विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली शिशु लोक साहित्य

फूलचन्द्र झा ‘प्रवीण’ · 2010-01-15 · अंक 50

मैथिलीमे बाल साहित्य
मैथिली शिशु साहित्य लोक
फूलचन्द्र झा ‘प्रवीण’
मैथिली लोक साहित्यमे शिशु लोक साहित्यक अम्बार लागल अछि। किछु लिपिबद्ध आ बेसी मौखिक। शिशु लोक साहित्य अज्ञात समयमे, अज्ञात लोक रचनाकारक द्वारा भेल होयत। जहियासँ एकर रचना भेल तहियासँ ई वेदक रचना जकाँ हजारो वर्ष धरि मौखिक परम्परामे जीबैत रहल। तकर बाद किचु तँ लिपिबद्ध कयल जयबाक प्रयास भेल आ बेसी एखनो धरि लोकक कंठमे अपन स्थान बना कऽ रखने अछि। प्रत्येक पीढ़ीक लोक अपन पछिला पीढ़ीक लोकसँ एकरा सुनैत आ सीखैत आबि रहल अछि। मौखिक परम्परामे जीबाक कारणेँ एकर मौलिकता दिनानुदिन नष्ट भेल जा रहल अछि। लोक–विशेष, वर्ग–विशेष आ क्षेत्र–विशेषक कारणेँ एकर शब्द आ उच्चारणमे अंतर पाओल जाइत अछि।
मैथिली शिशु लोक साहित्य प्रायः सब विधामे उपलब्ध अछि, मुदा एहि आलेखमे पद्य विधाकेँ केन्द्रमे राखि थोड़ बहुत आनो विधा सब पर विचार कयल गेल अछि।
एखनधरि जे मैथिली शिशु लोक साहित्यकेँ लिपिबद्ध रूपमे संकलित करबाक प्रयास भेल अछि ताहिमे प्रो. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन”क मैथिलीक नेना गीत डा. अणिमा सिंहक “शिशु गीत आ खेल” तथा एहि सम्पूर्ण बाल साहित्यकार डा. दमन कुमार झाक एकटा समालोचनात्मक ग्रंथ “मैथिली बाल साहित्य”क प्रकाशन बहुत हद धरि उपयोगी सिद्ध भेल अछि।
मैथिली शिशु लोक साहित्यकेँ निम्नलिखित भागमे बाँटल जा सकैत अछिः-
1. लालन–पालनसँ सम्बद्ध।
2. खेल आ मनोरंजनसँ सम्बद्ध।
3. ज्ञानोपयोगी।
लालन–पालनसँ सम्बद्ध शिशु लोक साहित्य
एहि प्रकारक लोक साहित्यक परिवेश पैघ नहि होइछ। ई घर–आँगनसँ दलान धरि सीमित रहैत अछि। नेनाकेँ जन्म लितहि ‘सोहर’ ओकरा कानमे पड़ैत छैक आ जेना–जेना नेनाक अवस्था बढ़ैत छैक, बदलैत छैक तेना–तेना शिशु लोक साहित्य परिवर्त्तित होइत जाइत अछि। जन्मक बाद ओकरा दिन–राति मिला कऽ कतेको बेर कड़ूतेलसँ जाँतल–पीचल जाइत छैक आ जतनिहारिक ठोर पर अनायास चल अबैत अछि–
चैं–चैं–चैं बौआ सूतभैं
बौआ मत्था पच्चनि तेल
मुद्दै मत्था फुट्टनि बेल।
चानि पर तेल पचाय, अपन दुनू टाँगपर नेनाकेँ पारि, देह उँगारैत कहैत छथि
बौआ ईलसन, कील सन
धोबियाक पाट सन
कुम्हराक पाठ सन
अद्दै–मुद्दैक छाती पर लात दिअऽ
पृथ्वी पर भऽर दिअऽ।
तकर बाद नेनाकेँ हाथसँ लोकैत छथि। नेना डरे कानए लगैत अछि। पुनः कहैत छथि–बौआ आम तोड़ू/बौआ जाम तोड़ू।
तकर बाद टाँग पकड़िकऽ, उनटाकऽ झुलबैत कहैत छथि–
बौआ मामा गाम देखू
बौआ नाना गाम देखू
बौआ अपन गाम देखू।
एहिमे एकटा बात देखयमे अबैत अछि–जँ नेना मामा गाममे रहल तँ ओकर दादा–दादीक, जँ अपन गाममे रहल तँ नाना–नानीक चौल कयल जाइत अछि।
पहिल साँझ दीप लेसलाक बाद छोट–छोट नेनाक रक्षार्थ संझा–मैयासँ प्रार्थना कयल जाइत अछि।
आको मैया चाको, संझा मैया राको
पहरा मैया हेरणी, सब दुःख फेरनी
जे बौआकेँ दिअय दृष्टि, तकरा बान्हू गोला विष्ठी
काल–भैरव रक्षा करय, सोनक दीप, पाटक बाती
बौआ सूतय सुखक राती
दुःख–दरिद्र पाछू जाउ, सुख–श्रृंगार आगू आउ।
तहिना बेसी देखनुहुक नेनाकेँ क्यौ नजरि–गुजरि ने लगा दिअय, एहि क्रममे ई पाँती द्रष्टव्य–
हँसनी–खिलनी गेल बजार/हँसनी चल आयल
खिजनी रहि गेल/जहिना हस्से राजा धनपाल
तहिना हस्से बालक/दोहाइ राजा धनपाल
दोहाइ मौरगनी माए।
दीपक इजोत पर नेना अपन दृष्टिकेँ केन्द्रित कऽ डिम्हा घुमबैत, आनन्द लैत रहैत अछि।
जनश्रुति अछि, प्राचीन कालमे छठिहारक रातिक दीप मिझाकऽ लोक राखि लैत छल तथा छः वर्ष धरि बेटाकेँ आ तीन वर्‍श धरि बेटीकेँ एहि दीपसँ ई टोटमा करैत छल, मुदा वर्त्तमानमे एहन कम देखबामे अबैत अछि।
जखन नेना बैसऽ लगैत अछि, संकेत पर आँगुर पकड़ब सीखि लैत अछि तखन लोक कोनो बातक जिज्ञासाक क्रममे, बालबोध बुझि अपन बिचला दू गोट आँगूरकेँ नेनाक कपारपर घुमबैत कहैत छथि–आनी–मानी हम जानी/खारा रोटी खाए नहि जानी
आए–बापकेर ना नहि जानी/सत्त छोड़ि असत्त नहि बाजी।
तकर बाद नेनाकेँ आँगुर देखबैत पकड़बाक लेल कहल जाइत अछि। जँ नेना बिचला आँगुर पकड़ि लैत अछि तँ जिज्ञासा पूरा होयबाक सम्बावना प्रबल मानल जाइछ।
जखन नेना ठाढ़ होयब आरम्भ करैत अछि तखन बेर–बेर खसि पड़ैत अछि। घर–परिवारक लोक ओकरा बेर–बेर आँगुरक भऽर दैतठाढ़ होयबाक लेल आ डेग उठएबाक लेल प्रोत्साहित करैत कहैत छथि–
था.....था.....दिग्–दिग् था
था.....था.....थैया.....था
डेग बढ़ैया.....हम्मर बाबू.....हम्मर भैया।
एहि संग नेना डैग उठबैत अछि, बेर–बेर खसैत अछि आ ई सुनि–सुनि पुनः ठाढ़ होएबाक आ डेग उठएबाक प्रयास करैत अछि। एहि पदक माध्यमसँ नेनाकेँ बूलब सिखाएल जाइत अछि।
झौलाएत नेनाकेँ कोरामे लऽ घुमयबाक क्रममे कथा–गीतक परम्परा रहल अछि। एकर स्वरूप पैघ आ छोट दुनू प्रकारक देखबामे अबैत अछि। जेना चन्नामामाकेँ देखबैत नेनाकेँ कहल जाइत अछि–
चन्ना मामा आ रे आ, पारे आ/नदियाकेँ किनारे आ
सोनाकेँ कटोरामे/दुध–भात नेने आ/बौआक मुँअमे घुटुक सन।
दोसरः-
चन्नामामा आरे आ पारे आ/केराक भार ला
पूड़ी–पकमान ला/फोका मखान ला/बौआ मुँहमे ठुस।
एतेक कहैत अपन हाथसँ नेनाकेँ खोअएबाक अभिनय करैत छथि। तहिना तरेगण दिस तकबैत–
एक तारा दू तारा/तारा बेटी बड़ बुधियारि
गंगाकातसँ बालु अनलक/सेहो बालु कनुनियाँ लेलक
सेहो कनुनियाँ फुटहा देलक/सेहो फुटहा चरबहबा लेलक
सेहो चरबहबा घस्सा देलक/सेहो घस्सा गैया खेलक
सेहो गैया दूध देलक/सेहो दूध बिलैया पीलक
सेहो बिलैया मूसा देलक/सेहो मूसा चिलहोरबा खेलक
सेहो चिलहोरबा पंखा देलक/सेहो पंखा राजा लेलक
सेहो राजा हाथी देलक/सेहो हाथी मामा लेलक
सेहो मामा गिलास देलक
सुतयबाक काल नेनाकेँ जाँघपर लऽ, बेर–बेर ओकर कनपट्टी आ माथकेँ सोहरबैत, जाँघकेँ नीचा–उपर करैत, अपनो देहके डोलबैत, ई लोरीक परम्परा एखनो धरि मिथिलाक सब घरमे देखबा सुनबामे अबैत अछि–आगे निनियाँ आ आ/बौआ लए निन ला ला
निनियाँ एलै बिढ़िनियाँसँ/बौआ एलै मातृकसँ
बौआक मामा गामकी–की बिकाय।
अंगा बिकाय, टोपी बिकाय/सेहो अंगाकेँ पहिरय/बौआ पहिरय
एकरा कत्तौ–कत्तौ दोसर प्रकारेँ एना सुनबामे अबैत अछि–
निनियाँ अयलै बिरहिनियाँसँ/बौआ अयलै ममहरसँ
ममहरमे बौआ की–के खाए/आरब चाउरक भात
सोरहिया गायक दूध/हाली–हाली खो रे बौआ जयबेँ बड़ी दूर
हुअमाकेँ पियासल बौआ गेल पोखरि
पोखरिक टेंगस लेल टेंगराय
बोनक बगुला देल छोड़ाय/ऐहेँ रे बगुला खेत–खरिहान
एक सूप देबौ देसरिया धान/तेकरे कुटिहे नाम–नाम चूड़ा
बैसि जिमबिहेँ ब्राह्मण पूरा देल आसीस
जिबिहेँ सै बौआ लाख बरीस।
एहि लोरी सभक माध्यमसँ नेनाकेँ सुतयबाक संग–संग ओकर दीर्घायु होएबाक कामना सेहो कएल जाइछ। नेनाक सुति रहला पर माए, निश्चिंत भऽ अपन घरक काज–रोजगारमे लागि जाइत छथि।
नेनाक संग अपनो मनोरंजन करबाक क्रममे लोक अपने उतान भऽ पड़ि रहैत अछि आ नेनाकेँ पैरपर बैसाय, बेर–बेर पैर उपर–नीचा करैत एहि पालन गीतक आनन्द अपनो लैत छथि आ नेनोकेँ सेहो दैत छथिन। एकरा कत्तौ–कत्तौ “घुघुआ–मना” आ कत्तौ–कत्तौ “धुआँ–चुआँ” नामसँ सेहो जानल जाइत अछि।
घुआँ घूँ लल्ले छूँ लल्ले मनसा नाम की
सोनमन झा, टीक पकड़ि ला, पोखरि खुना
पोखरिक कात–कात चम्पा लगा/चम्पा फूल उधिआयल जाए
परती फुलायल जाए/सीकीक डगमग कोकाक फूल
चकमक देवता चल बड़ी दूर/कत्ते दूर/मधेपुर
मधेपुरमे की सब, तार छै बेतार छै
काजर–बीजर कएल छै/टीकुली बैसाएल छै
मामा गेलै पटना/मामी सुतलै अंगना
मामा घरमे चोर पैसल/दोड़ऽ हो भगिनमा
तकर बाद “नव घर उठे” कहि पैर उठाएल जाइत अछि आ “पुरान घर खसे” कहि पैर नीचाँ खसाएल जाइत अछि। ई खेल नेना सब बेर–बेर खेलएबाक लेल कहैत अछि आ आनन्द विभोर होइत रहैत अछि।
जावतकाल घरि नेना जागल रहैत अछि, ओकरा एक ने एकटा लोकक सानिध्य चाही, नहि तँ ओ कानय लगैत अछि। एहना स्थितिमे गायक अतिरिक्त नानी, दादी, दीदी आदि ओकर मोनकेँ बहटारबाक लेल रंग–बिरंगक पद्य, भास लगाकऽ गाबऽ लगैत छथि–
अलिया गै, मलिया गै/गोला बड़द खेत खाइ छौ गै
कत्तऽ गै, डीहपर गै/डीहपर रखबार के गै/बाबा गै
सासुकेँ नहि देतौ गै/सिरमातरमे रखतौ गै
अपने सबटा खयतौ गै।
दोसरः-
लाल गाछी गेली, लाला आम पेली
बाबाक देली, बाबा हौ/आब नहि जाएब मकैया खेत।
बाघ छै, बघिनियाँ छै, कोठीपर हरमुनियाँ छै
बाबा आँगनमे चूड़ा कुटाय/पड़बा बीछि–बीछि खाइ छै
कोन बेटखउकी नजरि लगौलक/पड़बा रूसल जाइ छै।
नेनाक लालन–पालनमे माए, दादी, नानीक संग–संग दीदी अर्थात पिउसिक सेहो बड़ महत्वपूर्ण योगदान रहलैक अछि। तेँ किछु दीदीपरक द्रष्टव्यः-
लाल दीदी गे/की दीदी गे/डलिया दे मिरचाइ तोड़ए लेल
ककरामे/पुलिसबामे/सबे पुलिसबा हुलिसन आएल
ककरा घर नुकाएब गे/बाबा घर नुकाएब गे
बीचे बाट पर खसली गे/सब बरियतिया हँसली गे
दोसरः-
लाल दीदी गे/की दीदी गे/बेटा कनै छी खोपड़ीमे
कानय दहिन पुतखौकाकेँ/नाचय दहिन पमरियाकेँ
खाइ लेल देलहुँ दालि भात/खाए लेलक सोहारी
सुतइ लेल देलहुँ अलंग–पलंग/सूति रहल गोरथारी
गेलहुँ मोँछ पकड़ि कऽ उठबए/फोलि देलक केबाड़ी।
तेसरः-
लाल दीदी गे/की दीदी गे/एक रत्ती छाल्ही चटलियौ गे
तै लेल बाबा मारलकौ गे/बाबा बड़ चण्डलबा गे।
अपना ओहिठामक बेटीकेँ जखन संतानक योग्यता होइत छनि तखन प्रायः नैहर आनि लेबाक परम्परा एखनो धरि बाँचल अछि। एहना स्थितिमे नेनाकेँ मामा, मामी, नाना, नानीक बेसी दुलार–मलार भेटैत रहलैक अछि, तेँ किछु मामा–मामीसँ जुड़ल पालन–पद्य द्रष्टव्य–
मामा हौ पोखरी भीड़पर जइहऽ
चिक्कन पड़बा मारिकऽ आनिहऽ
मामी हाथकेँ दीहऽ/तेल फोरन मिलाकऽ करिहऽ
अपने खइहऽ लाल–लाल कुटिया/हमरा दीहऽ झोर
ई सब देखिकऽ बहि रहलैए/हमरा आँखि सँ लोर।
दोसरः-
मामी यै भात उधिआए/मामी यै दालि उधिआए
कोठी पर सुग्गा स्नान करैए।
तेसरः-
आब नहि जएबै मामाक अँगना
अपने खाइ छै लाल–लाल कुटिया/हमरा दै छै झोर।
खेल आ मनोरंजनसँ सम्बद्ध शिशु–लोक साहित्य
एहिसँ सम्बद्ध शिशु लोक साहित्यक परिवेश बेसी विस्तृत अछि। रस्ता–पेरा, परती–पराँत, विद्यालय–परिसर, खेलक मैदान आदि ठाम नेनाक झुण्ड भोर साँझ जमा होइत अछि आ रंग बिरंगक खेल खेलाइत अछि। छोट–छोट नेना, जे खेल, बेसीकाल खेलाइत अछि, ताहिमेसँ किछु द्रष्टव्य–
अटकन–मटकन दहिया चटकन/पूस महागर पुरनी पत्ता
हिल्लय–डोल्लय/माघ मास करैला फरए/तै करैलाक नाम की
आम गोटी, जाम गोटी, तेतरी सोहाग गोटी।
सिंगही लेबै की मुँगरी
जँ उत्तरमे नेना ‘सिंगही’ कहैत अछि तँ ओकरा बिट्ठू काटल जाइत अछि आ जँ ‘मुँगरी’ कहैत अछि तँ मुक्कासँ मारल जाइत अछि।
एकरा दोसर प्रकारेँ सेहो सुनबामे अबैत अछि–
