विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मिथिला पञ्चकोशी परिक्रमा

नागेन्द्र कुमार कर्ण · 2010-03-01 · अंक 53

मिथिला पञ्चकोशी परिक्रमा चारिमदिन अर्थात फागुण शुक्ल तृतीयाक दिन महोत्तरी जिल्लाक पहिल विश्राम स्थल मटिहानीमें प्रवेश करैत अछि । एतऽ सीताजीक मटकोरक लेल माटि खनाएल विश्वास कायल जाइत अछि । एहिठाम प्रसिद्ध लक्ष्मी सागर नामक विशाल पोखरि आ प्रसिद्ध लक्ष्मीनारायणक मन्दिर रहल अछि ।
(५) जलेश्वर ः— मटिहानीसँ परिक्रमायात्री पाँचमदिन जलेश्वर पहुँचैत अछि जे मटिहानीसँ २ कोश पश्चिममे अवस्थित अछि । एतऽ जलमे विराजमान जलेश्वरनाथक पुजा आराधना पश्चात यात्रीक रतुका विश्राम एतहि होइत अछि ।
(६) मडै ः— फागुण शुक्ल पञ्चमीक दिन परिक्रमाक डोला जलेश्वरसँ प्रस्थान कऽ मडै पहुँचैत अछि आ एतऽ रातिक विश्राम करैत अछि । प्राचिनकालमे एतऽ माण्डव ऋर्षीक आश्रम आ सीताजीक विवाहकलेल मडवा (वेदी) एत्तहि बनाओलगेल बुढ़–पुरानक कहबी छन्हि ।
(७) धु्रवकुण्ड ः— परिक्रमावासी मडैÞसँ सातम दिन धु्रवकुण्ड पहुँचि एतऽ विश्राम करैत अछि । एतऽ ध्रुवक मन्दिर आ ध्रुव कुण्ड रहल अछि ।
(८) कञ्चनवन ः— ध्रुवको दर्शन कएला पश्चात परिक्रमाबासी महोत्तरीक अन्तिम पडाव स्थलक रुपमा रहल कञ्चनवनमे सप्तमीक दिन विश्राम लेल करैत अछि । एहिठाम ईच्छावती आ विरजा गंगाक पवित्र संगमस्थल भेलाक कारणे एकरा पवित्र मानल जाइत अछि । पौराणिककालमे एतऽ अनारवन, तमालवन, तालवन, कदलीवन लगायतक १२ टा रमणीय वन रहल छल । त्रेता युगमे एतऽ भगवान राम हारी खेलने रहल किंवदन्ति अनुसार एतऽ परिक्रमाबासी पहुँचिकऽ अविर खेलीकऽ होली मनवैत अछि ।
(९) पर्वता ः— नवम् दिन परिक्रमायात्री धनुषाक पर्वतामे विश्राम लैत अछि । राजा जनकद्वारा स्थापित क्षिरेश्वरनाथ महादेवक प्रसिद्ध मन्दिर एतऽ रहल अछि ।
(१०) धनुषाधाम ः— पर्वतासँ परिक्रमाबासी दशम् पडावस्थलक रुपमा रहल धनुषाधाम पहुँचैत अछि । एहिठाम जनकपुरमे सीताक स्वंयम्वर होइतकाल मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामद्वारा तोड़लगेल धनुषक एकटा टुकड़ी खसल विश्वास अछि । एतऽ सीताराम, हनुमान लगायतक मन्दिर रहल अछि, मुदा दर्शनार्थीक दर्शनक केन्द्रविन्दु धनुषे रहल पाओलगेल अछि ।
(११) सतोषर ः— फागुण शुक्ल दशमीक दिन परिक्रमाबासी डोलाक संगे सतोषर पहुँचल करैत अछि । एहिठाम सातटा पोखरी होयबाक कारणे एकर नाम सतोषर परल अछि । एतऽ शिव आ सीताराम मन्दिर रहल अछि ।
