काठमाण्डूमेँ कोहबर घर : वर ने कनिञा तैइयो बढिञा
केवाडमेँ स्वागतम् । घरके भितमे वर कनिञाक चित्र, हाथीपर चढिकऽ गौर
पुजैत नवविवाहिता, डोली कहार सेहो ।
कोहबर घर मैथिली सँस्कृतिके एकटा अनुपम नमुना, गवाह नव दाम्पत्यक । वर
कनिञाक मिलनके साक्षी सेहो । ई कोहबर घर कोनो बर कनिञालेल नहि अछि, ई अछि
मिथिलासँस्कृतिक जीवैत नमुना । मैथिलीक समृद्ध परम्परा आ संस्कारके
चिनारी बनल अछि ई कोहबर घर ।
काठमाण्डूक कुपण्डोलस्थित महागुठी आर्ट ग्यालरीमेँ सजाओल कोहबर घर मैथिली
सँस्कृतिके बखान करैत अछि । एहि कोहबरमेँ रहल पाग, डोपटा, वियनि, डोला
कहार, गुआ—माला जेहन चीजसभ आओर आकर्षक बना देने अछि । तहिना वियाहक विध सिन्दुरदान, मुँहदेखाइ, विदाइ के पेन्टिंगसभ सेहो कोहबर घर देखनिहारके
अपना दिस खिचैत अछि ।
हस्तकलाक समान उपलब्ध होबऽबला ई दोकान मेँ कोहबर घरके मिथिला पेन्टिंगके
उजागर करबाक प्रयास कएल गेल अछि । विवाहमेँ विधके क्रममे काज लागऽबला आ
मैथिली घरके प्रतीक उखरि—समाठ, कोठी जेहन वस्तु सेहो गमैया लुक दैत अछि
एहि कोहबर घरके ।
एत्तऽ एलासँ लगैत अछि जे कोनो मिथिलासंग्रहालयमेँ चलि एलहँु । मैथिली
सँस्कृतिके संरक्षणक नामपर बडका बडका भाषण केनिहारसभके एहि कोहबर घरसँ
किछु ज्ञान भेटि सकैत अछि ।
मिथिला पेन्टिंगके लोकप्रियता आ मैथिली सँस्कृतिके मौलिकता कारण ई
कृत्रिम कोहबर घर देश विदेशक कला प्रेमीके मोन मोहि लैत अछि ।
मिथिला पेन्टिंगके वाहक मात्र नहि समग्र संस्कृतिके परिचायक ई नमुना
कोहबर घर काठमाण्डूसँ देश विदेशक लोकके मैथिली संस्कृति दिस आकर्षित करैत
अछि ।
2.परम्पराके निरन्तरतामेँ प्रवास बाधक नहि
गामसँ कोशोदूर रहितोअपन परम्परा आ सँस्कारके बचाकऽ राखऽमें मैथिल महिलाक
बडका योगदान अछि । ग्रामीण परिवेशमेँ सहज रुपेँ पाबनि तिहार केनिहारि
महिलाक अपेक्षा शहर आ दूर देशमेँ रहल मैथिल महिलाके पाबनिक ओरिआओनपातीमेँ
दिक्कति त होइते छन्हि मुदा पाबनिपर एकर कोनो प्रभाव नहि परैत अछि ।
काठमाण्डूमेँ बरसाइत पाबनि केनिहारि अर्चना झाक कहब मानी त काठमाण्डूमेँ
रहियोकऽ कोनो दिक्कति नहि होइछन्हि एहि पाबनिमेँ । गाममेँ सभ महिला बडका
बरक गाछ तर जम्मा भऽ बरक पुजा करैत छथि त शहरमेँ गमलामेँ बरक गाछ राखिकऽ
बेगरता पुरा कएल जाइत अछि । बटसावित्री अर्थात बरसाइतमेँ अहिवात महिला
अपन पतिक लम्बा आयुक कामना करैत छथि, नव कनियाँकलेल इ पाबनि बेशी महत्व
रखैत अछि । नवकनियाँ सभकेँ प्रोढ महिला वरसाइतक विध विधान सिखाकऽ पुजामेँ
सहयोग कएल करैत छथिन्ह । काठमाण्डूमेँ महिला सभ सामुहिक रुपेँ एहन पाबनि
पुजल करैत छथि । सामाजिक सदभाव आ एकदोसराके बुझबालेल सेहो शहरवासी मैथिल
महिलाक लेल एहन पाबनि निक अवसर भऽ गेल अछि । शरिर कतउ रहए मोनमें अपन
परम्परा आ सँस्कारप्रति श्रद्धा होएबाक चाही, अपन सँस्कृति आ परम्पराके
निरन्तरता देबामेँ प्रवास बाधक नहि होइत अछि ।
