगुतराय प्रश्न लकए दुनुक वीच मतभेदक संभावना भ सकैत छैक। अंगुतराय एक महत्वपूर्ण जनपद छल आर बौद्ध धर्मक केन्द्र सेहो। अहिठाम बुद्ध कैक वेर गेल छलाह आर आपन ग्राम मे एकाधमास रहलो छलाह। अंग जीतलाक बाद बिम्बिसार अंगुतराय अपन आधिपत्य स्थापित करए चाहैत हेताह जकर विरोध करब वैशालीक हेतु स्वाभाविक छल। अहि क्रम मे जे संघर्ष भेल होएत ताहि मे संभवतः लिच्छवी लोकनि अंगुतराय क्षेत्र पर अधिकार कलेने हेताह जे बिम्बिसार मानबा लेल तैयार नहि भेल हेताह आर अहि कारणे दुनु मे युद्ध भेल हेतैन्ह। झगडा एकटा आओर कारण अम्बपाली सेहो छल। बिम्बिसार चुपेचाप वैशाली मे आवि केँ एकाध सप्ताह रहल छलाह आर अम्बपाली सँ बिम्बिसार केँ एकटा पुत्रो छलन्हि जकर नाम छल अभय। संघर्षक चाहे जे कारण अथवा स्वरूप रहल हो परञ्च अंत मे जाकए वैशालीक संग बिम्बिसार वैवाहिक संबध स्थापित केलन्हि आर एकर फलस्वरूप दुनु राज्यक बीच युद्धक अंत भेल। तखन सँ मगधक संग वैशालीक संबध अजातशत्रुक आक्रमणक समय धरि ठीके रहल।
मल्ल आर लिच्छवीक बीचक संबध सेहो बढिया छल। दुनुक ओतए गणराज्यक व्यवस्था छल आर दुनु केँ जैन आर बौद्ध धर्मक प्रति आस्था छलैन्ह। मनु दुनुक वर्णन व्रात्य कहि केँ केने छथि। अजातशत्रुक आक्रमणक समय मे दुनु सम्मिलित रूपें काज कएने छलाह। कोशल राजाक सेनापति बन्धुल मल्ल रहथिन। कोशल राज्यक संग सेहो लिच्छवी लोकनिक संबध बढिये छलैन्ह। लिच्छवी महाली आर राजकुमार प्रसेनजित तक्षशिलामे संगे पढैत छलाह। दुनु मे खूब दोस्ती छलैन्ह। वत्सक संग सेहो वैशालीक वैवाहिक संबध छल। वत्सराज सतानिकक विवाह चेतकक पुत्री मृगावती सँ भेल छल। उद्यन ओहि दुआरे वैदेही पुत्र कहबैत छथि।
जगदीश मंडल
जगदीश प्रसाद मंडल (1947- )
गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.।कथाकार (गामक जिनगी-कथा संग्रह), नाटककार(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यासकार(उत्थान-पतन- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। मुदा सीलिंगसँ बचबाक लेल कम्युनिस्ट आन्दोलनमे गेनिहार लोक सभसँ भेँट भेने मोहभंग। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि।
मौलाइल
गाछक
फूल
उपन्यास
जगदीष प्रसाद मण्डल
बेरमा, मधुबनी, बिहार।
मौलाइल गाछक फुल:ः 1
दू साल रौदीक उपरान्तक अखाढ़। गरमी स जेहने दिन ओहने राति। भरि-भरि राति बीअनि हौंकि-हौंकि लोक बितबैत। सुतली राति मे उठि-उठि पाइन पीबै पड़ैत। भोर होइते पसीना अपन उग्र रुप पकड़ि लैत। जहिना कियो ककरो मारै ले लग पहुँच जाइत तहिना सुरुजो लग आबि गेलाह। रास्ता-पेराक माटि सिमेंट जेँका सक्कत भ गेल अछि। चलबा काल पाएर पिछरैत अछि। इनार-पोखरिक पानि, अपन अस्मिता बँचवैक लेल पातालक रास्ता पकड़ि लेलक। दू साल सँ एक्को बुन्न पानि धरती पर नहि पड़ने धरतीक सुन्दरता धीरे-धीरे नष्ट हुअए लगल। पियासे दूबि सभ पाण्डुरोगी जेँका पीअर भ’-भ’ परान तियागि रहल अछि। गाछ-पात बेदरंग भ’ गेल अछि। लताम, दारीम, नारिकेल इत्यादि अनेको तरहक फलक गाछ सूखि गेल। आम, जामुन, गमहाइर, शीषोक गाछक निच्चा पातक पथार लगि गेल। दसे बजे सँ बाध मे लू चलै लगैत अछि। नमहर-नमहर दरारि फाटि धरतीक रुपे बिगाड़ि देने अछि। की खायब? कोना जीबि? अपना मे सभ एक-दोसरा सँ बतिआइत अछि। घास-पानिक दुआरे मालो-जाल सूखिकेँ संठी जेँका भ’ गेल अछि। अनधुन मरबो कयल। अनुकूल समय पाबि रोगो-बियाधि बुतगर भ गेल। माल-जाल स’ ल’ क’ लोको सभहक जान अबग्रह मे पड़ि गेल अछि। खेती-बाड़ी चैपट्ट होइत देखि, थारी-लोटा बन्हकी लगा-लगा लोक मोरंग, दिनाजपुर, ढाका भगै लगल। जैह दषा किसानक ओइह दषा बोनिहारोक। कहिया इन्द्र भगवानक दया हेतनि, एहि आषा मे अनधुन कबूला-पाती लोक करै लगल।
तीनि दिन स अनुपक घर चुल्हि नहि पजड़ल। नल-दमयन्ती जेँका दुनू परानी अनुप दुखक पहाड़क तर मे पड़ल-पड़ल एक-दोसराक मुह देखैत। ककरो किछु बजैक साहसे नहि होइत। बारह बरखक बेटा वौएलाल, बोरा पर पड़ल माय केँ कहलक- ‘‘माए, भूखे परान निकलल जाइ अए। पेट मे बगहा लगै अए। आब नइ जीबौ!’’
वौएलालक बात सुनि दुनू परानी अनुप केँ आखि स नोर आवि गेलै। मुहक बोल बुताय लगलै। लग मे बैसल रधिया उठि क’ डोल-लोटा ल’, इनार दिषि विदा भेलि। इनारोक पानि निच्चा ससरि गेल अछि, जहि स डोलक उगहनियो छोट भ’ गेल। कतवो निहुड़ि-निहुड़ि रधिया पानि पबै चाहैत, तइयो डोल पानि स उपरे रहैत। रधियाक मन मे एलै जखन अधला होइवला होइ छै तखन एहिना कुसंयोग होइ छैक। वौएलाल नइ बँचत। एक त पाँच टा संतान मे एकटा पिहुआ बँचल सेहो आइ जाइ अए। हे भगवान कोन जनमक पापक बदला लइ छह। इनार स डोल निकालि, लहरे पर डोल-लोटा छोड़ि रधिया उगहनि जोड़ै ले डोरी अनै आंगन आइलि। रधियाक निराष मन देखि अनुप पूछलक- ‘‘की भेल?’’
टूटल मने रधिया उत्तर देलक- ‘‘की हैत, जखन दैवेक(दइबैक) डाँग लागल अछि तखन की हैत। उगहनि छोट भ गेल तेँ जोड़ै वला डोरी ले एलौ।’’
रधियाक बात सुनि अनुप घरेक(ओसारेक) बनहन खोलि रधिया केँ देलक। खड़ौआ जौर ल रधिया इनार पर जा उगहनि जोरलक। उगहनि जोड़ि पानि भरलक। पाइन भरि लोटा मे लए’ रधिया आंगन आबि बौएलाल केँ पीबै ले कहलक। पड़ल बौएलाल केँ उठिये ने होय। ओसार पर लोटा राखि रधिया वौएलालक बाँहि पकड़ि उठा केँ बैसौलक। अपने हाथे रधिया लोटा स चुरुक मे पानि ल’ वौएलालक आखि-मुह पोछलक। वौएलालक देह थर-थर कपैत। थरथरी देखि रधियोकेँ थरथरी पैसि गेलनि। लोटा उठा रधिया बौएलालक मुह मे लगवै लागलि कि थरथराइत हाथ स लोटा छुटि गेलैनि जहि स पानि बोरा पर पसरि गेल। दुनू हाथे छाती पीटैत रधिया जोर स बजै लागलि- ‘‘आब बौएलाल नै जीति, जे घड़ी जे पहर अछि।’’
रधियाक बोल सुनि अनुप जोर स कनै लगल। अनुपक कानब सुनि टोलक धियो-पूतो आ जनिजातियो एक्के-दुइये अबै लगल। सभहक मुह सुखाइले। के ककरा बोल-भरोस देत। सभहक एक्के गति। अनुपक कानब सुनि रुपनी अंगने से कनैत अबैत। रुपनी अनुपक ममिओत बहिन। अनुपक आंगन आबि रुपनी बौएलाल केँ देखि बाजलि- ‘‘भैया, बौआक परान छेबे करह। अखन मुइलह हेन नहि। किअए अनेरे दुनू परानी कनै छह। जाबे शरीर मे साँस रहतै ताबे जीवैक आषा। चुप हुअअ।’’ कहि रुपनी वौएलाल क’ समेटि कोरा मे बैसौलक। तरहत्थी स चाइन रगड़ै लागलि। वौएलाल आखि खोलि बाजल- ‘‘दीदी, भूख से पेट मे बगहा लगै अए।’’
वौएलालक बात सुनि रुपनी बाजलि- ‘‘रोटी खेमे।’’
‘‘हँ।’’
वौएलालक बात सुनि रधिया घर मे धयल फुलक लोटा, जे रधिया के दुरागमन मे बाप देने रहथि, निकालि अनुप केँ देलनि। लोटा नेने अनुप दोकान दिषि दौड़ल। लोटा बेचि गहूम कीनने आयल। अंगना अबिते रधिया हबड़-हबड़ केँ चुल्हि पजारि गहूम उलौलक। दुनू परानी रधिया जाँत मे गहूम पीसै लगल। एक रोटीक चिक्कस होइतहि रधिया समेटि क रोटी पकबै आवि गेलीह। अनुप गहूम पीसै लगल। रोटी पका रधिया वौएलाल लग ल गेल। अपने सँ रोटी तोड़ि खेवाक साहसे वौएलाल केँ नहि होयत। छाती, दाबि- दाबि रधिया वौएलाल केँ रोटी खुआवै लगली। सैाँसे रोटी वौएलाल खा लेलक। रोटी खायत-खायत वौएलालो केँ हूबा एलैक। अपने हाथे लोटा उठा पानि पीलक। पानि पीवितहि हाफी हाअए लगलैक। भुइँये मे ओंघरा गेल। जाँत लगक चिक्कस समेटि रधिया चुल्हि लग आनि सूप मे सानै लगलीह। जाँघ पर पड़ल चिक्कस अनुप तौनी स झाड़ि, लोटा-डोल नेने इनार दिषि बढ़ल। हाथ-पाएर धोय, लोटा मे पानि लए आंगन आबि खाइ ले बैसल। छिपली मे रोटी आ नोन-मेरिचाइ नेेने रधिया अनुपक आगू मे देलक। भुखे अनुप केँ होय जे सैाँसे रोटी मोड़ि-सोड़ि क एक्के बेरि मुह मे ल’ ली, मुदा से नहि कए तोड़ि-तोड़ि खाय लगल। छिपलिक रोटी सठितहि अनुप रधिया दिषि देखै लगल, मुदा तीनिये टा रोटी पका रधिया चिक्कसक पथिया कोठी पर रखि देने। रधिया क’ देखि अनुप चुपचाप दू लोटा पानि पीवि उठि गेल।
दिन अछैते नथुआ, दौड़ल आबि, हँसैत अनुप केँ कहलक- ‘‘गिरहत कक्का बड़की पोखरि उड़ाहथिन। काल्हि से हाथ लगतै। तोहूँ दुनू गोरे काज करै चलिहह।’’
नथुआक बात सुनितहि रधियाकेँ, जना अषर्फी भेटि गेल होय, तहिना भेलै। अनुपोक मुह सँ हँसी निकलल। अनुपक खुषी देखि नथुआ बाजल- ‘‘अपने मुसना कक्का मेटगिरी करत। ओइह जन सबहक हाजरी बनौत।’’
नथुआ, अनुप आ रधियाक बीच गप-सप होइतहि छल कि मुसनो धड़फड़ाइल आयल। मुसना दिषि देखि नथुआ बाजल- ‘‘मुसनो कक्का त आबिये गेला। आब सभ गप फरिछा केँ बुझबहक।’’
मेटगिरी भेटला सँ मुसनाक मन तरे-तर गदगद होयत। ओना कहियो मुसना मेटगिरी केने नहि, मुदा गामक बान्ह-सड़क मे मेट सबहक आमदनी आ रोब देखने, तेँ खुषी। मने-मन सोचैत जे जकरा(जहि जन) मन हैत तकरा जन मे राखब आ जकरा मन हैत तकरा नै राखब। इ त हमरे जुइतिक काज रहत की ने। जकरा मन हैत ओकरा बेसिये क हाजिरी बना देबैक। पावर त पावर होयत। जँ पावर भेटै आ ओकर उपयोग फाजिल क’ के नहि करी त ओहन पावरे ल क’ की हेतइ। जँ से नहि करब ते मुसना आ मेट मे अनतरे की हैत। लोक की बुझत। मुस्की दैत मुसना अनुप केँ कहलक- ‘‘भैया, काल्हि से बड़की पोखरि मे काज चलतै, तोहू चलिहह। दू सेर धान आ एक सेर मड़ुआ, भरि दिनक बोइन हेतह। तत्ते टा पोखरि अछि जे कहुना-कहुना रौदी खेपिये जेबह। सुनै छी जे आनो गामक जन सभ अबै ले अछि मुदा ओकरा सभकेँ माटि नहि काटै देबै।’’
मुसना बात सुनि वौएलाल फुड़फुड़ा क’ उठि कहलक- ‘‘कक्का हमरो गिनती क’ लिह’। हमहू माटि काटै जेबह।’’
-‘‘बेस वौआ, तीनू गोरे चलिहह। हमरे हाथक काज रहत। दुपहर मे भानस करै ले भौजी क’ पहिने छुट्टी द देवैइ।’’
कहि मुसनो आ नथुओ चलि गेल।
दोसर दिन भोरे, पोखरि मे हाथ लगै से पहिनहि चैगामाक जन कोदारि-टाला वा पथिया-कोदारि ल’ पोखरिक मोहार पर पहुँच थहाथहि करै लगल। मेला जेँका लोक। जते गामक जन तहि स कैक गुना बेसी आन गामक। जनक भीड़ देखि मुसनाक मन मे अहलदिल्ली पैसि गेलइ। तामसो आ डरो से देह थर-थर कपै लगलैक। मुसनाक मन मे एलै हमर बात के सुनत। माथ पर दुनू हाथ ल’ मुसना बैसि गेल। किछु फुरबे ने करैत। ठकमूरी लगि गेलैक। सैाँसे पोखरि, गैाँवा स अनगैाँआ धरि, जगह छेकि-छेकि कोदारि लगा टल्ला ठाढ़ केने। सोचैत-सोचैत मुसनाक मन मे एलै जे रमाकान्त बावू(गिरहत कक्का) केँ जा क सब बात कहिअनि। सैह केलक। उठि क’ रमाकान्त ऐठाम विदा भेलि।
तहि बीच गौँवा-अनगौँआ जन मे रक्का-टोकी शरु भेल। अनगौँवा सभ जोर-जोर से बजैत जे कोनो भीख मंगै ले एलहुँ। सुपत काज करब आ सुपत बोइन लेब। गौँवा जन सभ कहै जे हमरा गामक काज छी तेँ हम सभ अपने करब। सुखेतक भुटकुमरा आ गामक सिंहेसरा एक्के ठाम पोखरि(माटि) दफानने। दुनूक बीच गारि-गरौबलि हुअए लगलै। सभ हल्ला करैत तेँ ककरो बात कियो सुनबे नहि करैत। सभ अपने बजै मे बेहाल। गारि-गरौबलि करिते-करिते भुटकुमरो सिंहेसर दिषि बढ़ल आ सिंहेसरो भुटकुमरा दिषि। दुनूक बीच मुह स गारियो-गरौबलि होइत आ हाथ स पकड़ो-पकड़ा भ’ गेल। एक-दोसर केँ पटकि छाती पर बैइसै चाहैत। दुनू बुतगर। पहिने त भुटकुमरे सिंहेसराकेँ पटकलक किऐक त सिंहेसराक पाएर घुच्ची मे पड़ि गेलै, जहि स ओ धड़फड़ा क खसि पड़ल। मुदा सिंहेसरो हारि नहि मानलक। हिम्मत क उठि भुटकुमरा केँ, छिड़की लगा खसौलक।
दरबज्जा पर बैसि रमाकान्त बावू बखारीक धान, मड़ूआक हिसाव मिलबैत। हलचलाइत मुसनाकेँ देखि रमाकान्त पुछलखिन। मुसनाक बोली साफ-साफ निकलबे नहि करैत। मुदा तइयो मुसना कहै लगलनि- ‘‘काका, तत्ते अनगौँआ जन सब आबि गेल अछि जे गौँवा केँ जगहे ने हैत। कतबो मनाही केलियै कोई मानै ले तैयारे ने भेल। अपने से चलि केँ देखियौक।’’
कागज-कलम घर मे रखि रमाकान्त विदा भेलाह। आगू-आगू रमाकान्त आ पाछू-पाछू मुुसना। पोखरि सँ फड़िक्के रमाकान्त रहथि कि पोखरि मे हल्ला होइत सुनलखिन। मन चैंकि गेलनि। मन मे हुअए लगलनि जे अनगौँवा सभ बात मानत की नहि! अगर काज बन्न क’ देब त गौँओ कामै(कामए) हैत। जँ काज बन्न नहि करब ते अनगौँओ मानवे नहि करत। विचित्र स्थिति मे रमाकान्त। निअरलाहा गड़बड़ भ’ जायत। पोखरिक महार पर रमाकान्त केँ अबितहि चारु भर सेँ जन सभ घेरि लेलकनि। सभ हल्ला करैत जे जँ काज चलत त हमहू सब खटब। ततमत् मे पड़ि रमाकान्त अनगौँआ सभ केँ कहलखिन- ‘‘देखू रौदियाह समय अछि। सभ गाम मे काजो अछि अ करौनिहारो छथि। चलै चलू, अहाँ सभहक संगे हमहू चलै छी आ हुनको सभकेँ कहबनि जे अपना-अपना गामक बोनिहार केँ अपना-अपना गाम मे काज दिऔ।’’
आन सभ गामक लोक कोदारि, छिट्टा, टल्ला नेने विदा भेल। रमाकान्तो संगे विदा भेलाह। किछु दूर गेला पर रमाकान्त मुसनाकेँ कहि देलखिन जे जखन आन गामक लोक निकलि जायत तखन गौँआ जन केँ काज मे लगा दिहक। तहि बीच क्यो जा क’ सिंहेसरा घरवाली केँ कहि देलक जे पोखरि मे तोरा घरवला केँ ओंघरा-ओंघरा मारलकौ। घरवलाक मारिक नाम सुनितहि सिंहेसराक घरोवलाी आ धियो-पूतो गामे पर से गरिअबैत पोखरि लग आबि गेलि। मुदा तइसे पहिने अनगौँआ सभ चलि गेल छल।
पोखरिक काज शुरु भेल। तीनू गोटे अनुप एक्के ठाम खताक चेन्ह देलक। कोदारि स माटि काटि-काटि अनुप पथिया भरैत, रधिया आ वौएलाल माथ पर ल’ ल’ महार पर फेकए लगल। बारहक अमल भ’ गेल। रमाकान्त घुरि केँ आबि पोखरिक पछबरिया महार पर ठाढ़ भ’ देखै लगलथि। मुसनाक नजरि पड़ितहि दौड़ि क रमाकान्त लग पहुँचल। मुसनाकेँ पहुँचतहि रमाकान्त, आंगुरक इषारा स वौएलालकेँ देखबैत, पूछलखिन- ‘‘ओ(वौएलाल) के छी। ओकरा साँझ मे कहिहक भेटि करै ले।’’ कहि रमाकान्त घर दिसक रस्ता पकड़लनि। बारह बर्खक वौएलालक माटि उघब देखि सभकेँ छगुन्ता लगैत। जाबे दोसरो कियो एक बेरि माटि फेकैत ताबे वौएलाल तीनि बेरि फेकि दइत। वौएलालक काज देखि अनुप मने-मन सोचै लगल जे बोनिआती स नीक ठिक्का होइत। मुदा हमरे सोचला से की हेतैक। ताबे मुसनो रमाकान्त केँ अरिआति घुरि क’ अनुप लग आबि कहलक- ‘‘भैया, मालिक दुनू बापूत केँ साँझ मे भेंट करै ले कहलखुन हेँ।’’
मालिकक भेटि करैक सुनि अनुपक हृदय मे खुषीक हिलकोर उठै लगल। मुदा अपना क’ सम्हारि अनुप मुसना केँ कहलक- ‘‘जखन मालिक भेंट करै ले कहलनि ते जरुर जायब।’’
सुरुज पछिम दिस एकोषिया भ’ गेलाह। घुमैत-फिरैत मुसना अनुप लग आबि रधिया केँ कहलक- ‘‘भौजी, अहाँ जाउ। भरि दिनक हाजरी बना देने छी। भानसोक बेर उनहि जायत।’’
रधिया आंगन विदा भेलि। अनुप आ वौएलाल काज करिते रहल। चारि बजे सभ काज छोड़ि देलक। गाम पर आबि अनुप दुनू बापूत नहा क’ खेलक। कौल्हुके गहूमक चिक्कसक रोटी, आ अरिकंचन पातक पतौरा बना पकौने छलि, ओकर चटनी बनौने छलि। खा क’ तीनू गोटे(अनुप, वौएलाल आ रधिया) ओसार पर बैसि गप-सप करै लगल। अनुप रधिया केँ कहलक- ‘‘भगवान बड़ी गो छेथिन। सब पर हुनकर नजरि रहै छनि। देखियौ ऐहेन कहात समय मे कोन चक्कर लगा देलखिन।’’
गप-सप करितहि गोसाई डूबि गेल। झलफल होइतहि अनुप दुनू बापूत रमाकान्त ऐठाम विदा भेल। रस्ता मे दुनू बापुत केँ ढेरो तरहक विचार मन मे उठैत आ समाप्त होयत। ओना दुनू बापुतक मन गदगद।
दरबज्जा पर बैसि रमाकान्त मुसना से जनक हिसाब करैत रहथि। मुसना जनक गिनतियो केने आ नामो लिखने। मुदा अपन नाम छुटल तेँ हिसाव मिलवे नहि करैत। अही घो-घाँ मे दुनू गोटे। तहि बीच दुनू बापूत अनुप पहुँचल। फरिक्के स अनुप दुनू हाथ जोड़ि रमाकान्त केँ गोड़ लागि बिछान पर बैसल। वौएलालो गोड़ लगलकनि। वौएलाल केँ देखि रमाकान्त बिहुँसति अनुप केँ कहलखिन- ‘‘अनुप तोँ इ बेटा हमरा द’ दाय?’’
मने-मन अनुप सोचै लगल जे ई की कहलनि? कने काल गुम्म भ’ अनुप उत्तर देलकनि- ‘‘मालिक, वौएलाल की हमरे टा बेटा छी, समाजक छियै। जखन अपने केँ जरुरत हैत तखन ल’ लेब।’’
अनुपक उत्तर सुनि सभ छगुन्ता मे पड़ि गेलाह। मास्टर साहेव अनुप केँ निङहारि-निङहारि देखै लगलथि। एकटा युवक, जे दू दिन पहिने भाग्यक मारल आयल छल, ओहो आषा-निराषा मे डूबल। ओहि युवक केँ तीन बर्ख कृषि विज्ञानक पढ़ाई पूरा भेल छलैक, सिर्फ एक बर्ख बाकी छलैक। अपन सभ खेत बेचि पिताक बीमारीक इलाज करौलक, मुदा ठीक नहि भ’ मरि गेलखिन। कर्जा ल पिताक श्राद्ध-कर्म केलकनि। खरचा दुआरे पढ़ाइयो छुटि गेलनि आ जीवैक कोनो उपायो ने रहलनि। जिनगीक कठिन मोड़ पर आबि युवक निराष भ’ गेल छलाह। साल भरि पहिने विआहो भ’ गेल छलनि। एक दिस बूढ़ि माए आ स्त्रीक भार दोसर दिस जीवैक कोनो रास्ता नहि। सोग स माइयोक देह दिन व दिन निच्चे मुहे हहड़ल जाइत। रमाकान्क उदार विचार सुनि ओ युवक आयल छल।
सभ दिन रमाकान्त चारि बजे पिसुआ भाँग पीबैत छथि। दोसरि-तेसरि साँझ होयत-होयत रमाकान्त केँ भाँगक नसा(नषा) चढ़ि जाइत छनि। भाँगक आदत रमाकान्त केँ पिता स लागल छलनि। रमाकान्तक पिता न्याय शास्त्रक विद्वान्। ओना गाम मे कम्मे-काल रहैत छलाह, बेसी काल बाहरे-बाहर। हुनके प्रभाव रमाकान्तक उपर। तेँ रमाकान्त जेहने इमानदार तेहेन उदार विचारक। पोखरिक चर्चा करैत रमाकान्त मुसना केँ कहलखिन- ‘‘काल्हि से वौएलाल केँ दोबर बोइन दिहक।’’
दोबर बोइन सुनि, कने काल गुम्म भ’ मुसना कहलकनि- ‘‘मालिक, एक गोरे के बोइन बढ़ेबै ते दोसरो-तेसरो जन मांगत। एहि से झंझट शुरु भ’ जायत। झंझट भेने काजो बन्न भ जायत।’’
काज बन्न होइक सुनि रमाकान्त उत्तेजित भ’ कहलकखिन- ‘‘काज किअए बन्न हैत। जे जतेक काज करत ओकरा ओते बोइन देबैक।’’
रमाकान्तक विचार केँ सभ मूड़ी डोला समर्थन क देलकनि। समर्थन देखि गद्गद होइत रमाकान्त कहै लगलखिन- ‘‘अखन वौएलाल केँ बोइन बढ़ेलहुँ बाद मे दू बीघा खेतो देबैक। मास्टर सहायव, अहाँ राति केँ वौएलाल केँ पढ़ा दिऔ। सिलेट-कितावक खरच हम देवै।’’
खेतक चर्चा सुनि मुसना रमाकान्त केँ कहलकनि- ‘‘विपन्न(गरीब) त वौएलाले टा नहि अछि, गाम मे बहुतो अछि।’’
मुसनाक प्रष्न सुनि रमाकान्तक हृदय मे सतयुगक हरिष्चन्द्र पैसि गेलनि। उदार विचार, इमान मे गंभीरता, मनुक्खक प्रति सिनेह हुनक विवेक केँ घेरि लेलकनि। अखन धरि ने सुदिखोर महाजनक चालि, आ ने धन जमा करै वला जेँका अमानवीय व्यवहार प्रवेष केने छलनि। नीक समाज मे जहिना धन केँ जिनगी नहि बुझि, जिनगीक साधन बुझि उपयोग होइछ, तहिना रमाकान्तो परिवार मे रहलनि। जखन रमाकान्तक पिता गाम मे रहैत छेलथिन आ कियो किछु मंगै अबैत त खाली हाथ घुरए नहि दइत। जे रमाकान्तो देखथिन। सदिखन पिता कहथिन जे जँ किनको ऐठाम पाहुन-परक आवनि आ ओ किछु मांगै आवथि ते हुनका जरुर देबनि। किऐक त ओ गामक प्रतिष्ठा बँचाएव होयत। गामक प्रतिष्ठा व्यक्तिगत नहि सामुहिक होइछ। तहिठाम जँ क्यो सोचैत जे गाम सभहक छियैक हमरा ओहि स कोन मतलब? गलती हेतैक। गाम मे अधिकतर लोक गरीब आ मुर्ख अछि, ओ एहि प्रतिष्ठा केँ नहि बुझैत अछि। तेँ जे वुझिनिहार छथि हुनकर इ खास दायित्व बनि जाइत छनि। एहि धरती पर जतेक जीव-जन्तु स ल क’ मनुख धरि अछि सभकेँ जीबैक अधिकार छैक। तेँ, जे मनुख ककरो हक छिनै चाहै छैक ओ एहि भूमि पर सबसँ पैघ पापी छी। जनकक राज मिथिला थिकैक तेँ मिथिलावासी केँ जनकक कयल रास्ता केँ पकड़ि क’ चलक चाही। जहि स ओ प्रतिष्ठा सभदिन बरकरार रहतैक।
मौलाइल गाछक फुल:ः 2
सुखि सम्पन्न रमाकान्त, जेहने उदार तेहने इमानदारक लेल समाज मे वुझल जायत छथि। मरौसी जमीन त अधिक नहि मुदा पिताक अमलदारी मे बहुत भेलन्हि। पितो कीनने त नहिये रहथि मुदा पुरस्कार स्वरुप पैघ-पैघ दरवार सब स भेटल छलनि। मधुकान्त(रमाकान्तक पिता) अध्यात्म, वैयाकरण आ न्यायषास्त्रक विद्वान छलथि। बच्चे स मधुकान्तक झुकाव अध्ययन दिषि देखि पिता बनारस पढ़ै ले पठौलकनि। वनारस मे अध्ययन क’ मधुकान्त तीनि बर्ख काषीक एकटा न्यायषास्त्रक पंडित एहिठाम अध्ययन केने रहथि। अध्ययनक उपरान्त ओ(मधुकान्त) पूर्ण रुपेण बदलि गेल रहथि। अध्ययन-अध्यापनक असुविधा दुआरे गाम मे मोन नहि लगनि। ने अपन मनोनुकूल लोक भेटनि आ ने क्रिया-कलाप मे सामंजस्य होइन। तेँ जिनगीक अधिक समय अनतै वितबैत रहथि। जेहने प्रतिष्ठा मधुकान्त केँ अपना राज मे तेहने आनो-आनो राज मे रहनि। भारतीय चिन्तन क’ बुनियादी ढंग स व्याख्या करब मधुकान्तक खास विषेषता रहनि। सामाजिक व्यवस्थाक गुण-अवगुनक चर्च अनेको लेख मे लिखने रहथि, जे असुविधाक चलैत अप्रकाषिते रहलनि। तगमा, प्रषस्ति पत्र टांगि दरवज्जाक शोभा बढ़ौने छलाह। जखन गाम मे रहैत छलाह तखन सभहक एहिठाम जा-जा सामाजिक व्यवस्थाक कुरीति बुझवथिन। खास क’ कर्मकाण्डक। तेँ समाज मे सभ चाहनि। अपनो जिनगीक बात दोसर केँ कहथिन आ दोसरोक जिनगीक अध्ययन करैत रहैत छलाह। छल-प्रपंचक मिसिओ भरि गंध जिनगी केँ नहि छुलकनि। समाज मे मनुक्ख कोना मनुक्खक जिनगी मे बाधा बनि ठाढ़ अछि आ ओहि स कोना छुटकारा भेटितै, नीक-नहाँति मधुकान्त बुझथिन। सत्तरि जाड़ एहि धरती पर कटलनि।
सभ दिन चारि बजे रमाकान्त भाँग पीवि पान खा टहलै ले निकलि दोसर साँझ धरि घुरि क’ घर पर अबैत छलाह। घर पर अबिते हाथ-पाएर धोय दरबज्जा पर बैसि दुनियादारीक गप-सप करैत छलाह। टोल-पड़ोसक लोक एका-एकी आबि-आबि बैसय। रंग-बिरंगक गप-सपक संग चाहो-पान आ हँसिओ- मजाक चलैत रहैत छलैक। हीरानन्द(मास्टर सहाएव) आ शषिषेखर(युवक) सेहो टहलि-बूलि क’ अयलाह। चाह पीवि रमाकान्त शषिषेखर केँ पूछलखिन- ‘‘बौआ, अहाँ की चाहै छी?’’
मजवूरीक स्वर मे शषिषेखर कहए लगलनि- ‘‘ऐहन दल-दल मे हम फँसि गेल छी जे एकटा पाएर निकालै छी त दोसर धँसि जाइत अछि। एहि स कोना निकलब?’’
कृषि कओलेज मे प्रवेषक प्रतियोगिता मे सफल होइतहि शषिषेखर केँ सुखद भविष्यक ज्योति भेटल। बेटाक सफलता सुनि पिताक उत्साह हजार गुना बढ़ि गेलनि, जते जिनगी मे कहिओ नहि भेल छलनि। जहिना काँटक गाछ मे बेल(अमरफल) फड़ैत, काँटक गाछ मे गुलाबक फुल फुलाइत अछि तहिना पछुआइल परिवार मे शषिषेखर भेलाह। शषिषेखरक पिता मन मे अरोपि लेलनि जे बीत-बीत क खेत किअए ने बीकि(बिक) जाय मुदा बेटा केँ कृषि वैज्ञानिक बना केँ छोड़ब। शषिषेखरोक मन मे पैघ-पैघ अरमान अबै लगलनि। कृषि वैज्ञानिक होएव, नीक नोकरी भेटत, माए-वापक सेहन्ता कमा क’ पूरा करब। सिर्फ परिवारेक नहि जहाँ धरि समाजोक भ’ सकत सेवा करब। मुदा बिचहि मे समय ऐहन मोड़ पर आनि देलकनि जे सभ अरमान हवा मे उड़ि गेलनि। जहिना बीच धार मे नाओ चलौनिहारक हाथ स करुआरि छुटि गेला पर नाओ मे यात्रा केनिहार आ चलौनिहार केँ होयत, तहिना शषिषेखरो क’ भेलनि। चारि सालक कोर्स मे तीनि साल पुरलाक बाद पिता दुखित पड़लखिन। चारिम सालक पढ़ाई छोड़ि शषिषेखर पिताक सेवा मे जुटि गेलाह। एक दिषि पिताक इलाज दोसर दिषि परिवारक बोझ पड़ि गेलनि। आमदनीक कोनो स्रोत नहि, सिर्फ खेते टा। खेतो बहुत अधिक नहि। तहू मे अधहा स बेसी बिकिये गेल छलनि। शषिक बचपनाक बुद्धि। जिनगी आ दुनिआ स भेटि नहि। छोट बुद्धि सँ पैघ समस्याक समाधाने नहि होयत छलनि। अंत मे निराष भ’ खेत बेचि-बेचि परिवारो आ पितोक इलाज करबै लगलाह। बीति-बीति केँ खेत बिक गेलनि। जहन कि दुनू समस्या(परिवार आ इलाज) बड़करारे रहलनि। बेबष भेल छलाह शषि। पितो मरि गेलखिन। कर्ज क’ केँ पिताक श्राद्ध-कर्म केलनि। दुनियाँ मे कतौ इजोत देखवे नहि करथि। सैाँसे दुनिया अन्हारे-अन्हार लगै लगलनि।
वेबस भेल शषि मने-मन सोचे लगलाह जे जँ हम ट्यूषनो पढ़ा क’ अपनो पढ़व तहन परिवारक की दषा हयत! ओतेक त ट्यूषनो सँ नहि कमा सकैत छी जहि सँ अपनो काज चलायब आ परिवारो चला लेब। अधिक कमाइक लेल अधिक समयो लगबै पड़त। जे संभव नहि अछि। अगर जँ सब समय ट्यूषने मे लगा देब त अपने कखन पढ़ब आ क्लाष कोनो करब। जहिया स पिता मुइलाह तहिया स माइयोक देह सोग स हहड़ले जा रहल छनि। एक त बूढ़ि छथि दोसर सोग स सोगाइल। मनुक्ख मे जन्म लेला पर क्यो माय-बापक सेवा नहि करै त ओ मनुक्खे की? मनुक्खक मात्र नकल छी। हम से नहि करब। चाहे दुनियाक लोक नीक कहै वा अधला, तेकर हमरा गम नहि अछि। डिग्री ल’ क’ हम नीक नोकरी करब। नीक दरमाहा भेटत। जहि स खाइ-पीवै, ओढ़ै-पहिरै आ रहैक सुबिधा भेटत, मुदा जिनगी त ओतवे टा नहि अछि। जिनगीक लेल ज्ञान, कर्म आ व्यवहारक जरुरत सेहो होइत अछि। जिनगी पाबि जँ मनुक्ख प्रतिष्ठित नहि बनि सकल त ओ जिनगिये की। आइ जँ हम माए केँ छोड़ि दिअनि आ हुनका कष्ट होइन, ओहि कष्टक भागी के बनत। दिन-राति हुनका सेवाक जरुरत छनि, उठौनाई-बैसोनाई स ल’ क’ खुऔनाई-पिऔनाई धरि। हम सब ओहि धरतीक सन्तान छी जहि ठाम श्रवणकुमार सन बेटा जन्म लए चुकल छथि। यैह विचार शषिषेखर केँ पढ़ाई छोड़ौलकनि। दुनिया मे कोनो सहारा नहि देखि शषि रमाकान्त ऐठाम अयलाह। अपन जीवनक सब बात शषि हीरानन्द केँ कहलखिन। शषिक बात स हीरानन्दक हृदय पधलि गेल छलनि। ओ(हीरानन्द) मने-मन सोचति रहथि जे जे नवयुवक देष सेवा मे एकटा खूँटाक काज करत ओ अपनहि नष्ट भ’ रहल अछि, तेँ, ओहन युवक केँ सोंगर लगा ठाढ़ करैक जरुरत अछि।
सोझमतिया रमाकान्त दोहरवैत शषि केँ पूछलखिन- ‘‘नीक जेँका अहाँक बात हम नहि बुझि सकलौ?’’
बिचहि मे मास्टर साहेव रमाकान्त केँ बुझवैत कहलखिन- ‘‘षषि महा संकट मे फँसि गेल छथि। हुनका अहींक मदतिक जरुरत छनि। तखने ओ उठि क’ ठाढ़ हेताह।’’
मास्टर साहेबक बात सुनि धाँय द’ रमाकान्त कहलखिन- ‘‘अगर हमरा मदति सँ शषि केँ कल्याण हेतनि त जरुर करबनि।’’
रमाकान्तक आष्वासन स शषिक हृदय मे भोरक सूर्य देखि दिनक आषा जगलनि। शषिक मुह स हँसी निकललनि। जिनगीक अमावष्या पूर्णिमा मे बदलैए लगलनि। गंभीर भ’ हीरानन्द शषि केँ कहै लगलखिन- ‘‘चिन्ता छोड़ँू। नव जिनगीक दिषा मे डेग उठाउ। ई कर्मभूमि थिकैक। एहिठाम कर्मनिष्टे लोक मनुष्यक जिनगी पाबि सकैत अछि।’’
हीरानन्दक विचार सुनि शषि उठि क’ ठाढ़ भ’ हुनक हाथ पकड़ि जिनगी भरिक मित्रताक व्रत लइत कहलखिन- ‘‘जहिना कोनो रोगाइल गाछ केँ माली तामि-कोड़ि, पानि द’ पुनः नव जिनगी दैत अछि तहिना अहाँ दुनू गोटे हमरा देलहुँ। तहि लेल हम ऋृणी छी। जहाँ धरि भ’ सकत सेवा करैत रहब।’’
शषिक विचार सुनितहि रमाकान्तक हृदय मे, कर्णक रुप सन्निहा गेलनि। खुषी सँ गद्गद् होइत कहलखिन- ‘‘बौआ, हम त पढ़ल-लिखल नहि छी। पिताजी गाम मे नहि रहैत छलाह तेँ परिवार सम्हारै पड़ैत छल। ओना कोनो वस्तुक अभाव जिनगी मे ने पहिने भेल आ ने अखन अछि। जहिया पिताजी गाम अवैत छलाह तहिया बुझा-बुझा क’ कहैत छलाह। अखनो मन मे ओइह विचार अछि।’’
रमाकान्त केँ दू गोट बेटा। दुनू डाॅक्टरी पढ़ि मद्रास मे नोकरी करैत छन्हि। कहियो काल दू-एक दिनक लेल गाम अबैत छन्हि। दुनू भाइ मद्रासे मे विआहो क’ नेने छथि। दुनू कनि´ो डाॅक्टरे छथिन। एक परिवार मे चारि डाॅक्टर, तेँ, आममदनियो नीक छनि। दस बर्खक नोकरी मे कमा क’ ढेर लगा लेने छथि। अपन तीनि मंजिला मकान मद्रासे मे बनौने छथि। चारि टा गाड़ी सेहो रखने छथि। अपन क्लीनिक सेहो बनौने छथि। बेटा लग जेबाक विचार रमाकान्त बहुत दिन सँ करैत छलाह मुदा दुरस्तक दुआरे नियारिये केँ रहि जाइत छलाह।
पुनः रमाकान्त बजलाह- ‘‘पोखरियोक काज सूढ़िआइये गेल अछि ओकरा सम्पन्न केँ मद्रास जायब। मद्रास सँ अयलाक बाद सब जोगार अहाँक कए देव। ताधरि अहाँ पत्निओ आ माइयो केँ एहिठाम लए अबिअनु। एतै रहू।’’
वेरु पहर हीरानन्द आ शषिषेखर टहलै निकललाह। दरबज्जाक सोझे पोखरिक महारक निच्चा मे, उत्तर पूव कोन मे एकटा भरिगर सरही आमक गाछ। दुनू गोटे ओहि गाछक निच्चा दुभि पर बैसि गप-सप करै लगलाह। हीरानन्द अपन खेरहा कहै लगलखिन। मैट्रिक पास केलाक उपरान्त मास्टरीक लेल इन्टर-भ्यू देइ ले गेलौ। जखन ओहि ठाम गेलहुँ, आ देखलिऐक त वुझि पड़ल जे इन्टर-भ्यू मात्र दिखावा अछि। मोल-जोल तेजी सँ चलैत छल। मुदा सोझे घुमिओ जायब उचित नहि बुझि, रुकि गेलहुँ। मन मे आइल जे मोल-जोलक विरोध करी। संगी भजिअवै लगलौ। मुदा मोल-जोलक पाछू सभ लागल। एकोटा संग देमएवला नहि देखि मन केँ असथिर केलहुँ। फेरि भेल जे विरोध कए हंगामा ठाढ़ कए दियैक। मुदा दुनू पक्ष एक दिषाहे, सिर्फ हमही टा कात मे। तामसे देह थर-थर कपैत छल। लाभ-हानिक हिसाब जोड़ी त हानिये बेसी बुझि पड़ैत छल। मुदा मन तइयो माने ले तैयार नहि हुअए। हुअए जे जे बहालीक उपरका सीढ़ी पर अछि ओकरा चारि धौल लगा दियै। दस दिन जहले मे रहब। फेरि हुअए जे जखन डिग्री आ योग्यता अछि, तखन ऐहेन-ऐहेन नोकरी कतेको औत आ जायत। फेरि हुअए जे हजारो नवयुवक देषक आजादीक लेल खून बहौलक। हमरा बुते एतबो ने हैत। समुद्रक लहड़ि जेँका मन मे संकल्प-विकल्प उठैत आ शान्त होयत रहल। सभ केयो चलि गेल। हम असकरे रहि गेलहुँ। अचता पचता केँ विदा भेलौ। डेगे ने उठैत छल मुदा तइयो घर पर एलहुँ। घर पर अबितहि पत्नी वुझि गेली। मुदा आषा जगबै दुआरे लोटा मे पानि नेेने आगू आबि कहलनि- ‘‘थाकि गेल होएब। हाथ-पाएर धोय लिअ, थाकनि कमि जायत। जलखै नेने अबै छी।’’ जाबे हम पाएर-हाथ धोलहुँ ताबे थारी नेने ऐलीह। पहिनहि जलखैयक ओरियान कए क’ रखने रहथि। जलखै खा, दरबज्जेक चैकी पर कुरता खोलि क’ रखि देलियै आ बाँहिक सिरमा बना पइर रहलौ। मुदा मन मे ढेरो रंगक विचार सभ उठै लगल। मुदा दू तरहक विचार सोझ मे आवि गेल। पहिल विचार जे कि षिक्षकेक बहाली टा मे घुसखोरी छैक आ कि सब विभाग मे छैक? आखि उठा-उठा सभ दिषि देखै लगलहुँ त बुझि पड़ल जे अहू(षिक्षा) स बेसी आन-आन मे अछि। जखन सब विभाग मे घुसखोरी अछि तखन देष आगू मुहे कोना ससरत? निच्चा स उपर धरि एक्के रोग सगतरि पकड़ने अछि। मन औना गेल। मन औनाइते छल कि दोसर विचार मन मे उपकल। मन केँ असथिर कए सोचए लगलहुँ। अनायास मन मे आयल जे जहिना पूरबा पछबा हवा धरती से अकास धरि बहैत अछि तहिना ई व्यवस्थाक हवा छियैक। तेँ एकरा बदलैक एक्के टा रास्ता अछि व्यवस्था बदलब। मुदा व्यवस्था बदलब छैाँड़-छैाँड़ीक खेल नहि छी। कठिन काज छी। व्यवस्था सिर्फ लोकक चालिये-ढालि धरि सीमित नहि अछि। ओ अछि मनुक्खक चालि-ढालि स ल’ क’ ओकर बुद्धि-विचार विवेक धरि। मनुष्य केँ जेहेन बुद्धि रहै छै ओहने विचार मन मे अबै छै। जेहेन विचार मन मे अवैत छैक तेहने ओ काज करैत अछि। तेँ जाधरि मनुक्खक बुद्धि नहि बदलत ताधरि ओकर क्रिया-कलाप नहि बदलि सकैत अछि। जाधरि-क्रिया-कलाप नहि बदलत ताधरि व्यवस्था बदलब मात्र बौद्धिक व्यायाम हैत। तेँ जरुरत अछि मनुक्ख मे नव बुद्धिक(बुइधिक) सृजन कए नव क्रिया-कलाप पैदा करब। नब क्रिया-कलाप अएला पर नव रास्ता बनत। नब रास्ता बनला पर कियो नव स्थान पर पहुँचत। नव जगह पहुँचला पर मनुक्ख मनुक्खक बराबरी मे आओत। आ छोट-पैघ, धनीक-गरीब, ऊँच-नीचक खाधि समतल हएत। तखन भक्क खुजल। भक्क खुजितहि हाई स्कूलक षिक्षक देवेन्द्र बाबू मन पड़लथि। देवेन्द्र बाबू, सदिखन छात्र सभ केँ कहथिन- ‘‘मनुख केँ कखनो निराष नहि हेबाक चाहिऐक। जखने मनुक्ख मे निराषा अवैत छैक तखने मृत्यु लग चलि अबै छैक। तेँ सदिखन आषावान भए जिनगी बितेबाक चाहिऐक। कठिन स कठिन समय किएक ने आबे मुदा विवेकक सहारा लए आगू डेग उठेवाक चाहिऐक।’’ देवेन्द्र बाबूक विचार मन पड़ितहि ओ संकल्प लेलनि जहन षिक्षक बनैक लेल डेग उठेलहुँ त षिक्षक बनि केँ रहब। चाहे जत्ते विघ्न-बाधा आगू मे उपस्थिति होअए।’’
जखन देवेन्द्र बाबू कओलेज मे पढ़ैत रहथि तखन आजादीक आन्दोलन देष मे उग्र रुप धेने छल। ओहो(देवेन्द्रवावू) पाँच-सात संगीक संग पोस्ट आॅफिस मे आगि लगा देलखिन। पोस्ट-आॅफिस जरि गेलै। तीनि दिनक बाद हुनका पुलिस पकड़ि लेलकनि। मारबो केलकनि आ जहलो लए गेलनि। जहल जाइ से पहिने कने डरो होइत छलनि। लोकक मुहे सुनने रहथिन जे जहल मे खाइ ले नहि दैत छैक। उपर स दुनू साँझ(साँझ-भिनसर) मारवो करै छै। मुदा जहलक भीतर गेला पर देखलखिन जे हजारो देष प्रेमी क्रान्तिकारी जहल मे छथि। हुनका सभहक लेल जेहने घर तेहने जहल। एक बर्ख ओहो जहल मे रहलाह। ओहि बर्ख दिन मे ओ बहुत सिखलनि। जिनगीये बदलि गेलनि। आब देबेन्द्र बावू सिर्फ अपने आ अपना परिवारे टा ले नहि सोचथि। बल्कि ओ बुझि गेलखिन जे देषक अंग समाज आ समाजक अंग व्यक्ति वा परिवार होइत अछि। तेँ, सभ केँ अपना से ल’ क’ देष धरिक सेवा करैक चाहिऐक। जहल से निकलि बी.एक फार्म भरलनि। बी.ए. पास केलाक पर हाई स्कूलक षिक्षक बनलाह।
हाई स्कूल मे बहूतो षिक्षक छलथि, मुदा हुनकर जिनगी भिन्न छलनि। खानगी पढ़ौनी(ट्यूषन) केँ पाप बुझि क्लास मे तेना पढ़बैत छलाह जे विद्यार्थी केँ टयूषन पढ़ैक जरुरते ने रहैत छलैक। स्कूलक पजरे मे टटघर बना असकरे रहैत छलाह। महिना मे एक दिन गाम जा बालो-बच्चा केँ देखथिन आ दरमहो परिवार मे द’ अवथिन।
चैकी पर हीरानन्द पड़ले रहथि कि एकटा अनठिया आदमी पहुँचलनि। ओ नहि चिन्हलखिन। मुदा दरवज्जाक लाज रखैक लेल आंगन स एक लोटा पानि आनि पाएर धोय बैइसे ले कहलखिन। पुनः आंगन जा पत्नी केँ कहलखिन- ‘‘एकटा अतिथि अयला हेन तेँ झब दे चाह बनाउ।’’कहि दरवज्जा पर आबि ओहि आदमी केँ नाम-गाम पूछै लगलखिन। नाम गाम पूछि काजक गप उठवितहि रहति कि आंगन स पत्नी हाथक इषारा स’ चाह लए जाइ ले कहलखिन। इषारा देखिते गप्प क’ विराम दइत आंगन चाह अनै गेलाह। आंगन जा दुनू हाथ मे दुनू चाहक गिलास लए दरबज्जा पर आबि दहिना हाथक गिलास अतिथि केँ देलखिन आ बामा हाथक गिलास दहिना हाथमे ल’ अपने पीबै लगलाह। गप्पो चलैत आ चाहो पीवैत रहथि तेँ पीवै मे देरी लगलनि। चाह सठलो नहि छलनि कि आंगन स पत्नी जलखइक इषारा देलखिन। पत्नीक इषारा देखि हाथेक इषारा स थोड़े काल बिलमि जाइ ले कहलखिन। चाह पीवि लगले जलखै करब नीक नहि होइत अछि। हँ, चाह पीबै से पहिने जलखै नीक होइत छैक। चाह पीबि पान खा दुनू गोटे गप-सप करै लगलाह। अतिथि केँ पूछलखिन- ‘‘किमहर-किमहर अहाँ एलहुँ?’’
अतिथि- ‘‘एकटा बूढ़ि हमरा गाम मे छथि। सामाजिक संबंध मे दादी हेतीह। बिधवा छथि। बेटो नहि छनि। हुनका विचार भेलनि जे बच्चा सभ केँ पढ़ै ले एकटा इस्कूल बनाबी। चारि बीघा खेत छनि। समाजोक सभ आग्रह केलकनि जे सम्पत्ति त राइ-छित्ती भइये जायत, तहि स नीक स्कूल बना दिऔक। अखन ओ दू बीघा खेत इस्कूल मे देथिन आ दू बीघा अपना ले रखतीह। जखन ओ(दादी) मरि जेतीह तखन चारु बीघा इस्कूलेक हेतै।’’
ध्यान स अतिथिक बात सुनि मुस्कुराइत हीरानन्द कहलखिन- ‘‘बडड् नीक विचार छनि।’’
‘‘ओहि इस्कूल केँ चलवै ले अहाँ से कहै एलहुँ।’’
‘जरुर जायब। राति एतै बीता लिअ। भोरे चलब।’
‘‘कोसे भरि अछि दोसर साँझ धरि पहुँच जायब।’’
‘एते अगुताइ किऐक छी। हमहू थाकल छी। भोरे चाह पीबि दुनू गोटे चलब।’’
हीरानन्दक आग्रह अतिथि मानि गेलाह। अंगनाक टाट लग स पत्नी दुनू गोटेक सब बात सुनैत रहथिन। दुनू गोटे तमाकू खा लोटा ल मैदान दिस विदा भेलाह। घुमैत-फिडै़त दुनू गोटे तेसरि साँझ मे घर पर अयलाह। घर पर आबि दुनू गोटे, दरबज्जा पर बैसी, गप-सप करै लगलाह। भानस भेल दुनू गोटे खा क’ सुति रहलथि।
चारि बजितहि दुनू गोटेक निन्न टूटि गेलनि। जाबे दुनू गोटे पैखाना स आवि दतमनि केलनि ताबे आरती(पत्नी) चाह बनौलनि। चाह पीवितहि रहति कि सूर्यक उदय भेल।
आजुक सुरुज मे एक विषेष रंगक आकर्षण बुझि पड़ैत छलनि। सूर्यक रोषनी मे विषेष आकर्षण छल आकि सभहक हृदय मे छलनि। आरतीक मन मे होइत छलनि जे पति नोकरी करै जा रहल छथि तेँ, विषेष आकर्षण। हीरानन्द क हृदय मे जिनगीक एक सीढ़ी बढ़ैक आकर्षण आ मटकनक(अतिथि) हृदय मे अपन बेटाक पढ़ैक आकर्षण छलनि।
चाह पीवि हीरानन्द झोरा मे धोती, तौनी लए दुनू गोटे गप-सप करैत विदा भेलाह। गप-सपक क्रम मे बुझि पड़लनि जे स्कूल बनवै मे रमाकान्तक विषेष हाथ छन्हि। तेँ गाम पहुँचतहि मटकन केँ कहलखिन- ‘‘पहिने रमाकान्त सँ भेटि क’ लेबनि तखन हुनका(दादी) ऐठाम जायब।’’
दुनू गोटे रमाकान्त ऐठाम पहुँचलाह। साठि वर्षीय रमाकान्त गायक नादि मे कुट्टी-सानी लगवैत रहथि। दलान पर दुनू गोटे केँ देखि रमाकान्त हाँइ-हाँइ हाथ धोए लग आबि बैइसै ले कहलखिन। हीरानन्द चैकी पर बैसलाह मुदा मटकन ठाढ़े रहल। मटकन केँ रमाकान्त कहलखिन- ‘‘तूँ आगू बढ़ि जाह। हम दुनू गोटे पाछू से अबैत छी। जहन मास्टर सहायब दुआर पर ऐला त बिना जलखए करौने कोना जाय देबनि।’’
मटकन आगू बढ़ि दादी केँ सभ समाचार सुना देलकनि। समाचार सुनि दादीक मन खुषी सँ नाचि उठलनि। दादीक मन मे हुअए लगलनि जे आब गामक बच्चा अन्हार स इजोत मुहे बढ़त।
जलखै कए चाह पीबि दुनू गोटे दादी ऐठाम चललथि। दादीक घर थोड़बे हटल। रस्ता मे रमाकान्त मन मे अबै लगलनि जे स्कूल त व्यक्तिगत संस्था नहि छी। सामाजिक छी। सामाजिक संस्था मे सभहक सहयोग हेवाक चाहिऐक। धन्यवाद हुनका(भौजी) केँ दैत छिअनि जे अपन सब सम्पत्ति समाज केँ द’ रहल छथि। मुदा हमरो सभहक त किछु दायित्व होइत अछि। तेँ एहि लेल किछु करब जिम्मा भ’ जाइत अछि। मास्टर साहेबक भोजन आ रहैक जोगार हम कए देवनि। दरमाहा रुप मे खेतक उपजा हेतनि आ समाज सभ मिलि केँ जँ स्कूलक घर बना दइ त सर्वोत्तम होयत। एतै बात मन मे नचितहि छलनि कि दादी ऐठाम पहुँच गेलाह। दादी केँ रमाकान्त भौजी कहथिन। किऐक त समाजिक संबंध मे दादीक पति स भैयारी रहनि। दादीयो मास्टर सहेवक रास्ता देखैत छलीह। भौजी ऐठाम पहुँचति रमाकान्त मटकन केँ कहलखिन- ‘‘मटकन, स्कूल गामक एकटा पैघ संस्था छी। तेँ समाजोक लोक केँ खबरि दहुन आ सब मिलि केँ विचारि आगूक डेग उठायब। ओना भौजीक तियागक(त्याग) प्रषंसा जते कयल जाय कम हएत। जहि सम्पत्तिक लेल लोक नीच स नीच काज करै ले उतड़ि जायत अछि, ओहि सम्पतिक तियाग भौजी कए रहल छथि। जखन मास्टर साहेब आबिये गेल छथि तखन हड़बड़ करैक जरुरत नहि। अखन सौंसे गाम मे सबकेँ कहि दहुन आ बेर मे सभ एकठाम बैसि विचारि लेब।’’
बेर टगि गेल। समाजक सभ एका-एकी अबै लगलाह। सभ केँ मन मे जिज्ञासा रहनि। तेँ विषेष उत्सुक सभ रहथि। सभहक बीच मे रमाकान्त कहलखिन- ‘‘समाजक सभ जनिते छी जे भौजी अपन सभ सम्पत्ति बच्चा सभहक लेल दए रहल छथि। जाहि स हमरे अहाँ केँ कल्याण होयत। मुदा हमरो अहाँक दायित्व होयत अछि जे हमहूँ सभ किछु भागीदार बनी। जाधरि हम जीबैत रहब ताधरि षिक्षक केँ रहैक आ भोजनक प्रबंध करैत रहबनि। अहाँ सभ स्कूलक घर बना दिऔक।’’
रमाकान्तक विचार केँ सभ थोपड़ी बजा समर्थन कए देलकनि। मुस्कुराइत हीरानन्द कहलखिन- ‘‘घर बनै मे किछु समय लगत, तहि बीच अहाँ सभ अपन-अपन बच्चा केँ पठाउ। हम पढ़ाई शुरु कए देव।’’
मास्टरो साहेबक विचार केँ सभ थोपड़ी बजा समर्थन कए देलकनि। थोपड़ी बन्न होइतहि दुखिया ठाढ़ भए अपन विचार रखैत बजै लगल- ‘‘खेती करै ले कते स हर-जन अनताह। जते बोनिहार छी सभ मिलि खेती कए देबनि। किऐक त जहिना मास्टर साहेव हमरा सभहक सेवा करताह तहिना त हमहूँ सभ मिलि केँ हुनकर सेवा करबनि।’’
मौलाइल गाछक फुल:ः 3
छह मास से सोनेलालक स्त्री सुगिया अस्सक छथि। परोपट्टाक डाॅक्टर, वैदय, हकीम ओझा-गुनी थाकि गेल मुदा सुगियाक रोग एक्कैसे होइत गेलै जे उन्नैस नहि भेलैक। फेदरति-फेदरति मे सोनेलाल पड़ल। दिन-राति एक्को क्षण मन चैन नहि। कखनो डाॅक्टर एहिठाम जायत त कखनो दवाइ आनै बजार जायत छलाह। कखनो बच्चा ले दूध अनै जाइत त कखनो माल-जाल केँ खाइ-पीबै ले दइत छलाह। अपना खाइयो-पीवैक सुधि नहि रहैत छलनि। कखनो मनतरिया केँ बजा अनैत त कखनो साँढ़-पारा केँ रोमए ले खेत जाइत छलाह। स्त्री मरैक ओते चिन्ता नहि जते तीनि बेटी पर से भेल चारिम बेटाक। कोरैलै बेटा जनमै काल सुगिया केँ दुख पकड़ि लेलकनि। बच्चा जनमै काल तेहेन समय भ गेल छलैक जे सोनेलाल डाॅक्टर एहिठाम नहि जाय सकलाह। एक त जाड़क मास, दोसर अनहरिया राति। कनिये-कनिये पछबा सिहकी दइत आ बरखा बुन्न जेँका टप-टप गाछ सभ पर स पालाक बुन्न खसैत छलैक। समय देखि सोनेलाल बेवस भ’ गेलाह। पलहनिक घर लग मे रहितहुँ बजबै गेल नहि भेलनि। डरो होइन जे हम ओमहर जायब आ ऐम्हर किछु भ’ जाइन। गुप-गुप अन्हार। हाथ-हाथ नहि सुझैत छलैक। विचित्र संकट मे सोनेलाल पड़ि गेलाह।
जहिया से बच्चाक जन्म भेलै आ स्त्री बीमार पड़लनि तहिया स सोनेलाल केँ कोनो दषा बाकी नहि रहलनि। मुदा सोनेलालो हिम्मत नहि हारलनि। जे केयो जे दवाई वा प्रतिकारक कोनो वस्तुक नाम कहनि ओ आनि सोनेलाल स्त्री केँ देथिन। अंत मे पाँच कट्ठा खेत पाँच हजार मे भरना लगा सोनेलाल लहेरियासराय जाइक विचार क’ लेलक। बच्चो सभ छोट-छोट तेँ घरो आ बाहरो(लहेरियासराय) सम्हारैक लेल आदमीक जरुरत भेलनि। घर सम्हारै ले सारि आ लहेरियासराय जाइक लेल बहीनि केँ बजौलनि। स्त्रीक दूध सुखि गेलनि। तेँ बच्चा केँ बकरीक दूध उठौना केने रहथि। बहीनोक छोटका बच्चा नमहर भ’ गेल छलैक। तेँ ओकरो दूध सुखि गेल छलैक। मुदा बच्चाक दषा देखि बहीनि मसुरी दालिक झोरो खाय लगली आ बच्चो केँ छाती चटबै लगलीह जहि स कनी-कनी दूध पोनगै लगलनि।
लहेरियासराय जाइक तैयारी मे सोनेलाल लगि गेल। मालक घर मे टांगल खाट क’ उताड़ि झोल-झार झाड़ै लगला। खाटक झोलो साफ केलक आ कतौ-कतौ जे जौर टूटल रहै ओकरो जोड़ि-जोड़ि बन्हलनि। बहीनि केँ सोनेलाल कहलक- ‘‘दाय, नुआ बिस्तर आइये खीचि लाय, भोरके गाड़ी पकड़ि क’ चलैक छह। दस दिन जोकर चाउरो-दालि लइये लेब। चाउर त कोठिये मे छह, दालि दड़रै पड़तह। सब ओरियान आइये क क’ राखि लाय।’’
बहीनि- ‘‘भैया, तोहर कोन-कोन कपड़ा साफ कए देवह?’’
‘दाय, एक जोड़ धोती, अंगा आ चद्दरि हम्मर आ तू अपनो कपड़ा खीचि लीहह। अखन ते एकटा धोती पहिरनहि छी। अलगन्नी पर धोती छह, ओकरा अखने खीचि दहक जहि स नहाइ बेर तक मे सुखि जायत। नहा क’ ओकरा पहीर लेब आ पहिरलाहा धोती क’ खीचि लेब।’’
सोनेलालक साइरिये लगे मे ठाढ़। सारि केँ कहलखिन- ‘‘अहाँ दुआर-दरबज्जा से कतौ बाहर नै जायब। अंगने-दुआर मे बच्चो सभ केँ राखब आ मालो-जाल क’ खाइ-पीबै ले देवइ। समय साल खराब अछि, तोहू मे अइ गाम मे देखते छियै जे नव कबरिया छैाँड़ा सभ भाँग-गाँजा पीबि लेत आ अनेरो लोक केँ गरिअबैत रहत। जँ कियो उक्कठे क’ दिअए।’’
बहीनि कोठी स’ मसुरी आ चाउर निकालि, अंगने मे विछान पर सुखै देलक। नवकुट्टिये चाउर तेँ सुरा-फड़ा नहिये लागल छलैक। बहीनि कपड़ा खिचै गेलि आ सारि मसुरि दड़रै लगली। सोनेलाल खाट ठीक कए दू टा बरहा दुनू भागक पाइस मे बन्हलनि। कपड़ा खीचि बहिन सोनेलाल केँ पूछलक- ‘‘भैया, कत्ते चाउर-दालि ल’ जेबहक?’’
सोनेलाल- ‘‘दाय, दुइये गोरे खेनिहार रहब ने, तइ हिसाब से चाउरो आ दालियो ल लेब। तीमन-तरकारी ओतै कीनब।’’
बहीनि- ‘‘भैया, नून ते ओतउ कीनि लेब मुदा मिरचाइ, हरदी आ कड़ूतेल एतै(गामे) से नेने जायब। एकटा थारी एकटा लोटा आ दुनू छोटकी डेकची सेहो लइये लेब। डेकचिये मे सब समान ल लेब किऐक त फुट-फुट के लेला से अनेने नमहर मोटरी भ’ जायत। खाइयोक चीज-बौस रहत आ लतो-कपड़ा रहत, मुदा तइयो मोटरी नम्हरे भ जायत।’’
सोनेलाल- ‘‘मोटरी नम्हरे हैत ते की करबै। जखैन गाड़ा मे ढोल पड़ल अछि तखन की करबै।’’
लहेरियासराय जाइक बहीनि तैयारियो करै आ मने-मन सोचबो करै जे भगवान भारी बिपत्ति मे भैया केँ फँसा देलखिन। जँ कहीं भौजी मरि जेतइ त भैया फटो-फन्न मे पड़ि जायत। असकरे की करत? बच्चो सभ लेधुरिये छै। कना खेती सम्हारत, धिया-पूता के देखत आ माल-जाल केँ देखत। हे भगवान ऐहेन विपत्ति सात घर मुद्दइयो रहै ओकरो नइ दिहक। हमही की करबै? हमहू ते असकरुए छी। हमरो चारि टा धिया-पूता, माल-जाल अछि। छी अइठीन आ मन टांगल अछि गाम पर। मुदा ऐहेन बेर मे जँ भैइयो केँ नै देखबै ते लोक की कहत। लोके की कहत? अपने मन मे केहेन लागत।’’
साँझ परितहि सोनेलाल टीषन जाइ ले दू टा जन तकै गेल। ओना त अपनो दियाद-वाद अछि मुदा बेर पर ककर के होइछै। अचताइत-पचताइत सोनेलाल फुदिया ऐठाम पहुँचल। फुदियाक जेहने नाम तेहने काज। सोनेलाल केँ देखितहि फुदिया पूछलक- ‘‘किमहर-किमहर ऐलह, भाय?’’
‘तोरे से काज अछि।’
‘की?’
‘काल्हि, भोरका गाड़ी पकड़ब। रेखिया माए केँ लहेरियासराय लए जेबै। अपने से ते चलै-फिड़ै वाली नइ अछि। खाट पर ल’ जाय पड़त। तेँ दू गोटेक काज अछि।’’
‘‘तोरा जँ हमर खूनक काज हेतह, हम सेहो देवह। तोहर उपकार हम जिनगी भरि नइ बिसरब। हमरा ओहिना मन अछि जे बेटी विदागरी करै ले तीनि दिन से जमाइ बैसल रहथि आ कपड़ा दुआरे बिदागरी नइ करियैक। मगर जहिना आबि के तोरा कहलियह तहिना तोहूँ रुपैआ निकालि के देने रहह। ऐहेन उपकार हम बिसरि जायब।’’
‘‘समाज मे एहिना सबहक काज सबकेँ होइ छै आ होइत रहतै। जेँइ तोरा पर भरोस छल तेँ ने एलौ। भोरे मे गाड़ी छै। तेँ गाड़ी अबै से एक घंटा पहिने घर पर से बिदा हैब।’’
‘बड़बढ़िया!’ चारिये बजे मे हमरा सब दिन निन्न टुटि जाइ अए। समय पर हम दुनू भाइ चलिऐबह। तोहूँ अपन तैयारी मे रहिह। भ’ सकै अए जे कहीं समय पर निन्न नहि टूटए ते एक लपकन चलि अबिहह।’’
फुदी एहिठाम स आबि सोनेलाल बहीनि केँ पूछलक- ‘‘दाय, सब चीज एक ठीन सरिया के रखि लाय, नै ते जाइ काल हड़बड़ मे छुटि जेतह।’’
सोनेलालक बात सुनि बहिन मने-मन सोचै लगल जे कोनो चीज छुटि ते ने गेल। बहीनि भाइ केँ पूछलक- ‘‘भैया, एक बेरि फेरि से सब चीजक नाम कहि दाय। अखने मिला क’ सरिया लेब।’’
दुनू भाइ-बहीन एक-एक क’ क’ सब वस्तुक नाम लेलक। सब वस्तु देखि सोनेलाल बहीनि केँ कहलक- ‘‘दाय, चारि बजे उठैक अछि, जँ भानस भ गेलह ते अखने खाइ ले द’ दाय।’’
हाथ-पाएर धोय सोनेलाल खाइ ले बैसल। चिन्तित मन तेँ खाइले ने होय मुदा तइओ जी जाँति क’ कहुना-कहुना चारि कौर खेलक। खा क’ मालक घर गेल। माल-जाल केँ खाइ ले द’ आबि क’ सुति रहल। बहीनि खा क’ बच्चा केँ छाती लगा सुति रहल। सुतले-सुतल बहीनि भौजाई के पूछलक- ‘‘भौजी, मन नीक अछि की ने?’’
‘हँ।’
ओछाइन पर पड़ल सोनेलाल केँ निने ने होय। विचित्र द्वन्द्व मे पड़ल रहए। एक दिषि भोरे उठै दुआरे सुतै चाहैत त दोसर दिस पत्नीक चिन्ता नीन आबै ने दइत। कछ-मछ करैत। कनिये कालक उपरान्त हाँफी भेलनि। निन एलनि। निन्न आबितहि चहा क’ उठि बहीनि केँ पुछलखिन- ‘‘दाय, भोर भ’ गेलै?’’
बहीनो जगले छलि, बाजलि- ‘‘भैया, अखने त खा के कर देलहुँ हेन। लगले भोर कना भ’ जइतैक।’’
फेरि दुनू गोटे सुति रहल। तीनि बजे दुनू भाई-फुदिया आबि, डेढ़िया पर से सोर पाड़लक- ‘‘सोनेलाल भाइ, अखैन तक सुतले छह। उठह-उठह, भुरुकुवा उगि गेलै।’’
फुदियाक आवाज सुनि दुनू भाइ-बहीनि धड़फड़ा केँ उठल। आॅखि मिरितहि सोनेलाल बाहर निकलि फुद्दी केँ कहलक- ‘‘की कहिह, बड़ी राइत मे नीन भेल। भने तू आबि के जगा देलह। हम चीज-बौस निकालै छी आ तू खाट केँ सुढ़िआवह।’’
अन्हारक दुआरे बहीनि दू टा डिबिया लेसलक(नेसलक)। एकटा डिबिया ओसारक खुटा लग रखलक आ एकटा घर मे। खाट निकालि फुद्दी पासि मे बान्हल बरहा क’ अजमा केँ देखलक जे सक्कत अछि की नहि। दुनू कात पासि मे बान्हल बरहा क’ देखि फुद्दी सोनेलाल केँ कहलक- ‘‘भाइ, बरहा त ठीक अछि। बाँसक टोन कहाँ छह?’’
बाँसक टोन घरक पँजरे मे राखल। टोन क’ ओंगरी स देखबैत सोनेलाल कहलक- ‘‘होइबैह छह।’’
टोन आनि फुद्दी डिवियाक इजोत मे देखै लगल जे गिरह सब छीलल छै की नहि। छीलल छलै। खाट पर बिछवै ले सोनेलाल एक पाँज पुआर आनि फुद्दी केँ कहलक- ‘‘तोरा अटिअबैक लूरि छह एकरा(पुआर) सरिया क चैरस क’ क’ बिछा दहक।’’
पुआर के फुदी सरिया कहलक- ‘‘भाइ, अइपर बिछेबहक की?’’
सोनेलाल घर से शतरंजी आ सिरमा आनि फुद्दी केँ देलक। बिछान सरिया फुदी बाजल- ‘‘भाइ, रस्ता मे कान बदलै काल, कही भौजी गिरि-तिरि नहि परथि। तेँ पँजरो मे दुनू भाग से डोरी बान्हि देबह।’’
फुद्दीक विचार सोनेलाल केँ जँचल। कने गुम्म भ बाजल- ‘‘की कहिह फुदी दुख पड़ला पर मनो बौआ जाइ छै। तोहूँ की अनाड़ी छह जे नइ वुझबहक। जे नीक बुझि पड़ह से करह।’’
खाट पर रोगी क’ चढ़ा, दुनू भाइ फुद्दी कान पर उठौलक। कान पर उठवितहि सोनेलाल केँ मन पड़ल कहलक- ‘‘फुदी, घर मे ते धियो-पुते रहत, कियो चेतन नहिये अछि। साइरियो आइल अछि ओहो अनठिये अछि। तेँ, तूँ राति केँ एतै खैइहह आ सुतिहह।’’
‘बड़-बढ़िया’ कहि फुद्दी आगू बढ़ल। चाउर-दालि आ बरतन-बासनक मोटरी माथ पर ल’ सोनेलाल निकलल। बच्चा केँ छाती लगौने बहीनो निकललीह। डेढ़िया पर अबितहि सुगिया खाटे पर स बाजलि- ‘‘कनी अँटकि जाउ।’’
फुदी ठाढ़ भ’ पुछलक- ‘‘किअए रोकलहुँ?’’
खाटे पर से सुगिया बजलीह- ‘‘हे सौध-गुरु, अगर नीके ना घुरि के आयब ते पचास मुरतेक भनडारा करब।’’
फुदी खाट उठा विदा भेल। रास्ता मे केयो किछु नहि बजैति रहथि। मने-मन सभ रंगक बात सोचैत रहथि। फुद्दी सोचैत जे भगवानो केहेन बेइमान अछि जे सोनेलाल भाइ सन सुधा(षुद्ध) आदमी केँ ऐहेन विपत्ति देलखिन। सोनालाल सोचैत जे तीनि बेटी पर बेटा भेल जँ घरवाली मरि जाइत ते बेटो मरि जायत। चुमौन करब तहि स बेटाक कोन गारंटी हएत। जँ कहीं बेटिये भेल त खानदानोक अंत होयत आ जिनगी भरि अपनो विआहे दानक बनर-फाँस मे सोहो पड़ल रहब।
बहीनि सोचैत जे जँ कहीं भौजी मरि जेतीह ते जिनगी भरि भैया केँ दुखे-दुख होइत रहतै।
स्टेषन पहुँच सोनेलाल मोटरी रखि गाड़ीक भाँज लगवै गेल। टिकट कटैत देखि वुझलक जे गाड़ी अबै मे लगिचा गेल अछि। हमहूँ टिकट कटाइये लइ छी। टिकट कटौलक। कनिये कालक बाद गाड़ी आयल। तीनू गोटे(दु गोटे फुद्दी आ सोनेलाल) सुगिया केँ गाड़ी मे चढ़ौलनि। सोनेलाल उपरे मे(गाड़ी मे) रहलाह। मोटरी उठा केँ फुद्दी देलकनि। मोटरी रखि सोनेलाल बहीनिक कोरा स बच्चा केँ लेलनि। बहिनो चढ़लीह। गाड़ी खुजितहि दुनू गोटे फुद्दी खाट उठा घर दिषि विदा भेल।
गाड़ी दरभंगा पहुँचल। छोटी लाइन दरभंगे तक चलैत। तेँ गाड़ी दू घंटा उपरान्त फेरि घुरि क’ निरमलिये जायत। गाड़ी स यात्री सभ उतड़ै लगलाह। मगर सोनेलाल सबतुर बैसले रहलथि। मन मे कोनो हड़वड़ी नहिये रहनि जखन सभ उतड़ि गेलाह तखन सोनेलाल सीट पर स उठि बहीनि केँ कहलनि- ‘‘दाय, तू एतै रहह, हम कोनो सबारी भजिऔने अबै छी।’’
कहि सोनेलाल गाड़ी स उतड़ि, प्लेटफार्म से निकलि वाहर एकटा टेम्पू लग पहुँचलाह। ड्राइवर निच्चा मे ठाढ़ भ’ पसिन्जर सभकेँ देखैत रहति। सिरसिराइत सोनेलाल ड्राइवर केँ कहलखिन- ‘‘भाइ, हमरा डाकडर ऐठाम जेवाक अछि, चलबह?’’
सोनेलालक बोली स ड्रइवर बुझि गेल जे देहाती आदमी छी तेँ एना बजैत छथि। मुदा सोनेलालक प्रति ड्राइवरक आकर्षण बढ़ि गेलनि असथिर से ड्राइवर पुछलखिन रोगी कहाँ छथि।’’
‘‘गाड़िये मे।’’
‘‘बजौने अबिअनु।’’
‘‘अपने पाएरे अबै वाली नइ छथि। पकड़ि केँ आनै पड़त।’’
गाड़ी केँ सोझ क’ ड्राइवर सोनेलालक संग प्लेटफार्म पर आयल। गाड़ी लग पहुँच ड्राइवर रोगी आ समान देखि मने-मन विचारलनि जे एक आदमीक काज आरो पड़त। प्लेटफार्म दिषि उठा क’ हियाबै लगल। गाड़ी साफ करै ले दू गोटे केँ नेने अवैत देखि जोर से ड्राइवर बाजल- ‘भैया’
भैया सुनि झाड़ूवला आखि उठौलक ते ड्राइवर केँ देखलक। ड्राइवर केँ देखितहि लफड़ि कए ड्रइवर लग आयल। ड्राइवर कहलकै- ‘‘भाय एकटा दुखित महिला अई कोठली मे छथि, हुनका उताड़ि केँ टेम्पू मे बैसाय दिअनु।’’
झाड़ू राखि दुनू झाड़ूओवला आ ड्राइवरो सुगिया केँ उताड़ि टेम्पू दिषि बढ़लाह। सोनेलाल मोटरी लेलनि। आ बहीन बच्चा केँ कन्हा लगा चललीह। सुगिया केँ चढ़ा क झाूड़ूवला गाड़ी साफ करै ले घुरै लगल। दुनू झाड़ूवला केँ रोकि सोनेलाल दस टा रुपैआ निकालि दियए लगलखिन। रुपैआ देखि, अधवेयषु झाड़ूवला, बाजल- ‘‘भाइ हमहू सरकारी(रेलवे) नोकरी करै छी। दरमाहा पबै छी। अहाँक मदति केलहुँ। अखन जइ मुसीबत मे अहाँ छी ओहि मे हमरा देहो आ रुपैयो से मदति करक चाही। मुदा गरीब छी, कहुना-कहुना कमा क’ गुजर कए लइत छी। किऐक त ओहूँ बुझिते हेवइ जे सब दुख गरीवे केँ होइ छै। धनीक लोक सोनाक मंदिर मुरुत के खोआ-मलाई चढ़ा घरम करैत अछि। हमर भगवान यैह मरल-टूटल लोक छथि। हम सेवा केलहुँ। भगवान करथि जे हँसी-खुषी से अहाँ घर जाय।’’
झाड़ूवलाक बात सुनि सोनेलाल अचंभित भ’ गेलाह जे जकरा से लोक छुति मानैत अछि ओकर आत्मा कतेक पवित्र छै।
टेम्पू आगू बढ़ल। थोड़े दुर गेला पर सोनेलाल ड्राइवर केँ कहलखिन- ‘‘डरेबर सहाएव, हम अनभुआर छी। कहियो ऐठाम नइ आयल छी। अहाँ अइठीन रहै छी। सबटा बुझल-गमल अछि। तेहेन डाकडर लग चलू जे हमरा रोगी केँ छुटि जाय।’’
‘‘बड़वढ़िया।’’- ड्राइवर बाजल।
मने-मन ड्रइवर सोचै लगल जे अस्पताल मे भरती करौनाइ नीक नहि हेतनि। एक त अस्पताल मे बेवस्थो बढ़िया नहि छैक दोसर जेकरे लागि-भागि छै तेकरे सभ केँ सभ सुविधो भेटैत छैक। तेँ सबसे बढ़िया डाॅक्टर बनर्जी लग लए चलिएनि। डाॅक्टर बनर्जी रिटायर भए अपन घरो आ क्लीनिको बनौने।
बारह बजि गेल। डाॅ. बनर्जीक पहिल पाली आठ बजे भिनसर से बारह बजे होइत आ दोसर पाली चारि बजे से आठ बजे साँझ धरि होइत छलनि। सब रोगी केँ देखि डाॅ. बनर्जी डेरा जेबाक तैयारी करैति रहथि टेम्पू के ड्राइवर सोझे फाटक से भीतर ओसार लग लए गेल। टेम्पू देखि डाॅ. बनर्जी फेरि वैसि रहलाह। टेम्पू रोकि ड्राइवर उतरि क’ सोझे डाॅ. बनर्जी लग जा कहलकनि- ‘‘डाॅक्टर साहेव, रोगी अपने से चलै-फिड़ैवाली नइ छथि तेँ पहिने एकटा डेरा दिअनु।’’
आखिक इषारा से डाॅ. बनर्जी कम्पाउण्डर केँ कहलखिन। बगले मे अपने डेरा। कम्पाउण्डर जा क’ एकटा कोठरी खोलि कुन्जी सोनेलाल केँ द’ देलकनि। कम्पाउण्डर घुरि क’ आबि, नोकर केँ संग क, स्ट्रेचर पर सुगिया केँ ल’ जा सीट(दू जनिया चैकी) पर सुता देलकनि। स्ट्रेचर राखि कम्पाउण्डर डाॅ. बनर्जी केँ कहलकनि- ‘‘सब व्यवस्था कए देलिएनि।’’
डाॅ. बनर्जी आगू-आगू आ कम्पाउण्डर, ड्राइबर आ सोनेलाल पाछू-पाछू। सुगिया केँ देखितहि डाॅक्टर केँ रोग चिन्हा गेलनि। मुदा आरो मजबूतीक लेल सुगिया केँ पूछए लगलखिन। हताष मन सोनेलालक। मुह सुखायल। आखि नोरायल। बहीनिक आखि स नोरक ठोप खसैत। डाॅ. बनर्जी कम्पाउण्डर सूई लगबै ले कहलखिन। कम्पाउण्डर सूइ अनै गेल। सोनेलाल डाॅ. बनर्जी केँ पूछलखिन- ‘‘डागडर सहाएव, रोगीक दुख छुटतै की नै?’’
