विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

अवतारवाद

जगदीश प्रसाद मंडल · 2010-05-15 · अंक 58

अवतारवाद मनुष्‍यमे हीनभावनाक जन्‍म दैत अछि‍। जँ से नहि‍ तँ देश आ धर्मपर संकट ऐलापर अवतारी ि‍कएक ने नि‍वारण करैत अछि‍। जखन वि‍धर्मी सोमनाथक मंदि‍र लुटि‍ लेलक तखन पुजेगरी सभ ि‍कएक मुँह तकैत रहि‍ गेल। ि‍कएक ने ईश्‍वरकेँ पुकारि‍ बचौलक।
ताधरि‍ मनुष्‍य उन्‍नति‍ नहि‍ कऽ सकैत अछि‍ जाधरि‍ ओ ई नहि‍ बुझत जे धरतीपर मनुष्‍य सभसँ बलशाली अछि‍। ईश्‍वर, देवी-देवता, अवतारक कल्‍पना मनुष्‍यक ओहि‍ अंधकार मस्‍ति‍ष्‍कमे जन्‍म लैत अछि‍ जहि‍मे ओ अपन दुर्बलताकेँ संयोगि‍ अवकाशक सांस लैत अछि‍।
वस्‍तुत: आत्‍मा जखन महात्‍माक रूपमे वि‍कसि‍त होइत तखन परमात्‍मा स्‍वयं बनि‍ जाइत अछि‍। काम-क्रोध, राग-द्वेष इत्‍यादि‍ दुर्गुणपर जखन मनुष्‍य वि‍जए पाबि‍ जाइत अछि‍ तखन अपने-आपमे ईश्‍वर, परमात्‍मा, दैव आ ब्रह्मक रूप देखए लगैत अछि‍।
श्रीमद्भागवत-
दरि‍द्रो यस्‍त्‍वसन्‍तुष्‍ट: कृपणो योऽ जि‍तेन्‍द्रि‍य:।
गुणेष्‍वसक्‍तधीरीशो गुणसंगे वि‍पर्यय: /११/१९/४४ जेकरा चि‍त्तमे असन्‍तोष अछि‍ वएह दरि‍द्र छी। जे ि‍जतेन्‍द्रि‍य नहि‍ अछि‍ वएह कृपण छी। समर्थ, स्‍वतंत्र आर ईश्‍वर वएह छथि‍ जि‍नकर चि‍त्त-वृत्ति‍ ि‍वषए-भोगमे आसक्‍त नहि‍ छन्‍हि‍। अहीक वि‍परीत जे वि‍षएमे आसक्‍त अछि‍ वएह सोलहन्‍नी पापी छी।
सरोज खिलाड़ी
सरोज खिलाडी
(नेपालके पहिल मैथिली रेडियो नाटक संचालक)
बोतल राम
( मैथिली एकल नाटक )

स्टेज एकटा सड्क अछि । जाहि सड्कपर कोनो व्यक्ति गरिबके संकेतमे कपडा पहिरने सुतल अछि । कनीका देरतक सुतलाके बाद भोर होबके संकेत भेटते ओ व्यक्ति उठैत अछि । उठलाके बाद अपना झोरा सँ एकटा दारुके बोतल निकाली कक कुल्ला आजा करैत अछि । कुल्ला– आजाके पश्चात अपना आगामे एकटा दारुके बोतल राखी कऽ अपना झोरा सँ दुऽटा अगरबती,फुल चानन निकाली कक पुजा–आजा करैत अछि । जाहि पुजामे आरती बन्दना नेपथ्य सँ शुरु होइत अछि ।

नेपथ्य सँ– हमरा अपन दारुए अमृत लगैय
कोरस– हमरा अपन दारुए अमृत लगैय नेपथ्य सँ– हमरा सगुने आ सन्तरा मैगडल लगैय
कोरस– हमरा सगुने आ सन्तरा मैगडल लगैय
नेपथ्य सँ– हमरा अपन दारुए अमृत लगैय
कोरस– हमरा अपन दारुए अमृत लगैय
नेपथ्य सँ–जुरैय दुधिया त नै चाहि भरजीन
कोरस– जुरैय दुधिया त नै चाहि भरजीन
नेपथ्य सँ– दोसर जका नै चाहि मैगडल जीन
कोरस– दोसर जका नै चाहि मैगडल जीन
नेपथ्य सँ– हमरा जीवनके रक्षा करवला
कोरस– हमरा जीवनके रक्षा करवला
नेपथ्य सँ– हमरा दुधिएके बोतल भगवान लगैय
कोरस– जय होकककककक
नेपथ्य सँ– हमरा अपन दारुए अमृत लगैय