१.बीरेन्द्र कुमार यादव- कथा- हमर समाज २.जीवकान्त-जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास- “मौलाइल गाछक फूल” पर ३.धीरेन्द्र कुमार-जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास- “मौलाइल गाछक फूल” पर ४.राजदेव मंडल- कुरूक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल पत्र
१
बीरेन्द्र कुमार यादव
ग्राम- घोघड़रिया, पोस्ट- मनोहपट्टी, भाया- निर्मली, जिला सुपौल
ग्राम- घोघड़रिया
पोस्ट- मनोहपट्टी
भाया- निर्मली
जिला सुपौल
कथा
हमर समाज
विरेन्द्र कुमार यादव
बिन्नू आ बीरू बालसंगी छलाह। दुनू गोटे कोशीक कछेर गाम घोघड़रियामे मरूआक रोटी आ पोठी माछक चटनी जलखै खाइत छल। रेडियो बाजि रहल छल जे “लिंक रोड निरमलीमे विष्णु महायज्ञ शुरू अछि, जहिमे गणेशजी महाराज लोक सभकेँ लड्डू दैत छथिन्ह।” ई सुनितहि बिन्नू अपन भजार बीरूकेँ कहलखिन- “यार, घोर कलियुगमे गणेशजी लड्डू बटैत छथि। एक दिन चलु आ अपनो सभ प्रसाद लए आबि।”
दुनू भजार आश्चर्य करितहुँ यज्ञ मेला देखवाक िनश्चए कएलक। ओहि बीच गामक ठकनी काकी मुँहमे पान गलठैत हाथमे बजैत रेडियो नेने लगमे आबि बजलीह- “यौ बिन्नू बौआ, एहि रेडीमे कहलक जे लिंक रोड ईटहरीमे गणेश भगवान लड्डू बँटैत छथिन्ह, अपनो सभ चलेचलु गणेशक लडू लए आबि।”
बीरू बजलाह- “गै काकी धैरज धर हम रेलगाड़ीक भॉंज करै छियौ, गामक सभ गोटे रेलपर चढ़ि गणेशजीक प्रसाद लेबाक लेल अवश्य जाएव।”
ठकनी काकी कने ठमकि कऽ बजलीह- “रौ बकलेलहा, एहि गाममे बस, मोटर चलबाक तँ रस्ते नहि अछि, तोँ रेल मंगबैत छैँ।”
बीरू हँसैत बजलाह- “गै काकी जहन माटिक मुरूत गणेशजी लड्डू बॉंटि सकैत छथि। तखन बिनु पटरीक रेल किएक नहि आओत?”
बीरूक बात सुिन बिचहिमे बिन्नू कहलखिन- “अहॉं सभ बकझक जुनि करू, धर्मक काज देखबा, सुनवा आ कएलासँ स्वर्ग होइछ। हम सभ मिलि देवी पूजा पाठ आ दर्शन करए एक दिन अवश्य जाएव।”
गामक पैघ आ देहोदशासँ भरिगर पंडित कमलशेखर बावूसँ भेटि कए दुनू भजार शुभ दिन तकौलक आ भाड़ाक बदलामे तेलपर परमाबावूक ट्रेक्टर भॉंज कएलक।
जेठ मासक रौदमे ठकनी काकी, बीन्नू, बीरू आ गामक लोक सभ ट्रेक्टरसँ यज्ञमेला देखबाक लेल प्रस्थान कएलक। उबड़-खाबड़मे ट्रेक्टरक झोलामे झुलैत, रंग-विरगक गप-सप्प करैत रज्ञ स्थल माने मेला पहुँच गेल।
रज्ञ स्थलपर अनगिनित लाउडस्पीकरक आवाजसँ भारी शोर-शराबा होइत छल। एहि बीच साइकिल स्टेंडसँ एगो चीकन युवती समतोला रंगक समीज सलवार पहिरने, ऑंखिपर रंगीन गोगुल्स धरौने, हाथक मोवाइलसँ फोटोग्राफी करैत ठकनी काकीपर नजरि पड़ितहि बजलीह- “मौसी अहॉं आबि गेलहुँ, बढ़ियॉं भेल, भेंट-मुलाकात भऽ गेल। हम तँ प्रचारे सुनि अएलहुँ। एतेक लोकक भीड़ तँ एहिठाम कॉंलेज परिसरमे देशक प्रधानमंत्री बाजपेयीजी आएल छलाह ओहूमे नहि भेल छल।” ई सोलह बरिसक बाला प्रेमलता जे हालहिमे पत्रकारितासँ जुड़लीहेँ सएह छथि।
एहि यज्ञ मेलामे अनेको लोक-लुभावन कार्यक्रममे भोरूकवा रेडियो स्टेशन एफ.एम ९२.८, राजविराज (नेपाल)सँ आएल मैथिली भाषी कलाकार सभ मैथिली भाषाक विकासक लेल आ समाजकेँ प्रगतिमूलक शिक्षाक हेतू बढ़िया कार्यक्रम देखौलक।
