रचनाकर्मीपर प्रभाव
जीबन-मरन
उपन्यास
जगदीश प्रसाद मण्डल
(c) mithilesh kumar mandal
छह बजे भिनसुरका ड्यूटी रहने डॉक्टर देवनन्दन पाँचे बजे ओछाइन छोड़ि नित्यकर्मसँ निवृत भऽ कपड़ा पहीरितै रहथि आकि चाह नेने पत्नी आबि टेवुलपर रखि चोट्टे घुरि पिता-ससुरकेँ चाह देमए गेलीह। पिता लग चाह रखि बजलीह- “बावू, बाबू......।”
पिताक उत्तर नहि देखि नाकक साँसपर हाथ दऽ अन्दाजए लगलीह। साँस चलैत नहि देखि, मनमे उठलनि। पिता तँ अपनो मुइलाह मुदा, तीनि मास बीमारीसँ ग्रसित भऽ मरल रहथि। मुदा हिनका तँ किछु नहि भेलनि तखन किअए साँस नहि चलैत छन्हि। असमंजसमे पड़ि गेलीह। मनमे फुरलनि अपने नहि ने किछु जनैत छी मुदा, ओ -पति- तँ डॉक्टर छथि। दिन-राति तँ यएह रमा-कठोलामे लागल रहैत छथि, पुछि लिअनि। फेरि मनमे एलनि जे अखन शुभ-शुभकेँ ड्यूटी जाए रहल छथि कोना अशुभ बात कहबनि। फेरि मनमे एलनि जे ड्यूटी तँ क्षणिक छी मुदा, मृत्यु तँ स्थायी छी, तेँ एहि आगू ओकर तुलना करब बचपना हएत। पिता लगसँ झटकि कऽ पतिक कोठरी जाए धमकलीह। चाह पीवि डॉ. देवनन्दन कोठरीसँ निकलैक तैयारी करैत रहथि। धड़फड़ाएल पत्नीकेँ देखि पुछलखिन- “किछु मन पड़ल की?”
“नहि किछु मन नहि पड़ल।” शीला बजलीह।
“तखन?”
“बावू भरिसक मरि गेलाह। कतबो बाँहि पकड़ि झुलौलियनि मुदा, आँखि नहि तकलनि।”
पिताक मृत्युक बात सुनि देवनन्दन घवड़ेला नहि। पुछलखिन- “माए केतऽ छथि?”
“ओहो अपना कोठरीमे सुतले छथि। जहिना सभ दिन पहिने बाबूकेँ चाह दैत छलिएनि तहिना दइले गेलिएनि कि देखलिएनि।”
“चलू” कहि देवनन्दन आगू बढ़लथि। सासुकेँ उठबैले शीला दोसर कोठरी दिशि बढ़लीह। कोठरीमे पहुँचतै बजलीह- “माए!”
“माए” सुनि सुभद्रा फुड़फुड़ा कऽ उठलीह। तहि बीच शीला चाह अानए गेलीह। राखल लोटाक पानिसँ सुभद्रा कुड़ुड़ करए लगलीह। कुड़ुड़ कए चाह पीलनि। देवनन्दन पत्नीकेँ सोर पाड़लनि। शीलाकेँ पहुँचतै कहलखिन- “बावू मरि गेलाह।”
अपना कोठरीसँ सुभद्रो सुनलनि। मृत्यु सुनि दौड़िले पति लग पहुचलीह। मृत्यु पतिकेँ देखि घबड़ेली नहि। मन पड़लनि अपन जिनगी। जहिया दुनू गोटे एक बंधनमे बन्हि दुनियाँक लीला लेल संगी बनलहुँ। तेकरा साठि बर्ख भऽ गेल। ओहि बंधनसँ पूर्व ने हम किछु कहने रहिएनि आ ने ओ किछु कहने रहथि। कहियो भेंटे नहि भेल छल। तहिना बिना किछु कहनहि संग छोड़ि चलि गेलाह। मुदा तेँ कि साठि बर्खक, संग मिलि कएल काजो चलि जाएत। जहिना अबै दिन परिवार भरल-पुरल छल -सासु, ससुर छलाह तहिना तँ आइयो बेटा-पुतोहू अछिये। तहन सोग कथीक! मुस्की दैत बेटा दिशि तकलनि। तहि बीच फुदकैत आशा आबि माएकेँ पुछलक- “माए, बाबा मरि गेलखिन?”
आशाक बात सुनि सुभद्रा बजलीह- “बाबा गाम गेलखुन।”
पिताक मृत्यु देखि देवनन्दन सोचए लगलाह। पिताक अपन समाज छलनि। जहि बीच रहि जिनगी बितौलनि। मुदा हमर समाज तँ अलग भऽ गेल अछि। तेँ उचित हएत जे एहिठामक समाज छोड़ि हुनका अपना समाजमे पहुँचा दिअनि। मृत्युक कोनो कर्म एहिठाम नहि कऽ हुनके समाजक अनुकूल करब बढ़ियाँ हाएत। शीलाकेँ कहलखिन- “अहाँ तीनू गोटे एहिठाम रहू। गामेमे अगिला सभ काज हेतनि। हम जोगार करए जाइ छी।”
कोठरीसँ निकलि अगिला ओसारपर अबितै ड्राइवरकेँ ठाढ़ देखि कहलखिन- “अस्पताल नहि जाएब। पेट्रोल पम्पपरसँ तेल भरौने आबह। गाम चलैक अछि।”
बिना किछु बजनहि ड्राइवर गाड़ी लऽ निकलि गेल। कोठरीमे आबि दुनू बेटाकेँ जनतब देवए लेल मोवाइलमे नम्वर लगौलनि। दयानन्द जेठ धर्मानन्द छोट बेटा। दयानन्द फोर्थ इयरक विद्यार्थी आ धर्मानन्द फस्ट इयरक। दुनू एक्के मेडिकल कॉलेजक छात्र। दयानन्दकेँ कहलखिन- “बच्चा, बावू मरि गेलाह, तेँ दुनू भाँइ गाम आउ?”
बाबाक मृत्युक समाचार सुनि दयानन्द कहलखिन- “एहि लेल गाम किअए जाएब। आव तँ तेहेन बिजलीबला शवदाह बनि गेल अछि जे आसानीसँ काज सम्पन्न भऽ जाइत अछि।”
दयानन्दक विचार सुनि देवनन्दन कहलखिन- “बच्चा, सभ जीव-जंतुकेँ अपन-अपन जिनगी होइत अछि। जे जाहि जिनगीमे जीवैत अछि ओकरा लेल वएह जिनगी आनन्ददायक होइत अछि। जना देखैत छहक जे चीनीमे सेहो कीड़ा -पीलू- फड़ैत अछि, मिरचाइमे सेहो फड़ैत अछि, करैलामे सेहो फड़ैत अछि। तीनूक सुआद तीनि तरहक होइत अछि। एक मीठ, दोसर कड़ू आ तेसर तीत। चीनीक कीड़ाकेँ जँ मिरचाइ वा करैलामे देल जाए तँ स्वाभाविक अछि जे ओ मरत। मुदा कि मिरचाइक कीड़ा वा करैलाक कीड़ा चीनीमे जीवि सकत। कथमपि नहि। ओ किअए मरत? ओ तँ अधलासँ नीकमे गेल। तहिना बावू सेहो सभ दिन गाममे रहि जीवन-यापन केलनि। ई तँ संयोग नीक रहल जे तोहर माए सप्पत-किरिया दऽ बूढ़ी -माए- केँ हँ कहौलनि। जहिसँ दुनू गोटे मास दिन पहिने ऐलाह। सेहो ऐलाक तीनिये दिनक उत्तर गाम जाइले कच्छर काटए लगलाह। कते सप्पत दऽ-दऽ माए मास दिन घेरलखुन नहि तँ तेसरे दिन चलि जइतथि।”
पिताक बात सुनि दयानन्द पुछलखिन- “ई तँ बड़ आश्चर्यक बात कहै छी, बाबू?”
दयानन्दक जिज्ञासा देखि देवनन्दन कहलखिन- “कोनो आश्चर्य नहि। गामक दोसर नाम समाजो छिअए। जे शहर-बजारमे नहि अछि। समाजमे बंधन अछि जहि अनुकूल लोक चलैत अछि जकरा सामाजिक बंधन कहल जाइत छैक। एहि बंधनक भीतर धर्मक काज छिपल अछि जकरा सभ मिलि निमाहैत अछि। मुदा शहरमे से नहि छैक। कानून-कायदाक हिसावसँ चलैत अछि जहिमे दया-प्रेम नहि अछि। प्रतिदिन बूढ़ाकेँ दस गोटेक जिनगीक बात सुनब आ दस मिनट बजैक जे अभ्यास लगि गेल छन्हि से एहिठाम कोना हेतनि। सभ अपने पाछू बेहाल रहैत अछि। के केकर सुख-दुख, जीबन-मरन सुनत। भरि पेट नीक अन्ने-तीमन खुऔने लोकक मन असथिर थोड़े रहि सकैए। जाधरि आत्माक सन्तुष्ठि नहि हेतैक।”
पिताक बात सुनि दयानन्द हूँहकारी दैत कहलखिन- “कहुना-कहुना तँ तीनि दिन पहुँचैमे लागत, ताधरि की कहब?”
“अखनो गाममे ऐहन चलनि अछि जे शरीरसँ परान निकलितहि जरवैक ओरियान हुअए लगैत अछि। अर्थी रखैक चलनि नहि अछि। तोरा सभकेँ अबैसँ पहिने दाह-संस्कार कऽ लेब। काजो तँ लगले सम्पन्न नहिएे होइत अछि। कहुना-कहुना तँ पनरह दिन लगिए जेतह।”
“बड़बढ़िया। सौझुका गाड़ी पकड़ि दुनू भाँइ गाम आबि जाएब।”
मोबाइल ऑफ कऽ मने-मन देवनन्दन हिसाब मिलबए लगलाह। कमसँ कम पनरह दिनक काज अछि। उसारैयोमे किछु समए लगबै करत। मोटा-मोटी बीस दिन लगि जाएत। बीस दिनक आकस्मिक छुट्टीक दरखास्त लिखए लगलथि। दरखास्त लिखि टेवुलपर रखि पिताक कोठरी पहुँच पत्नीकेँ कहलखिन- “गाममे बीस दिन लागत। तहि हिसाबसँ सभ सामान ओरिया लिअ। काजक समए अछि तेँ नीक-जेकाँ तैयार भऽ चलैक अछि।”
कहि माए लग बैसि गेलाह। शीला उठि कऽ चीज-वस्त्र ओरिआवए चलि गेलीह। सुभद्राक चेहरामे सोग नहि सुख -सिनेह- उमड़ैत। विचारक समुद्रमे डुबल। मने-मन खुश होइत जे हुनका अछैत जँ हम पहिने मरितहुँ तँ मनमे लागल रहैत जे शेष दिन हुनकर केहेन बीतितनि। मुदा से भगवान सुनलनि। जहिना हाथ पकड़लनि तहिना पार-घाट लगा देलिएनि। हमरा आब की अछि तेहेन भरल-पुरल फुलवाड़ी लगा देने छथि जे कतौ हेराएल रहब। उमेरोक हिसाबसँ नीके भेल। चारि बर्खक जेठो छलाह। माएकेँ विचारमे डूबल देखि देवनन्दन पुछलकनि- “माए.......।”
मुस्की दैत सुभद्रा बजलीह- “बौआ, एक्को मिसिया दुख नहि भऽ रहल अछि। ई तँ सृष्टिक नियमे छिअए। तहि लेल दुख कथीक।”
ओम्हर शीला कपड़ो-लत्ता सरियवैत आ मने-मन मुस्कुरेवो करैत रहति। मनमे फुड़लनि अनका जे हौ हमरा तँ सात गंगा नहेला फल भेटल। जना अनका देखै छियै, अनका कि अपन पितिऔते भाएकेँ देखिलिएनि जे मरै बेरिमे कक्का कोना घिनबिथिन्ह। से तँ नहि भेल। जिनगीमे कियो ऐहेन ओंगरी तँ नहि देखाएत?”
तहि बीच ड्राइवर वाहरमे हार्न बजौलक। अवाज सुनितहि देवनन्दन माएकेँ कहलनि- “माए, लगले हम अबै छी।”
कहि कोठरीसँ दरखास्त लऽ ड्राइवरकेँ ऑफिस दऽ अबैले कहलखिन। पुनः घुरि कऽ पिताक गोरथारीमे वैसि तैयारीक प्रतिक्षा करए लगलथि। आँखि माएपर पड़लनि। एक्को पाइ मायक मुँह मलिन नहि, सोचए लगलथि। जहिना आंगनसँ घरक ओसारपर जेबा लेल बीचमे सीढ़ी बनल रहैत अछि तहिना तँ परिवारोमे अछि। मन पड़लनि बावाक सुनाओल माए-बापक विवाहक कथा। कोना नव परिवार बनि दुनू गोटे बाबा-दादीकेँ जिनगी पाड़ लगौलकनि। ओहने समए तँ आइ हमरो संगे आबि गेल। माएकेँ किअए मनमे कोनो तरहक अभाव अओतैक। एते दिन पिताक आशापर जीलनि आब हमरा दुनू परानीपर आबि गेलीह। जहिना पत्नीक सहयोग पतिकेँ आ पतिक आशा पत्नीकेँ बनल रहैत अछि तहिना तँ पतिक परोछ भेने बेटाक भऽ जाइत अछि। फेरि मन पड़लनि गामक स्कूलमे अपन नाओ लिखाएब। नीक मनुष्य बनैक लेल पिता चारि वर्खक अवस्थामे कन्हापर उठा भगवान रामक खिस्सा सुनवैत नाओ लिखा देलनि। ज्ञानक प्रति एत्ते प्रेम कोना कम पढ़ल-लिखल आदमीमे आएल? कोना सभ माए-बापक हृदयमे सरस्वती वैसल रहैत छथिन? भलेहीं सामाजिक कुव्यवस्था आ सत्ताक लापरवाहीसँ नहि भऽ पवैत अछि। जिनगीक मजबूरी अन्हारक काल कोठरीमे धकेल दैत अछि। मुदा हमरा से नहि भेल। गामक स्कूलमे लोअर -तीसरा- धरि पढ़लहुँ। लोअर पास करितहि मिड्ल स्कूलमे नाओ लिखवैक लेल रुपैआ देलनि। चारि वर्खक उपरान्त मिड्ल स्कूलसँ निकललहुँ। फेरि हाइ स्कूलक खर्च देलनि चारि वर्खक उपरान्त हाइ स्कूलसँ निकललहुँ। संयोगो नीक रहल आर.के. कॉलेज मधुबनीमे साइंसक पढ़ाइ शुरु भेल। जहिना उत्साह कओलेजमे नाओ लिखौने अपना रहए तहिना नव-नव शिक्षक बनने प्रोफेसरो सभकेँ रहनि। ओना ता धरि शिक्षो विभागमे चोर-दरवाजा खुजि गेलैक। मुदा अखुनका जेकाँ बड़की गाड़ी पास होइ जोकर नहि छोट-छीन एकपेरिया। बहुत नीक विद्यार्थी तँ हमहूँ नहिये छलहुँ मुदा, बहुत भुसकौलो नहि छलहुँ। जँ भुसकौल रहितहुँ तँ पास कोना करितहुँ। कहियो फेल नहि भेलहुँ। डॉक्टर बनैक विचार तँ मनमे आएलो नहि छल। विचार छल बी.एस.सी. केलाक उपरान्त हाइ-स्कूलक शिक्षक बनैक। चिकित्सा जगतमे विरड़ो उठल। दरभंगामे अस्पताल खुजल आ डॉक्टरीक पढाइयो शुरु भेल। आइ.एस.सी. पास केलहा संगी सभ मेडिकल कओलेजमे नाओ लिखवैक विचार हमरो देलक। पिताकेँ कहलिएनि। पढ़वैक इच्छा पहिनहिसँ रहनि। नाओ लिखवैक विचार दऽ देलनि। अगुआइल परिवार -अधिक खेतबला। कारखाना तँ अपना इलाकामे अछि नहि गोटि पंगरा स्थानीय व्यापारी आ बेसी माड़वारीक व्यापार चलैत- पढ़ि-लिखि नोकरी करैक पक्षमे नहि रहथि। गरीब परिवारक बच्चा, अभावमे पढ़ि नहि पबैत रहए। जे लाभ हमरो भेटल। मुदा आब बुझै छी जे डॉक्टर बनि गाम छोड़ब, परिवार-समाजकेँ छोड़ब भेल। जखन हम डॉक्टर बनलहुँ, रोगक इलाज करब काज भेल, तखन कि गाममे रोग आ रोगी नहि अछि। जहिना आकाश आओर पृथ्वीक बीचक सीमा होइत, जहिठाम पहुँच चिड़ै-चुनमुनी लसैक जाइत, तहिना देवनन्दनक वुद्धि लसकि गेलनि। ने आगूक बाट देखति आ ने पाछु हटल होनि। मन घोर-घोर होइत रहनि। माए दिशि, मुड़ी उठा तकलनि। मायक पँजरामे बैसल आशाकेँ अपन धुनिमे मग्न देखलनि। आशापरसँ नजरि ससरि दुनू बेटापर पड़लनि। डॉक्टरी पढ़ैत बेटापर नजरि पड़ितै अगिला पीढ़ी दिशि नजरि दौड़लनि। जहिना हम माए-बावूक सेवाक फल डॉक्टर छी तहिना तँ ओहो दुनू भाँइ हमर हएत। मुदा जे सुख-सुविधा पाबि हम दुनू गोटेसँ अलग भऽ जीवन-यापन कए रहल छी तहिना तँ ओहो दुनू भाँइ हमरासँ अलग भऽ जीवन-यापन करत। मुदा शरीरक गति जे गति -बालपन, युवापन आ वद्धापन- अछि ओ तँ सभक लेल अछि। बालपन आ वृद्धापनमे एक-दोसरक जरुरत सभकेँ होइत अछि। जेकरा अपन बुझि सभ सेवा करैत अछि ओ हजारो कोस दूर रहैत अछि। तखन सेवा कोना होएतैक? अगर जँ दुनियाँ भरिकेँ अपन बुझि सेवा करी तँ एतेक खून-खच्चर, छीना-झपटी, चोरी-छिनरपन, लूट-खसोट किऐक होइत अछि? विचित्र स्थितिमे देवनन्दन ओझरा गेलाह। मनमे एलनि हम डॉक्टर छी। हमरा सन-सन कतेको डॉक्टर अस्पतालसँ शहर धरि छथि मुदा, सेवा रहितहुँ जाति आ दलालक कोन जरुरत छैक। देखै छी जे जिनका जातिक आ दलालक आधार छन्हि ओ दिन-राति रुपैया ठिकियबैत रहैत छथि आ जनिका क्षेत्रीय वा जातिक आधार नहि छन्हि, सभ गुण रहितहुँ माछी मारैत छथि। फेरि मनमे उठलनि जे जहिया हम डॉक्टर बनलहुँ तहिया मात्र थर्मामीटर आ आला रहए। तहिना अस्पतालोमे रहै। मुदा आइ अनेको यंत्र, औजार अस्पतालोमे भऽ गेल आ अपनो कीनिलहुँ। जहिसँ चिकित्सा असान भेल जाइत अछि। मुदा ककरा लेल? कि अखन दवाइ आ चिकित्साक अभावमे लोक नहि मरैत अछि? सभकेँ चिकित्साक सुविधा भेटि गेल छैक? कि रोग लोककेँ पूछि-पूछि होइत छैक? जँ से नहि तँ हमरा स्वयं अपन सीमा-सरहद बुझक चाही। जँ से नहि बुझब तँ जहिना झाँट-बिहाड़िमे कीड़ी-मकोरीसँ लऽ कऽ चिड़ै-चुनमुनी जेकाँ नष्ट होइत चल जाएब। जँ सएह हएब तँ अनेरे एते वुद्धिकेँ किऐक रगड़ै छियैक। वेचारी ओहिना खसल खेत जेकाँ परती रहितथि। जहिपर धिया-पूता परो-पैखाना करैत आ खेलवो-धुपबो करैत।
तहिबीच, एक झुण्ड स्टाफसँ छात्र धड़ि पहुँच कहलकनि- “डॉक्टर सहाएब, लहासकेँ की करए चाहै छियैक?”
आँखि उठा देवनन्दन सबहक चेहरा देखि मुस्कुराइत कहलखिन- “गामेमे जरैबनि। एहिठाम सभ सुविधा रहितौ हिनक विचारक प्रतिकूल रहत। तेँ बीचमे हम अपन सिर दोख नहि लेब। सौँसे जिनगी गाम आ समाजक बीच बितौलनि, तेँ हमर फर्ज होइत अछि जे हिनका लऽ जाए समाजकेँ सुमझा दिअनि। हिनका निमिते जे काज हएत ओ समाजक विचारानुसार हएत। जँ से नहि हएत तँ समाजक नजरिमे काँट बनि जाएब। जे नहि चाहै छी।”
देवनन्दनक विचार सुनि सभ गुम्म भऽ गेलाह। तहि बीच सीनियर डॉक्टर सबहक झुण्ड पहुँचलनि। मुदा किनको मनमे सोग नहि। सबहक मन प्रफुल्लित। परिवारमे ने कहियो काल जन्म आ मृत्यु होइत मुदा, अस्पतालमे तँ से नहि होइत। सभ दिन जन्म-मरण होइते रहैत अछि। मुस्की दैत डॉ. कृष्णकान्त देवनन्दनकेँ कहलखिन- “आगूक काज किअए रोकने छी? पहिने शवदाहगृहमे फोन कऽ कए बुक करबऽ पड़त। जखुनका समए भेटत तहि हिसाबसँ ने जाएब।”
डॉक्टर कृष्णकान्तक विचार सुनि देवनन्दन गुम्मे रहलाह। मनमे नचए लगलनि जे स्टाफ आ जुनियर जे कहलनि हुनकर जवाब तँ दऽ देलिएनि। मुदा हिनका कि कहबनि। जँ विचार कटबनि तँ मनमे दुख हेतनि। हमरासँ वेसी दिन दुनियाँ देखने छथि। अपन विचारकेँ मनेमे राखि कहलखिन- “हम तँ बेटा छिअनि मुदा, माए तँ जिनगीक संगी रहलखिन, तेँ हुनकर विचार बुझव जरुरी अछि।”
सभ क्यो मायक विचार सुनैक लेल कान ठाढ़ केलनि। माए -सुभद्रा- बजलीह- “भलेहीं इहो घर-द्वार अपने छी मुदा, बनाओल छिअनि देवक। हुनकर -पतिक- बनौल गाममे छन्हि। अपन गाछी-कलम छन्हि, जे पुस्तैनी छिअनि। मुइलहा माने सुखलाहा गाछ सबहक जगहपर नवका गाछो लगौने छथि। पतिआनी लगा कऽ पैछला पुरखा सभ सजल छथि। तेँ हम ओहि पतिआनीकेँ छोड़ि अनतए कतौ दऽ अवियनि, ई नीक नहि बुझि पड़ैत अछि। सिर्फ लहासे जरबैक प्रश्न तँ नहि अछि अंतिम क्रिया धरि निमाहैक अछि। मासे-मास, साल भरि छाया हेतनि। साले-साल, बरसी हेतनि ताहिपरसँ पितृपक्ष सेहो हेतनि।”
सुभद्राक विचार सुनि सभ मुँह बन्न कऽ लेलनि। तहि बीच ड्राइवर आबि कहलकनि- “गाड़ी तैयार अछि।”
ड्राइवरक बात सुनि देवनन्दन कपड़ा बदलैले गेलाह। कपड़ा बदलि कऽ आबि गाड़ीमे लहासकेँ चढ़वैक विचार केलनि। सभ कियो रहबे करथि हाथे-पाथे लहासकेँ उठा गाड़ीमे चढ़ौलनि। लहासकेँ गाड़ीमे चढ़ा सभ क्यो चलि गेलाह।”
गाड़ीमे बैसितहि देवनन्दन मनमे एलनि उमेरक हिसाबसँ मृत्यु उचिते भेलनि। अस्सी बर्ख धरि लोक बूढ़ होइत अछि आ ओहिसँ उपर भेलापर झुनकुट बूढ़ भऽ जाइत अछि। जहिना पाकल धान वा कोनो अन्न कटलापर अधिक छिजानैत नहि होइत मुदा, वएह जखन झुना जाइत तँ हवो-विहारिमे वा ओहुना टूर सभ खसए लगैत अछि। तहिना तँ मनुष्योक शरीर होइत। अधिक बएस भेलापर माने झुनकुट वूढ़ भेलापर शरीरक अंग सभ क्रियाहीन हुअए लगैत अछि। जहिसँ रंग-विरंगक बाधा सभ उपस्तिति हुअए लगैत अछि। बाधा उपस्थिति होइतै कतेक रंगक रोग-व्याधि आबि जाइत अछि। तहिसँ नीक भेलनि जे अखन धरि अपन सभ क्रिया-कलाप करैत रहलाह। सिर्फ प्राण-वायु शरीरसँ निकलनि। सुभद्राक मनमे खुशी एहि दुआरे होइन जे अधपक्कू भऽ नहि पूर्ण पकि कऽ दुनियाँ छोड़लनि। शीला आओर आशाक लेल धैनसन। बेसीसँ बेसी हम सभ हुकुम निमाहैवाली छी। परिवारक हानि-लाभसँ हमरा की। अखन धरि परिवारमे चारिम सीढ़ीपर छलहुँ आब तेसरपर एलहुँ। तहिना आशाक मनमे रहए जे हमर तँ कोनो हिसावे एहि परिवारमे ने अछि ने रहत। जहिना घर आ आंगनक बीच सीढ़ी बनल रहैत अछि जहिसँ लोक घरसँ बहार होइत आ बहारसँ घर जाइत तहिना।
माएक चेहरापर देवनन्दन नजरि देलखिन तँ बुझि पड़लनि जे पैछला कोनो बात मन पड़ि गेल छन्हि जहिसँ चिन्तित जेकाँ भऽ गेल छथि। चिन्ता मनसँ निकलितन्हि कोना? युक्ति सुझलनि जे आन कियो जँ किछु बाजत तहिसँ ओकर चिन्ता नहि मेटेतैक। भऽ सकैत अछि जे ओहि बातपर धियाने नहि दिअए। तहिसँ नीक जे किछु पूछि दिअए? जहिसँ आन बात मन पाड़ैमे पैछला बात दबि जाइ। नीक युक्ति फुड़ने मुस्की दैत कहलखिन- “माए, जखन हम छीहे तखन तोरा चिन्ता किअए होइ छओ?”
चिन्ता सुनि सुभद्रा कहए लगलखिन- “बौआ, पुरना बात मन पड़ि गेल छलए तेँ कनी चिन्ता आबि गेल।”
लाड़ैन चलबैत शीला पुछलखिन- “बुढ़ोमे पुरना बात मने छन्हि?”
“कनियाँ, अहूँ एक उमेरपर आब एलौं तेँ कहै छी। हमरा दादी कहने रहथि जे जहिना माटिक कोठी बना लोक अन्न रखैए, जे बहुत दिन तक सुरक्षित रहैत तहिना मनुष्यकेँ अपन जिनगीक कर्मक लेल कोठी बना राखक चाही। सभसँ पहिने गणेश जी बनौलनि। जहिना अन्नक खढ़-भूस्सा, सूपसँ फटकि, हटा दैत छिअए तहिना जिनगीक कर्मक जे भूस्सा-भूस्सी अछि ओकरा हटा कर्मकेँ मोन राखक चाही। सुभद्रा बजितहि छलीह कि बिचहिमे आशा जोरसँ पुछलकनि- “कोन पुरना गप छियै?”
आशाक मुँह देखि सुभद्रोक मुँहमे पुरना अंकुर फुटल। मुस्की दैत कहए लगलखिन- “बुच्ची, बहु दिनका कथा छी अपने गाममे दू समुदायक छौँड़ा-छौँड़ीकेँ प्रेम भऽ गेलै। बच्चेसँ दुनू झंझारपुर हाट माए-बापक संग जाइत-अबैत रहए। गाममे दुनूक सभ काज-उद्यम फुट-फुट रहए। ने खेनाइ-पीनाइ एक ठीन होय आ ने पावनि-तिहार। मुदा खेती दुनू गोटेक एक्के रहए। दुनू गोटे तरकारीक खेती करए आ हाटमे जा-जा बेचै। गामेसँ दुनू गोटे संगे जाए आ हाटोपर एक्के ठाम बैसि तरकारी बेचै। जखन दुनूक बच्चा कनी चेष्टगर भेलै तँ कोनो-कोनो समान कीनि-कीनि आनए लगलै। दुनू संगे जाइ। एकटाकेँ ने हराइक डर रहैत मुदा, संगीक संग तँ बच्चा कम हेराएत अछि। बच्चेसँ दुनू गोटेकेँ बैचारिक मिलान हुअए लगलै। अपना सन-सन लोककेँ हँसी-चौल देखै-सुनै। देखा-देखी दुनू गोटेक बीच सेहो हँसी-चौल हुअए लगलैक। हाटमे तरकारी बेचैक लूरि आ खेतमे गोला-फोड़ैक, पटबैक, रोपैक, कमठौन करैक लूरि सेहो भऽ गेलैक। दुनूक नव दुनियाँ बनए लगलैक किऐक तँ बाप-माएसँ पाँच-दस किलोक मोटा फाजिल उठबए लगल। जहिसँ परिवारक काजो आ आमदनियो दोबरा गेलइ। बीचमे एकटा घटना घटलै।
“की घटना?” फुदकि कऽ आशा पुछलकनि।
“बुच्ची, झुठ की सत्य, भगवान जनथिन। मुदा गाममे चर्चा चलए लगलै। तना-तनी बढ़ए लगल। जहाँ-तहाँ गारि-गरौबलि आ पकड़ा-पकड़ी शुरु भऽ गेल। मुदा गामक जते मुँह पुरुख रहए, सभकेँ अपने-अपने अपेछितसँ कहा-कही हुअए लगलनि। कखनो काल माथा ठंढ़ा होइत नहि तँ बेसी काल गरमाएले रहए लगलनि। मुदा पनचैती के करत से पंचे नहि एक्कोटा गाममे। सभ मुँह-पुरुख अपनहिमे कनफुसकी कए पनचैतीक समए निर्धारित कऽ दुनू -लड़का-लड़कीक- बापकेँ कहि देलकनि। हाट-बजारक लोक दुनू गोटे रहबे करए, जबाव देलकनि जे पंच हम वएह मानब जे निष्पक्ष होथि। मुँह-पुरुखक बीच दोसर उलझन ठाढ़ भऽ गेलनि। जँ एक समुदाइक रहैत तखन तँ दोसर ढ़ंगसँ पनचैती धरा कएल जा सकैत अछि मुदा, से नहि! दू जाति दू सम्प्रादायिक बीचक विवाद। सभ मुँह-पुरुखक माथ चकरा गेलनि। गाममे एक्को गोटे शेष नहि जे एक पक्ष नहि भऽ गेल होथि। तकैत-तकैत बुढ़ापर नजरि पड़लनि। सभ दिन तँ बुढ़ा अपन खेत-पथारसँ परिवार धरि रहलाह। गामसँ ओतबे मतलब जे मुरदा डाहए जाथि, वरिआती पुरथि, भोज खाथि, कतौ अगिलग्गी होय तँ जाथि। पर-पनचैतीक लूरि नहि। मतलबो नहि। कियो पुछबो नहि करनि।”
हँसैत शीला बजलीह- “ऐहेन सोहल-सुथनी बूढ़ा छलनि?”
पुतोहूक बात सुनि सुभद्राक आँखिमे सिंहक ज्योति एलनि। उत्साहित होइत बजलीह- “कनियाँ, की-की लीला भेल, से की कहब।” बुढ़ाक भीड़ि तँ कियो जाथि नहि मुदा, हमरा भरि-भरि दिन बरदबए लगल। अपन काज सभ खगए लगल। हमरा लग जे आवए तेना कऽ अपन बात कहि दिअए जे हम “हँ” कहि दिअए। जहिसँ हमर विचारे उधिया गेल। तखन बुढ़ाकेँ कहलिएनि। जखने कहलिएनि कि फड़कि उठलाह जे गाममे की कतए होयत छैक से हम नहि देखै छी। खाइ-पीबै काल सभ एक भऽ जाएत आ इज्जत-आबरुक बेर औतै तँ पड़ा जायत। ऐहेन गामसँ हटले रहब नीक। जेकराले चोरि करी सएह कहए चोरा। ऐहेन गामक कुचालिमे हमरा नहि पड़ैक अछि। भने अपन नून-रोटीक ओरियानमे समए वितबैत छी, शान्तिसँ रहैत छी। एक्के-दूइये सभ आबि-आबि कहए लगलाह। हारि कऽ हुनका बुझबैत-बुझबैत सुढ़िऐलहुँ। मानि गेलाह। चारि बजेक समए निर्धारित भेल। सौंसे गामक लोक एकत्रित भेलाह। आँखिक देखलाहा तँ एकहुँटा गवाह नहि मुदा, दुनूक -लड़का-लड़की- क्रिया-कलापसँ साबित भऽ गेल। एक मतसँ सभ सहमत भऽ गेलाह जे दुनूक बीच संबंध अछि। जखन संबंध अछि तखन निराकरण हुअए। गुन-गुनी फुस-फुसी वैसारमे शुरु भेल। चुपचाप बुढ़हा सभ देखैत-सुनैत रहथि। गुन-गुनी, फुस-फुसी जोड़ पकड़ए लगल। जोर पकड़ैत-पकड़ैत हल्ला हुअए लगल। दुनू दिशि गाम बँटा गेल। एक पक्षक कहब रहए जे ऐहेन-ऐहेन संबंध कोन समाजमे नहि होइत छैक? कोनो कि अपने गामक पहिल घटना छी। आइ धरि की भेलैक? कहियो कोनो मुँह दुबराहाकेँ चारि थापर मारल गेलै तँ ककरो पाँच-दस रुपैआ जुर्माना भेलै। दोसर पक्षक कहब रहै जे जाति-सम्प्रदायक बंधन काँच सूतक बन्धन छी। एक वृत्ति, एक उम्रक लड़का-लड़की जँ अपन जिनगीक निर्णए स्वयं करए चाहैत अछि तँ समाजकेँ ओहिमे प्रोत्साहन करक चाही। दोसर विचार बुढ़ाकेँ जँचलनि। अपनो निर्णए दऽ देलखिन। ले बलैया, एक पक्षकेँ तँ खुशी भेलइ। मुदा दोसर पक्षक जे अगिला-वहान रहए ओ बुढ़हाक गट्टा पकड़ि कहलकनि- “बड़ पैनिचैतियाक सार बनलथिहेँ। गट्टा पकड़ितहि बुढ़हाक नरसिंह तेज भऽ गेलनि। सभ वुझबो ने केलक। हाँइ-हाँइ कऽ वुढ़हा चारि-पाँच थापर ओकरा मुँहमे लगा देलखिन। लगक लोक कियो एक थापर देखलक तँ कियो दू थापर। मुदा बुढ़ो आ मारि खेनिहारो पाँच थापर बुझलक। गाममे सना-सनी भऽ गेल। दौड़ि-दौड़ि कऽ सभ अपना-अपना अंगनासँ लाठी आनि-आनि दू साइड भऽ गेल। अपन-अपन घरबलाकेँ लाठी लऽ-लऽ जाइत देखि स्त्रीगणो सभ दौड़ि-दौड़ि अबए लगलीह। ओना मारिक डर सभकेँ होय। एक बेरि १९४२ई.मे ऐहने घटना पहद्दीमे भेलि रहए। जहिमे लड़का-लड़कीकेँ आगि लगा घरेमे जराओल गेल रहए। जेकर परिणाम हत्याक मुकदमा चलल आ एकतीस गोटेकेँ आजन्म कारावास भेलि रहए। गामक स्त्रीगण ढ़ेरिया गेलीह। कियो बजए लगलीह जे मनुक्खक जिनगीकेँ मनुक्खक जिनगी बना जीवैक चाही तँ कियो बजैत-कुल-खानदानक नाक-कान कटौलक। कियो-किछु, कियो-किछु बजए। सभ अपने-अपने बजैमे बेहाल। जहिना पुरुख तहिना स्त्रीगण। मुदा तत्खनात झगड़ा रुकि गेल। सभ पुरुखकेँ अपन-अपन घरवाली लाठी छीनि-छीनि बाँहि पकड़ि-पकड़ि अपना-अपना आंगन लऽ गेेलीह। गामक खेलौनाकेँ सरकारी खेलाड़ी पकड़लनि। रंग एलै।
दुनू पक्षक जते पंच पनचैतीमे रहए सभकेँ कोट-कचहरीसँ लाट-घाट पहिनहिसँ रहैक। नव खेलाड़ीक लेल नव खेल आ नव फील्ड तैयार भेल। दुनू परानीकेँ मारि-पीटक मुकदमामे फँसा देलक। जे पच्चीस बर्खक उपरान्त हाइ-कोर्टसँ फड़िआएल।”
आत्म विभोर भऽ सुभद्रा, बेटा, पुतोहू आ पोतीकेँ अपन जिनगीक कथा सुनबैत रहथिन। जहिना एकाग्र भऽ देवनन्दन सुनैत रहथि तहिना शीला। आशाक बुद्धिमे बात अँटबे नहि करैत, तेँ कखनो दादीक बातो सुनैत आ कखनो बावाक अरथियो दिशि देखैत। चौवन्नियाँ मुस्की दैत शीला सासुकेँ पुछलनि- “माय, जहलो देखने छथिन?”
पुतोहूक प्रश्नसँ सुभद्राकेँ दुख नहि भेलनि। मनमे एलनि जे भरिसक जिज्ञासा जागि रहल छनि। ओना देवनन्दनक नजरि सेहो माइयेपर अँटकल रहनि मुदा, चुपचाप सुनैक इच्छासँ कान पथने रहति सुभद्रा कहए लगलखिन- “कनियाँ, बुढ़ा-संग तँ हमहूँ हाइ-कोट धरि लड़लहुँ। मुदा हाकिमक आगू दुइये दिन जाइ छलौं। जखन मैमला भेल तखन जमानत करबै जाय आ जहि दिन पुछै गल्ती केलहुँ अछि वा नहि, तहि दिन।”
शीला- “जहलमे की सभ होइ छै से तँ नहि देखलखिन?”
सुभद्रा- “नहि कनियाँ! झूठ कोना बाजब। जे नहि देखलिएक से कोना कहब। भगवान सबहक देहमे रुइयाँ देने छथिन ककरो आगि किअए उठेवैक।”
शीला- “बुढ़ा, कतेक बेरि जहल गेल छथिन?”
बुढ़ाक नाम सुनि सुभद्राक मनमे खुशी आइल। मुस्की दैत कहलखिन- “अपने मुँहे एक्कैस बेरि कहने छथि। ओना देखिएनि तँ हमहूँ मुदा, हमरा ठेकान नहि अछि।”
“भेंटो करए जाथिन?”
“कहू, कोना नै जैतियनि। खाइ-पीबैक बौस मनाही केने रहथि मुदा, तमाकुल-चून दऽ दऽ अबिअनि।”
“देखि कऽ कनवो करथिन।”
“कनितौं किअए। कोनो कि नइ बुझियै जे दस-पाँच दिनमे फेरि निकलवे करताह। तइले कनितहुँ किअए। दस-पाँच दिन तँ लोक कुटुमैतियोमे जा कऽ रहैत अछि।”
“बुढ़ासँ झगड़ो होइन?”
“झगड़ा किअए होइताए। तखन घरक काजमे कहा-कही हुअए। मुदा ओ हिसाब जोड़ि कऽ बुझा दथि। मन मानि जाए। एक बेरि एहिना भेल बौआ विआह लए।”
बौआक विआह सुनि आशो चौकन्ना भेलि आ शीलो देह-हाथ समेटि सुनैले कान ढाढ़ केलनि। मुदा देवनन्दनमे कोनो तरहक उत्सुकता नहि एलनि।
“बौआक विआह लए की भेलनि?”
“बौआ जखन पढ़िते रहए तखन विचार देखियै समाजमे बौओसँ छोट-छोट बच्चा सभकेँ विआह होय। जखन समाजमे रहै छी तखन तँ समाजक संग चलए पड़त। मुदा बूढ़ा विचार रहनि जे जखन देव पढ़ि कऽ अपना पाएरपर ठाढ़ भऽ जाएत तखन विआह करब। हमरा हुअए जे अइ जिनगीक कोन ठेकान अछि अगर जँ विआह केने बिना मरि जाएब तँ अपनो मन लागले रहि जाएत। मुदा बुढ़ाकेँ परिवारक खर्च जोड़ए पड़नि। कहियो हाथमे सए-पचास रुपैआ नै रहैत छलनि। सदिखन एकटासँ एकटा भूर रहबे करैत छलै।”
पत्नी आ माइक गप-सप्प सुनैत देवनन्दन विचारक दुनियाँमे डूबल रहथि। मने-मन विचारैत रहति जे जहिना लंकामे विभीषण छलाह तहिना तँ अहू समाजमे अछि। सदिखन एक नहि एक आक्रमण होइतै रहैत अछि। जहि समाजकेँ हम नीक बुझै छियै ओहिमे अन्न-पानिसँ लऽ कऽ बुद्धि धरिक चोर किअए अछि। सदिखन लोक झुठे किअए बजैत अछि? अनका नीक देखि जरैत किअए अछि? दोसराक बहू-बेटीक इज्जत किअए लैत अछि? ककरो-क्यो गारि-मारि किअए करैत अछि? देवनन्दनक मन फटए लगलनि। किएक तँ मनमे प्रश्न उठलनि जे समाजमे अछूत के अछि जे कोनो नहि कोनो रोगसँ -छुत- ग्रसित नहि अछि। जँ सभ रोगिये अछि तँ समाज नीक कोना भेल? जाधरि समाजक लोक समाजकेँ नीक नहि बनाओत ताधरि समाज नीक बनत कोना? जहि गाममे एक गोटेकेँ हेजा होइत छैक ओहिसँ सौँसे गाम रोग पसरि जाइत छैक। तहिना तँ आनो-आनो रोगक अछि। खास कऽ कऽ समाजक रोग! अपनापर नजरि एलनि। अपनापर नजरि अवितहि अपनाकेँ डॉक्टर देखलनि। मुदा केहेन डॉक्टर, जे खाली शरीरक रोगक छथि। मुदा रोग तँ एतवे नहि? शरीरक संग-संग मन-रोग आ परम्परा रोग सेहो अछि जकरा समाजक व्यवहारक रोग सेहो कहि सकै छियै। जहिना तेज धाराक धारमे भट्ठासँ सीरा दिशि बढ़व कठिन अछि, असंभव नहि? तहिना तँ समाजोमे अछि। जेम्हर देखै छी ओम्हर कोनो झाड़ीक बोन तँ किम्हरौ तीत फलक गाछक बोन तँ किम्हरौ मीठो फलक गाछक बोन अछि। जे जीवनक -जिनगीक- सैद्धान्तिक फलक बोन दिशि पहुँचबैत। तीत-मीठ फलक गाछ देखि संतोषक अंकुर हृदएमे जन्म लेलकनि। संतोषक अंकुरकेँ उगितहि दुनियाँक रंग बदलल बुझि पड़लनि। नजरि पितापर गेलनि। सिर दिशिसँ निङहारब शुरु केलनि। पएर लग अबैत-अबैत मन पड़लनि पिताक ओ राम कथा जे गामक स्कूलमे नाओ लिखबै दिन सुनौने रहनि। भगवान राम जंगल विदा भेला। गामक -अयोध्याक- समाज अरियातए संगे चललाह। गामक सीमानपर पहुँचैत-पहुँचैत साँझ पड़ि गेल। समाजक आग्रह होनि जे अपने बोन नहि जाय पुनः अयोध्या घुमि जाय। राम अपन संकल्पपर दृढ़ जे पिताक आदेश नहि काटब। साँझ भेने सभ कियो रात्रि विश्राम करए लगलथि। जखन सभ सुति रहलाह तखन राम लक्ष्मण सीता विदा भेलथि। स्थल रास्तासँ नहि। स्थल छोड़ि अकासक रास्तासँ। भोरमे जखन सबहक नीन टुटलनि तँ रामकेँ नहि देखलनि। रास्ता दिशि बढ़लाह तँ ने घोड़ाक टापक चेन्ह रहै आ ने रथक पहियाक। निराश भऽ सभ घुमि गेलाह। ऐहन समाजमे पूर्ण जीवन पिता कोना जीवि लेलनि? नजरि बढ़लनि जे समाजमे कत्ते परिवारसँ दोस्ती छलनि -अछि- आ कत्तेसँ दुसमनी? नजरि खिरबए लगलथि तँ वौआ गेलथि। माएकेँ पुछलखिन- “माए, आइ तँ समाजक काज पड़त। कते परिवारसँ बाबूकेँ दोस्ती छलनि?”