आरतीकऽ पश्चात पूजा कएने दारुके बोतलके प्रसाद माइनकक ग्रहण करैत अछि । पिलेलाके बाद
व्यक्ति ः– (सिसी फेकैत) साले दइए घोटमे खतम भगेलै ।
नेपथ्य स“ ः– (हसैत) चालैन दुस्लक सुपके जकरा ७२ गो देद ।
व्यक्ति ः–(मुंह दुसिकक हसैत) बाप जन्ममे नै छे कहियो हस्ने,वै कुता हैस ले कि बाइजले, (डेराइत) वै तो के छे रे ?
नें. स.ः– (गंभिर स्वरमे) हम छि दारु महराज ।
व्यक्ति ः– ( सोचैत) दारु महराज,कोन देशके राजा ?
ने. स. – राजा नै रे मूर्ख । तोहर दुस्मन ।
व्यक्ति – हमर दुस्मन, हमर दुस्मन त केउ भइए नै सकैय ।
ने. स. – संसारमे एहन कोनो व्यक्ति नै थिक, जकर दुश्मन नै छै ।
व्यक्ति – मुद्दा हमर दुश्मन, असम्भव ।
ने.स. – हम छियौ नै ।
व्यक्तिः– (डेराइत) तो के छे ?
ने. स. – हम वाहँ छि जे तोरा सन–सनके खोजैत रहैछै ।
व्यक्ति – (भगैत) पु–पु–पु–पु– पुलिस–पुलिस–पुलिस ।
ने. स. –रुक, पुलिस नई, दारुऽऽ ।
व्यक्ति – (हसैत) दाऽऽ रु । तखन त ताें हमर दोस भेले दोस ।
ने. स.– (जोर स“) किन्हु नई । दोस्त रहितियौ त हमरा पिलाके बाद हमरा सिसीके गारि पैढकऽ नै फेकते ।

व्यक्ति – दु तोरीके, वोटबा टा के बातला ।
ने. स.– बात कहु छोट भेलैय । बिना इखके मनुष्य कि, बिना बिखके साप कि ?
व्यक्ति – वै, त तो हमरा पर पिताइएकऽ कथि क लेबे ?
ने.स. – कलेबौ नै कदेलीयौ ।
व्यक्ति – (सोचैत) कलेबौ नै कदेलीयौ, वै कुता कथि रे रु
ने.स. – भिखमंगा (हसैत) भिखमंगा, भिखमंगा ।
व्यक्ति – (कटहसी सँ) भिखमंगा वहु मे हमरा, तों पागल छे बुइझगेलिऔ नामलोली ।
ने.स. – सोच, कनीका गंभीर सँ सोच ।
व्यक्ति – हटा सोच फोच हमरा स बेशी काविल के छै ऐत रु
ने.स. – काबिल नै तो मुर्ख छे, माहामुर्ख ।
व्यक्ति– (गंभीर सँ दारु पिवैतं) हम मुर्ख नै थिक ।
ने.स. – मुर्खकऽ लक्षण त ताें अखनो देखा देल्ही जे कनीका टाके सोचऽ बलाबातमे ताें हमरा पिबक लगले, रे बुद्घिके मारल, हमरा पिला स“ हम ककरो समस्याके सामाधान नै कदेइ छियै ।
व्यक्ति– टेढबात नै बाज, जे कहके छौ सोझ स“ बाज । तोरा सन– सनके अखनो दुटाके देखबउ बुझलिही कि ? (छाती ठोकैत मुहेभरे खसैत)
ने.स.– (हसैत)देखतै हमरा सन सनके आ गीरलैय मुहेभरे ।
व्यक्ति – (गंभीर स“) गीरलियैय नै , डान्स कैलीयैय, बुझलही कि ?
ने.स.– डान्स कि करबे दैवके कपार, भिखमंगा कहीके ।
व्यŒिाm—(गंभिर भ क) हम भिखमंगा कोना क छि रु
ने.स.–कोना नै छे, रे रहवला घर–घरारी सब बिकादेलीयौ । तोहर खनदानके उकटा देलीयौ,प्रतिष्ठाके नास कदेलीयौ, छोट–छोट भाई सब स“ पिटबौलियौ तोरा हम सड्क पर आइन देलियौ (हसैत) सड्क छाप