(१२) औरही ः— विमला नदीक तटमे अवस्थित औरहीमे परिक्रमा यात्रीसब अपन १२ दिनक विश्राम लेल करैत अछि ।
(१३) करुणा ः— नेपालक औरहीसँ पुनः परिक्रमा भारतक करुणामे तेरहम् दिनमे प्रवेश करैत अछि । एहिठाम करुणा नामक नदी विख्यात रहल अछि ।
(१४) विशौल ः— करुणाक विश्रान्तिकबाद परिक्रमाबासी चर्तुदशीक दिन भारतक विशौल पहुँचैत अछि । एहि स्थान होइत कमला नदी वहैत अछि आ एतऽ ऋर्षी विश्वामित्रक मन्दिर सेहो अवस्थित अछि ।
(१५) जनकपुर ः— भारतक विशौल पश्चात परिक्रमाक अन्तिम पडावस्थलक रुपमे नेपाल स्थित मिथिलाक राजधानीक रुपमे विश्व प्रसिद्ध रहल जनकपुरमे पहुँचिकऽ परिक्रमाबासी विश्राम करैत अछि । एतऽ रतुका विश्राम पश्चात अन्तिम प्रहरमे अन्तगृही परिक्रमा करबाक परम्परा रहल अछि । जानकी आ राममन्दिरके केन्द्रविन्दु मानिक अन्तगृही परिक्रमा होइत अछि । एतऽ सम्मत जरौलाकवादमे मिथिलामे होली अर्थात फगुआक डम्फ बजैत रंग आ अविरक वर्षा प्रारम्भ भऽजाइत अछि ।

महाशिवरात्री मेला आ गाँजाक व्यापार
–मनोज झा मुक्ति
संसारमे सबसँ प्रसिद्ध शिवलिङ्ग रहल नेपालक काठमाण्डू स्थित मन्दिर सबठामक हिन्दू सबहकलेल पैघ आस्थाक केन्द्रकरुपमे परिचित रहल अछि । विभिन्न अवसरपर एतऽ लागऽवला मेलामे कसिकऽ दर्शनार्थिक भीड़ लगैत अछि । ओना बेगर मेलोके पशुपतिनाथक दर्शनकलेल संसारक सभ कोनासँ हिन्दूसब आओल करैत अछि ।
विषेश रुपसँ शिवरात्रीमे पशुपतिनाथक मन्दिरमे अपार भीडभाड लगैत अछि । बहुत दुर–दुरसँ योगीसब बाबाक दर्शनकलेल सेहो अवैत अछि । नेपाल सरकारक दिससँ जोगी सबहकलेल विषेश व्यवस्था होएबाक कारणे सेहो जोगी सबहक आकर्षणक केन्द्र पशुपतिनाथ बनल अछि । शिवरात्रीक अवसरपर आओल जोगीके एतऽ सेवा सत्कारक अलावा सम्मानक सँग विदाई करबाक परम्परा चलैत आएल अछि ।
नेपाली भाषामे एकटा कहबी छैक,‘पशुपतिको यात्रा, सीद्राको व्यापार’ । जकर अर्थ होइछ, पशुपतिक यात्रा आ सिधरीक व्यापार । सिधरीक उदाहरण एहिलेल देलगेल होएबाक चाही कि निरंकारक दरबारमे, दर्शनक बहन्नासँ सभ तरहक लोक अपन–अपन कार्य सिद्धि करैत छथि । पशुपतिनाथक प्राँगणमे शिवरात्रीक समयमे लागऽवलामे औनिहार जोगी सबमे बहुत लोक त जोगीक भेषमे मात्र आ मात्र गाँजाक व्यापार करबाकलेल अवैत अछि । एकटा आओल जोगीक कहब रहनि जे ‘दू दिन गाँजा बेच लेलहुँ त भरि सालक जेबखर्ची चलि जाइत अछि ।’ हुनक कहब रहनि जे हम सबदिन गाँजा नई बेचैछी, मुदा शिवरात्रीमे गाँजाक बेचवामे कोनो रोकटोक नई रहबाक कारणे हमहुँ ओइदिन गाँजा बेचलेल करैत छी ।
