विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मणिपद्मक कथा–यात्रा

प्रो. प्रेमशंकर सिंह · 2010-01-01 · अंक 49

३.प्रो. प्रेमशंकर सिंह
मणिपद्मक कथा–यात्रा
स्वाधीनता–संग्राम विकट–प्रत्युहक पश्चात् देश जखन स्वतंत्र भेल तखन भारतीय शासन–व्यवस्था भेला पर आधुनिक भारतीय भाषामे साहित्य–सृजनक एक प्रबल ज्वार आयल परिणाम भेलैक जे साहित्य–सरितामे एक नव–स्पन्दनक संचार भेलैक आ प्रत्येक सृजक अपन–अपन साहित्यक विकासार्थ अभूत पूर्वगतिएँ साहित्य–सृजन दिस उन्मुख भेलाह तथा प्रत्येक विधामे अत्युच्य कोटिक साहित्य–सृजनक अभूतपूर्व परम्परा उद्भूत भेल। एहि दिशामे मैथिली–साहित्य पछु आयल नहि रहल; प्रत्युत निर्वाध गतिएँ साहित्य–सृजनक परम्पराक शुभारम्भ भेलैक जकर प्रकाशनक श्रेय समकालीन पत्रिकादिकेँ छैक जे नव–नव प्रतिभा सम्पन्न साहित्य सृजनिहारकेँ साहित्य–साधना दिस उन्मुखक कए प्रोत्साहित करब प्रारम्भ कयलक। एकरे प्रतिफल थिक जे स्वाधीनताक पश्चात् मैथिली–साहित्यक सर्वांगीन विकास भेल तथा प्रत्येक विद्यादिमे नव–रूपें साहित्य–सृजनक परम्पराक श्री गणेश भेल। स्वाधीनोत्तर कालमे मैथिली गद्यक विकासमे वैदेही (1950), मिथिला दर्शन (1953) तथा मिथिला मिहिर (1960) अन्य पत्रिकादिक अपेक्षा दीर्घजीवी भेल साहित्य–सरिताक प्रवहमान वेगवती धारामे अवरोध नहि होमय देलक।
मैथिली कथा साहित्यकेँ प्रोढ़, प्राणवंत, समुन्नत आ समृद्धशाली बनयबाक दिशामे पटनासँ प्रकाशित मिथिला मिहिरक पुनर्प्रकाशन निश्चये मीलक पाथर प्रमाणित भेल जे सहस्त्राधिक कथाकारक एक वर्ग तैयार कयलक जनिक कथा एहि लब्ध–प्रतिष्ठ पत्रिकामे अनवरत प्रकाशित होइत रहल जकर श्रेय आ प्रेय छनि एकर विद्वत वरेण्य साहित्य चिंतक आ सम्पादक सुधांशु शेखर चौधरी (1920–1990)केँ जे प्राचीन एवं अवाचीन कथाकारक अद्भुत समंवय कयलनि। एहि विषयकेँ ध्यानमे राखि एकर प्रत्येक अंकमे कम सँ कम दुइ आ अधिक सँ अधिक चारि कथाक समावेश कयलनि। एकर अतिरिक्त समसामयिक पृष्ठभूमिमे मिथिलांचलमे प्रचलित व्रत–त्योहारक कथा सेहो समय–समयपर प्रकाशित होइत रहल। मिथिला मिहिरक नव वर्षक प्रवेशांक कथा–अंकक रूपमे नियमित रूपेँ बहराइत रहल जे एकर साक्षी थिक मैथिली कथा–साहित्य अपन प्रौढ़ताकेँ प्राप्त कयलक। कारण मैथिली कथा–साहित्यक सर्वाधिक सशक्त ओ सम्पन्न विधा कथा ओ कविता थिक। निश्चयतः एहि कथानक सत्यताक अपलाप नहि कयल जा सकैत अछि। किंतु एहि स्थितिक संग–संग इहो विचारणीय विषय थिक जे कोन एहन तत्व सभ विशेषतया कथाकार लोकनिक मध्य काज कयलकनि जे अपनाकेँ स्थापित करबाक हेतु कठिन साहित्य–साधना कयलनि तथा निरंतर हुनक कथा धारा प्रवाहित होइत रहलनि, कारण कथा गद्य–साहित्यक विशिष्ट विधा थिक जकर प्रतिरूप मैथिली–कथामे सर्वत्र दृष्टिगोचर होइत अछि।