ठकनी काकीक संगे प्रेमलता आ गामक लोक कार्यक्रमक आनंद लैत मुरूतक दर्शन करए आगू बाढ़लाह। सभसँ पहिने धोर कलियुगमे सतयुगक कामधेनू गाए देखितहि प्रेमलता बजलीह- “मौसी, कामधेनूक थनसँ चुबैत दूधक पान करू आ जिबतहि स्वर्गक बदलामे माक्ष प्राप्त करू।”
प्रेमलताक एतेक सुिन बीरू बाजि उठल- “काकी कामधेनूक चारू दिस ऑंखि खोलि कऽ ताकू। ई बुद्धिक कमाल आ व्यवसायक धार्मिक तरीका छी। जाहिपर कोनो तरहेँ ऑंगुर नहि उठए आ शांतिसँ पाइक संचय हुअए। ई सभटा पाइ िहन्दु धर्मक ठीकेदार बाबा आ पंडितजीकेँ पाकिटमे जाएत, जाहिसँ बाबा आ पंडितक जिनगी शान-शौकत आ भोगविलासमे बीतत।”
ठकनी काकी लोकक एतेक भीड़ रहितहुँ ठेलि-ठालि कऽ अमृत पान कएलक आ लोको सभकेँ करौलक। बीनू कहलखिन- “ओहिठाम लाेकक बड्ड भीड़ छैक ओतए चलि देखू कोन देवता की बॉंटैत छथिन्ह। सभ गोटे ओहि भीड़क लग गेल। श्रद्धालू भक्रगण गणेश भगवानसँ टाका दए प्रसाद माने लड्डू लेबाक मुड़ कटबैत छल।”
प्रेमलता मुरूतक सजाओल दृश्यक फोटो खींचैत यज्ञशालाक बगलमे ठाढ़ दलीह आ मोनमे रहनि जे किछु श्रद्धालूजनसँ साक्षात्कार करी आ संवाद प्रेषित करी। तावत काल माथपर भाेगारसँ उजरका आ सिनुरिया चानन घसल गेहुमा रंगक मोटगर लोक उजरका धोती पहिरने प्रेमलताक सोझाा आएल। प्रेमलता पूछि देलखिन- “पंडितजी ई की भए रहल अछि।”
जोरसँ ठहाका दैत पंडित जी बजलाह- “ई धोर कलियुग बीत रहल अछि। मनुक्खक गप्प छोड़ू आब तँ देवता लोकनि सेहो पाइक लेल दोकान खोलि देलक। िहन्दु धर्मक चादरि ओढ़ि अधार्मिक, अनैतिक काज करबा लेल हमरा समाजक प्रतिष्ठित व्यक्ति सभ कतेक तत्पर अछि से सभ ऑंखि खोलि देखबाक लेल आएल छी। दुनियाँक लोक सभ चॉंदपर बसवाक लेल प्रयासरत अछि, आ हमरा समाजक लोकसभ साहुकार गणेशक लड्डू पाइ दए कऽ पबैत अछि।”
ठकनी काकी प्रेमलताक लग आबि बजलीह- “गै छौड़ी, केकरासँ गप्प करै छेँ चल एहिठामसँ आब गामो जाएव।”
मौसीकेँ विदा होइसँ पहिनहि प्रेमलता वीरू दिस मुस्की दैत बजलीह- “अपने किछु कहब?” वरू झटसँ कहलखिन- “किएक नहि? सभ लोककेँ धार्मिक होएवाक चाही, मुदा एहिठाम जतेक आडम्बर कएल गेल अछि से उचित नहि। आजुक वैज्ञानिक युगमे ढ़ाइ-तीन लाख रूपैया खर्च कए एहि तमाशासँ वातरवरणक शुद्धि, भक्तिमय माहौल आओर गामक नाम उँच केलक एकर अलावा की प्राप्त होएत? समाजक एतेक रास रकमक खर्च आधुनिक सोचसँ गरीबक बच्चाकेँ पढ़वा-लिखबामे, बिमारीसँ पिड़ित लोकक इलाज करएवामे, गामक विकासमे होएवाक चाही। जाहिसँ हमरो समाजक धीया-पुताकेँ नोबेल पुरस्कार प्राप्त करबाक अवसर भेटय। धार्मिक कार्यक्रमक उद्देश्य बदलि गेल अछि। सभटा खेला पाइ हँसोथबाक लेल भऽ रहल अछि। एना कएलासँ हमर समाज आगू नहि बढ़ि पएत। अपितु पाछुए रहत। ई हमरा सभक लेल हास्यास्पद बात छी।”
प्रेमलता मुस्कुराइत हाथ आगू बढ़बैत बीरूसँ हाथ मिलाए मौसीसँ विदा लेलनि। वीरू प्रेमलता दिस आ प्रेमलता वीरू दिस धुिर-धुिर तकैत चलि गेल। विन्नु भाय, अपन भजार वीरूक मुस्कुराइत चेहरा टुकुर-टुकुर तकिते रहि गेल। तत्पश्चात् ठकनी काकी विन्नु, वीरू आ गामक लोक सभ ट्रेक्टरपर चढ़ि गाम दिस विदा भेल।
2.
जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास “मौलाइल गाछक फूल”
जीवकान्त
ज
गदीश प्रसाद मण्डलक पोथी “मौलाइल गाछक फूल” पढ़ि गेलहुँ। एकटा नव लेखक। एकटा नव भाव-भूमि।
उपन्यास थिक। प्रमुख बात थिक गामक गरीबी, अशिक्षा आ खेतक विषम वितरण।
आरंभसँ अन्त धरि समाजवादक धारणा गनगनाइत अछि। तेँ पात्र सभ गौण भऽ जाइत अछि। पात्र सभ गरीबी लए कऽ उपस्थित होइत अछि, अपन दीनता, अपन संघर्ष अपन विजय अभियानक दिशा देखबैत अस्त भऽ जाइत अछि।
गाम बदलतैक जखन बोनिहारकेँ भूस्वामी बना देल जएतैक, शिक्षा लेल स्कूल फुजतैक, दवाइ लेल डाक्टर आ दवाइ सुलभ हाेएतैक।
से सभ एहि “मौलाइल गाछ” (मिथिला आ भारतक अविकसित आ कृषि-प्रधान गाम) मे भऽ जाइत छैक। भूमिक वितरण भऽ जाइत छैक। स्कूल फुजैत छैक। दूटा किशोर-किशोरी मद्रास जा कए चिकित्साक आरंभिक ज्ञान लए गाम आिब जाइत छैक। गाममे पिरवर्तन होइत छैक। गामक स्वर्ण भूस्वामी डोमक नोत मानि सोत्साह भोजमे सम्मिलित हाेइत अछि। बोनिहारक बेटा गामक पैघ जोतदार (आब भूत पूर्व) लेल जर्मनीमे बनल रेडिओ उपहार देवा लेल अनैत अछि।
नव जागरण छैक। नया समाजवाद छैक। कतहु मारि-मोकदमा नहि। कतहु भोट-भॉंट नहि। सभ वस्तु आरामसँ स्वत: होइत गेल अछि।
एकठाम लाठी चललैक अछि। िसतिया आ ललबाबला प्रसंगमे। दू वर्गक लोक अछि। दुनूक वर्ग चरित्र झलकैत छैक। पोथीमे उल्का जकॉं ई घटना अबैत अछि आ मिझाइत अछि।
वर्ग घृणा एकठाम छैक। सुबुध मास्टर नोकरी छोड़बा लेल त्यागपत्र फेकि अबैत अछि। ओकर स्त्री घौना करैत अछि। घसवाहिनी सभ आेकर दुख ओकर जीवन-शैलीक चर्चा कए अपन घृणा प्रकट करैत अछि।
गाममे एहेन परिवर्तन होएवाक चाही। से बात उपन्यासकार कहैत छथि। कथानकमे कोनो पार्टीक उपस्थिति नहि छैक। मुदा पार्टीक एजेण्डा जकॉं सभ काज भए जाइत छैक। गाममे एन.जी.ओ. नहि छैक, मुदा एन.जी.ओ.क उपस्थिति अभड़ैत छैक।
मार्क्स, गॉंधी, लोहिया, विनोवा इत्यादिक आहट सुनाइत छैक।
एहेन परिवर्तन होएव तत्काल संभव नहि छैक। शिक्षा प्रचारसँ आ समाजसेवी सभक सेवा आ श्रमसँ एना भए जाए तँ आश्चर्यक बात नहि।
रमाकान्त जखन मद्राससँ घुरैत छथि, तखनसँ अन्त धरि उपन्यास शिथिल भए जाइत अछि। तकर वाद सभ घटनाक अन्दाज पाठककेँ भए जाइत छैक। उपन्यासमे अन्त-अन्त धरि मोड़ अएवाक चाही, घटना सभमे आकस्मिता होएवाक चाही, से नहि छैक।
पोथीक भाषा खाँटी लोकक भाषा थिक, किताबी भाषा नहि थिक। सेहो एकटा विशिष्ट आ महत्वपूर्ण बनबैत छैक। साहित्यमे एहेन घर-ऑंगनक पात्र नहि आएल छल, से सभ प्रवेश कएलक अछि।
भारतमे गरीबी विशाल अछि। एकर नियति बदलतैक, मंद गतिसँ बदलतैक। एकर उनटा एहिमे अछि।
पोथी पढ़ि गेलहुँ। से एकर सफलताक सूचक थिक।