सोनेलालक प्रष्न सुनि डाॅ. बनर्जीक हृदय पधलि गेलनि। उत्साह दैत सोनेलाल केँ कहलखिन- ‘‘चैबीस घंटाक भीतर रोगी टहलै-बुलै लगतीह। अखन एकटा सूइयाँ दैत छियनि। पाँच बजे तक सुतल रहती। उठेबनि नहि। अपने निन्न टुटतनि। निन्न टुटला पर कुड़ड़ा-आचमन करा चाह बिस्कुट देबनि।’’
ताबे कम्पाउण्डर आबि सुगिया केँ सूई लगौलक। सूइ पड़ितहि सुगिया केँ निन्न आबि गेलनि। डाॅ. बनर्जी सोनेलाल केँ कहलखिन- ‘‘आब अहाँ सभ खाउ-पीबू।’’
डाॅक्टर चलि गेलाह। ड्राइवर सोनेलाल केँ वुझबै लगलखिन- ‘‘पानिक कल बगले मे अछि। भानस करै ले चुल्हियो अछिये। अपने भानस करब। बाहर चलू दोकान देखा दइ छी। अइ से बाहर नइ जायब। लुच्चा लम्पट बेसी अछि। जेबी से पाइ निकालि लेत। तेँ जतबे काज हुअए ततबे पाइ मुट्ठी मे नेने जायब आ सामान कीनि लेब। आव हम जाइ छी। ऐठाम कोनो चीजक डर नइ करब। सभ भार डाॅक्टर साहेब केँ छनि।’’
पाँच बजितहि सुगिया आखि खोललक। सुगियाक लगे मे सोनेलालो आ बच्चो केँ कोरा मे नेने बहीनों बैसलि। आखि खोलितहि सुगिया सुतले सुतल बाजलि- ‘‘किछु खाइक मन होइ अए।’’
सुगियाक बात सुनितहि सोनेलाल केँ मन पड़ल जे डाॅक्टरो सहाएव कहने रहथि। उठि के चाह-विस्कुट आनि सुगिया लग रखलक। कल पर से लोटा मे पानि आनि केँ कुड़्ड़ा करै ले देलखिन। वैसले-वैसल सुगिया कुड़्ड़ा कए चाहे मे डुबा-डुबा विस्कुट खेलनि। चाह-विस्कुट खा सुगिया मुह पोछलक। सुगिया के मुह पोछितहि सोनेलाल पूछलक- ‘‘मन केहेन लगै अए।’’
- ‘‘कनी हल्लुक लगै अए।’’
सोनेलालो आ बहिनोक मन मे खुषी आयल। मने-मन बहीन भगवान केँ कहै लगलनि जे हे भगवान कहुना भौजी केँ नीक कए दिअनु।’’
सुगिया केँ सुधार हुअए लगल। तेसरा दिन स सुगिया बुलै-टहलै लागलीह। दू बेरि दिन मे डाॅक्टरो साहेव आवि-आवि देखथि। सभ तरहक तरदुत सोनेलाल करै ले हरदम तैयार।
दसम दिन सुगिया केँ डाॅक्टर साहेव छुट्टी दए देलखिन। सोनेलाल कम्पाउण्डर से सभ हिसाब केलनि। जते हिसाब सोनेलाल केँ भेलनि तेहि सँ पाँच सय रुपैआ अधिक ल’ सोनेलाल डाॅक्टर साहेव क आगू मे रखि देलकनि। रुपैया गनि डाॅक्टर साहेव पाँच सय रुपैया घुमवैत कहलखिन- ‘‘जोड़ै मे पाँच सौ बेसी आबि गेल। इ पाँचो सय रखि लिअ।’’
डाॅक्टर साहेबक बात सुनि सोनेलाल कहलकनि- ‘‘गनै मे गलती नइ भेल। पाँच सय अहाँ केँ खुषनामा दइ छी।’’
खुषनामा सुनि डाॅ. बनर्जी गुम्म भ गेलाह। मन मे एलनि जे वेचाराक बगए-बानि कहैत अछि जे पैइच-उधार क-ए आयल होयत तखन देखू उद्गार। हमरा कोन चीजक कमी अछि जे एहि वेचाराक फाजिल पाइ हम छूबै। मन पड़लनि, जमीनदारीक समयक पुनाह। जमीनदार सभ साल मे एक बेरि पुनाह करैत छलाह। जमीनदारक कचहरी मे पुनाह होइत छलैक। पुनाह होइ स पनरह दिन पहिने रैयत सभ केँ जानकारी दए देल जाइत छलैक। जमीनदार दिषि स मोतीचूरक लड्डू बनाओल जायत छलैक। एक रुपैआ मे एक लड्डू हिसाव स देल जायत छलैक। रैयतो मे दू विचारक रैयत रहैत छल। एक तरहक ओ छल जकरा सिर्फ अन्नेक आमदनी छलैक। ओहि तरहक रैयतक हालत कमजोर छलैक। मगर दोसर तरहक जे रैयत होइत छल ओकरा अन्नक संग-संग नगदो आमदनी छलैक। जना कोना-कोनो जाति केँ दूध-दहीक, त कोनो-कोनो जाति केँ तीमन-तरकारीक। कोनो जाति केँ पानक त कोनो-जाति केँ छोट-छोट कोल्हु इत्यादि। पुनाह धर्म स जोड़ल शब्द अछि। धार्मिक भावना सभहक मन मे रहैत छलैक। तेँ, एक-दोसर केँ निच्चा देखबैक लेल मने-मन प्रतियोगिता करैत छल। एकटा लड्डूक दाम मुष्किल स दू पाइ होइत छल होयतैक। किऐक त आठ अने चीनी(चिन्नी) आ रुपैआ मे चारि सेर खेरही वा आन कोनो अन्न, जेकर लड्डू बनैत छलैक। प्रतियोगिता दू तरहक होइत छलैक। पहिल- व्यक्ति विषेष मे आ दोसर जाति-विषेष मे। लोक खुब खुषी रहैत छलै। गामे-गाम मलगुजारी से बेसी, पुनाह मे जमीनदार रुपैआ असुल कए लइत छलाएह। जहि समाज मे मलगुजारीक चलैत लोकक खेत निलाम होइत छलैक। ओहि समाज मे पुनाहक नाम पर लूट सेहो चलैत छलैक। वैह बात डाॅ. बनर्जी केँ मन पड़लनि। हँसैत डाॅ. बनर्जी सोनेलाल केँ कहलखिन- ‘‘अहाँ, खुषी भए ऐहिठाम सँ जाय रहल छी, यैह हमर खुषनामा भेल। भगवान करथि परिवार फड़ै-फुलाय।’’
तीनू गोटे गामक रास्ता धेलनि। बच्चा केँ सुगिया कोरा मे नेने आ बहीनि बरतनक मोटरी माथ पर नेने। खालिये देहे सोनेलाल दरभंगा स्टेषन आबि गाड़ी पकड़लनि।
अपना स्टेषन मे उतड़ि तीनू हँसी-खुषी सँ गाम दिसक रास्ता धेलक। रेलवे कम्पाउण्ड स निकलि सुगिया सोनेलाल केँ कहलनि- ‘‘जाइ काल पचास मुरते सौधक भनडारा कबुला केने रही। कबुला-पाती उधार नइ राखक चाही। काल्हि खन ओहो कवुला पुराइये लेब।’’
सोनेलालोक मन खुषी रहनि। चाउर-दाइल घरे मे रहनि। रुपैयो किछु उगड़ले रहनि। मुस्कुराइत सुगिया केँ कहलखिन- ‘‘काल्हि त भनडारा नहि सम्हरत। दही पौरैक अछि, हाट से तीमन-तरकारी, नोन-तेल आनै पड़त। चारि-पाँच दिन मे भनडारा कए लेब। अखन दाइयो आयले अछि।’’
दाइक नाम सुनि बहीनि बाजलि- ‘‘भैया, तेहने गड़ू मे पड़ि गेल छेलह तेँ अपन सब कुछ छोड़ि केँ छिअह। तूँ नै बुझै छहक जे हमरो कियो दोसर करताइत नै अछि? काल्हि हम चलि जेवह।’’
सोनेलालक मन गदगद्। जहिना चुल्हि पर चढ़ाओल पानि देल बरतन मे निच्चा स आगिक ताव लगितहि निचला पानि गर्म भ उपर मुहे उठैत, तहिना सोनेलालक मन खुषी स नचैत रहनि। स्टेषन से थोड़े दूर ऐला पर सोनेलाल कहलक- ‘‘अहाँ दुनू गोरे अइठाम बैसू। लगले हम चीज-बौस कीनने अबै छी।’’
सुगियो आ बहिनो, रस्ते कात मे आमक गाछक निच्चा मे बैसलीह। सोनेलाल स्टेषन दिषि विदा भेल। स्टेषने कात मे आठ-दस टा दोकान छलैक। एकटा दोकान माछक, दोसर मुरगी आ अण्डाक एकटा सुधा दूधक एकटा चाहक, एकटा पानक आ पान-छौ टा तरकारीक। सोनेलालक मन मे एलै जे पान-सात रंगक तरकारियो, दूधो आ राहड़िक दालियो कीनिये लेब। किऐक त छह मास से ने भरि पेट अनन खेलहुँ आ ने कहियो मन असथिर रहल। तेँ आइ राति अपनो सभ परिवार आ फुद्दियो दुनू भाँइ केँ न्योत(नौत) दए खुआ देवनि। रेलवेक कम्पाउण्ड मे जे दोकान(तरकारी, दूध, माछ इत्यादिक) छलैक ओ स्थायी नहि। साधारण छपड़ी टाँगि-टाँगि दोकान चलवैत अछि। क्यो दोकानदार रेलवे सँ दोकानक पट्टो नहि बनौने। स्टेषनेक स्टाफ, दोकानदार केँ दोकान लगबै देने अछि। जहि से बट्टीक बदला सभकेँ परिवार जोकर तरकारी सब दिन भए जायत छलैक। जहिया कहियो रेलवेक अफसरक आगमन होयत छलैक तहि से पहिनहि स्टाफ दोकानदार सभकेँ कहि दैत छलैक। अपन-अपन छपड़ी सभ हटा लइत छल।
मोड़(दोकान आ रेलवेक बीच) पर ठाढ़ भए सोनेलाल सोचै लगल जे दोकान मे जे राहड़िक दालि बिकायत ओ अरबा रहैत अछि। तेँ दालि के उलवै पड़त। घर मे ते लोक पहिनहि राहड़ि उला लैत अछि। बिनु उलौल(उलाओल) राहड़िक दालि त खेसारिये जेँका होइत अछि। मुदा उलौलाक बाद आमील देल राहड़िक दालि त दालिये होइत। सबसँ नीक। लटखेवा दोकान पहुँच सोनेलाल एक किलो राहड़िक दालि, आधा किलो चिन्नी कीनलक। दुनूक दाम दए तरकारीबला लग आबि सात-आठ रंगक तरकारी कीनिलक। तरै जोकर गोलका भाँटा(भाँटिन) गंगाकातक बड़का परोड़, हैदराबादी ओल टेबि केँ कीनलक। दू किलो सुधा दूध सेहो लेलक। सब समान के गमछा मे बान्हि, हाथ मे लटकौने घुरि के सुगिया लग आयल। गमछा मे बान्हल समान देखि बहीनि पूछलक- ‘‘भैया, की सब कीनि लेलहक?’’
बहीनिक मन मे भेलनि जे धिया-पूता ले भरिसक लाइ-मुरही कीनि लेलनि। मुदा मोटरी नमहर, तेँ पुछलकनि। बहीनिक बात सुनि सोनेलाल हँसैत बाजल- ‘‘दाय, खाय-पीबैक समान सब कीनलहुँ। आइ सभ परानी मिलि नीक-निकुत खायब। बेचारा फुदियो, नोकर जेँका राति के घरक ओगरबाही करैत हैत। तेँ ओकरो दुनू भाय केँ नौत दए खुआ देबइ। तेँ तीमन-तरकारी, दूध आ दालि कीनि लेलहुँ। भानस करै ले तोहूँ तीनि गोटे(बहीनि, स्त्री आ सारि) छेबे करह। एक्कोदिन ते तोरो सभक मेजमानी होय। दाय, जते अनका भाइयो से सुख नहि होइत छै तहि से बेसी तोरा से भेल। तोहर उपकार जिनगी मे नहि बिसरब। भगवान तोरा सन बहीनि सभकेँ देथुन।’’
सोनेलालक बात सुनि गद्-गद् होयत बहीनि उत्तर देलकनि- ‘‘भैया, हम अपन काज केलहुँ। तोहर उपकार की केलियह। ऐहेन वेर पर जे तोरा नै देखितियह ते हमरा सन बहीनि ककरो रहिये के की हेतइ।’’
बहीनिक बात सुनि सुगिया पति केँ कहलनि- ‘‘दाई ते औगुताइ छथि। कहै छथि जे काल्हि भोरे चलि जायब। एकोटा धराउ घर मे साड़ियो ने अछि जे देवनि। बिना साड़ी देने कोना जाय देबनि। केहेन हैत?’’
भौजाइक बात सुनि मुस्की दैत ननदि बाजलि- ‘‘भौजी, चारु बेटा-बेटीक वियाह मे ते हमरा चारि जोड़ साड़ी रखले अछि। मुदा ऐहेन बेरि मे साड़ीक कोन काज छै। अपने ते भैया पैंइच-उधार ल’ क’ काज चलौलक अछि। तइ पर से हमरो ले करजा करत। हमरा जँ दिऔ चाहत ते हम नै लेबै।’’
घर पर अबितहि परिवार स गाम धरि खुषीक बर्खा बरिसय लगल। तीनू बेटी सुगियाक गरदनि मे लटपटा गेलि। बहिन(सुगियाक) बच्चा केँ कोरा मे लए मुह चुमै लगल। जहिना जाड़क मास मे गाछ-बिरीछ पालाक मारि स ठिठुर जाइत, मुदा गरमी केँ धबितहि नव रुप धारण करैत अछि तहिना सबकेँ भेल। छह मासक तबाही, सोग, निराषा सोनेलाल केँ छोड़ि पड़ा गेल। पास-परोसक जनिजाति सभ आबि-आबि सुगिया केँ देखवो करैत आ बीमारीक समयक खिस्सो सुनैत छलीह। एक्के-दुइये सैाँसे अंगना धियो पूतोक आ जनिजातियो स लोकक भीड़ हटल। तीनू गोटे भानसक जोगार मे लागि गेलीह। कते दिन से सोनेलाल भरि मन नहायल नहि छल। साबुन लए केँ नहाय ले गेल।
भानस भेलैक। सभ कियो भरि मन खेलनि। खाइते सभकँे ओंघी अबै लगलनि। सभ जा-जा केँ सुति रहलाह।
पत्नीक संग सोनेलाल केँ लहेरियासराय जैतहि गाम मे चर्च चलै लगल। एक दिषि जनिजाति सभ सोनेलाल केँ बाहवाही करैत छलीह त दोसर दिषि मर्दा-मर्दीक बीच इलाजक खर्चक चर्च चलै लगल। सैाँसे गाम दुनू परानी सोनेलालेक चर्च चलैत रहए। सबेरे स्कूल मे छुट्टी दय खसल मने हीरानन्द चलि ऐलाह। सबेरे हीरानन्द केँ आयल देखि रमाकान्त पुछलखिन- ‘‘सबेरे स्कूल बन्न कए देलिऐक?’’
ओना रमाकान्तो केँ सोनेलालक संबंध मे बुझल छलनि मुदा जहि गंभीरता सँ हीरानन्द सोचैत रहति ओहि गंभीरता सँ ओ नहि सोचैत छलाह। तेँ मन मे कोनो तेहेन विचार नहि छलनि। हीरानन्द उत्तर देलखिन- ‘‘बच्चा सभ केँ पढ़बै मे मोन नहि लगैत छल, तेँ छुट्टी दए देलियैक।’’
‘किअए नहि पढ़वै मे मन लगैत छल।’’
चिन्तित भए हीरानन्द कहलखिन- ‘‘एक त बाढ़िक मारल बेचारा सोनेलाल ताहि पर सँ बीमारीक। तेहेन चपेट मे पड़ि गेला जे कोनो कर्म बाकी नहि छन्हि। यैह बात मन मे घुरिआय लगल। पढ़वै मे एक्को रत्ती नीके नहि लगैत छलै।’’
सोनेलालक बात सुनितहि रमाकान्तक मन मौलाय लगलनि। मौलायत-मौलायत जहिना हीरानन्दक मन रहनि तहिना भए गेलनि। पाएर मे ठेंस लगलापर जहिना केयो मुह भरे खसैत आ छाती मे चोट लगैत अछि तहिना रमाकान्तक हृदय मे मनक चोट लगला सँ भेलनि। मुदा जोर सँ नहि कुहरि चुप्पेचाप कुहरै लगलथि। मन मे एलनि जहि गाम मे चारि-चारि टा डाॅक्टर छथि ओहि गामक लोक रोग सँ कुहरै, कते दुखक बात छी। ऐहने डाॅक्टर केँ लोक भगवान बुझि पुजनि कहाँ धरि उचित छी। जाहि पढ़ल-लिखल लोक केँ अपना गाम सँ स्नेह नहि, अपन कुटुम्व परिवार सर-समाज सँ स्नेह नहि छन्हि, अपने सुख भोगक पाछू बेहाल छथि। हुनका अनेरे दाय-माय किअए छठियार दिन छाती मे लगा जीवैक असीरवाद देलकनि। फेरि मन मे एलनि जहिना माल-जाल केँ डकहा बीमारी होइ छै तहिना त मनुक्खो केँ चटपटिया बीमारी होइ छैक। जे छन मे छनाँक कए दैत छैक। चारि टा बेटा-पुतोहू डाॅक्टर हमरे छथि जँ कहीं अपने आ कि महेन्द्रक मइये केँ ओइह चटपटिया बीमारी भए जाइन ते कि करताह ओ सभ हमरा।
मन घोर-घोर, बाके बन्न भए गेलनि।
तीन दिनक बाद सोनेलाल भनडाराक कार्यक्रम बनौलनि। खाइ-पीवैक सब ओरियान दिल खोलि केँ केलनि। तुलसी फुलक अरबा चाउर, राहड़िक दालि, एगारह टा तरकारी दही-चिन्नीक नीक व्यवस्था केलनि।
गाम मे दू पंथक साधू। पहिल पंथक महंथ रमापति दास आ दोसर पंथक गंगा दास। राम-जानकीक मंदिर रमापति दास बनौने छथि। दुनू साँझ पूजा करैत छथि। मुदा गंगादास केँ किछु नहि। सेवकान दुनू गोटे केँ छन्हि। आन-आन गाम मे सेहो दुनू गोटे केँ सेवक छन्हि।
सोनेलालक मन मे, छल-प्रपंचक मिसिओ भरि लसि नहि, तेँ पच्चीस मुरते साघुक दल रमापति दास केँ देलकनि आ पच्चीस मुरतेक दल गंगादास केँ। दल देलाक बाद सोनेलाल दुआर-दरबज्जा चिक्कन-चुनमुन करै लगला। भानस करैक बरतन सब माँजि-मूजि तैयार केलनि। खाइक लेल केराक पात काटि, धो केँ सेहो रखलनि।
एक गाम मे रहितहुँ दुनू पंथक बीच अकास-पतालक अंतर छलनि। पहिल पंथ मे ऊँच जातिक बोलवाला जबकि दोसर पंथ मे ऊँच जाति कम मुदा निम्न जाति बेसी। छूत-अछूतक कोनो भेद नहि। दिनुके भनडारा।
दोसर पंथक साधु सभ सबेरे आबि, चरण पखारि भजन शुरु केलनि। भजन शुरु होइतहि टोल-परोसक जनिजातियो आ धियो-पूता आबि केँ सैाँसे खरिहान भरि देलकनि। खरिहाने मे बैसारो केने रहथि। तीन टा भजन समाप्त भेलाक बाद रमापति दास चेलाक संग पहुँचलथि। संग मे सभ साधु रहथि। फरिक्के सँ दोसर पंथक साधु देखि रमापतिदास मने-मन जरै लगलथि। मुदा क्रोध के दाबि दरबज्जा पर पहुँचलथि। दरबज्जा पर अबितहि रमापतिदास सोनेलाल केँ कहलखिन- ‘‘हमरा सभहक बैसार फुट मे करु।’’
रमापतिदास केँ प्रणाम क’ सोनेलाल दलान दिषि इषारा दैत कहलकनि- ‘‘अपने सभ दरवज्जे पर बैसिऔक।’’
सोनेलालक विचार सुनि रमापति दास मने-मन सोचै लगलथि जे जँ अखन दोसर ठाम बैसार बनवै ले कहबैक त धड़फड़ मे संभव नहि होयत। जँ झगड़ा करै छी त ककरा सँ करु। वेचारा घरबारी की करत? घरवारीक लेल त जहिना हम दल देलाक बाद एलहुँ तहिना त ओहो सभ छथि। तेँ जेहने हम सभ तेहने ओहो सभ। अगर ओही साधु सभ सँ कहा-कही करैत छी त दू धार्मिक पंथक बीच विवाद होयत। मुदा एहिठाम त भनडारा छी, पंथक नीक-अधलाक विवेचनक मंच नहि! इहो करब उचित नहि। जँ अपना केँ उन्नैस मानि लइत छी त कायरता होयत। विचित्र स्थिति मे रमापतिदास पड़ि गेलाह। गुम्म-सुम्म, दरवज्जा आ खरिहानक बीच ठाढ़। ने डेग आगू बढ़ैन आ ने पाछु होइन। जत्ते गोटे हमरा संग आयल छथि जँ हुनका सभ स विचार पुछवनि आ ओ लोकनि हमरा मनक विपरीत विचार दैथि तखन की करब? आइ धरि त सेहो नहि केलहुँ। करब उचितो नहि। गुरु-चेलाक अन्तर समाप्त भ जायत। रमापतिदासक मन औनाई लगलनि। चाइन पर पसीनाक रुप चमकलनि। ताबे कान पर रखनिहार हारमुनियमवलाक कान्ह अंगिया गेलैक ओ आगू बढ़ि ओसारक चैकी पर हारमुनियम रखि देलक। हारमुनियम रखैत देखि ढोलकियो ढोलक रखि देलक। एहिना एका-एकी सभ अपन-अपन लोटा-गिलास धरि रखि देलक। मुदा वैसल कियो नहि। तकर कारण बिना चरण पखारने बैसब कोना? आ जाबे गुरु महाराज नहि बैसताह ताबे हमसभ कोना वैसब। सभकेँ अपन-अपन सामान(बाजा, लोटा-गिलास) रखैत देखि अपन गिलास-कमंडल के सेहो राखल देखथि। रमापतिदास केँ गर भेटिलनि। ओ(रमापतिदास) विक्षिप्त मने कहलखिन- ‘‘जखन सभहक मन अछि तखन किऐक ने दरबज्जे पर बैसलि जाय। घरवारियो ते आदर करिते छथि।’’
एकदिषि रमापतिदास केँ मन जरैत दोसर इहो खुषी जे स्वागत(सुआगतक) संग घरवारी हमरे बेसी महत्व देलनि। सभ कियो चरण पखारि बैइसय लगलाह।
बिढ़नी जेँका सुगिया नचैत छलीह। कखनो घर जा दही देखि अबैत जे कहीं बिलाई ने आबि के खा लिअए। त लगले ओसार पर राखल सामान(चाउर-दालि, तरकारी) केँ देखैत जे कौआ ने आबि के छुता दिअए। फेरि लगले अंगना मे राखल टकुना, कराह, बालटीन केँ देखैत जे धिया-पूता ने गंदा कए दिअए। त लगले आबि दलानक पाछू मे ठाढ़ भ’ टाटक भुरकी देने देखैत, जे लोक सँ भरल दरबज्जा-खरिहान अछि, कहीं मारिये ने शुरुह भए जाय। सुगियाक मनमे अहलदिल्ली पैसि गेलनि। मगज पड़क पसीना सोनेलाल केँ केषक तर देने गरदनि पर होयत गंजी तर देने, धोती भिजबैत रहैक।
भजन सुनिनिहार मे धिया-पूता स’ ल’ क’ स्त्री-पुरुष धरि। मोतियाक माए पचास वर्खक बूढ़ि। भजन बन्न भेलि देखि बुचाईदास केँ कहलखिन- ‘‘हे यौ बुचाई दास, बिना भजन गौने जे पंगहति करबै ते पाप नै लिखत?’’
मोतिया मायक कड़ूआइल बात सुनि बुचाई दास उत्तर देलखिन- ‘‘बड़ी काल गाजा पीना भ’ गेल अछि, तेँ कने पीबि लइ छी। तखन नाचो देखा देब आ कबीर सहाएव की कहलखिन सेहो सुना देव। कनिये काल छुट्टी दिअ। होअए हौ रघूदास, जलदी गुल दहक।’’
बिना साज बजनहि घुन-घुना क’ कहै लगलखिन- ‘‘हटल रहियौ सन्तो बिलैइया मारे मटकी।’’
बुचाई दासक पाँती आ मुहक चमकी देखि धियो-पूतो आ जनिजातियो, खापरि मे देल जनेरक लाबा जहिना भर-भरा केँ फुटैत अछि तहिना सभ हँसै लगलाह।
दलानो मे आ खरियानो मे भजन शुरु भैल। दोसर पंथक बैसार मे ढोलक, झालि, खजुरीक संग थोपड़ियो बजै लगल। महिला पहिल पंथ दिषि पखाउज, झालर, हारमुनियाक संग सितार सेहो बजै लागल। एक सूर एक लय आ एक ताल मे भजन शुरु भेल- ‘‘केसव! कही न जाय का कहिये!’’ मुदा दोसर पंथ दिषि भजन तते जोर सँ होइत जे पहिल पंथक भजन सुनाइये ने पड़ैत छल। महंथ रमापतिदास बाहर निकलि घुमबो करैत आ भजनो सुनैत रहथि। रमाओत भजनक अवाज दलान क घर स बाहर निकलबे नहि करैत छल। रमापति दास तामसे माहुर होइत रहथि। मने-मन भनभनेबो करैत रहथि। सोनेलाल केँ सोर पाड़ि कहलखिन- ‘‘ई कोन बखेरा ठाढ़ कए देलिऐक?’’
थरथराइत दुनू हाथ जोड़ि सोनेलाल उत्तर देलखिन- ‘‘सरकार, हम अनाड़ी छी। नहि वुझलिऐक जे एना होइ छै। जे भ’ गेलैक से त भइये गेलैक। अपने तमसाइयौ नहि। जँ कनी गलतिये भ’ गेलै ते माफ क’ दिऔक। अपने समुद्र छियैक। नीक-अधला पचबैक सामथ्र्य अछि। अखन धरि भोजन बनवैक अहरियो नहि खुनल गेल अछि, आदेष दियौक।’’
तरंगि केँ रमापतिदास कहलखिन- ‘‘हमर जते साधु छथि ओ फुटे मे अहरियो खुनता आ भोजनो बनौताह। तेँ सभ किछु(बरतन स ल क’ चाउर-दालि, तरकारी धरि) हमरा फुटा दिअ।’’
‘बड़बढ़िया’ कहि सोनेलाल सभ किछु दू भाग क’ देलकनि। चारि-चारि गोटे भानसक जोगार मे लगि गेलाह। दूटा अहरी, हटि-हटि क, खुनल गेल। सोनेलाल सभ वरतनो आ चाउरो-दालि आनि दुनू अहरी लग रखि देलकनि।
दलानक भजन बन्न भ’ गेल। मुदा खरिहानक भजन चलिते रहल। बुचाई दास अगुआ मुरते। भजनिया सभ गोल-मोल भेल बैसल, तेँ बीच मे जगह खाली रहए। ओहि खाली जगह मे बुचाई दास ठाढ़ भ’ आगू-आगू भजनक पाँतिओ गवैत आ नचबो करैत। बीच-बीच मे पाँतीक अरथो कहैत रहथि।
रमापति दास सोनेलाल केँ, हाथक इषारा सँ सोर पाड़ि, कहलखिन- ‘‘बड्ड अनधोल होइत अछि। भजन बन्न करबा दिऔ।’’
बुचाई दास लग आबि सोनेलाल बाजल- ‘‘गोसाई सहाएब, भजन बन्न क’ दिऔ। महंथ जी केँ तकलीफ होइ छनि।’’
सोनेलालक आग्रह सुनितहि, के छोट के पैघ, सभ एक्के बात कहै लगलनि जे हमसभ बिना भजन गौने पंगहति नहि करब।’’
सोनेलाल अबाक भ’ गेलाह। सैाँसे देह सोनेलालक कपैत। मुदा की करैत? क्यो त बिन दले नहि आयल छलाह। तेँ, सभ साधुक महत्व बराबरि बुझथि।
अंगनाक टाट लग ठाढ़ सुगिया मने-मन सोचैत जे जँ कहीं सौध सभ अपना मे झगड़ा कए बिना भोजन केनहि चलि जेताह, तखन ते हमर कबूला पूरा नइ हैत। कबूला नइ भेने दुखो(रोगो) घुरि क’ आबि सकैत अछि। आब ज दुखित पड़ब ते जीवि की मरब, तेकर कोन ठेकान। हे भगवान सौध सभकेँ मति बदलि दिऔन जे असथिर भए जेताह। मने-मन सौध-सौध जपै लगलीह।
दू बजैत-बजैत निर्गुण पंथ दिषि भोजन बनिकेँ तैयार भए गेल। भोजन तैयार होइतहि गंगादास सोनेलाल केँ कहलखिन- ‘‘भोजन बनि गेल तेँ आब भोजनक जगह तैयार करु।’’
गंगादासक आदति सुनि सोनेलालक करेज आरो थरथर कपै लगल। ई केहेन हैत। एक दिषि साधु सभ भोजन करताह आ दोसर दिषि बनितहि अछि। एक त अखने से सौध सभ दरवज्जा पर ऐला तखने से झंझट होइ अए। कहुना-कहुना अखैन धरि पार लगल, मगर आब आखरी बेर मे ने कही झगड़ा फँसि जाइन। बाढ़नि आनै लाथे सोनेलाल आंगन गेल। आंगन मे जा बाढ़नि ताकै लाथे बैसि रहल। बैइसैक कारण रहैक समय लगायव। कनिये कालक बाद सुनलक जे हिनको सभहक भोजन तैयार भ’ गेलनि। बाढ़नि नेनहि सोनेलाल अंगना स निकलि खरिहान आवि बाहरै लगल। खरिहान बहारि सोनेलाल पानिक छिच्चा देलक। छिच्चा द’ खरही बिछौलक। खरही बिछबितहि साधु सभ हरे-हरे केँ उठि खरही पर बैसलाह। खरही पर बैसितहि पात उठल। पत्ताक बँटवारा शुरु होइतहि रमापति दास अपन सत्तरि मे घुमि-घुमि जय-जयकार करै लगलाह। दोसरि दिषि मंगल(भजन) शुरु भेल।
सभ साधु भोजन केलनि। भोजन कए सभ उठलाह। दोसर पंथ दिसक सत्तरि मे एक्को टा अन्न वा कोनो वस्तु पात पर छुतल नहि। जबकि दोसर सत्तरि मे, बरिआतीक भोजन जेँका, छुतल। सभकेँ उठितहि चारुभर से कौआ-कुकुड़ आवि-आबि खाय लगल।
भोजन कए दोसर पंथवला सब ढोलक-झालि लए विदा हुअए लगल। मुदा रमौत दिषि से दछिनाक तगेदा भेल। अनाड़ी सोनेलाल सिक्कीक चंगेरी मे पान-सुपारी लए बीच मे ठाढ़ रहथि। हाथक इषारा स’ रमापति दास सोनेलाल केँ सोर पाड़ि, कहलखिन- ‘‘आब हम सभ चलब, तेँ झव दे दछिना लाउ।’’
सोनेलाल- ‘‘कोना की दछिना.....।’’
रमापतिदास- ‘‘एक सय एकावन स्थानक चढ़ौआ, एक सय एक हमर, साधु सभकेँ एकावन-एकावन आ भोजन बनौनिहार केँ एकासी-एकासी द दिऔन।’’
भोजन बनौनिहारक आ महंथजीक दछिना त सोनेलाल केँ जँचल, मुदा.....।’’
गंगादास आ बुचाइ दास सेहो सभ देखैत आ सुनेत। आँखिक इषारा स’ गंगादास केँ बुचाई दास कहलखिन- ‘‘अधिकार अधिकार छी। जत्ते दछिना रमापति दास केँ हेतनि तहि सँ एक्को पाइ कम हमहूँ सभ नहि लेब।’’
हिसाब जोड़ि सोनेलाल आंगना स रुपैआ आनि आनि रमापति दासक हाथमे द’ देलकनि। रुपैआ ठीक स गनि रमापति दास सोेनेलाल केँ असिरबाद दैत उठि के विदा भेलाह। रमापति दासक पाछू-पाछू सोनेलालो अरिआतने किछु दूर धरि गेल। फेर घुरि के आबि गंगादास लग ठाढ़ भ’ पूछलकनि- ‘‘गोसाई सहाएब, अहाँकेँ दछिना कत्ते हयत?’’
सोनेलालक तड़पैत मनकेँ गंगादास आँकि लेलखिन। दया स हृदय बरफ स पानि बनै लगलनि। मुह सँ बोली नहि फुटनि। सोनेलाल केँ की कहथिन से फुरबे नहि करनि। बुचाई दास दिषि देखि पूछलखिन- ‘‘की यौ(अओ) बुचाई दास, अहूँ त अगुआ मुरते छी, बिना अहाँ सभहक विचार लेने हम कोना जबाब देबनि। किऐक त ऐठाम तीन टा प्रष्न अछि। पहिल- दू पंथक अधिकारक सवाल अछि, दोसर- पंथ के निच्चा मुहे जाएब हैत। आ तेसर, सोनेलाल कबुला पुरबैक लेल भनडारा केलनि। एक त बीमारीक फेरि मे पड़ि पस्त भेलि छथि, तइ पर सँ हमहूँ सभ भार दिअनि, इ हमरा नीक नहि वुझि पड़ैत अछि।’’
गंगादासक प्रष्न सुनि दोसर पंथक सभ साधु गुम्म भ’ मने-मन सोचै लगलाह जे की कएल जाय? मुदा सोचवोक रास्ता अलग-अलग होइत अछि। एक्के प्रष्नक उत्तर पेवाक लेल वैरागीक रास्ता अलग होइत अछि। जबकि रागीक विचार अलग। भले ही दुनू गोटे एक्के रंग विद्वान किऐक ने होथि। ततबे नहि, आध्यात्मिक चिन्तक आ भौतिकवादी चिन्तकक बीच सेहो होइत अछि। जबकि निष्पक्ष चिन्तकक अलग होइत अछि। पंथक बीच बँटल समाज मे निष्पक्ष चिन्तक होएव कठिन अछि। किऐक त पंथ सिर्फ वैचारिकते टा नहि होइत, व्यवहारिक सेहो होइत अछि। जे परिवार आ समाज से सेहो जोड़ल रहैत अछि। जहि स जिनगीक गाड़ी चलैत अछि।
कोनो विषय पर गंभीर चिन्तन करैक लेल एकटा आरो भारी उलझन अछि। ओ अछि- भुखल आ पेटभरल शरीरक मन। मनकेँ बहुत अधिक प्रभाबित करैत अछि शरीरक इन्द्रिय। इन्द्रिय केँ संचालित करैत अछि शरीरक उर्जा(षक्ति)। उर्जाक निर्माण करैत अछि उर्जा पैदा करैक वस्तु। ओ वस्तु अबैत भोजन स। मुदा सिर्फ भोजने टा से उर्जा पैदा नहि होइत? उर्जा पैदा करैक दोसरो वस्तु अछि, जेकर भोजन शरीरक भोजन स अलगो होइत अछि।
बीच-बचाव करैत बुचाई दास गंगादास केँ विचार देलखिन- ‘‘गोसाई सहाएव, हमहू सभ अपना धरमक सिपाही छी, तेँ मरैत दम तक पाछु हटब धोखावाजी हैत, मुदा पवित्र धरमक रक्षा करब सेहो हमरे सभ पर अछि। तेँ, सोनेलाल जते रुपैआ रमापति दास केँ देलखिन, तते हमरो सभकेँ द’ दोथु। छ मासक दुख-तकलीफ हम सभ सोनेलालक सुनबे केलहुँ तेँ हुनकर दुख मे हमहू सभ शामिल भ’ रुपैआ घुमा दिअनि।’’ सैह भेल। सभ कियो हँसी-खुषी स भनडारा सम्पन्न कए जय-जयकार करैत विदा भेलाह।
मौलाइल गाछक फुल:ः 4
मद्रास स्टेषन गाड़ी पहुँचतहि रमाकान्त नमहर साँस छोड़नि। दू राति तीनि दिन सँ गाड़ी मे बैसल-बैसल तीनू गोटे(रमाकान्त, पत्नी श्यामा आ नोकर जुगेसर) केँ देह अकड़ि गेल छलनि। गाड़ी केँ रुकितहि रमाकान्त हुलकी मारि प्लेटफार्म दिस तकलनि ते दोसरि-तेसरि लाइन पर गाड़िये सभ केँ ठाढ़ भेल देखलखिन। अपना सभहक स्टेषन जेँका नहि जे कखनो काल क’ गाड़िओ अबैत आ भीड़-भाड़ नहि रहने पुलोक जरुरत नहि पड़ैत। सगतरि रस्ते। जेमहर मन हुअए तेमहर विदा भ’ जाउ। गाड़ीयो छोट आ लाइनो तहिना। गाड़ी मे रमाकान्तकेँ अनभुआर जेँका नहि बुझिपड़लनि किऐक त बिहारेक गाड़ी आ बिहारेक पसिन्जरो रहए।
गाड़ी सँ यात्री सभ उतड़ै लगलाह। तीनू गोटे रमाकान्तो अपन झोरा-मोटरीक संग उतड़ि, थोड़े आगू पुल पर चढ़ै लगलाह। पुल पर लोकक करमान लागल मुदा अपना सभ स्टेषन जेँका ऐँड़ी-दौड़ी नहि लगैत। जकरा हियासि केँ रमाकान्त अपनो चेत गेला आ श्यामो-जुगेसर केँ कहि देलखिन। अखन धरि स्टेषन मे दुनू कात गाड़िये देखथिन मुदा पुल पर जना-जना उपर चढ़ैत जायत छलाह तेना-तेना आनो-आनो चीज सभ देखै लगलखिन। पुलक सीढ़ी पर चलैत-चलैत श्यामो आ रमाकान्तोक जाँध चढ़ि गेलनि। पुलक उपर पहुँचतहि रमाकान्त जुगेसर केँ कहलखिन- ‘‘जुगे, मोटरी कतबाहि मे राखि दहक आ कने तमाकू लगबह। ताबे हमहू कनी बैसि लइ छी। चलैत-चलैत जाँघ चढ़ि गेल।’’
जुगेसर मोटरी भुइये मे रखि तमाकुल चुनवै लगल। गाड़ीक जते चिन्हार पसिन्जर रहनि, सभ हरा गेलनि। नव-नव लोक पुलो पर आ निच्चो मे देखए लगलखिन। सिर्फ लोके टा नव नहि, ओकर पहिरेबो आ बोलियो। तमाकुल खा झोरा-मोटरी उठा तीनू गोटे पुल पर स उतड़ि, हियाबै लगलथि जे ककरो सँ पूछि लियनि। मुदा ककरो बाजव बुझवे नहि करथि। रमाकान्तो लोक सभ केँ देखैत आ लोको सभ रमाकान्तकेँ देखनि। तमाषा दुनू बनल रहथि। रमाकान्त आ जुगेजसर केँ धोती पहिरब देखि ओहिठामक लोक निङहारि-निङहारि देखैत रहथि आ रमाकान्तो तीनू गोटे ओहिठामक मरदो आ मौगियोक कपड़ा पहिरब देखि मने-मन हँसवो करथि। अनुभवी लोक सभ त बुझि जाइत छलाह जे बिहारी छथि। मुदा जकरा नहि वुझल छलैक ओ सभ ठाढ़ भ’ भ’ तजबीज करनि। एक जेर मौगी रस्ता धेने गप-पस करैत जाइत छलीह ओ सभ अपने सभ(मर्द) जेँका ढेका खोंसने। मौगी सभकेँ ढेका देखि श्यामा मुस्की दैत रमाकान्त केँ कहलखिन- ‘‘देखियौ एहिठामक मौगी सभकेँ ढेका खोसने।’’
श्यामाक बात सुनि रमाकान्त हँसलनि मुदा किछु बजलथि नहि। रमाकान्त आँखि उठा-उठा चारु दिषि ताकि मने-मन सोचति जे वाह रे एहिठामक सरकार। कते सुन्दर आ चिक्कन-चुनमुन बनौने अछि। कतौ बैसि जाउ। कतौ सुति रहू। सरकार बनौने अछि अपना सभ दिस, जे कोनो स्टेषन ऐहेन नहि अछि जाहि ठाम भरि ठहुन केँ गंदगी नहि रहैत होअए। प्लेटफारमे पर केराक खोंइचा, पानक पीत, चिनिया बदामक खोंइचा, कागजक टुकड़ी छिड़ियाइल नहि रहैत अछि। ततबे नहि! जेरक-जेर भिखमंगा, पौकेटमार, उचक्का रेलवे स्टेषन सँ ल’ क’ बस स्टेण्ड धरि पसड़ल रहैत अछि। मुदा एहिठाम त एक्कोटा नजरिये नहि पड़ैत अछि।
गाड़ीक झमार से तीनू गोटेक देह भसिआइत छलनि। मुदा की करितथि। जुगेसर तमाकुल चुनबै लगल। मने-मन रमाकान्त सोचैत जे बड़का फेरा मे पड़ि गेल छी। की करब? मुदा किछु फुरबे नहि करैत छलनि। बड़ी काल धरि उगैत-डूबैत रहलाह। जहि गाड़ी स गेल रहथि ओहि गाड़ीक भीड़ छँटल। लोक पतड़ाइल। तहि बीच एक गोटे मोटर साइकिल स आबि रमाकान्तेक आगू मे गाड़ी लगौलक। रमाकान्त ओहि आदमी दिषि तकै लगलथि आ ओहो आदमी रमाकान्त दिस तकै लगलनि। जना नजरिये स दुनू गोटेक बीच चिन्हा-परिचय भ’ गेलहोनि। रमाकान्त उठि क ओहि आदमी लग जा, जेबी सँ पुरजी निकालि, देखै देलखिन। पुरजी मे पता लिखल छलनि। पुरजी देखि ओ आदमी एकटा टेम्पूवला केँ हाथक इषारा स सोर पाड़लनि। टेम्पूवला केँ अबिते पता बता, लए जाय ले कहलखिन। तीनू गोटे टेम्पू मे वैसि विदा भेलाह। मुदा ड्राइवर ने हिन्दी जनैत आ ने मैथिली। तेँ ड्राइवर संग कोनो गप-सप रास्ता मे नहि होइत छलनि। स्टेषनक हाता(कम्पाउण्ड) सँ निकलितहि रमाकान्त आखि उठा-उठा बजारो दिषि देखैत आ लोको सभ केँ देखैत छलाह। बाजार मे ओते अन्तर नहि बुझि पड़नि जते लोक आ बोली मे। मने-मन रमाकान्त अप्पन इलाका आ ओहि इलाका केँ मिलबै लगलाह। अपना ऐठाम पिण्डष्यामा आ गौर वर्ण एकरंगाह अछि मुदा एहिठाम पिण्डष्याम वर्णक लोक अधिक अछि।
लोकक बाजबो दोसरे रंगक। जना मधुमाछी भनभनाइत अछि, तहिना। मुदा अपना ऐठामक लोक जेँका ठक, ओहिठाम नहि। बजारक रास्ता स जाइत रहति त’ गरीबी-अमीरी मे अन्तर बुझिये नहि पड़नि। मुदा अपना इलाकाक बजार स ओहिठामक बजार बेसी चिक्कन चुनमुन आ सुन्दर। गंदगीक कतौ दरस नहि बुझि पड़नि।
मुख्य मार्ग स निकलि पूब मुहे एकटा रास्ता गेल छलैक। ओहि रास्ता मे डाॅक्टर महेन्द्रक घरो आ क्लीनिको। मुदा जहि अस्पताल मे महेन्द्र नोकरी करैत रहथि ओ मुख्य मार्ग मे छलैक। ओहि गलीक मोड़ पर टेप्पू ड्राइवर तीनू गोटे केँ उताड़ि भाड़ा ल’ आगू बढ़ि गेल। सड़कक दुनू भाग बड़का-बड़का मकान सभ अछि। ओहि मोड़ पर तीनू गोटे मोटरी रखि वैसि रहलथि। गाड़ीक झमार स तीनूक देह-हाथ बथैत छलनि। ठाढ़ रहले नहि होइत छलनि। जहिना अमावस्याक राति मे बादल पसरि आरो अन्हार कए दइत अछि तहिना रमाकान्तो केँ होइत छलनि। एक त अनभुआर जगह दोसर बोलिक भिन्नता। बोली(भाषा) मनुष्य मनुष्यक बीच कत्ते दूरी बनवैत अछि इ बात रमाकान्त आइये बुझलनि। श्यामा मने-मन सोचैत जे हे भगवान केहेन जगह अछि जे अछैते मनुक्खे हम सभ हराइल छी। तीनू गोटे निराषक समुद्र मे डूबल। मने-मन रमाकान्त सोचैत जे आब की करब? आइ धरि जिनगी मे ऐहेन फेड़ा नहि पड़ल छल। अपन सभ बुद्धि-अकील हरा गेल अछि। रमाकान्त जुगेसर केँ कहलखिन- ‘‘जुगेसर, मन घोर-घोर भ’ गेल अछि। कनी तमाकू लगावह?’’
जुगेसर तमाकुल चुनवै लगल। सभ सभहक मुह देखि पुनः नजरि निच्चा क’ लइत छलाह। तहि बीच डाॅक्टर महेन्द्र(रमाकान्तक जेठ बेटा) फियेट गाड़ी सँ अस्पताल से घर अबैत रहथि कि सड़कक कात मे तीनू गोटे केँ बैसल देखलनि। पहिने त थोड़े धखयलाह, मुदा चिन्हल चेहरा, तेँ मेन रोड से गाड़ी बढ़ा अपन रास्ता पर लगौलथि। गाड़ी ठाढ़ कए महेन्द्र उतड़ि रमाकान्त केँ गोड़ लगलनि। रमाकान्त केँ गोड़ लागि महेन्द्र माए केँ गोड़ लगलनि। गोड़ लागि महेन्द्र पिताक झोरा लए गाड़ी मे रखलनि। तीनू गोटे उठि गाड़ी दिस बढ़लाह। जुगेसर, मोटरी गाड़ी मे रखलक। चारु गोटे गाड़ी मे बैसि आगू बढ़लाह। महेन्द्र अपने ड्राइवरी करैत रहथि। महेन्द्र केँ गाड़ी चलबैत देखि माए पूछलकनि- ‘‘बच्चा, मोटर अपने हँकै छह?’’
‘हँ’
‘डरेबर नइ छह?’
माएक प्रष्न सुनि महेन्द्र मुस्कुराइत कहलकनि- ‘‘जखन गाड़ी मे रहैत छी तखन दोसर काजे कोन रहैत अछि जे डरेबर राखब। अनेरे खरचा बढ़त।’’
घरक आगू गाड़ी केँ पहुँचतहि महेन्द्र हार्न देलनि। गाड़ीक आवाज सुनि भीतर स नोकर आबि गेटक ताला खोलि देलकनि। महेन्द्र गाड़ी भीतर लए गेलाह। गाड़ी ठाढ़ क’ महेन्द्र उतड़ि गाड़ीक तीनू फाटक खोलि तीनू गोटे केँ उताड़लनि। गाड़ी से उतड़ितहि रमाकान्त मकान दिषि तकलनि। तीनि तल्ला बड़का मकान। आगूक फुलवाड़ी देखि रमाकान्त मने-मन सोचै लगलथि जे सम्पति त गामो मे बहुत अछि मुदा ऐहेन घर....। अप्पन कोन जे परोपट्टा मे ऐहेन मकान ककरो नहि छैक। मन मे उठलनि जे अपन कमाइ स महेन्द्र ऐहन घर बनौलक आ कि बैंक-तैंक स करजा ल’ के बनौलक आ कि भाड़ा मे नेने अछि। ओना कहने रहथि जे जमीन कीनि केँ मकान बनेलहुँ। मुदा ऐहेन घर बनबै मे बीसो लाख सँ उपरे खर्च भेल हेतैक। एतबे दिन मे कत्ते कमा लेलक।
आगू-आगू महेन्द्र आ तहि पाछू तीनू गोटे मकान मे प्रवेष केलनि। मकानक सिमेंट ऐहन जमाओल जे पाएर पिछड़ैत। सभसँ उपरका तल्ला मे लए जाए एकटा कोठरी रमाकान्त आ जुगेसर केँ दोसर माए केँ। सुमझा देलनि। ताबे नोकर जलखए आ पानि नेने पहुँच गेलनि। हाथो-पाएर नहि धोय रमाकान्त पलंग पर पड़ि रहलाह। पंखा चलैत रहए। दूटा पलंग कोठरी मे लगाओल रहए। दूटा टेबूल, एकटा नमहर अएना, रंग-बिरंगक देवी-देवताक फोटो देवाल मे सेहो छलैक। नील रंग स कोठरी रंगल। दूटा अलंगा सेहो देवाल दिस राखल। खूब मोटगर गद्दीदार ओछाइन पलंग पर विछौल। मसलन सेहो दुनू पलंग पर। पानिक टंकी सेहो कोठरीक मुहे पर, केबारक बगल मे छलैक।
पलंग स उठि रमाकान्त कुड़्ड़ा क’ जलखै करै लगलाह। दू कौर खा पानि पीबि रमाकान्त चाह पीवै लगलथि। जुगेसरो जलखै खा चाह पीबै लगल। महेन्द्र ठाढ़े-ठाढ़ चाह पीवै लगलाह। चाहक चुस्की लइत रमाकान्त महेन्द्र केँ पूछलखिन- ‘‘बौआ, मकान अपने छी?’’
‘हँ।’
‘बनवै मे कते खर्च भेल?’’
खर्चक नाम सुनि मुस्की दैत महेन्द्र कहलखिन- ‘‘बाबू, खर्च त डायरी मे लिखल अछि तेँ बिना देखने नीक-नाहाँति नहि कहि सकै छी मुदा तीन लाख मे जमीन कीनलहुँ से मन अछि। जखन जमीन भ’ गेल तखन चारु गोटे कमेबो करी आ घरो बनबी। तेँ ठीक सँ, बिना डायरी देखने, नहि कहि सकैत छी।’’
चाह पीबि, टेवुल पर कप रखि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘चारि दिन नहेला भ’ गेल। देह मे एक्को रत्ती लज्जति नहि बुझि पड़ै अए तेँ पहिने नहाएव, खाएब आ भरि मन सुतब।’’
‘बड़वढ़िया’ कहि महेन्द्र कोठरी स निकलि नोकर केँ कहलखिन- ‘‘तीनू गोटे,(भाइ, स्त्री आ भावो) केँ फोन से कहि दहक जे बुढ़हा-बुरही अएलाह अछि।’’
नोकर केँ कहि रमाकान्त लग आबि महेन्द्र कहलखिन- ‘‘चलू। नहाइक घर देखा दइ छी।’’
आगू-आगू महेन्द्र आ पाछू-पाछू रमाकान्त जुगेसर चललाह। स्नान घरक केवाड़ खोलि महेन्द्र कहलकनि- ‘‘दूटा जोड़ले कोठरी अछि, दुनू गोटे नहाउ।’’ कहि दुनू कोठरीक बौल जरा देलखिन।
कोठरी केँ निङहारि-निङहारि दुनू गोटे देखै लगलथि। पानिक झरना, टंकी, साबुन रखैक ताक कपड़ा रखैक अलगनी इत्यादि। रमाकान्त जुगेसर केँ कहलखिन- ‘‘जुगे, चाह पीलौ आ तमाकू खेबे ने केलहुँ। मन लुलुआइल अछि। जाह पहिने तमाकुल नेने आबह।’’
जुगेसर स्नान घर सँ निकलि कोठरी आबि तमाकुल-चून लए आबि तमाकुल चुनबै लगल। तमाकुल चुना जुगेसर रमाकान्तो केँ देलकनि आ अपनो ठोर मे लेलक। थूक फेकैत रमाकान्त बजलाह- ‘‘जुगे गाम मे हमहू सम्पतिवला लोक छी मुदा आइ धरि ऐहेन पैखाना कोठरी आ नहाइक घर नै देखने छेलिऐक। सभ दिन खुल्ला मैदान मे पैखाना जाइ छी आ पोखरि मे नहाइ छी।’’
‘कक्का, अपना सब गाम मे रहै छी ने। इ सब शहर-बजारक छियैक। जँ शहर-बजारक लोक गाम जेँका चाहबो करत से थोड़े हेतइ। ऐठाम लोक बेसी अछि आ जगह कम छै, तेँ लोक केँ एना बनबै पड़ै छै। मुदा पोखरि मे लोक पानि मे पैसि केँ नहाइत अछि आ ऐठाम पानि ढारि केँ नहाइत अछि। जहिना अपना सब कहियो काल लोटा स’ पाइन ढारि केँ नहाइत छी। मुदा पानि मे पैसि केँ नहेला स संतोख होइ छै, जे अइ मे नइ हेतइ।’’
‘‘ऐहेन जिनगी जीनिहार केँ गाम मे रहब पार लगतै?’’
‘से कोना लगतै।’
‘‘बाबू हमरा बेसी काल कहै छलाह जे मनुखक शरीर देखै मे एक रंग लगनहुँ, जीवैक जे ढंग छैक ओ दू रंग बना दइ छैक।’’
‘अहाँक गप हम नइ बुझलौ, काका।’’
‘‘देखहक, जे आदमी भरिगर काज(षारीरिक) सभ दिन करै अए ओकरा जहि दिन भरिगर काज नहि हेतइ ते देहो-हाथ दुखैतै आ अन्नो रुचिगर नहि लगतैक। तहिना जे आदमी हल्लुक काज करै अए आ जँ ओकरा कोनो दिन भरिगर काज करै पड़तै ते ओकरो देह-हाथ ओते दुखेतै जे अन्नो ने खा हेतइ।’’
‘हँ, से त होइ छै। हमरो कए दिन भेल अछि।’
‘‘तहिना गामक लोक जे शहर-बजार मे आबि जिनगी बदलि लइत अछि ओ फेरि गाम अही दुआरे नहि जााय चाहैत अछि।’’
‘गामक लोक गरीब अछि काका! खाय-पीबै से ल क’ ओढ़े-पीनहै, रहै, दवाइ-दारु, पढ़ै-लिखैक सब चीजक अभाव छैक, तेँ लोक नहि रहै चाहैत अछि।’
महेन्द्र पिता केँ स्नानघर पहुँचा घुमि के अपना कोठरी आबि भाय डाॅक्टर रविन्द्र, पत्नी डाॅ. जमुना भाबो डाॅक्टर सुजाता केँ फोन स कहि देलखिन जे गाम से माए-बावू आ जुगेसर अएलाह हेँ। तीनू गोटे केँ जानकारी द’ अपने भंसा घर जाय मने-मन सोचै लगलथि जे एहिठामक जे खान-पान अछि ओ हुनका सभकेँ पसिन्न हेतनि की नहि? तेँ गामक जे खान-पान अछि सैह बनाएब नीक हैत। मुदा भनसिया त ऐठामक छी तेँ बना सकत की नहि? तेँ अपने स बनाएब नीक रहत। ओना भात-दालि आ रसगर तरकारी त भनसियो बना सकैत अछि। सिर्फ तेतेरिक परहेज करैक अछि। तेतेरि के अलग स खटमिट्ठी बना लेब। जँ तरुआ तरकारी नहि बनाएव त ओ(पिता) अपमान बुझताह। ओना दूधो-दही जरुरी अछि। मुदा एक्कोटा चीज स काज चलि सकैत अछि। दहियो त घर मे नहिये अछि। लगक दोकान सभहक दही दब रहै छै तेँ रविन्द्र केँ कहि दिअनि जे दरभंगावला होटल सँ दही कीनने आबथि। ई बात मनमे अबितहि महेन्द्र मोबाइल स रबिन्द्र केँ कहलखिन। रविन्द्र अस्पताल से सोझे दरभंगावला होटल विदा भेलाह। महेन्द्र, अपने स तिलकोरक पात, परोड़, झिंगुनी, भाँटा आ आलू तड़ै लगलाह। गैस चुल्हि, तेँ लगले सब कुछ बनि गेलनि।
पैखाना जाइ स पहिनहि रमाकान्त हाथ मटिअबै ले माटि तकै लगलाह। मुदा माटिक कतौ पता नहि। नहाइ स ल’ क’ हाथ धोय धरि साबुने। रमाकान्त जुगेसर केँ कहलखिन- ‘‘जुगेसर, बिना माटिये हाथ कोना मटिआएब?’’
रमाकान्तक बात सुनि मुस्कुराइत जुगेसर कहलकनि- ‘‘कक्का, जेहन देष ओहन भेस बनबै पड़ैत छैक। गाममे त भरि दिन माटिये पर रहै छी मुदा ऐठाम त माटि स भेटो मष्किल अछि। किऐक ते देखते छिअए जे माटि तरमे पडि गेल अछि। ने माटिक घर अछि आ ने रस्ता पेरा। साबुनो ते गमकौए छी। की हेतइ साबुने से हाथ धो लेब।’’
कहलह ते ठीके जुगेसर मुदा हाथ धोअब आ मन केँ मानब दुनू दू बात अछि। हाथ धोइये लेब मुदा मन नहि मानत ते ओ हाथ धोअब कन्ना भेल?’’
‘हँ कक्का, इ बात ते हमहू मानै छी मुदा गंदगी साफ करैक सवाल छै की ने से त हैत। मन के बुद्धि ने चलबै छै तेँ मन के बुद्धि मना लेत।’’
‘‘तोहूँ त आब बच्चा नइ छह जे नहि बुझबहक। एकटा बात कहह जे लोक पेट मे खाइ अए। पेट भरै छैक, तखन लोक किअए कहै छै जे भरि मन खेलहुँ वा पेट भरलाक बादो कहै छै जे मन नहि भरल।’’
‘अपना सब कक्का मिथिला मे रहै छियै ने। मिथिलाक माटियो पवित्र छैक। मुदा इ त मद्रास छी ने तेँ ऐठामक लोक जे करैत हुअए, सैह करब उचित।’’
‘‘बड़बढ़िया।’’ कहि दुनू गोटे अपन क्रिया-कलाप मे लगि गेलाह।
रमाकान्त आ जुगेसर स्नाने घर मे रहति, तहि बीच तीनू गोटे (रविन्द्र, जमुना आ सुजाता) अपन-अपन गाड़ी स आबि गेलथि। सभकेँ मनमे अपन-अपन ढंगक जिज्ञासा रहनि। तेँ गाड़ी सँ उतड़ितहि सभ पिता रमाकान्त, ससुर रमाकान्त केँ देखैक लेल उताहुल। मुदा कोठरी अबितहि पता चललनि जे ओ नहाय छथि। नहाएब सुनि सभ अपन-अपन कपड़ा बदलै अपन-अपन कोठरी गेलथि। पेन्ट-षर्ट खोलि रविन्द्र लूँगी पहिरतहि मायक कोठरी दिस बढ़लाह। कोठरी मे पहुँचतहि रविन्द्र माए केँ गोड़ लागि आगू मे ठाढ़ भ गेला। रबिन्द्र केँ माए चिन्हलकनि नहि मुदा गोड़क जवाव बिना चिन्हनहि द’ देलखिन। रविन्द्र मुस्कुराइत रहथि। मुदा अनचिन्हार जेँका माए बेटाक मुह दिषि बकर-बकर देखैत रहति। तहि बीच जमुना आ सुजाता आबि माय केँ गोड़ लगलनि। दुनू पुतोहूओ केँ माय असिरवाद देलखिन। रविन्द्र बुझि गेलखिन जे माए नहि चिन्हलनि। मुस्कुराइत रविन्द्र माए केँ कहलखिन- ‘‘माय, हम रविन्द्र छी।’’
रविन्द्र नाम सुनितहि माए हक्का-बक्का भ’ गेलीह। अनायास मुह से निकललनि- ‘‘रविन्द्र।’’
चारि साल सँ रविन्द्र गाम नहि आयल छलाह। पहिने रविन्द्रक देह एकहारा छलनि। खिरकिट्टी जेँका। जे अखन मस्त-मौला भ’ गेलाह। पुष्ट देह भेने रविन्द्रक रुपे बदलि गेलनि। कोरैला बेटा होइक नाते माएक ममता बाइढ़िक पानि जेँका उमड़ि गेलनि। मुहक बोली पड़ा गेलनि। सिर्फ आखिये टा क्रियाषील रहलनि। जे अश्रुधारा स सिमसि गेलनि। आँचर स नोर पोछितहि ओ दिन मनमे नचै लगलनि जहि दिन रविन्द्र एहि आंचर मे नुकाइल रहैत छल। सौझुका तरेगण जेँका श्यामाक हृदय सुखद जिनगीक मनोरथ सभ चमकै लगलनि। हाथक इषारा सँ माय दुनू पुतोहू केँ बैइसै कहलखिन। दुनू पुतोहू माइक दुनू भाग बैसिलीह। दुनू कान्ह पर दुनू हाथ द सासु ओहि दुनियाँ मे बौआइ लगली जाहि दुनियाँ मे दुखक कोनो जगह नहि होइत छैक। मुदा सुखोक त दू टा दुनिया अछि। एक दुनिया श्यामाक आ दोसर रविन्द्रक। जे दुनियाँ श्यामा दुनू परानीक भेल जाइत छलनि ओ तियाग, करुणा दयाक सवारी स वैरागक मंजिल दिषि बढ़ैत जायत छलनि। जबकि दुनू भाय रविन्द्रक जिनगी अधिक स अधिक धन उर्पाजन क’ दैहिक सुख दिषि बढ़ल जायत छलनि।
रमाकान्त आ जुगेसर नहा क’ कोठरी अएलाह। नहेलाक उपरान्त दुनू गोटेक देहक थकान मेटा गेलनि। नव-नव सफूर्ति आ ताजगी आबि गेलनि। नव ताजगी अबितहि भूखो जगलनि। रविन्द्र कोठरी स निकलि पिताक कोठरी दिषि बढ़लाह। ताबे महेन्द्र सेहो पिता लग आबि भोजन करैक आग्रह केलकनि।
ऐम्हर सासु लग दुनू पुतोहू बैसि एक-दोसराक खानदान, परिवार आ मानवीय संबंध बनवैक लेल वस्तु-जात एकत्रित करै लगलीह। गामक जिनगी(देहाती) बितौनिहारि पचपन बर्खक माय आ बजारु जिनगी जीनिहारि दुनू दियादनी पुतोहू तीनूक मन अपन-अपन जिनगीक रास्ता स भ्रमण करैत रहनि। मुदा सासु-पुतोहूक रास्ता मे कतौ संबंध नहि रहनहुँ मानवीय संवेदना आ जिनगीक व्यवहारिक प्रक्रिया तीनू केँ लग आनि सटबैत रहनि। बीतल जिनगी त स्मृति आ इतिहास बनि जायत अछि मुदा अबैबला जिनगीक रुप-रेखा त अखने(बर्तमाने) निरधारित होएत। एक(सासु) जिनगीक पचपन बर्खक अनुभव त दोसरि-तेसरि आधुनिक षिक्षा सँ लैस। सोच मे दूरी रहनहुँ, सभ एक्के परिवारक छी, इ विचार सभकेँ बलजोरी खींचि क’ एकठाम सटबैत रहनि। सासुक मन मे प्रष्न उठैत छलनि जे हम हजारो कोस हटि क’ बेटा-पुतोहू स दूर रहैत छी, हमरा पुतोहूक सुख कत्ते हैत? समाज मे देखै छी जे अस्सी बर्खक बूढ़-पुरान स ल’ क’ पेटक बच्चा धरि एक-ठाम रहि हँसी-खुषी स जिनगी बितबैत अछि। खायब-पीबि कोनो वस्तु नहि थिक। किऐक त जकरा हम नीक वस्तु बुझै छियै ओहो भोज्य-पदार्थ छी आ जेकरा दब वस्तु बुझै छियै ओहो भोज्ये-पदार्थ छी। हँ, इ विषमता समाज मे जरुर छैक जे केयो नीक वस्तु थारी मे छुता क’ उठैत अछि। जे कुकूड़ खायत, आ कियो भुखल सुतैत अछि। मुदा हम देखै छी हजारो किस्मक भोज्य-वस्तु घरती पर पसरल अछि जेकरा ने सभ चिन्हैत अछि आ ने उद्यम क’ आनै चाहैत अछि। जबकि जमुना आ सुजाता सोचैत जे परिवार केँ आगू बढ़वैक लेल सन्तान जरुरी अछि। नोकर-दाइक सहारा स छोट बच्चाक पालन हैत(सेवा नहि) किऐक त माय अपन बच्चा केँ दूधो नहि पीआबै चाहैत। बच्चा जखन स्कूल जाय जोकर हैत तखन आवासीय विद्यालय मे भरती करा षिक्षा-दीक्षा होइत। षिक्षा प्राप्त केलाक बाद कमायक जिनगी मे प्रवेष करत। जिनगीक एक चक्र इहो थिक। जे जमुना आ सुजाताक मन मे चकभौर लइत छलनि। श्यामाक मन अपन पारिवारिक(खानदानीक) फुलवाड़ी मे औनायत छलनि। ने आगूक रास्ता देखैत छलीह आ ने पाछूक।
आगूक रास्ता कठिन अछि आ कि सघन आ कि संवेदन रहित वा सहित अछि। एक-दोसर मनुष्यक संबंध हेवाक चाहिये, ओ जरुरिये नहि अनिवार्य आ आवष्यक सेहो अछि। जे मनुष्य एहि धरती पर जन्म लेलक ओकरे ओतेक जीबैक अधिकार छैक जते दोसर केँ छैक। जँ से नहि अछि ते लड़ाई-दंगा केँ कोन शक्ति रोकि सकैत अछि? मुदा प्रष्न जटिल अछि, आइ धरिक जे दुनियाक मनुक्खक जिनगी बनि गेल अछि ओ एतेक विषम बनि गेल अछि जे सामूहिक मनुक्खक कोन बात जे दू सहोदरा भायक बीच समता रहब कठिन भ’ गेल अछि। तेँ की?
भोजनालय। नमगर-चैड़गर कोठरी। देबाल पर बहुरंगी फलक चित्र बनाओल अछि। सुन्दर हल्का गुलाबी रंग स कोठरी ढओरल एयरकंडीषन। गोलनुमा नमगर-चैड़गर खायक टेबुल। जकरा चारु कात खेनिहारक लेल कुरसी लागल। पनरहो सेे बेसिये। देवालक खोलिया मे साउण्ड बक्स। जहि स मधुर स्वर मे गीति होइत अछि।
भोजन करैक बाजारु व्यवस्था केँ महेन्द्र अपनौने। मुदा माता-पिता केँ अयला स आइ महेन्द्र धर्मसंकट मे पड़ि गेलाह। मने-मन सोचै लगलाह जे हम चारु गोटे(दुनू भाय आ दुनू दियादनी) त एक्के टेबुल पर खाइ छी मुदा माए त बाबूक सोझ मे नहि खेतीह। ततबे नहि हमरा दुनू भायक संगे त ओ खेताह मुदा दुनू पुतोहूक संग त नहि खेताह। अगर ज जोर करबनि त कहीं बिगड़ि नहि जाथि। जँ बिगड़ि जेताह तेँ आरो विचित्र भ’ जायत। तखन की करब नीक होयत? गुनधुन मे महेन्द्र। अनायास मन मे एलनि(आइल) जे माय सँ विचार पूछि लिअनि। माय लग जा पूछलखिन- माय, हमसब त एक्के टेबुल पर खाय छी मुदा....?’’
महेन्द्र बात सुनि माय बुझबति कहलखिन- ‘‘बौआ, हमरो उमेर पचास-साठि बर्खक भेल हयत। आइ धरि जहि काज केँ अधलाह बुझलिऐक, आब कोना करब? कते दिन आब जीबे करब! तइ ले किअए अपन बाप-दादाक बताओल रास्ता तोड़ब। ऐहन व्यवहार सिर्फ अपने टा परिवार मे त नहि अछि समाजो मे छैक। जाधरि ऐठाम छी ताधरि मुदा गाम गेला पर त फेर ओइह व्यवहार रहत। तइ ले ऐहेन काज करब उचित नहि। गामक जिनगीक अनुकूल चलनि अछि। कोनो चलनि समाज आ जिनगीक अनुकूल होइत अछि। जे जिनगीक लेल नीक होइत अछि। भले ही दोसर तरहक जिनगी जीनिहार केँ ओ अधलाह लगइ।’’
माइक विचार सुनि महेन्द्र दू तोर(बैच) बना क खायब नीक बुझलक। पहिल तोर मे अपने, जुगेसर आ पिता तथा दोसर तोर मे बाकी सभ कियो।
भोजन करितहि रमाकान्त हफुआय लगलाह। जुगेसर सेहो हफुआय लगल। हाथ-मुह धोय दुनू गोटे सुति रहलाह।
तीन रातिक जगड़ना। ताहि पर अन्नक निसां सेहो लागल रहनि। एक्के बेर चारि बजे रमाकान्त केँ निन्न टूटलनि। नीन टुटितहि, सुतले-सुतल रमाकान्त देवालक घड़ी पर आखि देलनि। चारि बजैत। भाँग पीवैक बेर भ’ गेल रहनि। भाँगक आदत रमाकान्त केँ पहिनहि स लागल रहनि। तेँ मद्रास अबैये काल झोरा मे भाँगक पत्ती ल’ लेने रहथि। श्यामा सेहो बुझि गेलीह जे हुनका भाँग पीबैक बेर भ’ गेलनि। भाँगक सब समान- मरीच, सोंफ अननहि छी। सिर्फ पीसेक जरुरत अछि। पलंग पर स उठि झोरा खोलि भाँगक सब समान निकालै लगलीह। तहि बीच सुजाता ब्राण्डीक किलोवला बोतल आ गिलास नेने सासु लग आबि ठाढ़ भ’ गेलीह। खाइये बेर मे सासु पुातोहू केँ कहि देने रहथिन जे बुढ़हा सब दिन चारि बजे पीसुआ भाँग पीबैत छथि। भाँगक संबंध मे सुजाता अनाड़ी रहथि। किछु नहि बुझल रहनि। मुदा ब्राण्डीक संबंध मे मे त बुझल रहनि। तेँ सभ(सुजाता, श्यामा आ रमाकान्त) अपन-अपन ढंग स साकांछ रहथि।
पलंग पर स उठि रमाकान्त जुगेसर केँ जगा, टंकी पर मुह-हाथ धोय ले गेलाह। खट-खुट अवाज सुनि श्यामा बुझि गेलीह। बोतल ल’ सुजाता तैयारे रहथि। मुदा सुजाताक मन केँ मिथिलाक संस्कृति झकझोड़ति रहनि। किऐक त मिथिलाक संस्कृतिक व्यवहारिक पक्ष जनैत नहि छलीह तेँ जहिना अनभुआर जंगल मे कोनो जानवर औनाइत रहैत तहिना सुजातो। मने-मन सोचति जे एहिठाम जहिना पुतोहू ससुरक बीच व्यवहाक होइत अछि, तहिना मिथिलो मे होइत आ कि नहि। दोसर प्रष्न उठैन जे पढ़ल-लिखल समाज मे त पुरान व्यवहारो बदलि नव रुप ल’ लइत अछि। तेँ सुजाता हाथ मे ब्राण्डीक बोतल आ गिलास रखने विचारक दुनिया मे बौआइत छलीह। रमाकान्त केँ भाँग पीवैक समय भ’ गेल छलनि तेँ विचार मे मधुरता आबि गेल छलनि। श्यामा आबि रमाकान्त केँ कहलकनि- ‘‘अखन भाँग नइ पीसिलहुँ हेन। पुतोहू जनी एकटा बोतल रखने छथि, से की कहै छियनि?’’
भाँग नहि पीसब सुनि रमाकान्त मन मे कने क्रोध अबै लगलनि मुदा बोतलक नाम सुनि दवि गेलनि। मुस्कुराइत रमाकान्त पत्नी केँ कहलखिन- ‘‘बेटी आ पुतोहू मे की अन्तर छैक। जहिना बेटी तहिना पुतोहू। ताहू मे छोटकी पुतोहू ओ त कोरैला बेटीक सदृष्य होइत। एक त दुनिया मे कोनो संबंध अधलाह नहि छैक मुदा जखन ओ सीमा मे रहैत अछि तखन। जखन सीमाक उल्लंधन लोक करै लगैत तखन लाज आ परदाक जरुरी भ’ जायत अछि। जे परम्परा बनि आगू मे ठाढ़ भ गेल अछि। मुदा ओहने(पैछला व्यवहार) निपुआंग मरि नहिये गेल अछि। तेँ नीक व्यवहार जिनगी मे धारण करब अधलाह त नहि।’’
रमाकान्तक बात सुजातो सुनैत छलथि। मने-मन खुषियो होइत छलीह जे ज्ञानवान ससुर छथि। मुदा बिना सासुक कहनहुँ त आगू बढ़ब उचित नहि। तेँ बोतल-गिलास नेने अढ़ मे ठाढ़ छलीह। रमाकान्तक विचार सुनि श्यामा सुजाता केँ कहै आगू बढ़लीह। पर्दाक अढ़ मे ओ ठाढ़। कहलखिन- ‘‘जाउ! भगवान अहाँ केँ भोलेनाथ ससुर देने छथि। मुदा ससुर जेँका नहि पिता जेँका व्यवहार करवनि।’’
बामा हाथमे बोतल आ दहिना दहिना हाथ मे गिलास नेने सुजाता ससुर लग आबि मुन्ना खोललनि कि सैाँसे कोठरी महकि पसरि गेल। गमक स हवो मे मस्ती आवि गेल। एक गिलास पीबि रमाकान्त जुगेसर केँ कहलखिन- ‘‘जुगेसर, तोहू एक गिलास पीबह।’’
जुगेसर- ‘‘कक्का, अहाँ लग बैसि कोना पीबि?’’
‘अखन ने तू छोट छह आ ने हम पैघ छी। सभ मनुक्ख छी। मनुक्ख त मनुक्खे लग मे रहि ने जिनगी बितौत।’
तहि बीच सुजाता गिलास जुगेसरो दिषि बढ़ौलनि। जुगेसर एक्के सूढ़ि मे सौंसे गिलास पीबि गेल। पेट मे ब्राण्डी पहुँचहि गुदगुदबै लगलै। दोसर गिलास पीबितहि रमाकान्त सुजाता केँ कहलखिन- ‘‘बेटी, किछु निमकी खाइ ले लाउ?’’
रमाकान्तक आढ़ति सुनि सुजाता गिलास-बोतल केँ टेबुल पर रखि कीचेन स मद्रासी भुजिया दूटा प्लेट मे नेने अएलीह। एकटा पलेट रमाकान्तक आगू मे आ दोसर जुगेसरक आगू मे देलनि। दू-चारि फक्का भुज्जा फाॅकि रमाकान्त फेरि दू गिलास ब्राण्डी चढ़ा लेलनि। ओना भाँगक निसां रमाकान्त केँ बुझल जे पीलाक उपरान्त घंटा-दू घंटाक बाद निसां अबैत अछि, मुदा ब्राण्डीक निसां त पीबितहि आबि गेलनि। ओना जुगेसर दुइये गिलास पीलक मुदा तेही मे मन उनटि गेलै। सैाँसे बोतल पीबि रमाकान्त ढकार केलनि। सुजाता केँ कहलखिन- ‘‘बेटी, इलाइची देल पान खुआउ?’’
सुजाता केँ बुझल। सासु पतिक खान-पानक संबंध मे सब बात कहि देहने छलखिन। दू खिल्ली पान, सुअदगर तेज जरदा डिब्बा, इलाइची, सेकल सुपारीक कतरा पलेट मे नेने सुजाता आबि रमाकान्तक आगू मे रखि देलनि। शराबक रंग मे जहिना रमाकान्त तहिना जुगेसर रंगि गेलाह। बजैक लेल दुनूक मन लुसफुसायत। पान मुह मे लइतहि रमाकान्त सुजाता केँ पूछलखिन- ‘‘बेटी, अहाँ डाक्टरी कोना पढ़लहुँ?’’
ससुरक सबाल सुनि सुजाता बगलक कुरसी पर बैसि, संकुचित भ’ कहै लगलनि- ‘‘बाबू जी, हमर पिता आ माय अपन महल्लाक कपड़ा साफ करैत छलथि। सभ दिना काज छलनि। एहि स जेना-तेना गुजर चलैत छलनि। एक्केटा घर छलनि। अनके कल पर नहेबो करै छलौ आ पानियो पीबै छलहुँ। पिता ताड़ी पीबथि। एक दिन साझू पहर केँ ताड़ी पीबि अबैत रहथि। बहुत बेसी निसां लागि गेल रहनि। रस्ता(सड़क) पर एकटा खाधि(गढ़ा) रहए। ओहि मे खाधि मे ओ खसि पड़लाह। ओहि समय एकटा ट्रक, बिना इजोतेक, पास करैत रहए। ट्रक हुनका उपरे देने टपि गेलै कुड़कुट-कुड़कुट सैाँसे शरीरक हड्डी भ’ गेलनि। हम सभ बुझवो ने केलिऐक। दोसर दिन भिनसर मे हल्ला भेलै। हमहू तीनू गोटे(माय,भाय) देखै गेलहुँ। देहक-दषा देखि चिन्हबो ने केलिएनि। मुदा कपड़ा आ चप्पल देखि मन खुट-खुट करै लगल। तीनू गोटे दुनू वस्तु केँ चिन्हि गेलिऐक। तखन हुनका उठा क’ आनि जरौलिएनि।
विचहि मे जुगेसर बाजि उठल- ‘‘अरे बाप रे।’’
जुगेसरक ‘अरे बाप’ सुनि सुजातक आखि मे आँसू आबि गेलैन्हि।
सुजाताक बात रमाकान्त आखि मूनि केँ सुनैत रहथि। जुगेसरक बात सुनितहि आखि खोललनि। हृदय पसीज गेल रहनि। ताड़ी पीआकक बात सुनि रमाकान्त मने-मन विचारति रहथि जे नषापान त हमहूँ करै छी मुदा ऐठामक जिनगी आ गामक जिनगी मे बहुत अन्तर छैक। ततबे नहि पेटबोनिया आदमीक सवाल सेहो अछि। हमरा सभहक जिनगी(ग्रामीण जिनगी) शान्तिपूर्ण अछि। अभाव(धनक) त जहिना एतौ छैक तहिना गामो मे छैक। एहिठाम किछु गनल-गूथल कारोवारी(उद्योग आ व्यापार) अछि जे समृद्धिषाली अछि। मुदा पेटबोनियो ओकरे देखाओेस(देखौस) करै चाहैत अछि जहि स ओकर जिनगी अषान्त भ’ जाइत छैक। ओहि अषान्ति केँ शान्ति करै दुआरे लोक सड़ल-गलल निसां पान करैत अछि। जहि स जिनगी बाटे मे टूटि जाइत छैक। एत्ते बात मन मे अबितहि रमाकान्त पलंग स उठि पीक फेकै निकललाह। बाहरक नाली मे पान थूकड़ि क’ फेकि, टंकी मे कुड़्ड़ा क’ कोठरी आबि सुजात केँ कहलखिन- ‘‘बेटा, चाह पिआउ?’’
आँचर स आखि पोछैत सुजाता चाह आनै निकलीह। रमाकान्तक हृदय मे सुजाताक प्रति विषेष आकर्षण बढ़ि गेलनि। जना हनुमानक हृदय मे राम-लक्ष्मण बैसल तहिना सुजातो रमाकान्तक हृदय मे एकटा छोट-छीन घर बना लेलनि। रमाकान्तक प्रति सुजातोक हृदय मे तस्वीर बनै लगलनि। आइ धरि जे बात सुजाता स क्यो ने पूछने छलनि से बात सुनि ससुरक हृदय पघलि गेलनि। जरुर रमाकान्तक हृदय मे सुजाता अपन जगह बना लेलनि। चाह आनि सुजाता रमाकान्तो केँ आ जुगेसरो केँ देलनि। हाथ मे चाह लैतहि रमाकान्त अपन अस्तित्व बिसरि गेलाह। सुजाताक आखि मे अपन आखि दए एक-टक सँ देखै लगलाह। आद्र भ रमाकान्त सुजाता केँ कहलखिन- ‘‘ओहि समयक जिनगी ओहिना मन अछि कि बिसरवो केलहुँ हेन?’’
‘बिसरब कोना! ओ समय आ घटना त हमर जिनगीक इतिहासक एक महत्वपूर्ण कालखंड छी।’’
‘‘तकर बाद की भेल?’’