दोस्ती नाम सुनितहि सुभद्रा हरा गेलीह। जना शरीरसँ मन उड़ि गाममे बौआए लगलनि। मन पड़लनि संग मिलि कुमरम गीित। विआह गीति, सामागीत, घरक गोसाँइसँ लऽ कऽ दुर्गास्थान धरिक गीति गाएब। सासुकेँ एकाग्र होइत देखि शीला बजलीह- “बुढ़ी तँ नीन पड़ि गेलीह?”
नीनक नाम सुतितहि आँखि खोलि सुभद्रा बजलीह- “नइ कनियाँ नीन कहाँ पड़लौंहेँ। मन पड़ि गेल आमक गाछीक धिया-पूता। भगवानो बड़ अनर्थ केने छथिन जे ककरो ढेरीक-ढेरीक चीज देने छथिन तँ ककरो ढेरीक-ढेरी खेनिहार। पाकल-पाकल आम जखैन बच्चा सभकेँ दइ छियै आ ओकर हृदय जुराय छै तँ अपनो आत्मा जुरा जाइए।”
मुस्की दैत शीला- “बूढ़ी फेरि ओंघा गेलीह।”
बोलीमे जोर दैत शीला पुन: बाजलि- “बेटा पुछै छनि गाममे कत्ते गोटेसँ दोस्ती छन्हि?”
“ऐहेन गप किअए पुछलह, बौआ? ने कियो दोस अछि आ ने कियो दुसमन।”
देवनन्दन- “जखन गाम पहुँचब तँ बावूकेँ जरबैले तँ लोक सभकेँ कहै पड़त की ने?”
बेटाक बात सुनि सुभद्रा बजलीह- “छिया, छिया। मिथिलाक समाज छी। एहि समाजमे मुरदा जरबैले ककरो घरक आँगि मिझवैले, ककरो-साँप-ताप कटने रहल वा गाछ-ताछपर सँ खसलापर ककरो कियो कहैत नहि छैक। ई सामाजिक काज छी। तेँ, अपन काज बुझि सभ अपने तैयार भऽ जाइत अछि।”
मायक बात सुनि देवनन्दन नमहर साँस छोड़लनि। गामक सीमापर अवितहि सभ चुप भऽ गेलाह अपन गाछी लग पहुचितहि देवनन्दन गाड़ी रोकवौलनि। रघुवीर भायकेँ देखने रहथिन एक बेरि -दिन- देखने रहथिन जे पछिमसँ कमला आ पूबसँ कोशीक बान्ह टूटि गेलइ। बरखो खूब होइत रहए। नेपालक पहाड़सँ तराइ धरिक पानि सेहो टघरि-टघरि बेग वनि अवैत रहए। पानिओ किअए ने औत आखिर ओकरो तँ समुद्रमे समेवाक लिलसा छैक। तहूमे मिथिलांचल बीच बाटपर अछि ओकरा किअए नै संग करैत जाएत। गामक उत्तरसँ बाढ़िक पानि ढूकल आ एक दिशिसँ पसरैत दछिन मुँहेक रास्ता धेलक। जाधरि पानि बासभूमिसँ हटि बाधक रास्ता धरि रहल ताधरि ककरो चिन्ता नहि भेलैक। मुदा जखन पानि मोटा कऽ अंगना-घर ढूकए लगल तखन सभकेँ चिन्ता हुअए लगलनि। गामक एकटा टोल गहीरगरमे बसल। चारु दिशिसँ पानि चढै़त-चढ़ैत आंगना घर ढूकि गेल। एक तँ ओहिना, बरखामे टटघरो आ भीतघरो ढहि-ढनमना गेल। तइपरसँ बाढ़िक वेग अबिते भीत घर खसए लगल टटघर सभ मचकी जेकाँ झुलए लगल। घर खसैत देखि टोलक सभ मालो-जाल आ चीजो-बौस आ धियो-पूतोकेँ लऽ पोखरिक महार दिशि विदा भेल। पच्चीस परिवारक टोल। बेदरा-बुदरी लगा एक सए तीस आदमी। चालिस-पेंइतालीसटा गाए-महीसि, पच्चीस-तीसटा बकरियो। मालो-जाल बाढ़िक पानि आ आवाज सुनि डरे थरथर कपैत। कोनो-कोनोकेँ ऑखिसँ नोरो खसैत। मुदा एक्कोटा ने खाइले डिरिआइत आ ने पानि पीबैले। सभ अपन-अपन माल जालक डोरी खोलि देलक। डोरी खुजिते आगू-पाछू जोरिया सभ पानिक बेगसँ उपर भेल। मुदा एक्कोटा जान-माल नोकसान नहि भेल। एकाएक पानि नहि चढ़ल। टोलक समाचार सुनिते रघुनन्दन करियाकाकाकेँ दुलारुसँ बटुआ कहैत रहथिन सोर पाड़ि कहलखिन- “ऐम्हर आवह हौ बटू।”
करिया काकाकेँ अबिते कहलखिन- “सुनै छी जे पूबरि टोलमे बाढ़िक पानि चढ़ि गेलैक अछि। चलह तँ देखियै?”
बिना किछु बजनहि करियाकाका संग भऽ गेलनि। थोड़े आगू बढ़लाह तँ देखलनि जे चेतनसँ लऽ कऽ धिया-पूता धरि किछु नहि किछु माथपर उठौने भीजैत-तीतैत गामक ऊँचका जगह दिशि जाए रहल अछि। मनमे उठलनि जतऽ जा रहल अछि ओतऽ रहत कोना? मुदा, आँखि उठा कऽ तकैयौमे लाज होनि। जे जनिजाति कहियो सोझामे बजैत नहि ओ सभ साड़ीक फाँड़ बन्हने माथपर, कियो अन्न, तँ कियो ओछाइन, तँ कियो बरतन-वासन नेने बच्चा सभक पाछु-पाछु जाए रहल छथि। लोकक दशा देखि करियाकाकाकेँ कहलखिन- “बटू, सभकेँ अपना ऐठाम लऽ चलह जहाँ धरि सकड़ता धरत तहाँ धरि पार लगेवैक।”
दुनू गोटे सभकेँ सेग केने अपना घर चललथि। समस्या तँ देशक नहि सिर्फ एक टोलक अछि मुदा, पहाड़ोसँ नमहर। समाजक मनुक्खो तँ सभ रंग अछि केयो अनका दुखकेँ अपन दुख बुझि कनैत तँ केयो हँसैत। जे विपत्ति छैक ओ एक गोटे बुते कोना मेटौल जाएत। जँ नहि मेटौल जाएत तँ लोक मरैत केहेन परिस्थितिमे अछि। मनमे बुकौर लगि गेलनि कोनो बाटे नहि सुझति रहनि। सभसँ पहिल समस्या अछि लोको आ मालो-जालकेँ पानिसँ बँचैक लेल जगह। अपना घरे कैकटा अछि। तहूमे सभ व्योतले। अंगनाक घर अन्न-पानिसँ आ जरना-काठीसँ भरल अछि। लऽ दऽ कऽ एकटा दरवाजा। जे परिवारक प्रतिष्ठा छी। दोसराक आश्रम-स्थल। मनमे नव आशा जगलनि जे जे विपत्तिमे पड़ल अछि ओ तँ अपन विपत्तिक मुकाबला करैक लेल सेहो अछि। मुँहसँ हँसी निकललनि। अंगनासँ दरवज्जा धरि सभकेँ ठौर धड़ौलनि। माल-जालकेँ तत्खनात् तँ बान्हे माने रस्तेपर खुँटा गारि-गारि बन्हैले कहलखिन। खाइक ओते जरुरी नहि बुझलनि जते माल-जालक ठौर। करियाकाकाकेँ कहलखिन- “बटू, तत्खनात तँ सभ असथिर भेल। पहिने सभकेँ -मनुष्यो आ मालो-जाल- खाएक ओरियान करह। तेकर वाद अगिला काज देखिबै।”
खेनाइ बनबैक लेल आगि आ चुल्हिक जरुरत पड़त। चूड़ा तँ घरमे ओते अछि नहि। तहूँमे फक्का-फुक्की भेलि। ओहिसँ काज नहि चलत। जँ चाउर-दालि, तरकारी सभकेँ फुटा-फुटा देबै तँ ओते चुल्हिक वेवस्था कतए हएत? से नहि तँ पहिने नारक टालसँ नार खींच सभ माल-जालकेँ दऽ देल जाए। लोकक लेल चारि गोटे एक्केठाम भानस करए। सएह केलनि। भानस हुअए लगल। दुनू गोटे -रघुनन्दनो आ करियोकाका- गाममे घूमि-घूमि सभकेँ गर लगौलनि। बीस दिन बाद सभ अपना-अपना ऐठाम गेल।
करियाकाकाक कानमे पड़िते, दौड़ि कऽ गाड़ी लग आबि देवनन्दनकेँ कहलखिन- “डॉक्टर सहाएब, भैयाकेँ पहिने घरपर लऽ चलिअनु। घरपर मृत्यु नहि भेलि छन्हि। अपनो परिवारक आ समाजोक लोक अंतिम दर्शन कए लेतनि। तेकर बाद बरियाती साजि गाछी अनबनि।”
करियाकाकाक विचार सुनि सबहक मनमे समाजक प्रति श्रद्धा जगलनि। देवनन्दनक मनमे एलनि समाजमे पिताक कएल काज। जे समाजक प्रतिष्ठाक कारण रहनि।
करियाकाकाक बात देवनन्दन मानि, चारु गोटे-देवनन्दन, सुभद्रा, शीला आ आशा- गाड़ीसँ उतड़ि गेलथि। तहि बीच गाममे समाचार पसरि गेल। समाचार पसरिते जे जेत्तै सुनलनि ओ ओत्तेसँ देखैले दौड़लथि। धिया-पूता, बूढ़-बुढ़ानुससँ रास्ता अन्हरा गेल। गाड़ी कोना आगू बढ़त से रस्ते नहि। जे पहुँचैत, मूड़िआरी दऽ दऽ मुँह देखए चाहैत। मुँह झाँपल। तेँ सभ चद्दरि ओढ़ने सुतल आदमी देखैत। लोकक भीड़ चारु भरसँ गाड़ीकेँ घेड़ि नेने। ने आगू बढ़ैक बाट खाली आ ने कियो रघुनन्दनकेँ देखि पबैत छलाह। माटिक मुरुत जेकाँ चारु गोटे निच्चॉंमे ठाढ़ भऽ सबहक मुँह देखैत। रंग-विरंगक मुँह देखि पड़नि। ककरो-ककरो आँखिमे नोरो आ मनमे सोगो तँ ककरो-ककरो आँखिमे ने नोर आ ने सोग। मने-मन करियाकाका विचारि बजलथि- “अहाँ सभ रास्ता छोड़ि दिऔ। भैयाकेँ अंगना लऽ चलैत छिअनि ओतै उताड़ि कऽ रखबनि आ सभ दर्शन करब।”
करियाकाकाक बात मानि रास्ता छोड़ि देलक। आगू-आगू गाड़ी पाछु-पाछु सभ घर दिशि बढ़लाह घर-पर अबिते रधुनन्दनक मृत्यु शरीरकेँ उताड़ि उत्तर सिरहौने सुता देलकनि। लगमे सुभद्रा, शीला आ आशा बैसि गेलीह। देवनन्दनकेँ करियाकाका कहलखिन- “बौआ, अहाँ दरवज्जापर बैसू। समाज सभ जिज्ञासो करए औताह आ ऐम्हर हम आगूक ओरिआनो करैत छी।”
दियादिक सभ चुल्हि मिझा गेल। मुदा सभकेँ मनमे खुशी रहनि। सभसँ उमेरगर रघुनन्दने छलाह। ओना तइओ वेवहारिक रुपमे सबहक आँखिमे नोर रहनि मुदा, मनमे दुख नहि। उत्तर-मुँहे सुतल, नव वस्त्रसँ मुँह छोड़ि सौँसे देह झाँपल। सिरमामे तुलसी गाछ आ गूगूलक सुगंध अंगनामे पसरैत। मर्द-औरतसँ आंगन भरल। मर्द सभ तँ दर्शन कऽ-कए दरवज्जापर आबि जाइत मुदा, स्त्रीगण सभ अंगनेमे बैसि गप-सप्प करए लगथि। छोटका-बच्चा सभ ओसारपर खेलए लगल। एक साए एगारह बर्खक रधिया दादी, बाँसक बत्तीक ठेंगाक हाथे एलीह। झुनकुट बूढ़ि। ने मुँहमे एक्कोटा दाँत आ ने एक्कोटा केश कारी। चौड़गर मुँह। दहिना गालपर एकटा नमहर मसुहरि। जहिपर इंच भरिक दूटा पाकल केश। सौँसे देहक चमड़ी ढील भऽ घोकचि-घोकचि गेल। चानिपर तीनिटा रेघा जेकाँ बनि गेल। गालक उपरका भागमे सेहो रेघा जेकाँ मुदा, निचला भागमे गायक गरदनि जेकाँ चमड़ी लटकि गेल। आंगनमे पएर दइते नवतुरियो आ सियानो सभ दादीक लेल रस्तो बनौलनि आ सुभद्रा लग बैसैक जगहो। मुदा दादीक आँखिक नोरमे दर्द रहनि। ओना अखन धरि नोर पुतलीसँ भीतरे छलनि। तहि काल पाँच वर्खक एकटा छौँड़ा लुचबा दादीक ठेंगा पकड़ि तीनू झुनझुना -तारक बना ठोकल रहनि- डोला-डोला बजबए लगल। अंगनाक सभ खढ़ू-मढ़ू लगमे जमा भऽ गेल। धिया-पूताकेँ देखि डॉटि कऽ सुबधी बाजलि- “भने ते तू सभ ओसारपर खेलै छलेँ, अइठीन किअए एलेँ?”
सुबधीक बात दादीकेँ नीक नहि लगलनि। कहलखिन- “कनियाँ, बच्चा सभकेँ किअए डटै छियै। अहाँ समरथ छी तेँ ने बुझै छियै, ई सभ अखैन कियाँने गेलै। जहिना जाड़क उत्तर गरमीमास अबैए आ गरमीक उत्तर बरखा। जे गरमीसँ शुरु भऽ जाड़मे ठेका दैत अछि। तहिना तँ ई देहो अछि। हम तँ कातिक-अगहनक जाड़ भेलहुँ ई बच्चा सभ तँ फागुन-चैतक जाड़ छी। मुदा सूर्ज तँ वएह रहैत छथि। भलेहीं कहियो उग्र तँ कहियो शीतल भऽ जाइ छथि।”
दादी बजिते रहथि कि शीला उठि कऽ दहिना बाँहि पकड़ि आगू लऽ जाए लगलीह। रघुनन्दन लग पहुँचतहि आँखिसँ साओनक बरखा जेकाँ, नोर झहरए लगलनि। मुदा बेसी काल नहि झहरलनि। केवल ओतवेकाल झहरलनि जतेकाल अपन उमेरपर मन अँटकलनि। आगूसँ पाछू मुँहेक रघुनन्दनक जिनगी दिशि नजरि बढ़िते मुँहसँ हँसी निकलए लगलनि। दादीक हँसी देखि आशा बाजलि- “बाँबीकेँ एक्कोटा दाँत नहि छन्हि। आब हेतनि?”
आशाक बात सुनि दादी जोरसँ हँसलीह। बिनु दाँतक चौड़गर मुँह तीनि गोटेक मुँहक बरोबरि। एक झोंक हँसि दादी सुभद्राकेँ कहए लगलखिन- “दियादिनी, अहाँ बच्चा छी। तेँ, कने दुख होइते हएत। मुदा अहाँसँ कम्मे उमेरमे हमर स्वामी संग छोड़ि चलि गेलथि। तहि आगू अहाँक विपत्ति छोट अछि। भगवान अहाँकेँ सभ किछु देने छथि। भरल-पूरल परिवार अछि श्रवणकुमार सन बेटा लछमी सन पुतोहूँ छथि। ऐहन सुन्नर खेलौना सन पोती अछि तहन किअए सोग करै छी। आब अपना सभ सृष्टिक ओहन बीज स्वरुप बनि गेल छी जहिसँ अंकुरक संभावना नहि। जहिना कोनो अन्न बीआ वा फलक बीआ साल भरिक उत्तर पुरान भऽ जाइत, जहिमे अंकुरक शक्ति झीण भऽ जाइ छै तहिना भऽ गेलहुँ। मुदा तेँ कि, अन्ने फलक बीज जेकाँ मनुष्योक शक्ति साले भरिमे झीण भऽ जाएत। सबहक शक्तियो एक समान नहि होइत।”
तहि बीच फुदकि कऽ आशा पुछलकनि- “बाँबी, अहाँकेँ कते दिन भेलि अछि?”
आशाक बात सुनि- “हे गै डकडरबा बेटी, तूँ हमरा दिन पूछै छेँ। साढ़े बाइस गाही बर्ख भेलि अछि।”
दादीक बर्खक हिसाब कियो नहि बुझलनि। सभ अकबका गेलीह। सभ-सबहक मुँह देखए लगलीह। दादी बुझि, मुस्कुराइत शीलाकेँ कहलखिन- “सासु, सासु नहि माए छथि। हमर छोट दियादिनी छथि। जखन हमरा पाँच बर्ख ऐठाम ऐला भेल रहए तखन रघू बौआक जन्म भेलनि। एक बेरक खेरहा कहै छी। काकियो समर्थे रहथि। मुदा हमरासँ उमरगर रहथि। माघ महीनाक मकरक मेला शुरु भेल। अपना गाम सभक बेसी लोक हरड़ी जाइत छल। हमरा संग रघू वौआ हरड़ी गेल। हरड़ीसँ कनिए वेसी विदेसर छै। मुदा विदेसरक मेला गड़वड़ हुअए लगलै। निरमलीसँ दड़िभंगा धरिक रेलवे कातक जते उचक्का अछि, सभ भोरुके गाड़ीसँ आबि उचकपन्नी शुरु कऽ दैत। जहिसँ नीक घरक लोक जाएव छोड़ि देलक। ओना विदेसरो बाबा बड़ जगताजोर तेँ कतवो उचकपन्नी होइ तइयो मेला बढ़ले जाइत। अपना गाम सभक लोक जाएव छोड़ि देलक। ओना क्षेत्रो नम्हर छैक, तहिपर सँ स्थानक लग-पासक लोक सेहो कान्ह उठेलनि। जेकर फल भेलै जे स्थानसँ उचकपन्नी समाप्त भेल। हरड़ीक संग दूटा बाधा उपस्थित भेल। परसा धाममे सूर्य भगवानक मुरती उखड़लासँ नव स्थान बनल। ओना मुरतियो दिव्य अछि। एक तँ सूर्य भगवानक दोसर बेस किमती पाथरो अछि। मंदिरो नीक। मुदा हालमे जे साम्प्रदायिक प्रभाव मदनेश्वरकेँ बढ़ौलक ओहिसँ परसो आ हड़ियोकेँ नीक झटका लगल। हरड़ी महादेबो छथि गहींरमे, जहिसँ सभ दिन जल भरल रहैत अछि। बीचहिमे सुभद्रा दादी दिशि देखि पुछलीह- “बहीनि कत्ते दिन बौआकेँ -रघुनन्दन- दूध पिऔने छिअनि?”
समरथाइमे हम खूब बुफगर रही। पहिल सन्तान भेले रहए। मरसम्फे दूध हुअए। काकी रोगा गेलीह। दूध टूटि गेलनि। हमरे दूध पीवि-पीवि वौआ जीअल। जखन बौआ साल भरिक भेला, अन्न-तन्न सेहो खाए लगलथि, डेगा-डेगी चलौ लगलथि, बोलिओ फुटलनि तखन काकी सिखा देलकनि दूधवाली माए कहैले। हमरो नीक लागए। बेटा तँ नहि कहिअनि मुदा, बच्चा कहैत रहिअनि। डेढ़ साल भेलापर हमरो दूध टूटए लगल। खाइ-पीवैमे तँ कोताही नहि हुअए मुदा, दोसर कारण भऽ गेल। मकरक मेला जाइत रही। काकी बच्चोकेँ नेने जाइले कहलनि। सभ साल ओतैसँ तरिपात कीनि-कीनि आनी आ सालो भरि मसल्ला खाइ छलौं। ओना हरड़ी मेलाक हरीस, माटिक नादि, टाड़ा-टाड़ी नामी रहए। सात-आठ बर्खक बच्चा रहथि। गामक बहुत जनिजातियो आ धियो-पूतो रहए। अपनो बेटा आ बच्चोकेँ हमहीं नेने गेलिएनि। अरबा चाउरक रोटी आ सीम-भाँटाक तरकारी बना लेलहुँ। गामोपर खा लेलहुँ।”
बिचहिमे आशा टोकलकनि- “खा कऽ महादेव दर्शन करए गेलियै?”
आशाक बात सुनि दादी ठहाका दैत कहए लगलखिन- “हरड़ी मेला स्त्रीगणक मेला छी। पुरुखसँ बेसी स्त्रीगण आ धिया-पूता रहैत अछि। दस बजेमे सभ खा-खा जाइत अछि आ दोसरि-तेसरि साँझि धरि घुरि-घुरि अबैत अछि। अपना सबहक कुटुमैती बेसी अही भाग अछि। एक दिशिसँ धीओ-बेटी अवैत आ दोसर दिशिसँ माइयो-पितिआइन जाइत। तेँ ओम्हरसँ बेटियो-जाति अबैत आ ऐम्हरसँ माइयो जाइत। सभकेँ मेलामे भेंटि-घाँट भऽ जाइत। जहिना बड़ियाकेँ बान्ह नहि छै, जे मन फुड़ै छै से करैए तहिना तँ जनिजातियो आ बूड़िबकहो अछि। जे मन फुड़तै से करत। हँ तँ कहै जे छेलियह, बच्चाकेँ नेने गेलिएनि। बेरहटिये पोखरिक महारपर बैसि खाए लगलौं। बच्चोकेँ एक खाड़ा रोटी आ तरकारी देलिएनि। हम दछिन-मुँहे-पोखरि दिशि घूमि कऽ खाए लगलौं। मूड़ी गोतने रही, माथपर साड़ी लटकल रहए। तेहि बीच एकटा झुनझुनाबला घुमैत-घुमैत अाएल। धिया-पूता सभ पाछु-पाछु रहए। ताड़क पातकेँ गुलाबी रंगमे रंगि झुनझुना बनौने रहए। एकटा झुनझुना हाथसँ बजबैत रहै आ बाकी पथियामे माथपर रखने रहए। आँएले-वाँएले बौओ रोटी खाइते पाछु धऽ लेलनि। हम बुझबे ने केलियै। धिया-पूता तँ खुरलुच्ची होइते अछि। झुनझुनाबला आगू बढ़ि गेल। बाटीमे पानि पीबि जखन पानि दइले तकलौं तँ देखवे ने केलिएनि। ले बलैया, ओते लोकमे कतऽ ताकब? भारी पहपटिमे पड़ि गेलौं। हाँइ-हाँइ कऽ तरिपातो आ टड़ो लेलहुँ आ तकैले विदा भेलहुँ। एकटा झुनझुनाबला रहैत तखैन ने ठेकना कऽ जइतौं। से तँ जेम्हर देखियै ओम्हरो झुनझुनाबला रहए मन हारि मानि लेलक। मनमे हुअए लगल जे काकीकेँ की जबाब देबनि। मुदा मने-मन चण्डेश्वर बाबाकेँ कहलिएनि जे आन देवस्थानमे तँ कियो नहि हराइत अछि मुदा, तोरा स्थानमे भऽ गेलह। अखनुका जेकाँ ताबे धिया-पूताक चोरि देवस्थानमे नहि हुअए। मुदा तइओ मनमे खुटखुटी रहबे करए। तेकर कारण रहए जे कहियो-काल सुनियै फल्लां स्थानसँ फल्लांक बेटा वा बेटी हरा गेलइ। तेँ मनमे हुअए जे काकी की कहतीह? तहूमे रोगाएल छथि। मने-मन समोह लागि गेल। मुदा फेरि मनमे भेल जे जँ कहीं घुरि-फिरि कऽ चलि आबथि। थोड़े-काल गुन-धुन कए, एक हाथकेँ तेरपात लेलहुँ आ दोसर हाथमे टाड़ा, तकए विदाह भेलौं। रस्ताक दुनू कात दोकानबला सभ दोकान लगौने रहए आ बीच देने लोक सभ चलए। मंदिरक आगू एक्के बेरि मंदिरक फाटकसँ बहुत लोक निकलल। रास्तापर रेड़ा भऽ गेल। तेहि काल माथपर सँ साड़ी ससरि गेल। आब की करब? दुनू हाथो बरदाएल रहए। माथपर साड़ी कोना लेब? नहि लेब तँ लोक की कहत? तहि काल दहिना हाथक टाड़ा छुटि गेल। फुटि गेल। झुटका-झुटाक भऽ गेल। मुदा पहिने साड़ी ससारि कऽ माथपर लेलौं। एक गोरेकेँ पाएरमे झुटकाक कान गरि गेलै। ओ भिन्ने खिसिआइत कहलक- “ऐहेन ढहलेल छह ते मेला-ठेला किअए अवै छह?” मुदा अपन हारल रही, किछु नहि कहलियै। चुपे-चाप रेड़ासँ बहरेलौं। बाहर अबिते आँखि उठा कऽ तकलहुँ कि देखलहुँ जे उत्तरसँ दछिन मुँहे एकटा झुनझुनाबला अबैए। रस्ता कातमे ठाढ़ भऽ हिया-हिया देखए लगलौं कि पाछु-पाछु हिनको-रघुनन्दन बच्चाकेँ देखलिएनि। देहो हल्लुके रहए। खाली एक्केटा हाथ बरदाएल रहए। दौड़ि कऽ जा बाँहि पकड़ि कात केलिएनि। फेरि जखन पोखरिक महारपर एलौं तँ ककरो नहि देखिलियै। सभ चलि गेल रहए। आनो-आनो गामक यात्री घरमुँहा भऽ गेल रहए। हमहुँ ओही लाटमे विदा भऽ गेलौं। मुस्की दैत शीला पुछलकनि- “तमसाएलमे फज्झतियो केलखिन?”
स्नेहसँ भरल दादीक मुँहसँ निकललनि- “राम-राम। अबोध बच्चाकेँ किअए किछु कहितिएनि। अबोध बच्चाकेँ तँ बुझा कऽ ने कहबै आकि मारि कऽ। मारलासँ बच्चा हेहरु भऽ जाइ छै कि ने? हँ ते कहै छलौं ने, गामपर एलौं तँ काकीकेँ कहलिएनि जे ऐहन-ऐहन खुरलुच्ची बेदरा सेने कोनो मेला-ठेला नै जाय। काकी अकचका कऽ पुछलनि तँ सभ खेरहा कहलिएनि। उमेरक अन्तर रहितौ चौल करबे करैत छलिएनि। जूरशीतलमे अछीनजलसँ असीरवाद दइते छलिएनि। फगुआमे रंग-रंग खेलवो करै छलौं। (सुभद्रा दिशि देखि) बहीनि, अहाँक मालिकसँ कम्मे उमेरमे हमर मालिक संग छोड़लनि। करीब साठि बरीससँ उपरे भेलि हएत। अहाँ तँ एक बएसपर आबि गेल छी। भगवान कोनो चीजक परिवारसँ समाज धरि, कमी देने छथि जे सोग-पीड़ा करब। दुनियाँ फुलवारी छिअए। एक अबैत अछि एक जाइत अछि। जहिना सालो भरि एकटा (जड़-चेतन) जन्म लैत अछि, एकटा जुआनीक आनन्द लैत अछि आ एकटा पाकि कऽ सुखैत अछि। तहिना तँ मनुक्खोक होइत अछि। तहूमे भगवानक फुलवारीक अजीव गति छनि। हुनका फुलवारीमे सालक कोन, मासक कोन, दिनक कोन जे छने-छन एकटा अबैत अछि तँ दोसर जाइत अछि। हम अहाँ मनुक्ख छी। असकर मनुक्ख रहितो सामाजिक सेहो अछि। मुदा पहिने मनुक्ख छी तखन किछु आर। मनुष्यकेँ मनुष्यत्व प्राप्त करब प्रमुख काज छी। जखने मनुष्यकेँ मनुष्यत्व प्राप्त भऽ जाइत तखने ओ दुनियाँकेँ चिन्हए-जानए लगैत। अपन परिवारसँ समाज (मनुष्य-मात्र) धरिक संबंध स्थापित कऽ लैत अछि। जहिसँ संबंधक अनुरुप अपन दायित्व निमाहए लगैत अछि। ओना बच्चा-रघुनन्दन हमरा आगूमे बच्चे छथि। भलेहीं सामाजिक संबंधमे भाए-भौजीक संबंध अछि। मुदा भगवान अनुचित केलनि। उचित ई होएत जे पहिने हमरा लऽ चलितथि। ई विचार मनमे अबिते दुनू आँखि ढबढ़बा गेलनि।
बचनू, चंचल, झोली, बौकू आ बतहू, देहक कपड़ा उताड़ि खाली देहपर तौनी आ डाँड़मे धोती पहीरने कान्हपर कुड़हरि नेने पहुँचल। अंगनासँ दरवज्जा धरि जनिजाति, पुरुख आ बच्चा सभसँ भरल लोकक भीड़ि देखि देवनन्दनक मन उड़ैत रहनि। अंगनासँ दरवज्जा धरि पिताक हँसैत आत्मा देखथि। विसरि गेलाह अपन जिनगी। मनमे हुअए लगलनि जे बिनु कहनहुँ समाज कोना अप्पन काज बुझैत छथि। ऐहन काज समाजक केबल मृत्युए समए नहि, बेटा-बेटीक बिआहक संग अनेको समए हाेइत अछि। संग मिलि हँसी, संग मिलि कानी, संग मिलि गाबी आ संग मिलि नाची, तँ एहिसँ सुन्दर की होइत अछि। सुख ककरा कहबै? जहि सुख लेल लोक नीचसँ नीच काज करैत अछि मुदा, पाबि नहि पबैत अछि।
एक छिन्ना धोती पहिरने श्रीकान्त पहुँचलाह। श्रीकान्त मधुवनी कोर्टसँ बड़ाबावूक पदसँ सेवानिवृत भेलि छलाह। मुँह निच्चाँ केने सोझे आंगन पहुँच ओ पएर छुबि गोड़ लागि एकटंगा दऽ ठोर पटपटबैत फुसुर-फुसुर कहए लगलखिन- “काका, अहाँ परसादे जिनगी भरि कुरसीपर वैसि सेवा निवृत भेलहुँ। जहिसँ जहिना जिनगी चैनसँ बितेलहुँ तहिना अगिला शेष जिनगी सेहो बिताएव।” सुभद्रा दिशि देखि बजलाह- “काकी, हमहूँ अही समाजक बेटा छी। जहिना अहाँ देवकेँ बुझैत छिअनि तहिना बुझब।”
श्रीकान्तक बात सुनि सुभद्रोकेँ मन पड़लनि। मनमे उठलनि जे देखियौ कौल्हुका छौँड़ा बूढ़ भऽ गेल। बूढ़ा तँ सहजहि झुनकुट बूढ़ छलाह। हवा-बिहाड़िमे टूटि कऽ खसवे करितथि। ऐहन मृत्यु भगवान सभकेँ देथुन। ऐहन मृत्यु तँ धरमतमे सभकेँ होइत छैक। कोनो कि हमरेटा चूड़ी फुटल, सिन्नुर धुआएत आकि दुनियाँमे बहुतोकेँ होइत अछि।
मूड़ि निच्चाँ केने श्रीकान्त अंगनासँ निकलि दरवज्जापर आबि देवनन्दनक बगलमे चुपचाप बैसि गेलाह। किछु बजैक साहसे नहि होइत रहनि। जना जीह्वामे थरथरी आबि गेल रहनि। साहस बटोरि, आँखि उठा, देवनन्दनकेँ कहलखिन- “बाउ देव, ओना अहाँ बच्चा छी मुदा, हमरासँ सभ तरहेँ उपर छी। अपन बात कहै छी। अखुनका जेकाँ पहिने घरक स्थिति नहि रहाए। बाबू बड़ मेहनती रहथि। जहिना मनुक्खक किरदानी तहिना दैवीए प्रकोप सेहो सदिकाल चलिते रहए। एक दिशि बइमानी-शैतानी तँ दोसर दिशि पानि-बिहाड़ि भूमकम, रौदी, शीतलहरी होइते रहए। तइपर सँ रोग-व्याधि सेहो चलिते रहए। जखन टेस्ट परीक्षा दऽ पास केलौं तँ फार्म भरैक समए आएल। बाबू अस्सक रहथि। कालाजार भऽ गेल रहनि। (कालाज्वर सुनि देवनन्दनक मनमे एलनि जे सचमुच अपना इलाकामे कालाज्वर अखुनका केन्सरसँ कम नहि छल) दिनानुदिन देह हहड़ले जाइत रहनि। गुणाकरपुरसँ हाथीक लिद्दी आनि-आनि दिअनि। बच्चे रही तेँ बुझवो कम करियै। माए जे कहए से कऽ दिअए। फारम भरैले रुपैआ माएसँ मंगैक साहसे ने हुअए। भरि दिन तंग-तंग देखिएनि। दोसर-दोसर विद्यार्थी सभ फारम भरि लेलक। हमरा मनमे विचित्र उथल-पुथल होइत। अंतिम तारीख अबैत-अबैत आशा टूटि गेल। जेना विपत्ति कपारपर आबि गेल हुअए तहिना बुझि पड़ए। दुनियाँक रंग बेद-रंग लागए लगल। अंतिम दिनक चारि बजे, हेडमास्टर सहाएव एकटा विद्यार्थी दिअए समाद देलनि जे “काल्हि धरि हमरा लग फारम रहत तेँ तूँ आबि कऽ फारम भरि लाए। कौल्हुका बाद भरब कठिन भऽ जेतह।?” ने कोनो काज नीक लगे आ ने खेनाइ-पीनाइ। मनमे आएल एक बेरि रघुनन्दन कक्काकेँ कहिएनि आबि कऽ सभ बात कहलिएनि। पुछलनि- “कहिया धरि काज छह?”
कहलिएनि- “आइ तँ आखिरी तारीक छी मुदा, हेड मास्सैव एते दया केलनि जे काल्हि धरि समए देलनि। दरबज्जेपर सँ काकीकेँ बक्सामे सँ रुपैआ नेने अबैले कहलखिन। जहिना बच्छाबला पैकार देने रहनि, तहिना आनि कऽ आगूमे रखि काकी कहलकनि- “घरमे एक्कोटा चाउर नहि अछि....। जहिना काकी कहलखिन तहिना कक्का उत्तर देलखिन- “एक-दू साँझ भुखलो रहि जाएब। मुदा एक जिनगीक प्रश्न अछि। तेँ ऐहने सभ काजकेँ ने लोक धरम बुझैए।” रौदियाह समए रहए। जहिसँ गामक लोक कियो मड़ूआ रोटी, तँ कियो कोटाक जनेरक रोटी, कियो अल्हुआ तँ कियो खेसारीक उसना खाए। सेहो सभकेँ भरि पेट नहि होइ। कते गोटेकेँ तँ साँझक-साँझ चुल्हि नहि चढ़ैत रहए। कहैत-कहैत श्रीकान्तक आँखिमे नोर टघरए लगलनि। जते दुखक ताप श्रीकान्तक आँखिसँ टघरि-टघरि निच्चाँ खसैत तते देवनन्दनकेँ धरतीसँ उठैत हवासँ हृदय शीतल हुअए लगलनि। पुछलखिन- “अखन परिवारक की स्थिति अछि?”
धोती खूँटसँ आँखि पोछैत कहलखिन- “बाउ, बड़ सुखसँ जीवैत छी। दुनू भाँइ बी.ए. पास कऽ नोकरी करैए। जेठका हाई स्कूलमे अछि आ छोटका ब्लौकमे। शनिए-शनि दुनू भाँइ अबैए आ सोमकेँ सबेरे खा-पी कऽ चलि जाइए। दुनू पुतोहूओ आ पाँचो-पोतीसँ घर भरल अछि। अपनो पेन्शन भेटिते अछि। भगवान बेटी नहि देलनि। मुदा तइओ दुनू बेटाकेँ पढ़ा, रहैले छह कोठरीक माकन आ तीनि बीघा खेत कीनिलहुँ। चौमासमे एकटा कल गरा देने छियै, जहिसँ तीमन-तरकारी कीनै नहि पड़ैत अछि। बाकी खेत बटाइ लगा देने छियै। भरि दिन अनमेनामे लगले रहै छी। कखनो ई नहि बुझि पड़ैए जे समए कोना काटब। एते दिन तँ ऑफिसेक फाइल उघलौं मुदा, आब दू घंटा कऽ रामाएण, महाभारत पढ़ै छी। तहि लागल बच्चे सभकेँ अपनो पढ़ा दइ छियै आ गोटे-गोटे खिस्सा रामाइनो-महाभारतसँ सुना दइ छियै। सालमे एक बेरि महिना भरिक हिसावसँ देशाटन सेहो कऽ लैत छी। जहिसँ तीर्थाटनो भऽ जाइत अछि। अपनो तँ बहुत नहिये अछि मुदा, कक्का बतौल बातकेँ अखनो कान धेने छी जे अपनासँ निच्चाँक जँ कियो किछु मंगै अबैत तँ नहि पान तँ पानक डंटियो लऽ जरुर सेवा करै छियै। मनमे कखनो कोनो चिन्ता नइ रहैए।”
तहि बीच किसुनलाल साबेक जुटि खोलि भिजौने आबि दलानक आगूमे वैसि खरड़ै लगल। कान्हपर कुड़हरि नेने सोधन आबि करियाकाकाकेँ पुछलकनि- “भैया, बाँस कटवै।”
“के सभ जाइ छह?”
“कएक टा कटबै?”
“रौ बुड़िबक, इहो पुछैक गप्प छी। खूब नमगर-चौड़गर चचड़ी बनवैक अछि। कोन चीजक कमी भैयाकेँ छन्हि जे मचोड़ि-सचोड़ि कऽ घरसँ बहार करबनि। कमसँ कम तँ चारिटा बाँस आनह। दूटा मुठवाँसी आ दूटा छिपगर लऽ आनह।”
“कोन बीटमे कटबै?”
“ऐना अनाड़ी जेकाँ किअए पूछै छह। तोरा कि नै देखल छह?”
“से तँ सभटा देखल अछि। साले-साल काटि कऽ लऽ जाइ तइओ ने देखल रहत। आकि आबे विसरि जाएब। जहिना जेठ भैया जीवैतमे छलाह तहिना तँ आगूओ रहता की ने। पाँचटा बाँस साले-साल सोझहोमे कटै छलिएनि परोछोमे कटबनि। मुदा से ने कहलौं। कहलौं जे हरोथक बीटमे कटवै कि चाभमे?”
सोधनक बात सुनि करियाकाका गुम्म भऽ सोचए लगलथि। मुदा बुझल-गमल काज तेँ सोचैमे देरी नहि लगलनि। मुस्की दैत कहलखिन- “हरोथ मरदनमा बाँस होइए छाती धरि मोंछ-दाढ़ी रहै छै। ओकरा चिक्कन बनबैमे देरी लगतह। संगे एकटा आरो ओजार -पगहरिया- तीनि दिन जहल चलि जाएत। काजक घरमे सभ चीजक काज बढ़ि जाइत अछि।”
करियाकाकाक बात सुनि हँसैत सोधन वौकू दिस बढ़ल कि तखने धड़-फड़ाएल दुनू परानी लेलहा आएल। अपनाकेँ अपराधी बुझि करियाकाकाक आगूमे ठाढ़ भऽ गेल। करियाकाका बुझि गेलखिन जे भरिसक कतौ गेल छलै तेँ पछुआ गेल। आगू चलैबला जँ पछुआ जाइत तँ तेकर कारण होइ छै पछिला काज। मुस्कुराइत कहलखिन- “चेला, अखन धरि सुतले छेलह?”
ठोर विचकबैत लेलहा कहलकनि- “काका, कतेक दिनक पछाति आइ काज लागल। वएह करैले चलि गेल छलौं।”
“कोन काज करए गेल छेलह?”