उपर्युक्त पृष्ठभूमिक परिप्रेक्ष्यमे डा. व्रजकिशोर वर्मा मरिपद्म (1918–1986) एक एहन प्रतिभा सम्पन्न कथाकार उद्भूत भेलाह जे एहि विधामे अपन अक्षय कथा कृतिक कारणेँ एक कीर्तिमान स्थापित कयलनि जे निश्चये मैथिली–साहित्येतिहासमे एक अविस्मरणीय ऐतिहासिक घटना थिक। क्वालिटी आ क्वानटिटीक दृष्टिसँ विश्लेषन कयल जाए तँ हिनक कथा–यात्रा अनंत छनि। ओ जाहि विपुल परिमाणमे मैथिली कथा–भण्डारकेँ भरलनि जे अन्यान्य कथाकार लोकनिक द्वारा सम्भव नहि भऽ सकल, किंतु एतय एक प्रश्न वाचक चिह्न अछि जे विपुल परिमाणमे कथा–रचना कयलो पर ई साहित्येतिहासमे सर्वथा उपेक्षिते रहि गेलाह।
मैथिलीक वरिष्ठ इतिहासकार डा. जयकांत मिश्र (1922–2009) हुनक कथा–यात्राक प्रसंगमे A History Of Maithili Literature (Sahitya Academy New Delhi 1976) तथा मैथिली साहित्यक इतिहास (साहित्य अकादेमी नई दिल्ली 1988)मे एको शब्द लिखब उचित नहि बुझलनि, ने जानि किएक? साधारण पाठक तँ इएह अनुमान करत जे ओ मरिपद्मक कथादिसँ सर्वथा अनभिज्ञ वा अपरिचित छथि, वा जानकारीक अभाव छनि वा जानि बूझिक उपेक्षा कयलनि।
राधाकृष्ण चौधरी (1924–1984) A Survey Of Maithili Literature (शांति निवास, बमपास टाउन, देवघर, झारखण्ड, 1976) मैथिलीक विस्तृत चर्चा करैत हुनक दुइ कथाक विशेष उल्लेख कयलनि अछि, Manipadm’s Purishaka Mula (Value Of Man) and Kona Elini (What brought you) (Page 247–248)|
चेतना समिति पटना द्वारा आयोजित भारती–मण्डन–व्याख्यान मालाक अंतर्गत डा. जयधारी सिंह (1929–2000) मैथिली कथाक विश्लेषण करबाक क्रममे कथाकार लोकनिक उपलब्धिक मूल्याकंन करबाक अपेक्षा कथा संग्रह सभक परिचय दऽ कए ओहिमे संग्रहीत कथा कारक जे परिचय देलनि जे वर्त्तमान परिप्रेक्ष्यमे अप्रासंगिक प्रतीत होइत अछि। एहि क्रममे ओ परिपद्मक साहित्यकारक दिन (संचयिता), शाश्वत ऑल इण्डिया रेडियो (अभिव्यञ्जना), प्रतिद्वन्द्विता (पल्लव) एवं दक्षिणा (मिथिला मिहिर) कथाक उल्लेख कयलनि (मैथिली साहित्यक रूप–रेखा पृष्ठ 89–103)।
मैथिली साहित्यक इतिहास (भारती पुस्तक केन्द्र दरभंगा 1991)मे डा. दुर्गानाथ झा श्रीश (1929–2000) मैथिली गद्य साहित्यक विश्लेषणक अंतर्गत आधुनिक गल्प–साहित्यक अंतर्गत नकटाक शिकार (वैदेही), पट्टीदार (वैदेही), एवं संयोग (वैदेही) मात्र कथाक उल्लेख कयलनि आ हुनक कथाक प्रसंगमे एको शब्द लिखब उचित नहि बुझलनि (381–382)।
डा. दिनेश कुमार झा (1941–2002) मैथिली साहित्यक आलोचनात्मक इतिहास, मैथिली अकादमी, पटना 1979)मे मैथिली कथाक प्रवृत्ति मूलक विश्लेषण करबाक क्रममे हुनक मात्र दुइ यथार्थवादी कथा शोणितक स्वाद (मिथिला मिहिर) एवं दछिना (मिथिला मिहिर)क उल्लेख कयलनि, किंतु हुनक कथा–धाराक वा प्रवृत्तिक कोनो विश्लेषण नहि कयलनि जे हास्यास्पद प्रतीत होइछ।
