विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

प्रतिवादक स्वर

डॉ. शेफालिका वर्मा · 2010-04-01 · अंक 55

प्रतिवादक स्वर

हँ हम खून केने छी हम सासु बनय नही चाहैत छी. हम माय बनय नही चाहैत छी. ..तैं हम ई खून केलों . तीन तीन टा खून हम नारी छी नारी ग्लानि भ रहल ऐछ हम नारी किएक भेलों ?नारी के किएक महान मानल गेल ? नारी प्रकृति के निकृष्टतम कृति छी तैं हम अपन नारी जीवन जीवा लेल नहि चाहलों. हम माय बनि जीवा लेल चाहैत छलों सासु बनि जीवा लेल नहि चाहैत छी जज साहेब ------सासु ससुर ननदी हम तीन तीन टा खून केलों . जज साहेब हम चाहितों ते भागि के जान बचा सकैत छलों अपन ..दहेजक कारन हिनकर सबहक बनाओल षडयंत्रक हमरा लग कोनो सबूत नहि ऐछ --कोनो पुतोह लग कोनो सबूत नहि रहैत ऐछ..कानून सबूत चाहैत छैक साँच हो व फूसी हो . हमर सासु ससुर हमरा मारवाक षड्यंत्र केलनि एकर सबूत मात्र हम छी अओर हमर भगवान् ...सबुतक आधार पर चलयवाला आन्हर कानून टका पर सबूत अनैत ऐछ.आ ओही किन्लाहा सबूत पर अहाँ न्याय करैत छी जज साहेब --हमरा प्रतिकार लेवाक छल समाजक ठेकेदार सब स . हमरा फांसी दिय जज साहेब फांसी-----
सौनसे कोर्ट स्तब्ध . सब वकील पाथरक मुरुत जनताक अपार भीढ़ के काठ मारि गेल छलैक . जज साहेब जेना हिमशिला सन श्वेत सर्द -लहास ---आंखि में अपन बेटाक ब्याहक मोल भाव नाचि गेल हो ...मुदिता हफैसी रहल छलीह . समस्त केशराशि कारी राति सन छिरिआयल छल . दुनू आंखि में घनघोर बरखा . दिनकरक ईजोत कृष्ण-पक्षक रंग ल लेलक. कारी कारी विषधर सांप सौनसे कोर्ट में कतेक काल धरि ससरैत रहल ......
मुदिता जीवनक मात्र बीस बसंत देखने छलीह आ ओ एहेन वीभत्स काज क बैस्तीह ई अकल्पनीय छल.आ मुदिता..?पलक बंद केने..बाबूजी बाबूजी .अहाँ कते छी अहांक बेटी अहांक नाम पर कलंक लगा देलक . हत्यारिन नहि मुदा अहांक आदर्शक रक्षा केलक . बाबूजी हम नारी जीवन नहि जीवी सक्लों . आ आंखि से जेना व्यतीत छलछला गेल.....