नेपथ्य स“ गीत– आब हम जीनगीमेऽऽऽऽ
दारुके कहियो हाऽऽत नई लगायव–२
घर बिकागेल घरारी बिकागेल, समाजमे प्रतिष्ठा
सर कुटुम दोस्त महिम स“ खतमभेल घनिष्ठा
आब हम जीनगीमे दारुके कहियो ..............
नई लगायव –४

व्यक्ति – (गंभिर भ क) हम भिखमंगा, मुर्ख, चपाट छलीय मुद्दा आब नई ।
ठिक कहलेहं तों, तोरे कारण हमर घर–घरारीसव तहस नहस भगेल ।
तोरा सन– सन नुकाकक रहल समाजके बरबादीके आब हम चिन्ह लेलौ । तोरा नई पिबऽके लेल हमरा के नई समझौलक, सर–कुटुम, माय–बाप, भाई–बहिन, समाज सबके सब हमरा समझबैत–समझबैत थाइकगेल मुद्दा हम अपन युथरइ नई छोरलौ । तोहर बात स“ आइ हमर आखि खुइल गेल । किया,किया तो समाजमे रहैछे ? (चिच्याइत छाति ठोकिकक कनैत)
कतेकके विधवा आ कतेकके विलटुवा बनादेल्ही तों । मुद्दा आब नई । आई तोरा हम खोइजकऽ समाजे स“ हटादेबौ ।
ने.स.–(खुब हसैत) हम तोरा नई भेटबउ ।
व्यक्ति – हम तोरा खोजी क रहबौ ।
ने.स.– (व्यंग स“) हम तोरा नई भेटबउ ।
व्यक्ति – देखै छियौ ताें कोना नई भेटैछे ।
ने.स.– (व्यंग स“) बच्चा, हम तोरा नई नई भेटबउ ।

(व्यक्ति चारुदिस खोजैछथि, खोजलाके बाद अपन कमिज फारै छथि । वै व्यक्तिके पुरा देहमे रंग बिरंगके दारु बान्हल रहैछै । जनौहमे सेहो २ — ४टा दारु बान्हल रहैछै फेर त फटलका फुल पेन्ट से हो निकालैछथि । हुन्का जाङघ आ छाबामे से हो दारुके बोतलसब बान्हल रहैछै । ओ सबटा दारुके सिसीके वहिठाम फोरैछथि । तखन ने.स.खुब कानके चिच्यायके आ छटपटायके अवाज अबैछै । व्यक्ति सिसी फोरैत फ्रिज)

( समाप्त )
बेचन ठाकुर
“बेटीक अपमान” क संबंधमे अपन दू शब्‍द-
श्रीमान् अखन संसारक गति‍-वि‍धि‍मे दि‍नानुदि‍न आशातीत पि‍रवर्तन भऽ रहल अछि‍ जहि‍मे लोक अपन सभ्‍यता-संस्‍कृति‍ आओर कर्त्तव्‍य परायणताकेँ ि‍बसरि‍ सांसारि‍क सुखकेँ अपनाए रहल छथि‍। लोभ चरम सीमापर अछि‍। जबकि‍ दहेज देनाइ व लेनाइ कानूनी अपराध छी। एहि‍ अपराधकेँ अपराध नहि‍ बुझि‍ आमदनीक स्‍त्रोत लोक बुझैत छथि‍। वर पक्ष मोछ पि‍जबैत छथि‍ जे हमरा लाखक लाख दहेज भेटत। मुदा कनि‍यॉं पक्ष माथा होंसतैत छथि‍ जे हम लाखक दहेज कतएसँ आनब। एहि‍ संदर्भमे लोक बेटीसँ घृणा करैत छथि‍ आओर बेटीक अपमान करैत छथि‍ तथा बेटा लेल जान-प्राण लगौने रहैत छथि‍। अल्‍ट्रासाउण्‍ड उचि‍त इलाजक एकटा महत्‍वपूर्ण आवि‍ष्‍कार छी। सामान्‍यतया एकर प्रयोग गलत ढंगसँ कएल जाइत अछि‍। अल्‍ट्रासाउण्‍ड करा कऽ लोक बेटीकेँ नष्‍ट करबा लैत छथि‍ आ बेटाकेँ सुरक्षि‍त राखैत छथि‍ एहि‍ क्रममे बेटीक संख्‍या काफी घटि‍ रहल अछि‍ आओर बेटाक संख्‍या काफी बढ़ि‍ रहल एहि‍सँ संसारक संतुलन बि‍गरि‍ रहल अछि‍ आओर भवि‍ष्‍यमे काफी बि‍गरि‍ जाएत। संगहि‍ अल्‍ट्रासाउण्‍ड करौनि‍हारि‍केँ स्‍वास्‍थ्‍यपर प्रति‍कुल प्रभाव पड़ैत अछि‍ आ पड़त। अल्‍ट्रासाउण्‍डहि‍ नहि‍ कोनहु वि‍धि‍सँ गर्भ जॉंच आओर नाश केनाइ बड्ड पैघ पापीक काज छी स्‍वभावि‍क अहि‍तकर सि‍द्ध होएत।
प्रस्‍तुत नाटक “बेटीक अपमान” मे ई दर्शाएल गेल अछि‍ जे गर्भपात नहि‍ हाएवाक चाही आओर बेटा-बेटीमे समानता रहक चाही। बेटा-बेटीमे क्‍यो ककरोसँ कम नहि‍ अछि‍। दुनू एहि‍ संसारक आधार छी।
मनमौजी वा हुण्‍डपनी कएलासँ इज्‍जत नहि‍ बॉंचत। वि‍वेकी आदमी इज्‍जतहि‍ लेल हरान रहैत छथि‍। वि‍वेक वा इज्‍जत बजारू वस्‍तु नहि‍ थि‍कैक। ई अपन क्रि‍या-कलाप व सत्‍संगहि‍सँ अबैत अछि‍। इत्‍यादि‍ यएह सभ वि‍षए-वस्‍तु रखैक प्रयास कएलहुँ हेन।
अपन त्रुटिक लेल क्षमाप्रार्थी होएवामे हमरा कोनो दुख नहि‍। अपन त्रुटि‍मे सुधार हेतु अपने सभसँ उचि‍त मार्गदर्शनक आशा रखैत छी।
बेचन ठाकुर
बेटीक अपमान
पुरूष पात्र-
दीपक चौधरी- एकटा साधारण पढ़ल-लि‍खल ि‍कसान
मोहन चौधरी- दीपक चौधीरीक बड़का बेटा
सोहन चाधरी- मझि‍ला बेटा
गाेपाल चौधरी- छोटका बेटा
प्रदीप कुमार ठाकुर- एकटा वार्ड सदस्‍य (दीपकक)
बलवीर चौधरी- पंचायत शि‍क्षक
हरि‍श्‍चन्‍द्र चौधरी- पंचायत शि‍क्षक
हरि‍चन्‍द्र चौधरी- गरीब ि‍कसान
महेन्‍द्र पंडि‍त- दीपक चौधरीक लंगोटि‍या संगी
सुरेश कामत- दीपक चौधरीक मामा
सेानू- दीपक चौधरी- मामि‍औत भाए
गंगाराम चौधरी- बलवीर चौधरीक छोट भाए
चन्‍देश्‍वर चौधरी- बलवीर चौधरीक पैघ भाय
