विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिलीक प्रमुख उपभाषाक क्षेत्र आ ओकर प्रमुख विशेषता

शम्भु कुमार सिंह · 2010-09-15 · अंक 66

मैथिलीक प्रमुख उपभाषाक क्षेत्र आ ओकर प्रमुख विशेषता
मैथिली भारोपीय भाषा परिवारक, भारतीय आर्यभाषासँ उत्पन्न एक महत्वपूर्ण आर्यभाषा थिक। एहि भाषाक उद्भव ओ विकासक जेहन प्राचीन साहित्यिक मान्यता उपलब्ध अछि ओहन भारतक कोनो आधुनिक आर्य आ द्रविड़ भाषाक नहि अछि।
कोनो सशक्त भाषाक अन्तर्गत ओकर अनेक बोली अथवा उपभाषाक निर्माण कालक्रमसँ क्षेत्रानुसार अवश्य होइत रहैत अछि। तकर कारण अनेक अछि। प्रत्येक भाषा अपन चारूकातक भाषा सँ प्रभावित होइत अछि। एहि क्रममे इहो कहल जाइत अछि जे प्रत्येक कोस पर बोली बदलैत अछि आ प्रत्येक जाति वा समाजक भाषा भिन्न होइत अछि। डॉ. सुभद्र झा एवं ग्रियर्सन सन विद्वान लोकनि ई पहिनहि स्पष्ट क’ देने छथि जे मैथिली एक स्वतंत्र का सशक्त भाषा थिक। एहि भाषाक चारूकात चारि गोट भाषा अछि। एकर पूबमे बंगला भाषा, पश्चिममे भोजपुरी, उत्तरमे नेपाली आ दक्षिणमे मगही भाषा अछि। इहो स्वतः सिद्ध अछि जे कोनो भाषा अपन निकटवर्ती भाषा सभसँ प्रभावित होइत रहैत अछि।
उपर्युक्त कारणसँ मैथिली भाषामे अनेक बोली अथवा उपभाषाक जन्म भ’ गेल अछि।
सर्वप्रथम मैथिली भाषाक विभिन्न उपभाषाक परिचय डॉ. ग्रियर्सन अपन “Linguistic Survey of India” क दोसर भागमे प्रस्तुत कएने छथि। हिनका अनुसारेँ मैथिलीक छः गोट उपभाषा अछि:- (1) मानक मैथिली (2) दक्षिणी मानक मैथिली (3) छिका-छिकी बोली (4) पूर्वी मैथिली (5) पश्चिमी मैथिली (6) जोलहा बोली।
ग्रियर्सनक उपर्युक्त उपभाषा वा बोलीक वर्णनसँ पं. गोविन्द झा सहमत नहि छथि। हिनक कहब छनि जे मैथिलीक विभिन्न बोलीकेँ क्षेत्रानुसार पाँच उपभाषामे बाँटल जा सकैछ: (1) पूर्वी मैथिली (2) दक्षिणी मैथिली (3) पश्चिमी मैथिली (4) उत्तरी मैथिली (5) केन्द्रीय मैथिली वा उपभाषा।
उपर्युक्त विवेचना सँ लगैत अछि जे गोविन्द झा सेहो ग्रियर्सनक मतानुसार मैथिलीक उपभाषाक वर्णन केने छथि। ओना ओ कतहु-कतहु विभिन्न उपभाषाक क्षेत्र आदिमे कनेक अन्तर क’ देने छथि, अस्तु मैथिलीक वर्तमान रूपकेँ देखल जाय तँ ज्ञात होइत अछि जे ग्रियर्सनक समयमे जे मैथिलीक विभिन्न उपभाषाक क्षेत्र आ रूप छल ओहिमे परिवर्तन भ’ गेल अछि। एकर अतिरिक्त नेपालक तराईमे जे मैथिली बाजल जाइत अछि ओकरो एकटा फराक रूप छैक। एहना स्थितिमे मैथिलीक उपभाषाक वा बोलीक आठ गोट भेद कएल जा सकैत अछि:
1. मानक मैथिली:-- एकर क्षेत्र केन्द्रीय ओ उत्तरीय पुरना दरभंगा जिला (मधुबनी, दरभंगा आ समस्तीपुर) थिक। ओना तँ डॉ. ग्रियर्सनक अनुसारेँ मानक मैथिली दरभंगा आ भागलपुर जिलाक उत्तरी क्षेत्रक आ पुर्णियाँ जिलाक पश्चिमी क्षेत्रक ब्राह्मण लोकनि बजैत छथि। हिनका लोकनिक अपन साहित्य आ परंपरा छन्हि जे एहि भाषाक विकृत प्रवाहकेँ मन्द कएने अछि। वर्तमान मे ई स्पष्ट भ’ गेल अछि जे मानक मैथिली ब्राह्मणे टाक बोली नहि छन्हि, किएक तँ मैथिली भाषाक पठन-पाठनक प्रवृति ब्राह्मण सँ आनो जातिक मध्य पूर्ण रूपसँ जागल अछि। एहि हेतु मानक मैथिली मिथिलाक सभ जातिक बोली कहल जा सकैत अछि।
2. दक्षिणी मैथिली:-- डॉ. ग्रियर्सनत दक्षिणी मानक मैथिलीकेँ दक्षिणी मैथिलीमे राखल जा सकैत अछि। एकर क्षेत्र मुंगेर, मधेपुरा, सहरसा ओ समस्तीपुर धरि मानल जा सकैत अछि।
मानक मैथिली आ दक्षिणी मैथिलीमे निम्न अन्तर अछि—(I) मानक मैथिली मे जतए धातु स्वर ह्रस्व रहैत अछि ओतए दक्षिणी मैथिलीमे दीर्घ भ’ जाइत अछि। जेना-मानक मैथिलीमे, ‘जनै छी’ होइत अछि आ दक्षिणी मैथिलीमे, ‘जानै छी’।
(II) सर्वनामक रूपमे मानक मैथिलीमे हमर, तोहर, अहाँ, अपने, आदि प्रयुक्त होइत अछि। दक्षिणी मैथिलीमे मोर, तोर, तोहे सर्वनामक प्रयोग होइत अछि।
(III) क्रियापदमे सेहो भिन्नता देखल जाइत अछि, उदाहरणस्वरूप मानक मैथिली ‘अछि’ दक्षिणी मैथिलीमे ‘अछ’ भ’ जाइत अछि।
3. पूर्वी मैथिली:-- ग्रियर्सन एकरा गँवारी मैथिलीक संज्ञा देने छथि। एकर क्षेत्र पूर्णियाँ जिलाक केन्द्रीय आ पश्चिमी भाग, संथाल परगनाक पूर्वी भाग, साहेबगंज आ देवघर धरि अछि। ग्रियर्सन कहैत छथि जे, ई भाषा अशिक्षित वर्ग द्वारा बाजल जाइत अछि।
पूर्वी मैथिली, दक्षिणी मैथिली आ दक्षिणी मानक मैथिलीसँ साम्य रखैत अछि। ओना कनेक अन्तर सेहो देखना जाइत अछि—(I) दक्षिणी मैथिलीमे सम्बन्ध कारकमे ‘के’ प्रयोग होइत अछि, मुदा पूर्वी मैथिलीमे ‘केर’ चिह्नक प्रयोग होइत अछि। (II) दक्षिणी मैथिलीमे ‘छिक’ क्रियाक प्रयोग होइत अछि, मुदा पूर्वी मैथिलीमे ओकर बदलामे ‘छिकई’ क्रियाक प्रयोग होहत अछि।
4. छिका-छिकी बोली:-- ई गंगाक दक्षिणी मुंगेरक पुबारी भागमे, दक्षिणी भागलपुर ओ संथालपरगनाक उत्तरी ओ पश्चिमी भागमे बाजल जाइत अछि। ई दक्षिणी मानक मधेपुराक बोलीसँ अत्यधिक साम्य रखैत अछि। एहिमे शब्दक अन्तमे ‘की’ वा ‘हो’ क उच्चारण कएल जाइत अछि, जेना— अपनो, खएबहो, कहबहो, सुनलहो आदि।
5. पश्चिमी मैथिली:-- एकर क्षेत्र मुजफ्फरपुर ओ चम्पारण जिलाक पुबरिया भाग थिक जाहिपर भोजपुरीक व्यापक प्रभाव अछि। ग्रियर्सनक अनुसारेँ एहि क्षेत्रक कतिपय लोक जे बजैत छथि तकरा भोजपुरी कहल जाय अथवा मैथिली ई कहब कने कठिन। ओना मुजफ्फरपुरसँ अलग भेल वैशाली जिलाक क्षेत्रक भाषाक नाम ‘बज्जिका’ भाषा देल गेल अछि। एहि भाषाक नामकरण लिच्छवी वंशक इतिहासक आधार पर कएल गेल अछि।
6. उत्तरी बोली:-- एकर क्षेत्र नेपालक तराई आ वर्तमान सीतामढ़ी जिलाक उत्तरी भाग धरि मानल जा सकैत अछि। एहि भाषा पर नेपली भाषाक प्रभाव बुझना जाइत अछि।
7. जोलहा बोली:-- पुरना दरभंगा जिलाक मुसलमानक बोलीकेँ डॉ. ग्रियर्सन जोलहा बोली मानैत छथि। ओना हिनक कहब छनि जे मिथिलाक मुसलमान मैथिली नहि बजैत छथि। मुजफ्फरपुर आ चम्पारण जिलाक मुसलमान जे बोली बजैत छथि ओहि पर अवधि भाषाक प्रभाव अछि। एकर अतिरिक्त वर्तमान कालक मुसलमानक बोली पर उर्दू आ हिन्दीक प्रभाव सेहो परिलक्षित होइत अछि।
8. केन्द्रीय मैथिली:-- मध्य मिथिलाक (दरभंगा, मधुबनी, पंचकोशी) सम्पूर्ण क्षेत्रक भाषा जकर निकट कोनो आन भाषा नहि अछि, तकरा केन्द्रीय मैथिलीक नामसँ जानल जाइत अछि। केन्द्रीय मैथिली साहित्यक भाषाक अत्यन्त नजदीक कहल जा सकैत अछि। मानक मैथिली आ केन्द्रीय मैथिलीमे बहुत सामीप्य देखल जाइत अछि।
वर्तमानमे मैथिलीक दू टा उपभाषाक नवीन नामकरण भेटैत अछि—अंगिका ओ बज्जिका। छिका-छिकी, अर्थात् पूर्वी बोलीकेँ अंगिका कहल जाइत अछि जकर केन्द्र स्थल थिक भागलपुर। प्रायः भागलपुर महाभारत कालीन अंग राज्यक राजधानी छल तैँ एहि क्षेत्रक भाषाकेँ अंगिका कहल जाइत अछि। बज्जिकाक सम्बन्धमे विवेचना कएल जा चुकल अछि।
एतावता ज्ञात होइत अछि जे मैथिली भाषाक क्षेत्रानुसार अनेक उपभाषा अछि। एखनहुँ धरि एकर पूर्णरूपेण सर्वेक्षण नहि कएल गेल अछि नहि तँ किछु आओर उपभाषाक सम्बन्धमे ज्ञात होइत, तैँ एहि बिन्दु पर भाषावैज्ञानिक दृष्टिएँ सर्वेक्षण होएब अत्यंत आवश्यक अछि।
१.साकेतानन्द-कथा-आछे दिन पाछे गए २.प्रो. वीणा ठाकुर-कथा- परि‍णीता

साकेतानन्द
(1) लेखकीय नाम : साकेतानन्द. (2)पत्रकारिताक नाम : बृहस्पति. (2) असली नाम : साकेतानन्द सिंह (एस.एन.सिंह).(3) पिता : स्व. श्री विजयानन्द सिंह. माता: स्व.श्रीमती राधारमा जी. (4) जन्म : 27 फरवरी 1940 क’ कुमार गंगानन्द सिंहक तत्कालीन आवास “सचिव_सदन” 5, गिरीन्द्र मोहन रोड, दरभंगा. (प्रमाण पत्रमे_26 जनवरी 41 ). (5) शिक्षा: क्रमशः राज स्कूल दरभंगा/ बुनियादी स्कूल श्रीनगर, पूर्णियाँ/ विलियम्स मल्टीलेटरल स्कूल,सुपौल/ पश्चात पटना एवं मगध विश्वविद्यालय स’ अंग्रेजी औनर्स आ मैथिलीमे स्नात्कोत्तर । (6) व्यवसाय: आजीवन आकाशवाणीक चाकरी । आठ राज्यक नौ केन्द्रमे विभिन्न पद पर काज । लटे_पटे 40 वर्षक कार्यकाल । पटना, दरभंगा एवं भागलपुरमे बीसो साल तक मैथिली कार्यक्रमक आयोजन, प्रस्तुतिकरणमे लागल । ओतबे दिन क्रमशः आकाशवाणी पटनाक ग्रामीण कार्यक्रम ‘चौपाल’ आ
दरभंगाक ‘गामघर’ कार्यक्रमके मुख्य स्वर”जीवछभाइ’क रूपमे ख्यात। आकाशवाणी दरभंगाक संस्थापक_स्टाफ । (7) साहित्यिक गतिविधि: मैथिली कथा साहित्यमे 1962 स’ सक्रिय । गोडेक चालिस_पचास टा कथा, रिपोर्ताज. संस्मरण, यात्रा_विवरण मैथिलीमे प्रकाशित अधिकांश पत्र_पत्रिकामे छपल । पहिल मैथिली कथा “ग्लेसियर” 1962मे ‘मिथिलामिहिर’मे प्रकाशित । हिन्दियोमे दू दर्जन कथा आदि प्रकाशित । सन 99मे छपल पहिल कथा_संग्रह “गणनायक’ के ओही वर्ष ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार। पैघ बान्ध’ स’ अबैबला विपत्तिके रेखांकित करैत, पर्यावरण के कथा वस्तु बना क’ राजकमल प्रकाशन स’ प्रकाशित एवं अत्यंत चर्चित उपन्यास (‘डौकूमेंट्री फिक्शन’) “सर्वस्वांत” प्रकाशित। आकाशवाणीक विभिन्न केन्द्र लए लिखल आ प्रस्तुत कैल नाटक, डौकुमेंट्री संख्या बहुत रास। आकाशवाणीक राष्ट्रीय कार्यक्रममे प्रसारित दू टा उल्लेखनीय वृत्त रूपक_ ‘महानन्दा अभयारण्य’ पर आधारित “जंगल बोलता है” एवं झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रक ज्वलंत डाइनक
समस्या पर आधारित वृत्तरूपक “ नैना जोगन “ चर्चित एवं प्रसिद्ध । मैथिली नाटकक कैकटा ‘लैंडमार्क’ यथा डा.रामदेव झा विरचित दू टा नाटक ‘विद्यापति’ आ ‘हरिशचन्द्र’ ; डा. मणिपद्मक ‘चुहड मल्लक मोछ’ । सल्हेस, दीनाभद्री, विदापत आदि लोक गाथा, लोक_नृत्य सब के लोक_गायकक मध्य जा क’, मूल वस्तुक ध्वन्यंकन एवं ओकर संपादन आ प्रसारण “गणनायक” कथासंग्रह के राजस्थानी अनुवाद, राजस्थानी साहित्यक जानल_चीन्हल नाम श्री शंकरसिंह राज पुरोहित एवं हिन्दी अनुवाद, मैथिलीक ख्यातनामा अनुवादिका श्रीमती प्रतिमा पांडॆ केलनि अछि; आ दुनू के साहित्य अकादमिये प्रकाशित केलक । (8) संप्रति: सन 2001मे आकाशवाणी हज़ारीबाग स’ केन्द्र_निदेशक के पद स’ अवकाश प्राप्त केलाक बाद पूर्ण रूपेण मिटः रूपेण मैथिली लेखन, मिथिला क्षेत्रक समस्या सब पर वृत्त__चित्र बनेबाक, मैथिलीक किछु नीक कथा सब
के फिल्म रूपांतरणक गुनान__धुनानमे लागल ।
आछे दिन पाछे गए
आइ दिने खराब छनि, भोर नंइ जानि ककर मुंह देखने रहथि मोन नंइ
छनि। जे क्यो रहल हुए, अभगला के नीक नंइ हेतै । डेरा स’ निकलले छला कि बगलबला छौंडा तेना
छिकने रहनि जे लगलै जेना नाके देने अंतडीं-भोंतडी निकलि जेतै । बडा अबंड सब छैक चारू भर...