डयोढ़
१० ०६ २०१०
3
धीरेन्द्र कुमार
(हिंदी विभाग, सी.एम. बी. कॉलेज, डेवढ़, मधुबनी)
निर्मली, सुपौल।
जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास- “मौलाइल गाछक फूल” पर
मैथिली साहित्यमे यथेष्ट सामग्री लऽ प्रवेश केनिहार उपन्यासकार/कथाकारमे यशस्वी एक लेखक छथि। २००२मे प्रवेश केनिहार मंडल जीक सामग्री सभकेँ आश्चर्यचकित कऽ दैत छथि। एहन लगैत अछि जे जीवनक चिंतक, समाजक चिंतन आ आस-पासक होइत घटनाक्रमपर सृजन-दृष्टि हिनकर पहिनेसँ कार्यरत रहनि आ शब्द-बद्ध करैत रहलाह आ अनुकूल समए भेटैत अंकुरित भेलाह आ शीघ्रे एकटा गाछक पैघ स्वरूप धऽ लेलनि।
प्रस्तुत कृति ग्राम्य-परिवेशक ससक्त अभिव्यक्तिमे सफल अछि। ग्राम्य-जीवनक चित्रणक कमी नै अछि मुदा हिनकर चित्रण आर सभसँ अलग अछि। गामक छोट-छिन मुद्दाकेँ पकड़ैमे यथास्थान प्रस्तुतिकरण, चित्रणक सघनतामे मंडल जी सिद्धस्त छथि।
मंडलजी हिन्दी साहित्यसँ एम.ए. केने छथि। हिनका हिंदी साहित्यक कतेको उपन्यास-कथा पढ़बाक अवसर भेटल हेतनि। हिनक “मौलाइल गाछक फूल” उपन्यास पढ़लापर स्पष्ट प्रतीत होइत अछि जे प्रेमचन्दसँ बेसी प्रभावित छथि। गाम-घरमे रहिकए अनुखन समाजक कल्याणक भावना हिनकामे छनि। जाहि कारणें रमाकांत उदारवादी पात्रक रूपमे प्रतिष्ठित छथि। व्यक्तिगत रूपसँ परिपूर्ण छथि। केओ एकटा परिवारक पात्र एहन नहि अछि जे आदर्शवादी रमाकांतक व्यवहारक विरोध केने होथि। गाम-घरसँ पढ़ि-लिखि शहरमे नीक पदपर स्थापित भऽ बेटा-कनियॉं गामक संस्कारसँ परिपूर्ण अछि। आजुक व्यस्तता, पाइक महत्ता आ छद्म-मुखौटाधारी एकोटा पात्र रमाकांतक परिवारमे नै भेटत।
उपन्यासकारक विचार-दृष्टि समाजमे मूल्य स्थापित करब अछि तेँ ओइ दृष्टिसँ उपन्यासकेँ देखक चाही। जे अछि जे होइत अछि ताहि माध्यमसँ अबैत भविष्यकेँ सचेत नहि कऽ मानवीय-दृष्टिसँ आदर्श समाजक स्थापनापर हिनकर विस्वास छन्हि।
भाषा हिनकर विकासशील अछि। विशेष वर्गमे स्थापित भाषासँ अलग व्यवहारक शब्द आ भाषा हिनक उपन्यासमे छनि ताहि कारणे पाठककेँ अपन समाजक बोध होइत छनि।
मंडल जीक उपन्यास और “सेवासदन”क आदर्श एक्के अछि। अपन जीवनकालमे मंडल जी मार्क्सवादसँ प्रभावित छथि। एकर स्पस्ट दर्शन अपनेकेँ जमीन वितरण प्रणालीमे अवस्से देखबामे आओत। किछु लेखक जमीन छिनए लेल ठाढ़ समाजक चित्रण केनिहार भेटताह मुदा, मंडल जीक पात्र रमाकांत अपन मोने प्रसन्न्ा मोने वितरण करैत अछि।
श्रृति प्रकाशनसँ प्रकाशित पोथि सुन्दर आ छपाइक आकर्षक आवरणसँ युक्त अछि।
पोथिक नाम- मौलाइल गाछक फूल
उपन्यासकार- जगदीश प्रसाद मंडल
प्रकाशन- श्रृति प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य- २५० टाका
१९. ०६. २०१०
4.
