विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मिथिलाक इतिहास (आगाँ)

प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी · 2010-01-01 · अंक 49

२.२.१.शीतल झा-नेपालमे मघेशीकेँ समस्‍या आ सामाधान! २.पाकिस्तान मे सेक्स-विचाकुमार राधारमण
१.चिड़ै-सुजीतकुमार झा२.. कामिनी कामायनी-डाविर्नक बानर३.प्रो. प्रेमशंकर सिंह-मणिपद्मक कथा यात्रा ४.रामलोचन ठाकुर-समकालीन मैथिली-कथाक यथार्थ-उर्फ यथार्थक-कथा
२.४.१.बिपिन झा-आवश्यकता अछि मैथिली शब्दतन्त्र निर्माणक ॥२.गोपाल प्रसाद-फराक मिथिला राज्यक गठन कियक नहि ?
२.५.१.दुर्गानन्द मंडल-बकलेल,२.कपिलेश्वर राउत-छूआ-छूत,३.राजदेव मंडल,रखबार (दोसर भाग)
२.६.१.शरदिन्दु चौधरी-समय–संकेत २.शीतल झा-गामक अधिकारी....भैया....पोखरि....चम्पा फूल.... ३. विजय–हरीश-किछु लघु कथा ४.सुनीता ठाकुर-अपहरणक सच-५.श्रीमति कुमुद झा-उच्चैठ भगवतीक महात्म-६.शम्भू झा वत्स-ग्राहर्स्थ्य जीवनक समस्‍या
२.७.१.मिथिला मे रंगकलाक समकालीन दृष्टि - प्रकाश २.२.राकेश कुमार रोशन-पञ्चैति (कथा)३.भीमनाथ झा-चन्‍दा झा, हरिमोहन झामिलिकऽ४.हेमचन्द्र झा दूटा कथा
२.८.१.सुभाष चन्द्र यादव-पति-पत्नी सम्वाद २.मानेश्वर मनुज-‘जीत’३.(सं. सा. सं)नागेश्वर लाल कर्ण ४.डॉ. रवीन्द्र कुमार चौधरी-विद्यापतिक फोटोकेँ लोक सभामे लगएबाक मांग
२.९.- जीत उपन्यास-जगदीश प्रसाद मंडल
प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी (१५ फरबरी १९२१- १५ मार्च १९८५) अपन सम्पूर्ण जीवन बिहारक इतिहासक सामान्य रूपमे आ मिथिलाक इतिहासक विशिष्ट रूपमे अध्ययनमे बितेलन्हि। प्रोफेसर चौधरी गणेश दत्त कॉलेज, बेगुसरायमे अध्यापन केलन्हि आ ओ भारतीय इतिहास कांग्रेसक प्राचीन भारतीय इतिहास शाखाक अध्यक्ष रहल छथि। हुनकर लेखनीमे जे प्रवाह छै से प्रचंड विद्वताक कारणसँ। हुनकर लेखनीमे मिथिलाक आ मैथिलक (मैथिल ब्राह्मण वा कर्ण/ मैथिल कायस्थसँ जे एकर तादात्म्य होअए) अनर्गल महिमामंडन नहि भेटत। हुनकर विवेचन मौलिक आ टटका अछि आ हुनकर शैली आ कथ्य कौशलसँ पूर्ण। एतुक्का भाषाक कोमल आरोह-अवरोह, एतुक्का सर्वहारा वर्गक सर्वगुणसंपन्नता, संगहि एतुक्का रहन-सहन आ संस्कृतिक कट्टरता ई सभटा मिथिलाक इतिहासक अंग अछि। एहिमे सम्मिलित अछि राजनीति, दिनचर्या, सामाजिक मान्यता, आर्थिक स्थिति, नैतिकता, धर्म, दर्शन आ साहित्य सेहो। ई इतिहास साहित्य आ पुरातत्वक प्रमाणक आधारपर रचित भेल अछि, दंतकथापर नहि आ आह मिथिला! बाह मिथिला! बला इतिहाससँ फराक अछि। ओ चर्च करैत छथि जे एतए विद्यापति सन लोक भेलाह जे समाजक विभिन्न वर्गकेँ समेटि कऽ राखलन्हि तँ संगहि एतए कट्टर तत्त्व सेहो रहल। हुनकर लेखनमे मानवता आ धर्मनिरपेक्षता भेटत जे आइ काल्हिक साहित्यक लेल सेहो एकटा नूतन वस्तु थिक ! सर्वहारा मैथिल संस्कृतिक एहि इतिहासक प्रस्तुतिकरण, संगहि हुनकर सभटा अप्रकाशित साहित्यक विदेह द्वारा अंकन (हुनकर हाथक २५-३० साल पूर्वक पाण्डुलिपिक आधारपर) आ ई-प्रकाशन कट्टरवादी संस्था सभ जेना चित्रगुप्त समिति (कर्ण/ मैथिल कायस्थ) आ मैथिल (ब्राह्मण) सभा द्वारा प्रायोजित इतिहास आ साहित्येतिहास पर आ ओहि तरहक मानसिकतापर अंतिम मारक प्रहार सिद्ध हएत, ताहि आशाक संग।-सम्पादक
मिथिलाक इतिहास
अध्याय–१०
मिथिला आ नेपाल
नेपाल शब्दक उद्गम एखन धरि रहस्यमय अछि। अति प्राचीन कालसँ नेपालक इतिहास मिथिलाक इतिहास संग निकटतम रूपें संबंधित अछि। मिथिला एहेन स्थान रहल अछि जाहिठाम नाना प्रकारक धार्मिक आन्दोलन एवँ दर्शनक उत्पत्ति भेल छैक आर नेपाल ओहि आन्दोलन सबकेँ उर्वरा शक्ति देलकै जाहिसँ वो आन्दोलन सब पुष्पित वो फलदायक भेल। नेपाल मे आर्यत्वक विकास मिथिले बाटे भेलैक। एहि ठाम हम मिथिला आ नेपालक मात्र राजनैतिक सम्बन्धक चर्चा करब।
किरातः- भूतकालक कुहेसक मध्य नेपालक प्रारंभिक इतिहासक विषयमे किछु विशेष ज्ञात नहि अछि। ई. पू. ५९०सँ ११०ई. धरि नेपाल किरात संस्कृतिक प्रधानकेँन्द्र छल। किरातक वर्णन शुक्ल यजुर्वेद मे आएल छैक। इहो कहल जाइत छैक जे अति प्राचीन कालसँ किरात लोकनि पूर्वी नेपाल मे रहैत जाइत छलाह।‘किराते’ शब्द जंगली अनार्य जाति केँ सूचित करैछ जे पहाड़ पर एवँ भारतक उत्तरपूर्वी भाग मे रहैत छलाह। सिल्वाँ लेवीक विचार छन्हि जे किरातक उत्पत्ति मंगोलसँ भेल छल आर दुनु एक्के छलाह। महाभारतसँ ज्ञात होइछ जे जखन अर्जुन हिमालयमे तपस्या करैत छलाह तखन महादेव किरातक भेष मे अर्जुनक परीक्षा लेने छलाह। महाभारतक वनपर्वमे एकटा किरातपर्व सेहो अछि आर यजुर्वेद शतरूद्वीपसँ सेहो एहि पर प्रकाश पड़इयै। भारतक उत्तरी पूर्वी सीमा सेहो किरात संस्कृतिसँ सम्बन्धित छल। ओ सब पूर्वी हिमालयक वासी छलाह। अपन दिग्विजयक क्रममे भीमकेँ विदेश देश छोड़लाक पश्चात किरात सबसँ भेंट भेल छलन्हि। किरात लोकनि पीअर रंगक होइत छलाह। लेभीक अनुसार किरातक सम्पर्क चीन आर म्लेच्छसँ सेहो छलन्हि। रामायणसँ सेहो प्रमाणित अछि जे किरात लोकनि पीअर रंगक होइत छलाह। विष्णु पुराण एवँ मार्कण्डे पुराणसँ ज्ञात होइछ जे ई लोकनि पूर्वी भारत मे रहैत छलाह। वो हिमालयक दक्षिणी मार्ग पर सम्पूर्ण उत्तर–पूर्वी भारतमे, नेपालसँ सटले उत्तरी बिहार मे आ गंगाक उत्तरी भागमे बसि गेल छलाह। ई उएह प्रवेश छल जाहि मध्यसँ चीनक व्यापार भारतक गंगावर्ती धरातलसँ होइत छलैक। नेपाल–मिथिलाक संस्कृतिक इतिहासमे हिनका लोकनिक महत्वपूर्ण स्थान छैक। प्रारंभऽ मे संभऽवतः किरात लोकनि नेपालक स्थानीय राजवंशी छलाह।
नेपाल पर किरात लोकनिक राज्य बहुत दिन धरि छलन्हि। वो लोकनि ई. पू, ६००सँ संभऽवतः नेपाल पर राज्य करैत छलाह। हिन्दू संस्कृतिक विकास मे वो नेपाल मे भारतीय मंगोलियनक प्रमुखताक हेतु सब पृष्ठाधार बनौलन्हि। प्रायः ई.पू.३१२ मे जखन संभूत विजय मरि गेला तखन जैन धर्मावम्बी मे विभाजन भेल आर तकर पश्चात उत्तर भारतमे बारह वर्ष धरि अकाल रहलैक। भऽद्रवाहु नामक एक जैन साधु अकाल भेला पर दक्षिण दिसि चल गेला आ अकाल समाप्त भेला पर घुरला। जैन धर्मसँ छुटकारा लए ओ अपन शेष जीवन व्यतीत करबाक हेतु नेपाल चल गेला। जैनी सबहक जुटान पटनामे भेल आ हुनका तकबाक हेतु स्थूलभऽद्र नेपाल गेला आ ओतए हुनकासँ चौदह पर्व पओलन्हि। गौतम बुद्धक जन्म तँ नेपाल क्षेत्र मे भेल परञ्च ओ नेपाल भ्रमणकेँने छलाह अथवा नहि से कहब कठिन। अशोकक प्रयाससँ नेपाल मे बौद्ध धर्मक प्रसार भेल। कहल जाइछ जे कौटिल्यकेँ सेहो नेपालक पूर्ण ज्ञान छलन्हि। अशोकक समकालीन नेपालमे छलाह स्थुमिको। नेपाल उनक हेतु विशेष प्रसिद्ध छल। लुम्बिनी मे अशोक ४८ गोट स्तूपक निर्माण करौने छलाह आर स्थुमिकोक शासन काल मे वो स्वयं नेपालो गेल छलाह। अशोकक समयमे नेपालक शासन किरात लोकनिक हाथमे छलैक। अशोकक पुत्री आ जमाय नेपाल मे छलाह। अशोकक वादो दशरथक प्रभाव नेपालमे बनल छलैक। नेपाल आ मिथिलाक सम्पर्क मौर्य साम्राज्यक ह्रासक समय धरि बनल छलैक। शूंग कालक मुद्रा पश्चिमी नेपालसँ प्राप्त भेल अछि जाहि आधार पर ई अनुमान लगाओल जाइत अछि जे शुंग लोकनिक एक प्रकारक दुर्वल नियंत्रण नेपाल पर छलन्हि। कुषाण लोकनिक शासन चम्पारण धरि छल आर तिरहूतो पर हुनका लोकनिक प्रभाव छलन्हि। नेपाल पर कुषाण शासन हेबाक समर्थन स्वर्गीय जायसवाल महोदयकेँने छथि। कुषाण मुद्राक पता काठमाण्डु लग सेहो लगलैक अछि तैं जायसवाल महोदयक विचारकेँ मान्यता भेटैत छैक। ‘रधिया’ नामक ग्रामसँ सेहो कतेक रास ताँवाक मुद्रा विम कैडफ्रिसेज आर कनिष्कक भेटल छैक जाइक तँ कुषाण शासनक प्रमाण सिद्ध होइत छैक।
कैक शताब्दी धरि नेपाल पर शासन करैत काल किरात सबकेँ जखन–तखन अनायास विड़रो सबसँ संघर्ष करए पड़लन्हि। राजनैतिक अस्थायित्वक रहितहुँ ओ सांस्कृतिक जीवन आ राजनीतिक नियमक स्थापनामे बहुत किछुकेँलन्हि। किछु विद्वानक मत छन्हि जे इण्डो मंगोलाइड सब सर्वप्रथम भारत पर शासनकेँलन्हि आ तब नेपाल गेला। सुसंस्कृत इण्डो मंगोलाइडक रूपमे नेपालक नेवारक उल्लेख भेल छैक। नेवार लोकनि प्रायः ई. पू. तेसर शताब्दीमे एला। ताधरि अशोक पाटनमे बहुत रास बौद्ध चैत्यक निर्माण कै चुकल छलाह। तहियासँ ओहि क्षेत्रमे बौद्ध धर्मक प्रसार बनले रहल आ बादमे महायान सम्प्रदायक पद्धति ओ विचार सेहो बिहारेसँ ओतए गेल। ओहिठामक शैव, शक्ति आर वैष्णव धर्मक सम्बन्धमे सेहो इएह कहल जा सकैत अछि। ई सभऽ आंशिक रूपमे उत्तरी बिहारक आरंभऽक मंगोलाइडक प्रतिक्रिया स्वरूप छल। आर्यीकरणक पूर्व मिथिला सेहो किरात संस्कृतिक प्रधानकेँन्द्र छ्ल। इण्डोलाइड एकटा सामूहिक संस्कृतिक विकासमे पैघ योगदान देलन्हि।
११०ई.क आसपास किरात वंशक अंत नेपालमे भेल आ तखनसँ लकए २०५ ई. धरि नेपालक इतिहास अन्धकारपूर्ण अछि। एहि बीच कोनो लिखित प्रमाण नहि भेटइयै। गुणाढ़यक ‘बृहकथा’मे नेपाल देशक शिव नामक नगरमे राजा यशकेतुक शासन करबाक उल्लेख भेटइयै। कखन आ कोन प्रकारे किरात लोकनिक ह्रास भेल से हमरा लोकनि नहि जनैत छी आ नेऽ तकर कोनो ठोस सबुते भेटैत अछि। इहो कहल जाइत अछि जे ‘निमिष’ नामक एक गोट राजा नेपालमे विजय प्राप्तकेँने छलाह आ निमिष राजवंश करीब १४५ वर्ष धरि ओतए शासनकेँने छलाह आ एहि वंशमे पाँच गोट राजा भेल छलाह– निमिषम मनाक्ष, काकवर्मन, पशु प्रेक्ष देव, पशु प्रेक्ष देव, आ भास्कर वर्मन। एहि राजवंशक समयमे आर्य लोकनिकेँ नेपालमे पशुपतिनाथक मन्दिरक स्थापनाकेँलन्हि आ भारतसँ आर्यसब केँ अनलन्हि। एकर बाद नेपालमे लिच्छवी वंशक शासन शुरू होइत अछि।
लिच्छवी वंशक इतिहास:- लिच्छवीक सम्बन्ध मनु लिखैत छथि–
“द्विनातयः सर्वणासु जनयन्य व्रतांस्तुयान्।
तांसावित्री परिभ्रष्यनं व्रात्यानितिविनिर्हिशेत्॥
व्रात्यातु जायते विप्रात्पापात्मा भूजकण्टकः।
आवंत्यवाट घानौच पुष्पधः शैख एवचः॥
झल्लोमल्लश्च राजन्याद व्रात्यन्निच्छिवि देवच।
नरश्य करणश्चैव खसाँ द्रविड एवच”॥