अटकन मटकन दहिया चटकन/केरा कूस महागर जागर
पुरनिक पत्ता हिल्लै–डोल्लै/माघ मास करैला फूलै
आमुन गोटी, जामुन गोटी/तेतरी सोहाग गोटी
सिंगही लेबेँ की मुँगरी?
दोसरः-
गाछ करै ठाँए–ठाँए, नदी गौंगिआए
कमलक फूल दुनू अलगल जाए/सीकीक डाली चमेलीक फूल
चकमक देवता चलबड़ी दूर/हाथीपर हथबरबा भैया
घोड़ापर रजपूत
सब रजपूतनी खोपा गुहने/बंका छै मजबूर
बंका बिकाइए तीन–तीन बंका/बाजूकेँ गरदाग
रामजीकेर सुतल पुतहुआ/कूटैत रहए धान।
बाल मनोविज्ञानकेँ ध्यानमेँ राखि, नेनाक समुचित विकासक, उल्लासक लेल मैथिली शिशु लोक साहित्य थोड़ नहि प्रतीत होइछ। खेलसँ सम्बद्ध एकटा बाल–कथा काव्य द्रष्टव्य–
एकटा छलै फुद्दी, ओ बैसल कुसपर
कुस ओकर पेट चीरि देलक
ओहिसँ निकलल तीनटा धार
दूटा सुखले–सुखले छल, एकटामे पानिएँ नहि
जाहिमे पानिएँ नहि, ताहिमे पैसल तीनटा हेलबार
दूटा डुबिए–डुबिए गेल, एकटाक पते नहि
जकर पते नहि,से नोतलक तीनटा ब्राह्मण
दूटा भुखले–भुखले रहल, एकटा खएबे नहि कएलक
जे खएबे नहि कएलक, तकरा भेल तीन मुक्का दण्ड
दूटा हुसिए–हुसिए गेल, एकटा लगबे नहि कएल
एहि प्रकारक लोक साहित्य नेना सब बड़ मनोयोगसँ सुनैत अछि।
कखनोकाल नेना–भुटका झुण्ड एक–दोसरक डाँर पकड़िकऽ रेलगाड़ी बनबैत अछि। एहिमे एक गोटा इंजिन आर सब नेना डिब्बा बनैत अछि आ घुमि–घुमिकऽ कहैत अछि।
रेलगाड़ी झकमक/पहिया लोहारकेर, बेल सरकारकेर
कुँइआमे पानी, मकोलामे तेल/आ गेलि मइयाँ, पी गेलि तेल
भैया रे भैया, कुटुम्ब कहाँ गेल/एक सय हाथी बान्ह पर गेल।
मिथिलाक खेलमे कबड्डीक बड्ड पुरान परम्परा रहल अछि। एहिपर आधारित किछु पद्य देखल जाए–
कबड्डी–कबड्डीकार/मैना बच्चा अण्डापार
दोसरः-
चेत कबड्डी आबऽ दे/तबला बजाबऽ दे
तबलामे पइसा/बाग–बगइचा।
तेसरः-
कबड्डी खेलऽ गेलहुँ कपार फुटि गेल
रेशमकेर डोरामे हाथ कटि गेल
श्रवणकेम देखिकऽ पियास लागि गेल
हाथीक देखिकऽ हदास उड़ि गेल/आम चकलेट चीनी प्लेट
एकटा खेल अछि गिरगिटरानी ई खेल मिथिलाक कन्या लोकनिक मध्य खेलाएल जाइत रहल अछि। एहिमे एकटा कन्या गिरगिट बनैत अछि आ दूटा, ओकर दुनू जाँघ पकड़िकऽ ठाढ़ भऽ जाइत अछि आ एकटा कन्या ओकर दुनू पैर पकड़िकऽ, ओहि पर बैसि जाइत अछि आ कहैत अछि–
गिरगिटमाला–गिरगिटमाला/कहाँ–कहाँसँ आएल छी
बौआ लाला–बौआ लाला/देस–देससँ आएल छी।
की सब लाएल छी।
आम छोड़ि गुद्दा/ककरा देलहुँ
राजाक बेटीक हाथमे/राजाक बेटी कत्तऽ अछि
मजे कोठलिया/मजे कोठलिया की सब
साँप छै, बाघ छै।
एहि कथा–काव्यकेँ दोसर तरहेँ सेहो कहल जाइछ–
हे गिरगिटियाँ रानी! तोँ कतएसँ अएलह
हमरा लेल की–की अनलह
कान खोड़ि गुजुआ/सेहो गुजुआ ककरा लेल
राजा बेटी हाथक लेल/राजा बेटी की सब देल
हाथी छोड़ि घोड़ा देल/सेहो घोड़ा कहाँ गेल
विरदावनमे चरए गेल/विरदावनमे की–की देखल
साँप देखल, बाघ देखल/नाचे गिरगिटिया।
जे कन्या गिरगिट बनल रहैत अछि ओ अपन मूड़ी उठा आ हाथ पसारिकऽ उत्तर दैत रहैत अछि आ ओ तीनू सहयोगी कन्या ओकरा घुमबैत रहैत अछि।
एकटा खेल अछि–कटहरक गाछ बला एहिमे एकटा नेना ठाढ़ भऽ गाछक अभिनय करैत अछि तथा आओर नेना सब ओकर पैर पकड़ि, मूड़ी गोंतिकऽ, बैसि रहैत अछि आ कटहर फलक अभिनय करैत कहैत अछि–
हमरा बाड़ी–हमरा बाड़ीकेँ हुहुआए
राज कोतवाल/की–की मँगैए
आरब चौरा, नव ढ़कना
तकर बाद कोतवाल, फलक अभिनय करैत नेना सबकेँ, हाथसँ टेबैत अछि
तखन गाछ कहैत अछि–
काँच छै तऽ छोड़ि दू/पाकल छै तऽ लऽ लू।
एकटा खेल अछि– “झिझिर कोना”। ई खेल पाँचगोट नेना द्वारा कोनो खाली घरमे खेलाएल जाइत अछि, जाहिमे चारिटा कोन होइ। ई खेल बेसीकाल नेना खाली दलानक कोठली वा विद्यालयमे खेलाइत अछि। एहि खेलमे प्रयुक्त लोक साहित्यकेँ देखल जाए–
झिझिर कोना–झिझिर कोना कोन कोना जैब
एहि कोना जैब, ओहि कोना जैब।
एकटा खेल अछि– “साँप डिग–डिग”। ई एकटा सामुहिक खेल थिक, जाहिमे बहुत नेना एक संग हत्था – जोड़ि कऽ केँ सोझ पाँतीमे ठाढ़ होइत अछि। एकटा कहैत अछि –
की रे बकरिया
की रे छकरिया/बकरी कत्तऽ
खेतमे/धान किएक खेलकौ
खेत्तौ/रोज लेब्बौ
नहि देब्बौ।
तखन दू हाथक बीच दऽ नेनासब बन्हएबाक अभिनय करैत अछि आ बजैत अछि– साँप–डिगडिग/साँप–डिगडिग
जेना पशु–पक्षी सब अपन अबोध नेनाकेँ आत्मरक्षाक उपाय दौड़िकऽ बाजिकऽ, खेलाएकऽ सिखबैत रहैत अछि, तहिना शिशु लोक साहित्यमे सेहो आत्म–रक्षार्थ अनेक प्रकारक खिस्सा–पिहानी
गद्य आ पद्य दुनूमे पर्याप्त मात्रामे उपलब्ध अछि। उदाहरणस्वरूप–बगिया गाछक खिस्सा, गोनू झाक खिस्सा एहिमे सबसँ बेसी लोकप्रियता पौलक अछि। ओना आरो कतेक अछि। जेना–ननदि–भाउजसँ जुरल आँझुलक खिस्सा ‘सातो भाइ परदेस गेल आँझुलकँ दुःख देने गेल’।
तहिना झाँझी कुकुरक सौतिनक खिस्सा–
मोर मन मोर मन नहि पतिआइ
सौतिनक टाँग दुनू झुलिते जाइ।
किछु एहेन लोक–साहित्य देखबामे अबैत अछि जाहिमे निरर्थक शब्द सभक प्रयोग बुझना जाइछ। जेना–
औका–बौका, तीन तरौका/लौआ–लाठी, चानन काठी
चाननकेँ बागमे इजय–विजय/गल–गल पुअबा–पचक।
दोसरः-
ईटा–माटी सोनेक टाट/आठम लड़की भागल जाइ
आलू बम बेटा बम/भौजी नाचए छमाछम।
ज्ञानोपयोगी शिशु लोक साहित्य
“परिवारकेँ सामाजिक जीवनक पहिल पाठशाला” कहल गेल अछि। मैथिली शिशु लोक साहित्यक माध्यमेँ नेनाकेँ अनेक प्रकारक शिक्षा देल जाइत रहल अछि। किछु उदाहरण द्रष्टव्य–
अंक ज्ञानक लेल एकटा खेल अछि– “अट्टा–पट्टा” एहिमे नेनाक दहिना हाथपर अपन दहिना हाथसँ थापर मारल जाइत अछि आ बेरा–बेरी आँगुर पकड़ि कहल जाइत अछि–
अट्टा–पट्टा बौआकेँ पाँचगो बेट्टा
एगो गेल गायमे, दोसर महींसमे
तेसर बड़दमे–चारिम गेल बकरीमे/पाँचम गेल छकरीमे।
तकर बाद तरहत्थीपर, अपन आँगुर रखैत–
एतऽ बुढ़िया स्नहलक, पकौलक, खएलक, पीलक ई कहैत अपन आँगुरकेँ डेगा–डेगी बढ़वैत ओकर हाथसँ काँख धरि लऽ जाएल जाइत अछि आ कहल जाइत अछि–
एतऽ सँ जे चलल बुढ़िया..../गुद्दू गैयाँ।
नेना गुदगुदी लगलापर जोर–जोरसँ हँसैत–हँसैत लोट–पोट भऽ जाइत अछि। एहि प्रकारेँ नेनाकेँ एकसँ पाँच धरि अंकक ज्ञान कराओल जाइत अछि।
तहिना दोसर खेल अछि जाहिमे दू आ दूसँ अधिक नेना ठाढ़ भऽ आँगुरसँ संकेत करैत खेलाइत अछि–
दस, बीस तीस, चालीस, पचास/साठि, सत्तरि, अस्सी, नब्बे, सौ
सौमे लागल धागा, चोर निकलिकऽ भागा
रानी बेटी सोइती, फूलकेँ माला गोइती
मेम खाए बिस्कुट/साहेब बाजए भेरी गुड।
एहि खेलक माध्यम सँ नेनाकेँ दहाइ आ सैकड़ा धरिक अंकक ज्ञान कराओल जाइत अछि।
एकटा खेल अछि– “घो–घो रानी”। एहि खेलमे एकटा नेना बीचमे ठाढ़ होइत अछि आ चारूकात नेनासब हत्था जोड़ी कऽ केँ वृत्ताकार ठाढ़ होइत कहैत अछि–
घो–घो रानी कत्ते पानी–एड़ी धरि
घो–घो रानी कत्ते पानी–ठेहुन धरि
घो–घो रानी कत्ते पानी–जाँघ धरि
घो–घो रानी कत्ते पानी–डाँढ़ धरि
घो–घो रानी कत्ते पानी–ढ़ोढ़ी धरि
घो–घो रानी कत्ते पानी–पेट धरि
घो–घो रानी कत्ते पानी–छाती धरि
घो–घो रानी कत्ते पानी–गरदनि धरि
घो–घो रानी कत्ते पानी–मुँह धरि
घो–घो रानी कत्ते पानी–नाक धरि
घो–घो रानी कत्ते पानी–आँखि धरि
घो–घो रानी कत्ते पानी–माँथ धरि
अंतमे ‘चुभुक’ कहि सब नेना डूबिकऽ नहयबाक अभिनय करैत अछि। एहिमे माध्यमसँ नेना सबकेँ अंगक ज्ञान कराओल जाइत अछि।
एकटा खेल नेना सब एहि प्रकारेँ खेलाइत अछि–एकटा नेना अपन दुनू हाथकेँ उठाकऽ पैघ आकार बनबैत अछि आ तकर बाद क्रमशः छोट करैत जाइत अछि आ कहैत अछि–
एतेक टा की–छिट्टा/एतेक टा की–पथिया
एतेक टा की–मउनी/एतेक टा की–चुक्का
चुक्कामे की–अण्डा/के फोरए–कउआ
के गीजए–हमसब।
ई कहि– ती–ती–ती–ती....कहैत सब नेना कूदऽ लगैत अछि। एहि लोक साहित्यक माध्यमसँ छिट्टा, पथिया, मउनी, चुक्का सभक आकारक ज्ञान कराओल जाइत अछि।
तहिना एकटा खेल अछि जकरा माध्यमसँ किछु वस्तुक उपयोगक ज्ञान कराओल जाइत अछि–
खेलए–धूपए गेलिऐ/एगो लोहा पेलिऐ
सेहो लोहा कथी लेल/हाँसू गढ़ाबऽ लेल
सेहो हाँसू कथी लेल/खड़ही कटाबऽ लेल
सेहो खड़ही कथी लेल/बंगला छराबऽ लेल
सेहो बंगला कथी लेल/भैसी बन्हाबऽ लेल
सेहो भैसी कथी लेल/चोतबा पड़ाबऽ लेल
सेहो चोतबा कथी लेल/अंगना निपाबऽ लेल
सेहो अंगना कथी लेल/गहूँम सुखाबऽ लेल
सेहो गहूँम कथी लेल/आटा पिसाबऽ लेल
सेहो आटा कथी लेल/पूरी पकाबऽ लेल
सेहो पूरी कथी लेल/भौजीकेँ मँगाबऽ लेल
सेहो भौजी कथी लेल/बेटा जनमाबऽ लेल
सेहो बेटा कथी लेल/कोरामे खेलाबऽ लेल
अंतमे–टाइल–गुल्ली टूटि गेल/बौआ रूसि गेल।
उपरोक्त विवेचनसँ लगैत अछि जे मैथिली शिशु लोकसाहित्य नेनाक प्रत्येक पक्षसँ जुड़ल रहल अछि। लालन–पालन आ खेल मनोरंजनसँ सम्बद्ध लोक साहित्यक अधिकता पाओल गेल अछि। खेलक मध्यमसँ मनोरंजनक संग–संग नेना भुटकामे एकता, सहयोग, सहानुभूति आ प्रेमक भावना जगैत अछि। एकर अतिरिक्त अभिनय, नृत्य, गीत आदिक ज्ञान सेहो आरम्भहिसँ होमए लगैत अछि। एखन हमरा सबकेँ मैथिली शिशु लोक साहित्य सन अमूल्य धरोहरकेँ सहेजिकऽ समेटबाक प्रयोजन अछि कारण दिनानुदिन ई अपन मौलिकताकेँ त्यागि विकृत रूप अपनौने जा रहल अछि। जँ एहि दिशामे हमरा सभ सचेष्ट नहि होएब तँ एहि धरोहरक मूल्यवान वस्तु नष्ट भऽ जयबाक प्रबल सम्भावना लगैत अछि।
ओना हम आरम्भेमे कहि चुकल छी जे एहि विषयपर पहिनो बहुत गोटा काज कयलनि अछि आ प्रायः एखनो कऽ रहलाह अछि, मुदा एकर फलक ततेक विस्तृत अछि जे उपलब्ध संकलन यथेष्ट नहि मानल जा सकैत अछि। कारण संकलित शिशु लोक साहित्यसँ कैक बड़ बेसी लोक साहित्य एखनो धरि लोकक ठोरपर छिड़िआएल अछि।
वर्त्तमानमे जखन पाश्चात्य–सभ्यता मिथिलाकेँ चारूकातसँ गछारने जा रहल अछि। लोक “चन्न मामा आ रे आ”केँ त्यागि “ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार” दिस आँखि मुनिकऽ भागल जा रहल अछि आ अपन जे विशिष्ट–वस्तु तकरा त्यागने जा रहल अछि। एहना स्थितिमे हमरा सभक समक्ष यक्ष प्रश्न अछि जे मिथिलाक एहि अमूल्य–निधिकेँ, जे कि, एहिठामक संस्कृतिक, एकटा अपन विशिष्ट परिचिति दैत रहल अछि, तकरा कोनाकऽ अक्षुण्ण राखल जाए। आइ जखन हमसब इक्कीसम शताब्दीक देहतिकेँ पार कऽ रहल छी, विज्ञान अपन विस्तारकेँ सुदूर देहातधरि पसारि चुकल अछि, तेहना स्थितिमे नव–नव तकनीक द्वारा एहि असंकलित शिशु लोक साहित्यकेँ, चिरकाल धरि, संकलित कऽ जोगा कऽ राखल जा सकैत अछि, जन–जन धरि एकर प्रचार–प्रसार कराओल जा सकैत अछि, परंच एकरालेल जरूरी छै–एहि दिशामे एकटा समधानल डेग उठएबाक आ जोरगर प्रयास करबाक।
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२.६. १.श्‍यामसुन्‍दर शशि-नमन गुरुदेव- (साहित्‍यकार डा़. धीरेश्‍वर झा धिरेन्‍द्रक ६ अम वार्षिकीपर विशेष) २.सुजीत कुमार झा हारैत हारैत नेपाल पत्रकार महासंघक केन्‍द्रीय अध्‍यक्ष