‘हम, दू भाय-बहीन छी। एगारह बरखक हम रही आ आठ बर्खक भाय। दुनू गोरे इस्कूल जाइत रही। महल्ले मे स्कूल। भाइ त छोट रहै तेँ कोनो काज नइं करै मुदा हम माइक संग कपड़ो खींची, परती पर सुखेबो करी, लोहो दिअए आ माइयेक संग महल्ला से कपड़ा आनबो करी आ दाइयो अबियै। ओहि से जे कमाई हुअए तहि से गुजरो करी। पढ़ल-लिखल परिवार स ल क’ बनिया-बेकाल धरिक परिवार मे आवा-जाही रहए। पढ़ल-लिखल परिवार मे जखन जाइ ते फाटल-पुरान किताब मांगि ली। ओहि स पढ़ै ले किताब भ’ जाय। खायक जोगार कमाइये सँ भ’ जाय। एहि तरहे मैट्रिक फस्ट डिबीजन से पास केलहुँ। जखन मैट्रिकक रिजल्ट निकलल रहै तखन महल्ला भरिक लोक बाहबाही केलक। हमरो उत्साह बढ़ल। मन मे अरोपि लेलौ जे बी.एस.सी. करब। ओहि समय हमरा मन मे डाॅक्टर विचार रहबे ने करए। कोना उठैत? जतवे टा बुद्धि ततबे ने सोचितहुँ।
कओलेज मे एडमीषन शुरु भेल। भैयाक(महेन्द्र) कपड़ा दइ ले हम तीनू गोरे(माए-भाइ आ हम) भिनसुरके पहर केँ एलहुँ। भैया ताबे अस्पतालेक क्वाटर मे रहैत रहथि। ओसार पर बैसि दाढ़ी बनबैत रहथि। माए कपड़ाक मोटरी रखि दीदी(जमुना) केँ सोर पाड़ि कहलखिन- ‘‘मलिकाइन, कपड़ा लिअ।’’
हम-दुनू भाइ-बहीनि ठाढ़े रही। कोठरी से निकलितहि दीदीक नजरि हमरा पर पड़लनि। ओ(जमुना) माए केँ कहलखिन- ‘‘बेटी पास केलक, मिठाई खुआउ।’’
दीदीक(जमुना) बात सुनि भैया(महेन्द्र) दाढ़ी बनाएव छोड़ि हमरा दिषि मूड़ि उठा क’ तकलनि। बिना किछु बजनहि थोड़े काल देखि, फेरि हाँइ-हाँइ दाढ़ी कटै लगलाह। दाढ़ी काटि, सब समान(दाढ़ी कटैक) सैंति केँ राखि, हमरा सोर पाड़लनि। हमरा मनमे कोनो तरहक विचार उठबे ने कएल। किऐक त तेसरा-चारिम दिन पर बरोबरि अवैति छलहुँ। दीदी केँ भैया कहलखिन- ‘‘कने चाह बनाउ।’’ भैयाक बोली हम नइ बुझलिऐनि मुदा दीदी बुझि गेलखिन। ओ पाँच कप चाह बनौलनि। दू कप अपने दुनू परानी आ तीन कप हमरा तीनू गोरे केँ देलनि। पहिल दिन हम भैयाक डेरा मे चाह पीने रही। भैया, हमरा नाम पुछलनि। हम कहलिएनि। मैट्रिक रिजल्ट संबंध मे पुछलनि। सेहो कहलिएनि। ओ(भैया) नाम लिखवै स’ ल’ क’ किताब-कापी धरिक भार उठबैत माए केँ कहलखिन- ‘‘स्कूल-काओलेज त लगे(महल्ले) मे अछि तेँ बाहर जा पढ़ैक समस्ये नहि अछि। घरे पर रहि पढ़ि सकैत अछि। तखन स्कूल-कओलेजक खर्च स’ ल’ क’ पढै़क सामग्री धरिक खर्च दुनू भाय-बहीनिक हम देब।’’
भैयाक बात सुनि खुषी सँ हमर मन नाचि उठल। हम बकर-बकर भैयाक मुह, बड़ी काल धरि, देखिते रहि गेलहुँ। जाधरि डाॅक्टर बनलहुँ ताधरि भैया सब खर्च दइते रहलाह।’’
सुजाताक बात सुनि रमाकान्त केँ मन मे एलनि जे जँ कनियो मदति गरीब केँ कएल जाय त जिनगीक उद्धार भ’ सकैत अछि। पितो बहुत केलन्हि। बेटो केलक। बीच मे हम त किछु नहि केलहुँ। ओना दोसराक लेल रमाकान्तो बहुत-किछु केनहुँ रहथि आ करबो करथि। मुदा, सब केलहा बिसरि गेलाह।
रातिक आठ बजि गेल। एका-एकी तीनि टा गाड़ी आयल। महेन्द्रक अपन गाड़ी कोठरी मे रखि, कपड़ा बदलि, सोझे पिता लग अयलाह। महेन्द्र केँ देखितहि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘बौआ, हम बेसी दिन नहि अँटकब। हम त दस गोटे मे समय बितवैवला छी। एहिठाम असकर मे नीक नहि लागत।’’
महेन्द्र- ‘‘गाड़ीक झमारल छी तेँ पहिने चारि दिन अराम करु। तकर बाद देखि-सुनि केँ जाइक विचार करब।’’
मौलाइल गाछक फुल:ः 5
मद्रास अयला रमाकान्त केँ दस दिन भ’ गेलनि। दस दिन कोना बीतिलनि से बुझवे नहि केलनि। एहि दस दिनक बीच महेन्द्र, अपने गाड़ी सँ तीनू गोटे केँ उदकमंडलम्, कोडाइकंनाल आ एकडि हिलस्टेषन सहित शुचीन्द्रम, रामेष्वरम्, तिरुचेंदूर, मदुराई, पलनी, तिरुचिरापल्ली, श्रीरंगम, तंजोर, कुम्बकोणम, नागोर, वेलांकण्णि, वैत्तीष्वरन कोइल, चिदम्वरम्, तिरुवण्णामलै, कांचीपुरम, तिरुत्तणि आओर कन्याकुमारी घुमा देलकनि। मुदा अपना सभ सँ भिन्न रीति रेवाज, वेवहार आ जीवैक ढंग ओहिठामक लोकक बुझि पड़लनि। एकटा बात जरुर देखल जे अपना सभ सँ ओ सभ अधिक मेहनतियो आ इमानदारो अछि।
भारतक आजादीक उपरान्त, राज्य पुनर्गठन अधिनियमक अन्तर्गत चैदह जनवरी उन्नैस सौ उनहत्तरि मे मद्रास राज्यक नाम तमिलनाडू राखल गेलैक। पुरना केरलक किछु हिस्सा आ आंध्रप्रदेषक किछु हिस्सा जोड़ि केँ एहि राज्यक निर्माण भेलैक।
तमिलनाडु द्रविड़ सभ्यताक केन्द्र अदौ सँ रहल अछि। ई. पू. चारिम शताब्दी मे चोल, पाण्ड्य आ चेर राजवंषक समय मे द्रविड़ सभ्यता अपन चरम सीमा पर फुलायल-फड़ल।
तेरहमी शताब्दीक आरंभ मे एहिठाम काकतीयेक शासन रहल। तेरह सौ तेइस ईस्वी मे दिल्लीक तुगलक सुल्तान काकतीय शासक केँ भगौलक। गोलकुंडाक कुतुबषाही सुल्तान अखनुका हैदराबादक न्यो लेलक। सम्राट औरंगजेब सुल्तान केँ हरा आसफ जा के गवर्नर बना देलक। मुगल शासनक आखिरी समय मे आसफ जा, अपनाकेँ निजामक उपाधि धारण कए, स्वतंत्र शासक घोषित कए लेलक।
सोलह सौ उनचालीस ईस्वी मे, ईस्ट इंडिया कम्पनीक पएर मद्रास मे जमि गेल ताधरि देषक अधिकांष भाग मे अंग्रेजक अधिकार भए गेल छलैक। तमिलनाडुक पूब मे बंगालक खाड़ी, दछिन मे हिन्द महासागर, पछिम मे केरल आ उत्तर मे कर्नाटक आ आन्ध्रप्रदेष अछि।
पैछला राति गप-सप करैत सभकेँ डेढ़ बजि गेलनि। गप्पक विषयो नमहर, सात दिनक देखल मद्रास छलनि।
ढाई बजे भोर मे, एकठाम गाड़ी दुर्धटना भए गेलैक। चारु गोटे(चारु डाॅक्टर) केँ फोन एलनि जे जलदी दुरघटनाक जगह पर अबियौक। फोन सुनि महेन्द्र तीनू गोटे रविन्द्र, जमुना आ सुजाता केँ जानकारी दैत कहलखिन- ‘‘जल्दी तैयार भए चलै चलू।’’
एकहि गाड़ी सँ चारु गोटे विदा भेलाह। दुर्घटनाक जगह पहुँच महेनद्र देखलखिन जे गाड़ी, एकटा पर राखल रौलर सँ टकरा गेल अछि। जहि स थौआ-थाकर भेल अछि। गाड़ी मे एक्के परिवारक आठ गोटे सवार रहथि। उद्योगपति परिवार। एकटा जवान आ एकटा बच्चाक मृत्यु भए गेल छलैक। एकटा बूढ़ केँ माथ फटि गेल रहनि, जहि सँ अड़-दर्ड़ बजैत रहथि। दोसर महिला केँ छाती टुटि गेल रहनि। मुदा वायु पर ओहो बजैत छलीह। एकटा जुआन पहिला केँ दुनू जाँघ टूटि गेल रहनि। दूटा ढेरबा बच्चिया केँ एक-एक आखि फुटि गेल रहनि आ एक-एक डेन टूटि गेल रहनि। अबोध बच्चा केँ किछु नहि भेल छलैक। महेन्द्र केँ पहुँचतहि धाँइ-धाँइ अस्पतालक आनो-आनो डाॅक्टर, नर्स आ स्टाफो सभ आयल छलाह। थाना पुलिस सँ ल’ क’ जिला पुलिस धरि पहुँच गेलैक। डाॅक्टर आयल छलाह सभ रोगी सभकेँ देखि विचार केलनि जे अस्पताले लए जायब नीक होएत। डाॅक्टर सभक संग मे सिर्फ अल्ले टा। ने कोनो दवाई आ ने कोनो औजार रहनि।
आठो गोटे केँ, थानोक पुलिस आ अस्पतालोक कर्मचारी, उठा-पुठा के असपताल अनलकनि। असपताल मे जाँच-पड़ताल होइतहि समय दू गोटेक मृत्यु भ’ गेलैक। वाकीक उपचार चलै लगलैक।
साँढ़े पाँच बजे, चारु गोटे महेन्द्र डेरा पहुँचलाह। गाड़ीक हड़हरेनाइ सुनि रमाकान्तोक निन्न टुटि गेलनि।
सुतैक समय नहि देखि चारु गोटे गाड़ी सँ उतड़ि अपन-अपन नित्य-कर्म मे लगि गेलाह। ओछाइने पर पड़ल-पड़ल रमाकान्त सोचै लगलथि जे आइ एगारहम दिन छी मुदा एक्को-टा पोता-पोती केँ मुँह नहि देखि सकलहुँ। जाहि परिवार मे पँच-पँच टा पोता-पोती रहत, ओहि परिवारक बच्चा सँ भेटि नहि होअए, कते दुखक बात छी? माए-बाप, दादा-दादीक स्नेह बच्चाक प्रति की होइत छैक, तेकर कोनो नामो-निषान नहि देखति। जहि बच्चाकेँ माए-बापक सिनेह नहि भेटितैक ओहि बच्चाकेँ माता-पिताक प्रति केेहेन धारणा बनतैक?
हँ, ई बात जरुर जे दुनियाँक सभ मनुष्य-मनुष्य छी, तेँ सभहक प्रति सभकेँ स्नेह हेबाक चाहिऐक। मुदा जाहि परिवेष मे हम सभ जीबि रहल छी, जाहि ठाम व्यक्तिगत सम्पत्ति आ जबाबदेहिक बीच मनुष्यक चलि रहल अछि। ताहि ठाम स्नेहो त खंडित होइत अछि। मनुष्यक जिनगी स्थायी नहि अस्था होइक अछि। उम्रक हिसाब स शरीर क्रियाषील रहैत अछि। जहिना बच्चाक उत्तरदायित्व माए-बाप पर रहैत छैक तहिना रोग स ग्रसित वा अधिक बयस भेला पर, जखन शरीरक अंग षिथिल होमए लगैत छैक तखन त दोसरेक सहाराक जरुरत होइत छैक। जँ से नहि होय त जिनगी कष्टमय हेबे करत। लोक, एक राज्य स दोसर राज्य, एक देष स दोसर देष, कमाइ ले जाइत अछि। किऐक? एहि लेल ने जे अपनो आ परिवारोक जिनगी चैन सँ चलत।
महेन्द्र केँ तीन आ रविन्द्र केँ दू सन्तान। दुनू मिला क’ पाँच भाय-बहीनि। महेन्द्रक जेठ बेटा हाई स्कूल मे पढ़ैत बाकी चारु नर्सरी मे रहति। रमेष(महेन्द्र जेठ बेटा) हाई स्कूलक होसटल मे रहैत अछि आ बाकी चारु आवाषीय स्कूलमे रहैत अछि। महीना दू महिना पर महेन्द्र जाय केँ खरचा पहुँचवैत छथि।
बाबा-दादीक जोर कयला पर, बच्चा सभ केँ भेटि करैक कार्यक्रम महेन्द्र बनौलनि। रवि दिन स्कूलो बन्न रहतैक, तेँ भेटि-घाॅट करै मे सुविधा सेहो होयतनि। सात बजे डेरा सँ चलबाक कार्यक्रम बनलनि। रमाकान्त, श्यामा आ जुगेसर समय सँ पहिनहि तैयार भ गेल छलाह मुदा भरि रातिक जगरना दुआरे महेन्द्र पछुआइल रहथि। ओंघी स देह भसिआइत रहनि। मुदा निन्न तोड़ैक दवाइ खाय रमाकान्त लग आबि कहलखिन- ‘‘बाबू, हम त भरि राति जगले रहि गेलहुँ। जखन ओछाइन पर गेलहुँ, निन्न पड़लो नहि रही कि फोन आवि गेल जे एकटा गाड़ीक दुरघटना भ’ गेलैक। जहि मे सबार एक्के परिवारक आठ गोटे छलाह ओ पैघ उद्योगपतिक परिवारक छलाह। हुनके सभकेँ देखैत-सुनैत भोर मे एलहुँ।’’
बिचहि मे जुगेसर बाजल- ‘‘मरबो केलई?’’
‘हँ। जे दुनू मुख्य कारोबारी छलाह ओ मरि गेलाह। एक गोटे के ब्रेन हेम्रेज भए गेलनि। ओ सभ दिन पगलायले रहती। एक गोटे कें छातीक हड्डी थकुचा-थकुचा भए गेल छनि, ओ दू-चारि मासक मेहमान छथि। तीनिटा अधमरु भए केँ जीविताह। एकटा, चारि सालक बच्चा टा सुरक्षित अछि।’’
रमाकान्त महेन्द्रक बातो सुनति आ मने-मन सोचवो करति जे अइह थिक जिनगी। अहीक लेल लोक एते नीच स नीच काज पर उतड़ि मनुख केँ मनुख नहि बुझैत अछि। अनका बुझवै ले धरमक नाटक रचि पूजा-पाठ, कीरतन-भजन करैत अछि। हजारो-लाखो रुपैआ खर्च कए पाथरक मूर्ति स्थापित करैत अछि। नीक-नीक प्रसाद चढ़बैत अछि। मुदा जाहि मनुष्य केँ पेट मे अन्न नहि, देह पर वस्त्र नहि, रहैक घर नहि आ जीवैक कोनो ठेकान नहि, ओकरा तँ देखिनिहारो क्यो नहि। यैह थिक कर्मकाण्डक आडम्बर आ चक्रव्यूह।
रमाकान्तकेँ गंभीर देखि मुस्की दइत महेन्द्र कहलकनि- ‘‘बावू, नोकरीक जिनगिये ऐहन होइत छैक। एक रातिक कोन बात जे एकलखाइत पाँचो राति जागल रहब तइयो किछु नहि वुझबैक। ऐहन-ऐहन दवाइ सब अछि जे खाइत देरी निन्न निपत्ता भ’ जायत अछि। जाबत अहाँ सभ चाह-पान करब ताबत हमहू तैयार भए जायत छी।’’
कहि महेन्द्र उठि क’ तैयार होइ गेलाह।
चारु गोटे कार मे बैसि विदा भेलाह। महेन्द्र, अपने ड्राइवरी करैत रहति। दुनू स्कूल एक्केठाम। एक दोसर सँ थोड़बे हटल रहै। चारु गोटे पहिने रमेषक होस्टल पहुँचलाह। छहर देवालीक बीच मे होस्टल अछि। अबै-जाइक एक्के टा दरवज्जा। जहि दरवज्जामे लोहाक फाटक लागल। एकटा चैकीदार बैसल। दरमान महेन्द्र केँ चिन्हैत रहनि। किऐक त मासे-मास ओ अबैत छथि। चारु गोटे भीतर गेलाह। भीतर मे, गारजन सभक लेल एकटा खुला घर बनल अछि। जाहि मे चारु कात कुरसी सजल। चारु गोटे ओहि घर मे बैसिलाह। महेन्द्र रमेष केँ समाद देलखिन। रमेष आबि पिता केँ गोड़ लगलकनि। पिता केँ गोड़ लागि रमेष ठकुआ क’ आगू मे ठाढ़ भ’ गेल। ने रमेष बाबा दादी केँ चिन्हैत आ ने बाबा-दादी रमेषकेँ चिन्हैत रहनि। ठकुआ केँ ठाढ़ देखि रमेषकेँ महेन्द्र कहलखिन- ‘‘बौआ, बाबा-दादी केँ गोड़ लगिअनु। महेन्द्रक कहला पर रमेष तीनू गोटे केँ गोड़ लगलकनि। षिष्टाचार निमाहैत त तीनू गोटे असिरवाद दए देलखिन। मुदा रमाकान्तक मनमे तूफान उठि गेलनि। सोचै लगलाह जे जे पोता चिन्हबो ने करै अए ओ सेवा की करत? पढ़नाइ-लिखनाइ, सभ मनुष्यक लेल जरुरी अछि। एहि स ज्ञान होइत छैक, जे जिनगी जीवैक ढंग सिखबैत छैक। मुदा जँ बच्चाकेँ परिवार सँ अलग जिनगी बना पढ़ाओल-लिखाओल जाय त ओ परिवार केँ कोना चिन्हत आ परिवारक दायित्वकेँ कोना बुझत? परिवारोक त सीमा छैक। एक परिवार पैछला पीढ़ी केँ जोड़ि बनैत जे संयुक्त परिवार कहबैत। जे मिथिलाक धरोहर छी। आ दोसर अपने लग सँ आगू बढ़ि बनैत अछि। जे एकल परिवार कहबैत अछि। जहि मे लोक बापो-माए केँ बीरान बुझि कुभेला करैत अछि। जँ एहि तरहक परिवारक संरचना होअए लगत तेँ बापो-माए केँ धिया-पूता सँ कोन मतलब रहतैक। तखन समाजक की दुर्दषा होयतैक? जँ से नहि होयतैइ तेँ मनुष्य आ जानवर मे अन्तरे की रहतैक? अखने देखि रहल छी जे अपन खून रहितहुँ, बुझि पड़ैत अछि जे जहिना हाट-बजार वा मेला-ठेला मे हजारो मनुक्ख केँ देखलो पर अनचिन्हारे-अनचिन्हार बुझि पड़ैत, तहिना त अखनो भए रहल अछि। एहि स नीक जे जहिना मनुष्यक समूह सँ परिवार बनैत आ परिवारक समूह स समाज बनैत त समाजेक सदस्यकेँ किऐक ने अंगीकार कयल जाय, जहि स जिनगी हँसैत-खेलैत बीतैत रहत। पिता केँ गुम्म देखि महेन्द्र कहलकनि- ‘‘बाबू, एहिठाम से चलू। एहिठाम सभ बच्चाक रुटिंग बनल छैक। अगर अपना सभ बेसी समय अँटकबै त बच्चाक रुटिंग गड़बड़ा जयतैक।
ममता भरल मनकेँ मारि रमाकान्त उठि केँ ठाढ़ होइत कहलखिन- ‘‘हँ, हँ, चलू। ओहू बच्चा सभकेँ देखैक अछि।’’
रमेषो चलि गेल आ इहो चारु गोटे गाड़ी मे बैसि बढ़लाह नर्सरी विद्यालय लगे मे रहै। महेन्द्र केँ दरमान चिन्हिते रहनि तेँ, कोनो रोक-राक नहिये भेलनि। चारु बच्चाकेँ दरमान बाजा अनलक। चारु बच्चा आबि महेन्द्रकेँ गोड़ लगलकनि। गोड़ लागि चारु बच्चा ठमकि गेल। हाथक इषारा से रमाकान्त आ श्यामा केँ देखवैत बच्चा सभकेँ महेन्द्र कहलखिन- ‘‘बौआ, बाबा-दादी छथुन। गोड़ लगहुन।’’
महेन्द्र केँ कहला पर चारु बच्चा तीनू गोटे केँ गोड़ लगलकनि। रमाकान्तो आ श्यामोक मन तरे-तर टूटै लगलनि। मुदा की करितथि? सोचै लगलथि जे की सोचि एहिठाम एलहुँ आ की देखि रहल छी। आब एक्को दिन एहिठाम रहब उचित नहि, मुदा जखन आबि गेलहुँ तखन ते बेटे-पुतोहूक विचार से ने गाम जायब। किछु देखैक लेल सेहो बाकी अछि। टूटल मने रमाकान्त महेन्द्र केँ कहलखिन- ‘‘बच्चा सभकेँ देखिये लेलहुँ आब ऐठाम से चलू। गामक सुरता खीचि रहल अछि। जल्दीये चलि जायब।’’
पिताक बात महेन्द्र नहि बुझि सकलाह। जाधरि महेन्द्र गाममे रहलाह विद्यार्थिये छलाह। डाॅक्टर बनला बाद मद्रासे चलि अयलाह। जाहि स मद्रासेक परिवेष मे ढलि गेलाह।
बेर टगितहि चारु गोटे ब्रह्मचारी आश्रम विदा भेलाह। बह्मचारी आश्रम मे मंदिर नहि। सिर्फ दू टा घर। एकटा घर धर्मषाला जेँका सार्वजनिक आ दोसर घर मे ब्रह्मचारी जी अपने रहैत छलाह। ओहि मे एक भाग सुतबो आ भानसो करैत छथि। बरतन-वासन सब एक भागमे सेहो ओहि घर मे रखने छथि। ब्रह्मचारी जी मिथिलेक। अद्वैत दर्षनक प्रकाण्ड पंडित छथि। नस-नस मे अद्वैत दर्षन समाइल छनि। ब्रह्मचारी आश्रम लग मे रहितहुँ महेन्द्र नहि जनैत छलाह। मुदा जखन रामेष्वरम् गेल रहथि ते ओतै एकटा पुजेगरी कहलकनि।
मुख्य मार्ग स ब्रह्मचारी आश्रम दस लग्गी पछिम। एकपेड़िया रास्ता तेँ महेन्द्र मुख्य मार्गक कतबाहि से गाड़ी लगा। चारु गोटे आश्रम दिषि बढ़लाह। आश्रमक सीमा पर पहुँचतहि रमाकान्तो आ महेन्द्रो आखि उठा-उठा तजबीज करै लगलथि। ने कोनो तरहक तड़क-भरक आ ने लोकक भीड़ आश्रममे देखथि। घर त ईंटाक बनल छैक मुदा धर्मस्थान जेँका नहि बुझि पड़ैत छैक। साधारण गृहस्तक घर जेँका आश्रम। मुदा नव चीज दुनू गोटे केँ बुझि पड़लनि। जे हम सभ मद्रासक जमीन छोड़ि मिथिला चल एलहुँ। ब्रह्चारी जी करजान मे कच्चिया हाँसू सँ केरा गाछक सुखल डपौर सब कटैत रहथि। केरा गाछक अढ़ मे रहथि। तेँ ने ब्रह्मचारी जी रमाकान्त सभ केँ देखलखिन आ ने रमाकान्त सभ ब्रह्मचारी जीकेँ। मुदा गाड़ीक आवाज ब्रह्मचारी जी सुनने रहथि। ओना गाड़ी त सदिखन चलिते रहैत अछि तेँ गाड़ीक आवाज पर ब्रह्मचारी जी धियाने नहि देलनि। अपन काज मे मस्त रहथि।
एक बीघा जमीन आश्रम मे। ओहि मे सभ किछु बनल रहैक। दू कट्ठा मे दुनू घर, आंगन आ गाइयक थैर रहनि। चारि कट्ठाक एकटा छोटबे टा पोखरि। पाँच कट्ठा मे गाछी-कलम। दू कट्ठामे गाइयक लेल घासक खेती आ सात कट्ठा मे अन्न उपजैत अछि।
सबसँ पहिने चारु गोटे पोखरिक घाट पर पहुँचलथि। पोखरिक घाट पजेबा-सिमटीक बनल। घाट पर ठाढ़ भए चारु गोटे पोखरि केँ हियासि-हियासि देखै लगलथि। पोखरिक किनछरि मे पान-सात टा मिथिलेक बगुला चरौर करैत रहए। एक टक सँ रमाकान्त बगुला केँ देखि सोचै लगलथि जे जहिया से ऐठाम एलहुँ आइये अपन इलाकाक बगुला देखलहुँ। ओना बगुला त एतहुँ अछि मुदा मिथिलाक बगुला त दोसरे चालि-ढालिक होइत अछि। बगुला पर स नजरि हटा पोखरि दिषि देलनि। पोखरि मे दस-बारह टा कुमहीक छोट-छोट समूह फूल जेँका छिड़ियाइल रहए। जे हवाक सिहकी मे नचैत रहए। तहिबीच दू टा पनिडूबी भुक दे जागल। जकरा अपना सभ पिहुओ कहै छियैक। पिहुआ केँ तजबीज करितहि रहति कि एक जेर सिल्ली उड़ैत आबि पोखरि मे बैसल। तहि बीच जुगेसर रमाकान्त केँ कहलकनि- ‘‘कक्का, इ त अपने इलाकाक पुरैनिक गाछ छी। फूलो ओहने बुझि पड़ै अए।’’
जुगेसरक बात सुनि रमाकान्त मूड़ी उठा पुरनि क’ देखि कहलखिन- ‘‘हँ, हौ जुगेसर। छी ते कमले।’’
हाथ-पाएर धोय चारु गोटे घाटक उपरका सीढ़ी पर आबि ब्रह्मचारी जी केँ हियाबै लगलथि। ब्रह्मचारी जी केँ नहि देखि रमाकान्त सोचै लगलथि जे भरिसक ब्रह्मचारी जी कतौ गेल छथि। तहि बीच जुगेसरक नजरि करजान दिषि गेल। करजान मे ब्रह्मचारी जी केँ देखि जुगेसर रमाकान्त केँ कहलकनि- ‘‘काका, एक गोटे करजान मे काज कए रहल अछि। हम जा क’ पूछि लइ छिअनि।’’
जुगेसरक बात सुनि रमाकान्तो आ महेन्द्रो आखि उठा क’ देखलनि। मुदा ब्रह्मचारी जीक छुछुन चेहरा देखि रमाकान्त केँ भेलनि जे कियो जौन मजदूर काज करैत अछि। तहि बीच ब्रह्मचारिये जीक कानमे रमाकान्तक आवाज पहुँचलनि कानमे आवाज पहुँचतहि ब्रह्मचारी जी हाथक हँसुआ नेनहि, पहुँचलथि।
ब्रह्मचारी जी अनेको भाषा आ बोलीक जानकार छथि। चारु गोटे केँ देखि ब्रह्मचारी जी बुझि गेलथि। ई लोकनि मिथिलेक छथि किऐक त जुगेसर आ रमाकान्तकेँ मिथिलेक ढंग स धोती पहिरने देखलनि। मुदा महेन्द्र केँ देखि तत्-मत् मे पड़ल रहथि। श्यामाक साड़ी पहिरब देखि ब्रह्मचारी जीक मन मानि गेलनि जे ई सभ मिथिलेक छथि। मुदा रमाकान्त ब्रह्मचारी जी केँ नहि चीन्हि, पूछलखिन- ‘‘ब्रह्मचारी जी कते छथि?’’
ब्रह्मचारी जी साधारण धोती पहिरने रहति। सेहो फाँड़ बन्हने। देह पर गमछा रहनि। ने बाबरी छटौने आ ने दाढ़ी रखने रहति। ने गरदनि मे कंठी-माला आ ने देह मे जनेउ। मुस्कुराइत ब्रह्मचारी जी उत्तर देलखिन- ‘‘अहाँ सभ मिथिला सँ एलहुँ अछि। ऐना-ठाढ़ किऐक छी। चलू बैसि क’ गप-सप करब। ब्रह्मचारी जी अपने आबि जयताह।’’
कहि ब्रह्मचारी जी पोखरिक घाट पर हाँसू रखि हाथ-पाएर धोय, अंगने मे मोथीक बिछान बिछौलनि। चारु गोटे केँ बैसाय, ब्रह्मचारी जी घर स एक घौड़ केरा निकालि अनलनि। केराक रंग-रुप देखि रमाकान्त बुझि गेलखिन जे इ त मिथिलेक गौड़िया-मालभोग छी। अँठियाहा नहि छी। घौउरो नमहर। गछपक्कू, आँठी-आँठी जुआइल छलैक। सुआदो नीक हेतइ, अपने सँ पूर्ण जुआ केँ पाकल अछि। धुकलाहा नहि छी। केराक घौड़ बीच मे राखल आ सभ किओ हाथ बगने। जुगेसर सोचैत जे खेने छी, पेट मे जगहे नहि अछि नइ ते सैाँसे घौड़ खा जइतियनि। रमाकान्त ब्रह्मचारी जी केँ कहलकनि- ‘‘अखने, एक घंटा पहिने, भोजन केलहुँ तेँ खाइक क्षुधा नहि अछि। मुदा ब्रह्चारी आश्रमक परसाद छी तेँ दू छीमी जरुर खाएब।’’
कहि दू छीमी उपरका हत्था स तोड़ि खेलनि।
रमाकान्त केँ देखि महेन्द्रो आ जुगेसरो दू-दू छीमी तोड़ि खेलनि। श्यामा हाथ बगने रहति। चुपचाप बैसल छलीह। श्यामा केँ हाथ बागब देखि ब्रह्मचारी जी कहलखिन- ‘‘बहीनि, अहाँ जाहि दुआरे हाथ बगने छी ओ हमहू बुझै छी। मुदा अपन मिथिला मे दुनू चलैन अछि। पतिक आगू मे पत्नी केँ नहि खायब आ विवाहक प्रकरण मे समाजक माय-बहीनि मिलि मौहक करैत छथि। जाहि मे पति-पत्नीकेँ संगे खुआओल जाइत अछि। तेँ अहूँ के लजेबाक नहि चाही। इ त सहजहि आश्रम छी। दोसर धर्मस्थानो छी।’’
ब्रह्मचारी जीक विचार सुनि श्यामाक मन डोललनि मगर व्यवहार मनकेँ रोकैत छलनि। असमंजस मे श्यामा केँ देखि जुगेसर फनकि केँ बाजल- ‘‘काकी, जब हमर घरनीक हाथ ढेकी मे कटि गेल रहनि तखन हम अपने हाथे खुआविअनि। अहाँ त सहजहि बृद्धि भेलहुँ।’’
जुगेसरक बात सुनि रमाकान्त मूड़ी झुका लेलनि। दू छीमी केरा श्यामो खेलनि। चारु गोटे केरा खा, पानि पीबि मुह पोछलनि।
ब्रह्मचारी जी रमाकान्त केँ पूछलखिन- ‘‘एहिठाम अपने कोना-कोना ऐलिऐक?’’
महेन्द्र केँ देखबैत रमाकान्त कहलखिन- ‘‘ई जेठ बेटा छथि। डाॅक्टरी पढ़ि, नोकरी करै एहिठाम चलि अएलाह। साल मे एक बेर अपनो गाम जायत छथि। बाल-बच्चा आ स्त्री आइ धरि गाम नहि गेलखिन अछि। तेँ दुनू परानीक मन मे आयल जे देषो-कोस आ बच्चो सभ केँ देखि आवी। तेँ एलहुँ?’’
महेन्द्र दिषि देखि ब्रह्मचारी जी पूछलखिन- ‘‘कते दिन सँ एहिठाम छी?’’
कनेक गुम्म भए समय मन पाड़ि महेन्द्र कहलकनि- ‘‘ई बाइसम बर्ख छी।’’
‘एते दिन से ऐहिठाम रहै छी, मुदा कहियो भेटि-घाँट नहि भेलहुँ।’
अपन विबसता देखबैत महेन्द्र उत्तर देलखिन- ‘‘एक त नोकरी करै छी तहि पर डाॅक्टरी ऐहन पेषा छी जे भरि मन कहियो अरामो नहि क’ पबैत छी। घुमनाइ-फीरिनाइक कोन बात। मुदा तइयो कहुना नहि कहुना समय निकालि ऐबो करितहुँ से बुझले नहि छल।’’
‘आइ कोना भाँज लागल?’
‘‘चारिम दिन रामेष्वरम् गेल रही, ओहिठाम एकटा पुजेगरी अपनेक संबंध मे कहलनि।’’
महेन्द्रक बात सुनि ब्रह्मचारी जी मुस्कुराइत कहए लगलखिन- ‘‘मास मे एक बेरि हमहुँ रामेष्वरम् जाइ छी। समुद्रक कात(समाजरुपी समुद्र) मे स्थापित रामेष्वर लग जाय समुद्र मे उठैत लहड़ि केँ धियान सँ देखबो करैत छी आ बिचारबो करैत छी। दुनू तरहक लहड़ि समुद्र मे उठैत अछि- नीको आ अधलो। नीक लहड़ि देखि मन प्रसन्न होयत अछि आ अधला देखि मन जरै लगैत अछि। मुदा तइओ सोचैत रहै छी जे अधला लहड़ि बेसी उग्र नहि हुअए। आ नीक लहड़ि सदिखन उठैत रहए।’’
ब्रह्मचारी जीक विचार जना महेन्द्रक सुतल बुद्धि केँ जगा देलकनि। अनायास महेन्द्र केँ बुझि पड़ै लगलनि जे अन्हार सँ इजोत मे आबि गेलहुँ, आ कि इजोते से अन्हार मे चलि गेलहुँ। विचित्र स्थिति मे महेन्द्र पड़ि गेलाह। जाहि रुप मे माय-बाप आ जुगेसर केँ अखन धरि देखैत छलाह ओ अनायास बदलै लगलनि। बीच स उठि महेन्द्र गाछी दिषि टहलै विदा भ’ गेलाह। ब्रह्मचारी जी बुझि गेलखिन।
रमाकान्त ब्रह्चारी जी केँ पूछलखिन- ‘‘अपने मिथिला छोड़ि एहिठाम किऐक आबि गेलहुँ? जबकि ई इलाका दोसर धर्म, संस्कृति आ जातिक छी?’’
मुस्कुराइत ब्रह्चारी जी कहै लगलखिन- ‘‘कोनो जाति पंथ आ संस्कृति क आधार होइत जिनगी। जिनगीक आधार होइत मुनुक्खक बुद्धि, विचार आ कर्म। जखने मनुक्ख अपन सुपत कर्म स जिनगी ठाढ़ करैत अछि तखने सभ किछु(धर्म, संस्कृति, विचार आ आचार) बदलि, सही मनुक्खक निर्माण करैत अछि। जकरा हम महामानव धर्मात्मा आ उच्च कोटिक मनुष्य बुझैत छी। जे मिथिलांचल मे क्षीण भ’ रहल अछि। सोलहन्नी मरल नहि अछि मुदा दबाइत-2 दुब्बर भ’ गेल अछि। ओहिठामक(मिथिलाक) जे मूल बासी छथि हुनका अभिजात वर्ण वा कही त परजीवी वर्ण वा बाहरी लोक आबि सभ किछ केँ बदलि, ऐहेन सामाजिक ढाँचा मे ढालि देलकनि। जहि स अदौ स अबैत संस्कृति केँ दाबि अभिजात संस्कृति केँ बढ़ा देने अछि। जिनगीक सच्चाई केँ दाबि बनौआ जिनगी मे बदलि देने अछि। जाहि स लोकक जिनगी वास्तविकता स हटि बौआ गेल अछि। ओना निर्मूल नष्ट नहि भेल अछि मुदा एतक क्षीण जरुर भए गेल अछि जे नीक-अधलाह केँ बेरायब कठिन भए गेल अछि। हम त सभ मनुष्य केँ मनुष्य बुझैत छी। ने कियो कारी अछि आ ने कियो गोर। मुदा जिनगीक ढाँचा ऐहन बनि गेल अछि जे स्पष्ट रुप मे एक-दोसर स पैघ आ छोट बनि गेल अछि। ओना देखबै त बुझि पड़त जे सभ, एक दोसर स पैघ आ एक-दोसर स छोट अछि। मगर मकड़ा जेँका अपने पेट स सुत निकालि, जाल बुनि, ओहिमे सभ ओझरा गेल अछि।’’
ब्रह्चारी जी आखि बन्न कए बजितहि रहति कि बिचहि मे रमाकान्त पूछि देलखिन- ‘‘अपने त प्रकाण्ड पंडित छी तखन मिथिला क’ किऐक छोड़ि एहिठाम चलि एलहुँ?’’
रमाकान्तक प्रष्न सुनि ब्रह्माचारी जी गंभीर होइत कहै लगलखिन- ‘‘अहाँक बात हम मानैत छी मुदा पढ़ल-लिखल सँ मुरुख धरिक विचार ऐहेन बनि गेल अछि जहि मे नीक विचार केँ सन्हिआइये नहि देल जायत अछि। कहलो गेल छैक जे ‘असकर वृहस्पतिओ फूसि।’ ततबे नहि जेकरा कल्याणक जरुरत अछि ओहो नीक रास्ता धरैक लेल तैयारे नहि अछि! जकरा लेल चोरि करीहुँ सइह कहै चोरा। की करबैक? जँ सिर्फ वैचारिके स्तर पर संघर्ष होय त संघर्ष कयल जा सकैत अछि मुदा ततबे नहि अछि? जिनगीक क्रिया मे उपद्रव जे करैत अछि से त करबे करैत अछि जे जानो सँ खेलबाड़ करै मे नहि चुकैत अछि! अभिजात वर्ग एते सषक्त बनि गेल अछि जे जहिना कोनो साँढ़-पारा पाँक मे चलैत काल फँसि जाइत अछि आ परोपट्टाक नढ़िया, कुकुड़क गीध, कौआ आबि-आबि जीविते मे आखि फोरि-फोरि खाय लगैत अछि, तहिना इमानदार मनुखोक संग होइत अछि। मुदा हारि मानै ले नै हम तैयार छी आ ने मानब? जहिना नव सुरजक संग नव दिन शुरु होइत तहिना नव मनुक्ख नव जिनगी बनबैक दिषा मे बढ़ैत अछि, तेँ संतोष अछि।’’
रमाकान्त- ‘‘अपनेक परिवार मे के सभ छथि?’’
ब्रह्मचारी- ‘‘पिता गिरहस्त छलाह। पनरह बीघा खेत छलनि। ओहि खेत केँ दुनू परानी(माता-पिता) उपजबै छलाह, जाहि सँ परिवार नीक जेँका चलैत छलनि। ओना रौदी-दाही होइते छलैक मुदा तइयो सहि-मरि क’ ओहि सँ गुजर करैत छलाह। हम दू भाइ छी। घरे लग नवानी विद्यालय मे हम पढ़लहुँ किछु दिन लोहना पाठषाला मे सेहो पढ़लहुँ। हमर छोट भाइ बच्चे स पिताजी क’ संग खेती करैत छलाह। नहि पढ़लनि। माइयो आ बावूओ मरि गेलाह। हम विआह नहि केलहुँ। भाइ केँ विआह करा सब किछु छोड़ि अपने घर स निकलि गेलहुँ। मनमे छल जे एहिठाम(मिथिला) जे कुरीति, कुव्यवस्था आ कुचालि मे समाज फँसल अछि ओकरा सुधारि सुरीति, सुव्यवस्था आ सुचालि दिषि लए चली। ताहि पाछू लगि गेलहुँ। मुदा वेबस भ’ छोड़ि चलि एलहुँ। कारण एहिठामक नियामक आ नियामकक पाछु पढ़ल-लिखल(जे अपना केँ पंडित बुझै छथि) लोक स’ ल’ क’ अभिजात लोकनि सब मनुक्खक साँच के ओहन बना देने छथि, जहि स कुपात्र छोड़ि सुपात्रक निर्माणे ने होइत। जकरा चलैत छीना-झपटी, बलात्कार चोरि, छिनरपन, जातीय उन्माद, धार्मिक अन्माद वा ई कहियौ जे मनुक्ख बनैक जते रास्ता अछि सब नष्ट भ’ गेल अछि। सभहक जड़ि मे सम्पत्ति धुरिक काज कए रहल अछि। जहि पाछू पड़ि सभ बताह भ’ गेल अछि। सबसँ दुखद बात त इ अछि जे नीक स नीक, पैघ स पैघ आ विद्वान स विद्वान धरि, बजताह किछु आ करताह किछु। जहि स समाजक बीच सत्य बजनाई(बाजब) मेटा गेल अछि। ऐहेन समाज मे नीक लोकक रहब कोना संभव हयत। तेँ छोड़ि केँ पड़ा गेलहुँ। देहक सुखक पाछू सभ आन्हर भ’ गेल अछि।’’
ब्रह्मचारी जीक सुनि रमाकान्त केँ धनक प्रति मोह भंग हुअए लगलनि। सोचै लगलाह जे हमरो दुइ सय बीघा जमीन अछि, ओते जमीनक कोन प्रयोजन अछि। जँ ओहि जमीन के गरीबक(निर्भूमिक) बीच बाँटि दियैक त कते परिवार आ कत्ते लोक सुख-चैन सँ जिनगी जीवै लगत। जकरा लेल जमीन रखने छी ओ त अपने तते कमाई छथि जे ढेरिऔने छथि। अदौ स मिथिला तियागी महापुरुषक राज रहल, किऐक ने हमहूँ ओहि परम्परा क’ अपना, परम्परा केँ पुनर्जिवित कए दियैक। एते बात रमाकान्त केँ मन मे अबितहि ब्रह्मचारी जी केँ पूछलखिन- ‘‘अपने एहि जिनगी सँ संतुष्ठ छी?’’
रमाकान्तक प्रष्न सुनि हँसैत ब्रह्मचारी जी उत्तर देलखिन- ‘‘हँ, बिल्कुल संतुष्ठ छी। एहि स नीक जिनगी की भए सकैत छैक। दुनियाक जते भाषा अछि ओहि भाषाक उद्भव, विकास आ साहित्यक सब पोथी पुस्तकालय मे रखने छी। ततबे नहि, दुनिया मे जते धार्मिक सम्प्रदाय अछि ओकरो पुस्तक रुप मे रखने छी आ अध्ययन करैत छी। वेद, उपनिषद, ब्राह्मण, संहिता, ज्योतिष, पुराण, रमायणक संग वाइबिल, कुरान, गुरु ग्रन्थ सेहो रखने छी। सभ दर्षनक पोथी सेहो अछि। शरीर निरोग रखैक दुआरे किछु समय शारीरिक श्रम करैत छी बाकी समय अध्ययन, चिन्तन-मनन मे रमल रहै छी। मास मे एक दिन, सब धार्मिक सम्प्रदायिक पंडित सभकेँ बजा, अपन-अपन सम्प्रदाय पर व्याख्यान करबैत छी। एक दिन राजनीतिक व्याख्यान, एक दिन साहित्यिक व्याख्यान मास मे करवैत छी। एहि सबहक अतिरिक्त एक दिन किसान गोष्ठी, एक दिन चिकित्सा गोष्ठी, एक दिन विज्ञान गोष्ठीक संग आइक वैष्वीकरणक दुनिया मे विज्ञान स नीक-अधला पर विचार-विमर्ष करवैत छी। समय कोना बीति जाइत अछि से बुझवे ने करै छी।’’
ब्रह्मचारी जी बजितहि रहथि कि महेन्द्र सेहो आवि गेला। उन्मत्त पागले जेँका महेन्द्रक चेहरा बुझि पड़ेत छलनि। रमाकान्तो बाहरी दुनिया स निकलि भीतरी दुनियाँक बाट पकड़ि लेलनि।
चारु गोटे ब्रह्मचारी जी केँ पाएर छुबि गोड़ लागि चलैक विचार केलनि। चारु गोटे केँ अरिआति ब्रह्मचारी जी गाड़ी मे बैसाइ अपने घुरि गेलाह। गाड़ी मे कियो ककरो सँ गप-सप नहि करै चाहति। सभ अपने-आप मे डूबि गेलाह। डेरा अवितहि रमाकान्त महेन्द्र केँ कहलखिन- ‘‘बौआ, आब हम एक्को दिन नहि अँटकब। गामक सुरता खीचि लेलक हेँ तेँ जते जल्दी भए सकै विदा कए दिअ?’’
‘बड़बढ़िया।’ आइये टिकट बनबा लइ छी। एहिठाम से दरभंगाक गाड़ी साप्ताहिक अछि तेँ अपना धड़फड़ेने त नहि ने होयत। अगर टिकटो बनि जाइत तइओ पाँच दिन रहए पड़त।’’
आठ बजे राति मे सभ कियो एकठाम बैसि अपन गामक संबंध मे गप-सप करै लगलाह। गाम मे अप्पन बीतल दिनक चर्चा करैत महेन्द्र बजलाह- ‘‘की जिनगी छल आ अखन की अछि, एहि विषय पर अखन धरि विचारैक अवसरे नहि भेटल। जहिना आकास मे चिड़ै-चुनमुनी उन्मुक्त भए उड़ैत अछि तहिना बच्चा मे छल। ने कोनो चिन्ता आ ने फीकिर। जहिना मध्यम गति स गाड़ी-सवारी चलैत अछि, तहिना छल। ने कोनो प्रतियोगिता परीक्षाक लेल चिन्ता आ नोकरीक जिज्ञासा छल। साधारण गति स आई.एस.सी. पास केलहुँ आ मेडिल कओलेज मे नाम लिखा डाॅक्टर बनलौ। डाॅक्टर बनलाक बाद नोकरी आ पाइक भूख जगै लगल। जाहि स अपन गाम, अपन इलाका छोड़ि हजारो कोस दूर आबि गेल छी। एहिठाम आबि बजारु समाज आ संस्कृति मे फँसि अपन परिवार, समाज सब छुटि गेल। जते पाइ कमा सुख-भोगक कल्पना करै छी ओते काजक बोझ बढ़ल जाइत अछि। फेरि सुख-भोगक लेल समय कहाँ समयक एत्ते अभाव रहैत अछि जे कताक दिन अखबारो नहि पढ़ि पबैत छी। अखन धरिक जे विचार जिनगी संबंध मे छल आइ बुझै छी जे भ्रमक छल। एते दिन अपने सुख टा केँ सुख बुझैत छलहुँ मुदा आव बुझि पड़ैत अछि जे अपने सुख टा सुख नहि छी। हर मनुष्य केँ जिनगी चलैक जे आवष्यक वस्तु अछि ओ पूर्ति हेवाक चाहिऐक तखने ओ चैन स जिनगी बीता सकैत अछि। मनुष्य सँ परिवार बनैत छैक आ परिवार स समाज। मनुष्यो क कर्तव्य बनैत छैक जे सबसँ पहिने ओ अपना पाएर पर ठाढ़ भए परिवार केँ ठाढ़ करए। परिवार ठाढ़ भए जायत त समाज केँ स्वतः ठाढ़ भए आगू बढ़ै लगत। ओना सुख की थिक? सबसँ पहिने एहि बातक विचार क लेवाक चाही। पंचभौतिक शरीर आ आत्माक संयोग स मनुष्य बनैत अछि। सुख-दुख, नीक-अधला आत्माक अनुभूति थिक नहि कि शरीरक। ओना दुनियाँक जते मनुक्ख अछि सभकेँ एक स्तर सँ चलैक चाहिएक मुदा से त नहि अछि! दुनिया देष मे बँटल अछि आ देषक शासन व्यवस्था आ समाज खण्ड-पखण्ड भए भिन्न-भिन्न भाषा, भिन्न-भिन्न संस्कृति आ भिन्न-भिन्न जाति मे बँटल अछि जाहि स खान-पान, रीति-रेबाज, चालि-ढालि मे भिन्नता छैक। कहै ले त हमहूँ मनुक्खेक सेवा करैत छी मुदा पाइक दुआरे हम पाइवलाक सेवा करैत छी। बिनु पाइवलाक सेवा कहाँ भए पवैत अछि। जकरा सबसँ बेसी जरुरत छैक। अभाव मे ओ खेनाई-पीनाई स ल क’ घर-दुआर, कपड़ा-लत्ता, दवाई-दारु, सब स बंचित रहि जाइत अछि। जेकर चलैत गरीब लोकक जिनगी जानवरो स बदतर बनि गेल छैक। ओ सभ मनुक्खक शक्ल मे जानवर बनि जीवैत अछि। जहि मनुष्यक जरुरत ओकरा सभकेँ छैक ओ अपने पाछु तबाह अछि।’’
डाॅक्टर महेन्द्रक बात, सभ केयो धियान सँ, सुनलनि। रमाकान्त कहलखिन- ‘‘बौआ, जइ गाम मे तोहर जन्म भेलह आ जहि माटि-पानि मे रहि डाॅक्टर बनलह, ओहि गामक लोक उचित इलाजक दुआरे मरि जाय, कते दुखक बात थिक?’’
रमाकान्तक प्रष्न सुनि सभ केयो गुम्म भए गेलाह। केयो किछु नहि बाजि पवैत रहति। सभक मुह देखैत छलाह। हजारो कोस पर गाम अछि। कोना एहिठाम से ओहिठाम इलाज भए सकैत छैक? सभक मनमे सवाल नचैत छलनि। बड़ी कालक बाद महेन्द्र मुह खोललनि- ‘‘बावू, सवाल त ऐहन भारी अछि जे जबावे नहि फुरैत अछि। मुदा एकटा उपाय मन मे अबैत अछि।’’
‘की?’
‘‘अहाँ गाम जायब त दू गोटे एकटा लड़का, एकटा लड़की जे कम्मो पढ़ल लिखल हुअए, केँ एहिठाम पठा दिअ। ओहि दुनू गोटे केँ ऐठाम राखि छह मास पढ़ा पठा देब। जे तत्काल इलाज करब शुरु कए देत। संगहि हम सभ चारि गोटे साल मे एक-एक मासक लेल जायत रहब आ जहाँ धरि भए सकत तहाँ धरि इलाज करैत रहब। तहि बीच जँ कोनो जरुरी रोग उपकि जाय त फोन से कहि सेहो बजा लेब। नहि त लहेरियासराय अछिये।
‘महेन्द्रक विचार रमाकान्त केँ जँचलनि। मुस्कुराइत कहलखिन- ‘‘बौआ, गामक लोक त गरीब अछि, ओ कोना इलाज करा सकत?’’
गरीबक नाम सुनि धाँय द रबिन्द्र उत्तर देलकनि- ‘‘बाबू, हम सभ बहुत कमाई छी। जते इलाज मे खर्च से देवई। ततबे नहि! अखन अहाँ जाउ, पहिने दू गोरे केँ पठा दिअ। अगिला मास मे आयब एकटा स्वास्थ्य केन्द्र बनायब। जहि मे सभहक इलाज हेतैक।’’
रबिन्द्रक विचार सँ सभक ठोर पर हँसी अएलनि। रमाकान्तक मन मे उठलनि- ‘‘हमरे दू सय बीघा जमीन अछि मुदा छी कैक गोटे? जँ इमनदारी सँ देखल जाय त की हमहीं चोर नहि। महाभारतो मे कहल गेल छैक जे जरुरत सँ बेसी सम्पत्ति रखने अछि ओ चोर अछि। जे पिता जी बरोवरि कहैत रहैत छलाह। ओना अनका जेँका हम बेइमानी कएकेँ खेत नहि अरजने छी मुदा ढेरिया के त रखनहि छी।
गप-सप करैत साढ़े दस बजि गेल। भानसो भए गेलैक। सभ केयो गप-सप छोड़ि खाइ ले गेलाह।
दोसर दिन स चारु गोटे विदाइक जोगार मे लगि गेलथि। कतेक गोटे स दोस्ती चारु गोटे केँ। जकरा सब केँ काज उद्यम मे इहो सभ नोत पुरने, तेँ सबकेँ जानकारी देव उचित बुझि चारु गोटे अपन-अपन अपेक्षित केँ जानकारी देमए लगलखिन। अपनो सब फुट-फुट माता-पिता क विदाई मे जुटि गेल।
एहि चारि दिनक बीच रमाकान्त टहलब-बुलब छोड़ि, दिन-राति आत्मनिष्ट भए, सोच मे डूबल रहै लगलाह। चाह पीबै बेरि चाह पीबि पान खा, भोजन बेरि भोजन कए, भरि दिन पलंग पर पड़ल-पड़ल जिनगीक संबंध मे सोचै लगलथि। अखन धरि एक्के टा दुनिया बुझै छेलिये जे आब दोसरो दुनिया देखै छियैक। एक दुनिया बाहरी, जकरा उपरका आखि स देखैत छी दोसर दुनिया शरीरक भीतर अछि। जहि दुनिया केँ अखन धरि नहि देखैत छलहुँ। बाहरी दुनिया स भीतरी दुनिया फुलवाड़ी जेँका सुन्दर अछि। जहि मे आषाक जंगल पसरल अछि।
पाँच बजे साँझ मे मद्रास स्टेषन स दरभंगाक गाड़ी खुजैत अछि। आरक्षित टिकट, मन मे बेसी हलचलो नहिये छलनि। गाड़ी पकड़ैक हलचल त ओहि यात्री केँ होयत जे साधारण बोगी मे टटका टिकट कटा सफर करैत अछि। मुदा आरक्षित बोगी मे त गनल सीट आ गनल टिकट होयत अछि। बाइली यात्री केँ त चढ़ै नहि देल जायत अछि। दुइये बजे स सभ समान एटैची, कार्टून मे सैंति तैयार केलनि। रास्तक लेल, फुट सँ, एकटा झोरा मे खाइक सभ सामान सेहो दए देलकनि। दस लिटरा गैलन मे पानि। थर्मस मे चाह। पनबट्टी मे पान। एक कार्टून विदेषी शराब जे डाॅक्टर सुजाता रमाकान्त केँ आखिक इषारा स कहि देने रहनि।
चारि बजे, परोठा-भुजिया खाय तीनू गोटे(रमाकान्त, श्यामा आ जुगेसर) नव वस्त्र पहीरि तैयार भए गेलाह। स्टेषनो लगे तेँ विदा हेबाक हड़बड़ियो नहिये। मुदा सामान बेसी तेँ गाड़ी खुजै सँ पहिनहि स्टेषन पहुँचब जरुरी छनि। ओना गाड़ी मद्रासे सँ बनि केँ चलैत तेँ सामानो रखै मे परेषानियो नहिये रहनि। सबा चारि बजे सभ डेरा स विदा भए गाड़ी पकड़ै चललाह।
मौलाइल गाछक फुल:ः 6
छुट्टी दिन रहितहुँ हीरानन्द गाम नहि गेलाह। ओना लग मे गाम रहने शनि के गाम सोम के स्कूल स पहिने चलि अवैत छलाह। मुदा रमाकान्त केँ नहि रहने परिवारक सब भार देने गेल रहथिन। गोसाइक धाही दइते ओ नहा, चाह पीबि वौएलाल ऐठाम चललाह। मने-मन यैह होइन जे रमाकान्त कहने रहथि जे मद्रास जाइ छी, धिया-पूता केँ देखि-सुनि लगले घुमि जायब। मुदा आइ पनरहम दिन भ’ रहल छनि अखन धरि किऐक ने अएलाह। ओना दुरसो छैक आ परिवारोक सभ त ओतइ छनि ते जँ बिलंबो भेलनि त स्वभाविके छैक। रास्ता मे जे धिया-पूता देखनि हाथ जोड़ि-जोड़ि प्रणाम करनि। हीरोनन्द सभकेँ असिरवाद दइत आगू बढै़त जाइत रहति। वौएलालक घर स थोड़े पाछुए रहथि कि वौएलाल देखलकनि। देखितहि आगू बढ़ि, प्रणाम क’, संगे-संग अपना ऐठाम ल’ गेलनि। हीरानन्द केँ पाबि वौएलाल बहुत किछु सिखवो केलक आ सुधरबो कएल। अपन एकचारी बैसार मे बैसवैत पानि अनै आंगन गेल। आंगन स लोटा मे पानि नेने आबि पाएर धोय ले कहलकनि। लोटा मे पानि देखि हीरानन्दक मन मे मिथिलाक वेबहार नाचि उठलनि। सोचै लगलथि जे पूर्वज कते विचारवान छलाह जे एते चलौलनि। पाएर धोय हीरानन्द चैकी पर बैसिलाह। वौएलाल चाह बनबै आंगन गेल। माए केँ चाह बनवै नहि होइत छलैक। तहि बीच अनुपो बाड़िये मे खुरपी छोड़ि, मटिआयले हाथे आबि मास्टर साहब केँ प्रणाम कए चैकीक निच्चा मे एकचारीक खुँटा लगा बैसल। मटिआयल हाथ देखि मास्टर साहेव पूछलखिन- ‘‘कोन काज करै छलौ?’’
मटिआयल हाथ रहितहुँ अनुप केँ संकोच नहि होइत छलैक। निःसंकोच भ’ उत्तर देलकनि- ‘‘बाड़ी मे गेनहारी साग बौग केने छी, ओइ मे तते मोथा जनमि गेल अछि जे साग क’ झाँपि देने अछि, ओकरे कमठौन करै छलौ।’’
सागक कमठौन सुनि हीरानन्द कहलखिन- ‘‘चलू, जाबे वौएलाल अबै अए ताबे कनी हमहूँ देखि लिअए।’’
कहि उठि विदा भेला। मास्टर सहेव क’ ठाढ़ होइत देखि अनुपो ठाढ़ भ आगू-आगू विदा भेल। धुर दुइऐक मे साग बाओग छलैक। साग देखि हीरानन्द कहलखिन- ‘‘जिनगी मे आइये हम ऐहन गेनहारी देखलौ। ई त अद्भुत अछि। किऐक त एक रंग पत्ता वला गेनहारी त अपनो उपजबै छी मुदा ई त फूल जेँका लगै अए। अधा पात लाल आ अधा पात हरियर छैक। कत्ते स इ बीआ अनलौ?’’
मास्टर साहेवक जिज्ञासा देखि अनुप कहै लगलनि- ‘‘हम सढ़ूआड़य नोत पुरै गेल रही। ओतए देखलियै। देखि क’ मन हलसि गेल। ओतै से अनलौ। करीब दस बर्ख सँ सब साल करै छी। खाइत-खाइत जखन डाँट जुआ जाइ छै तखन छोड़ि दैत छियै। ओहि मे तत्ते बीआ भ’ जाइ अए जे अपनो बौग करै छी आ जे मंगलक तेकरो दइ छियै।’’
‘अइवेर हमरो थोड़े देब।’’
‘बड़वढ़िया।’
दुनू गोटे घुरि क’ आबि पुनः एकचारी मे बैसलाह। तहि बीच वौएलालो चाह बनौने आयल। दुनू गोटे केँ चाह दए आंगन जा अपनो लेलक आ माइयो केँ देलक। चाह पीबि, माय(रधिया) घोघ तनने दुआर पर आबि मास्टर सहेव केँ गोड़ लगलकनि। सूखल शरीर, केष पाकल आखि धसल रधियाक। रधियाक देह देखि मास्टर सहेबक मन तरे तर बाजि उठलनि- ‘‘हाय, हाय रे गरीबी आगियो स तेज धधड़ा गरीबिक होइत छैक। पेंइतिस-चालिस बर्खक शरीरक इ दषा बना दैत छैक।
मुस्की दैत एकटा आँखि उघारि रधिया बाजलि- ‘‘आइ हमर भाग जगि गेल जे मास्टर-सहाएव ऐलाह। बिनु खेने-पीने नइ जाय देबनि। जे कन-सागक उपाय आछि से बिनु खुऔने नइ जाय देवनि।’’
रधियाक स्नेह भरल शब्द सुनि हीरानन्दक आखि सिमसि गेलनि। दुनू तरहथी स दुनू आखि पोछैत बजलाह- ‘‘ओना त घुमैक विचार स आयल छलहुँ, मुदा अहाँ सभक स्नेह बिना खेने जाइ नहि दिअए चाहैत अछि। जरुर खायब।’’
घर मे सुपारी नहि रहने वौएलाल सुपारी आनै दोकान गेल। तहि बीच मास्टर साहेव अनुप के पूछलखिन- ‘‘अहाँक पूर्वज(पुरुखा) कते दिन स एहि गाम मे रहैत आयल छथि?’’
हीरानन्दक प्रष्न सुनि अनुप छगुन्ता मे पड़ि गेल। मने-मन सोचै लगल जे ऐहन बात त आइ घरि क्यो ने पूछने छलाह। मास्टर साहेव किऐक पुछलनि। मुदा मास्टर-साहेबक उपकार अनुपक हृदय मे एहि रुपे बैसल छलनि जे आत्माक दोसर रुप बुझैत छला। हुनके पाबि बेटा दू आखर पढ़बो केलक आ मनुक्खोक रस्ता सिखै अए। हँसैत अनुप कहै लगलनि- ‘‘मास्टर सहाएब, हमरा बौ के अपना घरारियो ने रहै। अनके जमीन मे घरो बन्हने रहै आ अनके हरो-फाड़ जोतए। अनके खेत मे रोपैन-कमठौन सेहो करै। हम धानोक सीस आ रब्बी मास मे खेसारियो-मौसरी लोढ़ी। अनके गाइयो पोसिया नेने रहै। साल मे जते पावनि-तिहार होय आ अनदिनो जे करजा बरजा लिअए ओ ओही गाइयक दूधो बेचि क’ आ लेरु जे होय, ओहो बेचि के करजा सठाबै। एक दिन वाउक मन खराप रहै। गिरहत आबि के भार बेटी ऐठाम दए अबै ले कहलकै। बाउक मन वेसी खराब रहै तेँ जाइ से नासकार गेल। तइ पर ओ बेटाकेँ सोर पड़लकै। बेटा एलै। दुनू बापूत। हमरा बाउ के गरिऐबो केलकै आ अंगनाक टाट-फड़क उजाड़ि के कहलकै जे हमर घरारी छोड़ि दे। हमर बौ कतेक गोरे के कहबो केलकै मुदा सब ओकरे दिस भ’ गेलै। तखन हमर बाउ की करैत ते माटिक तौला-कराही छोड़ि, थारी-लोटा, नुआ-बिस्तर, हाँसु-खुरपीक मोटरी बान्हि तीनू गोरे(बाउ, माए आ हम) ओइ गाम से भागि गोलौ। गाम से निकलि, बाघ मे एकटा आमक गाछ, रस्ते पर रहै, ओइठिन आबि के बैसलौ। बाउ के बुकौर लगै। दुनू आखि से दहो-बहो लोर खसै। माइयो कानए। थोड़े खान ओइठिन बैसलौ। तखन फेरि विदा भेलौ।’’
बजैत-बजैत अनुपक दुनू आखि मे नोर आवि गेलइ। अनुपक नोर देखि हीरोनन्दक आखि मे नोर आबि गेलनि। रुमाल से नोर पोछि पुनः पूछलखिन- ‘‘तब की भेल?’’
अनुपक हाथ मटिआयल रहै तेँ हाथ से नोर नहि पोछि गट्टा स नोर पोछि पुनः बाजै लगल- ‘‘ई मात्रिक छी। नाना जीबिते रहए। हुनका एक्के टा बेटी रहनि। हमरे माए टा। जखन तीनू गोरे ऐठाम एलो ते ननो आ नानियो अंगने मे रहए। नानी आ माए, दुनू बाँहि से दुनू गरदनि मे जोड़ि कानै लगल। बाउओ कनै लगल। नाना हमरा कोरा मे उठा नोर पोछैत अंगना से निकलि, डेढ़िया पर बुलबै लगल। थोड़े खान नानी कानि, मोटरी के घर मे राखि हाँइ-हाँइ चुल्हि पजारै लागलि। मुदा माए कनिते रहल।’’
बिचहि मे हीरानन्द पूछलखिन- ‘‘नाना गुजर कोना करैत छलाह?’’
‘अहाँ से लाथ कोन मासटर सैब। महिना मे आठ-दष साँझ भानसो ने होय। हम बच्चा रही तेँ नानी बाटी मे बसिया भात-रोटी राखि दिअए। सैह खाय छलौ।’’
अनुपक बात सुनि हीरानन्दक हृदय पघिलय लगलनि। अनुप केँ कहलखिन- ‘‘जाऊ, काजो देखिऔ। वौएलाल त आबिये गेल।’’
मास्टर साहेबक आदेष स अनुप फेरो साग कमाई ले चलि गेल। वौएलाल आ हीरानन्द, रमाकान्तक चर्चा करै लगलाह। वोएलाल बाजल- ‘‘करीब पनरह दिनक धक लगि गेल हएत, अखन धरि बाबा किऐक नहि अएलाह। बाजि क’ गेल रहथि जे आठ दिनक भीतरे चलि आयब। किछु भ’ नेते गेलनि।’’
हीरानन्द- ‘‘अखन धरि कोनो खबड़ियो नहि पठौलनि जे बुझितिअए।’’
दुनू गोटे उठि क’ बाड़ी दिषि टहलै विदा भेला। अनरनेवाक गाछ देखि हीरानन्द हिया-हिया क’ देखै लगलाह। पहिलखेपक फड़, तेँ नमहर-नमहर रहैक। गोर-दसेक फड़ नमहर आ जेना-जेना फड़ उपर होइत जायत तेना-तेना छोटो खिच्चो। पान-सात टा फड़ छिटकल। जहि मे एकटा क’ लाली पकड़ि नेने रहए। हीरानन्द बौएलाल केँ ओंगरी से देखवैत- ‘‘वौएलाल, ओ फड़ तोड़ि लाय। खूब त पाकल नहि अछि मुदा खाइ जोकर भ’ गेल आछि। हम सभ त दँतगर छी की ने।’’
गाछ बेसी नमहर नहि। हाथे से बौएलाल ओहि फड़ क’ तोड़ि, डंटी स’ बहैत दूध क’ माटि पर रगड़ि देलक। दुनू गोटे घुरि क’ आवि गेलाह। हीरानन्द चैकी पर वैसलथि आ वौएलाल अनरनेबा रखि आंगन गेल। आंगन स’ कत्ता आ एकटा छिपली नेने आयल। कत्ता से अनरनेबा क’ सोहि टुकड़ी-टुकड़ी कटलक। छिपली भरि गेल। भरलो छिपली बौएलाल हीरानन्दक आगू मे देलकनि। भरल छिपली देखि हीरानन्द बजलाह- ‘‘एत्ते, हमरे बुते खायल हएत। पान-सात टा खंडी खायब। बाकी आंगन ल’ जाह।’’
वौएलाल सैह केलक। अनरनेवा खा पानि पीबि हीराननद वौएलाल केँ कहलखिन- ‘‘चलू, थोड़े टहलि आबी?’’
दुनू गोटे रस्ते-रस्ते टहलै लगलथि।
जाधरि दुनू गोटे टहलि-बूलि केँ अयलाह ताधरि रधिया अरबा चाउरक भात माछक तीमन आ माछक तरुआ बनौलनि। भानस कए रधिया चिक्कनि माटि स ओसार नीपि, हाथ धोए कम्मल चैपेत क’ बिछौलक। थारी-बाटी, लोटा आ गिलास क’ छाउर स माँजि धोलक। लोटा-गिलास मे पनि भरि कम्मलक आगू मे रखि वौएलालकेँ बजौने आबै ले कहलक। आंगन आबि हीरानन्द कम्मल पर बैसि मने-मन सौचे लगलाह। भोजन से त पेट भरैत अछि मुदा मन त सिनेहे स भरैत अछि, जे भेटि रहल अछि। तहि बीच वौएलाल घर स थारी निकालि आगू मे देलकनि। गम-गम करैत भात तहि पर माछक नमहर-नमहर तड़ल कुटिया। जम्बीरी नेबोक खंड। बाटी मे तीमन। भोजन देखि, मुस्की दइत हीरानन्द रधिया केँ कहलखिन- ‘‘अलबत्त ढंग स भोजनक व्यवस्था केने छी। देखिये क’ पेट भरि गेल।’’
मास्टर साहेबक बात सुनि खुषी स रधिया क’ नहि रहल गेलै, बाजलि- ‘‘माहटर बाबू, अहाँ पैघ छी। देबता छी। हमर भाग जे हमरा सन गरीब लोकक ऐठाम भात खाई छी।’’
रधियाक बात सुनि बुझि गेलखिन जे भात क’ अषुद्ध बुझि कहलनि। मुदा ओहि विचार क’ झपैत कहलखिन- ‘‘वौएलाक केँ छोट भाइ बुझै छियै, आ परिवार केँ अपन परिवार बुझैत छी। तखन भात रोटी खाइ मे कोन संकोच।’’
हीरानन्दक विचार सुनि रधियाक हृदय साओनक मेघ जेँका उमड़ि पड़लनि। मन मे हुअए लगलनि जे अपन जिनगीक सभ बात कहि सुनबिअनि। उत्साहित भ’ बजै लगलीह- ‘‘माहटर बाबू, एहनो दुख कटने छी जे एक दिन ममिओत भाय आयल रहै। घर मे एक्को तम्मा चाउर नइ रहै। चिन्ता भ’ गेल जे भाइ केँ खाइ ले की देबैक। तीनि-चारि अंगना चाउर पैइच ले गेबो केलो मुदा सबहक हालति खराबे रहै। अपने ने रहैक ते हमरा की दइत। हारि के मड़ुआ रोटी आ सीम-भाँटाक तीमन रान्हि क’ भाइयो केँ खाइ ले देलिऐ आ अपनो सब खेलौ। मुदा अखन ते, रमाकान्त कक्का परसादे, सब कुछ अछि।’’
थारी मे बाटी स झोर ढारैत हीरानन्द पूछल- ‘‘पहिलुका आ अखुनका मे कते फर्क बुझि पड़ै अए?’’
‘माहटर बाबू, अहाँ स’ लाथ कोन! ओइ हिसाबे अखन राजा भ’ गेलौ। पहिने कल्लर छलौ। हरदम पेटेक चिन्ता धेने रहै छलै।’’
मुहक भात आ माछ चिबबैत रहति कि दाँतक गह मे एकटा, काँट गड़ि गेलनि। भात घोटि आंगुर स काँट निकालि, थारीक बगल मे रखि हीरानन्द पूछलखिन- ‘‘पहिने जत्ते खटै छलौ तइ स अखन बेसी खटै छी आ कि कम?’’
‘पहिने बेसी खटै छलौ। बोइन क क’ आबी तखन अंगनाक काज मे लगि जाय। अंगनाक ाकज सम्हारि भानस करी। भानस करैत-करैत बेर झुकि जाय। तखन खाइ।’’
ओसार पर बैसल अनुप रधिया केँ चोहटैत बाजल- ‘‘मास्टर सहाएव केँ भोजन करै देबहुन आ कि नहि?’’
अनुपक बात सुनि हीरानन्द बजलाह- ‘‘अहाँ तमसाई किऐक छिअनि। भोजनो करै छी आ गप्पो सुनै छी। जे बात काकी कहै छथि ओ बड़्ड़ नीक लगै अए।’’
मास्टर साहेवक समर्थन पाबि रधियाक मन मे आरो उत्साह जगि गेलैक। होइ जे जते बात पेट मे अछि, सब बात मास्टर साहेब केे सुना दिअनि। बाजलि- ‘‘माहटर बाबू बरख मे अधा से बेसी दिन सागेक तीमन खाइ छलौ। माघ-फागुन मे, जखन खेसारी, मसुरी उखाड़ै आ बोइन जे हुअए, दस-पाँच दिन दालि खाय। नइ ते बाड़ी-झाड़ी मे जे तीमन-तरकारी हुअए, से खाय। बेसी काल सागे खाइ। खेसारी मास मे महीना दिन दुनू साँझ चाहे खेसारी साग खाय नइ ते बथुआ।’’
खेसारी सागक नाम सुनि हीरानन्द पूछल- ‘‘खेसारी साग कोना बनवैत छी?’’
मास्टर साहेबक प्रष्न सुनि अनुपो केँ पैछला बात मन पड़ितहि खुषी एलैक। मुस्की दैत बाजल- ‘‘राड़िन बुते कतौ खेसारी साग रान्हल हुअए।’’
अनुपक बात केँ धोपैत हीरानन्द बजलाह- ‘‘खेसारी साग मे कँचका मिरचाई आ लसुनक फोरन द’ हमरो कनियाँ बनवैत छथि। हमरा बड़ सुन्दर खाय मे लगै अए।’’
व्यंग्यक टोन मे अनुप बाजल- ‘‘अहाँ सबहक कनियाँक पड़तर राड़िन केँ हेतइ। हमही छी जे ऐहेन लोकक गुजर चलै छै। नइ त......?’’
व्यंग्यक भाव बुझि हीरानन्द चुप्पे रहलाह। मुदा फनकि क’ रधिया एक लाड़नि चलबैत बाजलि- ‘‘नै ते, सासुर मे वास नइ होइते?’’
अनुप- ‘‘मन पाड़ू जे जइ दिन अइठिम आयल रही तइ दिन कोन-कोन लुरि रहै। जँ सासु नहि सिखवैत ते कोनो लुरियो होइत?’’
पासा बदलैत रधिया बाजलि- ‘‘माए आ सासु मे की अन्तर होइ छै। जहिना अपन माए तहिना घरवलाक माए। सिखलौ त।’’
रधिया अनुप दिषि तकैत अनुप रधिया दिस। मुदा दुनूक मन मे क्रोध नहि स्नेह रहैक। तेँ वातावरण मधुर रहैक। हीरानन्द सागक संबंध मे कहै लगलखिन- ‘‘अपना सभहक पूर्वज बहुत गरीब छलाह। अखुनका जेँका समयो नहि छल। बेसी काल ओ सभ सागे खायत छलाह।’’
जेहने भोजन बनल तेहने पवित्र बरतन छलनि। आ ताहू सँ नीक बैइसैक जगहक संग ऐतिहासिक गप-सप। जते वस्तु हीरानन्दक आगू मे आयल छलनि रसे-रसे सभ खा लेलनि। पानि नहि पीलनि, किऐक त ने गारा लगलनि आ ने बेसी कड़ू रहैक। भोजन कए बाटिये मे हाथ धोय, उठलाह। उठि क’ वौएलाल केँ कहलखिन- ‘‘एते कसि क’ आइ धरि भोजन नहि केने छलहुँ।’’
आंगन स निकलि एकचारी मे आबि सोझे पड़ि रहलाह। पड़ले-पड़ल अनुपो आ वौएलालो केँ कहलखिन- ‘‘आब अहूँ सभ भोजन करै जाउ। हमरा सुतैक मन होइ अए।’’
अस-बिस करैत हीरानन्द रहति। लगले-लगले करौट बदलैत रहति। मने-मन सोचै लगलथि जे एतबे दिन मे अनुप कते उन्नति कए गेल। उन्नतिक कारण भेलै सही ढंग से परिवार केँ बढ़ाएव। जे परिवार जते सही दिषा मे चलत ओ परिवार ओते तेजी स आगू बढ़त। मुदा जिनगीक रास्ता त बाँस जेँका सोझ नहि अछि। टेढ़-टूढ़ अछि। जहि स बौआ जायत अछि। जिनगीक रास्ता मे डेग-डेग पर तिनवट्टी-चैबट्टी अछि। जहि सँ लोक भटकि जायत अछि। तहूँ मे जकरा रास्ताक आदि-अंतक ठेकान नहि छैक ओ त आरो ओझरा जायत अछि। ऐहन-ऐहन ओझरी सभ जिनगीक रास्ता मे अछि जहि मे ओझरेला पर कियो बताह भए जाइत अछि त कियो घर-दुआरि छोड़ि चलि जायत अछि। क्षणिक सुखक खातिर स्थायी सुखक रास्ता छुटि जायत छैक। क्षुद्र सुख पैघ सुखक रास्ता स धकेलि ऐहन पहाड़ जेँका ठाढ़ भए जायत छैक जे पार करब मुष्किल भए जायत छैक। जिनगीक रास्ता एक नहि अनेक अछि मुदा पहुँचैक स्थान एक अछि। जते मनुख तते रास्ता अछि। एक मनुक्खक जिनगी दोसर स भिन्न होयत अछि। अनभुआरो आ बुझिनिहारो(अज्ञानियो आ ज्ञानियो) लगले(जिनगीक शुरुहे मे) नहि बुझि पबैत छथि। जे कोन रास्ता पकड़ला स सही जगह पर पहुँचब आ नहि पकड़ने छुटि जायब। मनुक्खक उद्धारक बात त सब सम्प्रदाय, किस्सा-पिहानी सब कहैत अछि, मुदा रास्ता मे घुच्ची कते छैक जहिठाम जा लोक खसैत अछि, से बुझिये ने अबैत छैक! मुदा इहो त सत्य छैक जे निस्सकलंक जिनगी बना ढेरो लोक ओहि स्थान पर पहुँच चुकल छथि आ ढेरो जा रहल छथि। जे जरुर पहुँचताह। भले ही हुनका भरि पेट अन्न आ भरि देह वस्त्र नहि भेटैत होनि। सुखल गाछ रुपी समाज केँ जाधरि गंगाजल सन पवित्र पानि स नहि पटाओल जायत ताधरि ओहि मे कोना कलष आ फूल फुलायत। अगर जँ समय पाबि कलषवो करत त किछुऐ दिन मे मोला जायत। दुखो थोड़ दिनक नहि, जड़िआयल रहैत अछि। अनेको महान् व्यक्ति, एहि दषिा केँ देखबैक रास्ता अदम्य साहस आ शक्ति लगा केलनि मुदा जड़ि सँ दुख कहाँ मेटाएल? हमहूँ-अहाँ एहि मातृभूमिक सन्तान छी, तेँ हमरो अहाँक दायित्व बनैत अछि जे मायक सेबा करी। छठिआरे राति समाजक माय-बहीनि कोरा मे लए छाती लगौलनि, मुदा ओकरा बिसरि कोना जाइ छी? की सभ बिराने छथि। अपन क्यो नहि?’’
बेर खसैत हीरानन्द चलैक विचार करै लगलाह। बौएलाल चाह पीबैक आग्रह केलकनि। मुदा भरिआयल पेट बुझि हीरानन्द चाहक इनकार करैत कहलखिन- ‘‘खाइ बेरि मे पानि नहि पीने छलहुँ, एक लोटा पानि पिआबह।’’
आंगन से लोटा मे पानि आनि वौएलाल देलकनि। लोटो भरि पानि पीबि हीरानन्द बाजलाह- ‘‘बुझि पड़ै अए जे अखने खा क’ उठलौ हेँ। चाह नहि पीवह, सिर्फ एक जूम तमाकू खुआ दाय।’’
अनुप तमाकुल चुनबै लगल। तहि बीच हीरानन्द बौएलाल केँ कहलखिन- ‘‘तू ते आब धुरझार किताब पढ़ै लगलह। आब तोहूँ पड़ोसिक बच्चा सभकेँ, जखन समय खाली भेटह, पढ़ावह। एहि सँ इ हेतह जे कखनो बेकारी सेहो नहि बुझि पड़तह आ थोड़-थाड़ बच्चो सभ पढ़ै दिस झुकत।’’
पढ़बैक नाम सुनि अनुप बाजल- ‘‘मासटर सहाएव, ककरा बच्चाकेँ वौएलाल पढ़ाओत! देखै छियै (ओंगरी स देखबैत) ओ तीन घर कुरमी छी। ओकरा से खनदानी दुष्मनी अछि। ने खेनाई-पीनाई अछि आ ने हकार-तिहार। तहिना (फेर ओंगरी से देखबैत) ओ घर मल्लाहक छी भरि दिन जाल ल’ क’ चर-चाचर से ल’ क’ पोखरि-झाखड़ि मे मछबारि करै अए। जकरा बेचि क’ गुजरो करै अए आ ताड़ी-दारु पीबि केँ औत आ झगड़ा-झाटी शुरु कए देत। तहिना ओ (ओंगरी स देखवैत) कुजरटोली छी। अछि त सबटा गरीबे, मुदा व्यवषायी अछि। स्त्रीगण सभ तरकारी बेचै छै आ पुरुख सभ पुरना लोहा-लक्करक कारोबार करै अए। जातिक नाम पर सदिखन अराड़िये करैत रहै अए। तहिना हम दस घर धानुक छी। हमही टा गरीब रहितौ बोनि करै छलौ। आब त अपनो दू बीधा खेत भ’ गेल (रमाकान्त देल) तेँ खेती करै लगलहुँ नहि त सभ खबासी करै अए। जुआन-जहान बेटी सभ केँ माथ पर चंगेरा दए आन-आन गाम पठबै अए। तेँ ओकरा सभहक एकटा पाटी छै आ हम असकरे छी। ने खेनाइ-पीनाइ अछि आ ने कोनो लेन-देन। आब अहीं कहू जे ककरा बच्चा केँ वौएलाल पढ़ाओत?’’
अनुपक बात सुनि हीरानन्द गुम्म भ’ गेलाह। मने-मन सोचै लगलथि जे समाजक विचित्र स्थिति छैक। ऐहेन समाज मे घुसब महा-मोसकिल अछि। कने काल गुम्म रहि हीरानन्द कहलखिन- ‘‘कहलहुँ त’ ठीके, मुदा ई सभ बीमारी पहिलुका समाज मे बेसी छलैक। ओना अखनो थोड़-थाड़ छइहे मुदा बदलि रहल छैक। आब लोक गाम छोड़ि शहर-बजार जा-जा कल-कारखाना मे काज करै लगल अछि। संगे गामो मे चाह-पानक दोकान खोलि-खोलि जिनगी बदलि रहल अछि। खेती-बाड़ी त मरले अछि तेँ एहि मे ने काज छेक आ ने लोक करै चाहैत अछि। करबो कोना करत? गोटे साल रौदी त गोटे साल बाढ़ि आबि, सबटा नष्ट कए दैत अछि। जहिना गरीब लोक मर-मर करैत अछि तहिना खेतोवला सभ। खेतोवला सभ केँ देखते छिऐक बेटीक विआह, बीमारी आ पढ़ौनाइ-लिखौनाइ बिना खेत बेचने नहि कए पबैत अछि। ओना सभहक जड़ि मे मुरुखपना छैक जे बिना पढ़ने-लिखने नहि मेटाएत। धिया-पूता केँ पढ़वैक इच्छा सभकेँ छैक मुदा ओ मने भरि छैक। बेवहार मे एकोपाइ नहि छैक। इहो बात छैक जे जकरा पेट मे अन्न नहि देह पर वस्त्र नहि रहतै ओ कोना पढ़त?’’
हीरानन्द आ अनुपक सभ गप, बाड़ी मे टाटक पुरना कड़ची उजाड़ैत, सुमित्रा सुनैत छलि। बारह-तेरह बरखक सुमित्रा। अनुपक घरक बगले मे ओकरो घर। तमाकुल खा हीरानन्द विदा भेलाह। हीरानन्द केँ अरिआतने पाछू-पाछू वौएलालो बढ़ैत छल। थोड़े दूर आगू बढ़ला पर हीरानन्द केँ छोड़ि वौएलाल घुमि गेल।
जाबे वौएलाल घुमि क’ घर पर आयल ताबे सुमित्रो जरनाक कड़ची आंगन मे रखि वौएलाल लग आइलि। ओना परिवारक झगड़ा स धिया-पूता केँ कोन मतलब। धिया-पूताक दुनियाँ अलग-होइत अछि। सुमित्रा वौएलाल केँ कहलक- ‘‘हमरा पढ़ा दे।’’
वौएलाल किछु कहै सँ पहिने मन-मन सोचै लगल जे हमर बावू आ सुमित्राक बाबूक(राम परसाद) बीच कते दिन स झगड़ा अछि, दुनूक बीच कताक दिन गरि-गरौबलि होइत देखै छी, तखन कोना पढ़ा देवई। मुदा हीरानन्दक विचार मन रहए तेँ गुनधुन कर लगल। कनी काल गुनधुन करैत सुमित्रा केँ कहलक- ‘‘पहिने ई माए स पूछि आ।’’
सुमित्रा दौड़ि क’ आंगन जा माए केँ पूछलक- ‘‘माए, हम पढ़व।’’
माए- ‘‘कते पढ़मे?’’