हरेराम सि‍ंह- बलवीर चौधरीक गामक एकटा वुजुर्ग
बौआ क्षा- एकटा अनपढ़ पुरहि‍त
झमालाल महतो- दीपक चौधरीक पड़ोसी
सुरेन्‍द्र चौधरी- हरि‍श्‍चन्‍द्र चौधरीक भाए
प्रेमनाथ मेहता- एकटा प्रसि‍द्ध डाक्‍टर
टुनटुन- बलवीर चौधरीक भातीज
रमन कुमार- हरि‍श्‍चन्‍द्र चौधरी पंचायतक मुखि‍या
स्‍त्री पात्र-
वीणा देवी- दीपक चौधरीक पत्‍नी
सुनीता देवी- बलवीर चौधरीक दोसर पत्‍नी
मंजू- बड़की बेटा
संजू- छोटकी बेटी
राधा देवी- हरि‍श्‍चन्‍द्र चौधरीक पत्‍नी
शालि‍नी- हरि‍श्‍चन्‍द्र चौधरीक बेटी
अंक पहि‍ल-
दृश्‍य पहि‍ल-
(दीपक चौधरी एकटा साधारण पढ़ल-लि‍खल किसान छथि‍। हि‍नक घरनी वीणा देवी छथि‍न्‍ह। मोहन चौधरी, सोहन चौधरी आ गोपाल चौधरी हि‍नक तीनि‍टा पुत्र छथि‍न्‍ह। दीपक चौधरी अपन दुआरि‍पर दुनू परानी बैसि‍ ि‍कछु गप-सप्‍प करैत छथि‍।)
दीपक- मोहन माए, एगो गप कहु।
वीणा- कहुने, एक्‍केटा ि‍कएक। जत्ते मोन तत्ते।
दीपक- एक गोट बेटीक इच्‍छा होइत अछि‍। बेटा तँ भगवान तीनि‍ गोट देलनि‍।
वीणा- आब इच्‍छे कएने की भेटत? ई इच्‍छा जे पहि‍ने होइताए तहन ने। पहि‍ने बेटे लऽ जान जाइत छल। मोहनो बेरमे अहॉं कहलहुँ जे अल्‍ट्रासाउण्‍ड कराए लि‍अ। जदी बेटी होएत तँ ओकरा हटा देब।
दीपक- से तँ हम ठीके कहने रही। समए महगीक अछि‍। बेटीमे अग्‍गहसँ बि‍ग्‍गह खरच अछि‍। आमदनी कोनो नहि‍।
वीणा- अहॉं तँ सभ दि‍न आमदनीए बुझलि‍ऐक की टक्‍के।
दीपक- मोहन माए, एकटा कहबी अछि‍- “टाका हि धर्म:, कटा हि‍ कर्म:, हे टाक‍ तू सर्वोपरि‍”
वीणा- धूर जाउ, अहॉं खाली फकरे सुनबैत रहैत छी सुनु मोहन बाउ, दुनि‍यॉंमे टक्‍केटा सभ कि‍छु नहि‍ अछि‍। ओकर सि‍ंगारो ने होएवाक चाही। बेटा- बेटीए ने एहि‍ दुनि‍यॉंका सि‍ंगार छी।
दीपक- लगैत अछि‍ जे अहॉं हमर गुरू रही।
वीणा- हँ-हँ, कहब नीक तँ लागत दि‍क। आब हम कहि‍ देब।
दीपक- हे हे चुप रहु, पोल नहि‍ खोलु एहि‍ भरल सभामे।
वीणा- नहि‍ यौ, हमरा आब बर्दास नहि‍ होएत। आब हम पोल खोलए देब।
दीपक- हे हे मोहन माए, अहॉं बड्ड नीक लोक थि‍कहुँ। हमरा बेज्‍जती जुनि‍ करू। हे हे पएर पकड़ै छी।
वीणा- अहॉं तँ तेना खेखनि‍यॉं करए लागलहुँ से कहि‍ नहि‍। खाइर आइ छोड़ि‍ दैत छी।
दीपक- हे मोएन माए, आब गप-सप्‍प छोड़ु। हमरा जेबाक अछि‍ जन ताकए लेल। देखै नहि‍ छि‍यैक जन सभकेँ कि‍केदारीए चाही हफकौरे चाही।
वीणा- बरनी आउ। हमरो भनसाक ओरीयान करबाक अछि‍।
दीपक- बेस तहन हम जाइत छी।
पस्‍थान
पटाक्षेप
दोसर दृश्‍य-
क्रमश:
१.बिपिन झा-बालमजदूर पर हमर लेखिनीक दृष्टि, २.बीरेन्‍द्र कुमार यादव-राजदेव मंडलक बाढ़ि‍क चि‍त्रपर

बिपिन झा
बालमजदूर पर हमर लेखिनीक दृष्टि
एहि अंक मे हमर लेखिनी क दृष्टि ओहि बाबू भैया पर अछि जे संवैधानिक आओर सामाजिक नियम के ताख पर राखि के बच्चा के नोकर राखब विशेष नीक बुझैत छथि । एहि मे ओ दूइटा लाभ देखैत छथि- पहिल कम खर्च मे टहलुआ भेटब आ दोसर एकरा रखनाई सहज होयब।
ई गप्प केवल गामे घरक नहिं अपितु नीक नीक शैक्षणिक संस्थान तक के अछि। हम एतय एकटा एहने उदाहरण प्रस्तुत कय रहल छी। एकटा एहेन बच्चा जेकर हार्दिक इच्छा पढवाक छलैक ओ अपन शिक्षा सँ कोशो दूर भारतवर्षक एकटा उच्च शिक्षण संस्था क ढाबा मे काज करय हेतु मजबूर छल। ओकर पढबाक इच्छा देखि हमर एकटा मित्र प्रारंभिक रूप सँ पढेनाई शुरू केलखीन्ह| बात ओ बच्चा मात्र के नहिं अछि एहि तरह असंख्य बच्चा अछि जे अपन बाल्यावस्था लोकक टहल टिकोरा मे बिता दैत अछि।
स्वतन्त्रता सँ पूर्व १८८१ केर कारखाना अधिनियम, संगहि १९११, १९२२, १९३४, १९४६ केर संशोधित अधिनियम बालमजदूरी के हतोत्साहित करैत रहल अछि। संगहि स्वातंत्रोत्तर भारत मे सेहो संवैधानिक दृष्टि सँऽ यद्यपि अनेकनेक नियम सं संरक्षण प्राप्त छैक ई बच्चा कें मुदा व्यबहार मे कतेक ई अनुपालित होइत अछि ई सर्वविदित अछि।
अस्तु, एहि लेखक माध्यम सँ मात्र एतेक अभिव्यक्ति बुझलजाय जे बालमजदूरी के यथासाध्य निवारित करबाक व्यावहारिक स्तर पर प्रयास हो । बालमजदूरी संवैधानिक दृष्टि मात्र सँ अनुचित नहि मानल जाय अपितु एकर सामाजिक बहिष्कार सेहो अपेक्षित। आशा अछि जे ई अभिव्यक्ति जनमानसक सुतल चेतना के जगेबाक यत्न मे सफल रहत आ एहि भारतवर्षक एक एक टा बच्चा "बालोऽहं जगदानन्द" दिस अर्थात ज्ञानपरम्परा कें श्रीवृद्धि करबाक दिशा मे कदम बढा सकत।
२.
बीरेन्‍द्र कुमार यादव
ग्राम- घोघड़रि‍या, पोस्‍ट- मनोहपट्टी, भाया- नि‍र्मली, जि‍ला सुपौल
राजदेव मंडलक बाढ़ि‍क चि‍त्रपर-
मैथि‍ली साहि‍त्‍यक उत्‍कृष्‍ट संकलन वि‍देह पद्द २००९-१० पढ़ि खूब खुशी भेल। अनेको रचनाकारक संग मैथि‍ली साहि‍त्‍य जगतमे आधुनि‍कतासँ ओत प्रोत कवि‍ राजदेव मंडलजीक रचना वर्ष २००९मे कोशीक वि‍भि‍षि‍का जे कुसहा त्रासदीक नामसँ जानल जाइत अछि‍। अपन देश धरि‍ नहि‍ कि‍न्‍तु समूचा वि‍श्‍वक लोकक रोइयॉं-रोइयॉं ठाढ़ कएलक, संचार साधनक वि‍भि‍न्‍न माध्‍यमसँ कोशीक मध्‍य बसनि‍हारक व्‍यथा-कथा जतेक भोगलहुँ-सुनलहुँ ओहि‍सँ बेसी मंडल जीक रचनामे कोशी बीच रहनि‍हारक दर्द मात्र छ: दृश्‍यमे दृष्‍टि‍गोचर भेल अछि‍।
मंडलजीक रचना रूचि‍कर लागल। एतेक दि‍न हि‍नकर रचना हि‍न्‍दी साहि‍त्‍यमे पढ़ैत छलहुँ, आब मैथि‍लीमे हि‍नक रचना मि‍थि‍लाक माटि‍-पाि‍न आ मि‍थि‍लामे रहनि‍हार लोकक लेल होमए लगल। एहि‍ लेल मंडलजी धन्‍यवादक पात्र छथि‍। आशा करब जे मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे ि‍हनक रचना बराबरि‍ आबए, हमरा सभकेँ पढ़बाक अवसर भेटए आ हमर मैथि‍ली साहि‍त्‍य समृद्ध हुअए।
प्रेमशंकर सिंह: ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा।मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८। २००९ ई.-श्री प्रेमशंकर सिंह, जोगियारा, दरभंगा यात्री-चेतना पुरस्कार।

Suggested citation: जगदीश प्रसाद मंडल. “अवतारवाद.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 58, 2010-05-15. https://www.videha.co.in/research/2010/58/अवतारवाद.htm

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