हाल चाल (1986)क मरिपद्म–श्रद्धाञ्जिल अंकमे मात्र पैंतीस कथाक शीर्षक चर्चा कयल गेल अछि जे उपहास्पद थिक।
साहित्य–अकादेमी आ चेतना समिति पटनाक तत्वाधानमे मैथिली गद्यक विकास (1994) पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठीमे मोहन भारद्वाज (1943) मैथिली कथा गद्यपर अपन आलेख प्रस्तुत कयलनि, किंतु मरिपद्मक सदृश सशक्त गद्यकारक गद्यक प्रसंगमे ओ विचार करब अनावश्यक बुझलनि जखन कि हुनक गद्य अत्यंत सशक्त ओ प्राणवंत अछि जकर यथार्थताक अवबोध पाठककेँ हुनक कथाक अनुशील नहिसँ पाठककेँ होयतनि।
डा. मिघन प्रसाद (1961), मैथिली कथा कोश (1996)मे मरिपद्मक एक सय आठ कथाक शीर्षक वद्ध उल्लेख कयलनि जाहिमे सँ मुनरीक मोल (1964) कथा नहि; प्रत्युत एकांकी थिक जकरा हम अनमिल आखर (कर्ण गोष्ठी कोलकता 2000)मे संकलित कयल अछि। ओहिमे सँ तीन कथाकेँ अर्चित मानलनि अछि। (कथा कोश पृष्ठ-......), किंतु हमरा जनैत हुनक कथाकेँ मर्मकेँ आत्मसात करबाक दिशामे ओ सचेष्टता नहि देखौलनि तेँ एहन निष्कर्ष बहार कयलनि। डा. प्रसाद बहुचर्चित, चर्चित तथा अर्चित कथा क्रम जे एहन निर्धारण कयलनि अछि ताहिसँ हम असहमत छी, कारण कोन आलोचक प्रत्येक कथाकारक कथा–कृति धरि सीमित रहि जाइत छथि। किंतु जाहि समीक्षककेँ उपयुक्त अवसर भेटैत छनि तँ ओ समग्र कथा–कृतिक प्रत्येक पक्षसँ परिचित भऽ कए वास्तविक समीक्षा करबाक प्रयास करैत छथि।
अवलोकन (1995)मे डा. अरूण कुमार कर्ण (1961) मरिपद्मक कथा–संसार शीर्षकसँ एक समालोचनात्मक आलेख अछि जाहिमे हुनक सम्पूर्ण कथा–कृतिक विश्लेषण नहि कऽ कए मात्र वैदेही ओ मिथिला मिहिरक जे कथादि हुनका उपलब्ध भेलनि, ओहि आधार पर हुनक आलेख केन्द्रित अछि। डा. कर्ण सेहो मुनरीक मोल (1964)केँ कथा कहलनि जे नितांत भ्रामक आ अशुद्ध थिक।
उपर्युक्त परिप्रेक्ष्यमे आब आवश्यक भऽ जाइत अछि जे डा. व्रज किशोर वर्मा परिपद्मक कतेक कथा कृति अद्यापि मैथिलीक विभिन्न पत्र–पत्रिकादिमे आ कथा–संग्रहादिमे प्रकाशित अछि तकर यथार्थतासँ जनमानस पाठक परिचित भऽ जाथि। मैथिली कथा–द्वारपर मरिपद्म दस्तक देलनि बीसम शताब्दीक षष्ठ दशक आरम्भिक कालमे, जाहि हुनक लेखकक एक दिन (1950), जामवंत चारी (1952), धरतीक हाक (1953), नकटाक शिकार (1954), पट्टीदार (1954), संयोग (1955), ओ दिन आ ओह दिन (1957), दुनू छोर (1959), भट्ठापरक पीपर (1960), ओइ लेखक दुआरे (1960), क्षण आ मन (1961), तऽरमे एक्के (1962) एवं मिस फिट (1969) कुल तेरह कथा प्रकाशित अछि।
दरभंगासँ प्रकाशित मिथिला मिहिरमे हुनक इजोतदाइ (1951), जोगबा मिसर (1951) बाल गोविन्द (1953), सुमरिन महालन (1953) एवं राजकुमारी चैननक रोमांस (1953) कुल पाँच कथा पाठक सम्मुख आयल।