बेटा आब अहांक ब्याह भ रहल ऐछ . आब पतिक घर अहांक मान मर्यादा जीवन मरण सब किछ अछि .हम सब ते अहाँ लेल पाहून रहब पाहून..---मुदिताक पिता बेटीक माथ पर हाथ फेरैत बजलाह ----
मुदिताक मोने अपन ब्याहक प्रति विरोध भाव उठहल--जमीन जाल बेचि हमर ब्याह नहि करू बाबूजी / मुदिता बड भावुक छलीह सदिखन चिंतन में डूबल खाली अभावे टा ओकर पूंजी छल अभाव क्रांतिक कारन भ सकैत छै मुदा शर्त रही जायत छै विवेकक...पिताक गरीबी समाज में अभिशाप छल आदर्शवादी कीरानिक जीवने की छै --तेज जलधार में कम्पित जलकुम्भी सन. बी ए पास क मुदिता बैसल छलीह जता देखू ओत टका ..एतेक मूल्य वृद्धि वरक भ गेल छल जे वरक बाप के मृत्युक अतरिक्त कोनो बाट नहि देखा परैत छल ..मुदी रातुक भानस में की ऐछ
आटा लेल मदना के पठोने छी बाबूजी
ओह कतेक महगी आबी गेल छै ---नमहर साँस लैत शिविर बाबु बजलाह

बाबु जी एकटा बात ते अहाँ छोडिये देलों ........मुदिता अधर पर मैलछांह हंसी लय बजलीह ---ओही जमाना में बेटीक ब्याह ले लड़का मंगनी में भेटैत छल आब मोलभाव कर पढ़ैत छै--मुदिक गप सुनी शिविर बाबु चौंकी गेल छलाह ---बाबूजी एकटा बात पूछी ? लोग अपन बेटा के किएक बेचैत छैक कोना बेचैत छै..-----शिविर बाबुक आंखि में रेतकण झिलमिला गेल..बाबूजी माय कोना अपन बेटा के बेचैत ऐछ बेटाक दाम लग्वैत ऐछ ..अपन पेट में नाओ मास जीवन दान दैत ऐछ पालैत पोसैत ऐछ ओ माय कोना बेटा बेचवा लेल सहमत भ जायत ऐछ. बाबूजी सौरभ ते छोट ऐछ की ओकरा केओ दस हजार टका देत ते बेचि देवैक अहाँ ?
मुदु---भरि स्वर में बजलाह बताही भ गेल छी अहाँ अंट शंट बजने जा रहल छी की भ गेल अहांके ...........नहि बाबूजी हम किनल बर से ब्याह नहि करब
शिविर बाबु बेटीक पागल प्रलाप सुनी ओहिठाम से उठी गेल छलाह .....ओही राति ओ अपन माँ बबुजिक गप सुनने छलीह ------------मुदितक ब्याह ओहें घर में करब जे आदर्श हो ओ बड भावुक ऐछ विद्रोही प्रकृति के----आ बाप बेटीक गप सुनी माई दांत कासी लेने छलीह..एही बेटीक भविष्य की ऐछ ईश्वर ! माय आशंकित
सब दिन बेटा जकां पोसने छी आदर्श आ सिधांतक शिक्षा देने छी माथ पर गृहस्थिक भार पढ़तैक अपने शान्त भ जेतीह..
आतिश बाबुक बेटा सप्तक अहाँ के केहेन लागैत ऐछ .......बाबूजिक स्वर सुनी मुदी चोंकि गेलीह ---------आतिश बाबु छोट मोट रोजगार करैत छथि बेटा सेहो ओही रोजगार में लागल ऐछ...निक खैत पिबैत घर . सिधान्त्वादी लोक ....मुदा ओ बड टका माँगता मायक आशंका
टका....हँसैत शिविर बजलाह .....'दहेज़ विरोधी संघक ' अध्यक्ष छैथ. दहेज़ प्रथा हन्तेवा लेल जी जान से लागल छैथ ..
ओ तखन ते बड निक . अपनो विवाह एकटा गरीब घरक लड़की से केने रहैथ आतिश बाबु के के नहि जनित ऐछ .....
हँ से ते ठीके हमहूँ जनैतछी. ....मायक स्वर मुदिताक कान में जायत रहल..हुनकर ससुरक घर दुआरी जगह जमीन सब बिका गेल रहनि हँ दहेज़ नहि नेने छलाह एही में कोनो शंका नए.हँ सप्तक मायबापक परम आज्ञाकारी आ सुशिल ऐछ ..
मुदिताक आंखि में सप्तकक रूप नाच लागल आदर्श आ सिधांतक गप सुनी ओकर ह्रदय सप्तके लेल नहि सम्पूर्ण परिवार लेल पूजा पुष्प सन समर्पित होयत रहल ......
