विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

कृतारिषड्वर्गजयेनमानवीम्…। (सफलताक मूलसूत्र)

बिपिन झा · 2010-03-15 · अंक 54

कृतारिषड्वर्गजयेनमानवीम्…।
(सफलताक मूलसूत्र)
आजुक युवा में एकटा बहुत पैघ कमी देखै में आबय लागल अछि, जे बाहरी शत्रु पर तऽ ओ सहजता सँऽ विजय प्राप्त कय लैत छथि मुदा आन्तरिक शत्रु काम, क्रोधादि पर ओ विवश भय जाइत छथि। जाहि कारण बहुत बेर ओ सफलता सँऽ वंचित रहि जाइत छथि अथवा ई कहब उचित होयत जे आंशिक सफ़लता प्राप्त करैत छथि।
Earl Nightingale केर अनुसार सफलता क आशय “Progressive realization of worthy goal” अछि। अस्तु, सफलता क्षणभरिक कार्य सँ नहि अपितु निरन्तर उद्यम सँ संभव अछि।
एहि संदर्भ में किरातार्जुनीयम् (महाकवि भारवि केर अनुपमकृति, संस्कृत महाकाव्य) क प्रथम सर्गक एकटा श्लोक स्मरण में अछि जतय दुर्योधन कें एहि कारण प्रशंसा कयल गेलैक जे ओ अपन समस्त आन्तरिक शत्रु पर विजय प्राप्त कय समय केर नियमपूर्वक विभाजन कय जनता क सेवा में लागल अछि। ओतय ओकर सम्बोधन दुर्योधन केर् अपेक्षा सुयोधन कहनाई उचित बुझल गेल छैक।
यदि आन्तरिक शत्रु पर विजय प्राप्त कयल जाय तऽ दुःसाध्य काज सेहो सम्भव छैक। क्षणभरि धैर्य नहि रहब साल भरिक परिश्रम कें व्यर्थजँका सिद्ध कय दैत अछि (’जका’ एहि कारण कहल गेल जे परिश्रम कखनहु व्यर्थ नहिं जाइत अछि )। धैर्य केर उदाहरण एहि प्रकारें देल जा सकैत अछि-
एक व्यक्ति केर व्यापार ओहि समय ठप्प भय गेलैक जखनि ओ मात्र २१वर्षक छल। २२ वर्षक अवस्था में ओ चुनाव लडल आ हारि गेल। पुनः व्यापार में आयल जाहि में समुचित सफलता नहिं भेटलैक ओहि समय ओ मात्र् २४वर्षक छल। जखनि ओ २६ वर्षक छल अपन प्रियतमा सँ सदाक लेल दूर भय गेल, स्वाभाविक अछि ओ किछु वर्ष धरि नर्वस जका भय गेल। हारि नहिं मानलक पुनः कांग्रेसियल रेस में आयल किन्तु सफलता नहिं भेटलैक ओहि समय ओ ३४ वर्षक छल। एहि तरहें ओ जीवन रूपी समरांगण में सतत् संघर्ष करैत रहल हारि नहिं मानलक। अन्ततः ओ अमेरिका केर प्रथम राष्ट्रपति बनल। ओ छलाह अब्राहम लिंकन।
कहबाक आशय मात्र एतवा अछि जे जाहि क्षेत्र में रुचि हो, ओहि क्षेत्र में बिना विचलित होइत निरन्तर आगू बढी कियाक तऽ एहि राष्ट्र कें विकसित राष्ट्र के पंक्ति में आनव मात्र सरकारी योजना सं संभव नहि अपितु समस्त नागरिक केर अथक, सांविधिक आ नैतिक नियमानुकूल समुचित कार्य सँऽ संभव छैक।

१. बेचन ठाकुर,नाटक-‘छीनरदेवी’२.राधा कान्त मंडल ‘रमण’-कने हमहूँ पढ़व
बेचन ठाकुर , चनौरा गंज, मधुबनी, बिहार।
‘छीनरदेवी’बेचन ठाकुरक-

बेचन ठाकुर
(चनौरा गंज)
दृश्य तेसर

(स्थान-सुभाष ठाकुरक घर। दुनू परानी ललनक विषएमे गप-सप करैत छथि।)
मीरा- यै ललनक बाबू, हमर विचार अछि जे आब ललनकेँ कोनो बढ़ियाँ धाइमसँ देखाए दियौक।
सुभाष- यै ललनक माए, रातिमे अपन घरक गोसांइ काली बंदी हमरा सप्पन देलनि जे बौआकेँ कोनो चिक्कन धाइमसँ देखा। हम पुछलियनि जे के चिक्कन धाइम छथि तऽ ओ कहलनि जे खोपामे रोडक कातमे परवतिया कोइर नामक एकटा धाइम छथि, ओ एकदम सिद्ध धाइम छथि आ ओ जे किछु कहैत छथि से उचितो मे उचित। ओतए तोरा मोनक भ्रम दूर भऽ जेतौक।
मीरा- ललन बाउ, घरक गोसांइ बड़ पैघ होइत छथिन्ह हुनक कहल नहि करबनि तँ किनक कहल करबनि।
सुभाष- हँ हँ हुनक कहल करबाके अछि! ललन, ललन, बौआ ललन।
(ललनक प्रवेश। ललन बताहक अवस्थामे छथि।)
ललन- हमरा तों बौआ किएक कहैत छह? हम तोहर बौआ नहि छियह। हम तोहर नाना छियह। आइसँ तों हमरा नाना कहह।
सुभाष- ललन नाना, हमरा सङे चलू एकठाम मेला देखै लए। मएओ जेतीह।
ललन- हम पएरहि नहि जेबह। हम कनहापर जेबह।
सुभाष- चलह ने, बेसी कनहेपर चलिह आ कने-मने पएरो।
ललन- बेस चलह। हमरा ओतए रसगुल्ला, लाय मुरही, झिल्ली किनि दिह। बगियो कीनि दिह।
मीरा- चल ने, सबटा कीनि देबौक।
(सुभाष, मीरा ओ ललन जा रहलाह अछि परबतिया कोइर ओहिठाम। परबतिया गहबरमे बैसल छथि! मृदंग बाजि रहल अछि। किछए कालमे परबतियाक देहपर काली बंदी सवार भऽ जाइत छथिन्ह। मृदंग बजनाइ बन्द भऽ जाइत अछि)
परबतिया- होऽऽऽ बोल जय गंगा। बोल जय गंगा। काली बंदी छियह हम। बोल जय गंगा। बाजह, के कहाली छह? बोल जय गंगा। जल्दी लग आबह। बोल जय गंगा जल्दी आबह। हमरा जेबाक छह बाबा धाम। फेर गंगोकेँ देखनाइ अछि।

(तीनू परानी लग जाइत छथि। ललन देह-हाथ पटकि रहल अछि। मूरी हिलाए रहल अछि। भगत पीड़ि परसँ माटि लऽ कऽ ललनक देहपर फेंकलथि। ललन शांत भऽ जाइत अछि। भगत ललनक माथक पूरा पकड़ैत छथि।)
परबतिया- हओ बाबू, एकरा केलहा नहि छह। जे कियो तोरा कहैत छह जे एकरा केलहा अछि से तोहर कट्टर दुश्मन छियह। तोरा दुनू दियादमे झगड़ा लगाबए चाहैत छह। बोल जय गंगा। काली बंदी छियह। हओ बाबू ओ तोरासँ ऊपरे ऊपर मुँह धएने रहैत छह। ओ आस्तीनक साँप छियह। हओ बाबू तोड़ै लऽ सब चाहैत अछि मुदा, जोड़ै लऽ कियो नहि। बोल जय गंगा। ओ बड़का धुर्त्त छह, मचण्ड छह।
सुभाष- सरकार, हमरा बहुते लोक कहलक जे अहाँक छोटकी भाबो पहुँचल फकीर अछि। ओकरहि ई कारामात छी।
परबतिया- बोल जय गंगा। हओ बाबू, कने तोहुँ सोचहक, अकल लगाबहक जे जदि डाइनकेँ एतेक पावर रहितैक तँ ओ अपन विद्यासँ सौंसे दुनियाँपर शासन करैत रहितैक। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्य मंत्री, एस.डी.ओ., कलक्टर, थाना-पुलिस बैंक सभटा वएह रहितैक ने। बोल जय गंगा। हओ बाबू, डायनपर विश्वास केनाइ खाटी अंध विश्वास छी। ई मोनक भ्रम छी। ई मोनक शंका छी। बोल जय गंगा। हओ बाबू, अगर शंकाबला आदमी केकरो हँसैत देखि लेलक तँ ओकरो होइत छैक जे ओ हमरेपर हँसल। तें हम यएह कहबह जे तों नीक लोक लागैत छह, एहि भ्रममे नहि पड़ह। नहि जौं पड़लह तँ सत्यानाश भऽ जेतह। हम तोरहि घर गोसांइ काली बंदी बाजैत छियह। बोल जय गंगा। हओ बाबू, आब हमरा देरी भऽ रहल छह, हमर विमान ऊपरमे लागल छह।
मीरा- सरकार, ई ठीक कोना होएत, से उपए बता दथुन्ह न? ई एना किएक करैत अछि?
परबतिया- बोल जय गंगा। हओ बाबू, एहि छौंड़ाकेँ छीनर देवी लागलि छह।
सुभाष- छीनरदेवी हटत कोना?
परबतिया- हँ हटत, नहि किएक हटत? जल्दी तों एकर बिआह केहनो लड़कीसँ करह। सभ ठीक भऽ जेतह। आओरो कोनो कष्ट छह?
सुभाष- नहि सरकार, जदि अपने सहाय रहबैक तँ कोनो कष्ट नहि होएतैक।
मीरा- सरकार, कने विभूति दए दिअ।

(परबतिया मीराकेँ विभूति देलनि।)
परबतिया- बोल जय गंगा। बोल जय गंगा। बोल जय गंगा। आब हम जाइ छियह। बाबा धाम।
(कहैत कहैत काली बंदी चलि जाइत छथि।)
सुभाष- सरकार, अपनेक दक्षिणा?
परबतिया- पाँच टका मात्र।
सुभाष- सरकार एतबै?
परबतिया- हँ पाँचहि टका मात्र। उहो गहबरमे प्रसाद चढ़ाबए लेल। हमरा गहबरमे ठकै फुसलबै बला काज नहि होइत अछि। हमरा गहबरमे कलयाणक आ संतोषक गप होइत अछि। शंका वा भ्रम बढ़ाबए बला नहि, पूर्णतः हटाबए बला गप होइत अछि आब अपने सभ जाउ। एकर बिआह जल्दी करु, छीनरदेवी भागि जाएत।
(तीनू परानी माथा टेक कऽ प्रणाम करैत छथि आ आर्शीवाद लऽ कऽ प्रस्थान करैत छथि।)
पटाक्षेप
दृश्य चारिम क्रमशः
2.
राधा कान्त मंडल ‘रमण’
जन्म- 01 03 1978
पिता- श्री तुरन्त लाल मण्डल
गाम- धबौली, लौकही
भाया- निर्मली
जिला-मधुबनी
षिक्षा- स्नातक

मैथिली एकांकी

कने हमहूँ पढ़व

पात्र परिचय
1. धनिकलाल पंचाइतक मुखियाजी छथि।
2. चम्पत लाल मुंशी मुखियाजीकेँ
3. दुखना गरीव व्यक्ति
4. दुखनी ‘‘ ’’
5. अमर ‘‘ ’’
6. रीता ‘‘ ’’

प्रथम दृश्य

(दुखना दुखनी अपन घरमे जीवनकेँ पलक घड़ी दुखसँ वितबैत छलै जेकरा एक सांझक भोजनपर आफद छल। ई बात अपनामे विचार करैत दुखना आ दुखनीक प्रवेश होइत अछि। दुखनी आंगन घरक काज करैत छलि आ मने-मन विचारैत छल जे हे भगवान आइ हम आ हमर धिया पुता खाएत की तहि बीचमे दुखनाक प्रवेश)

दुखना- सुनै छहक ने?