‘‘बोएलाल लग।’’
वौएलालक नाम सुनि माए मने-मन बिचारै लगली जे हमरा से ते कम्मो-सम्म, मुदा ओकरा(पति) से त वौएलालक बाप केँ झगड़ा छै। कने काल गुनधुुन कए माए कहलकै- ‘‘जँ वौएलाल पढ़ा देतौ(देतहु) त पढ़।’’
खानदानी घरक बेटी सुमित्राक माए। आन-आन घरक बेटियो आ पुतोहूओ चंगेरा उघैत अछि मुदा सुमित्राक माए कतौ नहि जाइत। अपने राम परसाद भार उघैत अछि। मुदा स्त्री नहि। जहिना कहियो अनुप आ रामपरसादक बीच एहि सवाल(भार उघैक) पर झगड़ा होयत त सुमित्रा मायक विचार अनुप दसि रहैत छल। मुदा मरदक झगड़ा मे कोना विरोध करैत। तेँ चुपचाप आंगन मे बैसि मने-मन अपने पति केँ गरिअवैत छलि जे कोन कुल-खनदान मे चलि एलौ।
घुमि क’ सुमित्रा आबि वौएलाल केँ कहलकै- ‘‘माइयो कहलक।’’
‘ठीक छै। मुदा पढ़मे कखन के। भरि दिन हमहू काजे उद्यम मे लगल रहै छी आ साझू पहर के अपने पढ़ै ले जाइ छी।’’
दुनू गोटे गर लगबैत तय केलक जे भोर मे(काजक बेर स पहिने) पढ़ब।
मौलाइल गाछक फुल:ः 7
तीन बजे भोर मे हीरानन्दक निन्न टुटिलनि। निन्न टुटितहि बाहर निकललथि ते झल-अन्हार देखि पुनः ओछाइन पर आवि गेलाह। अनुपक बात हीरानन्दक मन केँ झकझोड़ैत छलनि। जे समाज मे एहि रुपे कटुता, विषमता पसरि गेल अछि जे घर-घर, जाति-जाति, टोल-टोल मे भैंसा-भैंसीक कनारि पकड़ि नेने अछि। एहना स्थिति मे, कोना समाज आगू बढ़त? समाज केँ आगू बढ़ैक लेल एक-दोसरक बीच आत्मीय प्रेम हेबाक चाहिऐक। से कोना होयत? एहि प्रष्न केँ जते सोझरबै चाहै छलाह तते ओझराइत छल। विचित्र स्थिति मे पड़ल हीरानन्द। अपने मन मे प्रष्न उठा, तर्क-वितर्क करति आ अंत होइत-होइत प्रष्न पुनः ओझरा क’ रहि जायत। विबेक काजे नहि करैत छलनि। तहि बीच भाग चिड़ैक चहचहेनाइ सुनलनि। चिड़ैक चहचहेनाइ सुनि फेरि कोठरी स निकलि पूब दिस तकलनि। मेघ ललिआयल बुझि पड़लनि। घड़ी पर नजरि देलनि त पाँच बजैत छलैक। पुनः कोठरी आवि लोटा लए मैदान दिषि विदा भेलाह। मुदा मनकेँ ऐहेन गछाड़ि केँ सवाल पकड़ने रहनि जे चलैक सुधिये नहि रहलनि। जायत-जायत बहुत दूर चलि गेलाह। खुला मैदान देखि, लोटा राखि टहलवो करैत आ प्रष्नो सोझरबैक कोषिष करैत रहति। मुदा तइयो निष्कर्ष पर नहि पहुँच सकलाह। पुनः घुरि कए घर पर आबि, दतमनि कए मुह हाथ धोय, चाह बनवै लगलाह। ओना चाहक सब समान चुल्हिऐक उपर चक्का पर राखल रहैत अछि। सिर्फ केतली पखारब, गिलास धोअब आ ठहुरी जारन डेढ़िया पर स आनै पड़लनि। सब कुछ सरिया हीरानन्द चाह बनवै वैसिहाल मुदा मन बौआइत छलनि। असथिरे नहि होयत छलनि। असकरे चाह पीनिहार मुदा भरि केतली पानि दए चुल्हि पर चढ़ा देलनि। जखन चाह खोलए लगलनि तखन मन मे एलनि जे अनेेरे एते। चाह किअए बनवै छी। फेरि केतली चुल्हि पर स उताड़ि दू गिलास दूध मिलाओल पानि कात(बगल) मे राखल गिलास मे रखि, बाकी दूध मिलाओल पानि दू गिलास केतली मे दए देलनि।
मन बौआइते छलनि। आँच लगबैत गेला मुदा चाह पत्ती केतली मे देवे नहि केलनि। आगिक ताव पर दुनू गिलास पानि जरि गेला पर मन पड़लनि जे चाह पत्ती केतली मे देबे ने केलिऐक। हाँइ-हाँइ क’ डिब्वा मे से हाथ पर चाह पत्ती लय केतलीक झप्पा उठौलनि कि नजरि केतली क भीतर गेलनि त पानिये नहि छलैक। सबटा पानि जरि गेल छलैक। तरहत्थी परक चाह पत्ती डिब्बा मे रखि पुनः केतली मे पानि देलनि। चाह बनल। भिनसुरका समय दू गिलास पीलनि। एक त ओहिना मन समाजक समस्या मे ओझड़ालय छलनि तहि पर सँ चाह आरो ओझरी लगा देलकनि।
चाह पीबि दरबज्जा पर बैसि बिचारै लगलाह। मुदा चाहक गर्मी पावि मन आरो बेसी बौआइ लगलनि। जहिना ककरो कोनो वस्तु हरा जायत छैक आ ओ खोजए लगैत अछि तहिना हीरानन्द समाजक ओहि समस्याक समाघान खोजै लगलाह जे समस्या समाज केँ टुकडा़-टुकड़ा कए देने अछि। दोसर कियो नहि छलनि। जनिका सँ तर्क-वितर्क करितथि। असकरे ओझराएल रहथि। अपने मन मे सवालो उठनि जबाबो खोजथि। अध्ययनो बहुत अधिक नहिये। छलनि। सिर्फ मैट्रिके पास छलाह। मुदा तइओ समस्याक समाधान तकितहि(खोजितहि) रहलाह, छोड़लनि नहि। जहिना पथिक केँ, बिनु देखलो पथ, हराइत-भोथिआइत भेटिये जायत छैक तहिना हीरानन्दो केँ भेटलनि। अनायास मन मे मिथिलाक चिन्तनधारा आ मिथिला समाजक बुनाबटिक ढाँचा पर गेलनि। दुनू(चिन्तनोधारा आ सामाजिक ढँचो) पर नजरि पड़ितहि मन मे एकटा नव ज्योतिक उदय भेलनि। बिजलोका इजोत जेँका मन मे चमकलनि। विछान सँ उठि ओसारे पर टहलै लगलथि। अनायास मुह स’ निकललनि- ‘‘वाह रे मिथिलाक चिन्तक! दुनियाँक गुरु। जे ज्ञान, हजारो बर्ख पहिनहि मिथिलाक धरती पर आबि गेल छल। ओइह ज्ञान उन्नैसम शताब्दी मे माक्र्स कठिन संधर्ष कए केँ अनलनि। जहि स दुनियाँक चिन्तनधारा बदलल। मुदा मिथिलाक दुर्भाग्य भेलैइ जे समाजक नियामक धूर्तइ केलक। जे चिन्तक, मनुष्य केँ एक रुप (सभ मनुक्ख मनुक्ख छी) मे देखलनि, ओहि रुप केँ, नियामक(षासन कर्ता) टुकड़ी-टुकड़ी कए काटि देलनि। आइ जरुरत अछि ओहि सभ टुकड़ी केँ जोड़ि कए एक रुप बनवैक। जे नान्हि टा समस्या नहि अछि। ततबे नहि! अखनो टुकड़ी बनौनिहारक कमी नहि अछि। जहन कि भेलि टुकड़ी केँ स्वयं ओ चेतना नहि छैक। जे टुकड़ी भेल कात मे पड़ल छी आ कौआ-कुकुड़ खायत अछि।
ई ऐहन विचार हीरानन्दकेँ उपकितहि मन असथिर भेलनि। मन मे नव स्फूर्ति, नव चेतना आ नव उत्साह जगलनि। नव ढंग(नजरि) सँ सभ वस्तु केँ देखै लगलथि। तहि बीच शषिषेखर सेहो टहलि-बूलि क’ अयलाह।
हीरानन्द पर नजरि पड़ितहि शषिषेखर केँ बुझि पड़लनि जे जना क्यो नहा क’ पोखरि स उपर भेल होअए, तहिना। मुदा हीरानन्दक मन विचार मे डूबले रहलनि। मने-मन सोचैत जे जहिना पटुआ सोन वा सनईक सोन वा रुइक रेषा महीन होइत, मुदा कारीगर ओहि रेषा केँ टेरुआ वा टौकरीक सहारा स समेटि क सूत वा सुतरी बना, कपड़ा वा बोरा वा मोटगर रस्सा बनवैत अछि। तहिना समाजोक टुटल(खंडित) मनुक्ख केँ जोड़ि समाज बनवै पड़त। तखने नव समाजक निर्माण होयत। जे अद्दी-गुद्दी काज नहि कठिन काज छी। कठिन काजक लेल कठिन मेहनतक जरुरत पड़ैत अछि। सिर्फ कठिन मेहनते कयला टा स सभ कठिन काज नहि भए सकैत अछि। कठिन मेहनतक संग, सही समझ आ सही रास्ताक बोध सेहो जरुरी अछि। तेँ कठिन मेहनत, गंभीर चिन्तन आ आगू बढ़ैक(काज करैक) अदम्य साहस सेहो सभमे हेबाक चाहिऐक। एहिक संग मजबूत संकल्प सेहो होयब जरुरी अछि। विचारक संग-संग हीरानन्दक मन मे कठिन कार्यक संकल्प सेहो अपन जगह बनबै लगलनि। भिनसुरका समय तेँ लाल सूर्य मे ठंढ़ापन सेहो देखए लगलथि। एक टक स सूर्य दिषि देखैत अपन विचार केँ संकल्प लग ल’ जाय दुनू केँ हाथ पकड़ि दोस्ती करौलनि। दुनूक बीच दोस्ती होइतहि मनक नव उत्साह शरीर मे तेजी अनै लगलनि।
दरबज्जाक आगुऐ देने उत्तरे-दछिने रास्ता। हीरानन्द शषिषेखर केँ कहलखिन- ‘‘चलू, कने बुलिये-टहलि लेब आ एकटा गप्पो कए लेब।’’
दुनू गोटे दरवज्जा पर स उठि आगू बढ़लाह कि, उत्तर से दछिन मुहे, तीन टा ढेरबा बच्चा केँ जायत देखलनि। तीनूक देह कारी खटखट। केष उड़िआयत। डोरीवला फाटल-कारी झामर पेन्ट तीनू पहिरने रहए। देह मे ककरो कोनो दोसर वस्त्र नहि। तीनूक हाथ मे पुरना साड़ीक टुकड़ा क’ चारु कोण बान्हल झोरा। तीनू गप-सप करैत उत्तर से दछिन मुहे जायत रहए। तीनू केँ एक टक स हीरानन्द देखि, तीनूक गप-सप सुनैक लेल कान पाथि देलनि। मुस्की दैत बेङबा बाजल- ‘‘रौतुका बसिया रोटी आ डोका तीमन तते ने खेलियौ जे चललो ने होइ अए। पेट ढब-ढ़ब करै अए। (दहिना हाथ दबैत) हे सुंगही हमर हाथ केहेन गमकै छै। जना बुझि पड़तौ जे कटुक-मसल्ला लागल छै। (हाथ समेटि) तू की खेलै गइ(गै) रोगही?’’
सिरसिरायल रोगही बाजलि- ‘‘हमरा माए कहलक जे जो डोका बीछि के ला गे। ताबे हमहू मड़ूआ उला, पीसि के रोटी पका क’ रखबौ। डोका चटनी(साना) आ रोटी खइहें।’’
रोगहीक बात सुनि बेङबा कबूतरीकेँ पूछलक- ‘‘तू गै कबूतरी?’’
‘काइल(काल्हि) जे माए डोका बेचै गेल रहै, ओम्हरे से मुरही कीनने आयल। सैह खेलौ।’’
कबूतरी बात सुनि बेङबा पनचैती केलक जे तोहर जतरा सबसे नीक छौ। आइ तोरा सबसे बेसी डोका हेतौ। सबसे बेसी तोरा तइ से कम हमरा आ सबसे कम रोगही के हेतइ।’’
बेङबाक पनचैतीक विरोध करैत रोगही बाजलि- ‘‘बड़ तू पंडित बनै छै। तोरे कहने हमरा कम हैत आ तोरा सब के बेसी। हमरा जेँका तोरा दुनू गोरे के डोका बिछैक लूरि छौ। घौंदिआयल डोका कते रहै छै से बुझै छीही?’’
मुह सकुचबैत बेङबा पुछलक- ‘‘कते रहै छै, से तूही कह?’’
‘किअए कहबौ। तू खेलै से हमरा बाँटि देलै।’’
बेङबा- ‘‘बाटि दितिओ, से हम अगरजानी जननिहार भगवान छी। तू कहले हेन अखनी आ बाँटि दैतियौ अंगने मे।’’
बेङबाक बात सुनि रोगही निरुत्तर भ’ गेलि। हीरानन्द आ शषिषेखर तीनूक बात, चुपचाप ठाढ़ भ’ सुनलनि। ताधरि तीनू गोटे हीरानन्दक लग पहुँचि गेल। हाथक इषारा स तीनू गोटे केँ हीरानन्द सोर पाड़ि पूछलखिन- ‘‘बौआ, तू सभ कते जाइ छह?’’
हीरानन्दक प्रष्न सुनि बेङबा धाँय दए उत्तर देलकनि- ‘‘डोका बिछै ले।’’
‘डोका बीछि क’ की करै छहक?’’
‘अपनो सब तुर खाइ छी आ माय बेचबो करै अए। बाउ कहने अछि जे डोका बेचि क’ पाइ हेतौ, तइ स अंगा-पेन्ट कीनि देबौ। घुरना विआह मे पीहीन के बरिआती जइहें।’’
बेङबाक बात सुनि हीरानन्द रोगही केँ पूछलखिन- ‘‘बच्चा तू?’’
रोगही उत्तर दैत कहलकनि- ‘‘हमहू डोके बीछै ले जाइ छी। माए कहलक जे डोका से जे पाइ हेतौ, तइ स षिवरातिक मेला मे महकौआ तेल, महकौआ साबुन, केष बन्है ले फीता आ किलीप कीनि देबौ।’’
मुस्कुराइत हीरानन्द, बातक समर्थन मे मूड़िओ डोलबैत आ मने-मन विचारबो करति जे कते आषा स गरीबोक बच्चा जीवैत अछि। शषिषेखर दिषि देखि, आखिक इषारा स कहलखिन, जे एकरा सभहक बगए देखिऔ आ आषा देखियौक। तेसर बच्चिया-कबूतरी केँ पूछलखिन- ‘‘बौआ, तू?’’
हीरानन्दक आखि मे आखि गड़ा कबूतरी कहै लगलनि- ‘‘हमरा माए कहने अछि जे डोका पाइ से सल्बार-फराक कीनि देबौ।’’
काजक समय नष्ट होइत देखि हीरानन्द तीनू केँ कहलखिन- ‘‘जाइ जाह।’’
हीरानन्द आ शषिषेखर घुरि क’ दरबज्जा पर अएलाह। ओ तीनू बच्चा गप-सप करैत आगू बढ़ल। थोड़े आगू बढ़ला पर कबूतरी बेङबा केँ पूछलक- ‘‘बेङबा, तू विआह कहिया करमे?’’
विआह सुनि बेङबाक मन मे खुषी भेलैक। ओ हॅसैत उत्तर देलक- ‘‘अखनी विआह नइ करबै। मामा गाम गेल रहियै ते भैया कहलक- ‘‘जे कनी आउर बढ़मे ते तोरा भेबन्डी(भिबन्डी) नेने जेबउ। ओतै नोकरी करबै। जखैन बहुत रुपैआ हेतै तब ईंटाक घरो बनेबइ आ बिआहो करबै।’’
विचहि मे रोगही कहलकै- ‘‘तोरा सनक ढहलेल बुते बोहू सम्हारल हेतउ?’’
बोहूक नाम सुनि बेङवाक हृदय खुषी स गदगद भए गेलैक। हँसैत कहलक- ‘‘आँई गै रोगही, तू हमरा पुरुख नइ बुझै छेँ। हम ते ओहन पुरुख छी जे एगो के, कहै जे तीन गो बहू केँ सम्हारि लेब।’’
कबुतरी- ‘‘खाइ ले बहू के की देबही?’’
बेङबा- ‘‘भेबन्डी मे जब नोकरी करबै तब बुझै छीही जे कते कमेबै। दू हजार रुपैआ एक्के महीना मे हेतइ।’’
हँसैत रोगही बिचहि मे टिपकल- ‘‘दू हजार रुपैआ गनलो हेतउ?’’
बेङबा- ‘‘बीस-बीस के गनवै। रुपैआ हेतइ ते फुलपेन्ट सियेबै, खूब चिक्कन अंगा कीनवै, घड़ी कीनवै, रेडी कीनवै, मोबाइल कीनवै, डोरी वला जुत्ता कीनबै। तब देखिऐहै जे बेङबा केहेन लगै छै।’’
कबूतरी- ‘‘तोरा नोकरी के रखतौ?’’
बेङबा- ‘‘ गामवला भैया नोकरी रखा देतइ। उ कहलक जे जेही मालिक अइठीन हम रहै छियै तेही मालिक अइठीन तोरो रखा देवउ। बड़ धनीक मालिक छै। मारिते नोकर छै। हम जे मामा गाम गेल रहियै ते भइयो गाम आइल रहै। ओ कहै जे हम मालिकक कोठी मे रहै छियै। दरमाहा छोड़ि के बाइलियो खूब कमाइ छै। मालिक के एकटा बेटी छै। उ बड़का इस्कूल(कालैज) मे पढ़ै छै। अपने स हवागाड़ी चलबै छै। सब दिन, हमर भैया ओकरा इस्कूल संगे जाइ छै। उ पढ़ै छै आ हमर भैया गाड़ी ओगरै छै। जखनी छुट्टी भ’ जाइ छै तखनी दुनू गोरे संगे अवैछै। उ मलिकाइन हमरा भैया केँ मानबो खूम करै छै। संगे-संग सिलेमा देखै ले जाइ छै। बजार घुमै ले जाइ छै। बड़का दोकान(होटल) मे दुनू गोरे खूम लड़ू खाइ अए। अन्ना ते बड़का मालिक सब नोकर के दीयाबत्ती(दिवाली) मे चिक्कनका नुआ देइ छै, हमरो भैया के दै छै। छोटकी मलिकाइन अपने दिसन से नीकहा-नीकहा फुलपेन्ट, नीकहा-नीकहा अंगा कीनि-कीनि देइ छै। रुपैयो खूम देइ छै।’’
तीनू गोटे बाध पहुँच गेल। बाध पहुँचहि तीनू गोटे तीन दिषि भए गेल। तीन दिस भए तीनू गोटे डोका बीछै लगल। उपरे सब मे डोका चराओर करै ले निकलल रहए। डोका बीछि तीनू गोटे घुरि गेल।
दरबज्जा पर आबि हीरान्द शषिषेखर केँ पूछल- ‘‘षषि, की सभ ओहि बच्चा सभ मे देखलिऐक?’’
मुह बिजकबैत शषि उत्तर देलनि- ‘‘भाय, ओहि बच्चा सभकेँ देखि छुब्द छलहुँ। ओकरा सभहक बगए देखए छलिऐक आ मनक खुषी देखै छलिऐक। जना दुनियादारी स कोनो मतलब नहि। निर्विकार। अपने-आप मे मग्न छल।’’
हीरानन्द- ‘‘कहलहुँ त ठीके, मुदा एकटा बात तर्कक छल। अपना सभहक समाज तते नमहर अछि जाहि मे भिखमंगा सँ राजा धरि बसैत अछि। एक दिस बड़का-बड़का कोठा अछि त दोसर दिस खोपड़ी। एक दिस आजुक विकसित मनुक्ख अछि त दोसर दिस आदिम युगक मनुुक्ख सेहो अछि। एते पैघ इतिहास समाज अपना पेट मे रखने अछि ने ओहि इतिहास केँ कियो पढ़निहार अछि आ ने बुझनिहार।’’
‘ठीके कहलहुँ भाय।’’
‘‘आइ धरि, हम सभ समाजक जाहि रुप केँ देखैत छी ओ उपरे-झापरे देखै छी। मुदा देखैक जरुरत अछि ओकर भीतरी ढाँचा केँ। जहिना समुद्रक उपरका पानि आ लहरि त सभ देखैत अछि, मुदा ओहिक भीतर की सभ अछि से देखनिहार कैक गोटे अछि।’’
भोर केँ वौएलाल अपनो पढ़ैत आ सुमित्रो केँ पढ़ा दइत। जाधरि टोल-पड़ोसक लोक सुति क’ उठै ताधरि वौएलाल आ सुमित्रा एक-डेढ़ घंटा पढ़ि लिअए। एक त चफलगर दोसर पढ़ैक जिज्ञासा सुमित्रा मे तेँ एक्के दिन मे अ, आ से य,र,ल,व तक सीखि गेल। कब्बीरकाने सीखि सुमित्रा बाल-पोथी आ खाँत सिखब शुरु केलक।
सुमित्रा केँ पढ़ैत देखि माय-बाप केँ खुषी होइ। ओना माइयो केँ आ बापोक मनमे शुरुहे सँ रहए जे बच्चा सभ केँ पढ़ाएब, मुदा समयक फेरि आ परिवारक विपन्नताक चलैत, मनक सभ मनोरथ मने मे गलि क’ विलीन भए गेलैक। मुदा जहिया सँ सुमित्रा पढ़ै लागलि तहिया स पुनः ओ मनोरथ अंकुरित होअए लगलैक। मनुक्खक जिनगीक गति मनुक्खक विचार आ व्यवहार केँ सेहो बदलैत अछि। अनुपक प्रति जे कटुता आ दुर्विचार रामप्रसादक मन केँ गहिया क’ धेने छलैक ओ नहुँए-नहुँए पघिलए लगलैक। रामप्रसादक स्त्री(सुमित्राक माय) अनुपक आंगन अबैत जायत छलीह। तीमन-तरकारीक लेन-देन पति सँ चोरा क’ सेहो करैत छलीह। मुदा तइयो रामप्रसादक मन मे पैछला दुष्मनी नीक-नहाँति नहि मेटाएल छलैक। जहिना सुखायल धार मे(बरसात मे) पानि अबितहि जीवित धारक रुप-रेखा पकड़ि लइत तहिना विद्याक प्रवेष स रामप्रसादोक परिवारक रुप-रेषा बदलै लगलैक। भैंसा-भैसीक दुष्मनी भाय-भैयारी मे बदलैै लगलैक।
मिरचाई, तरकारी आ चून कीनै ले अनुप हाट गेल रहए। कोसे भरि पर कछुआ हाट अछि। तहि बीच रामप्रसाद कताक बेरि अनुपक डेढ़िया पर आबि-आबि अनुपक खोज केलक। रामप्रसादक अधला विचार केँ धिक्कारि क’ भगा नीक-विचार अपन जगह बना लेलक। दोसरि साँझ मे अनुप हाट स घुरि क’ रस्ते मे अबैत छल कि रामप्रसाद फेरि तकै ले पहुँचल। अनुप पर नजरि पड़ितहि रामप्रसाद कठहँसी हँसि कहलक- ‘‘बहुत दिन जीवह भैया। बेरुए पहर से कत्ते हरा गेल छेलह?’’
रामप्रसादक बदलल चेहरा आ विचार सुनि अनुप मने-मन तारतम्य करै लगल। जे आइ सुर्ज किमहर उगलाह। जिनगी भरिक दुष्मनी एकाएक ऐना बदलि कोना गेलैक? पैछला गप अनुप केँ मन पड़लै। अखन धरि रमपसदबा संग हमरा दुष्मनी ओकर अधले (खवासी) काजक दुआरे ने छल। मुदा ताराकान्त केँ धन्यवाद दियै(दिअए) जे बेचारा मारिओ खा, जहलो जा गाम मे खबासी प्रथा मेटौलक। जाबे रमपरसदबा अधलाह काज करै छल ताबे जँ दुष्मनी छल ते ओहो नीके छल। किऐक त हमहूँ अपना डारि पर छलौ। आब जँ ओ ओहि काज केँ छोड़ि देलक ते हमरो मिलान करै मे हरज की? कालोक गति त प्रबल होइत छैक। समयो बदलि रहल अछि। एक त पहिलुका जेँका भारो-दौर लोक नहि दइत अछि, दोसर पहिने लोक कान्ह पर भार उघैत छल आब गाड़ी-सवारी मे लए जायत अछि। ततबे नहि, आब सभहक समांग परदेष सेहो खटै लगल अछि। गामक मालिको-मलिकाना केँ पहिलुका रुतबा कमले जायत छैक।
रामप्रसादक बात सुनि अनुप कहलक- ‘‘हाट जायब जरुरी छल। घर मे ने मिरचाई छल आ ने चून। जे चूनवाली चून बेचए अबै छलि ओकर सासु मरि गेलै। अईसाल एक्को दिन कटहरक आँठी देल खेरही दालि सेहो नै खेने छलौ, तेँ मन लगल छले।’’
कहि अनुप सोझे आंगन जाय ओसार पर आँठी आ मेरिचाइक मोटरी रखि, कोही मे चून रखलक। एकचारी मे बैसि रामप्रसाद तमाकुल चुनबैत। खोलिया पर रखि चूनक कोही अनुप बाहर आबि रामप्रसाद केँ कहलक- ‘‘ताबे तमाकुल लगबह कने हाथ-पाएर धोय लइ छी। एक त कच्चाी रस्ता तहू मे तते टेक्टर सब चलै छै जे भरि ठहुन के गरदा रस्ता मे भ’ गेल अछि। जहिना लोकक पएर थाल-पानि मे धँसै छै तहिना गरदो मे धसै अए।’’
कहि अनुप इनार पर जा हाथ-पाएर धोय क’ आबि, रामप्रसाद लग बैसल। अनुपकेँ तमाकुल दइत रामप्रसाद कहलकै- ‘‘भैया, दुपहरे से मन मे आयल जे तोरो बड़दक भजैती आन टोल मे छह आ हमरो अछि। दुनू गोरे ओकरा छोड़ा के अपने मे लगा लाय। जइ से दुनू गोरे के सुविधा हैत’।’’
थूक फेकि अनुप उत्तर देलकै- ‘‘ई बात त कत्ते दिन से वौएलाल कहै छलै जे जते काल बड़द अनै मे लगै छह ओते काल मे एकटा काज भ’ जेतह।’’
मूड़ी डोलबैत रामप्रसाद बाजल- ‘‘काल्हि जा क’ तोहूँ अपन भजैत केँ कहि दहक आ हमहूँ कहि देवइ। परसू से दुनू गोरे एक्के ठीन जोतब।’’
आंगन बहरनाई छोड़ि रधिया सेहो आबि क’ टाटक कात मे, ठाढ़ भ’ गेलि। किऐक त बहुतो दिनक उपरान्त दुनू गोटेक मुहा-मुही गप करैत देखलनि। बड़दक भजैतीक गप कए अनुप रामप्रसाद केँ कहलक- ‘‘अबेर भ’ गेल। अखन तोहूँ जाह हमहूँ पर-पाखाना दिस जायब।’’
जहिना सड़ल सँ सड़ल पानि मे कमल फुलेला सँ भगवान माथ पर चढ़ैक अधिकारी भए जायत अछि तहिना वौएलाक सेवा सभहक लेल होअए लगल। जहि स गाम मे बौएलाल चर्चक विषय बनि गेल। हीरानन्दक आसरा पाबि वौएलाल रामायण, महाभारत, कहानी कविता पढ़ब सीखि लेलक। जहि गाममे लोक भरि-भरि दिन ताष खेलैत, जुआ खेलैत तहि गाम मे वौएलालक दिनचार्या सबसँ अलग बीतए लगलैक। जहि स वौएलालक जिनगीक रास्ता बदलि गेल। अधिककाल हीरानन्द वौएलाल केँ कहथिन- ‘‘बौएलाल, गरीबक सबसँ पैघ दोस्त मेहनत छी। जे कियो मेहनत केँ दोस्त बना चलत ओइह गरीबी रुपी दुष्ट केँ पछाड़ि सकैत अछि। तेँ सदिखन समय केँ पकड़ि, सही रास्ता सँ मेहनत केनिहार जे अछि ओइह एहि धरती आ दुनियाँक सुख भोगि सकैत छथि।’’
मौलाइल गाछक फुल:ः 8
रौतुके गाड़ी सँ रमाकान्त, तीनू गोटे, अपना टीषन मे उतड़लाह। अन्हार राति। भकोभन स्टेषन। सिर्फ दुइये गोटे, स्टेषन मास्टर आ पैटमेन, स्टेषनक घर मे केबाड़ बन्न कए जगल रहए। लेम्प जरैत। ने एक्को टा इजोत प्लेटफार्म पर आ ने मुसाफिर खना मे। अन्हारे मे तीनू गोटे अपन सब समान मुसाफिर खाना मे रखि, जाजीम विछा वैसि रहलाह। गाड़ी झमारक संग दू रातिक जगरना सँ तीनू गोटेक देह, ओंघी स भसिआइत रहनि। प्लेटफार्मक बगल मे ने एक्कोटा चाहक दोकान खुजल आ ने एक्को टा दोाकनदार जगल रहए। ने कोनो दोकान मे इजोत होयत छलैक आ ने गाड़ी से एक्कोटा दोसर पसिंजर(यात्री) उतड़ल। निन्न तोड़ै दुआरे रमाकान्त चाह पीबै चाहति मुदा कोनो जोगार नहि देखि कखनो समान लग बैसथि त कखनो उठि केँ टहलै लगति। जुगेसर आ श्यामा सुति रहल। मुदा रमाकान्त मन मे होइन जे जँ कहीं सुति रहब आ सब समान चोरि भए जाय तखन त भारी जुलुम हएत। निन्न तोड़ैक एकटा नीक उपाय छलनि जे ढाकीक-ढ़ाकी मच्छर रहए। जुगेसरो आ श्यामो चद्दरि ओढ़ि, मुह झाँपि सुतल रहथि।
प्लेटफार्म पर पनरह-बीस टा अनेरुआ कुकुड़ ऐम्हर स ओमहर करैत रहए। प्लेटफार्मक पछबारि भाग माल-जालक हड्डीक ढेरी स गंध अवैत सकरीक एकटा व्यापारी हड्डीक कारोबार करैत अछि। गाम-घर मे जे माल-जाल मरैत ओकर हड्डी गामे-घरक छोटका व्यापारी, भार पर उघि-उघि अनैत अछि ओहि व्यापारी ऐठाम बेचि-बेचि गुजर करैत अछि। जखन बेसी हड्डी जमा भए जायत छैक तखन ओ मालगाड़ीक डिब्बा मे लादि बाहर पठबैत अछि। जाधरि हड्डी प्लेटफार्मक बगल मे रहैत अछि ताधरि अनेरुआ कुत्ता सब ओहि हड्डी केँ चिबबैक पाछू तबाह रहैत अछि। दिन रहौ कि राति, जते टीषनक कातक कुकुड़ अछि सब ओहिक इर्द-गिर्द मड़राइत रहैत अछि। ओना आनो-आनो गामक कुकुड़ गाम छोड़ि ओतए रहैत अछि। एकटा पिल्ला एकटा पिल्लीक संग, प्लेटफार्मक पूबारि भाग से अबिते छल कि एकटा दोसर कुत्ताक नजरि पड़लैक। बिना बोली देनहि ओ कुकुड़ दौड़ि क’ ओहि जोड़ि(पिल्ला-पिल्लीक) लग पहुँच गेल। आगू-आगू पिल्ली आ पाछू-पाछू पिल्ला नाङरि डोलबैत ओ दोसर कुकुड़ पिल्लीक मुह सूँघलक। मुह सुघितहि पिल्ली, मुह चियारि केँ, ओहि कुत्ता पर टूटलि। पिल्ली केँ टूटितहि पैछला पिल्ला जोर से भुकल। कुत्ताक अवाज सुनितहि, जते अनेरुआ कुकुड़ प्लेटफार्म पर रहए, सभ भुकैत दौड़ि केँ, ओहि पिल्ली केँ घेरि लेलक। सभ सभपर भूकै लगल। मुदा पिल्ली डरायल नहि। रानी बनि हस्तिनीक चालि मे पछिम मुहे चललि। अबैत-अबैत टिकट घरक सोझे बैसि रहलि। पिल्ली केँ बैसितहि सभ पिल्ला पटका-पटकी करै लगल।
प्लेटफार्मक पछवारि भाग, कदमक गाछक निच्चा मे मघैया डोम सभ डेरा खसौने रहए। ओहि काल एकटा छैाँड़ा एकटा छैाँड़ीक संग, डेरा स थोड़े पछिम जाय, लट्टा-पट्टी करैत रहए। कुत्ताक अवाज सुनि एक गोटे केँ निन्न टूटलै। निन्न टुटितहि आखि तकलक कि पछवारि भाग दुनू गोटे केँ लट्टा-पट्टी करैत देखलक। ओ ककरो उठौलक नहि! असकरे उठि क’ ओहि दुनू लग पहुँचल। ओहो दुनू देखलकै। छैाँड़ा ससरि केँ झाड़ा फीड़ै ले कात मे वैसि गेल। मुदा छैाँड़ी चलाक। फरिक्के से ओहि आदमी केँ छैाँड़ी कहलकै- ‘‘कक्का।’’
कक्का सुनि ओ किछु बाजल नहि मुदा घुरबो नहि कयल। आगुए मुहे ससरैत बढ़ल। छैाँड़ियो ओकरे दिस ससरलि। लग मे पहुँचतहि छैाँड़ी कन्हा पर दहिना हाथ दइत फुसफुसा क’ कहलकै- ‘‘कक्का....।’’
कान्ह पर हाथ पड़ितहि कक्काक मन बदलै लगलनि। जहिना षिकारी केँ दोसराक षिकार हाथ लगला पर खुषी होइत तहिना कक्को केँ भेलनि। ओहो अपन दहिना हाथ क’ छैाँड़ीक देह पर देलखिन। देह पर हाथ पड़ितहि छैाँड़ी हल्ला केलक। छैाँउड़ो देखैत। उठि क’ ओहो हल्ला करै लगल। हल्ला सुनि सभ मघैया उठि-उठि दौड़ल।
टिकटघर (स्टेषन) मे टिकट मास्टर पैटमेन केँ कहलक- ‘‘रघू, प्लेटफार्म पर बड़ हल्ला होइ छैक। जा केँ देखहक ते।’’
पैटमेन जवाब देलकनि- ‘‘टीषन छियै। सभ रंगक लोक ऐठाम अबै-जाय अए। जँ हम ओमहर देखै ले जाय आ ऐम्हर(स्टेषन घर मे) चोर चलि आबेए ते असकरे अहाँ बुते सम्हारल हएत। भने केबाड़ बन्न छै। दुनू गोटे जागल टा रहूँ। नहि त सरकारी समान चोरि भेने दुनू गोरेक नोकरी जायत। कोनो कि सुरक्षा गार्ड अछि जे चोरिक दोख ओकरा लगतै।’’
पैटमेनक बात स्टेषन मास्टर केँ नीक बुझि पड़लनि पैटमेन केँ कहलखिन- ‘‘ठीके कहलह।’’
दुनू गोटे गप-सप करै लगला। लेम्प जरिते रहै। केवाड़क दोग देने पैटमेन प्लेटफार्म दिस तकलक ते देखलक जे कुत्ता सभ पटका-पटकी करै अए। अन्हार दुआरे मघैया सभ केँ देखबे नहि केलक।
एक दिस कुत्ता सबहक झौहड़ि आ पटका-पटकी, दोसर दिस मघैया सभहक गारि-गरौबलि स प्लेटफार्म गदमिषान हुअए। मने-मन रमाकान्त सोचति जे भने भए रहल अछि। लोकक हल्ला सँ हमर समान तँ सुरक्षित अछि। जुगेसर केँ उठवैत कहलखिन- ‘‘कने आगू बढ़ि क’ जा के देखहक ते कथीक हल्ला होइ छै?’’
जुगेसर उठि क’ कहलकनि- ‘‘कक्का, कोन फेरा मे पड़ै छीबस स्टेण्ड आ रेलवे स्टेषन मे एहिना सदिखन, झूठि-फूसि लय हल्ला होइते रहै छै। अपन जान बचाउ। अनेरे कते जायब।’’
भोर होइतहि टमटमवला सभ अवै लगल। उत्तरवारि भाग (थोड़े हटि क’) ठकुरबाड़ी मे घड़ीघंट बजै लगल। घड़ीघंटक आबाज सुनि रमाकान्त नमहर साँस छोड़लनि। जुगेसर केँ कहलखिन- ‘‘ओंघी से मन भकुआएल अछि। चाहो दोकान पर लोक सभ के गल-गुल करैत सुनै छियै। कने चाह पीने अबै छी। ताबे तू समान सब देखैत रहह।’’
कहि रमाकान्त उठि क’ कल पर जाय कुड़ुड़ केलनि। पानि पीलनि। पानि पीवि चाहक दोकान पर जाय चाह पीलनि। चाह पीबि पान खाय घुरि क’ आबि जुगेसर केँ कहलखिन- ‘‘आब तोहू जाह। चाह पीवि दू टा टमटम सेहो केने अविहह।’’
जुगेसर उठि के कल पर जाय कुड़्ड़ा केलक। कुड़्ड़ा केलाक बाद सोचलक जे अखैन भिनसुरका पहर छै। तोहू मे तीनिये-चारि टा टमटमवला आयल अछि। जँ कहीं चाह पीबै ले चलि जाय आ इमहर टमटमवला दोसर गोरे के गछि लै, तखन त पहपटि भ’ जायत। तइ से नीक जे पहिने टमटमे वला केँ कहि दिअए। सैह केलक। टमटमवला लग पहुँच क’ पूछलकै- ‘‘भाइ, टमटम खाली छह।’’
‘हँ।’
‘चलबह।’
‘हँ, चलब।’
पहिल टमटमवला जे छल, ओकर घरबाली दुखित छलैक। दस बजे मे डाॅक्टर ऐठाम जेबाक छलैक। एक्को टा पाइ नहि रहने भोरे स्टेषन पहुँच गेल जे एक्को-दू टा भाड़ा कमा लेब ते औझुका जोगार भ’ जायत। किएक त कम से कम पचास रुपैआ दवाई-दारु, तकर बाद घरक बुतात, घोड़ाक खरचा आ दस रुपैआ बैंकवला केँ सेहो देवाक अछि।
जुगेसर केँ पुछितहि टमटमवला मने-मन सोचै लगल जे भिनसुरका बोहनि छी तेँ एकरा छोड़ैक नहि अछि। साला टमटमवला सभ जे अछि ओ उपरौज करैत रहैत अछि। कहै ले अपना मे युनियन बनौने अछि मुदा बान्ह कोनो छइहें नहि। लगले बैसार क क’ विचारि लेत आ जहाँ दस रुपैआ जेबी मे एलै आ ताड़ी पीलक कि मनमाना करै लगैत अछि। अपना मे सभ विचारने अछि जे बर-बीमारी मे सभ चंदा देवइ मुदा हमरे कए टा पैसा चंदा देलक। पनरह दिन से घरवाली दुखित अछि जहि पाछु रेजानिस-रेजानिस भ’ गेल छी। ने एक्को मुट्ठी घोड़ा केँ बदाम दइ दियै आ ने अपने भरि पेट खाइ छी। धिया-पूता सभ अन्न बेतरे टउआइत(टौउआइत) रहै अए। तखन ते धन्यवाद ओही बच्चा सभ के दिअए जे भुखलो माए केँ सेवा-टहल करै अए। अपनो घोड़ाक संग-संग टमटम धिचै छी। जँ से नइ करब आ सोलहो अन्ना घोड़े भरोसे रहब ते ओहो मरि जायत। ओइह त, हमर लछमी छी। ओकरे परसादे दू पाइ देखै छी। ओकरा कन्ना छोड़ि देबइ। जिनगी भरि त ओकरे संग सुखो केलौ छोट-छोट बच्चो केँ त ओइह थतमारि केँ रखलक। हम त भरि दिन बोनाइले रहै छी। घर त ओहि वेचारीक परसादे चलै अए।
तहि बीच जुगेसर पूछलकै- ‘‘कते भाड़ा लेबहक?’’
भाड़ाक नाम सुनि टमटमवला सोचै लगल- एक त भिनसुरका बोहनि छी, दोसर डाकडरो अइठीन जाइ के अछि। जँ भाड़ा कहबै आ ओते नइ दिअए तखन ते बक-झक हैत। जँ कहीं दोसर टमटम पकड़ि लिअए तखन ते ओहिना मुह तकैत रहि जायब। तइ से नीक हैत जे पहिने समानो आ पसिनजरो चढ़ा ली। एते बात मन मे अबितहि टमटमवला कहलकै- ‘‘जे उचित भाड़ा हैत सैह ने लेब। हम तोरा एक हजार कहि देवह तेँ कि तू दइये देबह।’’
टमटमवलाक बात सुनि जुगेसर कहलकै- ‘‘अच्छा ठीक छै। पहिने चाह पीबि लाए।’’
दुनू टमटमोवला आ जुगेसरो चाहक दोकान पर जाय चाह पीलक। चाह पीबि तीनू गोटे तमाकुल खेलक। चाहवला केँ जुगेसरे पाइ देलकै। तीनू गोटे रमाकान्त लग आबि समान सब उठा-उठा टमटम पर लदलक। एकटा टमटम पर श्यामा, जुगेसर चढ़ल आ दोसर पर असकरे रमाकान्त समानक संग चढ़लनि। किछु दूर आगू बढ़ला पर रमाकान्त टमटमवला केँ कहलखिन- ‘‘घोड़ा एते लटल छह, खाइ ले नइ दइ छहक?’’
रमाकान्तक बात सुनि टमटमवला बेवषीक आखि उठा रमाकान्त दिषि देखि उत्तर देमए चाहैत मुदा कनैत हृदय मुह से बकारे नहि निकलै दैत। टमटमवलाक आखि पर आखि दए रमाकान्त पढ़ै लगलथि। तहि बीच टमटमवलाक आखि मे नोर ढवढ़बा गेलै। कान्ह परक तौनी स आखि पोछि टमटमवला कहै लगलनि- ‘‘सरकार यैह टमटम आ घोड़ा हमर जिनगी छी। अही पर परिवार चलै अए। जइ दिन से भनसिया दुखित पड़ल तइ दिन से जे कमाइ छी से दबाइये-दारु मे खरचा भ’ जाइ अए। अपनो वाल-बच्चाकेँ आ घोड़ो के खाइक तकलीफ भ’ गेलै अए। की करबै! कहुना परान बचैने छियै। परान बँचतै ते माउस हेबे करतै।’’
टमटमवलाक धैर्य आ बेवषी देखि रमाकान्तक हृदय पघिल क’ इनहोर पानि जेँका पातर भ’ गेलनि। बिना किछु बजनहि मने-मन सोचै लगलथि जे एक तरहक मजबुर ओ अछि जे किछु करबे(कमेबे) नहि करैत अछि आ दोसर तरहक ओ अछि जे दिन-राति खटैत अछि मुदा ओकरा प्राकृति स’ ल’ केँ मनुक्ख धरि एहि रुपे संकट पैदा करैत अछि जहि स ओ मजवूर होइत अछि। इ(टमटमवला) दोसर श्रेणीक मजवूर अछि तेँ ऐहेन लोक केँ मदति करब धरमक श्रेणी मे अबैत अछि। जरुर ऐहेन लोकक मदति करैक चाहिऐक। मुदा मेहनतकष आदमीक मोन एत्ते सक्कत होइत अछि जे दोसर सँ हथउठाइ नहि लेमए चाहैत अछि। जँ हम किछु मदति करै चाहिऐक आ ओ लइ स नासकार जाय तखन त मन मे कचोट हैत। एहि असमंजस मे रमाकान्त पड़ि गेला। फेरि सोचै लगलथि जे कोन रुपे एकरा मदति कयल जाय? सोचैत-सोचैत सोचलनि जे हम नहि किछु कहि एकरे सँ पूछिऐक जे अखन तू जहि संकट मे पड़ल छह ओहि मे कते सहयोग भए गेला स तोरा पाड़ लगि जेतह। इ विचार मन मे अबितहि पूछलखिन- ‘‘अखन तोरा कते मदति भए गेला सँ पार लगि जेतह।’’
रमाकान्तक बात सुनि टमटमवलाक मन मे संतोषक छोट-छीन लकीर खिंचा गेल। मने-मन सब हिसाब बैसवैत बाजल- ‘‘सरकार, अगर अखन पाँच दिनक बुतात (परिवारोक आ घोड़ोक) आ एक सय रुपैआ भए जाय त हम अपन जिनगी केँ पटरी पर आनि लेब। जखने जिनगी पटरी पर आबि जायत तखने जिनगीक सरपट चालि पकड़ि लेब। तीनू काज(स्त्रीक इलाज, परिवार आ कारोवार) ऐहेन अछि जे एक्को टा छोड़ैवला नहि अछि।’’
टमटमवलाक बोली मे रमाकान्त केँ मदतिक आषा बुझि पड़लनि। आषा देखि खुषी भेलनि। खुषी अबितहि विचारलथि जे अगर पाँच दिनक बदला दस दिनक बुतात आ सय रुपैआक बदला दू साय रुपैया जँ मदति कए देवइ त विरोध नहि करत। संगे, जखने समस्या सँ निकलैक आषा जगि जेतइ ते काजो करैक साहस बढ़ि जेतइ। मुदा असकरे त नहि अछि दू गोटे(दू टा टमटमवला) अछि। कि दुनू गोटे केँ मदति करवैक आ कि एकरे टा?’’
पुनः एहि सवाल पर सोचै लगलथि। मन मे एलनि जे मुसीबत त एहि वेचारे टा केँ छैक। ओकरा(दोसर टमटमवाला) से त गप नहि भेल जे बुझितियैक। मुदा एकर त बुझलिऐक। तेँ एकरे टा मदति करबैक। ओकरा(दोसर टमटमवला) से पुछि लेवइ जे तोहर भाड़ा कते भेलह? जेते कहत तते दए देवइ। मुदा एक ठाम (सोझामे) कम-बेसी देवो उचित नहि। तेँ पहिने ओकरा भाड़ा दए विदा कए देवइ आ एकरा रोकि, पाछू केँ सभ किछु दए विदा कए देवइ। गरीबक हृदय केँ जुराइब, बड़ पैघ काज होयत। एते सोचैत-सोचैत रमाकान्त घर पर पहुँच गेलाह।
घर मे ताला लगा हीरानन्द पैखाना गेल रहथि। दुनू टमटम पहुँच दलानक आगू मे ठाढ़ भेल। टमटम ठाढ़ होइतहि सभ कियो उतड़लाह। टमटमोवला आ जुगेसरो, सब सामान केँ उताड़ि दावज्जाक ओसार पर रखलक। ताबे हीरानन्दो बाध दिषि स आबि पोखरिक पूबरिया महार लग पहुँचलाह। महार लग अबितहि दरवज्जा पर टमटम लगल देखलनि। टमटम देखि हीरानन्द बुझि गेल जे रमाकान्त आबि गेलाह। हाँइ-हाँइ क’ दतमनि, कुड़ुड़ कए लफरल दरवज्जा पर आबि घरक ताला खोलि देलखिन। हाथे-पाथे तीनू गोटे सभ सामान केँ कोठरी मे रखि देलकनि। दोसर टमटमवला केँ भाड़ा पूछि रमाकान्त दए देलखिन। पहिल टमटमवला केँ आँखिक इषारा सँ रुकै ले कहलखिन। दोसर टमटमबला चलि गेल। पहिल टमटमवला केँ दू सय रुपैया आ दस दिनक बुतात(दू पसेरी बदाम आ तीन पसेरी चाउर) दए विदा केलनि। टमटम पर चढ़ि, मने-मन गद-गद होइत टमटमवला गीति सभक सुधि अहाँ लइ छी यौ बावा हमरा किअए विसरल छी यौ। गुनगुनाइत विदा भेल।
पसीना स गंध करैत कुरता-गंजी निकालि रमाकान्त चैकी पर रखलनि। भकुआइल मन रहनि। मुदा नीके-ना घर पहुँचला स मन खुषी होइत रहनि। हीरानन्दकेँ पूछै स पहिनहि रमाकान्त पूछलखिन- ‘‘गाम-घरक हाल-चाल बढ़िया अछि की ने?’’
‘हँ’ कहि हीरानन्द पूछलखिन- ‘‘यात्रा बढ़ियाँ रहल की ने?’
‘‘येह, यात्राक संबंध मे की कहू! अखन त मनो भकुआयल अछि आ तीनि दिन से नहेबो ने केलहुँ हेन। तेँ पहिने नहा लिअए दिअ। तखन निचेन से यात्राक संबंध मे कहब।’’
जुगेसर केँ जे बिदाइ मद्रास मे भेटल रहै, ओ चारि टा कार्टून मे रहै । चारु कार्टून जुगेसर फुटा क’ ओसारे पर रखने रहए। जुगेसरक घरवाली आ धिया-पूता सेहो आबि गेलैक। चारु कार्टून जुगेसर अपना घरवाली केँ देखबैत कहलक- ‘‘ई अप्पन छी। अंगना नेने चलू।’’
अप्पन सुनि घरोवली आ धियो-पूतो चपचपा गेल। चारु कार्टून लए आंगन विदा भेल।
रमाकान्त अबैक समाचार गाम मे बिहाड़ि जेँका पसरि गेल। धिया-पूता स ल’ क’ चेतन धरि देखै ले अबै लगलनि। दरबज्जा पर लोकक भीड़ बढै़ लागल। रमाकान्त नहाएब छोड़ि जुगेसर केँ कहलखिन- ‘‘जुगे, सनेसवला कार्टून एतै नेने आबह।’’
सनेस मे डाॅ. महेन्द्र दू कार्टून नारियल(टुकड़ी बनााओल) देने रहनि। जुगेसर कोठरी जा एकटा कार्टून उठौने आयल। जहिया स रमाकान्त ब्रह्मचारी जीक आश्रम गेलथि तहिया स विचारे बदलि गेलनि। अपन सुख-दुख केँ ओते महत्व नहि दिअए लगलथि जते दोसराक। दरबज्जा पर लोक थहा-थही करै लगल। जना लोकक हृदय रमाकान्त क हृदय मे मिझराय लगलनि आ रमाकान्तक हृदय लोक मे। अपन नहाएव, दतमनि करब आ आँखि पर लटकल ओघी सभ बिसरि जुगेसर केँ कहलखिन- ‘‘चेतन केँ दू टा टुकड़ी आ बाल-बोध केँ एक-एक टा टुकड़ी बाँटि दहक। दरवज्जा पर आयल एक्को गोटे इ नहि कहए जे हमरा नहि भेल।’’
कार्टून खोलि जुगेसर नारियलक टुकड़ी बिलहै लगल। हाथ मे पड़ितहि, की चेतन की धिया-पूता, नारियल खाय लगैत। एक कार्टून सठि गेल मुदा देखिनिहार, जिज्ञासा केनिहार नहि सठल। दोसरो कार्टून जुगेसर अनलक। दोसर कार्टून सठैत-सठैत लोको पतरा गेल। लोकक भीड़ हटल देखि रमाकान्त नमहर साँस छोड़ैत जुगेसर केँ कहलखिन- ‘‘आब तोहूँ जा के खा-पीअह गे। हमहूँ जाइ छी।’’
आंगन आबि जुगेसर अपन चारु कार्टून खोललक। मद्रास मे कार्टूनक भीतरका समान नहि देखने छल तेँ देखैक उत्सुकता रहै। एक-एक टा कार्टून चारु गोटे- महेन्द्र, रविन्द्र, जमुना आ सुजाता- देने रहै। पहिल कार्टून, महेन्द्रवला, मे एक जोड़ धोती, एक जोड़ साड़ी, एकटा कुरता कपड़ाक पीस(टुकड़ा) एकटा आङीक पीस, एकटा चद्दरि, एकटा गमछा, एक जोड़ जुत्ता(जुगेसर ले) आ एक जोड़ चप्पल, (घरवली ले) दुनू बच्चा ले पेन्ट-षर्टक संग तीनि सय रुपैआ रहैक। एहिना तीनू कार्टून मे सेहो रहैक। चारु कार्टूनक समान देखि जुगेसरक परिवार केँ खुसीक बिहाड़ि मन मे उठि गेलैक। दुनू बच्चा अपन कपड़ा देखि खुषी स एक-एक टा पहीरि आंगन मे नचै लगल। किऐक त कपड़ाक ऐहन सुख जिनगी मे पहिल दिन भेटल छलैक। दुनू परानी जुगेसर केँ सेहो खुषी स मन गद-गद भए गेलैक। जुगेसर हिसाब जोड़ै लगल जे जँ ओरिया केँ पहिरब ते दुनू गोरेक जिनगी पाड़ लगि जायत ऐहन चिक्कन कपड़ा आइ धरि नसीब नहि भेल छल। एक आखि जुगेसर समान पर देने आ दोसर आखि घरवालीक आखि पर देलक।
दुनू गोटेक आखि मे जिनगीक बसन्त अवै लगलैक। अपन विआह मन पड़लै। जुगेसर केँ होय जे घरवालीकेँ दुनू बाँहि स पजिया क’ छाती मे लगा ली आ घरवाली केँ होय जे घरवला केँ कोरा मे बैसि एकाकार भए जाय। मुदा तीन दिनक गाड़ीक झमार सँ जुगेसरक देहो भसिआइ आ ओंघियो आखिक पीपनी केँ झलफलबैत रहए। जुगेसर घरवाली केँ कहलक- ‘‘पहिरै ले एक-एक जोड़ कपड़ो आ जुत्तो बहार रखू आ बाकी केँ खूब सरिया क’ रखि लिअ जे दुरि नहि हुअए।’’
बेर टगि गेल। जुगेसर नवका धोती, गंजी पहीरि कान्ह पर गमछा नेने रमाकान्त ऐठाम पहुँचल। रमाकान्त सुतले रहथि। आंगन जाय श्यामा केँ देखलक ते ओहो सुति उठि के मुह-हाथ धोइत छलीह। जुगेसर केँ देखि, श्यामा एक टक स निङहारि, मुस्की दैत कहलखिन- ‘‘आइ त अहाँ दुरगमनिया बर जेँका लगै छी, जुगेसर।’’
हँसैत जुगेसर उत्तर देलकनि- ‘‘काकी, महिन्दर भाय देलहा छी।’’
महिन्दरक नाम सुनि श्यामा कहलखिन- ‘‘भगवान भोग देथि। की सब बच्चा देलनि?’’
जुगेसर- ‘‘अहाँ से लाथ कोन काकी, तते कपड़ा-लत्ता आ जुत्ता-चप्पल चारु गोरे केँ देलनि जे जिनगी भरि कतबो धाँगि क’ पहीरब तइयो ने सठत।’’
बेटा-पूतोहूक बड़ाई सुनि श्यामाक हृदय उमड़ि पड़लनि। आह्लादित भए पूछलखिन- ‘‘पाइयो-कौड़ी देलनि कि कपड़े-लत्ता टा?’’
‘रुपैआ त गनलिऐ नहि, मुदा बुझि पड़ल जे दस-पनरह टा नमरी अछि।’
‘बाह। मालिक देखलनि की नहि?’
‘ओ त सुतले छथि। हुनके देखबै ले पहीर के एलौ।’
‘हम ताबे चाह बनबै छी। दरवज्जा पर जाय क’ हुनको उठा दिऔन।’
‘बड़बढ़िया’ कहि जुगेसर दरबज्जा पर आबि रमाकान्त केँ उठवै लगलनि। आखि खोलि रमाकान्त देवालक घड़ी पर नजरि देलनि। चारि बजैत। पड़ले-पड़ल सुतैक हिसाब जोड़लनि। हिसाब जोड़ि घुनघुना क’ बजलाह- ‘‘ऐहेन निन्न त जुआनियो मे नहि अबैत छल।’ ओछाइन पर स उठि जुगेसर केँ कहलखिन- ‘‘कने चाह बनौने आबह। अखनो बुझि पड़ै अए जे निन्न आँखिये पर लटकल अछि। ताबे हमहूँ कुड़ुड़ कए लइत छी।’’
कहि रमाकान्त पहिने लघी करै गेलाह। लघी करै काल बुझि पड़नि जे चाहो से धीपल लघी होइ अए। ततवे नहि जते लघी चारि बेरि मे करैत छी। तोहू स बेसी भए रहल अछि। लघी कए कल पर आबि आखि-कान पोछि, कुड़ुड़ कए दमसा क’ भरि पेट पानि पीलनि। पानि पीबितहि बुझि पड़लनि जे अधा निन्न पड़ा गेल। जुगेसर चाह अनलक। रमाकान्त चाह पीवितहि रहथि कि हीरानन्दो स्कूल से आबि गेला। शषिषेखर आबि गेल। हीरानन्द जुगेसर केँ पूछलखिन- ‘‘जात्रा(यात्रा) बढ़िया रहल की ने?’’
हँसैत जुगेसर बाजल- ‘‘जाइ काल टेन मे बड़ भीड़ भेल। जाबे गाड़ी मे रही ताबे ने एक्को बेर झाड़ा भेल आ ने सुतलौ। किऐक ते रिजफ सीट रहबे ने करै। जइ डिब्बा मे बैसल रही ओहि मे लोकक करमान लागल रहै। तइ पर से सब टीषन(जइ स्टेषन मे गाड़ी रुकै) मे एगो-दूगो लोक उतड़ै आ दस-बीस गोरे चढ़ि जाय। मुदा भगवानक दया से कहुना-कहुना पहुँच गेलौ। जखन मद्रास टीषन पर उतड़लौ ते दोसरे रंगक लोक दखियै। अपना सब दिस अछि किने जे सब रंग लोक मिलल-जुलल अछि। से नइ देखियै। बेसी लोक कारिये रहै। गोटे-गोटे लोक उज्जर बुझि पड़ै। जखन डेरा पर पहुँचलौ ते मकान देखि बिसबासे ने हुअए जे अपन छिअनि। बड़का भारी मकान। तइ मे कोठलीक कमी नहि।’’
‘भरि मोन देखलौ की ने?’
‘‘ऐह, की कहू मासटर सैब, महिन्दर भाय अपने मोटर से भरि-भरि दिन बुलबैत रहथि। मोटरो तेहेन जे जहाँ बैइसी आ खुगै कि ओंघी लगि जाय। कतए की देखलौ से मनो ने अछि।’’
रमाकान्त केँ मद्रास सँ अयवाक समाचार सुनि महेन्द्रक स्कूलक संगी, सुबुध सेहो अएलाह। ओ हाई स्कूल मे षिक्षक छथि। महेन्द्र आ सुबुध, हाई स्कूल धरि, संगे-संग पढ़ने रहथि। महेन्द्र साइंसक विद्यार्थी आ सुबुध आर्टक। बी.ए. पास केला पर सुवुध षिक्षक भेलाह आ महेन्द्र डाॅक्टरी पढ़ि, डाॅक्टर बनलाह। महेन्द्रक कुषल-क्षेम पूछि सुवुध रमाकान्त केँ पूछलखिन- ‘‘अपना एहिठामक लोक आ मद्रासक लोक मे की अंतर देखलिऐक?’’
दुनू ठामक लोकक तुलना करैत रमाकान्त कहै लगलखिन- ‘‘ओत्तुका आ अपना ऐठामक लोक मे अकास-पतालक अन्तर अछि। ओहिठामक लोक अपना एहिठामक लोक सँ अधिक मेहनती आ इमानदार अछि।’’
बिचहि मे शषिषेखर प्रष्न केलकनि- ‘की मेहनती?’
‘मनुक्खक तुलना करै सँ पहिने अपन इलाका आ मद्रासक माटि-पानिक तुलना सुनि लिअ। जेहेन सुन्नर माटि अपना सभक अछि देखते छियै जे कते मुलायम आ उपजाऊ माटि अछि। पानियो कते बढ़ियाँ अछि, ऐहन मद्रास मे नहि अछि। अपना सभ सँ बेसी गरमियो पड़ैत छैक। जहाँ धरि लोकक सवाल अछि, अपना ऐठामक लोक अधिक आलसी अछि। समय केँ कोनो महत्व नहि दइत अछि। वा इ कहियौक जे एहिठामक लोक समयक महत्व बुझवे नहि करैत अछि। कियो बुझबो करैत अछि त ओ परजीवी बनि जिनगी वितबै चाहैत अछि। हँ, किछु गोटे ऐहेन जरुर छथि जे मर्यादित मनुष्य बनि जिनगी जीवि रहल छथि। जे पूजनीय छथि, मुदा सामाजिक व्यवस्था सदिखन हुनको झकझोड़ितहि रहैत छन्हि। ओहिठामक लोक समयक संग चलैत छथि। जहि सँ कमजोर इलाका रहितहुँ नीक-नहाँति जिनगी बितवैत अछि। ओहिठामक लोक भीख केँ अधला बुझि नहि मंगैत अछि, मुदा अपना ऐठाम लोक उपार्जनक स्रोत बुझैत अछि।’’
बिचहि मे सुबुध पूछलकनि- ‘पढ़ाई-लिखाई केहेन छैक?’
‘स्कूल, कओलेज, युनिवर्सिटी सभ देखलहुँ। लड़का-लड़कीक स्कूल शुरुहे से अलग-अलग अछि। मुदा तइयो दुनू केँ संगे-संग पढ़ैत सेहो देखलहुँ। अपना ऐठाम सँ बेसी लड़की ओहिठाम पढ़ैत अछि। अपना ऐठाम लड़के पछुआयल अछि त लड़कीक कोन हिसाब। गाड़ी(ट्रेन) बस मे सेहो अलग-अलग व्यवस्था छैक। जहन कि अपना ऐठाम सभ संगे-संग चलैत अछि।’’
सुबुध- ‘‘खाई-पीबैक केहेन व्यवस्था छैक?’’
‘गरीब लोकक खान-पान दब होइतहि छेक। मुदा एक हिसाव सँ देखल जाय त अपना सभक नीक अछि। कपड़ो-लत्ता पहिरब अपना ऐठाम नीक अछि।’’
रमाकान्त केँ छोटकी पुतोहू सुजाता, एक पेटी(कार्टून) फलक बनल शराब सेहो देने रहनि। आँखिक इषारा सँ रमाकान्त जुगेसर केँ एक बोतल ब्राण्डी अनै ले कहलखिन। जुगेसर उठि क’ भीतर गेल आ एकटा बोतल ब्राण्डी नेने आयल। दरवज्जा पर आबि चाहेक गिलास केँ धोय, सभमे शराब दए सभहक आगू मे देलकनि। आगू मे पड़ितहि रमाकान्त घट दए पीबि गेलाह। मुदा हीरानन्दो, शषिषेखरो आ सुबुधो केँ डर होइत छलनि। कहियो पीने नहि। दोहरी गिलास पीबैत रमाकान्त सभकेँ कहलखिन- ‘‘पीबै जाइ जाउ, फलक रस छियैक। कोनो अपकार नहि करत।’’
मुदा तइयो सभ-सभहक मुह तकैत रहति। दोहरा केँ फेरि रमाकान्त सभकेँ कहलखिन- ‘‘मने-मन सुबुध सोचलनि जे कोनो जहर-माहूर थोड़े छियैक जे मरि जायब। अगर मरबो करब ते पहिने कक्के ने मरताह। बुझल जयतैक। आगू मे राखल गिलास उठा आस्ते स दू घोट पीवि, गिलास रखि, हीरानन्दक केँ कहलखिन- ‘‘पीवू, पीबू मास्टर सहाएब। सुआद त कोनो अधला नहिये बुझि पड़ैत अछि।’’
सुबुधक बात सुनि हीरानन्दो आ शषिषेखरो गिलास उठा केँ पीलनि। तेसरो गिलास रमाकान्त चढ़ा देलखिन। तेसर गिलास पीवितहि आखि मे लाली अबै लगलनि। मन हल्लुक सेहो हुअए लगलनि। बजैक ताब सेहो अबै लगलनि। जहिना आगि पर चढ़ल पाइनिक वरतन मे, ताव लगला पर निच्चाँक पानि गर्म भए उपर आबै चाहैत अछि, तहिना रमाकान्तो केँ हुअए लगलनि। धीरे-धीरे रंग चढ़ैत नीक जेँका चढ़ि गेलनि। अहू तीनू गोटे- हीरानन्द, सुवुध आ शषिषेखर- केँ आँखि तेज हुअए लगलनि। तेज होइत नजरि सँ सुबुध पूछलखिन- ‘‘कक्का, महेन्द्र भाय मस्ती मे रहै छथि की ने?’’
बजैक वेग रमाकान्त केँ रहबे करनि, तहि पर सँ महेन्द्रक मस्ती सुनि कहै लगलखिन- ‘‘महेनद्रक मेहनत आ कमाई देखि क्षुब्द भ गेलहुँ। अप्पन बड़का मकान, चारि टा गाड़ी, बजार मे अइल-फइलिक बास तहि पर सँ बैंको मे ढेरी रुपैआ जमा केने अछि। अइठामक सम्पत्तिक ओकरा कोनो जरुरी नहि छैक। किऐक रहतैक? जेकरा अपने कमाई अम्बोह छै।’’
बिचहि मे सुवुुध टोकि देलकनि- ‘‘तखन ऐठामक खेत-पथार गरीब-गुरबा केँ दए दिऔक?’’
बिना किछु आगू-पाछू सोचनहि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘बड़ सुन्नर बात अहाँ कहलहुँ। अनेेरे हम एत्ते खेत-पथार रखने छी। अइह(यैह) खेत जे गरीबक हाथ मे जेतइ ते उपजबो बेसी करतै आ ओकर जिनगीयो सुधरि जेतई।’’
जहिना धधकल आगि मे हवा सहायक होइत, तहिना रमाकान्तो केँ भेलनि। एक त ब्राण्डीक नषा, दोसर परिवार मे चारि-चारि टा डाॅक्टरक कमाई, तहि पर सँ अपार सम्पत्ति देखि मन उधिआयत छलनि। समाजक स्नेह सेहो बढ़ि गेल छलनि। ततबे नहि, अद्वेत दर्षन हृदय केँ पैघ(विषाल) बना देलकनि।
हँसैत रमाकान्त, सभहक बीच, कहलखिन- ‘‘अखन धरि हम गुलरीक कीड़ा बनल छलहुँ, मुदा आब दुनियाँ केँ देखलिऐक। दू सय बीधा जमीन अछि। किऐक हम एत्ते रखने छी। एकटा जमीनदारक खेत स सैकड़ो गरीब परिवार हँसी-खुषी सँ गुजर कए सकैत अछि। जबकि ओतेक सम्पत्तिक सुख एकटा परिवार करैत अछि। इ कते भारी अनुचित थिक। सभ मनुक्ख मनुख छी। सभकेँ सुख-दुखक अनुभव होइत छैक। केयो अन्न बेतरे काहि कटैत अछि त ककरो अन्न सड़ैत छैक। घोर अन्याय मनुक्ख-मनुक्खक संग करैत अछि।’’
कहि जुगेसर केँ कहलखिन- ‘‘जुगे, चाह बनौने आबह?’’
जुगेसर चाह बनबै गेल। तहि बीच वौएलाल सेहो आयल। रमाकान्त केँ गोड़ लागि कात मे बैसल। वौएलाल केँ बैसितहि रमाकान्त हीरानन्द केँ कहलखिन- ‘‘मास्टर सहाएव, महेन्द्र कहने छल जे दू गोरे(एकटा लड़का एकटा लड़की) केँ एहिठाम(मद्रास) पठा दिअ। ओहि दुनू गोटे केँ अपना संग रखि छोट-छोट बीमारीक इलाज केनाइ सिखा देबैक। गाम मे इलाजक बड़ असुविधा अछि। ततबे नहि, गरीबीक चलैत लोक रोग-व्याधि स मरि जाइत अछि मुदा इलाज नहि करा पबैत अछि। तेँ एकटा छोट-छीन अस्पताल सेहो बना देव। जहि मे मुफ्त इलाज लोकक हेतैक। तहि लेल जते दवाई-दारु मे खर्च हैत से हम देब। हम सभ चारि गोटे छी। बेरा-बेरी चारु गोटे, साल मे एक-एक मास गाम मे रहब आ लोकक इलाज करब। तहि बीच छोट-छोट बीमारीक लेल सेहो दू आदमी केँ तैयार क’ देवाक अछि। जँ कहीं बीच मे नमहर बीमारी ककरो हेतैक ते ओकर इलाजक खर्च सेहो देवइ। तेँ दू आदमी केँ पद्रास पठा दिऔ ओकर जेवाक खर्च देवई।’’
रमाकान्तक बात सुनि, सभ कियो बौएलाल आ सुमित्रा केँ मद्रास पठबैक विचार केलनि। वौएलाल केँ हीरानन्द कहलखिन- ‘‘वौएलाल सभहक विचार त तू सुनिये लेलह। काल्हि दुनू गोरे मद्रास चलि जाह।’’
मौलाइल गाछक फुल:ः 9
कछ-मछ करैत हीरानन्द भरि राति जगले रहि गेलाह। मन मे कखनो होइन जे रमाकान्त देल जमीन समाजक बीच कोना बाँटल जाय त कखनो हुनक उदार विचार नचैत रहनि। कखनो होइन जे निसांक(नषाक) झोक मे बजलाह मुदा निसां टुटला पर, जँ कहीं नठि जाथि। विचित्र स्थिति मे हीरानन्द रहथि। बात बदलब धनीक लोकक जन्मजात आदत छी। मुदा हम त षिक्षक छी षिक्षकक प्रति आदर आ निष्ठा, सभ दिन सँ, समाज मे रहलैक आ रहतैक। एहि विचारक बीच जते गोटे छलहुँ ओहि मे हम आ सुवुध षिक्षक छी। तेँ आन क्यो त कम्मो मुदा हम दुनू गोटे तँ बेसी घिनाएब। कोन मुह लए केँ समाजक बीच रहब। फेरि अपने पर शंका भेलनि जे हमहूँ ते शराबेक निषां मे ने ते बौआइ छी। इ बात मन मे उठितहि उठि कए बाहर निकलि चारु भर तकलनि। अन्हार गुप-गुप रहए। सन-सन करैत राति छलैक। हाथ-हाथ नहि सुझैत छलैक। मुदा मेघ साफ। सिंगहारक फूल जेँका तरेगण चकचक करैत रहए। हवा त कोनो नहिये बहैत रहै मुदा राति ठंढ़ाइल रहए। पुनः बाहर स कोठरी आबि विछान पर पइर रहला। मुदा निन्नक कतौ पता नहि! मन सँ जमीन हटबे नहि करैत रहनि। पुनः उठि केँ कोठरी स निकलि लघी(लघुषंका) करै कात मे बैसलाह। भरिपोख पेषाव भेलनि। पेषाव होइतहि मन हल्लुक भेलनि। मन हल्लुक होइतहि ओछाइन पर आबि पड़ि रहलाह। ओछाइन पर पड़ितहि निन्न आबि गेलनि।
सुबुध सेहो भरि राति जगले बितौलनि। मुदा हीरानन्द जेँका ओ ओझरी मे नहि ओझराइल रहथि। समाज शास्त्रक षिक्षक होइक नाते स्पष्ट सोच आ समाज चलैक स्पष्ट दिषा छलनि, तेँ मन दृढ़ संकल्प आ सक्कत विचार स भरल छलनि। सबसँ पहिने मन मे उठलनि जे जहिना आर्थिक दृष्टि स टूटल समाज केँ रमाकान्त कक्काक सहयोग स मजबूत बल भेटितैक तहिना त ओहि बल केँ चलबैक(उपयोग) सेहो मजबूत रास्ता भेटैक चाही! जे रमाकान्त कक्का बुते नहि हेतनि। इमानदारी आ उदार स्वभावक चलैत त ओ सम्पत्तिक त्याग केलनि। मुदा ओ सम्पत्ति आगू मुहे कोना बढ़तैक? जहिना मनुक्खक परिवार दोबर, तेबर, चारिबरक रफ्तार स आगू मुहे बढ़ैत अछि तहिना त सम्पत्तियोब गति हेवाक चाहिऐक। मुदा सम्पत्ति मे ओ गति तखने आओत जखन कि ओहि मे श्रमक इंजिन लगाओल जायत। ओना श्रमक इंजन लगौनिहार(श्रमिक) सेहो पर्याप्त अछि मुदा ओकरा श्रम केँ कोन रुप मे बढ़ाओल जाय। एक रुपक इ होइत जे सोझे-सोझी ओकरा नव कार्यक ढाँचा मे ढालल जाय। (नव काज देल जाय) जे संभव नहि अछि! किऐक त नव औजार, नव तरीका बिना नव ज्ञान संभव नहि अछि। जे नहि अछि। दोसर जे तरीका(लूरि) आ औजार अछि, ओकरे धारदार बना आगू बढ़ाओल जाय। जे संभवो अछि आ उपयुक्तो होयत। मुदा ओहू लेल पथ-प्रदर्षकक जरुर होएत। जेकर अभाव अछि। हमहूँ त नोकरीये करै छी। सात दनि मे एक दिन(रवि) गाम मे रहै छी, बाकी छह दिन अनतै रहैछी। तहि स काज कोना चलि सकै अए? किऐक त समाजो नमहर अछि आ समस्यो ढेर अछि। हर समस्याक समाधानक रस्तो फराक-फराक होयत। जना बुद्धदेव कहने छथि जे दुष्मन केँ सूइयाक नोक भरि जँ सुराक भेटि जायत त ओहि होइत हाथी सन विकराल जानवर प्रवेष कए जायत। समाजक समस्यो त ओहने अछि। अनायास मन मे उपकलनि जे जहिना रमाकान्त कक्का अपन सभ सम्पत्ति समाज केँ दइ ले तैयार छथि तहिना हमहूँ नोकरी छोड़ि अपन ज्ञान समाज केँ दए देबैक। सभ किछु बुझितहुँ सड़ल-गलल रास्ता, अपन अरामक दुआरे, धेने चलि रहल छी। सात बीघा जमीन, एकटा पोखरि, दस कट्ठा गाछी-कलम आ खढ़होरि अछि। जाहि सँ पिताजी नीक-नाहाँति गुजरो करैत छलाह आ हमरो पढ़ौलनि। मुदा हम नोकरीयो करैत छी, खेतो-पथार ओहिना अछि मुदा कते आगू मुहे बढ़लहुँ। हँ, एते जरुर भेल अछि जे घरोवाली केँ आ बेदरो-बुदरी कें, धनिकक मंदिरक मुरती जेँका, नीक-नीक परसाद, नीक-नीक सजावट सँ सजा काहिल बनौने छी। की हम इ नहि देखैत छी जे झक-झक करैत छातीक हाड़वला रिक्षा खिंचैत अछि, साठि बरखक महिला चिमनी मे पजेबा उघैत अछि, मरैबला पुरुख बड़दक संग हर खिंचैत अछि। अन्नक बोझ उघैत अछि। की ओकर देह लोहाक बनल छैक आ हमरा सभहक कोढ़िलाक बनल अछि। इ सभ धन आ बुद्धिक करामात छी। आइ धरिक समाज आ समाजक नियामक एकरे पोषक रहलाह जे सुधारक अछि। नहि त मनुक्ख आ जानवर मे की अन्तर रहतैक? जहि समाज मे मनुक्ख जानवरक जिनगी जीबए ओहि समाजक प्रबुद्ध लोक केँ चुरुक भरि पानि मे डूबि केँ नहि मरि जेवाक चाहिएनि। एते बात मन मे अबितहि सुबुध तय केलनि जे सभसँ पहिने काल्हि स्कूल मे त्यागपत्र दए देब। आइ धरि जे जिनगी जीविलहुँ, जीविलहुँ मुदा काल्हि सँ नव जिनगीक सूत्रपात करब। एहि संकल्प-विकल्पक बीच मन घुरिआयत।
भोर होइतहि सुबुध ओछाइन पर सँ उठि मैदान दिषि विदा भेला। हाथ मे लोटा, मुदा मन ओहि विचार मे डूवल छलनि। थोड़े दूर गेला पर गाम मे गल्ल-गुल होइत सुनलनि। रस्ते पर ठाढ़ भए अकानै लगलाह। जे कथीक गल्ल-गुल भए रहल अछि। सोझा मे ककरो नहि देखैत जे पूछियो लइतथि मने-मन अनुमान करै लगलाह जे भरिसक राति मे कतौ कोनो घटना घटि गेलैक। या त ककरो साप-ताप काटि लेलकै वा कतौ चोरि भए गेलैक। मुदा से सभ नहि छलैक। साँझ मे जे विचार रमाकान्त व्यक्त केने रहथि ओ राता-राती बिहाड़ि जेँका सगरे गाम पसरि गेलैक। रस्ते सँ घूरि सुबुध कड़चीक दतमनि तोड़ि, तदमनि करैत घर पर आयला। घर पर अबितहि देखलनि जे सुकना बैसल अछि। मुदा सुकनाक नजरि सुवुध पर नहि पड़लैक, किऐक त ओ अंगनाक दुुआरि दिषि तकैत रहए। सुबुध सुकना केँ पुछलखिन- ‘‘भोरे-भोर किमहर सुकन।’’
सुबुधक बात सुनि अकचकाइत सुकन चैकी पर सँ उठि, दुनू हाथ जोड़ि बाजल- ‘‘मालिक, अहाँ त जनिते छी जे कोनो काज-उद्दम मे सब तूर मिलि सम्हारि दइ छी। गरीबो पर नजरि रखवै।
सुकनक बात केँ, कोनो अर्थे ने सुबुध केँ लगलनि। पूछलखिन- ‘‘सुकनभाय, तोहर बात हम नहि बुझलिअह।’’
‘लोक सब कहलक हेँ जे रमाकान्त कक्का अपन सब खेत गरीब-गुरबा केँ दए देथिन, जे अहीं बँटबै।’’
सुकनक बात सुनि सुबुध मने-मन सोचै लगलथि जे जमीन-जयदादक सवाल अछि। धड़फड़ा क’ कोना हेतैक। जँ आम लोकक विच विचार कएल जायत त हो-हल्ला हेतइ। हो-हल्ला भेने काजो बिगड़ि जयतैक। तेँ असथिर सँ विचार करैक जरुरत अछि। मुदा अखन जँ सुकन केँ इ बात कहबै ते दुख हेतैक। तेँ आषक बात कहब अछि। कहलखिन- ‘‘सुकन भाय, जखन गरीबक बीच खेतक बँटवारा हैत ते तोहूँ गरीबे छह। तखन तोरा किऐक ने हेतह। अखन जाहह।’’
सुकन विदा भेल। कलक आगू मे ठाढ़ भए सुबुध सोचै लगलाह। अजीव स्थिति भए गेल। एक दिषि गरीबक सबाल अछि। जँ किनयो चूक हैत त जिनगी भरि बदनामीक मोटरी माथ पर चढ़ि जायत। तेँ इमानदारीक जरुरत अछि। मुदा इमानदारी दिषि तकै छी ते अपनो मे बेइमानी घुसल अछि। परिवारो मे तहिना देखै छी आ समाजो मे ते अछिये। गरीबो मे देखै छी जे जे मेहनती अछि ओ बहुत किछु कमा क’ बनाइयो नेने अछि। जना रहैक घर, पानि पीवैक कल, जीबैक लेल बटाई खेतीक संग पोसिया मालो-जाल खूँटा पर रखने अछि। जहन कि जे आलसी अछि ओकरा सब कथूक अभावे छैक। ततबे नहि, जँ हम इमनदारियो से विचार रखै चाहब तइयो उलझन होयत हमही टा त नहि छी। आरो गोटे रहताह। सभक नेत सभक प्रति एक्के रंग हेतनि, सेहो बात नहि अछि। जँ कियो मुह देखि मंूगबा बँटताह, सेहो भए सकै अछि। ओहि ठाम जँ हुनका कहबनि त हमरे बात मानि लेता, सेहो संभव नहि अछि। जँ रमाकान्त कक्का ककरो बेसी दिअए चाहथिन ते कि कहबनि, सम्पत्ति त हुनके छिअनि। एहि सभ विचारक जंगल मे सुबुध बौआय लगलथि। दतमनिक घुस्सा कखनो चलैत आ कखनो बन्न भए जाइत छलनि। एक त भरि रातिक जगरना तहि पर सँ अमरलत्ती जेँका ओझरी क’ सोझरायब असान नहि वुझि पड़नि कनियो किम्हरो जोर पड़त त टन दे टुटि जायत। तेँ समाजक मूल रोग केँ जड़ि सँ नहि पकड़ल जायत त सभ गूड़ गोबर भए जायत। तहि बीच मुनमा डाबा मे दूध नेने आंगन (सुबुधक) जाय डाबा रखि, सुबुध लग आबि दुनू हाथ जोड़ि कहलकनि- ‘‘भाय, अबलो पर दया करबै?’’
एक त सुबुधक मन अपने घोर-घोर भेल, तहि पर स लोकक पैरबी। मन मसोसि केँ सुबुध कहलखिन- ‘‘अखन जाह। जखन जमीनक बँटवारा हुअए लगतै त तोरो बजा लेबह।’’
दतमनि कय सुबुध आंगन जाय पत्नीकेँ पूछलखिन- ‘‘डावा मे मुनमा की नेने आयल छल?’’
‘दूध’
‘दाम देलियै।’
‘नहि।’
‘किऐक?’
‘हमरा भेल जे अहीं पठेलौ, तेँ।
पत्नीक जबाव सुनि सुवुधक मन मे आगि लगि गेलनि। खिसिया क’ पत्नी केँ कहलखिन- ‘‘झब दे चाह बनाउ। स्कूल जायब।’
पत्नी- ‘‘अखने किअए जायब? आन दिन खा केँ जाइ छलौ आ आइ भोरे किअए जायब?’
‘रौतुका खेलहा ओहिना कंठ लग अछि। तेँ नहि खायब।’
कहि सुबुध लूँगी बदलि धोति पहिरए लगला कि पत्नी चाह नेने एलखिन। कुरता पहीरि चाह पीबि सुवुध विदा भेलाह।
जिनगी भरि मे रमाकान्त केँ ऐहन निन्न कहियो नहि भेल छलनि जेहन राति भेलनि। समयक अन्दाज सँ जुगेसर आबि खिड़की देने हुलकी देलक ते देखलक जे रमाकान्त ठर्र पाड़ैत छथि। रमाकान्त केँ सुतल देखि जुगेसर जोर सँ केबाड़ ढकढ़कौलक। केवाड़क अवाज सुनि रमाकान्त आखि मलैत उठलाह। जुगेसर रमाकान्त केँ उठा चाह अनै आंगन गेल। रमाकान्तो उठि क’ कल पर जा कुड़ुड़ केलनि। ताबे जुगेसरो चाह नेने आबि गेलनि। रमाकान्त चाह पीबितहि रहति कि मन मे एलनि जे बाबा चाणक्य ठीके कहने छथि जे धन ककरा रक्खी हमरो त पितेजीक अरजल छिअनि। जाधरि ओ जीबैत छलाह, हमरा कोनो मतलब नहि छल। मुदा हुनका मुइने त सबटा हमरे भेल। दुनू बेटा तते कमाइत अछि जे अई धनक ओकरा जरुरते नहि छैक। हम कते दिन जीवे करब। तहन ते सभ धन ओहिना नष्ट भए जायत। कौआ-कुक़ुड़ लूझि-लूझि खायत। तहि स नीक जे समाजक गरीब-गुरबा केँ दए दिअए। तिब्बतक राजकुमार चेन पो (8बीं 9वीं शदी) अपन सभ सम्पति जहिना लोकक बीच बाँटि देलखिन तहिना हमहूँ बाँटि देबई। तहि स समाज मे भाइ-भैयारिक संबंध सेहो मजबुत बनतैक। आइ जँ व्यास बाबा जीबैत रहितथि त ओ जरुर बिना कहनहुँ आबि केँ असिरवाद दइतथि। अगर स्वर्ग जेबाक रस्ता तियागो होय त हमहूँ किएक ने जायब। धन्यवाद सुबुध आ मास्टर सहाएव केँ दिअनि जे हमर अज्ञानताक केबाड़ खोललनि। सभ जखन सुनत ते मने-मन खुब खुषी हैत। की हमर कयल धरम ओकरा नहि हेतैक?
