नचिकेताक ‘प्रियंवदा’ : एक विश्लेषण
प्रियंवदा उदय नारायण सिंह नचिकेता द्वारा लिखित एकांकी आछि । एकरा सम्पूर्ण नाटकक रूप द’ क’ मनोज मनुज मंचित केलथि । एहि प्रस्तुति के देखबाक सौभाग्य हमरा नहि प्राप्त भेल, मुदा प्रस्तुति आलेख हमरा उपलब्ध भेल । ओही नाट्यालेख के अध्ययन केलाक बाद हमर निम्न अनुभव अछि ।
जेना कि नाम स’ लगैत अछि जे प्रियंवदा कोनो ऎतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित नाटक होयत मुदा से अछि नइ । ई मात्र नाटकक एकटा केन्द्रित पात्रक नाम अछि जिनका इर्द-गीर्द नाटकक कथानक घुमैत अछि ।
नाटकक कथ्य एना अछि जे प्रियंवदा नामक एकटा लड़की कोनो शहर में एसगर रहि रहल छथि आ कोनो कम्पनीक लेल मार्केटिंग सर्वे करैत छथि । ओही शहर मे शर्व नामक एकटा युवक सेहो रहैत छथि । शर्व के कविता लिखब खूब पसिन छनि आ प्रियंवदा के कविता सूनब नीक लगैत छनि । शर्वक कविता स’ प्रभावित भ’ प्रियंवदा शर्व संग प्रेम विवाह क’ लैत छथि । बाद मे किछु घटना घटैत अछि । सर्व प्रियंवदा के छोड़ि कतौ चलि जाइत छथि । नाटक मे प्रियंवदाक भैया आ भौजी छथिन संगहि किछु कोरस पात्रक प्रयोग सेहो कयल गेल अछि । एहि तरहे नाटक मे कुल जमा दस गोटे छथि ।
नाटक प्रियंवदा छ: दृश्य मे बाँटल गेल अछि । पहिल मे प्रियंवदा आ हुनकर भौजीक संवाद छनि । दोसर दृश्य मे कोरस, प्रेमी-प्रेमिका, प्रियंवदा आ शर्व छथि । तेसर दृश्य मे कोरस, शर्व आ प्रियंवदा तथा चरिम दृश्य मे शर्व, प्रियंवदा, भैया आ भौजी छथि । पाँचम दृश्य मे एक बेर फेर शर्व, प्रियंवदा, भैया आ भौजी तथा छठम दृश्य मे शर्व आ प्रियंवदा दुनू मात्र छथि ।
ई नाटक दूटा स्थान पर घटित होएत अछि – पहिल शर्व के घर में आ दोसर सार्वजनिक पार्क मे । शर्व के घर मे चरिटा दृश्य होइत अछि – पहिल, चरिम, पाँचिम आ छठम तथा पार्क में दोसर आ तेसर दृश्य होइत अछि । घरक दृश्य मे कुर्सी, किताब, काग़ज़, लैम्प होइत अछि आ पार्क मे संबंधित सामान राखल जा सकैत छैक ।
प्रियंवदा नाटक फ्लैस बैक मे चलैत अछि । उदय नारायण सिंह नचिकेताक ई प्रिय शैली छनि । एकर प्रयोग नचिकेता जी एक छल राजा मे सेहो केने छथि । नाटकक मे एहन तरहक शैली प्राय: नाटक के कमजोर करैत अछि । हँ ! ज’ नाटकक बीच मे किछु कालक लेल वा कोनो एकटा दृश्य फ्लैस बैक मे अबैत हो तखन त’ कोनो विशेष नहि मुदा, नाटकक पहिल दृश्यक बाद सम्पूर्ण नाटक एहि फ्लैस बैक शैली मे चलय त’ निश्चित नाटकक लेल ओतेक प्रभावी नहि भ’ सकैत अछि । कारण, कोनो नाटक एकटा लय मे चलैत अछि, जकर ग्राफ शून्य स’ आगू उठैत छै । दर्शक मे हरदम ई उत्सुकता बनल रहैत छनि जे आब की हेतैक । जखने ई उत्सुकता समाप्त भ’ जाइत अछि नाटक अपना संग दर्शक के बन्हबा मे कमजोर पर’ लगैत अछि । प्रियंवदाक अंतिम पड़ाव जे कि पहिले दृश्य मे अछि कोनो ओतेक प्रभाव नहि छोड़ैत अछि । खैर ...
आब एहि नाटकक कथ्य पर विचार करबाक चाही । नाटकक शुरुआत कथ्यक समापन स’ होइत अछि । तात्पर्य ई जे शर्व अपन प्रियंवदा के छोड़ि क’ चलि जाइत छथि जिनका स’ किछुए पहिने ओ प्रेम विवाह केने रहथि । प्रियंवदा वियोग मे रहैत छथि आ हुनकर भौजी हुनका समझा-बुझा रहल छथिन । मुदा, ओ अपना आप मे रहनाइ बेसी उचित बुझैत छथि । हुनकर एकटा संवाद बुझू नाटकक मूल अछि : “सेल्स गर्लक काज करैत – करैत हम स्वयं मार्केट पोडक्ट बनि गेल रही ” । आब प्रियंवदा अपन जीवनक कथा दोहरबैत छथि । कोना ओ अपना नौकरी स’ जुड़ल छलीह, कोना हुनका शर्व भेटलखिन, कोना एक दोसर स’ प्रेम भेलन्हि जे विवाह मे परिणत भेल, कोना दुनूक जीवन चलैत रहैन, कोना शर्व पर हुनक पिछला जीवन हॉबी भ’ जाइत रहनि, कोना शर्व कविता लिखनाई स’ प्रेम करैत छलाह, कोना एक दिन भैया भौजी अकस्मात घर अयलखिन, कोना हुनका सभ संग शर्वक व्यवहार बदललनि, कोना शर्व अपन प्रिय प्रियंवदा संग दुरव्यवहार क’ र’ लगलाह, कोना शर्वक दिमाग बदलि गेलनि आ ओ प्रियंवदा के छोड़ि घर स’ कतौ चलि गेलाह । आब प्रियंवदा हुनकर वियोग मे आइयो ओहिना ठाढ़ छथि ।
एहि नाटक मे कथ्यक दूटा धारा अछि । एकटा त’ बिलकुल सामान्य जे तुरत नाटकक नामे स’ देखाइत अछि जे स्त्रीक सामाजिक स्थिति केहन अछि । आइ नै आदि काल स’ स्त्रीक सामाजिक स्थिति मे कोनो परिवर्तन नै एलैन्ह अछि । हँ ! एकर रूप जरूर बदल अछि । आदि काल मे नल अपन दमयंती के सुनसान जंगल मे छोड़ि क’ चलि गेल छलाह, दुश्यंत त्यागि देलनि शकुंतला के । आइयो शर्व अपन प्रिय प्रियंवदा के आदमी रूपी जंगल मे छोड़िक’ चलि गेलाह । प्रेमक परिणति, वियोग मे - ओहू समय आ आइयो ।