“घुरना भैयाकेँ आठ गो मझोलके शीशो गाछ छै वएह पांङेले गेल छेलौं। एक ते एहन गाछ नै देखलौं। सदिकाल चुट्टी आ घोरन लड़ाइये करैत रहैत अछि। मुदा आइ तँ अद्भुत देखलौं। चारिटा गाछपर ने चुट्टी ने घोरन छलै। मुदा एक भागक दूटा गाछमे लोहाड़ि रहए आ दूटा पर घोरन। तीनिटा तेँ पांगि नेने छलौं कि सोनमा माए दौड़ल आबि कऽ कहलक। जे रघू दादा मरि गेलखिन। छिप्पी दिससँ थोड़े पांगि नेने रही। सोचलौं जे उतड़ैमे ओते घोरन कटबे करत जते कटैक छै...;
उत्तेजित भऽ
....ऐँह काका की कहब पाँखिबला बड़का-बड़का घोरनक छत्ता रहए। ओही पुरवैमे कनी अबेर भऽ गेल।”
“अच्छा की हेतै। अखन ते ढेरो काज पछुआएल अछि। भने टेंगारियो अननहि छह। सोधनक संग जा बाँस काटि आनह।”
“काका, कड़ची टाट बनबैले लऽ लेब। ताबे ओतै बोझ बान्हि कऽ रखि देवइ।”
“बड़बढ़ियाँ।”
“कक्का मूजक काज तँ सेहो ने हएत।”
“भने मन पाड़ि देलह। बिसरले छेलौं।”
घरवालीकेँ लेलहा कहलक- “पहिने दुनू गोटे काकाकेँ दर्शन कऽ लिअ। तखन हम बाँस काटए जाएब आ अहाँ मूज नेने आउ। गठूलाक बत्तीमे खोंसि कऽ रखने छी। अधा रखि लेब अधा नेने आएब।”
कहि लेलहा करियाकाकाक कानमे फुस-फुसा कऽ कहलकनि- “कक्का, थाकि गेल छी। पियासो लगि गेल अछि। पानि तँ पीबि लेब मुदा, अखन खाएब कोना। एक बेरि चीलमक भाँज लगा दिऔ।”
लेलहापर करियाकाका बिगड़लखिन नहि! सोधनकेँ आँखिक इशारासँ कहलखिन- “कुड़हरि-टेंगारी लेलहाे आ झोलीकेँ दऽ दहक आ हमर नाम कहि बौकासँ पाँच रुपैआक गांजा लऽ ओतै -बँसवीटी- पीबि लिहह।”
काजक जुति-भाँति लगा करियाकाका बँसवाड़ि पहुँच गेलाह। तीनू गोटे गजोक पीवैक तैयारी करैत आ दुनू बापूत रघुनन्दन-देवनन्दनक तुलनो करैत रहए। सोधन बाजल- “देवनन्दन कतबो पैघ डॉक्टर सहाएब भऽ जेता मुदा, तइसँ की रघू कक्काक परतर हेतनि?”
सोधनक बात सुनि करियाकाका जिज्ञासासँ पुछलखिन- “से की?”
“भरि दिन कक्का महादेव जेकाँ लेन-देन करैत छलाह। डॉक्टर साहाएब बुते से हेतनि।”
चीलममे दम मारि, ऊपर मुँहे धुँआ फेकैत करियाकाका बजलाह- “अपने बात सोधन कहै छिअए। भलेहीं लोक हमरा माइयो-बापकेँ दोख लगा कहि दैत अछि जे जाबे माए-बाप, जन्मदाता भगवान ओ किछु गुण नहि देखलखिन तावे करिया नाम किअए रखि देलखिन। कोनो की हमर देहक रंग कारी अछि। तेँ, हम तँ समाजमे कलंके बनि जन्म लेने छी। कतबो लोककेँ बुझेबै तइओ हमर बात तरे पड़ि जाइत। जकरा बुझा देवइ ओ बुझि कऽ मुँह बन्न कऽ लेत। जेरक-जेर जे जनमि-जनमि कऽ नवका पीढ़ी बनबैत अछि ओ कोना बुझतै? मुदा तइले दुख कहाँ होइए। हम तँ ओहन समाजक लोक नहि छी जे वित्तीय गामक सीमामे घर बना बुझैत अछि। हम तँ ओहि समाजक छी जहिमे जन्मसँ मृत्यु धरिक गाड़ी गुड़कैत अछि। पलहनिक ऐठामसँ लऽ कऽ असमसान धरि।”
जाधरि करियाकाका बजैत रहति ताधरि लेलहा दू दम मारि लेलक। गहूमन सॉपक बीख जेकाँ लेलहा कऽ निशाँ चढ़ि गेल। सोधनक हाथमे चीलम दैत बाजल- “कक्का, एक बेरि पटुआ काटए असाम गेलहुँ। अपना इलाकाक बहुत लोक साले-साल पटुओ आ धानो काटए मोरंग, असाम, ढाका धरि जाइत छल। मुदा हम पहिले-पहिल गेल रही। काकरभिट्टासँ बस पकड़ि सिलीगोड़ी होइत असाम गेलहुँ। एकटा बड़का धार -ब्रह्मपुत्र- देखलियै। बसक कंटेक्टर ओंगरीसँ एकटा पहाड़ देखबैत बाजल जे कामरुप कामाख्या मंदिर ओही पहाड़पर छै।”
चीलम बढ़बैत सोधन पुछलक- “कोन कमख्या?”
सोधनक बात सुनि ठहाका मारि हँसि लेलहा बाजल- “भैया, तोहूँ अनठा-अनठा बजै छह। हौ वएह कमख्या जइ ठीनसँ लोक जोग-टोन सीखि-सीखि अबैए आ अपना इलाकामे मौगी सभकेँ ठकैए। कहतह जे सभसँ पक्का मंत्र हमर कोखिया गुहारिक अछि। शुक्रक बेरागनक दस बजे रातिमे गुहारि करए जेतह।”
सोधन- “ओइ स्थानपर जा कऽ नहि देखलहक?”
“ऐँह, भैया तोहू हद करै छह। जखैन गौहाटी पहुँच गेलौं। तखैन नै जैइतहुँ। गेलौं। ते देखलियै जे चिड़ैसँ लऽ कऽ मनुक्ख धरिक वलि होइए। हँ, ते कहै छेलियह जे जखन बससँ उतड़लौं ते पानि पड़ैत रहै। कनियेँ काल अँटकलौं कि पानि छुटि गेलै चाह पीना बड़ीकाल भऽ गेल रहए। चाह पीवैले मन लुस-फुस करैत रहए। किछु नीके ने लगाए चारु गोटे एकटा चाहक दोकानमे गेलाैं तँ दोकानक सजाबट देखि कऽ किछु ने फुड़ल। अपना इलाकामे ओ सजावट कहाँ अछि।”
सोधन- “केहन सजाबट रहै?”
लेलहा- “दोकानदारेसँ पुछलियै ते कहलक ई बाँसक कैमचीक बनौल छियै। ओकर बनाइ देखि आश्चर्य लगल जे केहेन-केहेन लुरिगर लोक सभ अछि। बाँसेक कुरसी, टेबुल, गिरहक कप बनौने अछि। सिंहदुअरि परक मेहरावकेँ आध घंटा देखैत रहलौं। पथिया-मौनी तँ अपनो इलाकामे बनबैत अछि मुदा, ओहन कहाँ बनवैए। ने ओहन मेघडम्बर बनबैए आ ने ओहन मंदिर नुमा घर...
मुस्की दैत- ...ओम्हुरका बाँसो अजीब अछि। अपनो इलाकामे बीस-पच्चीस रंगक बाँस अछि। मुदा ओम्हर तँ सइयो रंगक अछि। जेहन कड़चीक दतमनि बनवै छह तेहन सऽ लऽ कऽ भरि-भरि पाँजक देखवहक। पालकीमे जे बाँस देखै छहक, बीटक-बीट ओ बाँस अछि। छत्ता बेट बनवैबला सेहो अछि। पुरान-पुरान बाँसक बीट सभ फुलाएल-फड़ल सेहो अछि।”
चीलमो सठल। उठैत करियाकाका बजलाह- “बेसी देरी नहि लगबिहह। हम ताबे आगू बढ़ै छी।”
करियाकाकाक बात सुनि लेलहा- “कक्का जहिना पानि उतड़ल कोदारि, खुरपी, हँसुआ इत्यादिसँ काजो कम होइत आ भीरो बेसी होइत। तहिना पनिउतड़ू पुरुख आ पनिचढ़ू पुरुखक काजमे होइत अछि। एत्तेकाल पनिउतड़ू छलौं आब पानि चढ़ि गेल। अहाँ पहुँचवो ने करब कि तइसँ पहिने हमसभ पहुँच जाएब। मुदा एकटा बात कहि दइ छी “रघू कक्का गामक मेह छलाह।” ई अंतिम काज समाज कऽ कान्हपर अछि तेँ नीक जेकाँ होिन।”
चारिटा बाँस काटि तीनू गोटे पहुँचल। दुनू मुठबाँसीक दूटा बल्ला बनौलक। वाकी दुनू छिपगरहा फट्ठा बनबैले टोनए लगल। दू गोटे टोन बनबै आ दू गोटे दू-दू फाँक कऽ फट्ठा बनबए लगल।
रघुनन्दनक मृत्युक समाचार सुनि दियादीक बीच चुल्हि बन्न भऽ गेल। मुदा दियादमे एकरुपता नहि। जहिक चलैत किछु चुल्हि बन्न भेल आ किछु जरिते रहल। गाममे सभसँ नमहर दियादी रघुनन्दनक छन्हि। से कोनो एकाएक आइये भेलनि, से नहि। पहिनेसँ चलि अबैत छन्हि। पहिलुका रुतबा आब नहि छन्हि मुदा, तइओ गामक लोक मने-मन बुझैत अछि। पहिलुका रुतबा कमैक कारणो भेल। बेटीक बाढ़ि एने किछु परिवार तँ उपटिये गेल जे जहियासँ सतना आ रमचन्द्रा भेल तहियासँ तँ आरो दियादी घिना गेलनि। दुनू ऐहन भेल जे गामक कोन बात जे अपनो कुल-खनदानक बहीनिकेँ बहीनि नहि बुझैत। जहिसँ आनो-आनो आ अपनो परिवाक बूढ़-पुरान “छगड़ा गोत्र” कहए लगलथि। एहि सभ दुआरे रघुनन्दनोकेँ दियाद-वादसँ ओते मेल नहि रहनि जते सभ चाहनि। एकटा बात अखनो जरुर अछि जे आन दियाद आन जातिसँ कोनो तरहक झगड़ा-झंझटमे सभ एक भऽ जाइए। अखन धरि एते जरुर निमाहैत एलनि जे अर्थी-लहासकेँ अपने दियाद उठा कऽ अंगनासँ गाछी लऽ जाइत छथि।
अखनो गाममे सभसँ अधिक पढ़ल-लिखल दियादी-परिवार देवनन्दनेक छन्हि। मुदा गुरुकाका आ पढ़ुआ भैया ओछाइने धेने छथि। जहिया दयाकान्त डॉक्टरी पढ़ि नोकरी शुरु केलनि तहियेसँ धिया-पूताक संग गाम छोड़ि देलनि। तहिना उमाकान्तो इंजीनियरिंग पढ़ि केलनि। आब तँ सहजहि चलनिये माने फैशने भऽ गेल अछि साधारणो नोकरी केनिहार सभ गाम छोड़ि दइए। उमेरे तँ गुरुओ काका आ पढ़ुओ भाय बूढ़ नहिये भेलाहेँ मुदा, सोगे दुनू गोटे ओछाइन पकड़ि लेलनि। नीको मन रहै छनि तइओ घरपर सँ कतौ नहि जाइत छथि
अखुनका लोकक माने मर्द-औरतक जे छिछा-बिछा देखै छथिन तहिसँ मन सदिखन खसले रहै छन्हि। नवका लोको तेहने भऽ गेल अछि जे नीक विचार, नीक काजकेँ शब्द मात्र बुझैत छथि ओकर व्यवहारिक पक्षक गुणकेँ नहि बुझैत छथि। बुझवो कोना करताह? जे कोनो फल काज केलाक उपरान्त भेटैत अछि ओ बिनु केने कोना भेटि सकैए। दियादीक परम्पराकेँ निमाहैक लेल सुखदेब देवनन्दन लग आबि कहलखिन- “बौआ देव, अहाँ बच्चा छी तेँ दियादीक परम्परा कऽ नै बुझै छियै। अखन धरि अपना दियादीमे चलनि रहल जे लहासकेँ आंगनसँ गाछी अपन परिवारक -दियादीक- समांग अठा कऽ लऽ जाइत अछि।”
सुखदेवक बात सुनि देवनन्दन किछु नहि बजलाह। मुदा कातमे ठाढ़ करियाकाका मुस्कियाए लगलाह। मनमे नचैत रहनि जे अखन गाममे छथि तेँ बेसी फुड़ै छन्हि। देह तेहन बनौने छथि जे अपन धोधि सम्हरबे ने करैत छनि, डॉड़सँ धोती ससरि-ससरि खसैत छन्हि आ रुआब बब्बेबला छन्हि। देवनन्दन दिशि देखि सुखदेवकेँ कहलखिन- “हओ सुखदेव, भाय-सहाएब जाति-दियादसँ आगू बढ़ि समाजमे छथि तेँ कियो अपन करबह। जँ तोँ गाछिये लऽ जेवहुन तँ एहिमे अधला की? इहो ते एकटा काजे भेल। लेकिन खाली बजनहिटा सँ ते नहि हेतह। तहि लेल संगोरो करए पड़तह।” कहि करियाकाका मुँह चुप कऽ लेलाह किन्तु मनमे अबैत जे- जिनगी वितलनि वौहुक संग सिनेमा देखैमे आ ऐलाहेँ अपनत्व बुझैले। कोनो गत्रमे लाजो ने होइ छनि। मुदा एहि गप्पकेँ मनहिमे राखि बात बदलैत फेरि बाजलाह- “जाधरि हम सभ ऐम्हुरका ओरियान करै छी ताधरि तहूँ संगोर केने आवह।”
तहि बीच सुन्दर काका धड़फड़ाएल पहुँचलाह। दुनू ममिऔत भाय परसू कपड़-फोड़ोबलि कऽ नेने रहथिन ओहिक जिज्ञासामे गेल रहथि। दुनू ममिऔतक बीच डेढ़ कट्ठा घरारी। बीच गाममे घर छनि। गामो गदाल तेँ एक्को घुर घरारी कीनब असाध छनि। के अपन घर तोड़ि देतनि। ओना बाधमे पाँच बीघा खेत छनि मुदा धरारीक सुखे तँ असकरे बाधमे नहि बसताह। नानाक परिवार समटल रहने अइल-फइलसँ रहै छलाह। मालोक थैर नारक टालो बना लैत छलाह। इनारो अंगनाक कोनेमे रहनि। मुदा अपना परोछ होइते मनुक्खक बाढ़ि घरमे आबि गेलनि। दुनू भाँइ भिनौज कऽ लेलनि। करबो नीक बुझि पड़लनि। करमी लत्ती जेकाँ जेठका भायकेँ परिवार चतड़ि गेलनि। भगवानो दहिन भऽ सातटा बेटा आ छहटा बेटी देलखिन। पढ़वैक तँ कोनो समस्ये नहि जे विआहो-दान पछुआएले रहनि। मुदा तइओ घरक अभाव बुझि पड़ए लगलनि। अपने टी.बीक रोगी। धिया-पूता जनमबैत घरोबाली तेहने। मुदा जहिना क्रोध तहिना जेठ हेवाक रुआब मनमे दुनू गोटेकेँ रहबे करनि। छोट भाएकेँ दूटा बेटे टा। तेँ, कोनो तरहक अभाव नहि बुझि पड़नि। एक पीठिया पाँचो भाँइ लाठी उठौलक। समांगक पातर छोट भाए, कपार फोड़ा लेलनि। मुदा घरवाली बदला लइये लेलखिन। पहिने भायक चानिपर खापड़ि फोड़ि दियादिनीपर कनखा पटकैत कहलखिन- “भरि दिन आहि-आलम करैत रहतीह आ राति कऽ केहन सुरखुड़ू भऽ जाइ छथि।”
छोट दियादनिक गारि सुनि तँ उनटवै चाहलनि मुदा, तावे टोलक लोक सभ आबि झगड़ा छोड़ा देलकनि। ओहि झगड़ाकेँ निपटवैक लेल सुन्दरकाका गेल रहथि। मात्रिकेमे पता लगलनि जे रघुनन्दन भाय देश छोड़ि देलनि। मामकेँ पनरह दिनक समए दऽ आबि गेलथि। गाम अबिते अंगा, चप्पल निकालि धोतीक खूँट देहपर लऽ विदा भेला। अंगनासँ निकलिते पता लगलनि जे लहास अंगनेमे अछि तेँ गाछी दिसक रास्ता छोड़ि घरे दिसक पकड़लनि। डेढ़ियापर पहुँचते करियाकाका सोझमे पड़ि गेलखिन। पुछि देलखिन- “काज सूढ़िआएल छह कि पछुआएल छह?”
नजरि घुमबैत करियाकाका कहलखिन- “ऐम्हुरका काज तँ डोरिआएले अछि मुदा......?”
“बड़वढ़ियाँ? कहि सुन्दरकाका आगू बढ़ि रघुरन्दन लग पहुँच गोड़ लागि ठोर पटपटवैत फुसुर-फुसुर कहलखिन- “जिनगी भरि संगे रहलौं तेँ जँ किछु ऊँच-नीच भऽ गेल हुअए ते विसरि जाएब।” कहि सुभद्रा दिशि देखि मुस्किया कऽ कहलखिन- “भौजी।”
सुन्दरकाकाक बोली सुनि सुभद्रा आँखि मिलवैत कहलखिन- “बच्चा।”
सुभद्राक मुँहे “बच्चा” सुनि सुन्दरकाका चोट्टे अंगनासँ निकलि देवनन्दन लग आबि कहलखिन- “वाउ देव, दुनू भाँइमे तीनिये मासक जेठाइ-छोटाइ अछि। बच्चेसँ दुनू भाँइ संगे बितेलहुँ। सभ ओरियान तँ देखि रहल छी मुदा, भजनियाँ सभ कहाँ अछि। मृत्यु सोगे नहि खुशियो होइत अछि। खुशी तँ तखन होइत जखन खुशीक काज होएत। भाय-सहाएव अपनो रामाएण, महाभारत गबैत छलाह। संगे भजनियो-कीर्तनियाँक सेहो सुनैत छलाह। आइ जखन दुनियाँ छोड़ि रहलाहेँ तखन पाँचटा भजनो किअए नहि संग कऽ दिअनि।”
सुन्दरकाकाक विचार सुनि देवनन्दन अवाक् भऽ गेलाह। मने-मन विचारि कहलखिन- “कक्का, सभ बात तँ समाजक वुझैत नहि छी तहन ते करियाकाका जेना-जेना करैत छथि, से देखै छी।”
देवनन्दनक बात सुनि सुन्दरकाकाक मनमे एलनि जे भरिसक किसुनलालकेँ नजरिमे नै एलै। मन लहरए लगलनि। जोरसँ तँ नहि मुदा, आस्तेसँ बजलाह- “सुआइत लोक ओकरा कन्हा कहै छै। जेम्हरे देखत ओम्हरे बरिसत।” टाटक अढ़सँ किसुनलालो सुन्दरकाकाक बात सुनलनि। मुदा किछु टोक-टाक नहि केलनि। भजनियाकेँ बजवैले सुन्दरकाका विदा होइत जोरसँ बजलाह- “किसुन, भजनिया ऐठाम जाइ छी ताबे ऐठामक ओरिआन करह।”
किछु दूर आगू बढ़लापर मन पड़लनि कि घुरि गेला। सुन्दर भायकेँ घुमैत देखि किसुनलालकेँ भेलनि जे भरिसक किछु गंजन बाकी रहि गेल से करैले घुमलाह। डोलैत छातीकेँ असथिर केलनि। मुदा भऽ गेल उन्टा। जहिना किसुनलाक मन गंजन सुनैले मन्हुआएल तहिना सुन्दरो भायक किसुनलालसँ पूछैले मन्हुआएल। लगमे आबि पुछलखिन- “किसुन, समरथाइमे तँ साज-बाज बला भजन-किर्तन सुनए छलौं मुदा, आब तँ मने-मन गबै छी। अखन के सभ गबैया अछि?”
अपन पुछब सुनि किसुनलाल उत्तेजित भऽ कहलखिन- “आब की कोनो कमी छै। एते दिन ढोल-पीपहीपर जीबछ भाय गबैत छलाह। गुणापर छीतन आ रंगलाल सिंगा बजवैत छलाह। तीनूकेँ भाय-सहाएबसँ अपेछा छलनि। तीनू जीविते अछि, तेँ तीनू गोटेकेँ कहि देव आवश्यक अछि।”
दुनू गोटे गप-सप्प करिते रहति कि बाँस-टेंगारी रखि लेलहा आबि बाजल- “कक्का, एक बेरक खिस्सा कहै छी। भैयाक विआह रहए। बाउ हमरा लोकनियाँ जाइले कहलक। अपन मन वरिआती जाइक नै रहए। किऐक ते रजकुमराक विआह रहए। बच्चे रही। बिनु कहनहि बरिआतीक पछोर लागि गेलौं। अखुनका जेकाँ गाड़ी-सवारी थोड़ै रहै जे उताड़ि दइत। घरवारी ऐठाम पहुँचलापर हमरो गिनती भऽ गेल। भुजल बदाम, आ चूड़ा जलखै देलक। लूँगी मिरचाइ तेहेन कड़ू रहै जे ओहि लाटमे खूब खेलौं। रातियोमे खूब खेलौं। गद्पर गद् भऽ गेल। अफरि गेलौं। मन हुअए जे खूब फलिगर विछान होइत तँ ओंघरा-ओंघरा सुतितौं। दलान छोट रहए। चेतन सभकेँ ते दलानपर अँटाबेश भऽ गेलै मुदा, बच्चा सभकेँ जगहे नै भेलै। पछाति घरवारी मालक घरसँ मालकेँ निकालि बहरामे बान्हि देलक आ ओहिमे पुआर पसारि बिछान कऽ देलक। ओछाइन देखि मन खुशी भेल। एक कातमे पहिने जा कऽ जगह पकड़ि लेलौं। कत्तू रातिमे घरबारी छौंड़ा सभ आबि टीकमे चिड़चिड़ी आ देहमे कबछुआ पत्ता रगड़ि देलक। लगवै काल नै बुझलियै मुदा, जखन चुलचुलाए लगल कि नीन टुटल। बोरामे कसल धान जेकाँ पेट रहए। कुरियवैबला हाथ दुइयेटा रहए, आ कुरिआए सगरे देह। उठि कऽ ठाढ़ भऽ निच्चाँसँ उपर कुरियाबए लगलौं कि माथपर हाथ पड़ल। दुनू हाथ देलियै कि सौँसे माथ मानी-चानी सुपारी जेकाँ बुझि पड़ल। टोबैत-टोबैत ओंगरी टीकपर गेल कि मौगीक खोपा जेकाँ बुझि पड़ल। एक भागसँ चिड़चिड़ी टीकमे छोड़बी तँ दोसर दिस पकड़ि लिअए। ऐम्हर सौँसे देहो चुलचुलाइत रहए। तइपर सँ हुअए जे पेट फुटि जाएत। महा-मोसकिलमे पड़ि गेलौं। तामस उठि गेल। दुनू कान पकड़ि सप्पत खेलौं जे बरिआती नै जाएब। मुदा फेरि मनमे आएल जे अगर हम नै ककरो बरिआती जेबै तँ हमरा के जाएत? जँ बरिआती नै जाएत ते विआह कना हएत? कोनो कि ककरो फुसला कऽ मंदिरमे जा, कए कऽ लेब आ पछाति पनचैतीमे लाठी खाएब। बिनु बरिआतिये विआह केहन हएत?” विआहक गवाह के हएत? कहियो कोनो भगड़ा हएत तँ पनचैती के करत। एक तँ सगरे देह नोचैत तइपर सँ विआह मन पड़ि गेल। विआह मन पड़िते मनमे उपकल जे जाबे दुख नै काटब ताबे बोहूक सुख कना हएत?”
मुस्की दैत करियाकाका कहलखिन- “तोहूँ सभ दिनक ढहलेले-बकलेल रहि गेलेँ। भैयाकेँ की कहै छहुन से ने कहबहुन?”
करियाकाकाक बात सुनि लेलहाक मन नोचनीसँ हटि भायक विआहपर पहुँचल बाजल- “जखन बाउ कहलक जे लोकनियाँ जइहेँ, तखनेसँ आँगी-पेन्ट साफ करैक मन भेल गामपर तँ फटलौ-पुरान आ मैलो-कुचैल पीहिन लइ छी। बरिआतीमे ते छौँड़ी सभ पीहकारिये मारत। उसराहा परतीपर सँ उस आनि माएकेँ कहलियै खूब नीक जेकाँ उसैन दइले। जखन उसैन देलक आ सरेलै ते पोखरिक घाटपर जा कऽ खूब उज्जर कऽ खीचिलौं। दू ठीमन अंगा फाटल रहए। माएकेँ सी दइले कहलियै। काकीसँ सुइयाँ आनि पुरना साड़ीक पाढ़िसँ डोरा निकालि सीवि देलक।”
काजक धुमसाही देखि करियाकाका कहलखिन- “अखन कते पछुआएल छह सेहो बुझै छहक। जे कहैक छह से झब दे कहुन?”
लेलहा- “हँ ते काका, विआहसँ दू दिन पहिने रघुनी काका आबि बाउकेँ कहलखिन जे जेहने बेटा-बेटी धनिकक तेहने तँ गरीबोकेँ। माए-बाप तँ माइये-बाप होइत। सबहक हृदय तँ भगवान एक्के रंग बनौने छथिन। बेटा-बेटीक विआहमे तँ सभकेँ एक्के रंग मनोरथ होइत अछि। गामेमे सिंगहरिया बाजा अछि। एकटा सोहनगर बजो भऽ जेतह आ ओहो बेचारा -रंगलाल- समाजक संग खेबो करत आ हँसि-बाजि कऽ बिताइयो लेत।”
काकाक बात सुनि बाबू कहलकनि- “ओ-सिंगाबला तँ रुपैइयो लेत, से कतएसँ देवइ।
तइपर रघुनन्दन काका कहलखिन- “हमरा संगे चलह। कहि देवै जे समाजक काज छिये तेँ नहि पान तँ पानक डंटियो लऽ कऽ काज सम्हारि दहक। रुपैया नै ने हेतह मुदा, खाइले ते देतह।”
सएह भेलइ। दुआर लगैसँ पहिने, रस्तेमे हमरा कहि देलक जे वौआ, नाच देखा देवउ। तूँ हमरे लग रहिहेँ। जखन बर दुआर लागल कि सौँसे गामक बुढ़िया-सुढ़िया सभ चंगेड़ामे चरि-मुँहा दिआरी बारने भैया लग गीत गबैत रहए। जते ढेरबा आ समरथकी सभ रहए ओ पाछूमे हाँ-हाँ, हीं-हीं करैत रहए। चुपेचाप रंगलाल काका बीचमे सन्हिया गेलखिन। हमहूँ पाछू-पाछू गेलौं। अन्हार रहबे करै कि एके-बेरि खूब जोरसँ सिंगा फूँकि देलखिन। तते जोरसँ अवाज भेलै जे सभटा पड़ाएल। एक्के बेरि जे पड़ाएल कि ऐँड़ी-दोरी लगलै। एकटा खसल कि ओहिपर भेड़ी जेकाँ खसए लगल। जहिना अन्नक ढेरी लगबै काल पथिया-पथिये उपरसँ देल जाइ छै, तहिना। हमहूँ बीचमे पड़ि गेलौं। ठाहाका मारि पुनः बाजल- “काका की कहब? दसटा सँ बेसिये ढेरबासँ अधवयसू धरि तरोमे रहए आ उपरोमे। तते भारी लगै जे कनैए लगलौं।”
मुस्की दैत करियाकाका- “धुर बूड़ि, ऐहने पुरुख।”
“ताबे ते बच्चे रही की ने...
मुस्की दैत- “से कि कोनो हमहींटा कनैत रही आकि तरमे पड़ल सभ कनैत रहए।”
“आ उपरका?”
“ओ सभ ते खिखिर जेकाँ हँसैत रहए। तेँ काका, ओहो बेचारा आब चौथापनेमे अछि। आब ते नबका-नबका बम्बैया बजन्त्री सभ भऽ गेल ओकरो कहि देवइ कक्का।”
सुन्दर काका- “अच्छा, तूँ सभ एम्हुरका काज सम्हारह, हम ओम्हर जाइ छी।” सुन्दर काका विदा भेला कि करियो काकाकेँ मन पड़लनि। बाजलाह- “भाय, कने सुनि लिअ। एक गोटे छुटि जाएत।”
“के?”
“छीतन भाय।” एक दिनक बात मन पड़ल। अगहन मास रहए। धुरझाड़ धन कटनी चलैत रहए। एक्के ठीन हमहूँ रही आ भइयो रहथि। हुनका जन रहनि हम अपने कटैत रही। करीब-बारह-एक बजे छियै। दुनू परानी छीतन भाय सुगर हहकारने खसलाहा खेतमे चरैले छोड़ि गुना नेने भाय-सहाएब लग पहुँचलथि। काटल धान जे पसरल रहए ओहिपर दुनू परानी बैसि गुना टुनटनबए लगला। भैया कहलनि- “बटु, तमाकुल खाए लाए।” एलौं। खूब बढ़िया जेकाँ तमाकुल चुनेलौं। दुनू भाइयो खेलौं आ छीतनोकेँ देलियै। छीतन घरवालीकेँ कहलक- “भायक धानमे अपनो सबहक साझी अछि कि ने। पाँचटा गीत सुना दिअनु। दुनू परानी गुनापर गीत गबए लगलाह। से कि कहूँ भाय, हुअए जे दुनू गोटेकेँ हाथसँ उठा माथपर लऽ ली। ओहन सिनेहसँ कहियो नहि सुनने छलौं, जेहन सुनलौं। राजा भरथरी आ पिंगलाक गीति गौने रहए। बेचारा जीविते अछि। ओहू वेचाराकेँ कहि देवइ।”
“बड़वढ़िया” कहि सुन्दरकाका आगू बढ़लाह। जीबछक घर पहिने पड़ैत रहए। जीबछक ऐठाम पहुँच जीबछकेँ कहलखिन- “भाय, रघू-भैया दुनियाँ छोड़ि देलनि। अपन बाजाक संग चलह।”
सुन्दरकाकाक बात सुनि घरवालीकेँ सोर पाड़ि जीवछ कहलक- “गिरहत वौआ मरि गेलखिन। छौँड़ा सभकेँ सोर पाड़ियौ। सभ बापूत जाएब।”
बेटा-भातिजकेँ बजबए मुनियाँ विदा भेलि। सुन्दरकाकाकेँ जीबछ कहए लगलनि- “भाय, एक दिनक गप कहै छी। माध मास रहए। शीतलहरी लागल रहए। जहिना दिन तहिना राति। दिनोमे नइ खेने रही। जाड़े बुझि पड़ए जे मरि जाएब। घुरले जरनो सठि गेल। की डाहब से रहवे ने करए। बिछानमे पुआर देने रहियै, बस ओतबे रहए। मन हुअए जे ओकरे जरा ली फेरि हुअए जे जखैन आगि मिझा जाएत तखन सुतब कतऽ। भुखे मन सेहो छटपटाइत रहए। दुनू परानी गिरहत बौआ अइठीन गेलौं। रघुनन्दन बौआ करसीक बड़का घुर मालक घरमे लगौने रहथि। अपनो बैसल रहथि। हिनका लग पहुँचैक डेगे ने उठाए। जी-जॉति कऽ खरीहानेसँ सोर पाड़लिएनि। घुरे लगसँ कहलनि ऐम्हरे आवह। गेलौं। खेबो केलौं आ मालेघरमे घुरे लग बिछान विछा सुतबो केलौं। जँ कनियो कानमे भनक लागल रहैत तँ अपने आबि जइतौं मुदा, अखैन तक नै सुनने छलौं। चलू-चलू पीठेपर चलै छी।”
ढोल-पीपही लऽ जीवछ, गुना लऽ छीतन आ सिंगा लऽ रंगलाल पहुँच, अपन-अपन बाजा बजबए लगल। जहिना बेटीक विआहमे सोहनगर गीत गाओल जाइत, तहिना वाजाक मुँहसँ निकलए लगल। घरे-अंगना नहि गामक वातावरण महमह करए लगल। बाजाक धुनपर कियो घुनघुना-घुनघुना गीति गबैत तँ धिया-पूता नचैत। बूढ़-बुढ़ानुस मने-मन रघुनन्दनकेँ स्मरण करैत तँ टूटैट संबंध परिवारक गार्जन सभ देखैत।
धड़फड़ाएल फोच भाय आबि देवनन्दनकेँ कहलखिन- “डॉक्टर सहाएब सभ किछु तँ ओरियान देखै छी मुदा, “सरर, आ घी, कहाँ अछि?”
फोच भायक बात सुनि देवनन्दन उत्तर देलखिन- “करियाकाका, सुन्दरकाका सभ ओरियान कऽ रहल छथि। हुनके उपर सभ भार छन्हि। बजा कऽ पुछि लिअनु।”
एकाएकी करियाकाका, सुन्दरकाका, लेलहा, बचनू देवनन्दन लग ऐलाह। करियाकाकाकेँ अविते फोच भाय पुछलखिन- “कारी-भाय, सभ काज तँ समटाएले बुझि पड़ैत अछि मुदा, घी आ सरर, नहि देखै छी।”
फोच भाय पाही जमीन्दारक मुँहलगुआ। ओना ने आब जमीन्दारी अछि आ ने जमीन्दार। मुदा एक साए पाँच बर्खक ढीला बावू जीविते छथि। खेत-पथार तँ कमि गेलनि मुदा, दरवारी चालि छन्हहेँ। अखनो भाँग पीसै, पान लगबै, मालिश करै, संगे टहलै आ भानस करैले नोकर रखनहि छथि। वएह संगे टहलैबला फोच भाय।
फोच भायक गप्प सुनि करियाकाकाक मन नाचए लगलनि। सुन्दरकाका मने-मन खुश होइत जे भने हमरा नहि पुछलनि। करियाकाका मनमे अवए लगलनि जे आँखिक सोझमे देखै छी जे कियो लहासकेँ धारमे फेकैत अछि तँ कियो धारक कातमे गारैत अछि। कियो आमक लकड़ीसँ जरवैत अछि तँ कियो बगुरसँ। कियो संठी-गोइठासँ जरबैत अछि ते कियो मुँहमे आगि छुवा गाड़ैत अछि। तहि ठाम सरर आ घीउक कोन जरुरत अछि।
फोच भायक बात सुनि बचनू बाजल- “फोच काका, अपन कएल काज कहै छी। नानी मरि गेलि। ओना मरैसँ तीनि दिन पहिनहिसँ दुनू माय-पूत ओतै रही। आँखिक देखल नानाक गाछी अछि। जइ साल अपन गाछी नइ फड़ैत छलए। तइ साल चलि जाय छलौं। खूब मारि-धुसि कऽ डेढ़ मास खाइ छलौं। तेसर साल जे कोसी नाश केलक ओहिमे मामाकेँ के कहे जे इलाकाक गाछी-कलम, बँसवारि उपटि गेल। अंगनाक सभ नानीकेँ मुइने कनैत रहए आ मामा जरबैक लकड़ीले कनैत रहथि। कानब दू रंग बुझि पड़ए। जहिना एक धुनक गीत भिन्न-भिन्न गवैयाक मुँहेँ एक्के स्वरमे गाओल जाइत। तहिना तँ मरैयोक अछि। मामाक कानब सुनि लगमे जाए पुछलिएनि। तँ कहलनि जे भागिन माए मरि गेलीह तेकर दुख नहि अछि। दुख तँ तखन ने होइत अछि जखन माए-बापकेँ अछैत बेटा-बेटी मरैत। मुदा अपन जे पूबरिया गाछी छलै ओ माइये-बावूक रोपल छलनि। बाल-बच्चा जेकाँ दुनू गोटे सेवा कऽ लगौने रहथि। उत्तरवारि भाग एक-पाँति सरही आम लगौने रहथि आ सौँसे कलम कलमी रहए। मुदा सरही तँ सरहीये रहए। एकदम बड़वड़ीया। कनियेँ-कनियेँटा आम होय। तहूमे गोटे-गोटे मीठ होय नइ तँ सभ खट्टे। मुदा कलमीक चुनल रहनि। अगते रोहणिसँ गुलाब खास आ डोमा बम्बै पकऽ लगए। जाबे सठवो ने करए तावे कृष्ण भोग, लड़ूवा पाकब शुरु भऽ जाए। पीठेपर मालदह पकए लगैत। मालदह सठवो ने करै कि कलकतिया पकए लगैत। पाल परक कलकतियासँ सभ साल आद्रा पावनि हुअए। कलकतिया सठिते फैजली मोहर ठाकुर आ राइर पकए लगए। एहि हिसाबकेँ देखि पुछलिएनि ते कहलनि जे वौआ सभ रंग आमक जरुरत होइत अछि। जखन जारैनिक जरुरत हेतह ते कलमीक डारि कटैमे मात्सर्य लगतह। मुदा सरहीमे से नै हेतह। हँ सरहियोमे तखन हेतह जखन कलमिये सन नम्हरो आ सुअदगरो रहतह। जरनाक जरुरत चुल्हियो आ मुरदो डाहैमे हेतह। केबल जरबैएेक काजटा तँ नहि अछि। मुइलाक बाद गाछोक उत्सर्ग होइत अछि। तहि लेल तँ बड़वड़िये नीक अछि। मुदा काटि कऽ जरबैक बात तँ जँचल मुदा, उत्सर्ग नहि जँचल। हुनकर लगौल छलनि। अपना विचारसँ लगौलनि। कोसीक विकराल बाढ़िसँ पहिने नाना मरल रहथि तेँ हुनका सुकाठ माने सरही आमक लकड़ीसँ जराओल गेलनि। एक-एकटा गाछ पुरहितो-पात्रकेँ देलिएनि। हुनका तँ सोलहो आना गाछी रोपैक फल भेटि गेलनि। मुदा माएकेँ कोना जराएब आ की दान देबइ। मामाक बात सुनि दुखो भेल आ तामसो उठल। जखन छल तखन भोगलौं। अखन नइए तँ कानव किअए? कहलिएनि- “मामा जँ कनलासँ दुख भगितै आ सुख भेटितै ते एहिना ई दुनियाँ रहितै। अनेरे अंगनामे रखने छी आ कनै छी। चलू, हमरा सभ लूरि अछि। खाधि खुनि गोरहोसँ जरबैक लूरि अछि आ सनठियो-मनेजरसँ, सुकाठोसँ जरबैक लूरि अछि आ कुकाठोसँ। अगवे वाँसो-कड़चीसँ।”
बचनूक बात सुनि सभ ठमकलाह मुदा, फोच भायकेँ तामस चढ़ि गेलनि। दाँत पीसैत बजलाह- “साओनमे जनमल गीदर भादवमे आएल बाढ़ि तँ कहलक जे ऐहन बाढ़ि देखबे ने केलहुँ। देखैत-देखैत दाँत-पोन झड़ि गेल हमर आ सिखवै छेँ तूँ।”
करियाकाका सुन्दरकाका दिस तकलनि। सुन्दरकाका पहिनहिसँ करियाकाका दिस देखैत रहथि। दुनू गोटेँकेँ फोच भाय िदससँ नजरि हटल देखि लेलहा फोच भायकेँ चोहटैत बाजल- “फोच भैया, अहाँकेँ ओतवे काल धरि भैया कहब जते काल अहूँ छोट भाए बुझब। अहाँक देहमे हजार रुपैआक कपड़ा, हजार रुपैआ घड़ी आ दस हजारक मोवाइल अछि। मुदा हमरो दिस देखू। रघूकाका आ देव भायसँ हमरो ओते अपेछा अछि जते अहाँकेँ अछि। अहाँ कहने हम पड़ा जाएब से बात नहि। अंतिम संस्कार कइये कऽ जाएब। ने काज अहाँ परिवारक छी आ ने हमरा परिवारक। काज करए ऐठाम ऐलौंहेँ घरवारी जना आदेश देताह तना कऽ देवनि। अहाँ फुचफुचेने की हएत?”
लेलहाक बात सुनि फोच भाय सहमलाह। भाषा बदलैत बजलाह- “ऐह, खिशिया गेलह लेलहू। दस गोटे जखने एकठाम बैसलौं तखने दस रंगक गप चलत। तहि लेल एते बिगड़बाक कोन काज अछि। ऐहन-ऐहन छोट-छीन गपक लेल समाज टूटि जाइत। जहिना सभ एकठाम रहैत एलहुँहेँ तहिना आगूओ रहब की ने।”
वातावरण ठंढ़ाइत देखि सुन्दर काका दरवज्जासँ उठि जीबछ लग पहुँच, कहलखिन- “बटगबनीक समए आएल जाइत अछि। धियान राखब।” कहि दरवज्जापर आबि करियाकाकाकेँ कहलखिन- “किसुन, अखन बैसैक समए नहि अछि। बैसलासँ काज पछुआएत।”
“हँ-हँ, से तँ ठीके” कहैत करियाकाका उठि गेलाह। करियाकाकाकेँ उठितहि एका-एकी कतेक गोटे उठि गेलाह। मने-मन फोच भाय जरल जाइत रहथि। ठोर पटपटबैत- “जकरा जे मन फुड़ै छै से करैए। ने बजैक ठेकान आ ने बाप-दादाक कएल काजक।”
दरवज्जापर सँ उठि फोच भाय आंगन दिशि टहलि गेलाह। मनमे अन्हर उठल रहनि। भेल काज -जना चचरी बनाएव- सभपर नजरि-गड़ा-गड़ा देखए लगलथि जे कतऽ कि गल्ती अछि। मुदा नजरि गल्तीक जड़िपर जाइते ने रहनि। जँ से जइतनि तँ इहो बात बुझितथि जे “गल्ती, ओहन व्यवस्था पैदा करैत अछि जे चलनिमे रहैत अछि नहि कि आगूक व्यस्थामे। दरवज्जाक डेढ़ियापर चंचल चचरी बनवैत रहए आ बौकू सावेक जौर बँटैत रहए। आँखि गुड़रि फोच भाय चचरीक लम्बाई-चौड़ाइ देखए लगलथि। फट्ठा बैसवैत मुस्की दैत चंचल कहलकनि- “नजरि नै लगा देवइ, भैया?” चंचलक मुस्की फोच भायक छातीमे महुराएल तीर जेकाँ लगलनि। किछु बोकरए चाहलथि कि तहि काल उत्तरवारि टोलमे जोरसँ हल्ला होइत सुनलखिन। जत्तए जे कियो रहथि कान ठाढ़ कऽ सुनए लगलथि। हल्लाक कारण रहै अढ़ूलिया आपराजितक झगड़ा।
रधुनन्दनक दियादक भगिनमान मनोहरक परिवार। तीनि पुस्तसँ मनोहर एहि गाममे। बाबे आवि सासुरमे बसल रहनि। मुदा जे मनोहरो परिवारक छियै ओहो दियादे जेकाँ काज-उद्यममे संग-साथ दइत। पैछला हाट लौफामे मनोहर बीस हजारमे गाए बेचलक। ओहिसँ नीक बगलेक गाममे तीस हजारमे टोहिया गेलइ। पनरह दिनक समए बना रुपैयाक ओरियान करए लगल। हिसाब जोड़ने जे बीस हजारमे गाए बिकाएल बच्छोक पोसिनदार कहलक जे दुनू बच्छा बेचि हमहूँ गाइये पोसब। बच्छा पोसब तँ ओहि पोसिनदारक लेल अछि जे खेतीयो करैत हुअए। जहिना सभ दिन, नवका कारमे बैसनिहारकेँ आनन्द होइत तहिना नव बड़द जोतिहार हरवाहकेँ। ने गियर बदलैक काज आ ने स्पीड कम बेसी करैक। रहवो किअए करतै, अपन-अपन खेतक यात्रा बीचमे कतौ दू-बट्टी-तीनि-बट्टी नहि पड़ैत। जहि चालिमे जोतए चाहब ओहि चालिमे हर लाधि दिऔ। एक्के बेर खोलै बेरिमे लदहा छिटकवैक काज। बेचारा पोसिनिहारकेँ खेती नइ छै। छोट पूँजीकेँ पैघ बनवैक काज कऽ रहल अछि। मुदा ओही वेचाराकेँ की दोख देवै, जइतै तँ पछिले हाट मुदा, बीमारीक चक्करमे तेना पड़ल अछि जे दुनू बच्छो हलि गेलै। वेचाराक बड़ सुन्दर विचार छै। अपन ढेनुआर गाए (उत्पादित पूँजी) भऽ जेतैक। समयक फेरि देखि मनोहर बीसो हजार रुपैआ देवालमे तख्ता देल आलमारीक ग्रन्थमे रखि देलक। खुल्ला रैक। रैकपर सिर्फ भागवत, देवी भागवत, सुखसागर, योगवशिष्ट, कबीर मन्सुर, बाइबिल, कुरान आ कृष्ण-उद्धव संवाद धरि। कृष्ण-उद्धव संवादमे बीसो हजारीक नोट पन्नामे दऽ दऽ सैंति कऽ राखल। काल्हि दिनमे सोहन आवि मनोहर माएकेँ कहि कृष्ण-उद्धव संवाद लऽ गेल। ग्रन्थ उनटा कऽ देखैक काजे नहि। अविश्वासक कतौ गंधे नहि। साँझमे जखन मनोहर लालटेन लेसि ग्रन्थ निकालए गेल तँ कृष्ण-उद्धव संवाद नहि देखलक। मनमे शंका भेलै। मुदा चोरीक शंका नइ भेलै। लगातार दुनू गोटेक बीच पोथीक लेन-देन होइत। माएकेँ पुछलक- “माए, सोहन भाय किताबो लऽ गेल छथि।”
“हँ।”
“किछु पोथीमे छेलैहियो?”