दुखनी- अहाँ बाजू ने की भेल हेँ?

दुखना- आइ बच्चा सभ की खतौ घरमे किछो छौ कि नाइ, हम तू तँ भूख मेटा लेव आ बच्चा कोना रहतौ।

(अमरकेँ प्रवेश)
अमर- बाबू बाबू हमरा भूख लागल अछि माए भनस कहाँ करै छै?

दुखनी- (अमरकेँ कोरामे लैत भगवानकेँ तरफ देखि कऽ छनि) हे भगवान हम तँ नोर पी कऽ अपन जीवन बीता रहल छी आ ई बच्चा कोना जीयत? (दुखनी यएह बजैत सोचमे डूबि जाइत अछि।)

दोसर दृश्य

(मुखिया जी आ हुनक मुंशीकेँ संग बात चीत)

धनिक लाल- (मुंशीकेँ इशारा करैत) हे रौ हे रौ मुंशिया से कतेक दिन भऽ गेलौ बही खाताकेँ लेखा जोखा, बही खाता ठीक छौ की ने।

चम्पतलाल- (डराइत बाजल चम्पतलाल मुंशी बाजल) जी ......जी मुखिया जी, ठीके -ठाक छै।

धनिकलाल- हेरौ आय कालि तँ लेन-देनक कार-बार भऽ रहल छै किने।

दुखनाक प्रवेश

दुखना- (मुखिया जीक पएरपर गीर पडैत अछि।) मालिक भऽ....भगवान हमर......।

(परएपर सँ दुखनाकेँ उठबैत मुखियाजी)

मुखिया- रै दुखन बाज तोरा की भेलौ जे तू एतै व्यग्र छे।

दुखना- मुखिजी हमरा घरवालीकेँ बहुत जोर मन खराप भऽ गेलै से अपने लँग दोगल एलौंहेँ घरमे फूटल कौड़ीओ नै छै जे इलाज करबै लऽ जेबे हम अहा पास रुपैआ ले ऐलौं हेन।

मुखियाजी- बाज तोरा कतेक टाकाक जरुरी छौ?

दुखना- पा..... पाँच सौ रुपैआ।

मुखियाजी- (मुंशी तरफ इशारा करैत) हे रौ मुंशीया तिजोरीसँ पाँच सौ टाका दुखनकेँ दही आ सुन ओकरा सँ वापसीक एग्रीमेट करबाले बुझलेँ की नै।

मुंशी- (रुपैआ दैत) ले रौ दुखना ई टाका ले आ हमरा सादा वहीपर एग्रीमेट कर।

दुखन- (औठामे निशान लगबैत) ई मालिक कतए कऽ देव, आइ अहीं हमर भगवान छी।

(दुखनकेँ प्रस्थान)

मंुशी- दुखनसँ सुन अगर ई टाका तों समएपर नहि देबही तँ तोरा टाकाक व्याजक ब्याज लगतौ आ सब गिरबी रखऽ पड़तौ से सुनि ले।

मुखियाजी- कतेक दिनक बाद ई एकट मोकिर धरैलो हेँ।

मुंशीजी- मऽ ... मालिक वहीपर दुखनक नाम कतेक मारबै?

मुखियाजी- (तमसाइत बजलाह) रौ मुऽऽ........मुंशीया तोरा हमर छाली घी मठ्ठा खा कऽ बुद्धिये ने तँ मोटा गेलौ।

मुंशी- (कपैत बाजलाह) जी......जी हुजूर हम आब बुझि गेलौं, जे...... जे पाँच हजारमे जेतै न मुऽऽ....मुखिया जी।

मुखियाजी- (हँसैत) ई भेलौ ने एकटा मुंशीया बुद्धि ई तँ बुझि जे हमरा अन्नक असर।

तेसर दृश्य- क्रमशः
१.ऋषि वशिष्ठ-अन्हरजाली
२.उमेश मंडल-रोहनियाँ आम ३.
कपिलेश्वर राउत-तरकारी खेती
१.
ऋषि वशिष्ठ
अन्हरजाली

कोर्ट परिसर भीड़सँ खचाखच भरल छलै। सह-सह करैत भीड़मे कियो प्रसन्न मुद्रामे नहि छल! सबहक मुँह-कान सुखाएल-टटाएल। फूफड़ी पड़ैत ठोर जेना जाड़क पछबापर राँइ-बाँइ फाटि गेल हो। वकील सभ वकालत खानामे बैसल बात-विचार करैत छलाह। कियो अपन मोकिरकेँ बुझबैत तँ कियो आश्वस्त करैत छल। मोकिर सबहक मुहेँ देखलासँ ओ असंतुष्ट आ दुविधाक सिथतिमे बुझाइत छल। वकील मुदा ओकरा विश्वास देबाक लेल अनेक उदाहरण दैत छल। एकटा मोकिर हाथ जोड़ने वकील सँ विनती करैत छल- ‘‘ओकील साहेब, हमर घर-घरारी सब दखल कऽ लेने अछि। कहुना उजड़ल के बसाउ, ओकील साहेब।’’
वकील साहेब ओकर स्थितिकेँ सुनैत बजलाह- ‘‘फैसला तँ अहाँक पक्षमे भइये जाएत, खाली अहाँ डाँड़ मजगुत केने ठाढ़ टा रहियौ।..........एखुनका समएमे जेहन माल तेहन कमाल।’’
मोकिरक मलिन मुखड़ापर जेना कनेक प्रसन्ताक रेखा उभरलै। वकील साहेब अपनैतीक भावसँ पुछलनि- ‘‘अहाँ समंगर छी कीने यौ?........कहबी ठीके छलै जे दस टके नै नितराइ, दस समांगे नितराइ।’’
मोकिरक कपाड़पर जेना तीनटा रेखा उभरि गेलै। चिन्ताक रेघा।
वकील साहेब अपन बड़ाइक मुद्रामे बजलाह- ‘‘हमरा सभ लग नहि चलतै। अहाँकेँ किग्री दिया देब। उचित आकि अनुचित, हमरा सभ लग नहि चलै। जकरा चाहबै जीततै।..........मुदा, सहर जमीनपर कब्जा तँ अपनहि करए पड़त।’’
उदास भेल मोकिर बाजि उठल- ‘‘तखन तँ जेहने जिनते तेहने हारने। ओइ राक्षसक पालासँ जमीन छोड़ाएब हमरा बुते कहियो पार लागत? से जँ बुत्ता रहैत तँ न्यायालय किएक अबितौं।’’
वकील साहेबकेँ कोनो अशुभक अनुमान लगलनि। ओ मोकिरकेँ उत्साहित करैत बजलाह- ‘‘तैलय चिन्ता करबाक काज नहि छैक। सभ बेवस्था छै किने! पहिने हमरा केश तँ जीतऽ दिअ।’’
मोकिर जेना आरो गंभीर भऽ गेला। वकील साहेब रंग-बिरंगक आर व्यान सभ सुनबए लगलखिन- ‘‘एन्ना, फल्लाँ ठाँ मामिला छलै......... तँ एन्ना जीता देलियै!.......एसेटा पठेलियै कि बस्स......... सभ घर धऽ लेलकै! अपनहि जग्गह खाली कऽ देलकै।’’
मोकिर तैयौ जेना आश्वस्त नहि भऽ रहल छल।
हल्ला-गुल्ला सबहक बेचैनी जेना बढ़ले जाइत छलै। भीड़मे कियो स्थित भऽ ठाढ़ नहि छल। सभ अपसियाँत भेल। एम्हर-ओम्हर झटकरैत। एकटा अधवयसू खसैत-पड़ैत वकालतखान दिस दौड़ल आएल। कहाँ छथि ओकील साहेब?..... हमरा बचाउ ओकील साहेब! हमरासँ घोर पाप भऽ गेलए।’’
वकील साहेब सभ साकंच भऽ बैसलाह। सभ एहि मोकिरसँ गप्प करए चाहैत छलाह।
आखीर की बात छै? ओना ई मोकिर अछि बेस आर्त्त। अर्थात मोटगर असामी’’ तखन एकरासँ जे मांग करियौ भेटतै।....... मुदा ई लक्ष्मी ककरा कपारमे लिखल छथि से नहि जानि.........!’’ सभ वकील यएह सोचैत छलाह। एकटा सीनियर वकील जेना मोकिरकेँ झपटलनि- ‘‘की बात छै से तँ बाजू। तखन ने कोनो रास्ता निकालब हमसभ।’’
मोकिर मुँहसँ जेना अनायास बजा गेलै- ‘‘भोर-भोर टहलैत छलाह, सड़कक कातमे एकटा मुर्दा छलै। हम ठाढ़ भऽ ओकरा देखिते छलौं कि केम्हरोसँ पुलिस आएल।........ओ कहए लागल जे तोंही खून केलहीए?’’
सीनियर वकील गंभीर भऽ प्रश्न कएलनि- ‘‘पुलिस अहीकेँ खूनी कहैए?’’
- ‘‘हँ! मुदा.......?’’
- ‘‘मुदा तुंदा किछु नहि। पुलिस खूनी कहि देलक तँ अहाँ सरकारक घरमे खूनी घोषित भऽ गेलहुँ। .......आब जखन अहाँकेँ ई प्रायश्चित लागि गेल तँ एकरा कटेबाक प्रयास करु।’’
- ‘‘एहनो अनर्गल भेलैए?’’ - मोकिर आश्चर्यचकित भऽ प्रश्न कएलनि।
सीनियर वकील मोकिरकेँ बुझबैत बजलाह- ‘‘देखियौ, उचित-अनुचितक फेरिमे जाएब तँ बातक बतंगर भऽ जाएत। बुधियारी अहीमे अदि जे कहुना एहिसँ फारकत्ती पाउ।’’
मोकिर चिन्तित भऽ बाजल- ‘‘तँ हमरा कहुना उबारु!’’
सीनियर वकील कागजपर किछु लिखए लगलाह। देासर टपकैत बाजल- ‘‘ओना तँ ई खूनी केश छै, एहिमे सजाए फाफ होएब आ सोंस-घड़ियारलक मुँहसँ जीबैत निकलब एक्के बात भेलै।’’
सीनियर वकीलकेँ जेना केश छिनेबाक अनुमान लगलनि। अेा दोसर वकीलकेँ डपटैत बजलाह- ‘‘खूनी केश छै तँ कि भेलै। हम दस आना गारेंटी लेबै जीतबाक।’’
दोसर वकील टेबुल ठोकलक- ‘‘सीनियर भऽ कऽ दसे आना गारेंटी? हम तँ बारह आना गारेंटी लेबनि।’’
मोकिर दुविधामे ठाढ़ भेल दुनूक मुँह तकैत छल।
सीनियर वकील अपन बेइज्जतीक अनुभव केलनि ओ तमकेत बजलाह- ‘‘चलह, चलह! कीदन नै चलय तँ केराके भार! सीनियर भेलौं हम आ ठीका लेथिन ई! कहलके जे......मुहक खतियौन नहिये होइछै।’’
मोकिर गुम्मी लधने दुनूक उतरा चौरी देखैत रहल। सभ वकीलो किछु कहबाक लेल सगबगाइत छलाह मुदा सीनियर वकीलक तामस देखि चुप्प छलाह।
दोसर वकील गप्पकेँ आगाँ बढ़बैत बाजल- ‘‘हम मुँहसँ दाबी नहि करै छियै, जीता कऽ देखा दै छियै। आइ तक हम एहन एकोटा केश नहि हारलैंहेँ.......ई हमर रेकार्ड अछि।’’
मोकिर देासर वकील दिशि आकृष्ट भेल।
सीनियर वकील जेना दोसरकेँ चित्त करबाक प्रयास केलनि- ‘‘ई सरकारी केश भेलै आ सरकारी केश हम आइतक नहि हारलौंहेँ। हमरा आगाँ सरकारी वकीलक कहियो गजहा नहि ठहरै छै। ओ तँ हमरा देखिते नाङरि सुटकाकऽ बिल धऽ लैइए।’’
मोकिर किछु निर्णय लेबामे असमर्थ छल। सीनियर वकील अपनाकेँ निर्लोभ साबित करबाक प्रयार केलनि- ‘‘औ बाबू, हमरा अहाँक केश लड़बाक सेहन्ता नहि अछि अहींक नीक लए कहलौं। आब अहाँकेँ जे नीक बुझाए सएह करु....।’’
देासर वकील संकेतक भाषामे बाजल- ‘‘जाउ! कटाउ ग!’’
एतबा कहैत दोसर वकील ओतए सँ ससरि गेल।
मोकिर आ सीनियर वकीलमे खूब विचार-विमश्र भेलै। समए बितैत गेल। वकील साहेब मोकिरकेँ ब्यान देबाक अभ्यास करबैत रहलाह। किछुए दिन कचहरीक दौड़-बढ़हा केने मोकिर सेहो चरफर भेल गेल।
......आइ मोकिरकेँ न्यायाधीसक सोझाँ ब्यान देबाक छलै। सरकारी वकील भिन्ने मोंछ ऐंठैत छल आ सीनियर वकील भिन्ने। न्यायाधीश न्यायालयमे बैसि गेल छलाह। खूनी मामिला छलै तेँ लोकोक भीड़ जूटल छलै- ब्यान सुनबाक लेल। बाहर लोकसब कलबल-कलबल करैत छल आ भीतर मोकिर, सरकारी वकील। सीनियार वकील आ पेशकार जजक समक्ष अपन-अपन भाव भांगिमा बना रहल छल। जजक आदेशसँ कार्यवाही शुरुह भेल-