वैह मिड्ल-क्लास मानसिकता बला लोक। अनेरे एक दोसरा के जिनगी मे ताक-झांक करैत रहत ।
मिश्रा जीक छोटका बेटा सुनाइये क’ नंइ कहि देलकनि जे “ ई हमरा सीधे क्लास-वन नंइ बुझाइ छथि, क्लास-वन कत्तौ अहिना रहै छै...हौ खाली हिंदी अखबार पढैत देखलहक है कोनो एस.पी. कलक्टर के ?” हिनका हिंदिये स’ काज चलि जाइत रहनि। भरि दिन त’ टीभी देखिते छथि, सब त’ वैह खबरि
रहै छैक, तखन गाम-घरक खबरि जेहन ई अखबार मे रहै छै….फेर अपन एकटा गौंआँ छनि अहि अखबारमे।
आइ अठारहम दिन छियनि....रिटायर भ’ गेला अछि से दिन भरि मे कैक बेर की कही पग-पग पर
मोन पडै छनि...एखन ओ बस कि टैक्सी- स्टैंड दिस लपकलो जाइ छथि आ सोचियो रहल छथि जे
कथी स’ जाथि ? जं’ टेम्पो रिजर्व करता त’ एकटा नम्बरी त’ खाइये जेतनि...एह!औफिस के तीन टा
गाडी रहै। जं’ कोनो खराब भेल त’ शहर मे टैक्सी छलै । सामने स’ एकटा औटो सर्र स’ निकलि
गेलनि। ई जाबे हाथक इशारा कि जोर स’ चिकडि क’ ओकरा रोकितथिन---ओ गोली जेकां निकलि गेल
रहै। ताबे सिटी बस बगल स’ पास केलकनि । नंइ जानि कोन रौ मे ओ लपकल रहथि आ पौ-दान
पर पैर रोपिते जेना बस चलल छल, जे आइ नंइ मरितथि त’ घायल जरूरे होइतथि । हुनका एना
लपकि क’ चढति देखि बस मे पहिने स’ ठाढ दू टा छौंडा हिनका दिस कनडेरिये देखैत किछु बाजल...
की बाजल हैत ? चलैत बस मे ठाढे—ठाढ मचकी झूलैत ओ यैह सोचि रहला अछि जे आगां मे
हिनके जेकाँ मचकी झूलैत दुनू कौलेजिया की गप्प केने हैत.. कहीं हुनका एना उचकि क’ चलती बस चढैत देखि ओकरा अपन क्षेत्र मे अतिक्रमण बुझायल होइ....जे से !आइ हुनका येन-केन-प्रकारेण अपन चेक--अप करेबाक छनि,बाइ-पास भेल छनि । तैं अइमे त’ कोनो आसकतिक बाते नंइ छैक; डा.मेहरोत्रा नामी हर्ट-स्पेशलिस्ट छथि...ई बुझिते जे हम पूनाक डिफेंस कारखानाक नामी हेड माने एम.डी छी...जकरा युनिट के अनेक बेर कमांडर-इन-चीफ माने माननीय राष्ट्रपति महोदय सम्मानित क’ चुकल छथिन; ओ अति प्रसन्न भेला। ओ सेल्फ-डिफेंस लेल हथियार खरीद’ चाहैत रहथि । तैं ओइ ठाम पंहुचैक देरी छै...डा.मेहरोत्रा स’ की एप्वायंटमेंट लेता....पांच मिनटक त’ काज ! बाबू , भले हिनका सनक लोक सब सीमा पर नंइ लडैत अछि, मुदा कि हिनका लोकनि सन लोक ज राति-दिन नंइ खटै, नंइ पसेना बहबे, त’ की सीमा पर फौज लडत...?
किन्नहु ने। कारगिल युध्धक समय....कैक महीना तक कहां क्यो औफ लेलक...अहर्निश कारखाना
चलैत रहलइ। समय-समय के बात...” बाबा ! कने आगाँ बढियौ । हमरा सब लए जगह छोडबैक कि
नंइ ?” ओ धडफडा गेला । धडफडा क’ ओ दुनू छौंडा स’ कने बेसिये दूर चल गेल छला । यैह, अही
सब ठाँ अपन सवारीक कमी खलै छै...की ओ सत्ते एहन भ’ गेला अछि जे ई दुनू छौंडा हुनका स’
काकु करनि ? माने एहन बूढ...नंइ-नंइ एखन त’ रिटायरे केलनि अछि….एखनो टी-शर्ट धारण करै
छथिन त’ की कहै छैक...बाइसेप्स—ट्राइसेप्स बांहि मे उछलि जाइ छनि । अपन समयक नीक टेनिसक
खेलाडी, एक समय मे हिनका संगे एक्को सेट खेलाइ लए क्लबक सब(पढल जाय सुंदरी सब)लालाइत
रहैत छल। से धरि ठीके ; जे केलखिन ताहि मे हरदम औव्वलि...हरदम अलग...सब स’ नीक ।
से आइ ओ एना कियैक सोचि रहला अछि ? ओ ‘रिटायर्ड’ भेला अछि ‘टायर्ड’ नंइ ?आइ‌काल्हि साठि
कोनो वयस भेलै ? मुदा एकटा बात ! ओ सेवा समाप्त भेला स’ पहिनंहे ई रिटायरमेंटक समय कोना कटता तकर सब बेवस्था क’ लेने रहथि । एत्ते तक जे बुढारी मे बेटा सबहक आगाँ हाथ ने पसार’ पडनि तकर नीक इन्त्जाम ओ बहुत पहिनहें क’ लेने रहथि...इहो सोचने रहथि जे ओ कोनो बेटाक आश्रम मे ताबे तक नंइ रहता,जाबे शरीर की समय सकपंज नंइ क’ दनि । ताबे कथी लए ककरो पर भार बनथिन.........
“औ बुढा ! कत’ जैब ? आब त’ अंतिम स्टौप आब’ बला छै ?”
मोन त’ पितेलनि। मोन भेलनि जे ठांइ-पठांइ किछु कहि दियनि तेहन, जे फेर अनटोटल बजबे बिसरि
जाथि ई तेजस्वी नवयुवक ! मुदा बात बढेबा स’ की फैदा ? एखन काल्हि तक एहन-एहन मथदुक्खा
सब स’ बांचल रहै छला...गाडी रहै छलनि । नंइ जानि कियैक, नौकरी जाइ स’ बेसी आहि-- हुनका सर
-कारी गाडीक सुविधा खतम भ’ जेबाक अबै छलनि ।
डा. मेहरोत्रा हिनका चिन्हैत रहथिन, मुदा सब त’ नंइ चिन्हैत रहनि। बस स’ उतरि क’ अस्पताल पंहु-
-चैत-पंहुचैत पसीना स’ भीज गेल रहथि। पैर पटकि क’ गर्दा झाडिते छला---‘एत्त’ एना जुत्ता झाडै छी,से कने बाहरे बढि क’ झाडितंहु से नंइ ?” बजै बला कंपाउंडर सनक लगलनि । सपरतीव केहन !हिनका शिक्षा द’ रहल छनि ।
“डा. साहेब कखन एथिन ?” ओ बात के नंइ सुनैत बजला ।
“समय भ’ गेलनि अछि, अबिते हेता । से कियैक देखेबै ?”
“हं, हमरा पेसमेकर लागल अछि....”
“से त’ बड बेस, मुदा नंबर लगेने छी ने ?”
“डा. साहेब अपेक्षित छथि....तैं !
“तखन त’ नंइ देखायल भेल आइ “
“से कियैक ?”
“केहनो अपेक्षित क्यो कियैक ने होथि---डाक्टर साहेब बिनु नंबरे नंइ देखै छथिन ।“
ताबे डा.साहेब के गाडी पोर्टिको मे आबि क’ लागल। ई लपकि क’ आगाँ
बढला जे कहीं बाटहि मे काज बनि जानि । मुदा डाक्टर एको बेर नजरिओ उठा क’ हिनका दिस तकबो ने केलखिन त’ हिनका बड आश्चर्य लगलनि। मर, ओना घुठ्ठी-सोहार छलनि, क्लिनिक मे अबिते की भ’ गेलनि, एक बेर ताकियो लितथिन ने त’ कने सांत्वना भेटितनि । मुदा डाक्टर त’ घाड
निहुरेने तेना गेलखिन जेना कि कहियो देखनंहु ने होथिन। बेस, हारि क’ ओ बडा याचनाक स्वर मे कंपाउंडर के कहलथिन जे ओ सेनाक कारखाना मे एम.डी.क पद पर स’ हाले रिटायर भेला अछि...बिच्चे मे ओ कंपाउंडरबा बात के लोकति कहकनि‌‌--“ अपने एम.डी. रहियै ने, आब नंइ ने छियै....अइ पुर्जा पर अपन नाम आ पता लिख दियौ बाबू साहेब ! चौथा दिन फोन करि क पूछि लेबै...लंबर आबि जायत।“
….ताबे बाहर कोनो गाडी के रुकब आ चपरासी आ सिक्योरिटी के दौडति देख बुझबा मे भांगठ नंइ
रहलनि जे बाहर कोनो भी.आइ.पी.क गाडी लगलै ।
भी.आइ.पी. के रहथि से ई की जान’ गेलथिं। ई त’ साढे चौबीसे वर्षक वयस मे पूना मे जे नौकरी धेलनि से आब यैह रिटायर भेलाक बाद घुरला अछि । अइ ठामक सब वस्तु तैं ने अनचिन्हार लगै छनि ।फेर भी.आइ,पी. आ हुनका संगे अनेकानेक चमचाज़ एन्ड लगुआ‌‌-भगुआ के सड-सडायल डाक्टरक चेम्बर मे ढुकति देखलखिन-- मोन खट्टा भ’ गेलनि । बगल मे ठाढ लोक स’ पुछलखिन त’ पता लगलनि जे ई अइ ठामक मेयर सैहेब छथि; आइ.ए.एस. ! हिनका पुर्जा कटेबाक कि लाइन मे लगबाक कोनो जरूरति नंइ ? कियैक त’ ई आइ.ए.एस. अहि ठामक मेयर साहेब छथि ।कियै; अपने जखन एम.डी. रहथि त’ अपने ई सुख नंइ भोगने रहथि की ? अपने प्रश्न पर सहमि गेला ओ ! चारू कात हियासलखिन....सबतरि निश्चिंतता पसरल छलै । ने हर्ष आ ने विस्मय । पेशेंट सब पैर मोडि क’ कुर्सी पर बैसल, गपियाति किछु गोटे हफियाति आ किछू झुकति । अजीब लगलनि हुनका। जेना समय रुकि गेल हुए । जेना एत्तुक्का सब गोटे मिलि क’ समय के ठुठुआ देखा रहल हुए । अपन-अपन दहिना हाथ सामने तनने, औँठा के बामा-दहिना घुमबति । डक्टरक चेम्बर स’ गल्ल—गुल्ल आ ठहाका । एत्ते लोक इम्हर मांछी मारैत अछि त’ मारौ । आगंतुक मेयर छियै, भ’ सकैत छै डाक्टरक दोस्त हुए । एतबा त’ सब दोस्त एक दोसरा लए करै छै।
“की गुन-धुन मे लागल छी यौ बाबा ?” कंपाउंडर हिनका दिस आंखि गुडारि क’ देखलक---“ किछु
करब ‘डाक सैहेब, बिनु नंबरे किन्न्हु नंइ देखता ।“
हुनका मोन मे एलनि कि आइ स’ किछुए दिन पहिने अइ तरहक लोक के अइ तरहे बजबाक साधंस
होइतै ?से छोडूने ! डक्टरबेक ई हिम्मति होइते जे एना भावे ताच्छिल करैत...जेना हम त कहियो किछु रहबे ने करी...हमरा स’ त’ ओकरा कहियो भेंटो नंइ....आदि इत्यादि बात सोचैत ओ तय केलनि
जे आब फेर कहियो एकरा क्लिनिक पर पैर ने देता । हुनका लगलनि जे डाक्टर मेह्रोत्रा स’ देखेबाक हुए त’ दुखित पडै स’ तीन मास पूर्वहिं नंबर लगा लिय’, नंइ त’ जाबे डाक्टरक नंबर आओत ओइ स’ पहिने भगवानक घरक नंबर आबि जेतै कारनीक । ई सब सोचैत, आजुक दिन आ आजुक जमाना के मोन भरि गरियबैत आ श्राप दैत ओ फैसला केलनि जे मौगी छैक त’ की हेतै ? अपन अस्पतालक डा.यास्मीन नीक डाक्टर छथि। हुनके स’ अपन रूटिन चेकप करेता । ओना ओ स्वस्थ छथि, मुदा शरीर त’ अबल भैये गेलनि। जखने देहके काट—खोंट भेल, कि फेर पहिने बला बात नंहि ने रहि जाइ छै ?से त’ पचपने मे सीवियर नंहि त’ माइल्ड धरि हर्ट एटैक रहबे करनि; तीन घंटा पर होश आयल रहनि। फेर मोन पडलनि आइ-काल्हुक रंग—ताल । आब कोनो डाक्टरक पुर्जा ल’ क’ कत्तौ दबाइ नंइ खरीदल जा सकैत अछि। जै मोहल्लाक डाक्टर ओही मुहल्लाक दबाइक दोकान मे हुनकर लिखल दबाइ भेटत । तैं सोचलनि जे दबाइ खरिदिये क’ जाथि । मुदा ओत्तुक्का भीड....बापरे! कत्ते लोक दुखीत पडैत छैक ? काल्हि तक ई फार्मेशियोक मुंह ने देखने रहथिन । आब लाइन मे लाग’ पडतनि। अइमे त’ सांझ भ’ जेतनि ? से जे भ’ जाउन ! आइ आब रत्तन सिंघ की रामगुलाम लाल “बाडाबाबू” नंइ छथिन-- जे सब काज ‘साम दाम दंड भेद” ,माने जे कोनो ने कोनो प्रकारे कैये या करवाइये लैत रहथि...आब ओ स्वंय छथि, सब मोर्चा पर पुनश्च असकर, नितांत एकसर ।
मुदा ई काज हुनका कर’ पडतनि । संभवतः तीस-चालिस वर्षक बाद फेर स’ हुनका लाइन मे लाग’ पड
--तनि ? अत्यंत कटु सत्य यैह छियै---“ एना कछ-मछ कियै क’ रहल छी बुढा...कलमच रहब से
नंइ ?”क्यो हिनका नसीहत देलकनि। पांच बाजि गेलै जखन हिनकर हाथ मे मास दिनुका दबाइ एलनि।रौद एखनंहु मुंह पर थापड जेकाँ लागि रहल रहै। घर मुंहा जैं भेला कि सामने स’ खाली औटो जाइत देखखिन । हाथ देलखिन, बैसला आ पांचो डेग ने औटो गेल हेत जे दू टा बलिष्ट कसरतिया जवान हिनका रौद दिस ठेलैत बैस’ लगलनि त’ ई ‘हां-हां’ कर’ लगला।मुदा हिनकर ;हाँ-हाँ’ के ओ दुनू पर कोनो प्रभाव नंइ पड्लै ।ओइ मे स’ जकरा गरा मे ताबीज रहै से हिनका कने आर रौद मे ठेलति बिहुंसलनि आ कहलकनि---“बहुत दिन छाहरिक सुख भोगलें बबा ! आबे हमरा सिनी जुआन-जहान के नम्मर छै ।“ आ दुनू ठठा क’ हंसि देलकनि।
२.