“खोलि कऽ कहाँ देखिलियै।”
मनोहर गुम्म भऽ गेल। मनमे एलै, अखने जा कऽ बुझि ली। फेरि दोसर मन कहलकै- “पाइयक मामलामे राति कऽ नहि जाएब, नीक। आगूमे लालटेन रखि वैसि गेल। मुदा मनकेँ अन्हार दावए लगलै। सोग बढ़ए लगलै। माएकेँ कहलक- “माए, मन नीक नै लगैए। नै खाएव।”
जोर करैसँ पहिने माइयक मनमे आइलि भोजन तँ नीक मनक छियै। अधला मनक तँ ओ.......। सोचि पुतोहू-अढ़ूलियाकेँ कहलनि- “कनियाँ, बौऔक मन दबे छै हमरो -बेटे दुखसँ दुख जनमैत- खाइक मन नइ होइए।” मुदा, पुरनकी पुतोहू थोड़े नवकी पुतोहूकेँ झझकारि कऽ उत्तर देलकनि- “चुुल्हि लगमे जखन अधपक्कू भऽ गेलौं। तखन हिनकर मन खराब भेलनि। होइताए हमरा तँ भऽ गेलनि हिनके। एक ताव लगतै तरकारियो भइये गेल। रोटी पहिने पका नेने छलौं। खहिहथि भोरे। तखन मन नीक हेतनि।” मुदा, फेरि वेचारीक मनमे पत्नी आ पुतोहूक रुप आबि वैसि गेलनि। जिनकाले भानस केलौं से जखन खेबे ने करताह तँ हमही.....। ओहिना झाँपि कऽ सभ किछु राखि देवै। सबेरे जखने मनोहर सुनलनि। जे रघुनी भैया मरि गेलाह। तखने आबि दरबज्जापर मूड़ी झुका कातमे बैसि गेल। सभकेँ होइत जे गाममे सभसँ बेसी दुख मनोहरे कऽ भऽ रहल छैक। असीम दुख। सेर-समांग दुनूक। माइयो माछूसँ गेलखिन। खाली आंगन देखि अढ़ूलियाकेँ भुखे नहि रहल गेलनि। बेचारी चारिटा रोटी आ घेराक भुजिया लऽ खाए लगलीह। तहि काल अपराजित आबि अढ़ूलियाकेँ डेढ़ियेपर सँ चिकरल- “कनियाँ, काकी गेलखिन।”
मुँहमे घेरा-रोटी चिबबैत अढ़ूलिया बाजलि। मुँह भारी देखि अपराजित ससरि कऽ आंगन आबि गेलीह तँ देखलनि जे बीचे दुआरिपर केवाड़ लग बैसि हाँइ-हाँइ खाइत अछि। जहिना करिया भेम्ह कटलासँ एक्के बेरि सनसना कऽ बीख चढ़ि जाइत, तहिना अपराजितकेँ चढ़ि गेलनि। मुदा निधोखसँ अढ़ूलिया चपा-चैप चपने जाइत। जत्ते अढ़ूलियाक मुँह चलै तत्ते अपराजितकेँ तरसँ खौंत चढ़ैत। अढ़ूलिया बुझि गेली जे जँ कहीं सरेरा माने हल्ला केलनि तँ सीनेपर पकड़ा जाएब से नहि तँ जाबे मुँह खोलथि-खोलथि ताबे थारी अखारि कऽ रखि देवइ। वरदाससँ बहार होइते झपटैत अपराजित बाजलि- “आँइ गे निरविचारी तोरा कोनो गत्तरमे लाज छौ कि नै?”
अखन धरि अढ़ूलिया मुँह नहि खोललक। थारी माँजि अँठि फेरि हाथ धोइ लोटा रखि उत्तर देलक- “हिनका बड़ लाज छन्हि। जे झूठ-मूठ कऽ बझा कऽ अलबट जोडै़ छथि। हमरे नै कोनो गत्तरमे लाज अछि। बूढ़ भऽ कऽ ई झूठ बजै छथि से बड़वढ़िया, हम बड़ निरलज्जी।”
“ऐँ गे तोरा एतबो ने विचार छौ जे जाबे अँगनासँ लहास नै उठलै ताबे मुँहमे अन्न किअए देलौं। पहिने अंगना-घर करितेँ तखन ने भानस-भात करितेँ।”
“हिनका दियादी छनि कि हमरा। हम भगिनमान छी। लोकक सहोदरो भाए अनतए रहने विरान भऽ जाइ छै आ दूरोक लोक लगमे रहने अप्पन भऽ जाइ छै। हमरा कोन अंगना-घर करैक काज अछि।”
अढ़ूलियाक बात अपराजितकेँ बेसम्हार कऽ देलक। बाजलि- “जेहने कुल-खुट रहतौ तेहने ने बुधियो हेतौ?”
कुल-खनदानक उपराग बुझि अढ़ूलिया बेसम्हार भऽ बाजलि- “यएह जँ बड़ नीक कुल-खनदानक छथि तँ कहाँ भेलनि जे मनुक्ख जेकाँ चुपचाप लगमे अवितथि। खाति देखितथि तँ पुइछ लितथि जे कनियाँ एना किअए करै छी। रातिमे नै खेने रही से बुझैक काज हिनका नहि भेलनि मुदा, छुछे उपदेश दइले चलि एलहुँ। अपन काज आँखि-मूनि कऽ करैत रहितथि, हमरा टोकैक जरुरत किअए भेलनि।”
मुदा अपराजितो अपने सीमामे रहथि तेँ वोलीमे गरमी रहबे करनि। अधोबात अढ़ूलियाक नहि सुनलनि, अपने बजैमे बेताल रहथि। मुदा मनमे शंका उठलनि जे हो-न-हो अखन ऐकरे अंगनामे छियै, कोनो दोखे लगा दिअए। रसे-रसे पाछु मुँहेँ डेगो उठबैत आ दूरीक हिसावसँ बोलियोमे जोर दैत। मुदा भऽ गेलइ कोनादन। एक्के-दुइये टोलक धियो-पूता सहटि-सहटि आवए लगल। तहिना जनि-जाइतिओक ढबाहि लागि गेल। चिपड़ी पाथैत महिनाथपुरवाली गोबराएले हाथे पहुँचलीह। तहिना फुल तोड़ए जाइत नवानीवाली फुलडाली नेनहि पहुँचलीह। सभसँ कमाल ननौरवाली केलनि। खाइले बेटा कनैत रहै ओकरा आरो चारि थापर उपरसँ लगा फनकैत पहुँचलीह। तहिना लखनौरवाली खिसिया कऽ बेटाक आगूमे भात-दालिक बरतने (जहिमे भानस होइत) रखि, अपनाकेँ पछुआइत बुझि लफड़ल पहुँचलीह। विचित्र भऽ गेलइ। सभ अपने-अपने फुड़ने अपन-अपन विरोधीकेँ चिक्कारी दऽ दऽ गरिअबैत। केयो ककरो बात सुनैले तैयार नहि। मुदा बजैत-बजैत मुँह दुखेने आकि बुधि जगने आस्ते-आस्ते हल्ला कम हुअए लगलै। कम होएत-होएत हल्ला सोलहन्नी शान्त भऽ गेल। मुदा तरे-तर कोना नै कौना दू पाटी बनि शब्दवाणक तैयारी करए लागलि। मुदा खलीफा किम्हरहुँ नहि। अखन धरि पूबारिपार वाली दादी आ पछवारिपार वाली दादीकेँ सभ अपन-अपन अगुआ बुझैत। अगुआइ करैक बुधियो छन्हि। मुदा पूवारिपार वाली एहि दुआरे नहि पहुँचलीह जे चारिमे दिनसँ दुखित छथि। आइ एकादशी कोना छोडितथि। विछानसँ उठैक होश नहि। तहिना पछवारिपार वाली अपना घरवलाकेँ डेढ़ बीघा जमीनक जिनगी बुझा दुनू परानी अपनो मालक गोवर आ बेरु पहर एक बेरि चारागाह जा एक छिट्टा आरो लऽ अनैत। सएह अनैले गेल रहए। जहिसँ गामक किछु गोटे कुट्टी-चालि करैत। मुदा दादियो पाछु घुरि कऽ देखए वाली नहि। जखने कनियो भनक लगि जानि जे फलनी-चिनली बाजल तँ अंगना पहुँच उपराग दऽ अबैत। आब कहाँ कियो गोवर बिछनी कहै छै।
आंगनसँ टहलैत आवि फोच भाय चचरी लग पहुँच आँखि दौड़ा-दौड़ा नाप-जोख करए लगलाह। मुदा काज अधखड़ुए तेँ गरे ने अँटनि। काजक दुनियाँमे अपन अँटावेश नहि देखि वाद-विवादक दुनियाँमे पहुँच बतहूँकेँ पुछलखिन- “कतेटा चचरी बनत?”
डोरी फट्ठेपर रखि आगूमे ओंगरीक नहसँ चेन्ह दैत बतहू बाजल- “अइठीन तक।”
“झुझुआन बुझि पड़ै छौ।”
“से की?”
“साढ़े तीन हाथ तँ सएह भेल। तेकर वाद जँ एक्को बीत आगू-पाछु नहि रहत से केहन हएत?”
फोच भायक बात सुनि बतहू गुम्म भऽ गेल। कातमे ठाढ़ भऽ लेलहा सभ बात सुनैत। मुदा एहि आशामे अखन चुप रहए जे जिनकासँ गप करैत छथि पहिने हुनकर जबाव ने सुनि लेब। जँ अपने सक्षम वाद-विवाद कऽ सकथि तँ सर्वोत्तम। नहि तँ जखन ऐठाम छी तँ ओते दूर धरि कोना बतहा भैयाकेँ पाछु हुअए देब। बतहूकेँ चुप देखि लेलहा बाजल- “फोच भैया, अहाँसे अधिक उमेरक बतहा भैया शरीर धुनि रहल छथि, तहिकालमे एतवो नै बुझलियै जे जिनका जहि काजक लूरि अछि से तहिमे सहयोग करथि। तइ कालमे अपन कोनो कर्तव्य नहि मुदा.......। अखन धरि जिनगीमे कते चचरी बनेलौं आ कते मुरदा जरौलौंहेँ। हँ ई बात जरुर अछि जे गोटि-पंङरा जँ जरौनौ हएब तँ ओहन मुरदा जिनका चचरीक जरुरते नहि भेल। पलंगपर उठा असमसान पहुँचै छथि। चचरीक स्कूलमे पढ़लौं हम आ हिसाब वुझि गेलियै अहाँ।”
लेलहाक बात सुनि फोच भाय तिलमिला गेलाह। क्रोधसँ आँखिमे नोर एलनि आकि डरसँ, ई बात लेलहा नहि बुझि सकल। अगिला गप सुनैले कान पाथि देलक। मुदा कोनो प्रश्न नहि अबैत देखि बाजल- “पचासो ओहन मुरदा डाहने छी वा गारने छी जेकरा चारि गोटे बदला दू गोटे पथियामे उठा सीक लगा, वाँसक ढाठपर उठा अंगनासँ असमसान लऽ गेल छी। ऐहन-ऐहन की सभ केने छी से कहैक अखन समए नहि अछि। नहि तँ......।”
आँगनसँ पटपटाइत दरवज्जापर आबि देवनन्दनकेँ दुनू हाथ जोड़ि कहलखिन- “कठिआरीक हमरो हाजिरी।”
“बेस-बेस। गेल जाओ। एतवे की कम छियै।”
दरवज्जापर सँ फोच भाय विदा तँ भऽ गेलाह। मुदा मनमे अन्हर-विहाड़ि उठए लगलनि। आगू मुँहे डेगे ने उठनि। पाछु घुरि बेरि-बेरि तकथि।
अरथी उठवैक लेल आ कठिआरी जाइ लेल घोल-फचक्का हुअए लगल। जनिजाति आ धिया-पूताक झुण्ड बाजाक लोभे आगू-आवि-आवि ठाढ़ भऽ गेल। किछु गोटेक कहब जे अपन पत्नियो धरि असमसान नहि जाएत तँ किछु गोटेक कहब जे जिनका बेटा नहि रहैत छनि हुनका तँ पत्निये आगि दइत छथि। कोना मनाही कएल जाएत। तहिना धिया-पूताक संबंधमे सेहो प्रश्न उठैत जे ई तँ अन्तिम संस्कार कर्म छी जहिमे खाधि खुनल जाएत, लकड़ी काटि जराओल जाएत। तहिमे धिया-पूता अनेरे जा कऽ की करत। मुदा संस्कारे ने संस्कार पैदा करैत अछि। अरथीक मुँहमे आगि लगाएवे ने संस्कार छी। जेकर जरुरत ककरा नहि छैक? आजुक धिये-पूते ने काल्हि जुआन बनि करत। तेँ ओकरा काजसँ विमुख करव उचित नहि। मुदा काज -मुर्दा जराएब- जतेटा अछि, जते लोकसँ कएल जाएत ततवे लोक ने चाही। फेरि एत्ते लोकक काज कोन छै? फेरि बाजा-बूजीक कोन काज अछि? काज केवल मुरदे जराएब टा छी आकि बेटी जेकाँ एक ठामसँ दोसर ठाम पहुँचयबो छी। इम्हर बाजा गड़गड़ाइत। रंग-विरंगक सोहर, रंग-विरंग दुआरि निकालि, वटगबनीक रिहलसल मने-मन चलैत। जहिना तरे-तर करियाकाकाकेँ तहिना सुन्दर काकाकेँ छातीक पसीना गोलगलाकेँ भिजबैत। मन घोर-घोर दुनूक। दुनूकेँ अपन मन हारि मानि गेलनि। सहयोगीक जरुरत पड़लनि मुदा, सहयोगी के? करियाकाकाक नजरि सुन्दर भायपर आ सुन्दकाकाक नजरि किसुनपर अपन-अपन जगहसँ उठि आँखिक इशारा चौमासक आड़िपर देलनि। आगू-पाछू दुनू गोटे चौमासक आड़ि दिशि चारि डेग बढ़ौलनि कि पाछुसँ लेलहा टोकलकनि- “काका कतऽ ससरल जाइ छियै। काज अछि ऐठाम आ अहाँ विदा भेलौं बाध दिशि? लेलहाक बात दुनू गोटेक करेजकेँ छेदि देलकनि। छटपटाइत मन कहलकनि- “तेहेन उफाँटि टोकि देलक जे, कि विचार हएत की नहि। मुदा दरवारमे जहिना भिखमंगाक विजकल मन रहैत तहिना दुनू गोटेक रहनि। कठहँसी हँसी हँसि दुनू गोटे संगहि कहलखिन- “जमात करे करामात? वौआ। तोहूँ इम्हरे आबह?”
तीनू गोटे चौमासक आड़िपर वैसि काजक समीक्षा करए लगलाह। मुदा, मुर्दा जराएव आ कठिआरी जाएब दू प्रश्न भेल। किछु गोटेकेँ लकड़ी कटैसँ खाधि धरि खुनए पड़त। किछु गोटे ओहिना मूड़ी गोति कऽ शोक मनौताह। सवा पहर मुरदा जरैमे लगै छै तइपर सँ जारन काटै, फाड़ैसँ लऽ कऽ अछिया सजाएब धरि अछि। घरोपर कते खटनी भेलि अछि। ओहूना दू घंटा खटलाक बाद किछु खाइ-पीवैक मन होइ छै। विचहिमे लेलहा टपकल- “ओइ जगहपर खाइक मन हएत?”
सुन्दरलाल- “धुर बूड़ि, सब दिन आड़िये-धुर, गाछिये-विरछीमे खाइछेँ से विसरि गेलही।”
मुँह सकुचबैत लेलहाक मन लेलहाकेँ कहलकै- “अनेरे बजलौं।”
तीनू गोटे विचारलनि जे पहिनहि घरवारी (जे जरबए नहि जेती) केँ जनाए दिअौन जे कमसँ कम दू बेर चाह आ लोकक हिसाबसँ सुखल जलखै आ पानि पठा दथि। अपने सभ ने वारीक रहब जेकरा जते मेहनत हेतै ओकरा ओते अहगर कऽ देवइ। मुदा नहि लऽ गेने तँ एकटा आफद हएत जाबे धिया-पूताक पेट भरल रहतै ताबे ने नाचत। जखने पेट कुलकुलेतै कि घर दिशि विदा हएत। बिना हाथ-पाएर धोनहि भनसा घर पहुँच जाएत। तेँ ओकरो तँ घेरि कऽ रखि नचबैक अछि। किछु गोटे ऐहन जरुर छथि जे मुँहमे किछु नहि लेता। लेवो कोना करता। एक जिनगीक ओहन सीमान छी जे सोझाक प्रश्न छी। तेँ हटल वा बाइस कऽ आनवो उचित नहि। सुन्दर काकाक मनमे उठलनि-सीमानक विवाद तँ दू खेत, दू गाम, दू दुनियाँ भऽ जाइत। कियो मृत्युकेँ खुशीसँ छाती लगबैत छथि तँ कियो कानैत-कलपैत। शुभ काज तँ खाइत-पीवैत हएब नीक। मुँहसँ हँसी निकललनि कि तहि बीच लेलहाक नजरि मुँहपर पड़लनि। मुस्की देखि अपनेपर शंका भेलै जे फेरि ने तँ किछु हूसल। मुदा अहं जगलै बाजल- “काका, जते अबेर करब औते अबेर हएत। अबेर भेने कते गोटे बीमार पड़त।
तीनू गोटे वाड़ीसँ दरवज्जापर आबि एक्के बेरि कहलखिन- “राम-नाम सत्य छी।”
आहि रे बा! फेरि चचरी लग हुज्जति शुरु भेल। केयो वजैत जे जीवैतमे काकाक उपकारक बदला नहि दऽ सकलिएनि, तेँ उठाएब? किछु गोटेक कहब जे काका की वाबा की भैया हमरो माए-वाबूकेँ उठौने रहथि, तेँ उठाएब। किछु गोटेक कहब जे बड़ बेरपर रुपैया सम्हारने रहथि तेँ अपन कर्ज चुकाएव? आड़िपर गप सुनि लेलहोमे पावर एलै। हुज्जतियाकेँ दुनू हाथे इशारा दैत कहलक- “सुनै जाइ जउ कान्ही लगा कऽ उठविअनु नै ते एक भग्गु भेने दरद हेतनि।”
लेलहाक विचार सभ मानि चारि गोटे चचरी उठबै बावा लग पहुँचल। चचरी लग पहुँचते जना एक्के वेरि सबहक मुँह चहा उठल। रघुनन्दन नहि रघुनन्दनक अरथी उठि रहल छनि। सुभद्रा आँखि, कोशिक ओहि धारा सदृश्य बहए लगलनि जे पहाड़क झरना होइत समतल जमीनपर आवि अनवरत चलैत रहैत अछि।
आंगनसँ निकलितहि एक दिशि “राम-नाम सत्य छी? तँ दोसर दिशि शहनाइपर बहिनिक विदाइक धुन। यएह तँ सुख-दुखक जगह दुनियाँ छी। घरक मुहथरिपर एक दिस करियाकाका आ दोसर दिस सुन्दरकाका ढाढ़ भऽ अंतिम प्रणाम कऽ आगू बढ़ौलकनि। तहि पाछु देवनन्दक हाथमे आगि दऽ विदा केलनि। तहि पाछु बरियाती सजि गेल। सभ बरियातीकेँ निकललाक बाद सुभद्रा आ शीला रुकि गेलीह। समए पाबि करियाकाका शीलाकेँ चाह-जलखै-पानिक बात कहि, रेलगाड़ीक गार्ड जेकाँ, पाछु-पाछु चलला। गाछीक माने कलमक कोनपर पहुँचतहि करियाकाका आ सुन्दरकाकाक खोज हुअए लगल। मूड़ि-उठा देवनन्दनो तकैत। मुदा दुनू गोटे अधे रस्तामे अवैत रहथि। गाछी पहुँचते करियाकाका आगू बढ़ि ओंगरीसँ इशारा दैत कहलखिन- “एहिठाम भैया मचान-खोपरी बनवैत रहथि...।
दोसर दिशि माने उत्तर-पूरब कोनमे देखवैत- आ एहिठाम वेसी काल बैइसै छलाह। तेँ नीक हएत जे विचहिमे दिअनि।”
कहि लेलहाकेँ कहलखिन- “लेलहुँ, चलह। पहिने लकड़ी देखी। करियाकाका सुन्दरकाका, लेलहा, बचनू, चंचल सभ वढ़ल। इम्हर जीबछो, छीतन आ रंगलाल अपन-अपन जगह टेबि बाजा उठौलक। केवल मालदहक कलम। खाली चारु हत्तापर शीशो, जामुन, गम्हारि लगौने रहथि। एकोटा आमक गाछ सुुरेब नहि। सभ अष्टावक्र। तहूमे मृत्युक लेल जीवितकेँ बलि देव उचित नहि बुझि आमक गाछसँ नजरि हटा लेलनि। गम्हारि दिशि नजरि दइते लेलहा बाजल- “गम्हारि महराज आ जामुन महराज तँ तेहन छथि जे अपना बुते अपनो नै पार लगतनि तँ मरल देह माने मुरदा हिनका बुते जराओल हेतनि। लेलहाक बात सुनि सुन्दरोकाका आ करियोकाका आँखि मिला मुस्की देलनि। मुदा लेलहाक बाजबसँ चंचलकेँ तामस पजरऽ लगलै। खढ़क आगि जेकाँ लगले पजरि गेल- “यौ सुनरकाका, जहिना पनियाह जामुनक लकड़ी होइए तहिना गमहारियोक। एहिसँ नीक आमक हएत। कने रुखो होइए। एहिसँ रुख इलचीक होइ छै। अनेने काजमे कोन भदबा लगौने छी। हैवए तँ देखै छी दछिनवरिया हत्ता परक शीशो सुखल अछि। मुरदा जरवैले ओहन जारन चाही जेकर धधड़ा कड़गड़ होय।”
सभ कियो दछिनवरिया हत्ता लग पहुँचलाह। दस-पनरहटा शीशो पैछला साल हवाक बीमारीमे सुखि गेल छलैक। तीनिए चारिटा साइजक गाछ नहि तँ सभ अनसाइजक। जे जरने भाव बिकाएत। पातर गाछ कटने चारिटा पाँचटा काटए पड़त। से नहि तँ ओहन दूटा गाछ काटि लिअ जहिसँ सभ काज नीक जेकाँ भइयो जाएत आ थोड़-थाड़ डोमोले रहि जेतइ। मुदा लेलहाक नजरि तर चलि गेल। बाजल- “काका, कते लकड़ीसँ मुरदा जरैत अछि।”
करियाकाकाकेँ सुनल तँ रहनि मुदा, लिखल नहि पढ़ने रहथि। प्रश्नक जवावो नहि देव उचित नहि। भलेहीं कहि दिअए, नै बुझल अछि। मुदा जे काज संगे मिलि एत्ते केने छी तहिमे हमहीं सोलहन्नी कोना मूर्ख बनि जाइ। फड़कि कऽ कहलखिन- “ऐँ रौ लेलहा, तोहर हम ठकदरुआ छिऔ जे ऐहन बात पुछलेँ। एते मुरदा जे संगे जरौलौं से हम देखलिए आ तू आँखि मुनने रहेँ।”
करियाकाकाक बात सुनि दोहरी नजरि खसलै। मनमे रहए जे काजक लकड़ी छी, वेसी जराएव उचित नहि, जँ जड़ि दिशिसँ टोनि कऽ लऽ जाय तँ घरक केबाड़ी भऽ जाएत। पहिने टोनि कऽ कलमक सीमा टपा कऽ रखि दिएे। पछाति लऽ जाएब। से मंगैसँ पहिने करियाकाकाकेँ खिसिया देलकनि। अपन काजक रुखि खराव होइत देखि सोचलक जे से नहि तँ सझिया कऽ कए बाजी। बाजल- “कक्का, दुनू भाँइ छी। बहुत लकड़ी अछि। निचका टोनि कऽ केवाड़ बनवैक विचार होइए?”
मने-मन हिसाव जोड़ि कहलखिन- “काज जोकर निकालि कऽ सिरौना-पथौना सौँसे रहए दिहक आ उपरका फाड़ि लीहह। तावे हम अगिला काज देखै छियै।”
कहि कोदारि लऽ अछियाक खाधि नापि खुनैले झोलीकेँ कहलखिन- “हँसैत झोली बाजल- “भाय लोकनि सुनि लिअ। हमहूँ बुढ़ाइले जाइ छी मुदा, जाबे बाँहिमे दम अछि ताबे समाजक भार -अछिया खुनब- उघैत रहब। एक साए पच्चीसम अपनासँ उमेरगरक अछिया खुनने छी। अपनासँ कम उमेरक खुनैक मौका नै भेटल।”
कहि अछिया खुनए लगल। तहि काल जीबछ शहनाइपर उठौलक- “मन सुमिरन करले रात-दिना। जगमे कोइ नहि अपना।”
अछिया खुना गेल। शीशोक ओहन मोट लकड़ी सिरहौना-पतौनामे देल गेलनि जते मोटगर ओछाइनपर जिनगीमे कहियो सुतल नहि छलाह। एक-एक चेरा चढ़बैत छाती भरि ऊँच चेरा काकाक संग जरैक लेल तैयार भऽ गेल। सुन्दरकाका देवनन्दनकेँ बाँहि पकड़ि, धधकैत उक मुँहमे लगौलनि।
मुँहमे उक पड़ितहि, बिजलोकाक इजोत जेकाँ, सबहक मनमे पहुँच गेलखिन। बाबा, काका, भैया, भाए, बौआ, वच्चा, नूनू इत्यादि हजारो काकाक रुप पटेरक फुल जेकाँ उड़ए लगल। जहिना पटेरक एकटा डाँटमे हजारो-लाखो पूर्ण फूल निकलैत तहिना रंग-विरंगक फूल बनि रघुनन्दन मने-मन उड़ए लगलथि।
आंगनसँ अरियाति सुभद्रो आ शीलो रहि गेलीह। शीलाक मनमे चाह, जलखै पठवैक ओरियान करब रहनि। जबकि सुभद्रा सोचैति जे घर-निप्पो सुखाइये गेल अछि। मास दिन कोना भीजल रहत। पुतोहू जनीकेँ ओरियाने-बात करैक छनि। तहिसँ नीक जे एक-गिलास पानि छिटि लाभर-जीभर बाढ़निसँ बहारि देबइ। आब तँ चारिम दिनसँ सभ दिन घर-अंगना होइते रहत। सएह केलनि। चाह-जलखै लेल गाछियेसँ बौकू आ शीतला चलि आएल। दुनू गोटेकेँ सभ समान दऽ निचेन भेलीह। धिया-पूताक हलहोरिमे आशा सिंगरिया-बाजाबलाक पाछू-पाछू चलि गेलि छलि। ताधरि सुभद्रो आंगन बहारि निचेन भेलीह।
शीला- “माए, कतौ वैसि कऽ बुढ़ाक बात कहथु?”
सुभद्रा- “हँ तँ कनियाँ! जहिठाम बुढ़ा सुतल छलाह तहीठाम आउ। भने तुलसियोक गाछ बगलेमे अछि।”
दुनू गोटे वैसितहि छलि कि लोहनावाली दादी हहाइल-फुहाइल पहुँचलीह। लोहनावालीकेँ देखि शीला कहलकनि- “आवथु बाबी, अंगने आबथु। अखन तँ अंगनामे दुइये गोरे छी। सभ पाछु-पाछु गेला।”
आंगन घर नीपल नहि देखि लोहनावालीक मनमे तरे-तरे क्रोधक लहकी-लहकए लगलनि। मुदा क्रोधकेँ दबैत सुभद्राकेँ कहलखिन- “दियादनी, अहाँ तँ हमरासँ जेठ छी मुदा, सब विधि-वेवहार सभकेँ थोड़े मन रहै छै। एहिमे एकटा विधि आरो होइ छै।”
“की?”
“स्वामीक निमित्ते कपारमे पाथर लगाएब।”
“मुस्की दैत सुभद्रा- “हँ, हँ, ई तँ हमरो मन अछि।”
“अखन नहि बैसब। जाइ छी।”
“बेस, बेस। जाउ।”
पुनः दुनू गोटे बुढ़ाक जगहपर जा बैसलीह आखिसँ नोर हराएल।
मुस्की दैत शीला बजलीह- “माए, बुढ़ासँ कहियो झगड़ो भेल छलनि?”
“बूढ़ा नर्कसँ स्वर्ग गेलाह। हुनकर आगि नहि उठेबनि। हमरो माए-बाप सिखा देने रहथि। मुदा जत्ते माए-बाबू सिखौने रहथि तइसँ बहुत बेसी बुढ़ा सिखौलनि। सदिखन कहैत रहैत छलाह जे जेकरा मनुक्ख बुझै छियै ओ मनुक्खक हॉड़-मांसक बनल एक ढॉचा मात्र छी। मुदा एकरा मनुक्ख बनवै छै मन। मन जेहेन रहत तेहेन ओ मनुक्ख बनत। जेहेन मनुक्ख बनत तते लोकक मनमे जगह भेटत। जगहो दू तरहक होइ छै। एक तरहक होइत अछि नीक आ दोसर अधला। मनुक्खकेँ सदिखन नीक विचार मनमे राखैक चाही।”
बिचहिमे शीला टपकि पड़लीह- “परिवारमे तँ घरहटो होइ छै, विआहो, पावनि होइ छै। ओ काज कोना करै छेलखिन।”
“कनियाँ, परिवारमे नमहर काज भेने चुल्हियोक काज बढ़ि जाइत अछि। मुदा सदिखन ई मनमे राखी जे अपन काज सम्हारि किछु दोसरोक काज करी। जहिना बाँसक बीट तीन सलिया, चरिसलिया धरि समटल रहैत अछि। पतरो रहैत कते-कते नमहर रहैत अछि। कड़ची सभकेँ समटि कऽ रखै छै। वएह कड़ची छी परिवारक अपनासँ बढ़ि दोसराक काजमे सहयोग करब। आजुक लोकक मन ढील भऽ गेल छै। जेकर फलाफल सोझेमे अछि।”
भाग- २
खूब अन्हरगरे माने चारि बजे भोरेमे सुभद्रा शीलाकेँ उठवैत कहलखिन- “कनियाँ, उठू। उठू झव दे उठू।”
सासुक धरफड़ाएल बोली सुनि शीला उठि कऽ वैसैत पुछलखिन- “की भेलनि जे एेना अधनीनामे उठा देलनि?”
“असथिरसँ बाजू। अखन गामक लोक नहि उठल अछि। अपन काज आगू बढ़ाउ।”
“कोन काज?”
“जखने एक्के-दुइये लोक सभ जागए लगत कि भूत सभ आबए लगत। अहाँ नव-नौताड़ि छी तहूमे शहर-बजारमे रहै छी। अहाँ गामक भूतकेँ नहि चिन्हवै बुरहा सभटा भूतकेँ चिन्हा देने छथि। अखन एतवे सुनू। नइ तँ जिनगी हूसि जाएत। बुरहा मरि गेलाह तेँ कि सभ ओहि लागल मरि जाएब। सभकेँ अपन-अपन दानी-पानी अछि। मुदा फेरि कहै छी? गप-सप्प करैले भरि दिन खालिये अछि। समाजक लोक सभसँ सभ बात पुछबनि आ बुझव। अखन जल्दी विस्कुटक डिब्बा निकालू आ चाह बनाउ। ताधरि हमहूँ बौआकेँ एकटा दतमनि दऽ अबै छिअनि। जावे अहाँकेँ चाहो नहि बनत ताबे ओ तैयार भऽ जाएत। चुल्हिमे तँ छाउर नहि अछि, माइटिये लऽ कऽ हाँइ-हाँइ कऽ दू घूसा दाँतमे दिऔ आ कुड़ुड़ कऽ पानि पीवि लिअ।”
कहि सुभद्रा देवनन्दनकेँ उठबैले दलानपर गेली। जहि जगहक चौकीपर रघुनन्दन सुतैत रहथि ओही अखड़े चौकीपर देवनन्दन सुतल रहथि। देहपर हाथ दऽ आस्तेसँ डोलवैत बजलीह- “बाउ, बाउ। उठू। लिअ दतमनि। पहिने मुँह-हाथ धोइ लिअ।”
मृत्यु कर्मम विधि बुझि देवनन्दन किछु पुछलखिन नहि। सोलहन्नी मानि दतमनि करए लगलथि। अपनो मुँह धोय कुड़ुड़ कऽ सुभद्रो आंगनक ओसारपर वैसलीह। प्लेटमे चारिटा छोट साइजक विस्कुट आ गिलासमे पानि नेने शीला पतिकेँ दइले चललीह। शीलाक हाथमे गिलास-प्लेट देखि कहलखिन- “पौआही पाँव-रोटी नहि अछि। तेँ बड़का डिब्वा चारि साए ग्रामबला विस्कुटे दऽ अवियौक।”
शीला सएह केलनि। चाह पीवैत सुभद्रा कहए लगलखिन- “अपना सभमे तँ तेरहे दिनमे सभ कर्म भऽ जाइत अछि मुदा, अपने गामक आन टोलमे ककरो पनरह तँ ककरो सत्तरह तँ ककरो महिना दिनपर कर्म सम्पन्न होइत अछि। हम किअए एते भोर उठा देलहुँ से बुझै छियै?” आइ एक्के बेरि वौआकेँ एक-मुक्त करए पड़तनि गोसाँइ लहसैत बुढ़ाकेँ पारस माने पातरि दैत खेताह। आब अहीं कहू जे जे-आदमी, बानर जेकाँ, किछु ने किछु सदिखन खाइत रहैत छथि ओ भरि दिन ओहिना माने निराधार कोना रहताह? बुरहा जिनगीक संगी छलाह मुदा, वौआकेँ दस मास पेटमे पालने छी। ओ पालब हम नै बुझवै ते पुरुखकेँ बुझव छियैक। अखन कियो नै अछि कहि दइ छी जे हमरा कोन, हरिवासयक साधल देह अछि मुदा, अहाँ दुनू परानी तँ से नहि छी। लोके भूत छी से बुझि लिअ। जखन अंगना खाली रहए आ खाइ-पीवैक मन हुअए तँ घरमे जा कऽ खा लेब। बुढ़हाक क्रिया-कर्मक जे विधान अछि आ समाजमे रहै छी ओ तँ समाजेक विचारानुसार हएत। मुदा इहो ने मनमे राखए पड़त जे एक तँ समांगक सोग मनमे अछि तइपर सँ खेनाइओ-पीनाइ छोड़ि देब तँ कि बुरहा लागल सभ चलि जाएब? जते काल जीवैत छलाह, सेवा-टहल केलिएनि वएह दायित्व भेल।”
एकटा खिस्सा कहै छी कनियाँ। खिस्सा नहि आँखिक देखल घटना....।
ओंगरीसँ टोलकेँ देखवैत- ....ओइ टोलमे फुसनाक घर छैक। बहुत दिन तँ नहि भेलैए मुदा, तइओ पच्चीस-तीस वर्ख भेल हेतइ। फुसनाक बावा मुइलै। ओ पेटबोनिया रहए। मुइलाक पराते अरगासन की देत आ अपने एक-भुक्त की करत? मुदा, तइओ ककरो-ककरोसँ पैंइच लऽ लऽ पार लगलै। मुदा बिना आमदनिये परिवार कोना चलतै। खाइ बेतरे धिया-पूता सभ टौआइ। चिन्तासँ दुनू परानी सेहो तरे-तर सुखए लगल। धिया-पूताक मुँह देखि बेचारीक फुसना माएकेँ करेज चहकि गेलइ। मरि गेलि वेचारी। फुसना गरदनिमे मायक उतरी आ बापक गरदनिमे बापक उतरी। तहिपर सँ वीसक दिन वाद मलेमास पड़ि गेल। दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर खसए लगलै। सुभद्रा आँखिसँ बहैत सरस्वतीक धारा देखि शीलाक मुँहसँ अनायास निकललनि- “वाह रे धैर्य! अपना सोगे नोर नहि अनका सोगे धार।”
चाह पीबि पान खा पढ़ुआ भाय पत्नीकेँ कहलखिन- “हमरा अवेरो भऽ सकैए। तहि बीच जँ कियो खोज करति तँ कहि देवनि जे देवनन्दन एहिठाम जिज्ञासा करए गेलाह।”
“अखने किअए जाएव?”
“अहाँ जे सोचै छियै तहिसँ हटि कऽ सोचए पड़त।” -कहि पढ़ुआ भाय डेग बढ़ौलाह।
पत्नी पाछुसँ कहलखिन- “अच्छा जाउ।”
रास्तामे पढ़ुआ भाय सोचए लगलथि जे अपने पढ़ल छी, किताबक बात वुझै छियैक। अनको कहै छियै। मुदा परिवारक जँ सभ नहि बुझत तँ अपन बुझलाहा अपने कतेक पइठ हएत। जाधरि आँखि तकै छी सोचै-विचारैक शक्ति अछि मात्र ताधरिक भार.......। जँ से नहि तँ कि शास्त्र ओकरा लेल नहि जकरा कियो अपन नहि छैक। मन ओझराए लगलनि। मुदा नजरि एहिठाम टिकि पत्नीक प्रश्नपर चलि गेलनि।
माड़किन वस्त्रमे सजल असकरे देवनन्दन गुरुकूलक विद्यार्थी जेकाँ चौकीपर दछिन मुँहेँ विस्कुट खा पानि पीवि चाह पीविते रहति कि पत्नी-शीला सिगरेटक डिव्वा आ सलाइ नेने आवि आगूमे रखि खाली गिलास लइले ठाढ़ भऽ गेलीह। तीनि-चारि घोंट चाह गिलासमे रहवे करनि मुदा, मन जे जबदाह छलनि से आब हल्लुक भऽ गेल रहनि, शीला दिशि मुस्की दैत, डेढ़-बराह आँखिये तकलनि। शीलाक आँखि कऽ काजक बोझ दबने। पतिक मुस्की जेना मनक घुर कऽ एक मुट्ठी सुखलाहा खढ़मे सलाइ पजारि देलकनि। मुदा धधराक लपटकक संग काजे अगुआ गेल। बजलीह- “आइसँ समाजक लोक काजक विषएमे पुछैले ऐबे करताह। हुनका सभकेँ खाइ पीवैले नहि देवनि से उचित हएत?”
“कथमपि नहि।” देवनन्दन कहलखिन।
“मनक मुस्की, अपन नमहर ऋृण अदाए होइत देखि अठन्नियाँ हँसी बनि निकललनि। पुछलखिन- “घरमे की सभ अछि?”
“चाह-पत्ती, चीनी, दूधक डिव्वा सिगरेट-सलाइ तँ अननहि छी आरो किछु जोगार करऽ पड़त से तँ नहि बुझल अछि।”
अपन भार उताड़ैत देवनन्दन कहलखिन- “गामक सभ बात तँ हमहूँ नहिये बुझै छी। करियाकाका कऽ बजा पुछि लइत छिअनि।”
अच्छा होउ। कौवा डकल। झब दे सिगरेट पीबि लिअ। ने ते अनेरे सिगरेटक सुगंध चलत। लोक जागत।”
पत्नीक गतिगर गप्प बुझि गिलास हाथमे दैत, सिगरेट धरा पीवए लगलथि। मनमे एलनि, अपने दुनू परानी ने वहरबैया भेलहुँ मुदा, माए तँ सभ दिन गामेमे रहलीह। हुनका सभ विधि-वेवहार तँ वुझले छनि। तहि काल विस्कुटक मोनक्काक ढकार भेलनि। मुँह लाड़ए-चाड़ए लगलथि। सिगरेटक खुट्टी फेकितहि रहथि कि पढ़ुआ कक्कापर नजरि पड़लनि। नजरि पड़ितहि चौकियेपर सँ बजलाह- “आशा।”
पतिक बात बुझि गेलखिन। गैस चुल्हिपर चाहक ओरियान करैत आशाकेँ कहलखिन- “बुच्ची, दरबज्जाक कोनपर सँ देखने आबह जे कते गोटे छथि?”