आ एक दिन पालकी पर बैसी कनिया बनि मुदिता अपन सासुर आबी गेलीह
.................खाली कनिए टा ? सर सामान दान दहेज़ ....आही रोऊ बा ....सासुक प्रथम स्वर सुनतही मुदिता घोघ तर से देख चाहली....माँ भौजी के गहनों नैहरक तेहन सन नै ऐछ .......मुदिताक अंग परिक्षण करैत छोटकी ननदी बाजी उठलीह ......बाबूजी हद्द क देलखिन माँ .......मुदिताक समस्त तन तिक्त गंध से आवेष्टित भ गेलैक ..सासुरक प्रथम स्वागत गान ! मोटा जकां कोन में बैसल मुदिता
माँ फ्रिज नहि टी वी नहि पलंग सोफा किछ ते नहि ..कतेक उछाह छल भैयाक ब्याह में ई सब आओत
सीपी एखन तोहर बाबूजी के पुछैत छी . दहेज़ विरोधिक सभापति छैथ समाज में की घर में ?अपने घर डाहि हम आइग नहि तापब... एकटा बेटा आ .....पुनः मुदिता डीसी तकैत आग्नेय सवारे बजलीह .....बैसल की टुकुर टुकुर तकैत छी हम भाढ़फोरही ताढ़फोर्ही नै बूझैत छी ..जाऊ भानस भात बनाबू काज धाज करू ..आ की माय एहो सब नै सिखेलक.....
अपरिचित घर अनचिन्हार परिवेश में मुदिता निस्सहाय जकां सप्तक के ताकि रहल छलीह मात्र चारि दिनक जकरा से परिचय छल. ओ ते माय बहिनिक उक्ति सुनी कखन घसकि गेलैक कियो नहि बुझलक . मुदिता चुपचाप भनसा घर दिसि चली गेली ........हे पटोर पहिरी भनसा में नहि जाओ आंखि से देखने छलिये पटोर .......सीपी एकटा नुआ असगनी पर से दय दहीक फेरी लेतैक............एकटा मैलछांह नुआ हाथ में नेने मुदिता कांपी रहल छलीह
छोलनी करछुलक मध्य ....साँझक कजरायल आंखि नोरा गेल आकास में त्रितियाक चान विधवाक टूटल चुढ़ी सन लटकल छल .....मुदिता सोचैत रहलीह .......कतेक सपना लोक देखैत ऐछ ..सपना कतेक विचित्र शब्द थ्हिक सपना आंखि खुलल आ टूटी गेल..नहि नहि सपना के पक्ढ़वाक चेष्टा नै करवाक चाही ...परछाही कतहु पकरहल जाय .........बाप रे एतेक देर से भंसा घर में की अपन देह डाहि रहल छी ----सासुक कर्कश स्वर ----माय बाप भिखमंगा जकां बेटी के सांठी देलक आ बेटीक मलार कतेक!...
एही परिवेश में दिनक पंछी उढ़ैत रहल विद्रोही मुदिताक सब स्वर शांत भ गेल. सब उत्ताप पर हिमपात भ गेल ...सप्तक राति के अवैत छल आ भिनसर होयताही निकलि जायत छल. मुदिताक मोन से ओकर सुखदुख से ओकरा कोनो मतलब नहि छल . ओ सरिपो माता पिता क आज्ञाकारी छल. आतिश बाबु बड पैघ समाज सुधारक छलाह हुनकर नाम प्रतिष्ठा छल दीया तर अन्हार.-----अहाँ शिविर बाबु से की कही विवाह थ्हिक केने छलों?कोनो सर सामान घर में नहि आयल .समाज सुधारवाक चक्कर में अपनाही घर में आगि लगा देलों.