प्रो. वीणा ठाकुर 1954-
कथा
परि‍णीता
आइ डोमेस्‍टि‍क एयर पोर्ट दि‍ल्‍लीमे श्‍यामाक भेँट नीलसँ भेल छलन्‍हि‍। श्‍यामा थोड़ेक काल धरि‍ हतप्रभ रहि‍ गेल छलीह। नील-नील कहि‍ मोनक कोनो कोनमे हहाकारक लहरि‍ उठि‍ गेल छल। एतेक वर्ष बीत गेल। नील एखनहुँ ओहने छथि‍, कोनो परि‍वर्त्तन नहि‍ भेल छन्‍हि‍। आकर्षक नील, हँसमुख नील, पुर्ण पुरूष नील, उच्‍च पदस्‍थ नील, नील-नील। श्‍यामा कहि‍यो नीलकेँ बि‍सरि‍ नहि‍ सकल छलीह। सभटा प्रयासश्‍यामाक वि‍फल भऽ गेल छल। नील सदि‍खन छाया सदृश्‍य श्‍यामाक संग लागले रहलथि‍। नील कतेक दूर भऽ गेल छथि‍, श्‍यामा आब चाहि‍यो कऽ नीलकेँ स्‍पर्श नहि‍ कऽ सकैत छथि‍, ओहि‍ना जेना छाया संग रहि‍तहुँ स्‍पर्श नहि‍ कएल जा सकैत अछि‍, मनुष्‍यक संग छायाक अस्‍ति‍त्‍व तँ सदि‍खन रहैत छैक, मुदा ओकर आकार तँ सदि‍खन नहि‍ रहैत छैक। श्‍यामाक जि‍नगी नील, श्‍यामाक सोच नील, श्‍यामाक सभ ि‍कछु नील। श्‍यामाक तन्‍द्रा भंग भऽ गेल छल, नीलक चि‍र परि‍चि‍त हँसि‍ सुनि‍, नील आश्‍चर्यचकि‍त होइत प्रसन्न भऽ कहने छलाह- “श्‍यामा, माइ डि‍यर फ्रेंड हमरा वि‍श्‍वास होइत अछि‍, अहाँ फेर भेँट हएत। श्‍यामा अहाँ एखनहुँ ओहि‍ना सुन्‍दर छी, यु आर टु मच ब्‍युटि‍फुल यार, आइ कैन नॉट वि‍लि‍भ।‍”
और पुन: ठहाका मारि‍ हँसने छलाह। नील संगक युवतीसँ श्‍यामाक परि‍चए करबैत कहने छलाह- “श्‍यामा, मीट माइ वाइफ नीलि‍मा, ओना हमर नीलू- नीलू माइ वेस्‍ट फ्रेंड श्‍यामा।”
नीलू बहुत शालीनतासँ श्‍यामाक अभि‍वादन करैत कहने छलीह- “गुड मॉनि‍ंग मैम।‍” और नील हँसेत बाजि‍ गेल छलाह- “देखू हम आइयो अहाँक पसन्‍दक ब्‍लू पैंट शर्ट पहि‍रने छी।‍” कि‍छु आॅपचारि‍क गप्‍प भेल छल। एयरपोर्टपर एनाउन्‍समेंट भऽ रहल छल, संभवत: नीलक फ्लाइटक समए भऽ गेल छल। श्‍यामा पाछासँ नील और श्‍यामाक जोड़ी नि‍हारैत रहि‍ गेल छलीह। कतेक सुन्‍दर जोड़ी अछि‍- राधा-कृष्‍ण सदृश्‍य। नीलि‍मा कतेक सुन्‍दर छथि‍, एकदमसँ नील जोगड़क। लगैत अछि‍ जेना ब्रह्मा फुर्सतमे नीलि‍माकेँ गढ़ने होएथि‍न्‍ह। सुन्‍दर, सुडॉल शरीर, श्‍वेत वर्ण, सुन्‍दर लम्‍बाइ, उमंग और उत्‍साहसँ पूर्ण नीलि‍मा। नीलि‍माक प्रत्‍येक हाव-भाव सुसंस्‍कृत होएवाक परि‍चायक अछि‍। श्‍यामा अपलक देखैत रहि‍ गेल छलीह। तावत धरि‍ जावत दुनू श्‍यामाक आँखि‍सँ ओझल नहि‍ भऽ गेल छलथि‍।
घर अएलाक पश्‍चात् बि‍नु कि‍छु सोचने आएना लग आबि‍ अपनाकेँ देखय लागल छलीह। केशक एकटा लटमे कि‍छु श्‍वेत केश देखि‍ श्‍यामाकेँ आश्‍चर्य भेल छलन्‍हि‍ जे एखन धरि‍ हुनक नजरि‍ एहि‍पर नहि‍ पड़ल छल। फेर जेना श्‍यामाकेँ संकोच भेल छलन्‍हि‍ जे अबैत देरी आखि‍र अएनामे की देख रहल छथि‍। भरि‍सक नीलक प्रशंसा एखनहुँ श्‍यामाकेँ ओहि‍ना आह्लादि‍त कऽ गेल छल। ई तँ कि‍छु वर्ष पहि‍ने होइत छल। आब तँ प्राय: श्‍यामा नीलकेँ, नीलक संग बि‍तायल क्षणकेँ बि‍सरवाक प्रयास कऽ रहल छथि‍। आखि‍र नील एखन धरि‍ श्‍यामाक मस्‍ति‍ष्‍कपर ओहि‍ना आच्‍छादि‍त छथि‍। समएक अन्‍तराल कि‍छु मि‍टा नहि‍ सकल। मि‍टा देलक तँ श्‍यामाक जि‍नगी, श्‍यामाक खुशी। श्‍यामाक जि‍नगी भग्‍न खण्‍डहर बनि‍ कऽ रहि‍ गेल, जाहि‍मे नील आइ हुलकी दऽ गेल छलाह। की नील एखन धरि‍ श्‍यामाकेँ बि‍सरने नहि‍ छथि‍? श्‍यामाक पसन्‍द एखनहुँ मोन छन्‍हि‍? श्‍यामाक महत्‍व एखनहुँ बॉंचल अछि‍? नहि‍ तँ नील एना नहि‍ बजि‍तथि‍।
चारू-कात देखलनि‍, ओछाओनसँ लऽ कऽ टेबुल धरि‍ कि‍ताब छि‍ड़ि‍याएल छल। मोन थोड़ेक खौंझा गेल छलन्‍हि‍, एहन अस्‍त-व्‍यस्‍त घरक हालत देखि‍। तथापि‍ कि‍ताब एक कात कऽ श्‍यामा अशोथकि‍त भऽ ओछाओनपर पड़ि‍ रहल छलीह। मोन एकदम थाकि‍ गेल छल, मुदा दि‍माग सोचनाइ नहि‍ छोड़ि‍ रहल छल। श्‍यामा अपन आदत अनुसार डायरी लि‍खैले बैसि‍ गेल छलीह।
आजुक पन्ना-नीलक नाम-
नील, आजुक पन्ना अहाँक नाम अछि‍। हमरा बुझल अछि‍, आब नहि‍ तँ हमर डायरी कहि‍यो जबरदस्‍ती पढ़ब, नहि‍ हमरा पढ़ब। नील पाँच वर्ष अहाँक संग बि‍ताएल अवधि‍ हमर जीवनक संचि‍त पूँजी थि‍क, एहि‍ पूँजीकेँ बड़ नुका कऽ मोनक कोनमे राखने छलहुँ। कतहु एहि‍ अमूल्‍य नि‍धि‍केँ बॉटवाक इच्‍छा नहि‍ छल, कागजक पन्नोपर नहि‍। मुदा आइ एतेक पैघ अन्‍तरालक पश्‍चात, अहाँकेँ देखि‍ मोन अपना वशमे नहि‍ रहल। मोन की हमरा वशमे अछि‍। अहाँक संग रहि‍ हम तँ दि‍न-दुनि‍याँ बि‍सरि‍ गेल छलहुँ, कहि‍यो कि‍छु कहबाक इच्‍छा होएबो कएल तँ अहाँ सुनए लेल तैयार नहि‍ भेलहुँ। अहाँ सतत् कहैत रहलहुँ- “हमरा अहाँक मध्‍य नहि‍ कहि‍यो तेसर मनुष आएत और नहि‍ कोनो व्‍यर्थक गप्‍प, बस मात्र हम और अहाँ, और कि‍छु नहि‍।‍” हम मन्‍त्र मुग्‍ध भऽ अहाँक गप्‍प सुनैत सभ कि‍छु बि‍सरि‍ गेल छलहुँ। मुदा आइ सभ कि‍छु बदलि‍ गेल। आइ जँ सभ कि‍छु लि‍ख अहाँकेँ समर्पित नहि‍ कऽ देब तँ मोन और बेचैन भऽ जाएत। अहाँ हमरासँ दूर भऽ गेल छी, तथापि‍ आइ सभ कि‍छु, जे नहि‍ कहि‍ सकल छलहुँ, हम डायरीमे लि‍ख रहल छी। जखन हम अपनाकेँ अहाँकेँ समर्पित कऽ देलहुँ, तखन कि‍छु बचा कऽ राखब उचि‍त नहि‍।
हमर पि‍ता उच्‍च वि‍द्यालयमे शि‍क्षक छलाह, नाम छलन्‍हि‍ पं. दि‍वाकर झा। हम दु बहि‍न एक भाए छी, हम सभसँ पैघ, बहि‍न श्‍वेता और भाए वि‍कास। हमर वर्ण कि‍छु कम छल, ताहि‍ कारणे बाबूजी आवेशमे हमर नाम रखलन्‍हि‍ श्‍यामा। बाबूजी हरदम कहैत छलाह- “ई हमर बेटी नहि‍ बेटा छथि‍, हमर जीवनक गौरव छथि‍ श्‍यामा।” छोट बहि‍नक नाम श्‍वेता अछि‍, श्‍वेता गौर वर्णक छथि‍, तेँ माए श्‍वेता नाम राखने छलथि‍न्‍ह। मैट्रि‍कमे हमरा फर्स्‍ट डि‍वि‍जन भेल तँ बाबूजी कतेक प्रसन्न भेल छलाह। महावीर जीकेँ लड्डु चढ़ौने छलाह। सौंसे महल्‍ला अपनहि‍सँ प्रसादक लड्डु‍ बॉंटने छलाह। हमरा जि‍द्दसँ कॉलेजमे हमर नाम लि‍खओल गेल छल। माए तँ वि‍रोध कएने छलीह। जखन हम बी.ए. पास कऽ गेलहुँ, तँ हमर वि‍याहक चि‍न्‍ता बाबू जीकेँ होमए लागल छलन्‍हि‍। एकठाम वि‍याह ठीक भेल तँ बड़क माए-बहि‍न हमरा देखय लेल आएल छलथि‍, मुदा श्‍वेताकेँ पसि‍न्न करैत अपन नि‍र्णए सुना देने छलथि‍न्‍ह जे अपन बेटाक वि‍आह श्‍वेतासँ करब। बाबूजी कतेक दुवि‍धामे पड़ि‍ गेल छलाह। पैघ बहि‍नसँ पहि‍ने छोटक वि‍आह कोना संभव अछि‍। मुदा माए बाबूजीकेँ बुझाबैत कहने छलथि‍न्‍ह-“जे काज भऽ जाइत छैक से भऽ जाइत छैक। वि‍आह तँ लि‍खलाहा होइत छैक।” नील शास्‍त्रक कथन अछि‍-माए बापक असि‍रवाद फलि‍त होइत छैक। जँ असि‍रवाद‍ फलि‍त होइत छैक तँ माए बापक नि‍र्णए सन्‍तानक भाग्‍यक नि‍र्धारण सेहो करैत हेतैक। भरि‍सक माएक नि‍र्णए हमर भवि‍ष्‍य भऽ गेल। श्‍वेताक वि‍आह ओहि‍ वरसँ भऽ गेलनि‍।
क्रमश:
१.अनमोल झा-कथा- अबकी बेर फतंग २.नन्‍द वि‍लास राय-कथा- बाबाधाम
अनमोल झा 1970- गाम नरुआर, जिला मधुबनी। एक दर्जनसँ बेशी कथा, लगभग सए लघुकथा, तीन दर्जनसँ बेशी कविता, किछु गीत, बाल गीत आ रिपोर्ताज आदि विभिन्न पत्रिका, स्मारिका आ विभिन्न संग्रह यथा- “कथा-दिशा”-महाविशेषांक, “श्वेतपत्र”, आ “एक्कैसम शताब्दीक घोषणापत्र” (दुनू संग्रह कथागोष्ठीमे पठित कथाक संग्रह), “प्रभात”-अंक २ (विराटनगरसँ प्रकाशित कथा विशेषांक) आदिमे संग्रहित।
अबकी बेर फतंग
बात से नञि छलइ, बात छलइ जे कहियो गाम-घर छोड़ि बाहर नञि रहलइ, दू मास आ दस पाँच दिन। सभ दिन तँ सभहक बीचेमे रहिक पढ़ाइयो-लिखाइ गामेपर केलक, हाइ स्कूलमे गेल तँ झंझारपुर सेहो कतेक दूर साइकिल उठाउ तँ पन्द्रह मिनट आ पायरे जाऊँ बीच धके तँ पाउन घंटा नञि ओ छहरपर सँ नीचा खसि जाऊँ तँ ओहि बाधे-बाधे आधा घंटा आ राखू ओहूसँ कम समयमे चलि जाऊँ स्कूल आ कालेज आ चली आबू फेर गामपर।
ओना अनिल सभ दिन गामेपर रहि पढ़लक से बात नञि छलै, ओकरा ओहिना मोन छलै जखन ओ आइ कॉम फस्ट इयरमे ललित नारायण जनता कॉलेज झंझारपुरमे रहए तँ पढ़ुआ कक्काक संगे कक्के टी.सी. लऽ कए गेल रहए आर.के.कॉलेज मधुबनीमे नाम लिखाबय आ नाम लिखा दुनू बेटा आ पिति घूमल रहए मधुबनीक लॉज सभमे एकटा डेरा लेल, डेरा ओहि दिन तँ झट दऽ नञि भेट गेल रहै, तथापि गामेपर आबी जोगार पाती बैसि गेल रहए, एकर गामक छोटका बौआसँ गामपर गप्प-सप्प भेलै आ ओ कहने रहै जे हमरा डेरामे एकटा सीट खाली छैक बिचार हो तँ रही सकैत छी, सत्तरि रूपया भाड़ा छैक महिना, सेफरेट रूम कए पैइतीस कके लागत, हँ एकटा चौकी लेमए पड़त, भानस-भात कए जेना जे बिचार हो अलग-अलग भानस करब तँ सभ बर्त्तन बासन सभ लेमए पड़त नै एके ठाम करी तँ मोटा-मोटी सभ समान अछिये, आ जे नै अछि से लऽ लेब तइयो चलत आ नै लेब तइयो चलत। अनिलकेँ लगलै जे कियो एकरा लेल पहिलेसँ व्यवस्था केने हो तहिना सन बुझेलै ओकरा। ओ झट दऽ कहलकै हँ हमरा विचार अछि, चलू मधुबनी आ एके ठाम रहब आ एके ठाम भानसो-भात करब, जे जेना खर्चा वर्चा होएत आधा-आधा सएह ने? आ गेल अनिल मधुबनी ओहि लाजमे जाके पहिले अपन पोथी-पतरा सथलक छोटका बौआ, अपने आ लहटन तिनु गोटा जा चौकी कीन आनल, ताही दिनमे बीरासी आ तिरासी टाकामे चौकी देने छलै, चौकी कोनो साउख, सीसमके जै छलै, आमेक पाइस पउआ आ आमेक तखता, उलूके-फलूक एकजनिये टाइप। आ रहए लागल मोन लगाक ओतए।
मोन लगाक तँ रहए लागल अनिल मुदा मोन लागब एकरा कहबै की? जहियासँ मधुबनीमे रहनाइ शुरू केलक तहियासँ तीला सक्रांतिक सात दिन छलै, माने एक हप्ताह, मोनमे बिचारने रहए, गाम नै जाएत लोके की कहतै देखलक हौ पढ़ूआकेँ दस दिन नै भेलै आ हाजिर जबाब? आ अपनो नीक नै बुझेलै। ओना काल्हि हेतै तिलासंक्राति तँ संगी जे छोटका बौआ आ लहटन छलै पावनि करए गाम चल गेलै । एक दिन पहिने सेहो भोरे भोर, साँझ तक अनिलोक मोन कछमछा सन गेलै, मोन केनादनि रीब-रीब करए लागल रहै, असगर मे खुब कानय कऽ मोन होबए लगलै आ उठेलक एक आध टा पोथी आ एकटा झोड़ा आ साँझुका बसाँ गाम आबी गेल रहए पाबनि करए। माएक मोन जुड़ा गेल छै माए कहलकै-नीक केलै बौआ, चल एले, तोरा बिना हमारा सब कोना पाबनि करीतउ? अनिल किछु बाजल जै रहए कारण जखन मधुबनी जाए लागल रहए तऽ माए पाबनिमे आबए कहने रहै, मुदा अनिल कहने रहै माएक-माए मे एहनो एनाइ होइछै, मुदा आइ अपने अनिल आबी गेलासँ माएक छाती सूप सन भऽ गेलै। फेर पाबनि कऽ प्राते फेर मधुबनी आएल। पढ़ाइ लिखाइ कऽ क्रममे मधुबनी आ गाम अनिलक पायरे तरमे रहै। दुरे कतेक पच्चीस आ तीस किलोमीटर छलै गामसँ मधुबनी आ मधुबनीसँ गाम।
अनिलक बाबूक तीन भाइक भैयारी छलाह सब सँ पैघ पिति पढ़ूआ कक्का गामेक स्कूलमे मास्टर साहेब छलाह, दोसर भाइ बिचला अनिलक बाबूजी छलखिन्ह जे गामेपर रही खेती बारी करैत छलाह आ सबसँ छोटका पिति कलकत्तामे कोनो पारभीट फार्ममे कोनो नौकरी करैत छलाह। गामपर तीनू भाइक साँझी आश्रम खुब हेम-छेमसँ चलैत छलाह। सभ भैयारीमे आ सभ दियादनी सभमे सेहो ककरो कतउ दियाद बादमे झगड़ा होइ तँ अनिलक बाप पितिक उपमा देल जाइ छलै गामपर लोककेँ, भाबे तेहन नीक जकाँ सभकेँ थथमारिक घर आश्रम चलै छलैसे।
ओना पारिवारिक आर्थिक स्थिति नीक नै छलै, तथापि ओतेक खरापो नै कहक चाही, “लुटी आनए आ कुटी खाए वला बात छलै, तथापि ओहिमे बड़ दीब जकाँ दिन कटल जा रह;ल छलै। एखन तँ भगवानक दयासँ दू कर भोजन आ दू हाथ वस्त्र तँ भेटीते आ आ जखन अनिलक बाप-पिति बच्चा रहए तँ हुनका सभकेँ ओहुपर आफद भऽ जाइत छलनि। गप्पे-गप्पमे माए एक दिन कहने रहए अनिलकेँ बुझले बौआ की जखन तोहर बाप स्कूलसँ पढ़िकेँ आबथुन तँ तोहर भैया हमरा कहैथ बौआक खेनाइ दऽ अबियौ आ हमारा लाजे नै जाइये खेनाइ दबए, कारण खेसारीक रोटी आ मसुरीक उसना कतउ खेनाइ देल जाइ, हमरा लाज हुआ खेनाइ दैत तँ सैह परिस्थिति छलउ तोरा बाप-पितिक घरक। रातिक मसुरीक उसना खाके सभ सूति रहै छलउ, आइ भगवतीक दयासँ से बात तँ नै छउ। उसना आ फूटहा बाला बात।
ई सभ सूनि अनिलक माथा सुनाओ जकाँ लागए लगैक, मुदा से केने कोनो लाभ छलै की, चिंता केने मोन आर खराप सन लागए लगै आ अपने मोने-मोन मोन कऽ सांतत्वना दैह-जे बीत गेल से बात गेल”
खैर...................।
अनिल मैट्रीक, आइ. कॉम आ बी. कॉम. कऽ परीक्षा जाहा की समाप्त होइ, टिकट कटा फटाकसँ कलकत्ता पहुँच जाए छल छोटका पिति लग, कलकत्ता घुमए। कलकत्ता ओकरा बड नीक लगलै आ कलकत्ताक लोक सभ आ ताहीमे मौगी आ छौड़ी सभकेँ देखिक ओकर आँखि फाटए लगलै, एहन उदण्ड आ एहन उघार आ निघार, ओ मोने-मोन सोचए लागल एकरा सभकेँ जतेक उघार ततेक फैसन लगै छैक की? अनिल जता बेर आबए परीक्षा दके गामसँ कलकत्तामे सभ ठाम जाए छल जतए गेलो छल ततयो-माने चिड़ियाखाना, विक्टोरिया मेमोरीयल, तारामण्डल, जादुघर, बिड़ला मन्दिर, बिड़ला म्यूज्यम, नेहरू चिल्ड्रेन म्यूज्यम कालीघाट, दक्षिणेश्वर काली, बेलूड़ मठ आ आर कतए कतए नै घुमए जाइत छल अनिल। आ लेख गार्डन आ एम्हर ओम्हरका पार्क आ मैदान सभ तँ धागल छलै ओकरा जाही बेर आबए खुब घूमए आ भरि दिन डेरापर असगर पड़ल राजा बनल रहै छल। पिति आफिस चल जाइत छलै आ डेराक आर लोक सभक ड्यूटी। एतुका लोककेँ एतेक ड्यूटीक प्रति सतर्कता देखि अनिल के आश्चर्य लगैत छलै, चारी बजे भोरे पिति उठी, शोचादिसँ निवृत भऽ नहा सोना भानस भात कके। छः बजे फीट, आठ बजैत-बजैत बासन खाली, माजल-धोल आ चकमक करैत रहैत छलै आ सभ लक लके पड़ाइत छलै ड्यूटी आ फेर मुन्हारी साँझमे अबैत छलै सभ फेर खेनाइ-पिनाइ बना सुति रहै छलै आ प्रातः भेने फेर ओहा रामा ओहा खटोलबा वाला बात होइत छलै। से एकरा आश्चर्य लगैत छलै बुढ़ पितिक ई फूर्त्ती देखि। अनिल के मोने-मोन होइ काश एहिना आ एतहे जकाँ फूर्त्ति आ काजक प्रति एतेक सजगता गाममे लोककेँ रहितै तँ निश्चय कोनो गाम गाम नै रहिते, सभ गाम अपन नाम शहरमे गनब लगिता। जे-से..............।