किंतु हुनक कथा–यात्राक शिल्प विकसित भेल तखन, जखन पटनासँ ओकर पुनर्पकाशन प्रारंभ भेलैक जाहिमे साधनाक मोह (1960), सफलताक छड़पान (1960), युधिष्ठिक पत्नी (1961), माइक संस्कृति (1961), हमर अष्टग्रह (1962), विसरल नहि जाइत छैक (1962), मरूधारा (1962), बहिनिक दुलार (1963), मुक्ति दिवस (1965), ओ विश्व विद्यालय (1965), आकृतिक ओहि पार (1965), दछिना (1966), उजरा बीछ (1967), लेखा–जोखा (1968), शोणितक स्वाद (1968), करोरिया मुँह (1969), खण्डित – साधना (1970), एकटा लौंग मार्च (1971), केँ? (1971), झिंगुर टेल (1972), सरोकारी (1972), लवहरि कुशहरि (1973), दोस्ती (1973), तेसर प्रेत (1974), स्वगता (1975), एकटा खुटेसल बकरी (1976), सोनहुला कनतोड़ (1976), श्मशानसँ घुरलापर (1976), प्रतिशोध (1976), सर्पसागर आ सुन्दरी (1976), हीरो गिरगिट (1977), हुनका नहि कहबनि (1977), खोजक भेंट (1978), चमचा (1978), एयर होस्टेज (1978), बस स्टैण्डपर (1979), चाहवाला छौड़ा (1979), जहीहा (1980), अद्वैत (1982), समाद (1982), क्षतिपूर्ति (1982), बसक बात (1983), एवं दानी दार (1984) कुल पचास प्रवासी मातृभाषानुरागी लोकनिक सहयोगसँ बङ्ग भूमिक महानगर कोलकातासँ प्रकाशित पत्रिकादिमे, मिथिला दर्शन (1953), कथीले (1955), लुतुक (1955), पोखरि खोर (1955), दुपरिया रातिक शिकार (1956), केशकरक इशारा (1957), बीसक ढ़ोलकिया (1958), प्रवासी एलाह (1960), मौनव्यथा (1960), हाफे हाफ (1960), कोव्रागर्लक खोजमे (1964), अदला – बदली (1973), एवं एकटा जरैल मोमबत्ती (1977)
मैथिली प्रकाशमे एकटा फाजिल पोस्ट कार्ड (1976–77), आखरमे चिंतामरित (1968) तथा मैथिली दर्शनमे खंजरी लै कै (1976) एक–एक कथा प्रकाशित अछि। धीया पूतामे बिलाइक डायरी (1960), अभिव्यञ्जनामे तीन शाश्वत ऑल इण्डिया (1960), ओइ राति (1962), एवं बुझले छल, निर्माणमे तीन रखबाक आ भरिया (1954), जौं लोक चढ़ैत होइ (1955) एवं रौंग साइड (1955), पल्लवमे तीन घरमुँहा (1957), नीमाक तीन युग (1957) एवं प्रतिद्वन्द्विता (1958), अभियानमे एक तुलिका लऽ कऽ (1963), आहूतिमे सरिसवक सागर (1976), कथा दिशामे एक एकपहिया ट्रेक्टर आ दोसर (1980) देस कोसमे अहैत (1981), माटि पानि आधुनिकीकरण (1984) तथा स्मारिका (धनबाद)मे एक हुनका खोजमे प्रकाशित अछि।
मरिपद्मक किछु कथा एहनो उपलब्ध होइत अछि जे नवीन पुस्तक प्रकाशनोपलक्षमे साहित्यकारक दिन (1953) टटका गप्पमे ओ दुनू (1964), गल्प–सुधामे क्रिमनल (1964), गल्प गुच्छमे नैका बनिजारा (1979), मैथिली ललित गद्यमे यात्रा (1973) तथा साहित्य–सौरभमे महाप्राण सलहेस (1987), अतएव ओकर प्रकाशन तिथि पुस्तक प्रकाशन तिथि मानव उचित हैत। केवल ओ दुनू कथाक पश्चात् जा कऽ मैथिली अकादमी पत्रिका (जनवरी–दिसम्बर 1985)क अंकमे प्रकाशित भेल।