नाटकक कथ्यक दोसर धारा सेहो अछि जे पहिलुक कथ्य स’ अति महत्वपूर्ण आ सारगर्भित सेहो छैक । शर्व एकटा कवि छथि हुनका पर हुनकर अतीत हरदम सबार रहैत छनि । एहि ठाम शर्व एहि नाटक पात्र मात्र नहि छथि बल्कि आजुक मानव समाजक प्रतिनिधित्व क’ रहल छथि । लोक चाहे जे किछु भ’ जाइछ या बनि जाइछ हुनकर अतीत हरदम हुनका पर छाया जेना मँडराइत रहैत छनि । एहि अतीत स’ किछु समर्थ व्यक्ति अपना आप के बचा लैत छथि आ ओहने व्यक्ति महान होइत छथि । मुदा अधिकांश व्यक्ति ओकर प्रभाव मे आबि जन सामान्यक जीवन जीबैत छथि या शर्व जेना अमानवीय व्यवहार क’र’ लगैत छथि । ई अति महत्वपूर्ण अछि आ एतबे नहि एखुनका सन्दर्भ मे ई विश्व स्तर पर गम्भीर प्रश्न बनल अछि । मुदा प्रियंवदा नाटक मे एहि गम्भीर मुद्दा के दाबि क’ स्त्रीक सामाजिक स्थिति सन सार्वजनित मुद्दा के प्रमुखता स’ प्रभावी बना देल गेल अछि । जँ एहि नाटकक नाम प्रियंवदा क’ बदला किछु आर होइत त’ ई निर्देशकक मोनक विचार आ कुशलता भ’ सकैत छल जे ओ कोन पक्ष केँ बेसी उभारैत छथि ।
पात्रक चुनाव उदय नारायण सिंह नचिकेताक नाटकक अत्यंत प्रभावी अंग थिक । कारण, सभ पात्र गठल आ कथ्यक माँगानुसार होइत छनि । एहू नाटक मे पात्रक संख्या आ ओकर विस्तार कथ्यक अनुसार उचित अछि । संगहि कोरसक प्रयोग क’ क’ आरो आसान बनाओल गेल अछि । कोनो छोट स’ छोट संस्था एहि नाटक केँ आसानी स’ प्रस्तुत क’ सकैत अछि । नाटक मे प्रियंवदा सबस’ महत्वपूर्ण चरित्र छथि आ ओहि के बाद शर्व । मुदा एकटा अभिनेताक लेल सबस’ महत्वपूर्ण आ चुनौतीपूर्ण चरित्र छथि शर्व । ई पात्र जतेक साधारण देखाइत अछि कविक रूपमे ओतबे जटिल अछि आंतरिक रूपे । अभिनयक जे सबस’ महत्वपूर्ण अंग अछि अंतरद्वन्द से एहि पात्र में दुनू तरह स’ भरल अछि – बाहरी आ आंतरिक सेहो । बाहरी मे अपन प्रियंवदा आ समाज सँ, आ आंतरिक मे हुनक अपन अतीत स’ । एहि तरहक चरित्र कोनो अभिनेता लेल पसंदिदा चरित्र होइत अछि । तेँ हम शर्व के एहि नाटक मे महत्वपूर्ण चरित्र मानैत छी । भैया आ भौजीक रूप मे दूटा पात्र आरो छथि । नाटक लेल ई दुनू सहयोगी पात्र छथि । अहू मे भौजी कनी बेसी महत्वपूर्ण । पहिने कहने छी जे कोरस के प्रयोग नीक अछि । तेँ प्रियंवदा पात्रक अनुसार एकटा महत्वपूर्ण नाट्य रचना थिक ।
नाटक मे नाटकीय भाषाक जे प्रयोग भेल अछि से शास्त्रीय थिक । चुँकी नचिकेता जी स्वयं नीक कवि सेहो छथि तेँ हिनक कविता बेसी प्रमुखता संग नाटक मे रहैत छनि । यैह कारण अछि जे बहुत बात ओ बहुत कम्मे शब्द आ सुगठित भाषा मे कहि लैत छथि । मुदा प्रियंवदा मे कविताक प्रयोग किछु विशेष भ’ गेल अछि । ओना शर्व कवि छथि तेँ कविता अधिक - सेहो कोनो उचित तर्क नहि बुझना जाइत अछि । आ एहन तरहक भाषाक प्रयोग नाटक के भ्रमित करैत अछि ओ एना कि भाषाक आधार पर प्रियंवदा के की कहल जाय शास्त्रीय नाटक, ऎतिहासिक नाटक, यथार्थवादी नाटक या आर कोनो । हाँ, भाषा आ कथ्यक आधार पर ई यथार्थवादी नाटकक वैचारिक नाटकक श्रेणी मे राखल जा सकैत अछि । मुदा, कोरसक भाषा नाटकक संग नहि जाएत अछि । संगहि किछु आर मुद्दा सेहो कोरस के माध्यम स’ सामने राखल गेल अछि ओ कनि आरो मूल कथ्य के भ्रमित करैत छै जेना प्रेमी-प्रेमिका मे विवाहेत्तर संबंधक मुद्दा उठायब । ई मुद्दा कमजोर या अप्रासांगिक अछि से हम नहि कहि रहल छी मुदा एहि ठाम एकरा उठायब नाटकक मूल कथ्य के कमजोर करब अछि ।
रंगमंचीय दृष्टि सँ प्रियंवदा एकटा सामान्य कृति अछि । ने कोनो अतिमहत्वपूर्ण आ ने निराशाजनक । एहन कोनो खास नै छै जे किनो निर्देशक वा संस्था एक बेर पढ़िते एकरा मंचनक परिकल्पना क’ र’ लागथि आ इहो नहि कहल जा सकैत अछि जे कोनो निर्देशक एकरा मंचित क’ र’ चाहथि त’ प्रभावी नहि बना सकैत छथि कनि फेर बदल क’ क’ ।
२
बिपिन झा
युवा हेतु प्रेमक "समुचित मार्ग"।
(वेलेण्टाइन डे विशेष पर)
प्रेम दिवस एकदा मन्यते यत्र रक्तपातोऽल्पि कारयति,
वर्षस्य प्रतिदिवस घ्रृणादिवस सम कुर्वन्न शर्म लभते।
न कोऽपि कथयति तं किमपि, यः वितरति विषयुक्ता हाला,
किन्तु सर्वे निन्दन्ति यदा मधु वितरति मधुशाला॥
सामान्यतया ई देखल जाइत अछि जे प्रेम दिवस अर्थात वेलेण्टाइन डे दिन यदि कोई विशेष उत्साह रखैत अछि तऽ समाज नीक नहि बुझैत छैक। एतय प्रश्न उठैत अछि जे प्रेम केर इजहार करब उचित वा अनुचित? एहि सन्दर्भ में जहाँ तक हमर दृष्टि अछि - प्रेम जीवन केर महत्त्वपूर्ण शक्ति छियैक जे भावना पर आश्रित होइत छैक। आब एतय प्रश्न स्वाभाविक अछि जे प्रेमक अभिव्यक्ति केना हो? एतय सजतया अपन विचार के प्रस्तुत करवाक लेल हम गीता केर ’भक्ति’ आ ’कर्म’ केर अवधारणा क माध्यम बना रहल छी। यदि निष्पक्ष भाव सँ देखल जाय तऽ प्रेम क्यल नहि जाइत छैक सहजतया भय जाइत छैक (we 'fall in love' not 'get it'). एहि स्थिति में समस्त प्रेमी के भक्तिमार्ग आ कर्ममार्ग में बिभक्त कय सकैत छी। भक्ति मार्ग में जतय व्यक्ति एकता दास जकाँ समर्पित भाव सँ काज करैत छैक ओतहि कर्म मार्ग में व्यक्ति स्वामी जकाँ आचरण करैत छैक। भक्ति मार्ग केर अपनबै बला प्रेमी विविध भावनानुकूल आचरण करैत छथि ओतहि कर्ममार्ग केर श्रेयस्कर बुझयबला मैत्री आ आनन्द केर अनुगमन करैत छथि। ई शब्दावली यदि आंग्ल पर्याय रूप में देखी तऽ विशेष स्पष्ट होयत।