दौड़ल आबि पढ़ुआ बाबाकेँ बैसल देखि घुरि माएकेँ कहलक- “बाबू लगा दू गोरे।”
पढ़ुआ काका आबि चुपचाप मौन धारण केलनि। दू मिनटक पछाति आँखि खोललनि कि आशाकेँ चाहक कप बढ़बैत देखि “रेलमे कटल आदमीकेँ देखि बुइधिक फाटक बन्न भऽ जाइत, तहिना भेलनि। तहि बीच देखलनि जे देवनन्दन दू चुस्की मारि लेलनि। मनमे बिहारि उठलनि ओना तँ नह-केश कटेलाक उत्तरि, नहि तँ कमसँ कम छौरझप्पी धरि तँ शोक मनेवाक चाही। मुदा बूढ़क मृत्युमे शोक मनेवाक चाही कि हर्ष। जँ शोक मनाएव तँ कि प्रकृतिक संग छेड़-छाड़ नहि हएत। मुदा परम्परो तँ अपन महत्व रखैत अछि। अखन धरि कर्ताक संग परिवारो आ समाजोक संग किछु नियम बनल अछि। जेकर संचालक अपने सभ छियै। तहिठाम की कएल जाए, तहूमे नवकबरिया डॉक्टर छथि, मनमे कचोट लगतनि। आ मरैकालक तँ सीमा नहि होइत। बूढ़ो मरैत, जुआनो मरैत आ बच्चो मरैत। तखन तँ सभकेँ अपन-अपन जिनगीकेँ दीर्घायु बनबैक छैक। तहीले ने सभ अपन-अपन जिनगीकेँ लगौने रहैत अछि। मुदा असकरे कोनो काज करैसँ पहिने दोसरो गोटैकेँ पुछि लेब आवश्यक अछि। मुदा लगमे के अछि जकरासँ पुछबै। भरोसे रहब तँ चाहे दुइर भऽ जेतइ। मुदा देवनन्दनकेँ पीबैत देखि भरोस भेलनि। चाहक चुस्की लैत बजलाह- “अपना सभक समाजमे तेरह दिनक कर्म डाहव -जरौनाइ- सँ लऽ कऽ द्वादसा कर्म धरि अछि। जहिना घरसँ निकालि गाछी लऽ जाए गाछक संग कऽ देलिएनि। तहिना ओहिठाम काज सम्पन्न कऽ घरपर लऽ अनलिएनि। आब घरक काज शुरु हएत। फेरि मनमे उठलनि जे काजक दौरमे जिज्ञासो तँ होइत अछि? फेरि मन ओझरा लगलनि। तेरह दिन हिसाब जोड़ैत तँ ठीके वइसनि। मुदा जिज्ञासा तँ तखने से ने शुरु हएत जखन से आंगनमे लोह-पाथर छुबि लोग अपन-अपन घर चलि जाएत। समाजक तँ एक प्रक्रिया सम्पन्न भऽ गेल। ऐहनो तँ भऽ सकैत अछि जे जे समाज -समाजक- गाममे नहि छलाह। जरौलाक बाद ऐलाह। हुनका कखन सामाजिक काजमे संग कएल जाए। जँ छौड़झप्पीक पछाति कएल जाए तँ संस्कारक संगी माने जरबैक संगी मानल जएताह। मुदा, जहिना माटि खुनैत-खुनैत कतेको रंगक रंगक माटि धरतीमे मिलैत तहिना माथ खोधैत-खोधैत चिक्कन माटि भेटिलनि। छह-छह करैत पानियोसँ बेसी छिछलाहट। फुड़लनि। समाजकेँ माने मनुष्यकेँ समयक अनुकूल बना चलक चाही। जहिना अनेको कारणसँ वायुमंडल बदलैत तहिना जँ मनुष्यो नहि बदलत तँ गतिहीन भऽ जाएत। गतिहीन आ मृत्युमे की अन्तर छैक। जते पढ़ुआ काका सोचैत तते मन ओझराएल जाइत। बजलाह- “बौआ, तीनि दिन धरि, जहिना बाधमे हरीयरी नहि रहने माल-जालकेँ बहटारि अपने गुल्ली डंटा खेलए लगैत तहिना छौड़झप्पीसँ पहिने मन बहटारए एलौं। एखन जाइ छी। फेरि आएब। मनमे चिन्ता नहि करब। समाज समुद्र छी जहिमे घोंघा-सितुआसँ लऽ कऽ बड़का-बड़का पानिक जानवर धरि प्रेम-भावसँ जीवन-यापन करैत अछि तहिना समाजो छी। सभ शक्ति समाजमे छैक। कहि रास्ता धेलनि।
माथ उधारने, अधा देह वस्त्रसँ झाँपल गुदरी पाछू-पाछु आ डॉड़मे ठेहुनसँ उपर धोती, कान्हपर तौनी नेने आगू-आगू हुलन आबि देवनन्दनकेँ ओसारक निच्चाँ सँ प्रणाम केलकनि। शिष्टाचारकेँ देखैत डॉक्टर देवनन्दन चौकीपर सँ उठि ओसारक निच्चाँ आबि भुँइयेमे चुक्की-माली वैसि दुनू परानी हुलनकेँ सेहो वैइसेले कहलखिन। मुँह सकुचबैत हुलन कहलकनि- “सरकार, अहाँ लग हम कना बैसब? हम ठारहे रहै छी। बजैत-बजैत दुनू परानीक आँखिसँ नोर टघरए लगलैक। गाल परक नोरक टघार पोछैत हुलन बाजल- “गामक खूँटा उखड़ि गेला। काकाकेँ अछैत कहियो चिन्ता नै भेल जे समाजसँ बहार छी। मुदा आन जे अछि ओ सदिखन अगराहिये लगवैत रहैए।”
“अच्छा गामक बात पाछु कहिह। पहिने अपन काज कहह।”
पति कऽ डटैत गुदरी- “वौआ, डागडर बावू, अहाँ देवता छी। कोनो बात छिपाए कऽ नै राखब। हमरो काज बहुत अछि। एक दिन बीतिये गेलनि। दसे दिनपर नह-केश होइ छै। ओइसँ पहिने सभ बरतन बना कऽ दिअए पड़त। बीचमे आठे दिन समए बचलै। दुइये परानी काज करैबला छी। धिया-पूता सभ इसकूले जाइए।”
स्त्रीगणक बोली सुनि अंगनासँ सुभद्रो आ शीलो दरवज्जापर ऐलीह। दरबज्जापर अबितहि सुभद्रा गुदरीकेँ कलखिन- “कनियाँ, ओजार-पाती नइ अनने छह? आब तँ सूपे-चालनिक काज पड़त। कनी ओकरा जोड़ि-जाड़ि दितिहक।”
नै काकी कहाँ किछो अनने छी। काल्हि बेरु पहर आबि कऽ कए देवनि।” अखैन ते काजेक बरतन बुझैले एलौंहेँ।
“वेस-वेस। मुदा एकटा बात मन रखिहह जे जहिना बुरहा मेघडम्बरक सिनेही छलाह तेहने बनबिहह।”
मेघडम्बर नाम सुुनि मुस्कुराइत हुलन बाजल- “काकी, जहिना भगवान विष्णु वामन रुपमे मेघडम्बर ओढ़ैत छलाह तहिसँ बीस कक्काक मेघडम्बर हेतनि। पाँच गोटेक परिवार तरमे अँटावेश कऽ सकैए।”
सुभद्रा देवनन्दनकेँ कहलखिन- “वाउ, अपने तँ गामक किछु बुझै नै छह, हम स्त्रीगणे भेलहुँ। मरदा-मरदीक काज छी। करिया वौआकेँ बजा लहुन।”
सुभद्राक बात सुनितहि गुदरी करिया कक्काकेँ बजबै विदा भेलि।
देवनन्दन हुलनकेँ पुछलखिन- “कारोवार की सभ अछि?”
कारोवारक नाओ सुनि हुलन हरा गेल। मन पड़लै अपन सुगर। भड़भड़ाएल स्वरमे कहए लगलनि- “भाय, गरीबकेँ कियो नीक केनिहार नहि। देवस्थानमे दुहाहि दइले गरीब अछि। जहिना कतबो दुहाइ देनौ गहूमन साँपक बीख नै उतड़ैए तहिना दीनदयाल भजने की हेतइ। यएह गाम छी धनेसर ऐठीन भोज रहए। अपनो सभ अठि-काँठ समेटलौं आ अँइठारमे फेकल अँठि पातमे सुगरकेँ छोड़ि देलियै। तेहने धनेसरक बेटा सेतानक चरखी अछि जे चोरा कऽ पोखरिक माछ मारैले इन्डोसेल अनने रहए। ओहीमे पातपर छीटि देलकै। सभटा सुगर मरि गेल। तइ दिनसँ ने पूजी भेल आ ने फेरि दुआरपर पशु।
हुलन आ देवनन्दन गप-सप्प करितहि रहथि। गुदरी करियाकाकाकेँ बजबैले विदा भेलि। देवनन्दन पुछलखिन- “जखन खेतो ने अछि, सुगरो सभटा मरिये गेल तखन गुजर कोना चलैत अछि?”
देवनन्दनक प्रश्न सुनि हुलनक मनक आशा फुटि कऽ निकलल। मुस्की दैत बाजल- “डाकडर सहाएब, समाज जीवैत रहए....।
सुभद्रा दिशि देखि- ....भगवान काकीकेँ औरदा देथुन। काकीकेँ बुझले छनि जे बारहम-तेरहम मास हिनके दुनू परानीक असिरवाद से गुजर करै छी।”
हुलनक उत्तर सुनि देवनन्दनक मनमे सुनैक उल्लास जगलनि। भुखाएल जेकाँ पुछलखिन- “से की, से की?”
रेगहाए कऽ हुलन कहए लगलनि- “बाउ गरीब लोकक लिये आसीन-कातिक सबसे भारी होइए। मुदा, सभ साल काका हमरा दूटा बाँस शुरुहे आसीनमे दऽ दैत छथि। दुनू बाँस लऽ जाइ छी। ओकरा चिड़ि-फाँड़ि कऽ बरतन बनबए लगै छी। ओना कोनियो-छिट्टाक बिकरी दोगा-दोगी हुअए लगैए। मुदा फुलडालीक संग आरो-आरो समानक विक्री हुअए लगैए। जइसे खूब नीक-नहॉति तँ नहिये मगर गुजर चलए लगैए। ई आशा अखनो अछिये। जावे काकी जीवैत रहती ताबे रहबे करत।”
हुलनक बात सुनि देवनन्दन चौंकि गेलाह। मनमे एलनि जे पिताक कएल कर्म-धर्म कऽ हम मेटा देब। कथमपि नहि। मुस्की दैत कहलखिन- “बाबूक सभ किछु रहवे करतथि।”
देवनन्दन विचार सुनि हुलनक आशा बनले रहि गेल।
करियाकाका बजार जाइक तैयारीमे रहथि पत्नी बुझा-बुझा कहैत रहनि जे अझुका एक-भुक्तक सभ सरंजाम देवनि। बारह-तेरह दिन तँ सभ कियो हुनके काजमे लगि जाएव तेँ आइये तेरह दिनक नोन-तेलक ओरियान नै कऽ लेब तँ बीचमे छुट्टी हएत।”
पत्नीक बात करियाकाका सुनवो करैत, समान अनैक झोरा-झोरी आ रुपैआक हिसाब सेहो मने-मन जोड़ैत रहथि। तहि बीच गुदरी डेढ़ियापर सँ सोर पाड़लकनि- “कक्का, काका।”
टाटक दोगसँ मूड़ी उठा देखलनि तँ गुदरी-डोमिनकेँ देखलखिन। मनमे उठलनि- “जतरा बिगड़ि खराव भऽ गेल। की हएत की नहि।”
मन खसलनि। दोहरवैत गुदरी बाजलि- “काका ते अखैन काकीमे ओझराएल छथि तेँ अनकर बात किअए सुनथिन?”
गुदरीक शब्द वाण करियाकाका छातीकेँ बोधि देलकनि। सान्त्वना दैत अंगनेसँ बजलाह- “कनी काजमे लागल छी। लगिचा गेल। अबै छी।”
मुदा शब्द-वाण छाती बेधि कऽ मैल निकालि देलकनि। विचार जगलनि कोनो काजमे जाइसँ पहिने ककरो देखने ककरो जतरा किऐक भगंठि जेतइ। ई मनक मैल छी। आदमी अपन जिनगी आ कर्मक मालिक स्वंग छी। तखन ककरो दोख लगाएव कायरता छी। गुदरीकेँ सुनवैत पत्नीकेँ कहलखिन- “आब अपन काज ठमकि गेल ताबे अहाँ झोरा, ओरिया कऽ रक्खू। डोमिनक बात बुझि लइ छियै।”
आंगनसँ निकलि करियाकाका दरवज्जापर आवि पुछलखिन- “किअए एते हलचलाएल छी।”
मजवूरीक अवाजमे गुदरी- “कक्का, हम तँ हिनके सबहक -समाजक- लऽ लऽ छी। ई तँ बुझिते छथिन जे सराधमे डोमिनक कते काज होइ छै। एक दिन बीतिये गेलनि। दसे दिनपर नह-केश होइ छै। नहे-केश दिन जँ सभ वरतन नै पहुँचा देवनि तँ येहे की कहताह?”
विचित्र द्वन्द्वमे करियाकाका फँसि गेलाह। एकटा मन कहनि जे सराधक काज तँ सरझप्पी बाद शुरु हएत आइ कोना करब? फेरि दोसर मन कहनि जे भात झंकैले कमसँ कम चारिटा बड़का छिट्टा चीज वौस रखैइयोले आ परसइयोले बीस-पच्चीसटा चंगेरो बनबए पड़तै। तहिपर सँ श्राद्ध-क्रिया वरतन सेहो बनबए पड़तै। दिनो तँ गनले आठटा अछि। जहिमे बाँस काटबसँ लऽ कऽ घरपर पहुँचबै धरिक छैक। छोट लोकक तँ दुर्भाग्यो छैक जे दूटा जवानसँ तेसर एक-ठाम नहि रहए चाहत। भलेहीं बाप-माए होय कि बेटा-बेटी। फेरि मनमे एलनि सुआइत मौगी पुरुखाह आ पुरुख मौगियाह भऽ जाइए। मनमे हँसी एलनि। मुदा लगले पाकल जौ मे पाथर खसलनि। एकरा जखने साय देवइ -काज करैक बान्ह- तखने काज करैक अधिकार भेटि जेतइ। अधिकारमे बाधा देब अनुचित हएत। जँ अखने नहि साय दय देवैक तँ ने बेसी समांग छै जे हाथे-हाथ सम्हारि देतै। मनुक्ख तँ लोहाक मशीन नहि छी जे बटन दाबि देतइ आ ढेरक-ढेर बनवै लगत। कमसँ कम चारि बाँसक काज छैक। काटत, फारत। टोनत। कैमची बनौत। गाड़ा बनौत आरो कते करए पड़तैक। मौगी कतबो लट-लट करैए तँ पुरुख जेकाँ बाँस तँ नहि काटि सकैए। जँ काटियो लेत तँ झोंझमे सँ घीचल कोना हेतै। मन धोर-धोर हुअए लगलनि। आशा जगलनि। काज तँ देवनन्दनक छिअनि। हम समाज भेलहुँ। भलेहीं दुनू गोटेक परिवार जोट्टल आम जेकाँ वा जोटल फूल जेकाँ अछि। मुदा मनुष्य होइक नाते मनुक्खक बात नहि मानियै। समाजक संगे ई वेइमानी हएत। आँखि मूनि कोनो बात मानि लेव ओ खाधिमे खसाएत। मनुष्य दोहरा कऽ एहि धरतीपर नहि अबैत अछि भलेहीं लोक साए बेरि अबैक-जाइक बात बुझए। मुदा हमरा गरदनिसँ निच्चाँ नहि उतड़त। आगू-आगू फनकल गुदरी आ पाछु-पाछु करियाकाका असथिरसँ रास्ता धेलनि। कनिये आगू बढ़ि उनटि कऽ गुदरी आगूमे ठाढ़ भऽ कहए लगलनि- “आब की इहो जुआने-जहान छथि जे नहि बुझथिन। काजक कते छिगरी-तान अछि से नइ बुझै छथिन। ओछाइनपर सँ उठै छी आ काजमे लगि जाइ छी। जलखै बेरिमे छौरसँ वा माटिसँ मुँह धोय पानि पीवै छी। धिया-पूताकेँ खुअबैत-पीअवैत, चरिया कऽ इस्कूल पठवैत गोसाँइ कान सोझे चलि अबैए। हमरा ले कि दोहरा कऽ दिन उगत।”
आगूमे ठाढ़ि बॉहि-फड़का-फड़का गुदरी करियाकाकाकेँ कहनि। अकछि कऽ कहलखिन- “चलू .... बुझलियै...... जे अहाँक बात नहि मानता ओ काजक भार लेथिन। काजक बेरिमे वाय गौंगियाए लगै छन्हि आ हुकुम चलबै कालमे जएह मन फुड़त सएह बाजि देब। जहिना कोनो घर बनवैमे रंग-विरंग काज, रंग-विरंगक समान, रंग-विरंगक ओजारसँ लऽ कऽ रंग-विरंगक बुद्धि लगैत तहिना मनुष्यक समाज बनवैक लेल मनुष्यकेँ बुझए पड़ैत अछि। दरबज्जापर अवितहि करियाकाका देवनन्दनकेँ पुछलखिन- “किअए बजेलहुँ?” देवनन्दनकेँ बजैसँ पहिनहि हुलन किछु कहए लगलनि मुदा, हुलनकेँ रोकैत करियाकाका कहलखिन- “रघुनी भैयामे हमरो साँझी अछि। तेँ किनको बिगाड़ने हम हिस्सा दुरि नहि हुअए देव। तोहर जे काज छह ओकर मालिक तों छह। जइ चीजक जरुरत हुअ ओ कहि दाए।”
हुलन बाजल- “बाँस।”
“वीट देखले छह। जते सँ काज हुअ काटि लिहह।”
विचहिमे सुभद्रा शीलाकेँ कहलनि- “कनियाँ, साय दए दिऔक।”
आंगनसँ शीला पँचटकही आनि गुदरीक हाथमे दऽ देलखिन। रुपैया लैत गुदरी बाजलि- “काल्हि बेरिमे आवि सुपा-चालनि बान्हि देवनि काकी।”
काज हल्लुक होइत करियाकाका मने-मन सोचलनि जे अधे घंटा ने देरी भेल कने रेसेसँ चलि जाएव। नै तँ कनी अबेरे हएत की ने। काजक दौरमे एहिना होइ छै। तहि बीच दुनू परानी हुलनकेँ दू लग्गा आगू आगू-पाछु जाइत देखलनि। गुदरीकेँ पति दिशि घुुमि हँसि कऽ किछु बजैत देखलनि। हुलन- “किछु छियै तँ राज-दरवार छियै। मुँह माँगा। आब तँ नवका-नवका लोक सभ भऽ गेल किने। ने ते वाउ कहै जे रघुनी भायक बावा जे रहैनि से बेटीकेँ खोंछिमे पाँच बीघा खेत देने रहथिन। से जँ नइ देने रहितथिन्ह तँ बाल-विधवाकेँ की दशा होइतै।”
गुदरी अपना विचारमे ओझड़ाएल तेँ हुलनक बात सुनवे ने केलक। तहि बीच करियाकाका हुलनकेँ सोर-पाड़ि कहलखिन- “सिदहा नेने जा। वेरु पहर बाँस लऽ जहिहह। काजमे विथूत ने होय।
सुभद्रा उठि आंगन विदा भेलि। कि पाछुसँ शीलो गेलीह। हुलन दरवज्जाक आगूमे ठाढ़ रहल आ गुदरी सिदहा आनए आंगन गेलि। हुलन करियाकाकाकेँ कहलखिन- “करिया काका, जावे जीवैत रहबै ताबे संबंध रहबे करत। ओना आब डॉक्टरो भाय बाहरे रहए लगलथि, हमरो सबहक धियापूता अपन व्यवसाय छोड़नहि जाऽ रहल अछि।”
हुलनक बातकेँ करियाकाका व्यवहारिक बुझलनि। मुदा देवनन्दनक नजरि अपन अगिला जिनगीपर पड़लनि। मने-मन सोचए लगलथि रैविये-रवि तँ नहि, मासो-मास आएव ओते जरुरी नहि अछि। मुदा तीनिटा जे मौसम- जार, गरम आ वरखा होइ छै ओहिमे आवि जँ मौसमी रोगक दवाइयोक आ इंजेक्शनो दऽ दिअए। तँ कि हमर सामाजिक संबंध बड़कराड़ रहत कि मरि जाएत। कि डॉक्टर भाय वुझि भैया, काका, बाबा, कहत। सामाजिक संबंधकेँ यएह डोर बान्हि कऽ रखैत अछि। जहिना साओन-भादोमे बावा वैजनाथक डोर कँवरियाकेँ लगि जाइत।”
परिवारक सिदहा आ जारन देखि गुदरी निचेन भऽ गप-सप्प पसारि देलक। घरक व्यवहार बुझल तेँ गुदरी चारि हाथक साड़ी फाड़ि कऽ बनौलहा टुकड़ा लइये कऽ आइलि छलि। जरनाक बोझक लेल बीरबाक जरुरत सेहो होइत। सुभद्राकेँ कहलकनि- “काकी, हमरा सबहक अपलेशन डागडर वौआ करै छथिन?”
गुदरीक बातकेँ मजाक वुझि सुभद्रा चुपे रहलीह। शीला बाजलि- “केहेन अपरेशन?”
“आरो कोन अपलेशन। उहाए धिया-पूताबला।”
“होइबला कि नहि होइबला?”
“अपलेशन केने धिया-पूता हेबो करै छै आ नहियो होइ छै।”
“जहन अपलेशनसँ धिया-पूता होइ छै तहन पुरुखे लऽ कऽ की हेतइ।”
कहि उठि कऽ ठाढ़ होइत गुदरी बाजलि- “काकी, आव तँ आवा-जाही लगले रहत। काजक अंगना छियै कते रंगक चीज-वौसक खगता हेतनि। नै किछ ते देह तँ अछि। लोके-काज लोककेँ होइ छै।” दुनू परानी मुस्कुराइत गाछी ठेकना सोझे विदा भेल। जहिना धारमे सुगरकेँ घाटक जरुरत नहि होइत मुदा, जाएत सोझे हिया कऽ, भलेहीं कतेको-बेरि घुरि-घुरि आबए पड़ै। तहिना सुगर पोसनिहारोक चालि। कोना नै रहतै जिनगी तँ सुगरे चड़वैक पाछु बीतलै।
शीशोक झाँखियो आ मोट-मोट गोटनो देखि दुनू परानी आनन्दसँ बैसि गप-सप्प करए लागलि।
गुदरी- “कहुना तँ पनरह दिन चलवे करत।”
हुलन- “सुखलो अछिये।”
करियाकाका उठि कऽ विदा होइक विचार करितहि रहथि कि कुसुमलाल पंडितकेँ धड़फड़ाएल अवैत देखते बुझि गेलखिन जे आब वजार गेल नै भेल। फड़िकेसँ कुसुमलालकेँ कहलखिन- “आवह, आवह पंडित। तोरासँ बहुत बुझैक अछि। से तँ बुझिते छहक जे काजक अंगना छी।”
मुस्की दैत कुसुमलाल कहलकनि- “हँ, से तँ छीहे?”
अंगना दिशि बढ़ैत, मने-मन करियाकाका सोचैत जे कमसँ कम एक घंटा बजलाक बाद मन ठंढ़ेतै। भलेहीं कौल्हुके सभ गप किअए ने दोहरबै। पाँच गोटेकेँ एकठाम वैसार बनिते बजैक समए निर्धारित हुअए लगैत। कुसुमलालो तँ पाँच गोटेक वैसारमे रहैत अछि। तहूमे अखन तँ आरो फीरीसान रहैए। धरवालीक गट्टा टुटि गेल छै, एकटा बेटा भीने छै तेँ ओकर अधिकार -माए-वापक- कटि गेल छै। दोसर बेटा, जे साझी छैक, दिल्लीमे नोकरी करै छै। पुतोहूकेँ आठम मास। तीनू जमाए परदेशी तेँ अपन घर-दुआर छोड़ि कोना बेटी देखत। तइपर धनकटनी, गहूमक बौग संगे बड़दकेँ फाड़ लगि गेलै। मुदा तेँ कि कुसुमलालक मन खुशी नै रहै छै अपन दोख हटा बेटा-बेटीकेँ जानकारी दइये देने अछि। किअए परिवारक कियो दोख लगाओत। बीमारी रहितहुँ बुढ़वा घरकेँ थितमारि कऽ रखने छथि। सभ धान कटिये गेल। आब गहुमो वौग भइये जाएत। हमरो पलस्तर भइये गेल अछि। बीस दिन आओर बान्हल रहत तकर वाद तँ दुनू वाल्टीन उठेबे करब। हमरा कोन टूटल अछि अनका तँ जाँघ टुटि जाइ छै, छाती टुटि जाइ छै। फेरि ओकरा छुटै छै की नै? तेँ खुशी। भगलाहि पुतोहू कखनो अपन माए-बापकेँ गरियबैत तँ कखनो पतिकेँ। सासु अपने रोगी। एतेक रहलाक वादो कुसुमलालक मन सदिखन खुशी रहैत। जखन कतौ काज करए विदा होइत तँ पुतोहूक भगलपाना पर हँसैत तँ कखनो बेटीक दिन-दुनियाँपर खुशी होइत। एत्ते कम्मल ऊनी कपड़ा तँ बेटिऐ-जमाऐक देल छी। तखन तँ तीनू बहिनि आबि कऽ भेंटि-घाँट कइएे लेलकै। इलाजो लेल पँच-पँच सौ तीनू देबे केलकै। जावे थेहगर छी ताबे......।
करियाकाका घुरि कऽ अंगनासँ आबि पुछलखिन- “अच्छा पंडित, भनसियाक समाचार कहह?”
“बीसम दिन पलस्तर कटि जेतइ। मुदा अखैन हम औगताएल छी काजे भरि गप करु।”
“तोहीं बाजह?”
“कर्मक बरतन तँ नापल अछि मुदा, सभसँ झनझटिया दहीक तौलाक अछि की ने। सरधुआ बरतनक दसम एगारहम दिन काज हएत। मुदा दही तँ तीनि-चारि दिन पहिने पौड़ल जाएत। एक दिन बीतिये गेल। पाँचम-छठम दिन तौलाक काज पड़ि जाएत। माटिक बनैमे तीनि दिन टेम लगै छै। तहिना पीटैइयो-सुखबैमे तीनि दिन लगिये जाइत छै। तखन एक दिन आवा लगत। आब हिसाब जोड़ि कऽ देखियौ जे आइसँ हाथ नै लगाएव तँ काज कोना सम्हरत।”
कुसुमलालक बात देवनन्दनकेँ ओजनगर बुझि पड़लनि। बजला किछु नहि। मुदा मूड़ी जे डोलवैत रहथिन से सुनैबला कि मानैबला, से कुसुमलालकेँ बुझवामे नहि अवैत।
हँसैत करियाकाका कहलखिन- “पंडित, तोहूँ जीवनीसँ अनाड़ी भऽ जाइ छह। रघू भैयाक काज अनकर वुझै छहक जे पूछैले ऐलह?”
“नाइ से तँ नहिये छियनि। तखन तँ फेरि काजे छियै। चारि गोटेमे चरचा भेने छुटल-बढ़ल सब बात सभकेँ नजरिपर आवि जाइ छै। अखैन जाइ छी....।
मुस्की दइत- ....काजक तेहेन छिगरी तान भऽ गेल अछि जे घरमे कड़ू कि समाजमे सबदिन सभ कियो एक-ठीन बैठि कऽ हाँ-हाँ हीं-हीं करै छी से आब अइ अवस्थामे छुटि जाय, केहेन हएत? अखनेसँ मुरदा बनि घरमे ओंझरा जाय। के खुट्टा गारि कऽ रहैले आएल अछि जे सभ दिन रहबे करत। तखैन ते जाबे घटमे परान ताबे अइ दुनियाँक लीला देखैए।”
करियाकाका- “ऐँह, तूँ ते तेहेन गप पसारि देलह जे चाहो पीबि बिसरि गेलहुँ।”
करियाकाका इशारा पानिकेँ आगू बढाएव छलनि। मुदा पानिक गति तँ सदिखन निच्चे मुँहेँ चलैत अछि। देवनन्दन आशाकेँ सोर पाड़लखिन। आंगनमे शीला बुझि गेलखिन। आशाकेँ कहलखिन- “वाउ, दरवज्जापर पापा शोर पाड़लनि, सेहो बुझि लेव आ काए गोटे छथि सेहो गनि कऽ आएव।”
दरवज्जाक कोनपर आशा गनिये रहलि छलि कि फाँड बन्हने, माथपर तौनी नेने राजेसरकेँ अवैत देखि करियाकाका जोरसँ बजलाह- “आवह-आवह राजेसर। चाह छुटि जेतह?”
“चारि लग्गा फड़िक्केसँ राजेसर बाजल- “करियाभैया, जहिना स्वाती नक्षत्रक अमृत रुपी जल सैकड़ो हाथ समुद्रक पानिमे टपैत सितुआक मुँहमे पहुँच मोती बनि जाइत अछि तहिना जइ अन्न-पानिमे हमर अंश चलि गेल अछि ओ घुमैत-फिड़ैत हमरे लग चलि आओत....।
हाथ उठवैत- ....दना-दानामे लिखल अछि खेनिहारक नाओ।”
“अच्छा आवह। तोहर काज तँ आइ भोरे छेलह?” करियाकाका पुछलखिन।
चानिपर उल्टा हाथ लैत राजेसर- “भाय सहाएब, कते तिल अइ गामक खेने छियै से नहि कहि। लोको सभ तेहेन बिजकाठी भऽ गेल अछि जे झगड़ो कड़ू तँ दिन-राति कखनो छुट्टी नहि भेटत कियो कि एक्को मिनट चैनसँ ककरो रहए दिअए चाहै छै। घरसँ बाहर घरि एक्के रमा कठोला।”
“अच्छा खिस्सा छोड़ह। काजक गप करह?”
“मुस्की दैत राजेसर कहए लगलनि- “भाय, ऐना आन जेकाँ किअए बुझै छी। जखने माया-जालमे पड़ल छी तखने तँ तवाही रहवे करत की ने। तेँ कि समाजक काज छोड़ि देव। हमरा सबहक खूँटा जहिना रघु भाय छेलाह तहिना हुनकर अंतिम काज सेहो खूँट्टे जेकाँ हेतनि।”
राजेसरक बात सुनि देवनन्दन चौंकि गेलाह। हिनका -पिता- सबहक दोहरी चालि जिनगीक छन्हि। जीवनक एक चालि छन्हि आ लोकक बीचक दोसर। जना सौँसे गामक ठकदरुआ ई सभ होथि आ हिनका सबहक ठकदरुआ सौँसे गाम होनि। मुदा साकांक्ष होइत तीनूक -करियाकाका, कुसुमलाल आ राजेसरक- गप-सप्प सुनए लगलथि। तखने शीला तस्तरीमे चारि कप चाह नेने पहुँचलीह। खाली चाह देखि कुसुमलाल मुस्की दैत बाजल- “आँइ यौ करिया भैया, कुम्हारक टेमकेँ अहाँ एहिना बुझै छियै। जते काल चाहले वैसलौं तते कालमे तँ पाइ रखैबला बैंक कत्ते गढ़ि नेने रहितौं।”
कुसुमलालक इशारा बुझि शीला तस्तरीकेँ पतिक आगू चौकीपर रखि चोट्टे आंगन घुरि विस्कुटक पॉकेटक कागज फाड़ितहि दरवज्जापर पहुँचलीह। बिस्कुट देखि करियाकाका कहलखिन- “कनियाँ, अहाँ पानि नेने आउ। हम बिस्कुट वाँटि लइ छी।”
सोलहो विस्कुटमे सँ पँच-पँचटा कुसुमलाल आ राजेसरकेँ देलखिन। तीनि-तीनिटा अपने दुनू गोटे देवनन्दन सहित लऽ दुनू गोटे दुनू गोटे दिस देखए लगलथि। स्वादिष्ट नमकीन विस्कुट मुँहमे चिबवैत राजेसर बाजल- “चारि बजे भोरेसँ भाय खटै छी। खाइयोक छुट्टी नै भेल। मुदा भगवानो तेहने अहारो देलनि। भऽ गेल भरि दिनका कोइला-पानि। दस बजे राति घुमि कऽ तकैइयोक काज नै। एकटा विस्कुट खाए एक-गिलास पानि पीबि शीलाकेँ गिलासमे पानि भरैक इशारा करैत बाजल- “कनियाँ एक दिनक खिस्सा छी। पानियो वाँटू आ खिस्सो सुनियौ। एक गोटेकेँ पता माने निमंत्रण दइले छह कोस पाएरे गेलहुँ। भिनसुरका चलल डेढ़-दू बजे दिनमे पहुँचलौं। थाकियो गेल रही आ भूखो लगि गेल रहए। मुदा बुढ़ी जे रहथिन से महा-सोभावी मुँहसँ मधु चुबैन। जाइते गेलहुँ कि अपने विछानपर वैइसैक इशारा करैत जजमान आ पसारीक गप पसारि देलनि। हमर मन तँ जरले रहए। तइओ घंटा भरि जी-जाति कऽ सुनलौं। तखन खिसिया कऽ कहलिएनि- “हमरा घुमैमे अन्हार भऽ जाएत। जाइ छी।”
धड़फड़ा कऽ उठि पुतोहूकेँ कहलखिन- “कहुना भेला तँ कुटुमक गामक नौआ भेलाह। चाहो-पान नहि खुएवनि-पीएवनि, से केहेन हएत?” मनेमे आएल जे ई सभ गामोमे परदेशिये छथि। शहरमे रहैत-रहैत मूस जेकाँ, समाजोक जालकेँ काटि रहल छथि। चाह पीबि-पान खा ओतै विचारि लेलहुँ। जे झाड़ा-झपटा कमले पेटमे करब। किरिण डूविते जे पूवरिया छहर टपि जाएब तँ दोसरि-तेसरि साँझ धरि गाम पहुँचिये जाएव। बटखरचा लेल पाँचटा रुपैया देने रहथि, भूखे छटपटी धेने रहए। कमला धारक ठंढ़ेलहा पानिमे जहाँ पएर देलियै कि पैखाना सटकि गेल। मुदा लघी लगि गेल। पूबरिया छहर टपि झंझारपुर वजारमे तीनि रुपैआक छोला-मुरही खेलौं पानि पीलौं कि जानमे जान आएल।”
“कोन गपमे बौआइ छह राजेसर भाय? काजक गप करह?” कुसुमलाल बाजल।
“विस्कुट खा पानि पीवि चाहक गिलास हाथमे लइते राजेसर शीलाकेँ कहलनि- “कनियाँ, जँ विस्कुटे खुएबाक छलए तँ पहिने पानि विस्कुट अनितौं। एक तँ बेचारी अपने बेइज्जत भऽ चाहसँ पानि भऽ गेली। तहिपर सँ हमहूँ सभ कते बेइज्जत वेचारीकेँ करबै।”
राजेसरक बात सुनि एक लाड़नि चलवैत देवनन्दन बजलाह- “बेइज्जतीक बोनमे तँ नम्हरे वेइज्जतक गाछक इज्जत होइत।”
काजकेँ देखैत करियाकाका गपक रास्ता बदलि कहलखिन- “कनियाँ राजेसरकेँ भाँड़ी जेकाँ ऐहेन गिलासमे नहि पौआही गिलासमे चाह देवनि। अच्छा, राजेसर आइ तँ गाछियेमे कर्म हेतइ?”
अपन काज अगुआएल देखि राजेसर बाजल- “भाय, आँझुका गप कि कहू। एक तँ तेहेन-तेहन सिफलाहि मौगी सभ गाममे चलि आएल अछि जे होइए जे झब दऽ मरि जाय जे ऐहन-ऐहन मनुक्ख सभसँ पिण्ड छूटत।”
“से की?”
“की पूछै छी। पहिलुके नीन रहए। करीब एगारह-बारह बजे राति रहए। गोपला घरमे आगि लगि गेलइ। ओकरे मिझवैमे दू-बाजि गेल। सौंसे देह थाल-कादो सेहो लगि गेल रहए। ओकरे धोइत-धाइत तीन बजि गेल। ओछाइनपर एलौं कि अझुका काज सभ मन पड़ल। छुतका बला केश कटैक अछि। खवरि दइले पुरहित-पात्र ऐठाम जाइक अछि। तहिपर सँ परसुए, जुगेसरा कहि देने रहए जे कनी केशो नीक जेकाँ छाँटि दिहह। आ बरिआतियो चलिहह।”
करियाकाका- “अखन लगन कहाँ छै?”
राजेसर- “अहाँ कोन जुग-जमानाक गप्प बजै छी भाय। क्यो जे कोटमे विआह करैए से लगन देखि कऽ। तहूमे कि जुगेसराक विआह हेतै कि चुमौन करत।”
“केहेन कनियाँ छै?”
“ऐह हद भेल भाय। कन्याँ बच्चोकेँ कहल जाय छै आ सासुरो बसनिहारिकेँ। जुगेसराकेँ तेसर छिअए आ कनियाँ के चारिम।”
“दुनू तँ उड़नबाजे बुझि पड़ैए?”
“भाय, मनुक्खमे सब गुण होइ छै। पालतुओ चिड़ै बोनाए जाइ छै आ बोनेलहो चिड़ैकेँ पकड़ि पोसा बना लैत अछि।”
“चाहक गिलास हाथसँ पकड़ैत राजेसर शीलाकेँ कहलकनि- “कनियाँ, काकाीकेँ सभ बुझले छनि। हुनका हमर नाओ कहि देवनि। डालीक ओरियान करतीह। जावे तक छौरझप्पी नै हएत ताबे तक गाछिये मे पुजौल जाएत।”
शीला आंगन जा सासुकेँ कहलनि। दरवज्जापर सभकेँ चुप देखि राजेसर डॉ. देवनन्दनकेँ कहलकनि- “डाकडर सहाएव, हमर काज माने नौवाबला काज पहिले दिनसँ शुरु भऽ जाइए। काजो दोहरी। एक दिशि पूजवैक प्रक्रियामे डाली सजौनाइ दोसर दिस कठिआरीबला सभ परातेसँ केश कटबऽ लगैत अछि। ई तँ एकटा काज भेल। जँ गाममे एकटा काज हएत तखन। जँ दोहरा-तेहरा गेल तँ काजो दोहरा-तेहरा जाएत तइपर सँ जन्मौटी छुतका भिन्ने। कते दिनसँ मनमे होइए। जे एकटा नांङरि माने गाए-महीसि दुआरपर रखितौं से पारे लगनाइ कठिन अछि। इम्हर श्राद्ध कर्ममे हम छअ आना हिस्साक भागीदार छी तइमे हथ-उठाइ किछु कर्ताक निछुड़लाहा भेटैए। झलफाँफी धोती माटिक वरतन आ किछु हथ-उठाइ भऽ गेल।”
राजेसरक बात सुनि देवनन्दन तरे-तर सर्द हुअए लगलाह। आँखि उठा करियाकाकापर देलखिन। करियाकाका राजेसरक मुँह दिशि तकैत। जना रसगुल्ला खसतै आ लपकब। रसगुल्ला तँ नहि एलनि मुदा, रसगुल्लाक रस जरुर आवि गेलनि। मुस्की दैत कहलखिन- “राजे, जे बेसी मनुक्ख लेल खटत आ कमसँ कममे अपन जिनगी चलाओत ओहिसँ बेसी इमानदार अइ घरतीपर के अछि?”
धरमक एकटा बाट तँ इमानो छिअए।
मने-मन देवनन्दन तइँ केलनि जे पिताक कर्म करौनाइ हमर जिम्मा छी। जे कोनो काज हएत ओकर नीक-अधलाक भागी के हेतै। गाममे जतऽ जे होइ छै होउ। मुदा अपना एहिठाम ऐहन अनुचित नहि हुअए देबैक। फेरि मनमे शंका उठलनि जे एहि बातकेँ पूरबासय कोना कएल जाय? पूर्वाशयक अर्थ की पूर्ब$आशय। समाजक जे अधिकांश लोकक कानमे रहैत छैक ओकरा की मानल जाय।”
रंग-विरंगक तर्ककेँ मनमे उठैत देखि सोचलनि जे दुनू पार्टीक माने पुरोहितक नौआक बीच काजक संबंध अछि। सझिया काजक फल तँ सझिया होइत। कते साँझी? तेकर की आधार। से नहि तँ दुनू गोटेमे करथि। सोझक जे निर्णए दुनू गोटे करता तँ हमरा मानैमे की लागत। मन असथिर भेलनि।
चारिम दिन। गाछीमे सरझप्पी केला उत्तर कर्म सम्पन्न भऽ गेल। शिव शंकर गाछियेमे भोजन कऽ नेने रहथि। करियाकाका हाथमे कोदारि नेने आगू-आगू तहि पाछू शिव शंकर आ देवनन्दन। तहि पाछू परिवारक सभ। तीनू भाँइयो-वहीनि आ सासुओ-पुतोहू। आंगन अबितहि सभकेँ बुझि पड़लनि जे जना-आगूए-आगू रघुनन्दन आवि गेला। हुनके बनाओल घर-दुआर, पानिक चापाकल संग-संग सभ किछुमे सन्हिया गेल छथि। जँ हुनकर घरारी स्मारक बनै तँ सभ दिन ओहि स्मारकमे दर्शन दितथिन्ह। मने-मन पिताकेँ स्मरण करैत देवनन्दन संकल्प लेलनि जे पिताक देल जे किछु अछि ओ एहि समाजक छियै। हम तँ अपने तते कमाइ छी जे गामो अबैक छुट्टी नहि होइत अछि। बेटी सासुर जाएत। बेटो कतौ नोकरी करत। की बाप-दादाक देल सम्पत्ति हम आनठाम दऽ अविऐक? तखन गामक मनुक्ख अनतऽ जाए भलेहीं अपनाकेँ अगुआ लथि मुदा, गाम तँ तरका जाँत जेकाँ पड़ले रहि जाएत। चलत कहिया। की जँ दुनू चक्की मिलक चक्की जेका चलए लगए तँ कि गहुमक आटा नहि पीसल जाएत। जरुर पीसल जाएत। पिताक देल सम्पत्तिक जे आमदनी अछि ओकरा भोज आ अपना दिशिसँ गरीब बच्चाकेँ पाँच हजार रुपैयाक किताव, पाँच हजार रुपैयाक दवाइ समाजक बीच पिताक मृत्युक दिन उपहारस्वरुप देवइ। एहिसँ खुशीक बात ई होएत जे हुनका -पिताकेँ- जनमे दिनक तिथिकेँ दितिऐक। बच्चाक संग-संग किअए नहि खेलथि। किऐक हुनकर मृत्यु शरीरकेँ मृत्यु बुझिअनि? मुदा, हुनकर जन्म-कुण्डली तँ नहि भेटत? स्कूल गेबे नहि केलाह। तखन की करब?