(एहि सम्बन्धमे देखु हमर “व्रात्यज इन एंसियेंट इण्डिया”)
लिच्छवी लोकनिक सम्बन्ध नेपालसँ बड्ड घनिष्ट छलैक। किछु विद्वानक विचार छन्हि जे इहो लोकनि मंगोलाइडसँ अदभूत छलाह। नेपालक मल्ल, खास आदिक कोटि मे मनु लिच्छवी (निच्छवी)केँ रखने छथि। लिच्छवी लोकनिक प्रभाव मिथिलामे अत्यधिक विकसित छलैक आ ओतहिसँ ई लोकनि नेपाल धरि अपन शक्तिक प्रसारकेँलन्हि। नेपालमे किरात शासनक संदिग्ध प्रमाण अछि। निमिष वंशकेँ सोमवंशी कहल गेल अछि आ ओकर वादे सूर्यवंशी राज्यक स्थापना भेल।
लिच्छवी लोकनि निमिष वंशकेँ उखाड़ि फेकलन्हि आर तकर बाद लगभऽग ५००वर्ष धरि नेपाल पर शासनकेँलन्हि। नेपाली संवत जे १११ई.सँ आरंभऽ छैक सैह संभऽवतः लिच्छवी लोकनिक राज्यारोहणक संकेत दैत अछि। ओहुना अखन इएह मान्य अछि जे लिच्छवी लोकनि नेपाल मे इस्वीसन् प्रथम शताब्दीक समीप अपन साम्राज्यक स्थापनाकेँने छलाह आ अपन संवतक प्रारंभऽ सेहो। सूर्यवंशी शासनक स्थापनाक पश्चाते नेपालमे यथार्थ एतिहासिक कालक प्रारंभऽ मानल जाइत अछि। दुनु राजवंश मिथिलासँ आएल छल एहि सब राजवंशक समय मे नेपाल आर मिथिला नियमित रूपें राजनैतिक आ साँस्कृतिक सन्दर्भ बनल रहलैक। प्रथम ऐतिहासिक राजा भेलाह जयदेव द्वितीयक बीचमे 33टा राजा भेल छलाह।
समुद्रगुप्तक समय मे नेपाल गुप्त साम्राज्यक चाङ्गुरमे पड़ल छल। प्रयाग प्रशास्तिसँ एकर स्प्ष्टीकरण होइछ– नेपालक सीमांत शासकक सिवा प्राप्त करबाक संदर्भ अछि। सूर्यवंशी लिच्छवी कोनो शासक नेपालमे तखन रहल होयताह जनिका हेतु “प्रयत्न नेपाल नृपति” शब्दक व्यवहार कैल गेल अछि। मिथिलासँ नेपाल धरि तखन लिच्छवी लोकनिक विस्तार छलन्हि आर समुद्रगुप्त लिच्छवी दौहित्र छलाह तैं एहि घटनाकेँ मात्र घरेलु घटना मानल जासकइयै। एहि युगमे नेपालमे वैष्णव वादक प्रवेश भेल। मान देवक चंगुनारायण मन्दिरक शिलालेख एवँ आन–आन शिलालेखसँ ई ज्ञात होइछ जे लिच्छवी राजा लोकनि बौद्ध धर्म, ब्राह्मण धर्म, शैव धर्म, वैष्णव धर्म, शाक्त आदि सबकेँ प्रोत्साहन दैत छलाह। नरेन्द्र देवक शासन कालमे मत्स्येन्द्र नाथ नामक संप्रदायक प्रचलन भेल। लिच्छवीक समयमे महायान शाखा सेहो अपन आकार ग्रहणकेँलक। लिच्छवी लोकनि ३५०सँ ८९९ धरि शासनकेँलन्हि–बीचमे मात्र अंशुवर्मन आर जिश्नुगुप्त छोड़िकेँ जे स्वतंत्र शासनकेँने छलाह।
अंशुवर्मन:- महासामंत अंशुवर्मन सातम शताब्दीक पूर्वाद्धक एकटा महत्वपूर्ण शासक भेल छथि। वो अपनाकेँ महासामंत कहने छथि। वो वेश शक्तिशाली शासक छलाह आर तराई राज्यक विशिष्ट भागकेँ अपना राज्यमे मिला लेने छलाह। अपन राज्यक विस्तार ओ वेतिया धरि कलेने छलाह जतए हुनक साम्राज्यसँ मिलैत छल। प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य चन्द्रवर्मन एवँ नालन्दा विश्वविद्यालयक प्रसिद्ध शिक्षक अंशुवर्मनक दरबारक शोभा बढ़ौने रहथिन्ह। अंशुवर्मन जाहि नेपाल राज्यक स्थापनाकेँलन्हि ताहि परम्पराकेँ जिश्नुगुप्त रखलन्हि आर बढ़ौलन्हि। ६४३मे अंशुवर्मनक मृत्युक पश्चात नरेन्द्र देवक नेतृत्वमे नेपालमे लिच्छवी शासनक पुनर्जन्म भेलैक।
लिच्छवी शासन नेपालमे किछु अवधि धरि रहलैक एकर प्रमाण हमरा मंजूश्री मूलकल्पसँ भेटैत अछि–
“भऽविष्यति तदाकाले उत्तरां दिशिमा श्रृतः।
नेपाल मण्डले ख्याते हिमाद्रे कुक्षिमाश्रिते॥
राजा मानवेन्द्रस्तु लिच्छवीनां कुलोद्भवः।
सोऽपि मंत्रार्थ सिद्धस्तु महाभोगी भऽविष्यति॥
पतनक कारण– “उदयः जिहनुनोह्यंते म्लेच्छानां विविधास्तथा।
अभ्योधे भ्रष्ट मर्यादा बहिः प्राज्ञोपभोजिनः॥
शस्त्र सम्पात विध्वस्ता नेपालाधिपतिस्तदा।
विधा लुप्ता लुप्तराजानो म्लेच्छ तस्कर सेविनः”॥
(राहुलजी द्वारा सम्पादित)
मानदेव लिच्छवी छलाह आ तकर बादो कैकटा लिच्छवी शासक भेलाह। लिच्छवी शासनक प्रसंगक उल्लेख हियुएन संग सेहोकेँने छथि। अंशुवर्मन‘महासामंत’ कहबै छथि जाहिसँ मान होइयै जे जो ६३३ई.धरि लिच्छवी राजाक प्रभुत्वक स्वीकार करैत छलाह। नेपालक वैवाहिक सम्बन्ध सेहो बिहारसँ चलैत छल। सोमदेवक विवाह मौरवरी भोगवर्मनक पुत्री ओ आदित्य सेनक प्रपौत्री वत्स देवीसँ भेल छलन्हि।
अहीर:- मंजूश्री मूलकल्पमे मानदेव द्वितीयक पश्चात राज विप्लवक वर्णन भेटइयै जाहिसँ ज्ञात होइछ जे नेपालमे गोलमाल भेल छल। अहीर लोकनिक आक्रमणसँ नेपाल आक्रांत छल। वंशावलीक अनुसार वो लोकनि भारतक समतलसँ आएल अहीर छलाह। हिनका लोकनि अहीरगुप्त सेहो कहल गेल छन्हि। ५००सँ ५९०क बीच एहिमे पाँचटा शासक भेलाह जाहिमे परमगुप्त पराक्रमी छलाह आ ओ लिच्छवी लोकनिकेँ शिकस्तकेँने छलाह। हुनक एकटा पौत्र सिमरौनगढ़मे शासन करैत छलाह। ओहि राजवंशक दोसर शाखा तराईमे शासन करैत छल। जयगुप्त द्वितीयक मुद्रा चम्पारण आ मगधमे भेटल अछि।
६४३–४४मे जिश्नुगुप्तक पश्चात अहीरवंश दू भागमे बटि गेल छल आ लिच्छवी लोकनि पुनः अपन राज्यकक स्थापना कलेने छलाह। तकर बाद नेपालकेँ तिब्बतमे मिलि जेबाक संभावना बुझि पड़इयै आ मंजूश्री मूलकल्पमे एकर अप्रत्यक्ष प्रमाण अछि। ई उएह समय छल जखन तिब्बती राजा चीनी राजदूतकेँ तिरहूत पर आक्रमण करबाक हेतु साहाय्य भेटल रहथिन्ह आ संभऽव जे ओहिक्रममे नेपाल पर तिब्बती प्रभाव बढ़ि गेल हो। मंजूश्री मूलकल्पसँ ज्ञात होइत अछि नेपाल शासन अन्यायी म्लेच्छ पर निर्भर रहए लागल छल तथा राज्यक प्रथा समाप्त भऽगेल छलैक। तिब्बती शासक श्राँगक विवाह अंशुवर्मनक बेटीसँ भेल छलैक। ७०३क बाद नेपाल विदेशी शासनसँ मुक्ति पेवाक हेतु माथ उठौलक। धर्मदेवक पुत्र मान देव तृतीय विजयक चारिटा स्तंभऽ निर्मितकेँने छलाह। लिच्छवी लोकनिक पुनरागमनसँ नेपालक सवतोमुखी विकास भेल। ७०५ ई. मानदेव तृतीयक चंगुनारायण अभिलेखसँ ज्ञात होइछ जे ओ मल्ल सबहिक संग युद्ध कएने छलाह आ गण्डक धरि पहुँचि गेल छलाह। स्वंयभुनाथ शिलालेखसँ तत्कालीन संविधान पर सेहो प्रकाश पड़ैत अछि। एहिठाम ई स्मरणीय थिक जे नेपालक लिच्छवी बरोबरि मिथिलासँ सम्पर्क बनौने रखैत छलाह। शिवदेवक विवाह आदित्यसेनक पौत्रीसँ छलन्हि। शिवदेवक जयदेव गद्दी पर बैसलाह आ हुनक पदवी छलन्हि‘परचक्रकाम’। जयदेव शक्तिशाली शासक छलाह। शिवदेव अपना शिलालेखमे अपनाकेँ–“भऽद्धारक महाराज लिच्छवी कुलकेतु” कहने छथि। जयदेवकेँ कश्मीर धरि विजयक श्रेय देल जाइत छन्हि। जयदेव मिथिलाक सीमा धरि अपन रज्यक विस्तारकेँने छलाह आ हुनक सम्पर्क पाटलिपुत्र आ गौड़सँ सेहो बढ़िया छलन्हि।८७९–८८०मे राघव देव नेपालक संवत चलौलन्हि मुदा हिनका जयदेवसँ कोन सम्बन्ध छलन्हि से हमरा लोकनि नहि जनैत छी।
लिच्छवीक पश्चात नेपालक ठाकुरी राजवंशक सम्पर्क अपना सबहिक क्षेत्रसँ बढ़िया छलैक। नेपालमे महायानक प्रधानता छल आ ओहिठामक विद्यार्थी नालंदा (आ बादमे विक्रमशिला)मे पढ़बाक हेतु अवैत छलाह। पालवंशक समयमे ई सम्बन्ध आ घनिष्ट भऽगेल। रमेश चन्द्र मजुमदारक मत छैन्ह जे इमादपुर (मुजफ्फरपुर)मे जे पाल अभिलेख भेटल अछि ताहि पर जे संवत ४८मे पढ़ल गेल अछि से भ्रामक अछि आर ओकरा नेपाली (नेवारी) संवत–१४८ बुझबाक थिक जे १०४८ई.क बरोबरि होइत अछि आ जखन मिथिला पर महिपाल प्रथम शासन करैत छलाह। सब तथ्यक स्पष्ट अध्ययनकेँला उत्तर हुनक मंतव्य छन्हि जे मूर्तिक समर्पितकेँनिहार व्यक्ति नेपाल वासी रहल होयताह आ तैं ओ नेवारी संवतक व्यवहार कएने छथि। १०३८मे नेपाली लोकनि मिथिला बाटे विक्रमशिला गेल छलाह आ ओतएसँ अनीशक नेपाल पहुँचलाक बाद नेपाली महायानमे तंत्रक प्रवेश भेलैक। एग्यारहम शताब्दीमे नेपाल आंतरिक रूपें बटि गेल तीन राज्यमे–पाटन, काटमाण्डु आ भातगाँव आ ओहिठामकेँन्द्रीय सत्ताक सर्वथा अभाव भऽगेल आ एहिसँ लाभऽ उठाकेँ विभिन्न राज्यक आक्रमण नेपाल पर शुरू भऽगेलैक। चालूक्य, कलचुरी, यादव, जैतुंगी आदिक शिलालेखसँ ज्ञात होइछ जे ई सब नेपाल पर आक्रमण कएने छलाह। एहि स्थितिसँ लाभऽ उठाए नान्यदेव सेहो नेपाल पर आक्रमणकेँलन्हि। नान्यदेव नेपाल पर मिथिलाक आधिपत्य स्थापित करबामे समर्थ भेलाह। राजकरैत शासक सबकेँ पदच्युत कै वो अपन राजधानी भातगाँवमे बनौलन्हि। नेपाली परम्पराक अनुसार वो काठमाण्डुक जगदेव मल्ल एवँ पाटन–भातगाँवक आनंद मल्लकेँ बची बनौलन्हि आ जे सब हिनक प्रभुत्व स्वीकारकेँलन्हि हुनका ई माफ क देलथिन्ह। नेपाल नान्यदेवकेँ कहियो चैन नहि भेटलन्हि आ बरोबरि किछु ने किछु खटपट होइते रहलैन्ह। एकमत इहो अछि जे नान्यदेवकेँ पुनः दोसर वेर (११४१मे) नेपाल पर आक्रमण करए पड़लन्हि। नान्यदेवक प्रभुत्व तँ नेपाल पर बनल रहलैन्ह मुदा हुनक उत्तराधिकारी लोकनि ओकरा रखबामे समर्थ भेलाह कि नहि से एकटा संदिग्ध विषय। परम्परानुसार नान्यदेवक एकटा पुत्र नेपालपर शासन करैत छलाह। संभऽवतः मल्लदेव एहिठामक शासक छलाह आ भीठ भऽगवान पुर धरि हिनक राज्यक प्रसार छल। नरसिंह देवक समयमे मिथिला आ नेपालमे फेर खटपट भेलैक आ दुनु राज्य अलग भऽगेल। मिथिलासँ नेपाल पृथक भऽगेल। नान्यदेवक वादहिसँ नेपालमे कर्णाट शासन दुर्बल भऽगेल छलैक आ नेपालमे कर्णाट शासनकेँ ठाकुरी राजा लोकनि उखाड़ि फेकने छलाह। एहि आस पासमे नेपालमे मल्ल लोकनिक उत्थान सेहो देखबामे अवइयै। ई वंश अरि मल्लदेवसँ शुरू होइछ। नीलग्रीव स्तंभऽ अभिलेखसँ ज्ञात होइछ जे धर्ममल्ल आर रूपमल्ल नेपालक मल्ल लोकमोक पूर्वज छलाह। एहि वंशक प्रमुख शासक छलाह अरि मल्लदेव।
मल्ल लोकनिक प्रभुत्वक कालमे मिथिलाक मंत्री चण्डेश्वर नेपाल पर आक्रमणकेँलन्हि आ नेपालक राजाकेँ पराजितकेँलन्हि। चण्डेश्वरक ‘कृत्य रत्नाकर’मे सेहो एकर विवरण अछि। वाग्मतीक तट पर एहि उपलक्षमे तुलापुरूष दानक उल्लेख सेहो अछि। १३१४मे नेपाल पर दक्षिणसँ (मिथिला) चढ़ाईक प्रमाण स्पष्ट अछि। हरिसिंह देव पराजित भेला उत्तर नेपाल गेला आर नेपाली शासक बिना प्रतिरोध आत्मसमर्पणक देलखन्हि। हरिसिंह देवमे भातगाँवमे सूर्यवंशी राजवंशक परिपाटी स्थापितकेँलन्हि। ओ अपन शक्तिकेँ नेपालमे पुनः संगठितकेँलन्हि आ कर्णाट प्रभुत्वक स्थापना सेहो। भातगाँवसँ ओ शासन करैत छलाह आ ओतहि ओ तुलजादेवीक मन्दिरक स्थापनाकेँलन्हि। नेपालमे हुनक सार्वभौम होएबाक निम्नलिखित अभिलेखसँ स्पष्ट अछि–