मैथिली प्राचीन ओ अर्वाचीन पत्रिकादिक अनुसंधान कऽ कए हमरा दृस्टिएँ कुल एक सएसँ बेसी कथा प्रकाशित अछि। हमरा अनुसंधानक क्रममे चारि कथाक सूचना आर भेटल अछि ओ थिक वैदेहीमे एक जामवंत चाही (1952), मिथिला दर्शनमे दू मिल औरो दिऔ (1959) तथा राधाकृष्ण चौधरी दू कथाक पुरूषक मोल एवं कोना अयलनिक चर्चा कयल;अनि अछि जे अनुसंधेय थिक। एहू सम्भावनाकेँ नहि अस्वीकारक जा सकैछ जे हिनक आर कथादि विभिन्न पत्रिकादिमे प्रकाशित हो जाहि दिस अद्यापि अनिसंधाता लोकनिक नजरि नहि गेलनि अछि।
अद्वैत शीर्षकसँ सेहो मरिपद्म दुइ कथाक रचना कयलनि जकर उल्लेख भेटैत अछि। एक देस कोस नवम्बर 1981 तथा दोसर मिथिला मिहिर 3 जनवरी 1982क अंकमे प्रकाशित अछि आ दुनू कथाक भाव भूमि सर्वथा पृथक–पृथक अछि। किंतु कथा कोशकार मिथिला मिहिरमे प्रकाशित कथाकेँ अनुसंधान एवं कथानु क्रमणिकामे उद्वैत कहलनि अछि। ओ अपन सूक्ष्म दृष्टिक उपयोग करबामे अन्यमनस्कता देखौलनि अछि, कारण अद्वैत एवं उद्वैतमे हुनका कोनो अंतर नहि बुझना गेलनि। पाठकक एहि भ्रम दूर करबाक उद्देश्यसँ प्रस्तुत संग्रहमे हम दुनू कथाकेँ समाविष्ट कयल अछि।
मरिपद्मक मसिजीवी साहित्यकार रहथि जनिक साहित्य–साधनाक अविरल धारा सतत कल–कल करैत साहित्य–सरितामे प्रवाहित होइत रहलजे मैथिलीक विभिन्न पत्रिकादिक अनुशीलनसँ स्पष्ट अछि। हुनक साहित्य–साधना निर्वाध गतिसँ प्रवाहित होइत रहलनि तथा ओ जीवनक अंतिम क्षण धरि साहित्य–साधनामे तल्लीन रहलाह जकर साक्षी थिक हुनक अक्षय–साहित्य–भण्डार। मरिपद्म कथा–साहित्यमे प्रवेश कयलनि वैदेहीक माध्यमे, किंतु बिस्तर भेटलनि मिथिला मिहिरमे तथा कथा–जगतमे चिन्हस गेलाह बाल गोविन्द (1953) कथा लऽ कए जे हिनका अविस्मरणीय कथाकार बनादेलक। हुनक कथा परिधिक व्यापकताक अनुमान तँ एहीसँ लगाओल जा सकैछ जे हुनक समसामयिक कोनो एहन पत्रिकादि नहि अछि जाहिमे हुनक कथा नहि प्रकाशित भेल हो।
मरिपद्म माने प्रवाह। मानवीय भावनाक प्रवाह। भाषण ओ लेखनमे प्रवाह। यथार्थताक नाम पर कलाक नाम पर ओ मानवीय भावनाकेँ थकुचि देबाक प्रबल विरोधी रहथि। कथा कहबाक शिल्पमे केवल संदेश देनिहार रहथि जे मानवीयताक हत्या नहि हो। समाजक हर व्यक्ति स्वर हिनक कथादिमे गुंजित होइत अछि चाहे ओ सामाजिक हो वा असामाजिक। सामाजिक यथार्थक मार्मिक मूल्याकंन हिनक कथा साहित्यक वैशिष्टय अछि। उपन्यास एवं कविता सदृश हिनक कथादिमे भावुकताक प्रभुसत्ता भेटैत अछि। एहि सभमे भोगल यथार्थ जीवनक विसंगति, जटिलता, कुण्ठा–संत्रास तथा यथार्थ जीवनक विविध आयामकेँ ओ अभिव्यक्त कयलनि। कविताक समानहि ओ गद्यमे उपमा–उपमानक झड़ी लगा देलनि अछि। आधुनिकताक परिवेशमे परिवर्तित होइत सामाजिक पृष्ठभूमिक यथार्थताक मूल्याकंन हिनक कथाक मर्मज्ञताक अछि। लोक–प्रचलित सहज–संवेद्य, बोध गम्य, सरल, सुकुमार शब्दावली जे मैथिलीमे विलुप्त भेल जा रहल छल ओहि सभक दस्तावेज थिक हिनक कथा जगत, जाहिमे प्रचुर परिमाणमे ओ ओकर प्रयोग भेल अछि।
मरिपद्म कथा–धारामे एक–सँ एक महत्वपूर्ण हिलकोर अनलनि तथा जीवनक महत्वपूर्ण सूक्ष्माति सूक्ष्म धड़कन, शाश्वत एवं सम्प्रतिक समस्याक जीवंत चित्र प्रस्तुत कयलनि। हिनक कथा–साहित्यक वैशिष्टय थिक जे भाषा–शैलीमे रोचकता, गम्भीर दृष्टिकोणमे व्यापकता, धारावाहिकता–भावुकता प्रभुसत्ता, महत्वपूर्ण उद्देश्य हुनक कथामे सर्वत्र उपलब्ध होइत अछि। हिनक कथामे प्रभावोत्मादकता, कल्पनाक प्रौढ़ता, प्रकृति वर्णनक सश्रीकता, कथानक–क्षेत्रक विशालता, विश्वव्यापी अनुभूतिक उद्घाटन तथा पात्रक अंतः स्तलमे प्रवेश करबाक अद्भुत क्षमता अछि। कथा तत्वकेँ सुरक्षित रखैत चरित्रक सूक्ष्मता, वातावरण ओ परिस्थितिक निर्माण कऽ कए उत्कर्ष–विधान हिनक कथाक मार्मिकता अछि। हिनक कथाक दृष्टि ओ दृष्टिओ दृष्टिमे भिन्नतासँ भरल अछि। कथोमे अद्युनातन प्रवृत्तिक रचना आ रचनाकारक खबरि ओ रखैत छलाह चाहे ओ रवीन्द्रनाथ ठाकुर (1861–1941), की जार्ज बनार्ड शाँ (1856–1950) अथवा टी.एस.इलिएट (1888–1964)। हिनक कथामे सामाजिक ओ वैयक्तिक दुनू पक्षक सम्यक रूपसँ चित्रित भेल अछि। ओ कथामे देश एवं अंचलक समस्या पर अपन विचार निर्भीकताक संग प्रस्तुत कयलनि। मरिपद्मक कथा–गद्यक सूक्ष्म रूपेँ विश्लेषण कयल जाय तँ कतिपय आलोचनात्मक कृतिक सम्भावना दृष्टिगत भऽ रहल अछि। मैथिली कथा साहित्यपर पर्याप्त मात्रामे आलोचनात्मक कृतिक अद्यापि अभावे अछि।
मरिपद्मक विशाल कथा–यात्राक परिधि अछि। ई जाहि परिमाण अमे कथा लिखलनि ओहि परिमाणमे अद्यापि मैथिलीमे कोनो कथाकार कथा–रचना नहि कऽ पौलनि। हिनक सम्पूर्ण कथा–यात्रा केँ एकहि संग प्रकाशित करब दुःसाध्य ओ असम्भव थिक, कारण समग्र कथा एक विशाल ग्रंथक आकार लऽ लेत जकर सम्भावना मैथिलीमे नहि दृष्टिगत होइत अछि जे क्यो प्रकाशक एहन विशाल–काय कथा–संग्रह प्रकाशित कऽ पौलाह। मैथिलीक हेतु दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति अछि जे हुनक जीवन–कालमे कोनो कथा–संग्रह नहि प्रकाशित भऽ सकल। एहन साहित्य–मनीषीक साहित्य–साधनाक एहिसँ पैघ पुरस्कार आन किछु नहि भऽ सकैछ जनिक स्मृति पटल पर मरिपद्मक साहित्य अद्यापि आच्छादित कयने अछि। पुस्तकाकार रूपमें हुनक कथा–कृतिक प्रकाशनो परांत हुनक कथा जनित प्रतिभाक वास्तविकताक यथार्थताक मूल्यांकनक सम्भावना अछि।

Suggested citation: प्रो. प्रेमशंकर सिंह. “मणिपद्मक कथा–यात्रा.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 49, 2010-01-01. https://www.videha.co.in/research/2010/49/मणिपद्मक-कथा-यात्रा.htm

मूल विदेह अंक / Original issue