क्रमशः
२.
उमेश मंडल
रोहनियाँ आम

ओसारक ओछाइनपर सुतल सुगियाकेँ भोरहरबेमे निन्न टुटि गेल। निन्न टुटिते आंगन दिस तकलक। अमावश्याक बारह बजे रातिक अन्हार तँ नहि मुदा ओहिसँ कने साफ-फरिच्छ देखि तीनि बर्खक बेटा डोमनाक मँुह देखलक। मन कनए लगलै नीन टुटलापर की खाइले देबै..... साँझे सुति रहल तेँ ने, नै तँ रातियोमे कनैत।’’
दुनू हाथसँ दुनू आँखि मीड़ि ओछाइनसँ उठि, बाढ़नि लऽ आंगन बहारए लगल। एहि आशाक संग जे नहि बहारने लछमीक बास नहि होइत छनि।
मनमे उठलै, भोरसँ लऽ कऽ आध पहर राति धरि खटै छी तइयो दुनू साँझ चुल्हि नहि पजडै़त अछि। भुखल जिनगी जीवैसँ नीक बिनु दुख कटने मरि जाएब नीक। कोन लोभे जीवै छी। एत्तेटा दुनियाँमे हमर किछु नहि छी? जँ किछु नहि छी तँ रहब कतए? जँ रहौ चाहब तँ रहए के देत? विस्मित भऽ सोचैत टाटक खूँटामे बाढ़नि झाड़ि रस्ता दिशि देखए लगल।
ओछाइनपर पड़ल गुलेतीक मनमे नचैत जे ने एको धुर खेत अछि जइमे खेती करब आ ने गाममे काज लगैत अछि जे खटियो कऽ गुजर करब। सरकारो तेहन धौंछ अछि जे घरारीक लेल चारि डिसमिल कि दू डिसमिल देत से जोड़िनिहारे ने कियो छैक। तखन ककरो घरारियो कना हेतइ। सोगक तर गुलेतीक मन पिचाए लगलै। मुदा तरे-तर बुद्धि ससरि बहराए गेलै। बुद्धिकेँ बहराइतै आंगन दिस तकलक तँ मन पड़लै चान। जहि ठाम लोक पहुँच रहल अछि। मनमे खुशी एलै जे एहिठामसँ नीक बास ओइठीन हएत। केहन शीतल जगह, मड़कड़ीक इजोत सन इजोत। अशोभक गाछ तर बुढ़िया टौकरी कटैए। मुदा लगले मन कसाइन हुअए लगलै। जहि चान सन रुपक आ अंगूर सन फलक बेटीक पाछु कते कोठा-कोठी, खेत-पथार डूबि गेल तेकर तयात नहि।
अंगनाक मुहथरिये लगसँ सुगिया डोमन दिशि तकलक। मातृत्व जगलै। बाढ़िनिकेँ टाटक कातमे रखि बेटा लग आबि बैसलि। हवाक झोंक मनमे लगलै। अनायास मुँहसँ निकलए लगलै... नीन टुटतै कनिते उठत। साँझे सुति रहल तेँ ने, नइ तँ रातिमे सुतैयो नइ दइते। जेकरा दस मास पेटमे रखलौं तकर नोरो पोछै जोकर नइ छी। छातियो छुट्टिये गेले नइ तँ छतिये लगा लैतिऐक। तहि काल डोमन कनैत उठल। पुचकारि कऽ सुगिया कोरामे वैसाए कहलक-
‘‘धान रोपै जेबै।
तइमे धान फड़तै।
धान काटि अनवै।
तेकर चूड़ा कुटबै।
नीकहा थारीमे वौआकँे
आम-चूड़ा देवई।
वौआ हमर खेतै।
माइयक गीति सुनैत-सुनैत डोमन चुप भऽ बाजल- ‘‘हमहूँ धान रोपए जेबउ।’’
मुस्कुराइत सुगिया बाजलि- ‘‘ताबे बुलू-भाँगू। लगले हम अबै छी।’’
सुगियाकेँ मन पड़ल रहै रोहनिया आमक चोकर।
जेठक रोहणि नक्षत्र। वर्खा नहि भेने सुपक तँ नहि मुदा रौद-पक्कू रोहनिया पकै लगल। घरसँ थोड़वे हटिकेँ एकटा गाछी। आम नहि पकने बगवार नहि रहैत। आठ-दस दिनसँ चोकर सभ खसैत। जे सुगियाकेँ बुझल। तहूमे काल्हि एकटा पाकल सेहो भेटल रहै। ओहि आशासँ सुगिया गाछी गेलि। गाछक उपरमे कौआ सभ आँखि गुरेड़ि-गुरेड़ि पकलाहा आम तकैत रहए। कौआक लोल मारल दूटा आम खसल। दुनू आम नेने हँसैत सुगिया आंगन आबि बेटाकेँ दैत पुछलक-‘‘कोन आम छियै बौआ?’’
डोमन बाजल- ‘‘लोहनिया।’’
३.
कपिलेश्वर राउत
तरकारी खेती

गणेश्वर नाथ महादेव स्थानमे हाट लगैत छले। हाटपर लोकक करमान लागल छल। गणेश्वर नाथ महादेवक स्थापना गणेश झाकेँ पोता जे एस. पी भेल छला, बाबाकेँ नामपर महादेवक स्थापना कऽ एकटा भव्य मंदीरक निर्माण करौलनि। अगल-बगलमे दोसरो-तेसरो भगवानक मंदिर अछि। आगाँमे पोखरि सेहो अछि। पोखरिक रकबा विघा पाँचेकसँ उपरे अछि। वएह पोखरिक पुबरिया मोहारपर हाट लगैत अछि। एकटा प्राइमरी स्कूल सेहो उत्तरबरिया मोहारपर अछि। बरसातक समए मे रौद आ पानिसँ बचबाक लेल एकटा पैघ बनौल अछि। ऊपरमे सिमटीक चद्दरासँ झाँपल अछि।
ललन हाटपर कोबी बेचबाक लेल आएल अछि। हाटपर रंग-विरंगक समान सभ रहैत छै से रहै। करीब दस कट्ठामे हाट लगैत अछि। नून तेलसँ लऽ कऽ कपड़ा-लत्ता, सिनुर-टिकुलि, चन्द तरहक मसल्ला सभ, मास-माउस तककेँ बिकरी होइत अछि।
माघ मास बित रहल छल आ फागुनक चढ़ंत रहै। कोवी, भाँटा, सीम, टमाटर, सालगम, आलू, मुरै, फर माने अरुआ, पालक साग, बथुआ, सरसो, तोरी, कोवी, लौफा इत्यादि ओहि दिन खूब पहुँचल छल जे पएर रक्खेक जगह नै छल। कोवी भाव दस रुपैये पसेरीसँ लऽ कऽ बीस रुपैये पसेरी छल। कोवीबला सभ माथा हाथ देने छल। ओहिमे एक शिवलाल आ ललन सेहो। ललन शिवलालकेँ पुछलक- ‘‘कि हौ भाय, की हालत छै?’’
शिवलाल कहलक- ‘‘धू, सभ चौपट्ट भऽ गेल। दुइये कट्ठामे एहि बेर मगही कोबी केने छलौं बर मेहनत भेल रहए। दस किलो डी.ए.पी, पाँच किलो पोटास, एक किलो जिंक आ छौड़-गोबरकेँ देने रहिये। तखन कोवी रोपने छलौं। दू बेर पानि से देलिये। कोबियो नीक भेल। देखि कऽ मन बड़ खुश रहए। दू किलोसँ छ-छ किलो धरि एकहक गो छत्ता अछि। मुदा भाव देखिते छहक जे पुजिओ उपर हएत कि नाइ। सुने छी जे पंडित सभ एहिबेर लगल नहि बनौने अछि। किछु लगन छैहो से जेठ-अखाढ़मे।’’
ललन बाजल- ‘‘हमरो हालत तँ सएह अछि। तू तँ दुइये कट्टामे केने छह। हमर तँ पाँच कट्टामे कएल अछि। मुदा, किछु रुपैआ नैै भेल।’’
थोडे काल उदास रहल मुदा चौंकेत शिवलाल बाजल- ‘‘हे प्याजक विआक हालत ठीक अछि। दू कट्टामे प्याजक विआ पाड़ने छी अखन सोलह रुपैयेसँ लऽ कऽ पच्चीस रुपैये तक अछि। तहन दुनूकेँ मिला कऽ घाटा नै लागत। मुदा, जे चाहैत छलौं से नै भेल।’’
ललन बाजल- ‘‘हुअअ तोरा मिला-जुला कऽ पुजी बँचलह।’’ दुनूक बीच गप-सप्प होइते छल आकि तखने बगलमे बैसल रामरुप पुछलक- ‘‘ऐना किए मुँह लटका कऽ दुनू गोटे गप-सप्प करै छह। की बात छियै?’’
ललन उत्तर देलक- ‘‘ऐँह, कोबी भावकेँ बारेमे गप-सप्प करै छी।’’
रामरुप- ‘‘धू, एहिक लेल कियो चिन्ता करए खेती छिये हौ। एकटमे जेतै तँ एकटामे आओत हम तू खेती करैत छह जँ ओकरा छोड़ि देबहक तँ कि करब। कोनो कि बाहरक आमदनी छहजे ओहिसँ गुजर जेतह। 1987ईमे बाढ़ि एलै तँ सभटा दहा भसिया कऽ लऽ गेले। मुदा लोक सभ कहाँ कोनो खेती छोड़ि देलकै। एहिबेर पानक हाल देखहक ने ततेक ने पाला खसले जे इलाकाक पान सुड्डाह भऽ गेलै। तइयो पानबला सभ पानक खेती छोड़ि देलकै। कहाँ ककरो मुँह मलीन छै। हँ तहन एकटा बात छै जे खेती एक्के रंगक नै करक चाही। जेना तरकारीये उपजाबै छह तँ दू कट्ठामे कोबी, त दू कट्ठामे बैगन, कमसँ कम दस घूरमे मूरै, दस धूरमे टमाटर, किछु मे प्याजक बिया एहिना थोरेक-थोरेक आनो-आनो खेती करक चाही। लाटमे इहो सभ रहत ने तँ मुँह मलीन कहियो नै हेतह। केहेन बढ़ियाँ शिबलाल कहलक हेन जे प्याजक बियाक बिक्रीसँ नीक आमदनी भेल। तेँ तरीकासँ काज मेहनत करह।’’
ललनकेँ रामरुपक बात जँचलै। मने-मन बिचारलक जे आगुसँ सभ तरहक खेती करब।
जगदीश प्रसाद मंडल-दू टा कथा
जगदीश प्रसाद मंडल1947- गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.। कथा (गामक जिनगी-कथा संग्रह), नाटक(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यास(मौलाइल गाछकफूल, जीवन संघर्ष, जीवनमरण, उत्थान-पतन,जिनगीक जीत- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। मुदा सीलिंगसँ बचबाक लेल कम्युनिस्ट आन्दोलनमे गेनिहार लोक सभसँ भेँट भेने मोहभंग। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि।
प्रेमी

जगदीश प्रसाद मण्डल

फगुआक दिन। मुरगाक बाङ सुनितहि ओछाइन छोड़ि पक्षधर बाबा परिवारक सभकेँ उठबैत टोलक रास्ता धेने गौँआकेँ हकार दिअए विदा भेलाह। मनो गद्गद्। भीतरसँ खुशी समुद्रक लहरि जेकाँ उफनैत रहनि। गौँवाकेँ फगुआक भाँग पीवैक हकार दए दरबज्जाक ओसारपर बैसि गर अटबए लगलथि जे दस किलो चीनी, मसल्ला आ भाँगक पत्तीक ओरियान तँ कइये नेने छी। आब खाली बाजा-गाजा संग लोककेँ अवैक अछि। एते बात मनमे अवितहि उठि कऽ भाँगक पत्ती आ मसल्ला -मरीच, सोंफ, सनतोलाक खोंइचा, गुलाव फूलक पत्ती, काबुलि बदाम- लऽ आँगन जाए पुतोहूँकेँ कहलखिन- ‘‘कनियाँ, बुरहीकेँ पुआ-मलपुआक ओरियान करए दिअनु आ अहाँ भाँग पीसू। खूब अमैनियासँ पत्ती धुअब। तीनि सलिया पत्ती छी, जल्ला-तल्ला लगल अछि।’’ कहि ओसारपर सभ सामान सूपमे रखि दरबज्जा दिशि घुरि गेलाह। हँ-हूँ केने बिना गांधारी मसल्लाक पुड़िया निच्चाँमे रखि पत्तीकेँ सूपमे पसारि आँखि गड़ा-गड़ा जल्ला तकए लगलीह। मनमे उठलनि जे आइ बूढ़ा सनकि-तनकि तँ ने गेलाहेँ। एत्ते भाँग लऽ कऽ की करताह। मुदा किछु बजलीह नहि। आँखि उठा कऽ देखि विहुँसि नजरि निच्चाँ कऽ लेलनि। ओना मिथिलाक नारी आँखिमे गांधारी जेकाँ पट्टी बान्हि घरती सदृश्य सभ किछु सहैत ऐलीह। दरबज्जापर बैसि पक्षधर सोचए लगलाह- जिनगीक एकटा दुर्गम स्थान दुर्गा टपा देलनि। मने-मन दुनू हाथ जोड़ि हृदयसँ सटा गोड़ लगलनि। अपना विचारसँ सुकन्या जिनगीक प्रेमी चुनलक। कोना नहि आनन्दसँ जीवैक असिरवाद दितिऐक। जहि फुलवारीकेँ लगबैमे अस्सी सालक श्रम लागल अछि ओहि श्रमकेँ, जहिना छोट-छोट बेदरा-बुदरी टिकुली पकड़ि पुनः उड़ा दैत अछि तहिना हमहूँ उड़ा देव। कथमपि नहि।
रुपनगर हाइ स्कूलक बोर्ड परीक्षाक सेन्टर प्रेमनगरक हाइ स्कूल भेल। देहाती स्कूल रहितहुँ परीक्षार्थीकेँ डेराक कोनो चिन्ता मनमे नहि। सभक मनमे एते खुशी जे डेरापर धियाने ने जाइत। सभ निश्चििन्त जे गाम-घरमे अखनो विद्याकेँ देवी स्वरुप बुझि सभ मदति करए चाहैत छथि। जँ मधुबनी सेन्टर होइतै तहन ने डर होइतए जे मेहता लौजमे सभ सामान चोरिये भऽ जाएत, तेँ असुरक्षित अछि आ प्रोफेसर कोलनीक भड़े तते अछि जे ओतेमे तँ विद्यार्थी परीक्षाक सभ खर्च पुरा लेत। ओना प्रेमनगरक सइयोसँ उपर कुटुमैती रुपनगरमे अछि, तेँ किऐक ककरो मनमे रहैक चिन्ता हएत। तहूमे प्रेमनगर हाइ स्कूलक हेड मास्टर तेहन छथि जे स्कूलक समएमे स्कूलक काज करै छथि बाकी बारह बजे राति धरि विद्यार्थीक खोज-पुछाड़िमे लगल रहैत छथि जे ककरो कोनो तरहक असुविधा तँ ने भऽ रहल छैक। तहूमे तेहन दरबज्जा अनन्दी बाबाक छन्हि जे इलाकाक लोक अपन रहैक ठौर बुझैत अछि। घर्मशल्ले जेकाँ। धन्यवाद यशोदिया दादीकेँ दिअनि जे बुढ़ाढ़ियोमे अभ्यागत सबहक ऐँठ-काँठ बारह बजे राति धरि उठबितहि रहै छथि।
परीक्षासँ एकदिन पहिने लोचन सभ समान शुटकेशमे लए साइकिलसँ प्रेमनगर पहुँचल। लोचनक परिवारकेँ पक्षधरक परिवारसँ साठियो बर्ख उपरसँ दोस्ती अवैत रहनि। आजादीक हुड़-बड़ेड़ाक समए रहै। जहिना गामक धियापूता गुल्ली-डंटासँ क्रिकेटक मनोरंजन करैत तँ शहरक धिया-पूता जगहक अभावमे खेलक स्कूलमे नाओ लिखा मनोरंजन करैत अछि। तहिना पक्षधरो आ ज्ञानचन्दो आजादीक लड़ाइमे पढ़ाइ छोड़ि समाजक बीच आवि हुड़-बरेड़ामे शामिल भऽ गेला। समाजक काजमे हाथ बँटबए लगलाह। समाजमे ककरो ऐठाम बेटीक विआह होइत आ बरिआती अबैत तँ अपन बहीनि बुझि, बिनु कहनहुँ पाँच दिन निश्चित समए दिअए लगलखिन। तहिना आरो-आरो काज सभमे हाथ बँटबए लगलाह। मुदा अस्सी बर्खक उपरान्तो पक्षधर पक्षधरे आ ज्ञानचन्द ज्ञानचन्दे रहि गेलाह। कहियो कियो नेता नहि कहलकनि। हँ एत्ते जरुर भेलनि जे भाय-भैयारी भेने गाममे तते भौजाइ भऽ गेलनि जे बसन्त छोड़ि ग्रीष्मक रस्ते घेरि देलकनि। आब तँ सहजहि बुढ़ाढ़ीमे धियापूताक संग रंगो-रंग खेलै छथि आ जोगिड़ो गबै छथि। गाम स्वर्ग जेकाँ लागि रहलनि अछि। किऐक नहि मन लगतनि जहि गाममे कालीदास सन विद्वान, जे जही डारिपर बैसब ओहि डारिकेँ काटब, मुदा ने कुड़हरिक धमक लागत, ने डारि डोलत, ने दुनू हाथे कुड़हड़ि भाँजब तँ देह डोलत आ ने दुनू पाएरक वैलेंस गड़बड़ाएत। निश्चििन्तसँ जखन डारि खसए लगतै तखन ओहिपर बैसिले-बैसल धरतीपर चलि आएव, ऐहन विद्वान् सभसँ तँ गामे भरल अछि। एते दिन, अपराधीक कम संख्या रहने नजरि निच्चाँ रहैत छलैक मुदा आब ककरा कहबै अपनो घरवाली धमकी देती जे माए-बाप आ भाइ-भौजाइक पाछू लगल रहै छी आ अपना धिया-पूता लऽ किछु करबे ने करै छी। एहि जिनगीसँ जहर-माहूर खाए मरब नीक। हौ बाबू, हमरा ऐहन भ्रममे नहि दाए। एहि दुनियाँमे ने कियो अप्पन छी आ ने बिरान। सीता जेकाँ लक्ष्मणक रेखाक भीतर रहह। नहि तँ रावण औतह आ लऽ कऽ चलि जेतह। अपन-अपन पाएरपर ठाढ़ भऽ गंगोत्रीसँ निकलैत गंगाक पानि जेकाँ, जे साथीक संग उपर-निच्चाँ होइत प्रसांत महासागरमे मिलैत अछि तहिना समएक संग चलैत रहह।
देखले पक्षधर बाबाक घर-दुआर लोचनकेँ। ककरो पूछैक जरुरते किऐक होइतैक। साइकिल हड़हड़ौने दरबज्जापर पहुँच साइकिलसँ उतड़ि घरक देवालक पँजरामे साइकिल ठाढ़ कए दुनू हाथे बाबाक पाएर छूबि गोड़ लगलकनि। बाबाकेँ बुझले रहनि, कहलखिन- ‘‘भने अखने चलि ऐलह। सभ सामान सरिया सेन्टरपर जा कऽ देखि-सुनि अविहह।’’ कहि पोती सुकन्याकेँ सोर पाड़लखिन। मुदा लोचनो तँ अंगना-घर जाइते अबैत रहए। सुकन्याकेँ लोचन आंगनसँ बजा अनलक। भाए-बहीनि जेकाँ दुनूकेँ देखि पक्षधर सुकन्याक कहैक बात विसरि दुनू गोटेकेँ कहलखिन- ‘‘बाउ, आब तँ हम चलचलौ भेलियह। तोरे सबहक पार एहि दुनियाँमे ऐहलहेँ। दुनियाँमे जते मनुष्य अछि ओ अपना समएक जिम्मा लऽ जीबैत अछि। अखन तू सभ सुकुमार कोमल किसलय सदृश्य छह। मनुष्य बनि जिनगी जीविहह। हम दुनू संगी -पक्षधर आ ज्ञानचन्द- दू जातिक रहितहुँ संगे-संग जिनगी बितेलहुँ। जे समाजोक लोक बुझैत छथि। मुदा हुनको धन्यवाद दैत छिअनि जे संगीक महत्व अदौसँ बुझैत आएल छथि। जेकरे फल छी जाति-कुटुम्बसँ कनियो कम दोस्तीकेँ नहि बुझल जाइत अछि। संगे-संग जहलो कटलौं आ एक ओछाइनपर सुतबो करैत छी। मिथिलांचलक कोनो राजनीतिक वा सामाजिक संगठनक बात होइ, मुदा कि एहि संस्कृतिकेँ आँखिक सोझमे नष्ट होइत देखियैक।’’ मन पड़लनि गाड़ीक ओ दिन जहि दिन जहल जाइत काल दुनू गोटेकेँ पैखाना लागल। हाथमे हथकड़ी। ट्रेनक पैखाना-कोठरीमे पानि नहि। की कएल जाए? जेबीसँ रुमाल निकालि दू टुकड़ी फाड़ि दुनू गोटे शुद्ध भेलहुँ। आँखि ढबढ़बा गेलनि। भरल आँखिसँ पोतीकेँ कहलखिन- ‘‘बुच्ची, दरबज्जापर रहने बौआकेँ पढ़ि नहि हेतइ। एक तँ पढ़वह कि खाक। बहुत लीलसा छल जे परिवारमे इंजीनियर डॉक्टर देखियैक मुदा हमरा सन-सन परिवारक लेल सपना नहि तँ आरो की अछि। एक दिशि पनरह-बीस लाखक पढ़ाइ आ दोसर दुइयो हजार महिनाक आमदनीक परिवार नहि। मुदा अखन बच्चा छह, आशासँ जीवैक उत्साह मनमे जगबैक छह।’’
जहिना जनकजीक फुलवारीमे राम आ सीताक प्रथम मिलन भेलनि तहिना सुकन्या आ लोचनक बदलल रुपक बीच भेल। अखन धरि जे बच्चा खेलौना सदृश्य परिवारमे छल ओकरा कानमे एकाएक जिनगीक बात पड़लै। जिनगीक लेल प्रेम भरल संगीक जरुरत होइत अछि। जिनगीक बात सुनि दुनूक देह सिहरि गेलइ। सिहरैत देह देखि पक्षधर कहलखिन- ‘‘बुच्ची, लोचन तोहर पाहुन भेलखुन। अंगनेक ओसारक कोठरी दऽ दहुन। सभ देखभाल तोरे उपर। कोनो तरहक असुविधा पढ़ैमे नहि होइन।’’
पक्षधरक बात सुनि सुकन्या शुटकेस माथपर उठा लोचनक पाछू-पाछू विदा भेल। कोठरी खुजले रहै अँटकैक कतौ जरुरते नहि पड़लैक। एक जनिया चौकी, कपड़ाक लेल अलगनी, एकटा टेबुल आ एकटा कुरसी। कुरसीपर शुटकेश खोलि लोचन कपड़ा निकालि चौकीपर रखलक। चौकीपर रखितहि सुकन्या ओहि अलगनीपर रखलक जहिपर पहिनेसँ ओकर कपड़ा छलैक। साओनक झूला जेकाँ दुनूक कपड़ा झुलए लगल। किताब, काँपी, कलम निकालि टेबुलपर रखलक। एक्के कोर्सक किताव दुनूक। लोचन मैट्रिकक सेन-टप केंडीडेट आ सुकन्या मैट्रिकक विद्यार्थी। टेबुलक बगलमे लोचन लग ठाढ़ि भऽ सुकन्या किताव फुटा कऽ नहि राखि, सभकेँ जोड़ा लगा-लगा रखलक। दुनूक नजरि दुनू किताब-कापी-पेनक जोड़ापर अँटकि गेल। पहिनेसँ दोबर कितावक थाक भऽ गेल। अएना जेकाँ एक दोसरक हृदयमे अपन-अपन रुप देखए लगल। किताबक लिखावट प्रेसक होइत। तहूमे एक्के प्रेसक किताव। मुदा काँपी तँ अपन-अपन हाथक लिखल होइत। एक दोसराक काँपी उलटा-उलटा देखए लगल। देवनागरी लिखावट लोचनक सुन्दर मुदा अंग्रेजी लिखावट सुकन्याक सुन्दर। ऐना किअए भेल? एक्के हाथक लिखावट दब-तेज कोना भऽ गेल। मुदा उत्तर ककरो मनमे नहि अबैत। अनायास सुकन्याक मन नाँचल। एते काल भऽ गेल अखन धरि पानियो नहि अनलौं। धड़फड़ा कऽ कोठरीसँ निकलि छिपलीमे जलखै आ लोटामे पानि नेने आबि चौकीपर छिपली रखि हाथ शुद्ध करै लऽ लोटा बढ़ा, चौकीक गोड़थारी दिशि पलथा मारि बाबाक पाहुनकेँ खुआवए बैसि गेली। खेबाकाल पुरुख चुप रहैत, नोन-अनोनक प्रश्न किअए उठतै। समदर्शी मिथिला छियै कि ने?
एक बजेसँ लऽ कऽ चारि बजे धरि परीक्षाक कार्यक्रम रहैक। पहिल दिन लोचनो दुर्ग टपै लऽ जाएत तेँ सुकन्याक मन मृगा जेकाँ नचैत। भिनसरेसँ सुकन्या लोचनपर नजरि अटकौने....... समएपर अपन काज पुरबैक अछि। हमरा चलैत जँ शुभ काजमे बाधा होयत तँ भगवानक ऐठाम दोखी हएब। मास्टर साहेबक सिखौल बात सुकन्याकेँ मन पड़ल। काजक भार तँ लोचनक उपरमे छन्हि हम तँ हुनकर मदतिगार मात्र छिअनि। तेँ नीक हएत जे हुनकेसँ पूछि लिअनि। चंचल मनमे उठलै-पूजाक तैयारीमे सभ किछु फुलडालीमे सजबैत होएत बीचमे बाधा देब उचित नहि। हो न हो फूल-पत्तीक जगहे बदलि जाइन। अनायास मनमे उठल-हाय रे बा घड़ी तँ देखबे ने केलहुँ। अगर बारह बजि गेल हेतइ तँ खुअबैक दोखी के हएत? मन व्याकुल, अव्यवस्थित वस्त्र, केश छिड़िआएल, कर्मक भारसँ भादबक अन्हरिया जेकाँ अन्हार आँखिक आगू सुकन्याकेँ पसरि गेल। कतऽ जाउ ककरा पुछियै। गाछो-बिरीछ नहि अछि जे पुछि लैतियै। अस्त-व्यस्त अवस्थामे सुकन्या माए लग पहुँच बाजलि- ‘‘भानस भेलौ?’’
‘‘अखने। अखन तँ आठो नै बाजल हएत।
‘‘जलखै भेलौ?’’
‘‘बच्चा कहलक एक्के बेर खा कऽ सबेरे जाएब।’’
जहिना केचुआ छोड़ैत समए साँपकेँ होइत, भले ही नव जीवन किऐक ने प्राप्त करै मुदा दर्द तँ हेबे करैत छैक। मीरा जेकाँ सुकन्या राजस्थानक तँ नहि। मिथिलाक वाला। परिवार आ समाजक सुकन्या अदौसँ समर्पित। बम्बईक धुन (गीतक धुन) बहुत मधुर होइत अछि तँ समवेत स्वरमे माए-वहिनक चैतावर, बारहमासा आ समदाउनक तँ मधु सदृश्य अछि। जहिना मधुमाछी उड़ि-उड़ि कखनो आमक गाछपर चढ़ि सोझे अपन प्रेमी मंजर लग पहुँच जाइत तँ लगले माटिपर ओंघराएल चमेलीक रसकेँ आमक रसमे महा मिश्रणक घोल बनबैत, तहिना ने छी।
कोठरीसँ निकलितहि लोचनक आँखि सुकन्यापर पड़ल। हजारो रश्मि रुपी तीर दुनूक बीच टकराए लगल। मुदा दू रंग। जहिना लड़ाइक मैदानमे वीर असीम विसवासक संग मरै लऽ नहि बलिदान होइ लऽ बढ़ैत अछि, तहिना लोचनोक हृदयमे होइत। कलीक खिलैत फूल जेकाँ मुँह। मुदा सुकन्या मने-मन भगवानसँ आराधना करैत जे ‘‘कुरुक्षेत्रसँ लोचन हँसैत आबए।’’
उचंगल मन फेरि उचङि गेल। ओसारसँ निच्चाँ उतड़ितहि सुकन्याक हृदय लोचनकेँ पाछूसँ ठेलए लगल। जहिना बच्चा सभ माटिक पहीया, कड़चीक गाड़ी बना धनखेतीक माटि उघि-उघि अंगनाक ओलतीमे दऽ खुशी होइत जे हमर अंगना चिक्कन भऽ गेल, तहिना आगू-बढ़ैत लोचनकेँ देखि सुकन्याकेँ खुशी होएत। मुदा खुशी अंटकल नहि। लगले चारि बाजि गेल। मनमे उठलै भुखल भायकेँ जलखै कहाँ खुएलहुँ। जहिना किसानक खेत दहा गेलासँ व्यापारमे मंदी आबि गेलासँ, बेरोजगार भेलासँ कि भीख मंगोकेँ कियो भीख देनिहार नहि रहत तहिना जे धरती करोड़ो पतिव्रता नारी पैदा केलक वहए धरती पतिहत्यारा भऽ जहल कटबैत अछि।
साढ़े चारि बजे बेरि-बेरि देखलोपरान्त सुकन्याक नजरि मौकनी हाथीपर चढ़ल गणेश जी जेकाँ लोचनकेँ अबैत देखि लोटामे पानि-थारीमे जलखै परोसि आंगनक ओलतीमे ठाढ़ भऽ देखय लगल। अखन धरिक लोचनक साइयो मनोहर रुप मनमे नाचए लगलै। कोठरी आबि लोचन गरमाएल देहक कपड़ा बदलि जलखै करए लगल। विस्मित भेल सुकन्याक मुँह बाजि उठल- ‘‘केहन परीछा भेल भाय?’’
‘‘बहुत बढ़ियाँ। जरुर पास करब।’’
जरुर पास सुनि सुकन्याक हृदय हनुमानक राम जेकाँ देखलक। मनमे आशाक सिहकी उठलैक। संगिये तँ जिनगीक जीत दिअबैत अछि। अपन सुखद जिनगीक मनोहर रुप लोचनमे देखि सुकन्या मोहित होइत बाजलि- ‘‘औझुका पेपर तँ नीक भेल मुदा आन दिनक जँ अधला हुअए, तहन?’’
‘‘ओ ओहि दिनक मेहनतपर निर्भर अछि। ऐकर जबाव हँ-नहिमे नहि देल जा सकैत अछि।’’
सातम दिन परीक्षाक अंत भेल। स्कूलसँ आबि पक्षधरकेँ गोड़ लागि लोचन बाजल- ‘‘बाबा परीछा समाप्त भऽ गेल। गाम जाइ छी।’’
असिरवाद दइसँ पहिनहि बाबाक मनमे उठलनि, जहन एहिठाम काज सम्पन्न भऽ गेलैक तहन रोकब उचित नहि। सबेर-अबेर भेनहुँ अपन घर तँ पहुँच जाएत। बात बदलैत बाबा पुछलखिन- ‘‘केहन परीछा भेलह?’’
मुस्की दैत लोचन- ‘‘पास करब बाबा।’’
लोचनक मुस्की पक्षधरक हृदयकेँ, सलाइक काठी जेकाँ, आनन्दक कोठरीकेँ रगड़ि देलकनि। मन पड़लनि जनकपुरक धनुष यज्ञ। ठहाका मारि कहलखिन- ‘‘भाग्य ककरो लिखल नहि होइ छैक, बनाओल जाइ छै बौआ।’’
आंगनक ओलती लग ठाढ़ि सुकन्याक मन मृगा जेकाँ व्याकुल भऽ नचैत। जहिना अपने नाभिक सुगंधसँ मृगा नचैत तहिना सुकन्याक मन परीक्षाक समाचार सुनै लऽ नचैत। मुदा दरबज्जो तँ दोसराक नहिये छी, सोचि आगू बढ़ल।
दुनू गोटेकेँ माने सुकन्या आ लोचनकेँ देखि पक्षधर बाबा कहलखिन- ‘‘आइ तोँ विद्याध्ययनसँ गृहस्ताश्रममे प्रवेश कऽ रहल छह। तेँ बाबाक लगाओल फुलवारीक सुखल-मौलाएल डारिकेँ कमठौन कऽ खाद-पानिसँ सेवा करिहह। ओहिमे नव-नव कलश चलतै। जहिसँ हँसैत-खेलाइत जिनगी चलतह।’’
मूड़ी गोंतने लोचन आंगन आबि पानि पीबि किताव सरियवैक विचार केलक। कितावपर किताब गेटल देखि हाथ काँपए लगलै। सुकन्याक मन कानि उठल। जहिना कोनो धारक दुनू मोहारपर बैसल यात्रीकेँ होइत अछि तहिना सुकन्याक मनमे उठए लगल। लोचन सफलताक जिनगीमे पहुँच गेल आ हम? आशा-निराशाक क्षितिजपर लसकि गेल सुकन्या।
सीमाधरि लोचनकेँ अरिआतए सुकन्या विदा भेलि। गामक सीमा बिला गेल। ने लोचन सीमा देखैत जे घुमैक आग्रह करितैक आ ने सुकन्या देखैत जे अंतिम विदाइ दइतैक। अजीव गामोक सीमा अछि। एक्को परिवारकेँ गाम मानल जाइत अछि -जेना भोजमे- तहिना दसोगाम माला बनि गाम बनि जाइत (दस गम्मा जाति) अछि। अरिआतने-अरिआतने सुकन्या लोचनक घर धरि पहुँच गेली।
पनरह दिन बीतैत-बीतैत अनेको मौगिआही कचहरीमे फैसला लिखा गेल जे ‘सुकन्या पक्षधरक घरसँ निकलि अजाति भऽ गेलि।’ कचहरीक फैसला सुनि-सुनि दुनू गोटेक सुकन्याक माए-बापक करेज दड़कए लगलैक गेलइ। कनैत मन बाजए लगलैक, मनो ने अछि जे कहियासँ दुनू परिवारमे दोस्ती अछि। सभ तुर हमहूूँ जाइ छी आ ओहो सभ आबि रहैत छथि। मुदा आइ की देखि रहल छी। जाधरि पिता जीबैत छथि ता धरि एहि परिवारक हम सभ के होइ छी? समाजक लोकक जबाव ओ देथिन। पिताकेँ गामक लोकक बात कहलखिन। बेटा-पुतोहूक बात सुनि गरजि कऽ पक्षधर कहलखिन- ‘‘जइ समाजमे मनुक्खक खरीद-बिकरी गाए-महीसि, खेत-पथार जेकाँ होइए कि ओहि समाजकेँ पँच तत्वक बनल मनुष्य कहल जा सकैत अछि। जँ से नहि त हमर कियो मालिक नहि छी। कियो ओंगरी देखाओत त ओकर ओंगरी काटि लेबइ। आइये दोस्तक ऐठाम जाइ छी आ देखि-सुनि अबै छी।
जहन भाँग पानिमे अलगि गेल तहन पुतोहू बुझलनि जे भाँग पीसा गेल। पोछि-पाछि सिलौटकेँ धोय बाटीमे रखलनि। दरबज्जापर बैसल पक्षधरक मनमे उठलनि जे नअ बाजि गेल, अखन धरि किअए ने कियो आएल। फेरि मन उनटि कऽ भाँगपर गेलनि। भाँगपर नजरि पहुँचतहि मनमे उठलनि जे बिनु भाँग पीनहि तँ ने सभ निसा गेल अछि। तहन भाँगक जरुरते की? किछु दिन पहिने धरि सभ गाममे एकदिना फगुआ होइत छलै, मुदा आब तीन दिना भऽ गेल। ओना तीनि रंगक पतरो आबि गेल अछि। मुदा अपना गाममे तँ एकदिने अखनो धरि होइत आएल अछि आ जाधरि जीबि ताधरि होइत रहत।
कीर्तन मंडलीक संग-संग आनो-आन पक्षधर ऐठाम पहुँचलाह। अनगिनित थोपरी बजौनिहार आ अनगिनत गबैयाक समारोह। चीनीमे धोड़ल भाँग। सभसँ उमरदार रहितहुँ पक्षधर भाँग परसिनिहारकेँ कहलखिन- ‘‘पहिने नवतुरिया सभकेँ पिआबह। वहए सभ ने बेसी काल गेबो करतह आ नचवो करतह।’’ मुदा एक्कोटा नवतुरिया बाबाक बात नहि सुनलक। सबहक यएह कहब रहै जे बाबा सभसँ श्रेष्ठ गाममे छथि, अनुभवी सेहो छथि। तेँ जँ ओ गोबर खत्तेमे खसताह तइओ हम सभ नहि छोड़बनि। नवतुरियाक बात सुनि पक्षधरक मनमे उठलनि अखन आंगनमे कहाँ छी दरबज्जापर छी। दस गोटेक बीच छी। तहन के छोट के पैघ कोना हएत? सभ तँ ब्रह्मेक अंश छी। तहूमे एते टुकड़ी एकठाम एकत्रित छी। दू गिलास भाँग पीबि पक्षधर उठि कऽ ठाढ़ होइत फगुआ शुरु केलनि- ‘‘सदा आनन्द रहे एहि दुआरे, मोहन खेले होरी हो।’’ ढोलक, झालि, कठझालि, हरिमुनिया, मजीरा, खजुरी, डम्फा, गुमगुमाक संग सइयो जोड़ थोपड़ीक महामिश्रणक धुनक संग कोइली सन मधुर अवाजसँ लऽ कऽ टिटहीक टाँहि धरिक बोल अकासमे पसरि गेल। ओना जमीनो खाली नहि रहल। इंगलिश डान्ससँ लऽ कऽ जानी धरिक नाच आ मेल-फीमेलक जोगीड़ा जोर पकड़िनहि रहै। बजनियो सभ अपन-अपन बाजो बजबैत आ कुदि-कुदि नचबो करैत। गोसाँइ डूबै बेरि फेरि पक्षधर भाँग बनबौलनि। अपन शक्तिकेँ कमजोर होइत देखि दोबरा-दोबरा सभ पीलक। उत्साहो दोबरेलै। पुरनिमाक राति। हँसैत चान। फागुन मास रहने अकासमे कतौ बादल नहि। मुदा तरेगण मलिन भऽ अपन जान लऽ झखैत। किऐक नहि तरेगण अपना जान लऽ झखत? आखिर बसन्त-बसन्तीक समागमक दिन छी की ने।
गामक दछिनवरिया सीमापर समन जरए लगल। समनक धधड़ाकेँ पक्षधर उत्तरसँ दछिन मुँहे कुदलाह। बाबाकेँ देखितहि सभ एका-एकी कूदए लगल।
धधड़ा मिझा गेल। मुदा जरनाक आगि चकचक करितहि रहल। समदाउन गबैत सभ घरमुँहा भेलाह।
2.बपौती संप्पति

आसीन अन्हरिया चौठ। गोटि-पङरा खाऐन पीनि शुरु भऽ गेल। मातृनवमी-पितृपक्ष साझिये चलि रहल अछि। क्यो-क्यो बापो, दादा, परदादा नामसँ तँ कियो-कियो माइओ, दादी, परदादी इत्यादिक निमित्ते नति-नहि खुअबैत। जल-तर्पण सेहो परीबे दिनसँ शुरु भऽ गेल। मुदा इहो गोटि पङरे। किछु गोटे ठकिओने जे एकादशीकेँ जल-तपर्ण कऽ लेब। तहिना मातृपक्षक लेल नवमी आ पितृपक्षक लेल एकादशीकेँ न्योतहारी नति खुआ लेब। मुदा, गामक किछु जातिक बीच तेसरो तरहक होइत। ओ ई होति जे बेरा-बेरी सभ सौँसे टोलकेँ एक-एक दिन कऽ खुअबैत अछि। जेकरा ढढ़क कहैत अछि। किछु गोटे मातृपक्षक लेल महिलाकेँ आ पुरुष पक्षक लेल पुरुषकेँ न्योत दऽ सेहो खुअबैत अछि। पखक मातृपक्ष भिनौज भऽ गेल अछि। एकपक्ष मातृनवमी आ दोसर पितृपक्ष। जहिसँ नवमी मातृपक्षक हिस्सा आ एकादशी पितृपक्षक हिस्सा भऽ गेल दुनू टेंगारीकेँ घरसँ निकालि गुलटेन पच्चार दए सिलौटपर पिजबैक विचार केलक कि तमाकुल खाइक मन भेलै। चुनौटीसँ सकरी कट तमाकुल निकालि तरहत्थीपर डाँट बीछिते रहै कि पत्नी मुनिया आबि कहलक- ‘‘घरमे एक्को चुटकी नून नै अछि। भानसाक बेर भऽ गेल, कखैन आनब?’’
‘‘अच्छा होउ, जाबे अहाँ सजमनि बनाएब ताबे हम दौड़ले नून नेने अबै छी। टेंगारी नेने जाउ कोठीक गोरा तरमे रखि देबै। हाँइ-हाँइ तमाकुल चुबए लगल। ठोरमे तमाकुल लइतै, मरचूनक दुआरे, कोनादन लगलै कि थूकड़ि कऽ फेकैत दोकान दिशि विदा भेल। एक तँ तमाकुल मनकेँ हौड़ि देलक दोसर काज टेंगारी पीजेनाइ पछुआइत देखि आरो मन घोर भऽ गेलैक। मनमे उठलै पुरने कपड़ा जेकाँ परिवारो होइए। जहिना पुरना कपड़ाकेँ एकठाम फाटब सीने दोसर ठाम मसकि जाइत तहिना परिवारोक काजक अछि। एकटा पुराउ दोसर आबि जाएत। मुदा चिन्ता आगू मुँहेे नहि ससरि रुकि गेलै। चिन्ताकेँ अटकितहि मनमे खुशी एलै। अपनापर ग्लानि भेलइ जे जहि धरतीपर बसल परिवारमे जन्म लैक सिहन्ता देवियो-देवताकेँ होइत छन्हि ओकरा हम माया-जाल किअए बुझै छी। ई दुनियाँ केकरा लेल छैक? ककरो कहने दुनियाँ असत्य भऽ जाएत। ई दुनियाँ उपयोग करैक छी नहि कि उपभोग करैक।
गुलटेनकेँ देखि आमक गाछक छाँहमे बैसल भुखना कहलक- ‘‘तमाकुल खा लाए कक्का, तखन जइहह।’’
ठाढ़ भऽ गुलटेन भुखनाकेँ कहलक- ‘‘बौआ, अगुताइल छी, जल्दी दू धूस्सा दहक आ लाबह। बेसी काल नै अँटकब।’’
ऐँह कक्का, तोहूँ सदिखन अगुताएले रहै छह। तमाकुलो खाइक छुट्टी नै रहै छह।’’ कहि भुखना चून झाड़ि चुटकीसँ तमाकुल बढ़ौलक। मुँहमे तमाकुल दइते रसगर लगलै। सुआद पाबि बाजल- ‘‘बड़ टिपगर खैनी खुऔलेँ भुखन। ऐहन टिपगर माल कोन दोकानक छिऔ?’’
‘‘काका की कहबह; दिन आठम एकटा समस्तीपुरक बेपारी साइकिलपर एक बोझ तमाकुल लऽ बेचए आएल रहै। रातिमे अपने ऐठीन रहल। ऐँह काका भरि राति हिसाबे जगौनहि रहल। जेहने खिस्सकर तेहने महरैया रहए। खाइसँ पहिने महराइ गौलक आ खेला बाद एक्के टा तेहन खिस्सा, रजनी-सजनीक, उठौलक जे ओरेबे ने करै जखन डंडी-तराजू पछिम चलि गेल तखन हमहीं कहलियै जे आब छोड़ि दिऔ। बड़ राति भऽ गेल। तखन जा कऽ छोड़लक। भिनसर भने पोखरि-झाँखरि दिशिसँ आएल तँ चाह पीआ देलियै। दलानसँ साइकिल निकालि तमाकुल सरिअबए लगल। हमहूँ गिलास धोय चक्कापर रखि एलौं कि जेबीसँ दस टकही निकालि दिअए लगल कि कहलियै- ‘‘ई की दइ छी।’’ ओ कहलक हम बेपारी छी कोनो अभ्यागत नहि, तेँ खेनाइक पाइ दइ छी। आब तोंही कहह कक्का ओकरासँ पाइ लेब उचित होएत। कि हम सभ अपन बाप-दादाक बनौल प्रतिष्ठाकेँ भँसा देब? ई तँ बपौती सम्पति छी की ने एकरा कोना आँखिक सोझमे मेटाइत देखब।’’
थूक फेकि गुलटेन कहलक- ‘‘ऐहनो कियो बूड़िबक्की करै। पा भरि खेने हएत कि नै खेने हएत, तइ ले लोक अपन खानदानक नाक कटा लेत। नीक केलह जे पाइ नै छुलै।’’
अपन बड़प्पन देखि मुस्की दैत भुखना बाजल- ‘‘ऐँह कि कहिह काका, ओहो बड़ रगड़ी, कहए लगल जे से कोना हएत। हम कि कोनो भुखल-दुखल छी, आ कि व्यापारी छी। मुदा हमहूँ पाइ नै छुलिऐक तखन ओ दस-बारह टा पात निकालि कऽ दैत कहलक, जहिना अहाँक अन्न खेलौं तहिना हमहूँ तमाकुल खाइये लऽ दइ छी। सएह छी।’’
आगू बढ़ैत गुलटेन- ‘‘बौआ अखैन औगताइल छी। नूनक दुआरे तीमन अनोन रहि जाएत।’’
थोड़बे अटि कऽ घोघन साहुक दोकान। गुलटेनकेँ देखितहि झिंगुर काका कहलखिन- ‘‘अखन धरि माथमे केश लगले देखै छिअह।’’
माथ हसोथि कऽ देखैत गुलटेन बाजल- ‘‘अखन कटबै जोकर कहाँ भेल हेन। जखन कानपर केश लटकऽ लगत तखन ने कटाएव।’’
‘‘बिसरि गेलह। काल्हिये ने बावूक बरखी छिअह। हमरो चच्चा सहाएवकेँ छिअनि। दुनू गोटे एक्के दिन ने मरल रहथुन।’’
झिंगुर काकाक बात सुनि गुलटेनकेँ धक् दऽ मन पड़ल। बाजल- ‘‘हँ, ठीके कहलौं काका। आइ ज अहाँ भेंटि नै होइतौं तँ बरखी छुटिये जाइत।’’
‘‘अखनो किछु नहि भेल हेन। जा कऽ कटा आवह। हमर तँ तेहन झमटगर दियाद अछि जे भोरेसँ चारि गोटे लागल अछि मुदा अखनो धरि पार नहि लागल हेन।’’
‘‘अखन तँ हमहीं टा घरपर छी। दियादिक तँ सभ कियो अपन-अपन हाल-रोजगारमे चलि गेल। कियो झंझारपुर वेपारीक संग गछकटियामे तँ कियो सुखेतक चिमनीपर ईंटा बनवैए। अपने केश कटाएब, ओरियान बात करब आ कि ओकरा सभकेँ बजवै लऽ जाएब।’’
‘‘असली कर्ता तँ तोहीं ने छिअह। तोहर कटाएव जरुरी छह। हमरा सभमे तँ पाँच बर्षी धरि सभ दियाद-वाद केशो कटबैट अछि आ कमसँ कम एगारह गोटेकेँ खाइयो लऽ दैत अछि। तोरा सेहो एकटा आरो हेतह। खाएन-पीनि माने मातृनवमी-पितृपक्ष चलिते अछि। चाचाजीकेँ तीर्थेपर वर्षी पड़ि गेलनि, तेँ दोहरा कऽ खुअबैक झंझट नहि रहलनि। मुदा तूँ सभ ते एकादशीकेँ खुअबै छह तेँ तोरा दोहरा कऽ सेहो करै पड़तह। ओना ई सभ मन मानैक बात छी। मुदा, चलनियो तँ कोनो अपन महत्व रखैत अछि की ने।
झिंगुर काकाक बात सुनि दोकानदारकेँ गुलटेन कहलक- ‘‘हओ घोघन साहु, झब दे एक टका के नून दाए।’’
गमछामे नोन बान्हि गुलटेन लफड़ल घर दिशि चलल। मनमे पिता नाचए लगलनि। हृदय पसीज गेलनि। स्मरण भेलनि, अनका जेकाँ बाबू नहि छलाह। आगू-पाछुक बात जनैत छलाह। जँ से नहि जनितथि तँ किऐक ने अनके जेकाँ हमरो खेत-पथार कीनि देने रहितथि। कोनो कि कमाइ खटाइ नहि छलाह। जँ से नहि छलाह तँ कातिक मासमे ओते खरचा कऽ कऽ भागवत कोना करबै छलाह। तहिपर सँ भोजो-भनडारा करिते छलाह। हमरे ले कि कम केलनि। घर-गिरहस्तीक सभ लूरि सिखा देलनि। बारहो मासक काज। हम कि कोनो नोकरी करै छी जे सालो भरि कहियो बैसारी नहि होइत अछि। कमाइ छी खाइ छी ठाठसँ जिनगी बीतबै छी। जँ खेते रहैत आ खेतीक करैक लूरिये नहि रहैत तँ छुछे खेते लऽ कऽ की होइतै। गाममे देखबे करै छी खेतबला सभहक दशा। रौदी हुअअ कि दाही अछैते खेते हाट-बजारसँ मोटा उघैत छथि। हमरा तँ एक्को धुर घरारी छोड़ि नहि अछि। तेँ कि ककरोसँ अधला जीबै छी। अपन खुशहाल जिनगीपर नजरि अवितहि आनन्दसँ हृदय ओलड़ि गेलनि। मरहन्ना धान जेकाँ लटुआइल नहि अपन चढ़ल जुआनी जेकाँ खेतसँ आँड़िपर ओलड़ल। कोना लोक बजैत अछि जे जकरा अ आ नहि लिखल अबैत अछि ओ मुरुख अछि। बावू तँ औंठे-निशान दऽ मट्टियो तेल आ चिन्नयो कोटासँ अनैत छलाह। बड़का-बड़का सर्टियोफिकेटबला सभकेँ देखैत छिअनि जे दारु पीवि लेताह आ बीच सड़कपर ठाढ़ भऽ अंग्रेजीमे भाषण करैत लोकक रस्ता रोकने रहैत छथि। तहिसँ हजार गुना नीक ने बावू छलाह। खाइ बेरिमे अंगनामे नहि रहैत छलहुँ तँ शोर पाड़ि संगे खुअवैत छलाह। जहिया कहियो नीक-निकुत अनै छलाह आ थारीमे अन्दाजसँ वेसी बुझि पड़ैत छलनि तँ थारीसँ निकालि माएकेँ दैत छेलखिन नहि तँ ओते छोड़ि कऽ उठैत छलाह। आ हा-हा ऐहन बाप होएव कि अधला छी। जखन काज करऽ जाइत छलाह तँ संगे नेने जाय छलाह आ काजक लूरि सिखवै छलाह। जहन काजक लूरि भेल तहन ने बोइन करऽ लगलहुँ। केहन हुनकर सालो भरिक हिसाव छलनि। आसीन-कातिक गछपंगियाँ आ खढ़ कटिया हुनकेसँ सीखिलहुँ। तहिना अगहन-पूस धन कटिया, नार बन्हिया, दौन केनाइ, टाल लगौनाइ सीखने छी। किअए एक्को दिन बैसारी रहत। अखनुका छौँड़ा सभ जेकाँ नहि ने जे कहत काजे ने अछि। कि रस्तापर बालू उड़ाएव आकि पानि डेंगाएव। मुर्खो रहैत बावूए ने सिखौलनि जे फागुनसँ जेठ धरि घरहटक समए होइ छै। जेकरा घरहट करैक लूरि रहत वएह ने अपनो घर आ अनको घर बन्हैमे मदति कऽ सकैत अछि। जेकरा लूरिये ने रहतै ओकरा इन्दिरा आवासमे मुखिया, चिमनीबला, सिमटीबला नै ठकत तँ कि जेकरा अपन घर बनबैक लूरि रहत, ओकरा ठकत। अपनापर गुलटेनकेँ भरोष होइतहि मनमे खुशी उपकल। मुँहसँ हँसी निकलल। ओगरवाहीक गाछीक मचकीपर नजरि गेलै। कि हमरा सबहक दुनियाँ अछि। बड़क गाछपर सँ बड़्ड़् काटि बरहा बनबै छी। मूठबाँसीक बल्ला, पीढ़ियाँ आ कील बना गाछक डारिमे लटका झुलबो करै छी आ गेबो करैत छी। जे चौमासा, छहमासा, बारहमासा मचकीक स्टेटपर होइत अछि ओ बाजा-बूजी आ वैसि कऽ गबैमे कोना होएत? असकरे कृष्ण राधाक संग कदमक झूलापर चढ़ि नचबो करैत छलाह, बाँसुरियो बजवैत छलाह आ आसो लगबैत छलाह। मुदा, अखन तँ देखैत छी जे बाजा कियो बजवैत, नाच कियो करैत आ गीति कियो गवैत अछि। तेहने ने देखिनिहारो छथि। कियो कैसियोबलाकेँ देखैत तँ कियो ठेकैताकेँ, कियो नचनिहारक नाच देखैत तँ कियो ओकर कानक झुमकाकेँ। गौनिहारक आबाज सुनैत, नहि कि ओकर मुँह देखैत अछि।