उक्त दुनू मार्ग एकांी दृष्टिगत होइछ। यदि दुनू केर समन्वय कय प्रेम केर गाडी आगू बढायल जाय तऽ ओ प्रेम निश्चित रूप सँ सफल होयत एहि में कतहु सन्देह नहि।
प्रेमक मह्त्त्व बुझैत सन्त वेलेण्टाइन अपन जीवन एहि कार्य हेतु युवा के प्रेरित करबा लेल अपन जीवन कें सर्वस्व न्यौछावर कय देलथि। राजा केर अवज्ञाक कारण हुनका मृत्युदण्ड भेटलन्हि।
एतय एकटा गप्प कहब अनिवार्य बुझैत छी जे वर्तमान समय में एहि पावन अवसर के अनुचित प्रयोग होइत अछि। अस्तु युवा वर्ग कें एहि दिस ध्यान देव अत्यावश्यक जे प्रेम दिवस कें नैतिकता क संग प्राणी मात्र हेतु मनायल जाय। आओर बुजुर्ग सँ आग्रह जे एहि पावन दिवस कें संकुचित दृष्टि सँ नहि देखि एकरा उत्साह क संग मनेवा हेतु युवा वर्ग कें प्रेरित करथि।
(लेख केर कोनोशब्द जनभावना के ठेस पहुँचवैत हो ओहि लेल सतत क्षमाप्रार्थी छी)
बिपिन झा, पी एच. डी स्कालर
आय. आय. टी. मुम्बई
http://sites.google.com/site/bipinsnjha/home
१.कुमार मनोज कश्यप-कथा- कचोट २.कथा-मुसिबत–सन्तोष कुमार मिश्र ३.दुर्गानन्द मंडल- लाल भौजी
कुमार मनोज कश्यप जन्म : १९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाममे आ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखनमे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवाणी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रिय सचिवालयमे अनुभाग अधिकारी पद पर पदस्थापित।
कचोट
'डिवोर्स इज ग्रांटेड। नाऊ यू बोथ आर लीगली सेपरेटेड ऑफ इच अदर' - कंहि कंऽ जज अदालतकं कंार्यवाही समाप्त कंऽ कंऽ उठि गेल छलाह। ओकंरा चेहरा पर पैघ सन मुस्कंान पसरि गेल छलै़माथकं बोझ हल्लुकं होईत सन बुझेलै। ओ विजयी भाव सँ तकंलकं मीरा दिस । मीराकं कंातर नजरि सेहो एकं पल लेल ओकंरा दिस उठलै ; पेᆬर जल्दी सँ अदालत सँ बहरा गेलि मीरा ।
ओ ठाढ़े रहि गेल अदालत मे । सोचैत़आई स्थिति कंोना एकंाएकं बदलि गेलैकंअप्रात्याशित। मीराकं वकंील बहस मे कंतेकं जोर दऽ कंऽ कंहैत छलै जे विवाह भारतीय समाजकं एकं टा पवित्र बंधन छई आ एहि बंधन के कंोनो उद्वेग मे तोड़ल नहि जा सकैछ । ओकंरा मोन पड़लै जखन मीराकं वकंील ओकंरा पर आरोप लगबैत कंहने छलैकं - 'योर ऑनर ! वास्तविकंता तऽ ई आछ जे श्रीमान विकंास हमर मुवक्किंल मीरा सँ तलाकं लऽ कंऽ दोसर विवाह अपन प्रोमिकंा सँग कंरय चाहैत छथि, जे पहिने परिवार आ समाजकं दवाबकं कंारणें नहि कंऽ सकंल छलाह । हमर मुवक्किंल कें पहिने रस्ता सँ हटेबा हेतु ओ तरह-तरह के प्राताड़ना दैत रहलाह़मारि-पीट, गारि-गंजऩक़ंी कंी नहि । ' किं तखने मीरा ठाढ़ भऽ कंऽ अपन वकंील के रोकैत जज दिस ईशारा कंरैत कंहने छलीह - ' हमरा क्षमा कंरब , ई सभ सत्य नहि आछ जज साहेब । हमर पति देवता-तुल्य छथि । हमरा ओ कंहियो अधलाह वचन तकं नहि कंहलनि ; हाथ उठेबाकं तऽ बाते नहिं । ओ किंयैकं हमरा सँ अलग होमय चहैत छथि से तऽ वैह जानथि । ' मीराकं एहि वत्तᆬव्य पर समूचा अदालत स्तब्ध रहि गेल छल। मीराकं भाय तामसे माहुर भऽ रहल छलाह। हुनकंर अँखि सँ व्रᆬोधकं ज्वाला पुᆬटय लागल छल़ठोर पटपटा रहल छल मुदा शब्द नहिं बहरायल।
पाशा तँ तखन पलटि गेलै जखन एकंर वकंील कंहने छलै--'मी लॉर्ड ! हमर मुवक्किंल के अदालत सँ तलाकं मँगबाकं मुख्य कंारण आछ श्रीमति मीराकं व्यभिचार जे हिंदु मैरिज एक्ट-१९५५ के धारा-१३ के अंतर्गत तलाकंकं एकंटा पैघ कंारकं भऽ सकैछ । हमरा लग कैकंटा एहन दृष्टांत आछ जे हमर एहि आरोप के पुष्टि कंरत़। ' एहि सँ पहिने किं वकंील अपन फाईल कें पढ़ि कंऽ किंछु आगु बजतथि, किं मीरा उठि कंऽ ठाढ़ भऽ जज सँ कंहने रहै--' जज साहेब ! हम अपन पति कें तलाकं देबा लेल तैयार छी । हमरा बताओल जाय जे कंोन कंागज पर कंतऽ दस्तखत कंरऽ पड़तै । ' समूचा अदालत मे पेᆬर सँ सन्नाटा पसरि गेलै। सभ स्तब्ध भेल अड़ोस-पड़ोस ताकंय लगलै ; कंाना-पुᆬसी शुरू भऽ गेलै। केयो एहन उम्मीदो नहि केने छल ।
तलाकं भेटलाकं क्षणिकं खुशी के तुरते बाद ओकंरा भान भेलै जे मीराकं चरित्र पर एहन पैघ लाँछन लगा कंऽ ओ नीकं नहि केलकं । एकंरा एकंोटा किंछु एहन घटना नहि बुझल छै जाहि सँ मीराकं चरित्र पर कंोनो टा संदेह होई । चरित्रे तऽ नारीकं सभ सँ पैघ गहना होईत छैकं । पेᆬर सोचलकं तलाकंकं हेतु आन कंोनो कंारणो तऽ नहि छलै ओकंरा लेल़वकंीले कंहने छलै जे एहि ग्राउँड पर सद्यः तलाकं भेट जयतै एकंरा ।
ई धरि सत्य जे ओ अपन ईच्छा के विरुद्ध परिवार-समाजकं दवाब मे मीरा सँ विवाह केने छल । मुदा ओ अपन प्रोमिकंा के नहि बिसरि पओलकंविवाहकं बाद तऽ ओकंर प्रोम बढ़िते गेलैकं। पत्नि आ प्रोमिकंाकं वास्तविकं भेद के जनितो ओ पत्नि मे प्रोमिकंाकं गुण ताकंऽ लागल । परिणाम भेलै जे पत्नि सँ विरत्तिᆬ बढ़ऽ लगलै । जखन प्रोमिकंाकं ईशाराकं हवा भेटलै तऽ पत्नि सँ विरत्तिᆬ अदालत तकं तलाकंकं मुकंदमा रूप मे पहुँचि गेलै़घर-परिवार, गाम-समाज सभ सँ विद्रोह कंऽ कंऽसभ सँ सम्बंध विछोह कंऽ कंऽ ।