मनमे नव उत्साह जगितहि करियाकाकाकेँ कहलखिन- “कक्का अहाँ सभ एक बतारी छी। हमरासँ बेसी देखने छलिएनि। अखने बैसि कऽ अगिला कर्मक विचार कइये लेब। शंकरो भाय छथिये।”
देवनन्दनक बात सुनि, अपन आमदनी शिव शंकर देखलनि। मनमे गुद-गुदी लगलनि। पानक पीत फैकैत बजलाह- “बेजाए कोन? अखन सभ समटाएल छी फेरि समटैमे समए लागत। तते करियाकक्का ठेलि-ठेलि कऽ खुऔैलनि जे आराम करैक मन होइए।”
अपन चावसी सुनि करियाकाका नजरिमे नाचि उठलनि खेतक आँड़िपर वैसि गप्पक संग-संग तमाकुलो खाथि। मन पड़लनि गुनाक गीत। तहियाक छीतन आइयो संग-संग अछि। मन पड़लनि समाज। आइ जे समाज एक भऽ भाय-सहाएबकेँ विदाइ देलनि कि ई उचित होय जे लोक अपन-आन गामक जातिकेँ भोज खुअबैत आ अपन ओहन समाजक बच्चाकेँ कनैत सुनियै, जे बेरि-विपत्तिमे सदिखन लगमे रहैत अछि। जते खुशी शिव शंकरक बात सुनि भेलनि तहिसँ वेसी कचोट मनमे उपकि गेलनि। बजलाह- “जखन तेरहे दिनक बीच काज नापल अछि तखन तँ अधिकसँ अधिक समाजक उपयोग होएव जरुरी अछि। हम सुन्दर भायकेँ बजौने अबै छिअनि?”
करियाकाका बात सुनि देवनन्दन कहलखिन- “अहाँ कोदारि पाड़ि कऽ एलहुँहेँ, आशाकेँ पठबै छिअए।”
देवनन्दनक बात सुनि करियाकाकाकेँ हँसी लगलनि। बजलाह- “डॉक्टर सहाएव, आशा जा कऽ की कहतनि?”
“बजवै छथि।”
“कथीले?”
“तखन चुप।”
“जँ भैया बुझैत जे कोनो छोट-छीन काज अछि तँ अपन नमहर काजकेँ सम्हारि जाएब। तखन औताह? से नइ तँ अपने जाइ छी।”
करियाकाकाकेँ विदा होइतहि दयानन्द (देवनन्दनक वेटा) केँ कहलखिन- “बाउ, एक लोटा पानि पीआउ। हमरो अहाँक परिवार कोनो बाँटल अछि अहाँक मात्रिक बरिआती हमहूँ गेल रही। अहाँ सभ तँ परदेशी भेलि जाइ छी। हमरा ओहिना मन अछि उपनयनसँ तीनि दिन पहिने दालि-भात, तड़ूआ तरकारी, दही-चीनी खेने रही। अहीं सबहक अन्नपर हमहूँ सभ ठाढ़ि छी.....।
पानि पीबी- .....अखन दुइये गोटे छी, तेँ कहै छी। पुजबैत-पुजबैत हमरा सबहक परिवार निच्चाँ मुँहेँ ससरि गेल। अपने बात कहै छी। राजविराजसँ तीनि कोस आगू तक बावूकेँ जजमनिका रहनि। जखन ओहि इलाका जाइ तँ मास-मास दिन परदेशे जेकाँ रहि जाइ। सेवा खूव हुअए। खेनाइ-पीनाइक कमी नहि। हमरा तँ एतऽ सँ नेपाल धरि ने धांगल अछि। अपना सभ तँ कनी हटल छी तेँ ने, नै तँ जना-जना उत्तर मुँहेँ जेवइ तेना-तना बाजव-भुकब, खेती-बाड़ी, माल-जाल मिलल-जुलल देखवै। कथा-कुटुमैती, भोज-काज अइपार ओइपार होइते अछि। सीमाकातमे अइ भागक लोक ओइ भाग जा हाट-बजार करैत अछि आ ओइ भागक अइपार। जना-जना आगू मुँहेँ बढ़बै तेना-तेना पानियो आ बोलियोमे अन्तर वुझाएत। तेकर कारण छैक उत्तरवरिया पहाड़। बावूकेँ खूब आमदनी होनि। भरि-भरि दिन भाँग-खाय दरवज्जापर बैसि तास खेलल करी। “लघु-सिद्धान्त” पढ़ैमे एगारह वर्ख लागल रहए। मुदा बावूक संग पूरैत-पूरैत अपन जीविकाक सभ लूरि भऽ गेल। पढ़ैमे मझिला भाए चन्सगर। खूब पढ़ि कऽ नीक नोकरी करै छथि। कहि देलनि जजमनिकासँ हमरा कोनो मतलब नहि हम मेहनत करब। मेहनतक अन्न खाएब। तखन धिया-पूताक संस्कार तेज हेतइ। सभसँ छोटका बकनाएल अछि। दिल्लीमे भाए नोकरीयो धड़ा देलकनि तँ तते कमाथि जे पेटो ने भरनि। मुदा समाजमे प्रतिष्ठा बनौने रहथि”
प्रतिष्ठाक नाओ सुनि दयानन्दक मनमे भेल जे एक दिशि कहै छथि जे बकना गेलाह आ प्रतिष्ठितो कहै छथिन। मनमे अचड़ज भेलैक आँखिमे आँखि गरा पुछलकनि- “की प्रतिष्ठा?”
दयानन्दक प्रश्नकेँ हल्लुक बुझि बजलाह- “बौआ, अखनो अधिक खेनिहार लोककेँ प्रतिष्ठित मानल जाइत अछि। एत्ते दिन ई प्रतिष्ठा भोज-काजमे भेटैत छलैक आब घरे-घर भऽ गेलइ। हम कतेक रुपैआ खेनाइपर खर्च करै छी एहिक भीतर प्रतिष्ठा आवि गेल अछि। भलेहीं हजार रुपैया प्रतिदिन परिवारक भोजनमे खर्च किअए ने करथि मुदा समाजक लोक जँ डेरापर आबि जेताह तखन या तऽ गेट खोलि भेंटे नहि देवनि या तँ भेंटो देवनि तँ गामक- हालि-चालि पुछि कहवनि जे पत्नी नोकरीक ड्यूटीमे छथि तेँ डेरामे चाहो पीयाएव मोसकिल अछि। वेचारा हाले-चाल की कहतनि जे बेसी समयो लागत। ने जिनगीक भेंटि आ ने एकठाम रहैबला। हँ, तँ कहै छलहुँ अपन भाइयक विषएमे। साल भरिसँ महंथ भऽ गेल अछि। देखलिऐक तँ नहि मुदा, सुनै छी अपनो चिट्ठीमे कताक बेरि लिखिलकहेँ। ओना भाए छी आगि नहि उठेबै, नअ-दस माससँ लत्तो-कपड़ा आ हजार रुपैया महिनो पठबैए। मुदा आफद की एकटा अछि? साल करीब भऽ गेलनि। कनियाँ एतै छथिन। एकटा बच्चो छन्हि। फोन केलिये जे दसो दिनक लेल गाम आबि वालो-बच्चाकेँ असिरवाद दऽ दहक। आब तँ तोँ महंथ भऽ गेलह....।
देवनन्दन दिस मुँह घुमा कऽ मुस्की दैत- ....भाय, की जबाव देलक से बुझिलिऐ, कहलक जे स्थानक की हमरा खातिआन बनल अछि। भरि दिन भरि राति कतौ रहू मुदा, साँझ-भिनसरकेँ घड़ी-घंट बजा आरती गवए पड़त। मुदा आब चढ़ौआ सभ सेहो हुअए लगलहेँ। भरि गाम-घरक स्त्रीगणसँ लऽ कऽ बजार धरिक जनिजाति सदिकाल अबिते रहैत अछि।”
देवनन्दन- “भावोओकेँ ओतै पठा दिअनु?”
शिव शंकर- “से तँ अपनो लिखैए जे विदागरी कऽ कए नेने अबिअनु। मदुा एकटा आफत रहै तब ने आफतपर आफत अछि। एक तँ कनियाँ जाइले नहि गछैत छथि। कोना उपकैर कऽ घरसँ विदा कऽ दिअनि। मुदा बात सेहो नहि अछि दोसरो बात अछि। एक बेरि विवाह-पंचमीमे जनकपुर नैहरक संगी संगे गेलीह। लोकक ठठ्ठ, दिन-राति यात्री इम्हरसँ उम्हर नचिते। एक ठाम एकटा नंगा स्थान लग बिजली कटि गेलइ। जहाँ-तहाँ अपन-जोरी -संगी- छोड़ि यात्री सभमे हरा गेल। हमरो भावो हरा गेलीह। ले वङौड़ रौतुका हराएल दिनोमे ने गौँवा भेटलनि हिनका आ ने ई भेटलखिन गौँवाकेँ। मुदा हरेलखिन नहि। वौएलखिन सभ यात्री तँ अपने इलाकाक रहै की ने। नानी गामक संगी भेटिलनि। जहिना धारमे बाँस वा रस्सी पकड़ि-पकड़ि लोक धार टपैत तहिना बेचारी नानी गामसँ मेजमानी करैत सात दिनक पछाति गाम ऐलीह। से मन उड़ल छनि।”
देवनन्दन- “सभ स्त्रीगण शहर जाए जाहैत अछि अहाँ उनटे कहै छी?”
मुस्की दैत शिव शंकर- “ऐह भाय, ओहूँ अनाड़ी जेकाँ बजै छी अपन जे मिथिलांचल अछि, एहि क्षेत्रमे कतौ लोक मैथिली बाजि जिनगी गुदस कऽ सकैत अछि। मुदा जहिठाम भाषाक दूरी, जीवन-शैलीक दूरी अछि तहिठाम कि गिरगिट जेकाँ सात बेेरि जिनगी बदलि सकैत अछि। रहल बात जीवाक उपायक? तँ कि जहिठाम मनुष्य रहत ओहिठाम कोनाे वस्तुक उत्पादनक जरुरत नहि अछि। की हमरा सभकेँ शिक्षा वा दवाइक जरुरत नहि अछि आकि भोजन-वस्त्रक। मनोरंजनक जरुरत नहि अछि आकि कला-संस्कृतक। मुदा ई के करत? जेकर छिअए से बोहू लऽ लऽ शहर घुमैए तँ कि सोझे सीते भूमि कहने अयोध्यासँ राम औताह। मुदा छोड़ू दुनियाँ-जहानकेँ। अखन जे काज सोझामे अछि पहिने तकरा देखू। हँ तँ जाधरि कारियाकाका आ सुन्दरकाका नहि पहुँचलाह तहि बीच एकटा आरो कहि दैत छी। राज-विराजसँ तीन कोस उत्तर धरि हमरा बावूकेँ जजमनिका छलनि। लोकोक धारणामे श्राद्ध-कर्मक महत्व छलनि। जहिसँ आमदनियो नीक छलनि। अखुनका जेकाँ जिनगियो फल्लर नहि छलैक। लोको विसवासू। आँखि देखा कऽ ककरो कियो वेइमानी नहि करैत। जहाँ-तहाँ बावूओ अपन समान -वरतन-कपड़ा- रखि देथिन कपड़ाक कते जरुरते परिवारमे रहैत छल। जहिसँ राजसी ठाढ़मे जीवन बितौलनि। जखन मुइलाह तखन चारु दिशिसँ भूत पकड़ि लेलक। भाय कहलनि जे नोकरिये करब। अपन परिवार लऽ कऽ चलि गेलाह। काजे-उद्यममे पाहुन जेकाँ अवैत छथि। दोसर भायक कहवे केलहुँ जे गामक फेदार मोरगंक दफेदार भऽ गेल। सुनै छी जे भरि-भरि दिन नानीक सिखैलहा खिस्सा सभ मौगी सभकेँ सुनवैत रहैए। खाएर, किछु करह। हमरो तँ कपार नहिये चटैत अछि। अखन की भऽ गेल अछि जे अल्लापुरक सभ जाति अपने-अपने पुजबै लगल। जजमैनका घटि गेल। अल्लापुरक देखौंस सीमो-कातक गाम सभ करए लगलहेँ। रहैत-रहैत पाँच गाम बचल अछि। ओना आब नवका जजमान मारवाड़ी सेहो बढ़लहेँ। पाइबला पार्टी।”
देवनन्दन- “ओ सभ अपन छोड़ि देलक?”
“अपनो धेनहि अछि। मुदा ऐठाम तँ सभ वेपारी भऽ गेला। पुजेगरी कहाँ अछि। एक बेरि पान खुआउ। गामक खेल-तमाशा देखि मन कनैत रहैत अछि मुदा, तइओ जे ठोरपर पछवा लहकी देखै छिऐ तँ तामसो उठैत अछि। मुदा सभसँ भला चुप। ने किछु बजै छी आ ने ककरो किछु कहैत छिऐक।”
पान मुँहमे लऽ कने काल गुलगुला कऽ पीत फेकैत पुन: बजलाह- “भाय, छह माससँ निचेन भऽ गेलहुँ। मुदा दियाद-वादक जे दशा-दिशा देखै छियै तहिसँ होइत अछि जे भगवान हमरो उपरमे तकैत छथि।”
देवनन्दन- “से की?”
शिव शंकर- “भाय-सहाएव सभ तेहेन रास्ता पकड़ि लेलनि जे चिन्ता मेटा देलनि। मझिला भाए जे नोकरी करैत छथि गामपर सबतूर आवि वलजोरी दुनू भाँइ (वेटा) केँ लऽ गेलखिन। की कहितिअनि? अपनो बुझै छी जे दिनानुदिन जीविका घटले जा रहल अछि। तहन तँ सभ िदन समाजक बीच रहलौं तेँ आब अहि उमेरमे कतऽ जाएब। जाधरि समाज जीवैत अछि ताधरि कहुना नहि कहुना बहिते रहब। अपने तँ नहि मुदा, भावो अपन दियादिनी माने हमरा पत्नीकेँ कहलखिन- “उसरागा खाित-खाइत सभटा उसरन भेलि जाइए। हमरा की लोक नहि दुसत जे बाप-पिती बड़का हाकिम छथिन आ बेटा-भातीज दसखतो करै जोकर नहि भेलखिन। कहि दुनू भाँइकेँ लऽ जा अपने लग, अफसर सबहक जे स्कूल छैक तहिमे नाओ लिखा देलखिन। छोटका भाए सदिखन फोन करैत रहैत अछि जे हमरा तते चढ़ौआ होइए जे कतऽ कऽ राखब। उठा-उठा लऽ लऽ जाउ। मुदा गाड़ीमे चलैत डर होइए। तते छिना-झपटी, निशां-खुऔनी हुअए लागल अछि जे हमरा बुते तीस घंटा गाड़ीमे बैसि दिल्ली पहुँचल हएत। मुदा तइओ अनका-अनका दिया तते चीज पठबैत रहैत अछि जे कोनो चीजक कमी नहि अछि। संतोष एते भऽ गेल जे कियो अपन-बाप माएक किरिया-कर्म करैत अछि तहि बीच हम किअए डाक-डकौबलि करी। पूर्वज सभ तँ तीन श्रेणीक सराध कर्म तइयै कए गेल छथि। जकरा जहि तरहक विभव रहैत अछि ओ ओहि तरहक कर्म कऽ कए एकलोटा पानि तँ पूर्वजकेँ दइऐ दैत छथि। मुदा लोकोमे छल-प्रपंच छैक? जँ करै छी तँ श्रद्धापूर्वक करु नहि तँ ठकि कऽ पिंड कटौने नहि हएत। तहिना हमहूँ करै छलहुँ। दियाद बाद अखनो करिते छथि जहिसँ दशो तेहने भेलि जाइ छन्हि। गामेमे वेदान्ती काका छथि। वेचारा अपन जिनगी अपना ढंगसँ बना नेने छथि। ओना ओ लोअरे-प्राइमरी स्कूलमे गुरुवाइ करै छथि। गामेक स्कूलमे काजो करैत छथि। मुदा अपन क्रिया-कलाप छन्हि। जहिना किसान काजकेँ दू उखड़ाहा -भिनसरसँ बारह वजे आ दू बजेसँ सूर्यास्त धरि- बँटने छथि। तहिना स्कूलमे दुनू उखड़ाहा पढ़बै छथिन। दरमाहा भेटिलनि कि नहि तेकर कोनो चिन्ता नहि। किछु अफिसक किरानी ठकि कऽ खाइ छनि तँ किछु बैंकक। कहियो कियो नाङट देह आ बच्चाकेँ किताब-काेपी देखा मांगि लैत छनि तँ बैंकक चारु भाग मरड़ाइत लुच्चा सभ झोड़ा छीनि लैत छनि। मुदा ने कहियो काकी मुँह उठा हिसाब मंगै छन्हि आ ने अपने ककरो कहै छथिन। मन पुष्ट रहैत छनि अपनो तँ जीविते छी तहन अनेरे घरमे रखि कऽ की हेतइ। कातिक मास “कार्तिक महात्म्य” ब्रह्म स्थानमे सभ साल सात दिन समाजकेँ सुनवै छथिन तहिमे ततेक कपड़ा भऽ जाइत छन्हि जे सालो भरि दुनू परानी बिनु सुइया भिरौल कपड़ा पहिरैत छथि। दूध खाइले गाइये पोसने छथि। ओना खेती अपने नहि करैत छथि। गाममे दू कट्ठा बाड़ी छोड़ि घरारियेटा छेबो करनि। पिता जजमनिका पुजबैत छलथिन। गामे-गामे जे जजमान दानमे खेत आ आमक गाछ देने छनि वएह तते आबि जाइत छन्हि जे दू-सलिया-तीनि-सलिया चाउर सेहो पथ्य-पानिले रहैत छन्हि। अादतो तेहेन रखने छथि जे ककरोसँ मंगैक काज नहि। आजुक छौँड़ा सभ जेकाँ नहि ने जे- “बाबा, कने खैनी खुआउ।” पचास गाछ तमाकुलक खेती अपने हाथे-बुद्धिये करै छथि। काकी गाइयेक पाछु बेहाल रहै छथिन। जहिना एक बहीन दोसर बहीनिक माथमे केश बिहिया-बिहिया ढीलो तकैत आ नीक-अधलाक गप्पो करैत तहिना गाइयक संग काकी। तमाकुलो अपने हाथे उपजवैत छथि आ चूनो तहिना अपनेसँ बनवैत छथि। दियादमे जखन हुनकापर नजरि पड़ैत अछि तँ नजरि निच्चाँ भऽ जाइत अछि। मुदा ओहीठाम दोसर छथि जिनका घरारी दुआरे एक्के अंगनामे सोड़ेक-सोड़े दिया-पूताक संग तीनि भाँइ छथिन। भोर होइते तीनू महाभारत शुरु कऽ दैत छथिन। तीनू दियादिनीयो तीनि परगनाक। एकटा अल्लापुरक छथिन दोसर भौरक। तेसर गंगा ओइ पारक मगहक छथिन। तीनू जे तीनि सूर-तानपर गाइरिक गीति गाएब शुरु करैत छथिन तखन बुझि पड़ैत अछि वृन्दावनमे छी आकि लंकाक पुष्प-वाटिकामे....।
मुस्की दैत- ....कते कहब भाय, अपने लाज होइए। एकटा छौँड़ा अछि लक-लक पतरे। झोंटा जेकाँ केश रखने अछि। सब दिन मोछ-दाढ़ी कटैए। छींटिबला घुट्ठी लग तक अंगा सिऔने अछि। पाएरेमे सटल, चुस्त पैजामा पहिरैत अछि। एक गोटेक काज रहए, देखलियै तँ धोखासँ कहा गेल के छिऐँ गै। से की पुछै छी जना बिढ़नी छत्तामे गोला फेकि देने होइये तहिना गनगनाए कऽ मुँहे-काने की कहलक, तेकर ठेकान नहि। सभसँ चोट एकटा बातक लागल जे कहलक- “मनुक्खक झर कहींकेँ।”
मुदा, लगले मुँहसँ हँसी फुटलनि बजलाह- “आँखि उठा कऽ देखै छियै ने भाय तँ बुझि पड़ैत अछि जे सभटा बूड़ि मुँहा भसि भसि गेल अछि। तेहेन-तेहन कुरेर सभ जन्म लऽ लेलकहेँ जे कुल-खानदानक नाक कटौत, की कान कटौत, की घरारीकेँ भट्टाक खेत बनाओत से नहि कहि। एक दियाद छथि जे लम्बाइ चारि फीट हेतनि चौराइयो तहिना मुदा, चंगेरा भरि चूड़ा, अधमन्नी तौला दही, एक्के सुरकानमे सीमा टपा दैत छथि। चूड़ा-दही तेहेन चुभुटि पेट कऽ पकड़ने छनि जे सदिखन पेटे टा सुझै छन्हि। घर गिर पड़लनि। कते खुशामद कऽ कए “इन्दिरा आवास” दिआ देलिएनि। ले बङोर ओहो चाटि लेलनि आ अखन खिचड़ी खाइ छथि। कते कहब भाय।”
सुन्दरकाकाकेँ संग केने करियाकाका पहुँचलाह। तखनहि लेलहा सेहो कुड़हरि लेमए आवि करियाकाकाकेँ कहलकनि- “आब तँ तीनि दिन कोदारि, कुड़हरि, टेंगारी जहल कटलक। आवो छोड़वै की नै। साते दिनमे जारनकेँ सुखाएवो छै।”
लेलहा बात सुनि करियाकाका चुपे रहलाह। मुदा सुन्दरकाका लेलहाक मुँहक बात छिनैत कहलखिन- “कारी, पढ़ुआ भायकेँ बजा अनिअनु। गाममे सभसँ वेसी गुल्ली पेंच वएह करै छथि।”
सुन्दर काकाक बात सुनि करियाकाका पढ़ुआ भाय एहिठाम विदा भेला। जखनसँ लेलहा सुन्दरकाका मुँहेँ गुल्ली-पेंच सुनलक, तखनसँ गुल्ली-पेंचक अर्थ बुझैले मन लुस-फुस करए लगलै। मुदा काजक गप सुनि अपन प्रश्नकेँ पेटमे दवने रहए। मुदा तइओ पेटमे उधकै। होइ जे कखन बाहर निकलब। बाँस भरि करियाकाका आगू बढ़लथि कि लेलहा पुछलक- “सुनर काका, गुल्ली-पेंच ककरा कहै छै?”
लेलहाक प्रश्न सुनि सुनरकक्काक पेट-गुंगुआए लगलनि मुदा, पहिले मुहराकेँ रोकैत शिव शंकर सम्हारि लेलनि। बजलाह- “देवनन्दन भाय लेलहा (सभ) समाजक खूँटा छी। वेचाराकेँ एहि उमेरमे कहीं ऐहन देह रहितैक। जना बुझि पड़ैत अछि जे कोसी बाढ़िमे जहिना नव-गछुली कलम-गाछी सभ पतझार लऽ छुछे पतड़का-पतड़का डारि जेकाँ देहक हाड़ वुझि पड़ै छैक। समाज की? समाजरुपी घर की? समाजरुपी घर वएह जे सबहक सझिया होय। आब प्रश्न उठैत काजपर काज तँ ढेरो तरहक अछि, समाजक काज की बुझल जाय? एहि प्रश्नक उत्तर विकास-प्रक्रियामे अछि। मुदा मूल प्रश्न अछि सभ मनुष्य मनुष्य छी तेँ सबहक दुख-सुख सझिया हुअए।”
शिव शंकर बात सुनि सुन्दर काका उफनि पड़लाह। जहिना रौद लगिते ताड़ी घैलमे फेना-फेना निच्चाँ खसैत तहिना सुन्दर काका मुँहसँ खसए लगलनि-लेलहू, तूँ सभ लगले विसरि जाय छह मुदा, हमरा तँ युग-युगक बात मन अछि। श्याम सुन्दर माएक श्राद्धक भोजमे देखने रहक जे पच्चीस गामक पंच कोना दरवज्जापरसँ लऽ कऽ अपना अंगना धरि गरि-औलकनि। केकर केलहा रहए? वएह पढ़ुआ भाय भनसियाकेँ फुसला कऽ गांजा पीआ, हकिमानी करै लगलथि। तरकारी-दालिमे जखन नोन दैक बेरि भेलइ तखन बोरे देखा देलखिन।”
सुन्दर काकाक बात सुनि ठहाका मारि बाजल- “हँ, यौ काका। पाछु हमहूँ बुझलौं।”
धुड़बूड़ि तेहेन छुछनरि छथि जे ओतवे केलनि। देखने रहक की नहि जे पुलकितक बेटी विआहमे केहेन मारि करा देने रहथिन। कोनो अनकर किरदानी रहए जे कि वएह बीचमे घोघटाही साड़ीके दुसि देलखिन। हुनके बातपर ने जनि-जाति सभ झगड़ा ठाढ़ केलक। अन्तमे देखवे केलहक। तेँ ऐहन-ऐहन बुधिकनाह लोकसँ सम्हरिऐ कऽ रही। कखैन की कऽ देतह तेकर कोनो ठीक नही अछि। ऐहन-ऐहन लोक एतवो ने बुझैत अछि जे अपन काज अनको ले होय। सदिखन अनकर हिस्सा अपनवैमे लागल रहैत अछि। सोझेमे तँ कुल-पूज वैसले छथि। वएह बाजथु?”
सुन्दर भायक प्रश्न सुनि शिव शंकर सकपकेलाह नहि असथिरसँ कहलखिन- “देखू किछु दिन पहिने तक हमरो चालि ओहने छल मुदा, आब ओ सभ छोड़ि देलहुँ। ककरो चुगली चालि केने हमरा की भेटत? एतवे ने होइए जे नकलीसँ सावधान? मुदा, आब जत्ते कालमे नकलीसँ सावधान करब तते कालमे असलिएकेँ ने किअए आरो असली बनाएव। सुन्दर भाय, जहियासँ भाए सभ कुल-खनदानक घरारीकेँ चिन्हलक तहियासँ सभ दुख पड़ा गेल। किछु दिन पहिने धरि हमहूँ आन-आन श्राद्ध-कर्मक उदाहरण दऽ दऽ जजमानसँ अधिक डांड़ै छलहुँ, से सभ छोड़ि देलहुँ। सभ अपन-अपन भार उठा लेलनि जहिसँ हमहूँ उठि गेलहुँ। आब बुझै छी जे -जाधरि लोक मानैत अछि- जाबे कियो करै छथि अपन-बाप-मायक करै छथि तहिमे किऐक जोर दिअनि? जहियासँ विचार बदलल तहियासँ जिनगीयो बदलल। गारियो सुनव कमल। तेहेन-तेहेन झनाठी बच्छा सभकेँ दागि कऽ साँढ़ बनाओल गेल जे गाइयक खाढ़े माने जेनरेशन चौपट्ट भऽ गेल। जहिसँ ने नीक बच्छा आ ने नीक बाछी गाममे रहल। बाड़ी-झाड़ी चड़ैबला सॉढ़ भऽ गेल अछि। सदिखन लोक नाओ धऽ धऽ सोझोमे गरिअवैत अछि जे “है-यएह शंकर बाबा पहुँच गेलाह।” मुदा, रच्छ रहल जे जहिना-जहिना नवका-नवका लोक सभ भेलाह तहिना-तहिना नव-नव काजो कऽ रहला अछि। हिनके सबहक परसादे तँ ऐहेन-ऐहेन सुन्दरो आ दूधगरो गाए सभ गाममे आबि गेल। नवका-नवका मशीन सभ सेहो आबिये रहल अछि।”
देवनन्दन दयानन्दकेँ कहलखिन- “वौआ, चाहो-ताहोक....।”
दयानन्द आंगन जाऽ माएकेँ कहलक पढ़ुआ काकाक संग करियाकाका पहुँचलाह। पढ़ुआ काकाकेँ शिव शंकर हाथक इशारासँ अपने लग बैइसैले कहलखिन। मुदा लेलहाकेँ अपन पैछला -बचपनक- बात मनमे नचए लगलै। बात ई जे गाछपर एकटा लुक्खी पकड़लक। जाधरि धड़ पकड़ने रहए ताधरि तँ लुक्खी हाथमे रहलै। मुदा नागड़ि पकड़ितहि लुक्खी पड़ा गेल। लेलहाक हाथमे नाङरिक रुइयाँटा बँचि गेलैक। मुदा अपना नजरियेपर शंका हुअए लगलै। कखनो वामा हाथसँ लेलहा आँखि मिड़ै तँ कखनो दहिना हाथसँ। मुदा तइओ मन मानवे ने करए जे पढ़ुआ काका भीतरसँ छथि कि उपरे-उपर छथि। मुदा मन बदललै। पाँच गोटेक बीच जखन रही तखन अपन बात दोसरकेँ कमसँ कम कही आ दोसराक बात बेसी सुनी।”
चाह आएल। सभ पीबए लगलथि। चाहक गिलास रखि पढ़ुआ काका शिव शंकर दिशि देखि कहए लगलखिन- “भाय, आब कि पहिलुका किछु रहत? पहिने केहेन बढ़ियाँ सभ मिलि भोज-काजमे संगे करवो करैत छल आ संग मिलि सभ खेबो करैत छल। आब तँ दरभंगाक बेपारी आबि कऽ सराध विआहक ठिक्के लऽ लैत अछि।”
पढ़ुआ काकाक बात सुनि शिव शंकर कहलखिन- “हम अपने बात कहै छी। देनिहार बुझैत छथि जे हजार रुपैआक बरतन देलिएनि मुदा, हम की ओकरा घरमे चुड़ि-चुड़ि खाएब। कतौसँ अनै छी दोकानमे जा कऽ अधोरमे बेचै छी। कहैले तँ एते भेटल मुदा, हाथ कते अबैत अछि। तहन तँ आब बुझए लगलियै जे मनुष्यक जिनगी मनुष्यताक योनि छी। सक्कत संकल्पक लेल कठिन आ दृढ़ताक जरुरत पड़ैत अछि। मुदा भऽ गेल छी पेटकनाह। बीति-भरि पेटक खातिर सभ चौपट भऽ गेल अछि। “अपन हारल बोहूक मारल” के ककरा कहै छैक। तहन हम यएह कहब जे पाँच गोटे विचारि कऽ डेग उठाउ।”
सभ कियो विचार विमर्श कऽ आगूक रास्ता धेलनि।
१. घरवारी माने कर्ताकेँ जेना मन माननि ओहि अनुकूल कर्म हुअए। झरखंडी बाछाकेँ दागि, साँढ़ बनौलासँ परहेज कएल जाय।
२. आन गामक पंच माने भोज खेनिहारसँ परहेज कए गामक सभ जातिक पुरुष-स्त्रीगणकेँ खुऔल जाए। आन गामक कुटुम्ब, दोस्त, दियाद तँ रहवे करताह।
अंतमे देवनन्दन बजलाह- “जहिना पिताजीक शरीर नष्ट भेलनि मुदा, आत्मा तँ छन्हिेँ। साले-साल हुनका निमित्ते यथासाध्य कल्याणकारी काज करैत रहब।”
सभ दिन रहताह विद्यापति : मायानंद मिश्र
प्रबोध सम्मान 2004 सँ सम्मानित मायानंद मिश्रसँ विनीत उत्पलक साक्षात्कार
विनीत उत्पल : अहाँक जन्म कोन ईस्वीमे भेल छल आ लालन-पालन कोना भेल?
मायानंद मिश्र : हमर सर्टिफिकेट जन्मतिथि 1934 ईस्वी थिक, मुदा कुंडलीमे अछि 1930 ईस्वी। माइक देहावसान बादे सन 1936-37 ईस्वीमे जखन हम पांचो-छओ वर्षक रही, मातृक सुपौल आनल गेल होएब। मुदा बीच-बीचमे गामो लऽ गेल जाइत रही तकर किछु-किछु खंडित स्मृति अछि। गामक स्मृति ओ ज्ञान क्रमश: सन 1940-41 ईस्वीसँ होमऽ लागल जे हमरा एकटा छोट बहिनि सेहो अछि आ हमरा चारिटा पित्ती तथा दुइ टा पीसी सेहो छथि। हमर लालन-पालन छठमे-सातमे वर्षसँ मातृकेमे होमऽ लागल छल आ छोट बहीनक गाममे।
विनीत उत्पल : कोशीक झमारल अहाँक परिवार रहए, तखन साहित्यसँ कोना जुड़ाव भेल?
मायानंद मिश्र : जखन गाममे कोसी बाढ़िक उत्पातक कारण सन 1940-41 ईस्वीमे गाम छोड़िकेँ प्रतापगंज थानाक गोविंदपुर जा कऽ हमरा सभकेँ रहऽ पड़ल। ओतए ओहि मातृवत बहीनक अपन पतिकुलक किछु जमीन छल, जाहिसँ मात्र पेट टा भरल जा सकैत छल। एहि गोविंदपुरमे सन 1945-46 ईस्वीमे हमर प्राथमिक कवित्व प्रतिभाक अंकुरण भेल छल। जखन ओहि ठामक कालीस्थानक लेल सुपौलक कोने ग्रामोफोनक कोनो गीतक सुरमे भगवतीक अर्चना-गीत लिखने छलहुँ, जकरा हम स्वयं गाबितो छलहुँ कीर्तन मंडलीमे।
विनीत उत्पल : उच्च शिक्षा कतएसँ भेटल? विस्तारसँ बताऊ?
मायानंद मिश्र : सन 1950 ईस्वीमे सुपौलसँ मैट्रिक पास कएलाक बाद आगू पढ़बाक समस्या छल जाहिमे आर्थिक-समस्या मुख्य छल। उत्साह सभक छलनि जे हम आगू पढी विशेषत: ज्येष्ठ माम पंडित रामकृष्ण झा किशुनजी तथा पिताजी पंडित बाबू नन्दन मिश्रजीक। उत्साह एहि लेल सभक छलनि जे हमरा मैट्रिकमे सेकेंड डिवीजन भेल छल जे ताहि दिनमे बहुत कम होइत छलैक। अपन इच्छा छल पटना कालेजक। आवेदन सेहो कएल। नामांकनक स्वीकृति-सूचना सेहो भेटल। किंतु अंतिम कालमे किसुनजीक विचार बदलि गेलनि जे दरभंगे। दरभंगामे पंडित श्री चंद्रनाथ मिश्र अमरजी छथिन, हुनके अभिभावकत्वमे। सन 52 ईस्वीमे विवाह कारणे आई.ए. क परीक्षा नहि देल आ सन 54 ईस्वीमे आगराक मैथिली महासभाक कारणे बी.ए. क परीक्षा नहि दऽ सकलहुँ।
विनीत उत्पल : मैथिली साहित्य दिश कोन मन आएल?
मायानंद मिश्र : सन 50 ईस्वीमे सी.एम. कॉलेजमे नाम लिखाओल। श्री अमरजीक डेरापर अधिक काल साहित्यिक गोष्ठी, दरभंगासँ सुपौल-मुरलीगंज-कटिहार तथा मुजफ्फरपुरसँ जयनगर धरि विभिन्न स्थानपर कवि सम्मेलन, वैदेही-कार्यालय तथा गीत लेखन। ‘भाङक लोटा’क प्रकाशन। समए चलैत गेल, परिचय-परिधि बढ़ैत गेल। एहि बीच दरभंगामे राजकमलजीसँ परिचय भेल। फेर ललित-राजकमल-मायानंद क गोष्ठी सभ, साहित्यिक चर्चा सभ जाहिमे रामू अर्थात रमाकांत मिश्र ओ दिवानाथजीक निरंतर सहभागिता। सन 54 ईस्वीमे ललितजी सब-डिप्टी कलक्टर बनि दरभंगा चल गेलाह। राजकमलजी ता पटने छलाह। हमहूँ 56 ईस्वीक अंतमे रेडियो, पटना आबि गेलहुँ।
विनीत उत्पल : ओहिकालमे पटनामे साहित्यिक परिदृश्य केहन रहए ?
मायानंद मिश्र : पटनामे रेडियो स्टेशन, हास्य-व्यंग्य-सम्राट हरिमोहन बाबूक डेरा, पंडित जयनाथ बाबूक डेरा, गोपेशजीक डेरा, प्रो. आनंद बाबूक डेरा, फणीश्वरनाथ रेणुक डेरा, मुरादपुर खादी भंडार, श्री रूपनारायण ठाकुरजीक कार्यकर्ता-निवासमे माछ-भातक मासिक भोज आ चेतना समिति, पुस्तक भंडारक रामायण-गोष्ठी, अभिव्यंजना-प्रकाशन, विभिन्न समए ओ विभिन्न स्थानपर घनघोर साहित्यिक चर्चा होइत छल। ओहि कालमे दक्षिण बिहारसँ मिथिलांचल धरि सभ जगह कवि सम्मेलनमे शामिल भेलहुँ।
विनीत उत्पल : पटनासँ सहरसा अएलहुँ, एतए केहन बीतल?
मायानंद मिश्र : एम.ए. क पश्चात सन 61 ईस्वीमे आबि गेलहुँ सहरसा कॉलेज, सहरसा। कॉलेज अध्ययन-अध्यापन, सघन-लेखन, बलुआसँ बम्बइ धरि विद्यापति पर्व-समारोहमे मंच संचालन, भाषणो आ कविता पाठ सेहो, विभिन्न संस्थाक संगठनात्मक प्रक्रियाक अध्ययन, सहरसामे विभिन्न पर्व-समारोहक आयोजन, मैथिली चेतना परिषद, सहरसाक गठन, पटनामे मैथिली महासंघक संगठन, डाकबंगला चौक-जाम क कार्यक्रम, लेखन आ पाठन, प्राचीन इतिहासक सघन अध्ययन, पुन: प्रथम शैलपुत्री च, मंत्रपुत्र, पुरोहित आ स्त्रीधनक लेखन आ तकर हिन्दी आ॓ मैथिलीमे प्रकाशन, दिशांतर, अवांतर, चंद्रबिंदु क प्रकाशन। तकैत-तकैत सहरसा कॉलेज, सहरसा आ स्नातकोत्तर केंद्र, सहरसामे 33 वर्षक सेवा-काल समाप्त भऽ गेल आ 1994 ईस्वीमे अवकाश ग्रहण कऽ लेलहुँ।
विनीत उत्पल : अहाँक दृष्टिक विस्तार कोना भेल?
मायानंद मिश्र : दृष्टिक विस्तार वस्तुत: मामक रूपमे युगांतकारी मैथिली साहित्यकार पंडित रामकृष्ण झा ‘किशुन’ द्वारा स्थापित मिथिला पुस्तकालयक कारणे भेल। ओहि ठाम 47 सँ 50 ईस्वीक बीचमे पढलहुँ जाहिमे प्रेमचंद, जैनेंद्र, इलाचंद्र जोशी, भगवतीचरण वर्मा, शरतचंद्र, बंकिम बाबू, रवींद्रनाथ ठाकुर तथा ताराशंकर वन्धोपाध्याय आदि प्रमुख छलाह। एहि समएमे किसुनजीक आदेश-निर्देशक विरूद्ध रातिकेँ चोरा कऽ चंद्रकांता ओ चंद्रकांता संतति संगहि शरलक होम्स सिरीज सेहो पढ़ि गेल रही। ओहि समएक ‘माया’ समकालीन ‘नई कहानियां’ छल जे नियमित पढ़ैत रही।
विनीत उत्पल : पहिल रचना कोन छल?
मायानंद मिश्र : 49 ईस्वीमे हरिमोहन बाबूक प्रभावक प्रचंड प्रतापे, हम प्रथम-प्रथम मैथिलीमे ‘हम रेल देखब’ नामक एकटा गद्य रचना कथात्मक शैलीमे लिखलहुँ जे हाइस्कूलक वार्षिक पत्रिकामे छपल। एहि प्रकाशन-प्रोत्साहनक कारणे भांगक लोटाक अधिकांश कथा, अही 49-50 ईस्वीमे लीखि गेलहुँ जकर प्रकाशन 51 ईस्वीमे प्रो. श्री कृष्णकांत मिश्रक वैदेही प्रकाशनक द्वारा भेल।
विनीत उत्पल : भांगक लोटा कतएसँ प्रकाशित भेल छल आ कहिया ?
मायानंद मिश्र : भांगक लोटाक दुइ गोट अंतिम कथा मैट्रिक परीक्षाक बाद लिखने छलहुँ जकर प्रतिलिपि श्री अमरजी कृपापूर्वक देखि देलनि, मुदा ओहूसँ पैघ उपलब्धि हमरा लेल भेल जे आचार्य सुमनजी दुइ बिन्दु नामे आ॓कर भूमिका लीखि देलनि आ प्रो कृष्णकांत मिश्रजी ओकरा सन 51 ई.मे छापि देल वैदेही प्रकाशनक दिससँ, हमरासँ एक्कोटा टाका नहि लेलनि। अपितु एक गोट टाका देलनि, मना कएलाक उपरांतो, पंडित त्रिलोकनाथ मिश्रजी आ॓कर मूल्य, जे ओहिपर छपल छल।
विनीत उत्पल : भांगक लोटामे तँ हास्य छल, मुदा गंभीर लेखन दिश कोना घुरि गेलहुँ ?
मायानंद मिश्र : भांगक लोटाक पश्चात हम हास्य कथा नहि लिखलहुँ। ई प्रकाशन प्रोत्साहन हमर कथा-लेखनक प्रेरणा अवश्य बनल जाहि कारणे , 51-52 ई सँ हास्य छोड़ि, सामाजिक जीवन-संघर्षपर आधारित मनोविज्ञानक गंभीर भावक कथा सभ लीखऽ लगलहुँ जाहिमे प्रमुख छल रूपिया, सुरबा, आगि मोम आ पाथर तथा सतदेवक कथा जे कालांतरमे, सन 60 ई.मे कलकत्ताक मैथिली प्रकाशनक दिससँ प्रकाशित ‘आगि मोम आ पाथर’ नामक संग्रहमे संकलित अछि, जकर अधिकांश कथा 59-60 ई.क मिथिला दर्शनमे प्रति मास छपल छल। मुदा मंच-जीवनमे हमर प्रवेश कथा-लेखनसँ नहि अपितु काव्य रचना विशेषत: गीत-रचनासँ भेल छल।
विनीत उत्पल : साहित्यिक यात्रामे केकर लेखनसँ प्रभावित भेलहुँ ?
मायानंद मिश्र : 40-50 ई. धरि अबैत-अबैत नेपाली आ॓ बच्चन क गीत-रचनाक प्रभाव हमरापर बहुत छल। सन 59 ई सँ बहुत पूर्वहि अर्थात दरभंगे कालमे सी.एम. कॉलेजक हिन्दी प्रोफेसर श्री सुरेंद्र मोहनजीसँ अज्ञेय द्वारा संपादित प्रतीक आ॓ तार सप्तक दुइ भाग पढ़ने छलहुँ आ अतिशय प्रभावित भेल छलहुँ। क्लासमे पढ़ल प्रसाद-पंत-निराला-महादेवी वर्मासँ सर्वथा भिन्न छल ई काव्य धारा, जाहि पर टी. एस. इलियट- एजरा पाउंड सँ लऽ कऽ एलेन गिन्सबर्ग आ॓ एंग्रीजेनरेशन तथा ब्रिटेनक कवि लोकनिक प्रभाव छल। शरतचंद चट्टोपाध्याय, रवींद्रनाथ ठाकुर, टालस्टॉयसँ प्रभावित रही।
विनीत उत्पल : अहाँ तँ हिन्दीमे किछु लिखने रहि?