अनिल तँ कोनो खुट्टा गाड़ी कऽ रहै लेल कलकत्ता नै जाइ छल, ओ तँ परीक्षा-तरीक्षा कोनो भऽ जाइ मधुबनीमे तँ दस दिन मास दिन घुमी आबए छल पिति लगसँ से बेचाराक मोनो खुब लगैत छलै कलकत्तामे। मुदा जखन गाम आबए कालमे पिति गाड़ीपर चढ़बए हावड़ा अबै छलखिन्ह तखन अनिलक बरदास्त सँ फाजिल भऽ जाइत छलै आ हिचकी-हिचकी कानए लगैत छल, धीया-पूता जकाँ। पिति बुझैत छलखिन्ह ई आए गाम जाइत अछि, एतए एकटा नीक लगैत छलै ताए कनैत अछि। मुदा पितिये की करितथिन्ह, छोट-छीन नोकरी, कलकत्ता देखू आ गामपर घर- आश्रम सेहो देखए पड़ैत छलैन आ नयहे देखए पड़ितैन तँ की सभ दिन अनिल अपन पढ़ाइये लिखाइ छोड़ीक एतए पड़ल रहितै सैह की नीक बात छीयै? आ बोल भरोस दके भातिजकेँ गाम बिदा करथि। ओना बेटा आ भातिजमे कोनो अंतर छैक? बेटे जकाँ मानितो छलैहे पिति आ देख-भाल सेहो करैत छलैन हे अनिलकेँ।
एम्हर गाम आ मधुबनी एलापर एक राति मोन नै लगैत छलैन हे बाउ केँ। होइन जे किछु हरा गेल हो कलकत्तामे, आ हरेतैन की लगैन अपने या मोने हरा गेल हो। एक मोन इहो होइ नाम-ताम कटा ओतहे चलि जाइ पढ़ाइ-लिखाइ करए, से फेर मोन अछताए-पछताए सेहो लगैत छलै, मधुबनीक पढ़ाइ आ कलकत्ताक पढ़ाइ, आ मधुबनीक खर्चा-बर्चा आ कलकत्ताक खर्चा-बर्चामे आकाश पातालक अंतर छलै। सेहो दम सकरब बाला बात छलैनहे, आ अपन बाप किछु छलै तँ गामपर गृहस्थे छलै ने, पितियेपर कते कुदता, पितिक फेर अपनो बाल बच्चा छैक ने, कोनो इयाहटा नै छथिन जे चल बाबा या कोनो बड़का हाकिम मुखतारो नै छनि पिति, फेर तँ छोटे छीन कम्पनीमे काज करैत छैक ने। जे से बात धीरे-धीरे सरा जाइत छलैहे आ फेर अपने आप मोन लागए लगैत छलै मधुबनी आ गाममे।
समय कऽ बितैत देरी होइ छै, ओ तँ हबाइ जहाजोसँ तेज गतिसँ चलैत छैक आ देखिते-देखिते कतएसँ कतए भागि जाइत छैक ई समय। मधुबनी कऽ पढ़ाइ समाप्त भेलै आ नौकरी-चाकरी लेल खूब प्रयास आ दौड़ बड़हा केलक अनिल, गाम घर, पटना, दरभंगा-मधुबनी आदि-आदि ठाम। एखुनका युगमे भगवानक भेटब आ नोकरी भेटब एके दर्जाक बात भेलै। औनाकऽ रहि गेला अनिल, कतौ गोटी नै बैसलनि। मोने-मोन अपने-आपपर खुँझाइत रहथि, एहि पढ़ाइक कोन काज? एहि मधुबनीक ओगरनाइक कोन काज? एहि पढ़ाइक पाछाँ पाइ बहाबैक कोन काज? जखन ईएह बेरोजगारीक जिनगी तखन एतेक तपस्ये कथीक? होइ अपन मूड़ी अपने पानिमे गोइत ली। आब आर किछु नै नीक लगैत छैक अनिलकेँ। मोन अनोन-बिसनोन सन लगैत छैक ओकरा, अपरतीब सन सेहो।
पित्ती छोटका कोनो काज उद्यममे गाम आएल छलखिन्ह, अनिल कोनो काज ताजक बारेमे गप्प केलक पित्तीसँ। पित्ती आबै काल कलकत्ता लेने एलखिन्ह। अपना सेठकेँ कहलखिन्ह- हमर भातिज छी आ भातिज की हमर बेटे बुझि कोनो काज एकरा दहक। पित्तीक पैरबी काज केलकै आ भऽ गेलै कोनो क्लर्केक पोस्टपर अनिलकेँ पित्तिये ऑफिसमे काज।
ट्रेनिंग भेलै आ तकरा बाद अप्वाइन्टमेन्ट आ कन्फरमेशन सेहो। आब लगभग चारि-पाँच बरखसँ काज करैत अछि कलकत्तामे अनिल। पित्ती भातिज एके नगरी आ एके डेरामे सेहो रहैत छथि। मोन नै लगबाक कोनो बाते नै। मुदा अनिलकेँ मोन नै लगैत छैक आब कलकत्तामे। बात कने भटमेराह सन सभकेँ जरूर लगैत छैक जे जाहि अनिलकेँ कलकत्ताक प्रति एतेक स्नेह आ उद्गार छलै जे हावड़ामे ट्रेन पकड़ै काल आ गाम जाइत काल कानय लगैत छल, छ मसिया चिल्का जकाँ तकरा आइ एतए नीक किएक नै लगैत छैक? ओकरा नोकरी छोड़ि देबाक इच्छा होइत छैक। मुदा पित्तीक मुँह आ गामक ओ नौकरी लेल बौऐनी आ छिछिऐनी मोन पड़ि जाइत छैक। पितीक मुँह एहि लऽ कऽ मोन पड़ैत छैक जे अनिलक सामनेमे दुनू हाथ जोड़ि थड़थर कपैत सेठसँ अनिलक लेल नोकरीक भीख मँगने छलै, से जँ आइ नोकरी छोड़ि देतै तँ पित्तीक कतेक मान रहतै। ओना आइ कतौ सरकारी काज आकि नीक पोस्टबला काज कतौ होइतै आ तखन जे छोड़िये देतै तँ पित्तीक अपमान नै छाती सूप सन होइतै आ कहैयो लेल होइतै ने सरकारी काम आकि उच्च पोस्टबला काम हुआ इसलिए छोड़ दिया, मुदा सेहो बात नै छलैहेँ।
अनिल करत की तँए काज करैत छल, मुदा ओकर मोन मिसिया भरि नै लगैत छलै। ओकरा गामक लोकसभ गामक चौक-चौराहा, कोठीयर कलम, पुबारी बाड़ी, बढ़मोतर आ खोइटक खेत, कुमरी पोखरो, उसराहा आ बौअन झा पोखरि सभ मोन पड़ि जाइत छलै। ओकरा गाम, झंझारपुर आ मधुबनी सभ सभटा आँखिक समक्ष नाचए लगैत छलै। ओकरा ई बान्हल जिनगी एकदम नै नीक लगैत छलै। ई आठ-दस घण्टा ड्यूटी आ एतेक व्यस्तता सोफाइत नै छलै। ओकरा मोन होइत छलै गाम-घरमे रहबाक, कत्ता गोटा कहै, अहाँकेँ नोस्टालजिया भऽ गेलहेँ, बिछुड़ल लोक, बिछुड़ल समए आ बितल बात सभ जे एतेक मोन पड़ैत अछि से किछु नै नोस्टेलजियाक बात छी।
ओकरा मोन पड़ैत छलैक गामक नांङट-उघार बच्चा सभ, गामक जुगेश्वर, बालेश्वर, फतुरिया, उत्तमा जे तीन सेर बोइन लेल सारा दिन ओही रौद आ पानिमे तितैत लोकक ओतए काज करैत छलै। ओकरा मोन पड़ैत छलैक गामक सभ वस्तुक दिक्कत, सड़लाहा राजनीति, लोकक कुचिष्टामे लोक लीन रहैत छैक। भरि पेट लोक भोजनो करतै तैयो हँसतै आ जँ भुखले रहतै तैयो हँसतै। मुदा एतेक बात बुझितो आ सुझितो आ गमितो अनिल अऑफिसमे रिजाइन दऽ दैत छैक आ चल अबैत अछि गाम। आ गाममे रहए लगैत छैक।
पित्तीक सभ प्रतिष्ठा आ बातकेँ अनिल पएरक ठोकरसँ घैला जकाँ गुड़का देलकै। घैला गुड़कि कऽ फूटि गेल छलै आ पानि सौँसे बहि गेल छलै। अनिलक पित्ती मोने मोन सोचैत छैक, कलकत्ताक ओही डेरामे आखिर एना किएक भेलै, जकरा कलकत्तामे एतेक नीक लगैत छलै तकरा एक बैगएना किएक मोन भऽ गेलै। आ अनायास मोनमे आ आँखिक सोझाँ अनिलक पित्तीकेँ अपन भैयारीक ओ बच्चाबला समए मोन पड़ैत छैक आ देखाइत छैक खेसारीक रोटी, मसुरीक सन्ना आ पेटकटारी लागल पेट आ अभावे अभाव सगरे...!
२.
नन्‍द वि‍लास राय-
नन्‍द वि‍लास राय-कथा
बाबाधाम
बोल-बम बोल-बम। बोलबम-बोलबम ई आवाज कमलीक कानमे पड़ल तँ ओ घास काटव छोड़ि‍ सड़क दि‍सि‍ तकलक। एकटा बसमे पीयर-लाल कपड़ा पहि‍रि‍ने लोक सभकेँ देखलक। बसक भीतर आ छतपर लोक सभ बैस कऽ बोलबम-बोलबमक नारा लगवैत छल। बस तेजीसँ सड़क पर दौड़ रहल छल।
कमलीक खेत सड़कक कातेमे छल। ओ खेतक आरि‍पर घास काटि‍ रहल छलि‍। कमली सोचए लगली- कतेक लोक बाबा धाम जाइत अछि‍ मुदा हमर तँ भागे खराप अछि‍। कतेक दि‍नसँ वि‍कलाक बापकेँ कहैत छी मुदा ओ अछि‍ जे धि‍याने ने दैत अछि‍।
कमली आ लखन दू परानी। एकटा बेटा ि‍वकला। वि‍कला सातमे पढ़ैत। लखनक माए-बापक सत्तर अस्‍सी बर्खक बूढ़। लखनकेँ पाँच बि‍घा खेत। एक जोड़ा बड़द आ एकटा महीसो। लखनकेँ कतौ जइक लेल सोचए पड़ए। कि‍एक तँ सत्तर बर्खक बूढ़ माए आ अस्‍सी बर्खक अथवल बापकेँ छोड़ि‍ कतए जाएत। तइ परसँ एक जोड़ा बरद आ महीसोकेँ देख-रेख। पाँच बि‍घा खेतमे लागल फसलक ओगरवाही। असगरे कमलीसँ कोना पार लागत। तैं कमलीक बाबाधामबला बातपर लखन धि‍यान नै दइत छल। लखन सोचए कमलीकेँ गामक लाेक संगे बाबा धाम भेज देव तँ भानस के करत? धास के आनत। असगरे हम की सभ करब। बेटा वि‍कला पढ़ते अछि‍। ओकरा स्‍कूलसँ छुट्टी होइत अछि‍ तँ ओ टीशन पढ़ै लए चलि‍ जाइत अछि‍। बि‍ना टीशन पढ़ने कोना परीक्षा पास करत। सरकारी स्‍कूलमे की आव पढ़ाइ होइत अछि‍। मास्‍टर सभ बैसि‍ कऽ गप लड़बैत रहैत अछि‍। चटि‍या सभ कोठरीमे बैसि‍ कऽ गप करैए अथवा लड़ाइ-झगड़ा। मास्‍टर सभक लेल धनि‍ सन। लखन अपन खेती गृहस्‍थीक संगे माए-बापकेँ सेवा नीकसँ करैत अछि‍। माए तँ थोड़े थेहगरो छथि‍न मुदा बापकेँ उठवो-बैसवोमे दि‍क्‍कते छनि‍। हुनका पैखाना-पैशाव लखनेकेँ कराबए पड़ैत अछि‍। पौरकाँसाल फगुनमे लखनक पि‍ताजीकेँ लकबा मारि‍ देलकनि‍। मश्रा पॉली क्‍लि‍नीक दरभंगामे इलाज करेलासँ जान तँ बचि‍ गेलनि‍ मुदा अथवल भऽ गेलाह। भगवान लखन जकाॅँ बेटा सभकेँ देथुन। ओ तन मन आ धनसँ माए-बापकेँ सेवा करैत अछि‍।
लखनक एकटा संगी अछि‍। नाम छी सुकन। सुकन लखनसँ वसी धनीक अछि‍। दूटा बेटा अछि‍ सुकनकेँ। दुनू बेटा सातवाँ तक पढ़ि‍ दि‍ल्लीमे नौकरी करैत अछि‍। मासे-मासे बेटा सबहक भेजलाहा ढौआ सुकनकेँ भेट जाइत अछि‍। सुकनोक माए-बाबू जीवते छथि‍न। सुकनक माए कम देखैत छथि‍न। हुनका राति‍केँ सुझवे नै करैत छनि‍। एक दि‍न सुकनक माए राति‍केँ ओसारपर सँ गि‍र गेलखि‍न हुनका पएरमे मोच पड़ि‍ गेलन्‍हि‍। लखनकेँ पता चलल ते ओ सुकनक माएक जि‍ज्ञासा करै लए गेल। सुकनक माए लखनकेँ अपने बेटा जाहि‍त मानैत छेलखि‍न।
लखन सुकनक माएसँ पुछलक- “‍माए कोना कऽ ओसारपर सँ गि‍र गेले।”
सुकनक माए बाजलि‍- “बौआ, आव हमरा सुझै नइ अछि‍। राति‍केँ तँ साफे नहि‍ देखैत छी। बेचू बाबूक छोटका कनटीरबा दरभंगामे डाकडरी पढ़ैत अछि‍ ओ फगुआमे गाम आएल छल हुनाक कहलि‍ऐ तँ ओ हमर दुनू आँखि‍ देखलक आ कहलक जे दुनू आँखि‍मे मोति‍यावि‍न भऽ गेलौहेँ। कहलक जे ऑपरेशन करेलासँ ठीक भऽ जाएत आ नीक जहाति‍ सुझए लगत।”
क्रमश:
१. श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा) २.नाटक- बेटीक अपमान-बेचन ठाकुर
१. श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा)
जन्म:९ अगस्त, १९४३, जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा: एम., पी-एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय),ए. एन. कालेज, पटनामे हिन्दीक प्राध्यापिका, अवकाशप्राप्त। नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित रचना: झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर, विप्रलब्धा कविता संग्रह, स्मृति रेखा संस्मरण संग्रह, एकटा आकाश कथा संग्रह, यायावरी यात्रावृत्तान्त, भावाञ्जलि काव्यप्रगीत, किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)। ठहरे हुए पल हिन्दीसंग्रह। २००४ई. मे यात्री-चेतना पुरस्कार।
शेफालिकाजी पत्राचारकेँ संजोगि कऽ "आखर-आखर प्रीत" बनेने छथि। विदेह गौरवान्वित अछि हुनकर एहि संकलनकेँ धारावाहिक रूपेँ प्रकाशित कऽ। - सम्पादक
आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा)
तेसर खेप
शेफालिका जी
आपकी आत्मकथा मैंने पढ़ी। जिंदगी बीत गई-जीने की तैयारी में। आँचल मे> दूध आँखों मे पानी और जिह्वा पर बतरस का शहद लिए मिथिलांचल की यह स्त्री किश्तों मे जीवन जीती है और जो कथा कहते चलती है, जीवन की- वह भी किश्तों में ही पूरी होती है।भूमण्डलीकरण कहिए भू$मण्डी$करण के बाद के इन धड़फड़िया दिनों का बीज-शब्द
है- किश्त! ऋणं कृत्वा धृतं पीवेत- चार्वाक का यह दर्शन घर घर मे चरितार्थ है। प्रेमचंद और यशपाल के समय की किश्तें शखमन्दगी और त्रासदी का उत्स थी। अब किश्तें फक्र का विषय है! लोग फक्र से कहते हैं-इतनी किश्तें गईं! .. किश्तों और पालियों में जिया जाने वाला मध्यवर्गीय स्त्री-जीवन इतना आसान नहीं होता! हँसी नए जमाने का घूँघट है- हर मुस्कान के पीछे लजाई बैठी इतनी ढेर-सी छोटी-बड़ी तकलीफ होती हैं कि उनका व्योरा लिखने मे धरती सब कागद कारौं/लेखनी सब बनराई की स्थिति घिर आती है! पूरी धरती को कागज बना लें समस्त वनों की लकड़ी से कलम गढ़ें तो भी हरि-गुन की तरह अगाध और अनंत स्त्राी जीवन अपनी पूरी माखमकता मे लिखा नहीं जा सकता।
शेफालिकाजी को अपने कर्मठ प्रज्ञावान सहयोगी और हिन्दू कॉलेज के दिनों के अपने प्रिय साथी राजीव की मिष्टी मुखी माँ के रूप मे तो वर्षों से पहचानती थी किन्तु एक लेखिका के रूप मे उनकी भास्वर पहचान कराई मशहूर अमरीकी भाषाविद् और अनुवादक आर्लीन ज़ाइद ने। पेंग्विन सीरीज ऑपफ इंडियन विमेन्स पोएट्री के दूसरे खण्ड के अनुवाद के सिलसिले मे वे भारत आई थीं। मेरे घर अचानक ही आईं उस समय मेरे भण्डार मे उन्हें खिलाने-लायक कुछ और था नहीं मध्यवर्गीय गृहस्थी मे सहज संकोच से मैंने उनके लिए ताल-मखाना भूना जो पिछले हफ्ते ही माँ ने मुजफ्फरपुर से भेजे थे। मखाने देखते ही उनके मन मे शेफालिकाजी की याद ताजा हो गई। उन्होंने कहा- दिस इज़ वॉट फिगर्स इन शेफालिकाज़ पोएम। फिर उन्होंने उस कविता का अंग्रेज़ी
अनुवाद सुनाया जो उन्हांने किया था और मेरे मन मे लड्डू और मखाने एक साथ ही लगे फूटने लगे कि इतनी बढ़िया कविता की इस रचयिता का नैतिक भूगोल मेरा अपना नैतिक भूगोल है मेरी प्रतिवेशिनी होगी यह मेरे घर मे पास ही कहीं इसका घर होगा!
वर्षों बाद जब बम्बई ने स्पैरो के तत्वावधान मे विभिन भाषाओं के स्त्राी-लेखकों को
बुम्बई बुलाया और काशिद के रिसोर्ट मे हम साथ ठहरे तब जाकर पता चला कि यह शेफालिकाजी तो और कोई नहीं अपने राजीव की माँ है। चकित रह गई!
और अभी जब किस्त-किस्त जीवन पढ़कर ख़त्म किया-तब से यही सोचती बैठी हूँ कि
यदि राजीव के पिता की तरह निश्छल धीरोदात्तता सब पुरुषों मे होती सब पुरुष इसी तरह के प्रेमी होते तब तो स्त्राीवाद का भट्ठा ही बैठ जाता! स्त्राी आंदोलन की ज़रूरत ही कहाँ होती। सबसे दुर्भाग्य का विषय है कि हमारे ज्यादातर पुरुष अतिवादी अधिनायक प्रजातांत्रिक सम्यक् दृष्टि का उनमे विकास ही नहीं हो पाया। छोटी-छोटी मार्मिक घटनाओं और चुटीले संवादों से स्मृतियों का जो प्रतिसंसार शेफालिकाजी ने इस सहज-सरस आत्मकथा मे गढ़ा है- उससे गाँवों-कस्बों की नई औरत का तादात्म्य गहरा बना
है। इसी तदात्म्य की ज़रूरत हमे है- बहनापे के विकास का सूत्रा यही है। रूसी क्रांति ने बराबरी स्वतंत्राता और भाईचारे की बात की थी। स्त्राी आंदोलन भाईचारे का विकास बहनापे में देखता है। स्त्राी- दृष्टि मोनालिसा नहीं। वर्ग-वर्ण-नस्ल-सम्प्रदाय-सापेक्ष कई समस्याएँ विशिष्ट है लेकिन कुछ समस्याएँ तो साझा हैं जिसके आधार पर विश्वभर की स्त्रियाँ बहने हैं और उनकी भाषा का छन्द ही अलग है। विषम परिस्थितियों मे भी अपनी राह बढ़े जाने की जो मलंग विनय स्त्राी-भाषा के साक्षी है उसका अद्भुत उदाहरण है-किस्त-किस्त जीवन!
डॉ अनामिका
अंग्रेज़ी विभाग
सत्यवती महा. (सांध्य)
दिल्ली विश्वविद्यालय
बहन के नाम भाई का स्नेह-पत्र-
बहन की एक प्रतीक्षा देख कादम्बिनी मे भाई का मन उल्लसित सा हुआ मन के कोने से एक गूंज सी उठी कोलाहल और कुछ शोर सा हुआ ।
व्ययित हृदय भोली सी बहन बनाने का
भाई का मन आकुल और तरस सा हुआ
इस अभाग्य का जीवन हो सफल तुझ जैसी बहन को पाकर मुझे सौभाग्य कहाँ हमजोली बहन का जो कुछ भी है बाँट लेंगे एक दूजे का प्यार सुख-दुःख तुझ जैसी बहन का पा
मोती तो खूब चुनते हैं खरे वही पाते जो पारखी हैं। शोकाकुल तो मूक दीन ही होते बुद्धिजीवि तो शोकाकुल होने का समय ही कहाँ पाते उच्छवासी क्यों कोई हो
गीत और कविता की ..।इस भाई का नाम तापस कुमार दास है जो बंगला भाषी है। हिन्दी साहित्य की एक झलक तक ही पहुँचा एक भाई तुल्य अजनबी बहन के
जवाब की अपेक्षा मे
There is a silver ship, there is a golden ship, there is no ship like Friend ship.
I am Tapas Kumar Das of 20th student of B.Sc. (joining year) My hobbies are great
hobbies in my own sens. These are as following :- Photography, Social reforming Reading
Hindi, English and Bengali literature, Driving Car Motor cycle) fast, I am a Hindi departmental
member of Radio Japan. So many programme has been broadcast through radio Japan.
It's my best and with best compliments to you my sister.
Cordial brother
Tapas Kumar Das
Das Estate
Lakanpur, Bhagalpur.
पूज्या दीदी
इतने दिनों बाद जब थक गया प्रतीक्षा मे कि अब आयेगा पत्र आपका कि अब आयेगा तब लिखने लगा हूँ आपको तंग करने के बहाने वैसे एक छोटा भाई तंग क्या कर सकता है- हाँ अबोध स्नेह का स्पर्श ही दे सकता है। क्या कर रही हैं- क्या लिख रही हैं क्या सोच रही हैं- इन सब स्थितियों को जन्म दीजिये कम से कम हमारे बगल मे बैठे रविकांत नीरज को बताइये न! तभी न आपकी प्रेरणाओं पर चल सकूँगा अविराम लेखनीय दायित्व को लिए साहिय-भू पर। मुझे विश्वास है कि आप पत्र अवश्य देंगी।
शुभकामनाओं के साथ-
प्रसूनलतांत
भागलपुर
स्नेहमयी दीदी!
सादर चरण-स्पर्श। अहाँक भगलपुर प्रवास जेना हमर सभक हृदय कें एकात्म कर लेल भेल छल। कतेक दिन धरि हम सभ विश्वविद्यालय परिसर मे मिलैत रहलौं- कतेक गोष्ठी मे एक दोसरा के बुझैत रहलौं। किन्तु दीदी हम नहि देखि सकैत छी अहाँक उदास चेहरा। अपन हँसीक पाछा नुका लैत छलौं अपन उदासी दीदी किन्तु हमर दृष्टि सँ नहि नुका पबैत छलौं। अहाँक अस्वस्थता सेहो नहि सहन क पबैत छी। दूनू चीज हमरा मोन पड़ैत अछि तँ हम व्याकुल भ जाइत छी कोना हमर दीदी फूल जकाँ सदिखन विहुँसैत रहतीह। कोनो बीमारी हमर दीदी के स्पर्श नहि करैक। सभ सँ पहिने दीदी अहाँ अपन स्वास्थ्यक ख्याल राखु। मैथिली साहित्य अहाँ दिसि टकटकी लगौने अछि
अहींक भाई
रविकान्त नीरज
भागलपुर
भागलपुर सँ एम ए क परीक्षा देवाक कारण हम रविकांत प्रसून ध्रुव नारायण इतिहासकार राधाकृष्ण चौधरी सभक हृदय मे निवास कर लागल छलौं। प्रसून लतांत आ रविकांत नीरजक कतेको पत्र हमरा भेटैत रहैत छल-
आदरणीया मामी जी
प्रणाम।पत्र और रचना मिली सम्पर्कांे को आपने बड़ी तेजी से रिश्ते का रूप दे दिया। साहित्यिकबंध्ुत्व के अलावा मामी का यह स्नेह मिल गया जो अबतक मुझे मामियों से मिलता रहा है।आपकी दोनों रचनायें स्तर की है प्रीति की कामायिनी और चश्मे के पानी पर उतर आयी बीमार ध्ूप का प्रयोग बड़ा अच्छा लगा। अच्छी रचनाओं के लिये पत्रिका के सम्पादक के हैसियत से धन्यवाद दे रहा हँू। हम रचनाओं के संकलन मे व्यस्त हैं तीन माह की सामग्री होते ही प्रकाशन प्रारंभ कर देंगे जैसे कि आपके पैड से मालूम हुआ इतना व्यस्त जीवन जीतें हुए भी आपने हमारे लिये समय निकाला इसके लिए हमारा विभव परिवार आभारी है। छपरे की एक और संस्था नवयुवक परिषद है जो अपने मे युवा शक्तियों को समाहित किये हुए समाजिक चेतना को जागरूक करने मे सक्रिय है। उसी के तत्वावधन मे हम एक विशाल आयोजन करने जा रहे है उसमंे एक कार्यक्रम कवि सम्मेलन का भी है यह संभवतः अक्टूबर मे आयोजित होगा। इसे आप पूर्व निमंत्रण समझे समय पर हम आपको सादर निमंत्रित करेंगे आशा है आप अवश्य आयेगी।
आपका
ओम प्रकाश, भगवान बाज़ार, छपरा
जूड़ शीतल
शेफालिका जी
मिथिला नववर्षक शुभकामना
मिथिला जन विकास परिषद
नवेन्दु कु . झा
पटना
प्रशस्ति प्रमोद
मैथिली महाकवयित्राी काव्य विनोदिनी डॉक्टर शेफालिका वर्मा जीक कोमल कर कमल मे सादर-कलित काव्य विनोदिनी डाक्टर सुदृढ़ शेपफालिके/ मैथिली सर महादेवी सुभद्रा सुमरालिके/मनोरम मुदमूखत मानसरोवरक मृदुभाषिके/करूण रस सँ सिक्त शीतल भावनाक प्रवाहिके/कवित कानन कोकिले ¯ककर कविक कलकण्ठिके/मधुरहास्य विलासिनी हृतहारिणी मनमोदिके।
बलदेवलाल कुलकिंकर
झझिहट जनकपुर रोड 22.1.79
हमर छोट भाई शरदक दोस्त छथि प्रदीप सिन्हा जे एखन आइपीएस आफीसर छथि। शरदक कारण ओ हमरा अपन सहोदर बहीन सँ बढ़ि कें मानैत छल। ओकर समस्त परिवार हमरा लेल बेहाल रहैत छल- प्रदीप अरुण नीलम आ हुनक माँ जिनका हम चाची कहैत छलौं- हृदयक अटूट रिस्ता बन्हि गेल छल ओहि परिवार सँ- तँ हुनकर सभक सिनेह-सिक्त पाती
मेरी प्यारी रजनी
तुम्हें असंख्य आशीर्वाद तथा मध्ुर स्नेह !