चाह पीबि, पान खा लोटा लए रमाकान्त गाछी दिषि चललाह। कृष्णभोग(किसुनभोग) आमक गाछ तर लोटा रखि, टहलि-टहलि गाछ सभकेँ निङहारि-निङहारि देखै लगलाह। गाछक जे रुप आइ रमाकान्त देखथि ओ आइ धरि कहियो नहि देखने रहथि। गाछ देखि बुझि पड़नि जे सभ हँसि रहल अछि। धरतीक श्क्ति पाबि ऐष्वर्यवान बनल अछि। दोसराक सेवा लेल उत्साहित अछि। एक टक स गाछक रुप देखि रमाकान्तक हृदय सेहो गद-गद भ’ गेलनि। सभकेँ देखि लोटा उठा पाखाना दिषि बढ़लाह। तहि बीच जय-जय कारक आवाज सुनलखिन। आवाज दूर मे रहै तेँ स्पष्ट नहि बुझति, मुदा सुनतिहिन। रसे-रसे आवाज लग अबैत गेलनि। पैखाना स उठि ओ आवाज केँ अकानए लगलथि। जय-जय कारक संग अपनो नाम सुनतिहिन। अपन नाम सुनि आरो चैकन्ना भए कानक पाछू मे हाथक तरहत्थी रखि अवाज अकानै लगलथि। लोकक समूह जते लग अबैत जायत, तते अवाज स्पष्ट होइत जाइत छलैक। हाँइ-हाँइ क’, लोटा नेने पोखरिक घाट पर आबि, कुड़ुड़ कए घर दिषि विदा भेलाह। अपन नामक संग जय-जयकार सुनि सोचै लगलाह जे कि बात छियैक? किऐक लोक जय-जयकार कए रहल अछि। दिलक धड़कन सेहो तेज हुअए लगलनि। मन मे गुदगुदी सेहो लगनि। उत्साह सँ छाती सेहो फुलैत जाइनि। जाबे लोकक जुलूस घर लग पहुँचल, तहि स पहिनहि दरवज्जा पर आबि, देखै लगलथि। हीरानन्द आ शषिषेखर सेहो दलानक आगू मे ठाढ़ भए देखैत छलाह। की बूढ़, की जुआन, की बच्चा सभ एक्के सुर मे। सभ मस्त। सभ उत्साहित। सभ नचैत। सभहक मुह मे हँसी छिटकैत छलैक।
दरवज्जाक आगू मे जुलूस आबि केँ रुकल। आगू-आगू घोड़ाक नाच। पाँच गोरे, वाँसक बत्ती क’ ललका कपड़ा स सजा, घोड़ा बनौनेह। पाँचो घोड़े जेँका दौड़ैत। कखनो हीं-हीं करैत त कखनो पाछू सँ चैतार फेकैत। तहि पाछू डफरा-वाँसुरीक धुन। वसन्तक वहार छिड़िअवैत रहए। तहि पाछू लोक नचबो करैत आ जय-जयकारा करैत रहए। रमाकान्त अपन उत्साह क’ रोकि नहि सकलाह। दलानक ओसार सँ उतड़ि सोझे जुलूस मे सन्हिया नचै लगलाह। के छोट, के पैघ, के बूढ़, के जवान, सभ बाइढ़िक पानि जेँका उधिआइत रहए। घर-घर सँ स्त्रीगण सेहो आबि चारु कात पसरि गेलीह।
आंगन सँ श्यामा आबि दरबज्जाक आगू मे ठाढ़ भए नाचो देखैत आ रमाकान्तो पर आखि गरौने छलीह। रमाकान्तोकेँ नचैत देखि ओ मने-मन सोचै लगलीह जे ऐना किऐक भए रहल अछि। लोक सभ केँ कोनो चीजक खुषी हेतइ तेँ नचैत अछि। मुदा हुनका की भेटलनि जे ऐना बुढ़ाढ़ी मे कुदैत छथि। छोट बुद्धि श्यामाक, तेँ बुझवे नहि करति जे नदी(धार) जखन समुद्र मे मिलै लगैत अछि तखन दुनूक पाइन एहिना नचैत अछि। एक दिषि नदीक पानि गतिषील होइत, त दोसर दिषि समुद्रक असथिर होयत अछि। ओहि मे सिर्फ लहरि उठैत अछि।
अखन धरिक जुलूस आ नाच गामक उत्तरवारि टोल सँ आयल छलैक। दछिनबारि टोल सँ दोसर जुलूस, मोर-मोरनीक नाचक संग सेहो पहुँचल। दुनू नाचक बीच सौंसे गामक लोक हृदय खोलि केँ नचैत। कात मे ठाढ़ भेल हीरानन्द, शषिषेखर केँ कहलखिन- ‘‘अखन जे आनन्द अछि ओ समाज मे सब दिन कोना बनल रहत?’’
हीरानन्दक प्रष्नक उत्तर शषिषेखर क’ नहि फुरलनि। मुदा प्रष्नक पाछू मन जरुर दौड़लनि। गंभीर प्रष्न। तेँ धाँय द’ उत्तरो देब शषिषेखर उचित नहि बुझि चुप्पे रहलाह। मुदा एते बात जरुर मन मे अवैत रहनि जे जँ सुकर्मक रास्ता सँ मनुष्य उत्साहित भए चलैत रहत त जरुर ऐहने आनन्द जिनगी भरि चलैत रहतैक।
जुलूसक बीच रमाकान्त नचैत-नचैत घामे-पसीने तर-बत्तर भए गेल रहति। मुदा तइयो मन नचै ले उधकैत रहनि। एकटा छौंड़ा, जे अखरहो देखने, नचैत-नचैत रमाकान्त लग आवि दुनू हाथे पजिया केँ रमाकान्त के उठा कन्हा पर लए नचै लगल। सभ कियो दुनू हाथे थोपड़ी बजवैत जय-जयकार करै लगल। कात मे ठाढ़ भेल हीरानन्द केँ भेलनि जे कहीं ओ खसि-तसि नहि पड़ति तेँ लफड़ि केँ बीच मे जाय रमाकान्त क डाँड़ पकड़ि निच्चा केलकनि। निच्चा उतड़ितहि रमाकान्त दुनू हाथे थोपड़ी बजबैत फेरि नचै लगलथि। दुनू हाथ उठा क’ हीरानन्द सभकेँ शान्त होइ लेल कहलखिन। हाथक इषारा देखि सभ शान्त भए गेल। धोतीक खूँट स रमाकान्त पसीना पोछि कहै लगलखिन- ‘‘अहाँ सभक बीच कहै छी जे जे खेत-पथार आइ धरि हम्मर छल, अखन से ओ अहाँ सभहक भए गेल।’’
रमाकान्तक बात सुनि सभहक मुह स धानक लावा जेँका हँसी भरभरा गेल। जे समाज आर्थिक विपण्णताक चलैत अखन धरि मौलाइल छल ओहि मे खुषीक नव फुल फुलाय लगल। सभ केयो हँसी-चैल करैत अपन-अपन घर दिस विदा भेल।
घर स निकलि सुवुध सोझे अपन डेरा गेलाह। डेरा मे पहुँच त्याग-पत्र लिखलनि। मेसवला केँ सब हिसाब फड़िछा स्कूल जाय प्रध्यानाध्यापक केँ त्याग पत्र दैत कहलखिन- ‘‘मास्टर साहेव, आइ सँ सेवा मे सहयोग नहि कए सकब।’’
कहि आॅफिस स निकलै लगलाह। आॅफिस सँ निकलैत देखि कुरसी सँ उठि प्रध्यानाध्यापक कहलखिन- ‘‘सुबुध बावू, कने सुनि लिय।’’
हेडमास्टरक आग्रह सनि सुबुध रुकि गेलाह। मुस्की दैत कहलखिन- ‘‘की कहलौ मास्साहेब?’’
हेडमास्टरक छातीक धड़कन तेज होइत जाइत छलनि। तेँ बोलीक गति तेज हुअए लगलनि। कहलखिन- ‘‘सुबुधबावू, अहाँ जल्दीवाजी मे निर्णय कए लेलहुँ। अखनो कहब जे अपन कागज वावस लए लिअ।’’
निषंक आ गंभीर स्वर मे सुबुध कहलकनि- ‘‘मास्सैब, आइ धरि अहाँ सभहक संग रहलहुँ, मुदा आब हम बैरागीक संग जाय रहल छी। तेँ एक्को झण एतए अटकैक इच्छा नहि अछि। एक्को पाइ हमरा दुख नहि भए रहल अछि। व्यक्तिगत जिनगी बना अखन धरि जीविलहुँ मुदा आब सामाजिक जिनगी जीवैक लेल जाय रहल छी। तेँ अपनो सँ आग्रह करब जे असिरवाद दिअ।’’
एक दिषि सुबुधक मुखमंडल नवज्योति सँ प्रखर होइत जायत त दोसर दिस हेडमास्टरक मुखमंडल मलिन होइत जाइत छलनि। सुवुधक त्यागपत्रक समाचार षिक्षकक बीच सेहो पहुँचल। सभ षिक्षक अपना कोठरी सँ उठि हेडमास्टरक चेम्बर मे पहुँच गेलाह। दुनू हाथ जोड़ि सुबुध सभकेँ कहलखिन- ‘‘भाय लोकनि, आइ धरिक जिनगी, संगे-संग बितेलहुँ, तहि बीच जँ किछु अधला भेल हुअए, ओ बिसरि जायब। आइ धरि किताबी ज्ञानक बीच ओझरायल छलहुँ मुदा आब ओहि ज्ञान केँ व्यवहारिक धरती पर उताड़ै जाय रहल छी।’’
जहिना सूर्योदय सँ पूर्व थलकमल उज्जर रहैत मुदा सूर्यक रोषनी पाबि धीरे-धीरे लाल हुअए लगैत अछि तहिना सुवुधक हृदय मे समाजक प्रखर रोषनीक प्रवेष स हृदय बदलि गेलनि।
कहि सुबुध तेज गति सँ स्कूलक ओसार सँ निच्चा उतड़ि गेलाह। सुवुधक तेज चालि देखि विवेक बाबू सेहो नमहर-नमहर डेग बढ़वैत सुबुध लग आबि कहलखिन- ‘‘सुबुध भाय, अहाँ जे किछु केलहुँ, अपन विचारक अनुकूल केलहुँ। तेँ ओहि संबंध मे हमरा किछु कहैक नहि अछि। किऐक त जहिया स्कूल मे नोकरी शुरुह केलहुँ आ जते वुझै छेलिऐक ओहि सँ बेसी आइ जरुर बुझै छियैक। तेँ, ओहि दिनक विचारक अनुरुप केलहुँ आ आइ औझुका विचारक अनुकूल कय रहल छी। मुदा हमर अहाँक संबंध सिर्फ षिक्षकेक नहि अछि बल्कि विद्यार्थियोक अछि।’’
सुबुध आ विवेक हाइये स्कूल सँ संगी। हाई स्कूल से कओलेज धरि दुनू गोटे संगे-संग पढ़ने रहथि। मुदा विवेक सँ सुबुध तीनि दिन जेठ रहथि। जे बात सुबुधो केँ आ विवेको केँ वुझल छलनि। स्कूलो मे आ कओलेजो मे सुबुध विवेक स नीक विद्यार्थी रहथि। तेँ, विवेक स अधिक नम्बर परीक्षा मे सुबुध केँ अबैत रहनि। ओना दुनू एक्के डिवीजन सँ पास करैत छलाह मुदा अंक मे किछु तरपट रहैत छलनि। विवेक सुबुध केँ सीनियर बुझैत छथि। जेकर उदाहरण अछि जे जहि दिन दुनू गोटेक बहाली स्कूल मे भेल छलनि ओहि दिन सभ कागजात विवेकक अगुआयल रहितहुँ स्वेच्छा सँ विवेक सुवुध केँ तीन नम्बर षिक्षक आ अपना केँ चारि नम्वर षिक्षकक लेल हेडमास्टर केँ कहने रहथिन। जकरा चलैत सुवुधक बहाली क चिट्ठीक समय बदलि हेडमास्टर रजिष्टर मेनटेन केने रहथि। विवेकक प्रति सुवुध हृदय मे ओइह स्नेह रहनि।
दुनू गोटे विवेकक डेरा अयलाह। डेरा मे अवितहि विवेकक पत्नी चाह बना, दुनू गोटेक आगू मे दए बैठक खाना सँ निकलि खिड़की लग ठाढ़ भए गेलीह। एक जिनगीक टूटैत संबंध सँ कपैत हृदय विवेक बावूक। थरथराइत स्वर मे पूछलखिन- ‘‘एक्को दिन पहिने त इ बात नहि बाजल छलहुँ! अनायास ऐहेन निर्णय कोना कए लेलिऐक?’’
मुस्कुराइत सुवुध उत्तर देलखिन- ‘‘पहिने सँ नियार नहि छल। एहि बेरि जे गाम गेल छलहुँ तखन भेल। जहिना देव-असुर मिलि समुद्र मथन केने रहथि तहिना समाजक मथनक परिस्थिति बनि गेल अछि। जहि लेल हमरो जरुरत समाज केँ छैक। समाजक पढ़ल-लिखल लोक त हमहुँ छी तेँ अपन दायित्व पूरा करैक लेल नोकरी छोड़लहुँ। महान् जिनगीक लेल सेवा जरुरी होइत अछि। जँ नोकरी केँ सेवा कहल जाय त खेत मे काज करैवला बोनिहार केँ की कहबैक? किऐक त मजूरी(बोनि) ले ओहो काज करैत अछि आ नोकरीयो केनिहार। मुदा पेटक(जिनगीक) लेल त कमेबो जरुरी अछि। जँ से नहि करब त खायब की आ दोसर केँ खुऐबै कोना? भूखल केँ भोजन चाही। चाहे ओ अन्नक भूखल हुअए वा ज्ञानक। तेँ चाहे नोकरी होय वा आन उपारजनक काज, ओहि केँ इमानदारी सँ निमाहैत, आगू बढ़ि किछु करब चाहे ज्ञानक क्षेत्र होय वा जीवनक(भोजन, वस्त्र, आवास, चिकित्सा,षिक्षा) ओ सेवा होइत। ज्ञानक सेवा ताधरि अपन महत्वक स्थान नहि पबैत जाधरि ओ जीवन सँ जुड़ि कर्मक रुप नहि लइत अछि। सिर्फ वैचारिके धरातल सँ होइत त मिथिला मे महान्-महान्(पैघ-पैघ) विचारक, मनुष्यक उद्धारक लेल रास्ता बतौलनि। मुदा अखनो समाज मे ओहन मनुक्ख अछिये जे हजारो बर्ख पूर्व मे छलैक। हँ, किछु आगुओ बढ़लनि, इहो बात सत्य अछि। मुदा जे कियो बौद्धिक, आर्थिक- क्षेत्र मे आगू बढलथि ओ पछुआयलक क डेन पकड़ि आगू मुहे खिंचलनि वा पाछू मुहे धकेललनि। जँ बाँहि पकड़ि आगू मुहे खिंचै चाहितथि त एतेक जाति, सम्पद्राय, कार्मकांड पैदा करैक की प्रयोजन? राजसत्ता आ समाजसत्ता- दुनू पछुआयल लोक केँ आरो पाछुऐ मुहे धकेललक।’’
एते कहि सुबुध उठि क’ ठाढ़ होइत कहलखिन- ‘‘आब एक्को क्षण एहिठाम नहि रुकब। हमर बाट रमाकान्त कक्का तकैत होयताह। सुबुध केँ दुनू बाँहि पकड़ि बैसबैत विवेक पत्नी केँ कहलखिन- ‘‘झबदे थारी साठू। साबुध भाय जेवा लेल धड़फड़ाय छथि।’’
भोजन कए सुबुध विवेकक डेरा सँ विदा भए गेलाह। दुनू हाथ जोड़ि विवेक कहलकनि- ‘‘हमरो पर ध्यान राखब।’’
गामक सीमा मे प्रवेष करितहि सुबुध घरक सुधि बिसरि गेलाह। सांैसे गाम परिवारे जेँका बुझि पड़ै लगलनि। एक टक सँ खेत, पोखरि, गाछी-कलम, खढ़होरि देखि मने-मन सोचै लगलथि जँ एहि सम्पत्ति केँ ढंग सँ आगू बढ़ाओल (विकसित ढंग स कएल जाय) जाय त निसचित गामक लोक मे खुषहाली ऐबे करत। अखन धरि जहिना खेत मरनासन्न भए गेल अछि तहिना पोखरि-झाखड़ि सेहो अछि। सबसँ पैघ बात त इ अछि जे लोको दबैत-दबैत एते दबि गेल अछि जे सिर्फ मनुक्खक ढाँचा मात्र रहि गेल अछि। तेँ सभ मे नव चेतना, नव ढंग (करैक क्रिया) नव तकनीकक (नव औजार) उपयोग आवष्यक अछि। तखने षिषिरक सिकुड़ल रुप बसन्तक विकसित रुप मे बदलि सकैत अछि। सोचैत सुबुध राजिनदरक घर लग पहुँचलाह। राजिनदरक घर देखि सुबुध रास्ता छोड़ि ओकरा ओहिठाम गेलाह। राजिनदर केँ तीनि टा घर। अंगनाक एकभाग मे टाट लगौने रहए। दछिनबरिया घर मे मालो बन्हैत छल ओ अपनो बैसार बनौने। बैसार मे दू टा चैकी देने, रहए। एकटा पर अपने सुतैत आ दोसर के पाहुन-परकक लेल रखने रहए। सुबुध केँ देखि राजिनदर चैकी पर स उठि, दुनू हाथ जोड़ि बाँहि पकड़ि चैकी पर वैसौलकनि। सुवुध केँ चैकी पर बैसाय घरवाली केँ दरवज्जे पर से कहलक- ‘‘मास्टर सहाएव ऐला हेन, झव दे एक लोटा पानि नेेने आउ?’’
राजिनदरक बात सुनि गुलबिया लोटा मे पानि नेने आबि ओलती लग ठाढ़ भए गेलि। मुह झँपने। स्त्री केँ ठाढ़ देखि राजिनदर कहलक- ‘‘हिनका नइ चिन्है छिअनि, सुबुध भाइ छथि। मुह किअए झँपने छी।’’
राजिनदरक बात सुनि सुबुध मुस्की दैत बजलाह- ‘‘हम त गाम मे रहितहुँ अनगौँवा भए गेल छी। जहिया से नोकरी शुरु केलहुँ, गाम छुटि गेल। सप्ताह मे एक दिन अबै छी जहि से गाम मे घुरियो-फीरि नहि पबैत छी। तेँ, नहि चिन्है छथि। मुदा आब गाम मे रहै दुआरे नोकरी छोड़ि देलहुँ। आब चिन्हितीह।’’
सुवुधक बात सुनि राजिनदर स्त्री केँ कहलक- ‘‘सुवुध भाय पैघ लोक छथि। जखन दुआर पर पाएर रखलनि तखन बिना किछु खुऔने-पीऔने कना जाए देबनि। जाउ बाड़ी से ओरहावला चारि टा मकैक बालि तोड़ि, ओड़ाहि के नेने आउ।’’
राजिनदरक बात सुनि गुलबिया मुस्की दैत विदा भेलि। राजिनदर सुबुध केँ पूछल- ‘‘भाय नोकरी किअए छोड़ि देलिये?’’
राजिनदरक प्रष्नक सही उत्तर देब सुबुध उचित नहि बुझि कहलखिन- ‘‘नइ मन लागल। अपनो खेत-पथार अछि आब खेतिये करब।’’
चारु ओड़ाहल बालि नोन-मेरिचाइ थारी मे नेने गुलबिया आबि सुवुधक आगू मे रखि, अपने निच्चा मे वैसि गेलीह। मकैक ओड़हा देखि सुवुधतिरपित भए एकटा बालि हाथ मे लए गौर स दाना देखै लगलथि। सुभ्भर बालि। एक्को टा दाना भौर नहि। बालि केँ देखि कहलखिन- ‘‘बड़ सुन्नर मकई अछि। अपना ऐठामक गिरहत ते उपजबितहि नहि अछि जँ उपजौल जायत खूब हेतइ। बेगूसराय, सहरसा आ मुजफ्फरपुर इलाका मे देखै छियै जे मकैयेक उपजा स गिरहस्त धनिक भए गेल अछि। सालो भरि मकैक खेती होइत छैक। जहिना खेती तहिना उपजा। पाँच मन छह मन कट्ठा मकई उपजैत अछि। खाइयो मे नीक। रोटी, सतुआ, भुज्जा, ओरहा सब कुछ मकैक बनैत अछि। बदाम आ मकेक सतुआ त बुझू जे बूढ़क(विनु दाँतवलाक) अमृते छी।’’
वामा हाथ मे बालि दहिना हाथक ओंगरी स दाना छोड़ा मुह मे लइत पूछलखिन- ‘‘राजिनदर भैया, बाल-बच्चा कैक टा अछि?’’
सुवुधक प्रष्न सुनि राजिनदर चुप्पे रहल मुदा गुलबिया बाजलि- ‘‘तीनि भाय-बहीनि अछि। जेठकी सासुर बसै अए। बड़बढ़िया जेँका गुजर चलै छै। दोसरो के विआह केलहुँ। मुदा जमाय बौर गेल। दिल्ली मे नोकरी करैत रहै, ओतइ से बौर गेल ने एक्को टा चिट्ठी-पुरजी पठवै आ ने रुपैया। छह मास बेटी केँ सासुर मे रहै देलिऐ तकर बाद अपने ऐठाम लए अनलियै। दल्लिी से जे कोय आबै आ पुछियै ते कोय कहे दोसर विआह कए लेलक। ते कोय कहै अरब चलि गेल। कोय कहै मलेटरी मे भरती भए गेल ते कोय कहै उग्रवादी भए गेल। कोनो भाँजे ने लागल। आखिर मे चारि बरिस अपना अइठिन बेटी केँ रखलहुँ। मुदा गामो मे तेहेन लुच्चा-लम्पट सब अछि जे अनका इज्जत के कोनो इज्जत बुझै छै। (हाथक इषारा स देखवैत) उ घर देखै छियै, ओहि अंगनाक एकटा छैाँड़ कहियो माछ कीनि के नेने आवे ते कहियो फोटो खिंचवै ले संगे ल जाय। हम दुनू परानी वाध-बोन मे भरि-भरि दिन रहै छलौ। गाम पड़क खेल-बेल वुझवे ने करै छेलिये। जखन गामक लोक कुट्टी-चैल करै लगल तखन वुझलियै। जेठकी बेटी आयल रहए। ओकरा कहलियै। ओ अपने संगे नेने गेलै। दोसर विआह अइ दुआरे नै करियै जे जँ कहीं जमाय जीविते हुअए। जेठके जमाय से विआह कए लेलक। दुनू बहीन एक्के घर मे रहै अए। दुनू केँ सखा-पात छैक। छोट बेटा अछि। ओकरो विआह-दुरागमन कए देलियै।’’
मुस्कुराइत सुवुध पूछलखिन- ‘‘दान-दहेज मे की सब देलक?’’
दान-दहेजक नाम सुनि गुलविया हँसैत कहै लगलनि- ‘‘समैध अपने ऐला। संग मे सार (लड़कीक माम) रहनि। दुआर पर आबिते भोला बापक(घरबला) पुछाड़ि केलनि। हम चिपड़ी पथैत रही। नुआक फाँड़ बन्हने रही। माथ परक साड़ी पसरि क’ गरदनि पर रहए। दुनू हाथ मे गोबर लागल रहै। कना गोवरायल हाथे साड़ी सम्हारितौ। तेँ ओहिना चिपड़ी पथैत रहि गेलहुँ। कोनो कि चिन्हैत रहियै। ओहो ते हमरा नहिये चिन्हैत रहथि। आनठिया ओहो आ अनठिया हमहूँ रही। ओहो मनुक्खे छथि आ हमहूँ मनुक्खे छी तखन बीच मे कथीक लाज?’’
गुलबियाक बात सुनि दाँत पिसैत राजिनदर कहलक- ‘‘आबो एक उमेरक भेलि, तइओ समरथाइक ताव कम्म नै भेलै अए। जेे मन मे अबै छै, बकने जाइ अए।’’
राजिनदरक बात केँ दबैत बाजलि- ‘‘कोनो कि झूठ बात बजै छी जे लाज हैत। मास्टर बौआ कि कोनो अनगैाँवा छथि। जे रस्ते-रस्ते ढोल पीटताह।’’
बिच-बचाव करैत सुुबुध कहलखिन- ‘‘तकर बाद की भेल?’’
- ‘‘ताबे इहो (पति) आयल। दुनू गोरे केँ चैकी पर बैसाय गप-सप करै लगलथि। हमरो गोबर सठि गेल। चलि गेलहुँ। हाथ-पाएर धोय पछबरिया टाट लग ठाढ़ भए गप-सप सुनै लगलौ। लड़कीक माम उचक्का जेँका बुझि पड़ै। मुदा बाप असथिर बुझि पड़ल। वेचारा बड़ सुन्नर गप्प बाजलथि। ओ कहलकनि जे देखू अहाँक बेटा छी आ हम्मर बेटी। दुनिया मे जते लोक अछि ओ अपने बेटा-बेटी ले सबकुछ करै अए। जहिना अहाँ छी तहिना त हमहू छी। जहिना अपन नून-रोटी मे अहूँ गुजर करै छी तहिना हमहूँ करै छी कौआ से खैर लुटाएब मुरुख पन्ना छी। हमरे एकटा पितिऔत सार अपन बेटाक विआह केलक। एक लाख रुपैआ नगद नेने रहए। तते लाम-झाम से काज केलक जे अपनो जे बैंक मे साठि हजार रुपैआ रहै, सेहो सठि गेलइ। हम ओहन काज नइ करब। बेटी-जमाइ केँ एकटा चापाकल गड़ा देवइ। दू कोठरीक मकान बना देबई। एक जोड़ा गाय ली वा महीसि, से देब। लत्ता-कपड़ा (दुनू गोटे के) बरतन-वासन, लकड़ीक सब आवष्यक सामानक संग बिआहक खर्च करब। अहाँ क’ एहि (अइ) दुआरे नहि खर्च कराएब जे जे खर्च भए जेतइ ओ त ओही दुनूक जेतइ की ने। हमरा पसिन्न भए गेल। मन कछ-मछ करै लगल जे सूहकारि ली। मुदा पुरुखक बीच गप चलैत रहै। मनमे इहो हुअए जे जँ कहीं कोनो बाते दुनू गोरे मे रक्का-टोकी भ’ गेल तखन ते कुटुमैतियो नइ हैत। मन कछ-मछ करै लगल। एक बेरि खोंखी केलहु जे ओ(पति) आवए, मुदा से नइ भेल। तखन दुनू हाथे थोपड़ी बजेलहुँ। तइयो सैह। आब कि करितहुँ। काज पसिन्न गर अछि, मुदा जँ कही कोनो बाधा उपस्थित भए गेल तखन त सब नाष भ’ जायत मुह उधारनहि हम दुआर पर गेलहुँ। आगू मे ठाढ़ भए हिनका (पति) कहलिएनि- ‘‘भैया, बड़ सुन्नर बात समैध कहै छथुन भोलाक विआह कए लाय।’’ कहि चोट्टे घुमि के आंगन आबि शरबत बनेलहुँ। अपने से जा क’ तीनू गोटे केँ पिऐलहुँ। कुटुमैती पक्का भए गेल। विआह भए गेलइ।’’
तहि बीच चारु बाइलो सुवुध खा लेलनि। पानि पीबि घर दिसक रास्ता पकड़लनि।
थोड़े दूर आगू बढ़ला पर मनमे अवै लगलनि घर पर जाय कि रमाकान्त काका ऐठाम। दुबट्टी लग ठाढ़ भए गुनधुन करै लगलथि। एक मन होइन जे भरि दिनक थाकल छी, कने आराम करब जरुरी अछि। तेँ, घर पर जाएब जरुरी अछि। दोसर मन होइन जे एहि जुआनी मे जँ आराम करब त जिनगी छुटत। फेरि मन मे भेलनि जे नोकरी छोड़ैक समाचार घर पहुँचाएव जरुरी अछि। तत्-मत् करैत रमाकान्त घर दिसक रास्ता छोड़ि मलहटोलीवला एकपेड़िया पकड़ि घर दिस बढ़लाह। घर लग अबितहि सभकिछ बदलल-बदलल वुझि पड़लनि। जना सभ किछु खुषी सँ मस्त हुअए। दरवज्जाक चुहचुही सेहो नीक वुझि पड़ै लगलनि। दुआर पर आबि कुरता खोलि चैकी पर रखि पत्नी केँ सोर पाड़ि कहलखिन- ‘‘कने एक लोटा पानि नेने आउ। बड़ पियास लगल अछि।’’
पतिक आवाज सुनि लोटा मे पानि नेने अयलीह किषोरी हाथ सँ लोटा लए लोटो भरि पानि पीबि, पत्नी केँ कहलखिन- ‘‘आइ सँ नोकरी छोड़ि देलहुँ विद्यालय मे त्यागपत्र दए देलहुँ।’’
पतिक बात सुनि किषोरी चैंकि गेलीए। मुदा पति-पत्नीक बीच मजाको होइत छलनि। किषोरी केँ सोलहन्नी बिसबास नहि भेलनि मुस्की दइत बजलीह- ‘‘नीक केलहुँ। आठ दिन पर जे भेटि होय छलौ से दिन-राति भेटि होइते रहब। हमरो नीके।’’
किषोरीक बात सुनि सुवुध केँ मन मे भेलनि जे भरिसक समाचार केँ मजाक बुझलनि। दोहरबैत कहलखिन- ‘‘अहाँ मजाक बुझै छी। सत्य वात कहलौ। (जेबी से त्यागपत्रक नकल निकालि) हे देखियौ कागज।’’
तहि बीच मंगल सेहो आयल। मंगल केँ देखि किषोरी ससरि गेलीह। मुस्कुराइत सुबुध मंगल केँ कहलखिन- ‘‘काका, नौकरी छोड़ि देलहुँ। आब गामे रहि खेतियो-पथारी करब आ जहाँ धरि भए सकत समाजक सेवा करब।’’
सुबुधक बात सुनि मंगल कहलकनि- ‘‘बौआ, हम त उमेरे मे ने अहाँ से जेठ छी मुदा अहाँ पढ़लो-लिखल छी, मास्टरियो करै छी तेँ नीके जानि के ने नोकरी छोड़ने हैब।’’
मंगलक बात सुनि सुवुधक मन सवुर भेलनि। मुस्की दैत बजलाह- ‘‘कक्का जाधरि पढ़ल-लिखल लोक समाज मे रहि समाजक क्रिया-कलाप के आगू मुहे नहि धकेलत ताधरि समाज आगू कोना बढ़त।’’
सुवुध आ मंगल गप-सप करतहि रहति कि किषोरी आंगन मे अड़र्ाहट मारि कानै लगलीह। सुवुध बुझि गेलाह तेँ असथिर स वैसले रहलाह। मुदा अकबेराक कानब सुनि टोलक जनिजाति दौड़ि-दौड़ि आवए लगलीह। सैाँसे आंगन जनि-जाति सँ भरि गेलनि। नवानी वाली किषोरी केँ पूछलखिन- ‘‘कनियाँ, की भेल हेन जे ऐना अकलबेरा मे कनै छी?’’
मुदा किछु उत्तर नहि दय किषोरी आरो जोर-जोर सँ कनै छलीह। टोलक जते बहीना, फुल, पान, गुलाब, चान, पार्टनर किषोरीक छलन् िसभ केयो एक्के टा प्रष्न पूछैत छलनि जे- ‘की भेल?’
जते संगी-साथी सभ किषोरी स पूछैकत छलनि तते किषोरी जोर-जोर सँ कनैत छलीह। ककरो कोनो अर्थे नहि लगैक। मुदा अनुमानक बजार तेज होइत जायत छल। कियो किछु वुझैत त कियो किछु।
दरवज्जा पर बैसल-बैसल सुबुध मने-मन खुषी होयत रहति। सोचैत रहथि जे जाधरि पुरना चालि-ढालिक लोकक (चाहे मरद हुअए वा स्त्रीगण) चालि नहि बदलत ताधरि नव समाज कोना बनि सकैत अछि? इ प्रष्न त सिर्फ समाजेक लेल नहि परिवारोक लेल छैक। आ परिवारे किअए मनुक्खोक लेल छैक। तँ सुवुध किछु बजबे नहि करथि।
अकलबेराक समय रहबे करए। बाध दिषि स गाय, महीस, वकरी चरि-चरि अवैत रहय। धसबहिनी घासक पथिया नेने अवैत छलि। गोबर बीछिनिहारि गोवरक छितनी माथ पर नेने अबैत छलि। बुधनी आ सोमनी, घासक छिट्टा माथ पर नेने अबैत छलीह कि सुवुधक अंगना मे कानव सुनलनि। दुनू गोटे अकानि केँ वुझलनि जे सुवुधक कनियाँ कनै छथिन। सोमनी वुधनी केँ कहलखिन- ‘‘बहीनि, छिट्टा रखि केँ चल देखै ले।’’
बुधनी कहलक- ‘‘गै बहीनि अइ चमचिकनी सबहक भभटपन सुनि के की करबीही। भरि दिन चाह-पान घोटैत रहै अए, वुझै अए जे ऐहने दुनिया छै। मरद केँ किछु हुअए मौगी सब रानी छी। जाबे एतए बरदेमे ताबे गामे पर चलि जेमे। घास-भूसा झाड़ब, जरना-काठी ओरिआइब। थैर खर्ड़ब। वासन-कुसन धुअब कि अइ भभटपनवालीक भभटपन सुनब।’’
सोमनी- ‘‘बेस कहले बहीनि। जकरा जते सुख होइ छै ओ ओते कनै अए। अपने सब नीक छी जे कमाई छी खाइ छी। चैन से रहै छी। ‘अइ ललमुही सबहक किरदानी सुनबीही ते हेतउ जे मुहे पर थुक दए दीअए।’
मौलाइल गाछक फुल:ः 10
भरि दिन सुवुधक मन मे अइह खुट-खुटी धेने रहलनि जे जाहि गामक लोक मे एते उत्साह बढ़ल अछि, ओहि गाम मे जँ बिहाड़िक पूर्व हवा खसै त लोकक मन मे अनदेषो बढ़ि सकैत अछि। समाज छियै, के की बाजत की नहि बाजत, तकर कोन ठेकान। कियो कहि सकैत अछि जे, जते विचारक सभ अछि ओ पाइ-कौड़ीक भाँज मे कहीं टौहकी ने लगबैत हुअए। मुदा लोकक धारा के रोकला स खतरो उपस्थित भए सकैत अछि। जहिना अधिक रफ्तार चलैत गाड़ी मे एकाएक ब्रेक लगौला सँ दुर्घटनो भए सकैत अछि तहिना काज मे ढील-ढाल भयला पर भए सकैत अछि। ओना भरि दिन त अपने चक्कर मे फँसल रहलौ, से के बुझत। गामक लोक त गामक काजे भेला सँ बुझताह अचताइत-पचातइत सुवुध रमाकान्त ऐठाम विदा भेला। मुन्हारि साँझ भए गेल छलैक। थोड़े दूर आगू बढ़ला पर, रस्ताक पछबारि भाग रतिया घरक आगू मे, पान-सात गोटे बैसि गप-सप करैत रहथि। एक गोटे अनुभवी जेँका बाजल- ‘‘जे खेतक बँटवाराक ढोल त रमाकान्त कक्का पीटि देलखिन, मुदा बँटै कहाँ छथिन। घनक लोभ ककरा नइ छै। ओ थोड़े खेत बँटतिन्ह। इ सब सबटा धनिक लोकक चालबाजी छियै। लोक थोड़े नीक-अधलाक विचार करै अए, जे सुनलक ओ कौआ जेँका काँय-काँय कए, सगरे गाम बिलहि दैत अछि। मुदा तइ से की, अगर जँ ओ खेत नहिये बँटतिन्ह तेँ कि लोक मरि जायत।’’
रास्ता पर ठाढ़ भए सुवुध सुनलनि। दोसर बाजल ‘जे अपने ठकि-फुसिया केँ एते धन जमा केलक ओ सुहरदे मुहे थोड़े लोक के जमीन दए देतइ। तखन ते गरीबक कपारे मे दुख लिखल छै, से त भोगै पड़तै। केहेन निरलज्ज जेँका रमाकान्त नाचि-नाचि लोक केँ कहलकै।’ एते सुनैत सुबुधक मन मे आगि लागि गेलनि। सोचै लगलाह जे भरि दिन त हमहू अनतै छलहुँ, गाम मे ने ते किछु भए गेलैक। मुदा बिना किछु बजनहि सुबुध आगू बढ़ि गेलाह।
रमाकान्त एहिठाम पहुँचतहि हीरानन्द बाजि उठलाह- ‘‘जिनके चरचा करै छलौ से आविये गेलाह।’’
रमाकान्त सुबुध केँ कहलखिन- ‘‘कैक बेरि तोरा स गप करैक मन भेल मुदा तोँ ते भरि दिन निपत्ते रहलह। कतौ गेल छेलह की?’’
रमाकान्तक बात सुनि सुबुध कहलखिन- ‘‘भरि दिन एते व्यस्त रहलौ जे अखन फुरसति भेल। घर स बहार धरि परेषान-परेषान दिन भरि होइते रहलौ।’’
रमाकान्त- ‘‘की परेषान?’’
- ‘‘काल्हि राति मे जखन ओछाइन पर गेलहुँ त अहाँक कहलाहा बात मन पड़ल। मन पड़ितहि पेट मे घुरिआय लगल। बड़ी काल धरि सोचैत-विचारैत रहलौ। नीनो ने हुअए। अंत मे यैह मन आयल जे जहिना अहाँ अप्पन सब सम्पत्ति समाज केँ दए देलियै तहिना हमहूँ नोकरी छोड़ि, देह स समाजक सेवा करब। जहिना गाड़ी इंजिनक बले चलैत अछि तहिना त समाजो मे इंजिनक जरुरत छैक। तहि बीच एकटा इतिहासक घटना मन पड़ल।’’
इतिहासक घटना सुनितहि उत्सुकता स हीरानन्द पूछि देल- ‘‘की बात मन पड़ल?’’
सुबुध- ‘‘तिब्बत मे एकटा राजकुमार चेन पो नामक भेलाह। ओ अपना राज मे धनी-गरीबक बीच खाधि देखलनि। ओहि खाधि केँ पाटैक लेल अपन सब सम्पत्ति प्रजाक बीच बाँटि देलखिन। मुदा किछुए दिनक उपरान्त फेरि ओहिना केँ ओहिना भए गेलइ।
धनिक धनिक बनि गेल आ गरीब गरीब बनि गेल। राजकुमार क्षुब्ध भए गेलाह जे ऐना किएक भए गेलैक?’’
किस्सा सुनि बिचहि मे शषिषेखर पूछि देलकनि- ‘‘ऐना किऐक भेलई?’’
- ‘‘हम समाजषास्त्रक विद्यार्थी छी तेँ एहि बात केँ जनैत छी। व्यवस्था नहि बदलत ताधरि मनुक्खक जिनगी नहि सुधरत। तेँ हम अपन दायित्व बुझि नोकरी छोड़लहुँ। गामक गरीब स ल’ क’ अमीरधरि आ बच्चा स ल क’ बूढ़ धरि, गाम सभकह छियैक। तेँ हम ओहन हूसल (तिब्वत जेँका) काज नहि करब।’’
रमाकान्तक मन पहिलुके प्रषंसा सुनि कान नेने उड़ि गेलनि, राजकुमारक खिस्सा सुनबे नहि केलनि। मुदा हीरानन्दोक आ शषिषेखरोक नजरि(धयान) ओहि खिस्सा मे घुमै लगलनि। तहि बीच जुगेसर चाह अनलक। सभ कियो चाह पीवै लगलाह। चाह पीबि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘देखू, हम अप्पन सब खेत समाज केँ दए देलिऐक। आब हमरा कोनो मतलब ओहि खेत स नहि अछि। मुदा एकटा बात जरुर कहब जे कोनो तरहक गड़बड़ी समाज मे नहि हुअए। सभकेँ खेत होय।’’
रमाकान्तक बात सुनि शषिषेखर अप्पन विचार रखलक- ‘‘गामक परिवार (गरीब-लोकक) जते अछि ओकरा जोड़ि लिअ आ खेत के जोड़ि, एक रंग क’ बाँटि दिऔ।’’
शषिक विचार सुनि हीरानन्द नाक मारैत कहलखिन- ‘‘ऊँ- हूँ।’’
मुह पर हाथ नेने सुवुध मने मन सोचैत जे कियो एहनो अछि जकरा घरारियो ने छैक। आ कियो ऐहनो अछि जकरा घरारीक संग दू कट्ठा धनखेतियो ने छैक। ककरो पाँचो कट्ठा छैक। जँ जमा सम्पत्ति मे एक रंग केँ देल जाय त सभकेँ एक रंग कोना हेतइ। एहि ओझरी मे सुबुध पड़ल रहलि। हीरानन्द सोचैत जे गरीबो त सभ एक रंग नहि अछि। कियो मेहनती अछि त कियो नमरी कोइढ़। कियो नषाखोर अछि त कियो सात्बिक। गरीबोक स्थिति त विचित्र अछि। लेकिन मूल प्रष्न अछि समाज केँ उपर उठबैक। सभकेँ गुम्म देखि रमाकान्त मुह मे पान लए जरदा फँकैत कहलखिन- ‘‘ऐना सभ गुम्म किअए छी? हम समाजक दाँव-पेंच त नहि बुझै छियै मुदा अहाँ सभ त पढ़ल-लिखल होषगर छी। तखन कियो किछु किअए ने बजै छी।’’
अपन बुद्धिक कमजोरी व्यक्त करैत हीरानन्द सुवुध केँ कहलखिन- ‘‘भाय, जे सोचै छी ओ ओझरा जायत अछि। तेँ अहीं सोझरबैत कहियौ।’’
गंभीर भए सुबुध कहै लगलखिन- ‘‘अप्पन समाज बहुत पछुआइल अछि। पछुआइल समाज मे घनेरो (ढेरो) समस्या, समाढ़ जेँका, पकड़ने रहैत अछि। जे बिना समाधान केने आगू नहि ससरै दइत। मुदा समाधानो त कागज पर नक्षा बनौने नहि होएत। समस्या लोकक जिनगी केँ चुड़ीन जेँका पकड़ने अछि। जहिना चुड़ीन लोकेक देह मे घोसिया अपन करामात करैत अछि तहिना समस्यो अछि। तेँ अखन मात्र दू टा सवाल केँ पकड़ू। पहिल, सभकेँ एक रंग खेत होय। आ दोसर खेतक संग-संग आरो जे पूँजी अछि ओकरो उपयोग ढंग सँ कयल जाय।’’
सुबुध बजितहि रहथि कि विचहि मे जुगेसर टभकि गेल- ‘‘मास्सैव, कनी बिकछा केँ कहियौ। ऐना जे पौती मे राखल वस्तु जेँका झाँपि केँ कहबै, त हम सभ कना बुझवै।’’
जुगेसरक बात सँ सुबुध केँ तकलीफ नहि भेलनि। मुस्कुरा केँ कहै लगलखिन- ‘‘ठीके अहाँ नहि बुझने होएव, जुगे। नीक जेँका बिकछा क’ कहै छी। देखियौ, सिर्फ खेते रहने उपजा नहि भए जाय छैक। ओकरा उपजबै पड़ैत छैक। तामि-कोड़ि कए तैयार करै पड़ैत छैक। बरखा होय वा पटा केँ बीआ पाड़ै पड़ैत छैक। बीआ जखन रोपाउ होयत छैक तखन उखाड़ि क’ रोपल, कमठौन कयल जायत छैक। तखन ने उपजा हैत। खेतक संग-संग मेहनत जे होयत से ने पूँजी भेलैक। मेहनत करै ले ओजारोक जरुरत होइत अछि। ओजारोक नमहर इतिहास रहल अछि। शुरु मे लोक साधारण औजार स काज करैत छल। जेना-जेना औजारो उन्नति करैत गेल तेना-तेना लोकक हालत सुधरति गेल। मुदा अप्पन गाम बहुत पछुआयल अछि। तेँ नव औजार सँ काज करव संभव नहि अछि। नव औजारक लेल अधिक पैसौक जरुरत होइत, जे नहि अछि। अखन साधारणे औजार सँ काज चलवै पड़त। जेना-जेना हालत सुधरैत जायत तेना-तेना औजारो सुधरैत जायत।’’
सुबुधक बात सुनि जुगेसर भक द’ निसांस छोड़ि बाजल- ‘हँ’ आब बुझलौ। सुआइत लोक कहै छै जे पढ़ि-लिख केँ जँ हरो जोतब तँ सिराउर सोझ हैत।’’
हीरानन्द बजलाह- ‘‘बड़ सुन्दर बात कहलिऐक सुबुध भाइ। आब खेतक बँटवाराक संबंध मे कहियौक।’’
कनडेरिये आखिये हीरानन्द केँ देखि सुबुध कहै लगलखिन- ‘‘हीरा बाबू, गाम मे जते गरीब लोक छथि (एक बीघा खेत स निच्चा वला) हुनका सभ केँ एक-एक बीघा खेत भए जेतनि। सिर्फ रमाकान्ते कक्का वला जमीनटा नहि हुनका अपनो जमीन ओहि मे जोड़ा जेतनि। जना देखियौ जे किनको घरारियो नहि छन्हि हुनका बीघा भरि खेत दिअए पड़त। मुदा जिनका पाँच कट्ठा छन्हि हुनका त पनरहे कट्ठा दिअए पड़त। ततबे नहि जिनका ओहू स बेसी छन्हि, हुनका आरो कम दिअए पड़त।’’
सुबुधक बात सुनि रमाकान्त ठहाका मारि बजलाह- ‘‘बड़ सुन्नर, बड़ सुन्नर। बड़ सुन्नर विचार सुवुधक छनि। आब रातियो बेसी भए गेल। खाइओ-पीबैक बेरि उनहि जायत। रोटी गरमे-गरम खाई मे नीक होइ छै। तेँ आब गप-सप छोड़ू। काल्हि भोरे ढोलहो दए सबकेँ बजा लेवनि, आ सभहक बीच मे अपन निर्णय सुना देवन्हि। खेत बटैक भार हुनके सभ पर छोड़ि देवनि। नहि ते अनेरे हो-हल्ला करताह।’’
भोरे ढोलहो पड़ल। एक त’ ओहिना सभहक कान ठाढ़ रहनि, तहि पर स ढोलहो पड़ल घरा-घरी सभ पहुँचलाह। जहिना केस लड़निहार फैसला सुनै ले उत्सुक रहैत अछि तहिना बैसार मे सभ रहथि। अस्सी बरखक सोने वाबा सेहो आयल रहति। ओना सोनेला बाबा केँ अपने अढ़ाई बीघा खेत छन्हि मुदा गाम मे नब उत्सवक उत्साह स आयल छलाह। बैसले-वैसल ओ मूड़ी उठा क’ देखि बजलाह- ‘‘कोनो टोलक कियो छुटलो छथि। सभ अपन-अपन टोलक लोक केँ गनि लिअ।’’
सोनेबाबाक गप सुनि सभ अपन-अपन टोलक लोक मिलबै लगल। सिर्फ दू आदमी बैसार मे नहि आयल छलाह। दुनू टोलक दू आदमी केँ पठा दुनू केँ बजौल गेलनि। दुनू आदमी केँ देखितहि सोनेवाबा पूछि देलखिन- ‘‘तोरा दुनू गोटे केँ ढोलक अवाज कान मे नहि पहुँचल छलौ?’’
बौका बाजल- ‘‘ढोलहो ते बुझलियै। मगर नोकरी करै छी ने, ने माए-बाप अछि आ ने बहू तखन खेत ल’ क’ की करब? विआहो होइते ने अछि। लोक ढहलेल वुझै अए। तखन अनेरे किअए अबितौ।’’
बौकाक बात सुनि सोनेबाबा मूड़ी डोला स्वीकार केलनि। दोसर, आब गोसैमा बाजल- ‘‘हम दुनू परानी ते (अहाँ आगू मे नहि) बूढ़े भेलौहुँ की ने। बेटा अछिये नहि। ल’ द’ क’ एकटा ढेरबा बेटी अछि। ओकरो विआह अइवेर कइये देवइ। विआह हेतइ अपन घर जायत। भोगिनिहार के रहत जे अनेरे हम खेत लेब।’’
गोसैमोक विचार सुनि सोनेबाबा मूड़ी डोला स्वीकार केलनि। दुनू गोटेक(बौका आ गोसाईक) बात सुनि सोनेबाबा सोचै लगलथि जे समाज मे दू टा परिवार कमि जायत। तेँ दुनू परिवार के त नहि बचाओल जाय सकैत अछि, मुदा दुनू केँ जोड़ि कए एकटा परिवार त बनाओल जाय सकैत अछि। कहलखिन- ‘‘बौका त सिर्फ नामक अछि। केहेन बढ़ियाँ बजै अए। गोसाईओक बेटी आन गाम चलि जेतइ। जहि से दुनू गोटे (बाप-माए) केँ बुढ़ाढ़ी मे दुख हेतइ। तेँ बौकाक विआह गोसाईक बेटी सँ करा देने एक परिवार भए जायत।’’
सोनेवबाक विचार सुनि अधा सँ बेसी गोटे समर्थन कए देलक। मुदा किछु गोटे विरोध करैत बजलाह- ‘‘एक गाम मे (लड़का-लड़कीक) विआहक चलनि त नहि अछि। जँ हैत त अनुचित हैत।’’
धड़फड़ा के लखना उठि जोर से बाजल- ‘‘कोन गाम आ कोन समाज ऐहेन अछि जहि मे छैाँड़ा-छैाँड़ी छह-पाँच नहि करैत अछि। चोरा क’ छह-पाँच केलक से बढ़बढ़िया मुदा देखाकेँ करत से बड़ अधला हेतैक।’’
लखनाक विचार केँ सभ सहमति दए देलनि। दुनूक विआहक बात पक्का भए गेल। सुबुधक मन मे फेरि एकटा प्रष्न उठि गेलनि जे दुनू परिवार (वौका आ गोसाईक) केँ एक मानि जमीन देल जाय वा दू मानि। तर्क-वितर्क करैत मिला केँ एक परिवार मानि हिस्सा दइक सहमत बनल।
फेरि प्रष्न उठल जे जमीनक नाप-जोख के करत? रमाकान्त कहि देलखिन जे अपने मे अहाँ सभ बाँटि लिअ।’’
सुवुधोक मन मे भेलनि जे रमाकान्त कक्का ठीके कहलनि। काज केँ बाँटि कए नहि करब त गल्ती हएत। सभ काज जँ अपनहि करै चाहब ते एते गोटे जे समाज मे छथि ओ की करताह। जँ कहीं कोनो गलतियो हेतइ त सुधरि जेतइ। कहलखिन- ‘‘खेत नपैक लूरि कते गोटे केँ अछि? किऐक त जँ अमीन लए केँ बँटवारा करब ते बहुत खर्च होयत। जे खर्च बँटै मे करब ओहि पैसा से दोसरे काज किअए नेहि कए लेब। पैसाक काज त बहुत अछि तेँ अन्ट सन्ट खर्च नहि कए सुपत-सुपत खर्च करब नीक होयत। देखते छियै जे जहिना देषक संविधान ओकील केँ सालो भरि हरियरी देने रहैत अछि, तहिना त सर्वेओ अमीनकेँ अछि। कौआ सँ खैर लुटाएव नीक नहि। जहिना अहाँ सभ केँ मंगनी मे खेत भेटि रहल अछि तहिना सही-सलामत हाथ मे खेत चलि जाय। जँ अमीन सभहक भाँज मे पड़ब ते ओहिना हैत जहिना लोक कहै छै ‘जते मे बहू नहि तते मे लहठी’ कीनव हैत।’’
सुवुधक बात सुनि, जोष मे बिलटा उठि क’ ठाढ़ भए बाजल- ‘‘माघ मास स ल’ क’ जेठ धरि हम सभ खेत तमिया करै छी। कोनो एक्के साल नहि, सभ साल करै छी। सेहो कोनो आइये से नहि जहिया से ज्ञान परान भेल तहिये से। कोन अमीन आ कमिष्नर नपै ले अवै अए। अपन गामक कोन बात जे चरिकोसी मे तमनी करै छी। ततबे नहि, नेपालो जा-जा तमै छी। ततवे नहि साले-साल नपैत-नपैत त सैाँसे गामक खेत जनै छी जे कोन खेत कते अछि, तेँ नपैक जरुरतो ने अछि। मुहजवानिये कहि देब जे कोन कोला कते अछि। एक गोरे कागज पर लिख लिअ जे ककरा कते खेत देवइ। हमरा कहैत जायब, हम कोला फुटवैत जायब। एकटा पंडी जी, बड़बढ़िया नाम कहने रहथिन मुदा मन नइ अछि, जे ओ तीनिये डेग मे दुनियाँ के नापि लेने रहथि। तहिना हमहूँ तीनि डेगक लग्गी बना एक गामक कोन बात जे परोपट्टाक जमीन नापि देब।’’
बिलटाक बात सुनि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘बड़बढ़ियाँ, बड़बढ़ियाँ। सभ केयो उठि-उठि विदा भेलाह।
बेर झुकतहि सैाँसे गामक स्त्रीगण, ढेरबा बच्चिया छोटका-छोटका ढेन-बकेन चिकनी माटिक खोभार दिषि विदा भेल। सभहक हाथ मे खुरपी-पथिया। सभकेँ हाथ मे खुरपी पथिया नेने जाइत देखि श्रीचन मने-मन सोचे लगल जे ऐना किअए लोक कए रहल अछि। दसमिओ ते अखन नहि एलै। कोनो पावनियो-तिहार नहिये छियैक। तहन स्त्रीगण मे ऐना उजैहिया किअए उठि गेलइ। कोन बुढ़िया जादू तरे-तर गाम मे पसरि गेल जे मरद बुझबे ने केलक आ मौगी सभ बुझि गेल। अनकर कोन अपनो घरवाली रमकल जाइत अछि। जते श्रीचन सोचै ओते ओझरिये लगल जाय। तत्-मत करैत रुदल ऐठाम विदा भेल। रुदलक घर लगे मे। श्रीचने जेँका रुदलो छगुन्ता मे पड़ल रहए श्रीचन केँ देखितहि रुदल पूछि देलकै- ‘‘आँइ हौ श्रीचन भाइ, मौगी सभ केँ कथीक रमकी चढ़लै जे एते रौद मे माटि आनै ले जाइये।’’
रुदलक बात सुनि श्रीचन आरो छगुन्ता मे पड़ि गेल। मन मे एलै जे हम गाम पर नइ छलौ तेँ नइ, बुझलिऐक। मगर इ त गामे पर रहए। किअए ने बुझलिकैक। फेरि सोचलक जे जखन घरवाली माटि ल’ क’ आओत ते पूछि लेवए। मन असथिर भेलै। मुदा रुदलक मुहक रंग स बुझि पड़ै जे कत्ते भारी काज स्त्री बिना पुछिनहि कए लेलकै। भीतर स खुष मुदा उपर स गंभीर होइत श्रीचन रुदल केँ पूछलक- ‘‘आँइ हौ रुदल भाइ, तोरा भनसिया से मिलान नइ रहै छह जे बिन पुछनहि चलि गेलखुन।’’
श्रीचनक मनक बात नहि बुझि खिसिया केँ रुदल बाजल- ‘‘की कहिह भाइ, मौगी पर विसबास नै करी। जखैन अपन काज रहतै ते हँसि-हँसि बजतह, मुदा जखैन तोरा कोनो काज हेतह ते कहतह जे माथ दुखाइ अए।’’
मुह दाबि श्रीचन मने-मन खूब हँसैत मुदा रुदल तामसे भेरि होइत जाइत। विदा होइत श्रीचन कहलकै- ‘‘जाइ छिअए भाय। मौगी सभहक किरदानी देखि हमरा किछु फुरबे ने करै अए।’’
सह पाबि रुदल गरजि उठल- ‘‘बड़बुधियार मौगी सभ भए गेल होँ चलै चलह ते हमरा संगे कोदारि पाड़ए।’’
थोड़े दूर आगू बढ़ि श्रीचन रुकि केँ कहलकै- ‘‘भाय की करबहक, आब मौगिये सभहक राज भेलई।’’
- ‘‘हमरा कोन राज-पाट से मतलब अछि हर जोतै छी, कोदारि पाड़ै छी, तीन सेर कमा के अनै छी, खाइ छी। एते दिन पुरखे चोर होय छले आब मौगियो चोरनी हैत। भने जहल जायत आ पुलिसवा से यारी लगौत।
श्रीचन बढ़ि गेल। रुदल, दुनू हाथ माथ पर लए सोचै लगल।
सभ केयो माटि आनि-आनि अपन-अपन अंगनाक माटिक ढेरी पर रखलनि। धामो-पसीने सभ तर-बत्तर रहति। कने काल सुसतेलाक उपरान्त दिआरी बनबै लेल मुंगरी, लोढ़ी स माटि फोरै लगलीह। मेही स’ माटि फोड़ि, इनार कल से अछीनजल पानि भरि-भरि अनलनि। माटि मे पानि दए सानै लगलीह सुखल माटि मे पानि पड़ितहि सोन्हगर सुगंध सैाँसे गाम मे पसरि गेल। गामक हबे बदलि गेल। जहिना साझू पहर के सिंगहार फूल, राति रानी सँ वातावरण महमहा जायत तहिना माटि-पानि सँ जनमल सुगंध गामकेँ महमहा देलक। माटि सानि, छोट-छोट दिआरी सभ बनबै लागलि। दिआरी बना, पुरान साफ सूती वस्त्रके फाँड़ि-फाँड़ि दहिना हाथक तरहस्थी सँ जाँध पर रगड़ि-रगड़ि टेमी बनौलनि। टेमी बना दिआरी मे कड़ूतेल दए टेमी सजौलनि। दिआरी सजा सभ केयो फुलडाली मे त कियो चंगेरी मे त कियो छिपली मे त कियो केराक पात पर रखलनि। दिआरी रखि सभ नहेलीह अजीब दृष्य। नव उत्सव। नव जिज्ञासा। नव आषा सभहक मे छलनि। सुरुज डूबबो नेहि कयल, मुदा निच्चा जरुर उतड़ि गेल रहति, गाछो सब परक रौद बिला गेल छलैक सभ अपन-अपन गोसाउनिक घर जा सिरा आगू मे दियारी लेसिलनि दियारी लेसि, एकटंगा द आराधना करै लगलीह जे आइल लछमी पुनः पराइत नहि।’ गोसाई केँ गोड़ि लागि सभ गामक देव स्थान सब दिषि चललीह। अपन-अपन आंगन मे त सभ असकरे-असकर छलीह मुदा आंगन स निकलितहि देवस्थान दिषि विदा होइतहि संगबे सभ भेटेँ लगलनि। संगबे मिलितहि सभ, जहि स्थान दिषि जाइत रहथि ओहि देवताक, गीत गबै लगलीह। सैाँसे गाम, सब रास्ता मे, एक नहि अनेक समूह गीत गवैत मगन स देवस्थान पहुँचै लगलीह। सभहक मन मे जमीनक खुषी तेँ सभ देवतो केँ मुस्कुराइत सभ देखति। सभहक मन मे नचैत जे एक सँ एक्कैस हुअए।
दियारीक इजोत जेँका गामक सभ गरीब-गुरबाकेँ, आषाक दीप खेत पाबि जरै लगलनि। हजारो बर्ख स पछुआबैत गरीबी केँ एकाएक आड़ि पड़ि गेल। सभ कियो, नव-नव योजना, मन मे बनबै लगलाह। जहि स जिनगी दुखक बेड़ी केँ टपि सुखक सीमा मे पएर रखलनि। नव जिनगी जीवैक उत्कंठा सभहक मन मे जगलनि।
मौलाइल गाछक फुल:ः 11
खेत भेटिला स भजुआक सभ समांगक विचारो बदललनि। नवो बापूत बैसि विचार करै लगल जे जहिना रमाकान्त काका हमरा सभकेँ रखि लेलनि तहिना हमहूँ सभ समाजक एक अंग बनिकेँ रहब। सबसँ पहिने रमाकान्त, सुबुध शषिषेखर आ मास्टर सहाएवकेँ अपना ऐठाम भोजन करैवनि। मुदा अखन धरिक जे हमरा सभहक चालि-ढालि रहल अछि ओकरा त अपनहि बदलै पड़त। अंगना-घर आ दुआर-दरवज्जाक जे छिछा-बिछा अछि ओ नीक लोकक बैइसै जोकर नहि अछि। सभ दिन अपना ऐहने मे रहलौ तेँ रहै छी, मुदा नीक लोक ऐहेन जगह मे कोना औताह। देखिये केँ मन भटकि जेतनि। तेँ, पहिने सभ सवांग भोरे से दुआर-दरवज्जा, अंगना-घर केँ चिक्कन-चुनमुन बनाबह। मरदो आ मौगियो जे भदौस जेँका नुआ-बसतर बनौने रहै छी ओकरो बदलह। जखन अपन काज करै छी तखन जे फटलो-पुरान आ मइलो-कुचैल कपड़ा पहिरै छी ते बड़बढ़िया। मुदा जखन किनाको नोत दए क’ खाय लेे बजेबनि तखन ऐहेन बगए-बानि से काज नइ चलत। भजजुक जेठ बेटाक सासुर दरभंगा बेला मोड़ पर अछि। जखन ओ सासुर जात आ ओहिठाम रहल-सहन, बात-विचार देखैत त मन जरुर आगू मुहे बढ़ैक कोषिष करैत अछि। मुदा गामक जे गरीबीक अवस्था छैक ओ सब विचार केँ दाबि दइत छैक। मुदा तइओ दरभंगाक देखल परिवार नजरि मे त रहबे करैक। झोलिया(भजुआक जेठ बेटा) सातो भाइक भैयारी मे सबसे जेठ। तेँ सभ भाय झोलियाक बात मानैत अछि। झोलिया कहलक- ‘‘सातो भायक बीच रमाकान्त बाबा सात बीघा जमीन देलखुन। पाइ ते एक्कोटा नै लेलखुन। दुनियाँ मे ककरा के ऐना दइ छै। जेँ हुनका मन मे हमरो सभहक प्रति दया एलनि, तेँ ने। तहिना हमहू सभ हुनका ओते पैघ बुझि, आदर करबनि। गामे मे भाड़ा पर कुरसी, समेना, शतरंजी, जाजीम, सिरमा सब भेटै अए। जहिना बरिआतीक लेल लोक सब व्यवस्था(भोजन स’ ल’ क’ रहै तक) करै अए तहिना हमहू सभ करब।’’
झोलियाक विचार सुनि सभ कियो (छवो भाइयो आ बापो-पित्ती) मूड़ी डोला समर्थन क’ देलक। झोलिया फेरि बाजल- ‘‘बाउ, तू रमाकान्त बाबा ऐठाम चलि जैहह। हुनका चारु गोटे केँ नतो दए दिहनु आ संगे-संग बजेनहु अबिहनु। दू भाय रहैक जोगार (भाड़ा पर सब समान आनि) करिहह। दू सवांग बजार से खाइक सब समान कीनि आनह। सभ सब काज मे भोरे से लगि जैहह।
दलान पर बैसि रमाकान्त आ हीरानन्द चाहो पीबैत रहति आ गामेक गप-सप करैत रहथि। गामक गप-सप करैत रमाकान्तक नजरि वौएलाल आ सुमित्रा पर गेलनि। गिलास रखि रमाकान्त हीरानन्द केँ बौआ(महेन्द्र) कहने रहथि जे छअ मास सिखा-पढ़ा दुनू गोटे केँ पठा देब मुदा अखन धरि किऐक ने आयल?’’
हीरानन्द- ‘‘जे कोनो कारण भेल हेतै तेँ ने अखन धरि नहि आयल अछि। ओना चिकित्सा कठिन विद्या थिक। सुढ़िआइ मे त किछु समय लगवे करतैक।’’
दुनू गोटे गप-सप करिते रहथि कि भजुआ आबि रमाकान्त केँ गोड़ लगलकनि। रमाकान्त केँ गोड़ लागि हीरानन्दो केँ लगलकनि। हीरानन्द केँ गोड़ लगितहि, ओ असिरवाद दैत पूछलखिन- ‘‘भजू भाइ, नीके रहै छह की ने?’’
‘हँ मास्टर बौआ। हमरा ते गाम से भगैक नौवत आबि गेल छलए। मुदा (रमाकान्त दिषि देखि) कक्का नै भागै देलनि।’’
- ‘‘से की, से की- हलचल शब्द मे रमाकान्त पूछलखिन।
गाम मे बसैक खिस्सा भजुआ कहै लगलनि- ‘‘एहि गाम मे पहिने हम्मर जाति(डोम) नै छल रहए। मुदा डोमक काज त सब गाम मे जनम स मरन धरि रहै छै। हमरा पुरखाक घर गोनबा रहै। पूभर से कोसी अबैत-अबैत हमरो गाम लग चलि आयल। अखार चढ़िते कोसी फुलेलै। पहिलुके उझूम मे तेहेन बाढ़ि चलि आयल जे बाधक कोन गप जे घरो सब मे पानि ढूकि गेल। तीन दिन तक, ने माल-जाल घर से बहरायल आ ने लोके। पीह-पाह करैत सभ समय बितौलक। मगर पहिलुका बाढ़ि रहै तेसरे दिन सटकि गेल। हम्मर बावा दुइये परानी। ताबे हम्मर बाउ नै जनमल रहै। बाढ़िक पानि सटैकिते दुनू गोरे दसो टा सुगर आ घरक समान लए गाम से विदा भ’ गेल। जखैन गाम से विदा भेल ते दादी बाबा के कहलकै- ‘‘अनतै कत’ जायब। हमरो माए-बाप जीविते अछि तेँ ओतै चलू। बबो मानि गेल। दुनू परानी अही गाम देने जाइत रहै। गाम मे अबिते सुगर के चरै ले छोड़ि देलकै आ अपने दुनू परानी सुसताय लगल। अइ गाममे डोम नहि तेँ गामक बेदरा-बुदरी सब सुगर देखै ले जमा भ’ गेल। गामो मे हल्ला भए गेलै। गामक बाबू-भैया सब आबि हमरा बाबा के कहलकै जे अही गाम मे रैह जा। हमर बाबा रहि गेल। गामक कात मे एकटा परती रहै। ओही परती पर एकटा घर सब (बाबू-भैया) बना देलकै। ओइ दिन मे परती नमहर रहै। मगर चारु भाग जोता खेत रहै। चारु भागक खेतवला सभ परती के छाँटि-छाँटि खेत मे पीअवैत गेल। परती छोट होइते गेलै। रहैत-रहैत घर-आंगना आ खोबहारे भरि रहलै। मगर तइयो दिक्कत नै होय। हमर बाउओ भैयारी मे असकरे। मुदा हम दू भाइ भेलौ। जखैन दुनू भाय भिन्न भेलौ ते घरारियो बँटा गेल आ गिरहतो। मुदा तइयो गुजर मे दिक्कत नै हुअए। अखैन दुनू भायक बीच सात टा बेटा अछि। चारि टा हमरा आ तीनटा भेए के। गुजर ते कमा के सब क’ लइत अछि मुदा घरक दुख ते सबके होइते छै।
भजुआक खिस्सा सुनि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘आब ते बहुत खेत भेलह?’’
- ‘‘हँ कक्का! कते पीढ़ी आनन्द से रहब। अखैन घर ते नै बन्हलौ मुदा खेती केनाई शुरु क’ देलियै।’’
बिचहि मे हीरानन्द पूछलखिन- ‘‘सबेरे-सबेरे केम्हर चललह, भज्जु भाय?’’
भजुआ- ‘‘राति मे सभ सवांग विचारलक जे जहिना रमाकान्त कक्का सभकेँ समाजक अंग बना खेत देलनि तहिना हमहू सभ हुनका नोत दए खुऐबो करबनि आ धोती पहिरा विदाइयो करबनि। तेँ नोत दइ ले एलौ हेँ।’’
न्योतक नाम सुनितहि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘कहियाक नोत दइ छह?’’
ऐहो तीनू गोटे- सुबुध, शषि आ हीरानन्द- जेथुन। हिनको सभ केँ कहि दहुन।’’
- ‘‘हँ कक्का, अहीं टा केँ थोड़े लए जायब। हिनको सभ केँ लए जेबनि। ऐठाम ते अहीं दू गोरे छी। शषिभाइ आ सुबुध भाइ नइ छथि। ताबे अहाँ दुनू गोरे नहाउ-सोनाउ, हम ओहू दुनू गोरे के बजौने अबै छिअनि।’’
हीरानन्द- ‘‘औझुके नोत दइ छह?’’
- ‘‘हँ, मासटर सहायब!’’
रमाकान्त- ‘‘बड़बढ़िया! शषि त पोखरि दिस गेलखुन, अबिते हेथुन। ताबे सुबुध केँ कहि अवहुन।’’
भजुआ सुबुध ऐठाम विदा भेल। चाह पीबि सुबुध दुनू बच्चा केँ पढ़बैत रहथि। भजुआ केँ देखितहि सुबुध पूछि दलखिन- ‘‘भज्जु भाइ, केम्हर-केम्हर?’’
प्रणाम कए भजुआ कहलकनि- ‘‘भाइ, अहीं ऐठाम ऐलौ हेँ। रमाकान्तो कक्का के कहि देलियनि आ अहूँ के कहै ले एलौ हेँ।’’
‘की कहै ले ऐलह?’
‘‘नोत(नत) दइ ले एलौ।’’
‘कोन काज छिअह?’
‘‘काज-ताज नै कोनो छी। वहिना अहाँ चारु गोरे के खुअवैक विचार भेल।’’
भजुआक बात सुनि सुबुधक मन मे द्वन्द्व उत्पन्न भए गेलनि। मन मे प्रष्न उठलनि जे भजुओ त अही समाजक अंग छी। जहिना शषीर मे नीक सँ नीक आ अधलाह स’ अधलाह अंग अछि, जहि सँ शरीरक क्रिया चलैत अछि तहिना त समाजो मे अछि। मुदा शरीर आ समाज केँ तँ एक नहि मानल जायत। समाज मे जाति आ सम्प्रदाय एहि रुपे पकड़ि नेने अछि जे सभ सँ उपरो अछि आ निच्चो अछि। एक दिस धर्मक नाम पर सभ हिन्दू छी मुदा जाति रंग-बिरंगक भीतर मे अछि। एक जाति दोसर जातिक ने छुवल खायत अछि आ ने कथा-कुटमैती करैत अछि। ततवे नहि हिन्दूक जे देवी-देवता छथि ओहो बटायल छथि। देवी-देवता केँ एक जाति मानैत अछि दोसर नहि मानैत अछि। जँ मानितो अछि ते ने हुनकर पूजा करैत छथि आ ने परसाद खाइत छथि। भरिसक हृदय सँ प्रणामो नहि करैत छथि। मने-मन अछोप, शूद्र इत्यादि देवतो बुझैत छथि। अगर जँ इ प्रष्न हल्लुक-फल्लुक रहैत त कोनो बात नहि! मुदा प्रष्न त जड़िआयल छैक। ऐहेन ने हुअए जे नान्हि टा प्रष्नक चलैत समाज मे विस्फोट भए जाय। समाजक लोक एहि दुनू प्रष्नक बीच तेना ने बन्हायल अछि जे जिनगीक सबसँ पैघ वस्तु एकरे बुझैत छथि। जहन कि छी नहि। मुस्कुरायत सुवुध भजुआ केँ कहलखिन- ‘‘ताबे तूँ रमाकान्त कक्का ऐठाम बढ़ह। हम नहेने अवै छी।’’
भजुआ विदा भेल। मुदा सुवुध मने-मन सोचिते रहलाह जे की कयल जाय। तर्क-वितर्क करैत सुवुधक मन धीरे-धीरे सक्कत हुअए लगलनि। अंत मे एहि निष्कर्ष पर पहुँच गेलाह जे जाधरि एहि सब छोट-छीन बात केँ कड़ाई सँ पालन नहि कयल जायत ताधरि समाज आगू मुहे नहि ससरत। समाज केँ पछुअबैक इहो मुख्य करण थिक। तेँ एकरा जते जल्दी हुअए तोड़ि देव उचित हैत। इ बात मन मे अबितहि सुवुध नहाइ ले विदा भेला। नहा क’ कपड़ा पहीरि रमाकान्त ऐठाम विदा भेला। जाबे सुबुध रमाकान्त एहिठाम पहुँचथि तावे रमाकान्त शषिषेखर आ हीरानन्द नहा क’ कपड़ा पहीरि तैयार रहथि। सुबुध केँ पहुँचतहि हीरानन्द कहलखिन- ‘‘सुबुधो भाइ आबिये गेलाह। आब अनेेरे बिलम्ब करब उचित नहि।’’
सुबुध बैसबो नहि कयला। सभ क्यो विदा भए गेलाह। आगू-आगू रमाकान्त पाछू-पाछू सभ। थोड़े दूर आगू बढ़ला पर हीरानन्द भज्जु केँ पूछलखिन- ‘‘कथी सबहक खेती केलह हेँ भज्जु?’’
मजबूरीक स्वर मे भज्जु कहै लगलनि- ‘‘भाई, अपना बड़द नै अछि। कोदारियो ने छले मुदा छउरा सब जोर केलक आ दस गो कोदारि कीनि अनलक। सब बापूत भोरे सुति क’ उठै छलौ आ खेत तामए चलि जाइ छलौ। पनरह दिन मे सब खेत तामि लेलहुँ। बड़बढ़िया जजात सब अछि। अइबेर हैत ते बड़दो कीनि लेब।’’
जखन खेत भेलह ते बड़द किअए ने कीनि लेलह?’’
‘एक्के टा दिक्कत नइ ने अछि। बड़द कीनितौ ते बान्हितौ कते। खाइ ले की दैतिअइ। अगर सब काज-बड़द कीनिनाइ, घर बनौनाइ, खाइक जोगार केनाइ- एक्के बेरि शुरु करितौ ते ओते काज पार कना लगैत। तेँ एका-एकी सब काज करब।’’
‘‘बड़ सुन्दर विचार केलह?’’
गप-सप करैत सभ भजुआ एहिठाम पहुँचलाह। घरक आगू मे दू कट्ठा जमीन। ओहि मे समियाना टँगने। एक भाग कुरसी लगौने। दोसर भाग शतरंजी, जाजीम, तकिया लगौने। भजुआक सभ सवांग-मरद स मौगी धरि नहा क’ नवका वस्त्र पहीरिने। जहिना कतौ बरिआतीक व्यवसथा होइत छैक। तहिना व्यवस्था केने अछि। व्यव्स्था देखि चारु गोटे क्षुब्ध भए गेलाह। किनको बुझिये नहि पड़ैत जे डोमक घर छियै। चारु गोटे चारु कुरसी पर बैसलाह कुरसी पर वैसितहि भजुआक एकटा बेटा शरवत अनलक। सबसँ पहिने रमाकान्त दू गिलास सरबत पीवि, ढकार करैत कहलखिन- ‘‘आब पान खुआबह।’’
जते काल सरबत पीवथि, तहि बीच भजुआक पोती चाह नेने आवि गेली। हाँइ-हाँइ केँ शषिषेखर सरबत पीलनि। स्टीलवला कप मे चाह। शुद्ध दूधक बनल। ने अधिक मीठ आ ने फिक्का। चाहक रंगो तेहने। तइ पर काॅफी चक-चक करैत। चाह पीवैत-पीवैत रमाकान्तक पेट भरि गेल। भरिआइल पेट बुझि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘ई तीनू गोटे- कुरसी पर बैसताह, हम ओछाइने पर पड़ब।’’ कहि उठि क’ ओछाइन पर जाय पड़ि रहलाह। पान आयल। सभ क्यो पान खेलानि। मुह मे पान सठबो नहि कायल छलनि कि जलखै करैक आग्रह भजुआक केलकनि। भजुआक आग्रह सुनि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘हम ओछाइने पर खायब। हुनका सभ केँ टेबुल पर दहुन।’’
भजुआक सभ सवांग दासो-दास रहए। जखन से चारु गोटे अयलाह तखन से भजुआक परिवार मे नव उत्साहक लहरि उमरि पड़लैक। की मरद की स्त्रीगण। जे स्त्रीगण सदिखन झगड़े मे ओझरायल रहैत छलि, सभक मुह मे हँसी छिटकैत। मनुक्खे एहि दुनियाक सबसँ पैघ कर्ता-धर्ता छी इ विचार सभक मन मे नचै लगलनि। भजुआक पोती, जेकर मात्रिक दरभंगा छियै आ ओतै बेसी काल रहबो करैत अछि, हाइ स्कूल मे पढ़बो करैत अछि, ओकर संस्कार आ काज करैक ढंग देखि सुबुध आ हीरानन्द आखियेक इषारा मे गप करै लगलथि। आँखिऐक इषारा मे सुवुध कहलखिन- ‘‘जँ मनुख केँ नीक वातावरण भेटइ त ओ किछु सँ किछु कए सकैत अछि। चाहे ओकर जनम केहनो गिरल परिवार मे किएक ने भेलि होय।’’
सुवुधक बात सुनि हीरानन्द कहलखिन- ‘‘इ सब ढोंग छी जे लोक कहैत अछि जे पूर्व जनमक कर्मक फल लोक एहि जनम मे पबैत अछि। हँ, जँ एकरा एहि रुपे मानल जाय जे एहि जनमक पूर्व पक्ष पर पछातिक जिनगी निर्भर करैत अछि, त एक तरहक विचार होय। देखियौ जे यैह बच्चिया (भजुआक पोती, कुषेसरी) अछि कते व्यवहारिक अछि। अही परिवार मे त एकरो जनम भेल छैक मुदा अगुआयल इलाका आ अगुआयल परिवार मे रहने कते अगुआइल अछि। की पैघ घरक बेटी सँ कम अछि।’’
चूड़ा, दही, चिन्नी, केरा, अचार, डलना तरकारीक संग पाँच टा मिठाई सेहो जलखै मे छल। चारु गोटे भरि मन खेलनि। खेलाक बाद अस-बीस करै लगलथि। हाथ धोय रमाकान्त बिछाने पर ओंघरा गेलाह। मुदा गप-सप करै दुआरे सुवुधो आ हीरानन्दो कुरसिये पर बैसल रहलाह। सभ सवांग भज्जु जलखै कए सरिआती जेँका, बैसल रहए। सुबुध पूछलखिन- ‘‘जखन एते समांग छह तखन माल-जाल किअए ने पोसने छह?’’
नवो समांग मे झोलिया सबसँ होषगर। अपनो सभ समांग झोलिया केँ गारजन बुझैत। सुवुधक सवालक उत्तर झोलिया देमए लगलनि- ‘‘मास्सैब, अखन धरि हमरा सभहक परिवार मे सुगर पोसल जाइत रहल अछि। मुदा सुग्गर सिर्फ खाइक जानवर छी। आन काज त ओकरा से होइ नहि छैक। ने हर जोतल जाइ छैक। आ ने दूध होइ छै। छोट जानवरक दुआरे गाड़ियो नहिये जोतल जेतैक। जकरा नूनो-रोटी नहि भेटै छै ओ माउस कत्त’ स खायत। तइयो हम सभ पोसै छी। अप्पन पोसल रहै अए तेँ पावनि-तिहार मे कहियो-काल खाइयो लइ छी। खेनिहारक कमी दुआरे नेपाल जा-जा बेचै छलौ। नेपाल मे अपना ऐठाम से बेसी लोक खायत अछि। किऐक त सुगरक माउस खस्सी बकरी से बेसी गरम होइ छै। अपना ऐठामक जलवायु सेहो गरम आछि। तेँ सुग्गर मुख्यतः ठंढ़ इलाकाक खाद्य थिक। मुदा तइयो सुग्गरो पोसै छलौ, किऐक त गाय-महीसि जँ पोसबो करितहुँ ते हमरा सभहक दूध के कीनैत?’’
झोलियाक बात सुनि सुबुध पूछलखिन- ‘‘सेहो ते ने देखै छिअह?’’
झोलिया- ‘‘पहिने जेरक-जेर सुग्गर रहै छलै। पोसैइयो मे असान होयत छलए। एक्के गोटे केँ बरदेला से सय-पचास सुग्गर पला जाइत छल। भोरे किछु खा केँ सुग्गर केँ खोबहारि सेँ निकालि चरवै ले चलि जाइत छल। घर पर खुअबै-पिअबैक कोनो जरुरत नहि। साल भरि पोसै छलौ आ एक बेरि (सालमे) नेपाल लए जाय केँ बेचि लइ छलौ। परुँका साल डेढ़ सय सुग्गर लए क’ बाउओ आ कक्को नेपाल गेल। ओइठिन एकटा मंगलक हाट लगै छै। जहि हाट मे सबसे बेसी सुग्गर बिकै छै। बड़का-बड़का पैकार सभ ओहि हाट मे रहैत अछि। हाटक एक भाग मे हमरो सुग्गर छल। एक भाग बौ वैसल आ दोसर भाग कक्का। एकटा पैकार पान-सात गोरेक संग आयल। दाम-दीगर हुअए लगलै। दाम पटि गेलै। सब सुग्गर केँ गिनती कए, एकटा पैकार रहल आ वाकी गोरे सुग्गर हाँकि के विदा भेल। ओ पैकार हमरा बाउओ आ कक्को केँ कहलक जे चलू पहिने किछु खा-पी लिअ। हमरो बड़ भुख लागल अछि। एकटा दोकान मे तीनू गोटे गेल। जलखै करै लगल। जलखै मे किछु मिला देने छेलै। खाइते-खाइते दुनू गोरे केँ निसां लगि गेलै। लटुआ केँ दुनू गोरे दोकाने मे खसि पड़ल। तहि बीच की भेलइ से बुझबे ने केलक। दोसर दिन निन्न टुटलै ते ने ओ पैकार आ ने दोकान। किएक ते दोकान हाटे-हाटे लगैत रहए। दुनू भाय कनैत-खिजैत विदा भेल। ने संग मे एकोटा पाइ आ ने खाइक कोनो वस्तु। भूखे लहालोट होइत, कहुना-कहुना के डगमारा आयल। डगमारा अबैत-अबैत दुनू भाय वेहोष भए गेल। डगमारा मे हम्मर एकटा कुटुम अछि। दुनू भायक दषा देखि ओ कुटुम गुम्म भए गेलाह। किछु फुरवे नहि करनि। बड़ी कालक बाद दुनू भाय केँ होष भेलै। होष अबितहि दुनू भाय पानि पीबि जखन कने मन नीक भेलै ते नहायल। नहा क’ खेलक। खा के सुतल। सुति क’ उठला बाद आरो मन नीक भेलइ। दू दिन औतै रहल। तेसर दिन गाम आयल। ओहि दिन से सुगर उपटि गेल।’’
सुवुध- ‘‘अपना घर मे रुपैआ-पैसा नहि अछि?’’
झोलिया- ‘‘थोड़बे रुपैआ अछि जे बाबा वाउ के देने रहै आ कहने रहै जे जब हम मरब ते अइ रुपैआ से भोज करिहें। रुपैआ गनल नै अछि। बाँसक चोंगा मे, सुगरक खोवहारी मे राखल अछि।’’
हलचला क’ रमाकान्त कहलखिन- ‘‘नेने आवह ते। देखियैक कते रुपैआ छह?’’