हम कहने छलों सिपिक माय इशारा में कतेक बात कहने रही ....हम टका पैसा नहि लेब एकेटा बेटा ऐछ ओकर माय के कतेक सुख सेहनता छै ----------भाढ़ह में जाय अहांक कहब सीपीक माय अगुता गेलीह अहाँ टका नहि लेलों ते अहांके किछ नहि भेटल
अहाँ स्थिर राहु टका ते नाहीये भेल टीवी फ्रिज किछ ते नहि भेल...... आतिश बाबु सोच लगलाह
कहू ते एकेटा बेटा आब ते हमरा घर में कहियो ई सब नहि आयत .....मुदिताक सासु दुःख आ वेदना से कानय लगलीह.......स्थिर रहु हम उपाय सोचैत छी.
घरक एहेन वातावरण में मुदिता देरायल हिरनी जकां राति दिन चौन्कल रहैत छलीह डेरायल सन जंगली भेढ़िया सबहक मध्य एकटा मृग शावक माय बापक अल्हढ़ चंचल विद्रोहिणी मुदिता घरक कण कण में ओकरा षडयंत्रक आभास होइत छले. ..डेरायल चौन्कल भयभीत.........
ओही राति सप्तकक बाहीं पर सुतल मुदिताक आंखि में नीन नहि छल. राति दिन खुजल आंखि से ओ भयंकर सपना देखैत छलीह ......की भ जायत ऐछ अहांके नहि ते अपने सुतैत छी नहि ते हमरा सूत दैत छी. मुदिताक चोंकब से अर्धनिद्रा में पडल सप्तक खौन्झा उठैत छल. ..........नीन नहि अबैत ऐछ -जेना अपना आप से बजलीह
धन्य छी महाराज निन्न नहि अबैत ऐछ ते चुपचाप पडल रहु चोंकि चोंकि तिरिया चरित्त नहि देखाऊ . मुदी दिसि पीठ कय सप्तक बढ़बढ़हैत रहल--------मुदिता लहुलाहान भ गेलीह . तिरिया चरित्त? भावुक मोन कछोटी उठल तिरिया चरित्त केकरा कहैत छैक के बनोलक एही शब्द के ? पुरुष चरित्त केओ किएक नहि बजैत छैक सबटा वेद-पुराण रामायण गीता सब टा पुरुखक लिखल ऐछ तैं ई पक्षपात ! कतेक असहाय हम सब छी लंका से सीता के आनि राम अग्निपरीक्षा सीता क लेलानी मुदा एको बेर सीता प्रतिवाद नहि केलीहपत्नी से अलग रामो ते छलाह ओ किएक ने परीक्षा देलनि रामायण पुरुषक लिखल छल. ---------निस्तब्ध्ह राति कतो कोनो मर्मर नै मुदिता चुपचाप पडल एही आँखिक नोर बही ओही आंखी में जाय सागर बना रहल छल..सब देशक लोक कहने ऐछ frelty thy name is woman कियो स्त्री के चीन्ही नै सकल. स्वयं स्त्री माय बनि बेटा बेचैत ऐछ पुतोह बनि जरैत ऐछ आ बची जायत ऐछ ते सासु बनि जरावैत ऐछ. बेटा क माय बनि की भ जायत छै स्त्री के ?ई स्त्री स्वातंत्र्य नारी विमर्श ई सब हथिक दांत छी पहिने स्वयं स्त्री के बदल पडत अपन अधिकार अपन शक्ति के चिन्ह पडत.........असहाय मुदिता आक्रोश से भरल छलीह . नाना प्रकारक विचारधारा ओकर मानस मंथन क रहल छल. पतिक प्रेमिल स्वरों से वंचित कोनो माय बाप अपन बेटीक ई स्थितिक कल्पना क सकैत ऐछ कतेक बेटी अपन सासुर में एहिना राति बित्वैत हेती. एकटा माय दोसरक बेटी गंजन करैत ऐछ मुदा स्वयं ओकर बेटीक भविष्य ? ...नींद नहि छल ओकर आंखि में ...राति तितल भिजल नीरवता एहेन जे खिड़की से अवैत हवाक स्वरों वाचाल छल. मुदितक ह्रदय में एकटा आशंका ..एकटा संशायक मेघ जेना कोनो प्रलयंकर झंझा आबे वाला हो समस्त क्षितिज अंधकार से आच्छादित .......अचक्के किछ स्वर जेना ओकर कान में आब लागल...एकटाअनजान भय से ओकर छाती कांपे लागल .ओकर समस्त इन्द्रिय सजग सचेतन भ गेल ओ ओही शब्द सब के आत्मसात करवाक प्रयास कर लागल
...................हमहूँ एयैह सोचैत छी ..सासुक स्वर कान में पडल ..ओ आर सजग भ गेलीह ...शिविर बाबु ते सब सुख मनोरथ डाहि देलनि ..विनिश बाबुक बेटी से बात चलाबी...विनिश बाबु नगरपालिकाक चेयरमेन देब लेब ते खूब करताह मुदा हुनका बेटी के आंखि चमकैत रहैत छैक...दुनू टा आंखि झिप झिप करत ऐछ जेना कनखी मारैत होई... .......सीपीक माय बजली
निक आंखि वाली आन्लों ते की भेटल ....ई ते सांचे मुदा एही कनियाक की करब ई ते हल्ला गुल्ला मचाय सबटा प्रतिष्ठा माटी में मिला देत ........एकरो उपाय छैक
मुदिताक सर्वांग कांपी रहल छलैक सांस जोर जोर से चली रहल छल .स्वर अस्पष्ट भेल जा रहल छल. पारामार ऐछ हँ पारामार ते दोकाने में अपन पडल रहैत ऐछ.
लोक के की कहवैक..लोक के की..कही देवैक ..आत्महत्या क लेलीह..दोसर गोटे से फंसल छलीह आय पकड़ा गेलीह. ........वह.. ई ते उत्तम ..हम ततेक जोर से चिकरी बाजब जे सब केओ हमर कथन के साँच बुझी जायत मुदितक सासुक स्वर में ख़ुशी छल
दोसर गोटे से फंसल ...पारामार ..मरणोपरांत चरित्र पर दोषारोपण .... आवेश आ उत्तेजना से कांपी रहल छल मुदिता . आतिश बाबुक ऑफिस घर में तेबुलक दराज में रखल लोडेड रेवाल्वारक ध्यान आबी गेलैक -----माय्बापक आज्ञाकारी पुत्र एही सब से अनभिज्ञ निचिं सुतल छल -------एकटा आवेश एकटा उत्तेजना एकटा एकटा मूर्च्छना में मुदिता ऑफिस घर से रिवाल्वर निकलि यंत्रचलित जकां सासु ससुरक समक्ष ठाढ़ह भ गेलीह ............बहुत भेल बाबूजी अहाँ एहेन समाज सुधारक के प्रतिष्ठाक संग ज्जेनाई एही दुनिया से जेने निक छै आ एक गोली ससुरक छाती पर माय अहाँ माँ शब्द पर कलंक छी नारी रूप पर कलंक छी नारी भ नारी के प्रतिष्ठा नहि द सकैत छी.......दोसर गोली माय के छाती पर सीपी !..पैघ भ अंहु माय बनब सासु बनि पुतोहके पारामार खुआयब तैं ई अहांक लेल...
तिनु लहाश ताढ़फर्हा रहल छल सप्तक केराक भालेरी जकां कंपित कखन दरवज्जा पर आबी ठाढ़ह भ गेल छल.....नहि अहांके किछ नहि कहब अहाँ माता पिताक आज्ञाकारी छी अवश्य मुदा हमर सोहाग छी एही सोहागक कारन सीता अपन सासु ससुर महल दोमहला सब के त्यागी के रामक संग वन चली गेल छलीह .....बस अहाँ अपन कलंकक संग जीवु............
सत्यानंदपाठक
कथा-

Suggested citation: डॉ. शेफालिका वर्मा. “प्रतिवादक स्वर.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 55, 2010-04-01. https://www.videha.co.in/research/2010/55/प्रतिवादक-स्वर.htm

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