नोनक मोटरी पत्नीकेँ दैत गुलटेन कहलक- ‘‘बाबूक बरखी काल्हिये छी। बिसरि गेल छलौं। केश कटौने अबै छी। ताबे अहाँ बरखी लऽ जे चाउर रखने छी ओकरा निकालि रौदमे पसारि दिऔ। राहड़ि सेहो उलबए पड़त। बेरु पहर तीमन-तरकारी आ मसल्ला हाटसँ लँ आनब। दूध तँ आइये पौरल जाइत। ओना अमहौरपर सौझुको दूध जनमि जाएत।’’
पतिक बात सुनि मुनिया बजलीह- ‘‘ऐहेन जे अहाँ बिसराह छी, सब काज चौबीसमा घड़ीमे सम्हरत। ने कुटुमकेँ नोत देलौं आ ने बेटी-जमाइकेँ खबरि देलिएनि।’’
‘‘अच्छा सभ हेतै। अनजान-सुनजान महाकल्याण। बाबू कोनो अधरमी रहथि जे कोनो बाधा हएत। उगलाहा सभ देखबो करै छथि आ पारो लगौताह।’’
कहि गुलटेन केश कटबए विदा भेल। केश कट करखीक जानकारी सबजना न्योत दऽ चोटे घुरि गेल।
काजमे गुलटेन जेहने होशगर माने लुरिगर तेहने बिसराह। जे सभ बुझैत। उजड़ल गाम कोनो बसत। दरिद्र गाम कोनो सुभ्यस्त बनत, एहि कलाक प्रदर्शन गुलटेनक काज देखबैत। अनाड़ीकेँ काजक लूरि सिखाएब, हनपटाह गाए-महीसि दुहब, डरबूकसँ डरबूक गाएकेँ बहाएब माने साँढ़ लग लऽ जा पाल खुआएब, घोरनोबला आ चुट्टियाहो गाछपर चढ़ि आम तोड़ब, झोंझगर बाँसमे पत्ता तोरव, सुरुंगवा शीशो पाङब, सुआगर घर छाड़ब, सक्कत खेत जोतब, पनिगर खेतमे धान रोपब, सांङिपर ढेंग उठाएव, दुखताहकेँ खाटपर उठा डॉक्टर ऐठाम लऽ जाएब, फड़काह बच्छाकेँ पटकि नाथव, हर लागएव इत्यादि काज समाजमे ककरो कऽ दैत। कोना नहि करैत? एकरे तँ अपन बपौती सम्पति बुझैत अछि।
वर्षी भोजक चर्चा जनिजातिक माध्यमसँ सगरे गाम पसरि गेल। अपन दायित्व बुझि एका-एकी मरदो आ स्त्रीगणो गुलटेन ऐठाम आबए लागल। जहिना अनका ऐठाम काज भेने गुलटेनो बिनु कहनहुँ पहुँच जाइत तहिना समाजोक लोक आवए लगलाह। रवियापर नजरि पड़ितहि गुलटेन कहलक- ‘‘रबी, तोरा ऐठाम तँ जाइये ले छलौं। भने आबिये गेलह। बहुत दिन जीबह।’’
रवि- ‘‘किअए भैया? अखने फोकचाहावाली काकी अंगनामे बजलीह; तब बुझलौं।’’
‘‘ठीके सुनलक। बिसरि गेल छलौं। दोकानपर झिंगुर काका मन पाड़ि देलनि। मुदा काज तँ कौल्हुका बदला परसू नै हएत।’’
‘‘हमरा बुते जे हेतह तइमे पाछू थोड़े हेबह।’’
‘‘चाउर-दालि तँ घरेमे अछि। तेल-मसल्ला, तरकारी हाटेपर सँ लऽ आनब मुदा पंचकेँ दुइओ कौर दही नै खुऐबनि से नीक हएत?’’
‘‘सौझका दूध अपनो रहत आ किसुनोसँ लऽ लेब। कत्ते दूध पौरबहक?’’
‘‘दू मन चाउर रान्हब। अधोमन तँ दही चाही।’’
‘‘अधा मन सँ हेतह?’’
‘‘अपना सभमे दहिये कते परसल जाइत अछि। गरीब लोक अन्ने बेसी खाइत अछि। दूध-दही आ कि फल-फलहरी जे खाइयो चाहत से आनत कतऽ सँ।’’
‘‘हँ, ई तँ ठीके कहलह। हम तँ कहबह जे तरकारियो किअए हाटपर सँ अनबह। अखन तँ सबहक चारपर सजमनि कदीमा आ बाड़ीमे भट्टा अछिये तइ ले पाइ किअए खर्च करवह। धड़फड़मे अदौरी बनौल नै हेतह। बैगन आ अदौरी नै बनेबह से केहन हएत?’’
‘‘मन होइए जे बर-बरीक ओरियान करी।’’
‘‘तों सनकि गेलह हेन। बड़-बड़ीक घाटि कते मेठनियाँ होइत अछि से नै बुझै छहक।’’
‘‘हँ, से तँ ठीके कहलक।’’
‘‘अखन जाइ छिअह। दहीसँ तू निचेन भऽ जाह। काल्हि दुपहरमे ने काज हेतह। आ कि पुजौनिहारो औथुन।’’
‘‘अपना सभमे कत्ते पुजौनिहारकेँ देखै छहक। जतिया आगू कोनो पतिया लगै छै।’’
भगिन पुतोहू दालि दड़ड़ै लऽ अबैत छलि। डेढ़ियापर अवितहि गुलटेनपर नजरि पड़ितहि मुँह बीजकबैत बाजलि- ‘‘बुढ़हा अपनो मरताह आ दोसरोकेँ जान मारथिन काल्हि-परसू ई सब काज नै होइतै। कहि दालिक मुजेला लऽ जाँत दिशि बढ़लि।
गोसांइ डुबिते भाय भजनाक संग सिंहेसरी पहुँचलि। अपना माथपर अपन पहिरएबला कपड़ा आ अल्लूक मोटरी आ भजनाक माथपर चाउर-दालिक। बिनु छँटले चाउर आ गोट्टे दलि। आंगन पहुँच सिंहेसरी कानल नहि। माए-बाप लग बेटीक कानव तँ सिनेहक होइत। मुदा सिंहेसरीक मन तखनेसँ लहकल जखने भजना बरखीक चर्चा केलक। मनमे उठै जे अपना खूँटापर लघैर महीसि अछि, बरखी सन काजमे जँ एक्को कराही दही नहि लऽ जाएब से केहन हएत? ओसारपर मोटरी रखि माएसँ झगड़ा शुरु करैत बाजलि- ‘‘ऐँ गे बुढ़िया, हमरा कोनो आए-उपाए नै यऽ जे, काल्हि बाबाक बरखी छिअनि आ आइ तू अबै ले कहलेँ?’’
तहि बीच गुलटेन सेहो हाटसँ आबि गेला। माथपर मोटरी रहबे करनि कि मुनिया बाजलि- ‘‘दाय, हमर कोन दोख अछि मासे-मास जे छाया करैत एलौं तेकर ठेकाने ने रहल। बापो तेहन विसराह छेथुन जे बिसरि गेलखुन। आइये बुझलौं।’’
माएक जबाव सुनि सिंहेसरीक तामस पिता दिस बढ़ए लगल। मुदा मुँह-झाड़ि बाजब उचित नहि बुझि माएकेँ अगुअबैत बाजलि- ‘‘जाबे बाबा जीवैत छलाह ताबे कत्ते मानै छलाह। आब जखन ओ नहि छथि तखन हुनकर किरिया-करम छोड़ि देबनि। एगारहो गोटेक तँ ओरियान कऽ कऽ अबितौं।’’
बेटी आ पत्नीक बात गुलटेन चुपचाप सुनैत। कखनो मनमे उठै जे गलती हमरे भेल। फेरि होइ जे कोनो काज करै काल ने उनटा-पुनटा भेने गल्ती होइत अछि। मुदा, हम तँ बिसरि गेल छलौं। सामंजस्य करैत गुलटेन बाजल- ‘‘पाहुन किअए ने ऐलखुन?’’
सिंहेसरी- ‘‘से तू नै बुझै छहक जे नोकरिया-चकरियाक घर छी जे ताला लगा देवै आ विदा भऽ जाएब। दुनू परानी लगल रहै छी तखन ते एक्को क्षणक छुट्टी नै होइए। ढेनुआर महीसिकेँ छोड़ि कऽ दुनू गोरे कना अबितौं।’’
बेटीक बात सुनि मुनिया बाजलि- ‘‘अइ घर ओइ घरमे कोन अन्तर अछि। तोरा लिये जेहने ई तेहने उ। अहूठीन ते दहीक ओरियान भइये रहल हेन। तइ ले तोरा किअए मनमे दुख होइ छौ। हम तोहर माए नइ छियौ। कोनो आइऐक छियै कि सभ दिनेक बिसराह छथुन। तइ ले तामस किअए होइ छह। मोटरी सभकेँ खोलि-खोलि चीज-बौस ओरिया कऽ राखह। पहिने पएर धोय गोसाँइकेँ गोड़ लगहुन।’’
पत्नी आ बेटीकेँ शान्ति होइत देखि गुलटेन मुस्की दैत बाजल- ‘‘गाममे जेकर काज हम केने छी ओ कि हम्मर नै करत। कते भारी काजे अछि।’’
घरक गोसाँइकेँ गोड़ लागि सिंहेसरी पिताकेँ गोड़ लगैले बढ़ल कि गुलटेनक आँखि सिमसिमा गेल। सिमसिमाएल मने पुछलक- ‘‘बुच्ची, कोनो चीजक दुख-तकलीफ ने ते होइ छह?’’
हँसैत सिंहेसरी कहलक- ‘‘बाबाक बात कान धेने छी। हाथ-पएर लड़बै छी सुखसँ दिन कटैए।’’
भोजमे खूब जस गुलटेनकेँ भेल। भरि-दिन ऐम्हर-दौड़ तँ ओम्हर-ताकमे दुनू परानीकेँ रहल। मुनियाक छाती केराक भालरि जेकाँ कपैत। बिना अन्ने-पानिक भरि दिन खटैत रहलीह। जेना भुख-पियास कतौ पड़ा गेलनि। मुदा भोजनक जस दुनू परानी गुलटेनकेँ, जहिना ऊसर खेतमे कुश लहलहाइत, तहिना लहलहा देलक। पिताकेँ सिंहेसरी कहलक- ‘‘सभ काज सम्पन्न भऽ गेल। आब अपनो सभ खा लाए।’’
खेला-पीला उपरान्त गुलटेनक मनमे, सिनेमाक रील जेकाँ, नाचए लगल- ठीके ने लोक कहैत छथि जे जेहन करत से तेहन पाओत। जहिना बाबूक मन शुद्ध छलनि तहिना ने क्रियो-कर्म हेतनि। आ-हा-हा ओंगरी पकड़ि-पकड़ि घर बन्हैक लूरि सिखौलनि। बारहो मासक काज जीवैक लेल सिखौलनि। मने-मन पिताकेँ गोड़ लगलक।

Suggested citation: बिपिन झा. “कृतारिषड्वर्गजयेनमानवीम्…। (सफलताक मूलसूत्र).” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 54, 2010-03-15. https://www.videha.co.in/research/2010/54/कृतारिषड्वर्गजयेनमानवीम्-।-सफलताक-मूलसूत्र.htm

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