एहि बेरुका वितल शिवरात्रीमे हमहुँ गेल छलहुँ ई देखबाकलेल जे कोन तरहें गाँजाक खुलेआम बाजार लगैत अछि पशुपतिनाथक मेलामे । जखन पशुपतिनाथक मन्दिरक सटले रहल आर्यघाटक सँगेक पुलसँ वाग्मतीके ओहिपार राम मन्दिरक प्राँगणमे प्रवेश केलहुँ त विभुतसँ अपना शरीरके रंगने बाबासभ अपन अपन खन्ति गाड़िकऽ धुनी रमौने बैसल भेटलाह । हम आ हमरा संगे तीनटा आओर मीत्र रहैथ । हमसब पहिनहींसँ गाँजाक बाजारमे जाऽकऽ मोलजोल करबाक, मुदा नहिं किनवाक बात विचारिकऽ ओतऽ गेल छलहुँ ।
ओतऽ देखलियैक प्रायः बाबासब अपना अपना आगामे नीक चीप्पीबला गाँजा एकटा प्लास्टिकवला पुडियामे देखयबाकलेल धेने छथि आ एकटा छोट वासनमें गाँजाक बुकनी रखने ओकरा सिकरेटमें भरैत अछि । सिकरेट भरि–भरिकऽ आगामे सजाविकऽ राखिरहल छथि । हुनकासँ पुछलियैन,‘बाबा गाँजा केना देते हैं ?’
बाबा कहलथि,‘ दश रुपैयाका एक सिकरेट ’
हम कहलियैन,‘बाबा, बहुत महँग भऽ गया, कनि कम नही होगा ?’
बाबा,‘हम दुसरे बाबाजी जैसे भाँगको गाँजा कहकर नही बेचते हैं, एकदम असली माल है ।’
हम, ‘बाबा केना बुझेंगे जे ई असली है ?’
बाबा(गाँजाक चीप्पी देखवैत), ‘ई देखता है, वस ऐसाही माल हमारे ईहां मिलेगा ’
हम, ‘बाबा २५ रुपैयामे चारिटा दिजिएगा ?’
जखन हम १० रुपैयामे एकटा दाम कहने सिकरेटके २५ रुपैयामे चारिटा देवाक बात कहलियैन्ह त बाबा मोनके मसोरैत देवाकलेल तैयार भऽ गेलाह । मुदा हमरा सबके लेबाक नई छल ताँए दुआरे ओतऽसँ आगा बढलहुँ ।
आगा बढलहुँ त देखैत छी जे सब बाबाक आगामे ओहिना सिकरेट सजाओल अछि आ गहिंकीसब किनमे आ बाबाजीसब बेचऽमे व्यस्त छथि । फेर एकटा बाबालग पहुँचलहु आ पुछलियैन्ह, ‘बाबा परसाद है ?’
बाबा( हमरा दिस निचासँ उपरदिस घुरैत), ‘बेचनेके लिए त नही है, लेकिन पीनेके लिए मिल जाएगा ’
हम,‘कते पैसा लगेगा ?’
बाबा,‘१००÷५० जो देना हो देदो’
हम,‘बाबा ५ रुपैयाके नही मिलेगा ?’
बाबा,‘यहाँसे जाओ, पाँच रुपैयाके गाँजा नही मिलता है ।’
हमसब फेर ओतसँ आगा बढलहु त एकठाम ५÷६ टा बाबाजी चारुकातमे वैसिकऽ धुनी तपैत देखलियैन । हम ओतऽ जाकऽ पुछलियै जे बाबा परसाद मिलेगा ? केओ किछु नई बाजल तहन हमसब आगा बढऽ लगलहुँ । हमरा सबके आगा बढैत देखि ओहिमेंसँ एकटा बाबा बजौलथि आ कहलथि,‘ जादा त नही है, हँ कमसम पानेके लिए परसाद मिल जाएगा ,’
हम,‘कते रुपैया देना पडेगा ?’
बाबा,‘कमसेकम १० रुपैयाका’
हम,‘बाबा दू रुपैयाके नही मिलेगा ?’