राजदेव मंडल
कुरूक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल पत्र-
प्रिय बन्धु,
अहॉंक दीर्धकाय ग्रंथ “कुरूक्षेत्रम् अन्तर्मनक” पढ़बाक सुयोग प्राप्त भेल। कतेको साहित्यिक कृति (उपन्यास, कविता, कथा-गल्प संग्रह, नाटक, महाकाव्य, बाल नाटक, बाल कथा, बाल कविता, प्रबन्ध-निबन्ध समालोचना आदि)केँ एकहिं पुस्तकमे संग्रहित कए अहॉं पाठकक लेल एकटा तेहेन पुष्पमाला बना देलिएक जाहिमे लगैत अछि जे विभिन्न रंगक पुष्प एकहिं जगह गॉंथल हो। आ पाठक वृन्द साहित्यक कोनहु स्वाद एहि दीर्घ पोथीसँ प्राप्त कए सकैत छथि। निश्चय अपनेक ई प्रयास साहित्यक लेल नवीन अछि संगहि कर्मठताक साक्ष्य....।
हम कोनहु पैघ समीक्षक नहि छी तेँ समीक्षा करबाक दायित्वपूर्ण कार्यक लेल अक्षम छी। तथापि अहॉंक पुस्तक पढ़लाक उपरान्त मनमे जे विचारक उद्भव होएत ताहिसँ अवगत करा देब एकटा दायित्व सन बुझैत छी। तेँ किछु अपन विचार पठा रहल छी।
बन्धु, प्रथमत: ई कहबामे हमरा कनियो संकोच नहि होएत अछि जे मैथिली साहित्यक लेल जे अपने साहित्य आन्दोलनक कार्य कऽ रहल छी से साहित्यक लेल तँ एतिहासिक अछिए। संगहि मैथिली प्रेमी, मिथिलावासी सेहो अहॉंक एहि सुकार्यकेँ कहियो नहि भूलत-बिसरत।
बालकथा-
अहॉं मिथिलांचलमे पसरल छोट-पैघ कथा सभकेँ नवीन रूपेँ संग्रहित कएने छी। अहाँक एहि प्रयाससँ विलुप्त होइत कथा सभ पुन: जीवन्त भऽ उठल अछि। बगियाक गाछ बचपनावस्थामे दादीक मुँहसँ सुनने रही। आइ पुन: पढ़बाक अवसर भेटल।
राजा सलहेस, महुआ घटवारिन, नैका-बनिजारा, जट-जटिन इत्यादि कथ्ाा सभ पढ़लासँ लगैत अछि जे एतिहासिक बहुत गूढ़, तथ्यपूर्ण बात सभ सोझा अाएल अछि। क्षिप्रताक साथ अग्रसर होइतो सब बातक संकेत धरि आबि गेल अछि आ ओहि प्राचीण समएक दशा आ दिशाक ज्ञान सहजहिं परिलक्षित भऽ रहल अछि। सामाजिक जिनगीक क्रिया-कलापक वर्णन करैत अहॉं जे चित्र उपस्थित कएने छी। ताहिमे ओहि काल विशेषक प्रेम-घृणा, संयोग-वियोग, उन्नति-अवनति, बैर-प्रीत, शांित-अशांति, वीरता-कायरता, मुर्खता-विद्वता सबटा भिन्न-भिन्न रूपेँ प्रगट भेल अछि। पढ़ैत काल लगैत अछि जे हम दोसर संसारमे प्रवेश कएने छी। ओहि समएकेँ जँ एखुनका समएसँ तुलना करैत छी तँ बुझि पड़ैत अछि जे विकास कते तीब्र गतिसँ भऽ रहल अछि। आ एहि पुरान भेल जिनगीक कथापर कलम चलौनाइ कोनो साधारण गप्प नहि अछि। विषए-वस्तु सभपर जे अहॉं संतुलन बनौने छी से समए आ परिस्थितिक अनुकूल अछि।
संकर्षण-नाटक- अपाला आत्रेयी-दानवीर दधीची