“जातः श्रीहरिसिंह देव नृपति प्रौढ़ प्रतापोरयः।
तद्वंर्श विमले महारिपुहरे गाम्मीर्यरत्नाकरः॥
कर्त्तायः सरसामुपेत्य मिथिलां संलक्ष्य लक्षाप्रियो।
नेपाले पुनरोध वैभऽवयुते स्थैर्य विधते चिरम्॥
हरिसिंह देवक नेपाल आक्रमणक प्रश्न पर इतिहास कार मध्य काफी मतभेद अछि। लुसिआनो पेतेकक विचार छन्हि जे मल्ल लोकनि स्वतंत्र छलाह आ अपनाकेँ महाराजिधराज परमेश्वर परमभऽद्दारक कहैत छलाह जाहिसँ ई मान होइछ जे हुनका लोकनि पर कोनो विदेशी सत्ताक शासन नहि छलन्हि। मिथिला पर चण्डेश्वर द्वारा आक्रमणक बातकेँ ओ मनैत छथि परञ्च ओ इहो कहैत छथि जे ओहि आक्रमणक फले मिथिलाक आधिपत्य नेपाल पर नहि भेलैक। मिथिलासँ भागला पर ओ नेपालमे अपन राज्य बनौलन्हि तकरा वो नहि मनैत छथि। एकटा वंशावली पोथीक आधार पर इहो सिद्ध कएने छथि जे हरिसिंह देव नेपाल पहुँचलाक बाद मरि गेला आर रजगाँवक माँझी मारो हुनक पुत्रकेँ गिरफ्तार कए वंदी बना लेलकन्हि आ धन–वित्त छीनि लेलकन्हि। एवँ प्रकारे हरिसिंह देवक वंश एहिठाम समाप्त भऽगेलैन्ह।
लुसिआनो पेतेकक मतकेँ हम ओहिना राखि देने छी जेना वो लिखने छथि। इहो कहल जाइत अछि जे ओहि समयमे पश्चिमी नेपालसँ आदित्यमल्लक आक्रमण सेहो भेल छल। तिरहुतिया जगतसिंह सेहो किछु दिनक हेतु नेपालमे राज्यकेँने छलाह। एक विद्वानक अनुसार हरिसिंह देवक परिवार एवँ हुनक उत्तराधिकारी हुनका वादो नेपाल पर शासनकेँलक। उत्तराधिकारी लोकनिक नाम एवँ प्रकारे अछि–
i. मतिसिंह–(१३१५–६९)–सिमरौनगढ़क राजगद्दी पर सेहो राज्यकेँलन्हि आर नेपाल पर सेहो। चीनक सम्राट सिमरौनगढ़ शासककेँ मान्यता दैत छलथिन्ह। शमशुद्दीन इलियास जखन नेपाल पर आक्रमण करबाक हेतु बढ़लाह तखन ओ सिमरौन गढ़क शासककेँ सेहो परास्तकेँलन्हि आ ओहि बाटे नेपाल गेलाह। मतिसिंहक नाम पर मोतिहारी अछि।
ii. शक्ति सिंह
iii. श्यामसिंह– हिनका कोनो पुत्र नहि भेल आ हुनक पुत्रीक विवाह मल्लवंशक राजकुमारसँ भेल। मतिसिंहक ओतए चीनक दूत आएल छल। चीनक सम्राटक ओहिठामसँ एकटा मोहर सेहो आएल छलैक आ शक्तिसिंहक ओहिठाम सेहो एकटा चीनी सम्राटक मोहर आ पत्र आएल छलैक। श्यामसिंहक राज्यारोहनक चीनी सम्राटक हाथे भेल छल। एहितथ्य सबसँ प्रत्यक्ष अछि चीनी सम्राट एहि कर्णाटवंशीयकेँ नेपालक सार्वभौम राजा बुझैत छलाह। अहु सम्बन्धमे पेतेकक मत अछि जे ई सब बात गलताथिक। १३८२ ई. क इथाम बहाल अभिलेखसँ स्पष्ट होइयै जे मदन रामक पुत्र स्जक्तिसिंह नेपाली अनेक रामक वंशज छलाह ने कि कर्णाट वंशीय। नेपालक इतिहास मे अहुखन कतेको मतभेद अछि आ रहत।
रज्जलदेवीक पति जयार्जुनक शासनकालमे जयस्थिति मल्ल द्वारा राज्य शासनमे नियम विरूद्ध विप्लव कैल गेल। जयस्थितिकेँ सिमरौनक हरिसिंह देवक वंशज कहल गेल अछि। नायक देवी आ जगतसिंहक पुत्री रज्जलादेवीसँ जयस्थिति विवाहकेँलन्हि। जयस्थिति जयार्जुनकेँ पराजित कए नेपालक राजा भेलाह। ओ सूर्यवंशी कर्णाटक योग्य प्रतिनिधि सिद्ध भेलाह। पृथ्वीसिंहक आधिपत्य स्थापित होयबाक समय धरि हुनक वंश शासन करैत रहल। जयस्थितिमल्लक संग रज्जल्ला देवीक विवाह भेलासँ तीनटा शक्तिशाली शासक परिवार–ठाकुरी, कर्णाटओ मल्ल संयुक्त भऽगेल। जयस्थितिमल्ल शक्तिशाली शासक छलाह। हुनक उत्तराधिकारी यक्षमल्ल अपन अधिकार मिथिला धरि बढ़ौलन्हि। ओ अपन प्रतिद्वन्दीकेँ हराय राज्यकेँ चारि भागमे विभऽक्तकेँलन्हि।
__ i. भातगाँव – अपन ज्येष्ठ पुत्र राज्यमल्लकेँ
__ ii. बनेया – रणमल्लकेँ
__ iii.काठमाण्डु – रत्नमल्लकेँ
__ iv.पाटन – अपन पुत्रीकेँ।
एकर परिणाम भैल नेपालक सर्वनाश। सत्रहम शताब्दीमे नेपाल अनेकानेक जागीरमे बँटि गेल। सबसँ पूबमे किरात प्रदेश छल जाहिमे दूध कोशीक समतल, ओकर शाखा तथा सून कोशीक पूबमे तराईक किछु भाग सेहो छलैक।
मुसलमानी आक्रमणः- ऐतिहासिक सम्पर्क पकड़बाक हेतु पुनः ईस्वीसन् चौदहम शताब्दीक चर्चा करए पड़ैत अछि। कहल जाइछ जे अलाउद्दीन खलजी सेहो अपन प्रभाव नेपाल धरि बढ़ौने छलाह यद्धपि एकर कोनो ठोस प्रमाण हमरा लोकनिकेँ उपलब्ध नहि अछि। १३४६–४७मे बंगालक शासक शमसुद्दीन हाजी इलियास नेपाल पर आक्रमणकेँलन्हि आ एहिबातक उल्लेख स्वयंभूनाथक अभिलेखमे अछि। एहि शिलालेखक अनुसार हाजी इलियास काठमाण्डुकेँ घेर लेलक, शहरमे आगि लगादेलक, लूट पाट मचौलक एवँ मूर्त्ति सबकेँ ध्वस्तकेँलक। शिलालेखक तिथि अछि नेवारी ४९२=१३७१–७२ई.–मन्दिर पुनः निर्मित भेलैक आ स्तूप पुनर्स्थापित भेल आ ओकर समारोह मनाओल गेल। एहि शिलालेखक संपादनकेँ.पी.जायसवालकेँने छथि। तकर बादसँ पुनः कोनो आक्रमणक उल्लेख नहि भेटैत अछि।
मल्लक शासनः- जयस्थितिक चर्च हमर पूर्वहि कचुकल छी। हुनक उत्तराधिकारी छलाह जगज्योतिमल्ल। ओ मैथिल वंशमणिक मिलिकेँ ‘संगीत भास्कर’ नामक पुस्तकक रचनाकेँने छलाह। हुनक उत्तराधिकारी ज्योतिमल्ल भेला आ हुनक यक्षमल्ल। यक्षमल्ल अपन अधिकारक विस्तार समतल भूमि दिसि सेहोकेँलन्हि। यक्षमल्लक तृतीय पुत्र रत्नमल्ल मैथिल ब्राह्मणक प्रभावक अधीन छलाह। रत्नमल्लक उत्तराधिकारी छलाह अमरमल्ल आ हुनक महेन्द्रमल्ल जे चानीक मुद्राक व्यवहार शुरूकेँलन्हि। ओ तिरहूतसँ हानी मंगवैत छलाह।
एम्हर आवि मिथिला आ नेपालक बीचक सम्बन्ध खूब बढ़िया नहि रहल। खण्डवला कुलक राजा महिनाथ ठाकुर अपन राज्य विस्तारक क्रममे मोरंगकेँ जीति लेलन्हि। मिथिला, तिरहूति गीतक प्रचार एहि राजाक समयमे भेल छल। नेपाल तराईक लोग सब खटपट करैत छल आ तै मोरंगक जमीन्दार सबकेँ दबेबाक हेतु औरंगजेब गोरखपुरक फौजदार आ मिथिलाक फौजदारकेँ पठौलन्हि। सत्रहम शताब्दीमे मिथिला आ नेपालमे खटपट होयबाक एकटा कारण मकवानी राज्य ते तराई वो घाटीक उपहिमालय मार्गक सटले दक्षिण आ दक्षिण–पश्चिममे रहैक। एहिठाम एकटा प्रमुख शासक छलाह राजा हरिहर जे बड्ड महत्वाकाँक्षी छलाह। राघवसिंह जखन मिथिलाक राजा भेलाह तखन फेर एहि राज्यकेँ लकए नेपालसँ खटपट शुरू भेल। नेपाल तराईक पंचमहलाक राजा भूपसिंहकेँ युद्धमे हरौलन्हि आ भूपसिंह ओहिमे मारल गेला। दरभंगाक खण्डवला राज्यक सीमा मकवानी राज्यक सीमा मकवानी राज्य धरि पहुँचल। मोरंग राजाक ओतए सेहो मिथिलाक धाख बनल। बंजर सब सेहो तराईक क्षेत्रमे शरणलेने छलाह आ अलीवर्दी हुनका सबहिक विरूद्ध उचित कारवाईकेँने छलाह। बंजर लोकनि भऽपटिआटी टीसनसँ मकवानी राज्यक सीमा धरि पसरल छल।
१७६५मे नेपालमे गोरखा लोकनि शक्तिशाली भऽगेलाह। १८०२ई.सँ नेपालक सम्पर्क इस्ट इण्डिया कम्पनीक अधिकारीसँ भेल जखन कि नेपाली लोकनि हुनकासँ भेंट करबाक हेतु पटना अवैत गेल। नेपाल आ इस्ट इण्डिया कम्पनीक सम्बन्ध मधुर नहि भऽसकल आ दिनानुदिन झंझट बढ़ि गेल। अंग्रेज आ नेपालीक बीच युद्ध भऽइयैकेँ रहल आ ओ युद्ध भेल मिथिला भूमि पर। युद्धमे नेपाली लोकनि अपन अधिकारक विस्तार तराईमे छपड़ा (सारन) धरिक चुकल छलाह। चारूकात लड़ाई प्रारंभऽ छल। सारनसँ कोशी धरि आ वीचमे मकवानी होइत अंग्रेजक एकटा टुकड़ी नेपालक राजधानी दिसि बढ़ल। लड़ाईक भीषण रूप देखि गजराज मिश्र शांतिक वार्त्ता चलौलन्हि। १८१५मे एक समझौताक अनुसार ई निश्चित भेलैक जे नेपालकेँ ओहिभूमि पर अधिकार छोड़ि देवाक चाही जाहि पर ब्रिटिशक कब्जा भऽगेल छलैक। एहि संधिसँ कोनो संतोषजनक परिणाम नहि बहरेलैक। १८१६मे पुनः मकवानी पुर लग फेर भिड़ंत भेलैक आ गोरखा पराजित भेल १८१४ई.२८ नवम्बरक सुगौलीक संधिकेँ जखन गोरखा लोकनि बिना कोनो शर्त्त स्वीकारकेँलन्हि तखनहि अंग्रेज युद्धवंदी घोषणा १८१६मेकेँलन्हि। एवँ प्रकारे अंग्रेज आ नेपालक बीच संघर्षक मुख्य स्थल मिथिले रहल आ सुगौलीक सन्धिक पश्चात दुनु राज्यक वीचक सम्बन्ध सुधरल।
अध्याय–११
मुल्ला तकियाक वयाजक अनुसार मिथिलाक इतिहास
मुल्ला तकिया अकबरक समकालीन छलाह आ ओ अपन असमक भ्रमणक क्रममे मिथिला बाटे गेल छलाह। ओ मिथिलामे जे देखलन्हि–सुनलन्हि से आ अन्यान्य साधन केँ आधार अपन एकटा ‘वयाज’ (डायरी) लिखलैन्ह जे मिथिलाक इतिहासक अध्ययनक हेतु सर्वथा अपेक्षित अछि। एहि वयाज पर आधारित एकटा विस्तृत निबन्ध पटनाक मासिर पत्रिकामे १९४६मे छपल छल आ दरभंगासँ प्रकाशित डॉ. लक्ष्मण झा द्वारा संपादित साप्ताहिक मैथिली “मिथिला” (२ फरबरी, ९ फरबरी आर १९ फरबरी १९५३क अंक सब)मे सेहो एकरा पर आधारित किछु अंश प्रकाशित अछि। मिथिलाक इतिहासक हेतु ई एकटा अपूर्व साधन मानल जा सकइयै आ एकर उपयोग हम अपन ‘हिस्ट्री ऑफ मुस्लिम रूल इन तिरहूत’मे सेहो कैल अछि। मैथिली पाठकक हेतु हम एहिठाम मुल्ला तकियाक वयाजक सारांश उपस्थित क रहल छी। मिथिला पर मुसलमानी राज्यक विस्तारक अध्ययन क्रममे सेहो एकर विवरण भेटत।
वयाजक अनुसार राजा लक्ष्मणसेन पर आक्रमणक पूर्व वख्तियार खलजी मिथिलाक किछु भाग पर आक्रमण कयने छलाह। मिथिलाक राजा नरसिंह देव बंगालक राजा लक्ष्मण सेनक अधीन शासन करैत छलाह। पाछाँ ओ मुसलमान राजाक अधीनता स्वीकारकेँलन्हि आ तखनसँ ओ मुसलमान शासक गियासुद्दीन इवाजक समय धरि कर दैत रहलाह। १२२५मे जखन इल्तुतमिश बंगाल पर आक्रमणकेँलन्हि तखन गियासुद्दीन इवाज हुनकासँ मेल कलेलन्हि। बिहारकेँ बंगालसँ फराक कए फुटे प्रांत बना देल गेल आ मल्लिक अलाउद्दीन जानीकेँ ओहिठामक राज्यपाल नियुक्त कैल गेल। इल्तुतमिसक घुरला पर गयासुद्दीन नरसिंह देवक मदतिसँ पुनः बिहार पर आधिपत्य स्थापित कलेलन्हि। बदला लेबाक विचारसँ सुल्तानक बंगाल पर आक्रमणकेँलन्हि आ गियासुद्दीन मारल गेला। नतसिंह देव हुनकासँ माँफी माँगिकेँ अपनाकेँ छोड़ोलन्हि आ कर देवाक वचन देलन्हि। रजिया बेगमक शासन कालमे बंगाल पुनः दिल्लीक नियंत्रणसँ मुक्त भऽगेल। राजा नरसिंह देव सेहो विद्रोह क देलन्हि तुगलक तुगान खाँ मिथिला विद्रोहकेँ दबेबाक हेतु पठाओल गेलन्हि आ ओ ओहि राज्य पर अपन सत्ता स्थापित कए बहुत रास वस्तुजात लूटिकेँ लगेलाह। मिथिलाक राजा बहुत दिनधरि नजरबन्द रहलाह। १२४४मे ओ चंगेज खाँक आक्रमणक समयमे ओ अपन बहादुरी देखौलन्हि आ तकर पुरस्कार स्वरूप हुनका सुल्तान अलाउद्दीन मसूद प्रसन्न भऽए तिरहूत राज्य घुरा देलथिन्ह आ हुनका एकटा सम्मानित राजा घोषित कए बिदाकेँलथिन्ह। मिथिलाकेँ सूबेदारक मातहदीसँ हटा देल गेल आ एकरा सोझे दिल्लीक अधीन कलेल गेल। आव ई अपन कर दिल्लीकेँ देवए लगला। ‘तबाकते नासिरी’मे एहि आक्रमणक वर्णन अछि। विद्यापति सेहो अपन‘पुरूष परीक्षा’मे नरसिंह देवक दिल्ली प्रवासक चर्चा कएने छथि। हिनक पुत्र रामसिंह देवक समयमे सेहो किछु संघर्ष भेल छल। हिनके समयमे दरभंगामे राम चौक नाम मोहल्लाक स्थापना भेल।
अलाउद्दीनक समयमे मिथिला पर पुनः मुसलमानी आक्रमणक चर्च भेटैत अछि। इतिहासमे एकर उल्लेख आनठाम नहि भेटैत अछि मुदा मुल्लाकवयाजमे एकर विस्तृत विवरण अछि। एहि आक्रमणक अंतर्गत मखदून ताज मोहम्मद फकीहक पुत्र शेख मुहम्मद इस्माइलक नेतृत्वमे तीन वेर युद्ध भेल छल। पहिल एवँ दोसर वेर शाही सेना पराजित भऽगेल छलाह आर मिथिलाक जीत भेल छल। प्रथम लड़ाईक स्थान दरभंगामे अखनो “मुकबेश” नामसँ प्रसिद्ध अछि। शेख मुहमद इस्माइल जखन राजा दोसर बेर आक्रमण करबाक विचारकेँलक तखन सेना पठेबाक हेतु बादशाहसँ निवेदनकेँलक। रजीउल मुल्क मलिक महमूदक सेना पतित्वमे शाही फौज मिथिलाक धरती पर उतरल। अहुबेर हुनका अपने सन मुँह लकए पराजित भऽकए घुरे पड़लैन्ह। ई लड़ाई जाहि स्थान पर भेल छल ताहि स्थान पर राजा अपन राजधानी दरभंगासँ उठाकेँ लगेला। शक्रसिंहक नाम पर ओ स्थान सम्प्रतिसकरी नामसँ विख्यात अछि। तेसर वेर पुनः युद्ध भेल जाहिमे मिथिलाक पराजय भेल आ राजा अपन मंत्री सबहिक संग पकड़ल गेला। गिरफ्त भेला उत्तर राजा क्षमा याचनाकेँलन्हि आ आजीवन कर देबाक वचन देलन्हि। एहिशर्त्त पर अलाउद्दीन हुनका राज्य घुरा देलथिन्ह। वादमे शक्तिसिंह (शक्रसिंह) अलाउद्दीन हिन्दू फौजक सेना पति सेहो नियुक्त भेल।
जखन अलाउद्दीनकेँ हम्मीर देवसँ युद्ध भेलन्हि तखन शक्रसिंह अलाउद्दीनक आर्थिक आ सैनिक साहायता देलन्हि। शक्रसिंह स्वयं रणक्षेत्रमे उतरलाह आ एहिसँ अलाउद्दीनकेँ बड्ड बल भेटलन्हि। शक्रसिंह एवँ प्रकारे निथिलाक स्वतंत्रताकेँ सुरक्षित रखबामे समर्थ भेलाह। दरभंगाक ‘सुखी दिग्घी’ अखनो शक्रसिंहक स्मारक स्वरूप अछि।
हरिसिंह देव कर्णाट वंशक अंतिम राजा छलाह आ हरिसिंह पुर सेहो अपन राजधानी बनौने छलाह। गयासुद्दीन तुगलक जखन बंगालक विद्रोहकेँ दबाकेँ घुरलाह तखन ओ तिरहूत पर ध्यान देलन्हि। तिरहूतक राज्य ओ दखलकेँलन्हि। कहल जाइत अछि जे तिरहूतक राजा बंगालक मदतिमे छलाह। हरिसिंह देव अपन मजबूत किला, कठिन रास्ता ओ दुरूह जंगल आदिक बमे पहिने तँ गयासुद्दीनक विरोधकेँलन्हि परञ्च बादमे पराजित भऽए पकड़ल गेलाह। सुल्तान हुनका पकड़िकेँ दिल्ली लगेला आ मिथिलाक शासन भार अहमद खाँक हाथमे देलन्हि। गयासुद्दीनक मुहम्मद तुगलक दिल्लीक शासक भेलाह। राज्याभिषेकक अवसर ओ हरिसिंह देवकेँ मुक्त क देलैन्ह। हरिसिंह देव कर देवाक बचन देलन्हि तखन हुनका राज्य घुरा देल गेलैन्ह आ ओ प्रमुख सेनापतिक पद पर सेहो नियुक्त भेलाह। ई सब भेलाक बाद सुल्तानकेँ बुझबामे एलन्हि जे राजाक मंत्री वीरेश्वर ठाकुरक संग एक विचित्र पाथर छन्हि जकर संसर्गसँ सब प्रकारक धातु सोना भऽजाइत अछि। ई पाथर अलाउद्दीन खलजीकेँ नहि देल गेल छल। सुल्तान आदेश बाहरकेँलन्हि वाजाप्ता एक फरमान द्वारा जो ओहि पाथरकेँ शाही खजानामे जमा क देल जाइक। वीरेश्वर जखन पाथरक बदलामे हीरा उपस्थितकेँलन्हि तखन सुल्तान ओकरा लेबासँ अस्वीकारकेँलन्हि। तकर बाद वीरेश्वर बजलाह जे काशीमे गंगा स्नानकेँलाक उत्तर ओ ओहि पाथरकेँ शाही खजानामे जमा करताह। शाही सरंक्षणमे वीरेश्वरकेँ काशी आनल गेल। काशी एवाक पूर्व ओ राजा हरिसिंह देवसँ सेहो भेंटकेँलन्हि आ काशीमे स्नान करबाक क्रममे ओ पाथरकेँ गंगेमे राखि देलन्हि। शाही संरक्षक एहि प्रसंगकेँ लकए हरिसिंह देवक शिकायत सुल्तान लग कदेलक। एहि पर मिथिला राज्य जप्त भेल आ हरिसिंह देवकेँ कारावासक आदेश भेटल। एहिबातक सूचना राजाकेँ पहनहि भेट गेलन्हि आ ओ तरत पड़ाएकेँ नेपाल चल गेला। बादमे हुनक पता नहि लागल। मिथिलाकेँ तुगलक साम्राज्यमे मिला लेल गेल। सुल्तान तिरहूतकेँ एक अलग प्रांत बना देलैन्ह आ तिरहूतक महत्व बढ़ल आ दरभंगा ओकर राजधानी बनल। तिरहूतकेँ तुगलकपुर सेहो कहल गेल। ओतए एकटा किला आ जामा मस्जिदक स्थापना भेल।
१३४०मे मुहम्मद तुगलक मिथिलाक शासन भार कामेश्वर ठाकुरकेँ देलन्हि। बंगालक शासनक भार सुल्तान शमसुद्दीन हाजी इलियासकेँ देलन्हि। मिथिलासँ कर वसूली करब आ राजा पर निगरानी रखबाक भार सेहो हिनके पर देल गेलैन्ह। कामेश्वर ठाकुर ओइनी गामक रहए वाला छलाह आ ई गाम हुनका पूर्वजकेँ कर्णाट शासकसँ जागीरक रूपमे भेटल छलैन्ह। कामेश्वर ठाकुर राज्य प्राप्तकेँला उत्तर अपनहि गामकेँ राजधानी बनौलन्हि। मुहम्मद तुगलकक जीवैत हाजी इलियास अपन निवास दरभंगामे रखलक परञ्च मुहम्मद तुगलकक मुइलाक बाद ओ अपनाकेँ स्वतंत्र घोषित कए देलक आ कर देव सेहो बंदक देलक। अपन साम्राज्य क्षेत्र विस्तारक योजनाक क्रममे ओ अपन आधिपत्य स्थापित कदेलक। ओ मिथिलाक राजाक संग युद्ध कए मिथिलाक राज्य रहल आ ओकर दक्षिणमे इलियासक राज्य भेल। एवँ प्रकारे नेपाल तराईसँ बेगूसराय धरि ओ अधिकारक स्थापनाकेँलक आ कामेश्वर वंशकेँ ओइनीसँ हँटोलक। मिथिलाक एहि अप्राकृतिक बटवाराक विरोधमे कामेश्वर ठाकुर विद्रोहक देलन्हि मुदा ओहि विद्रोहकेँ शख्तीसँ दवाओल गेल। एहि शख्तीसँ विद्रोह दवेबाक क्रममे बहुतो गाम नष्ट–भ्रष्ट भऽगेल। विद्रोह दबौलाक पश्चात ओ बूढी गण्डकक तट पर अपन राज्यक सुरक्षार्थ एकटा प्रशासनिककेँन्द्र बनौलक जे शमसुद्दीन पुर (समस्तीपुर)क नामे ताहि दिनमे प्रसिद्ध छल। गंगाक तट पर ओ हाजीपुर वसौलक आ ओतए एकटा किलाक निर्माण सेहोकेँलक।
फिरोज तुगलककेँ जखन ई सूचना भेटलैक तँ ओ आगि वव्वुला भऽगेल आ समाचार सुनवहि ओ दिल्लीसँ मिथिलाक हेतु विदा भऽगेल। आवत फिरोज गोरखपुर पहुँचल तावत हाजी इलियास अपन बोरिया–विस्तर बान्हिकेँ पण्डुआ दिसि विदा भऽगेल। ओतहु अपनाकेँ सुरक्षित नहि देखि ओ ओतएसँ एकदला दिसि चलगेल। जखन फिरोज मिथिला पहुँचल तखन कामेश्वर ठाकुर तथा छोट–मोट जमीन्दार लोकनि उपहार लकए सुल्तानक समक्ष उपस्थित भेलाह आ हाजी इलियासक लूट–पाटक शिकायतकेँलन्हि। सुल्तान कामेश्वर ठाकुरकेँ पुरस्कृतकेँलथिन्ह। कामेश्वर ठाकुर हुनक अधीनता स्वीकारकेँलन्हि आ कर देवाक प्रतिज्ञाकेँलन्हि। फिरोज मिथिलाक दुनु भागकेँ मिलाकेँ फेर एक कदेलैन्ह आ ओहिठाम अपन काजी नियुक्तकेँलन्हि। सुल्तान ओहिठामसँ एकदला दिसि विदा भेला। १३५३ फिरोज तुगलक कामेश्वर ठाकुरकेँ छोट बालक भोगीश्वरकेँ राजा बनौलन्हि मुदा मुल्ला तकिया एहि प्रसंगमे चुप्प छ्थि। बरनी सेहो एहि विषयमे किछु नहि कहैत छथि। फिरोज विद्रोही इलियासकेँ दबाकेँ जखन घुरला तखन ओ मिथिलामे अपन हाकिम बहालकेँलन्हि। मुल्ला तकिया कोनो स्पष्ट संकेत एहि सम्बन्धमे नहि दैत छथि। मिथिलामे मुसलमानी शासनक प्रसारक सम्बन्धमे जखन विवरण प्रस्तुत करब तखन सब बातक समीचीन व्याख्या करब। एहिठाम तँ मात्र मुल्ला तकियाक वयाजक आधार पर वस्तुस्थितिकेँ उपस्थिति कैल गेल अछि। फिरोज तुगलक पुनः मिथिलाकेँ दिल्लीक एकटा प्रांत बनालेलन्हि आ एहिठामक राजा पुनः दिल्लीक अधीन भऽगेलाह भऽनेऽ हुनका स्वायत्ता प्राप्त रहल होन्हि से दोसर गप्प। कर वसूल करबाक हेतु फिरोज तुगलक एतए अपन आदमीकेँ नियुक्तकेँलन्हि। भोगीश्वर फिरोजक मित्र छलाह।
दरभंगाक उत्पत्तिः- एहि प्रसंगमे दरभंगाक उत्पत्तिक सम्बन्धमे दूएक बात कहि देव आवश्यक बुझना जाइत अछि। दरभंगा शब्दक उत्पत्ति कहिया आ कोना भेल एहि प्रश्न पर अखनो धरि मत विभिन्नता अछिए। तवारिखुल फितरत(फितरतक इतिहास)क अनुसार दरभंगाकेँ बसायवला गयासुद्दीन तुगलक छलाह। हरिसिंह देवकेँ पराजित कए ओ एहि नगरकेँ बसौलन्हि एहेन बुझल जाइत अछि। हरिसिंह देव पड़ायकेँ जंगल–पहाड़ दिसि चल गेल छलाह। सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक अपन आक्रमणक क्रममे हुनका पर कब्जा करबा लेल जंगल कटबा देलन्हि। एहि साफ कैल जंगलक नाम “दारू भंग” राखल गेल। संस्कृतमे “दारू”क अर्थ होइछ लकड़ी आ ‘भंग’क अर्थ भेल काटब, छाटब आ नष्ट करब। चूंकि स्वयं सुल्तान अपना हाथे तरूआरिसँ जंगलकेँ काटिकेँ नष्टकेँने छलाह आ ओहिठाम अपन ओहि स्थानकेँ“दारूभंग” कहल गेल जे क्रमेण दरभंगाक नाम प्रसिद्ध भेल। अखन धरि ई मत सर्वमान्य नहि भेल अछि।
विलियम हण्टर दरभंगी खाँसँ दरभंगाक उत्पत्ति बतबैत छथि। दरभंगी खाँ आईसँ करीब १२५ वर्ष पहिने भेल छलाह आ ओ मुहम्मद रहीम रूहेलाक पौत्र छलाह। हिनक वंशज अखनो दरभंगा बाला सिद्धांत कोनो तरहे मान्य नहि बुझि पड़इयै परञ्च तइयो हम देखैत जे ओमैली सेहो हण्टरेक मतकेँ मानने छथि। दरभंगा ओहिसँ पुरान नगर अछि तैं हण्टर आ ओमैलीक मत अमान्य अछि। सिद्धांत प्रतिपादित कैल गेल अछि जे ‘द्वार–वंग’ अथवा दूर–वंग या दार–ई–वंगलसँ दरभंगा शब्दक निर्माण भेल अछि। दरभंगाकेँ ‘द्वार वंग’क संज्ञा देव उपयुक्त नहि बुझि पड़इयै कारण कोन रूपे एकरा बंगालक द्वार कहल जेतैक? ई बात ठीक जे मध्य युगमे दिल्लीक सेना एहि बाटे बंगाल जाइत छल।
(१६१५–१६४८) मिथिलाक संस्कृत लेखक पण्डित गंगादत्त झा अपन अपन भृंगदूतमे दरभंगा शब्दक उल्लेख कएने छथि–
“तस्याः पाथः परम विमलं सन्निपिया भिरामा–
गारां कामायुध दरभंगा राजधानी मुपेयाः”।