मायानंद मिश्र : सन 49 ई मे किछु हिन्दी गीत लिखलहुँ, जकर तीन गोट मुखरा, पंक्ति एखनहुं मोन अछि, ‘अरमान मेरे दिल के सभी टूट चुके हैं’, ‘अधजली कामनाएं लेकर अपलक मैं गगन निहार रहा’ तथा ‘मैं अंतर मे तूफान लिए चलता हूं’ मुदा, 50 ई.क मैथिलीमे रचित ‘आ॓हि दिल छलहुँ हम भांग पीने’ तथा ‘नोचनी तोर गुण कते गैब’ अत्यंत लोकप्रिय भेल। ‘स्त्रीधन’ नामक उपन्यास नेशनल बुक ट्रस्ट छापने अछि।
विनीत उत्पल : गीतनाद, स्वरसंधानकेँ कोना साधलिऐ?
मायानंद मिश्र : गीत गाबऽ लागल छलहुँ 1942-43 ईस्वीसँ सुपौलमे अपन मातामहक कीर्तन मंडलीमे। हमरा लगैत अछि जे हमरामे कंठ-स्वर, स्वर-संधान-प्रतिभा तथा सुरताल-ज्ञान आदि जकर अनेक प्रशंसा भेल-मातामह पंडित नागेश्वर झासँ आएल अछि। एना गुनगुना कऽ तँ किछु ने किछु गबैत छलाह आ तेँ कालान्तरमे जे हम गीत-रचना कएल से कोनो ने कोनो सुरतालमे रहैत छल। आ॓हि कारणे हम स्वयं सेहो गबैत छलहुँ तथा किछु गीत किछु गायक जाहिमे गायक चूड़ामणि पंडित रघु झाजी सेहो छथि, गबैत छलाह।
विनीत उत्पल : अहाँ गायन ज्ञान कतएसँ पेलिऐ ?
मायानंद मिश्र : सन 50 ई.क अंतिम चरणमे जखन ‘नभ आंगनमे पवनक रथ पर कारी-कारी बादरि आयल’ नामक गीत लिखलहुँ तँ गाबिये कऽ लिखलहुँ। यएह गायन-ज्ञान हमर छन्द-ज्ञान छल। जहाँ धरि आइयो मोन अछि, बिनु छन्द-ज्ञाने प्रारम्भोमे लिखल हमर गीत-रचनामे छन्द दोष, शास्त्रीय संगीत मर्मज्ञ पंडित कवि नै ईशनाथ झा ताकि सकलाह, जे एकर पहिल आधिकारिक श्रोता बनलाह आ ने आचार्य रमानाथ झा जे एहि गीतकेँ आई.ए.क लेल संकलित ‘कविता कुसुम’ मे सर्वप्रथम संकलित कएलनि।
विनीत उत्पल : अहाँ जहि साल आई.ए. मे रही, ओहि साल पाठ्यक्रममे अहाँक लिखल कविता सेहो छल की?
मायानंद मिश्र : अत्यधिक प्रसन्नता भेल छल आ॓हि दिन, जाहि दिन सन 52 ई.मे आचार्य पंडित रमानाथ झा आई.ए. क पाठ्यग्रंथक रूपमे कविता कुसुमक संकलन-संपादन कएलनि तथा आ॓हिमे ‘नभ आंगनमे पवनक रथपर’ नामक गीतकेँ स्थान दैत संकलित कएने छलाह। एना तँ कोनो संकलनमे स्थान भेटलासँ प्रसन्नता होइत किंतु एतए तँ स्वयं रमानाथ बाबू द्वारा संपादित ग्रंथक गप्प छल आ सेहो आई.ए. क पाठ्यग्रंथमे, जखन की हम ताधरि स्वयं आई.ए. पास नहि कएने छलहुँ।
विनीत उत्पल : आ॓हिकालमे अहाँ कोन-कोन पत्रिकामे लिखैत छलहुँ ?
मायानंद मिश्र : जहिना आ॓हि समएमे दरभंगासँ ‘वैदेही’ प्रकाशित होइत छल, तहिना कलकत्तासँ ‘मिथिलादर्शन’ आ॓ बादमे ‘मैथिली दर्शन।’ ललित आ॓ राजकमल सामान्यत: वैदेहीमे अधिक लिखैत छलाह तथा हम स्वयं अपेक्षाकृत मिथिला दर्शनमे। नाटको लिखने छी, कथा-कविता सेहो लिखने छी।
विनीत उत्पल : अभिव्यंजनावादी काव्य की छल?
मायानंद मिश्र : 59 ई मे मैथिलीमे अनेक नवीन काव्यक लेखन प्रथम-प्रथम कएल, जकरा हम अभिव्यंजनावादी काव्य कहने छी तथा जकर प्रथम प्रकाशन सन 60 ई. क आरंभमे ‘अभिव्यंजना’ नामक पत्रमे भेल अछि। संगहि अही 59 ई. मे हम एक वर्ष पूर्वक मैथिली पांडुलिपि ‘माटिक लोक’ क आधारपर प्रथम-प्रथम ‘माटी के लोक: सोने की नैया’ क नामसँ हिन्दीमे लेखनारंभ कएने छलहुँ। आ जहिना सन 50 ई. मे एकटा मैथिली कृति प्रकाशित भेल छल, तहिना सन 60 ई मे दुइ गोट मैथिली कृति ‘बिहाड़ि पात आ पाथर’ तथा ‘आगि मोम आ पाथर’ प्रकाशित भेल।
विनीत उत्पल : आ॓हि काल की सपना छल?
मायानंद मिश्र : हिंदीक आ॓हि अज्ञेयी नई कविता जकाँ मैथिलीमे नवीन काव्यान्दोलन ठाढ़ करबाक उद्देश्यसँ अभिव्यंजनाक प्रकाशन-योजना मोनमे आएल छल, जाहिमे मात्र ‘नवीन काव्य’ टा रहत। आ ताहि लेल पहिने स्वयं किछु नवीन काव्य लिखल। आ ओ दू-चारि दिनपर हरिमोहन बाबूकेँ सुनाबी जे अभिव्यंजनामे हमरा एहने कविता चाही। आ ओ देबो केलनि जे अभिव्यंजनामे छपल छल। आधा 59 ई. क घोर व्यस्तताक फलस्वरूप सन 60 ई.क आरंभमे अभिव्यंजनाक प्रकाशन संभव भेल। प्रकाशनक खर्च ओ लोकार्पण समारोहक सभटा खर्च स्वयं पंडित जयनाथ मिश्र, एकटा अर्द्ध परिचित किशोर युवा संपादकक उत्कट उत्कंठा ओ महत्वपूर्ण महत्वाकांक्षापर द्रवित होइत, कयने छलाह। सन 60 ई हमर लेखकीय जीवनक लेल अति व्यस्ततापूर्ण रहल। एहि समएमे जँ एक दिस अनेक कथा लिखल तँ दोसर दिस अनेक नवीन काव्यक सेहो रचना कएल जे कालांतर ‘दिशांतर’ मे संकलित अछि। तेसर दिस जँ अभिव्यंजनाक संपादन कएल तँ किछु समीक्षा सेहो एहि कालखंडमे लिखल, जाहिमे सँ किछु मिथिला दर्शन, वैदेही आ॓ कृष्णकांत बाबूक मैथिली सम्मेलनक रचना संग्रहमे अछि। ओहि काल एकटा काल्पनिक रेडियो नाटक सेहो लिखने छी- इतिहासक बिसरल।
विनीत उत्पल : कोन-कोन पैघ साहित्यकारसँ भेट भेल छल?
मायानंद मिश्र : दिनकरजी सँ हमर परिचय पंडित जयनाथे बाबू करौने छलाह मैथिली कवि ओ चौपाल स्वरक रूपमे। पहिल बेर दिनकरजी चौंकल छलाह आ चौपालक हमर स्वर आ॓ अभिव्यक्तिक अतिशय प्रशंसा कएने छलाह। रेणुजी सँ परिचय अति त्वरित गतिसँ अंतरंग आत्मीयतामे बदलि गेल छल। प्राय: नित्य रेडियो स्टेशनमे अथवा बुध दिनकेँ अधिक खन हुनका डेरापर सायंकालकेँ सांध्य गोष्ठीमे भेंट होइत रहल।
विनीत उत्पल : अहाँ जवाहरलाल नेहरू आ इंदिरा गांधीसँ सेहो भेंट कएने छलहुँ ?
मायानंद मिश्र : भारतक प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरूक चिर ऋणी रहब, जनिक विशेष आग्रहक कारणे, एतेक शीघ्र सन 65 ई मे मैथिलीकें देशक एकटा स्वतंत्र साहित्यिक भाषाक रूपमे साहित्य अकादमी मान्यता देलक। 73 ई मे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधीसँ सेहो भेंट भेल छल।
विनीत उत्पल : मैथिली चेतना परिषद संस्थानक निर्माण कोना कएलहुँ आ कोना कएलहुँ ?
मायानंद मिश्र : 62 ई. मे हम सहरसा मैथिली चेतना परिषद नामक संस्थाक निर्माण कएलहुँ पंडित श्री अमरेंद्र मिश्रजीक डेरापर। एहि संस्थाक तत्वावधानमे अभिव्यंजनाक प्रकशनक संगहि सन 62-63 ई मे प्रथम-प्रथम कविश्वर चंद्र प्रसिद्ध चंदा झाक जयंती समारोहक आयोजन कएने छलहुँ सहरसा परिसरमे। सहरसाक ई समारोह पूर्वांचल मिथिलांचलक पहिल ओ आदिम समारोह तँ छलहे (प्राय:) संभव पिंडारूछ गामक पचासक दशक अनेक आयोजनक पश्चात ई दोसर स्थान छल, जाहि ठाम एहि प्रकारे हुनकर स्मरण कएल गेल। एहि स्मरण समारोहक एकटा कारणो हमरा मोनमे छल। हुनक मातृक बड़गाम छलनि, जतऽ हुनक प्रारंभिक शिक्षा भेल छलनि आ जे आधुनिक मैथिलीक सूत्रधार छलाह।
विनीत उत्पल : जीवनक एहि मोड़पर अहाँक जीवनदर्शन की अछि ?
मायानंद मिश्र : हम दर्शनक गप्प नहि करैत छी। किछु-किछु निष्काम कर्मक मर्म पढल अछि, किछु-किछु बुझलो अछि। की सभक जीवन-दर्शनक अनुकूल चलि पबैत अछि। माया चलऽ दैत अछि ? अनेक-अनेक प्रश्न अछि जे अनुत्तरिते रहि जाइत अछि तथापि जीवन-प्रवाह अछि जे प्रवाहित होइत चल जाइत अछि, चल जाइत रहत, अविरल, अविराम।
विनीत उत्पल : कालगतिकेँ की मानैत छी ?
मायानंद मिश्र : सर्वोपरि काल-गति। मुदा, मनुष्य गति तँ एकमात्र संघर्षक गाथा थिक। जखन-जखन समाजक ई गति ओ दुर्गति होइत अछि, तखन-तखन समाजमे पुनर्जागरण होइत अछि। युगक धाराकेँ मोड़ि समाजमे रचनात्मक परिवर्तन अबैत अछि, निश्चित अबैत अछि। अबैत रहल अछि, जकर साक्षी थिक इतिहास, मानव इतिहास। आब ओही इतिहासक प्रतीक्षा अछि। प्रतीक्षाक एकटा भिन्ने सुख होइत छैक।
विनीत उत्पल : एखुनका कालमे केकर रचना नीक लगैत अछि?
मायानंद मिश्र : मैथिलीमे नचिकेता, सुभाषचंद्र यादव, जयधारी सिंह आ डॉ महेंद्र झाक लिखल नीक लागैत अछि।
विनीत उत्पल : मैथिलीक भूत, वर्तमान आ भविष्यकेँ लऽ कऽ की सोचैत छी ?
मायानंद मिश्र : सभ दिन रहताह विघापति। मैथिलीक सौभाग्य अछि जे अंग्रेज एहि भाषाकेँ लोकक आगू आनलक। मैथिलीमे लोक पढ़ैत अछि, मुदा कीनए लागत तखन लेखक आओर प्रकाशक आगू आएत।
विनीत उत्पल : अहाँक परिवारमे के सभ अछि, ओ सभ की करैत छथि ?
मायानंद मिश्र : तीन लड़का, एक लड़की अछि। पैघ बेटा प्रो. विघानंद मिश्र जे पीजी सेंटर, सहरसामे इतिहासक प्रोफेसर अछि। दोसर डॉ. भवानंद मिश्र, राजेंद्र मिश्र कॉलेज मे इतिहासक प्रोफेसर अछि। छोट कामनानंद मिश्र दिल्लीमे हिन्दुस्तान अखबारक वेबसाइट संस्करणक इंचार्ज अछि। बेटी वंदना मिश्र जमशेदपुरमे रहैत अछि। दामाद स्टेट बैंक मे अफसर छथि।
बेचन ठाकुर
दोसर दृश्य- बेटीक अपमान
(स्थान- दीपक चौधरीक आवास। दीपक आ वीणामे किछु गप-सप्प होइत अछि।)
दीपक- मोहन माए, हम खेत जाइत छी। खेतमे हर बहैत अछि आ दुटा जन सेहो अछि। कने जलखै जल्दीए लेने आएब।
वीणा- सुनू ने, तहन जाएब।
दीपक- बाजू की कहैत छी?
वीणा- की कहब? जारैनक इन्जाम तँ साफे नहि छैक।
दीपक- याए जारैन कीनि देने रही। ओ सभटा सधि गेल की?
वीणा- सधि नै गल तँ की। अहॉंकेँ बुझाए रहल अछि जे हम खाए लेलहुँ।
दीपक- हे मोहन माए, हमरा अबेर भऽ रहल अछि कोनो जोगार कऽ जलखै जल्दी लेने आएब।
वीणा- कोन जोगार? कने बताए दिअ ने।
दीपक- कहैत तँ लाज होइत अछि। मुदा कहि दैत छी। नहि होएत तँ एहि कलमसँ कने पत्ते खरैर आनब।
वीणा- नैहरमे खर्रा पथिया चिन्हबो नहि केलहुँ। मुदा सासुरमे अहॉं की नहि करेलहुँ। ऐँ यौ मोहन बाउ, आब वएह समए छैक जे जखैन तखैन खर्रा-पथिया लऽ कऽ जाउ आ पत्ता खरैर आनू।
दीपक- कोनो जोगार करब। हम जाए रहल छी। हरवाहा खेतमे की करैत होएत की नहि।
वीणा- सुनि लिअ मोहन बाउ, हम जोगार करैत करैत थाकि गेलहुँ। आब हमरासँ कोनो जोगार नहि होएत। जोगार करैत करैत हमरा दिशि कियो ताकए नहि चाहैत अछि। सभटा प्रतिष्ठा माटिमे मिलि गेल।
दीपक- अहॉं बड्ड प्रतिष्ठित भए गेलहुँ?
वीणा- हँ यौ तँ की। प्रतिष्ठा कोनो बजारमे बिकाइत अछि की। अपन व्यवहारसँ प्रतिष्ठा आबैत अछि। अहॉंकेँ की प्रतिष्ठा अछि?
दीपक- मोहन माए, अहॉं बड्ड चढ़ि कऽ बाजि रहल छी आ हमरा प्रतिष्ठाकेँ उकटि रहल छी आइ अहॉं खेत जलखै नहि आनब, तहन बुझबैक।
वीणा- यावत जारैनक जोगार नहि कए देब, ताबत जलखै केर कोनो आशा नहि। हम पत्ता खरैले नहि जाएब। अहॉंकेँ जे करबाक हएत से करब। हम अहॉंक पत्नी छी ने।
दीपक- से बुझि लेब। कोन बॉंसक दाहा होइत छैक।
वीणा- अइँ यौ मोहान बाउ, नहि बाजी तँ पीचने जाउ। ऐँ यौ, हमरा एहि देहमे किछु अछि। ठाढ़े छी सएह बहुत। सौंसे देह उज्जर भऽ गेल अछि। एक्को रत्ती खून देहमे नहि अछि। खाली जनमाबै ले होइत अछि। उपरेमे अल्हुआ फरैत छैक की? खाली बेटे चाही बेटे। चलु दरिभंगा। अल्ट्रासाउण्ड करए लिअ आ बेटीकेँं हटाए दिऔक बेटाकेँ रहए दिऔक। सफैया कराबैत-कराबैत आ गोटी-दवाइ खाइत-खाइत हमर देह गलल जाए रहल अछि। आब हम नहि बॉंचब। बेटा लेल तारमतोर सफैया हमरा जाए मारि देलक। देहसँ तारमतोर ओतेक-ओतेक खून बहनाइ मामूली बात छैक। समाजमे बेटी दुश्मन अछि की? हए नारायण बेटा-3
(वीणा देवी दम तोिड़ दैत छथि।)
दीपक- (माथ पीटैत) मोहन माए यै मोहन माए। आब हम कोना रहबै यै मोहन माए। मोहना रओ मोहना। सोहना रौ सोहना। गोपला रओ गोपला। दौड़ै जाइ जो रओ बौआ सभ।
(मोहन, सेाहन, आ गोपालक प्रवेश।
तीनू बेसुमार कनि रहल अछि)
तीनू- माए गै माए, हम सभ कोना रहबै गै माए।
दीपक- बौआ सभ रओ बौआ सभ। आब अपना सभ केना रहबै रओ बौआ सभ। के खाइलए देतै रओ बौआ सभ। मोहन माए यै मोहन माए। हमरे खातिर अहॉं मरलहुँ यै मोहन माए।
(चारू बा-पूत कानैत-कनैत वीणाक देहपर मुरी रोइप दैत अछि। पटाक्षेप भऽ जाइत अछि। अन्दरसँ राम-नाम सत्यक आवाज सुनाइ पड़ैत अछि।)
दृश्य- तेसर
क्रमश:
१.कामिनी कामायनी- कथा-कनिया पूतरा के विवाह २.निबन्ध-बिपिन झा-किछु पजरैत प्रश्न
१
कामिनी कामायनी
कनिया पूतरा के विवाह ।
बङका बङका अटैची. . .सूटकेस. . एसी .. टी वी . ..फ्रीज पलंग .. .अगङम बगङमक’ पैकिंग .. ओहिना बान्हल. . .राखल छलै . ओही बङका हॉल सॅ लऽ क’ ओकर कोठरी आ’ तीनो कातक बरान्डा धरि ।घरक बाहरि कंपाउंड में ललका चरपहिया ठाढ झक झक करैत छल .।लोकवेद के गेलोपरांत. . ओ अपन माथ सॅ घोघ हॅटौलक़ . .नथिया बङ भारी छलै ..नाक बथैत बथैत फूलिक’ घोंघा जकॉ गोल भ’ गेल रहै .. ।नहुॅ नहुॅ ओकरा उतारि क’ ड्रेसिंग टेबुल प’ राखि देलकै आ’ छोटकी नथिया निकालय लेल निहुरि क’ अपन अटैची खोलि रहल छल कि कान में किछु अनसोंहात . . अप्रिय . . . पटुआ सन तीत .. .लोंगिया मिर्चे सन लेसैत. . किछु कटु वचन तीर जकॉ घुसिक’ ह्दय प्रदेश में खलबल्ली मचा देलकै . ।क्रोधक लुत्ती जेना सम्पूर्ण काया के एकेबेर प्रज्ज्वल्लित करबा लेल बेकल. . .मुदा मजबूरी . . नब अपरिचित माहौल आ’ पितृगृह के बिछौह . . .सब एके संग मिलक’ मोन के उद्विग्न करि देलकै .. .आ’ डोका सन बङका बङका ऑखि में नोर डबडबा क’ काजर समेत खसबा लेल बेकल भ’ गेल छलै. . . ।अकस्मात नहिं जानि कोन देवयोग सॅ . ओकर स्मृति पटल के गुप्त खोह में व्यतीतक किछु .. . . .अन्हार आकास में बिजुरि जकॉ चमैकि उठलै .. आ’ क्षण मात्र लेल बाढिक’ पानि सन प्रलय मचबय लेल उबडूब करैत. . .ऑखिक पानि ठामेठाम ज्यों के त्यों . . . .ओहिना थिर रहि गेल रहै. ..।ठोर प आयल स्मित मुस्की सॅ. . श्यामल मुख चान सन चमैक उठलै. . . आ’ नोरक मध्य ठाढ भ’ गेल छल .. .कनिया पुतरा के विवाह . . ।
ओ दिन . . . .छुट्टी चलि रहल छलै गरमी के . .. दूर. . .संथाल परगना के कठोर पथरैल .. .ललका जमीन के भीजैबा लेल . ..उमङैत घुमङैत .. .कारी खरकट बादरि . . नाचि नाचि क’ ल’ग .े त’ आबै. . .मुदा बरसऽ के नाम नै लै .. .खोंझा रहल हौ जेना सूखल टटैल .. .पियासल धरती के ।मेघ त’ लगले रहै सदिखन . . .कत्तो भरिसक बरसल सेहो हेतैक .. .तैं. . .मद्विम .. .तेज बहैत बसात . . .खिङकी दरवज्जा के परदा के उङबैत बङ सोहनगर लागि रहल छल ।
आ’ एहने सुखगर मौसमक दुपहरिया. . . ओकर कोठरी में होमए लागल कनिया के विवाहक ब्योंत. . .।लाल मोलायम . . रबङक गुङिया सब के साबुन सॅ नहा धो क’ एकबार प’ पसारि पंखा के नीचा सुखबा लेल राखि .. लाडो . . अडोस पडोस में अपन किछु संगी सब सॅ राय मसविरा करए चलि गेल . . ।आधे पौन घंटा में त’ घुरि आयल छल .कोठरी में पैसिते . . .ओ दृश्य देखि ओ ततेक कैस क’ चिकरल छल .. .जे दोसर कोठरी में विश्राम करैत दादी जे आइये गाम सॅ आयल छलीह झटकारैत बङका बङका डेग भरैत ओकरा लग आबि ठाढ भ’ गेलीह .. ई देखि हुनको कोढ कॉपि गेलन्हि . ..मुॅह प’ दुखक भाव के संगे कंठ सॅ ‘ च्च .. च्च’ . .निकसि गेल छलैन्ह ।कोन मे बैसल दूनू अगिलका पएर सॅ दबने .. .टॉमी .. .लाल लाल गुङिया के हब्बर हब्बर चिबा रहल छल ।हाथ पएर छिङियाबैत. . . . औल बौल भेल . . .ओकर मुॅह सॅ गुङिया झिकऽ चाहै .. .त’ ओ लाल टरेस ऑखि केने . . .नाक हिलबैत . . .सबटा दॉत देखाक’ ‘हूॅ.ऽ्््ऽऽ्ऽ्ऽकार करैत आर बेसी डरौन बनि गुर्रेऽ्् लागै ।
“हेऽ््ऽहे. . .मार बाढिनि’ कहैत दादी के किछुओ नहि फूरैलन्हि त’ बरान्डा में राखल एक टा पैना उठौलन्हि .. . आ’ कहुना करि क ओकरा मुॅह प’ मारने छलैथ ।एके डंटा मे गुङिया छोङि किकियाइत कोठरी सॅ पङाऽ गेल छल ।गुङिया के त’ दुर्गति दुर्गति भ’ चुकाल छल. . . मोहनजोदङो के खोदाय मे बहरैल मूर्ति सन. . .अंग भंग़ . .एक टा ऑखि निपट. . . . हाथ टूटल .. .गल मे छेदे छेद .. दुनू पएर चूसल चिबैल. . . .। “‘ई गुङिया पपा कत्तो बाहर सॅ अनने छलथि. . .आब कत्त भेटतै. . .’ओकरा हिचुकि हिचुकि क’ कानैत खीझैत देखि दादी ओकरा गरा लगाक’ दुलारैत पुचकारैत बजलिह “ई हो कोनो कनिया छै. . बिलैति मेम .. .एकर भला लोक की वियाह करतै .. . इ त’ अपने विवाह करै छै आ’ छोङै छै .। ... . तोरा हम एहेन कनिया बना देबौ. . .जे खॉटी अपन देसक’. . एकरा सॅ हजार कच्छ नीक .. कनि जे सब कहै छियौ सबटा समान जुटा दे .. देखिहैं संगी सब मुॅह बेने के बेने रहि जेतौ .. . ।”
निर्दोख बालपन . . .पितामही के आश्वासन मात्र सॅ क्षण भरि में अपन अपार क्षति बिसरि पुलकैत. . .नान्हि नान्हि हाथ सॅ अपन ऑखिक नोर पोछैत . . .दू बीतक लाडो. .. . फुद्दी जकॉ उङि गेल छल .।रूइया के बङका बंडल .. .बैंडेज . ..आलमीरा में राखल पपा के पुरना मलमल के कुरता . . .लाल. उजरा. . करिया ताग सुइया .. .कैंची . ..सूखल पातर पातर लकङी आनि अपन पलंगक कात ओछाओल पटिया प’ राखि देने छल ।
ओकर ऑखि खूजलै . . देबाल घङी में चा.रि बाजि रहल छल. . . ‘एत्ते काल सुति रहलौं’ मने मन सोचैत .. . पलंग सॅ नीचा झकलक . . . . .तीन टा सुन्नर पुतला बनि क’ तैयार . .. करिया रेशमी ताग सॅ डाढ धरि लटकल . .कारी कारी केश. . पैघ ..पैघ ऑख़ि उपर में तीरछा भौं .. .ठाढ नाक़ . .लाल लाल ठोर .. .।एक टा पुतरा के जुट्टी गुथैत ओ माथ उठौने छलैथ .। आकरा देखि अहं भाव सॅ मुस्कैत फेर सॅ अपन काज में लागि गेली ।दियासलाय के डिब्बा सब जे ओ रेलगाङी बनबऽ लेल रखने रहै .. .दादी ओकर बङ दीव महफा बना क’ ओहि में नव पुरान कतरन के ओहार लगा क’ . . .मोहक बना देने छलैथ . . .डिसपोजेबल सीरिंज के एक दोसर सॅ गोंद सॅ साटि क’ पंखा बनाओल गेल ।
आब सुरू भेल छल असल विवाहक तैयारी .. .कनिया के कपङा लत्ता गहना गुरिया. . . .मोती के छेद में सूइया नै घूसै. . .त’ सोनी अपन घर सॅ फूल काढ बला पतरका सुइया अनने छलै. . .कएक टा माला गॉथल गेल. ।. .मॉ के पुरना रेशमी . .सूती नूआ फाङि क’ बनल नूआ. . .घागरा प’ गोटा लगाओल गेल. . .टीन के चॉकलेट बाला डिब्बा सब में . .गुरिया के नूआ फट्टा .. .जेवरात . कीचन सेट टी सेट .. . .. एक टा डिब्बा में लट खूट समान राखल गेल. . .छोट छोट मैटिक चुकङी के कान प’ छेद करि क’ ओकरा तराजू जकॉ बना ओही में चौर दालि .. .मखान. . .चीनी . . लमनचूस. . बिस्कुट . . .भार दौरक सब समान राखि एक गोट सम्पूर्ण नब गिरहस्थी के संसार सजैबाक पयत्न कएल गेल ।
संगी .. . संघतिया सॅ भरल ‘ बुद्वक’ दूपहरिया में बङ धूमधाम सॅ कनिया के विवाहक आयोजन भ’ रहल छल ।गुड्रडा अ ित प्रिय सखी जया के छलै .. ।ओ अपन गुुड्डा के सजा धजा क’ चाह वला बङका ट्रे में लत्ता बिछा . . ओही प’ ओकरा चीत्ते सुता क’ . . .अपन माथ प’ नेने चारि टा बरियाती संग आबि गेल छल ।
विवाह हेतै कोना .. . . ।लाडो त’ अडियल घोङा बनल . . . ‘बिनु पंडितक कत्तो विवाह होइत छै .. ।’ सविता जे ओतए सबसॅ बूझनूक आ’ उमिर में पैघ . . .करीब नौ बरखक छल. . .. अपन चारि बरखक लजकोटर भाय के परतारिक पंडित बनौलक . . . .ओ अनेरे लाजे मूॅह नुकौने . . . ‘बम. . बम.’ करेत कनिया बर दूनू के एक हाथ सॅ कनेरक फूल के माला पहिरौलक आ’ दोसर हाथ .के . .मुठ्ठी बन्हने पीठ क पाछॉ रखने ।जल्दी सॅ माला पहिराक दौगि क’ दोसर कोन में गेल आ’ मुठ्ठी में राखल चोरूका टॉफी अपन मुॅह में झट दनी राखि नेने छल ।
लङकी बला के भोज भात करेनाय आवश्यक छलै. . ।किएक त’ ओहो सब पैघ लोक संग क़त्तेको विवाह क पार्टी में गेल छल त’ खेनाय पिनाय सएह मुख्य गप होय। ओकरे बङाय वा हिनताय ।
भोजक व्यवस्थात’ ओ अपने दम प’ करि नेने .चूकिया फोङिक’ अठन्नी चौवन्नी के ढेर देखि सिंघाङा .. गुलाब जामून .. आ’ जिलेबी त’ मीत्तू साह के दोकान सॅ मॅगा नेने रहै. . आ’ मॉ सेहो भनसिया के कहि पूङी आ’ खीर बनवा देने रहैथ ।घरक बङका बरामदा प’ दरी चादरि बिछा लाडो सबके भरि पेट. . . पत्तल प’ खुऔने रहै. ।. ‘देखी त ..हम अपन गुरिया के विवाह में केहेन हिय खोलिक भोज करि रहल छी .. . .आ इ सीमा जे केन्ो रहै. . .एकए क टा बिस्कूट खुआ देने रहै. . .. . . आ इ मा ला अपन गाछक लताम क’ एक एक टा फॉक पकङा देने रहै ।”
खा पीब क’ सब गोटे गीत नादक कार्यक्रम में जूटल. . .”चलनी के चालल दूल्हा अंखियो नै खोले है. .सॅ सुरू होइत ‘बाबूल की दुआए लेती जाऽऽ््।’ प समाप्त भेलोपरांत कनिया के घघरा बदलि नबका नूआ पहिरा क’ बङका टा के घोघ तानि मोङ माङि ओही महॅफा में बैसाबऽ के कोरसीस करै .. त’ कखनो कनिया के माथ बाहर भ’ जाए त’ कखनो पएर । .. . .हारिक’ महफा के ऊपर कनिया के सूताक’ लाल डोरी सॅ बॉधि क’ विदा कराओल गेल ।पलंगक दोसर कोन में बिछल ललका दरी जया के अस्थाई बासा बनल .. . कनिया ओहि ठाम पहुॅचली ।
विदाइ के पछैति थाकि क’ चूर भेल सब कियो लूडो खेलय में लागि गेल छल. . .सविता के छोटका भाय सेहो ।
तेसर दिन जया आयल छल मूॅह बनौने . . दस ठाम सॅ नाक भौं कोंचियाति “ई की. . . .हमर गुड्डा के त’ तू ठकि लेलही. . . नै औंठी . . नै .. गरा में चैन .. ।” .. लाडो त बकलेल जकॉ ओकर मुॅह ताकितै रहि गेलै. . ।ओ त’ अहि में ऐंठल छल जे एतेक खरीच करि क’ शान सॅ . . .अपन कनिया के विवाह केन्ो छल. .. . . एहेन भव्य समारोह त’ ओही परोपट्टा में कियो नहिं केन्ो छल । ओकर मूङी मित्र मंडली में खूब उॅच भ गेल रहै ।अकस्मात इ आरोप सुनि मूहें भरे खसल “इहो सब होय छै विवाह में . . .पहिने किएक नै बजलैं .. हम ओरियान करितौं।’ “हमरो कत्त बूझल छल. . .आय हमर नानी आयल छथि. . ओ कहलैन्ह .. लङका .के दान दहेज देल जाए छै. . .गुड्डा हमर एत्तेक नीक . . नै एको टा कपङा देलही नै बरतन जात. . ।केहेन विवाह गरीबहा जकॉ. . ।”
ओकरा गेलोपरांत ओ गुमसुम बाहर कुरसी प’ बैसल रहै. . ।सांझ नहूॅ नहॅू भरियाय लगलै. . .।एना उदास. . .उदास देखि कंपाउंड में टहलैत दादी. . ओकरा लग आबि पूछलथि त’ ओ अपन मोनक सबटा व्यथा उङिल देलकै. .।दादी बजली “हे. . . लैह. . ओ कोठा सोफा बला बरक माए. . .ओ कत्त देलकौ तोहर कनिया के गहना गुरिया. . .नै नथिया नै टीका .. .नै नूआ .. नै लहठी. . एहनो कत्तो विवाह होय छै ..सासुरो सॅ भार दोर आबै छै .. .तौं त’ एत्तेक सामान देबे केलही .. .. . ओना त’ सासुर में राजा के बेटी के सेहो दूषै छै लोक़ . .जे हाथी त’ देलथि मुदा ओकरा बान्हय लेल कङी त’ देबै नहि केलथि ।मुदा ओकर कोन मूॅह छै दूसब के”।
इ सुनैत मातर लाडो के संपूर्ण शरीर में जेना सौसे ललका पिपरी लुधैक गेल होय . . . ओ दौगल जया के घर ।
जया अपन कोठरी मे टांग पसारने बैसल कनिया पुतरा के पेटार खोलने असार पसार करैत . .चीज वोस्त सरिया ब्ऽ मे व्यस्त छल ।लाडो एकदम सॅ ननस्टॉप रेर्काड जकॉ सुरू भ’ गेलै “ हमर त’ पच्चीस टाका खरच भ’ चुकल अछि. . तोहर कत्तेक पाय खर्च भेलौ. . .चुकिया हम्मर फुटल की तोहर . . ।” आ’ अहि उकटा पैंची मे गप ततेक बढि गेलय जे जया गुङिया के ल’क कैस क’ बजारि देलकै .. “ले ल जो अपन गुङिया के”आ तामसे किटकिटाक’ ओकर हाथ मे अपन बीसो दॉत गङा देलकै. . ।लाडो दर्द सॅ बिलबिला उठल .. .हाथ छोङबैत ओ ओकर गुड्डा के अपन पएरक नीचा लतमर्दन करैत ओकर मुकुट .. .तोङि देलकै. . मुॅह पिचका देलकै. . “एहने बर .. नै हाथ . .नै पएर ..” कहैत. . तामसे आन्हर होइत. . जया के झोंट खींच क’ चारि मुक्का पीठ प’ मारैत. . लंक लगा क’ ओत्त सॅ पङाऽ गेल छल ।
अहि घटना के उपरांत त’ दूनू मे तेहेन तनातनी जे एक दोसर के शोणित पीबए लेल उद्वत. .।नेना भुटका मे दू फॉङ भ’ गेल रहै. .।किछु दूनू पख के धेने .. .नारदक कार्य संपन्न करबा मे लागल । ओही दिन मेघ बरसि गेल रहै . . .चारो कातक जमीन भीजल. त्त्. .. . . .जलखई करिक’ धिया पुत्ता के झूंड़ .. . . . पडोस मे .. . पछिला हफ्ता ट्रक सॅ . .उझिलल बौलक ढेर पर उछलम खूद करै .. पहुॅचल । . . .केकरो घर बनैत रहै. . कल्हुका बारीश सॅ बौल भींजल .. .ओकरा खोदि खोदिक ओही मे अपन पएर राखि घर बनाबए मे असीम उत्साह आ ऊर्जा सॅ जूटल छल . . कि तखने कोनो अगत्ती आबिक लाडो के कहलकै. “हौआ अपन गाछक नीचा बनल चबूतरा प’ बैसल जया तोरा देखि क’ मुॅह बिचकाबै छौ. . आ’ किदुन किदुन बाजि ओहि चारू छौंङी सब संगे खूब ठहक्का मारै छौ. . ।”ओकरा जेना बिरनी काटि लेलकै. . .अपन पएर प’ थोपल बालू के एक झटका मे फेंकैत ओ दौगल चबूतरा दिस .. . ।ओकरा पाछॉ आन धिया पुत्ता सेहो अपन अपन महल के धराशायी करैत. . .तूफान मेल बनल पहुॅचल ।
दुनू पाटी घरक पाछॉ वला इनरक कात के बङका चबूतरा प घों घें करैत फॉङ बन्हने .. .।इ वाक् युद्व. . .मल्ल युद्व में परिणत होमए लेल बेकल ।तखन दूनू .. क्रिकेट खेलैत अपन अपन छोट भायक हाथ सॅ बैट छीन नेने रहै. . .।धोबिनिया जे संजोगे सॅ कपङा नेने उम्हरसॅ आबैत रहै .. . .. दौगल लाडो के घर. . .चपरासी दौङा क’ ओकरा पङबाक आनल गेल ।एतेक गरमागरमी देखि क मतारी सब अपन अपन वीर बॉकुङा के खूब थपङियेने रहैथ ।. . .सब कियो छगुन्ता मे डूबल . . . नेना भुटका के संसार मे कोना एतेक कडुआहठ भरि गेलय ।
तेकरा बाद त’ कनिया पुतरा के विवाहे बन्न ।सबहक घर सॅ इ आदेश ‘खेलबैं त’ खेल . . मुदा विवाहदान किन्नौह नहि. . . ।’
ओ त हॉस्टल चलि गेल छल चौदह बरखक बनवास मे . ।ओत्त सॅ पपाके ट्रन्सफर भेला के बाद खिस्से खतम .. इ मस्तिष्कक कोन गव्हर सॅ निकैल ओकर स्मृति पटल प’ चान सन चमैक उठले सेनहि जानि ।ओ तुच्छ सन बेकार खेल वास्तव मे असल जीनग्ी के खेल छल .. . जतए उत्साह उमंग आ’ उल्लासक मध्य बङका काज प्रारंभ करैत लोक छोटका छोटका चीज मे उलझि अपन जीनगी नर्क बना लैत अछि । विदाइ के काल मॉ के बोल कान मे घुरय लगलै. . ‘नैहर खूजल. . पढल किताब. . सब किछु स्पष्ट .. मुदा सासुर ..नब अपरिचित पोथी. . गुढ रहस्य सॅ भरल. . कत्तेको बरख लागै छै बॉचबा में . . किछु मगज मे घूसै छै .. मुदा सदिखन विवेक सॅ काज लेबए के पाठ पढबैत .. ।’
ड्राइंग रूम सॅ एखनो धरि व्यंग .. आक्रोश सॅ भरल अचटि कुचटि क’ स्वर आबि रहल छल “मोहनजी त’ गोनू झा के बाप निकलला .. जहिना कहलियैन्ह दू टा वस्त्र में कनिया चाही तहिना दू टा वस्त्र में पठा देलन्हि ।बङका पाग बला लोक ..’ ‘इजे छहौर महौर केलथि . . गाङी देलथि . .से त’ बेटिये के कमाए हेतैै न .. .एतेक दिन सॅ कमा रहल छै ।’ ‘एहेन कंगाल कुटुम .. . कहु त’ वरक माय के एकटा डायमंडके सेट धरि नै देलकै ।कत्त फॅसा देलथि बज्रभूषण बाबू हमर बेटा के .. ।. जटाधारी बाबू केहेन नीक कथा देने छलैथ. . .इनकम टैक्स कमीश्नरक एकलौती संतान .. कतेक मकान . . .क तैक फारम हाउस. . .मुदा जो रे कपार. . ।”
लाडो क’ ऑखि मे थीर नोर भरभरा क’ खसय लगलै .. .मनुक्ख एसगरे बिन पैलवार के रहि नहि सकैत अछि .. .क़तबो पैर प’ ठाढ . . भ’ जाए .. .प्रगति के . . संपत्ति के सर्वोच्च शिखर प’ ठाढ भ’ जाए .. . .एकरा संग वा ओकरा संग .. .केकरो नै केकरो संग त’ चाहबै करी .. ।
संयम त्याग आ’ बुद्वि के बल प’ पैलवार चलै छै. . ।अही अतकही बतकही में नहिं फॅसिक’ नब जीनगी के नीक जकॉ कोना जीबी तेकर सुरूआत करबाक चाही ।आखिर पढल गुनल अपन पएर प’ ठाढ के मतलब की ।तोङनाय त’ एक क्षणक काज छै .. बना क’राखब मे न’ काबिलती ।व्यवहार सॅ अपन बनबय पङतै सबके ।घरक चारदीवारी सॅ बाहर . . . आफिसमे. . . कत्तेको तरहक गप सुनबाक . . सहबा के पङै छै. .. जौं घरे में सहि ली त’ अनर्थ की .. ।हॅ .. जखन जान प’ पङि जायत तखन त’ सोचले जेतै .. ।अनेको तरहक सद विचार सॅ मन हल्लुक भ गेलै. . ।ऑखिक नोर पोछि लाडो कान मे इयर फोन लगा आइ पौड प’ गीत सुनए लागल छल ।
२.
बिपिन झा
किछु पजरैत प्रश्न
महात्मा कसाब केँ फाँसी सजा के घोषणा कऽ पश्चात मीडिया में जनसामान्य, बुद्धजीवी, सरकार सभक प्रतिक्रिया सूनि मन में हसी छटल। केयो श्रीमान एकराआतंकवाद पर गम्भीर प्रहार घोषित करै छलखिन्ह त केयो एकरा भारतीय सुरक्षा एजेंसी, भारतीय न्यायपालिका सभक विजय कहलथि मुदा अगर ई घटना केँ निष्पक्ष मूल्यांकन करीए त कतेक प्रश्न मन मे उठैत अछि।
ई चिन्तनीय प्रश्न अछि जे राष्ट्रीय-सुरक्षा- अखणडता पर की पर की सामान्य नीति हेबाक चाही ? एहि सम्बन्धित कमजोर राजनैतिक इच्छाशक्ति देखि जनसामान्य में कोनो प्रतिक्रिया कियान होइत अछि? राष्ट्रीय सुरक्षा विषयपर न्यायिक-प्राशासनिक-राजनैतिक शिथिलता-लापरवाहीअ कि अक्षम्य अपराधनहि अछि? आखिर ई अफजल-कसाब आदि स्वनामधन्य महात्मा के फाँसी सजा कहियातक क्रियान्वयित हेतन्हि?
ई अनुभव होइत अछि जे राष्ट्रक आत्मा कतौ हेरा गेलई राष्ट्रीय संवेदना कतौ सुसुप्त अवस्था में बैसल छै राष्ट्र कऽ रोइओप में भारत असफल भय गेल !