अपाला आत्रेयी आर दानवीर दधीची-एहि दुनू बाल नाटकमे आहॉं कथा किछु नव रूपे प्रकट कएने छी। से पात्रकेँ अनुरूपे अछि। कथोप-कथनमे प्रवाह अछि आर छोट-छोट वाक्यक प्रयोग अछि। जे नाटकीयतामे प्रभाव उत्पन्न करैत अछि। जेना दानवीर दधीचिक एकटा कथोपकथन : “दधीची- इन्द्र। कुरूक्षेत्र लग एकटा जलाशय अछि जकर नाम अछि, शर्यणा। अहॉं ओतय जाउ। ओतय घोड़ाक मुड़ी राखल अछि.....। ओहिसँ नाना प्रकारक शस्त्र बनाउ।”
बाल नाटक- बालकेँ ज्ञान बृद्धिक लेल सेहो उपयोगी अछि।
संकर्षण-
नाटक एकटा नवीन चरित्रसँ परिचित करबैत अछि। जे गामक लोककेँ ठकनाइकेँ नीक बुझैत अछि। एिह अवगुणकेँ प्रतिभा बुझैत रहैत अछि। अवगुणक प्रतिफलपर कनेको विचार नहि करैत अछि। वएह बेकती जखन दिल्ली सन महानगर जाइत अछि तँ रास्तामे स्वगं ठका जाइत अछि। लालकिलामे जूता किनबा काल ओकरा पता चलि जाइत अछि जे ओ ठक विद्यामे कतेक पाछू अछि, उदाहरण रूपेँ एकटा कथोपकथन : “गोनर- अहॉंकेँ ठकि लेलक। अहॉंक नाम तँ बुझनुक लोकमे अबैत अछि। संकर्षण- मित्र की कहू?......। एहि लालकिलाक चोर बजारक लोक सभ तँ कतेको महोमहापाध्यायक बुद्धिकेँ गरदामे मिला देतन्हि।”
छोट छीन कथोपकथन द्वारा व्यंग्य, हंसी आ गम्भीर बातकेँ सहज ढंगसँ कहि देब अहॉं लेखनीक विशेषता थीक। नाटककेँ आकार लघु अछि जे नवीनताक सूचक अछि। तथा मिथिलामे पसरल बहुत रास बातकेँ समटबाक प्रयास निश्चय सराहनीय अछि। मंचित करबाक लेल दिशा निर्देश नीक ढँगे कएल गेल अछि।
नाटक पठनीयता संगे नाटकीयतासँ परिपूर्ण अछि। आर संकर्षण आकर्षणसँ भरल अछि।।
शेषांश आगू देल जाएत-
१.डॉ. शेफालिका वर्मा- एकटा लघुकथा २.कथा-नन्द विलाश राय-ऐना
१
डॉ. शेफालिका वर्मा
एकटा लघुकथा
शैतान वृध्ह भ गेल छल , अपन उत्तराधिकारी लेल सर्व्गुन्सम्पन्न शैतान खोजी रहल छल बेकल भय ; सभा बजाओल गेल. शैतान सभ से पुछलक 'के के कोन कोन काज आय धरि केने छी ?
दरबार में से केओ बजाक..हुजुर हम एतेक गोटे के खून केने छी जाकर हिसाब नहि ऐछ, केओ हम एतेक बच्चाक खून, केओ हम एतेक स्त्रीक संग बलात्कार केने छी , हम जते जते डकैती करय गेलों ,ओहिठाम केकरो जीवित नै छोढ़लों, हम गाम क गाम उजारी देने छी , हम कतेक अपहरण केने छी से कही नै सकैत छी.; जतेक मुंह ओतेक बात . मुदा , शैतानक माथ लाज से झुकि गेल , बाजल ===छिः छिः ,अहाँ सबहक काज देखि हमरा लाज भ रहल कोनो जोकरक अहाँ सब नहि छी. --परेसान जका चारू क़ात दरबार में ताकलक....... आर केओ छैक ?
एकटा प्रौढ़ , सभ्य ,शालीन व्यक्ति उठि के ठाढ़ भेल ,माथ झुकोने विनम्रता से बाजल -----
हमरा ते लहास गिनवाक फुर्सत नहि भेटल , मुदा ,हम जेकर जेकर खून केलों ओ अंत अंत धरि हमरा अपन दोस्त बूझैत रहल..