अहुँसँ ई सिद्ध होइछ जे दरभंगीक पूर्वहिसँ दरभंगा नाम प्रचलित अछि। १७७८मे प्रतापसिंह सेहो दरभंगामे अपन राजधानी बनौने छलाह मुदा हुनकासँ १०० वर्ष पूर्वसँ‘दरभंगा’ राजधानीक रूपमे प्रख्यात छल जकर प्रमाण हमरा ‘भृंगदूत’क कविसँ भेटैत अछि। ओहि कविक विवरणसँ इहो ज्ञात होइछ जे दरभंगा (राजधानी) वाग्मती नदीक तट पर स्थापित छल आ ओतए एहेन एहेन सुन्दर भऽवन सब छल जे देखबामे कामदेवक तरू आरि सन लगैत छल। भृंगदूतक आधार ई कहल जा सकइयै जे ‘दरभंगा’ १७म शताब्दीमे एकटा प्रसिद्ध दर्शनीय नगर छल। दरभंगामे ताहिदिनमे मुगल बादशाहक प्रतिनिधि रहैत छलाह आ खण्डवला कुलक राजधानी “भौर”मे छल आ भौर आ दरभंगाक मध्य मधुर सम्बन्ध छल। महाराज माधव सिंहक समयसँ खण्डवला कुलक महाराज लोकनि स्थायी रूपेँ दरभंगामे रहए लगलाह। एक इहो सिद्धांत प्रतिपादित कैल गेल अछि जे ‘दलभंग’सँ दरभंगाक उत्पत्ति भेल अछि–गजरथपुरमे शिवसिंहक पराजय भेला पर ओहि स्थानक नाम ‘दलभंग’ राखल गेलैक कियैक तँ ओहिठाम शिवसिंहक ‘दल’केँ ‘भंग’ कैल गेल छलन्हि। परञ्च अहुमे विशेष तथ्य नहि बुझा पड़ैत अछि।
ओना तँ सब गोटए अपन–अपन तर्क उअपस्थित कएने छथि मुदा कोनो तर्क नेऽ अखन धरि मान्य भेल अछि आ नेऽ ओकरा हेतु कोनो प्रामाणिक साधने उपलब्ध अछि। १७म शताब्दीमे ‘दरभंगा’ नामक प्रचलन ई सिद्ध करैत अछि जे ई नाम बहुत पूर्वहिसँ प्रख्यात रहल होएत। तैं हमर अपन विचार ई अछि जे एहि शब्दक उत्पत्ति गयासुद्दीन तुगलकक समयमे भेल जे ‘दारू’–‘भंग’केँलैन्ह आ ओहि दारूभंगसँ दरभंगा शब्दक विन्यास भेल। ई जखन तुगलक साम्राज्यक एकटा अंग बनल तखन मिथिला तुगलक पुरक नामे प्रसिद्ध भेल आ ओकरे राजधानी भेल ‘दरभंगा’। दरभंगा ताहि दिनमे जंग़ल छल आ तकरा कटबामे सबकेँ डर होइत छलैक तैं गयासुद्दीन अपनहि जखन जंगल काटब शुरूकेँलन्हि तखन आ सबकेँओ मिलिकेँ एहिमे योगदान देलथिन्ह आ जंगल साफ भेलैक आ ओहिठाम तुगलक साम्राज्यक प्रधान कार्यालय बनल। तिरहूतक तुगलक कालीन सिक्का सेहो भेटल अछि।
अध्याय–12
मिथिलाक इतिहासमे मुसलमानी अमल
२९४ सँ ३१६
कर्णाट वंशक समयसँ मिथिलामे मुसलमान लोकनि हुलकी–बुलकी देव शुरू कऽ देने
छल। ७११ ई.जखन सिन्ध पर अरब लोकनिक आक्रमण भेलैक ताहिसँ पूर्वहुसँ अरब
लोकनिक सम्पर्क पश्चिमी आ दक्षिणी भारतसँ छलैक आ ओ लोकनि ओहि क्षेत्रमे
व्यापार करबाक हेतु अवैत छलाह। जखन अरब लोकनि सिन्ध पर आक्रमण केलन्हि
तकर बादहिसँ भारत्क संग राजनैतिक सम्बन्धक शुरूआत मानल जाइत अछि। ७११ सँ १२०० ई.क बीच बहुत रास मुसलमान चिंतक आ संत उत्तर भारतक विभिन्न क्षेत्रमे पसरि गेलाह आ मिथिला क्षेत्र सेहो सूफी लोकनिक एकटा प्रधान केन्द्र छल। ओम्हर पूबमे बंगाल धरि वख्तियार खलजीक समय धरि मुसलमानी प्रकोप बढ़ि चुकल छल आ बिहारोमे गंगा दक्षिण भागमे मगध पर मुसलमान लोकनि अपन आधिपत्य जमा चुकल छलाह। मिथिलेश एकटा भाग बचल छल जाहि पर हिनका लोकनिक नियंत्रण अखन धरि नहि भेल छलन्हि यद्धपि ई लोकनि अहि बातक हेतु सतत प्रयत्नशील रहैत छलाह।
मुल्ला तकियाक वयाजक अनुसार तँ मुसलमान लोकनि बख्तियार खलजीक समयमे मिथिलो पर आक्रमण कएने छलाह यद्धपि एकर कोनो आन प्रमाण ओना नहि भेटैत अछि। गंगाक मार्गसँ जेवा काल किवाँ गंगा कोशीक संगम दिसिसँ भनेऽ ई लोकनि लूट–पाट करैत होथिसँ दोसर कथा मुदा हिनका लोकनिक आधिपत्य तिरहूत पर भेलन्हि छलन्हि। पूबमे मिथिलाकेँ मुसलमानी प्रगतिक पथमे वाधक बुझल जाइत छलैक कारण ताहि दिनमे अहिठाम सशक्त कर्णाट लोकनिक शासन छल आ तैं सब ठामसँ विद्वान लोकनि पड़ायकेँ एतए अबैत छलाह। पश्चिमक मुसलमान लोकनितँ तत्काल मिथिलाकेँ अपना नियंत्रणमे नहि आनि सम्राट परञ्च बंगालक मुसलमान शासक गृद्ध दृष्टि सेहो मिथिलाक स्वतंत्र कर्णाट राज्य पर लगले रहैत छलैक आर तैं जखन कोनो मौका भेटैक तखने वो लोकनि मिथिला दिसि बढ़ि जाइत छलाह। गंगदेवक कर्णाट शासक लोकनिमे ओ शक्ति नहि रहि गेल छलन्हि जाहिसँ ओ लोकनि शक्तिशाली आक्रमणक विरोध करितैथ। १२११ आ १२२९क बीचमे बंगालक विजेता गयासुद्दीन इवाज मिथिलाक राजाक क्षेत्र अपन नाम घुसौलन्हि आ हुनकासँ कर वसूल केनाई प्रारंभ केलन्हि। अहिसँ पूर्व मिथिलाक राजा ककरो सामने नेऽ कर देने छलाह। बंगाल पड़ोसिया होइतहुँ मिथिला पर मुसलमानी आक्रमणक श्रीगणेश केलक।
बंगालसँ तिरहूतमे एबाक हेतु रस्तो सुगम छलैक। कोशी, गण्डक आ गंगाक काते कात तिरहूत होइत बंगाल जाएव–आएव सुगम छल आ तैं ताहि दिन पश्चिम आ पूबक आक्रमण कारी लोकनि अहि मार्गक प्रश्रय लेने छलाह। बीचमे पड़ैत छल तिरहूतक राज्य जे समयानुसार ‘वेतसिवृति’क पालन करैत अपन स्वतंत्रताक सुरक्षाक हेतु यथासाध्य परिश्रम करैत छल। कानूनगोय महोदयकेँ ई बात बुझबामे नहि अवैत छन्हि जे जखन मिथिला आ कामरूपक स्वतंत्र राज्यकेँ वख्तियार नहि जीत सकल तखन ओ तिब्बत दिसि बढ़बाक प्रयास कियैक केलक? वख्तियार खलजीक मूल उद्धेश्य छल प्रांत सबकेँ लूटब आ धन जमा करब तैं कोन प्रांत स्वतंत्र रहल अथवा गुलाम भेल तकर चिंता हुनका नहि छलन्हि। आखोमात्र अपन मात्र स्वार्थ आ महत्वा काँक्षाक पूर्त्तिक हेतु सब काज करैत छ्लाह। पश्चिमसँ एक्के वेर बंगाल धरि मुसलमानी राज्यक प्रसारक देव ताहि दिनमे कि कोनो कम उपलब्धिक बात भेलैक? बंगाल विजयक क्रममे नदीक मार्गक अवलंबनमे मिथिला दक्षिण पूर्वी सीमा देने जँ ओ गुजरल होथितँ कोनो आश्चर्यक गप्प नहि सेनवंशक संग बरोबरि खटपल रहलसँ मिथिलाक ई अंश विशेष काल अरक्षित रहैत छल आ तैं यदि अहि बाटे बंगाल जेबाक क्रममे मुसलमान लोकनि अपन प्रभाव क्षेत्र एकर बिना लेने होथि तँ सँ संभव। परञ्च एतए स्मरण रखबाक अछि जे गयासुद्दीन इवाजक पूर्व धरि कोनो मुसलमान शासक मिथिलाक राजासँ कर नहि वसूल केने छलाह। तैं वख्तियारक पुत्र इख्तियारोक तिरहूत पर आक्रमण लूट–पाटे जकाँ छल कारण ओहिसँ तिरहूत राज्यक अक्षुण्णता एवं अखण्डता पर कोनो आँच आक्रमण विश्वविद्यालयकेँ उहै नष्ट केलक आ अपन बहादुरीक प्रदर्शन कुतुबुद्दीन ऐबकक दरबारमे दिल्लीमे जाके केलक।
बंग कामरूप आ तिरहूतक शासकसँ ऐतिहासिक तौर कर मूलकेँ निहार व्यक्ति छलाह गयासुद्दीन इवाज। कानूनगोएक मत जे तिरहूतक सम्बन्धमे छन्हि जे पूर्णतया भ्रामक मानल जाइत अछि आ ओकर कोनो ऐतिहासिक प्रमाण नहि भेटइयै। अरिमल्लदेव नामक कोनो राजा मिथिलामे नहि भेल अछि आ ओहिकालमे नरसिंह देव अहिठामक शासक छलाह। अहि शंकाक समाधानक हेतु हम प्रोफेसर, कानूनगोएकेँ लिखने छलियन्हि आ हुनके आदेशानुसार डॉ. रमेश मजूमदारकेँ सेहो। श्री मजूमदार महोदय ई लिखलैन्ह जे कर्णाटवंशमे अरिमल्लदेवक नामक कोनो शासक नहि भेल छथि जकर राज्य मिथिलाक पूर्वी भाग ताहि दिनमे लखनावतीक अधिकार भऽ गेल छलैक। कोन आधार पर कानूनगोए महोदय अहि निर्णय पर पहुँचल छथि तकर प्रमाण ओ नहि देने छथि आ अहिकालमे मिथिलाक राज्य तुकड़ा–तुकड़ामे बटबाक प्रमाण हमरा लोकनिकेँ नहि भेटल अछि। यदि ओ सिलवाँ लेवीसँ प्रेरित भए अपन निर्णय बनौने छथि तखन आव एतवे कहि देव उचित जे अत्याधुनिक शोधक आधार लेवी महोदयक मत मान्य नहि अछि।
नरसिंह देवक शासन कालसँ मुसलमानी प्रकोप मिथिलामे बढ़ल सेटा मान्य अछि आ मैथिल परम्परामे सेहो अहिबातकेँ स्वीकार कैल गेल अछि आ विद्यापतिक पुरूष परीक्षा एकर साक्षी अछि। नरसिंह देव पहिल व्यक्ति छलाह जे कर देलन्हि आ दिल्ली आ बंगाल दुनु ठामसँ सम्बन्ध बनौलन्हि। ई सब होइतहुँ ओ अपन स्वतंत्रताकेँ सुरक्षित रखबामे सफल भेला। बछवाड़ाक समीप ब्रह्मपुरा गाममे एकटा मस्जिद अखनहु वर्त्तमान अछि जकरा इल्तुतमिशक प्रचुर मात्रामे दान देने छ्लैक। अहिसँ बुझि पड़इयै जे मिथिलाक अहि क्षेत्र पर इल्तुतमिशक प्रभाव रहल हेतैक आ तखने नेऽ ओ दान हेतैक। इल्तुतमिशक समयमे तुगान खाँ बिहारक राज्यपाल छलाह मुदा ताहि दिनक विहारमे मिथिला सम्मिलित नहि छल। मिथिला बिहारसँ फुटे एक स्वतंत्र राज्य छल जकरा जीतबाक लेल बंगाल आ दिल्ली दुनु समान रूपसँ प्रयत्नशील छलाह। तुगान खाँ अपनाके बंगाल आ बिहारक शासक बनालेलक आ रजिया बेगमसँ ओकर मंजूरी लऽ लेलक। अहि स्थितिकेँ देखि नरसिंह देव पुनः अपनाकेँ स्वतंत्र घोषित कलेलन्हि आ कर देव बन्द कदेलन्हि। मुदा थोड़बे दिनक बाद ओ गिरफ्त भगेला आ दिल्ली लजाएल गेलाह। चंगेज खाँक विरूद्ध अपन बहादुरी देखा ओ पुनः मिथिलाक स्वतंत्रता प्राप्त केलन्हि आ अहि आदेशसँ घुरला जे ओ सोझे दिल्लीकेँ कर देल करौथ।
रामसिंह देवक समयमे मुसलमानी आक्रमणक प्रकोप बढ़ि गेल छी। तुगान खाँक तिरहूत आक्रमण उल्लेख मुसलमानी श्रोतमे भेटैत अछि परञ्च ओहिमे राजाक नाम नहि अछि। कालक हिसाबे तखन रामसिंह देव मिथिला पर शासन करैत छलाह। तुगानक आक्रमणसँ मिथिलाक स्वतंत्रताकेँ धक्का अवश्य पहुँचले परञ्च स्वतंत्रता सुरक्षित रहलै। तुगान प्रचुर मात्रा धन–विन प्राप्त केलक। तिब्बती यात्री धर्मस्वामी जे रामसिंहक शासनकालमे एतए आएल छलाहसँ अपना आँखि सब किछु देखलन्हि आ लिखैत छथि जे मुसलमानी प्रकोपसँ वैशालीक निवासी हड़कम्पित छलाह आ मुसलमानी सेनाक आवागमनसँ जे धुरा उड़ैत छल ताहिसँ सौसे मेघ अन्हार भजाइत छल। तुरूक आक्रमणक संख्या दिन प्रतिदिन बढ़िते जाइत छलैक आ तिरहूतक राजा रामसिंह देव मुसलमानी प्रकोपसँ बढ़िया किलाबंदी करौने छलाह। किछु संस्कृतक पाण्डुलिपिक पुष्पिकासँ सेहो ई ज्ञात होइछ जे रामसिंहकेँ मुसलमान सबसँ संघर्ष करए पड़ल छलन्हि। चारूकातसँ मुसलमानक प्रकोप रहितहुँ रामसिंह अपन पूर्वजक जकाँ मिथिलाक स्वतंत्रताकेँ सुरक्षित रखबामे समर्थ भेलाह आ एहि हेतु हिनक शासन काल मानल गेल अछि।
शक्तिसिंहक समयमे मिथिला पर अलाउद्दीनक आक्रमणक विवरण मुल्ला तकियाकवयाजमे भेटैत अछि परञ्च कोनो आन साधनसँ एकर संपुष्टि नहि होइत छैक। अलाउद्दीनकेँ हम्मीरक विरूद्ध ई सहायता देने छलथिन्ह आ हिनका हम्बीरध्वांत भानुः कहल गेल छन्हि। हिनका संग देवादित्य ठाकुर आ देवादित्यक पुत्र वीरेश्वर सेहो गेल छलथिन्ह। चण्डेश्वरक कृत्यचिंतमणिमे एकर उल्लेख अछि। फरिश्ताक विवरणमे अछि जे अलाउद्दीन समस्त बिहारकेँ जीत लेने छलाह मुदा तहिया मिथिला बिहारसँ भिन्न छल आ बिहार कहलासँ मिथिलाक बोध नहि होइत छल। अलाउद्दीन मिथिलाक व्यक्तित्व आ वैभवकेँ देखि ओकरा मित्र बनौने होथिसँ संभव कारण ओहि मित्रतासँ हुनका कैकटा लाभ छलन्हि। सर्वप्रथम लाभतँ ई भेलैन्ह जे ओ मैथिल शासककेँ अपना पक्षमे कए हम्वीरक विरोधमे ठाढ़ केलन्हि आ देवादित्यकेँ ‘मंत्री रत्नाकर’ पदवीसँ विभूषित केलन्हि। अहि सबसँ बुझि पड़इयै जे ओ बिना युद्ध केनहि मिथिलाकेँ अपना मैत्री भावसँ मिला लेने होयताह आ ओहिठाम अपन प्रभाव क्षेत्र बढ़ौने होयताह। मिथिलामे प्रभाव क्षेत्र बढ़ाएब आवश्यक छल कियैकतँ ओम्हर बंगाल दिसि मुसलमान लोकनि मिथिला पूर्वी दक्षिणी क्षेत्रमे घुसि रहल छलाह।
अहि प्रसंगक विवरणक पूर्व बलबनक संक्षिप्त उल्लेख आवश्यक अछि। कहल जाइत अछि जे अपन बंगाल अभियानक क्रममे बलबन इकालिम–इ–लखनौती तथाअरशाह–इ–बंगालकेँ दबाकेँ अपना अधीनमे केने छलाह आ मुसलमानी बंगालक राज्यपालक रूपमे ओ अपन पुत्र बुगरा खाँकेँ ओतए नियुक्त केलन्हि। बुगरा खाँकेँ ओ कहलन्हि जे अहाँ “दियार–इ–बंगाल”केँ जीतवाक प्रयास करू। किछु गोटएक मत छन्हि जे सोनार गाँवक दशरथ दनुजराय (वंग)क राज्य ‘दिआर–इ–बंगाल’मे छलन्हि। अहिदिआर–इ–बंगालकेँ किछु तिरहूत जिलाक दरभंगा बुझैत छथि जे हमरा बुझबे अप्राँसगिक बुझि पड़इयै कारण अहिठाम दशरथ–दनुअरायक राज्य छल ने कि कर्णाट वंशक। बंगालक द्वारजँ एकरा बुझल जाइकतँ ई क्षेत्र कतहु बंगालक समीप रहल होइत कारण बलबनक समयमे मिथिलामे कर्णाट वंशक राज्य छल आ ओ तीर भुक्तिक नामे प्रसिद्ध छल आ ‘दिआर–इ–बंगाल’क नाम ताधरि प्रचलित नहि भेल छलैक। बलबनक समयमे बिहारकेँ बंगालसँ अलग कैल गेल छलैकसँ बात ठीक मुदा तखन मिथिला बिहारसँ फराकेँ एकटा स्वतंत्र राज्य छल।
१९५५मे महेशवारा (बेगूसराय)सँ फिरूजएतिगिन (१२९०–९२)क एकटा सुप्रसिद्ध एवं अद्वितीय शिलालेख उपलब्ध भेल अछि जकरा हम पूजासँ प्रकाशित करौने छी। फिरोज एतिगीन बंगालक रूकनुद्दीन कैकश द्वारा नियुक्त एक प्रशासक छलाह जे अपनाकेँ ओहि अभिलेख द्वितीय सिकन्दर आ खानक खान। एहि प्रशासकक नामक एक गोट आ अभिलेख लक्खीसराय (मूंगेर)सँ सेहो प्राप्त भेल अछि। रूकनुद्दीन कैकस बलबनक वंशक छल आर मिथिला क्षेत्रमे ओकर अधिकारक प्रसार अहिबात संकेत दैत अछि जे शक्तिसिंह आ हरिसिंह देवक समय बंगालक शासक दक्षिणसँ गंगा पार कए गण्दक धरि बढ़ि चुकल छलाह आ कर्णाट शासककेँ ओहि क्षेत्रसँ धकिया चुकल छलाह। कर्णाट शासक लोकनि बंगालक दबाबसँ तबाह भऽ रहल छलाह। मुल्ला तकिआ अहिबातक उल्लेख नहि कएने छथि मुदा अभिलेख जखन साक्षाते मौजूद अछि तखन दोसर साधनक अपेक्षे कोन? गण्डक क्षेत्रसँ अहि शिलालेखक प्राप्ति अहि बातकेँ स्पष्ट कदैत अछि जे ओहिकाल धरि अवैत–अवैत कर्णाट लोकनिक शक्ति दक्षिणमे क्षीण भऽ चुकल छलन्हि। अहि क्षेत्रमे गंगाक दुनु कात बंगालक सीमा धरि दियारा सब अछि–अहि दियारा सबकेँ संकेत “दियार–इ–बंगाल”सँ होइत होसँ संभव कारण गंगाक दुनु काते बंगाल जेबा–एबाक रास्ता छल। अहि अभिलेखसँ कर्णाट राज्यक वास्तविक विस्तारक सम्बन्धमे प्रश्न उठब–स्वाभाविक बुझि पड़इत अछि। बलबनक बाद बलबनी शाखा बंगालमे स्वतंत्र शासन करए लागल छ्ल आ एतए धरि अपन राज्यक सीमा बढ़ा लेने छल। एकर बाद छिट–पुट ढ़ंगसँ मुसलमान लोकनि एम्हर–ओम्हरसँ हुलकी–बुलकी दैत रहलाह आ लूट–पाट करैत रहलाह। चारूकात मुसलमानी प्रभावक वावजूदो जे मिथिलाक कर्णाट लोकनि अखन धरि अपन स्वतंत्रता सुरक्षित रखने छलाह, ई कोनो कम गौरवक विषय नहि। लखनौती जेबाक बाटमे मिथिला पड़ैत छल आ तैं अहि पर एबा–जेबा कालमे सब केओ अपन किछु ने किछु बनालैत छलाह। संगठित रूपेँ मिथिला पर सुनियोजित आक्रमण केनिहार व्यक्ति छलाह गयासुद्दीन खलजी। सुगति सोपानसँ ज्ञात होइछ मिथिलाक राजनैतिक स्थिति दयनीय भगेल छल। दान रत्नाकरक एक श्लोकमे कहल गेल अछि जे मिथिला म्लेच्छ रूपी समुद्रमे डुबि गेल छल (मग्नाम्लेच्छमहार्णवे. . .)। कहबाक तात्पर्य ई भेल जे हरिसिंह देवक समय तक अवैत मुसलमानी आक्रमणक प्रकोप मिथिला पर बढ़ि गेल छल आ हरिसिंह देव अखन धरि ककरो समक्ष झुकल नहि छलाह जेना ज्योतिरीश्वरक विवरण सँ स्पष्ट होइछ। अपितु हमरा बुझना जाइत अछि जे वो कोनो सुरतानकेँ पराजित सेहो केने छलाह–आव ई सुरतानकेँ छलाहसँ कहब कठिन? नामक अभाव किछु निश्चित नहि कहल जा सकइयै। नाबालिक होएबाक कारणे हरिसिंह देवकेँ बहुत दिन धरि अपना मंत्री सबक अधीनमे रहए पड़ल छलन्हि।
१३२३–२४मे मिथिला पर गयासुद्दीन तुगलकक आक्रमण भेल। मिथिला पर आक्रमणक पूर्व ओ बंगाल पर आक्रमण कएने छलाह मुदा कानूनगोए महोदय कहैत छथि जे ओ पहिने तिरहूत आ तब बंगाल पर आक्रमण केलन्हि। मुदा से मत मान्य नहि अछि। गयासुद्दीनक आक्रमणक विवरण सब मुसलमानी श्रोतमे भेटैत अछि, मुल्ला तकिआमे सेहो आ अहि घटनाक एकटा चश्मदीद गवाह सेहो छथि जनिक पोथी वशातिनुलउन्स अखनो उपलब्ध अछि आ जकर फोटो कॉपी पटनाक काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थानमे अखनो राखल अछि। ओहि पाण्डुलिपिक बारहम पात पर मिथिलाक राजाक सम्बन्धमे कहल गेल अछि जे ककरो कोनो बात नहि सुनलन्हि, तर्क आ बुद्धिसँ काजनहि लेलन्हि आ अनेरो पहाड़ दिसि पड़ा गेलाह–आगि जकाँ पाथरक पाछु नुका गेला मुदा तइयो चकमक करिते रहलाह। इशामीक अनुसार गयासुद्दीन तिरहूत पर आक्रमण केलन्हि आ ओहिठामक राजा एत्तेक भयभीत भगेला जे बिना कोनो प्रकारक विरोध केने भागि गेला। हिन्दू लोकनि सेहो जंगलमे नुका रहलाह। सुल्तान जखन अपनहि हाथसँ जंगल काटब शुरू केलन्हि तखन सैनिक सेहो ओहिमे जुटिगेला आ तीन दिनमे सम्पूर्ण जंगल साफ भगेल। तकर बाद राजाक किला पर चढ़ाई भेल जे सातटा पैघ–पैघ पानि भरल खाधिसँ घेरल छल। किला पर विजय प्राप्त कए राजा धन सम्पत्ति सबटा लूटलन्हि आ विरौधीक हत्या केलन्हि। अहमदकेँ अहिठामक शासक नियुक्त कए ओ ओतएसँ वापस गेलाह। फरिश्ता आ मुल्ला तकिआमे हरिसिंह देवक गिरफ्तारक गप्प झूठ अछि कारणवशातिनुल–उंसक विवरणसँ ई बात कटि जाइत अछि। वशातिनुलउंस (लेखक–इखतिस्सान)क अनुसार–तिरहूतक राजाकेँ प्रचुर सामग्री उपलब्ध छलन्हि, जन–धनक कोनो अभाव नहि छलन्हि, मजबूत किला छलन्हि, नीक व्यक्तित्व छलन्हि मुदा ओ घमण्डे चूर रहैत छलाह आ विद्रोहक भावनाक्ल नेतृत्व सेहो करैत छलाह। राजद्रोह हुनकामे कूटि–कूटिकेँ भरल छल। अहिसँ पूर्वक शासकक प्रति कहियो ओ अपन माथ नहि झुकौने छलाह, नेऽ ककरो मातहदी गछने छलाह आ नेऽ कहिओ पराजित भेल छलाह। सुल्तानक आगमनक सूचनासँ ओ भयभीत भगेला आ संगहि चिंतित सेहो। ओ किकंर्तव्यविमूढ़ भए बैसि गेला। एतेक चिंतातुर आ अपाहिज जकाँ ओ भगेला जे सब किछु रहितहुँ ओ सुल्तानक विरोध करबाक वजाय किला छोड़ि भगवाक घोषणा करैत ओ सबसँ तेज घोड़ा पर चढ़िकेँ भागि गेलाह। भोरमे जे अपनाकेँ सम्राट बुझैत छलाह तिनके स्थिति साँझमे भिखारि जकाँ भऽ गेलैन। ओ ओतए पहाड़ दिसि भगलाह आ अपना पाथरक पाछु नुका लेलन्हि। सुल्तान ओहिठाम बहुत दिन धरि रूकला आ प्रशासनिक व्यवस्था केलन्हि। जे केओ सुल्तानक आज्ञा मानलन्हि हुनका क्षमादान भेटलन्हि आ बाँकीकेँ सजा। सब किछु ठीक ठाक केलाक बाद ओ ओहिठामसँ दिल्ली दिसि विदा भेला। तिरहूत तुगलक साम्राज्यक एकटा अंग बनि गेल आ ओकरा तुगलकपुर सेहो कहल जाइत छल। एवँ प्रकारे कर्णाट कालक गौरव पूर्ण शासनक अंत भेल आ शुद्ध रूपे मिथिलामे मुसलमानी अमल शुरू भेल। एतवा दिन मुसलमान एम्हर–आम्हरसँ हस्तक्षेप करैत छलाह मुदा आव मिथिला दिल्ली सल्तनतक एकटा प्रांत बनि गेल आ एकर स्वतंत्र सत्ता समाप्त भऽ गेलैक जकरा पुनर्स्थापित करबाक प्रयास बादमे शिवसिंह आ भैरव सिंह केलन्हि।
कर्णाट वंशक पराभव भेला पर मिथिलामे ओइनवार वंशक स्थापना भेल आ ई राजवंश तुगलक साम्राज्यक करद राज्य छल। ओना आंतरिक मामलामे जे स्वायतत्ता प्राप्त रहल हौक सँ दोसर बात मुदा वास्तविकता आव इएह जे कर्णाट कालीन स्वतंत्रता लुप्त भऽ चुकल छल आ मुसलमानी प्रभाव मिथिलामे काफी बढ़ि गेल छल। खास ककए तुगलक लोकनिक सम्बन्ध ओइनवार शासकक संग बरोबरि बनल रहलैन्ह आ जखन तुगलक वंशक ह्रास भेल तखन आन–आन शक्ति सब सेहो मिथिलाकेँ धमकावे लागल। बंगाल, जौनपुर, अवध आ दिल्ली सबहिक मुसलमान शासकक नजरि मिथिला पर बनल रहैन्ह आ जखन जे मौका पावैथि सैह हाथ मारि लैत छलाह। कोनो तरहे मिथिलाकेँ चैन नहि छलैक आ बेचारे शिवसिंह आ भैरवसिंहक सत्प्रयासक बादो मिथिला स्थायीरूपेण राजनीतिक क्षेत्र कर्णाटकालीन मर्यादा नहि प्राप्त कऽ सकल। ई तँ धन्य विद्यापति जे अहिवंशक गौरव गाथाक यशोगान कए एकरा अमरत्व प्रदान करेबामे समर्थ भेलाह। गयासुद्दीन तुगलकक समयमे तिरहूतकेँ बंगालसँ फूट करा कए एकटा अलग प्रांत बनाओल गेल छल आ दरभंगामे ओकर राजधानी छल।
ताहि दिनसँ दरभंगा मुसलमानी शक्तिक प्रसारक जे एकटा केन्द्र बनलसँ बनले रहल जा धरि कि ओहि पर अंग्रेजक कब्जा नहि भऽ गेलैक। ओइनवार वंशकेँ तुगलक लोकनिक हाथे राज्य भेटल छलन्हि तैं ओ लोकनि ओहिवंशक उपकृत छलाह। मोहम्मद तुगलकक समयमे एकर आ प्रसार भेलैक आ तिरहूत पर तुगलक शक्तिक विस्तार सेहो मुदा महत्वाकाँक्षी लोकनिक तँ कतहुँ अभाव नहि अछि आ इएह कारण छल जे बंगाल शमसुद्दीन हाजी इलियास रक्षकक स्थान पर भक्षकक काज केलन्हि आ तिरहूत आ नेपाल पर आक्रमण कए देलन्हि। तुगलक साम्राज्यमे मोहम्मद तुगलकक पगलपनीक चलते जे अव्यवस्था उत्पन्न भऽ गेल छलैक ताहिसँ प्रोत्साहित भए गोरखपुर, ब्रह्मचर्य, चम्पारण, तिरहूत आदिक राजा ढ़ीट भगेल छलाह आ शमसुद्दीन इलियास अपन महत्वाकाँक्षाक पूर्त्ति करबाक हेतु हिनका लोकनिकेँ सजा देवाक ढ़ोंग रचलक। हिन्दू राजा लोकनि आपसमे बटल छलाह जकर परिणाम ई भेल जे ई लोकनि सम्मिलित भए ओकर मुकाविला नहि कऽ सकलाह आ हाजी इलियास अपन विजयक डंका बजबैत हाजीपुर धरि पहुँचि गेल। गोरखपुर धरि ओकर प्रभाव बढ़लैक आ मिथिलामे ओइनवार राजाक अधिकारकेँ ओ सीमित ककए बूढ़ी गण्डकक उत्तरी भागमे राखि देलक आ दक्षिणक समस्त भाग पर अपन आधिपत्य स्थापित केलक। समस्तीपुर सँ बेगूसराय धरि आ ओम्हर हाजीपुर धरि इलियासक आधिपत्य बढ़लैक आ समस्तीपुर सँ बेगूसराय धरि आ ओम्हर हाजीपुर धरि इलियासक संस्तापको इएह मानल जाइत अछि। हाजीपुरक सामरिक महत्व ताहि दिन सँ बनले रहल आर मुसलमान कालमे एकर महत्व छल। बंगालोक प्रतिनिधि अहिठाम रहैत छलाह।