साहित्‍यकार डा़. धीरेश्‍वर झा धिरेन्‍द्रक ६ अम वार्षिकीपर विशेष
नमन गुरुदेव
श्‍यामसुन्‍दर शशि
जनकपुरधाम
नेपालीय मैथिली साहित्‍यक जनक एवं जनकपुरक चटिसारके अन्‍तिम प्राचार्य गुरुदेव डा़धीरेश्‍वर झा ‘धिरेन्‍द्र’क छठम् स्‍मृतिसभा पुस २७ गते सम्‍पन्‍न भेल अछि । हुनकर वरदहस्‍त प्राप्‍त क एखन धुरन्‍धर खेलाडी बनल साहित्‍यकारलोकनि हुनका स्‍मरण कएलनि कि नहि से ओएह जानथि मुदा हुनके प्रेरणासँ जन्‍मग्रहण कएने मिथिला नाट्यकला परिषदधरि हुनका अवश्‍य स्‍मरण कएने छल । एहि अवसरपर भाषण भुषण आ किछु घोषणा सेहो भेल । सभके बुझल अछि जे नेतासभक भाषण निष्‍प्रभावी भ रहल आजुक युगमे भाषणप्रतिक आमजनके विश्‍वास घटि रहल छनि । ओना हुनका कोनो मन्‍चपर चढिक स्‍मरण करी वा मोने मोन, कोनो अन्‍तर नहि छैक । कारण देवताक पूजा मोने मोन सेहो कएल जा सकैए । आ असली पूजा त देवताक देखाओल बाटपर चलब थिक । हुनकर आदर्शके पालना करब थिक । हँ जहाँधरि घोषणा करबाक गप्‍प अछि त एतुका वहुत संस्‍था आ व्‍यक्‍ति बहुत किछु घोषणा क चुकल छथि । आव देखवाक अछि जे ई घोषणासभ कार्यरुपमे आएल कि नहि ?
हम जहन गुरुदेवके जनकपुरक चटिसारके अन्‍तिम प्राचार्य लिखए लागल छलहुँ त मोनमे नानाप्रकारक चिन्‍ता व्‍याप्‍त छल । कारण जनकपुरमे सम्‍प्रति जे कलमजिवीसभ सकृय अछि ,ओहोसभ कोनो हिसावसँ कम नहि छथि । सभक संग नाम,दाम आ मुकाम छनि । एहना अवस्‍थामे केओ कहि सकैत छथि जे ‘ओ अन्‍तिम प्राचार्य कोना भ गेलाह ।’ मुदा एहि वास्‍ते हम मैथिली एमएक पहिल बैचक जमावडाक दृश्‍य उदघाटन करए चाहव । ओना उमेरक कारणे हमरा एहि भितरके तिरीभिटीक जानकारी नहि अछि मुदा हम जे देखल से कहए चाहव ।
गुरुदेवके भागिरथी प्रयाससँ राराव क्‍याम्‍पसमे मैथिलीमे एमएक पढाई सुरु भेल छल । मैथिलीक बादे राजनिती शास्‍त्र,अर्थशास्‍त्र किंवा अन्‍य विषयमे स्‍नातकोत्तरके पढाई सुरु भेल । सभके सुखद आश्‍चर्य लागि सकैए जे मैथिलीक एमएक पहिल बैचक विद्यार्थीसभ छलाह सर्वश्री डा़राजेन्‍द्रप्रसाद विमल,जानकी रमण लाल,रामभरोस कापडि‘भ्रमर’डा़पशुपतिनाथ झा,डा़रेवतीरमण लाल, रुद्रकान्‍त झा ‘मडई’,प्रो़परमेश्‍वर कापडि,नमोनाथ ठाकुर,नागेश्‍वर सिंह आदि आदि । ताहु समयमे सभके सभ अपन अपन मुकामपर छलाह । चुकी अधिकांश विद्यार्थी नोकरियाहा छलाह ते कक्षा भोरमे संचालित होईक आ अधिकाश कक्षा गुरुदेवके घरेपर संचालित होईक । चाह पानक दौर चलैक आ पढाई लिखाई सेहो । हम,घुटुल आ पुटुल चाह पान लावएमे परेसान रही । हँसीक पमारा छुटैक ,विभिन्‍न विषयपर गंथन मंथन होईक आ गुरुदेव डिक्‍टेशन लिखवथिन । हमरा मोन अछि भाषा विज्ञानके कापी तैयार करैत काल गुरुदेव जानकी बाबू आ विमलसरसँ बेर बेर राय सल्‍लाह कएल करथि । यदि अधलाह नहि लागय त स्‍वीकार करए पडत जे ओएह कापीक आधारपर एखनो मैथिलीक एमएक विद्यार्थीसभ परीक्षामे पास करैत छथि ।
एखनो जनकपुरमे मैथिली विद्वानक कमी नहि अछि । मैथिलीक प्राध्‍यापकके सख्‍या सेहो पहिनेसँ बेसी अछि । कि एखन गुरुदेवद्वारा चलाओल गेल चटिसार चलैत अछि ?यदि नहि त हुनका जनकपुरक चटिसारक अन्‍तिम प्राचार्य कहवामे कि हर्ज ?
गुरुदेवके स्‍मरण करैत काल एकगोट आओर विषय मोन परैत अछि । ओ ई जे ओ मैथिली भाषाक साहित्‍यकारटा नहि छलाह । साहित्‍यकार श्रृजना करएवला ब्रम्‍हा सेहो छलाह । केओ मानथि वा नहि मानथु ओ महेन्‍द्र मलंगियाके नाटक लिखवाक प्रेरणा आ सिख दुनू देलथिन । रेवती रमणलालके रिपोर्ताज लिखवाक आदेश देलथिन । रामभरोस कापडिके कविता आ गीत एवं भुवनेश्‍वर पाथेयके कविता आ कथा लिखवाक जिम्‍मेवारी देलथिन ।
प्रतिभा आ रुचिक अनुसार गुरुदेवद्वारा कएल गेल ई जिम्‍मेवारी विभाजनके पाछा बहुत पैघ उद्येश्‍य छल हेतनि । ओ चाहने हेताह जे नेपालीय मैथिलीमे सेहो सभ विधामे रचना हो । पाछा जा से भेवो कएल । भलेहि भारतीय हुनके किछु शिष्‍यद्वारा षडयन्‍त्र कएल गेल हो मुदा ‘नेपालीय मैथिली साहित्‍य’क नामाकरण ओएह कएने छलाह ।
हे गुरुदेव । अहाँ प्रेरणा दियौ जे जनकपुरमे फेरसँ गुरुकुल परम्‍परा चलि सकए । चुकी एखन साहित्‍य श्रृजनसँ बेसी मैथिलसभके अधिकारक आवश्‍यकता छैक । मैथिलके अपन राजपाट होईक आ अपन भाषामे काज क सकए । ओना हमरा मोन अछि अपनेक ओ जीद्द
नोरक टघारेसँ जिनगी जँ निर्मित
आशाकेर कमल अछि हृदयकेर दहमे
कठिन युद्ध अछि ई त लडिए रहल छी
हारब ने किन्‍नहु ,हमर जीत निश्‍चित ।।
अपनेक अनुचरलोकनि अपनेक ईक्षाके अवश्‍य पूरा करत ।
२.सुजीत कुमार झा
हारैत हारैत नेपाल पत्रकार महासंघक केन्‍द्रीय अध्‍यक्ष
नेपालमे एकटा कहावत अछि नेपालक एकीकरणक समयमे पृथ्‍वीनारायण शाह कतेको ठाम हारि गेल रहथि । निराश भऽ अपन घरमे अराम कऽ रहल रहथि की देखलखिन एकटा चुट्टी किछ पर चढयकेँ प्रयास करैत छल आ ओ बीचमे खसि परैत छल । चुट्टी के देखलखिन चारि पाँच वेरक प्रयासक वाद ओ चढि गेल । एकरवाद हुनका एकटा ज्ञान भेटलन्‍हि आ पृथ्‍वीनारायण शाह फेर सँ एकीकरण अभियानमे जुटि गेलाह , एखनकेँ नेपाल अछि तकर निर्माण भऽ सकल ।
करीब—करीब नेपाल पत्रकार महासंघक केन्‍द्रीय अध्‍यक्ष धर्मेन्‍द्र झा सँग एहने स्‍थिति भेल अछि । ओ चुट्टी तऽ नहि देखलथि मुदा पत्रकारक नेतृत्‍व करबाक अछि से अठोट हुनका केन्‍द्रीय अध्‍यक्ष बना देलक ।
धर्मेन्‍द्र २०५१ सालमे नेपाल पत्रकार महासंघ धनुषाक कोषाध्‍यक्षमे हारल रहथि । फेर २०५४ सालमे केन्‍द्रीय सदस्‍य पदमे, २०५९ सालमे केन्‍द्रीय सचिव पदमे , २०६२ सालमे महासचिव पदमे हारल रहथि । किछ गोटे तऽ हुनका हरुवा पुरुष तक कहय लागल छलनि । मुदा २०६५ सालमे नेपालक पत्रकार सभक सभसँ वडका पद महासंघक केन्‍द्रीय अध्‍यक्ष भऽ गेलथि । नेपाल पत्रकार महासंघक पूर्व अध्‍यक्ष तारानाथ दहाल कहैत छथि– ‘महासंघक नेतृत्‍व करबाक अछि से अठोट आ पत्रकार सभ बीच सम्‍वाद कायम राखब धर्मेन्‍द्रकेँ अहि स्‍थान पर पठौलक ।’ धर्मेन्‍द्र अहि बीचमे २०५६ सालमे केन्‍द्रीय सदस्‍यमे मात्र जितल छलथि । ओ स्‍वंय कहैत छथि — ‘केन्‍द्रीय कमिटीक विभिन्‍न पदमे हारलौ तहुँ सँ बेसी जनकपुरमे कोषाध्‍यक्ष पदमे हारल छलौं तहिया बड दुःख भेल छल ।’ ३०/३५ गोटे सदस्‍य रहल जिल्‍लामे हारि गेलौं तकर बाद प्रण लेने रही जे केन्‍द्रक प्रमुख पदपर पहुँच सभकेँ देखा देबै ।
कहियो नेता बनयकेँ सपना देखने धर्मेन्‍द्र रामस्‍वरुप रामसागर बहुमखी क्‍याम्‍पस जनकपुर अन्‍तर्गतक स्‍वतन्‍त्र विद्यार्थी युनियनक सदस्‍य आ नेपाल विद्यार्थी संघ धनुषाक उपाध्‍यक्ष सेहो भेल रहथि । मुदा स्‍ववियू कालमे २०४३ सालमे चहल पहल नामक भिते पत्रिका निकाललथि । आ सम्‍पादक भेलाक बादक लोकप्रियता वा प्रभाव हिनका अहि दिस खिच लेलक । ओ अपन स्‍ववियूकालमे जागृति नामक पत्रिकाक सम्‍पादक सेहो भेल रहथि ।
मैथिली आ राजनीति शास्‍त्र सँ एम.ए आ इन्‍डियन इन्‍स्‍टिच्‍यूट अफ मास क्‍म्‍युनिकेशन दिल्‍ली सँ डिप्‍लोमा धरिकेँ पढाइ कएने धर्मेन्‍द्र पत्रकारिता केँ पेशा बनौलथि । धर्मेन्‍द्रक बाबु राजेन्‍द्र झा कहैत छथि– ‘धर्मेन्‍द्र लग क्‍याम्‍पसमे टिचिङ्ग करब, अन्‍य सरकारी नोकरी दिस जाएब आ पत्रकारिता करब तिनटा विकल्‍प छल । मुदा हम देखलियै धर्मेन्‍द्रक इच्‍छा पत्रकारिता दिस वेसी अछि । पत्रकारितामे बहुत रास कठिनाइ छैक बुझलाक बादो हमसभ कोनो रुकाबट नहि कएलौ ।’
जाहि लगन सँ ओ काज करैत छलथि हमरा विश्‍वास छल ओ एक दिन बढिया करता राजेन्‍द्र आगा कहलन्‍हि । २०२३ चैत ४ गते माता मनोरमा झा आ पिता राजेन्‍द्र झाक जेष्‍ठ पुत्रक रुपमे सिरहा जिल्‍लाक गोविन्‍दपुर वस्‍तिपुरमे जन्‍म लेनिहार धर्मेन्‍द्र जहिना पत्रकारक नेता छथि तहिना लेखन क्षेत्रमे सेहो चोटी पर छथि ।
काठमाण्‍डू सँ प्रकाशित अन्‍नपूर्णापोष्‍ट दैनिकक समाचार संयोजक छथि । धर्मेन्‍द्र हिमालय टाइम्‍स दैनिककेँ कार्यकारी सम्‍पादक सेहो रहि चुकल छथि । जनकपुरमे धर्मेन्‍द्रक सम्‍पादनमे प्रकाशित नवविचार साप्‍ताहिक पत्रकारितामे एकटा अलग चिज देने छल । प्रत्‍येक हप्‍ता अन्‍तरवार्ता, व्‍यंङ्ग, समाचारमे विविधता ओहि पत्रिकाक विशेषता
छल । ओना व्‍यवसायिक पत्रकारिता माधव आचार्यक सम्‍पादनमे जनकपुर सँ प्रकाशित जनआकांक्षा आ विएम खनालक सम्‍पादनमे प्रकाशित विदेह साप्‍ताहिक सँ शुरु कएने छथि ।
साहित्‍यमे सेहो धर्मेन्‍द्रके प्रयोगवादी कविक रुपमे चिन्‍हल जाइत अछि । धर्मेन्‍द्रक रस्‍ता तकैत जिनगी, एक श्रृष्‍टी एक कविता , एक समयक वात, धुनियाएल आकृतिसभ सनक हिनक मैथिली संग्रह आएल अछि । तहिना नेपालीमे गोनु झाका कथाहरु , कौशलका परिहास सहित दर्जन सँ बेसी पुस्‍तक प्रकाशित अछि ।
पुरस्‍कारक बात जँ कएल जाए तऽ २०५५ सालमे नेपाल विद्याभूषण ‘ख’, रिपोर्टस क्‍लबद्वारा २०६० सालमे वेष्‍ट जर्नलिस्‍ट अवार्ड , २०६४ सालमे नागाअर्जुन वेष्‍ट पब्‍लिकेशन पुरस्‍कार , २०६५ सालमे राष्‍ट्रीय प्रतिभा पुरस्‍कार देल गेल अछि ।
भारत , अमेरिका , श्रीलंका, बंगला देश, कतार, नर्बे, फिन्‍लैण्‍ड , डेनर्माक, स्‍वीडेन आ जर्मनीके भ्रमण कऽ चुकल धर्मेन्‍द्र के आगा बढाबयमे माता पिताक अतिरिक्त कनिया मुन्‍नी झाक सेहो महत्‍वपूर्ण योगदान रहल ओ प्रसंगक क्रममे वेर वेर कहलन्‍हि । देशक पत्रकारसभके श्रमजीवि ऐन अन्‍तर्गत मिडियासभ तलब दौक, विना नियुक्ती पत्रके देशक कोनो पत्रकार के काज नहि करय परैक ताहि अभियानमे ओ आ हुनक नेपाल पत्रकार महासंघ अखन लागल अछि ओना मैथिलीक अभियानी लोक सेहेा छथि । मैथिली भाषा साहित्‍य कला साँस्‍कृतिकेँ कोना बढाओल जाय ताहिमे लागल रहैत छथि । फेर सफलताक शिखर पर चढलाक बादो धर्मेन्‍द्र अपन कैरियरकेँ प्रति ओतबे गम्‍भीर छथि जतेक २०/२५ वर्षक युवा रहैत अछि ।
२.७. कुमार मनोज कश्यप-जन्‌म : १९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाममे आ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखनमे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवाणी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रिय सचिवालयमे अनुभाग अधिकारी पद पर पदस्थापित।
अन्हेर

बड़ एकंात्मता बुझा रहल आछ हमरा स्वयं आ एहि ट्रेन मे---दुनू पड़ायल जाईत -- कंोनो-कंोनो स्टेशन पर बिलमैत -- नव-नव लोकं सँ परिचय आ पुरान सँ संग छुटब --तथापि ने मिलनकं खुशी ; ने वियोगकं दुःख----चरैवेति़ चरैवेति ।

टुगर हम क़ंक्कंा -कंाकंीकं कृपा पर जीबैत भैंस-बकंरी चरबैत । मोने आछ हमरा जे हम, जीबछा, मलहा सभ केयो टाईल-पुल्ली खेलबा मे एतेकं ने मस्त रही जे महींस के हाँकंबो बिसरि गेलहुँ । सभटा महींस भोकंनी साहुकं खेसारी खेत मे हुलि गेलै । एके-दू बेर तऽ मुँह मारने हेतै महींस सभ किं कंतऽ ने कंतऽ सँ दनदनाईत भोकंनी साहु जुमि गेलै़तामसे-पित्ते माहुर भेल़़बिखिन्न-बिखिन्न के गारि पढ़ैत । सभकं महींस तऽ हाँकिं कंऽ लईये गेलै ओ ; भोलबा सेहो पक़ंडा गेल । सभ छौंड़ा सभ जेम्हरे पओलकं तेम्हरे जान बचा कंऽ पड़ायल । डरे हमहुँ बेछोहे प़ड़ेलहुँ । डर भोकंनी बाबू सँ बेसी तऽ कंक्कंा आ कंाकंीकं छल़़दुनू बात-बात पर कंोना अधमौगति कंऽ मारैत आछ लाते-मुक्के, जे पओलकं ताहि लऽ कंऽमरबा-जीबाकं कंोनो ठेकंान ने ।

हम रेलवे कंाते-कंात पड़ायल जाईत रही किं लागल केयो पाछु सँ हमर आँगी पकंड़ि लेलकं डरे हमर होश गुम्म भऽ गेल अधमरू सन भऽ गेलहुँ । बफाड़ि कंटैत हम कंहुना एहि चाँगुर सँ अपना के छो़ड़ेबाकं अंतिम प््रायास कंरैत आगु दिस जोर लगबैत रहलहुँ । पेᆬर धम्म्‌ दऽ मुँहे भरे खसलहुँ । देह सँ माटि झाड़ैत हम पाछाँ तकंलहुँक़ेयो नहिं छल । जान मे जान आयल । हमर आँगी सिगनलकं तार मे ओझड़ा गेल छल । दूर तकं देखलहुँक़ेयो एम्हर नहिं आबि रहल छल । डर किंछु कंम भेल । ताबते कंोनो ट्रेन सिगनल पर आबि कंऽ ठाढ़ भेल । नुकंा कंऽ हम ओहि मे चढ़ि गेलहुँ डरे एकं कंोन मे दुबकंल ठाढ़ रही । एकंटा आदमी कंने कंात सहटि कंऽ हमरा बैस जेबाकं ईसारा केलकं । असोथकिंत तऽ भईये गेल रही ; बैसिते आँखि लागि गेल । आँखि खुजल तऽ सौंसे डिब्बा खाली छलैकं । धड़फ़डा कंऽ ट्रेन सँ नीचा उतरलहुँ । लोकंकं एहि अजश्र भीड़ मे एकंहुटा चेहरा चिन्हार नहिंज़गह अनचिन्हार; लोकं अनचिन्हार अनभुआर हम आब कंतऽ जायब ?क़ंी कंरब ?? बुकंौर लागऽ लागल हमरा डरे जाँघ थरथराय लागल - 'नहिं जानि कंोन दुरमतिया घेरने छल जे गाम सँ पड़ा गेलहुँग़ाम पर मारिये खैतौं ने ! पहिनहुँ किं कंोनो कंम्म मारि खेने छी ।क़ंी बिगड़ितै मारि खा कंऽ ? देह मे भूर तऽ नहिं ने भऽ जैतै ? मरि तऽ ने जैतौं ? एहि परदेश मे तऽ आब बिलटि कंऽ मुईनाईये लिखल आछ । बौड़ल लोकं अपन देश कंहाँ आपस जा पबैत आछ़़ओकंरा सभ के सुख-सराध लोकं ओहिना कंऽ दैत छै । ' डरे हदास उड़ऽ लागल जोर-जोर सँ हिचुकंऽ लागल रही ।

बुझायल जे केयो हमरा कंान्ह पर हाथ रखलकं चौंकिं कंऽ तकंलहुँ । एकंटा अधवयसु पुरूष हमर कंनबाकं कंारण जानऽ चाहि रहल छल । ओकंर स्नेह सँ हमर कंरेजा फाटि गेल मोन भेल भरि ईच्छा कंानी । हम किंछु ने बाजि सकंल रही । ओ हमरा स्टेशनकं खाली बेंच पर बैसा कंऽ मारते रास कंचड़ी-मुड़ही-घुघनी कंीनि कंऽ खेबा हेतु देलकं । भुख सँ तऽ अँतरी बैसल जाईत रहै़हम खाय लगलहुँ । कंने सुभ्यस्त भेलहुँ तऽ ओ पोल्हा कंऽ सभ बात पुछय लागल । पहिने तऽ हमरा किंछु नहिं बाजल भेल खाली हिचुकैत रहलहुँ । परदेश मे एकंटा अनचिन्हार द्वारा एहन स्नेह पओला सँ हम ओकंर कृतग्य भऽ गेल रही । हम ओकंरा सभ बात बता देलियै आ कंहलियै जे ओ हमरा गाम बला ट्रेन पर बैसा दिअय । ओ हमरा बड़ बोल-भरोस देलकं आ कंहलकं जे आब आई तऽ कंोनो ट्रेन नहिं छैकं ; कंाल्हि ट्रेन धड़ा देत । ता राति भरि लै अपना बासा पर लऽ गेल । मुदा ओ हमरा गामकं ट्रेन नहिं धड़ओलकं नित नव-नव बहाना । हमरे तुरिया ओकंरो बेटा रहै । खेलाईत-खाईत हमरो दिन बीतऽ लागल़़ग़ामकं सुरता धिरे-धिरे कंम होईत गेल ।

ओकंरा सभकं हमरा प््राति स्नेह व्रᆬमशहे कंम्म होईत गेलैकंआब हमरा उपर घरकं कंाजकं संगहिं माल-जाल , खेत-पथार, बाड़ी-झाड़ी सभ टा जिम्मेदारी छल़़क़ंान वुᆬरियेबाकं तकं के पलखति नहिंताहि पर गारि-गंजन सेहो हुअय लागल । आजिर भऽ कंऽ एकं दिन सिन्हा साहेब सँगे ओहि ठाम सँ पड़ा गेलहुँ ।

सिन्हा साहेब हमरा भोरे-भोर सभ दिन भेंट भऽ जाथि ओ टहलय निकंलैत छलाह आ हम मलिकंाईनकं पूजा लेल पूᆬल तोड़य निकंलैत छलहुँ । आपस मे देखि कंऽ मुस्किंयेनाई , पेᆬर प््राणाम आ तकंरा बाद बढ़ैत गेल अपनत्व । सिन्हा साहेब कंोनो पैघ ऑफीसर रहथि । हमरा अपन माय-बाप के मुँह तकं मोन नहिं लोकं कंहई अलच्छा जनमिते माय-बाप के खा गेलई । मुदा सिन्हा साहेब मे हम अपन माय-बापकं छाँह साफ देखैत छलहुँ । हम हुनकंा अपन देवता समान बुझैत रहलहुँ आ ओ हमरा अपन संतान सँ बढि कंऽ मानैत छलाह । अपने जतऽ-जतऽ जाईत रहलाह हमरा संगे रखलनि । एकं दिन अनचोके मे हुनकंो साहचर्य हमरा सभ के छुटि गेल आब ओ एहि दुनियाँ मे नहिं रहलाह ।

हम आब हुनकंर बेटाकं कंारखाना मे कंाज कंरैत छी । कंारखाना के कंाज सँ जयनगर जा रहल छी । ट्रेनकं ख़िडकंी सँ पाछु पड़ायल जाईत खेत-पथार, कंलम-गाछी, बाध-बोन, ईनार-पोखरि अचानकं हमरा मोन मे हमर बाल्यकंाल एकंटा छाँह जकंाँ पसरि गेल आछ । ट्रेन एके बेर धक्कंा संग रूकिं जाईत आछ । यात्री सभ एम्हर-ओम्हर तकैत एकं दोसरा सँ ट्रेन रूकंबाकं कंारण पुछि रहल आछ । किंछु गोटे तऽ कंारणकं खोज मे ट्रेन सँ नीचा उतरि गेल आछ । हमरो मोन उबिया गेल वा ई कंहु जे रेलकं पटरी कंातकं मनभावन दृश्य हमरो ट्रेन सँ नीचा उतरबा लेल विवश कंऽ देलकं। लोकं बजैत छै जे माओवादी सभ ट्रेन के पटरी उड़ा देने छै़आब ट्रेन आगू नहिं जा पाओत । हम चारू कंात मुड़ी घुमा कं चर -चित लैत छी - सामने पुल पर बोर्ड लागल छैकं -- कंमला पुल सं० ७ । हमर दिमाग पर जोर पड़ल हमरो गामकं पुल के तऽ लोकं साते नम्बर पुल कंहै । ओहु ठाम एकंटा एहने झमटगर पीपड़ के गाछ छलै । हम तजबीज कंरैत छी । यादकं आर कंोनो चिन्ह नहिं बुझाईत आछ । मुदा ई कंमला नदी जकंरा लोकं मोईन कंहैत छलैकं आ एकंर भीड़ पड़हकं ई पीपड़कं गाछ !? हम ट्रेन सँ अपन बैग लऽ कंऽ नीचा उतरि जाईत छी ।

रस्ता कंात मे गुम-सुम ठाढ़ हम आखयास कंऽ रहल छी समय कंतेकं जल्दी बदलि जाईत छैकं मोईनकं कंात मे पीपड़कं गाछ तर बदरिया के चाहकं दोकंाऩ़ओकंर दस पैसी नागीन बिस्वुᆬट कंी सुअदगर ! साँझ-भिनसर भरि गामकं लोकं जुटै एहि दोकंान पऱ़ग़ाम-घर, देश-दुनियाँ, खेती-पथारी सभ टा गप्प होई एहि ठाम । हमरो कंक्कंा घर मे कंतबो चाह पीने होऊ जाबत भोर-साँझ एतुक्कंा चाह नहिं पिबैत छल ताबे चैने नहिं क़ंाकंी भने कंतबो अपन कंपाड़ नोचौ । हमरा मोने आछ जे एकं बेर धानकं सीस लोढ़ि कंऽ ओहि पाई सँ चाह पिबैत रही कंी कंतऽ ने कंतऽ सँ कंक्कंा आबि गेल रहै आ बिना किंछु पुछने तेहन घरमेच्चा मारने रहै जे गाल पर लिला-मशा पड़ि गेल रहै । गिलास तऽ दुर पेᆬकंा कंऽ चूड़-चूड़ भऽ गेल रहै । लोकं सभ कंते दुर्‌ छीः केने रहै कंक्कंा के । ई मोईनो कंतेकं चौड़गर रहै ताहि दिन । कंी मजा अबै पीपड़कं पुᆬनगी पर चढ़ि कंऽ पानि मे वुᆬदई मे । कंते-कंते कंाल हम डुब्बी मारने रहि जाई पानि मे एके सुरूकिंया मे आधा मोईन के पार कंऽ जाई । देखनाहर अचम्भित रहि जाई । मोईनकं ओहि कंछाड़ पर कंतेकं रास जामुनकं गाछ रहै़ख़ाईत-खाईत अघा जाई केयो रोकं-टोकं केनहार नहिं । खायल भऽ जाय तऽ जामुनकं डारि तोड़ि दातमनि कंरब़़ सभ चेन्ह मेटल । कंतेकं मजा अबैत छलै ! एखनो मोने आछ मोकंना जे महेशकं बाड़ि सँ केरा घौड़ चोरा कंऽ कंाटि अनने रहै आ सभ मिलि कंऽ नहरिकं कंछेड़ मे खाधि खुनि कंऽ ओकंरा गाड़ने रही । झलफल अन्हार होईते सभ ओहि ठाम जमा होई आ भरि ईच्छा केरा खाई ।

हम बान्ह दिस नजरि दौड़बैत छी । साँझकं मैलछौंह अऩहार पसरल जा रहल आछ । चरबाहा, घासबाली, गोबर-गोईठा बिछयबाली सभ अपन-अपन घर आपस भऽ रहल आछ । रस्ता कंात मे ठाढ़ हम बितल समय के अपन मुट्‌ठी मे बंद कंरबाकं अंतहीन प््रायास कंऽ रहल छी । बगल सँ एनहार - गेनहार किंछु अचम्भित सन हमर मुँह देखि आगू बढ़ि जाईत आछ ।

- 'बड़ी कंाल सँ आहाँ के एतऽ ठाढ़ देखि रहल छी। कंतऽ जेबई अपने? '

- ' एहि गाम मे कंतऽ जेबई से तऽ हमरा अपनो नहिं बुझल आछ । बस एतबे टा मोन आछ जे साईत हम कंहियो एहि गामकं वासी रही । बाबूकं नाम तऽ नहिं मोन आछ कंारण हम हुनकंर मुँहों नहिं देखने छलहुँ । हँ हमर कंक्कंा के नाम बुधन छल । '

- 'कंोन बुधन? '

- 'बुधन मंडल । '

- 'तोहर नाम मदना तऽ ने छह ? '
- 'हँ हमर नाम मदन आछ । '

सुनिते ओ आदमी हमरा भरि पाँज कंऽ पकंड़ि लेलकं - ' मदना रौ ! कंतऽ छलैहैं एतेकं बरख धरि ? हमरा सभ के तऽ भेल जे कंतौ मरि-खपि गेलैं । हमरा नहिं चिन्हलैं?हम जीबछा !तोहर लंगोटिया यार !! ' पेᆬर हमरा माथ सँ पैर तकं निघारैत बाजल- 'तों तऽ साहेब भऽ गेलैं हमरा आऊर तऽ गाम मे ओहिना के ओहिना---दुनियाँ-जहानकं फिरेसानी !!! खैर छोड़ ई बात सभ । ई कंह जे एतेकं दिन कंहाँ पतनुकंान लेने छलैहैं ? बुडिबकं कंहाँ के ! अहुना केयो गाम बिसरैत आछ ? ' पेᆬर ओहि ठाम एकंत्र लोकं सभ के हमर परिचय दैत कंहलकै - ' कंक्कंा एकंरा नहिं चिन्हलियै ! ई अपन मदना छी ! अरे ! दछिनबाड़ि टोल मे जे बुधन मंडल छल ओकंरे भातिज हम सभ तऽ संगे उठी -बैसी , खाई-खेलाई़़ । ' लोकंकं आन्भग्यता देखैत बाजल - 'अरे ! तों सभ कंी जानऽ गेलही एकंरा बुधन मंडल के मरलो तऽ जमना बीति गेलै़आ ईहो मदना तऽ गोड़ चालीस बरखकं बाद गाम आयल हैत । ' ओ हमरा जनाबऽ लागल- 'तोहर कंक्कंा-कंाकंी दुनू आन्हर भऽ कंऽ मुईलउ अंतकंाल मे केयो एकं घोंट पानि तकं ने देबऽ बला़। संतान तऽ भगवान देबे नहिं केलखिन । डीह पर ओहिना जंगल-झाड़ जनमल़़निपुत्रकं डीह पर केयो किंयैकं जायत ?'

लाठी टेकंने एकंटा वृद्ध भीड़ के चीड़ कंऽ बीच मे आयल । 'कंक्कंा एकंरा नहिं चिन्हलियै ?ई बुधन मंडलकं भातीज मदना थीकं जे अहींकं मारिकं डरे महींस छोड़ि कंऽ जे पड़ायल से आई एते बरिख के बाद उपर भेलै । ' जीबछा कंहने रहै ।

'अच्छा ई मदना छी ! एकंदमे बदलि गेल ! कंतऽ छलह हौ एतेकं दिन? कंोना मोन पड़लह गाम -घर एतेकं युगकं बाद? '
हम गुम्मे रहलहुँ ।

'कंक्कंा ई मदना नान्हि टा गलती केलकं जे एकंर महींस आहाँकं खेत चरि गेल ताहि लेल एकंरा चालीस बरखकं वनबास भोगय पड़लैकं आ ई नक्सलबादी अताई सभ जे एहन - एहन पैघ जुलुम कंरैत आछ तकंरा देखऽ बला केयो नहिं ! सत्ये अन्हेर भऽ रहल आछ एहि कंलयुग मे । ' कंहि कंऽ ओ आकंाश दिस तकंलकं । पेᆬर हमर बाँहि पकंड़ि कंऽ कंहलकं - 'चल यार घर पर बैसि कंऽ दुनू दोस्त भरि मन बतियायब । ' लोकंकं हुजूम हमरा पाछाँ-पाछाँ चलि रहल छल ।
२.८. १.डा.रमानन्द झा ‘रमण’-तन्त्रानाथझा/ सुभद्रझा जन्मशतवार्षिकी २. ऋृषि वशिष्ठ- जुआनी जिन्दाबाद ३. शिवशंकर श्रीनिवास- पण्डित ओ हुनक पुत्र
डा.रमानन्द झा ‘रमण’
तन्त्रानाथझा/ सुभद्रझा जन्मशतवार्षिकी
‘हम आगि आ हमरा प्रज्ज्वलित कएनिहार तन्त्रनाथ बसात।’ - सुभद्र झा
राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्रामक आगि जेना-जेना सुनगैत, पजरैत एवं लहकैत गेल, मिथिलाक संग मिथिलाक भौगोलिक
सीमासँ बाहर सांस्कृतिक मिथिलाक लोकमे अपन भाषा, साहित्य एवं संस्कृतिक विकास, प्रचार-प्रसार एवं संरक्षणक चेतना सेहो क्रमशः घनीभूत होइत रहल। एहि चेतनाक फलस्वरूप गत शताब्दीक पहिल दशक, मैथिली भाषा-साहित्यक लेल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। सांस्कृतिक मिथिलाक प्रबुद्ध मैथिल, मैथिलीमे पत्र-पत्रिकाक सम्पादन-प्रकाशन ओही दशकमे आरम्भ कएल। एहि सन्दर्भमे विद्यावाचस्पति मधुसूदन ओझा एवं म.म.मुरलीधर झाक नाम आदरक संग स्मरण कएल जाइछ। ओही दशकमे कमसँ कम एक सोड़हि मैथिलीक अवदानी साहित्यकारक जन्म भेल। ओ सभ अपन प्रतिभा अध्ययन-अनुशीलन एवं मातृभाषा प्रेमसँ मिथिला भाषाक मानकीकरण कएल। भाषा लेल विभिन्न प्रकारक प्रतिमान स्थापित कएल। हुनका लोकनिक संघर्षशील व्यक्तित्वसँ मैथिलीक आधार सुदृढ़ भेल। सरहपाद, ज्योतिरीश्वर आ महाकवि विद्यापतिक भाषा मैथिली, राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तरपर भाषा-कुलमे गरिमापूर्ण स्थान पाबि सकल। दोसर दिश ओ सभ अपन-अपन कारयित्राी प्रतिभासँ मैथिली-साहित्यमे उत्कृष्ट विविधवर्णी रचनाक पथार लगा देलनि। हुनका लोकनिक समस्त क्षमता आ ऊर्जा मैथिली साहित्यक संवर्धन लेल तँ छलैके, एहू लेल ओ सभ चिन्तित एवं प्रयासरत छलाह जे आबएबाला युगमे अपन मातृभाषाक प्रति लोकमे सहज अनुराग रहैक, सम्बद्धता एवं प्रतिबद्धतामे कमी नहि आबए तथा साहित्य-सर्जनाक प्रवाहक गति अवरुद्ध नहि हो। एहि हेतु ओ सभ परती-पराँतहु जोति-कोड़ि पर्याप्त भूमि तैआर कए देलनि। आइ हुनके लोकनिक दूरदर्शिता, परिश्रम एवं प्रतापसँ उपजल जजात, हमरा लोकनिक बीचक कतेको गोटे काटि आ ओसा फूससँ, खपड़ा आ खपड़ासँ कोठा पीटि रहल छथि। ओहन-ओहन महानुभावक जन्म शतवार्षिकीक आयोजन निश्चिते श्लाघ्य एवं प्रेरणास्पद अछि। स्वागत योग्य अछि। आयोजकक संगहि ओ व्यक्ति धन्यवादक पात्र छथि। जनिका मनमे ई आयोजन उचड़ल छलनि वा उचड़ैत छनि।
सर्वप्रथम हम मैथिली भाषा साहित्यक लेल अत्यन्त महत्वपूर्ण गत शताब्दीक पहिल दशकमे जनमल मैथिलीक साहित्यकार, यथा - अच्युतानन्द दत्त, ईशनाथझा, कालीकुमार दास, कांचीनाथझा ‘किरण’, काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’,
गणेश्वरझा ‘गणेश, जयनारायण झा‘विनीत, जीवानन्द ठाकुर, जीवनाथ झा, तन्त्रानाथ झा, दामोदरलाल दास ‘विशारद’,
दुर्गाधर झा, नरेन्द्रनाथ दास ‘विद्यालंकार’, प्रबोधनारायण चौधरी, बैद्यनाथ मिश्र ‘यात्राी’, भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’, महावीर झा ‘वीर’, रमानाथ झा, रमाकान्त झा(नेपाल), लक्ष्मीपति सिंह, शशिनाथ चैधरी, श्रीवल्लभ झा, श्यामानन्द झा, सुरेन्द्र झा ‘सुमन’, सुभद्र झा, हरिमोहन झा, हरिनन्दन ठाकुर ‘सरोज’ आदिकेँ जे मैथिली साहित्यक खंँाम्ह छलाह, वर्तमान शताब्दीक पहिल दशकक अन्तिम वर्षमे स्मरण करब। सुधी समाजक ध्यान एहि तथ्य दिश आकृष्ट करए चाहब जे उपर्युक्त अवदानी साहित्यकारक सूचीमे अधिकांश लोक सरिसब परिसरक छथि। अथवा सरिसब परिसरसँ अन्य प्रकारेँँ सम्बद्ध छथि वा सरिसब परिसरक शिष्यत्व ग्रहण कएलापर हुनक सर्जनात्मक प्रतिभाक अंकुर प्रस्फुटित भए पल्लवित-पुष्पित भेल अछि। अपन भाषा-साहित्यक प्रचार-प्रसार एवं संरक्षण लेल सदिखन तत्पर एहि उर्वर परिसरक समागत मातृभाषा अनुरागी एवं विज्ञजनकेँ हमर प्रणाम निवेदित अछि।
डा.सुभद्र झा (जन्म 09 जुलाइ, 1909 - देहावसान 13 मइ, 2000) लिखलनि अछि जे ‘हम आगि आ हमरा
प्रज्ज्वलित कएनिहार तन्त्रानाथ बसात।’ सुभद्र झा एवं तन्त्रानाथ झा( जन्म 22 अगस्त, 1909 - देहावसान 02 मइ,1984)क पारिवारिक पृष्ठभूमि भिन्न छल, अध्ययन एवं अध्यापनक विषय भिन्न छल, स्वभावो भिन्न छलनि तथापि आगिक दाहकता बसातक गति पाबि तेहन ने ताप उत्पन्न कएलक जे पटना विश्वविद्यालयमे मैथिलीक स्वीकृतिक बाटक कतेको ढ़ेङ जरि सुड्डाह भए गेल। प्रतिकूल स्वभाव एवं पृष्ठभूमिक लोकमे एहन समर्पण, निःस्वार्थ मित्र भाव एवं मिलि सामाजिक काज करबाक तत्परताक उदाहरण सर्वथा दुर्लभ अछि। डा.दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’ लिखल अछि जे मैथिली साहित्यक सजग प्रहरी सिनेटक सदस्य तन्त्रनाथ झा, अपन अनन्य मित्र डा. सुभद्र झाक संग मैथिलीक स्वीकृतिक सभ कार्यक संयोजन कएल करथि। ओ इहो लिखल अछि जे सुभद्र झाक चतुर-प्रयाससँ तन्त्रानाथ झा सिनेटर निर्वाचित भेल छलाह। से ठीके, जँ डेग-डेग पर डा.सुभद्र झाक सहयोग तन्त्रानाथ झाकेँ नहि भेटल रहितनि तँ विश्वविद्यालयक स्तरपर मैथिलीक मान्यताक हेतु प्रयासरत संग्रामी दलक सफल नेतृत्वक जे श्रेय
हुनका भेटि रहल छनि, से सम्भव नहि होइत। आ तखन मैथिली सूर्पनखाक हाथेँ कहिआ ने झपटा लेल गेल रहितथि।
तन्त्रानाथ झाक अवदान
तन्त्रानाथ झाक अवदानकेँ दू कोटिमे राखि सकैत छी - क.आन्दोलनात्मक एवं ख. साहित्य सर्जना द्वारा मैथिली साहित्यक संवर्धन।
तन्त्रानाथ झाक आन्दोलनात्मक काज मोटामोटी चारि प्रकारक अछि - 1. पटना विश्वविद्यालयक उच्चतर कक्षामे मैथिलीक स्वीकृति, 2. शिक्षक समुदायक लेल संघर्ष, 3. शिक्षाक क्षेत्रामे विकास कार्य- चन्द्रधारी मिथिला कालेजमे विभिन्न विषयक पढ़ाइक आरम्भ होएब तथा सरिसबमे हुनक सत् प्रयाससँ कालेजक स्थापना। तथा, 4. अखिल मैथिली साहित्य परिषदक मन्त्रीक रूपमेँ मैथिली भाषा आ’ साहित्यक प्रचार-प्रसार एवं संवर्धन। सामाजिक संलग्नता, सामाजिक कार्यमे रुचिक ह्रास तथा व्यक्ति केन्द्रित विचार-धाराक प्रमुखताक परिणामसँ कतेको मैथिल वा मैथिलीक प्राध्यापक आ सरकारी एवं गैर-सरकारी सेवामे छोट-पैघ ओहदापर सेवारत लोक ई कहैत-बजैत सुनल जाइत छथि जे हमर काज पढ़ाएब थिक, हमर काज लिखब थिक, हमर काज आन्दोलन करब वा मिथिला, मैथिल, मैथिली करब नहि थिक। तन्त्रानाथ झा एवं सुभद्र झा एहि विचारक नहि छलाह जे मैथिलीक अधिकारक हेतु संघर्ष, प्राप्त
अधिकारक सुरक्षाक तथा अध्यापन वा साहित्य-सर्जना करब पृथक-पृथक वर्गक लोकक दायित्व थिकैक। ओ साहित्य-सर्जना एवं मैथिलीक आन्दोलनमे सक्रियताकेँ एक दोसरक पूरक मानैत छलाह। साहित्य-सर्जना आ जागरण-अभियानमे सक्रिय कांचीनाथ झा ‘किरण’क नाम आदरक संग एही कारणसँ लेल जाइत अछि। आ इएह कारण थिक जे सभ प्रकारक सरकारी मान्यता, सुविधा, प्रोत्साहन एवं सुरक्षाक अछैतो मैथिलीेक प्राध्यापक अथवा मैथिलीक साहित्यकारक सामाजिक स्वीकार्यता सम्प्रति ह्रासोन्मुख अछि। कोंकणीक प्रसिद्ध लेखक, अङरेजीक शिक्षक एवं संघर्षरथी डा. आर.केलकर लिखल अछि जे अपन भाषाकेँ समृद्ध करबा लेल पहिने ओ सभ साहित्य सर्जना कएल, जखन बोली कहि अपमानित कएल जाए लागल तँ भाषाविज्ञानक छात्र भए गेलाह आ जखन शत्रु सभ हुनकर भाषाकेँ समाप्त करबा लेल एवं गोवाकेँ भारतक मानचित्रसँ पोछि देबाक गम्भीर चालि चलल तँ राजनीतिज्ञ बनि गेलाह। मैथिलीकेँ उचित विश्वविद्यालयीय मान्यता लेल व्यूह रचना कएनिहार एवं साहित्य सर्जक तन्त्रानाथ झा एवं सुभद्र झा हमरा लोकनिक आदर्श पुरुष छथि। तन्त्रानाथ झाक व्यक्तित्वसँ प्रेरणा लेबाक थिक जे आजीविकाक विषय भिन्न रहलहुँपर मातृभाषाक सेवामे जँ मातृभाषाक प्रति अनुराग हो, तँ कोनो बाधा-व्यवधान नहि छैक। आओरो किछु उदाहरण अछि। प्रो. हरिमोहन झा पढ़लनि आ पढ़ौलनि दर्शनशास्त्र मुदा लिखलनि मैथिलीमे। डा.जयकान्त मिश्र आ प्रो. उमानाथ झा पढ़लनि आ पढ़ौलनि अङरेजी, मुदा भंडार भरलनि मैथिलीक। प्रो. प्रबोधनारायण सिंह पढ़लनि आ’ पढ़ौलनि हिन्दी, मुदा आजीवन समर्पित रहलाह मैथिलीक लेल। सम्प्रति स्थिति एवं मानसिकता किछु भिन्न अछि। आन विषयक मैथिल प्राध्यापककेँ, अपवाद छोड़ि, मैथिली पढ़बा-लिखबामे अरुचि छनि आ’ अपन मातृभाषामे रचना करब अपन हीनता बुझैत छथि तँ दोसर दिश मैथिलीक कार्यक्रममे आन विषयक प्राध्यापकेँ मंचस्थ वा सक्रिय देखि मैथिलीक प्राध्यापक कन्हुआइ छथि। अर्थशास्त्रक प्राध्यापक तन्त्रानाथ झाक व्यक्तित्व आ’ मातृभाषा-प्रेम अनुकरणीय अछि।
तन्त्रानाथ झाक अवदान - साहित्य-सर्जना
तन्त्रानाथ झाक सर्जनात्मक प्रतिभाक दर्शन बाल्यकालहिमे होअए लागल छल। जकर पृष्ठभूमिमे निश्चिते हुनक
मातृकुलमे पाण्डित्य एवं साहित्य-सर्जनाक सुदीर्घ परम्पराक प्रभाव रहल होएतनि। मुदा, तात्कालिक प्रेरक भेल छलथिन्ह अग्रज आचार्य रमानाथ झा। ओ हुनकहि प्रेरणासँ ‘साहित्य पत्रा’क लेल माइकेल मधसूदन दत्तक ‘मेघनाद बध’क आदर्शपर ‘कीचक बध’क सर्जना कएल। कोनहुँ कविक पहिल कृति उच्च कोटिक कलात्मक एवं प्रयोगशील हो, अवश्य असामान्य प्रतिभाक द्योतक थिक। तन्त्रानाथ झाक मैथिली साहित्यक सेवा गद्य एवं पद्य- दूनू क्षेत्रमे अछि। पद्य साहित्यक अन्तर्गत अछि ‘कीचक बध’ एवं ‘कृष्णचरित’ महाकाव्य, कविता संग्रहमे अछि ‘मंगलपंचाशिका’, ‘नमस्या’ एवं ‘कीर्ण-विकीर्ण’। गद्यमे अछि ‘एकांकी चयनिका’, किछु निबन्ध, ललित निबन्ध, संस्मरण आदि। ओ किछु कथा सेहो लिखल। बाल कथा लिखल। मिथिलाक्षरक प्रचार-प्रसार लेल अपन हाथेँ किछु कथा लिखि, तकरा लिथो कराए प्रकाशित कराओल। एकर महत्त्व कथा-दृष्टिसँ जतेक हो, मिथिलाक सांस्कृतिक सम्पदा, मिथिलाक्षरक संरक्षण एवं प्रचार-प्रसारक दृष्टिसँ अवश्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। ओ ‘कीर्तिलता’ एवं ‘हितोपदेश’क किछु अंशक भाषा अनुवाद एवं ‘हेमलेट,’ ‘मालती-माधव’ एवं ‘रत्नावली’क गद्यमे नाट्यसार लिखि प्रकाशित कएल। एहि सभमे तन्त्रानाथ झाक विलक्षणक गद्यक दर्शन होइत अछि। हिनक अनुसंधान परक निबन्ध, जे अङरेजी वा मैथिलीमे समए-समएपर विभिन्न पत्र-पत्रिकामे छपल अद्यावधि असंकलित अछि। ओहिमे प्रमुख अछि कवि रविनाथकृत सन 1304 सालक रौदीक वर्णन, सन्तकवि रामदास, Vishnu Puri : The Maithil Vaishnav Savant, Adventures of Maithil Pandits (Sachal Mishra and Mohan Mishra)आदि। तन्त्रानाथ झाक रचना साहित्यक विशेषताक चर्चा विस्तारसँ नहि कए मात्र एक दू बिन्दुक प्रसंग सूत्रमे उल्लेख करब-
1. प्रयोगशीलता - तन्त्रानाथ झा प्रयोगशील रचनाकार छलाह। एहिसँ मैथिली साहित्य लाभान्वित भेल अछि।
‘साहित्यपत्रा’मे महाकाव्यक पारम्परिक मानदण्डक आधारपर कविशेखर बदरीनाथ झाक ‘एकावली परिणय’ छपैत छल जे सामान्य पाठकक रसबोध लेल सरल नहि कहल जाएत। सम्भव थिक तन्त्रानाथ झा सामान्य पाठकक स्थिति बूझि गेल होथि। ओ ओही समय एकावली परिणयक भाषा-शिल्पक विपरीत मुक्त-वृत्त एवं सरल भाषामे ‘कीचकबध’ लिखि मैथिलीक मन्दिरमे अर्पित कए मुक्त-वृत्त शिल्पक मैथिलीमे श्रीगणेश कएल। मैथिलीक पाठक समुदाय लेल ‘कीचक बध’क प्रकाशन गुमकीक बाद सिहकी सन सुखद भेल। एहिना ओ सोनेट लिखल। मैथिली कथाक क्षेत्रमे शिल्प सम्बन्धी जड़ता तोड़ने छलाह। प्रो. उमानाथ झा ‘रेखाचित्र’मे संकलित कथाक माध्यमसँ। एक सर्जनात्मक प्रतिभा सम्पन्न कल्पनाशील रचनाकार साहित्यमे आएल जड़ताकेँ तोड़बाक हेतु कथ्यवर्ग एवं शिल्पवर्गमे कोना प्रयोग करैत अछि, तकर उदाहरण थिक तन्त्रानाथ झाक विपुल साहित्य।
2. तन्त्रानाथ झाक साहित्यमे समाजमे व्याप्त कुरीति, आडम्बर, अन्धविश्वासपर प्रहार अछि। एहि प्रहारक शिल्प
व्यंग्यात्मक अछि। ई समस्त साहित्यमे सहज सुलभ अछि। तन्त्रानाथ झाक व्यंग्यक प्रसंग सोमदेवक लिखब समीचीन अछि:
मेना-कोकिल, आ बगरामे जेना तेज अछि बाझ।
व्यंग्यधारसँ पिजा चोँच छथि से तहिना कवि माँझ।4
3. नारी सशक्तीकरण - एही सरिसब गामक सुआसिन चित्रलेखा देवी5 लिखल अछि जे तन्त्रानाथ झा अनेको पोथी
तथा गीत कविता लिखि केँ मैथिल समाजकेँ उठौलनि। तन्त्रानाथ झाक रचनात्मक व्यक्तित्वक प्रसंग एक महिलाक मन्तव्यमे ओहि समाजक प्रसंग तन्त्रानाथ झाक विचार आ सामाजिक स्तरपर हिनक अवदान प्रतिघ्वनित अछि। नारीक सशक्तीकरणक प्रसंग तन्त्रानाथ झाक दृष्टिक उदाहरण भेटैत अछि द्रुपद-सुताक चरित्रांकनमे। कीचकक व्यवहारसँ आतंकित द्रुपद-सुता विचारैत अछि -
‘अबला, भीरु,
की हम द्रुपद-राजकुल पाओल जन्म,
अबला भीरु कहाबए ? क्षत्रिय-केतु पाण्डु-बधू भए,
अबला भीरु कहाए मरब’6।
एहि पृष्ठभूमिमे द्रौपदीक आत्मबल जगैत छैक -‘शाद्र्दूली की कखनहु पाबए त्रास?’ आ तखन आत्मबलसँ
अभिभूत भए गुम्हरैत अछि -
अनल-शिखा-आलिंगन-शील विमूढ़, क्षुद्र पतंग समान होएत जरि भस्म।
तन्त्रानाथ झा मानैत छथि जे स्त्राीगण हमरा लोकनिक संस्कृति ओ सभ्यताक हेतु ‘रक्षणविधान’ काज कएलनि ओ कए रहल छथि। सम्प्रति स्त्री-शिक्षाक प्रसार द्रुत गतिएँ भए रहल अछि जे सामाजिक कल्याणक दृष्टिसँ आवश्यक थिक। कोनो समाज अर्धांशकेँ अशिक्षाक अन्धकार मध्य राखि उन्नतिपथपर अग्रसर नहि भए सकैत अछि।7
डा. सुुभद्र झा
सुभद्र झा अपन अनन्य मित्र तन्त्रनाथ झा जकाँ सौभाग्यशाली नहि छलाह। अन्यथा हुनकहु प्रकाशित-अप्रकाशित
साहित्य आजुक पाठकक लेल सुलभ भए गेल रहैत। हमरा जनैत एकर तीनटा प्रमुख कारण अछि -
1. भाषा-साहित्यक अध्ययन-अध्यापनमे कठिन भाषा विज्ञान सुभद्र झाक कार्य-क्षेत्र छल। दुर्योग एहन जे बिहारक
कोनो विश्वविद्यालयमे स्वतन्त्रा भाषा विज्ञानक विभाग अद्यावधि नहि अछि। एहन कठिन विषय के पढ़त आ पढ़ाओत?
एक भाषा वैज्ञानिकक शिष्यत्व के ग्रहण करत? जँ शिष्ये नहि तँ गुरुक वैदुष्यक प्रचार-प्रसार, स्थापनाक खंडन-मंडन एवं साहित्यक संकलन-प्रकाशन कोना होएत? ओ स्वयं लिखने छथि जे हम ‘आगि’ छी। आगिक प्रयोजन तँ सभकेँ होइत छैक, मुदा पकबाक डरसँ केओ छूबैत नहि अछि, देह-हाथ सेदि कात भए जाइत अछि।
2. सुभद्र झा भाषाविद छलाह, शास्त्र-मर्मज्ञ छलाह। देश-विदेशमे एक भाषाशास्त्रीक रूपमे आदर आ सम्मान
छलनि। मुदा ओ कविता, कथा, नाटक, एकांकी, उपन्यास आदि नहि लिखल। मंचपर जाए अपन हास्य-व्यंग्यक माध्यमसँ लोकक मनोरंजन नहि कएल। विद्वत्जनक बीच आदरक पात्र सुभद्र झा सामान्य पाठकक लोकप्रिय रचनाकार होइतथि कोना? तथा,
3. सुभद्रझा सन कीर्तिपुरुषक संतानमे हुनक कृतिक संरक्षण एवं प्रचार-प्रसारक प्रति अभिरुचिक अभाव अछि।
एहिसँ हिनक प्रकाशित रचना दुर्लभ भए गेल। अप्रकाशित प्रकाशमे नहि आबि सकल अछि।
सुुभद्र झाक कृृति:
संस्कृत, हिन्दी, अङरेजी, फ्रेंच एवं जर्मन भाषाक ज्ञाता सुभद्र झाक पहिल रचना कोन थिक आ से कहिआ छपल
तकर जनतब तँ हमरा नहि अछि। मुदा, हमरा जे हिनक प्रकाशित पहिल रचना देखबाक अवसर भेटल अछि से थिक मिथिला मिहिरक एकसँ बेसी अंकमे प्रकाशित ‘मैथिली भाषाक उत्त्पति’8 विषयक लेख। एहि लेखमे जाहि प्रकारेँ विभिन्न विद्वानक मतक खंडन-मंडनक उपरान्त अपन मत स्थापित कएल अछि, सुभद्र झाक गम्भीर अध्ययनक द्योतक थिक। दोसर थिक ‘मैथिलीमे संख्यावाचक शब्द ओ विशेषण’9। इहो थिक ओही मूल-गोत्रक। एहिसँ ई स्पष्ट अछि जे सुभद्र झाक प्रिय विषय भाषा विज्ञानक अध्ययन छल आ मैथिलीक भाषा वैज्ञानिक विश्लेषण करब हुनक इष्ट छलनि The Formation of The Maithili Language क अनुसार ओ सर्वप्रथम पटना कालेजक डा.ए.बनर्जी शास्त्रीक निर्देशनमे काज आरम्भ कएल। मुदा समाप्त भेलनि डा.सुनीति कुमार चटर्जीक निर्देशनमे।10
सुभद्र झाक रचना दू प्रकारक अछि। पहिल कोटिमे अछि मैथिली भाषा सम्बन्धी अङरेजीमे लिखित साहित्य। एहि
कोटिमे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि The Formation of The Maithili Language11 आ The Songs of
Vidyapati.12 The Formation of The Maithili Language हिनक शोध प्रबन्ध थिक जाहिपर पटना
विश्वविद्यालयमे डी.लिट क उपाधि भेटल छलनि तथा The Songs of Vidyapati नेपाल स्रोतक आधारपर विद्यापतिक 262 गीतक संग्रह थिक। एहिमे विद्यापति गीतक भाषा वैज्ञानिक विश्लेषण एवं गीतक अङरेजी अनुवाद अछि। दोसर कोटिमे अबैत अछि मैथिलीमे सम्पादित एवं लिखित पोथी सभ। ‘विद्यापति-गीतसंग्रह’’मे विद्यापतिक 370 गीत अछि। एहि संग्रहक भूमिका लेखक छथि प्रो.आनन्द मिश्र। विदेश यात्रा वर्णनक दू टा पोथी ‘प्रवास जीवन’(1950) एवं ‘यात्रा प्रकरण शतक’(1981) छनि। ओ 27 अगस्त,1946 ई केँ दू वर्षक लेल पटना विश्वविद्यालक अनुदानपर तथा महाराज कामेश्वर सिंहसँ प्राप्त आर्थिक सहयोगसँ उच्च शिक्षा हेतु फ्रांस गेल छलाह। ओतए ओ अर्थवेदक पैप्लाद, आधुनिक भाषा विज्ञान तथा ध्वनि विज्ञानक विशेष अध्ययन कएल।13 ओही यात्राक विलक्षणक वर्णन एहि दूनू पोथीमे अछि। ‘नातिक पत्राक उत्तर’ पत्रात्मक शैलीमे कहि सकैत छी जमाहिर लालक Discovery of Indiaक शैलीमे लिखित पोथी थिक। ओ अनेको जर्मन आ फ्रेंचमे लिखित पोथीक अनुवाद हिन्दी आ’ अङरेजीमे कएने छथि।14 जे जर्मन आ फ्रेंचमे हिनक असाधारण अधिकार देखबैत अछि। मुदा हिनक एहि
विद्वता एवं ज्ञानराशिक फलसँ मैथिली वंचित रहि गेल।
सुुभद्र झाक महत्व:
1. यद्यपि सुभद्र झाक पूर्वहु किछु विदेशी आ किछु भारतीय भाषाविद मैथिली भाषाक अध्ययन प्रस्तुत कएने छलाह।
मुदा, पहिल व्यक्ति भाषाविद डा.सुभद्र झा भेलाह जे एतेक गम्भीरता एवं विस्तारसँ मिथिला भाषाक विश्लेषण कएल जाहिसँ विश्व-भाषाक मानचित्रपर मैथिलीकेँ प्रतिष्ठापित होएबामे भाषावैज्ञानिक आधार भेटल।
2. विद्यापति गीतक भाषा शास्त्राीय विवेचन एवं गीतक अनुवाद अङरेजीमे कए विद्यापति गीतक महत्वकेँ सर्वप्रथम
अन्तरराष्ट्रीय पाठकक समक्ष आनल।
3. मैथिलीक विदेश यात्रा साहित्यक पहिल लेखक छथि सुभद्र झा। सुभद्र झासँ पूर्वहु कतोक मैथिली विदेश यात्रा कएने छल होएताह। पूर्वक अपेक्षा बेसी लोक देश विदेश भ्रमण, उच्च शिक्षा वा आजीविका हेतु जाइत अछि, मुदा डा.जगदीशचन्द्र झाकेँ छोड़ि यात्राक क्रममे प्राप्त अनुभवकेँ मैथिलीमे लिपिबद्ध कए अपन मातृभाषाक यात्रा साहित्यक संवर्धन कएनिहार कम लोक छथि। आ’ सेहो एतेक सूक्ष्मता एवं व्यापक रूपसँ।
4. ‘नातिक पत्रक उत्तर’मे एक इतिहासकार जकाँ, किन्तु सरल भाषा एवं नव ढ़ंगें ओ मैथिलीक स्वीकृति हेतु कएल
गेल आन्दोलन एवं विभिन्न समस्या आदिपर अपन विचार निर्भीकता एवं स्पष्टताक संग प्रस्तुत कएल अछि। एकरा जँ भाषा-आन्दोलनक विचार प्रधान इतिहासक पोथी कही, तँ अत्युक्ति नहि होएत।
5. डा.सुभद्रझा राष्ट्रीय भावना एवं मिथिला, मैथिल एवं मैथिलीक प्रेमसँ ओतप्रोत छलाह। हिनक एहि रूपक दर्शन
‘प्रवास जीवन’ एवं ‘यात्राप्रकरण शतक’सँ होइत अछि। पेरिसमे हिनक वस्त्राभरण देखि दर्शक सभ डा. एस.राधाकृष्णनक समक्षहिमे हिनकहि डा. एस.राधाकृष्णन् बूझि आकर्षित भए गेल छलाह।15
6. प्राच्य विद्याक गम्भीर वेत्ता, भाषाविज्ञानक प्रकाण्ड पण्डित, भाषाविद, सफल अनुवादक, सहजता आ सरलताक
प्रतिमूर्ति, सदिखन अनुसंधानरत शोध-निर्देशक, विद्वानक बीच विद्वान एवं सामान्यक बीच सामान्य, निरअहंकारी डा.सुभद्र झा मिथिलाक सारस्वत परम्पराक एक एहन विभूति छथि जनिक नामहिसँ मैथिल समाज अपनाकेँ गौरवान्वित अनुभव करैत अछि।
अन्तमे कहए चाहब जे आन्दोलनी भाषाविद साहित्यकार डा. सुभद्र झा कविता, कथा, उपन्यास आदि लिखि
मैथिलीक लोकप्रिय लेखक वा मंचासीन भए श्रोता-दर्शकक आकर्षणक केन्द्र भनहि नहि भेल होथि। मुदा, राष्ट्रीय
अन्तरराष्ट्रीय स्तरपर विज्ञजनक बीच जतेक ओ पढ़ल जाइत छथि वा उद्घृत होइत छथि, से किनसाइते मैथिलीक महानसँ महान लेखककेँ सौभाग्य भेल होनि वा होएतनि। ई मात्र डा.सुभद्र झा थिकाह जे मैथिलीक भाषा-वैज्ञानिक विश्लेषण, भाषा विज्ञान सम्मत तथ्यक आधारपर विस्तारसँ कएल एंव मिथिला भाषाक विशेषतासँ लोककेँ परिचित कराओल। मैथिली भारोपीय कुलक एक स्वतन्त्र भाषा थिक, ताहि प्रसंग पर्याप्त सामग्री एवं तर्क विश्व समुदायक समक्ष राखल। आ’ बेर पड़लापर एक नीतिकुशल कूटनीतिज्ञ जकाँ प्रतिकूलहुँ केँ अनुकूल बनाए पटना विश्वविद्यालयमे मैथिलीक स्वीकृति हेतु लोकक सङोर कए अपन मातृभाषा मैथिलीक हित-साधनमे सहायक भेलाह।
1. तन्त्रनाथ झा अभिनन्दन ग्रन्थ,1980, पृ.सं.84
2. तन्त्रानाथ झा अभिनन्दन ग्रन्थ, 1980, पृ.सं. 12, डा.दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’
3. Our language was the symbol of our identity and we took to writing in this language so as to serve in its progress.When
our language was insulted as being only a dialect, we turned to be students of linguistics.When finally our enemies
made serious attempts to wipe out the language and very place of origin, Goa from the political map of India, then we
turned to be politicians. -Planning for the Survival of Konkani. - Dr.R. Kelkar, Goals and Strategies of Development of
Indian Languages,1998, CIIL Mysore./2
.............................
४.सोमदेव- तन्त्रनाथ झा अभिनन्दन ग्रन्थ, पृ.सं.१४५
5. चित्रालेखा देवी, अवोधनाथ, 2008 पृ. सं. 5
6. कीचक बध, चारिम सर्ग, तन्त्रानाथ झा अनुपम कृति, पृ.सं. 68,
7. तन्त्रानाथ झा अनुपम कृति, 2004, झा, पृ.सं. 525, 8. मिथिला मिहिर, 06 नवम्बर, 1936
9. भारती,अप्रैल, 1937.
10. The Formation of The Maithili Language, Preface, Luzac & Company , Ltd, London,1958
11. The Formation of the Maithili language is a brilliant contribution to scientific analysis of the Maithili language, which
is spoken by about 2 crores people of Nepal and India. This Maithili language has been the literary vehicle of the
Vaisnava poets of Bengal, Assam and Orissa and has inspired the poets of Bengal from Chandidasa upto Rabindranath
Tagore. Maithili is from political point of view to be included in the dialects of Hindi, while linguistically it stands in
between Bengali and Hindi and is different from both especially on account of each verb forms. It has its own structural
form, although it is an Indo-Aryan language, its special features make it different from each of the literary modern
Indian languages.- Luzac & Company , Ltd, London,1958- www. Vedicbooks.net
12. The Songs of Vidyapti, 1954, Motilal Banarsi Dass, Vanarasi

14.(i).Grammar of the Prakrit Language by R.Pischal - Translator- Subhadra Jha, (ii).History of Indian Literature by
M.Winternitz- Transator- Subhadra Jha- Bhartiya Sahitya ka Itihas, (iii).The Abhidharmakosa of Vasubandu Chapter I
& II with commentary Annoted and rendered into French from Chinese - translated into English by Subhadra Jha -
K.P.Jayaswal, Patna, 4. A Descriptive Catologue of The Sanskrit Manuscripts-338 pages, 5. A Descriprtive Catologue
of The Sanskrit Manuscripts-362 pages etc.
@5
15. यात्रा प्रकरण शतक, 1981, मैथिली अकादमी, पृ.सं.62 - श्रीराधाकृष्णन्के ँविशुद्ध साहेबी ठाठमे बैसल देखल, ओ माथ पर मुरेट्ठा सेहो
नहि बन्हने रहथि। प्रदर्शनी देखि जाहि बड़कीटा बेंचक एक छोरपर राधाकृष्णन् बैसल रहथि तकर दोसर छोरपर हम आ’ मनकूर बैसि गेलहुँ।
हम मिरजइ आ’ धोतीमे रही। ते ,ँ जे आगन्तुक राधाकृष्णन् के ँ चिन्हैत रहन्हि से हुनका लग जाए भारत, भारतक सभ्यता आदिक विषयक
चर्चा हुनकासँ करए आ’ जे हुनका नहि चिन्हैत रहैन्हि, से हमरे वेष-भूषाक आधार पर हमरे राधाकृष्णन् बूझि ओहि प्रसंग चर्चा करए। परिणाम
ई भेलैक जे हुनका लग सात वा आठ व्यक्ति मात्रा रहलैन्हि मुदा हमरा तीन दिशासँ पचासक अन्दाज लोक घेरि लेल। आ’ हमहुँ ककरो भान
नहि होअए दिऐक जे हम राधाकृष्णन् नहि छी।
16. Bachcha Thakur- Subhadra Jha - 'Close to nature, people till his very last - 'A vibrant intellectual in the midst of
intellectuals, an ordinary man in the midst of the ordinary , a Maithil Brahmin in the midst of of his castemen, a
casteless figure in the midst of the men of the cross-sections of the society, a progressive in the midst of progressives,
a leftist in the midst of rightists, Dr.Jha epitomised the vast vistas of divergent crosss-currents in him with oceanic calm
and poise.' - The Indian Nation, Patna, 22 May, 2000.
ऋृषि वशिष्ठ
प्रकाशित कृति- जे हारय से नाक कटाबय (बाल साहित्य), कोढ़ियाघर स्वाहा (बाल साहित्य), झुठपकड़ा मशीन (बाल साहित्य), मैथिली धारावाहिकक कथा, पटकथा आ संवाद लेखन। एकर अतिरिक्त कथा आ व्यंग्य पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित। पता- तेजगंगाधाम, परिहारपुर, मधुबनी-847235
जुआनी जिन्दाबाद
सगरो टोलमे एक्कहि बातक चर्च-बर्च छलैक। बुढ़-बुढ़ानुस सभ साँझक चारि बजबाक बाट तकैत छलाह। सबहक मूँहे एक्के बात- ‘‘लाख छै तेँ कि, देखहक काली-बाबुक बेटाकेँ। एखनुको समएमे सरबन पूत होइ छै की !’’ कियो-कियो इहो कहैत छलै जे- ‘‘बाबू, काली बाबू बड्ड कष्टेँ बेटाकेँ इंजीनियर बनौने छथि।’’
-‘‘से तँ ठीके, मुदा आइ काल्हि ई कष्ट ककरो-ककरो सार्थक होइ छै ! आ से काली बाबूकेँ भेलनि।’’
यैह गर्मीक समए छिऐ। परुकाँ साल कालीबाबूकेँ दू-बेर मासे दिनपर हार्ट एटैक भऽ गेल छलनि। सगरो गामक लोक कहैत छलै जे आब हिनकर बाँचब मोस्किल छनि। आ स्थिति छलनिहों तेहने। दोसर बेरक हार्ट एटैकक खबरि जखने कालीबाबुक बेटा नबोनाथकेँ लगलनि तँ ओ तुरत अमेरिकासँ अपना गाम आपस आबि गेलाह। गाम आबि ओ कालीबाबुक हालत देखलनि। ओ अपना संग कालीबाबूकेँ अमेरिका लऽ जेबाक तैयारी कएलनि। पहिने तँ कालीबाबू तैयारे नहि होइत छलाह मुदा बुझा-सुझाकए नबो तैयार केलनि। नबो तँ चाहैत छलाह जे माइयो संग चलए। ओ मुदा एक्कहि ठाम कहि देलखिन जे- ‘‘हमरा लऽ जेबाक जिद्द करबह तँ हम माहुर खा लेब। हम बिलेँत जा कऽ एको दिन जीबि नहि सकै छी।’’
सभ कागज-पत्तर तैयार कऽ नबो अपन पिताक संग अमेरिका जेबाक तैयारीपर छलाह। टोल-पड़ोसक लोकक कहब छलै जे- ’’आब बेकारे बुढ़ाकेँ लऽ जेबहुन। आब अबस्थो भेलनि। साठि टपि गेलनि तँ आब की !’’
कालीबाबुक छोट भाए तँ रुष्ट भऽ कऽ एतेक तक कहि देने छलखिन जे- ‘‘अमेरिकासँ हमर भाए-साहेब घुमि कऽ औताह से उमेद त्यागिये कऽ लथु।’’
इंजीनियर नबोनाथ सभकेँ बुझेबाक प्रयास करैत छलाह। माइ पर्यन्त सदिखन कनैत रहैत छलीह। कालीबाबू चुप्पचाप सभटा तमाशा देखैत छलाह। नबोनाथक माइ ई कखनो नहि कहैत छलखिन जे बाबूकेँ नै लऽ जाहून। हुनका एहि बातक विश्वास छलनि जे कालीबाबू अमेरिका जा कऽ ठीक भऽ जेताह।
जेना-तेना इंजीनियर साहेब कालीबाबूकेँ लऽ कऽ अमेरिका चल गेलाह। साल भरि बीत गेल अछि। एहि बीचमे रंग-बिरंगक समाचार आएल गेल। आइ वर्ष दिनपर कालीबाबू आपस आबि रहल छथि। कालीबाबूकेँ नबका हार्ट लगाओल गेलनिहेँ, से सभकेँ बुझल छैक। सबहक मोनमे विभिन्न तरहक जिज्ञासा छैक। कियो कहै जे- ‘‘अमेरिका जए कऽ की भेलनि ! रोगीक रोगिये रहि गेलाह ! कहाँदन दोसराक हार्ट लगाओल गेलनिहेँ।’’
‘‘आब तँ आर अपस्थक भऽ गेल हेताह। अनेरे बुढ़ारीमे गंजन। कहू तँ बेकारे ने चीड़-फाड़ करौलनि।’’
समए बितैत कतेक देरी। चारि बाजि गेल। बारह बजे पटनामे हवाइ जहाज अएबाक समए छलै। पटनासँ अएबामे बेसीसँ बेसी चारि घंटा। आब जइ घड़ी जे क्षण ने अएलाह। सड़कपर अबैत सभ गाड़ीकेँ सभ ठिकियबैत छल।
‘‘यैह आबिये गेलाह।’’
....मुदा ओ गाड़ी सुर्र...र्र.............दऽ आगाँ बढ़ि गेल।
कालीबाबुक दलानसँ कनिके दूर चौराहा छलै। चौराहापर विशाल पिपरक गाछ आ सड़कक काते-कात चाह-पानक दोकान। गाछक छाँहमे बैसल बच्चा किशोर आ बुढ़-बुढ़ानुस तँ सहजहिँ। खास कऽ सभकेँ कालीबाबुक प्रति बेसिये जिज्ञासा छलनि।
‘‘केहेन भेल हेताह? साफे बदलि गेल हेताह कि ओहने हेताह! ककरो चिन्हबो करताह कि नै?’’
‘‘जे जत्तहि सुनलक आगवानीमे पहुँचि गेल। कालीबाबुक दरवज्जापर एखनो भम्ह पड़ैत छनि मुदा एतए भीड़ जूटल अछि। पुरुष-पातकेँ गामपर नै रहने यैह दशा होइत छैक। भरि ठेहुन कऽ घास जनमि गेल छनि। सभ अही बातक चर्च करैत छल। मोन मुदा सबहक टाँगल छलै पच्छिम भरसँ आबएबला चारिपहिया वाहनपर। कालीबाबु प्राथमिक विद्यालयमे शिक्षक पदसँ रिटायर भेल छलाह। ठेंठ देहाती लोक। कोनो आधुनिकताक हवा नहि लागल छलनि। ओ वर्ष दिन अमेरिकामे कोना रहल हेताह। सभ यैह बात सोचैत छल। नबोक माइ कोनटा परसँ हुल्की मारि जाइत छलीह।
......यैह, लालरंगक चारिपहिया वाहन आबि कऽ रुकल। पीपर तरक भीड़ कालीबाबुुक दरवज्जापर पहुँचल। कियो दौड़ैत, कियो झटकैत आ कियो घिसियाइत। गाड़ीक आगाँक गेट खुजल। इंजीनियर नबोनाथ उतरलाह। आँखि परक करिया चश्माकेँ माथपर चढ़बैत हाथ जोड़ि सभकेँ प्रणाम केलनि आ पछिला गेट खोललनि। भीड़मे जूटल वृद्ध सभकेँ जेना साँस रुकि गेल छलनि। गेट खूजल.....। ..........अचरज! भारी अचरज!! कालीबाबू सूट-बूट पहिरने छलाह। करिया जिन्स आ लाल रंगक फोटो बनल टी शर्ट। आँखिपर करिया चश्मा। बेस चिक्कन-चाक्कन मूँह-कान। खूब निरोग। हाथमे गिटार लेने उतरलाह। बुढ़ सभ देखि कऽ अचरजमे पड़ि गेलाह।
‘‘देखहक हौ, ई की छनि कालीबाबूकेँ?’’
‘‘सारंगी लेलनिहेँ।’’
‘‘गुदरिया भऽ गेलाह-ए की?’’
‘‘वाह रे वाह! यैह भेलै बुढ़ारीमे घी ढारी।’’
इंजीनियर साहेब टिका-टिप्पणी सुनलनि। ओ हँसैत बजलाह- ‘‘बाबू जीकेँ अस्पतालमे पड़ल-पड़ल अकच्छ लगैत छलनि। असलमे डाॅक्टर हिना पुछलखिन जे आहाँकेँ सभसँ बेसी रुचि कथीमे आछि? संगीत पढ़ाइमे आकि आन कोनो काजमे! बाबूजी कहलखिन- ‘‘रंगीतमे। सेहो संगीत गाबए आ बजाबएमे। गाएब तँ मना छनि मुदा बजेबाक लेल गिटार डाॅक्टर देबाक अनुमति देलनि।’’
एतबा कालमे तँ कालीबाबू एक हाथमे गिटार लेने आ दोसर हाथ माथमे सटबैत नमस्कार केलनि। किछु बुढ़ हँसि कऽ मूँह घुमा लेलनि आ हँसैत नजरिसँ नजरि मिलबैत रहलाह। कालीबाबू डेगाडेगी दैत नाचए लगलाह आ गिटारपर बेसुरा टुम टाम करए लगलाह।
राजधर बुढ़ाकेँ नै रहल गेलनि। ओ व्यंग्य करैत बजलाह- ‘‘ई तँ कीदन भऽ गेलाह हौ इंजीनियर। चौबे चलला छब्बे बनए आ दुब्बे बनल अएलाह। अँइ हौ, ई तँ काली बताह भऽ गेलह-ए?’’
इंजीनियर साहेब सहज भऽ बजलाह- ‘‘असलमे बाबा, ओतुक्का तँ एहने माहौल छै किने।’’
‘‘हैइ, किछु रहौ। ई तँ साफे पगलेठ जकाँ करै छै। जीवन भरि एतए रहलै तँ किछु नै आ एक बर्खमे ओतुक्का सबार भऽ जेतै?’’
गाड़ीबला सामान सभ उतारि कऽ विदा भऽ गेल। गाड़ी कनेक आगाँ बढ़ल। कालीबाबू मूँहकेँ गोल करैत सीटी बजबैत ड्राइवरकेँ बाॅइ.....बाॅइ केलनि। कोनटापर ठाढ़ भेल अपन पत्नीकेँ जखने देखलनि कि फेर मूँह चुकरियबैत सीटी बजौलनि.......‘हू......हूँ.......उ..... ’’ ’ओ बेचारी लजाइत कोनटापर सँ पड़ेेलीह। लोक सभ तमाशा देखि अपना घर दिस कऽ विदा होबए लागल। कालीबाबू फेर ओहिना सीटी बजबैत हाथ हिलबैत रहलाह।
भीड़ तँ उसरि गेल मुदा लोकक मोनमे चैन नहि भेलै। एतए ओतए सगरो कालियेबाबुक चर्च। कियो बताह कहए तँ कियो घताह। एक्के बरखमे लोक एना कऽ बदलतै। ओहिठाम तँ हुनकर बेटो छनि। ओ तँ दसो सालसँ अमेरिकामे रहए छै। कहाँ कोनो चालि-ढालि बदललैए ! राजधर बुढ़ा अपना मंडलमे घोषणा करैत बजलाह- ‘‘नबो इंजीनियरकेँ नीकक काज होइ तँ बापकेँ कोनो माथाबला डाॅक्टरसँ देखबौक।’’
रंग-विरंगक टिका-टिप्पणी होइत रहल। देखलाहा दृश्य राति भरि लोकक सोझाँ ओहिना नचैत रहलै। कथीलए ककरो निन्नो हेतइ।
कालीबाबुक रातिक निन्न तँ अमेरिकेमे छुटि गेलनि। ओ राति भरि कछमछ करैत आ गिटारकेँ टुनटुनबैत रहि गेलाह।
भोरे-भोरे कालीबाबुक दलानक सोझाँमे फेर भीड़ जुटि गेल। एहन अनर्गल काज काली बाबुक नै होइतनि जँ माथ ठीक रहितनि। ओ अपना कहलमे नै रहलाह। सबहक निष्कर्ष एक्कहिटा।
गर्मीक समए छलै। कालीबाबू भोरे-भोरे गंजी आ ठेहुन धरिक पैंट पहिरने, डाँड़ झुकलाहा सन अवस्थामे, माथक केश मेहदीसँ राँगल। ओ चौकीपर ठाढ़ गिटार बजेबामे अपसियाँत छलाह। मूँहक आकृति रंग-विरंगक भऽ रहल छलनि। गिटारक अवाज साफे बेसुरा। एहन उन्मत्त भऽ बजेनाइ नहि देखल-ए। देखलासँ कोनो प्रवीण गिटारवादक लगैत छलाह मुदा सुनलापर साफे अनारी। राजधर बुढ़ाकेँ कालीबाबुक बेस चिन्ता छलनि। ओ चिन्तित सन मुद्रामे बजलाह- ‘‘एहेन कोन पागलपन भेलै? कहह तँ जे काली कहियो नचारियो नहि गौलक तकरा ई बजेबाक कोन भूत सवार भऽ गेलइ।’’
नबोनाथ जेम्हरे निकलथि सभ बाबूक हालचाल पुछनि।
‘‘केहन छथि? आब नीक जकाँ रहए छथि कि ओहिना सारंगी लऽ कऽ नचै छथि?’’
कतेक कऽ की जबाब देथिन। सबहक कहब आ अपनो तँ देखिये रहल छलाह। नबो कालीबाबूकेँ मानसिक रोग विशेषज्ञसँ इलाज प्रारंभ केलनि। डाॅक्टर समूचा जाँच-पड़तालसँ मानसिक रोगक लक्षण नहि पौलनि। आब तँ मामला आरो ओझराएल जा रहल छल। इंजीनियर साहेब कऽ टपाक दऽ कहा गेलनि जे- ‘‘असलमे एहन सभ चालि-चलन आ व्यवहार हृदय प्रत्यारोपनक बाद भेलनिहेँ।’’
डाॅक्टर साहेब गंभीर अनुसंधानमे लगलाह। कालीबाबूकेँ जखन-तखन डाॅक्टर ओहिठाम बजाहटि होबए लागल।
समए बितैत गेल। साँझक समए रहए। डाॅक्टर नर्सिग होममे मानसिक रोगी सभ भरल छलइ। रंग-विरंगक उटपटाँग हरकैत सभ भऽ रहल छलै। डाॅक्टर साहेब गंभीर भेल कुर्सीपर बैसल छलाह आ टेबुलपर राखल कागज सभकेँ उनटबैत छलाह। सामनेक कुर्सीपर कालीबाबू उत्सुक सन मुद्रामे बैसल छलाह। आ बामा कात इंजीनियर नबोनाथ चौंकल सन मुद्रामे छलाह। डाॅक्टर की कहथिन की नइ!
डाॅक्टर साहेब सभ कागजकेँ पसारैत अपन लैप-टापकेँ आसस्तेसँ दबाबए लगलाह- ‘‘इंजीनियर साहेब, हम एहि केसक गंभीर अनुसंधान केलहुँ अछि संगहि सभटा सबूत जमा केलहुँ अछि।’’
इंजीनियर साहेब चौचंग भेलाह।
‘‘अहाँक पिताजीकेँ जे हृदय प्रत्यारोपित कैल गेल ओ वस्तुतः एकटा एक्कैस वर्षक मशहुर पाॅप गायकक हृदय छैक। ओ बेचारा एकटा दुर्घटनामे मारल गेल आ ओकर दान कएल हृदय आइ अहाँक पिताकेँ जीवन देने छनि।’’
‘‘मुदा’’- इंजीनियर साहेब उत्साहमे बजलाह।
- ‘‘हँ, इंजीनियर साहेब। कोशिकामे स्वभावक याददाश्त रहैत छैक।...... आ यैह कारण अछि जे ई रहि-रहि कऽ संगीतक पाछाँ बेहाल भऽ उठै छथि। एहि तथ्यकेँ युनिवर्सिटी आॅफ एरिजोना सेहो सिद्ध करैत अछि। ई युनिवर्सिटी अंग प्रत्यारोपनक कतेको मामिलापर शोध कऽ चुकल अछि।’’
डाॅक्टर साहेब आँगुरसँ लैपटाॅपक स्क्रीन दिस इशारा करैत बजलाह- ‘‘हे, देखियौ ने ! आब कोनो काज कठिन छैक? अहीठाम बैसले-बैसले सभटा शोधक जानकारी लऽ लिअ।’’
इंजीनियर साहेब झुकि कऽ लैपटाॅप दिशि तकैत बजलाह- ‘‘एकर मतलब आब बाबूजी अहिना रहि जेता?’’
डाॅक्टर हँमे मूड़ी डोलबैत बजलाह- ‘‘हूँ! कलाकारक जुआनी अवस्था छलैक ने! ओ तँ औनाहटि उचिते छैक।’’
कालीबाबू पीठपर टाँगल गिटार उतारलनि। खोलसँ बहार केलनि आ थैया-थैया...... दिग् दिग थैयाा करैत गिटार बजेबामे लीन भऽ गेलाह।
शिवशंकर श्रीनिवास
(मिथिलाक लोक-कथापर आधारित बाल कथा)
पण्डित ओ हुनक पुत्र
नैनापुर गाममे एकटा पण्डित रहथि। नाम रहनि- बौआ चौधरी। नैनापुर टोलक विद्यालयक ओ प्रधान गुरुजी रहथि। सभ हुनका बड़का गुरुजी कहनि। बड़का गुरुजीक पण्डिताइक सोरहा ओहि समयमे देश-विदेशमे छल। ओहि समएक प्रसिद्ध युवा विद्वान् मे बेसी गोटे हुनके शिष्य रहथि। देश-विदेशक लोक हुनका लग शास्त्रक गप्प बूझऽ अबैत छलाह। किन्तु बड़का गुरुजी रहथि बड़ क्रोधी, से सभ जनैत छल। क्रोध छोड़ि हुनकामे सभ टा गुणे रहनि। किन्तु हुनक क्रोधक चर्चा सभ करए।
बड़का गुरुजीक एक मात्र संतानमे बेटा, नाम रहै धनंजय।
धनंजय बड़ तेजस्वी रहय। लोक कहै धनंजय अयाची मिश्रक बेटा शंकरक दोसर अवतार छी। धनंजय बारहे-तेरह वर्षक उम्रमे बड़का विद्वान् भऽ गेल। इलाकाक लोक कहऽ लगलै- जेहने गुणमन्त बाप तेहने बेटा। किन्तु धनंजय उदास रहैत छल कारण जे बाप कहिओ नीक भाखा नहि कहथिन। ई कोनो विषयमे कतबो अंक आनय, परीक्षामे प्रथम घोषित होअए, कठिनसँ कठिन शास्त्रार्थ जीति कऽ आबय आ सोचय जे एहि बेर बाबू अवश्य प्रसन्न भऽ किछु कहता, किन्तु बाबू ओहिना धीर-गंभीर, किछु नहि कहलथिन। धनंजय अपन पिताक मुखसँ नीक गप्प सुनबाक लेल वा कोनो वाहवाहीक शब्द सुनबाक लेल ओहिना तरसय जेना उपासल पानि लेल तरसैत अछि। ओना बड़का-बड़का विद्वान् प्रशंसा करथिन, कतेको प्रसिद्ध विद्वान् हृदएसँ लगबथिन किन्तु पिताक मुँहसँ प्रशंसा सुनबाक हेतु मन रकटले रहै।
अठारह वर्षक उम्रमे धनंजय न्याय शास्त्रक एहन पोथी लिखलक जे सर्वत्र चर्चामे आबि गेल।
धनंजय अपन पोथी पढ़बाक लेल पिताकेँ देलक, किन्तु ओ पढ़ि घुमा देलथिन, किन्तु किछु कहलथिन नहि।
एक दिन धनंजय साहस कऽ केँ पिताकेँ पुछलक- “बाबू, पोथी पढ़ि अहाँ किछु सम्मति नहि देलहुँ।”
“थोड़े आर परिश्रम करू।” कहि पिता गंभीर भऽ गेलथिन।
धनंजयकेँ पिताक गप्प बहुत अधलाह लगलै, ततबे नहि, मनमे घोर प्रतिक्रिया भेलै। सोचलक- “ई हमर शत्रु छथि, जावत जीता तावत हमर यश-प्रतिष्ठासँ जरैत रहताह, कहिओ प्रशंसा नहि करताह।” से सोचैत-सोचैत बुझू बताह भऽ गेल। मनेमन निर्णय कएलक जे आइ रातिमे जखन ओ भोजन कऽ आङनसँ बहरेता तँ खर्गसँ गरदनि काटि पड़ा जाएब। अन्हरिया छैके केओ ने देखत।
दिन बीतल, साँझ भेलै आ तकर बाद राति। बड़का गुरुजी भोजन कऽ रहल छलाह, आगूमे पत्नी अंजनी बैसलि छलथिन। आ इम्हर धनंजय खर्ग लऽ कऽ ठाढ़ छल जे भोजन कऽ कोनटा लग औताह कि काटि कऽ पड़ा जाएब।
अंजनी कहलथिन- “धनंजयक पोथीक सुनै छी बड़ चर्चा छै।”
“हूँ”- पत्नीक गप्पपर बड़का गुरुजी बजलाह।
“एकटा बात कहू, तमसायब तँ नहि।” अंजनी अपन क्रोधी पति बड़का गुरुजीकेँ पुछलनि।
“कहू ने”- गुरुजी पुछलथिन।
“पहिने कहू जे तामस नहि करब।”
“अच्छा नहि करब, पूछू।”
“अहाँ धनंजयपर तमसाय किएक रहै छियनि? ”
“तमसाय किएक रहबनि? ”
“अहाँ आइ तक हुनकर प्रशंसा कयलियनि? ” पत्नी गप्पपर बड़का गुरुजी बहुत हँसलाह आ कहलथिन- “अहाँ नहि बुझै छिऐ।”
“हम बुझै छिऐ, ओ अहाँकेँ नहि सोहाइ छथि।”
“के एहन अभागल होएत जकरा बेटा नहि सोहेतै? बेटे एकटा एहन होइ छै, जकरा लोक अपनासँ पैघ देखऽ चाहैए।”- गुरुजी बजलाह।
ताहिपर पत्नी पुछलथिन- “कहू तँ अहाँक बेटा केहन पण्डित छथि? ”
“बहुत पैघ पण्डित छथि। हमरासँ बहुत आगू बढ़ि गेलाह।” गुरुजी बहुत आनन्दमे अंजनीकेँ कहलनि।
ओहिना आनन्दसँ आनन्द लैत अंजनी पुछलथिन- “ओ पोथी जे लिखलनि से केहन छै? ”
“बहुत उत्तम, हम कएटा बात ओहि पोथीसँ जनलहुँ अछि, बूझू गदगद छी। धनंजय पुत्रे नहि, पुत्र रत्न थिकाह।”
“तखन हुनकर प्रशंसा किएक ने करै छियनि?”
पुनः पत्नीक गप्पपर भभा कऽ हँसैत गुरुजी कहलथिन- “बुझलहुँ, हम हुनकर बाप छियनि, प्रशंसा करबनि तँ घमण्ड भऽ जयतनि आ तखन विकास रुकि जयतनि।”
“सुनू, हम अहाँक स्त्री छी। अहाँ जहिया हमर काजक प्रशंसा करै छी तहिया हम आरो नीकसँ काज करै छी। आ जहिया कोनोपर बिगड़ै छी तकर बाद आरो काज गड़बड़ा जाइए, ताहिपर अहाँ ध्यान देलिऐ? ”
“हूँ...।” कहि पत्नीक गप्पपर गुरुजी गंभीर होइत पुछलनि- “अहाँ आइ ई सभ किए पुछैत छी? ”
“अहाँ धनंजयकेँ पोथी दैत कहलियनि जे आर परिश्रम करू, से हुनका नीक नहि लगलनि।
“अहाँ कोना बुझलहुँ? ”
“हम माय छिऐ, हम ओतबो नहि बुझबै। तखनसँ हुनक माथ ठीक नहि बुझाइए।”
“ओ ज्ञानी छथि, हुनका हमर बातक कतहु क्रोध होइन? ”
“तखन अहाँकेँ क्रोध किए होइए? अहूँ तँ ज्ञानी छी।”
“हँ, से...।” पत्नी गप्पकेँ स्वीकारैत गुरुजी सोचैत भोजन करऽ लगलाह। मने-मन सोचलनि अंजनी ठीक कहैत छथिन।
ओम्हर कोनटाक अन्हारमे ठाढ़ गप्प सुनैत धनंजयक हालत विचित्र भऽ गेलै- “ओ एहन महान पिताक हत्याक लेल ठाढ़ अछि? ओ वस्तुतः पण्डित नहि मूर्ख अछि।” सोचैत धनंजय कानऽ लागल।
भोजन समाप्त कऽ गुरुजी ओसारापर सँ उतरि अङना अएलाह आकि धनंजय पएरपर खसि कनैत कहलक- बाबू हम बिना विचार कएने अहाँक हत्या कऽ दैतहुँ। हम बताह छी। हम मूर्ख छी। पातकी छी।”
“नहि धनंजय, अहाँ हमर हत्या करऽ लेल छलहुँ से बात नुका सकै छलहुँ, किन्तु अहाँ सत्यकेँ नुकेलहुँ नहि। अहाँ सत्यकेँ समक्ष अनबामे डरेलहुँ नहि। अहाँ वस्तुतः पण्डित छी।”
“नहि बाबू। हम क्रोधमे रही। अहाँक हत्या करब सोचलहुँ, तकर प्रायश्चित? ”
“प्रायश्चित् भऽ गेल।”
“से कोना? ”
“सत्यक खुलासासँ। आँखिक नोरसँ।”
“किन्तु बाबू? ”
“बेटा धनंजय, आइ अहाँक प्रसङसँ हमहूँ किछु सिखलहुँ।”
“बाबू!”
“जावत क्रोध रहत तावत ज्ञान हँटल रहत। हम सभ दिन विद्या सिखलहुँ आ सिखौलहुँ किन्तु हमरामे क्रोधक स्वभाव रहबे कएल आ...। ”
“आ की बाबू? ”
“सभकेँ, जे काज करए ओकरा प्रोत्साहन दीऐ। आ कोनो बात केओ कहए वा नहि कहए, दुनू स्थितिमे सोची, से नहि कएने अहाँ सन ज्ञानी बापकेँ मारब सोचैत अछि। ”

Suggested citation: फूलचन्द्र झा ‘प्रवीण’. “मैथिली शिशु लोक साहित्य.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 50, 2010-01-15. https://www.videha.co.in/research/2010/50/मैथिली-शिशु-लोक-साहित्य.htm

मूल विदेह अंक / Original issue