अपना के धिक्कंारऽ लागल ओ़चरित्र तऽ एकंर स्वयं कंलुषित छैकं जे व्याहता पत्नि के छोड़ि़। ओकंरा सन पतित भरि संसार मे केयो नहिं हेतैकं । मीरा सन धवल चरित्र पर कंलंकंकं दाग तऽ कंम सँ कंम नहिं लगावऽ बुझैत छलैकं ओकंरा । मीरा़! मीरा तऽ वीराँगना आछ़ज़खन एकंर वकंील ओकंर चरित्र के कंलंकिंत कंहऽ लगलै तऽ ओ अपन चरित्र पर लाँछना सुनबा सँ पहिनहि ओ तलाकंकं कंागज पर दस्तखत कंऽ देब नीकं बुझलकं।
घर आबि कंऽ ओ पलंग पर धड़ाम सँ पड़ि रहल। सामनेकं देवाल पर एखनो एकंरा दुनूकं फोटो टाँगले छलैकं। ओकंर ध्यान ओहि फोटो पर टँगि गेलै़क़ंतेकं ध्यान राखैत छलैकं मीरा एकंर एकं-एकं जरूरति के ध्यान राखैत छलैकं। एकंरा तऽ मोनो ने छैकं जे द्विरागमनकं बाद सँ अपन जरूरति के कंोनो समान ई घर मे मँगने होईकं वा स्वयं उठा कंऽ लेने हुअय़ज़रूरति सँ पहिने मीरा सामान लऽ कंऽ हाजिर । लुड़ि-वितपनी, आवेश-वात सभ मे मीरा अव्वल । भरि गाम मे लोकं कंहै छै जे पुतोहू हुअय तऽ भोलबाबू सन। आस-पड़ोस, घर-परिवार, जन-हरवाह सभकं प्रिाय बनि गेल छलैकं मीरा। एकंो क्षण सासु-ससुर के नजरि नहिं पड़नि तऽ कंनियाँ-कंनियाँ के शोर। ननदि-देयोर भौजी-बौजीकं अनघोल केने। एकंरो तऽ कंोनो शिकंायत नहिये छलैकं मीरा सँ। मुदा किंश्मत बीचहिं मे अपन चालि चललै आ पूर्व-प्रोमिकंा सँ एकंर लगाव बढ़ऽ लगलै नहि चाहितो ओ प्रोमिकंा के प्रोम-जाल मे पँᆬसैत चलि गेल आ पेᆬर दुनू निश्चय केलकं मीरा सँ अलग भऽ विवाह कंरबाकं। एकंरा नीकं जकँा बुझल छलैकं जे मैथिलानी लेल पतिकं आतरित्तᆬ ओकंर कंतहु स्थान नहि आ सौतीन सेहो कंथमपि स्वीकंार्य नहि; तैं अंतिम रस्ता अदलते सँ तलाकं लेब बुझेलैै।
गाम-समाज मे जे सुनलकं से थू-थू कंरय लागल। बाप जे धड़ खसेलनि से खसेनहिं रहि गेलाह़माथकं पाग बेटा खसा देने छलनि। ओकंर विद्रोहकं आगाँ सभ विफल भऽ गेल़ओ घर छोड़ि कंऽ पड़ा गेल ऩहिं जानि कंतऽ।
आई ओकंरा प्राचंड झंझावातकं बाद पसरल विरानगि सन बुझा रहल छलै अपना भीतऱकिंछु टा नहिं नीकं लागि रहल छलै ओकंरा । अपराध-बोध सँ दबले जा रहल छल़किं पओलकं ओ़उनटे पुरखाकं मर्यादा मटियामेट भऽ गेलै़बाबू लोकंलाजें दलानो पर तकं नहि निकंलैत छथिऩमायकं आँखिकं नोर सँ आँचरकं खूट तीतले रहैत छै़हँसैत-खेलैत परिवार मे आई मरघटकं सन्नाटा सन पसरि गेल छै । एहि सभकं दोषी तऽ यैह आछ । ओ जतेकं सोचय; आत्म-ग्लानि सँ ततबे दबल जाय । प्रोमिकंाकं बेर-बेर फोन अबैत छलैकं। मोबाईल स्वीच-ऑफ कंऽ कंऽ ओ कंात मे पेᆬकं देलकं । उठल़दू-चारि टा कंपड़ा-लत्ता जल्दी-जल्दी ब्रीफकेश मे ठुसलकं आ घर मे ताला लगा बाहरा गेल ।
दलान पर बाबू आ कंक्कंा कंोनो गूढ़ विचार-मंथन मे लागल छलाह। ओ दुनूकं पायर छुलकंनि कंकंरो दिस सँ कंोनो प्रातिव्रिᆬया नहिं। ओ अप्रातिभ भऽ गेल। कंने कंाल ओहिना ज़डवत ठाढ़ रहल पेᆬर समान उठा कंऽ आँगन दिस विदा भेल । कंोनटा लग माय ठाढ़ छलैन, दबले स्वरे पुछलकंनि ' निके छी किंने?' ओ स्वीकृति-सूचकं मुड़ी डोलबैत अपना कंोठली मे चल गेल। मीराकं कंपड़ा-लत्ता, वस्तु-जात सभ किंछु ओहिना राखल जेना एखने नीकंलल होथि ओहि कंोठली सँ । माय चौखटि लग नुआँकं खूट सँ नोर पोछैत आबि कंऽ ठाढ़ भऽ गेलखिन। पेᆬर नहुयें-नहुयें कंहय लगलखिन-'बौआ आहाँ अपना पर ध्यान राखब़अहीं पर सदिखन चिंता लागल रहैत आछ । सुनै छियै कंनियाँकं भाय आहाँकं जान लेबा लेल उदवीर्त भऽ गेल आछ । गोनमाकं माय बजैत छलैकं जे ओ तऽ बंदूकं निकंालि कंऽ आहाँ के मारबाकं लेल निकंलि गेल छल। मुदा कंनियाँ ओकंर पैर गछेड़ कंऽ पड़ि रहलै जे भैया एहन पाप नहिं कंरू । एखन हम कंम सँ कंम सधवा तऽ कंहबैत छी़सींथ मे सिनूर पहिरैत छी़माँछ-माँसु खाईत छी। तलाकंकं कंागज पर दस्तखत मात्र कंऽ देने जन्म-जन्मांतरकं सम्बंध नहिं टुटि जायल कंरैत छै । हुनकंा कंरय दियनु ओ जे कंरैत छथि । अहुँ के जँ हम बोझ बुझाईत होई तऽ हमरा छोड़ि दिय़हम वुᆬटौन-चुरौन कंऽ कंऽ पेट पोसि लेब़संसार बड़कंा टा छै । '
सुनि कंऽ ओ ठामहिं ठाढ़ भऽ गेल- ' माय हम गंगापुर जा रहल छी मीरा सँ भेंट कंरय । ' माय अचम्भित भेल कंोनो आनष्टकं आशंकंा सँ ओकंरा रोकिंते रहि गेलखिऩओ मोटरसाईकिंल स्टार्ट कंऽ कंऽ आँखि सोंझा सँ दूर भऽ गेल। बाबू - कंक्कंा बौकं बनल दलान पर ठाढ़े रहि गेलाह।
२
मुसिबत–सन्तोष कुमार मिश्र
दुरागणे दिनसँ जे कननी–रोइनी ओकरापर सबार भेलै से एखन धरि छुटल नहि छलै । तें हम साँझखनकऽ जखन कतौसँ आबि त सबहे दिन लोड–सेडिङ्गकें कारणे अन्हार ताहुमे ओ असगरे कनैत । कहियो मैनबत्ति बरैत त कहियो अपने बारऽ परैछल । हुनका कनैत देखिकऽ हम मैनबत्ति लऽकऽ हुनकर मुँहके चारु दिश घुमऽबैति कहऽलैगितीए –“आको माइ चाको, पहलाद माइ रोको, सँझा माइ तरणी, सबहे दुःख हरनी, हसनी–खेलनी आगु आ, डिठ–मुठि नजरि–गुजरि सब पाछु जो, .........” एते कहिते ओ छमसिया बच्चा जकाँ खिलखिला– खिलखिलाकऽ हंसऽ लैगतथिन । हम त कनहि बिलाइ, मारे तिरपित । हुनका हसिते हमर सुपसन करेज भऽजाइछल । आ, हम खुसीसँ दङ्ग परैत कैहितिए “सो डारलिङ्ग ह्वाट टु डू ?”
जेना बापक जिमदारी हुए तहिना ओ तखनसँ काज अढ़ाबऽकें शुरु करैछलखिन । हम त धोखासँ अंग्रेजीमे बजैछली आ, तकर बाद ओकर अग्रेजी शुरु होइछल । इहे त बात छै, कहूँ माथ पर बैसल त सोचिलिअ, दिशा करबाक चान्स बेशी रहत ।
समय एहिना बड़ निकसँ शुद्ध पत्नीवर्ता पुरुष जकाँ चलैत रहे । मुदा एकबेर अफिसके काजसँ काठमाण्डू जाए पड़ल । समय त किछु बेशिए लागऽवाला रहै । करिब एक महिना । आ, सबहे दिन फोन पर बात करब से बचन सेहो देनेहे रहि । आबऽबेरमे ओ बेर–बेर कहैत रहथिन –“काठमाण्डूमे ठन्ढा बेशी छै, अहाँके मिसेज डि–कोल्ड कें आवश्यक पड़त ।” हम बेर–बेर जबाब दिए–“अच्छा, जरुरत बुझएतै त किनलेबै ।” हमर जबाब ओ सुनिते हैसिदे । मुदा ई बात जखन बसमे हमरा ठन्ढ़ा लागल तखन महसुस भेल जे ओ डि–कोल्ड के आगुमे मिसेज किए लगै? ओ त अपना लेल कहे । तखन मतलब साफ नजरि आएल जे हुनको काठमाण्डू आबऽके मोन छलनि ।
काठमाण्डू पहुचलाके बाद एक दिन पहिने बात कएने रहि मुदा काल्हिखन दिन भरि फोन लागले नहि रहे । जखन फोन लगबिए त आवाज अबै–“तपाइले .....” मतलब सम्पर्क नहि होएत । मुदा, तकरे प्रातः कलंकीसँ फोन कनिञाके फोन आएल –“हम अग्नी बसके काउन्टर लग ठाढ़छी जलदीसँ लेबऽ आउ” ओ माइ गोड, अखन त साढ़े चारिए बजलैए । पुछलिए टेक्सीके बारेमे त जबाब आएल जे आइ उपत्यका बन्द छैक । कनिञा आएल काठमाण्डू, एकटा मुसिबत । उपत्यका बन्द, दोसर ।
हम होटलके स्टाफकें खुसामद कऽकऽ गाड़ी त मगलहूँ मुदा ओ कलंकीमे मात्र छोरत ओतऽसँ फिर्ता नहि आओत । कहाँदोन हड़तालमे टुटफूटके इन्स्योरेन्स कभर नहि करैछैक । हम कलंकी पहूचली । हुनका देखलियनि; ओते ठन्ढ़ामे पातर ओढ़ना, मुदा ओढ़ना जतबे पातर छलै लोलमे लिपस्टिक ओतबे मोट ते सायल ओतबे मोट लाठीसँ हुनका पिटऽके सेहो मन भऽगेल । मुदा ..... ।
हम हुनक नजदिक जाकऽ बड़ प्रेमसँ मुस्कैत कहलिए –“चलु डारलिङ्ग, ... अहाँके बेग कतऽ अछि ?” ओ क्लोज–अप स्माइल दैत अप्पन ह्याण्ड बेग दैत कहली –“हम त एतबे लऽकऽ आएलछी ।” ओ त काठमाण्डू आबिकऽ बड़ खुस मुदा हमर मन त हुनक बेग देखिकऽ खौझागेल । तैयो हमसब आगु बढ़लहुँ । किए त पैदले जाएके आश छल । करिब एक किलोमिटर चललो नइ रही कि ओ कहऽ लगली –“चाह पियब ।” कनिके आगु जाकऽ देखलिए एकटा महिला टेबुलपर स्टोभ धऽकऽ चाह बेचैत छली । हम दुनूगोटे ओतै चाह पिलहुँ । आ ओतऽसँ बिदा भेलहुँ । ओतऽसँ बिदा भेला दुइयो मिनट नइ भेल रहे कि ओ अपन पेटपर हाथ हौस्तैति कह लगली –“हे यौ ....यौ सुनुने, एहन रस्ता दने चलु जतऽ लगमे ट्वाइलेट हुए ।” आब ई परेसानी संग पकड़लक । मतलब जे हम भोर खनकऽ हिनका बेड टि दै छलियनि तखन ई ट्वाइलेट जाइछलखिन । आदतसँ लाचार, कि करु । जखन–जखन जोरसँ लगैनि तखन–तखन मुहँ घोकचऽबित पेट पकरैत बजथिन–“आहऽऽऽ” आ जखन कने ठिक जकाँ जे हुएन त बजथिन– “दरऽऽऽ, बज्जरखसो एहि काठमाण्डूमे, एकटा ट्वाइलेटो नहि ।” फेर कने आगु सेहे ताल । करिब एक किलोमिटर आगु जाकऽ कालीमाटीकें पुलक निचा एकटा सार्बजानिक सौचालय भेटल । मुदा ओतौ खाली नइ । मुदा हुनक छटपटाहट देखिकऽ एकटा ट्वाइलेटकें केबार हम ढकढकादेलिए आ कने दुर हटिकऽ ठाढ़ भऽगेलीए । तुरत्ते एकटा मोटचोट महिला ओहि ट्वालेटमेसँ निकलली आ एक थप्पर हुनका मारिकऽ फेर ओहिमे पसिगेली । हुनकर मुहँ त लाल रहबेकरै आब कि ? कनिके देर बाद एकटा दोसर ट्वाइलेटमेसँ एकटा पुरुष निकलल आ ओ ओहिमे गेली आ सायद ओतै ओे उपत्यका बन्दसन पावनिकें सेलीब्रेट कएली ।
३.दुर्गानन्द मंडल-
कथा-
लाल भौजी दुर्गानन्द मण्डलजीक
पछिला अड़तालिस बर्खक सभ रेकार्ड घ्वस्त करैत एहि बेरक जाड़ पाँछा छोड़ि देलक। कहबी छैक जाड़ मासमे रुइये आकि दुइये मुदा रुइ ततैक महग जे बेसाहब कठिन। जँ दाम पुछबै तँ माधो मास सौंसे देह पसीनासँ तर-बत्तर भऽ जाएत। जहाँ धरि दूइएक सवाल अवैत अछि तँ ई सुख प्रायः सबहक कपारमे लिखले नहि अछि। जँ क्यो किशोरावस्थाक बालक-बालिका छथि तँ राति सपनाइते वितैत छन्हि, आ बुढ़हा-बुढ़िक तँ कथे नहि पुछू किऐक तँ आइ ने ओ बुढ़ भेलाहहेँ मुदा ऐहेन कतेको जाड़ कऽ ओ लोकनि देखने छथि आ खेपने छथि। तेँ फलक रुपमे केराक घोड़ जेकाँ हथ्थे-हत्थाक असथानपर गन्डाक-गन्डा धिया-पुता सोहरल छन्हि। बाल-बच्चाक समर्थ रहबाक कारणे ओकरा सभकेँ तँ अपने खाए-खेलाएसँ पलखति नहि। ताहू परसँ जँ कोनो पाहुन-परख चल आबैथि तँ घरक सवर्था अभावे। सभ घरकेँ बेटा-पुतोहू अलगे छेकने। तेँ बुढ़ा-बुढ़िक लेल तँ माध मासक जाड़ प्राणक हार बनल रहैत छनि।
कोनो तेहन अवसरे नहि भेटि पबैत छनि जे समए सँ ओइ कहबीसँ किछु लाभ उठाबथि। तेँ ओम्हर बुढ़ि कोनेा कोन मे धोकरी लगा पुआर मे धोसिआइल रहैत छथि। आ ऐम्हर बुढ़हा दलानक कोनो केानमे पोता पोतीक संग जाड़सँ सर्घष करैत रहैत छथि। कोनो तरहेँ दुनू परानी (बुढ़हा-बुढि) राति खेपक लेल मजबुर। मुदा से कते दिन धरि?
एक दिन मौका पाबि़ बुढ़ा बुढ़िकेँ हाक दैत छथिन- ‘‘सुनै छै हाथ-पाएर जाड़े ठिठुरि रहल अछि, कनी कोनो मालीमे लहसुन तेल पका कऽ लेने आबो तऽ। बुढ़ि आंगनेसँ उतारा दैत छथिन हँ हँ सुनै छियै एते जोरसँ किए हाक दै छै, कोनो की हम बहीर छी? लेने आबै छियै। ताबे माले घरमे आगि तापो। बुढ़हा पुनः बाजि उठैत छथि- ‘‘हे जल्दी सँ औते हम माले घरमे छी।’’
बुढ़ि करीब दस मिनटक बाद मालीमे लहसुन तेल पका दुरुखे सँ हाक दैत छथिन- ‘‘कतए छै हइया लौ।’’
बुढ़हा फेरि बाजि उठैत छथि- ‘‘एम्हरे लेने आबो ने हइया छियै।’’
बुढ़ि लग अबैत बाजि उठैत छथि- ‘‘ई किछो नइ बुझै छै? जे बेटी-पुतोहूबला अंगना-घर भेलै। सुतौ तेल लगा दैत छियै।’’
बुढ़हा पुआरक बिछौनपर ओंघरा जाइत छथि आ बुढ़ि तेलक मालीश करए लगैत छथिन। कने कालक बाद बुढ़ा तेल लगबैत गरमा जाइत छथि। प्रेमसँ बुढ़िकेँ पुछै छथिन- ‘‘भानस भातमे देरी छै की? बच्चा सभकेँ अंगना दऽ आबौ खा पी कऽ सुइत रहतै आ ई एत्ते आगि तापो।’’
बुढ़ि आंगन जा धिया-पुताकेँ पुतोहू सभकेँ दैत अपने बुढ़हा लग आबि जाइत छथि आ मालक घरमे पजरल घुरा लग बैसि आगि तापए लगैत छथि। दुनू परानीक गप्प-सप्प करैत बुढ़हा हाथ-पाएर सुग-बुगबए लगैत छथि। आ अपन दहिना हाथ बुढ़िक बामा.........
शेष अगिला अंकमे
१.विद्यानन्द झा-किशोर लोकनिक लेल दूटा कथा २श्यामसुन्दर शशि- जनकपुरके खवरि
१
विद्यानन्द झा
किशोर लोकनिक लेल दूटा कथा
नैतिक योग
कोनो गाममे एकटा नापित छल ओ अपन कार्यमे तँ निपुण छलैहे, जाहिसँ गामक लोक ओकरापर प्रसन्न रहैत छल, ओकर दोसर गुण छलैक जे छोट–मोट घाव घोंसकेँ चीर–फाड़ि कऽ के जड़ी–बूटी दऽ ओकर इलाज कऽ दैत छल। लोक नीकेना भऽ जाइत छल। गामक लोक सभ प्रशंसा करैत छल। ओकर ई चिकित्सा सम्बन्धी कार्य खूब चलैत छलै। पाइयो नीके कमाइत छल, बड्ड दिन धरि ओकर कार्य चलैत रहल। किछु दिनक बाद ओहि गाममे एकटा डाक्टर साहेब अएलाह। ओ नीक सर्जन छलाह, बड्ड पैघ–पैघ डिग्री सेहो छलन्हि। ओहि गाममे ओ डाक्टर साहेब अपन क्लीनिक खोललन्हि। हुनका लग चीर–फाड़िक सभटा यंत्र छलन्हि, नीक–नीक औषधिक व्यवस्था सेहो कएलन्हि। पर्चा–पोस्टर छपाए आस–पासक गाममे सटबेलन्हि। ओकर बाद डाक्टर साहेब नियमित रूपसँ अपन क्लीनिकमे भरि दिन बैसथि। मुदा ई की ? रोगीक कोनो पता नहि, डाक्टर साहेब बैसि कऽ झख मारथि। डाक्टर साहेबकेँ किछु फुरैबे नहि करन्हि, की करी की नहि करी। डाक्टर साहेब कम्पाउण्डर सेहो रखने छलाह, तकरा घरेसँ वेतन दै छलाह। आमदनीक कोनो रस्ता नहि छलन्हि। क्लीनिकक खर्च सेहो अलगेसँ। बेचारा डाक्टर साहेब मन मसोसि बैसल रहथि। ओम्हर गामक लोक सभकेँ एहि पढ़ुआ डाक्टरसँ बेसी ओहि नापितक कएल चिकित्सापर विश्वास छलैक।
एक दिन डाक्टर साहेब ओहि गामक परम बृद्ध ओ नीतिज्ञ लोकक शरणागत भेलाह। डाक्टर साहेब हुनकासँ सविस्तार अपन हाल सुनाओलन्हि। ओहि नीतिज्ञ बृद्धक संग समस्त गामक लोक सभ हिनक समस्या सुनलन्हि। डाक्टर साहेब कहलखिन्ह जे हम एतेक दिन धरि पढ़ि–लिखि चिकित्साक उचित वैज्ञानिक शिक्षा पाबि तखन एहि कार्यक लेल क्लीनिक खोललहुँ अछि। जाहिसँ गामक लोकक इलाज नीक ढ़ंगसँ होएत। ओकर बाबजूदो समाजक लोग सभ हमर क्लीनिक नहि आबि ओहि नापित देहातीसँ इलाज करबैत छथि।
नीतिज्ञ, बृद्ध लोकनि डाक्टर साहेबक समस्या सुनि किछु उपदेश देलखिन्ह आ कहलखिन्ह जे अहाँ ई तरीका अपनाउ शीघ्रे समस्या मुक्त भऽ जाएब। डाक्टर साहेब हुनक आदेश शिरोधार्य कऽ वापस डेरापर अएलाह। अगिला दिन सुरूचिगर भोजनक ओरियाओन कऽ ओहि नापितकेँ अपना ओहिठाम भोजन करबा लेल आमंत्रित कएलन्हि। डाक्टर साहेब अपनेसँ जा कऽ ओहि नापितकेँ नोत देने छलखिन्ह। ओ नापित खुशीसँ ओत-प्रोत भए गेल, नचैत–नचैत भरि गामक लोककेँ ई संवाद कहि आएल जे डाक्टर साहेब हमरा गुरू मानि लेलन्हि अछि। भोजनक बेरमे ओ नापित डाक्टर साहेबक ओहिठाम पहुँचल। डाक्टर साहेब ठाढ़ भए आह्लाद पूर्वक ओहि नापितकेँ बैसाओल। भरि पोख भोजन करौलन्हि, आदर देलन्हि आ कहलखिन्ह जे अपनेक चिकित्सा विद्यासँ हम प्रसन्न छी। हम डाक्टरी पढ़ियोकऽ जतेक नहि सिखलहुँ ताहिसँ बेसी अहाँ अपन अनुभवसँ कल्याण करैत छी। जँ एतेक करिते छी तँ कनेक आओर ध्यान देबैक तँ पैघसँ पैघ आपरेशन अपने कऽ सकैत छी, मात्र थोड़बे ध्यान राखए पड़त। ओ नापित परम प्रसन्न भेल डाक्टर साहेबक मुँहे अपन प्रशंसा सुनिकऽ डाक्टर साहेबसँ पुछलक जे कोन–कोन बातक ध्यान राखए पड़त। डाक्टर साहेब ओकरा अपना दिश उन्मुख होइत देखि भीतरे–भीतर प्रसन्न होइत बजलाह-–जेना पएर परक घाव भेलापर किछु नश–नाड़ीकेँ चीन्हि ओकरा कटबासँ बचा कऽ अहाँ पैर परहक घावकेँ चीर–फाड़ि कए चिकित्सा कए सकैत छी। ओ पुछलक जे डाक्टर साहेब पएर परहक नश कटलासँ की होएतैक? डाक्टर साहेब बतौलखिन्ह जे ओ नश कटलासँ तीव्र रक्तस्राव होएत जे साधारण ढंगे नियंत्रणमे नहि आओत, तखन रोगीक रक्त शुन्यताक स्थितिमे प्राणांत भए सकैछ। तहिना धौना परहक नशकेँ देखबैत बतौलन्हि जे एहि ठामक घावक आपरेशन करए काल नश सभपर बेसी ध्यान राखऽ पड़त, से नहि कएलासँ नश कटबाक भए बनल रहत। एहिसँ रोगीकेँ लकबा मारबाक सम्भावना बढ़ि जाएत। जँ नश सभकेँ चिन्हि–चिन्हि आपरेशन करब तँ सफल रहत।
ई सभ सुनि नापित घर दिश बिदा भेल, आब ओ अगिला दिनसँ नशक ज्ञान प्राप्त करबामे लागल। ओकर नैसर्गिक बुद्धि हेड़ाए गेल। जखन ओ चीर–फाड़ दिश सोचलैक की नश कटबाक भए सतबए लगैक। ई नश कटत तँ ई रोग होएत, आ ओ नश कटत तँ ओ रोग होएत। परञ्च ओकरा लेल एहि समस्यासँ पार पाएब सम्भव नहि भेलैक आ अंततः ओ चिकित्सा कार्यसँ विरक्त भए गेल। आ ओम्हर डाक्टर साहेबक क्लीनिक ताबड़तोड़ चलए लगलन्हि।
२
दीप तर अन्हार
दूटा मित्र छल। दुनहुँक मध्य बड्ड प्रेम छल। जतए जाए संगहि, भोजन संगहि, खेलाइत संगहि, मुदा घरक कोनो काज ओ दुनू नहि करैत छल। सतत् काल दुनू योजना बनबैत छल। शेख–चिल्ली जकाँ गप्प बघारब मुदा कोनो जोगरक नहि। घर–परिवारक लोक सभ आजिज भए दुनूकेँ गामसँ भगा देलन्हि। दुनू मित्र वापस अपन गाम जाए किछु काज कए पाइ जमा कएलक आ आपसमे दुनू विचार कएलक जे गामसँ बहुत दूर शहरमे जाए कोनो काज करब ताहिसँ खूब पाइ कमाएब आ तखन गाम वापस आएब। दुनू मित्र पाइसँ गामहिमे किछु बट खर्चाक ओरियाओन कएलक। ओ ओढ़ना, बिछौनाक मोटरी बनाए दुनू मित्र बिदा भेल। शहरसँ जखन बहुत दूर छल तँ संध्या भए गेलैक। कतहु कोनो गाम नजरि नहि अबैत छल। चलैत रहल–चलैत रहल अन्हार गुज्ज साँझ भए गेलैक। चोर सभ सतबए लगलैक आब की करत? कतए जाएत? दुनू मित्रकेँ किछु फुरएबे नहि करैक। इतस्ततः करैत–करैत जंगलक बीच जा रहल छल। तखन एकटा बरगदक गाछ नजरि अएलैक। ओ दुनू मित्र थाकि गेल छल। ओहि गाछ तर राति बितएबाक बिचार कएलक। ओहि बरगदक गाछ तर मोटरी राखि धम्मसँ बैसि रहल। एक तँ बाटक थकान दोसर अन्हार गुज्ज राति। दुनू बिछौना बिछा कऽ पड़ि रहल। दुनू मित्र आपसमे निर्णय कएलक जे बेरा बेरी सुति कऽ राति बिताएब, एहिसँ चोर उचक्का सामान आ पाइ नहि चोराबै सकत। परंतु से सम्भव नहि भेलैक। दुनू ततेक बेसी थाकल छल जे कखन दुनूक आँखि लागि गेलैक से दुनू नहि बुझलक। खूब सूतल, भोरहरबामे जखन एकटाकेँ निन्न टुटलैक तँ ओ मोटरी नहि देखि चिचिआबै लागल, दोसरो उठल ओहो चिचियाबै लागल। दुनू एक दोसराकेँ चोरि करबाक आरोप लगबए लागल, बहुत काल धरि दुनू झगड़िते रहल। ओहिठाम तँ तेसर क्यो रहैक नहि जे ओकर दुनू लोकनिक झगड़ा छोड़बितैक। अपनहि थोड़ेक कालक बाद शांत भए निर्णय कएलक जे नजदीकक कोनो गाम जाए ओहि गामक पंचसँ निसाफ कराएब जे दोषी के ?
दुनू मित्र बिदा भेल। थोड़े दूर चलैत–चलैत जखन जंगलसँ बाहर भेल तँ एकटा खेतमे हर जोतैत एकटा हरबाह नजरि अएलैक। दुनू मित्र ओहि हरबाह लग पहुँचल, एकटा मित्र बाजल जे भाए हो–रातिमे हमर दुनू मित्रक सामान आ पाइ कौड़ी चोरि भऽ गेल, तेसर तँ क्यो छलै नहि तखन तोहीं कहऽ जे–(दोसर मित्र दिश आंगुर देखबैत)–एकरा छोड़ि दोसर के लेने होएत ? दोसर मित्र फेर बमकल। ओ पहिलकेँ गारि श्रापक तर कऽ देलक। ओ हरबाहा बेचारा स्वयं अपनाकेँ निसाफ देबामे असमर्थ पाबि कहलक जे एहि बातक गाममे एकटा नीक पंच छैक हरि चरण। तोँ सभ ओकरे ओहिठाम जा कऽ सभ वृतांत बता दहक, ओ निजगुत फैसला कऽ देतौक। दुनू मित्र आगाँ बढ़ल। अपरिचित गाम छलैक, बेर–बेर चौक चौराहापर पंचक घरक मादे पुछऽ पड़ैक। तखने एकटा जोन–बोनिहार भेटलैक। एक मित्र ओकरासँ पूछि बैसल जे हौ हरिचरण पंचक घरक पता बता देबह। ओ पुछलक जे अहाँकेँ ओहि पंचसँ कोन काज अछि। तखन दुनू मित्र बताबऽ लागल जे हमरा सभक बीच विवाद भेल अछि हुनकासँ निसाफ कराए। ओ बोनिहार बाजल- ओ की फैसला करताह ओ तँ बड बेइमान छथि। दुनू मित्र अचम्भित होइत आगाँ बढ़ल। किछु दूर आगाँ गेलाक बाद एकटा समर्थगरि कुमारि कन्या नजरि अओलैक। तखन दुनू हुनकासँ पंचक घरक रास्ता देखा देबऽ लेल कहलकैक। ओहो कन्या हिनकासँ प्रयोजन पुछलकन्हि। दुनू मित्र रातुका सभटा खिस्सा कहलकैक। ओ कन्या बाजलि जे ओ की निसाफ करताह ओ तँ आन्हर छथि। दुनू मित्र घोर निराशामे पड़ि गेल। किछु नहि फुरए जे आब कतऽ जाए। लेकिन दुनू मित्रकेँ हरबाहाक कहल गप्पपर बिश्वास छलैक ओ आगाँ बढ़। राहमे एकटा अधेड़ महिला पुछलकै। ओ सभ स्त्रीगण बाजलि जे जँ अहाँ सभ कोनो निसाफ लए जाइत छी तँ बेकार होएत। ओ दिन खाइ छथि तँ राति लेल झखै छथ। आब तँ दुनू मित्र भयंकर असमंजसमे पड़लाह जे आब हरिचरण पंचक ओहि ठाम जाइ आकि नहि। ई सोचिते बढ़ि रहल छलाह की पंचक घर आबि गेल। हरिचरण दलानेपर सुतरी कढ़ैत छलाह। दुनू मित्र हुनकर दलानपर जाए प्रणाम कएलन्हि। सरपंच हुनक लोकनिक समस्या सुनि युक्तिपूर्वक न्याय कऽ देलखिन्ह। दुनू मित्र प्रसन्न भेलाह। परञ्च मनमे ओ सभटा बात उमड़लन्हि जे पंच तँ बड़ निसाफी छथि तखन ओ लोकनि हिनकर मादे एना किएक कहलन्हि। नहि रहल गेलन्हि। एकटा मित्र पंचसँ रास्ताक सभटा वृतांत कहलखिन्ह। हरिचरण गम्भीर भए कहलखिन्ह जे हम एखन गरीबीमे छी। ओहि बोनिहारक किछु बोनि हमरा लग बाँकी छैक जावत दऽ नहि दैत छिऐक तावत् ओकरा लेल बेइमान थिकहुँ। ओ कुमारी कन्या हमर बेटी थिकीह। तों सभ देखने होएबह जे हमर बेटी वियाह करबाक जोगरि भऽ गेल अछि। हम ओकर विवाह नहि करा सकलिऐक अछि तैँ ओकरा हेतु हम आन्हर छी। अंतमे जे महिला भेटल छलीह ओ हमर दोसर पत्नी थिकीह। हम एक दिन बिता कऽ हुनका लग जाइ छी तैँ ओ कहलन्हि जे एक साँझ खाइ छथि दोसर साँझ उपासल रहैत छथि। तैँ ओ सभ अनर्गल तँ नहिए कहलन्हि।
२
श्यामसुन्दर शशि- जनकपुरके खवरि
रेल सेवा बन्द । नेपाल सरकार कानमे तेल तूर धऽ सूतल
श्यामसुन्दर शशि ,
जनकपुरधाम । गत एक सप्ताहसँ जनकपुर रेल सेवा बन्द अछि । भारत एवं पूर्वी धनुषाके आवागमनके वास्ते प्रयोगमे आवएवला एकमात्र रेल सेवा बन्द भेलासँ दुनू देशक नागरिकके सास्ती भोगए परि रहल छनि ।
मुदा रेल व्यवस्थापन,स्थानीय प्रशासन,सरकार आ राजनितीकदलसभ कानमे तेल तूर धऽ निषवद्ध पडल अछि । ककरो कोनो चिन्ता नहि । हँ सोमदिन नेपालक राष्ट्रिय मानव अधिकार आयोग मध्यमांचल क्षेत्रीय कार्यालय जनकपुर एहि विषयपर चिन्ता व्यक्त कएलक अछि ।
आयोगके प्रमुख प्रदीपकुमार झा प्रेस विज्ञप्ति प्रकाशित कऽ रेल सेवा अविलम्ब सुचारु कएल जएवाक वातावरण सृजना करवालेल स्थानीय प्रशासन तथा सम्बन्धित पक्षसँ सकृय पहलके अपेक्षा कएलक अछि ।
नेपालके एकमात्र रेल्वे सेवा बन्द भेलाक बाद धनुषाक पूर्वी भागसँ दैनिक जनकपुर आवागमन करएवला हजारौ सर्वसाधारणके कठिनाई भेलैक अछि आ एहि बन्दीसँ बन्द—व्यावसाय सेहो प्रभावित भेल अछि । अतः बन्दक सम्पूर्ण कार्यक्रम फिर्ता लए अपन जायज मांगके वार्ताक माध्यमसँ समाधान करबाकलेल आयोग सम्बन्धित पक्षसंग आग्रह करैत अछि । झा विज्ञप्ति मार्फत आह्वान कएने छथि ।
गत सातदिनसँ रेल्ा सेवा अवरुद्ध भेलाक बाबजुदो स्थानीय प्रशासन चुप्प अछि । रेल्वे व्यवस्थापनके कोनो फिकीर नहि छैक । सरकार एतेक वेपर्वाह अछि जे तीन सप्ताह पूर्व नियुक्त कएल भेल महाप्रवन्धक भोला पंजियारके एखन धरि हाजिर होवए नहि पठौने अछि ।
एम्हर रेल सेवा बन्द कऽ आन्दोलनमे उतरल कर्मचारीसभक वास्ते सेहो साँप छुछुन्नरिके ताल भऽ गेल छनि । ओसभ अपने मोने रेल खोलैत लजा रहलाह अछि आ कोनो निकाय खोलवालेल आग्रह नहि कऽ रहल छनि । हुनकासभक आरोप अछि जे कोनो निकाय हमरासभक मांग प्रति सकारात्मक नहि अछि । दोसर दिस सेवाग्राहीसभ सरकार आ कर्मचारीक प्रवृति विरुद्ध आन्दोलनमे जएवाक धमकी देलक अछि । हुनकासभक कहब छनि जे यात रेल नीक जकाँ चलाओल जाय वा बन्द क देल जाय ।
मधेसी जनअधिकार फोरम आ नेपाली काग्रेस निकट श्रमिकसभक एक समूहले चारि सूत्रीय मांग राखि रेल्वे प्रशासन,लेखा आ प्रवन्धकके कार्यालयमे तालाबन्दी कएने छल । जकर विरोधमे माओवादी निकट अखिल नेपाल यातायात मजदुर संघ रेल सेवा बन्द करौने छल ।
संलग्न तस्वीर
शहीद धोषणामे सेहो ‘मूह देखि मुंगवा’
श्यामसुन्दर शशि
गणतन्त्रान्त्रिक आन्दोलनके प्रथम शहीद दुर्गानन्द झाके एखनधरि औपचारिक रुपमे शहीद घोषणा नहि कएल जएवापर मधेसी नागरिक समाजक अगुवासभ कडा प्रतिवाद कएलनि अछि । हुनकासभक आरोप छनि जे देशमे शहीद घोषणा करबाक विषयमे सेहो ‘मूह देखि मुंगवा’ बाटल जा रहल अछि ।
लोकतन्त्रके गरदनि दवा क्रुड पंचायती व्यवस्था सूत्रपात करएवला राजा महेन्द्रउपर २०१८सालमे वम प्रहार कएनिहार शहीद दुर्गानन्द झाके ४७सम् वलिदानी दिवसके अवसरपर वृहस्तपतिदिन जनकपुरके जानकी मन्दिर प्रांगणमे आयोजित प्रवचन गोष्ठीक वक्तासभ ई आरोप लगोने छलाह ।
‘देशमे शहीद घोषणा करेवाक दौर चलल अछि । चोर,डकैतसभ सेहो शहीद घोषित भेल मुदा अदालतके निर्णयसँ फाँसीक सजाय पावएवला दुर्गानन्द झाके एखनोधरि शहीद घोषणा किए ने कएल गेल ।’ स्वर्गीय झाके सहकर्मी एवं वम काण्डके दोसर जिवित शहीद अरवीन्द ठाकुरके प्रश्न छलनि ।
जनकपुर वौद्धिक समाजके अध्यक्ष राजेश्वर नेपालीके मांग छलनि जे स्वर्गीय झाके राष्ट्रिय विभूति आ गणतान्त्रिक आन्दोलनके प्रथम शहीद घोषणा कएल जएवाक चाही ।
लोकतन्त्रके हत्या कऽ पंचायती व्यवस्था सूत्रपात कएनिहार राजा महेन्द्र विरुद्ध लोकतन्त्रवादीसभमे आक्रोश छल । लोकतन्त्र स्थापनार्थ नेपाली काग्रेस सशस्त्र जनयुद्धके घोषणा कएने छल । एहि बीच राजा महेन्द्रके जनकपुर भ्रमण तय भेल छल । नेपाली काग्रेस राजाउपर वम प्रहार करवाक निर्णय कएलक । एहि वास्ते सीमावर्ती भारतीय नगर उमगाउॅमे अध्ययनरत्त १९वर्षिय दुर्गानन्द झा आ अरवीन्द ठाकुरके जिम्मा देल गेल । काग्रेस पार्टीक निर्णय अनुसार २०१८साल माघ ९गते राजा महेन्द्रउपर जानकी मन्दिर प्रांगणमे वम प्रहार कएल गेल छल । अरवीन्द ठाकुर वम सहित पकडल गेलाह मुदा दुर्गानन्द झा राजा महेन्द्रउपर मन्दिर प्रांगणमे वम प्रहार कएलनि । राजा अपने बाचि गेलाह मुदा मोटर क्षतिग्रस्त भेल छल ।
लगभग १८महिनाक चरम यातना पश्यात तत्कालीन मुलुकी ऐनमे परिवर्तन कऽ दुर्गानन्द झाके राजकाज अपराध सजाय ऐनके दफा ४अन्तर्गत फाँसीक सजाय देल गेल आ ठाकुरके उर्म कैदक सजाय । झाके २०२०साल माघ १५गते केन्द्रिय कारागारमे फाँसीपर लटका हत्या कएने छल । चुकी तत्कालीन कानूनमे गाई आ ब्राहृमनके हकमे मृत्यु दण्ड वर्जित छल तें ऐनमे संशोधन कऽ दुर्गानन्द झाके फाँसी देल गेल छल ।