तुम्हारी कितनी ही चिटिृयाँ मिलती रही परन्तु मैं तुम्हें उत्तर नहीं दे सकी इसका मतलब तुम्हें भूल जाना कदापि नहीं हुआ। अपनी परिशानी भी मैं तुम्हें लिखकर बोर करना नहीं चाहती। फोन पर भी तुम से दो बातें नहीं कर पायी कि राजन ने झट फोन ले लिया। तुम्हारी तबीयत बहुत खराब हो गई थी यह जानकर हृदय कितना दुःखी और चिन्तित हो गया मैं तुम्हें शब्दों मे लिख कभी समझा नहीं सकती। अपना ख्याल करो रजनी अभी भी समय है वक्त है समय खो जाने पर तुम स्वयं को भी खो बैठोगी। तुम्हारी याद मुझे बहुत आती है। नारी जीवन की गाथा कथा मैं तुमसे अध्कि जान सकँूगी नारी तेरी यही कहानी अंचल मे है दूध् आँखों मे पानी किसकी लिखी कविता है याद
है न राजू शरत से मिलने गया था। उसने आकर बताया कि शरत की तबीयत बहुत खराब थी अब ठीक है। मैं भी उसे देखने जाऊँगी। राजू ने यह भी बताया कि रजनी दीदी 12 को आ रही है यह जानकर मुझे भी बड़ी खुशी हुई परन्तु फिर फोन पर बात करने के बाद पता चला कि तुम नहीं आ रही हो। रजनी मेरी अच्छी रजनी मेरी चिट्ठी तुम्हें कभी समय से शायद नही मिल सकेगी। तुम्हारी चाची बहुत पापी हैं बदकिस्मत है कभी उन्हें चैन की रोटी नहीं मिली पता नही कितनों का कर्ज मैंने ही उठाना पड़ा है। गर्मी सीमा पर है प्राण तो नहीं निकलता परन्तु सुबह से बारह बजे रात्रि इस घर मे रहना पड़ता है। मैं तुम्हें भूल न सकी रजनी तुम्हारा प्यार भरा हृदय मुझे बहुत भा गया न जाने क्यों जिसके हृदय मे प्यार नहीं है वह मनुष्य मनुष्य कहलाने योग्य नहीं-
तुम्हारी
चाची
सिन्हा भवन
एक्जीबीशन रोड पटना
चाचीक मृत्यु असमय भ गेल मुदा हुनक पत्र सभ समय असमय हमरा झकझोरि जाइत
अछि-
पूज्यनीया दीदी
प्रणाम।
आपके जाने के दूसरे दिन सुबह मैं आपको ये पत्र भेज रहा हूँ। दीदी आपके जाने के बाद
मेरी आँखों से भी दो बूंद आँसू निकल पड़े। मुझे बड़ा दुःख हुआ। मिथलेश को भी बड़ा दुःख हुआ।अपना एक फोटो भेज दिजीयेगा। भूलियेगा मत दीदी। आप अपनी तबीयत का ख्याल रखीयेगा। फोटो जल्द भेज दिजीयेगा। नीलम ठीक है। उसे भी आपके जाने का बड़ा दुख पहुँचा। बच्चे को प्यार तथा जीजा जी को मेरा प्रणाम कह दिजीएगा। पत्रोतर शीघ्र देंगी।
आपका
अरूण
पटना 16 8 74
प्रिय दीदी
प्रणाम
आप उधर जा रही थी इधर हम ठगे से खड़े रह गए वह लौह उपकरण हमारी दीदी
को हमसे दूर कर विजेता दैत्य की भाँति लेकर भाग रहा था और हम विवश आँखों मे आँसू लिए खड़े देखते रह गए दीदी क्या रक्त का संबंध ही सब कुछ होता है हमने तो अपनी दीदी को भगवान के वरदान की तरह अपनाया है
आपका ही भाई
प्रदीप
17 08 74
आदरणीया दीदी
सादर चरण - स्पर्श।
आपको तो न जाने सहरसा मे जाते ही क्या हो जाता है कि नीलम सिन्हा दिमाग से निकल जाती है। चिट्ठी लिखना और पफोटो भेजने की बात ही दूर है। जीजा जी कैसे हैं मैं समझती हूँ वो पहले से अच्छे ही होंगे। आप कैसी हैे आप अपने दिये गये वचन को निभाना सीखिए देवी जी हाँ! भेज देंगे - जरूर। सहरसा पहुँचते ही सारे वचन हवा हो गया है ना माँ को आपसे शिकायत है कि आप ना वहाँ हाल देती है और न यहाँ का लेती हैं। अतः आपसे निवेदन है महारानी जी कि अब चार लाइन भी खत लिखकर डाल दिया करें ले लिया करें। समझी फुर्सत यदि न हो तो फुर्सत निकाल कर आइयें।
आपकी बहन
नीलम
एहिना बीरपुर डारमेट्री सँ हमरा बड़ प्रेम छल। जखन वर्माजी लोक अभियोजक सहरसा
सुपौल मधेपुरा जिला छलैथ। तँ कोर्ट मे बराबर बीरपुर जाइत छलाह। ललित बाबूक बनाओल ओ डारमेट्री बड़ कलात्मक छल- हमरा ओहि डारमेट्री सँ प्यार भ गेल छल। ओकर आकर्षण मे हम हिनक संग लागि जाइत छलौं-तँ डारमेट्री ल क सभ हमरा किचारइत छल। तखनुक डिस्ट्रिक्ट जज- शरण साहबक बेटा अपन पत्रों मे एहि बातक चर्च करैत छल ।
हाँ तो चाची आपकी तबीयत कैसी है एक बार मन कर रहा है कि आपसे कहूँ कि बीरपुर बहुत ही थर्ड क्लास जगह है आपको चिढ़ाने मे भी परमानन्द की अनुभूति महसूस करती थी। क्यों चाची मेरे पत्र से आप बोर हो रही हैं क्या ठीक है मैं बन्द कर रहा हूँ।
आपका
अखिलेश शरण
मुंगेर
सुश्री वर्मा जी
चमचे की स्टेनलैस स्टील भरा प्रणाम ।आशा है सपरिवार सानन्द सकुशल लडडू सी लुढ़क रहीं होगी ।आपकी एक रचना माह मई 78 कादम्बिनी के अंक मे प्रकाशित हुई । पढ़ने का अवसर मिला हार्दिक प्रसन्नता हुई । आपने जिस परिप्रेक्ष्य मे रचना लिखी है वास्तव मे ही सराहनीय है।भविष्य मे कोई अन्य रचनायें प्रकाशित हों तो अवश्य सूचित करें ।
लोकतंत्रा मे मँहगाई के कदम सदा आगे चलते।भ्रष्ट उल्लुओं के पट्ठे ही फूल रहे फलते-फूलते।।मरने को भी मिट्टी का अब तेल नहीं जिस शासन मे।
तन के दीप जलाते लेकिन मन के दीप नहीं जलते।।
वैसे मुझे नहीं लिखना चाहिये परन्तु मैं भी अवगत करा दूँ कि मैं भी अखिल भारतीय स्तर के हास्य-व्यंग कवि सम्मेलनों का मंचीय कवि हँू । दिल्ली बम्बई उ॰प्र॰ म॰प्र॰ राजस्थान बिहार पंजाब प्रान्तों के क्षेत्रों मे काव्य पाठ करके अबतक लोगों की चमचागीरी कर चुका हँू । आकाशवाणी के विभिन्न केंद्रों से भी रचनायें प्रसारित होती रहती है। पत्र-पत्रिकाओं मे भी रचनायें प्रकाशित होती रहती है। शेष शुभ सदैव कृपा पत्र द्वारा सद्भाव बनाय रहें। आशा है आप भी लोकतंत्रा का बोझा ढो रहे होंगे। हमारी आत्मा को शान्ति प्रदान करने के लिए अपने हृदयोद्गार भरा एटमबम पत्र द्वारा हमारे पास तक अवश्य धमकायेंगे।
चमचा हाथरसी
विनोद सिपर्फ अपका ही
हाथरस उ प्र 26 5 78
शेफालिका जी
नमस्कार ।
आपका पत्र मिला कल ही । ध्न्यवाद मिथिल मिहिर मे प्रकाशित आपकी सभी कहानियाँ पढ़ चुका हँू । उपन्यास भी पढ़ चुका हँू । सोना माटि वैदेही आखर मिथिला दूत अग्नि पत्र एवं चांगुर मुझे कहीं नहीं उपलब्ध् हो रहा है।एक बात । मैं आपके पास कुछ प्रश्न भेज रहा हँू जो अलग कागज पर संलग्न है। कृप्या इसका उत्तर भेज दें । इसे एक भेट वार्त्ता ही समझ सकती हैं। इसका उल्लेख मुझे शोध् मे कहानी का परिचय के समय देना पड़ेंगा । हाँ! मैं भागलपुर जा रहा हँू .. पी॰एच॰डी॰ हेतु मैं भागलपुर वि॰वि॰ मे पंजीकृत हँू । गाईड भी वहीं रहते है और मेरे अग्रज भी अतः अग्रज के पास जा रहा
हँू तो देरी तो लौटने मे होगी ही । अतः कृप्या मेरे प्रश्नों का उत्तर भागलपुर ही भेजें ।
शेखर प्रसाद
डॉ सी एस लाल
फोरेनसिक मेडीकल कॉलेज
भागलपुर
20 9 74
ई पत्र हमरा एकटा मानसिक उलझन मे द देने छल। एहि पत्रक संग संलग्न प्रश्नपत्र मे
एकटा प्रश्न छल- आपकी तुलना लोग महादेवी वर्मा से करते हैं। महादेवी वर्मा के जीवन से हम सभी परिचित हैं! पिफर आप क्या कहती हैं कहियो काल हम अपन बाल बच्चा परिवारक संग संगत नहि वैसा पाबैत छी। कहबा लेल चाहैत छी किछ कहि दैत छी किछ-हमर कथनक शल्य क्रिया होभ लगैत अछि। आ ई तँ कोनो अनचीन्हार शेखर प्रसाद छलाह। हमर आँखि नोरा गेल छल उत्तर सोचैत खोजैत। हमरा असहज देखि
वर्मा जी सहज क देलनि- एकर उत्तर तँ स्पष्ट छैक- अहाँ लिखि दिऔक जे हम बुझैत छी लोग हमर रचनाक तुलना महादेवी सँ करैत छथि नहि कि हमर जीवनक सहरसा जिला मे जे पी आंदोलन मे हम बड़ सक्रिय छलौं। घर मे घुसल पर्दाशीन स्त्रिायों
के हम बाहर जुलूस मे अनने रहीं-
आदरणीया शेफालिका वर्मा जी
सादर प्रणाम मैं सहरसा आया था । आप नहीं थी । दि॰ 05 नवम्बर की अ॰ भा॰ महिला
संगठन की प्रांतीय संयोजक मंदाकिनी दानी सहरसा आ रही है। तीन तरह के कार्यक्रम अपेक्षित है। 1 महिला कार्यक्रम 2 कार्यकर्त्ता कार्यकर्ती बैठक 3 सार्वजनिक कार्यक्रम! इसी संबंध् मे विशेष विचार विमर्श के लिय प्रांतीय संयोजिका दि. 25 अक्टूबर रविवार प्रातः जानकी एक्सप्रेस से सहरसा आ रही है। उसी दिन रात को लौटेगी - कार्यकर्त्ता की बैठक हो । दिनांक 3 8 नवम्बर के बेगुसराय को कार्यकर्त्ता सम्मेलन मे आपकी प्रतीक्षा करूँगा।
इस बीच नागपुर मे आयोजित एक बैठक को लेकर कुछ गलतफहमी सी हो गई ऐसा कुछ भी सुब्रह्मण्य भारती से और कार्यालय मंत्राी श्री पंचनदीकर से बातों से और कुछ आपके पत्र को पढ़ने से अनुभव हुआ। क्योंकि अभी किसी भी प्रदेश मे विधिवत महिला विभाग का स्वतंत्रा कार्य नहीं हुआ हुआ था केंद्र से महिलाओं के संबंध के पत्रक जो मंदाकिनीदाणी महिला कार्य की प्रमुख ने भेजा प्रदेश संगठन मंत्राी के नाम भेजा जो 1999 का लिखा था। क्योंकि उन्होंने कथा था कि कोई 5 महिलाएँ नागपूर पहुँच कर कार्य समझ लें हमने अपने विभाग संगठन मंत्रियों को 912 नाम पूछ कर उन्हें भेजने की दृष्टि से बातें करने को कहा था। श्री सुब्रह्मण्यम भारती जी ने हमे यह स्पष्ट बताया था कि सहरसा जिला का महिला संगठन का कार्य आप करेंगी और सहरसा नगर का कार्य श्रीमती निर्मला वर्मा करेंगी। क्योंंिक एक महिला से दो जाना वहाँ से ठीक रहेगा ऐसा भारती जी ने सोचा होगा और आप दोनों को जाने का आग्रह किया होगा। पत्र देकर उधर के क्षेत्रा की कार्य प्रगति का विवरण देती रहेंगी। मैथिली महासम्मेलन के महिला विभाग की अध्यक्षता आप सफलतापूर्वक कर लौटेंगी। आपके मैथिली लेखिका मे सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त करने की बात तो हमे पत्र पढ़कर ही ज्ञात हुई। किस भाई को अपनी बहन के इस प्रकार के गौरव से अभिमान न होगा हम प्रदेश समिति की ओर से भी आपको इस उपलक्ष्य मे बधाई देते हैं। दिन पर दिन मेरी यह प्रतिभासम्पÂा बहन ऐसी ही प्रगति पथ पर अग्रसर हों यही भगवती से प्रार्थना है।
नाना भागवत
विश्व हिन्दु परिषद
नाला रोड पटना
(अगिला अंकमे....
विश्व हिन्दू परिषदक एहि लेटरपैड मे अध्यक्षक जगह पर पं जयकांत मिश्र पटना छल कोन जयकांत मिश्र छलथि कहियो जिज्ञासा नहि रहल-.....)

नाटक- बेटीक अपमान
नाटककार- बेचन ठाकुरजी
चनौरागंज (मधुबनी)
क्रमश:
बेटीक अपमान-
बेचन ठाकुर
दृश्‍य पाँचि‍म-
(स्‍थान बलवीर चौधरीक आवास। बि‍याहक तैयारी पूर्ण भए गेल अछि‍। जयमालाक मंच तैयार आ सजल अछि‍। मचक आगू बाल्‍टीनमे लोटा आ पानि‍ अछि‍। कुर्सीपर गंगा राम चौधरी बैसि‍ कऽ आेङहा रहल छथि‍।)
गंगाराम- (नीनमे) हमहुँ बेटाक वि‍याह करब। दहेजमे एगो उजरा आ एगो करि‍या बत्तु लेब। ठाँठ बकरी लेब सेहो जरसी। कनि‍या लेल कानमे बुलकी लेब। अपना लेल एगो फाटलो-चि‍टलो कनि‍या लेब। बाआ लेले एगो गदहा लेब। अपना कनि‍या लेल ठोररंगा लेब। एगो मोचना लेब। ओहि‍सँ अपन कनि‍याकेँ सौंसे देहक केश उखारि‍ देबैन। आओर नगद एगारह लाख एगारह सए टाका, डालीमे एक लाख मच्‍छर आ समधी मि‍लानमे एक हजार एक उड़ीश लेब। आओर पुतौह लेल.....।
(चन्‍देश्‍वर चौधरीक प्रवेश)
चन्‍देश्‍वर- गंगा राम, गंगा राम, रओ गंगा राम।
(गंगाराम फुरफुरा कऽ उठि‍ खसैत-पड़ैत)
गंगाराम- जी भैया, जी भैया, केम्‍हर गेलीह भौजी?
चन्‍देश्‍वर- सपनाइत छेँ की?
गंगाराम- नहि‍ भैया, अपन बेटाक छेकामे गेल रही।
चन्‍देश्‍वर- नीन तोड़ू मुँह-हाथ धोउ।
(अन्‍दरसँ दुइ-चारि‍टा बमक आवाज होइत अछि‍।)
गंगाराम लगैत अछथ्‍ बरयाती आबि‍ रहल अछि‍।
गंगाराम- आबए दि‍यौन। कटहर-चूड़ा खेताह। एतेक अबेर आएल बरयातीकेँ की स्‍वागत होएत? अपन ठरल-ठरल खाएत आ सि‍रसि‍राइत भागत।
(बरयातीक प्रवेश। दीपक चौधरी, मोहन चौधरी, सोहन चौधरी, गोपाल चौधरी, प्रदीप कुमार ठाकुरक आ चारि‍-पाँच हुनक समाजक लोक बरायातीमे आएल छथि‍। सभ कि‍यो मंचपर वि‍राजमान छथि‍। पाछू काल सुरेश कामत पहुँचलाह।)
दीपक- गोर लगैत छी मामीश्री।
सुरेश- नीके रहू भागि‍न।
दीपक- बरयाती अएवाक मोन पड़ि‍ गेल?
सुरेश- की करबैक भागि‍न, असगरूआ छी। छेका दि‍न समएपर महीसकेँ नहि‍ दुहलहुँ। तेकर फल यएह भेल, महीस नि‍छए गेल।
(सरयातीक प्रवेश। हरे राम सि‍ंह, बरवीर चौधरी, गंगाराम चौधरी, चन्‍देश्‍वर चौधरी आ हि‍नक अपन समाजक लोक छथि)
हरेराम- (बरयातीसँ) सरकार सब, चरण पखारल जाउ। बड राति‍ भए गेल। हमर समाजक कतेको लोक चलि‍ गेलाह। नश्‍तो पानि‍ हरेएतैक। जल्‍दी चरण पखारल जाउ, सरकार सभ।
(सभ कि‍यो चरण पखारि‍ कऽ बैसैत छथि‍।
अन्‍दरसँ गंगाराम शरबत, नश्‍ता, चाह, पान, बीड़ी सुपारी इत्‍यादि‍ आनैत छथि‍। नश्‍ता-पानि‍ आरामसँ भए रहल अछि‍। चाय-पानक बाद सरयाती सभ अंदर जाइत छथि‍। तहन जनानी सभ जयमाला करेवाक लेल अएलीह। ओ सभ पहि‍ने परि‍छनि‍क गीत गाबि‍ परि‍छन कए रहलीह फेर लड़ि‍काक परि‍क्रमा करए जयमाला कराबैत छथि‍। तहन लड़ि‍की लड़ि‍काक आरती उतारि‍ आ प्रणाम कऽ आशीर्वाद लय सभ जनानीक संग अंदर जाइत छथि‍। प्रदीप कुमार ठाकुरक प्रवेश)
प्रदीप- (बरयातीसँ) सरकार सभ भोजनमे चलै चलू।
हरेराम- चलै चलू,( बरयाती सभ। भोर होमए जा रहल अछि‍। चलू, चलै चलू।
(सबहक प्रस्‍थान)
पटाक्षैप
१.शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘-
१.१.कुरूक्षेत्रम् अर्न्‍तमनक-(समीक्षा)१.२.
समीक्षा (अर्चिस) २. डॉ. शेफालिका वर्मा - प्रीति ठाकुर क मैथिली चित्रकथा
३.राजदेव मंडल, कुरूक्षेत्रम अन्‍तर्मनक लेल पत्र-शेष अंश ४.धीरेन्‍द्र कुमार- प्री‍ति‍ ठाकुरक दुनू चि‍त्रकथापर धीरेन्‍द्र कुमार एक नजरि
१.
शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘,
नाम : शिव कुमार झा, पिताक नाम: स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘, माताक नाम: स्व. चन्द्रकला देवी, जन्म तिथि : 11-12-1973, शिक्षा : स्नातक (प्रतिष्ठा), जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम + पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर, पिन: 848101, संप्रति : प्रबंधक, संग्रहण, जे. एम. ए. स्टोर्स लि., मेन रोड, बिस्टुपुर, जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि : वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार- प्रसार हेतु डा. नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चौधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्वमे संलग्न।
१.१.कुरूक्षेत्रम् अर्न्‍तमनक-
(समीक्षा)
कि‍छु लोकक ई प्रवृति‍ होइत अछि‍ जे सदि‍खन अपन चल जीवनमे नव-नव प्रकारक प्रयोग करैत रहैत अछि‍। एहि‍ नव प्रयोगक कारण जहानमे अपवर्गक वि‍हान देखएमे अबैत अछि‍। प्रयोग धर्मिता व्‍यक्‍ति‍क इच्‍छासँ नहि‍ जन्‍म लऽ सकैछ, ई तँ नैसर्गिक प्रति‍भाक परि‍णाम थि‍क। मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे प्रयोग धर्मी सरस्‍वती पुत्रक अभाव नहि‍ परंच वर्तमान कालमे एकटा एहेन प्रयोगधर्मी मि‍थि‍ला पुत्रकेँ मॉ मि‍थि‍ले अपन ऑचरमे सक्रि‍य कएलनि‍, जे तत्‍कालि‍क मैथि‍लीक दशा वदलवाक प्रयास कऽ रहल छथि‍। क्रांति‍वादी आ सम्‍यक वि‍चार धाराक सम्‍पोषक ओ व्‍यक्‍ति‍ केओ अनचि‍न्‍हार नहि‍- मैथि‍ली साहि‍त्‍यक प्रथम अंतर्जाल पाक्षि‍क पत्रि‍का वि‍देहक सम्‍पादक- श्री गजेन्‍द्र ठाकुर छथि‍। भऽ सकैत अछि‍ जे कि‍छु लोक मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ अन्‍तर्जालसँ जोड़वाक प्रयास कए रहल हएताह परंच एकटा मूर्त्त रूप दऽ 64 अंक धरि‍ पहुँचेवाक कार्य गजेन्‍द्रे जी कएलन्‍हि‍। साहि‍त्‍यक नव-नव वि‍धा आ समाजक वेमात्र वर्गकेँ मैथि‍लीक आलि‍ंगनमे आवद्ध कऽ साम्‍यवाद आ समाजवादकेँ वैदेहीक माटि‍पर आनि‍ हमरा सबहक माथपर लागल अनसोहांत कलंककेँ धो देलनि‍। मात्र 64 अंकमे जे कार्य भेल अछि‍ ओ कतऽ-कतऽ पहि‍ने भेल छल, आत्‍म अवलोकन करवाक पश्‍चात् जानल जा सकैत अछि‍। समाजक फूजल, बेछप्‍प आ उदासीन वर्गकेँ अपन वयनाक मानस पटलपर आच्‍छादि‍त करवाक लेल साहस सभ केओ नहि‍ जुटा सकैत अछि‍। मात्र भॉज पुरयवाक लेल मानस पुत्र एहेन कार्य नहि‍ कएलनि‍, ओहि‍ उपेक्षि‍त वर्गक रचना कारक रचनामे वि‍षए-वस्‍तुक गति‍शीलता आ तादात्‍म्‍य वोध ककरोसँ कम नहि‍ अछि‍। प्रयोगधर्मी गजेन्‍द्र जीक कर्मक दोसर आमुख थि‍क हि‍नक लेखनीक धारसँ नि‍कलल इन्‍द्रधनुषक सतरंगी गुलालसँ भरल भावक आत्‍मउदवोधन- “‍कुरूक्षेत्रम अन्‍तर्मनक”
एहि‍ पोथीकेँ की कहल जाए उपन्‍यास, गल्‍प, बाल साहि‍त्‍य, समालोचना, प्रवंध वा काव्‍य? साहि‍त्‍यक सभ वि‍धाक अमि‍र रसकेँ घोरि‍ वंगोपखाड़ी वना देलनि‍ जतए ई कहव असंभव अछि‍ जे गंगा, कोशी, यमुना वा हुगली ककर नीर कतए अछि‍?
शीर्षक देखि‍ अकचका गेल छलहुँ, ई महाभारत मचौता की! मुदा अपन हृदएसँ सोचल जाए प्रत्‍येक मानवक हृदएक दूटा रूप होइत अछि‍, मुदा अन्‍तर्मन सदि‍खन सत्‍य बजैत अछि‍ ओहि‍ठॉ मि‍थ्‍याक स्‍थान नहि‍।
कुरूक्षेत्र रणभूमि‍ अवश्‍य छल परंच ओहि‍ठॉ सत्‍यक वि‍जयक लेल युद्ध भेल। ओहि‍ठॉ धर्मसंस्‍थापनार्थ वि‍नाश लीला मचल छल। हमरा सभकेँ अपन अन्‍तर्आत्‍मामे कुरूक्षेत्रक दर्शन करएवाक लेल दि‍शा नि‍र्देशन कऽ रहल छथि‍ गजेन्‍द्र जी।
मैथि‍ली साहि‍त्‍यक कोन असत्‍यकेँ त्‍याग करवाक चाही? कि‍अए सुमधुर वयनाक एहेन दशा भेल? नव पथक नि‍र्माण नवल दृष्‍टि‍कोणसँ हएत। हमरा बुझने एहि‍ पोथीमे साहि‍त्‍य समागमक लेल दृष्‍टि‍कोणकेँ प्राथमि‍कता देल गेल अछि‍। एहेन वि‍लक्षण साहि‍त्‍यपर आलेख लि‍खव हमरा लेल आसान नहि‍ अछि‍- मुदा दु:साहस कऽ रहल छी-
भऽ रहल वर्ण-वर्ण नि‍:शेष
शब्‍दसँ प्रकटल नहि‍ उधेश्‍य
मोनमे रहल मनक सभ वात
अछि‍ंजलसँ सध: स्‍नात
सात खण्‍डमे वि‍भक्‍त एहि‍ पोथीकेँ सम्‍पूर्ण परि‍वारक लेल सनेश कहि‍ सकैत छी।
प्रवंध-नि‍वंध-समालोचना:- एहि‍ खण्‍डक आदि‍ लोकगाथापर आधारि‍त कथा सीत-वसंतसँ कएल गेल अछि‍। उत्तर मध्‍यकालीन इति‍हासमे अल्‍हा-ऊदल, शीत वसंत सन कतेक कथा प्रचलि‍त छल, जकर मंचन पद्यक रूपमे वर्तमानकालमे वि‍हारक गाम-गाममे भऽ रहल अछि‍। एक राज परि‍वारक वि‍षय-वस्‍तुक चि‍त्रण करैत लेखक सतमाएक ि‍सनेहपर प्रश्‍न चि‍न्‍ह लगैवाक प्रयास कएलनि‍ अछि‍? कथाक आरंभसँ इति‍ धरि‍ मर्मस्‍पर्शक अनुभव होइत अछि‍। कथाक अंतमे वि‍माताकेँ ओहि‍ पुत्रक छाया भेटलनि‍ जकर पराभव ओ कऽ देने छलीह।
श्री मायानन्‍द मि‍श्र मैथि‍ली साहि‍त्‍यक सभ वि‍धाक मांजल साहि‍त्‍य कार मानल जाइत छथि‍। हुनक इति‍हास वोधक चारू प्रमुख स्‍तंभ प्रथमं शैलपुत्री च, मंत्रपुत्र, पुरोहि‍त आ स्‍त्रीधनपर सम्‍यक आलेख प्रस्‍तुत कऽ गजेन्‍द्र जी पूर्वमे लि‍खल गेल प्रबंधक दृष्‍टकोणकेँ चुनौती दऽ रहल छथि‍। ऋृग्‍वैदि‍क कालीन इति‍हासपर आधारि‍त मंत्रपुत्र मायानन्‍द जीक प्रमुख कृति‍ मानल जाइत अछि‍। एहि‍ पोथीक लेल माया जीकेँ साहि‍त्‍य अकादेमी पुरस्‍कार भेटल अछि‍। मंत्रपुत्र पाश्‍चात्‍य इति‍हाससँ प्रभावि‍त अछि‍। मंत्रपुत्रक संग-संग पुरोहि‍तमे सेहो पाश्‍चात्‍य संस्‍कृि‍तक झलकि‍ देखए अबैत अछि‍। अपन समालोचनाकेँ गजेन्‍द्र जी अक्षरश: प्रमाणि‍त कऽ देने छथि‍, मुदा मायाबावूक रचना संसारपर कोनो तरह प्रश्‍न चि‍न्‍ह नहि‍ ठाढ़ कएलनि‍। समीक्षाक रूप एहने होएवाक चाही। समीक्षककेँ प्ूर्वाग्रह रहि‍त रहलासँ साहि‍त्‍यि‍क कृति‍क मर्यादा भंग नहि‍ होइत अछि‍।
केदारनाथ चौधरी जीक दू गोट उपन्‍यास ‘चमेली रानी’ आ ‘माहुर’पर गजेन्‍द्र जीक समीक्षा पूर्णत: सत्‍य मानल जा सकैत अछि‍। मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे बहुत रास रचनाक वि‍क्री सम्‍पूर्ण मैथि‍ल समाजमे जतेक नहि‍ भऽ सकल, ‘चमेली रानी’क ओतेक वि‍क्री मात्र जनकपुरमे भेल। एहि‍सँ एहि‍ साहि‍त्‍यक प्रति‍ पाठकक श्रद्धाकेँ देखल जा सकैत अछि‍। ‘माहुर’ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल क्रांति‍कारी उपन्‍यास थि‍क। अरवि‍न्‍द अडि‍गक कृति‍क चरि‍त्रसँ एहि‍ उपन्‍यासक एक पात्रक तुलना लेखकक भाषायी समृद्धताकेँ प्रदर्शित करैत अिछ।
वि‍देह-सदेहक सौजन्‍यसँ श्रुति‍ प्रकाशन द्वारा नचि‍केता जीक एकटा नाटक ‘नो एण्‍ट्री मा प्रवि‍श’ प्रकाशि‍त भेल अछि‍। एहि‍ नाटकक लेखनपर नचि‍केता जीकेँ कीर्ति नारायण मि‍श्र सम्‍मान देल गेल अछि‍। नाटकक चारू कल्‍लोलक तर्क पूर्ण वि‍श्‍लेषण कऽ गजेन्‍द्र जी समीक्षाक रूप बदलवाक प्रयास कएलनि‍ अछि‍। एहि‍ नाटकमे तार्किकता आ आधुनि‍कताक वि‍षय वस्‍तु नि‍ष्‍ठताकेँ ठाम-ठाम नकारल गेल अछि‍।
रचना लि‍खवासँ पहि‍ने अध्‍यायमे गजेन्‍द्र जी मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे भाषा सम्‍पादनपर वि‍शेष ध्‍यान देवाक प्रयास कएलनि‍। अपन साहि‍त्‍यमे भाषायी त्रुटि‍पर पूर्णरूपसँ ध्‍यान नहि‍ देल जा रहल अछि‍।
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मि‍थि‍लाक लेल प्रलय कहल जाए वा वि‍भीषि‍का- ‘बाढ़ि‍’ ई शब्‍द सुनि‍तहि‍ कोशी, कमला, बलान, गंडकी, बागमती आ करेहक आंतसँ ओझराएल लोक सभ कॉपि‍ जाइत छथि‍। एहि‍ समस्‍याक स्‍थि‍ति‍, सरकारी प्रयासक गति‍ आ दि‍शाक संग-संग बचवाक उपाएपर लेखकक दृष्‍टि‍कोण नीक बुझना जाइत अछि‍।
कोनो ठाम आ कोनो आन धाममे जौं हमरा लोकनि‍क वि‍षयमे पता चलए-की मैथि‍ल छथि‍, लोकक दृष्‍टकोण स्‍पष्‍ट भऽ जाइत अछि‍- हम सभ मछगि‍द्धा छी। एकर कारण जे धारक कातमे रहनि‍हार जीवक जीवन जलचरे जकाँ होइत अछि‍।
जलीय जीवक भक्षण अधि‍कांश व्‍यक्‍ति‍ करैत छथि‍। तेँ ने हमरा सभकेँ मॉछ आ मखानक प्रेमी बुझल जाइत अछि‍, आ वास्‍तवमे हम सभ मॉछक प्रेमी छी। अधि‍कांश मैथि‍ल ब्राह्मण परि‍वारमे सोइरीसँ श्राद्ध धरि‍ माॅछक भक्षण अनि‍वार्य अछि‍। अान जाति‍मे अनि‍वार्य तँ नहि‍ अछि‍, मुदा ओहु वर्गक अधि‍कांश लोक मॉछक प्रेमी छथि‍। लेखक एहि‍ लोकक भक्षण धारकेँ ध्‍यान धरैत कृषि‍ मत्‍स्‍य शब्‍दावली लि‍खलन्‍हि‍ अछि‍।
एहि‍मे सभ प्रकार मॉछक आकार, रंग, रूपक वि‍श्‍लेषण कएल गेल अछि‍। कृषि‍कार्यक लेल जोड़ा वरदक संग हर पालो इत्‍यादि‍क ज्‍वलन्‍त व्‍यवस्‍थापर लेखकक वि‍चार नीक मानल जा सकैत अछि‍। करैल, तारवूज आ खीराक वि‍वि‍ध प्रकारक नाओ सुनि‍ गामक जि‍नगी स्‍मरण आवि‍ जाइत अछि‍।
एहि‍ खण्‍डक सभसँ नीक वि‍षय जे हमरा अन्‍तर्मनकेँ हि‍लकोरि‍ देलक ओ अि‍छ वि‍स्‍मृति‍ कवि‍- पंडि‍त राम जी चौधरीक रचना संसारपर प्रवाहमय आ वि‍स्‍तृत प्रस्‍तुति‍।
हमरा सबहक भाखाक संग ि‍कछु वि‍षमता रहल जे एहि‍मे कतेक रास एहेन रचनाकार भेल छथि‍ जे अपने संग अपन रचनाकेँ गेंठ बन्‍हने वि‍दा भऽ गेलाह। एकर कारण एहि‍मे सँ कि‍छु रचनाकारक रचनाक संकलन नहि‍ भऽ सकल वा भेवो कएल तँ पाठक धरि‍ नहि‍ पहुँचल। एहि‍ लेल ककरा दोष देल जाए रचनाकारकेँ आ हमरा सबहक भाषाक तत्‍कालीन रक्षक लोकनि‍केँ? एहि‍ भीड़मे राम जी चौधरीक नाओ सेहो अछि‍। मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे रागपर लि‍खल रचनामे राम जी बावूक रचना सेहो अछि‍। भक्‍ति‍मय राग वि‍नय वि‍हाग, महेशवाणी, ठुमरी ति‍रहुता, ध्रुपद, चैती आ समदाओनक रूपमे हुनक लेखनीसँ नि‍कलैत गीत सभ अलम्‍य अछि‍। शास्‍त्रीय शैलीक मैथि‍ली गायनमे वर्तमान पि‍रहीक लेल अत्‍यन्‍त उपयोगी रचना सभकेँ प्रकाशमे आनि‍ गजेन्‍द्र जी मि‍थि‍ला, मैथि‍ली आ मैथि‍लपर पैघ उपकार कएलनि‍ अछि‍। सत्‍यकेँ स्‍वीकार करवाक सामर्थ्‍य मात्र कि‍छुए लोकमे होइत अछि‍। गजेन्‍द्र जी ओहि‍ लोकक पातरि‍मे ठाढ़ एक व्‍यक्‍ति‍ छथि‍ परि‍णामत: मैथि‍ली साहि‍त्‍य भोजपुरीसँ आगाँ मानल जाइत अछि‍ मुदा गुणवताक दृष्‍टि‍ए भोजपुरी रास परि‍मार्जि‍त अछि‍। भोजपुरी साहि‍त्‍यक काल पुरूष भि‍खारी ठाकुरक मर्म स्‍पर्शी वि‍देशि‍या एहि‍ भाषाक अलग पहि‍चान भेटल। मैथि‍ली भाषामे वि‍देशि‍याक कमीक मुख्‍य कारण रहल-प्रवासक प्रति‍ उदासीनता। जौं लि‍खलो गेल तँ महाकाव्‍यक रूप दऽ देल गेल। वि‍देशि‍या पद्य आ वि‍धापति‍क लि‍खल? हमरो वि‍श्‍वास नहि‍ भेल छल। वि‍द्यापति‍केँ मुख्‍यत: श्रैंगारि‍क कवि‍ मानल जाइत अछि‍। ओना हुनक रचनाकेँ भक्‍ति‍ रससँ सेहो जोड़ल जाइत अछि‍। कुरूक्षेत्रम अन्‍तर्मनक पोथी पढ़लासँ नव सोच मोनमे आवि‍ गेल। जकरा भोजपुरी साहि‍त्‍यमे वि‍देशि‍या कहल गेल वास्‍तवमे मैथि‍लीमे ओ अछि‍- पि‍या देशान्‍तर।
वि‍द्यापति‍क नेपाल पदावलीमे एहि‍ प्रकार रचना सभ संकलि‍त अछि‍, मुदा कहि‍यो एहि‍ रूपे महि‍मा मंडि‍त नहि‍ कएल गेल। कारण स्‍पष्‍ट अछि‍ पि‍या देशान्‍तरक नाटय रूप मि‍थि‍लाक पि‍छड़ल जाति‍क मध्‍य प्रदर्शित कएल जाइत अछि‍। तेँ अग्रसोची लोकनि‍ एकरासँ दूरे रहव उचि‍त बुझैत छथि‍। एहि‍सँ मैथि‍लीक दशा-दि‍शाकेँ नव गति‍ कोना भेटि‍ सकैत अछि‍। मैथि‍ली लोकभाषा अछि‍, लोक संस्‍कृति‍केँ बढ़यवाक प्रयास करवाक चाही। गजेन्‍द्र जीक सोझ दृष्‍टि‍कोणकेँ वि‍म्‍वि‍त करवाक चाही।
“एतहि‍ जानि‍अ सखि‍ प्रि‍यतम व्‍यथा‍” –श्रैंगारि‍क-वि‍रह व्‍यथाक वर्णन मुदा अछि‍ तँ पि‍या देशान्‍तर।
श्री सुभाष चन्‍द्र यादव जीक कथा संग्रह ‘बनैत-वि‍गड़ैत’पर गजेन्‍द्र जीक समीक्षा अपूर्व अछि‍। प्रवेशि‍कामे हुनक कथा ‘काठक बनल लोक’ पढ़ने छलहुँ। काठक बनल लोकक नायक वदरि‍याक मर्म देखि‍ पाथरो पि‍घलि‍ जा सकैत अछि‍। वास्‍तवमे सुभाष जी मैथि‍ली साहि‍त्‍यक फनीश्‍वर नाथ रेणु छथि‍। महि‍मा मंडनक कालमे मात्र भाँज पुरएवाक लेल हि‍नक कथा पाठ्यक्रममे दऽ देल जाइत अछि‍। आंचलि‍क रचनाकेँ कहि‍या धरि‍ उपहासक पथि‍यामे झाॅपि‍ कऽ राखल जाएत? एक नहि‍ एक दि‍न छीप उधि‍या जएत आ सत्‍यक सामना करए पड़त। लोक धर्मी साहि‍त्‍यकार चाहे ओ धूमकेतु, कुमार पवन कमला चौधरी, सुभाष चन्‍द्र यादव, जगदीश प्रसाद मंडल वा कोनो आन होथु- हुनका सबहक रचनाक उपेक्षा नहि‍ होएवाक चाही। सुभाष जीक कथा कनि‍या-पुतरा, बनैत-वि‍गड़ैत आ दृष्‍टि‍क समीक्षा देखि‍ समए-कालक दशाक अवि‍रल द्वन्‍द्व उपस्‍थि‍त भऽ जाइत अछि‍। ऋृणी छी जे गजेन्‍द्र बावू एहि‍ पोथीपर समीक्षा लि‍खलन्‍हि‍। इंटरनेटक लेल अन्‍तर्जाल प्रयोग, नीक लागल। वेवसाइट बनएवाक तकनीकसँ गजेन्‍द्र जीक उद्वोधन आ नि‍यमन नहि‍ बुझि‍ सकलहुँ। तीन वेरि‍ पढ़लहुँ मुदा जेठक तेज वि‍हारि‍ जकाँ मॉथपरसँ उड़ि‍ गेल। नव-नव नेना भुटका बुझि‍ जएताह। तकनीकी युगक नेनाक स्‍मरण शक्‍ति‍क आॅगन पैघ होइत छथि‍ तेँ हुनके सबहक लेल एहि‍ अध्‍यायकेँ छोड़ि‍ देलहुँ।
लोरि‍क गाथा समाजक उपेक्षि‍त वर्गक संस्‍कृति‍पर आधारि‍त अछि‍। सहरसा-सुपौलक वीर आदि‍ पुरूष लोकि‍कक परि‍चए-पातमे पौराणि‍क मैथि‍ल संस्‍कृति‍क दर्शन होइत अछि‍।
मि‍थि‍लाक खोजमे जनकपुर, सुग्‍गा धनुषा सन नेपालक स्‍थलसँ लऽ कऽ मधुबनी जि‍लाक कतेको उत्तर मैथि‍ल गामसँ दक्षि‍णमे जयमंगलागढ़ (वेगूसराय)क चर्च कएल गेल अछि‍। पूवमे पूर्णिया कि‍शन गंजक कतेक स्‍थलसँ लऽ पश्‍चि‍ममे चामुण्‍डा (मुजफ्फरपुर)क मॉ दुर्गाक मंदि‍रक चर्च कएल गेल अछि‍।
मि‍थि‍लाक ि‍कछु स्‍थानक वर्णन एहि‍ सुचीमे नहि‍ भेटल जेना- सती स्‍थान (गाम-शासन प्रखंड-हसनपुर जि‍ला- समस्‍तीपुर) आ उदयनाचार्यक जन्‍म स्‍थली (गाम-करि‍यन जि‍ला- समस्‍तीपुर)। एहि‍ लेल लेखककेँ दोष नहि‍ देल जा सकैत अछि‍, कि‍एक तँ मि‍थि‍लाक खोज- वि‍देहसँ लेल गेल अछि‍, जाहि‍मे गजेन्‍द्र जी अवाहन कएने छथि‍, जे जि‍नका लग कोनो प्रसि‍द्ध स्‍थलक वि‍षएमे जानकारी हुअए जे एहि‍मे सम्‍मि‍लि‍त नहि‍ अछि‍ तँ ओकर सूचना देल जाए जाहिसँ ओतए जा कऽ छाया चि‍त्रक संग सूचना सम्मिलित कएल जा सकए। कि‍छु स्‍थल आर छूटल भऽ सकैत अछि‍, प्रवुद्ध पाठक एहि‍ वि‍षएपर कार्य कऽ सकैत छी।
क्रमश:
१.२.