बाबा(हमरा मुँहपर ठिकियवैत),‘ अच्छा लाओ लेले ।’
बाबाके देवाक तैयारी भेल देखिकऽ हमर मित्र कहलथिजे छोडू चलु–चलु कहैत हमसब आगा बढि गेलहुँ ।
ओहि प्राँगणमे किछु विदेशी महिला आ पुरुषसेहो बाबाक धुनीक बगलमे गाँजा भरल चीलम सुनगवैत नजर आओल । ओहि परिसरमे भिडभाड बहुत कसिकऽ छल, आ ओहि परिसरमे घुमैत प्रायः दर्शनार्थीक आँगि देखवा योग्य छल । किनको आँखि बुझाइत छल जे लाल भऽकऽ आब निकलही बला अछि त किनको आँखि डुबिगेल अछि । जाहीमे युवा आ युवती सभ सामेल छल । सबहक चलबाक दृश्य सेहो देखवा योग्य छल । एकटा डेग एम्हर त दोसर ओम्हर । ओहीमे गाँजाक अवैद्य बिक्रि नई हो ताहिलेल सुरक्षा निकाय प्रहरीक ड्यूटी सेहो खटौने छल । गाँजा रोकबाकलेल आएल पुलिस सेहो बाबाक धुनीक आगा गाँजाक सोंटा लगवैत नजरि आएल । नजारा सब देखैत हमसब ओतऽसँ बाहर निकललहुँ आ शिवरात्रीक अवसरपर पशुपतिनाथक दर्शन करबाकलेल आओल अधिकांश बाबाक असली कारणसँ भिज्ञ भेलहुँ ।
बुझाइया ताहु दुआरे अनदिनो जौं केओ कहैत अछि जे पशुपति जाऽकऽ अवैत छी त अधिकांश लोक ई बुझैत अछि जे,‘ ई पक्के गाँजा पिवऽ जाऽरहल छथि ।’
जौं एहि तरहक गाँजाक खुल्ला व्यापार होइत रहल त लोक अपना धियापुताके शिवरात्रीक मेलामे पशुपतिनाथक मन्दिरमे पठेवासँ परहेज नई करत तकर कोनो ग्यारेन्टी नहि ।

मिडिया सेन्टरक स्थापना
पशुपति क्षेत्र विकास कोषद्वारा पशुपतिनाथक महिमाके राष्ट्रिय÷अन्तरराष्ट्रिय रुपमे प्रचार प्रसार करबाकलेल मिडिया सेन्टरक स्थापना केलक अछि ।
पशुपतिनाथक सम्बन्धमे देश÷विदेशमे रहल हिन्दू आ गैर हिन्दू सबहक पशुपतिनाथक सम्बन्धमे जानकारी कराएब प्रमुख उद्देश्यक संग स्थापित मिडिया सेन्टर पशुपतिनाथ सम्बन्धि सभ तरहक सूचना संसार भरि संप्रेषण करबाक काज करत से बात मिडिया सेन्टरके उद्घाटन करैत कोषक सदस्य–सचिव सुशील नाहटा बतौलन्हि ।
श्रीपशुपतिनाथक परिसरमे लागऽवला हरेक मेला÷महोत्सवमे सूचना प्रकाशन÷प्रशारणकलेल आबऽवला संचारकर्मीके यथा संभव सहयोग करबाक काज मिडिया सेन्टरके रहल बात बताओलगेल अछि ।
तहिना संसारभरि घरेमे बैसल–बैसल पशुपतिनाथ सम्बन्धि हरेक गतिविधिके देखवाकलेल कोषद्वारा मिडिया सेन्टर मार्फत वेभ साइटक शुरुवात सेहो कयलगेल अछि । धधध।उबकजगउबतष्।यचन।लउ ठेगाना रहल एहि साइटक उद्घाटन संस्कृति मन्त्री मिनेन्द्र रिजाल कयने रहथि ।

Suggested citation: नागेन्द्र कुमार कर्ण. “मिथिला पञ्चकोशी परिक्रमा.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 53, 2010-03-01. https://www.videha.co.in/research/2010/53/मिथिला-पञ्चकोशी-परिक्रमा.htm

मूल विदेह अंक / Original issue