जखन फिरोजतुगलक गद्दी पर बैसलाह तखन इलियासक ढ़ीटपनी दिसि हुनक ध्यान आकृष्ट भेलन्हि आ तैं तुगलक साम्राज्यक निर्धारित सीमा पर अपन सत्ता स्थापित करबाक हेतु ओ अग्रसर भेलाह। एम्हर जे हिन्दू राजा सब इलियास सँ पराजित भेल छलाह सेहो सब इलियास सँ खिसियैले छलाह आ तैं ओ लोकनि हषोत्फ्फुल भेलाह। फिरोज तुगलकक स्वागतमे ठाढ़ भेला गोरखपुर, कारूष, चम्पारण आ तिरहूतक शासन लोकनि। अहि सब पर अपन सत्ता स्थापित कए फिरोज सरयु नदीसँ कोशी नदीक क्षेत्र धरिक इलाका पर अपन प्रशासनिक व्यवस्था ठीक केलन्हि आ ओकरा अपन अधीनमे पुनः आलन्हि। फिरोजक प्रगतिक सूचना सुनितहि इलियास तिरहूतसँ भागल आ फिरोज हुनका पाँछा गेला। इलियास पहिने पण्डुआ पहुँचल आ तकर बाद एकदला। फिरोज तुगलक तिरहूत बाटे बंगाल दिसि गेलाह आ झंझारपुर अनुमण्डलमे सम्प्रति एकटा पिरूजगढ़ अछि जे फिरोज द्वारा स्थापित कहल जाइत अछि। ओहिठामसँ ओ राजविराज लग कोशी पार करैत बंगाल पहुँचलाह आ इलियासकेँ हरौलन्हि। ओहिठामसँ घुरला पर मिथिलाक सहयोगक प्रतिदान स्वरूप ओ भोगीश्वरकेँ अपन प्रियसखा कहैत मिथिलाक राजा बनौलन्हि। कहल जाइत अछि जे तिरहूतक दुनु भागकेँ मिलाकेँ ओ एक केलन्हि आ समस्त राजक भार ओइनवार लोकनिकेँ देलन्हि। मुदा किछु गोटएक मत छन्हि जे ई काजक श्रेय शिवसिंहकेँ छलन्हि। दिल्ली घुरबासँ पूर्व फिरोज मिथिलाक हेतु अपन कलक्टर आ काजी बहाल केलन्हि। हाजी इलियासकेँ मिथिलासँ भगाकेँ ओहि पर ओ पुनः अपन आधिपत्य स्थापित केलन्हि आ ओइनवार वंशकेँ करद राज्यक रूपमे रहए देलन्हि। ई लोकनि वार्षिक कर तुगलककेँ दैत रहलाह। इलियास अपना अमलमे तिरहूतमे बहुत रास किला बनबौने छल मुदा ओकरा गेला पर ओहि सब किलाकेँ हिन्दू लोकनि तोड़ देलन्हि।
फिरोज तुगलकक दिल्ली चल जेबाक बाद ओइनवार वंशमे आंतरिक संघर्ष प्रारंभ भेलैक आ एम्हर तुगलक लोकनिक हत्यासँ मिथिलामे एक नवस्थिति उत्पन्न भेल जकर चर्च हम पूर्वहि कऽ चुकल छी। बिहारमे मालिक वीर अफगान तुगलक लोकनिक प्रतिनिधि छलाह मुदा तिरहूत पर हुनक कोनो अधिकार छलन्हि अथवा नहि से कहब कठिन कारण तिरहूत तखन बिहार सँ अलग राज्य छल। कीर्तिसिंह आ वीर सिंहक जौनपुर यात्राक उल्लेख पूर्वहि भऽ चुकल अछि आ ई लोकनिक जौनपुरक इब्राहिम शर्कीसँ मदति लेबाक हेतु विद्यापतिक संगे ओतए गेल छलाह। फिरोज तुगलकक पोता सुल्तान महमूद बिहार आ तिरहूतक राज्य अपन वजीर ख्वात्रा जहाँ (जकरा मालिक–उस–शके) सेहो कहल जाइत छैक)केँ देने छलाह आ ओ जखन देखलन्हि जे दिल्लीक गद्दी लड़खड़ा रहल अछि तखन ओ अपन स्वतंत्रता घोषित कऽ लेलन्हि। ओ अपन पद्वी सुल्तान–उस–शर्क रखलन्हि आ अपनाकेँ जौनपुरक शासक घोषित केलन्हि। आ अवध, बिहार, तिरहूत तथा गंगाक दो आव धरि ओ अपन आधिपत्य कायम रखलन्हि। एतवा धरि निश्चित अछि जौनपुरक आक्रमण मिथिला पर भेल छलैक मुदा ओ कीर्ति सिंह–वीर सिंहक हेतु अथवा बंगालमे मुसलमानी सत्ताक पुनर्स्थापितक क्रममे से कहब कठिन। मुल्ला तकिआ विवरणमे इब्राहिम शाह शर्कीक शिलालेख उल्लेख अछि जाहिसँ तथ्यक पुष्टि होइछ मुदा तत्कालीन घटना क्रमक सम्बन्ध ततेक रास नेऽ बात सब मिभझर भेल अछि जे ओहिमे सँ कोनो वास्तविक तथ्यकेँ बाहर करब कठिन गप्प। अहि हेतु अखन आरो प्रयास करए पड़त आ तखनहि हमरा लोकनि ओहि औझरैल जालसँ बाहर हैब। १४६० धरि मिथिला जौनपुरी राज्यक मातहदी राज्य छल तकर कोनो प्रमाण हमरा लोकनिकेँ नहि भेटैत अछि। मुसलमानी साधन सेहो एत्तेक स्पष्ट नहि अछि जाहि आधार किछु ठोसबात कहल जा सकइए।
जखन तुगलक साम्राज्यक पतनक बाद चारूकात अस्थायित्व छल आ कोनो निस्तुकी राजाक शासन जमि नहि रहल छल तखनहि मिथिलामे शिवसिंहक उदय भेलैन्ह आ ओ मिथिलाकेँ मुसलमानी नियंत्रणसँ मुक्त कए अपन सोनाक सिक्का बाहर केलन्हि। बंगाल, जौनपुर, दिल्ली आ आन–आन, छोट–छोट राज्य जखन सब अपन डफली बजा रहल छलाह तखन शिवसिंहे कियैक चुप्प वैसितैथ? शिवसिंहक संघर्ष जौनपुरक शर्की राजाक संग भेल छलन्हि। ओना तँ अहि युद्धक पूर्ण विवरण नहि ज्ञात अछि मुदा कीर्तिपताकाक विवरणसँ एहि युद्धक संकेत भेट सकइयै। हुनका द्वारा घोषित मिथिलाक स्वतंत्रताक सुरक्षार्थ अपन जानक बाजी लगौलन्हि। शिवसिंह लड़ैत –लड़ैत मारल गेला अथवा कतहु पड़ा गेला–सेकहब कठिन। शिवसिंहक बादसँ मिथिला पर आधिपत्यक हेतु दिल्ली, जौनपुर आ बंगालक बीच घीचांतीरी होइत रहल। शिवसिंहक पछाति कालक्रमेण इलियास वाला बटबाराकेँ बंगालक शासन पुनः जीऔलक आ ओहिक्षेत्र पर पुनः अपन स्तित्व कायम केलक। भैरवसिंहक समयमे ओहिक्षेत्र पर बंगालक प्रतिनिधिरहैत छल से वर्धमानक दण्डविवेक ग्रंथसँ ज्ञात होइछ–
_ “गौड़ेश्वर प्रतिसरीरमति प्रतापः।
केदार रायमवगच्छति दारतुल्यम्”॥_
ई केदार राय बंगाल सुल्तानक प्रतिनिधि छलाह। ई हाजीपुरमे अपन मुख्यालय रखने छलाह। भैरव सिंह हिनका पराजित कए पंचगोड़ेश्वरक पद्वीसँ विभूषित भेल छलाह आ मिथिलाक दुनु भागकेँ एक वेर पुनः जोड़िकेँ एक केने छलाह आ संगहि अपनाकेँ स्वतंत्र सेहो घोषित केने छलाह। तकर बाद लोदी वंशक प्रभाव मिथिला पर बढ़लैक आ सिकन्दर लोदी मिथिलाक राजाक परम मित्र छलाह जकर उल्लेख हम पूर्वहि कऽ चुकल छी। सिकन्दर जौनपुरकेँ हराकेँ अपन राज्यक विस्तार पटना, तिरहूत आ सारन चम्पारण धरि केने छलाह। वाकिआत–ई–मुस्तकीसँ ज्ञात होइछ जे ताहि दिनमे चम्पारणमे मियाँ हुसैन फारमुली जागीरदार छलाह। आधिपत्यक हेतु लोदी आ बंगालक शासकक बीच संघर्ष होइत रहल आ मिथिला पेड़ाइत रहल। लोदीक समयसँ मिथिला पर मुसलमानक प्रभाव एकदम प्रत्यक्ष होमए लगलैक। बेगूसरायमे एकटा लोदीडीह अखनो अछि आ तुगलकसँ लकए शाह आलम धरिक सिक्का ओतएसँ प्राप्त भेल अछि। दिल्ली आ बंगाल दुनु मिथिला पर अधिकार प्राप्त करबा लेल संघर्ष शील रहैत छलाह। भगिरथपुर अभिलेख अहिबातक साक्षी अछि जे मिथिला पर चारूकात सँ मुसलमानी प्रकोप खूब जोड़–शोर सँ बढ़ि गेल छल।
१५२६मे पानीपतक पहिल लड़ाईमे इब्राहिम लोदी परास्त भेला। बाबरक लेख इत्यादिमे तिरहूतक राजा रूपनारायणक उल्लेख भेटइयै। तिरहूत बाबरकेँ कर दैत छल। बाबर सँ पूर्वहुँ तिरहूतमे अपन आधिपत्य कायम रखबाक हेतु मुसलमान लोकनि किछु उठा(उठौ)नहि रखलन्हि। बंगालक राजा नसरत शाह तिरहूतक राजाकेँ परास्त केलक आ नसरत शाहक एकटा अभिलेख बेगूसरायक मटिहानी गामसँ प्राप्त भेल छैक। नसरत अलाउद्दीनकेँ तिरहूतक गवर्नरक रूपमे नियुक्त केलक। नसरतक अवसान भेला पर मकदूम शाह विद्रोह केलक आ सासारामक अफगान नेता शेरशाहक संग मित्रता सेहो। शेरशाह चम्पारणसँ चटगाँव धरि जीतबाक प्रयास केने छल। हुमायुँक भारक प्रभाव नरहनमे छलैक जेकि महेश ठाकुर सर्वदेश वृतांत संग्रहसँ बुझना जाइत अछि। हाजीपुर पर शेरशाहक प्रभाव छलैक। १५४६मे हुमायुँ मिरजा हिन्दालकेँ हाजीपुर पर कब्जा करबाक आदेश देलकै। १५३० सँ १५४५ धरि मिथिलामे अराजकता रहलैक आर तकर किछु दिनक बाद केशव कायस्थ राजा भेल। दिल्लीये ई राज्यक भार हुनका भेटल छलन्हि। शेरशाह आ हुनक वंशजक शासन तिरहूत पर छलन्हि। तेघड़ा क्षेत्रमे मुगल–अफगानक संघर्ष भेल छल। मुगल साम्राज्यक समयमे मिथिलाक हेतु दिल्ली दिसि गवर्नर अथवा मुगलक प्रतिनिधि नियुक्त कैल जाइत छल। दरभंगामे बरोबरि फौजदार रहैत छल। महेश ठाकुरक शासनकालमे बहुत रास पठान सब हुनक संग देलन्हि। दाउदकेँ दबेबाक हेतु अकबर बिहार, तिरहूत आ हाजीपुरसँ सेना जमा केने छलाह। सैनिक दृष्टिकोणसँ मुगलकालमे हाजीपुरकेँ बरोबरि सुरक्षित राखए चाहैत छलाह आ खान–ई–आजमकेँ बंगाल आ तिरहूतक गवर्नर नियुक्त केने छलाह। मुजफ्फर खाँ चम्पारणक राजा उदीकरणक संग मिलि विद्रोही लोकनिकेँ दबौने छलाह। तिरहूतक राजा सम्राटकेँ कर दैत छलथिन्ह। १५८०क बाद शुभंकर ठाकुर भौरमे मिथिलाक राजधानी बनौलन्हि आ मुगल सम्राटसँ अपन बढ़िया सम्बन्ध बनाके रखलन्हि।
शुभंकर ठाकुरक समयमे जखन अकबर काबुल दिसि गेल छलाह तखन एम्हर तिरहूतमे बदम्क्षीक पुत्र बहादुर शाह साम्राज्यक विरूद्ध विद्रोह केलन्हि आ अपन नामक सिक्का आ खुतबा शुरू कदेलन्हि। पश्चात् ओ आजम खाँक नौकर सब द्वारा मारल गेला। पुरूषोत्तम ठाकुर जखन राजा भेलाह तखन हुनका राजस्व जमा करबाक हेतु किला घाटमे बजाओल गेलन्हि आ ओतहि धोखासँ मारि देल गेलन्हि। हुनक पत्नी दिल्ली जाए जहाँगीरक दरबारमे एकर शिकायत कैलक आ पुरूषोत्तमक हत्याराकेँ मृत्युदण्ड देल गेलैक। रानी ओतहि जमुना नदीक निगम बोध घाट पर सती भऽ गेलीहे। हुनक बाद नारायण ठाकुरक शासन कालमे कोनो एहेन महत्वपूर्ण घटना नहि घटल आ मुसलमानक सम्बन्ध यथावत रहल। तब सुन्दर ठाकुर राजा भेलाह। १६६१मे औरंगजेब एकटा फरमान अछि जाहिमे उल्लिखित अछि जे महिनाथ ठाकुर पलामू आ मोरंगकेँ जीतबामे साहाय्य देने छलाह। हुनका समय नवाब मिरजा खाँ दरभंगाक फौजदार छलाह। पलामूक चेर्रा सरदार प्रतापराय सम्राटकेँ करदेव बन्द कऽ देने छलाह आ अपना क्षेत्रमे तहलका मचौने छलाह। हिनका दबेबाक हेतु औरंगजेबक आदेश एला पर फौजदार महिनाथ ठाकुरसँ मदति लेलन्हि आ पलामूक संग-संग मोरंगक विद्रोही लोकनिकेँ सेहो दबाओल गेल। ओहि हेतु औरंगजेब हिनका धन्यवाद सेहो देने छलथिन्ह। अहिसँ ई स्पष्ट अछि जे मुगल सम्राटक अधीन छलाह। हिनका पारितोषिक हेतु मूंगेर, हवेली, ताजपूर, पूर्णियाँ, धरमपुर आदिक जमीन्दारी भेटलन्हि आ माछक निशान सेहो। मोरंगक विरूद्धक लड़ाइमे नरपति ठाकुर सेहो संग देने छलथिन्ह। महिनाथक बाद नरपति ठाकुर राजा भेलाह। मिरजा खाँक पश्चात मासूमखाँ, नुसेरी खाँ, शाहनवाज खाँ आ हादी खाँक ओहिठामक फौजदार भेला।
१.शीतल झा-नेपालमे मघेशीकेँ समस्‍या आ सामाधान! २.पाकिस्तान मे सेक्स-विचार-कुमार राधारमण
१.शीतल झा
नेपालमे मघेशीकेँ समस्‍या आ सामाधान!
(1) नेपाल
भारतके उत्तर‍दिस बिहार स उत्तर, पश्चिम बंगाल स पश्चिम, उत्तरप्रदेश स उत्तर पूर्वमे हिमालय पर्व‍तके एक अंशमे स्थित एकटा देश नेपाल अछि। २४० वर्ष पहिले गोरखा के एकटा लड़ाकु राजा पृथ्‍वी नारायण शाहके राज्‍य बिस्‍तारमे महत्‍वाकांक्षा स्‍वरूप उपत्‍यका सहित पूर्वमे तिस्‍ठा नदी आ पश्चिमे कांगड़ा किल्‍ला तक बिस्‍तारके क्रममे दक्षिणके सम्तल भूमिमे स्थित बिभिन्‍न ऐतिहासिक मुलुक पर बिजय प्राप्‍त करैत गेल ब्रिटिस्‍ट भारत सरकारके प्रतिरोधक बाद युद्ध भेल। १८१६ के सम्‍पन्‍न संधि नेपालके बर्तमान अवस्‍था कायम करैत १८६० के संधि सँ एकटा पूर्णता प्राप्‍त भैलै आ १९२३ के संधि एकटा देश मान्‍यता देलक।
(२) मधेश
मध्‍य एशिया स बनल शब्‍द मधेश नेपालक समतल भूमिमे रहल जाति जनजातिके मधेशी शब्‍द सँ सम्बोधन कएल गेल। एहि समतल भू-भागके तराई कहितोमे यही ठामक बासिन्‍दाके तराई बासी या मधेशी कहित खष भाषिक पहाडि वर्ग सम्‍बोधन करैत रहल १८१६ के सन्धिके खाकामें राप्‍ती आ कोशी के बिचक भूभाग ब्रिटिस्ट भारत लेने छल आ नेपालके २ लाख रुपैया देने छल। मुदा अन्तिम कालमे नेपालक अनुरोधपर ओ छोडि देलक। १८५९ भारतके प्रसिद्ध स्‍वतन्‍त्रता युद्ध सैनिक बिद्रोह के दमन करावक लेल नेपाली सेना भारतमो पठोलक बदलामे पश्चिमके चार जिल्‍लाके लएक जे सहित महाकालि सँ मेची तक समग्र २०-२२ जिल्‍ला मधेशक अछि आ एहि ठामक बासिन्‍दा मधेशी।
(३) मधेशी प्रति ब्‍यवहार
राजनीतिक-बर्तमान मधेशमे तत्‍कालिन अवस्‍थामे जे स्‍वतन्‍त्र राज्‍य सब रळे तकरा उपर प़थ्‍वी नारायण शाह हमला करैत गेल आ मिथिला राज्‍य सेहो कब्‍जा कएलक आ एकर १०००० ( दश हजार) सेनाके सहायता ल क पूर्वमे आक्रमण सफल कएलक आ तिरहुतिया सेनाके भंग कएलक। सम्‍पूर्ण मधेश पर ओ, साम्राज्‍य काएम करेके लेल सबपर जातिय साँस्‍कृतिक प्रशासनिक भाषिक दमन सुरु कएलक आ मधेशके पूर्ण उपनिवेश के रुपमे देखैत एकटा पूण्‍ति ओपनिबेशिक शासन चलव लागल। एही मधेशीके कहियो कोनो अधिकार नहि भेटलै जौँ कतहु नेपालक इतिहासमे मधेशीके चर्चा अवैतछैक ओ राजाके षडयन्‍त्र में ओकरा प्रयोग करवमे आएल छै। खस जातिमे २ जात शाह आ राणा आ क्षेत्री सत्ता संघर्षक क्रममे राजा के कटपुतली बनाक राखके काज जंग बहादुर राणा कएलक जेकर वंश १०४ वर्ष तक राजा आ प्राजा दुनुपर शासन कएल। जकरा कालमें चाक‍रीवाज शोषक पहाडी के शासनमें अंश रहलै, मुदा तहियो मधेशी निर्मम शोषण दमनके शिकार भेल। सम्‍पूर्ण मधेश शाह आ राणा सभक के जमिन्‍दार छलैक या दरवरियाक भाइभरदार दार के प्रशासन मार्फत राजनीतिक होइछलै आ प्रशासन मे मधेशी नहिं छलै ।
राणा शासनक अन्‍तथ आ शाह शासनक प्रारम्‍भ २००९ सालक कथित क्रान्तिमें। राजनीतिक स्‍वतन्‍त्रता नहीं, शाह वंशीय स्‍वतन्‍त्रता अएलै। २००७ साल सँ २०१७ सालतक विभिन्‍न राजनीतिक घटना क्रममें मधेशी के जनसंख्‍याके अनुपातमें कतहु राजनीतिक स्‍थान नही देल गेलै। जौ किनको स्‍थान भेटल ओ राजनीतिक आन्‍दोलनमें विशेष योगदान कएलनि तै। प्रशासनमें आ सुरक्षा क्षेत्रमें प्रवेश नही कतहु मधेशीकै देशक हरेक क्षेत्र पर रहल जाहिमे मधेश पूर्णत: पिसा गेल। एकरा अस्तित्‍वपर प्रत्‍येक क्षण खतरा रहै। नागरिकता ऐन कडा एकल गेल आ मधेशी के नागरिकता पर शंका करैत, देव में हाथ कठोर कएलक। एकरा कता संख्‍याके न्‍यून देखावक लेल पहाड स पूनर्वासिके नाम पर पहाडीके बसोवास मधेश में करौलक। जंगलके विचमे स राजमार्ग वनाक मधेशीके जनसंख्‍याक कम देखावकें खडयन्‍त्र करैत मधेशके मरभूमि बनावके चाल चलला। आसामी भुटानी वर्मेली नागरिक समेतके बसौलक आ सामाजिक अस्तित्‍व सेहो खतडा में पडैत गेल। एक भाष एकभेष एकराज्‍य एकदेश क निर्मम नीति के मधेश मे जे दमनपूर्वक प्रयोग क सकै तेहन मेधशी नेताके प्रयोग करैत रहल।
तथापि २०४६ सालमें आन्‍दोलन भेले आ लोकत पुर्जीवित प्राप्‍त कएलक। मुदा मधेशीके जीवन में कोनो परिवर्तन नहीं भेल। राजनीतिकमें कोनो अधिकार नहीं, सतामे कतछु पहुँच नही। सरकारी नीति निर्माण में किनको स्‍थान नही। दलके उच्‍च तहमें कोनो संख्‍यात्‍मक परिवर्तन नही। कोनो सम्‍मानजनक स्‍थान नही। केवो टिकाउ नही। किनको स्‍वाभिमान नही। सवपर एकटा कलंक मढल रहैछ। मधेशी नेताक निर्यात इएह भेल। प्रशासनमें मधेशी न्‍यून होइत गेल। जनपद प्रारीमें सेहो घटे तगेल सेनामें कतहु प्रवेश नही प्रावधिक क्षेत्रमे रहल सभके दमन वेस्‍नी वृत्तिविकाश कम एहि यस अवस्‍था सभ दलमें देखल गेला कोना प्रगतिशील कोन प्रजातान्त्रिक अन्‍याय भेल कहि नहीं सकैछी तुरुन्‍त सम्‍प्रदायिक आरोप, तुरुन्‍त निस्‍कासन, एहन निति रहल ०४६ स ०६२ तक राजा ज्ञानेन्‍द्रक शाही कालमे विभिन्‍न जाति, जात सभक विचमें लोकहतान्त्रिक चेतना प्रवेश्‍ कएलक समावेशीकरण, समानुपातिक उपस्थिति जातीय स्‍वायाता संधीय संरचना आत्‍मनिणर्निक अधिकार आदि शब्‍दक राजनीतिक अर्थ जनतामें प्रवेश कएलक आ विभिन्‍न आन्‍दोलन भरहल अछि। राज्‍य पक्ष शब्‍दमें स्‍वीकार कएलक अछि मुदा नियतव एह पुरान छै, प्रवृति राणाकालीन छै। कपटपूर्ण मनशाय शाहकालीन छै। दलक केन्‍द्रीय निकायामें वएह रबैआ छै। मधेशी अधिकारक आन्‍दोलनपर वएह आरोप, वएह कलंक, वएह दमनक धम्‍की, वएह मिथ्‍या अस्‍वासन वएह स्‍थान, सम्‍मान नहिं देवाक सामन्‍ती प्रवृति।
(४) आर्थिक
मधेशी पर भ रहल आर्थिक शोषणक अनन्‍त स्‍वरुप अछि। 1816 के संधिताकाल में मधेश मांगल गेल छैक पहाडीके पलएवाक लेल चितौनके सामने मधेश नहीं मांगल गेल छेक1 किए ओतेक भूभाग में ओहि क्षेत्रक सामन्‍तक पोषण भजेतै भन्‍सार मधेसमें सव खर्च पदाडके लेल। कारखाना मधेश मधेशमें राजस्‍व पहाडके लेल। उत्‍पादन मधेश मधेशी नियन्‍त्रण वेचविखन भष्‍ट पहीके हाथ में कोनो निकायपर मधेशीके नियन्‍त्रण नही भ्रष्‍टाचार मे सलग्‍न पहाडी सजाय मधेशी के मधेशीस्थिति गाँव गाँवमें एकेटाकें पहाडी जीमन्‍दार के राजनीतिक हस्‍तक्षेप ओकरे प्रशासनिक पहुँच ओकरें। पूरे क्षेत्रमें आर्थिक शोष ओकरें । ओहे प्रभावशाली व्‍यक्ति। ओकरें सामाजिक हैसियत। गामक झगडाके न्‍यायधीश ओहे। सारा जमिनपर ओकरें कब्‍जा। कोनो छोअ जीमन्‍दार मधेशी त ओकरा उपर क जीमन्‍दार पहाडी । मध्‍य युगीन निर्मम सामन्‍ती शोषण अखनो देखल जाति अछि मधेश में।
(५) सांस्‍कृतिक भाषिक, सामाजिक दमन
नेपाल विभिन्‍न जाति आ वर्णके मिश्रित देश अछि स्‍वीकारितोमें विभिन्‍न जातिक विभिन्‍न भाषा, विभिन्‍न भेष अलग सामाजिक सम्‍बन्‍ध सांस्‍काृति पहिचानके स्‍वीकार नै कएकल कहिओ पहाडी सत्ता शाही प्रशासनके मजबूत आ निर्मम वनकेलेल एकहि भाषा, खस भासा अर्थात शाही भाषा, अर्थात गोरख भाषा, अर्थात नेपाली भाषा के दमनकारी नीति प्रयोग एकलक बाँकी सभ भाषा पर सम्‍बैधनिक रुपस प्रतिबन्‍ध लागल आ सरकारी कामकाजक भाषा भेष आ ओहि भाषाभाषीके जे पारम्‍परिक पहिरन रहै से पहिरनके के दरवारक पहिरन मानल गेल। ओहे भेष सरकारी भेष भेल ओ है प्रशासनिक भेष भेल पहिरन आ राजनीतिक भेष होइत आ अन्‍तमें जनप्रतिनिधिक औपचारिक भेष होइत-होइत सम्रग नेपाली नागरिकके भेष जकाँ ओकरें। ओपचारिक पोषाक मानल गेल। शिक्षामें सरकारी काम काजके आ इएह भाषा रहल आ अदालत एहि विषयमें शाही हाथक कठपुतली रहल।

Suggested citation: प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी. “मिथिलाक इतिहास (आगाँ).” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 49, 2010-01-01. https://www.videha.co.in/research/2010/49/मिथिलाक-इतिहास-आगाँ.htm

मूल विदेह अंक / Original issue