भय सकैत अछि जे ई तमाम उलझन निर्मूल मात्र साबित होई भविष्य में मुदा चिन्तन त अनिवार्य अछि नै? ई सत्युअ आ यथार्थ छी जे भारत बहुत शक्तिशाली अछि आ ई मोट झंझावातक सामना आसानी से कय सकैत अछि मुदा मात्र ई चीज रटि कें वर्तमान समस्या आ लापरवाही सँमूह नहि मोडि सकैत अछि।
अपन देशक राजनैतिक स्वरूप अनेक विकृति सँ आप्लावित अछि एतदर्थ एकाएक सुधार सम्भव नहिं मुदा बुद्धिजीवी जनसामान्य अपन लोकतान्तिक समाज में एते सशक्त अछि जे ई कोनो परिवर्तन बड आसानी सँ आनि सकैत अछि।
समस्या अनन्त अछि राष्ट्रक समक्ष ! आब सभ व्यक्ति सबटा समस्या स परिचित छथि एतदर्थ आवश्युकता एहि कार्यक अछि जे एकटा सामान्य राष्ट्रीय जनचेतना जागृत होमय आ ई भ समस्या के समाधान हेतु अपन योगदान दथि।
ई बात स्मरणीय अछि जी बुद्धिजीवी समाज राष्ट्रक आधार स्तम्भ अछि अतः ओ नेतृत्व प्रशासन तन्त्र पर ओई तरहक हरसम्भव दबाब वनावथि जे राष्टीय सुरक्षा, विकास, प्रगति स सम्बन्धित सभटा लक्ष्य पूर्ण करि सकथि
ई विश्वास दृढ अछि जे भारत राष्ट्र अपन ऐतिहासिक यात्रा मे अनेक प्रश्नक उत्तर देलक। वर्तमान सम्मुख अछि आबि राष्ट्र कऽ एकटा व्यष्टि अंग रूप में अपनयोगदान दय अपन दायित्वक निर्वहण करी॥
प्रेमशंकर सिंह: ग्राम+पोस्ट- जोगियारा, थाना- जाले, जिला- दरभंगा।मौलिक मैथिली: १.मैथिली नाटक ओ रंगमंच,मैथिली अकादमी, पटना, १९७८ २.मैथिली नाटक परिचय, मैथिली अकादमी, पटना, १९८१ ३.पुरुषार्थ ओ विद्यापति, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर, १९८६ ४.मिथिलाक विभूति जीवन झा, मैथिली अकादमी, पटना, १९८७५.नाट्यान्वाचय, शेखर प्रकाशन, पटना २००२ ६.आधुनिक मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्य, मैथिली अकादमी, पटना, २००४ ७.प्रपाणिका, कर्णगोष्ठी, कोलकाता २००५, ८.ईक्षण, ऋचा प्रकाशन भागलपुर २००८ ९.युगसंधिक प्रतिमान, ऋचा प्रकाशन, भागलपुर २००८ १०.चेतना समिति ओ नाट्यमंच, चेतना समिति, पटना २००८। २००९ ई.-श्री प्रेमशंकर सिंह, जोगियारा, दरभंगा यात्री-चेतना पुरस्कार।
हरिमोहन झाक रचनाक परवर्त्ती
रचनाकर्मीपर प्रभाव
विगत शताब्दी निश्चये मैथिली साहित्यक हेतु स्वर्ण कालक रूपमे प्रवेश पौलक जकर फलस्वरूप सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे साहित्यिक वातावरणमे नव स्पन्दनक संचार भेलैक जे मातृभाषानुरागी रचनाकार एकर चहुमुखी विकास-यात्रामे मनसा वाचा कर्मणा आ कर्त्तव्य बुद्धया अजस्र साहित्य सरिता प्रवाहित करब प्रारंभ कयलनि जे पत्रिकादिक प्रकाशनक फलस्वरूप जनमानसमे मातृभाषाक प्रति अनुराग भावना उत्पन्न करबाक निमित्त जनजागरणक अभियान चलौलनि जे वर्त्तमान परिप्रेक्ष्यमे ऐतिहासिक महत्वक विषय भ’ गेल अछि। मातृभाषानुरागी साहित्य सृजक नव-नव प्रवृत्तिक रचनाक माध्यमे जनमानसक ध्यानाकर्षित करबाक निमित्त नव भाव-धाराक साहित्य-सृजन करब प्रारम्भ कयलनि तकरा अस्वीकार करब रचनाकारक प्रति अज्ञानता प्रदर्शित करब हैत। पत्रिकादिक प्रकाशनोपरांत मैथिली गद्य गंगा सहस्रमुखी साहित्यिक धारा उन्मुक्त भ’ कए प्रवाहित होमय लागल जकर फलस्वरूप एकांकी, उपन्यास, कथा, निबन्ध, नाटक, प्रहसन, संस्मरण एवं यात्रा वृतांतादिक सर्वतोमुखी विकास-यात्राक शुभारम्भ भेल।
वस्तुतः उन्नैसम शताब्दीक उत्तरार्द्धमे नवीनताक सूत्रपात भेल जकर फलस्वरूप आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक, एवं सांस्कृतिक जीवनमे नव-नव परिवर्त्तन दृष्टिगत होमय लागल। सम्पूर्ण राष्ट्र यथार्थोन्मुख प्रवृत्तिसँ प्रेरित भ’ महात्मा गाँधीक स्वतंत्रता आन्दोलनक प्रश्रय देमय लागल। सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे ओकर प्रतिनिधित्व पाश्चात्य शिक्षित वर्गक हाथमे छल। ओ लोकनि एक भाग अपन सांस्कृतिक विरासतक सुरक्षार्थ उत्सुकता देखौलनि तँ दोसर भाग नव आलोकक स्वागत कयलनि। एही सांस्कृतिक अनुष्ठानक पृष्ठभूमिमे अत्याधुनिक भारतीय भाषादिक विकास-यात्राक शुभारम्भ भेल जकर नेतृत्व बुद्धिजीवी लोकनि कयलनि। एही संक्रांति कालमे साहित्यमे आधुनिकता प्रारम्भ भेल आ रचनाकार साहित्यक नवीनतम प्रवृत्ति दिस उन्मुख भेलाह जे हास्य-व्यंग्यक सजीव चित्र अपन साहित्यमे प्रस्तुत कयलनि।
उपर्युक्त परिप्रेक्ष्यक स्वर्णिम बेलामे विगत शताब्दीक प्रथम दशकमे एक एहन अद्वितीय प्रतिभा सम्पन्न साहित्य-सृजक प्रादुर्भूत भेलाह जे अपन विविध रूपा अद्वितीय प्रतिभा सम्पन्न रचनावली ल’ कए पाठकक सम्मुख प्रस्तुत भेलाह जनिक साहित्यमे प्रचुर परिमाणमे हास्य तीक्ष्ण एवं प्रखर व्यंग्यक कारणेँ ओ जे लोकप्रियता अर्जित क’ कए प्रमाणित कयलनि जे मिथिलाक पावन भूमि अद्यापि विश्वकवि महाकवि विद्यापति सदृश सुसम्पन्न प्रतिभाशाली रचनाकार उत्पन्न क’ सकैछ ओ रहथि हरिमोहन झा (1908-1984)। ओ प्रचुर परिमाणमे उपन्यास, एकांकी, कथा, कविता, निबन्ध, प्रहसन, एवं जीवनयात्राक रचना क’ कए गद्य एवं पद्य धाराक अवरूद्ध मार्गकेँ नव प्रवृत्तिक रचनादि द्वारा प्रशस्त कयलनि। साहित्यक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थिक जे रचनाकार अपन अनुभूतिकेँ सत्यताक संग उद्घाटित करब साहित्यकारक दायित्व होइछ। रचनाकारक व्यक्तित्वक निर्माणमे अनेक प्रकारक भूमिका कार्य करैछ आ ओहि सभक सम्मिलित संयोजनसँ अपन रचनाक स्वरूप सुनिश्चित करैछ। मातृभाषानुरागसँ उत्प्रेरित आ अब्याहत मोह हिनका अपन कौलिक विरासतक रूपमे प्राप्त भेलनि जकरा ओ जीवन आ जगतक गम्भीर अनुभवकेँ व्यक्त करबाक तीव्र लालसा हिनका साहित्य-सृजन दिस प्रेरित कयलक। साहित्यिक क्षेत्रमे ई अपन अद्भूत समंवयात्मक दृष्टिकोणक परिचय देलनि। ओ युगक निष्प्राण धमनीमे अपन साहित्यक माध्यमे नव जीवनक रक्त संचारित करबाक प्रयास कयलनि। ओ गद्य आ पद्य दुनू विधामे समान रूपेण लेखन कयलनि, किंतु पद्यक अपेक्षा गद्य-विधाकेँ, जकर अभाव मैथिलीमे छल तकरा पूर्त्ति करबाक संकल्प कयलनि।
ई श्रेय आ प्रेय हुनके छनि जे ओ सर्वप्रथम मिथिलाञ्चलक संगहि संग राष्ट्रीय आ अंतराष्ट्रीय जनमानसक नव्यतम प्रवृत्ति हास्य-व्यंग्यकेँ चिन्हलनि तथा ओकरा अवलम्बन क’ कए कन्यादान (1933), द्विरागमन (1943), प्रणम्य देवता (1945), रंगशाला (1948), खट्टर ककाक तरंगक प्रथम भाग (1948), द्वितीय भाषा (1955), चर्चरी (1960), एकादशी (1964), जीवन यात्रा (1982), आ काव्य संग्रह (2005) आदि पुस्तक रूपमे प्रकाशित अछि। एहिसँ अतिरिक्त निबन्धादि यथा स्त्री-शिक्षाक वर्त्तमान दशा (मिथिला वर्ष-1 अंक-1 सन् 1336 वैशाख), स्वराज केँ लेत (मिथिला वर्ष-1 अंक-8 सन् 1337 अगहन) एवं देशाचार (डॉ. प्रेमशंकर सिंहक शोध प्रबन्ध)मे समसामयिक सामाजिक कुरीतिक प्रति ओ साकांक्ष कयलनि। हिनक निम्नस्थ कथादि यथा निरसन मामाक सिनेमा (1961), प्रगतिक पथपर (1961), शास्त्रार्थक जोश (1962), सहस्त्रर्थाचिभ्यो नमः (1962), सहयात्रिणी (1963), आब मोक्षे चाही (1970), भोला बाबाक गप्प (1974), कालाजारक उपचार (1977) एवं महाभारतक क्षेपक (1979), मिथिला मिहिरमे धूल-धूसरित भ’ रहल अछि। हिनक प्रहसन यथा बौआक दाम (1946), महाराज विजय (1948), ठोपसँ टोप (1935), आदर्श मैथिल रेलवे एवं रेलक झगड़ा (1960) आदि कोनो संग्रहमे नहि आबि सकल अछि जे चिंतनीय विषय थिक।
उपर्युक्त रचनादिमे ओ सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे सामकालीन मैथिल समाजक कुरुचि पूर्ण सामाजिक विकृति एवं विसंगतिपर कुण्ठाराघात कयलनि। सादा जीवन आ उच्च विचारक ओ प्रतिमूर्ति रहथि। ओ सत्य ज्ञानक भण्डार रहथि। ओ सशक्त व्यंग्यकार रहथि। हुनक चिंतन, पाण्डित्य, नीर-क्षीर विवेचनक शक्ति, व्यक्ति-व्यक्तित्वक खरेपन, सोझ, सपाट कथनक निखरल स्वरूप जनमानस समक्ष प्रस्तुत भेल जे उपन्यासकार, एकांकीकार, कथाकार, कविताकार, निबन्धकार, प्रहसनकार, एवं जीवन-यात्राकारक रूपमे हिनक साहित्यिक अवदान निश्चित रूपें प्रेरणादायक प्रमाणित भेल राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय स्तरपर। हिनक चिंतन आ साहित्य-साधना सागर सदृश विशाल अछि जे परवर्त्ती साहित्यसाधक लोकनिक प्रेरणाक अविरल स्रोत बनल। ओ अपन साहित्यिक प्रतिभा प्रसादात सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे अन्ध-विश्वास, रूढ़िग्रस्त परम्परा, धार्मिक वितण्डावाद, जीवनमे अंतर्विरोध, असंगति, ढ़ोंग, दम्म, पाखण्ड, बाबा वाक्यं प्रमाणम् क’ हठधर्मियता, मिथ्या बड़प्पन, मूर्खतापूर्ण संघर्ष, जीर्ण-शीर्ण विचार धारापर कशाघात क’ कए आचार-विचार एवं वाह्याडम्बरक तीव्र आलोचना आ भर्त्सना कयलनि। आनक उपलब्धिकेँ सहज भावसँ स्वीकारैत ओ सत्य गुणग्राहकक भूमिकाक निर्वाह कयलनि। हिनक कृतित्वक वैशिष्ट्य थिक हास्यमे सन्निहित व्यंग्य द्वारा ओ सामाजिक दोष दिस जनमानसक ध्यान आकर्षित कयलनि। प्राचीन एवं अर्वाचीन परम्परा एवं परिपाटीक दोष सम्प्रति वर्त्तमान अछि ओहि सभकेँ लक्ष्य क’ कए ओ अपन व्यंग्यवाण सँ बेधबाक प्रयास कयलनि। हिनक साहित्यमे ने तँ प्राचीन अन्धविश्वासक प्रति निष्ठा अछि आ ने तँ नवीनताक आन्धानुकरणक प्रति आशक्ति।
हरिमोहन झाक सम्पूर्ण साहित्य मात्र मिथिलाञ्चलक परिसर धरि सीमित नहि रहल, प्रत्युत राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तरपर उज्ज्वल भविष्यक सूचक सिद्ध भेल। हिनका द्वारा स्थापित परम्पराक प्रभाव परवर्त्ती युवा पीढ़ीक साहित्यपर तीन रूपें पड़लैक। प्रथम तँ ई मैथिलीमे पाठक वर्गक निर्माण कयलनि। द्वितीय मिथिलाञ्चलक कन्या लोकनिक व्यक्तिगत जीवन प्रभावित भेल जे हजारक हजार शिक्षित भ’ कए एक नव ज्योति जगौलनि। तृतीय प्रभाव पड़ल परवर्त्ती साहित्यकार लोकनिपर जे हुनका द्वारा प्रवाहित हास्य-व्यंग्य अविरल धाराक अनुकरण क’ कए साहित्यक विभिन्न विधामे साहित्य सृजनक परम्पराक शुभारम्भ कयलनि।
मैथिली साहित्यमे हिनका द्वारा हास्य-व्यंग्यक जे धारा प्रवाहित कयल गेल ओ एक नव-युगक अवतारणा क’ कए नव ज्योति जगौलक। हिनक प्रतिभाक छाहरिमे न्यू फोर्सक आविर्भाव भेलैक। हुनक कथा-साहित्यक परिवेशमे न्यू फोर्सक औनाहटिकेँ नहि थाहल जा सकैछ। न्यू फोर्सक अवतारणा एहन धरातलपर भेल आ एकर औनाहटि सर्वथा मौलिक छैक। हिनक साहित्यमे एकहि अकुलाहटि थिक समाजक नव जीवन शक्ति (भाइटल फोर्स)क प्राचीनताक सड़ल छोलकोइया फोड़ि क’ जनकल्याणक किरणसँ बाहर हैबाक अकुलाहटि। हुनक साहित्यमे रूढ़िवादक अन्धकार पूर्ण रात्रिक अंतिम अंशमे विहग कुलक रागिणी जे अयनिहार नवयुगक आन्दोलनक स्वागतमे गूंजि रहल अछि। ओ नारी जागरण शंखनाद कयलनि जकरा माध्यमे पर्दा प्रथा, तिलक-दहेज, बाबा वाक्यं प्रमाणम् पर गम्भीर चोट कयलनि।
हिनक साहित्य समाजक बीच प्रखर वेगसँ प्रवाहित होइत विभिन्न सामाजिक शक्ति सोसल फोर्सक घात प्रतिघात अछि। हुनक पात्र सभ परिस्थितिक प्रवाहमे बहैत अछि। आधुनिकताक बसातमे हिलैत अछि।
मैथिली उपन्यासक क्षेत्रमे ई हास्य-व्यंग्यक जे अजस्र धारा बहौलनि जे परवर्त्ती उपन्यासकार लोकनिक पाथेय बनल। जतय ओ शिक्षा-दीक्षा कारणेँ अनमेल विवाहक बलिदानक वेदी कन्या लोकनिक कुर्वान होइत देखलनि तकरा परवर्त्ती उपन्यासकार लोकनि व्यापक परिधिमे आनि यथा अवस्थाक कारणेँ अनमेल विवाह, रूप-गुणक कारणेँ अनमेल विवाह, शिक्षा दीक्षाक कारणेँ अनमेल, विधवा-विवाह आदि विविध सामाजिक वातावरण विशिष्ट सन्दर्भमे समसामयिक समाजमे व्याप्त विविध समस्यादिपर व्यंग्य कयलनि। वस्तुतः हिनक उपन्यासक प्रभाव मैथिली साहित्यपर तीन रूपें पड़लैक-समाजक मनोवृत्तिपर, कन्या लोकनिक व्यक्तिगत जीवनपर तथा परवर्त्ती लेखक समुदायपर।
हिनक उपन्यास नव युगक चौराहापर सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे परम्परावादक गुदरी पहिरने, कट्टरता मारल, ढ़ोंगक झमारल, रूढ़िवादी जजर्रित समाजपर तीक्ष्ण व्यंग्य क’ कए हास्य उत्पन्न कयलनि। हिनक हास्य-व्यंग्यसँ संयुक्त उपन्यास माइल स्टोन प्रभावित भेल जे हिनका द्वारा स्थापित मापदण्डक टक्कर क्यो नहि क’ सकला। हिनका द्वारा स्थापित एहि प्रवृत्तिक व्यापक प्रभाव परवर्त्ती अत्याधुनिक उपन्यासकार लोकनिपर पड़लनि जे वस्तुतः एहि प्रवृत्तिक वास्तविक विकास दृष्टिगत होइत अछि। हिनकासँ प्रभावित भ’ योगानन्द झा (1922-1986) मिथिलाञ्चलमे प्रचलित कुलीन प्रथाक निस्सारतापर भलमानुस (1944) मे अन्धविश्वासक वेदीपर सुकुमारी निर्मलाक निर्मम हत्या आ पवित्रा (1966)मे बाल-विवाहक कारणेँ वैधव्यक समस्या उपस्थित क’ कए व्यंग्य कयलनि।
हरिसिंह देवक वैवाहिक व्यवस्थाक पृष्ठभूमिमे कन्या-विक्रय आ वृद्ध-विवाहक पृष्ठभूमिमे वैद्यनाथ मिश्र यात्री (1911-1998), पारो (1353 साल) एवं नवतुरिया (1954)मे अवस्थाक कारणेँ अनमेल विवाहक समस्यापर व्यंग्य कयलनि। उपन्यास सम्राट व्रजकिशोर वर्मा मणिपद्म (1918-1986) अनलपथमे प्राचीन कुलीन प्रथाक नीचाँ दबायल चिनगोरा नव सामाजिक चेतनाक स्फुलिंग बनि क’ भुवनेश्वर एवं सरिताक रूपमे खिलैत अछि। सामाजिक नैतिकताक भर्त्सनाक संगहि-संग एहिमे सामाजिक जीवनमे राजनीति एवं आर्थिक पक्षपर व्यंग्य कयल गेल अछि। शारदानन्द झाक जयवार एवं अवधनारायण झाक वनमानुषमे उपन्यासकार समाजांतर्गत कतिपय उदण्ड व्यक्तिक दुष्कर्मसँ परिवार कलंकित भ’ सम्पूर्ण समाज हास्यापद भ’ जाइछ। राजकमल (1929-1967), पाथर फूल (1957) एवं आदि कथा (1958)मे व्यक्तिक व्यवहार एवं आंतरिक जगतक वीभत्स नग्नता एवं सामाजिक विरूपतापर व्यंग्य कयलनि। जतय विन्देश्वर मण्डल बाटक भेट जिनगीक गेंठ (1967)मे तिलक-दहेजपर ततय रूपकांत ठाकुरक नहलापर दहला (1967)मे बीसम शदीक उत्तरार्द्धमे जीवनमे आयल विसंगतिपर हास्य-व्यंग्य शैलीमे समसामयिक समाजपर व्यंग्य कयलनि।
समाजक परिवर्त्तित परिवेशमे ओ कथा-साहित्यांतर्गत जाहि हास्य-व्यंग्य शैलीक अवतारणा कयलनि तकरा परवर्त्ती पीढ़ीक युवा कथाकार लोकनि अधिक प्रशस्त कयलनि। किछु कथाकार तँ हुनक विचारधाराक अनुगमन कयलनि आ किछु व्यंग्य-मिश्रित भाषा-शैलीकेँ। परवर्त्ती कथाकार कोन अनुपातमे हुनक अनुकरण ओ विचारणीय प्रश्न अछि। हिनक कथाक लोकप्रियताक फलस्वरूप परवर्त्ती कथाकार हाँजक हाँज अग्रसर भेलाह जकर फलस्वरूप हास्य-व्यंग्य शैलीक निम्नस्थ कथा संग्रह प्रकाशमे आयल यथा नागेन्द्र कुमारक ससरफानी (1947), दृष्टिकोण (1954), शिकार (1954), एवं फलेना जामुन (1955), मायानन्द मिश्र (1934)क भाङक लोटा (1957) गोविन्द चौधरीक पाञ्चजन्य, रूपगर्विता एवं पाँच फूल, उदयभानु सिंहक जखन-तखन (1963), रूपकांत ठाकुरक धूकल केरा (1964) एवं मोमक नाक (1965), रमानाथ मिश्र मिहिर (1939-1999)क स्मृति (1965) एवं एकयुगक बाद (1975), छत्रानन्दसिंह झा (1946)क डोकहरक आँखि (1971) एवं काँटकूस (1977), हंसराज (1938-2006) जे कीने से (1972) दमनकांत झा (1924-1994)क गपाष्टक (1974), अमरनाथ झाक क्षणिका (1975), एकटा चाही द्रोपदी (1976), कबकब (1977), जोंक (1978), मोम जकाँ वर्फ जकाँ (1980) एवं अधकट्टी (2007) तथा मंत्रेश्वर झा (1944)क एक बटे दू (1977) आदि उल्लेखनीय अछि। परवर्त्ती किछु कथाकार एहन छथि जनिक कथा संग्रह तँ नहि प्रकाशमे आबि सकल अछि, किन्तु समकालीन पत्रिकादिमे हुनका सभक एहि प्रवृत्तिक कथादि प्रकाशित अछि जकर संख्या शताधिक अछि।
हरिमोहन झा ने विश्रुत गद्यकार रहथि, प्रत्युत वाक् सिद्ध कविताकार सेहो रहथि। हुनका विलक्षण प्रतित्वपन्नमतित्वक प्रतिभा सेहो छलनि। काव्यक क्षेत्रमे कुत्सित वैवाहिक परम्परा, बाल-विवाह, वृद्ध-विवाह, आधुनिक फैशन एवं सभ्यता, महगी, धार्मिक पाखण्ड, पर्दाप्रथा इत्यादि विषय केन्द्रित क’ कए गंभीर व्यंग्य कयलनि। परवर्त्ती युवा पीढ़ीक कवि लोकनि कतिपय कविताक रचना कयलनि। ओ ढ़ाला झा (विक्रम संवत् 2003)मे एहन व्यंग्यात्मक चित्र प्रस्तुत कयलनि जे लुट्टी झाक प्रप्रौत्र, नरहा पाञ्जि, ककरौड़क निवासी तथा बेलौंचेक वंशज, जनिक स्वरूप देखितहि पाठकक हास्यक अन्त नहि होइछ। एकर प्रभाव परवर्त्ती बड़ चर्चित काव्यकार वैद्यनाथ मिश्र यात्रीपर पड़ल आ ओ बूढ़वरक रचना कयलनि जे मैथिल समाजक यथार्थ व्यञ्जना उपस्थित करैत अछि। ई कविता भावनाक तीव्रताक कारणेँ हृदयग्राही बनि गेल अछि। वृद्ध विवाहक शब्द-चित्र चन्द्रनाथ मिश्र अमर (1925) बुढ़बा काका (1364 साल)मे अंकित कयलनि जे पुनर्विवाहक हेतु कतेक व्याकुल छथि। एहन वृद्ध-वरकेँ देखि क’ केँ पाठक नहि हैत जकरा हृदयमे आक्रोशक भावनाक उदय नहि हैत। एहि परम्परासँ प्रभावित समाजक यथार्थ अभिव्यञ्जना वैद्यनाथ मिश्र यात्री बूढ़वरमे कयलनि :
माथ छलनि औन्हल छाँछ जकाँ
जीह गाँजक जोलही माछ जकाँ
दाँत ने रहन्हि निदन्त रहथि
बूड़ि रहथि घेंत्था वसन्त रहथि
मिथिलाक समसामयिक समाजमे वृद्ध-विवाहक प्रचलनक कारणेँ कन्या विक्रय प्रथाक प्रचलन भेल। एहि परिप्रेक्ष्यमे हरिमोहन झा कन्याक निलामी डाक (1336 साल)मे पतित कुलीन प्रथापर कुण्ठराधात कयलनि जे कन्या एवं वर पक्षक घटक कोना मायाजालमे फँसा क’ कोमल कलीकेँ वृद्धक संग विवाह स्थिर करैत छथि तकर मार्मिक चित्रणसँ प्रभावित भ’ वैद्यनाथ मिश्र यात्री जखन कहैत छथि :
देख’ मे सुखैल पकटैल काठ
रुपैया बान्हि बूढ़ ऐला सौराठ
तथा
ई की कैल उठा क’ आनल
कमलक कोढ़ी लै ढ़ेङ कोकनल
बेटीकेँ बेचलहुँ मड़ुआक दोबर
बूढ़ बकलेल सँ भरलहुँ कोबर
आ उपर्युक्त प्रसंगमे चन्द्रनाथ मिश्र अमर कहैत छथि :
आगि देखौने कतहु नहि नमरैक लाह
वृद्ध विवाहक दुष्परिणाम होइछ अधिकांश कन्या विधवा बनि जाइछ। बाल-विधवाक जीवन केहन विषाद पूर्ण होइछ तकर स्पष्ट चित्रांकन वैद्यनाथ मिश्र यात्री कयलनि विलाप कवितामे। यथा :
भुस्साक आगि जकाँ
जरै छी मने मन हमहुँ
फटै छी कुसियारक पोर जकाँ
चैतक पछबामे ठोर जकाँ
हरिमोहन झा अत्याधुनिक फैशन परस्त युवक-युवतीपर सेहो व्यंग्यक कुण्ठाराधात कयलनि जकर स्पष्ट चित्र भेटैछ बूढ़ानाथ (1960) काव्यमे। आधुनिक समाजमे नारीक चारित्रिक उच्छृंखलता कतेक वेसी अछि ताहिपर कवि व्यंग्य करैत छथि। एहिसँ प्रभावित भ’ वैद्यनाथ मिश्र यात्री अत्याधुनिक राधिकापर कटाक्ष कयलनि :
देवि स्कूटर वाहिनी घुरिआउ सन्ध्याकाल
कोनो होटल मध्य बाट तकैत हैत बाँके बिहारीलाल
युग चक्रक कवि चन्द्रनाथ मिश्र अमर जखन कटाक्ष करैत छथि :
सुन्दरता लै पुरुष फटै छथि
नारी वर्गक कान कटै छथि
तैं तँ महिला सब उठि चलली
काटै पुरुषक कान कहौ केँ
आधुनिक फैशनक अति व्यापक प्रभाव पड़ल, जाहिसँ प्रभावित भ’ परम्परावादी पण्डित लोकनि सेहो एहिसँ अछूत नहि रहि सकलाह। ओ सभ सेहो आधुनिकताक संग चरणमे चरण मिला क’ चलय लगलाह। गोपाल जी झा गोपेश (1931-2009) एहने एक पोंगा पण्डितपर व्यंग्य करैत छथि :
देखने छलियनि पण्डित जीकेँ
टोस्टक संग चाहक चुस्की लैत
वैदिको जी भेटलाह सिनेमेमे
देखय आएल छला राजकपूरक सतरंगी तमाशा
अत्याधुनिक सभ्यतामे जतय हिनका दोष दृष्टिगत भेलनि तकरो ई व्यंग्यक आलम्बन बनौलनि। एहि दृष्टिएँ हिनक टी पार्टी (2005 साल) विशुद्ध हास्य-व्यंग्यसँ अनुप्राणित अछि जाहिसँ प्रभावित भ’ गोपालजी झा गोपेश कतिपय कविताक रचना कयलनि।
धार्मिक पाखण्डक आलम्बन बना क’ ई कतिपय काव्यक सृजन कयलनि। तन्त्र-मन्त्र, शास्त्र-पुराणक वितण्डावादक कारणेँ सामाजिक जीवन दिन प्रति दिन विषम भेल जा रहल अछि। धर्मक नामपर अपनाकेँ अग्रदूत बुझनिहार पाखण्डी पण्डित लोकनिपर व्यंग्य क’ कए धर्माचारक भण्डा फोड़लनि जकर प्रत्यक्ष उदाहरण थिक हुनक पण्डित (1953) एवं पण्डित विलाप (1960)। एहिसँ प्रभावित भ’ राजकमल चौधरी वैद्यनाथ धामक पण्डा लोकनिपर, आद्यानाथ झा निरंकुश (1934) गामक भूत एवं ब्रह्मस्थानमे, काञ्चीनाथ झा किरण (1906-1989) माटिक महादेवमे (1950) तथा तन्त्रनाथ झा (1909-1994), मुसरी झा (1956)मे उपर्युक्त पृष्ठभूमिमे व्यंग्य कयलनि जाहिमे हास्यक रूप स्वयं उद्भाषित भ’ गेल अछि। जहिना ओ अपन गद्य-साहित्यमे नारी जागरणक शंखनाद कयलनि तहिना ओ अपन काव्यमे सेहो उपर्युक्त प्रवृत्तिकेँ अधिक मुखर कयलनि जकर स्पष्ट रूप हिनक अङरेजिया लड़कीक समुदाउन (1953) एवं बुचकुन बाबा (1358 साल)मे उपलब्ध होइछ। एहिसँ प्रभावित भ’ परवर्त्ती युवा कवि लोकनि कतिपय काव्यक सृजन क’ कए एकरा अधिक मुखर कयलनि। हिनक निरसन मामा (1953)सँ प्रभावित भ’ वैद्यनाथ मिश्र यात्री नवनाचारी तथा बुचकुन बाबासँ प्रभावित भ’ गोपाल जी झा गोपेश करिया काकाक रचना कयलनि।
भिन्न-भिन्न स्थानसँ पत्रिकादिक प्रकाशनक फलस्वरूप निबन्ध-लेखनक एक प्रबल ज्वार आयल तकरे फलस्वरूप हास्य-व्यंग्य मिश्रित निबन्धक पारम्परिक शुभारम्भक प्रमाण थिक हिनक निबन्ध-साहित्य जाहिमे ओ समसामयिक सामाजिक कुरीति, पण्डित लोकनिक वाह्याडम्बर आ प्राचीन अन्धविश्वासकेँ खण्डित करबाक दिशामे जनमानसक ध्यानाकर्षित कयलनि। पहिने तँ हिनक निबंधादि वैदेही, मिथिला दर्शन, स्वदेश एवं मिथिला मिहिरमे प्रकाशित भेल, किन्तु पश्चात् जा क’ खट्टर ककाक तरंग प्रथम भाग (1948) आ द्वितीय भाग (1955)मे प्रकाशित भेल जकर फलस्वरूप एहि विधाकेँ अत्यधिक बल भेटलैक। हिनक निबन्धक प्रमुख नायक छथि खट्टर कका जे पूर्णत: विनोदी प्रवृत्तिक व्यक्ति छथि। हिनक प्रत्येक बात विनोद पूर्ण होइत छनि। ई अपन प्रतित्वपन्नमतित्वक कारणेँ सदिखन काव्य-शास्त्र-विनोदक धारा प्रवाहित करैत छथि। हिनक व्यंग्य युक्त विनोद पूर्ण कथनमे व्यक्ति, समाज, धर्म, दर्शन आदिक कटु आलोचना उपलब्ध होइछ। थैकरे जकरा राउण्ड एवाउट पेपर्स, कहलनि ओहि परिप्रेक्ष्यमे खट्टर कका पुरातन परम्परा यथा अन्धविश्वास, धार्मिक पाखण्ड, ढ़ोंग, रूढ़ि आदिपर व्यंगय क’ कए भयानक विद्रोह करैत छथि।
हिनक निबन्धक प्रमुख स्वर रहल अछि वेद-पुराण, कर्मकाण्ड, धर्म-शास्त्र, रामायण-महाभारत, ज्योतिष, आयुर्वेद, तन्त्र-मन्त्र, देवी-देवता, स्वर्ग-नरक, पुनर्जन्म-मोक्ष आदि विविध विषयकेँ ओ कोन रूपेँ देखलनि जे हिनका तार्किक निबन्धकारक कोटिमे परिगणित क’ देलक। ओ गीता, दुर्गापाठ एवं सत्यनारायणक कथाक विनोदात्मक व्याख्या करैत छथि तँ सांख्य, वेदान्त एवं भगवत्-भजनपर व्यंग्यात्मक पिचकारी छोड़ैत छथि। हिनक निबन्ध साहित्य बिजलीक करेंटक समान अछि। धार्मिक पाखण्डक खण्डनमे ओ प्रमाण एवं व्यंग्यवाणक झड़ी लगा देत छथि। हिनक निबन्धादिककेँ पंक्ति-पंक्तिमे हास्य-व्यंग्यक अजस्र धारा प्रवाहित भेल अछि। विचार-प्रधान निबन्धमे देखल जाइछ जे विचारात्मक एवं मधुर भावात्मक गद्यशिल्पक सम्मिश्रण आ वाद-विवादक प्रसंगमे संयुक्त गम्भीर व्याख्यात्मक गद्य-शिल्पक तेजी रहैछ। एहन गद्य शिल्पक हेतु बात कहबाक लेल भाषा नहि तकैछ।
निबन्धक क्षेत्रमे हुनका द्वारा स्थापित परम्पराक परिप्रेक्ष्यमे परवर्त्ती युवा निबन्धकार एहि प्रवृत्तिसँ अनुप्राणित भ’ आगाँ बढ़यबामे अद्भूत योगदान देलनि जकर संख्या सह्स्राधिक अछि। किन्तु दुर्योगक विषय थिक जे जाहि परिमाणमे हास्य-व्यंग्यसँ संयुक्त निबन्ध विभिन्न पत्रिकादिमे प्रकाशित भेल ओकर अत्यल्प संग्रह प्रकाशमे आयल अछि। खट्टर ककाक तरंगसँ सर्वाधिक अनुप्राणित भेलाह अमृतधारी सिंह (1918-1992) तथा हुनक शैलीक अनुकरण क’ कए घूटरबाबाक जाल (1976) एवं मन्त्रेश्वर झा ओझा लेखेँ गाम बताहे (1979) प्रकाशमे आयल। उपर्युक्त दुनू निबन्ध संग्रहमे हास्य-व्यंगयक संग कथात्मक रोचकताक समन्वय भेल अछि।
एतय एक बातक उल्लेख करब अधिक समीचीन हैत जे एहि विधामे नव-नव प्रतिभा सम्पन्न निबन्धकारकेँ उपस्थित करबाक दिशामे पटनासँ प्रकाशित मिथिला मिहिर अत्यधिक प्रोत्साहित कयलक। किन्तु एतबा कहबामे अतिशयोक्ति नहि होयत जे जाहि प्रकारक लोकप्रियता हरिमोहन झा अर्जित कयलनि ताहि रूपक लोकप्रियता अद्यापि किनको नहि भेटलनि अछि।
हरिमोहन झाक प्रहसन, एकांकी एवं छाया रूपक रचना क’ कए एक प्रतिमान प्रस्तुत कयलनि जकर व्यापक प्रभाव परवर्त्ती युगक युवा रचनाकर्मीपर पड़ल। एहि सब रचनादिमे व्यंग्य एवं हास्यक प्रधानता अछि जाहिमे ओ समाजकेँ कंगाल बना देनिहार दहेज प्रथा आ नारी जागरणक शंखनाद कयलनि। एहि दृष्टिएँ तन्त्रनाथ झाक एकांकी चयनिका (1947)मे कालेज प्रवेशमे एक अनुभवहीन, आधुनिकताक प्रिय एवं अर्द्धज्ञान प्राप्त छात्र समुदाय, तमघैलमे स्वार्थी समाज आ उपनयनाक भोजमे सामाजिक द्वेष तथा कुप्रथापर प्रपंच रचनिहार तथा घटकक पराभवमे नव युवक समुदायपर व्यंग्य कयलनि अछि जे विनु कन्या देखने विवाहार्थ प्रस्तुत नहि होइत छथि। योगानन्द झा मुनिक मतिभ्रम (1953)मे वृद्ध विवाहपर कठोर आघात कयलनि जाहिमे नाटकीय व्यंग्यक स्वर अधिक प्रखर अछि। सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे समसामयिक घटनाक आधार बना क’ चन्द्रनाथ मिश्र अमर समाधान (1955)मे निरक्षरता निवारक पाठशालामे वयस्क शिक्षापर संगहि नवीन पाठ्य प्रणालीमे आधुनिक शिक्षा पद्धतिपर तथा मलरवि (1961) हास्य-व्यंग्यक जे वातावरणक सृजन कयलनि जे सर्वाधिक निखरल अछि। सुधांशु शेखर चौधरी (1920-1990)क हथटूट्टा कुरसी (1960)मे दू पीढ़ीक मानसिक वैषम्य, संघर्ष, वाह्याडम्बर, ममत्व एवं सामाजिक परिवेशपर कठोर व्यंग्य कयलनि अछि।
एहि प्रवृत्तिकेँ आगाँ बढ़यबाक दिशामे परमेश्वर मिश्र क’ त्रिवेणी, हरिश्चन्द्र झाक छींक, रूपकान्त ठाकुरक वचन वैष्णव (1965) एवं लगाम (1966), चन्द्रकान्त झाक वाल्टी क्लब (शाके 1881) एवं पढ़बाक खर्च (शाके 1881), प्रबोध नारायण सिंहक हाथीक दाँत (1964), उदय नारायण सिंह नचिकेताक रामलीला (1977), जगदीश झाक मैथिली एकांकी प्रहसन (1988), किशोरी यादवक आँखिक बीझ (1987), मन्त्रेश्वर झाक बहुरूपिया (1993) एवं धूर्त्तनगरी (1993) समारोह (1991) एवं पराजय (1994) आदि-आदि एकांकी एवं प्रहसन हरिमोहन झाक हास्य-व्यंग्य शैलीक अनुकरण क’ कए लिखल गेल अछि।
एहि विधामे कतिपय एकांकी एवं प्रहसनकार उद्भूत भेलाह जनिक रचनादि विभिन्न पत्रिकादिमे धूल-धूसरित भ’ रहल अछि जकर संकलन अद्यापि प्रकाशमे नहि आबि सकल अछि। हमर विश्वास अछि जे भविष्यमे एहि विधाक अनुकरण क’ कए परवर्त्ती युवा पीढ़ी नव रूपेँ हास्य-व्यंग्य प्रस्तुत करताह।
कारयित्री एवं भावयित्री प्रतिभासँ समलंकृत हरिमोहन झाक उपन्यास, एकांकी, एवं प्रहसन, कथा, कविता, निबन्धादिमे हास्य-व्यंग्यक नव प्रवृत्तिक ओ जे नेओ देलनि ताहिसँ अनुप्राणित भ’ परवर्त्ती युवा रचनाकर्मी राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तरपर प्रभावित भेलाह जे उपर्युक्त विवेचनसँ स्पष्ट अछि। एहि प्रवृत्तिक हिनक विशाल साहित्यिक अवदान एक वट-वृक्षक समान अछि जकर परिसरकेँ केन्द्र-विन्दु मानि परवर्त्ती युवा रचनाकर्मी हास्य-व्यंग्यक अजस्र धारा प्रवाहित कयलनि आ पाठकवर्गक निर्माण, स्त्री शिक्षाक व्यापक प्रसार, अनमेल विवाहक अंत, धार्मिक वितण्डावादमे सुधार, चारित्रिक दुर्बलताक विनाश, राजनीतिक मूल्यमे ह्रास, सामाजिक वातावरणक विशिष्ट सन्दर्भमे सुधारक प्रयोजनीयताकेँ ध्यानमे राखि रचना कयलनि। हिनक साहित्यक व्यापक प्रभावक फलस्वरूप परवर्त्ती युवा पीढ़ीक साहित्य मनीषीपर पड़लनि आ हुनक प्रतिभाक प्रस्फुटन भेलनि। हुनक साहित्यक विशाल परिधिकेँ ध्यानमे राखि क’ जँ हुनका मैथिली साहित्यक चार्ल्स लैम्ब कहल जाय तँ कोनो अतिशयोक्ति नहि हैत। अंग्रेज समाजक जेहन चित्रण बनार्ड शॉक रचनामे उपलब्ध होइछ ओही प्रकारक मिथिलाञ्चलक सामाजिक जीवनक विशिष्ट सन्दर्भक एलबल थिक हिनक साहित्य-संसार।
जहिना सुस्वाद, चर्व्य, चोष्य, लेह्य, पेय भोजनकेँ प्राप्त भेलापर पेटूकेँ आनन्द होइछ तहिना हास्य-व्यंग्यमे अभिरुचि रखनिहार राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय युवा पीढ़ीक परवर्त्ती रचनाकारकेँ हास्य-व्यंग्यक ई एक नव मार्ग प्रशस्त कयलनि। हिनक साहित्य-संसारक लोकप्रियताक अनुमान तँ एहीसँ लगाओल जा सकैछ जे जहिना देवकीनन्दन खत्रीक उपन्यास चन्द्रकान्ता सन्तितकेँ पढ़बाक हेतु अनेक अहिन्दी भाषी जनमानस हिन्दी सिखलनि तहिना हरिमोहन झाक चित्ताकर्षक हास्य-व्यंग्य रचनाक रसास्वादनक हेतु बहुतो लोक मैथिली सिखलक। हिनक विभिन्न रचनादि समय-समयपर विभिन्न आधुनिक भाषाक प्रमुख साप्ताहिक, पाक्षिक एवं मासिक पत्रिकादिमे अनूदित भ’ प्रकाशित भ’ अमैथिली भाषीकेँ आनन्दित कयलक। वस्तुतः ई श्रेय आ प्रेय हिनके छनि, जनिक साहित्य सर्वाधिक भाषामे अनूदित एवं समादृत भेल जे हिनका राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्यमे अत्याधुनिक परिवेशमे युवा रचनाकारकेँ साहित्य-सृजनक निमित्त उत्प्रेरित कयलक। विद्यापतिक पश्चात् मैथिली भाषा-साहित्यकेँ अन्तर्राष्ट्रीय पहचान देनिहार रचनाकारमे हिनक समस्त साहित्य अजर, अमर एवं अक्षुण्ण रहत से हमर विश्वास अछि।
३. पद्य