सातो चोंगा रुपैआ भजुआ सुगरक खोबहारी सँ निकालि रमाकान्तक आगू मे रखि देलकनि। फोंकगरहा बाँसक पोरक चोंगा। एक भाग गिरहे स बन्न आ दोसर भाग मे कसि क’ लत्ता कोंचने। सातो चोंगाक लत्ता निकालि रमाकान्त आगू मे रुपैआ निकालि-निकालि रखलक। एकटा रुपैआ उठा रमाकान्त निङहारि केँ देखलनि ते चानीक रुपैआ रहै। रुपैआक ढेरी पर सबहक आखि रहनि। जे जत्ते रहति से तत्ते सँ रुपैआ पर आखि गड़ौने रहति। रमाकान्त हीरानन्द केँ कहलखिन- ‘‘मास्सैव, एहि रुपैआ केँ गनियौ ते।’’
कुरसी पर सँ उठि हीरानन्द रुपैआ लग आबि गनै लगलाह। सातो चोंगा मे सात सौ चानीक रुपैआ। सात सौ चानीक रुपैआ सुनि सुवुध मने-मन हिसाब जोड़ै लगलाह जे एक रुपैआक कीमत पचहत्तरि रुपैआ होयत अछि। एक सौ से पचहत्तरि सौ होएत। सात सौ से बाबन हजार पाँच सौ हैत। अगर एक जोड़ बड़द कीनत ते पाँच हजार लगतै। एकटा बोरिंग-दमकल लेत ते पनरह हजार मे भए जेतइ। जँ तीन नम्बर ईंटा ल ओकरा गिलेबा पर जोड़ि, उपर मे ऐसवेसट्स दए सात कोठरीक घर बनाओत ते पच्चीस-तीस हजार मे भए जेतइ। अपनो सभ सवांग कमाइते अछि आ सात बीघा खेतोक उपजा हेतइ। साले भरि मे बढ़िया किसान परिवार बनि जायत। जे अछैते पूँजीये लल्ल अछि। सब कथूक दिक्कत छैक। विचित्र स्थिति सुबुधक मन मे उठि गेलनि। एक नजरि स देखथि ते खुषहाल परिवार बुझि आ दोसर दिस देखथि ते ने रहै ले घर ने खाइ-पीवैक समुचित उपाय। मुदा एकटा गुण भजुआक परिवार मे सुवुध जरुर देखलनि जे आन गामक डोम जेँका ताड़ी-दारुक चलनि परिवार मे नहि छैक। सिर्फ वुझैक आ वुझबैक जरुरत परिवार मे छैक। नमहर साँस छोड़ैत सुवुध भजुओ आ भजुआक सभ सवांगो केँ कहै लगलखिन- ‘‘भजु भाइ, हम सभ समाज केँ हँसैत देखै चाहै छी, कनैत नहि। तेँ ककरो अधला होय से नहि सोचै छी। सभकेँ नीक होय, सभहक परिवार हँसी-खुषी स चलैत रहए। सबहक बेटा-बेटी पढ़ै-लिखै, रहैक नीक घर होय, दबाइ-दारु दुआरे कियो मरै नहि, तेँ हम कहब जे एहि रुपैआ के रास्ता सँ खर्च करु। ओना बाबू श्राद्धक भोज ले कहने छथि, सेहो थोड़थार कए लेब जैँ एत्ते दिन नहि केलहुँ ते किछु दिन आरो टारु। पहिने घर, बड़द आ बोरिंग गरा लिअ तखन जे उपजा बाड़ी हैत ते भोजो कए लेब।’’
सुबुधक विचार केँ समर्थन करैत रमाकान्त कहलखिन- ‘‘बड़ सुन्दर बिचार सुवुध देलखुन भज्जु। जिनगी केँ वुझह जे जिनगी ककरा कहै छै आ कोना बनतैक। से जा धरि नहि सिखबह ता धरि एहिना बौआयत रहि जेबह।’’
भजुआ त चुप्पे रहल मुदा झोलिया टपाक दे बाजल- ‘‘बावा जे कहलनि ओ गिरह बान्हि लेलौ। अहाँ सभ हमरो छोट भाय बुझू। जाबे हम्मर परिवार रहत आ हम सभ रहब ताबे अहाँ सबहक संगे-संग चलैत रहब।’’
झोलियाक विचार सुनि हीरानन्द खुषी सँ झूमि उठलाह। हँसैत कहलखिन- ‘‘भज्जुभाइ, अहाँ त आब बुढ़ भेलहु तेँ नवका काज दिस नजरि नहि ढुकत मुदा बेटा-भातीज सभ जुआन अछि, नव काज दिस बढ़ै दिऔक। जाधरि लोक, समयक हिसाब सँ नब काज दिषि नहि बढ़त ताधरि समयक संग नहि चलि पाओत। बाइढ़िक पानि जेँका समय आगू बढ़ैत जायत आ खढ़-पात जेँका मनुक्ख अरड़ा लगल रहत। तेँ, समय क’ पकड़ि के चलैक कोषिष करह। आब अपनो सभ भाय मिला केँ, सात बीघा खेत भेलह। सात बीघा खेतवला बढ़ियाँ गिरहस्त तखने बनि सकैत अछि जखन कि खेती करैक सब जोगार कए लिअए। पानिक बिना जजात नहि उपजि सकै अए। तहिना बड़दोक जरुरी अछि। खेतक महत्व त तखने हएत जखन कि ओकरा उपजबैक सभ जोगार कए लेब। बहुत रास रुपैआ अछि ओहि रुपैआक उपयोग जिनगीक लेल करु।’’
गप-सप चलिते छल कि हहाइल-फुहाइल डाॅक्टर महेन्द्र आ वौएलाल पहुँच गेलाह।
महंथ जेँका रमाकान्त ओछाइन पर पँजरा तर मे सिरमा देने पड़ल छलाह। महेन्द्र केँ देखितहि सभ अचंभित भए गेलाह। महेन्द्र आ बौएलाल सोझे रमाकान्त लग पहुँच गोड़ लगलकनि। महेन्द्र केँ असिरवाद दैत रमाकान्त कहलखिन- ‘‘एहिठाम किऐक ऐलह। कनिये कालक बाद त हमहूँ सभ ऐबे करितहुँ। गाड़ीक झमारल छह, पहिने नहैतह, खैइतह अराम करितह। हम कि कतौ पड़ायल जाइ छलौ जे भेटि नहि होइतिहह।’’
महेन्द्र डाॅक्टरक नजरि सँ चुपचाप पिता केँ देखैत छलाह। पिता केँ देखि मने-मन अपसोच करैत रहति जे गलती समाचार पहुँचल। मुदा किछु बजैत नह छलाह। तहि बीच भजुआ झोलिया केँ कहलक- ‘‘बौआ, पहिने दुनू गोरे के खुआवह।’’
महेन्द्रो आ वौएलालो केँ खुअबैक ओरियान झोलिया करै लगल। ओरिआन त रहबे करै। लगले परसि देनू गोटे केँ खुऔलनि। दुनू गोटे खा केँ घर दिस विदा भेला। पाछू से कुषेसरी महेन्द्र केँ सोर पाड़ि कहलकनि- ‘‘चाचाजी, पान-सुपारी लए लिअ।’’
कुषेसरीक आवाज सुनि दुनू गोटे रस्ते पर ठाढ़ भए गेला। झटकि क’ कुषेसरी, तस्तरी मे पान-सुपारी नेने, लग मे पहुँचलि। लग मे पहुँच अपने हाथे पान सुपारी नहि दए तस्तरिये महेन्द्रक आगू मे बढ़ौलकनि। पान सुपारी देखि महेन्द्र कहलखिन- ‘‘बुच्ची, हम त पान नहि खाइ छी। अगर घर मे इलायची आ सिगरेट हुअ ते नेने आबह।’’
कुषेसरी चोट्टे घुरि क’ आंगन आइलि। आंगन आबि सिगरेटक पौकेट, सलाई आ इलायची नेने पहुँचली। उत्तरमुहे घुरि महेन्द्र ओरिया केँ सिगरेट लगौलनि जे कही पिताजी ने देखि लथि। दुनू गोटे गप-सप करैत विदा भेला। कुषेसरी केँ देखि महेन्द्र अचंभित नहि भेलाह किएक त मिथिलाक गामक लेल कुषेसरी अचंभित लड़की भए सकैत छलीह। मुदा मद्रासक लेल नहि। कुषेसरी सन-सन ढेरो (पछुआइल जाति मे) लड़की अछि।
महेन्द्र केँ गाम सेँ एकटा गुमनाम पत्र गेल रहनि। ओहि मे लिखल छलैक जे पिताजी बताह भ गेल छथि। अन्ट-सन्ट काज गाम मे कए रहल छथि। तेँ समय रहैत हुनका इलाज नहि करेबनि ते निच्छछ पागल भए जेताह। पत्र देखितहि महेन्द्र घर अबैक विचार केलनि। भाय रबिन्द्र सँ विचारि लेव जरुरी बुझि महेन्द्र एक दिन रुकि गेलाह। दोसर दिन सुजाता (महेन्द्रक भावो) महेन्द्र, वौएलाल आ सुमित्रा, चारु गोटे गाड़ी पकड़ि गाम विदा भेलाह।
गाम अबितहि महेन्द्र पिता केँ नहि देखि मने-मन आरो सषंकित भए गेलाह। माए केँ पिताक संबंध मे पुछलनि। माए केँ सिर्फ एतबे पूछलनि जे ‘बाबू कते छथि?’ माए कहलखिन। एटैची रखि महेन्द्र वौएलालक संग सोझे भजुआ ऐठाम चललाह। डाॅ. सुजाता घरे पर रहि गेलीह। सासु, ऐहिठामक परम्परा केँ वुझबैत मनाही कए देलखिन।
चारि बजि गेल। खेबाक इच्छा ने रमाकान्त केँ आ ने आरो किनको रहनि। भानस भ गेलै। जते विलम्ब होयत ओते वस्तु सुआदहीन बनत। तेँ भजुआ चाहैत छल जे गरम-गरम भोजन सभकियो करथि। मुदा भूख नहि रहने चारु गोटे टाल-मटोल करैत रहथि। असमंजस करैत भजुआ रमाकान्त केँ कहलकनि- ‘‘कक्का, भानस भए गेल अछि। जैह मन माने सइह......।’’
ढकार करैत रमाकान्त उत्तर देलखिन- ‘‘जखन भोजन बना लेलह ते नहि खाएब त मुहो छुताइये लेब। मुदा सच पूछह ते एक्को रत्ती खाइक मन नहि होइत अछि।’’
‘‘सैह करबै’’ -भजुआ कहलकनि।
चारु गोटे उठि केँ आंगन गेलाह। सौंसे आंगन चिक्कनि माटि स टटके नीपल, तेँ माटिक सुगंध स अंगना महमह करैत। आंगन त छोटे, मुदा बेसी लोकक दुआरे पैघ बुझि पड़ैत रहए। कम्मल चैपेत केँ बिछाओल। जना आइये कीनि के अनने हुअए तेहने थारी, लोटा, गिलास, बाटी चकचक करैत। भोजनक बिन्यास देखि रमाकान्त क्षुब्ध भए गेलाह। की पवित्रता, की सुआद। मने-मन रमाकान्त सोचति जे अगर खूब भूख लागल रहैत त खूब खइतहुँ। मुदा भूखे ने अछि ते की खाएब।’’
भोजन क’ चारु गोटे विदा हुअए लगलाह। विदा होइ स पहिनहि झोलिया रंगल चंगेरा मे चारि जोड़ धोती आनि चारु गोटेक आगू मे रखि देलकनि। धोती देखि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘झोली, तू सब गरीब छह। अपने ले घोती रखि लाय। तू पहिरौलह हम पहीरिलहुँ। भए गेलैक।’’
मौलाइल गाछक फुल:ः 12
मद्रास मे महेन्द्र चारि बजे उठि अपन जिनगी लीला मे लगि जाइत छथि। मुदा गाम मे चारि बजे भोर मे महेन्द्र केँ कड़गर निन्न पकड़ने रहनि। एना किअए भेल? उठलाक उपरान्त महेन्द्र सोचै लगलथि। की एहिठामक (मिथिलाक) माटि, पानि, हवाक गुण छैक वा काजक कम एबाव रहने ऐना भेल। रमाकान्त सुति उठि क’ महेन्द्रक कोठरी मे जा देखलनि ते देखलखिन जे ओ ठर्र पाड़ैत घोर नीन मे सुतल अछि। नहि उठौलखिन। मन मे एलनि जे बापक राज मे बेटा एहिना निष्चिन्त भए रहैत अछि। अपने लोटा लए कलम दिषि विदा भेलाह। टहलि-बूलि, दिषा-मैदान सँ होइत अपन घरक रास्ता छोड़ि टोलक रास्ता पकड़ि घुमलाह। टोल मे प्रवेष करितहि, रस्ता कातेक चापाकल पर मुह-हाथ धुअए लगलथि। कलक बगले मे मंगलक घर। रमाकान्त केँ मंगल देखि चुपचाप अंगना से बेंतवला कुरसी आ टेबुल, आनि डेढ़िया पर लगौलक। मुह-हाथ धोय रमाकान्त अपना घर दिस चललाह। रास्ता कटैत देखि मंगल कहलकनि- ‘‘काका, कने एक रत्ती अहूठाम बैसियौ।’’
मंगलक बात केँ कटलनि नहि, मुस्कुराइत आबि कुरसी पर बैसि गेलाह। कुरसी पर बैसि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘बड़ सुन्नर कुरसी छह। कहिया बनौलह?’’
- ‘‘आठम दिन छैाँड़ा दिल्ली से आयल। वैह अनलक।’’
मंगलक बेटा रविया, अंगना मे चाह बनबैत रहए। चाह बना, तस्तरी मे बिस्कुट नमकीन भुजिया आ चाहक गिलास नेने अबि रमाकान्तक आगू मे टेबुल पर रखि, गोड़ लागि, कहलकनि- ‘‘बाबा, कने चाह पीबि लिऔ।’’
रवियाक बात सुनि रमाकान्त सोचै लगलाह जे यैह मंगला छी जे बिहाड़ि मे जखन घर उधिया गेल रहै ते सात दिन अपनो सबतुर केँ आ मालो-जाल केँ अपना मालक घर मे रहै ले देने रहियै। आइ वैह मंगला छी जे केहेन सुन्दर घरो बना लेलक आ कुरसियो टेबुल कीनि लेलक हेँ। मुस्की दैत पूछलखिन- ‘‘बेटा कते नोकरी करै छह मंगल?’’
‘‘दिल्ली मे, कक्का। बड़बढ़िया अए।’’
रमाकान्त भुजिया, विस्कुट खाय पानि पीबि चाह पीबति रहथि कि तहि बीच रविया आंगन जाय एकटा पौकेट रेडियो (जर्मनीक बनल) नेने आबि रमाकान्तक आगू मे रखैत कहलकनि- ‘‘बाबा, इ अहीं ले अनलहुँ हेन।’’
रेडियो देखि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘अइ सबहक सख आब एहि बुढ़ाढ़ी मे की करब। रखि ले। तू सभ अखन जुआन-जहान छैँ, छजतौ। हम लए क’ की करब। दहिना हाथ से रेडियो आ बामा हाथे रमाकान्तक गट्टा पकड़ि हाथ मे दैत रविया कहलकनि- ‘‘बाबा, अहीं ले कीनने आयल छी।’’
चाह पीबि, कुरसी पर सँ उठि रमाकान्त घर दिसक रास्ता पकड़लनि। आगू-आगू रमाकान्त पाछू-पाछू मंगल हाथ मे रेडियो नेने। एक बाँस सुरुज उपर उठि गेल। महेन्द्र, ओसार पर वैसि, दतमनि (ब्रस) करैत रहति। पान-सात टा बच्चिया माथ पर पथिया आ हाथ मे लोटा नेने पहुँचल।
महेन्द्र ब्रषो करैत रहति आ चुपचाप ओकरा सभकेँ देखवो करैत रहति। लोटा पथिया ओसार पर रखि, एकटा बच्चिया महेन्द्र केँ पूछलकनि- ‘‘बाबा कहाँ छथिन?’’
बच्चियाक प्रष्नक उत्तर महेन्द्र नहि देलखिन किऐक त नहि बुझल रहनि। सभक पथिया आ लोटा के निङहारि-निङहारि महेन्द्र देखै लगलथि। कोनो पथिया मे कोबी कोनो मे टमाटर, कोनो मे करैला त कोनो मे भट्टा रहैक। लोटा मे दूध रहै। दूध आ तरकारी देखि महेन्द्र सोचै लगलाह जे इ की देखि रहल छी। किअए इ सभ ऐठाम अनलक हेँ। गुन-धुन करै लगलाह। मुदा कोनो अर्थे ने लगैत छलनि। मन घुरिआइत छलनि। कनी कालक बाद पूछलखिन- ‘‘बौआ, इ सब किअए अनलह?’’
एकटा ढेरबा बच्चिया, जे बजै मे चड़फड़, कहलकनि- ‘‘बाबा अप्पन सब खेत हमरे सब केँ दए देलखिन। अपना ले किछु ने रखलखिन ते खेथिन की?’’
बच्चियाक बात सुनि महेन्द्र गुम्म भए गेलाह। सोचै लगलथि जे हम बेटा छिअनि। हुनकर चिन्ता हमरा हेबाक चाही। सुआइत कहल गेल अछि जे ‘जेहेन करब तेहेन पायब।’ मुह पर हाथ नेने महेन्द्र सोचैत जे अनेरे लोक अप्पन आ दोसर बुझैत अछि। जकरा ले करबै, ओ अहूँ ले करत। चाहे अपन हुअए वा आन। सोचितहि रहति कि पिताजी केँ अवैत देखलनि। पिता केँ देखितहि उठि क’ कुड़ुड़ करै गेलाह। रमाकान्त पर नजरि पड़ितहि सब बच्चिया ओसार पर स उठि गोड़ लगै लगलनि। आगू बढ़ि रमाकान्त लोटा मे दूध आ पथिया मे तरकारी देखलखिन। तरकारी देखि कहलखिन- ‘‘बच्चा, एत्ते किअए अनलह? अच्छा जदी आनिये लेलह। ते आंगन मे रखि आबह।’’
सब बच्चिया अपन-अपन पथिया, लोटा लए जाय केँ आंगन मे रखि आइलि।
महेन्द्र केँ अबैक जानकारी गाम मे सबकेँ भए गेलनि। एका-एकी लोक आबि-आबि अपन-अपन रोगक इलाज करबै चाहलक। मुदा महेन्द्र त नियारि केँ नहि आयल छलाह जेँ ने जाँच करैक कोनो यंत्र अनने रहति आ ने दवाई। मुदा तइयो वौएलाल आ सुमित्रा केँ बजा अनै ले जुगेसर केँ कहलखिन। जुगेसर वौएलाल केँ बजवै गेल। जते जाँच-पड़ताल करैक यंत्र, औजार (चीड़-फाड़ करैक) वौएलाल आ सुमित्रा केँ कीनि देने रहथिन ओ सब सामान नेने दुनू गोटे पहुँचल। वौएलाल महेन्द्र लग बैसल आ सुमित्रा सुजाताक संग दरबज्जाक पाछूक ओसार पर बैसलि। जनिजाति सुजाता लग जाँच करवै जाय लगलीह आ पुरुख महेनद्र लग। चारिये-पाँच गोटे केँ महेन्द्र जाँच केलनि कि चारि-पाँच टा रोगी खाट पर टांगल अबैत देखलखिन। ओ सभ दोसर गामक छलैक। खाट देखि महेन्द्र के भेलनि जे भरिसक हैजा-तैजा भए गेलैक। ओसार पर स उठि महेन्द्रो आ वौएलालो निच्चा मे ठाढ़ भए गेलाह। खाटोवला आबि गेल। सभ कुहरैत रहए। ककरो कपार फुटल त ककरो डेन टूटल। ककरो मारिक चोट से देह फुलल। अपना लग कोनो दवाई महेन्द्र के नहि रहनि। हाँइ-हाँइ के वौएलाल केँ, बैनडेजक सब सब समान आ दबाईक पुरजी बना, बजार से जल्दी अनै ले कहलखिन। साइकिल से बौएलाल खूब रेस मे विदा भेल।
रमाकान्त रोगी लग आबि, एकटा खाट उठौनिहार केँ पूछलखिन- ‘‘कोना कपार फुटलै?’’
डर स कपैत ओ कहलकनि- ‘‘मारि स कपार फूटलै।’’
सुनितहि रमाकान्त महेन्द्र केँ कहलखिन- ‘‘बौआ, सभहक इलाज नीक जेँका कए दहुन।’’ कहि ओसार पर पर विछाओल बिछान पर बैसि, खाट उठौनिहार सभकेँ सोर पाड़लखिन। सभ केयो लग मे आबि बैसल। पूछलखिन- ‘‘मारि कखैन भेलह?’’
‘‘खाइ-पीबै राईत मे।’’
‘‘तब ते खेनहुँ-पीनहुँ नहि हेबह?’’
‘नै’
जुगेसर केँ कहलखिन- ‘‘पहिने सभकेँ खुआबह।’’
पनरह-बीस गोटेक जलखै त घर मे छलनि नहि। जुगेसर सुमित्रा केँ सोर पाड़ि कहलक- ‘‘बुच्ची, काकी त बूढ़े छथि, डाॅ. साहेव (सुजाता) अनभुआरे छथि। झब दे बड़का बरतन चढ़ा के खिचड़ी बना। बेचारा सभ रौतुके भुखल अछि। हम सब समान जोड़िया दइ छियौ। तोरो सब कुछ बुझल नइ छौ।’’
जहिना जुगेसर सुमित्रा केँ कहलक तहिना सुमित्रो भानस मे जुटि गेलि। सुजाता सेहो लगि गेलीह।
जहिना वौएलाल निछोह साइकिल हाँकि बजार गेल तहिना लगले सब समान कीनि आबियो गेल। वौएलाल केँ अबितहि महेन्द्रो आ वौएलालो सभ रोगी केँ दरदक सूइयाँ देलखिन। सूई पड़ितहि, कनिये कालक उपरान्त, सभ कुहड़ब बन्न केलक। खिचैड़, तरकारी बना सुजातो आ सुमित्रो रोगी लग अएलीह। मन शान्त होइतहि सभहक खून लगलाहा कपड़ा बदलि, खिचैड़ खुआ, इलाज शुरु भेल। तीन गोटे केँ कपार फुटल रहै आ दू गोटे केँ डेन टूटल रहैक। सुजाता आ सुमित्रा दुनू गोटे केँ पलास्टर करै लगली। महेन्द्र कपार मे स्टीच करैत रहति। वौएलाल दौड़-बड़हा मे लागल रहै। कखनो किछु अनैत त कखनो किछु।
दू घंटाक बाद सभ चैन भेल।
रमाकान्त पूछलखिन- ‘‘मारि किअए भेलह?’’
नोर पोछैत जोखन कहै लगलनि- ‘‘मकषूदनक बेटी सितिया भाँटा बेचै हाट गेल रहै। सत्तरह-अठारह बर्खक उमेर हेतइ। नमगर कद। दोहरा देह। चाकर मुह। गोल आखि ओकर छैक। परुँके साल दुरागमन भेल छलै। ओना हाट ओकर माय करै छै, मुदा पान-सात दिन से ओ दुखित अछि। डेढ़ कट्ठा खेत मे भाँटा केने अछि। खूब सहजोर फड़लो छै। भाँटा के जुआइ दुआरे सितिया छाँटि-छाँटि क’ नमहरका भाँटा तोड़ि लेलक। एक छिट्टा भेलई। भट्टो के बेचिनाइ आ दवाइयो (माए ले) कीनिनाइ जरुरी छलै। दवाइक पुरजी साड़ीक खूँट मे बान्हि लेलक जे घुमै काल मे दवाई कीनने आयव। हाट मे भट्टा बेचि, दोकान मे दवाई कीनि, असकरे विदा भेलि। गोसाई डूबि गेलै। खूब अन्हार ते नै मुदा झलफल भ’ गेल छलै। धीरे-धीरे रस्तो चलनिहार पतरा लगल छलै। हाट गेनिहार ते साफे बन्न भए गेल छलै। मगर हाट से घुरनिहार गोटे-गोटे रहबे करए। पाँतर मे जखन सितिया आइलि त पाछू से ललबा आ गुलेतिया सेहो साइकिल से अबैत छल। गुलेतिया ललबाक नोकर। ललबा बापक असकर बेटा। बीस-पच्चीस बीघा खेत छै। बच्चे स ललबा बहसल। दुनू गोरे दारु पीने रहै। अन्ट-सन्ट बजैत घर दिस अबैत रहै। सितियाक लग मे, जखन दुनू गोटे, आयल त ललबा बाजल- ‘‘गुलेती, षिकार फँसलौ।’’ ललबाक बात सुनियो के सितिया किछु नहि बाललि। मुदा मन मे आगि सुनगै लगलैक। आरो डेग नमहर केलक। आगू बढ़ि ललबा साइकिल स उतरि, रस्ता केँ घेरि साइकिल ठाढ़ कए देलकै। साइकिल ठाढ़ क’ जेबी से सिगरेट आ सलाई निकालि, लगा, पीबै लगल। सितियाक मन मे शंका भेल, मुदा डरायल नहि। साइकिल लग आबि रस्ताक बगल देने आगू टपि गेलि। आगू मे ललबो आ गुलेतियो ठाढ़ भए सिगरेटो पीबैत आ चढ़ा-उतरीक गप्पो-सप करैत। मुह मे सिगरेट रखि ललबा सय रुपैआ नोट उपरका जीबी मे निकलि सितिया दिषि बढ़ौलक। रुपैआ देखि सितिया देह आगि स लह-लह करै लागलि। मुदा ने किछु बाजलि आ ने रुकल। लफड़ल आगू बढ़ैत रहलि। सितिया केँ आगू बढ़ैत देखि ललबो पाछू से हाथ मे रुपैआ नेने बढ़ल। दुनू गोटे केँ पछुआबैत देखि सितिया ठाढ़ भए गेलि। माथ परक छिट्टा केँ दहिना हाथे आरो कसिया क’ पकड़ि सोचलक जे छिट्टे से दुनू केँ चानि पर मारव। तामसे भीतरे-भीतरे जरितहि छलि। ललबा दहिना हाथे नोट सितिया दिस बढ़ौलक। लग मे ललबा केँ देखि, मौका पाबि, सितिया तना क’ रुपैआ पर थूक फेकलक जे रुपैआ पर कम्मे, मुदा ललबाक मुह पर बेसी पड़लै। मुह पर थूक पड़ितहि ललबा सितियाक बाँहि पकड़ि खिंचै चाहलक। पहिनहि स सितिया छिट्टा के पकड़ि अजमौनहि रहै। धाय-धाय दू छिट्टा ललबा केँ दए देलक। दुनू गोटे दुनू बाँहि पकड़ि सितिया केँ खींचिलक। छिट्टा नेनहि सितिया रस्ताक निच्चा खेत मे खसि पड़लि। खेत मे खसितहि जोष क’ केँ उठि दहिना तरहत्थीक मुक्का बान्हि, मुक्को आ दहिना पाएरो अनधुन चलबै लागलि। मारिक डर से गुलेतिया कात भए गेल। मुदा ललबा नहि मानलक। ओहो अनधुन मुक्का चलवै लगल। गुलेतिया केँ कात मे देखि सितियोक जोष बढ़लै। ललबा दारु पीनहि रहै, तिलमिला क’ खसल। जहाँ ललबा खसल कि सितिया ऐँड़-ऐँड़ मारै लागलि। तहि-बीच हाट से तरकारी बेचिनिहारिक जेर अबैत रहै। तरकारी बेचिनिहारिक चाल-चुल पाबि सितियाक जोष आरो बढ़ि गेलै। एक त समरथाइक शक्ति सितियाक देह मे, दोसर इज्जत बँचवैक प्रष्न, बाघ जेँका सितिया मारि क’ ललबा केँ वेहोष कए देलक। तरकारियो बेचिनिहारि लग मे आबि गेलीह। सितियाक काली रुप देखि हसीना पूछलकै- ‘‘बहीनि, की भेलौ?’’
सितिया बाजलि- ‘‘अखैन किछु ने पूछ। अइ छुतहर के खून पीबि लेबई।’’ बजबो करैत आ अनधुन ऐँड़ो देह पर वरिसवैत छलि। चारि गोरे सितिया केँ पकड़ि कात करै चाहलनि। मुदा चारु केँ झमारि सितिया पुनः आबि क’ दस लात ललबा केँ फेरि मारलक। फेरि चारु गोरे हसीना, जलेखा, रेहना आ खातून घेरि सितिया केँ पँजिया क’ पकड़ि घिचने-तिरने विदा भेलि। अबैत-अबैत जखन गामक कात आयल कि सितिया फेरि चारु गोरे केँ झमारि, अपन डेन छोड़ा फेरि ललबा केँ मारै दौड़लि। मुदा रेहना आ खातून दौड़ि सितिया केँ आगू से घेड़िलक। हसीना आ जलेखा सेहो दौड़ि क’ आबि पकड़लक। सितियाक मन क्रोध सँ बमकैत रहै। मन मे होय जे ललबाक खून पीने बिना नहि छोड़बै। चाहे फाँसी पर किअए ने चढ़ पड़ए। चारु गोटे सितिया केँ पकड़ने घर पर पहुँचलनि।
सौँसे गाम घटनाक समाचार बिहाड़ि जेँका पसरि गेल। गाम डोल-माल करै लगल। तनावक वातावरण बनै लगलैक। राति भारी हुअए लगलैक। गामक बुढ़बा चोट्टा स लए केँ नवका चोट्टा धरिक चलती बढ़ि गेल। तहि बीच चारि गोटे ललवा केँ खाट पर टाँगि सेहो अनलक। ललवाक बेहोषी त टूटि गेलै मुदा कुहरनी धेनहि रहलैक। ललबाक पितिऔत भाय डाॅक्टर बजा ललवाक इलाज करबै लगल। स्लाइन लगा डाॅक्टर बगल मे बैसि पानिक गति देखैत रहए। दोसर भाय (ललबाक पितिऔत) गाम मे लाठी संगोर करै लगल। जते गामक मुहगर-कन्हगर लोक सभ छल ललबाक पक्ष लेलक। ललबाक बाप बाजल- ‘‘जखैन इज्जत चलिये गेल ते समपैते रखि के की करब।’’
‘दुर्गा-महरानी की जय’ कहि पनरह-बीस टा गामक हुड़दंगहा लाठी लए सितिया ऐठाम विदा भेल। रस्तो मे जय-जय कार सभ करैत रहए।
मकषूदनक टोल मात्र बारह परिवारक। गरीब घरक टोल तेँ समांगो सभ मरदुआरे। मुदा तइयो जते पुरुख रहै लाठी लए-लए गोलिया केँ वैसि विचारलक जे इज्जतक खातिर मरि जायब धरम छी। तेँ जे हेतई से हेतई मुदा पाछू नै हटब। दोसर दिस टोलक सभ जनिजाति सेहो तैयार होइत निर्णय केलनि जे जाधरि पुरुख ठाढ़ रहत ताधरि अपना सभ कात मे रहब। मगर पुरुख केँ खसिते अपना सभ लाठी उठायब। एक त सितियाक देह मे आगि लगले रहै आरो धधकि गेलै। बाजलि- ‘‘जत्ते जुआन बेटी छेँ आ जुआन पुतोहू छेँ, सब अपन-अपन साड़ी क’ कसि क’ बान्हि ले। माथ मे साड़िऐक नमहर मुरेठा कसि केँ बान्हि ले, जहि स कपार नै फुटौ। बुढ़िया सभ केँ छोड़ि देही। मड़ुआ बीआ पटबैवला जे पटै घर मे छौ, से निकालि के एक ठाम कए क’ राख। आ देखैत रही जे की सब होइ छै। जहिना सभ बहीनि मिलि मरब तहिना संगे संगे सभ बहीनि जनमो लेब।’’
टोलक जते छोट बच्चा रहै, सबकेँ घरक बूढ़ि-पुरान लए-लए टोल स हटि गाछी मे चलि गेल। दोसर हँसेरी टोलक लग आबि जय-जय कार केलक। जय-जय कार सुनि सितिया केँ होय जे असकरे सबसे आगू जा हँसेरी केँ रोकी। मुदा लड़ाई मे अनुषासन आ निर्णयक महत्व बढ़ि जायत अछि। तेँ सितिया आगू नहि बढ़ि ठाढ़े रहलि। टोलक लोक, ताकत भरि, हँसैरी केँ रोकलक। अनधुन लाठी दुनू दिस स चललै। मुदा पछड़ि गेल। पाँच गोटे घायल भेल। हँसेरी घुमल नहि धन आ इज्जत लुटैक खियाल से आगू बढ़ल। अपन समांग केँ खसल आ हँसेरी केँ आगू बढ़ैत देखि मुरेठा बन्हने आगू-आगू सितिया, तहि पाछू-पाछू टोलक सभ स्त्रीगण, पटै लए हँसेरी केँ रोकलनि। की बिजलोका चमकै छैक तहिना गामक बेटी अपन चमकी देखौलनि। वार रे मिथिलाक धी। मिथिला सिर्फ कर्मभूमे आ धर्मभूमे नहि, वीरभूमि सेहो थिक। चारि आदमीक कपार असकरे सितिया ढाहलक। चारु खसलै। खूनक रेत चललै। हँसेरी मे हुड़ भेलै। सभ पाछू मुहे पड़ायल। इहो सभ भागल हँसेरीके रबाड़लनि। मुदा किछु दूर रबाड़ि घुमि गेलीह।
अप्पन सभ समांग केँ उठा-उठा सभ अनलक। मुदा दोसर दिसक लोक केँ अप्पन समांग अनैक साहसे नहि होयत छलैक। होय जे कहीं हमहूँ सभ अनै ले जाय आ हमरो सभ केँ ओहिना हुअए। तखन की हैत। बड़ी कालक बाद चोरा क’ (छिप क’) अपना समांग सभ केँ ओहो सभ लए गेल। गाम मे दुइये टा डाॅक्टर। सेहो डिग्रीधारी नहि, गमैया प्रेक्टिष्नर। दुनू ललबे ऐठाम रहए। राति मे कत्ते जायब, कोन डाॅक्टर भेटिताह आ नहि भेटिताह संगे संग दोहरा कए आक्रमणक डर सेहो रहै। सभ तत्-मत् मे पड़ल रहए। मुदा जेहो सभ घायल छल ओकरो मुह मलिन नहि छलैक। मन मे खुषी होयत रहए। तेँ दर्द केँ अंगेजने सभ रहए। इनहोर पानि कए केँ सभकेँ स्त्रीगण सभ ससारै लगलीह। कपारक फाटल जगह मे सिन्नुर दए-दए खून बन्न केलक। भरि राति कियो सुतल नहि।
रमाकान्तक नाम इलाका मे पसरल छलनि। जहाँ-तहाँ हुनके चरचा वेसीकाल चलैत रहैत। डाॅ. महेन्द्र केँ गाम अबैक जानकारी सेहो सभहक जानकारी मे छलनिहेँ।
जोखनक बात सुनि रमाकान्त बमकि उठलाह। ठाढ़ भए जोर-जोर सँ कहै लगलखिन- ‘‘जदि कियो अप्पन इज्जत-आबरु बँचावै ले हमरा कहत ते हम अप्पन सभ सम्पत्ति ओहि पाछू फुकि देब। मुदा छोड़बैक नहि। बौआ, जते तोरा हुन्नर छह तहि मे कोताही नहि करिहक। खेनाई-पीनाई, दवाई-दारु सब कथुक मदति कए दहक। फेरि एहि धरती पर जनम लेब। इ कर्मभूमि छियैक। मनुष्य किछु करैक लेल एहिठाम अबैत अछि। सिर्फ अपनहि टा नहि आनो जे कर्मनिष्ट अछि, ओकरो जहाँ धरि भए सकत मदति करबैक। जे भए गेल से भए गेल जोखन मुदा सुनि लाय जे जहिया-कहियो कोनो भीड़ पड़अ, हमरो एक बेरि खोज करिहह। जाधरि घट मे परान अछि ताधरि जरुर मदति करबह।’’
बेर टगैत चारि टा बच्चिया, खाइक लए केँ पहुँचलीह। एक कठौत भात बड़का डोल मे दालि आ छोटका डोल मे तरकारी नेने आइलि छलि। खाइ ले केराक पात आ दू टा लोटा सेहो अनने छलि। चारु बच्चिया केँ देखि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘बुच्ची, खाइक किअए अनलह?’’
रमाकान्तक बात सुनि सितिया कहलकनि- ‘‘बाबा, हमरा सब के नै बुझल छलै, तेँ अनलौ।’’
‘‘अच्छा, अनलह ते सभकेँ पूछि लहुन जे खाएब कि घुरौने जाएब।’’
सितियाक संग रमाकान्त गप-सप करितहि रहति कि जोखन बाजल- ‘‘कक्का, यैह (अइह) सभ बच्चिया मारि केँ ओहि पाटी केँ भगौलक।’’
अकचकायत रमाकान्त बजलाह- ‘‘आँ-आँई; यैह सभ छी। वाह-वाह। तोरे सभ सन-सन बेटी एहि धरतीक मान रखि सकैत अछि।’’
बिहाड़ि जेँका जोखनक बात, रमाकान्तक दरबज्जा आंगन सँ लए केँ गाम धरि पसरि गेल। जे सभ मरदक हँसेरी केँ अनधुन मारबो केलक, कपारो फोरलक आ गामक सीमा धरि खेहारबो केलक। ई समाचार सुनि गामक स्त्रीगण मर्द सभ उनटि केँ ओहि बच्चियाँ सभ केँ देखै ले अबै लगल। अजीब दृष्य बनि गेल। श्यामा आंगन सँ सुमित्रा दिया समाद पठौलनि जे कने ओहि बच्चिया सभ केँ अंगना पठा दिऔ जे हमहू सभ देखब। दरवज्जा पर आबि सुमित्रा रमाकान्त केँ कहलकनि। अंगनाक समाद सुनि रमाकान्त चारु बच्चियाँ केँ कहलखिन- ‘‘बेटी, कने आंगन जाह।’’
चारु बच्चिया केँ संग केने सुमित्रा आंगन गेलि। ओसार पर ओछाइन ओछा श्यामो आ सुजातो बैसलि छलीह। आगू-आगू सुमित्रा आ पाछू-पाछू चारु बच्चियो छलि। आंगन जाय चारु बच्चियाँ दुनू गोटे (ष्यामा आ डाॅ. सुजाता) केँ गोड़ लगलकनि। एकाएकी गामक स्त्रीगण, गामक बेटी अंगने जाय-जाय सितिया सभ केँ देखै लगलीह। अपने लग मे चारु बच्चियाँ केँ श्यामा बैसौने रहति। सुजाता निङहारि-निङहारि चारु केँ उपर (माथ) स लए केँ निच्चा (पाएर) धरि देखैत छलीह अजीब शक्ति चारुक चेहरा मे बुझि पड़लनि। चारु बच्चियो आखि उठा-उठा कखनो श्यामा पर त कखनो गामक स्त्रीगण सभ पर दैत छलीह। सभहक मन मे खुषी रहितहुँ हँसी मुह सँ नहि निकलैत छलनि। जना खुषीक पाछू अदम्य उत्साह अदम्य साहस आ जोष सभहक चेहरा पर नचैत रहनि। चारुक विषेष आकर्षण, सभकेँ अपना दिषि खिंचैत छलि। जेहो (स्त्रीगण) कने हटि क’ ठाढ़ भए देखैत छलि ओहो सहटि-सहटि सितियाक लग मे अबैक चाहैत छलि। श्यामा सुमित्रा केँ कहलखिन- ‘‘सुमित्रा, ऐहेन लोक केँ आंगन मे कहिआ देखबिही। तेँ बिना किछु खेने-पीने कोना जाय देबैक।’’
श्यामाक बात सुनि सुजाता उठि केँ अपन आनल मद्रासी भुजियाक डिब्बे घर सँ उठैने अयलीह। भुजियाक डिब्वा देखि सितिया बाजलि- ‘‘बाबी, लगले खाा के विदा भेल छलौ। एको-रत्ती खाइक छुधा नै अछि।’’
तहि बीच रमाकान्त चारु गोटे केँ बजवै ले जुगेसर केँ अंगना पठौलखिन। जुगेसर अंगना आबि सबकेँ कहलक। उठिकेँ चारु गोटे श्यामा केँ गोड़ लगलनि। असिरवाद दैत श्यामा कहलखिन- ‘‘भगवान हमरो औरदा तोड़े सभकेँ देथुन, जे हँसैत-खेलैत जिनगी एहिना बिताबह।’’
चारु गोटे केँ अंगना स निकलितहि सभ विदा भेलि।
चारिक समय। रौदो गरमियो कमै लगल। महेन्द्र जोखन केँ कहलखिन- ‘‘ऐठाम रोगी सभकेँ रखैक जरुरत नहि अछि। घरे पर साँझ-भिनसर सब दिन वौएलाल जाय जाय केँ सूइयाँ दए दए आओत। गोटी सेहो लगातार चलबैत रहब। पनरह-बीस दिन मे पूरा ठीक भए जायत।’’
पाएरे सभ विदा भेल।
साँझू पहर, रमाकान्त आ जुगेसर दरबज्जा पर बैसि मद्रासेक गप-सप शुरु केलनि। मुस्की दैत जुगेसर कहलकनि- ‘‘कक्का, एक बेरि आरो मद्रास चलू।’’
नाक मारैत रमाकान्त कहलखिन- ‘‘धुः बूड़िबक। गाड़ी मे लोक मरि जाय अए। ऐठाम केहेन निचेन से रहै छी। ने गाड़ी (रेल) बसक हर-हूड़ अबाज आ ने रस्ता-पेराक ठेकान। सड़क धए कए चलू। तहू मे सदिखन लोकेक धक्का लगैत रहत। केहेन सुन्दर अपना सभहक गाम अछि जे रस्ताक कोन बात जे आड़िये धुरे खेते पथारे जते मन हुअए तते जाउ। ने गाड़ी, बसक धक्काक डर आ ने पाएर मे काँटी, शीषा गरैक। जकरा से मन हुअए तकरा से गप करु। कुषल-समाचार पूछि लिऔ। ओइठाँ ते जना मुह मे बकारे नहि रहै तहिना बौक भेल रहैत छलौ।’’
व्यंग्य करैत जुगेसर कहलकनि- ‘‘केहेन ठंढ़ा घर मे रहै छलौ। ने नहाए ले कतौ जाइ पड़ै छले आ ने पर-पैखाना ले।’’
रमाकान्त- ‘‘धुत् बूड़ि। ओइठाँ जँ दुइयो मास रहितहुँ ते कोढ़ि भए जहितहुँ। उठैइयो-बैठेइयो मे आसकतिये लगैत। सच पूछैँ ते एते दिन रहलौ ने कहियो भरि मन पानि पीलहुँ आ ने पैखाना भेल। सभ दिन जना कब्जियते बुझि पड़ैत। जखने पानि मुह लग लए जाय कि मन भटकि जाय।’’
फेरि मुस्की दैत जुगेसर कहलकनि- ‘‘अंगूरक रस पीबै मे केहेन लगैत रहै?’’
अंगूरक रस सुनि थोड़े असथिर होयत रमाकान्त कहलखिन- ‘‘लोक कहै छै जे अंगूर मे बड़ ताकत छै मुदा अपना सबहक जे केरा, आम, बेल लताम अछि ओते ताकत अंगूर मे कत्ते सँ आओत। अंगूरेक शराब बनैत अछि मुदा अपना ऐठामक भाँगक पड़तर करतैक। अंगेरिजा शराब सनसना क’ मगज पर चढ़ियो जायत अछि आ लगले उतड़ियो जायत अछि। मुदा अप्पन जे भाँग अछि ओ रईसी नषा छी। ने अपराध करै ले सनकी चढ़ौत आ ने एको मिसिया चिन्ता अबै देत अछि।’’
रमाकान्त आ जुगेसरक गप-सप सुजातो अढ़ स सुनैत रहति। दुनू गोटेक गप्पो सुनैत आ मने-मन विचारबो करैत छलि। तहि बीच हीरानन्द आ शषिषेखर सेहो टहलि-बूलि केँ अयलाह। दुनू गोटे केँ बैसितहि रमाकान्त हीरानन्द केँ कहलखिन- ‘‘मास्सैब, खेतक झंझट त सम्पन्न भेल। बड़वढ़ियाँ भेल। एकटा बात कहू जे जते लोक गाम मे अछि, सभ अप्पन गाम कहैत अछि की ने?’’
हीरानन्द- ‘‘हँ। इ त कोनो नब नहि अछि। अदौ स कहैत आयल अछि आ आगूओ कहैत रहत।’’
‘‘जखन गाम सभक छियैक त गामक सभ किछु ने सभक भेलैक?’’
‘‘तहि मे थोड़े गड़बड़ अछि। गड़बड़ इ अछि जे अखन धरि जे बनैत-बनैत समाज आ गाम अछि ओ टूटैत टूटैत खण्ड-पखण्ड भए गेल अछि। तेँ एक-एक केँ जोड़ि कए समाज बनवै पड़त जे लगले नहि भए सकैत अछि।’’
हीरानन्द बजितहि रहति कि उत्तर दिषि सँ सुवुध आ दक्षिन दिषि सँ महेन्द्र आ बौएलाल सेहो आबि गेलाह। रमाकान्त वौएलाल केँ कहलखिन- ‘‘बौएलाल, आब ते तू डाकटर बनि गेलै मुदा तइयो ऐठाम सबसे बच्चा तोँही छैँ। जो, चाह बनौने आ।’’
डाॅक्टरक नाम सुनि महेन्द्रो आ हीरानन्दो मने-मन खुष भेलाह। किएक त दुनू गोटेक पढ़ौल वौएलाल अछि। मुस्कुराइत वौएलाल चाह बनवै विदा भेल। रमाकान्त सुवुध केँ कहलखिन- ‘‘सुवुध, जमीनक ठौर त लगि गेल पोखरि बाँचल अछि। शषि नौजवानो छथि। पढ़लो-लिखल छथि, आ लूरियो छन्हि। पोखरि मे गाछ पोसैत।’’
सुवुध- ‘‘बड़ सुन्दर विचार अपनेक अछि, काका। हमहूँ यैह सोचै छलौ जे गाम मे ते दुइये टा चीज माटि आ पानि-अछि। तेँ दुनू केँ ऐहेन ढंग सँ उपयोग कयल जाय जे जहिना एक गोटे केँ पाँच टा बेटा भेने पाँच गुना परिवार बढ़ि जायत छैक तहिना खेतो आ पाइनोक होय। ढ़ंग से मेहनत आ नव तरीका अपनाओल जाय। जहि सँ मनुक्खे जेँका ओहो पाँचो गुनाक रफ्तार सँ किएक ने आगू बढ़त। जँ ऐहन रफ्तार पकड़ि लइ। ते गाम के बढ़ै मे कते देरी लागत। बीस बीघा सँ उपरे गाम मे पानि अछि जे बैषाखो-जेठ मे नहि सुखैत अछि। अगर जँ महा-अकालो पड़ि जायत तइयो बोरिंगक सहारा सँ उपजि सकैत अछि। अखन धरि सब पोखरि ओहिना पड़ल अछि। सौँसे पोखरि केचली, घास छाड़ने अछि। ने नहाय जोकर अछि आ ने माछ-मखान करै जोकर। जे इलाका माछ-मखानक छी ओहि इलाकाक लोक केँ माछ-मखान नहि भेटै, कते लाजक बात छी। एहि लाजक कारण की हम सभ नहि छियैक? जरुर छियैक। भलेहि हरसी-दीरघी कए अपना केँ निर्दोष साबित कए ली, मुदा....। अखन देखै छी जे किछु परिवार (सुभ्यस्त परिवार) केँ तँ माछे-मखानक कोन बात जे अहू सँ नीक-नीक वस्तु भेटैत अछि। मुदा विषाल समूहक गति की छैक। जितिया पावनि मे माछ सँ भेटि होइ छैक आ कोजगरा मे दू टा मखान देखैत अछि। तेँ, मनुष्य केँ खुषहाल केँ बनैक लेल वस्तुक परियाप्तता जरुरी अछि। जँ वस्तुक कमी रहत त खुषहाली आओत कोना?’’
सुवुध बजितहि रहति कि वौएलाल चाह नेने आयल चाह देखितहि केयो कुड़ुड़ करै उठलाह त कियो तमाकू थुकरै। जुगेसर चाह बँटै लगल। एक घोंट चाह पीबि हीरानन्द महेन्द्र केँ पूछलखिन- ‘‘डाॅक्टर साहेब, कते दिनक छुट्टी मे आयल छी?’’
हीरानन्दक प्रष्न सुनि महेन्द्र असमंजस मे पड़ि गेलाह। मने-मन सोचै लगलाह जे कोना चिट्ठीक चरचा करब। चिट्ठीक बात त सोलहन्नी झूठ निकलल। जँ बेसी दिनक छुट्टीक चरचा करब त सेहो झूठ हैत। धड़फड़ी मे आयल छी। की कहिअनि की नहि कहिअनि। विचित्र स्थिति मे महेन्द्र पड़ि गेलाह। मुदा बिचहि मे जुगेसर टभकल- ‘‘येह मास्सैव, डाकडर सहाएव त आला भए गेलाह। कोना चीजक कमी नहि छन्हि। जखन अपना गाड़ी मे चढ़ा केँ बुलबैत छलाह ते वुझि पड़ैत छल जे इन्द्रासन मे छी।’’
हीरानन्दक बात तर पड़ि गेलनि। मने-मन सोचलनि जे भरिसक पिता दुआरे गुमकी लधने छथि। सभ कियो चाह पीबि-पीबि गिलास वौएलाल केँ देलखिन। सब गिलास लए वौएलाल अखैरे कल पर गेल। तहि बीच सुबुध महेन्द्र केँ कहलखिन- ‘‘महेन्द्र भाय, गामक लोक केँ जे देह देखै छियै, तहि सँ कि बुझि पड़ैत अछि जे किछु नहि किछु रोग सभकेँ पछानहि छैक। तेँ सभकेँ जाँचि इलाज कए दिऔक।’’
सुवुधक प्रष्न महेन्द्र केँ जँचलनि। कहलखिन- ‘‘अपनो विचार अछि। चारि-पाँच दिन जँचै मे लगत। सभकेँ जाँचि, जहाँ धरि भए सकत तहाँ धरि इलाजो कइये दितिऐक। आइ तँ भरि दिन दोसरे ओझरी मे ओझरा गेलहुँ, मुदा काल्हि सँ एहि मे लगि जायब।’’
शषि पूछलकनि- ‘‘डाॅक्टर साहेव, बुढ़ा (पिताजी) जे अप्पन सब खेत बाँटि देलनि तहि लेल अपनेक..?
शषिषेखरक बात सुनि मुस्कुराइत महेन्द्र कहलखिन- ‘‘दू भाइ छी दुनू भाय केँ डाॅक्टर बना देलनि। एहि सँ बेसी एक पिताक पुत्रक प्रति की बाकी रहि जायत अछि जे किछु कहवनि। खेतक बात अछि, हम थोड़े खेती करए आयब। तखन ते जे खेती करैबला छथि जँ हुनका हाथ मे गेलनि त एहि सँ बेसी उचित की होयत। बाबाक अरजल खेत छिअनि, जकर हकदार त वैह (ओइह) छथि। जँ अप्पन सम्पत्ति लुटाइये देलनि तहि सँ हमरा की। वैरागी पुरुष के रागी बनाएव पाप छी।’’
पुनः शषिषेखर पूछलखिन- ‘‘मद्रास मे केहेन लगैत अछि?’’
किछु मन पाड़ैत मने रुकि, महेन्द्र कहै लगलखिन- ‘‘जहिया डाॅक्टरीक षिक्षा पेलहुँ तहिया नीक बुझि मद्रास गेलहुँ। मुदा अखन एहिठामक सिनेह हृदय केँ तेना पकड़ि लेलक हेन, जेना छाती मे लगल तीर सँ पक्षी छटपटायत अछि। होयत अछि जे मद्रासक सब किछु छोड़ि-छोड़ि एहिठाम रही। कत्ते सँ जिनगीक लीला शुरु कयल जाय, इ गंभीर प्रष्न अछि। एहि प्रष्नक बीच मन ओझरा गेल अछि। स्पष्ट उत्तर नहि भेटि रहल अछि। किऐक त एहि प्रष्नक उत्तर दृष्टिकोणक मुताबिक भिन्न-भिन्न भए जाइत अछि।’’
मौलाइल गाछक फुल:ः 13
गामक दुखताहक दुख जाँचि दवाइ देबाक समाचार गाम मे पसरि गेल। काल्हि भिनसर सँ सभ टोलक दुखताह केँ बेरा-बेरी जाँचो होयत आ दवाइयो देल जायत।
भिनसर होइतहि ओहि टोलक लोक अबै लगलाह जहि टोलक पार छलनि। मर्दक जाँच महेन्द्र करै लगलथि आ स्त्रीगणक डाॅ. सुजाता करै लगलीह। डाॅ. महेन्द्रक मदतिक लेल वौएलाल आ सुजाताक लेल सुमित्रा रहथि।
तीन दिन मे सौँसे गामक रोगीक जाँच भेलनि। दवाइयो भेटलनि। लोकक बीच ऐहन खुषी दौड़ि आयलीह जना गाम सँ बीमारीये पड़ा गेल होय। सभक मनक खुषी एक्के रंगक रुप बना नचैत छलीह। मन मे ऐहन खुषी जे आब ने हमरा देह मे कोनो रोग अछि आ ने मरब। खुषीक नाच ऐहन छलि जेना रोग (दुख) देखिये केँ भगि गेल होय। मुदा जिनगी मे त यैह टा (रोग) दुख त नहि अछि, आरो बहुत तरहक अछि। मुदा इ त मनक बात छल। जँ इ मनक बात छी मुदा वास्तविक बात की छल? से त लोके मे देखै पड़त।
सब दिन भलेसरा केँ देखै छेलियै जे दुखताहे अछि जहि स काज काज-उद्यम छोड़ि देने छल, मुदा आय भोरे बड़का छिट्टा मे छाउर गोबर नेने खेत फेकै जायत अछि। रास्ता मे सोनमा पूदलकै ते कहलकै जे आब देह मे कोनो दुख नहि अछि। जाइ छी छाउरो फेकि लेब आ गरमा धानो काटि क’ नेने आयब। तहिना तेतरो पटै मे गाँथि, दू टा धानक बोझ कन्हा पर उठैने अबैत रहए।
सोनमाक मन मे नचै लगलै जे ऐना किअए भेलइ? देखै छियै जे लहेरियासराय असपताल मे छअ-छअ मास, रोगी केँ लोहावला खाट पर रखि, सूइयो पड़ै छै आ गोलियो खाइ ले देल जाय छै, तइयो मरि जाइ अए। मुदा एहि गामक दुखताहक दुख कोना एते असानी स पड़ा गेलइ। अजीब भेलै। ओह, भरिसक दुख ककरा कहै छै से वुझबे ने करै छी। जब अपने बुझवे नै करै छी तब बुझबै कना? जँ अपने सोचि बुझै चाहबै आ गलतिये सोचा जाय तखन ते गलतियै बुझबै। गलती बुझब आ नहि बुझब, दुनू एक्के रंग। बिनु बुझलो काज लोक करै लगैत अछि आ गलतियो काज करैत अछि। भलेही दुनूक फल उधले होय, मुदा करै त अछि। तब की करब? जकरा बुझै छियै जे फल्लाँ बुझनिहार अछि जँ ओकरो नइ वुझल होय आ झुठे अन्ट-सन्ट कहि दिअए। ततबे नहि जे बुझिनिहारो अछि आ ओकरा पूछियै जँ ओ गलतिये कहि दियै, तइयो त ओहिना रहि जायब। मुदा तोहू मे एकटा बात अछि जे जे ओ कहै आ हम करी आ तेकर फल गल्ती होय ते दोखी के हैत? तब की करब? आब उमेरो ने अछि जे इस्कूलो मे जा क’ पढ़ब। धिया-पूता सभ इस्कूल मे पढ़ैत अछि। मुदा जखैन इस्कूल जाइवला रही तखन किअए ने पढ़लौ। पढ़लौ कोना नै, इस्कूल मे नाओ लिखौनहि रही। पाँच किलास तक पढ़बो केलौ। ते छोड़ि किअए देलियै? छोड़लियै की मास्टर मारि केँ छोड़ा देलक। मास्टर मारि के किअए छोड़ा देलक? जखैन छअ किलास मे गेलौ आ अंग्रेजी मास्टर आबि केँ पढ़बे जे बी.यू.टी.- बट। पी.यू.टी.- पुट। तेहि पर ने कहने रहियै जे अहाँ गलती पढ़बै छियै। कोनो गलती कहने रहियै। जब गलती नै कहने रहियै तब ओ मारलनि किअए। नै पढ़बैक मन रहै ते ओहिना कहिते जे तोरा नइ पढ़ेबौ। इस्कूल से चलि जो। मारलक किअए। जँ मारबो केलक ते हमरा मन के ते बुझा दैइते। हमर मन मानि लइत। मन मानि लइत भए गेलैक। से ते नै केलक। तेँ ने हम मुरुख रहि गेलौ। नइ ते हमर की हाथ-पाएर कोनो पातर-छितर अछि जे दरोगा नइ बनलौ। हमर जे दरोगाक नोकरी गेल से उ मास्टर हमरा देत। जे मारि के इस्कूल छोड़ा देलक। धिया-पूता मे सैह भेल, चेतन मे तहिना देखै छी। आब कना जीवि? भरिसक हमरो ते ने बतहा दुख पकड़ि लेलक हेँ। ककरा से पुछबै, के कहत, सभ केँ ते सैह देखै छियै। की हम भरि जिनगी हरे जोतैत रहब, घोड़ा पड़ चढ़ि के षिकार खेलै ले कहिया जायब? दुनू हाथ माथ पर लय सोनमा गाछक निच्चा मे बैसि सोचै लगल, जहिना आमोक गाछ रोपल जाइ छै तहिना त खाइरो-बगुरक रोपल जाय छै। मुदा आम मे मीठहा फल फड़ै छै, खैर-बगुर मे काँट होयत छैक। रोपैक इलम त एक्के होइ छै। ओना अनेरुआ होइ छै। आमोक गाछ अनेरुओ होइ छै आ खाइरो-बगुरक।
साते दिनक छुट्टी मे महेन्द्र गाम आयल छलाह। आठ दिन पहिनहि छुट्टी बीति गेलनि। अबै जायक रस्ता सेहो मद्रासक पाँच दिनक अछि। छुट्टी बढ़बै पड़तनि। काल्हि भोरका गाड़ी सँ चलि जयताह, इ बात सुबुधो केँ बुझल छलनि। तेँ सुबुधक मन मे अयलनि जे महेन्द्र बच्चेक संगी छी, मुदा भरि मन गप एक्को दिन नहि कयलहुँ। काल्हि भोर मे चलिये जयत। तेँ आइये भरि समय अछि। इ सोचि सुवुध अपन सब काज छोड़ि महेन्द्र स गप्प करैक लेल अयलाह।
दरबज्जा पर बैसि महेन्द्र पिता केँ कहति रहथि- ‘‘बाबू, गामक जते रोगी केँ जँचलहुँ ओहि मे एक्को गोटे पैघ रोग (जना टी. वी., कैंसर, एड्स इत्यादि) सँ ग्रसित नहि अछि। तेँ आष्चर्य लगैत अछि जे बीमारी शहर-बजार मे धड़ल्ले सँ ओयत अछि। ओहि रोगक नामे-निषान गाम मे नहि अछि। जे खुषीक बात छी।’’
महेन्द्रक रिपोर्ट सुबुधो सुनलनि। खुषीक बात सुनि रमाकान्त पूछलखिन- ‘‘तखन जे एते लोक बीमार अछि, ओकरा कोन रोग छे?’’
मुस्की दैत महेन्द कहलखिन- ‘‘साधारण रोग। जे बिना दवाइओ-दारु सँ ठीक भय सकैत छैक। अगर ओकर खान-पान सुधरि जाय त इ सब रोग लोक केँ नहि हेतैक। अधहा स बेसी रोगी ओहन अछि जकरा कोनो रोग नहि सिर्फ शंका छैक। मुदा जँ ओकरा दुइयो-चारि टा गोली नहि दितिऐक ते मन नहि मानितैक। तेँ पुरजो बना देलिऐक, अल्ला सँ देहो हाथ देखि लेलिऐक आ दू-चारि टा गोलियो दय देलिऐक।
महेन्द्रक बात सुनि रमाकान्तो आ सुवुधे मने-मन हँसै लगलाह। हँसी रोकि सुवुध महेन्द्र केँ पूछल- ‘‘महेन्द्र भाय, काल्हि ते तू चलि जेबह, फेरि कहिया भेटि हेबह कहिया नहि। तेँ तोरे से गप-सप करै ले, अप्पन सब काज छोड़ि, एलहुँ। जिनगीक त ढेरो गप्प होइत मुदा तो डाॅक्टर छिअह आ षिक्षक छलौ, जे आब नहि छी। मुदा रोगक कारण बुझैक जिज्ञासा त जरुर अछि। तेँ अखन रोगेक संबंध मे किछु बुझै चाहै छी।’’
‘की?’
‘‘पहिल सवाल बताहेक लाय। जखन बताह दिस तकै छी ते बुझि पड़ै अए जे जते मनुख अछि सभ बताह अछि।’’
धड़फड़ा क’ रमाकान्त पूछि देलखिन- ‘‘से कोना?’’
‘‘कक्का, जे एक नम्वर प्रषासक छथि, जे एक इलाका सँ लए केँ देष भरिक शासन मे दक्ष रहैत अछि ओ घरक (परिवारक) शासन मे लटपटा जायत छथि। तहिना देखै छी जे, जे बड़का-बड़का हिसावी (गणितज्ञ) छथि ओ जिनगीक हिसाब मे फेल कय जायत छैक। तहिना देखै छी जे, बड़का-बड़का इंजीनियर छथि ओ परिवारक नक्षा बनवै मे चूकि जाय छथि। नेताक त कोना बाते नहि। किऐक त जहिना गोटे साल मानसुन अगते उतड़ि खूब बरिसैत अछि जहि स बेंगक वृद्धि अधिक भय जायत छैक तहिना ओकरो छैक।
मुस्की दैत रमाकान्त कहलखिन- ‘‘हँ, ठीके कहै छहक।’’
ततवे नहि कक्का, कियो ताड़ी-दारु पीवै पाछू बताह अछि, त कियो धनक पाछू। कियो पढै़क पाछू बताह रहैत त केयो ऐष-मौजक पाछू। कियो खाइ पाछू बताह त कियो ओढ़ै-पहिरै पाछू बताह। कियो काजेक पाछू बताह रहैत त कियो अरामेक पाछू। कियो खेले-कुदक पाछू बताह रहैत त कियो नाचे-तमाषाक पाछू। एते बताहक इलाज कते हैत। ततवे नहि एक रंगक बताह दोसर के बताह कहैत आ दोसर तेसर केँ। तहिना कियो शरीरक रोग स दुखित वा रोगी कहबैत त कियो अन्नक अभाव स, त कियो वस्त्रक अभाव वा घरक अभाव स दुखी होइत। तहिना कियो कोनो उकड़ू बात सुनला सँ होइत। एहि दृष्टिये जँ देखल जाय त कते लोक निरोग अछि। ततबे नहि जँ एक-एक गोटे मे देखल जाय त कइअ-कइअ टा रोग धेने अछि। मुदा, इ सब उपरी बात भेल। मूल प्रष्न अछि जे बसन्त ऋृतुक गुलाब जेँका जिनगी सबदिन फुलाइत रहै।’’
गुलाबक फूल जेँका फुलाइत जिनगी सुनि महेन्द्र नमहर साँस छोड़लनि। आखि उठा सुबुधक आखि पर देलनि। सुवुधक नजरि स नजरि मिलितहि जना महेन्द्र केँ बुझि पड़लनि जे अथाह समुद्र मे सुवुध हेलि रहल छथि। आ हम छोट-छीन पोखरि मे उग-डूब कय रहल छी। इ वात मन मे अबितहि महेन्द्र अप्पन माए-बाप सँ लए केँ अपन भैयारी होइत धिया-पूता दिषि नजरि दौड़ौलनि। जे कते आषा स पिता जी हमरा दुनू भाय केँ पढ़ौलनि, मुदा हम हुनका सँ कत्ते दूर हटि कए रहै छी। एते दूर हटल रहला पर कोना हुनका सेवा कए सकबनि। आब हुनका सेवाक जरुरत दिनोदिन बेसिये होइत जेतनि। उमेरो अधिक भेलनि आ दिनानुदिन बढ़िते सेहो जेतनि। जते उमेर बढ़तनि तते शरीरक अंग कमजोर हेतनि। जते अंग कमजोर हेतनि तते शरीरक क्रिया मे रुकावट हेतनि। जहि स कते नव-नव रोग शरीर मे प्रवेष करतनि। जते रोग शरीर मे प्रवेष करतनि तते कष्ट हेतनि। की ओहि कष्टक जिम्मेवार हम नहि हेबई। ताहि लेल करैत की छियैक। किछु नहि। अखन हम सभ (दुनू भाई आ दुनू पत्नी) जवान छी, मुदा किछु दिनक उपरान्त त हमहूँ सभ हुनके (माता-पिता) जेँका बूढ़ होयब। कोनो जरुरी नहि अछि जे हमरो सभहक बेटा हमरे सभ लग रहत। अखन त हम देषे मे छी। अंतर ऐतवे अछि जे देषक एक छोर पर इ सभ (माए-बाप) छथि आ दोसर छोर पर हम सभ छी। मुदा आइक जे हवा बहि रहल अछि जे आन-आन देष मे जाय केँ लोक नोकरी करैत अछि आ जीवन-यापन करैत अछि। जँ कहीं हमरो संगे सैह हुअए तखन की होयत? एते बात मन मे अबैत-अबैत महेन्द्रक चेहरा उदास हुअए लगलनि। मन वौअए (वौअए) लगलनि। देह सँ पसीना निकलै लगलनि। बुझि पड़ै लगलनि जे देह शक्ति विहीन भय रहल अछि। एक्को पाइ लज्जति देह मे अछिये नहि। पसीना से तर-बत्तर होइत महेन्द्र सुवुध के कहलखिन- ‘‘सुवुध भाय, जिनगीक अजीव रास्ता अछि। जते मनुक्ख एहि धरती पर जन्म लेने अछि, ओकरा त जिनगी बीतवै पड़तैक। मुदा जिनगीक रास्ता ऐहेन पेंचगर अछि जे विरले क्यो-क्यो वुझि पबैत अछि बाकी सब औनाइते रहि जाइत अछि।’’
मुस्कुराइत सुबुध महेन्द्र केँ कहलखिन-‘‘महेन्द्र भाय, अहाँ त डाॅक्टर छी। पढ़ल-लिखल लोकक बीच सदिखन रहबो करैत छी। अहाँ किअए ऐहेन बात कहि रहल छी। हम ते जाबे मास्टरी केलहुँ ताबे धिया-पूता केँ पढ़ेलहुँ आ जखन नोकरी छोड़ि गाम मे रहै छी तखन जेहन समाज मे रहै छी से देखबे करैत छी।’’
महेन्द्र- ‘‘भाय, अहाँ जे बात कहलहुँ ओ त आँखिक सोझा मे जरुर अछि मुदा अहाँ मे मनुक्ख चिन्हैक आ ओकरा चलैक रास्ताक लूड़ि जरुर अछि। अहाँ अपना केँ छिपा रहल छी।’’
महेन्द्रक बात सुनि रमाकान्त केँ भेलनि जे आदमी घर सँ हजारो कोस दूर हटि, कमा केँ एत्ते बनौलक ओ अपना केँ एते कमजोर किअए बुझि रहल अछि। मुदा दुनू संगीक बीच नहि आबि गुम्मे रहलाह। बैसिले-बैसल एक बेरि महेन्द्र केँ देखथि आ एक बेरि सुवुध केँ।
अपना केँ छिपाएब सुनि सुवुध बजलाह- ‘‘महेन्द्र भाय, जाहि प्रष्नक बीच अहाँ ओझरा रहल छी ओ प्रष्न ऐतेक ओझड़ाओठ नहि अछि। मुदा असानो नहि अछि। सिर्फ आखि मे ज्योति आनि देखि केँ चलैक अछि।’’
दलानक भितुरका कोठरी (आंगना दिसक) मे बैसि सुजाता खिड़की देने सभकेँ देखबो करैत आ गप्पो-सप सुनैत रहति। कखनो मन मे खुषियो अवैत छलनि त कखनो मन कड़ुऐबो करनि। मुदा किछु बाजति नहि। बाजब उचितो नहि बुझैत। ओना पढ़ल-लिखल रहने, कखनो के बजैक मन जरुर होय छलनि। मुदा किछुऐ दिन मे सासु मिथिलाक रीति-रेवाज आ व्यवहारक संबंध मे तना केँ बुझा देलकनि जे मद्रासक सुजाता मिथिलाक सुजाता बनि गेलीह। मुह पर नुआ (साड़ी) राखब त उचित नहि बुझति मुदा बाजब-भूकब पर नजरि जरुर रखै लगलीह। किनका से कोन ढंगे बाजी, कते आबाज मे बाजी, कोन शब्दक प्रयोग करी, एहि सब पर नजरि अवष्य रखै लगलीह। तेँ बोली संयमित भए गेलनि। ओना एहिठामक चालि-ढालि पूर्ण रुपेण नहि अंगीकार कए सकल रहति मुदा अंगीकार करैक पूर्ण चेष्टा करए लगलीह।
सुवुधक ऊट-पटांगो बात सँ महेन्द्र केँ दुख नहि होयत छलनि। हल्लुको बात मे ओ गंभीर रहस्यक अनुमान करै लगलथि। भलेही ओ गंभीर नहि हल्लुके किऐक ने होय। महेन्द्रक गंभीर मुद्रा देखि सुबुध सोचलनि जे आब ओ (महेन्द्र) गंभीर बात बुझैक चेष्टा मे उताहुल भए रहल छथि। तेँ जिनगीक गंभीर बात के खोलि देब उचित होएत। कहलखिन- ‘‘महेन्द्र भाय, अपना गाम मे सबसँ अगुआइल परिवार अहाँक अछि। चाहे धन-सम्पतिक हुअए वा पढ़ब-लिखबक। मुदा कने गौर कए केँ देखिऔ जे एत्ते धन-सम्पत्तिक उपरान्तो धनेक पाछू हजारो कोस घर स हटि केँ रहै छी। अहीं कहू जे कत्ते धन भेला पर मन मे संतोष होएत। मुदा एहि प्रष्नक दोसरो पक्ष अछि, आ ओ इ अछि ‘विष्व-वंधुत्वक विचार। अपनो एहिठामक महान्-महान् चिन्तक एहि विचार केँ सिर्फ मानवे नहि केलनि बल्कि बनवैक प्रयासो केलनि। ओना सैद्धान्तिक रुप मे विष्व-बंधुत्वक विचार महान् अछि मुदा जते महान् अछि ओहि स कनियो कम व्यवहारिक बनवै मे असान नहि अछि। जहिना लोक गामक वा आन गामक देवस्थान मे दीप जरबै (साँझ दइ) स पहिने अपना घरक गोसाइक आगू मे दीप जरबैत अछि। जे उचिते नहि गंभीर विचारक दिग्-दर्षन सेहो थिक। तहिना सभकेँ अपना लग सँ जिनगीक लीला शुरु करक चाहिऐक। अपना स आगू बढ़ि समाज, समाज स आगू बढ़ि इलाका, इलाका स आगू बढ़ि देष-दुनियाँ दिस बढ़ैक चाहिऐक। जँ से नहि कए कियो परिवार-समाज छोड़ि आगू बढ़ि करैत अछि त जरुर कतहुँ नहि कतहुँ गड़बड़ जरुर हेतैक। जहिना दुनिया मे समस्याग्रस्त मनुष्य असंख्य अछि तहिना त ओहि समस्या सँ मुकबलो करैवला मनुष्य असंख्य अछि। एक्के आदमी केँ कयला से तँ दुनियाक समस्या नहि मेटा सकत। तेँ जे जत्ते जन्म नेने छी ओ ओतइ इमानदारी आ मेहनत सँ कर्म मे लगि जाउ।’’
सुवुधक प्रष्न केँ स्वीकार करैत महेन्द्र कहलखिन- ‘‘हँ, इ दायित्व त मनुष्यमात्रक थिक।’’
सुबुध- ‘‘जखन इ दायित्व सभक (सब मनुष्यक) छी त अपने गाम मे देखियौ! एहि साल सँ (जखन सबकेँ खेत भेलै) थोड़-बहुत खुषहाली गाम मे एलै। मुदा एहि स पहिने त देखै छेलिऐक जे ने सभकेँ भरि पेट खेनाइ भेटै छलै आ ने भरि देह वस्त्र। ने रहैक लेल सुरक्षित घर छलै (अखनो नहि छैक) आ ने रोग-व्याधि स बचैक कोनो उपाय। बाजू, छलै की नइ छलै?’’
-‘‘हँ, छलैक।’’
‘‘आब अहीं कहू जे हमर-अहाँक जन्म त अही समाज मे भेलि अछि। की हम ओते कमजोर छी जे गाम छोड़ि पड़ा जाएब। (पड़ाइक मतलब, जते पेट भरत) जँ कियो पड़ायत अछि त ओकरा कायर, कामचोर छोड़ि की कहबैक? मुदा तइयो लोक जायत किऐक अछि? एकरो कारण छैक। एकर कारण छैक अधिक पाइ कमाइब वा कम मेहनत स जिनगी जीबि। मुदा कम मेहनत स जिनगी असानी स जीबि ताधरि संभव नहि अछि जाधरि मेहनत सँ देष केँ समृद्धिषाली नहि बना लेब। अगर जँ किछु गोटे केँ समृद्धिषाली भेने देषकेँ समृद्धिषाली बुझब त ओ नेने-नेेने गुलामी जंजीर मे बान्हि देत। कोनो देष गुलाम नहि होइत, गुलाम होइत ओहि देषक मनुक्ख आ गुलामी होइत ओकर जिनगीक क्रिया। पाइवला सभहक जादू समाज मे ओहि रुपे चलि रहल अछि जहिना हम-अहाँ पोखरि मे कनेक बोर दए बनसी पाथि दइ छियैक आ नमहर-नमहर माछ भोजनक लोभे फँसि जाइत अछि तहिना मनुक्खोक बीच चलि रहल अछि। ओहि केँ नजरि गड़ा केँ देखै पड़त।’’
सुबुधक विचार केँ महेन्द्र मूड़ी डोला मानि लेलनि। मुदा मुड़ी डोलौलाक उपरान्तो मन मे किछु शंका रहबे कयल छलनि। जे सुबुध मुहक हाव-भाव सँ बुझि गेलखिन। पुनः अपन विचार केँ आगू बढ़वैत कहै लगलखिन- ‘‘अपना एहिठामक दषा देखियौ। जकरा अपना सभ क्रीम ब्रेन कहै छियै- ओ थिक वैज्ञानिक, इंजीनियर, डाॅक्टर इत्यादि। ओ सभ आन-आन देष जाय अपन बुद्धि केँ पाइवलाक हाथे बेचि लइत छथि। भले ही किछु अधिक पाइ कमा लइत होथि मुदा ओ ओहि धनिक केँ आरो धन बढ़वैत छथि। नव-नव मषीन, नव-नव हथियारक अनुसंधान कए केँ पछुऐलहा देष पर आक्रमण कए वा व्यपारिक माल बेचि आरो पछुअबैत अछि। एकटा सवाल आरो मन मे अबैत होएत। ओ इ जे अपना देष मे ओतेक साधन नहि अछि जे ओ अपन वुद्धि केँ सदुपयोग कए सकताह। ते अपन बुद्धि केँ सदुपयोग करैक लेल आन देष जायत छथि। मुदा हमरा वुझने एहि तर्क मे कोनो दम्म नहि छैक। आइ धरिक जे दुनियाँक इतिहास रहल ओ अइह रहल जे सम्पन्न देष सदिखन कमजोर (पछुआइल) देष केँ लुटैत रहलैक। चाहे लड़ाइक माध्यम स होय वा व्यापारक माध्यम सँ। जहि स, जेहो सम्पत्ति (साधन) ओहि देष केँ रहैत, ओहो लुटा जाइत अछि। जखन ओ लुटा जायत तखन आगू मुहे, कोना ससरत?’’
माथ कुड़िअबैत महेन्द्र पूछलखिन- ‘‘तखन की करक चाही?’’
सुवुध- ‘‘आखि उठा कए देखिऔ जे दुनियाँ मे क्यो बिना अ,आ पढ़ने विद्वान् बनि सकल अछि वा बनि सकैत अछि? जँ से नहि बनि सकैत अछि ते पछुआइल देष वा लोक, बिना कठिन मेहनत केने आगू बढ़ि सकैत अछि। तेँ पछुआइल देष वा लोक केँ एहि बात केँ बुझै पड़तनि। जँ से नहि वुझि अगुऐलहाक अनुकरण करताह ते पुनः गुलामीक बाट पर चलि अओताह। कते लाजिमी बात छी जे हम अपने बनाओल हथियार सँ अपने घायल होय। आब दोसर दिषि चलू!’’
अपना ऐठाम जे परिवारक ढाँचा, अदौ स रहल, ओ दुनिया मे सवसँ नीक रहल अछि। आइक चिन्तन मे दुनियाँ परिवारबाद दिषि बढ़ल अछि। जे हमरा सभहक संयुक्त परिवारक रुप मे धरोहर अछि। मनुक्खक जिनगी कते टा होइ छै, एहि पर नजरि दियौ। तीनि अवस्था त सभकेँ होइ छैक। बच्चाक, जवानीक आ वुढ़ाढ़ीक। एहि मे दू अवस्था बच्चा आ वुढ़ाढ़ी मे दोसराक मदतिक जरुरत पड़ैत छैक। जे एकांगी परिवार मे नहि भए पाबि रहल छैक। आइक जे एकांगी परिवार बनि गेल अछि ओ कुम्हारक धरारी जेँका बनि गेल अछि। जहिना कुम्हारक घरारी (अर्थात् कुम्हारक बास) वेसी दिन धरि असथिर नहि रहैत तहिना भए रहल अछि। बाप-माए कतौ, बेटा-पुतोहू कतौ आ धिया-पूता कतौ रहै लगल अछि। मानवीय स्नेह नष्ट भए रहल अछि। सभ जनै छी जे काँच बरतन जेँका मनुष्य होइत अछि। कखन की एहि शरीर मे भए जायत, तकर कोनो गारंटी नहि छैक। स्वस्थ अवस्था मे त मनुष्य कतौ रहि जीवि सकैत अछि मुदा असवस्थक अवस्था मे ते से नहि भए सकैत छैक। तखन केहेन कष्टकर जिनगी मनुष्यक सामने उपस्थित भए जाइत छैक तोहू पर त नजरि देमए पड़त।
सुबुधक विचार महेन्द्रकेँ झकझोड़ि देलकनि। देह मे कम्पन्न आबि गेलनि। बोली थरथराय लगलनि। कने काल असथिर(स्थिर) भए मन केँ असथिर(स्थिर) केलनि। मन असथिर होइतहि सुबुध केँ कहलखिन- ‘‘सुबुध भाय भलेही हाई स्कूल धरि संगे-संग पढ़लहुँ, मुदा जिनगी केँ जहि गहराइ सँ अहाँ चीन्हिलहुँ, हम नहि चीन्हि सकलहुँ। सच पूछी ते आइ धरि अहाँ केँ साधारण हाई स्कूलक षिक्षक वुझैत छलहुँ मुदा ओ भ्रम छल। संगी रहितहुँ अहाँ गुरु छी। कखनो काल, जखन एकांत होइ छी, अपनो सोचै छी जे एते कमाई छी, मुदा दिन-राति खटैत-खटैत चैन नहि भए पवैत छी। कोन सुखक पाछू बेहाल छी से वुझिये ने रहल छी। टी.भी. घर मे अछि, मुदा देखैक समय नहि भेटैत अछि। खाइ ले वैइसै छी ते चिड़ै जेँका दू-चारि कौर खाइत-खाइत मन उड़ि जायत अछि जे फल्लाँ केँ समय देने छियै, नहि जायब त आमदनी कमि जायत। तहिना सुतैइयो मे होयत अछि। मुदा एते फ्री-सानीक लाभ की भेटैत अछि? सिर्फ पाइ। की पाइये जिनगी छियैक?’’
महेन्द्रक बदलल विचार सुनि, मुस्की दैत सुवुध कहलखिन- ‘‘भाय पाइ जिनगी चलैक साधन छी। नहि कि जिनगी। पाइक भीतर एते पैघ दुर्विचार छिपल अछि जे मनुष्य केँ कुकर्मी बना दइत अछि। कुकर्मी बनला पर मनुष्यत्व समाप्त भए जायत छैक। जाहि स चीन्हि-पहिचीन्हि समाप्त भए जायत छैक। आपराधिक वृत्ति पनपै लगैत छैक। आपराधिक वृत्ति, मनुष्य मे अयला पर पैघ सँ पैघ अपराध मे मनुष्य केँ धकेलि दैत छैक। तेँ अपन जिनगी केँ देखैत परिवार, समाजक जिनगी देखब, जिनगी छी। ओना मनुष्यमात्रक सेवाक लेल सेहो सदिखन तत्पर रहक चाही। जहाँ धरि भए सकै, करबोक करी। मुदा कर्मक दुनियाँ बड़ कठिन अछि। एत्ते कठिन अछि जे कर्मठ-स कर्मठ लोक रस्ते मे थाकि जायत छथि। मुदा ओ थाकब हारब नहि जीतब छी। जे समाज रुपी गाछ मौला गेल अछि ओहि मे तामि, कोड़ि, पटा नव जिनगी देवाक अछि। जाहि सँ ओहि मे फूल लागत आ अनबरत फुलाइत रहत। एहि काज मे अपना केँ समर्पित कए देबाक अछि।’’
सुवुधक संकल्पित विचार सँ महेन्द्रक विचार सेहो सक्कत बनै लगलनि। आँखि मे प्रखर ज्योति अबै लगलनि। दृढ़ स्वर मे पितो आ सुवुधो केँ कहलखिन- ‘‘दुनू गोटेक बीच बजै छी जे साल मे एक्को दिन ओहन नहि बँचत जहि दिन हमरा चारु (दुनू भाइ आ दुनू स्त्रीगण) गोटे मे से कियो नहि क्यो एहिठाम नहि रहब। ओना मद्रासो मे अज-गज बहुत भए गेल अछि, ओकरो छोड़ब नीक नहि होएत, मुदा परिवारो आ समाजो केँ नहि छोड़ब। मद्रासक कमाई परिवारो आ समाजो मे लगायब। अखन त ओते अनुभव नहि अछि मुदा चाहब जे समाज मे बीमारीक लेल जे खर्च हेइत ओ पूरा करब। जहिना पिताजी समाज केँ खायक ओरियान कए देलखिन तहिना स्वास्थक ओरियान जरुर कए देव। समाज केँ कहि दिअनु जे जकरा ककरो कोनो रोग (बीमारी) होय ओ आखि मूनि केँ एहिठाम चलि आवथि। ओकर इलाज जरुर हेतइ। बिना नियारे गाम आइल छलहुँ तेँ किछु लए केँ नहि एलहुँ। मुदा कहै छी जे जहाँ धरि रोग जँचैक औजारक जोगार भए सकत ओ मद्रास जाइते पठा देब। तत्काल अखन भावो रहतीह। वौएलाल आ सुमित्रा रहबे करत। आब जे आयब ओ बेसी दिनक लेल आयब। आ एहिठाम आबि अधिक स अधिक गोटे केँ चिकित्साक ज्ञान करा गाम सँ रोग केँ भगा देव। समाज हम्मर छी, हम समाजक छियैक।
2004
सुजीत कुमार झा
-कथाकार सुजीतजी जनकपुरसँ प्रकाशित होएबला दैनिक मैथिली समाचारपत्र मिथिला डट कम क सम्पादक छथि।
कथा
धधकैत आगि ः फुटैत कनोजरि
अन्हरिया राति सुनसान जंगल । बीच पक्की सड़क पर रातुक नरवताकेँ चीरैत ट्रकक अवाज गूँजि रहल छल । ड्राइवर ओहि सुनसान सड़क पर तीव्र गति सँ ट्रक आगा दौड़ा रहल छल ।
ड्राइवरक बगलमे बैसल खलासीकेँ दूर सँ ओहि सुनसान निर्वाध जंगलमे कोनो परछाँही ट्रक दिस अबैत बुझएलै । खलासी भयसँ कम्पित स्वरमे बाजल— “गूरुजी...................... देखियौ आगाँ सँ कियो आबि रहल अछि ।”
ड्राइवर ट्रकक प्रकाशमे दूर स्पष्ट होइत महिला आकृतीक ध्यान सँ देखय लगैत अछि ।
“गुरुजी, एहि सुनसान जंगलमे एतेक रातिमे महिला ? खलासी घबराइत बाजल ।
ड्राइवर गम्भीर भऽ गेल । क्षण—क्षण समीप अबैत आकृति पर नजरि स्थिर कएलक । टांग ओकर ब्रेक दिस बढल ।
“गूरु.............. रुकू नहि, अवश्य कोनो गड़बड़ अछि ...............गति बढ़ा कऽ बढ़ि जाउ ।”
ड्राइवर सोचमे पड़ि गेल । राजमार्ग ...... कोसो तक कोनो घर नहि ...........चारु दिस बड़का—बड़का गाछ आ बोन—झांखुर । एम्हर तँ केओ दिनोमे नहि पयरे निकलैत अछि । एहनमे ई युवती........ । सलवार समीज सँ करोड़ी सेहो नहि लगैत अछि । लगपासक करोडी सेहो रातिमे जंगली जानवरक डर सँ असगर नहि निकलैत अछि । तहन ई अछि के ? एतऽ एतेक रातिमे कोना ? कतऽ सँ आयल आ कतय जा रहल अछि ? कोन समस्यामे अछि ?
ई सभ सोचिते—सोचिते ड्राइवर ट्रकक गति कम कऽ देलक ।
ओम्हर खलासीक डर आओर बढ़ि गेल छल । ओ डर सँ कापय लागल छल । आ आतंकित स्वरमे पुनः ड्राइवर सँ कहलक जे ‘नहि रुकू, भागि चलू ।’
मुदा ड्राइवर खलासीक गप्प पर ध्यान नहि दऽ ई निश्चय कएलक जे एहि युवतीक मदत करब । अतः ओ एकदम युवतीक लग आबि ट्रक रोकलक । किछु क्षण युवतीकेँ गौर सँ देखलक । युवती कम उमेरक छल । कम्पित स्वरमे युवती सँ पुछलक— “ तोँ के छेँ आ कतय जाए चाहैत छेँ ? ”
युवती किछु सोच ऽ लागल कि ओ केना आबि गेल एहि सुनसान जंगलमे...................... अमावश्यमे..............ओकर कण्ठ अवरुद्ध भऽ गेलै । ओकरा बुझएलै अवश्य ई सपना अछि । आ कोना एतऽ आबि सकैत अछि । एते रातिमे.............अहि स्थानमे ..........अवश्य ई सपने अछि । आ ई विचार अबिते ओकरा भीतर अदभूत रोमाञ्च भरि गेलै ।
कहियो काल एना होइत छैक । सुतैत—सुतैत सपनाक अवस्थामे अचानक व्यक्ति एतेक जागरुक भऽ जाइत अछि की ओकरा ज्ञान भऽ जाइत छैक की ओ जखन चाहय, आँखी खोलि दुःखद स्थिति सँ दूर जा’ सकैत अछि । आ जखन ओकरा विश्वास भऽ जाइत छैक, आँखि खोलब आ दुखक स्थिति सँ दूर हएब ओकरा अपना हाथमे छैक, तखन ओकरा अपना शक्तिक अभास होइत छैक जे हम जे चाही कऽ सकैत छी ।
जखनकी अवस्था अेकरा अधीनमे छैक तखन ओ किए नहि मनमानी करए ? अपन ईच्छाक पूर्ति करय । ककरो की विगड़तै ? ककरो पतो नहि चलतै ई सपने तऽ छैक ।
तहन किएक नहि अपन उत्सुकता शान्त कऽ लिए ? एहि सँ बढ़ियाँ अवसर आब कहिया भेटत ? बाबुजी हरेक समय कहैत छथि जे हमर बुद्धि बड़ तेज अछि । हमरा चिकित्सक बनएबाक इच्छा छन्हि हुनक । एखने सँ एकर घरमे तैयारी भऽ रहल छैक । घरमे माय नहि अछि तऽ की
बाबूजी आ भैया तऽ छथि घरमे पुस्तकालय अछि । सिनेमा देखबाक, उपन्यास पढ़यक छूट नहि अछि । टीभी कार्यक्रम सेहो गिनल—चुनल देखबाक अवसर भेटैत अछि ।
आगाँ बढ़क अछि तऽ एकाग्रचित भऽ उद्देश्य पूर्तीक हेतु लगबाक अछि । हुनका सभकेँ अहि सँ बेसी अपेक्षा नहि अछि । ओ अपनामे मस्त किताब सँ सटल रहैत अछि ।
किछु दिन सँ एकटा शब्द बेर बेर ओकर मस्तिष्कमे हथौड़ी जकाँ बजैर रहल अछि — “की होइत छैक बलात्कार ?” किए बलात्कारक बाद लड़कीक आत्महत्या करय पडैÞत छैक, परिवार जन मुह नुकबैत रहैत अछि । एतेक सोचि ओकर बुद्धि हारि जाइत अछि । शब्दकोष छानि मारलौं, मुदा अर्थ नहि भेटल ,एहन कोन जबरदस्ती एहन कोन बल—प्रयोग ? किछु बुझबामे नहि आबि रहल छल । ई की छैक । ओकर उत्सुकताक अन्त नहि छलै । किए नहि आई सपना पूरा कऽ लिय ? ज्ञानो भेटि जाएत आ आत्महत्या सेहो नहि करय पड़त ।
तीन वर्ष पूर्व पड़ोसक रितू आन्टी ओकरा अपना घर लऽ गेल छल आ बहुत बैज्ञानिक ढंग सँ ओ ओकरा ‘फैक्ट टच लाईफ’ के विषयमे बतौने छलै । अचानक ओकरा सभकिछु नव लागि रहल छल जेना ओ जागि गेल हो । ओकरा किछु बेसी देखाई देबय लगल हो, किछु आवाज सुनाय लागल छल । किछु स्पष्ट बुझयमे आबय लागल छलै । मुदा बलात्कार शब्द मात्र एक रहस्य बनल रहल । से एकरा जानय—बुझयकें एहि सँ बढ़िया अवसर अओर की भऽ सकैत अछि ?
ड्राइवर उत्साह बढ़बैत पूछलक, “ कतय जाएक अछि बेटी ? आउ, बसि जाउ । आगा शहरमे छोड़ि देब । एतय कोसो तक कियो लोक नहि रहैत छैक ।
बहुत मुश्किल सँ जयन्ती किछु हिम्मत जुटा पौलक । ओ सोचय लागल किछु बाजय पड़त तऽ झूठ किए नहि .............। से बाजल— ‘बाट भुतिया गेल छी लिफ्ट दऽ दीअ ?’
“मुदा अहाँ एलौं कतय सँ ?”, घर सँ भागि कऽ एलौं । बिना किछु सोचने उतर देलक । फेर देखलक दूनु व्यक्तिक उत्सकुकता किछु शान्त भऽ गेल छल । से आगाँ बाजल— “ दिनभरि एहि सड़कपर चलैत रहल छलौं । जखन थाकि गेलौं तऽ एकटा गाछक जाड़िमे सूति रहलौं । एखन निन्न टुटल... बहुत डर... लागि रहल अछि । ”
“ से त ठीक अछि मुदा जएबाक कतय अछि ?” ड्राइवर पूछलक । एकर उत्तर ओकरा लग नहि छल । ओ चुप्प रहल । “ ठिक छै चलू, बैसू । शहर तक छोड़ि देब । ”
ओ सोचय लागल कि दूनु बीचमे बैसाक’ .... बाटभरि ओ हमरा सँ मजाक करत..... बलात्कार करत आ हमरा बलात्कार केना होइत छैक की होइत छैक, तकर जानकारी भेटि जाएत, मुदा से भेल नहि । दूनु सकुचि गेल आ ओकरा खिड़की लग बैसा देलक जयन्तीक डर भगावय के लेल ड्राइवर एकटा अभिभावक जकाँ ओकरा उपदेश देबय लागल । शहर पहुँचला पर पुलिस चौकी लग उतारैत ओकरा माथ पर हाथ फेरैत कहलक— घर चलि जाएब.... वैह अहांक अपन अछि..... अहाँकें नीक देखय वाला वैह सभ छथि..... ” कहि ट्रकमे सवार भऽ चलि गेल ।
पुलिसक विषयमे जयन्ती सेहो बहुत किछु सुनने आ पढ़ने छल । ओ सोचय लागल की एखनो किछु नहि विगड़ल । एखनो एतय काम बनि सकैत अछि । मुदा दूटा पुलिसकेँ देखि ओकर करेजक धुक धुक्की बढ़ि गेल, हाथ पाएर ठण्ढ़ा होबय लागल ।
“के छेँ.... की काम छौं ? ” “हम बाटे बिसरि गेलौं हएँ.... एतऽ बसि जाउ ?
दूनु पुलिस एक दोसर दिस देखय लागल ।
जयन्तीक हृदय धुक—धुक करय लागल
की शायद आब ओकर उत्कण्ठाक अन्त होबय लागल अछि । ओ भय सँ काँपय लागल ।
“ की नाम छौ तोहर ?
“रुना” बुद्धि एतेक सजग छलैक कि ओ अपन सही नाम तक नहि बतौलक ।
बापकेँ, नाम की छौ ? कतय रहैत छें ? की सोचै छें ? ओ ई सोचि कऽ एक के बाद दोसर फूसि बजैत गेल कि पता ई सपना नहि होअय...... सत्य मिलत ? ओ अपन प्रियजनक लेल कतेक लज्जाक कारण बनि जाएत । नहि—नहि स्वयं मरि जाएत, मुदा अपन परिवारजन्यकें कोनो हालतमे बेइज्जति नहि होबए देत ।
“ लगैत अछि कोनो अपराधी अछि”, एकटा पुलिस बाजल ।
एखने बन्द कऽ दू डण्डा पड़तै तँ सत्य अपने उगिल देत ।
“ नहि—नहि” डरे जयन्तीक कण्ठ अवरुद्ध भऽ गेलैक । किछु क्षण अपनाकें नियन्त्रित करैत बाजल, “ अपराधी होइतौं तँ स्वयं एतय अबितौ ? ९ कक्षाक विद्यार्थी छी । काका वकील छथि । हड़बड़ाहटमे एतेक सत्य ओकरा सँ बजा गेल छलै ।
“ लगैत अछि घर सँ भागि कऽ आएल अछि, “ दोसर पुलिस बाजल, “नवालिग अछि एतय बैसय देब ठीक नहि अछि । बिना बातक बतंगड़ भऽ सकैत अछि ।”
जयन्ती थकमकाइत नहुँए सँ बाजल— “हम घर नहि जायब” , कहऽ चाहि रहल छल हमरा सँग जे चाहैत छें से कऽ ले..... बलात्कार कऽ ले, मुदा नहि जानि ओकरा कोन संस्कार आबि कऽ ओकर मुह बन्न कऽ देलक ।
“राति कऽ हम तोरा एतय बिना महिला पुलिसके नहि राखि सकैत छियौ । या तऽ तोरा चौकी जाए पड़तौक वा फेर नजदीकक धर्मशालामे ।
बाँकी काल्हि देखबै । आगाँ की करबाक छैक”— एक पुलिस बाजल ।
जयन्ती चुपचाप धर्मशालामे आबि गेल । दोसर दिन कोनो तरहे जयन्ती धर्मशाला सँ निकलि आएल । जयन्ती आब एक साइकल लग ठाढ़ तीन युवक सँग गप्प कऽ रहल छल । तीनू ओकरा ललायित नजरि सँ घुरि रहल छल ।
जयन्ती सोझे प्रस्ताव रखलक, “हमरा अहाँ सिनेमा देखाएब?” ओ सभ किछु सोचैत एक दोसर दिस देखऽ लागल । ” कि वस्तु छैक?”
“विलाड़िक भागे सीक टूटल” दोसर हँसल ।
“ककरा सँग देखब” तेसर पुछलक । अहाँ तीनू के सँग” ओकर उत्तर छलैक ।
आउ हमरा साइकल पर बैसि रहु, ओहिमे सँ एक गोटे बाजल
जयन्ती कने झिझकैत संकोच सँ बाजल, ” जी नहि हम पयरे चलब, आ ओ सभ सिनेमा हाँल दिस बढ़ि गेल ।’
जखन तक सिनेमा शुरु नई भेल ताबत धरि शान्ति रहल । सिनेमा शुरु होइते मानू बिहारि आबि गेल । छीना झपटी शुरु भऽ गेल । ओ क्रमशः घबराहटिमे कखनो एकर तऽ कखनो ओकर हाथ हटबैत रहल । मुदा, अवस्था ओकर नियन्त्रण सँ बाहर होइत जा रहल छल । जखन एक हाथ ओकर सलवार दिस आ दोसर छाती दिस सरकय लागल तँ झट सँ ठाढ भऽ गेल । फेर ट्वाइलेट जएबाक अछि कहि, जल्दी सँ बाहर निकलि आएल । दूटा युवक सेहो पाछु लागि गेल । किछु देरक बाद बाहर निकलल आगाँ दूनु युवककेँ ठाढ़ देखलक । झट सँ फेर ट्वाइलेटमे घुसि गेल ।
आ सिनेमा समाप्त होएबाक प्रतिक्षा करय लागल । सिनेमा समाप्त होइते भीड़क लाभ उठा कोनो तरहे ओतय सँ भागि गेल । आब ओ घर घुमैत भीड़मे सँ एक छल । ओकरा पता छलै, कियो ओकरा ताकि रहल छै । भीड़मे अपनाकेँे नुकबैत अनजाने बाटमे ओ आगाँ बढैेत रहल । एखन तक ओ एक विचित्र भय सँ काँपि रहल छल, जेना कोनो चोरी कएने हो वा कोनो बड़का अपराध ।
सपना शायद सत्य भऽ गेल छल । ओ पूर्णरुपमे सत्यकेंँ झेलि रहल छल । स्वप्नक सुरक्षा नहि जानि कतय हेरा गेल छलैं । देखलक समीप मन्दिरमे आरती भऽ रहल छै । मन्दिरमे प्रवेश कएलक ओतय भीड़ छलै । ओहिमे ओ सम्मिलित भऽ गेल । भय सँ शरीर सुन्न भेल जाइत रहैक तएँ एकटा पायामे सटि कऽ आँखि बन्न कऽ लेलक ।
कखन आरती समाप्त भेल आ लोक चलि गेल जयन्तीकेँ पतो नहि चललै । आँखि खुजलै तऽ एकटा साधुकें अपना दिस घुरैत देखलक । कोनो स्वचालित यन्त्र जकाँ आगाँ बढ़ल आ हुनकर चरण स्पर्श कएलक । ओकर गरा अवरुद्ध भऽ गेल छलैक । किछु बाजब ओकरा बसक बात नहि छलैक ।
“ तोहर मनकाना पूरा हेतौ.............उठ धैर्य सँ काम ले” जयन्ती उठि कऽ ठाढ़ भेल । ओ साधुक आँखि दिस देखलक । एकटा विचित्र ज्वाला धधकि रहल छलै ओहि साधुक आँखिमे । साधु ओकरा अपना पाछा अएबाक हेतु कहलक आ यन्त्रवत् हुनकर पाछु—पाछु जाय लागल । हुनक पाछु चलि मन्दिरक प्राङ्गण पार करैत ओ एकटा कोठरीमे प्रवेश कएलक । भितर घुसिते’ द्वार अपने धड़ सँ बन्द भऽ गेल । ओ बन्न द्वारकेँ देखैत थकमका कऽ ठाढ़ भऽ गेल ।
“ चलि आ’ “ पलटि कऽ देखलक तँ भीतरक दोसर प्रवेश द्वार पर ठाढ़ साधु ओकरा कहि रहल छल । झिझकैत मोन सँ ओ दोसर द्वार पार कएलक तऽ ओहो धड़ाक दऽ अपने बन्न भऽ गेल । ओ डेरा कऽ, बन्न द्वार केँ देखय लागल ।
साधुक पुनः आदेशात्मक स्वर ओकरा कान सँ टकरएलै— “चलि आ” देखलक ओ आब भितर तेसर द्वार पर ठाढ़ छल । किछु क्षण ठाढ़ रहल ।
भक्तिपूर्ण विश्वास सँ पुनः ओ आगा बढ़ल । धड़ाक दऽ तेसरो द्वार बन्न भऽ गेल । आब साधु चारिम द्वार पर ठाढ़ ओकर प्रतीक्षा कऽ रहल छल । जयन्तीक डर सँ हृदय धड़कय लगलै, गर सुखि गेलै । पैर काँपय लगलै । ओ सिनेह सँ भरि गेल की साधुक भेषमे कतेको राक्षस घुमैत अछि, मुदा की करत..... बेसी सँ बेसी ओतबे करत ने, जकर जिज्ञासा सँ एतय धरि आएल छी ।से अपनाकेँ मजगुत कऽ द्वार पार कऽ गेल । । देखलक आगाँ एकटा आओर द्वार छल, जतय साधु ठाढ़ छल । केबाड़ लग सँ धूप जड़बाक सुगन्ध ओकर तनमनमे व्याप्त होबय लागल । एकटा छोटका दीप सेहो जरैत देखि रहल छल । मदहोश वातावरणमे ओकर तनमन शिथिल होइत बुझेलै ओतय ओकर बुद्धि सजग होइत जा रहल छल । ओकरा विश्वास होइत जा रहल छल कि एहि पाँचम द्वार केँ पार कएलाक बाद बाँकी सभद्वार ओकरा लेल सभदिनक लेल बन्द भऽ जाएत ।
“ आ तखन साधुक फेर ओहने आदेशात्मक स्वर सुनाए देलक । जयन्ती हुनकर बात जेना नई सुनने हो । ओकर प्रज्ञा ओतय सँ भगवाक आदेश दैत हो एहन अनुभूति होइते घुमल आ जाही बाटे’ आएल छल ओम्हरे भागय लागल ।”
ओ भगैत जा रहल छल अज्ञान सँ ज्ञान दिस ? शून्य दिस चेतना दिस ? जागरण दिस ? शायद ओकरा एकटा जानकारी भेट गेल छलै । नइ ई ठीक नई अछि ।
अचेतन मनमे सेहो किछु जन्मजात संस्कार एहन होइत अछि, जकर सीमाकेँं उल्लंघन स्वप्नमे सेहो सम्भव नहि अछि । शायद ओकरा जानकारी भऽ गेल छलै की स्वप्न अपन अनुभवक आधारभूत घटना पर केन्द्रित रहैत अछि । स्वप्न सँ अज्ञानताक नाश नहि होइत अछि, ज्ञान नहि भेटैत छैक ।
बिपिन झा
स्वातन्त्रोत्तरयुगीन संस्कृत साहित्यक संवर्द्धन मे मिथिलाक भूमिका।
भक्तत्राण परायणा भवभयाभावं समातन्वती, या देवीह सुदर्शनं नृपमणिं संरक्ष्य युद्दे खरे।
या चास्मै समुदात् स्वराज्यमखिलं स्वीयं हृतं शत्रुभिः, पायात् सा भुवनेश्वरी भगवती मां सर्वदा शर्मदा।
भारतीय ज्ञान परंपरा विचारक, ग्रन्थक आओर चिन्तकक निरन्तर अविच्छिन्न प्रवाहमयी धारा अछि जे दर्शन, साहित्य, तर्क, विज्ञान, धर्मशास्त्र आओर अन्यान्य ज्ञान-विधा से निर्मित होइत रहल अछि। एहि ज्ञान परंपरा कऽ समुन्नयन मे संस्कृत साहित्य आओर मैथिली साहित्य कऽ योगदान नितान्त महनीय अछि।
एहि लेख मे संस्कृत साहित्यक संवर्द्धन मऽ मिथिलाक की भूमिका रहल अछि एकर दिग्दर्शन करबाक प्रयास कयल जा रहल अछि। तहू मे मूलतः स्वातंत्रोत्तर युगीन संस्कृत साहित्यक संवर्द्धन मऽ मिथिलाक की भूमिका रहल अछि एकर विश्लेषण कयल जा रहल अछि। वस्तुतः एकटा लेखक माध्यम सँ सम्पूर्ण तथ्यक प्राकाशन सर्वथा कठिन अछि, अस्तु प्रतिनिधि अंश द्वारा कथनक पुष्टि करवाक प्रयास रहत। संस्कृतक की स्थिति छल प्राचीन मिथिला म ई त्ऽ एकटा उद्धरण सँ स्पषट भय जाइत अछि-
जगद्ध्रुवं स्याजगध्रुवं वा, कीडांगना यत्र गिरोगिरन्ति।
द्वारस्थ नीडाग्ङ्गसन्निरुद्ध, यानीहि तं मण्डन मिश्र धाम॥
संस्कृत साहित्यक समुन्नयन मे प्राचीन काल सँ मिथिला कऽ सहस्रशः मनीषि समर्पित रहल छथि । एहि मे- व्याकरणक क्षेत्र मे वार्त्तिककार वरुरुचि, भाषाविद् आओर साक्षात शेषावतार भगवान पतंजलि, दर्शनक क्षेत्र मे गौतम, कपिल, वाचस्पति मिश्र, ईश्वरक अस्तित्त्वप्रतिष्ठापक रूप मे प्रथित उदयनाचार्य, नव्यन्यायक प्रतिष्ठापक गंगेश उपाध्याय, उद्योतकर, पक्षधर मिश्र, अद्वैत वेदान्ती मण्डन मिश्र, विदुषी गार्गी, मैत्रेयी, भारती, धर्मशास्त्रक क्षेत्र मे लक्ष्मीधर, श्रीकर, हलायुध, भवदेव, श्रीधर,अनिरुद्ध, हरिहर, चन्द्रशेखर प्रभृति विसेश रूप सँ प्रथित छथि। काव्यक क्षेत्र मे विद्यापति जयदेव,मुरारि, भानुदत्त, शकर महनीय छथि।
अन्य विद्वान में महावैयाकरण पं० दीनबन्धु झा, पं० श्यामसुन्दर झा, पं० देवानन्द् झा, पं० तुलानन्द झा, पं०बुद्धिनाथ झा, पं०राधाकान्त झा, पं०वामदेव झा, पं० कामेश्वर झा, पं० वी० एन० झा, पं० शशिनाथ झा प्रभृति केँ नाम लेल जा सकैत अछि।
स्वातन्त्रोत्तर युग मे अनेकशः कवि अपन कृतिक माध्यम स्ँ संस्कृत साहित्य सुषमाक संवर्द्धन कयलथि। कतिपय कवि आओर हुनक कृति द्रष्टव्य अछि-
महाकाव्य :-
पं० भवानीदत्त शर्मा सुरथचरितम्
पं० रामचन्द्रमिश्र वैदेहीचरितम्
पं० पशुपति झा नेपालसाम्राज्योदयम्
पं० मतिनाथ मिश्र भार्गवविक्रमम्
पं० कृपाकान्त ठाकुर आंजनेयचरितम्
पं० रामकुमार सर्मा भरतचरितम्
खण्डकाव्य :-
पं० जीवनाथ झा महेन्द्रप्रतापोदयम्
पं० श्यामसुन्दर झा राजलक्ष्मीचरितम्
पं० विष्णुकान्त झा राजेन्द्रवंशप्रशस्ति
पं० रामचन्द्र मिश्र याज्ञासेनी
पं० काशीनाथ मिश्र स्मरदहनमंजरी
पं० रामजी ठाकुर वैदेहीपदांकनम्
पं० हरिकान्त झा जम्मूकाश्मीरसुषमारत्नम्
अन्य प्रमुख काव्य:-
पं० कविशेखर बद्रीनाथ झा काव्यकल्लोलिनी
पं० आनन्द झा आनन्दमधुमन्दाकिनी
दृश्यकाव्य:-
पं० तेजनाथ झा अयाचीनाटक
पं० अच्युतानन्द झा विज्ञानमहिमा
डा० नोदनाथ मिश्र मधुमालती
उक्त विवरण एकटा झलकमात्र अछि वस्तुतः तऽ एहि तरहें असंख्य रचना भेल अछि। अही संग संग ई कहब जरूरी अछि जे बहुतो विद्वान एहनो छलाह जे संस्कृत सं मैथिली पद्यानुवाद कय संस्कृतक संग संग मैथिली साहित्य कें समृद्द करबाक प्रयास मे आजीवन लागल रहला। अहे तरहक एकटा उदाहरण प्रस्तुत अछि पं० तुलानन्द झा कृत दुर्गासप्तशती चतुर्थ अध्यायक १ टा पद्या।
इन्द्रादि देव सभ मिलि करैछ हर्षें, रोमांच सुन्दर शरीर नुतो स्ववाक्यें।
दुर्गा प्रणाम-रत मस्तक नींक भावें, देवी कऽ मारल महिषासुर नाश भेनें॥
देवी जनीक सुबलें सभ व्याप्त विश्वे, सम्पूर्ण देवबल संघक कैल देहे।
अम्बा थिकीह सब देव महर्षि पूज्ये, प्रेमे नमी, सुभद ओ हमरा सभैकेँ
एवं प्रकारेण कहल जा सकैत अछि जे मिथिला सर्वथा सारस्वत साधना मे लीन रहैत संस्कृतक साहित्य सम्वर्द्धन में सतत योगदान दैत रहल अछि।
१.कुसुम ठाकुर- प्रत्यावर्तन आ २.हेमचन्द्र झा-साढ़े तीनो लाख
१.कुसुम ठाकुर
प्रत्यावर्तन (आगाँ)
ओना त एकटा कहबी छैक "जाबैत साँस ताबैत धरि आस " मुदा हमरा तs पूर्ण विश्वास छल जे लल्लन जी के किछु नहि होयतैन्ह मात्र किछु दिनक ग्रहक चक्कर छैक, तथापि चिन्ता तs होइते छल । हम इ कोना कही जे चिन्ता नहि होइत छल । हमारा सब केर वेल्लोर सs अयालक किछु मास बाद दादा जी (हमर ससुर) अयलाह। एक दिन दादा जी लल्लन जी सs गप्प करैत छलाह, हम दोसर कोठरी मे छलहुँ मुदा हुनकर सबहक गप्प ओहिना स्पष्ट सुनाई परैत छल । जहिना हम हिनक बिमारी के विषय मे गप्प करैत सुनालियैक ओहि घर मे रुकि गेलहुँ आ दादा जी आ लल्लन जी केर गप्प सुनय लगलहुँ । दादा जी हिनका सs कहैत छलाह "अहाँ चिंता जुनि करू अहाँ केर मात्र ग्रहक चक्कर अछि , हम बेबी बाबु सs अहाँक आ अपन टिपनि देखेलियैक अछि अहाँके किछु कष्ट अवश्य अछि मुदा हमरा पुत्र शोक नहि अछि "। इ सुनी लल्लन जी आ दादा जी केर मुख मंडल पर आबय वाला भाव तs हम नहि देखी सकलियैक मुदा कल्पना अवश्य केलहुँ । खास कs लल्लन जी केर जिनका हम खूब नीक सs चिन्हैत छलियैक । हम आगू नहि सुनी सकलियैक आ ओहि ठाम सs चलि गेलहुँ । मनुष्य कतेक विवश होइत छैक ?
दादा जी अपन इच्छा हिनका लग व्यक्त कयने रहथि जे हुनक इच्छा छलैन्ह जे हुनक बेटा सब सेहो मधुबनी मे घर बनाबथि , हमरा एक बेर लल्लन जी इ बात कहने छलाह । दादा जी जमशेदपुर सँ गेलाक किछुए दिन बाद एकटा चिट्ठी पठौलथि जाहि मे लिखने छलाह जे ओ मधुबनी मे मकानक लेल जमीन देखि रहल छथि संगहि गाम पर सेहो एकटा जमीन छैक आ हुनक इच्छा छैन्ह जे ओ जमीन लल्लन जी लs लेथि । चिट्ठी अयलाक किछुए दिन बाद दादा जी केर दोसर चिट्ठी अयलैन्ह जाहि मे ओ लल्लन जी के पाई लs कs गाम वाला जमीन रजिस्ट्री कराबय लेल आबय के लेल लिखने छलाह संगहि एकटा मधुबनी मे मकान लेल नीक जमीन छलैक सेहो लिखने छलाह । लल्लन जी मधुबनी गेलाह आ गामक जमीन रजिस्ट्री करा लेलथि संगहि हुनका मधुबनी वाला जमीन सेहो पसीन आबि गेलैन्ह आ ओहि जमीन वाला सँ सेहो गप्प करि कs आबि गेलाह । किछु दिन बाद पाई केर इंतजाम करि कs दादा जी केर पठा देलथिन्ह आ दादा जी केर जमीन रजिस्ट्री कराबय लेल कहि देलथिन्ह । हमरा कहलाह "ओना तs हमरो इच्छा नहि छल मधुबनी मे मकान बनेबाक, मुदा दादा कहि देलाह तs हुनकर इ इच्छा अवश्य पूरा होयतैन्ह "।
लल्लन जी केर सोचब सच मे ठीक छलैन्ह, जमीन किनला के बाद सs दादा जी बड खुश रहैत छलाह । Tisco सँ घर बनेबाक लेल क़र्ज़ (loan) भेटय मे किछु समय लागि गेलैक । ता धरि दादा जी नींव दियेबाक सबटा दिन देखवा लेलाह । नींव देलाक सँग घर बनय लगलैक हम दुनु गोटे सँग मे पंडित जी सेहो मधुबनी घर बनेबाक लेल गेल छलहुँ । पता नहि कोन धुन छलैन्ह आ की सोचय छलाह मुदा हम सब जे सोचि कs घर बनाबय लेल गेल रही ताहि सँ बेसी नीक घर बनि गेलैक । एक तs अपने" सिविल इंजिनियर " मकानक सबटा नक्सा अपने बनने छलाह आ दुनु गोटे ठाढ़ रहैत छलहुँ तs किछु नय किछु अपन सुविधाक ध्यान आबिये जाइत छल । मिला जुला कs हमरा सबहक हिसाबे जतबा मकान मद मे लगबाक चाहि ओहि सँ बहुत बेसी भs गेलैक मुदा कोनो वस्तु मे हम सब कटौती नहि केलियैक सब सामन नीके लगायल गेलैक। बेसी सामन तs जमशेदपुर सँ ट्रक सs किनि कs पठायल गेल छलैक । मकान बनैत छल ओहि समय मे कखनहु कs हमरा मोन मे होइत छल जे बेकार मे एतेक खर्च कs रहल छियैक मकान केर पाछू मुदा हिनका नहि कहि पाबियैन्ह । मकान बनय मे तs ओना छौ मास लागि गेलैक मुदा दो मास लगातार हम , लल्लन जी आ पंडित जी (जे हमर बेटे सन छथि ) तीनू गोटे छलहुँ ओहि केर बाद बीच बीच मे हम आ लल्लन जी अबियैक आ किछु दिन रहि चलि जाइत छलियैक मुदा पंडित जी छौ मास धरि लगातार रहलाह आ मकान बनि गेलाक बादे जमशेदपुर आपस गेलाह ।
खैर छौ मास मे मकान बनि कs तैयार भs गेलैक । गृह प्रवेशक दिन देखा कs गृह प्रवेश सेहो खूब धूम धाम सँ भेलैक । गृह प्रवेशक किछुए दिन बाद हमर देवर केर विवाह छलैन्ह जाहि मे लल्लन जी बड उत्साहित छलाह आ विवाह सेहो नीक सँ संपन्न भेलैक । गृह प्रवेश सँ विवाह धरि ओहि बेर हम सब करीब एक मास मधुबनी मे रही आ अपन ओहि मकान मे छलहुँ मुदा एकटा प्रसन्नता होइत छैक, से पता नहि कियैक हमरा भीतर सँ नहि होइत छल। इ भावी दुखक संकेत छल कि की, नहि जानि ।
लल्लन जी हमरा सs किछु नहि नुकाबय छलाह आ नहि हम हुनका कोनो काज मे बाधा दियैन्ह आ कि मना करियैन्ह। हुनका मोन मे अपन माँ पिता जी भाई बहिन के प्रति अपार स्नेह छलैन्ह । माँ केर तs ओ परम भक्त छलाह , माँ किछु कहि देथिन्ह तs हुनकर प्रयास रहैत छलैन्ह जे ओ ओकरा अवश्य पूरा करैथ मुदा एहेन विडम्बना जे हुनकर बीमारी के विषय मे हम माँ के नहि कहि सकलियैन्ह। माँ के मात्र एतवा बुझल छलैन्ह जे लल्लन जी केर बेर बेर बुखार भs जाइत छैन्ह ।
मनुष्य जखैन्ह दुःख मे रहैत अछि तs ओकरा भगवान छोरि और किछु मोन नहि रहैत छैक । ओ अपन दुःख मे ततेक नहि ओझरायल रहैत छैक जे आन किछु सोचबाक ओकरा फुर्सत नहि भेंटैत छैक । लल्लन जी सन व्यक्तित्व केर बाते किछु आओर होइत छैक । अपने बीमार छलाह मुदा दोसर केर विषय मे सदिखैन सोचैत रहैत छलाह । कखनहु कs हुनक एहि तरहक सोच देखि हमहु बिसरि जायत छलहुँ जे ओ बीमार छथि मुदा एहेन कोनो दिन नहि होइत छलैक जे हम राति मे हुनका विषय मे नहि सोचैत छलहुँ । हमर तs जेना नींद उरि गेल छल , राति या तs टक टकी लगा कs बितैत छल या नहि तs नोर बहा कs । दोसर तरफ़ मुँह कs हम भरि राति कानैत रहि जाइत छलहुँ। एक तs लल्लन जी बीमार छलाह दोसर हम एहि विषय मे किनको सs नहि कहने रहियैन्ह आ नहि हम ओकर चर्च करैत छलहुँ खास कs बच्चा सब लग तs एकदम नहि । सब सs कष्टप्रद छलs जे हमरा दुनु गोटे के सबटा बुझल छल मुदा हम सब एक दुसरा संग सेहो कखनो एहि विषय पर गप्प नहीं करैत छलियैक । की गप्प करितियैक , कोना करितियैक मुदा एक दिन लल्लन जी केर मुँह सs निकलिए गेलैन्ह आ हमरा पुछि देलाह ।
हमरा ओहिना मोन अछि, हमर मंगल व्रत छल साँझ मे खेलाक बाद हमर माथ घुमय छल हम बिछौना पर आबि कs परल रही लल्लन जी टीवी देखय छलाह किछुए समय बाद ओहो आबि कs हमरा बगल मे परि रहलाह । इ देखि पता नहि हमर मोन आओर बेचैन भs गेल हम मुँह झाँपि कs दोसर दिस घुमि गेलहुँ । ओहि घर मे मात्र हम दुनु गोटे छलहुँ । अचानक लल्लन जीक आवाज कान मे आयल "किछु होइत अछि की , आकि फेर माथ घूमि रहल अछि" । हम किछु नहि बजलियैन्ह , हम ऐना परल छलहुँ जेना हम सुतल रहि , मुदा ओ तs हमर एक एक टा मोनक गप्प बुझैत छलाह तुरन्त कहलाह हम सब बुझैत छी अहाँक मोनक गप्प , मुदा हमरा बाद अहाँ की करब"? बस एतबहि बजलाह आ चुप भs गेलाह । इ सुनतहि हमर माथ जेना सुन्न भs गेल , हमरा किछु नहि फुरायल आ नहि किछु बाजि भेल मुदा हमर आँखि सs नोर ढब ढब खसय लागल आ ओ रुकय के नाम नहि लैत छल । ओहि राति हम पहिल बेर लल्लन जी के सोंझाँ मे हुनका बीमार भेलाक बाद कानल छलहुँ आ भरि राति कानैत रहि गेलहुँ । लल्लन जी केर सेहो एतबा हिम्मत नहि छलैन्ह जे हमरा चुप्प करबितथि ।
२.हेमचन्द्र झा
कथा
साढ़े तीनो लाख
“ अपने तीन भाई छी, तँ कम सँ कम साढ़े तीनो लाख तँ गनबै"विदेसर बाबूक ई वाक्य जेना रमणक हदय पर ब्रजाघात के देलक । हुनक मूँहक बकार बन्न भऽ गेलनि । पछिला छह महीना तँ जाहि कथाक पाछू पड़ल छलाह, तकर आश ई पाँती तोड़ि देलकनि । एहूठाम कुटमैती नहि भऽ पेबाक पीड़ा हुनका चेहरा पर साफ देखाई दऽ रहल छलनि । आब रमणक लेल एहिठाम एको मिनट काटब पहाड़ छलनि । जेना-तेना आगूक कपमे बाँचल चाह ओ समाप्त केलनि आ ओहिठाम सँ चलबाक उपक्रम करय लगलाह । हुनक मोन मे झंझावातक प्रवाह चलिये रहल छल । बेर-बेर ओ झंझावात जेना जीह धरि आबि के रूकि जाईत छल । रमण बाबू कन्यागत छलाह] रें प्राय: बजबाक हक नहि छलनि हुनका । किछु बाजि ओ अपन-अपन मोन हल्लुक करय चाहैत छलाह । तथापि बात जेना मोन सँ जीह पर आबि अटकि जाईत छलनि ।
तथापि एहि झंझवात मे मोन तँ ई कहिये देखकनि जे काज तँ नहिये भेलौ,तहन चुप्प किएक छें ? जे बजबाक छौ से बाजि दही आ मोनक भरास निकालि ले । एहि उहापोह मे ५-१० मिनट आर बीति गेल । तथापि अंततः चुप्पी के तोड़ैत रमण बजलाह “ हमरा पहिने सँ शंका छल जे अपने दहेज वला गप्प उठेबे करबै आ तें हम पहिनहि अहाँ ओहिठाम नहि आबय चाहैत छलहुँ । हमरा अपन आर्थिक सीमा ज्ञात अछि आ हम बुझैत छलहुँ जे अहाँ एहिठाम कुटमैती मे नहि सकब । तथापि अपने के हमर बचिया पसिन छल आ अहीं काज पर विशेष जोर द’ क’ हमरा बजौने छलहुँ । आ तें हम आयल रही । तथापि पाईवला गप्प अपने उठाइये देलियैक । एहि संबंध मे हम एतबे कहब जे धरौआ गनबाक सामर्थ्य हमरा मे नहि अछि । तथापि अपन बेटीक बियाह मे जतय धरि भऽ सकत करब । ताहि शर्त पर जँ अपने कें कथा मंजूर हो तँ बेस, नहि तँ आज्ञा देल जाऊ । ”
रमणक बातक तत्काल कोनो जवाब नहि द’ सकलाह विदेसर बाबू । हुनक माथ झुकि गेलनि । एकबेर फेर वातावरण मे चुप्पी पसरि गेल । एही चुप्पीक मध्य रमण बाबू नमस्कार पातीक बाद ओहिठाम सँ विदा भ’ गेलाह ।
रमण दिल्ली महानगर मे एकाउन्टेन्टक एकटा छोट-छीन नोकरी करैत छला । पाँच गोटाक परिवार छलैक । दूटा जेठ बचिया आ सभ सँ छोट बचवा । पहिल कन्यादानक चक्कर मे साल भरि सँ घूमि रहल छला । कतहु बर पसंद होई तँ घर नहि । जतय दुनू पसंद होई ततय नकदी सुनि चुप्पे वापिस भ’ जाय । तथापि एहिठाम उम्मीद रहैक जे काज पटि जायत । कारण काजक शुभारंभ विदेसर बाबू स्वयं कयने रहथि ।
विदेसर बाबू सेनाक सिविल ड्यूटी मे अधिकारी वर्ग सँ इलाहाबाद सँ रिटायर भेल छलाह । अपन दू पुत्रक संग दिल्लीए मे निवास करैत छलाह । गाम-घरक सम्पन्न लोक छलाह । गाम पर खेत-पथार सहित घर-आँगन सभ किछु व्यवस्थित छलनि । जेठ पुत्र निजी क्षेत्रक कोनो कंपनी मे नीक पद पर कार्यरत छलनि आ छोट पुत्र स्व-रोजगार मे लागल छलनि । घरे लग एकटा कॉस्मेटिक्सक दोकान खोलने छलाह । वस्तुतः हिनके बियाहक लेल एकटा नीक पारिवारिक लड़कीक तलाश छलनि विदेसर बाबू कें ।
प्रभात रमणक ममियौत विदेसर बाबूक पड़ोस मे रहैत छलाह । प्रभात एखन अध्ययनरत छलाह आ यदा-कदा विदेसर बाबू ओहिठाम गेल करथि । गप्प-शप्पक क्रम मे विदेसर बाबू हुनका सँ अपन पुत्रक बियाहक बात कहलथि । विदेसर बाबू कहलाह जे हमरा घरेलू काज मे दक्ष, सुन्नर आ कनेक पढ़ल-लिखल कन्या चाही । प्रभातक ध्यान तत्काल रमणक जेठकी बचिया पर गेल आ ओ बिदेसर बाबू कें एहि संबंध मे विस्तार सँ बता देलनि । संगहि प्रभात ईहो स्पष्ट क’ देलक जे हमर पिसियौत रमण बाबू अहाँ मे सकताह नहि आ तें यदि पाई-कैड़ी वला गप्प रखबैक तँ ओ काज नहि क’ सकताह ।
प्रभात अगिला रवि के रमणक डेरा पर पहुँचलाह आ प्रस्तावक संबंध मे रमण कें कहलनि । रमण के प्रस्ताव नीक लगलनि आ तें ओ अपन बचियाक फोटो आदि प्रभात के द’ देलनि । संगहि रमण ईहो कहलाह जे हमरा जहाँ धरि होयत हम गानब, तथापि हुनका हैसियतक अनुसार हम नहिं सकब से स्पष्ट कहि दैत छियह । तें पहिने हुनका सँ पाईवला गप्प खुलबा लीह आ तखने गप्प आगू बढ़बियबह ।
रमणक गप्प मे अपन स्वीकारोक्ति दैत प्रभात फोटो आहि लेलक आ अपन डेरा पर वापस आबि गेल । किछु दिनक बाद बिदेसर बाबू सँ फेर ओकर भेंट भेलैक आ बिदेसर बाबू फेर पूछि देलथिन्ह कथाक प्रसंग । एहि बेर प्रभात स्पष्ट कहलकनि जे हम कथाक प्रसंग अपन पिसियौत सँ गप्प केलहुँ अछि, परन्तु चूँकि ओ अहाँक हैसियत मे नहि सकताह, तें कहलनि अछि जे अहाँ अपन डिमांड स्पष्ट रूप सँ बता दियौ, ताकि तदनुसार ओ आगू विचार करताह ।
“ डिमांडक कोनो एहन बात नहि छैक । हुनका चिंता नहि करय कहियौन । हमरा हुनक बचिया पसंद अछि । हुनका कहियौन जे हमरा भेंट करथि ।” - विदेसर बाबू कहलाह । तत्पश्चात प्रभात शीघ्रे रमण कें फोन केलकनि आ अगिले रवि दिन विदेसर बाबू ओहिठाम जेबाक प्रोग्राम तय भ’ गेल । चूँकि रमण एहि बेर आशान्वित छल, तें संग मे अपन जेठ भाय विनोद या छोट भाय महेश के सेहो ल’ लेलक । अपने तीनू भाई रमण आ प्रभात सहित चारि गोटा कोना जाईत तें रमण अपन पितियौत विनय के सेहो संग क’ लेलनि आ दू बजे दिन धरि विदेसर बाबू ओहिठाम पहुँचि गेलाह ।
तथापि विदेसर बाबू ओहिठाम पहुँचबा सँ पूर्व सभ कियो प्रभातक डेरा पर जमा भेलाह आ पहिने अपना मे विचार-विमर्श केलाह । विनोद रमण सँ पुछलनि जे एहि कनेदान मे तोहर कतेक बजट छौक । रमण कहलाह जे हम एक सँ सवा लाख गानब आ आगू बरियाती खर्च, दुरागमन आदि सभ तें छैके । विचार-विमर्शक बाद सभ कियो विदेसर बाबू ओहिठाम हाजिर भेलाह ।
मिथिलाक पारंपरिक रीतिए विदेसर बाबू सभक स्वागत केलनि । नमस्कार पाती समाप्त भेलाक बाद परिचय पात भेल । दुनू पक्ष एक-दोसर के विस्तार सँ अपन परिचय देलनि । फेर गाम घरक स्था-पातक गप्प भेल । किछु इलाहाबादक नोकरीक गप्प सेहो भेल आ पटना मे जमीन लेबाक गप्प सेहो उठल । गोत्र-मूल आदि सहित वर्तमान मँहगाई, नोकरिहाराक समस्या मिथिलाक बाढ़ि, राजनीतिक घटना-चक्र आ गाम-घर मे दिन-दिन घटल जाईत धान-पानिक मुद्दा पर सेहो विचारक आदान-प्रदान भेल । कन्यागत दिस सँ लारव निवेदनक बादो बिदेसर बाबू-पाईवाला गप्प ओहू दिन नहि बजबाह । एवं-क्रमेण चारि बाजि गेल । सभा-तोड़बाक समय सेहो भेल । अपन पाईवला गप्प तँ बिदेसर बाबू नहिये बजलाह, तथापि कन्यागत सँ जरूर खुलाबय चाहलाह । आखिर दुनू पक्ष दिस सँ पाईवला गप्प नहि निकलल ।
अंत मे सभा के समाप्ति दिस ल’ जाईत विदेसर बाबू बजलाह-‘तहन अहाँ लोकनिक की विचार भेल । चूँकि पाईवला गप्प एखनहुँ अस्पष्ट छल तें विनोद ई कहैत सभा समाप्त केलाह जे हम सभ पहिने लड़का देखि लैत छियैक आ तत्पश्चात् विचार-विमर्शक उपरांत अपने सँ फेर भेंट हेतैक ।
पाँचो गोटा कन्यागत विदेसर बाबू आ हुनक जेठ बालकक संग लड़का कें देखबाक लेल दोकान पर पहुँचलाह । लड़का के देखि हुनका सँ कनेक काल गप्प केलाक बाद सभ गोटे ओतय सँ चलि देलाह । बस स्टेण्ड धरि विदेसर बाबू अरियातय एलाह । नमस्कार-पातीक औपचारिकताक बाद विदेसर बाबू वापस भेलाह आ फेर सभ कियो प्रभातक डेरा पर जमा भेलाह ।
तीनू भाई रमं अपन पितिऔत आ ममिऔतक संग एहि पर फेर विचार केलनि । अंततः इ निर्णय भेल जे प्रभात भौजी के आनि कें लड़का देखा देथुन, एहि रूपें जे एहिठामक लोक वा लड़का नहि बूझि सकथि । जँ भौजी (लड़कीक माय) कें लड़का पसन्द हेतैन तँ अगिला रवि दिन रमण स्वयं असगरे विदेसर बाबू सँ भेंट करथि आ हुनका समक्ष आदर्श कथा कऽ लेबाक प्रस्ताव राखथि । आ तत्पश्चात् जँ पाई-कौड़ीक गप्प उठैक तँ अपन अधिकतम सामर्थ्य एक-सवा लाख बता देथि ।
तदनुसार बीच्चे मे एक दिन प्रभात आयल आ भौजी के ल’ क’ लड़का देखेबाक लेल गेल । भौजी कें लड़का पसन्द पड़लनि आ तें रमण अपन पूर्व निर्धारित कार्यक्रमक अनुसार अगिला रवि कें विदेसर बाबू ओहिठाम पहुँचलाह । थोड़े काल एम्हर-ओम्हर के गप्प भेलैक आ एही क्रम मे रमण आदर्श कथा क’ लेबाक प्रस्ताव विदेसर बाबु लग रखलनि । संगहि इहो कहलनि जे हमर बेटीक वियाह थिक, तें अपन सामर्थ्यक अनुसार गोर लगाई कहि जहाँ धरि भ’ सकत नगदीक व्यवस्था करब ।
रमणक एहि प्रस्तावक तत्काल उत्तर नहि द’ सकलाह विदेसर बाबू । नगद टाका छुटैत देखि हुनक पहिलुका सभटा आदर्श धयले रहि गेल । अपन कहलाहा सभटा गप्प जेना विदेसर बाबू के मोन पड़ि गेलनि । हुनक वाक् बन्न भ’ गेलनि । कन्यागत सँ एहन आशा नहि रहनि । हुनका मोन मे वस्तुतः की रहनि से सँ ओएह बुझथि,परंतु चेहराक भाव बता रहल छलनि जे ओ एहन भारी घाटा नहि सहि सकैत छथि । वातावरण मे कनेक कालक लेल चुप्पी पसरि गेल ।
रमण सँ ५ मिनटक समय ल’ क’ विदेसर बाबू घरक भीतर गेलाह । ता धरि रमण शांत-चित्त बैसस रहल । विदेसर बाबू कनिये काल मे वापस भेलाह आ बजलाह - “अपने तीन भाई छी नोकरी मे, कम सँ कम साढ़े तीनों लाख तँ गनबे करबैक” । बिदेसर बाबूक ई वाक्य पछिला छह महीना सँ जोड़ल गेल कथा-सूत्र कें समाप्त क’देलक ।
१.अमन कुमार झा , २. मनोज झा मुक्ति
आ ३.३.-गोपाल प्रसाद -हिंदी ,मैथिली , मिथिला , बिहार ओ मैथिल लोकनि सं अपेक्षा
१.अमन कुमार झा - काठमाण्डू
२०६६।०७।१४गते शनिदिन, काठमाण्डू । आइ तराइ रिर्पोटर क्लवक आयोजनामे एक“संचार सहकार्य तथा बिकासको निम्ति संचार सम्बाद” नामक बिचार गोष्ठिक आयोजना कएल गेल । जाहिकें आयोजक युनिर्भसल टाइम्स रहल एहि कार्यक्रक सभापत्तिक आशन ग्रहन तराइ रिर्पोटर क्लवक अध्यक्ष ई. कामेश्वर प्रसाद शाह आ अतिथी युनिर्भसल टाइम्सके सम्पादक श्री राम मनोहर पन्थ छलैथ । डा. रपोवर्ट टितलक प्रमुख आतिथ्यके भेल एहि कार्यक्रममे ओ समाजिक आ मानवीय सम्बन्धपर जोर देने छलाह । बिभिन्न वक्ता सभ संचार क्षेत्रमे भऽरहल अपराध तथा मधेशक मुदा पर जोर देने छलाह । एहि क्रमे मैथिली साहित्यकार श्री सन्तोष कुमार मिश्र झूठ समाचार लिखनिहार पत्रकारके सजायक ब्यवस्था होवाक चाहि कहलनि ।
२. — मनोज झा मुक्ति
महोत्तरीक मालपोतमे कर्मचारी मालामाल( के करत कारवाही ?)
देश पूर्णतया भ्रष्टाचारक दलदलमे जकड़ागेल अछि । नेपालकलेल भ्रष्टाचार कोनो नयाँ बात नहिं अछि, मुदा जन आन्दोलन दूक बाद देशमे भ्रष्टाचारक बाढ़िए जकाँ आबिगेल अछि । भ्रष्टाचारक एहि बाढ़िमे कर्मचारीसब मालामाल भऽ रहल अछि । ओना व्यापारी, पत्रकार, नेता आ देशक प्रायः निकाय एहि सँ अछुत नहिं रहल अछि,जेकरा जतऽ भेटैत अछि ओतहि लुटऽमे लागल अछि । भ्रष्टाचारक एहि बाढ़िमे बहुत मुश्किलसँ एकाध गोटे इमान्दार मनुख्ख भेटत, जकरा आजुक भ्रष्टाचारक माहौलमे बुड़िबकके संज्ञा भेटैत अछि ।
मधेश आन्दोलनकबाद मधेशमे जौं सभसँ बेसी फाइदा भेटल अछि त मधेशी कर्मचारीके । मधेशीक नामपर ओसब ब्रम्हलुट मचौने अछि । मधेश आन्दोलन आ तकराबादसँ दिनदुगुन्ना आ राति चौगुन्नाक हिंसावसँ खुजल शसस्त्र समूहक डरसँ मधेशक कार्यालयमे रहल अधिकांश पहाड़ी मूलक कर्मचारी अपन अपन सरुवा कराबिलेलक आ मधेशक कार्यालय सबमे स्थानिय मधेशी मूलक कर्मचारीके भ्रष्टाचारक नदि समुद्रमे परिणत भऽगेल । मधेशक कार्यालय सबहक हालति एतेक नाजुक भऽगेल अछि कि कर्मचारी खुलेआम घुस माँगिरहल अछि आ केओ किछु कहऽ नहि सकैया । कोनो जनता जौं किछु कहओ त कोनो ने कोनो दलक नेता आ ओहि कर्मचारीक अपन जातिपातिक लोक लाठी उठालैत अछि, जे भ्रष्टाचारक खेतीमे मलजलक काज कऽ रहल अछि । किछु जनता त घुस द कऽ आओर एकरा बढावा दऽ रहल अछि जल्दी जल्दी काज करेबाकलेल/अनैतिक काज करेबाकलेल, त अधिकांश जनता घुस देबाकलेल बाध्य भऽगेल अछि ।
भ्रष्टाचार कतेक चरम सीमापर पहुँच गेल अछि आ कोना खुलेआम भऽ रहल अछि तकर एकगोट उदाहरण महोत्तरी जिल्लाक जलेश्वर स्थित मालपोत कार्यालयक रवैयासँ देखल जाऽसकैय ।
मधेशमे रहल महोत्तरी जिल्लाक मालपोत कार्यालय सेहो मधेश आन्दोलनकवाद मधेशी कर्मचारीद्वारा खुलेआम लुटारहल अछि । मधेश आन्दोलन पश्चात महोत्तरीक मालपोत कार्यालय कामचलाउ रुपमे एकटा सुव्बाके सहारे चलि रहल अछि, ओहिना जेना ‘राम भरोसे हिन्दू होटल’ । अखन महोत्तरी मालपोतक हाकिम बनल छथि मधेशीक नामपर मधेशीके लुटनिहार, कानूनी ज्ञानसँ अनभिज्ञ, कहुनाक सुव्बा बनल लाल देव राय । जे जनता पाइ नहि दैत अछि तकरा एतेक ने नियम कानून देखवऽ लगैत छथिन्ह जे जनता परेशान भऽजाइत अछि । कहबी जे छैक ‘बन्दूक पकड़ा देलापर हवल्दार बनि जाइत छै’ सैह बातक प्रत्यक्ष उदाहरण बनल छथि —लाल देव राय । मधेशीक नामपर हाकिम बनल कानूनक ‘क’ अक्षर नईं जनने आ पैघ कानुञ्चीके दावा कएनिहार लाल देव रायके कानूनी सल्लाहकार बनल अछि महोत्तरी मालपोतक खरिदार.......।
महोत्तरी जिल्ला मालपोतमे घुसक वर्णन करैत गा.वि.स. हाथीलेटके युवा पिताम्वर महतो कहलनि,‘हम काज कराबऽ मालपोतमे गेलहु त काज एकदिनमे नहिं भेल । दोसर दिन जहन ११/१२ बजे गेलहुँ त काज भेलाकवाद कार्यालयक खरिदार पदमे कार्यरत कर्मचारी सुशील ठाकुर ‘ भोरे भेलाक नाते नीकेसँ बोहनी करेबाक लेल कहलथि ।’ एक्कहिटा सुशिल ठाकुर नहिं प्राय ः सब कर्मचारिक इहे रबैया ओतऽ देखवामे आओत ।
पंक्तिकार स्वयं एकटा काज लऽ कऽ एभिन्यूज महोत्तरी सम्वाददाता कमलेश मण्डलक संग महोत्तरीक मालपोतमे पहुँचल छल, एकटा कागज लेवाक छल हमरा सबके । जहन कागज भेटिगेल त ओतहिके कर्मचारी तेजनारायण झा अखनधरि बोहनी नहि भेल बात कहैत पाई मांगि बैसलाह । एतवे नहिं प्रायः सब टेबुलपर बिना बोहनी आ दक्षिणा देने कोनहुँ काज नहिं भऽ सकैय । कर्मचारीसब एनाकऽ पाइ मंगैत अछि जेना हूनक बाबु/बाबा पूँजी फँसाबिकऽ कोनो व्यापार/व्यवसाय कऽदेने होय । किछु कर्मचारी त ‘हे एतवा कममे घाटा लागि जेतैक’ सन बात कहऽमे सेहो पाछा नई हटैत अछि । ई सऽब किछु जनितो सरकारी संयन्त्र मौन अछि, किया त ओहो भ्रष्टाचारमे लिप्त अछि ।
जखन एहि घुसक सन्दर्भमे कार्यालयक प्रमुख बनल सुव्वा लाल देव राय सँ पुछलगेल त ओ कहलथि ‘ ई घुसक बात सर्वथा मिथ्या अछि, अखनधरि केओ सिकायत नहिं केलक अछि । हम अपने सँ भरिदिनमे २ बेर निचा सँ उपर अनुगमन करैत छी । जौं घुस लैत देखि लेलियैक त हम अवश्य कारवाही करबैक ।’ हूनका जहन हमसब अपनासबसँ माँगल बात कहलियैन त कहलथि,‘आहाँके तखने ने कहबाक चाही, अखन किया कहैत छी ।’
जलेश्वर स्थित महोत्तरी मालपोतक प्राँगणमे एकगोट पागलसन भेषमे टहलैत मनुख्खके देखवैत एकगोट लेखनदास नामनई लिखवाक शर्तपर कहलथि जे ‘काल्हि सातबजे रातिमे एहि पागलके जमिन हाकिमके पाइ खुवाबिकऽ दोसरगोटे अपना नामपर लिखबा लेलकैक ।’ ओ ई कहलथि जे लाल देव जी ठीके कहलथि जे हम २ बेर अपने नीचा उपर जाकऽ निरीक्षण करैत छी । ओ दूइए बेर नहि ५/७ वेर नीचा सँ उपर सभ रुममे चक्कर लगवैत रहैत छथि जे साँझमे कोनो कर्मचारी ई नहि कहए जे हमरा आई कमे पाई भेल । ओ ई देखवालेल जाइत रहैत छथि जे ककरा टेवुलपर कतेक पाई झरि रहल अछि । कतौ हमरासँ बेइमानी त नहि भऽ रहल अछि ?
मधेशक कार्यालयसबमे मधेशी कर्मचारीके खुलेआम भ्रष्टाचार रोकबाकलेल केओ तैयार नहि अछि । जे एक/दू गोटा एकर विरोध करैत अछि तकर काज नहिं भऽ सकैय । कानून निरीह बनल अछि, जौं आक्रोशित किछु युवा अधैर्य भऽकऽ ओहन कर्मचारीके पिटैत अछि त सम्पूर्ण कार्यालयक कर्मचारी लगायत देशव्यापी रुपमे कर्मचारी सबहक आन्दोलन शुरु भऽ जाइत अछि । कर्मचारी जाहि जातिक अछि ओ जातिक व्यक्ति/सँघ संस्था/नेता ओकरा पक्ष लऽ कऽ बाजब/नारा जुलुश करबाक शुरु कऽ दैत अछि ।
घुसक खेती कतेक बढ़ल अछि एकर अन्दाजा एकटा खरिदार/मुखिया/सुव्वा सनसन कर्मचारीके आलिशान महल देखिकऽ लगाओल जाऽसकैय । जहन कि मात्र नोकरीक भरोसे इमान्दारिताक पाईसँ अपना सम्पूर्ण जीवनक कमाईसँ एकटा अधिकृत या फस्टक्लाश अफिसर नीक दूतल्ला घर अपना तलवसँ नहि बनावऽ सकैय । मुदा बाजत के ? आब देखबाक ई अछि जे के नेपाल मायक कोन बेटा आगा बढैत अछि भ्रष्टाचार आ भ्रष्टाचारीके समाप्तीक रास्तापर....।
३.-गोपाल प्रसाद -हिंदी ,मैथिली , मिथिला , बिहार ओ मैथिल लोकनि सं अपेक्षा
हिंदी केर प्रचार - प्रसार ओ विकासक लेल केंद्रीय हिन्दी निदेशालय निरंतर प्रयासरत अछि| अपन विभिन्न महत्वपूर्ण योजना सभ आ कार्यक्रम सं हिन्दी कें वैश्विक धरातल पर प्रतिष्ठा दिलयबाक दिशामे सार्थक प्रयास क रहल अछि| निदेशालय द्वारा द्विभाषी,त्रिभाषी आ बहुभाषी कोष आ वार्तालाप पुस्तिका सभकें सीडी रूपमे पाठक लोकनि कें उपलब्ध कराओल गेल अछि |
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हम माय सीताक जन्मभूमि मिथिला क्षेत्रक दरभंगा जिलाक निवासी छी| दिल्ली मे विगत १२ वर्ष सं बेसी काल सं पत्रकारिता ओ साहित्य सृजनक संगहि संग एकटा आईटी कम्पनी ''नर्मदा क्रिएटिव प्रा. लि. द्वारा प्रकाशित ऑनलाइन हिन्दी मासिक पत्रिका "समय दर्पण " केर संपादकक रूपमे कार्यरत छी|पटना सं प्रकाशित मैथिली त्रैमासिक पत्रिका ' मिथिला महान " केर प्रबंध संपादकक रूप में सेहो योगदान देने छलहुँ | ओहि कालक्रम में प्रमुख लेखक/ कवि लोकनिक रचनाक संग -संग भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् सं प्रकाशित पत्रिका " गगनांचल" केर छ्टा आलेखक मैथिली अनुवाद सेहो कयलहुं |
" मिशन मिथिला " केर संयोजक केर रूप मे मिथिलाक सांस्कृतिक विरासतक संरक्षण -संवर्धन ओ मैथिली अस्मिताक भान करेनाई ओ जागरूकताक अभियान में प्रयासरत छी| किछु काल पूर्व मिशन मिथिलाक दिस सं केंद्रीय हिन्दी निदेशालय (दिल्ली ) , भारतीय भाषा संस्थान ( मैसूर), साहित्य अकादेमी आ मैथिली -भोजपुरी अकादेमी कें कएकटा मांग पत्र पठाओल गेल | मीडिया में सेहो काले काल मैथिली ओ मिथिलाक विकासक लेल प्रखर स्वर अनुगूंजित कयल गेल |
बिहार सरकार मैथिली क विकासमे बाधा उत्पन्न क रहल अछि | इंटरमीडीएटमे पहिने अनिवार्य भाषा क रूप मे मैथिली कें स्थान नहि भेटल मुदा बाद मे ऐच्छिक बिषय केर रूप मे शामिलकय एकर महत्त्व के समाप्त करबाक कुचक्र रचल गेल, जाहि सं अधिकांश छात्र मैथिली क पढाई सं बिमुख भ गेल| ग्याराहमक लेल सरकार द्वारा निर्धारित पोथीक जे नाम देल गेल ओकर प्रकाशन परीक्षा होयबाक मात्र तीन दिन पहिने बाजार मे उपलब्ध भेल जाहि सं बेसी कठिनाई भेल आ मैथिली विषय के घोर आघात लागल | बारहवीं क लेल "तिलकोर भाग-२" केर प्रकाशन सेहो बड्ड बाद मे भेल |इ पोथी नहि त छात्र लोकनि देखलक आ नहि त शिक्षक लोकनि देखलनि कियक त पोथी छपले नहि छल | फरवरी मे एकर परीक्षा भेल आ तखन इ पोथी बाजार मे उपलब्ध भेल | सम्पूर्ण बर्ष बीत गेल , फॉर्म भरल जा चुकल छल मुदा पोथी नहि रहबाक कारणे महाविद्यालय मे एकर पढौनी नहि भेल| एकरा संगे दोसरो पोथी जुडल अछि | बी. पी. एस. सी. पाठ्यक्रम सेहो मैथिलीक लेल उपयुक्त नहि अछि, जाहि मादे प्रश्नकर्ता आ छात्र दुनू के असुविधा भ रहल अछि | राजकमल चौधरी क " ललका पाग " छात्र लोकनि मात्र एकटा कथा ललका पाग पढ़य वा सम्पूर्ण पोथी पढ़य , एकर जिक्र कतहु नहि अछि | पोथीक उपलब्धताक कमी पूर्ण करबामे मैथिली अकादेमी ,साहित्य अकादेमी सक्षम नहि अछि |
यू. पी. एस . सी सेहो उटपटंगे अछि | महाकाव्य सम्पूर्ण होयबाक चाही | मात्र दत्तवती क दू टा सर्ग देबाक की तुक अछि ? जखन की एकर पाठ्यक्रम स्नातकोत्तर स्तरक होयबाक चाही , तीन चारिटा महाकाव्यक नाम होयबाक चाही , जाहि सं विद्यार्थी लोकनि कें छूट भेटय| बड्ड रास उच्च स्तरीय रचनाकार लोकनि कें स्थान नहि भेटल अछि , जकर पुर्नावलोकन अत्यावश्यक अछि |
यू.जी.सी., यू.पी.एस.सी. कें चाही जे सभ विश्वविद्यालय सभ सं मैथिली क शिक्षकक सूची उपलब्ध होबय जाहि सं बिषय सं सम्बंधित समस्या सभक त्वरित निदान भ सकय | स्नातक प्रथम सत्र मे कला, विज्ञान, वाणिज्य संकाय मे नीता झा केर कथा "बाय -बाय अंकल " कें स्थान द क देवशंकर नवीनक संपादकत्व मे एन.बी.टी. द्वारा प्रकाशित एक सय पचीस टाकाक दू टा पोथी पचास अंकक पढाई लेल बोझ डालल गेल एकर कियो विकल्प नहि देल गेल| प्रतिष्ठाक स्तर पर स्नातकोत्तर स्तरक पोथी राखल गेल अछि जखन की अन्य लेखक लोकनिक उच्च कोटिक पोथी उपलब्ध छल |
इग्नू, बी.पी.एस.सी., यू.पी.एस.सी., साहित्य अकादेमी , भारतीय भाषा संस्थान आ यू.जी.सी. केर मैथिलीक कमिटीमे एकटा विशेष कॉकस हाबी अछि | नाम गिनल चुनल अछि - भीमनाथ झा ,नीता झा , अमरजी, रामदेव झा , विद्यानाथ झा विदित,वीणा ठाकुर, अमरनाथ, विभूति आनंद, रमण झा | की ब्रह्मण वर्ग के अतिरिक्त मैथिली मे विद्वान् नहि अछि? दिल्ली केर मैथिली - भोजपुरी अकादेमी सेहो काईस्तवाद मे जकरल अछि| की ऐना मे मैथिली केर सर्वांगीण विकास होयत? प्रश्न इ अछि जे एकरामे कालक्रम अनुसार परिवर्तन कियक नहीं होयत अछि ? एहि लेल मैथिली सं जुडल सभ लोकनि कें जागय पडत |सभ सं नीक होयत जे मैथिलीक शिक्षा देनिहार वा जुडल सभ टा सरकारी वा गैरसरकारी संस्था ऑनलाइन भ जाय , कियक त जखन धरि मैथिली ,नव तकनीक इन्टरनेट सं नहीं जुड़त ओकर चुनौती बढ़बे करत |एहि लेल मैथिल संस्था सभ कें पुरान शैलीक स्थान पर नव राह पर चलय पडत|
(लेखक "मिशन मिथिला " केर संयोजक आ ऑनलाइन हिंदी मासिक पत्रिका "समय दर्पण " केर संपादक छथि)
१.कामिनी कामायनी- कथा समय कालआ २.अनमोल झा-लघुकथा- अधिकार
१. कामिनी कामायनी
कथा
समय काल
अईठ्ठ बासन . . .सब ओहिना बरांडा सए ल’क’ भनसा घर धरि पसरल छल । कुरसी इम्हर घूमल .टेबुल उम्हर घसकल. . . . बिछौन स’ ल’क’ बाहरि आंगन के मंडवा धरि नूआ फट्टा छिडिआएल. . . महाजुद्व के बाद रणभूमि क’ स्थिति सन दृश्य. . . . ।काकी क़त्तो नजरि नहि अयलीह. . . ।घरे घर . .. बाङी झाङी ताकि औला सत्तू भाय . .. . मुदा एकदम सूुन . .. . .कियो कत्तो नै .. . . . ।कनिए काल में गौरी बहरेली .. .पङोसिया के घर स’ । ‘दाय. . .काकी कत्त ्र. .? .।’ सत्तू भाए के देखि ओ कनि सकपका जेका गेल ।दङिभंगा मेडिकल कालेज में पढै छथि . . .कहियो काल क’ गाम आबि जायत छथि . . ..।अपन माय बाबूजी त’ हैदराबाद में रहैत छथिन . ..मझिला कका गामे में रहि गेलखिन्ह. . . ।काकी बङ सिनेह सॅ खुआबए पियाबए छथिन्ह . .आ’ जौं कियो बगलक शहरि लहेरियासराय जाए त’ एक दिन पहिने हुनका समाद द’ दैन्ह. . .आ’ ओ सत्तु के पसिन्न के खेनाय . . .कखनो रोहु माछ. . . कखनो मखानक खीर. ..कखनो टिकरी . . .पिङकिया ..बना बना क’ पठा दैथ ।. . . .. . . गौरी बेसी काल धकमकायल नहिं रहल. . .आ’ ऑखि सॅ भटभट नोर खसबैत पूबरिया टोल दिस हाथ उठा क’ बाजल ‘मॉ. ्््. .. हौआ .. .नैहर जा रहल अछि तमसा क’।’ रिक्शा दूरे सॅ देखाय पङि रहल छल ।सत्तू भायके गप्प बूझवा में विलंब नहि भेलन्हि . .. . .।ओ तीव्र गति सॅ दरवज्जा प’ अयला आ’ दूरखा मे लागल मंटुआ के सायकिल खींचैत रिक्शा के पछोङ धेला । ताबङतोङ पैडिल मारैत दुइए डेग प’ पकङि लेलखिन्ह रिक्शा के . . . ।काकी सन्न. .. ..ऑखि कानि कानि क’ अङहुल फूल सन लाल भेल . .. ।सत्तू काकी के किछु नहि कहि . . . रिक्शा बला के घुरौलथि . .. ।अपना खिङकी दरवज्जा सॅ हुलकी मारैत लोक़ . . ।
दलान .. .आंगन . . .टपैत . . .काकी चुपचाप सत्तू के पाछॉ चलैत . .. अपन कोठरी में आबि
पलंग प’ बैस रहली. . . .।गौरी के दू गिलास नेबो के शरबत बनाबय लेल कहि ओ काकी के पलंग ल’ग राखल एक गोट कुरसी के सोझ करैत बैस रहला “कत्तए जाए छलौं एना. ? . .बताहि भ’ गेलौं की . . .. .।
शरबत पीबि क’ काकी के शरीर में किछु जान सन बूझैलैन्ह. . . ..।ओ’ किछु बाजय चाहली . . .मुदा फेर कंठ अवरूद्व होमय लगलै आ आखर के स्थान प’ दुनु ऑखि सॅ नोर कोशकी के उन्मत्त धार सन फुटि पङलै. . . . .।आ’ ओ’ अपन ऑचरि सॅ मूॅह झापि करूण स्वर में क्रंदन करय लगली ।. .सत्तू किछु काल धरि हुनका ओहिना कानय देलथि. . . . . ।मोनक सबटा गर्द गुबार ....धुरि . . .माटि. . . मवाद बहि जाए लेल ।
ई परम सहिष्णु. . खटनिहारि स्त्री. . . कोनो लिख लोढा पढि पाथरि’ . . . गमार अठाहरम सदी के नहि छली .. . . जनक आर्मी सॅ रिटायर्ड. . ..अपन धीया पुता के नीक स्कूल देने छलथि . . ..।मुदा भाग्यक सोझा त’ विधाता सेहो नतमस्तक . .. ।विवाह एहेन पुरूष सॅ भेलन्हि . . ..जे प्राचीन कालक चारित्रिक दृष्टिकोण सॅ त’ बङ उत्तम . .. नहि चोर बनोङ . . .नहि लबरा लुच्चा . . .नहि कोनो जन्नी जाति के ताकब झॉकब
ने दारू . .. नै सिकरेट. . .. . म्ुादा. अपने दुनिया में ंमगन घर पेलवारक कोनो चिंता नै . ... .. छै. . सब किछु .. . पाय कौङी में कत्तय कोताहि करैत छथि. . . . .।हुनक परम यशस्वी पिता के ई फरमान . . ..जे आय धरि हुनक कुलक स्त्रीगण बाहरि नौकरी करय नहि गेली .. ओ कोना जेतीह .. . . ।एतेक दुरदिन त’ हमर नहि आबि गेल जे स्त्री के कमाई सॅ पेट भरल जेतैक़ . .. .त’ काकीके पढेबाक शौख मोनक कोनो कोन में दाबल रहि गेलन्हि ।
घर वर देख क’ . .. . नीक जकॉ पता लगा क’ विवाह भेल छलै .. . बेस व्यवस्था गिन क’ .. .खानदानी छलैथ. .. जमीन जायदाद छलैन्ह भाई सब आफीसर. . वर.. .
लग’क कओलेज में लेक्चरर छलाह. . .।देखबा में स्वस्थ. . . सुदर्शन . . .।आर कि देखैत छै कन्यागत. . .।
काकी एकटा बुधियारि . ..कमासुत आ’ आज्ञाकारी पुतौहक रूप में बङ प्रतिष्ठित भेल छलीह ।शनैः शनै कालक्रम में पेलवारक रूप बदलए लगलै . . .वृद्वजन अपन अंतहीन यात्र्रा के यात्रिक होईत गेलाह . .. ननदि . ..दियर सबहक अपन गिरहस्थी . . .. ।हुनक अपनो पेलवार में चारि टा धिया पुत्ता अवतीर्ण भ’ गेलखिन्ह. . . । म्ुादा पति ओहिना विरक्त. . .अहू जुग में भरि चुरू कङू तेल .. . माथ में चुभ चुभ करैत. . . . . धोती . . .मोटका खद्दरि के कुरता पहिरने . . .कॉख तरि छाता दबने अपन फटफटी सॅ कओलेज जायथि .. . ।आ’ बाकी समय अपन पढाय लिखाय पूजा पाठ . . .।
अहिना चलैत रहि जैते. . . जीवन त’ कोन खराप. . . . मुदा धिया पुत्ता लग पास क’ इसकूल ..कओलेज सॅ पढि जुवावस्था के दरवज्जा प ढाढ होमए के कोरसिस करैत. . . .बङ बङ स्वप्न ऑखि में नेने ..... ..अपन हिस्सा के अधिकार मांगय लेल पॉखि फङफङाबए .. .लगलै. . . तखन एक गोट धर्म संकट. .ठाढ़ . .. ।
कन्याक’ माय. . .कतेक रास .. .स्वप्न. . .संजोगने. बेटी के सिनुरदानक प्रतीक्षा में. . .देवता पितर के नौतनाए आरंभ करि देने छलीह।
पैघक विवाह हेतय तखन नै दोसरक बान्ह खुजतै . .. ।आ’ मोनक गप्प करए लेल बेकल . भ’ क’ पति ल’ग बैसथि त’ ओ मरखाह बरद जकॉ बिदकि जाथि .. ‘एखन कोन प्रलय होमए जा रहल छै. . . .हेतय सब किछु समय प’ . . . . ।’चिंतन मनन में डूबल . .. तत्व मीमांसा बॉचए वला . . . पिता कत्तो जेबाके नामे प’ चीज बोस्त ..फेंकनाए. . .शुरू क’ दैथ. ।. .अहंकार अपना सॅ सहस्त्र गुण भारी . . . .परदादा के गजराज त’ चलि गेलन्हि मुदा ओकर स्र्वण घंटी नेने ई बुलि रहल छथि ।महानंद बाबू के पङपोता . . . . . .भलमानुष लोक आब बचले कत्त छै. . . . .जै छै हमहीं छी बस. . . . ।
काकी अपना भरिसक प्रयत्न करिए रहल छलीह. . . ।पंजीयार के बजा कए. . .गोतिया दियाद . . . सर कुटुम लगुआ भिरूआ में तरे तर. .
कतेक पाय कौङी खरचैत. . . .तरूआ तीमन .. . खेनाय पिनाय ।जखन कियो कोनो नीक कथा के संदर्भ में किछु खबरि दैक . . . दौङ क’ .. . .भरल उत्साह सॅ . . .घरबला ल’ग जायथि. . . . ‘अहॉ एक बेर देख लैतियै नै . . ..अपन ऑखि सॅ .. .बङका गामक लङका छै. . . डाक्टर छै कलुआही में .. ।’
घरबला सुनिते भङैक जायथ. . ‘हे सुनियौन. . . .हिनक गप्प. . . अपने रहली बङौदा आ’ अहमदा बाद में. . .. आ’ हमर बेटी रहत कलुआही में. . . . .।अहॉ के दिमाग त नै खराब भ’ गेल अछि . .. . .।ओकरा लेल भोले नाथ नीक सॅ नीक ‘बर’ पठौता. . ।’
कतेक बरख सॅ अहिना चलि रहल छल ।कतेक सुद्व बीतैत रहलै . . . .कतेक सभा लगैत रहलै .. बागमती हिमालयक पघिलल बरफ सम्ुान्दर में पठबैत रहल छल. । कन्या पिता के कओलेज सॅ एम ए .करि दू बरख बैसला के पश्चात .. . बी. एड सेहो करि नेने छल. . . ।वएस त’ ढाढ नै रहतै ... ... . दिन प’ दिन बीतल चलल जा रहल छल. . . ।
पोरकॉ सत्तुए एक गोट कथा देने छलै .. ।दङिभंगे मेडिकल सॅ पास. . . एखन नौकरी नै छलै .. . .एम डी के तैयारी करैत छल .. . घरक बङ सुखीतगर. . . ।मुदा कका खिसियानि बिलाङि सन धुरखुन्ह नोंचय लगलखिन्ह .. .जे सत्तू के मूॅह अप्पन सन . .। ‘बेरोजगार डाक्टर गरा में बॉधि दियै . . . .जा धरि नौकरी चाकरी नै हेतै .. . . गाम में बैस बेटी उसीनिया कुटिया करत. . . जन मजूरक जलखई पनपियाई . .बनौत .. . . खबासिन बनि क’ रहि जायत भरि जीनगी. . ।’.
‘त उठियौ नै अपने. . . .सर्वगुण संपन्न वर .. . ताकए लेल . .जखन पाए कौङी गिनबे करबै. . . .त’ ई
मूरूछा किएक मारने रहैत अछि सदिखन .. . .कि घरे में बैसा क’ रखने रखने बूढ करि देबै बेटी के ।’ काकी के हिब कतेक बेर फाटि चुकल छलैन्ह. . . ओ कानि खींझ क’ बाजि भुकि क’ रहि जाय छली . . . की करितथि. . . . . उपै की .. . .।ई उचित अनुचितक गहीङ सोच. . . घरक मालिक सॅ विद्रोह केनाय हुनका उचित नहिं
लगैत छल ।ओना त’ हुनका पीठ प’ बङ लोक .. . गोतिया दियाद सॅ ल’क अपन भाय बंधु धरि हुनका एक सॅ एक कथा पठबैथ. . . . अमेरिका वाला भाय त’ पाए पठाबए लेल सेहो तैयार बैसल .. . .मुदा प्रोफेसर साहब के की कहल जाओ .. . . ओ त’ मददिगार के’ शत्रु बुझि ऑखि लाल पियर केने घर में कूदय लागैथ. . . ‘हे .. . हम मूईल नहि छी. . . जे लोक हमर बेटी प’ दया करत. . . ।बेसी दिक करब त’ हम गरा में ससरफानी लगा क’ मरि जायब. . .लईत रहब तखन .. . ।’ ‘बीस लाख में ओ कारी धुत्थुर. .. . . .अपन खानदान में पहिल पढल. . . .डिबिया. .के ईजोत में पढि पढि क’ इंजीनियर बनल .. .’ ‘ओहने हमर समधि .. . .कांध प’ अंगोछा. . . रखने . .. तरहत्थी प’ आंगुर सॅ तमाकू चुनबैत. . ।’
जखन शुद्वक समय आबै. . . घर में कलेस बढि जाए. . . आ’ परिणाम काकी आठ आठ सांझ उपासल रहि जायथ. . . .स्वास्थ सेहो खराप भ’ गेलन्हि . . .सदिखन ढैकरैत. . . . गैस सॅ पेट फूलल. . . ब्लडप्रेशर . .आ’ हार्ट क’ बीमारी सेहो कसि क’ गहिया लेलकन्हि. . .।मानसिक
तनाव से फराक़ . ।
सत्तु के आश्चर्य होय. . . एतेक ओरियानी..... .. . . . एतेक बुधिमति. स््रत्री. . . मुदा प्रतिकूल पति के सोझॉ कतेक बन्हैल. . .।
ई मिथिले अछि जतय अनमेल विवाह धङल्ले सॅ चलि आयल रहल अछि। गिरहस्थी क’ गाङी के दुनू पहिया. . . . .दू दिस. . .भेलोपरांत. .गाङी पटरी प’ ससरैत. रहैत छै .. .
.।कखनो काल लगैत अछि जे आब उनार हैत .. . . आब हैत. . .. मुदा फेर कोना नै कोना ससरए लगैत छै .. ।
बतीस बरक वैबाहिक जीनगी में काकी के कियो भागैत . .पङैत. . वा मर्यादाविहिन वा’उच्श्रृकल होइत नहि देखने छल .. . ।मुदा आब सहनशक्ति जेना दम तोङि देने होए. . . ।
इम्हर राज्य मे सरकार बदललै . . .आ’ कहिया कत्तय के बिझाएल . . .घुनाएल बेकार सङैत बीएड़ .डिग्री वला सब के किस्मतक ताला
खुजि गेलए .. . ।पिता कोना नै कोना ढरि गेलखिन्ह .. . . गौरी के सेहो लघीचक इसकूल में नौकरी लागि गेलए. . . ।माएक’ करेज जुङैलन्हि. . .. पढै लिखै वाला काज में धीया के मोन बहटरेतैन्ह. . . ।आ’ सुयोग्य वर सेहो. . . .. . ।
घरक माहौल में त’ विधाते जे परिवत्र्तन आनए चाहितथिन्ह तखने संभव छल. . .।पुत्र दुनु कत्तो बाहरे पढाई करि रहल छल. . . छोटकी सेहो बीएड करि नौकरि पकङि नेने छलै. . .।
कतेक बरख बाद भगवतिक किरपा सॅ प्रोफेसर साहबक मोन डोललैन्ह . . .. एक गोट कथा पसिन्न पङलैन्ह. .. . .।मुदा ओ अगिला वैसाख में विवाह करता. . . ।बेस. . ..हुनके कोन हङबङी छलेन्ह .. . जे हङबङी आ’ धुकधुकी छलैन्ह. .. . . .से त’ कन्या वा’ हुन माएके ..।अगिला वैसाख मे एखन एगारह मास विलंब छल । .. .आब जे छल . . पसिन त’ वएह कथा. . . कि मूल गोत्र .. . टक्कर के . .. पेलवार नीक़ . .समधि सेहो उच्चस्तरीय अधिकारी .. . . .शहरि में मकान. . . ।
काकी के चोटकल मुॅह प’ जेना किछु हरियरी आबए लगलै. . . .।भगवतीक’ चिनवाङ प’ बैस गोहराबए लगलीह. . .’अहींक़ . असरा मैया . . .जौ
ई कथा भ’ जायत जोङा छागर चढैब. . . ।’गौरी के मलिन झमैल मुॅह प’ सेहो किछु चुहचुही आबए लागल. . .स्वप्न त’ सबके देखबाक अधिकार छै. . .