शैतान ख़ुशी से गद गद भ गेल ..ई थीक हमर राज्यक असली वारिस .......
२.
कथा
नन्द विलाश राय
ऐना
हम अपन सारक बेटाक विआहमे गेल छलौंहेँ। हमर सारक बेटा रेलवेमे इंजीनियर अछि। ओ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालसँ इंजीनियरिंगक डिग्री लेने अछि। हमर सारक बेटाक नाम ललन थीक। ओ देखवा-सुनवामे वड्ड सुन्नर अछि। गोर वर्ण, पॉंच हाथक जवान। दोहरा कद-काठी। जेहने ओ सुन्नर अछि तेहने ओ पढ़ैओ-लिखैओमे तेज छल।
ललनक विआह पॉंच लाख टाकामे बैरमा गामक वुच्चन ठाकुरक बेटीसँ तँइ भेल छल। बुच्चन ठाकुर मध्य विद्यालकमे शिक्षक छथिन्ह। अपना बेटीकेँ इन्टर पास करौएने छथिन्ह। हमर सार महेशकेँ लड़की पसन्द भेल आ ओ ललनक विआह बुच्चन ठाकुरक बेटीसँ पक्का कए लेलक। बुच्चन ठाकुरक चारि लाख टका तँ हमर सार महेशकेँ दए देलक मुदा एक लाख टका वॉंकी रहि गेल। बुच्चन ठाकुर कहलखिन- “जेतेक टाका वॉंकी अछि विआहक दू दिन पहिने भेट जाएत” मुदा, विआह दिन जखन टका नहि पहुँचल तँ हमर सार हमरासँ कहलनि- “पाहुन टका तँ बुच्चन बावू अखन तक नहि भेजलक हेँ। कि कएल जाए?”
हम कहलअनि- “आइ वियाह थीक। आव की कएल जाए सकैत अछि। विआह तँ हेवे करत। भऽ सकैत अछि जे बुच्चन बावूकेँ कोनो मजवूरी भऽ गेल होएतनि। चलू शुभ-शुभ कऽ विआह करेवाक लेल।”
हमसब दुल्हा आ वरातीकेँ लऽ सात वजे सॉंझमे बैरमा गाम पहुँच गेलौं। वरातीकेँ सवेरे पहुँचलापर बैरमा गामक समाज आ बुच्चन बावूक सर-कुटुम सभ बड्ड प्रसन्न्ा भेलाह।
बुच्चन बावू हमर सार महेशकेँ कातमे लऽ गेलाह संगमे हमहूँ छलहुँ। कहलखिन- “हम समएपर टका नहि भेज सकलहुँ ताहि लेल अपने सभ लग लज्जित छी। मुदा वादा करैत छी, कनियॉं विदागरीसँ पहिने अहॉंक टका दऽ देव।”
हमर सार किछु नहि बजलाह। हम कहलयनि- “ठीक छैक अहॉं अपना वादापर कायम रहव आ विदागरीसँ पहिने टका महेश बावूकेँ दए देवनि।”
बुच्चन बावू बजलाह- “अवश्य-अवश्य।”
अवश्य-अवश्य बजैत ओ आंगन चलि गेलाह आ हमसब वासा पर आवि बैसलौं। जलखै-नाश्ता, चाह-पान आदि सभ चलए लगल। संगहि तिलकक ओरिओन हुअए लगलैक।
बरातीक स्वागत बड्ड नीक जकॉं भेल। खान-पानमे कोनो कमी नहि भेल। शुभ-शुभ कऽ विआहो सम्पन्न भेल। मुदा बुच्चन बावू अपन वादाक मुताविक कनियॉं विदागरीसँ पहिने वकियौताबला एक लाख नहि दऽ सकलाह। हमर सार महेशकेँ बड्ड दुख भऽ गेलैक। ओ बाजल तँ किछु नहि मुदा अवैतखान समधी मिलन नहि केलक। हमरा ई गप्प नहि पसीन भेल। हम समझेवाक प्रयास केलौं मुदा, ओ हमरा गप्प नहि मानि फटफटियापर बैसि कऽ चल गेलाह। हम कनियॉंकेँ विदागरी करा कऽ अपन सासुर मैलाम पहुँचलौं। हमरा अपना सारपर बड्ड तामस छल। हम हुनाका दरबज्जापर जाइते अपन संतुलन नहि राखि सकलौ आ महेशकेँ देखिते कहलियै- “......”
क्रमश: