विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

आवश्यकता अछि सकारात्मक मौलिक चिन्तनक

बिपिन झा · 2009-12-01 · अंक 47

आवश्यकता अछि सकारात्मक मौलिक चिन्तनक
मानवमात्रक विकास हेतु मौलिक चिन्तन अत्यावश्यक अछि। संगहिं विज्ञान आ प्रौद्योगिकीकनिरन्तर विकासक मार्ग में मौलिक चिन्तनक उपेक्षा नहि कयल जासकैत अछि। कोनो राष्ट्र यदिविकसित राष्ट्र कऽ रूप में ख्यातिप्राप्त अछि तऽ एहि में मौलिक चिन्तक योगदान सहजतया इंगित कयलजा सकैत अछि।
एतय ’सकारात्मक’ पद जोडबाक आशय मात्र एतवा अछि जे मौलिक चिन्तन यदि ध्वंसात्मकहो तऽ ओ सर्वनाशक कारण सेहो भय सकैत अछि। आब प्रश्न ई अछि जे एहि लेख कऽ औचित्य कीअछि? कियाक तऽ मनुक्ख जन्मजात विचारशील प्राणी होइत अछि। मौलिक चिन्तन ओकरस्वाभाविक गुण होइत छैक। मुदा… यदि वर्तमान परिप्रेक्ष्य कें ध्यान में राखल जाय तऽ व्यक्ति, चाहेओ जे कोनो कारण हो, मौलिक चिन्तन सऽ परहेज राखय चाहैत अछि।
अपन गप्प कें हम आजुक शोधक सन्दर्भ कें विशेष रूप सऽ जोडय चाहैत छी कियाक तऽभारतवर्षक विभिन्न उच्च अध्ययन संस्थान द्वारा करायल जा रहल विभिन्न विषय में शोध (जेकराप्रचलित रूप मे M. Phil/ M. Tech, D. Phil Ph. D आदि कहैत छियैक), राष्ट्रक ज्ञानपरम्परा कसंवर्धक आओर राष्ट्रक विकास में सहायक होइत अछि।
सामान्यतया आजुक स्थिति ई भय गेल अछि जे अधिकांश उच्च अध्ययन संस्थान द्वारा करायलजा रहल विभिन्न विषय में शोध, उपाधि प्राप्तिक हेतु मात्र भय जा रहल अछि। एहि विषय सऽ अपनेलोकनि सेहो अंशतः वा पूर्णतः सहमत होयब। सामान्यतः देखल जाइत अछि जे विबिध ग्रन्थगत तथ्यआओर अवधारणा क प्रस्तुति कय शोधग्रन्थ तैयार कय उपाधि प्राप्त कय लेल जाइत अछि। ओकरगुणवत्ता पर ध्यान नहि देल जाइत अछि।
एतय हम एकटा महत्त्वपूर्ण संस्था मे जाहि विषय पर उपाधि देल गेल ओकर चर्चा करयचाहैत छी। विषय “Theory of false Cognition” (भ्रम सिद्धान्त) सँ संबन्धित छल। ओतय विभिन्नसिद्धान्त शोधकर्ता द्वारा प्रस्तुत कयल गेल। पूर्ववर्ती आचार्यक मत पर टिप्पणी हुनका आदर दैत नहिंकयल गेल। एतय हमर कथन जे- शोधकर्ता सँ अपेक्षित छल जे विभिन्न आचार्यक मत कें समीक्षाकरितथि। जतय कतहु ओहि में समस्या छैक ओकर यथासंभव समाधान प्रस्तुत करितथि। अन्यथा तऽओ शोध पुनर्प्रस्तुतीकरणमात्र अछि जे जनमानस हेतु मात्र भारस्वरूप कहल जासकैत अछि।
एहि उदाहरणक माध्यम सँ हम मात्र एतेक कहय चाहैत छी जे केवल अन्धानुकरण कय अपनप्रतिभाक विकासक मार्ग अवरुद्ध नहिं करवाक चाही। एतय पूर्वाचार्यक प्रति अनादरक भाव नहिअभिप्रेत बुझी। प्रत्येक व्यक्ति के अपन मौलिक चिन्तन द्वारा ओ शोध हो अथवा व्यावहारिक जीवन,जनमानस कें नवीन दशा आओर दिशा देवा में सहयोग करैक चाही। अपन मिथिलाक संस्कृतिकप्रत्यभिज्ञा भेला सँ ई बात सहज रूप में स्पष्ट भय जाइत अछि जे ई माटि कखनहुं अन्धानुकरण के प्रश्रयनहिं देलकैक, अपन खण्डनमण्डानात्मक विधि द्वारा जनमानस के विकास में सहयोग दैत रहल अछि।एकरे परिणाम कहल जा सकैत अछि जे नव्यनाय क उत्पत्ति मिथिला में भय सकल जाहि कारणमिथिलाक संस्कृति आइयो समस्त विश्व में समादृत अछि। अस्तु आशा अछि जे एकर मर्यादा सततराखल जायत।http://sites.google.com/site/bipinsnjha/home
१.कुसुम ठाकुर आ २.हेमचन्द्र झा

Suggested citation: बिपिन झा. “आवश्यकता अछि सकारात्मक मौलिक चिन्तनक.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 47, 2009-12-01. https://www.videha.co.in/research/2009/47/आवश्यकता-अछि-सकारात्मक-मौलिक-चिन्तनक.htm

मूल विदेह अंक / Original issue