ओहो अहि पृथ्वी के प्राणी . . . ओकरो सहस्त्रों स्वप्न दूरे सॅ ऑखि में हिलकोर मारैत देखार होमए लगलै. . ।
अपन पुस्तैनी बङका घरक मरम्मति करबा ओकरा रंगबा ढोरबा क’ एक गोट भव्य हवेली क’ आभास दय देल गेलै. . . ।डयोढी के गेट बङ चाव सॅ अपने ठाढ भ’ क’ काकी लाल रंग सॅ. . रंगबेलन्हि .. ‘अहि गेट सॅ हमर बेटी मॅहफा सॅ विदा हैत. ।विवाह राति बिजली के लङी
आ’ लाईट सॅ सजल ई कतेक दिव्य लगतैक . .।’ बजैत बजैत हुनक ऑखि में इन्द्रधनुषी स्वप्न जेना झलकि उठै ।
वर पक्षक इच्छानुसारे दुरागमन चतुर्थीक पराते भ’ जेबाक निर्धारित भेलै. . ।ताहि लेल . .. दान दहेजक चीज वोस्तक ओरियान होमए लागल छल. . ।
देखैत देखैत फागुनो आबि गेलए. . .।चारोकात मॅह मॅह करैत फगुनाहट .. . .लोकक शरीर ’सॅ भरिगर वस्त्र उतरि क’ हल्लुक वस्त्र स्थान ग्रहण करि नेने छल .. ।वातावरण किछु सोहनगर भ’ गेल छलै .. .।घर सॅ ल’क’ अङोस पङोस धरि के नवतुरिया सब में गौरी दीदी के विवाहक उत्साह किछु विशेषे रूप सॅ छल .. . ‘बरियाती सॅ से परीच्छा लेब हम सब कि ओ सार सब त्र्राही त्राही करता ।’ माय पितियानि सब मिलजुलि क’ कहिया कत्तए नै अदौङी दनौङी खोईट क’ राखि नेने रहथि . . ।लकङी के सर समान . . . ओहि लेल त’ खेतक आरिए आरि बङ शीसो. . . .किछु बङ
पुरान सीसो काटि क’ दलानक’ पछबरिया ओसारा प’ गेटिआयल .. ।तैं छोटका कका फर्निचर सब बनबए लेल . . .बढीबा के कातिके सॅ अपन दरवज्जा प’ बैसा नेने तहथि . . .।बचलै .. . वर कनिया आ’ समधियाना के नूआ फट्टा .. . त’ ओ आब कि लोक जोगा क’ राखत . . .शहरि बजार
में तुरते भेंट जाईत छै. . . . .. सबटा काज प इत्मीनान सॅ नजरि फेरि काकी सरिपहॅु बङ प्रसन्न छलीह . . .।
ओ दिन भरिसक रबि छल. .. .प्रोफेसर साहब अपन दलान प’ अराम कुरसीप’ बैसि एकबार पढि रहल छला. .
.।तखने पोस्ट मैन पहुॅचलै. .. .गामक पोस्टमैन . .. अराम सॅ अपन घरक काज .. न्योता. पिहानी निबटा क’ छुट्टिए दिन बचलाहा डाक बॉटेत छल .. ।चिठ्ठी पढलोपरांत हुनक नजैर . . .एखबार सॅ उठि क’ आकास में अटकि गेलन्हि . . .।
लिखल त’ किछु विशेख नहि . . .एतबे छल दू पॉति ‘ हमरा माफ कएल जाओ. . .हमर बालक अपन औफिसे के एक गोट सहकर्मी सॅ
विवाह करि लेलथि. . .।’ ंमुदा ई दू पॉति ओहि घरक लेल केहेन पैघ हङहङी बज्र साबित से वर्णनातीत . .. .अपन कोठरी में पलंग प’ बैसल काकी
बरक ललका पाग में सुईया ताग ल’क’ घुनेस लगा रहल छलीह . .. .हाथ कॉपि कॉपि क’ जेना फङफङेलन्हि. . . . आ’ धुकचुके में हुनक प्राणपखेरू संसारक सब बंधन तोङैत एकदम फुर्र सॅ उङि गेलए. . . . ।बौराएल सन धीया .. . .माएक छाति प’ माथ पटकि पटैक क’ बिलखए लगलै .. . . ‘हमरौ किएक नहि अपने संग ल’ गेलहूॅ. . . ।’बेटी के ह्दयक भाव माय सॅ बेसी आर के जानि सकैत अछि. . . . बिन मोलक ओकिल. . . पैरोकार ।
दिन केहनो प्रलयंकारी होय .. .बीतिए जाईत छैक़ . . .मनुक्ख सन जीवट परानी . .. . जहॉ अन्न आ’ पानि शरीर में गेल .. ..काया उठि
पुठि क’ ठाढ भ’ जाए छै. . .।
जे हो . . . पहिने जकॉ त’ नहि मुदा ओहि घर में फेर सॅ गति विधि त सुरूए भ’ गेल छल . .।रोज रोज ऑच पजरै. . .सोहारी . ..भात . . .तरकारी .. .दालि .. .रान्हले जाए . .प्रोफेसर साहब अपन कओलेज़ . .बेटी. . दूनू अपन अपन इसकुल. . .. . नौकरी प .. ।
ओहि अन्हङ. . पानि बाढि वला समय में .. . . .सतू के खबरि भेटलै. . .ओ. . .कहुना करि छाति भरि पानि के चीरैत पहूचल छल. . .।
भेलए कि जे जखन मुनहरि सांझ बीत गेलए .. . भदवारि के घनघोर धार धार बहैर रातियो में जखन गौरी अपन इसकूल सॅ नहि घुरली. . .
तहन पिता के करेज लोहरबा के धुकनी सन धुक धुक करए लागलै. . .भरि रात पिता आ’ छोटकी बेटी. . .अनदेसा क’ बङका बोझ क’ नीचा छटपटैत . . .जागल. . .. सगरे राति बाढि क’ घों . .. घों करैत. . . सोर .. .चारों कात बेंग झींगुरक . .. .कुकुर .. . .नढिया के डरोन स्वर .. . नदी के बॉध सेहो टुटि
गेल छलै . . .. यातायत ठप्प. . . ट्रेन . .बस. स्थगित . . .जे जत्त छल. . .तत्ते घेरोल. . . .कत्तेको लोक पानि में दहिया भसिया गेलए .. . ।
ई समाचार रेडियो प’ भोरे भोर आबि रहल छल . .।
जखन सूरजोदय भेलै .. . प्रोफेसर साहब अपन छोटका भातीज सॅ कनि निहौरे करैत सन कहलखिन्ह. ‘कनि गौरी के इसकूल जा क’ खबरि आनए लेल ।ओकर माए अपना घर मे अलगे कूदय लगलि पॉच पॉच हाथ .. ‘अहि दाहङ में कत्तए जायत हमर पूत भसियाबए लेल. . . ।’मुदा भातिज गौरी शंकर माए के परतारैथ. . .बङ हिम्मत करैत भरि भरि ठेहुन पाानि में कहुना क’ सायकिल खीचैत निकलल।
रोड प’ त कनि कम पानि रहै. . .उचगर सङक छल .. .मुदा कत्तो कत्तो त’ मत पूछु. . . .सायकिल सॅ उतैर उतैर क’ चलए पङ..ै. . . . ..कखनो काल त’ साुयकिल माथ प’ सेहो उठा लैक़ . . चारो कात प्रलयंकारी दृश्य . . .. जतय धरि नजरि जाए. . . पानिए पानि. . . .।पानि में ठाढ गाछ .बिरीछ .. .
ओना त’ बङ नीक लगै .. .मुदा गाछ सॅ बान्हल झ्ुाला जकॉ खाट. . ओहि प राखल चीज वोस्त .. . गाछ प बैसल घरबैया. .. .सब देखि ह्दय टूक टूक होमए लागै. . दोसर दिस जीनगी सॅ भरल .. .धिया पुत्ता. . . पानि में उमकैत .. . ।
तीन चारि गाम टॅपि क’ रोडे प’ ओकर इसकूल उम्हर बाढिक प्रकोप न्ै.ा . . हैडमास्टरक गप्प सुनि गौरी शंकरक हाथ सॅ जेना तोता उङि गेलन्हि .. . ।केहेन
जाचना के काल .. . .कोन पापक सजा द’ रहल छथि विधाता . .. ।
टुटल मन. . . असोथकित .. .भेल दरवज्जा प’ राखल चौकी प’ प्रोफेसर साहब पसैर गेल छला .. . ।
सत्तु आबि चुकल छलाह .. .मुईलो परांत मायक साध अधुरे रहि गेल . .ओहि बङका गेट सॅ बेटी के विदा करबा के .. . गौरी अपन एक गोट सहकर्मी संग विवाह करि कत्तो आओर चलि गेल छल. . ।कका के बोल भरोस दैत सत्तु एतबे बाजल छल ‘ई त अवश्यंभाबी छल .. .इएह छैे समयकाल।’
9।11।09
२.अनमोल झा
अनमोल झा (1970- )
गाम नरुआर, जिला मधुबनी। एक दर्जनसँ बेशी कथा, लगभग सए लघुकथा, तीन दर्जनसँ बेशी कविता, किछु गीत, बाल गीत आ रिपोर्ताज आदि विभिन्न पत्रिका, स्मारिका आ विभिन्न संग्रह यथा- “कथा-दिशा”-महाविशेषांक, “श्वेतपत्र”, आ “एक्कैसम शताब्दीक घोषणापत्र” (दुनू संग्रह कथागोष्ठीमे पठित कथाक संग्रह), “प्रभात”-अंक २ (विराटनगरसँ प्रकाशित कथा विशेषांक) आदिमे संग्रहित।
अधिकार
-एकटा बात ध्यानसँ सुनि ले लखना, जँ बेगारी नै खटमे हमर आ अबाज ऊँच कके बजमे तऽ बासडीह जे छउ तकरा खाली करऽ पड़तउ। हमर पुरखा तोरा बाप-पुरखाक रैयतमे अपना जमीनपर बसेने छला एहि उपकार ले जे तू हमरा मूँह लागल जबाब देमे।
-तकर माने की अहाँ हमर उपजल बोनि नै देब आ अहाँक बेटा-भातिज हमर इज्जति दिस आँखि उठायत। हाथ-पैर तऽ तोड़ि देबै तकर। हँ रहल बासडीह बला सवाल से एते सस्ता नै छैक जे खाली करबा देब अहाँ। दस-बीस साल जे बटाइयो खेती करै छै तऽ सरकार कहै छै जे खेत ओकरे छियै आ दू पाँच पुरखा सऽ जाहि डीहपर बसल छी हम सब से हम्मर नै! हाकिमक देल बासगीत परचा सेहो अछि हमरा लग।
रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’-साझा प्रकाशनमे विद्यापति
राम भरोस कापड़ि भ्रमर, धनुषा, नेपाल 1951-
जन्म-बघचौरा, जिला धनुषा (नेपाल)।बन्नकोठरी: औनाइत धुँआ (कविता संग्रह), नहि, आब नहि (दीर्घ कविता), तोरा संगे जएबौ रे कुजबा (कथा संग्रह, मैथिली अकादमी पटना, १९८४), मोमक पघलैत अधर (गीत, गजल संग्रह, १९८३), अप्पन अनचिन्हार (कविता संग्रह, १९९० ई.), रानी चन्द्रावती (नाटक), एकटा आओर बसन्त (नाटक), महिषासुर मुर्दाबाद एवं अन्य नाटक (नाटक संग्रह), अन्ततः (कथा-संग्रह), मैथिली संस्कृति बीच रमाउंदा (सांस्कृतिक निबन्ध सभक संग्रह), बिसरल-बिसरल सन (कविता-संग्रह), जनकपुर लोक चित्र (मिथिला पेंटिङ्गस), लोक नाट्य: जट-जटिन (अनुसन्धान)।
साझा प्रकाशनमे विद्यापति
रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’
हम २०६५ साल पुस २ गते साझा प्रकाशनमे अध्यक्षक रुपमे नेपाल सरकार सं नियुक्त भेलहुं । साझा प्रकाशन सरकार आ किछु निजी क्षेत्रक शेयर होल्डर सभक राष्ट्रिय प्रतिष्ठान अछि जे अपन पुस्तक आ पत्रिका तं छपिते अछि नेपाल अधिराज्य भरि एक कक्षासं लऽ दश कक्षा धरिक सरकारी विद्यालयक पाठ्य पुस्तक वितरण आ विक्री करैत आएल अछि ।
लगभग ९० करोडक कारोबार कर’ बला आ तीन सयसं उपर कर्मचारीक संलग्नतामे देशभरिमे २८ गोट शाखा, उप–शाखा, क्षेत्रिय शाखा सभक संजाल कार्यरत् अछि । एकर स्थापना २०२१ सालमे भेल अछि आ एखन धरि नेपाली साहित्यकार वाहेक केओ एकर अध्यक्ष आ महाप्रबन्धक नहि बनाओल गेल छलाह । देशमे बदलैत राजनीतिक अवस्था आ समावेशी लोकतंत्रक प्रादुर्भाव भेलापर मंत्रालयमे मधेशक मंत्री लोकनिक प्रवेश भेल आ तखन खूजल ४५ वर्षक बाद बज्जर केबार । हम पहिल मधेशी, मैथिली साहित्य प्रेमी एहि गरिमामय पदपर बैसाओल गेलहुं ।
ई संस्था सालमे ३०–४० गोट साहित्यिक पुस्तक प्रकाशित करैत अछि । ईसभ साहित्यिक कृतिक सभा भाषा मात्र नेपाली । ई नेपाली भाषा वाहेक आन भाषामे पुस्तक नहि छपैत छल । हमरा गेलाक बाद माहौल बनओलहुं आ तखन निर्णय भेल जे नेपाली वाहेकके भाषामे सेहो पुस्तक छापल जाए ।
बड़ कुहरि कऽ भेलो निर्णयकें कार्यान्वयनमे काज बढाओल गेल । जाहिमे सर्वप्रथम विद्यापति’क पोस्टर चित्र बहार करबाक निर्णय कराओल । विद्यापतिक प्रचलित चित्रकें साझा प्रकाशनक कलाकारकें देखा बनएबाक कतेको आग्रह ओ पुरा नहि कऽ सकल । कारण छलै तत्काल उपलव्ध छोटचित्रमे देखाओल विद्यापतिक पागक गणित ओकरा समझसं बाहरक होएब । नेपालक चर्चित कलाकार छथि टेकवीर मुखिया साझाक प्रत्येक पुस्तक पर हुनके डिजाइन रहैत छनि । हमरा जनकपुर अएबाक रहए आ ताहिसं पूर्व चित्रकें सार्वजनिक करबाक हमर इच्छा । बड़ मुश्किलसं हम पाग खोजलहुं । साझा प्रकाशनक एकटा कर्मचारीकें पाग पहिरा बुझा कलाकार लग पठएलहुं, तखन ओ पागकें देखि स्केच कएलक आ तैयार भेल कलर विद्यापतिक चित्र, जे मिथिलाञ्चलक विक्री कक्षसं किछु मासमे विक्री भऽ चुकल छैक । दोसर खेप छापबाक तैयारी चलि रहल छैक, एहिमे कागजमे सुधार कऽ विद्यापतिक चित्रकें आर निखारल जएबाक योजना छैक । ई चित्र हम पटनामे जा जवावदेह व्यक्तित्व सभकें दऽ आएल छीयनि, मुदा ओ लोकनि एकटा समाचारो पत्रिकामे देबाक जरुरति नहि बुझलनि ।
एमहर भाद्र मसान्तमे मैथिली भाषाक पहिल पुस्तक वालकथाक बहार भऽ गेल अछि । “बगियाक गाछ” नामसं छपल ई पुस्तक साझा प्रकाशनक इतिहासमे नेपाली वाहेकक प्रथम मैथिली पुस्तक भऽ गेल अछि । राजविराजक देवेन्द्र मिश्रक संकलनमे १५ गोट वालकथाक एहि संग्रहमे कथा सम्वन्धित चित्र सभ सेहो मिथिला लोकचित्रमे अछि । आब साझा प्रकाशनक दरबज्जा खुजि गेलैए, आनो साहित्यकार ओ मैथिली, भोजपुरी, अबधी, थारु, गुरुङ, आदि भाषाक किएक ने हो अपन अधिकारक हेतु लड़ि सकैत छथि ।
मैथिली व्याकरण लिखबाक काज प्रारंभ भऽ गेल अछि – भाषाविद् डा. योगेन्द्र प्र. यादवक नेतृत्वमे । मैथिली कथा संग्रह, भोजपुरी कथा संग्रहक प्रकाशन योजना प्रगतिपर अछि । साझा प्रकाशनक नेपाली भाषाक स्तरीय पत्रिका ‘गरिमा’ मे आब मैथिली, भोजपुरी, अबधी भाषा साहित्य सम्वन्धी समालोचना, निबन्ध आब’ लागल छैक । ई सभ परिवर्तनक संकेत अछि ।
दुनू देशमे मैथिली गतिविधिक जे किछु घटना होइत अछि, तकरा सूचना प्रवाहक संकट छैक । भारतीय क्षेत्रक लेखक अपनामे सिमित भऽ गेने नेपालक गतिविधि पर नजरि राखब जरुरी नहि बुझैत छथि । परिणामतः बहुतो सूचना अपूर्ण रहल अछि । ने प्रयास कएल जाइछ, ने जरुरीए बूझल जाइछ ।
नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान विगत चारि वर्षसं राजनीतिक शिकार भेल अछि । गठन नहि भेने बहुतो काज रुकल पड़ल छैक । पंक्ति लेखकक प्रधान सम्पादकत्वमे निकलल ‘आंगन’ पत्रिका (जकर चर्च भारतीय पत्र–पत्रिका मे कहियो ने भेल) ठमकल अछि, कतेको मैथिली परियोजना अपूर्ण राखल छैक । तहिना एहि विच दर्जन भरि मैथिली पुस्तक छपल रहैत, से नहि भऽ सकल अछि । आ ई तखने आबो संभव हयत जं प्रज्ञाक गठन होइक । पा्रज्ञ लोकनिक ई पद राजनीतिक कार्यकर्ता सभ हथिअएबा मे जुटि गेलासं ई निष्प्रभावी बनल निरिह पड़ल अछि । एकरा राजनीतिसं मुक्त जं कऽ देल जाए तं अवश्य इहो मैथिली समेतकें नीक सहयोग त पहुंचा सकैत अछि ।
‘गोरखापत्र’ दैनिक एक पृष्ट मैथिलीमे दैत छैक, मुदा ओहो पृष्ट मैथिलीकें कतेक उपकार करैत अछि से देखले पर पता चलत । तखन मैथिली भाषामे छैक ई सन्तोषक बात ।
निजी चैनल सभ सेहो मैथिलीमे समाचार शुरु कएलक अछि । माहौल बनि रहल छैक । उपराष्ट्रपतिक हिन्दी शपथ विवादसं मैथिली प्रति जनमत वृद्धि भेलैए, ई उपलव्धिए मानल जएबाक चाही । जे से मैथिलीक नीक संभावना छै नेपालमे–संघीय सम्विधान बनलाक वाद तं आओर । जं कि हम साझा प्रकाशनमे छी ओत्तसं नेपालक मैथिली साहित्यक इतिहासक प्रकाशनक योजना बनाओल गेल अछि । नेपालक मै.सा.क इतिहास लिखनिहार डा. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौनकें हम पत्रद्वारा आग्रह कऽ चुकल छीयनि जे आधुनिक कालकें कनेक अपडेट कऽ देथि । हुनक स्वीकृति आ पाण्डुलिपिक प्रतिज्ञा अछि ।
एम्हर पुस्तक सभ सेहो खुबे आएल अछि । ‘भ्रमर’क नेपाली भाषामे “मैथिली लोक संस्कृति” काठमाण्डूसं छपि कऽ बाजारमे अछि । धीरेन्द्र प्रेमर्षिक गजल संग्रह (नेपालीमे) बाजारमे अछि । रमेश रंजनक कविता संगह आबि रहल छैक तं रामानन्द युवाक्लव द्वारा कथा संग्रह बहार भऽ रहलैक अछि । हिमांशु चौधरीक कविता संग्रह आएल अछि । रेवती रमणक नाटक संग्रह अएलनि अछि तं ‘भ्रमर’क सम्पादनमे नाटक संग्रह जल्दीए प्रेससं बहार हयत ।
आवश्यकता छैक छपल पुस्तक सभकें उचित प्रचार प्रसार आ समालोचना समीक्षा । जे आन भाषा जकां मैथिलीमे दुर्लभ अछि । कनेक उदार होब’ पड़त तखने पुस्तक प्रकाशनक सोकाज लगतै लोककें । संभव थिक आब’ बला काल्हि खुशनामा होइक मैथिली प्रकाशनक लेल ।
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साझा प्रकाशन
पुलचौक, ललितपुर, काठमाण्डू
नेपाल
३. पद्य
३.१. गुंजन जीक राधा-पन्द्रहम खेप
३.२.१.राजदेव मंडल-सीमा परक झूला आ चीड़ीक जाति २.विनीत उत्पल-मन परैत अछि
३.३.उमेश मंडल (लोकगीत-संकलन)- आगाँ
३.४.कल्पना शरण-इण्टरनेट स्वयंवर
३.५.१.सतीश चन्द्र झा-भाषा आ राजनीति आ २.सुबोध कुमार ठाकुर-जुग बदलि गेल
३.६.१.श्यामल सुमन-मैथिली दोहा २.अजित कुमार मिश्र-अप्पन माटि
३.७.१.बिनीत ठाकुर-गीत आ २. दयाकान्त मिश्र-हे मैथिल आबो जागु
३.८.शेफालिका वर्मा-बाजी
गंगेश गुंजन
जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी।श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आऽ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)।
गुंजन जीक राधा- पन्द्रहम खेप
बुझायल ता एतबे जे अयलौं माएक गर्भ मे नौ मास अपनहि निर्माणक नरक सहैत,
माइयो के सहबैत प्रतिपल भरि जीवनक पीड़ा माएक एक-एक साँस दुर्घट करैत
करैत ह अपनहि जन्म सँ कएल विकट पराभव ओकरा लेल। ओ यद्यपि कहैत
छैक- सन्तानक जन्म महासुख ! हम तं सन्तान, की बुझी तकरा कही की ?
...मुदा पुनः-पुनः माएक गर्भ मे के रखलक हमरा ? भरिसक पिता...वैह हुनके
राखल जे, होइत गेल विकसित बनैत गेल रधिया ! एक दिन...सुनै छी एहि गामक
धरती पर ......खसल चेहों-चेहों करैत, यैह झरकलही देह। सेहो सुनै छी, माए
तँ हर्षित किन्तु भेला बहुत सुख-चिन्तित पिता। भेलियनि जे बेटी, ककर दोख
यदि दोखे त ? जेना देलनि हमरा माएक गर्भ तेना देने रहितथि कोनो बेटा ।
बाधा की ? तें अपन काज केर फल सँ असंतुष्ट माय पर थोपल दोख किएक, कथीक?
ओना, जे हो आबि त गेबे केलियनि मायक कोरा- एहि छोटोछिन घर-असोरा-आङन मे,
बाड़ीक ओलक गाछ जकाँ अपनहि टोंटी सँ विकसित होइत, सौंसे चतरल गेल हरियर
गाछ समान। भ त गेवे कएलौं। जेहने भेलौं आब एतेक वर्ख धरिक भ गेलौं बेसी
बेटी त ओहिनो ओले बुझल-कहल जाइए-कबकब, समाज । राधाक मन बड़े बौआइत छैक।
एक क्षण एत, दोसरे क्षण नइं जानि कत ? मन खौंझाइत बड़ छैक जे ओ एहन आ
एहने भेलि कियेक ? अपने भेल कि बना देल गेलि एना ? की ? दुनू मे की ? बा
एहू दुनू कारण सँ फराक किछु कारण ? बा एहि दुनूक मिज्झर एकटा तेसर परिणाम
थिक ओ ? बड़ व्याकुल होइत अछि- किये रूसल छथि कृष्ण ? आ कि हमहीं छियनि
रूसलि हुनका सँ ! की ? के करओ पुरबा साही एकर- यदि रुसले अछि त ककरा सँ
के ?... राधाक कंठ सुखाएल- ओह,जल पीबितौं दू घोंट ! पियास आकुल घैलची सँ
ढारऽ गेली- घैल रिक्त ढन ढन करैत...!
दिवस कही बा राति कही, हमरा कहला सँ की जीवन व्यर्थ कही सार्थक, हमरा
कहला सँ की विषयो कहाँ हमर हमर सन लोकक ई सब यदि अनुभव किछु कहय त कहलो
सँ की एहि समाज मे मोजर त छुच्छे पुरूख कें भने लुल्ह-नाङर बहीर बताह
कनाहो कोतर पुरुखे हाँकत ई समाज निश्चयो करत दिशा केर एहना मे किछु
उचित-अपेक्षित, हो आवश्यक आबय कोनो विचारो त हमरा कहला सँ की? अनठा देत
अपनहुँ संगी-सखि-संबन्धी धरि करत अनेक उपहास सेहो सब सहला सँ की मन मे
बड़ अन्हर-बिहाड़ि, पानि आ पाथर ...एखनहि ठाठ भेलय तैयार ऊठलय घर
देखिते-देखैत दू पल मे ढनमना खसैये कम्मे लोक बचाबए दौड़ल लोक कहाँ अबैये
! इहो स्वभाव मनुक्ख-समाजक केहन विचित्र जे छल रहैत ठाढ़ विपति मे से छथि
आइ तटस्थ ।
आब त लोकक दुःख अनठएबा मे भेल लोक अभ्यस्त तकर दुःख बूझी, क्लेश सही
परन्तु यदि चर्चा चाही ककरो हेतैक ध्यान,हएत गंभीर कनिक एक रती अनुभव आ
वातावरणक जे रूप अछि पसरल कतबो केहनो हो आवश्यक विषय आ अनुभव,चिन्ता
ककरा कहबै ? कोन भाषा केहन बानी मे ? सबके अपने तेहन धरफरी पैसल छैक जे
एक दिस सुनितो रहत, पड़ाएलो जायत अपन गन्तव्यक दिशा ! कतबो करबै सोर ।
अहाँक आत्मीय चिन्ता सँ कम रहलै लोक कें संपर्क-संवाद । सबके अपने स्वयं
ततेक दाबी, संसारक अनुभव आ व्यवहारक, धर्म-शास्त्र सब सब कें जेना हो
घोंटल । ज्ञान त यमुनेक जल जकाँ- भरि लेलहुँ घैल,तमघैल कि बड़का कलगोइयाँ
लोटा । जत भेल इच्छा क लेलहुँ व्यवहार सहज-सुसके। बीच बाटहु पर हरा देने
हो नहि एको मिसिया खेद, बाट के पिच्छड़ बना क लोक के पिछड़ि-पिछड़ि खसबाक
दिक्कैत तैयार क देबाक। लोक के भरिसक्के होइत छैक भान--ओ की क रहलए, की क
गेल ओ लोकविरुद्ध ज्ञान हेरायल बाट!-घाट भेटब केहन सहज भेल ! मनुक्ख सँ
मनुक्खक परस्परक भाव, जानि नहि कत गेल ? पुछलिअनि एक दिन यैह प्रश्न त
कृष्ण बिहुँसलाह तेना जेना ओ त अपने परम बूढ़-पुरान आ हम रही सोझाँ मे
कोनो ! नेना
नहि ध्यान देलनि हमर एहि जिज्ञासा पर त सहजहि भेल हएत हमर मुँह उदास,
कनेक आहत सेहो। से अपन सधल बुधियारी आ कौशल सँ करैत तकर सम्हार कहए
लगलाह-"बड़ बताहि छें! ई सब काज तोहर नहि।सोचब जीवन, एकर नित्य
बदलैत-बढ़ैत-घटैत व्यवहार,तकर गूढ़ प्रक्रिया विषय होइत छैक जे छथि पंडित
जन हुनकहि बुद्धि-व्यवसाय। तों किएक करैत रहैत छें विकल अपन ई सुन्दर मन
? हमरे देख कोना रहैत छी हिनका लोकनि सँ बाँचल-छिटकल, कए काल तं लैत
पतनुकान, अपना तरहें अपन जीवन जीयैत। सत्त पूछ तं कतेक रहैए चिन्ता हमरो
हिनका सभक ? हम तं रहैत छी तोरे मे लेपटायल, तों ही ने हमर प्रिय
प्राण!"
हुनक ई कहब बुझाएल सद्यः काकु उक्ति। कृष्णक ई सब कहि जाएब धर-धर। अति
विशेष क अंत मे हमरा जोड़ि क कहब जे बात छल हुनकर।तें उचिते
कहलिअनि-"जाउ-जाउ, बड़ हमरे मे लेपटाएल रहै वला अयलौंहें।आ हमरे मे
रखनाहर ध्यान। अपने हुलकी द क देखियौ भरि आँगन-, बैसल आकुल उत्सुक के अछि
अभागलि से मन ! जुनि परतारू,ठकू नहि हमरा एना। हम तं ऑहिनो अहाँक बिना
कोनो कार्यक किछु नहि।"
-" सैह तं कहलियौ बताहि, हमहूँ बिन तोरे कोनो कार्यक कहाँ छी? प्राणहीन
देह आ तें गति-स्पन्दनहीन अस्तित्व भ जाइत, तोरा बूझल छौ।तथापि एना रूसै
छें।किएक एना रूसि जाइ छें, मीत ?"
कएलनि उन्टे अपने विलाप सेहो।-"वाह रे निसाफ । रूसल निपत्ता भ जाइ अपने आ
दोख हम्मर। कहलिअनि हम तं उदास भ गेला-अनचिन्हार उदास ! संच मंच बैसल
असकर एकटा बगड़ा जकाँ अनमन। निःशब्द।"...
(अगिला अंकमे...)
१.राजदेव मंडल-सीमा परक झूला आ चीड़ीक जाति २.विनीत उत्पल-मन परैत अछि
राजदेव मंडल
शिक्षा- एम.ए.द्वय, एल एल बी.,पता- ग्राम-मुसहरनियाँ, रतनसारा(निर्मली),जिला-मधुबनी,प्रकाशित कृति- हिन्दी ,नाम-राजदेव प्रियंकर,उपन्यास- जिन्दगी और नाव,पिजरें के पंछी,दरका हुआ दरपन।
(1)सीमा परक झूला
ई जर्जर झूला
लगैत अछि जेना तुला
सीमा पर लटकल अछि
पुरान डारि पर अटलक अछि
पेंगा पर झूलि रहल छी
आव स्वंय केँ भूलि रहल छी
अन्तिम छोर सँ
अपन बाँहिक जोर सँ
लगा रहल छी आस
नहि छी निराष
आस-पास
प्रभातक उजास
कखनहुँ एहिपार
कखनहुँ ओहिपार
बारम्बार
दोहराबैत छी कार्य ब्यापार
कट-कट-कट-कट
टूटि रहल डरि
दैत गारि
तइयो सम्हारि
धरती सँ नाता जुटि रहल अछि
गाछ सँ झूला छूटि रहल अछि
एम्हर कि ओम्हर खसब
रहब स्वछन्द कि जाल मे फँसब
जीयब वा मरब
फेर कियक डरब
चाहे खसब एहिपार
चाहे खसब ओहिपार
रहत इएह धरती
इएह भाव आर विचार
सुख हो वा दुख
रहब अन्ततः मनुक्ख।
(2)चीड़ीक जाति
धायल पाँखि पर
लटकल लहाष
लऽक पहुँचल
नीड़क पास
ओ जे ओकर नहि
किन्तु ओकरे छल
लहू सँ भीजल तन
कण-कण
सषंकित अछि चीड़ी केँ मन
तइयो
मातृत्व सिनेह
पियाबए चाहैत अछि
खियाबए चाहैत अछि
लोल मे राखल अहराक दाना
अनजान बच्चा गाबि रहल गाना
पाछू लागल षिकारी
बनल अछि अधिकारी
जेकरा भूखल आँखि मे
तरजू अछि लटकल
स्वादक बैटखारा
अछि मन मे अटकल
एकटा पलड़ा मे प्रौढ़गात
दोसर मे अछि नवजात
घायल देह
टुटैत नेह
टप-टप चुबैत खूनक बून सँ
धरती भऽ रहल स्नात
पूछि रहल अछि चिड़ई
अपना मन सँ ई बात
आबऽ बाला ई कारी आ भारी राति
कि नहि बाँचत हमर जाति...?
२.विनीत उत्पल
आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आs तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आऽ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र।
आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्ली मे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडा मे वरिष्ट उपसंपादक।
मन परैत अछि
कतेक दिन बाद आय
मन परैत अछि रामप्रसाद
आ॓ रामप्रसाद
जेकर पिता आ पितामह
हमर पितामहक हरवाहा छल
मन परैत अछि
हुनकर हर
जकरा सं खेत जोतैक छल
भोर आ॓ सांझ
ताहि दिन कतेक
मन लगैत रहैक गाम मे
आ॓हि हर मे जोतैत छल
दू टा बरद
बरद के घंटी
आबो बाजैत अछि कान मे
मन परैत अछि
जखन धान काटि कऽ
बोझ राखल रहै आंगन
आ दुआरि पर
मुदा, समय बीतल
नहि रहल आब रामप्रसाद
नहि रहल आब पितामह
नहि रहल आब दुआरि पर हर आ बरद
गाम मे ट्रक्टर आबि गेल
थ्रेसर सऽ आबि काज होइत अछि
ताहि सं नहि नींद टूटैत अछि घंटी सं
आ नहि बोझ रखाइत अछि आंगन मे।
उमेश मंडल
गनियारि पिसबाक गीत
कहमा केर जड़िया कहमा सिलौटिया रे।
ललना रे कओन मुँह भय पीसब, कौषिल्या पीआयब रे।
दछिन के इहो जड़िया, पछिम सिलौटिया रे।
ललना रे पूब मुँह भय पीसब, कौषिल्या पीयाअब रे।
पहिने जे पीलनि कौषिल्या रानी, सुमित्रा रानी रे।
ललना रे सिल धोइ पीयल कैकेयी रानी तीनू गरभ सँओ रे।
कौषिल्या के जनमत राम, सुमित्रा के लछमन रे।
ललना रे कैकेयी के भरत, शत्रुघन, तीनू घर सोहर रे।
तेलश्कसाय लगवैक गीत
(1)
कौने बाबा हरबा जोताओल, मेथिया उपजाओल हे।
कौने बाबी पीसल कसाय, जे कि बरुआ ओंगारल हे।
बड़का बाबा हरबा जोताओल, कि सरसो उपजाओल हे।
ऐहब बाबी तेल पेरौलीह, बरुआ ओंगारथि हे।
(2)
काँचहि बाँस के मलिया हे,
आकि ताहि मलिया तेल फूलेल हे।
कौने बाबी लगेतीह तेल फूलेल,
आकि कौन बाबी लगेती उबटन हे।
आकि फल्लाँ बाबी लगेती तेल फुलेल,
आकि फल्लाँ बाबी लगेती उबटन हे।
मूड़न
गोसाउनि नोतक गीत
जँ हम जनितौं काली मैया औती
अगर चानन मंगबितौ हे।
गंगा सँ मैया चिकनी मंगबितौ
ऊँच के पीड़िया बनबितौ हे।
नीर गंगाजल सँ पीड़िया निपबितौ
अड़हुल फूल चढ़बितौ हे।
पीअर पीताम्बर माँ के आँचर दीतौं
सोन रुपे घूघरु लगाय हे।
जोड़ा छागर धूर बन्हबितौ
करिया दीतौं बलिदान हे।
भनहि विद्यापति सुनु देबि काली
सदा रहब सहाय हे।
पितर नोतक गीत
कौन बाबा आओत गजन हाथी
ओ जे कौने बाबा लिल घोड़ा हे।
कौने बाबी अओती दोलियहि
कि बरुआ आषीष देती हे।
बड़का बाबा आओता गजन हाथी
छोटका बाबा लिल घोड़ा हे।
ऐहब बाबी अओती दोलियही
कि बरुआ आषीष देती हे।
मुड़न बेरक गीत
समुआ बैसल तोहे बाबा कि बरुआ अरजि करु हे।
लपटि झापय ललाट करह जगमूड़न हे।
रहु बाबू रहु बाबू बरुआ कि होयत सुदिन दिन हे।
नोतब सकल परिवार करब जगमूड़न हे।
मूड़न करैत बरुआ क बाबा सँ अरजि करु हे।
आनहु पीसि बोलाय कि अउरी पसारल हे।
औती पीसी सोहागिन बैसति चैक चढ़ि हे।
पीअर वस्त्र पहिरती केष परिछति हे।
केष कटबै कालक गीत
कौने बाबा छुरिया गढ़ाओल सोने मढ़ाओल हे।
कौने अम्मा लेल जन्म केष कि शुभश्शुभ होयत हे।
बड़का बाबा छुरिया गढ़ाओल रतने मढ़ओल हे।
बड़की बाबी लेल जनमकेष कि शुभश्शुभ होयत हे।
देब हे नौआ भैया लाल धोतिया सोनक कैंचिया हे।
शुभ कऽ उतारऽ बाबाक केष बबुआ जीक मूड़न हे।
नौआक गीत
धीरेश्धीरे कटिहह नौआ केष, कि बौआ बड़ दुलारु छइ हौ।
बौआक मामी नौआ तौरे देवह, कि बौआ छै बड़ दुलारु हौ।
बौआक मामी भार पठौलखिन, ठकुआ तोरे देबह केरा तोरे देवह हौ।
बौआक नाना घोती पठेलखिन, पीअर मे रंगि के तोरे देवह हौ।
धीरेश्धीरे कटिहह केष, कि बौआ छै बड़ दुलारु हौ।
नहेबा कालक गीत
कोने बाबा पोखरि खुनाओल, कि घाट बनाओल हे।
कोने बाबा भरथि जूड़ी पानि, कि बरुआ नहाबथि हे।
अपन बाबा पोखरि खुनाओल, घाट बनाओल हे।
ऐहब बाबी भरु जुड़ि पानि, कि बरुआ नहावथि हे।
चुमाओन गीत
आजु माइ शोभा श्री रघुवर के
मातु कौषल्या हकार पठाओल
गाइन जतेक नगर के।
कैकेयी आयलि सुमित्रा आयलि
गाइनि सगर नगर के।
दुबि अछत लय देवलोक आयल
चर डोलय रघुवर के।
तुलसीदास प्रभु तुम्हरे दरस के
जीवन सफल दरस के।
आजु माइ शेभा श्री रघुवर के।
भगवतीक विनती
अयलहुँ सरन तोहर हे जगतारनि माता। अयलहु.....
लाले मन्दिरिया के लाले केबरिया।
लाले घ्वजा फहराय हे जगतारनि माता।
लाले चुनरिया के लाले किनरिया,
लाले सिनुर कपार हे जगतारनि माता।।
राखि लिऔ मुखलाली हमरो।
हम लेब अचरा पसारि हे जगतारनि माता।।
अयलहुँ सरन तोहार...
गाम देवताक गीत
बेरिश्बेरि बर बरजौं मालिनि बेटिया,
बाट घाट जुनि रोपु फूल हे।
एहि बाटे औता ब्राह्मण दुलरुआ,
घोड़ टाप तोड़ि देत फूल हे।
कानै लगली खीजै लगली मालिनि बेटी,
आखि स बहै लागलि नोर हे।
के निरमोहिया फूल गाछ तोड़त,
के रे देत वरदान हे।
जुनि कानू जुनि खीजू मालिनि बेटिया,
हमरा स लीअ वरदान हे।
पहिल जे मंगलौ ब्रह्मण सिर के सिनुरबा,
तखन कोर भरि पुत्र हे।
जे पुत्र दीह ब्राह्मण हरि नहि लीह,
बाँझी पद छूटत गोर हे।
साँझ
साँझ दिय यसुमति मइया हे साँझ बीतल जाइये।
जैता कन्हैया खिसिआय, हे साँझ बीतल जाइये।
कथी केर दीप कथी केर बाती, हे साँझ बीतल जाइये।
सोना केर दीप पाट सूत बाती, हे साँझ बीतल जाइये।
सरसो तेल जरय सारी राती, हे साँझ बीतल जाइये।
जरय लागल दीप चमकि गेल बाती, हे साँझ बीतल जाइये।
खेलय लगलै साँझ मइया, हे साँझ बीतल जाइये।
उपनयनक गीत
(उद्योग गीत)
गोसाउनिक नोतक गीत
अढ़ुल फूल देखि अयली गोसाउनि, दूधहि चरण पखारब हे।
छुट्टा पान गोटा सुपारी, माँ काली नोतल जाथि हे।
बरुआक माय बाप गोचर करै अछि, सुनु माता विनती हमार हे।
सेबक बालक स्तुति नहि जानय, छमा करब सब अपराध हे।
पीतर नोतक गीत
दुअरहि बाजन बाजय स्वर्ग आवाज गेल हे।
स्वर्ग मे पुछथिन बड़का बाबा कतय बाजन बाजू हे।
अहाँ कुल जनमल फल्लाँ बरुआ ओतहि बाजन बाजू हे।
स्वर्गहि पितर आनन्द भेल कि आब वंष बाढ़ल हे।
स्वर्ग सँ आबि पितर बरुआ के आषीष देल हे।
बँसकट्टीक गीत
वृन्दावन बाँस कटायब कि मड़बा बनायब हे।
पहिने बाँस के पूजब तखन छऽ लगायब हे।
आहे ई थिक काठ सुकाठ एही सँ मारब बान्हव हे।
आकि वृन्दावन बाँस कटायब कि मड़बा बनायब हे।
मड़ठट्ठीक गीत
जन्म सुफल आइ भेल की आंगन माड़ब भेल हे।
जन्म सुफल ओहि बाबाक जिनका आंगन माड़ब हे।
जन्म सुफल ओहि बाबीक जनिका कुल पुत्र भेल हे।
पीयरहि खड़ छरायब कि लाल झालरि लगायब हे।
ताहि माड़व बैसत फल्लाँ बरुआ जिनकर जनउ हैत हे।
चहुदिस रहतनि सर सम्बन्धी की माड़ब सोहाओन हे।
मड़वा छारैक गीत
बाबा हे फल्लाँ बाबा मड़वा छारि मोहि दैह।
बरिसत हे नन्हबुनिया मेघ,
भाीजत हे मोरा बालक बरुआ,
पीताम्बर ओढ़न को दैह। बाबा हे....
बाबी हे फल्लाँ बाबी आँचर झाँपि मोहि लैह।
बरिसत हे नन्हबुनिया मेघ,
भीजत हे मोरा बालक बरुआ,
आँचर झाँपि मोहि लैह। बाबा हे....
मड़बा नीपक गीत
बाबा दान दीअ यौ, मटिया कोड़ैक इनाम दीअ यौ।
बाबा दान दीअ यौ, मड़बा नीपैक इनाम दीअ यौ।
गइया जे देलौ बछिया लगाय,
आर किछु दान बेटी आमा सँ लीअ?
आमा दान दीअ यै, मड़बा नीतैक इनाम दीअ यौ।
बाली जे देलौ बेटी झुमका लगाय,
आर किछु दान बेटी भैया सँ लीअ।
भैया दान दीअ यौ, मड़वा नीपैक इनाम दीअ यौ।
कंगना जे देल खीलन लगाय,
आर किछु दान बहिन काकी सँ लीअ।
बलिप्रदान कालक भगवती गीत
बदन भयावन कान बीच कुण्डल विकट दषन घन पाँती।
फूजल केष वेष तुअ के कह जनि नव जलधर काँती।
काटल माथ हाथ अति शोभित तीक्ष्ण खड़ग्कर लाई।
भय निर्भय बर दहिन हाथ लय रहिअ दिगम्बरि माई।
पीन पयोधर ऊपर राजित लिधुर स्रावित मुण्डहारा।
कटि किंकणि शब कर मण्डित सिक बह शोणित धरा।
बसिय मसान ध्यान सब ऊपर योगिन गण रहु साथे।
नरपति पति राखिअ जग ईष्वरि करु महिनाथ सनाथे।
बेटा विवाह
कुमरमक गीत
(1)
हम ते पोखरि खुनबै तेइ के घाट मढ़ैबै।
छिनारो आयल करिहें ओहि रे पोखरिया मे।
रसिया बात बाजू सम्हारि, छोड़ू हमरा से अरारि।
हम त झुलफी धय घिसिआयब पोखरिया मे।
हम त कोठवा उठैब तेइ मे खिड़की लगैब।
छिनरो अबायल करिहें ओहि रे कोठरिया मे।
रसिया बात बाजू सम्हारि छोड़ू हमरा से अरारि,
हम त झुलफी धय घिसिआयब कोठरिया मे।
हम त पलंगा लगैब तेइ मे तोसक ओछायब।
छिनरो आयल करिहें ओहि रे पलंगिया मे।
रसिया बात बाजू सम्हारि छोड़ू हमरा से अरारि।
हम त झुलफी घय घिसिआयब पलंगिया मे।
(2)
रिमझिम रिमझिम बुन्दे बरसि गेल, अंगना मे पड़ल कजरिया।
थरिया धोबै गेलि फल्लाँ छिनरिया, खसली टांग अलगइया।
घेड़बा चड़ल एलखिन फल्लाँ रसिया उठ गै छिनो हरजैया।
हम कोना उठबौ रसिया, तोहर बचनिया डरबा मे पड़लैमचकिया।
डरबा मचकिया के की की दबैया, सोठि पीपरि मरचइया।
सोठि पीपरि के बड़ रे जहरिया, अतर गुलाब ठंदैइया।
जुटिका बन्धनक गीत
कोने बाबा केरा गाछ रोपल, केरा कोसाय गेल हे।
कोने बाबीक बरुआ उमत भेल राति शहर बसु हे।
फल्लाँ बाबा केरा गाछ रोपल केरा कोसाय गेल हे।
फल्लाँ बाबी बरुआ उमत भेल राति शहर बसु हे।
मड़बहि घीव ढ़रकि गेल स्वर्ग इजोत भेल हे।
स्वर्गक पितर आनन्द भेल आब कुल रहत हे।
आमश्महु विआहय लेल जयबा कालक गीत
जाइत देखल पथ नागरि सजनी गे,आगरि सुबुधि सयानि।
कनकलता सन सुन्दरि सजनीगे, विधि निरमाओल आनि।
चलैत हस्ति गमन सन सजनी गे, देखैत राजदुलारि।
जनिकर ऐहन सोहागिनि सजनी गे, पाओल पदारथ चारि।
निल वसन तन घेरल सजनी गे, सिर लेल चिकुर सम्हारि।
ओहि भ्रमर रस पीबह सजनी गे, बैसल पंख पसारि।
आमश्महु विआहक गीत
(1)
आम बीछै गेली छिनरो, आँठी विछि लैली हे।
पचास बेर मना देलियह, तैयो ने तो मानली हे।
आम महु बिआहै छलै, तही से भुलेलियै हे।
हजार बेर मना देलियह, तैयो ने तो मानली हे।
(2)
अमुआ मजरि गेल जमुआ मजरि गेल चम्पाकली
ताहि तर छिनरो ठाढ़ि नयना सँ नीरे ढरी।
घोड़बा चढ़ल एलखिन फल्लाँ रसिया
किए अकेली ठाढ़ं, नयना सँ नीरे ढरी।
सासु मोर बुढ़िया हे ननदी ससुररिया
मोर पिया गेलै परदेष, नयना सँ नीरे ढ़री।
छाड़ि दीअ आ गे छिनरो घरबा दुअरबा
सुख सम्पति सगरी।
छोड़ि दैह बिअहुआ के आष चल हमरो नगरी
अगिया लगेबै रसिया के घरबा दुअरबा, सुख सम्पति सगरी।
बज्र खसेबै तोरे माथ मोर पिया आते रही।
उपनयन कालक गीत
(1)
चैतहि बरुआ विजय भेल बैषाख पाहुन भेल हे।
घर पछुआर केबटा बसु पार उतारि देहु हे।
जौं हम पार उतारब जायब कओन देष हे।
जायब हम जाहि देष जहाँ अपन बाबी हे।
बाबी के चरण पखारब लाल जनउआ देती हे।
(2)
काषी मे जाय बरुआ ठाढ़ भेल जनऊ पुकारय हे।
आहे के थिका काषी के वासी जनऊ मोहि चाहिय हे।
सुतल छला बाबा कवष्वनाथ सेहो उठि बैसला हे।
आहे हम थिकौं काषी के वासी जनऊआ पहिरायब हे।
झारिखंड जाय वरुआ ठाढ़ भेल जनऊआ माँगय हे।
आहे के थिका झारिखंड वासी जनऊ मोहि चाहिय हे।
हम थिकौं झारिखण्ड वासी जनऊआ पहिरायब हे।
आंगन आबि ठाढ़ि भेल भिखि मांगय हे।
हम थिकौं अहाँ के बाबी झोरी भरिय देव हे।
भीख कालक गीत
मिथिलाक रुसल बरुआ काषी कथि लेल जाय।
आगे दाय कियो नहि हित बन्धु जे बरुआ लेल बिलमाय।
आगे दाय बाबा से बड़का बाबा बरुआ लेल विलमाय।
बाबी से अइहब बाबी भीख नेने ठाढ़ि।
आगे माइ भिखो ने लियै बरुआ मुँहो सँ ने बजाय।
पहिरय लय पीयर धोती ओढ़य लेल मांगल चादर।
आगे माय हाथ दुनु मंट्ठा माँगे कान दुनु सोन।
आगे माइ मिथिलाक रुसल बरुआ काषी कियै जाय।
पुरोहित के गारि
बकलेल बभना चूड़ा दही चाटय ऐला हमर अंगना।
चाउर देलियनि दालि दलियनि धेलनि अंगना।
एक रती नोन लय करै छथि खेखना।
धेती देलियनि तौनी देलियनि धेलनि अंगना।
एकटा गमछा ले करै छथि खेखना।
सोन देलियनि चानी देलियनि धेलनि अंगना।
एकटा पाइ ले कोना करै छथि खेखना।
जनउ कालक गीत
लाल पीयर अछि माड़ब पाने पात छारल हे।
ताहि माड़ब बैसलाह बाबा से फल्लाँ बाबा हे।
बगल भए बैसलखिन बाबी से ऐहब बाबी हे।
कोरा बैसौलनि बरुआ से फल्लाँ बरुआ हे।
बरुआ जे मँगै बाबी लाल पीयर जनऊ दिय हे।
रहुश्रहु बाबू आइ अहाँ ब्राह्मण होएव हे।
कि लाल जनऊआ देब हक कि पियर जनऊआ हक।
चुमाओन कालक गीत
आइ षिवक चुमाओन हेमन्त घर मे।
सखि सब गाबै मंगलाचार हेमन्त घर मे।
आंगन चानन निपू मनाइन गजमोती चैक पुराइ।
काँचहि बाँस के डलबाँ बुनाओल।
ताहि राखब दूभि धान हेमन्त घर मे।
चुमबै बैसली सासु मनाइनि।
गौरी सहित त्रिपुरारी हेमन्त घर मे।
दुबि अक्षत लय मुनि सब आयल।
जय जय शब्द सुनाय हेमन्त घर मे।
दनही आ बिलौकी कालक गीत
(1)
अमुआ मजरि गौले महुआ मजरि गेलै।
ताहि तर फल्लाँ छिनरो ठाढ़ि नयना सँ नीर झरे।
घोड़बा चढ़ल एलखिन फल्लाँ रसिलवा, कियै छिनरो एकसरि ठाढ़ि।
सासु मोरा आन्हर ननदि गेल निज घर, मोर पिया गेल परदेष।
नयना......
छोड़ि दिहो छिनरो घरबा दुअरबा, छोर विहुआ के आस।
नयना........
(2)
नामि नामि कोसिया मे जुटिया गूथविह लटका के चलिहह ना।
छिनरो गोरी बदन बिछा के चलिहह ना।
पतरी कमरिया मे डरकस पहिरि लचका के चलिहह ना।
गोरे कलइया मे घड़ी पहिरि देखा के चलिहह ना।
गोरेश्गोरे अखिया मे सुरमा लगाबिह मचका के चलिहह ना।
बेटा विवाह
विवाहक लेल जाय कालक गीत (कुमार)
(1)
जहि दिन आहे बाबू तोरो जनम भेल, अन्न पानि किछु ने सोहाय हे।,
सेहो बाबू चलला गौरी विआहन, दुधबाक दाम दहु ने चुकाय हे।
दूधक दाम अम्मा सधियो ने सकइछ, पोसाइक दाम दै देव हे।
जाबत जीव अम्मा सध्यिो ने सकइछ, धनी हेती नौरी तोहार हे।
नित दिन आहे अम्मा चरण दबेती, भोरे उटि करती प्रणाम हे।
(2)
पाकल पान के बिड़िया लगाओल
नगर मे पड़ल हकार।
आबथु देवलोक बैसथु माड़ब चढ़ि,
सब मिलि साजु बरियात हे।
कौने बाबा साजल आजनश्बाजन
कौने बाबा साजु बरियात हे।
कौने बाबी साजल दुलहा दुलरुआ,
झलकैत जायत बरियात हे।
(3)
साँठह आहे आमा सिन्दुरक पुरिया, नगर मे पड़ल हकार हे।
साजह आहो बाबा दुलहा दुलरुआ, दूर जायत बरियात हे।
जखनहि रामजी कोबर बिच आयल, सरहोजि छेकल दुबारि हे।
हमरा के दान दीअ ननदोसिया, तखन कोबर देव पैर हे।
मोरा कुल आहे सरहोजि बहिनी ने जनमल, राम लखन दुहु भाइ हे।
सेहो भाइ मोर संगहि अयलाह, सरहोजि मांगथि दहेज हे।
बरियातीक गीत
(1)
ऊँची महलिया मालिनि के घर, नीचा लागल फुलवारी हे।
ले गे मालिनि सोनाक सूइया, बाबू के गूँथि दे मौरि हे।
मौरि लय आयल मालिन, कहलक के देत मौरक दाम हे।
घर सँ बाहर भेला फल्लाँ बाबा, हम देब मौरक दाम हे।
(2)
कौने बाबा सजल घोड़ हाथी कौने बाबा साजु बरियात हे।
कौने दुलहा साजथु रहिमल घोड़ा साजि चलल बरियात हे।
तिल एक आहे बाबू घोड़ा विलमाव अमा गोर लागि लिय हे।
जुरहि जैहह बाबू जुरहि अबिह जुरहि होयत विवाह हे।
रहमल घोड़ा सलामति रहतै शुभ2 होयत विवाह हे।
नगहर भरबाक गीत
भरय चलली सखि सिरहर नव कलष मँगाइ।
चानन सिरहर उर लय शुभ सिन्दुर लगाइ।
सागर तट जब महुँचल सब नारी।
सिर सँ कलष उतारल देल आमक डारी।
लोचन प्रीत जुड़ायल सब मिलि मंगल गावे।
सब के ई दिन होय विधाता लिखथि भागे।
शुभ कार्य मे विदा होयबा कालक गीत
शुभे ल बहार भेलि बेटीक माय,
काहु हाथ नारियल काहू दूबि धान,
काहू खोंइछा साँठल पाकल पान
भैया हाथ नारियल भौजी दूबि धान।
अमा खोंइछा साँठल पाकल पान।
आजू मोरा आजू मोरा उचित कल्याण,
बीलहह हे तरुणी सिनुर पिठार।
बेटीक विआह (कुमारि गीत)
(1)
कौने बन बोले कारी कोइलिया
कौने बन बोले मयूर हे।
कौने घर बोले सीता हे दुलारी
आब सीता रहति कुमारि हे।
आनन्द बन बोले कारी कोइलिया
निकुंज बन बोले मयूर हे।
राजा जनक घर सीता बेटी बोले
आब सीता व्याहन जोग हे।
जाहक आहो बाबा राज अयोध्या
जहाँ बसै दषरथ राज हे।
राजा दषरथ के चारि पुत्र छनि
राम लखन दुइ वीर हे।
गोरहि देखि जनु भुलहि हो बाबा
श्यामहि तिलक चढ़ैब हे।
अपन जोग बाबा समधि जोहब
नगर जोकर बरिआत हे।
सीता जोकर बाबा लायब जमैया
देखत जनकपुरक लोक हे।
(2)
जहि दिन आहे बेटी तोहरो जनम भेल से दिन कहलो ने जाय।
चिन्ता निन्द हरित भेल बेटी थीर नहि रहल गेयान।
कथी लय आहे सियाक जन्म भेल से भेल व्याहन योग
से सुनि बाबा उढ़ला चेहाय चलि भेला ताकयं जमाय।
बाँध बनबिहह बाबा पोखरि खुनबिहह लगबिहह आमक गाछ।
हँस जुटत आ कमल फुलायत जल मारत हिलकोर।
ई सरोवर जैतुक नहि माँगत भैया होयता वेहाल।
दरबाजा पर वरियाती ऐला पर
(1)
आउ आउ आहे बहिना सखिया हमार हे।
रतन पलकिया चढ़ि आयल चारु दुलहा।
हाथी घनेरो आबे घोड़ा हजार हे।
कतेक वरियाती आबे पाबी न पारे हे।
जेहने कुमारि तेहने चारु कुमार हे।
तिरहुत के नर नारी देखय मुँह उघारि हे।
लग भऽ जाऊ बहिनि लाज बिसारि हे।
गाओल सिनेहलता मन के उसारि हे।
(अगिला अंकमे)
कल्पना शरण
इण्टरनेट स्वयंवर
इण्टरनेटके अद्भुत तकनीक
खोलने छल सब बन्द द्वार
चैटक सुविधा पाबि कऽ
ललायित मोन बार्रबार
घरमे बैसले बैसल घूमै छलहुँ
हम विश्व के कोर्नाकोना
अपने नामकरणमे लीन भेलहुँ
अलीसा नोरा केली आ कि वैह मैडोना
जखन शुरू होय छल असल बात
हम नहिं किछु नुकेलहुँ डर सऽ
हमरा आनो स यैह अपेक्षा रहल
जे कहै अपना दऽ निर्भीक भऽ
विचारक आदान प्रदान सऽ
कतेको संगे असफल रहलहुँ
दोस्ती सऽ प््रोमक शुरूआत करैके
अपन प्रयास अनवरत रखलहुँ
एक जगह मोनलायक बात बनल
सोचलहुँ अपन असली नाम कही
ताहि सऽ पहिने भेद खुजल
ओ स्त्री छल जकरा पुरूष बुझने रही
१.सतीश चन्द्र झा-भाषा आ राजनीति आ २.सुबोध कुमार ठाकुर-जुग बदलि गेल
१.सतीश चन्द्र झा
भाषा आ राजनीति
अछि घातक आतंकबाद सँ
बढ़ि क‘ ई भाषा के झगड़ा।
कखन कतय ई आगि लगायत
कोना एकर पहिचानब चेहरा।
अछि रहस्यमय राजनीति के
क्रिया कलाप कर्म मन वाणी।
छापि रहल अछि पत्र पत्रिका
प्रतिदिन एकरे एक कहानी।
कखनो बाँटत जाति जाति कें
कखनो सीमा शरहद भारी।
कखनो बात धर्म के कहि क’
लगा देत सौंसे चिनगारी।
कतेक होइत दै चेहरा एकरो
जानि सकल नहि कियो एखन धरि।
सपथ लैत अछि ’सेवा धर्मक’
समटि लेत धन आँजुर भरि भरि।
स्वार्थ कते धरि खसत खाधि मे
कते आओर लज्जित क्षण आयत।
हिन्दी पर लागल कलंक जे
कोना एकर इतिहास मेटायब।
सीखि लेथु सभ भूखल जन जन
अलग अलग सभ प्रांतक भाषा।
तखने भरतनि पेट आब नहि
रहलै हिन्दी देशक भाषा।
जतय देश मे छै एखनो धरि
लाखो लोकक रोटी सपना।
सड़क कात छतहीन जिन्दगी
कंकर पाथर घास बिझौना।
की मतलब छै एकरा की छै
भाषा,भेष कतय की बान्हल।
बिना परिश्रम सँ नहि औतै
भात दालि थारी मे सानल।
जनहित के कल्याण आब नहि
राजनीति के बनतै भाषा।
छल प्रपंच के अस्त्र सस्त्र सँ
सत्ता सुख सबकें अभिलाषा।
भले लेथु ई शपथ मंच पर
विश्वक प्रचलित सभ भाषा मे।
बदलि सकत नहि हुनक आचरण
जनता ठाढ़ रहत आशा मे।
२.सुबोध कुमार ठाकुर
जुग बदलि गेल
जुग बदलि गेल,
मन बदलि गेल,
जकरे देखू से सनकि गेल
नहि जानि किए, एक दोसरसँ सभ दूर सड़कि गेल,
नहि माइ बाप नहि भाइ-बहिन,
सभ अछि जेना संबंध विहीन,
स्वच्छन्द रमए, स्वच्छन्द विचार लए,
जीबए जिनगी सभ ऐंठ-खिचार भए,
सम्बन्धक माने बदलि गेल
सभकेँ नहि जानि ई की भेल,
क्रोधी कामी अति लालची सभ
अछि दुर्भावनासँ ग्रसित सभ
सभ दिशाविहीन दिगभ्रमित भेल,
जकरे देखू से सनकि गेल,
आजुक परिदृश्यमे,
नारिक जीवन अही सृष्टिमे,
अछि दर्दनाक अतृप्त भेल
तोड़ि लाज सभ नारी परोसी रहल लाजक श्रिंगार,
देखिते जकरा मर्द भुकए बनि के सियार
नारीक परिभाषा बदलि गेल
जकरा देखिते क्षण ठिठकि गेल,
जुग बदलि गेल।
जकरे देखू से जुगल बनल
होइतए नेना जेना जुवान बनल,
हम जा रहल छलहुँ सड़कपर
देखलहुँ नेनाकेँ बालिका प्रति व्यवहार
सहजहि मनमे उठल विचार,
गर्लफ्रेंडक संग प्रेमक परिभाषा बदलि गेल
जुग बदलि गेल, मन भटकि गेल
नहि अछि भेष-भूषा नारीक समान,
नहि जानि कतएसँ आएल ई परिधान
चूड़ी, लहठी आ साड़ीकेँ छोड़ि
नारी आब जीन्स अधकट्टी स्कॉट संग भेल,
जुग बदलि गेल, मन भटकि गेल,
सभ भागि रहल फुसियाहींक आडम्बरपर,
सभ नाचि रहल बिन बाजनपर
नमस्कार अभिवादन छोड़ि,
आब हाए-बाय आबि गेल,
जुग बदलि गेल।
चाही सभकेँ खूब विलाश,
सभकेँ खजानाक छै तलाश
जिनगीक फुसियाही साधन जुटबैक लेल,
जिनगीयेकेँ सभ बिसरि गेल,
जुग बदलि गेल
सभ अछि अशान्त, अछि लोक कालहंत,
पाश्चात्य सभ्यता केलक सभकेँ परेशान
जे ग्रह बनि शान्तिकेँ निगलि गेल
पुछै अपन संस्कृति कतए सभक सुबोध गेल,
जग बदलि गेल,
सभ भटकि गेल।
१.श्यामल सुमन-मैथिली दोहा २.अजित कुमार मिश्र-अप्पन माटि
१.श्यामल सुमन
मैथिली दोहा
प्रश्न सोझाँ मे ठाढ़ अछि अप्पन की पहचान।
ताकि रहल छी आय धरि भेटल कहाँ निदान।।
ककरा सँ हम की कहू अपना मे सब मस्त।
समाचार पूछल जखन कहता दुख सँ त्रस्त।।
पँसल व्यूह मे स्वार्थ केर सब देखू बेहोश।
झूठ मूठ मुखिया बनथि खूब बघारथि जोश।।
हम देखलहुँ नहि आय धरि मैथिल सनक विवाह।
दान दहेजक चक्र मे बहुतो लोक तबाह।।
बरियाती केँ नीक नहि लागल माछक झोर।
साँझ शुरू भोजन करत उठैत काल तक भोर।।
रसगुल्ला, गुल्ला बनाऽ खाओत रस निचोड़ि।
खाय सँ बेसी ऐंठ कऽ देता पात मे छोड़ि।।
मैथिलजन सज्जन बहुत लोक बहुत विद्वान।
निज-भाषा, निज-लोक पर कनिको नहि छन्हि ध्यान।।
चोरि, छिनरपन छोड़ि कय करू अहाँ सब काज।
मैथिलजन तखने बचब बाँचत सकल समाज।।
जाति-पाति केँ छोड़िकऽ बनू एक परिवार।
मिथिला के उत्थान हित कोशिश करू हजार।।
अपन लोक बेसी जुटय बाजू मिठका बोल।
सुमन टूटल जौं गाछ सँ तखन ओकर की मोल।।
२.अजित कुमार मिश्र
अप्पन माटि
दूर देशमे अहाँ बसै छी
मन अछि हमर घोर यौ ,
चिट्ठी-पतरी किछु नहि पठबी
हम कोनाकेँ जीबि यौ ।।1।।
छोड़ि गाम जे शहर भगलिऐ
लए आसक सब पोटरी यौ ,
आस बदलि निराश भेल अछि
आबहुँ तँ घूमि अबियौ यौ ।।2।।
चिट्ठी पबितहिं पकड़ू गाड़ी
तेजू शहरक पानि यौ ,
पानिक बदला शोणित पीबी
तकरो नै भेल ज्ञान यौ ।।3।।
चिट्ठी नै हम सप्पत दै छी
जँ मानी अप्पन यौ ,
घुरती बेरक गाड़ी पकड़ू
पहुँचू गाम- सिमान यौ ।।4।।
आब गाम ओ गाम नै रहलै
जत्तए दर-दर ठोकर यौ ,
लूरि जेहन अछि तेहने काजो
गाम-गाममे पसरल यौ ।।5।।
गाम गाम नै धाम बनल छै
चहु दिस नव वितान यौ ,
गाम पहुँचिकेँ नाम करू अहँ
फेर नै शहरक नाम यौ ।।6।।
अप्पन गामक अलगे गुण छै
नै छै दोसर ठाम यौ ,
घुरि फीरिकेँ सब अबैऐ
राखू हमरो मान यौ ।।7।।
१.बिनीत ठाकुर-गीत आ २. दयाकान्त मिश्र-हे मैथिल आबो जागु
विनीत ठाकुर
गीत
ठकन काका हो कलयुगमे देखल बड़ अजगुत
मनुषक भेषमें घुमे सबतैर आब यमके दुत
आबनै चानमें ओ शितलता मलिनभेल सुरुजक लाली
स्वार्थक बसमें पैर मनुष सब करैय काज बेताली
भरल बसन्तमे कुहके कोयलिया पुत भेल कपुत
नोर बैन हिमालयसँ निकले कमला, कोशीके पानी
हिचुके गंगोत्रीसँ गंगा सबके भेल एक कहानी
नव दुलहिन धर्ती माताके छिन्न भेल सारीके सुत
जे कहाबे अपनाके ज्ञानी उहे करे खिचातानी
के नव बाट देखा मिथिलाके लिखत सुन्दर कहानी
कहिया धैर जाल सोझराक मैथिल हायत मजगुत
२. दयाकान्त मिश्र
हे मैथिल आबो जागु
बितल राईत भऽ गेल भोर
चिडे-चुनमुनी करैया सोर
सुरजक ललिमा भू पर पसरल
दैत अछि एकटा नव सनेश
हम जग्लहु अंहु जागु
अधिकारक लेल आगू आबू
हे मैथिल आबो जागु
कालि राज आई शिवराज
किया करैया अहांक कात
कखनो गोवा कखनो असम
कखनो पंजाब कखनो गुजरात
कि अहाँ नहि छी भारतवासी ?
गर्व सऽ अपन अधिकार जताबु
हे मैथिल आबो जागु
जागु जनक धिया वैदेही
जागु बुढ, नैना, जुआन
जात धरम सब ताक़ राखी कऽ
सबमिली कऽ करू संग्राम
छोरु पार्टी स्वार्थ अपन सब
आई माय के लाज बचाबू
हे मैथिल आबो जागु
आई अहाँ नहि आगू आयब तऽ
पढ़त गाईर इतिहास
आई अहाँ नहि एक होयब तऽ
होयत अहिना उपहास
सरशताक अहि धरती सऽ
कर्कश्ताक बिगुल बजाबू
हे मैथिल आबो जागु
शेफालिका वर्मा
जन्म:९ अगस्त, १९४३,जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा:एम., पी-एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय),सम्प्रति: ए. एन. कालेज मे हिन्दीक प्राध्यापिका ।प्रकाशित रचना:झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर । नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि:करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित कृति :विप्रलब्धा कविता संग्रह,स्मृति रेखा संस्मरण संग्रह,एकटा आकाश कथा संग्रह, यायावरी यात्रावृत्तान्त, भावाञ्जलि काव्यप्रगीत । ठहरे हुए पल हिन्दीसंग्रह ।
बाजी
ई हमर देश थीक
एहिठाम मानव की मानवकेँ चीन्हि सकल?
तरहत्थापर टघरैत पारा सन मानवक मोन
स्थिरता नहि।
आदमीक जंगल बढ़ि रहल
गाछ बृच्छ कटि रहल
कोनो बाट घाट, कोनो राह हाट
मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारा
वा कि
चर्चक हो वोसारा
भीड़क अन्त नहि...
की पएरे की रिक्शा
की कार की स्कूटर
तरह्हक सवारीपर भगैत
उजहिया चढ़ल मानवक अन्त नहि...
ई दिशाहीन भीड़:
भूत भविष्यक चिन्ता नहि
वर्तमानसँ संतुष्टो नहि
भागि रहल निरन्तर
भागि रहल जन प्रवाह...
संवेदना तितीक्षा
नहि भेटत शब्दकोशोमे जल्दी
मानवक आवश्यक आवश्यकता सन
शब्दकोशो आकार पाबि रहल
निरर्थक शब्द संसारक प्रयोजने की?
कागदोक दाम तँ बढ़ि गेल
पत्र-पत्रिका छापत कोना
प्रदूषणक हल होयत कोना
जे एकटा गाछ रोपल जाइत अछि तँ
सए नेना जनम लए लैत अछि
ऑक्सीजन पाओत कत्तऽ मेनिंजाइटिस
एड्स स्पोंडीलाइटिस सन अनचिन्हार बीमारी लोककेँ मारए लागल
एतबहि नहि
दहेजक बढ़ैत रोग बेटीक बापकेँ
ढाहए लागल
ओ दिन दूर नहि अछि जखन
मानव मानवकेँ मारि खाए लागत
आ एकटा प्रश्न तखनो समस्या बनल रहि जाइत अछि
मानवक बेशी वृद्धि की
मँहगी केर..?
बाजी दुनूमे लागल अछि
के कतेक आगू
केकर कतेक जोर...????
राम कतए चलि गेल...
बालानां कृते-
१.देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स)
२.कल्पना शरण: देवीजी
देवांशु वत्स, जन्म- तुलापट्टी, सुपौल। मास कम्युनिकेशनमे एम.ए., हिन्दी, अंग्रेजी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे कथा, लघुकथा, विज्ञान-कथा, चित्र-कथा, कार्टून, चित्र-प्रहेलिका इत्यादिक प्रकाशन।
विशेष: गुजरात राज्य शाला पाठ्य-पुस्तक मंडल द्वारा आठम कक्षाक लेल विज्ञान कथा “जंग” प्रकाशित (2004 ई.)
नताशा:
(नीचाँक कार्टूनकेँ क्लिक करू आ पढ़ू)
नताशा तीस
नताशा एकतिस
२.कल्पना शरण: देवीज
देवीजी : बिहारक नृत्य शैली
बच्चा के भगवानक रूप मानैवाली देवीजी 14 नवम्बर के बाल दिवस समारोह केना बिसरि सकैत छली।अहि बेर ओ बच्चा सबके बिहार के विभिन्न प्रकारक नृत्य देखाबैक विचार बनेने छली। कार्यक्रममे बाहर सऽ कलाकार के बजाओल गेल छल जे बच्चा सबके प्रत्येक प्रकारक नृत्यके प्रस्तुति के पहिने ओकर विवरण सेहो दैत छल।अहि कार्यक्रममे निम्नलिखित नृत्य देखाओल गेलः
1 झिझियन नृत्यः अहि नृत्यके इन्द्र देव के प्रसन्न करैलेल कैल जायत छै।आन नृत्य सऽ अलग अहि नृत्यके बरसातमे नहि वरन् सूखा के समय मे कैल जायत छै जाहि सऽ अकालक समस्या दूर होई आ बढ़िया फसल होय।अहि नृत्यमे जे गीत गायल जायत छै तकर अर्थ इन्द्रदेवक प््राार्थना होयत छै।बाजा सबमे हारमोनियम बांसुरी ढ़ोलक नगाड़ा इत्यादि पारम्परिक उपकरणके उपयोग होयत छै।
2 सोहर खिलौनाः अहि गीत के बिहारमे विशेषतः मैथिल सबमे बच्चाके जन्ममे गायल जायत छै जाहिमे बच्चाके प्रशंसा भगवान राम आ भगवान कृष्ण स तुलना कऽ कैल जायत छै।अहिमे स्त्री सब गीत नाद सहित भाव भंगिमा सेहो दैत छथिन जाहि लेल अकरा नृत्य के श्रेणीमे राखल गेल छै।
3 जट जटिनः जट जटिन दऽ बड खिस्सा छै मुदा अकर मुख्य पर्याय छै बरसातक समयमे स्त्री सबमे आपसी मनोरंजन।नियम छै जे ब्याहक पहिल बरसातमे कनिया नईहर जायत छैथ आ बेसी के पति सब कमाई लेल बाहर गेल रहैत छथिन। तऽ सब सखी सब मिलिकऽ पति पत्नीक बीच हुअ बला नोक झोंकक खेल खेलाई छथि।अहिमे किछु मनोवाञ्छित उपहार पत्नी मांगने रहैत छथिन आ से नहिं भेटला पर पत्नी उपराग दैत छथिन।किछु लोक नाचै छैथ आ बॉंकि सब देखै छैथ।
4 धामर नृत्य : धामर गीत होली के उपलक्ष्यमे गायल जायत छै जाहिमे लोक सब नृत्य सेहो करैत छथि।मिथिलांचलमे अकरा होरी कहैत छै आ भारतीय संगीतमे धामर राग बहुत प्रसिद्ध अछि।
5 झूमरी नृत्य : झूमरी नृत्य शैली गुजरात के गरवा सऽ मेल खाइत छै।परन्तु बिहार मे ई नृत्य कार्तिक मासके राति मे होयत छै जखन आकाश मेघरहित होयत छै आ पूर्णिमाके चॉंद अपन चॉंदनीसऽ राति जगमगेने रहै छै।
6 मोर मोरनी : ई नाच सेहो बरसातमे होयत छै जाहिमे स्त्रीसब मोर जकॉं नाचऽ लागै छैथ। उत्तरप्रदेशमे अहि तरहक नाचके कजरी कहल जायत छै।
7 विद्यापति नृत्य (बिदापत) : बंगालक रवीन्द्र संगीत जकॉं मिथिलांचलमे विद्यापति गीतके अपन अलग पहचान छै आ ताहि पर ताल मिलाबैत विशेष नृत्य शैली सामान्य वर्गमे बहुत प्रचलित छै। अहि प्रकारक नृत्य के मंचन आ उपर्युक्त प्रोत्साहन भेटने बिहारक संस्कृति के एक विशिष्ट रूप विश्व लग परिलक्षित भऽ सकैत छैै।
अहिके अतिरिक्त जितिया नाच. माझी नाच. नटुआ नाच. आदि सेहो बिहारमे प्रचलित छै तकर जानकारी देल गेल।बच्चा सबके अहिसऽ खूब मनोरंजन भेल।जानकारीपूर्ण हुअक अतिरिक्त परीक्षाके तनावपूर्ण समयमे एहेन मनोरंजन बहुत सहायक साबित भेल।
बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.)
Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.)
इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदानई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।
विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.
नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली
(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)
मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन
१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।
२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।
३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश,बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश,वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।
४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी,जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत,योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।
५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।
६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु,तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले,चोट्टे, आनो आदि।
७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।
८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।
९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन),पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।
१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए।
-(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)
2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली
1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-
ग्राह्य
एखन
ठाम
जकर,तकर
तनिकर
अछि
अग्राह्य
अखन,अखनि,एखेन,अखनी
ठिमा,ठिना,ठमा
जेकर, तेकर
तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ, अहि, ए।
2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।
3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।
4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।
5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।
6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।
7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।
8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।
9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।
10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।
11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।
12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।
13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।
14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।
15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।
16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।
17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।
18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।
19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।
20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।
21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।
ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६
VIDEHA FOR NON-RESIDENT MAITHILS(Festivals of Mithila date-list)
8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS
8.1.Original Maithili Poem by Smt.Shefalika Varma,Translated into English by Lalan
8.2.Original poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy from New York
DATE-LIST (year- 2009-10)
(१४१७ साल)
Marriage Days:
Nov.2009- 19, 22, 23, 27
May 2010- 28, 30
June 2010- 2, 3, 6, 7, 9, 13, 17, 18, 20, 21,23, 24, 25, 27, 28, 30
July 2010- 1, 8, 9, 14
Upanayana Days: June 2010- 21,22
Dviragaman Din:
November 2009- 18, 19, 23, 27, 29
December 2009- 2, 4, 6
Feb 2010- 15, 18, 19, 21, 22, 24, 25
March 2010- 1, 4, 5
Mundan Din:
November 2009- 18, 19, 23
December 2009- 3
Jan 2010- 18, 22
Feb 2010- 3, 15, 25, 26
March 2010- 3, 5
June 2010- 2, 21
July 2010- 1
FESTIVALS OF MITHILA
Mauna Panchami-12 July
Madhushravani-24 July
Nag Panchami-26 Jul
Raksha Bandhan-5 Aug
Krishnastami-13-14 Aug
Kushi Amavasya- 20 August
Hartalika Teej- 23 Aug
ChauthChandra-23 Aug
Karma Dharma Ekadashi-31 August
Indra Pooja Aarambh- 1 September
Anant Caturdashi- 3 Sep
Pitri Paksha begins- 5 Sep
Jimootavahan Vrata/ Jitia-11 Sep
Matri Navami- 13 Sep
Vishwakarma Pooja-17Sep
Kalashsthapan-19 Sep
Belnauti- 24 September
Mahastami- 26 Sep
Maha Navami - 27 September
Vijaya Dashami- 28 September
Kojagara- 3 Oct
Dhanteras- 15 Oct
Chaturdashi-27 Oct
Diyabati/Deepavali/Shyama Pooja-17 Oct
Annakoota/ Govardhana Pooja-18 Oct
Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-20 Oct
Chhathi- -24 Oct
Akshyay Navami- 27 Oct
Devotthan Ekadashi- 29 Oct
Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 2 Nov
Somvari Amavasya Vrata-16 Nov
Vivaha Panchami- 21 Nov
Ravi vrat arambh-22 Nov
Navanna Parvana-25 Nov
Naraknivaran chaturdashi-13 Jan
Makara/ Teela Sankranti-14 Jan
Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 20 Jan
Mahashivaratri-12 Feb
Fagua-28 Feb
Holi-1 Mar
Ram Navami-24 March
Mesha Sankranti-Satuani-14 April
Jurishital-15 April
Ravi Brat Ant-25 April
Akshaya Tritiya-16 May
Janaki Navami- 22 May
Vat Savitri-barasait-12 June
Ganga Dashhara-21 June
Hari Sayan Ekadashi- 21 Jul
Guru Poornima-25 Jul
Original Maithili Poem by Smt.Shefalika Varma,Translated into English by Lalan
Shefalika Verma has written two outstanding books in Maithili; one a book of poems titled “BHAVANJALI”, and the other, a book of short stories titled “YAYAVARI”. Her Maithili Books have been translated into many languages including Hindi, English, Oriya, Gujarati, Dogri and others. She is frequently invited to the India Poetry Recital Festivals as her fans and friends are important people. I do not have to give more introduction of her as her achievements speak for themselves.
As and when lonliness of graveyard
gets down in my eyes
blood of heart solidify into Ahilya
in the jungle of hunger
lotus bismeared with blood smiles
my inner becomes injured
with so called civilization and culture
then
a question ariss in my mind
only a question
to be asked from Janak
why did you send so much gifts
with Sita
you threw away the women folk
into burnning fire of dowry
by even presenting several kingdoms
why did you give birth to dowry system ??
My mind haunts
with a question
again to be asked from Sita...
Sita
why did you agree to undergo
agnipariksha praposed by Ram
being yourself possessed with power
got exploited
by accepting banishment to forest
thus giving birth to silence system
why did you put female life
under pains and sorrow ??
but
see the drama of RAMRAJ
today
dhobi is present in every house
and Ravan in every street
but not visible is RAM
now a days dont know
where Ram has gone
where Ram has gone.........................
Original poem in Maithili by Gajendra Thakur
Translated into English by Lucy Gracy from New York
Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in
Abhinav Bhatkhande
The theft of the eternity of Bhatkhande
The conspiracy of the western music
Seizing the freedom of the Indian music
An abduction of Indian creativity
Because of lack of vision
The politics was fail
The freedom was theft
But the character of Bhatkhande
Set the Indian music free
Dear Ramrang! I read your new Geetanjali
I read that thoroughly
You are truely a new Bhatkhande
The precious treasure of India
You don’t need any name
Your asceticism of fifty year
The vocal definition of freedom
Oh devotee of Hanumaan
Your music was filled with melody of Ramayana
I recalled Tulasidas
His irrespective manner to women and shudra
Your music is victory of Ramayana
New version of freedom
Raag vaidehi, Bhairav raag
Teer Bhukti
Raag vidyapati came from Maithili
You created lyrics filled with words of maithili
In raag Bhupali and raag Bilawal
The fast and slow style of
Raag Vidyapati Kalyan
Your music gave a new recognition
To the Mithila Dhwaj Geet
A new experience
The flying flag denotes
Mental freedom
Standing up after falling down
Leaving the support
Oh Son of Sukhdev Jha
People of Khajura will be said
If we see them
To establish your statue in the village
It is hard to pay off what you did to your kins
The freedom movement should be continued
At the bank of the Ganges in Varanasi
The sage has practices his free style music
An age is ended with him
Whether you recall his name or not
But remember his free style
May be physically handicapped but
Set your mind free
Let your confidence come out with faith
Don’t let your mind over ruled.
(Classical Music theorist and vocalist Shri Ramashray Jha "Ramrang" expired on 1st January 2009, he was music composer of my "Mithilak Dhwaj Geet"- in his memory.)
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Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding:
Language:Maithili
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"विदेह" क २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित।
विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/
विदेह: वर्ष:2, मास:13, अंक:25 (विदेह:सदेह:१)
सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर; सहायक-सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा
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सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु. 165.00
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हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर
साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर
बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक
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किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा
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उपन्यास
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पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश
मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा
मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन
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धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद
जगधर की प्रेम कथा : हरिओम
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कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक-२
खण्ड-८ क संग
२.सहस्रबाढ़नि क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर उपन्यास
स॒हस्र॑ शीर्षा॒
३.सहस्राब्दीक चौपड़पर क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर पद्य-संग्रह
स॑हस्रजित्
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शब्दशास्त्रम्
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कथा-संग्रह- गामक जिनगी
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२.मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार गीत आ गीतनाद -संकलन उमेश मंडल- आइ धरि प्रकाशित मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद मिथिलाक नहि वरन मैथिल ब्राह्मणक आ कर्ण कायस्थक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद छल। पहिल बेर जनमानसक मिथिला लोक गीत प्रस्तुत भय रहल अछि।
३.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन
४.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह
५.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन
६.विभारानीक दू टा नाटक: "भाग रौ" आ "बलचन्दा"
७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल
८.मिथिलाक जन साहित्य- अनुवादिका श्रीमती रेवती मिश्र (Maithili Translation of Late Jayakanta Mishra’s Introduction to Folk Literature of Mithila Vol.I & II)