शि‍व कुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’, जमशेदपुर।
समीक्षा (अर्चिस)
वर्तमान मैथि‍लीक कवि‍ताकेँ तरूण कवि‍ आ कवयि‍त्रीक पदार्पणसँ नव गति‍ भेटि‍ रहल अछि‍। एहि‍ नवतुरि‍या मुदा वि‍षए-वस्‍तुक दृष्‍टि‍कोणसँ सजल रचना सबहक रचनाकारक वर्गमे एकटा प्रवासी मैथि‍लीक कवयि‍त्री छथि‍- श्रीमती ज्‍योति‍ सुनीत चौधरी।
“अर्चिस‍” ज्‍योति‍ जीक प्रथम संकलि‍त कवि‍ता संग्रह थि‍क। एहि‍ पोथीमे ३७ गोट कवि‍ता संग्रहि‍त अछि‍। ज्‍योति‍ जी कतेक दि‍नसँ रचना करैत छथि‍, ई तँ नहि‍ बुझल अछि‍ मुदा वि‍देहक पदार्पणक कि‍छुए अंकसँ हि‍नक रचना प्रकाशि‍त हुअए लगल।
अर्चिसक अर्थ तत्‍सममे अग्‍नि‍ आ तद्भवमे आग, अनल आदि‍ मानल जाइत अछि‍ मुदा मैथि‍लीमे आगि‍, अंगोर आ लुत्ती सेहो कहल जा सकैछ। एहि‍ पोथीक शीर्षक मात्र कवयि‍त्रीक भावनापर आधारि‍त अछि‍, कवि‍ताक भावसँ एहि‍ शीर्षकक कोनो संबंध नहि‍। पहि‍ल कवि‍ता “हाइकू‍” प्रकृति‍ वर्णन, श्रृंगार, वि‍चार मूल आ वि‍रहक मि‍श्रि‍त चि‍त्रांकन करैछ। हाइकू पहि‍ने मैथि‍लीमे क्षणि‍का नाओसँ लि‍खल जाइत छल, मुदा ज्‍योति‍ जी एकर वास्‍तवि‍क रूपक चि‍त्रण कएलनि‍ अछि‍। सम्‍पूर्ण कवि‍तामे अर्न्‍तद्वन्‍द्व आ प्रसन्नताक भीड़क मध्‍य व्‍यथा-टीशक अंतरंग हृदयक प्रवाहमयी प्रस्‍तुति‍..... मनोरम लागल।
एकटा हेराएल सखीमे कवयि‍त्री कवि‍ताक नायि‍काकेँ अपन सखी माि‍न ओकरा सि‍नेहीसँ भेटल पीड़ाक उद्वोधन कऽ रहल छथि‍। नारी मोनमे अश्रुउच्‍छवासक संग-संग समर्पण सेहो रहैत अछि‍। ओना तँ आर्य ग्रन्‍थमे “त्रि‍या चरि‍त्र‍: पुरूषस्‍य भाग्‍यम् देवो न जानाति‍ कुतो मनुष्‍य:” लि‍खल गेल अछि‍, मुदा एकरा हम उचि‍त नहि‍ मानैत छी। आर्यावर्तक नारीक मोन वि‍ह्वलआ भावुक होइत अछि‍ तेँ भावनात्‍मक छलक शि‍कार शीघ्र भऽ जएवाक संभावना देखल जा सकैछ। पुरूष प्रधान समाजमे दोस नारीपर देल जाइत अछि‍ मुदा पुरूषक चरि‍त्रहीनताक नाओ की देल जाए? जीवन भरि‍ एक पुरूषक प्रति‍ समर्पणकेँ केन्‍द्र वि‍न्‍दु बना कऽ कवयि‍त्री दुखि‍त छथि‍ अपन सखीक नि‍श्‍छल समर्पणसँ। ई कवि‍ता सदेह ३ मे कल्‍पना शरणक रचनाक रूपमे प्रकाशि‍त भेल अछि‍। नहि‍ जानि‍ बेरि‍-बेि‍र नाओ बदलि‍ कऽ लि‍खवाक परम्‍परा कहि‍या धरि‍ चलत। छद्म नाअोक नि‍र्णक एकवेरि‍मे कऽ लेवाक चाही, नहि‍ तँ रचनाकारक वि‍लगि‍त मानसि‍कताक बोध होइत अछि‍।
वर्तमान महि‍ला वर्गमे नौकरी करवाक इच्‍छा शक्‍ति‍ प्रवल भऽ रहल अछि‍। स्‍वभावि‍के अछि‍ जीवनक दोसर पहि‍या तँ नारी छथि‍। सृजन आ सृष्‍टि‍क रूपमे पहि‍ल पहि‍या सेहो कहि‍ सकैत छी। परंच युवा महि‍ला वर्गक प्रवृति‍ चंचल होइत अछि‍। एहि‍ अल्हड़पनमे अपन कर्मगति‍केँ सेहो चंचल बनएवाक प्रयास कऽ रहल छथि‍ कवयि‍त्री अपन कवि‍ता “एकरा नौकरी चाही‍”मे। कार्यालयक सभटा काज हि‍नके मोनक होएवाक चाही। काज कम मुदा कैंचा वेसी चाहैत छथि‍। बॉसकेँ आन्‍हर आ वहि‍र होएवाक कामनामे हास्‍यक दर्शन होइत अछि‍। भऽ सकैत अछि‍ हि‍नक एहेन दृष्‍टि‍कोण मात्र कवि‍तेटा मे हुअए।
“पनि‍भरनी‍” कवि‍ता पढ़ि‍ हमर मॉथ सुन्न भऽ गेल, अकचका गेलहुँ। जाहि‍ नारीक बाल काल जमशेदपुरमे बीतल हुअए, आब लंदनमे रहैत छथि‍ हुनकासँ एहेन शब्‍दक आश कोना कएल जा सकैत अछि‍? गामोमे आब घैल आ इनारक रूप मृतपाय भऽ गेल अि‍छ। एकटा गरीव अवला पनि‍भरनीक प्रति‍ आसक्‍ति‍सँ कवि‍ता ओत प्रोत अछि‍। वि‍षय वस्‍तु आ दृष्‍टि‍कोण समंजन खूब नीक लागल। अपन जाति‍क प्रति‍ सि‍नेहक मर्मस्‍पर्शी चि‍त्रण भऽ सकैत अि‍छ जे एहि‍ प्रकारक व्‍यस्‍थाक वर्णन अपन परि‍वारक बूढ़-पुरानसँ ज्‍योति‍ जी सुनने हेती।
दीपमे ज्‍योति‍ पसरवाक शक्‍ति‍ होइत अछि‍ मुदा तरमे तँ अन्‍हार रहैछ। स्‍वाभावि‍क अछि‍ जे जहानमे आनंद देवामे सक्षम होइछ ओकर अपन जीवन व्‍यथि‍त भऽ जाइत अछि‍। एहि‍ प्रकारक दर्शन भेल “शीतल बसात” कवि‍तामे। वृक्ष दोसरकेँ शीतलता दैत अछि‍ परंच ओकर पात भूखण्‍डपर खसि‍ते अस्‍ति‍त्‍व वि‍हीन भऽ जाइत अछि‍। पतझड़ि‍क बाद वसन्‍त, फेरि‍ पतझड़ संगहि‍ रौद क्षणहि‍मे छॉह ई तँ प्रकृति‍क लीला अछि‍। मि‍थि‍लाक भूखण्‍डमे आमक गाछी बूढ़ पुरानक संग-संग बाल बोधक लेल गरमीक पि‍कनि‍क केन्‍द्र होइत अछि‍। भोज कोनो छप्‍पन प्रकारक भोज्‍य पदार्थक नहि‍, टि‍कुला आ झक्‍काक भोज। गरमी छुट्टीमे गामक प्रवासक ज्‍योति‍ जीक अनुभव नीक बुझना जाइत अछि‍।
“एकटा भीजल बगरा‍” कवि‍ता पढ़ि‍ हि‍न्‍दी साहि‍त्‍यक महान लेखि‍का महादेवी वर्मा जीक लि‍खल “गि‍ल्‍लू‍” कथा मोन पड़ि‍ गेल। ओहि‍ कथामे वर्माजी एकटा लुक्‍खीक पीड़ाक वर्णन करैत ओकरा आत्‍मसात कऽ लैत छथि‍, तहि‍ना ज्‍योति‍ जी एकटा चि‍ड़ैक प्रति‍ सि‍नेहक जे भाव देखा रहल छथि‍ ओ “सर्वे भवन्‍तु सुखि‍त:‍” सि‍द्धान्‍तक द्योतक बुझना गेल। “हम एकटा मध्‍य वर्गक वालक‍” वाल साहि‍त्‍यपर आधारि‍त कवि‍ता अछि‍। वाल मनोवि‍ज्ञानक संग एकरा वाल गृहवि‍ज्ञान सेहो मानल जा सकैत अछि‍, मुदा एहि‍ कवि‍तामे प्रवाहक अभाव देखए मे आएल। शब्‍दकेँ तुकांत वनएवाक क्रममे मूल भावक प्रति‍ अनाकर्षक देखए मे आबि‍ रहल अछि‍। “टाइम मशीन‍” कवि‍तामे आर्य भूमि‍क दृष्‍टि‍कोण आ पाश्‍चात्‍य देशक व्‍यवस्‍थासँ तुलना नीक लागल। वि‍लासि‍ताक प्रति‍ हमरा सबहक समर्पण परतंत्रताक रूपमे परि‍णति‍ भेल आ हम सभ सगरो क्षेत्रमे पंगु भऽ गेलहुँ। मि‍ठगर रौद, पहि‍ल फुहार आ वरसातक दृश्‍य कवि‍तामे प्रकृति‍ वर्णन सामान्‍य रूपसँ कएल गेल अछि‍। एहि‍ प्रकारक कवि‍तासँ हमर साहि‍त्‍य ओत-प्रोत अछि‍। एहि‍ प्रसंगमे कि‍छु नव नहि‍ देखए मे अाएल। जीवन सोपानमे जीवनक क्रमि‍क गति‍क छंदसँ भरल प्रस्‍तुति‍ सेहंति‍त अछि‍। “प्रतीक्षासँ परि‍णाम धरि‍‍” जीवन-दर्शनपर आधारि‍त ज्‍योति‍ जीक सोहनगरक कवि‍ता अछि‍। हमरा बुझने ई कवि‍ता एहि‍ पोथीक सभसँ वि‍लक्षण अध्‍याय थि‍क। श्रीमद्भगवतगीता आ शेष महाभारतक आधारपर कृष्‍ण चरि‍तक वर्णनसँ कवयि‍त्रीकेँ सि‍द्धहस्‍त मानल जा सकैछ। द्वापरसँ कलि‍मे प्रवेश नि‍श्‍चि‍त रूपेँ कवयि‍त्रीक वि‍स्‍तृत अध्‍ययन आ अनुशीलनक छाया देखा रहल अछि‍।
“इन्‍टर नेट स्‍वयंवर‍” वि‍याहक नव रूपक चि‍त्रण कऽ रहल अछि‍। वैदि‍क कालमे आठ प्रकारक पाणि‍ग्रहण व्‍यवस्‍था छल। वर्तमान समएमे इंटरनेट चैटि‍ंगसँ वि‍याह करवाक प्रणालीमे ठक व्‍यवस्‍था अछि‍ तेँ कवयि‍त्री जकरा वि‍नु देखने प्रेम करवाक नाटक कएलनि‍ ओ पुरूष नहि‍ स्‍त्री अछि‍। क्षि‍ति‍जक साक्षात दर्शनमे प्रवाहक पयोधि‍ गति‍शील अछि‍ मुदा रचनामे तारतम्‍यक अभाव देखि‍ रहल छी। हि‍म आवरि‍त आ मेघाच्‍छादि‍त सन शब्‍द तँ नि‍योजि‍त अछि‍ मुदा जखन हमरा सबहक भाषामे शब्‍द वि‍न्‍यासक अभाव नहि‍ तखन एहेन तद्भवक चयन करव नीक नहि‍ लागि‍ रहल अछि‍। जौं एहि‍ कवि‍तामे देसि‍ल वयनाक मूल शब्‍दक प्रयोग करि‍तथि‍ तँ कवि‍ताक रूप वेसी नीक जएवाक भऽ संभावना छल।
महावतक हाथी, वि‍द्या धन, वर्फ ओढ़ने वातावरण आ गामक सूर्यास्‍त कवि‍ता तँ नीक अछि‍ मुदा एकर वि‍म्‍व कोनो नव नहि‍ सभटा वएह पुरना कवि‍क रचना सबहक रूप देखए मे आएल मुदा दृष्‍टि‍कोण हि‍नक अपन अछि‍, ककरो रचनाक नकल नहि‍ कएने छथि‍। वि‍शाल समुद्रमे जलोधिक‍ छोट मुदा प्रासंगि‍क प्रस्‍तुि‍त नीक लागल। आधुनि‍क जीवन दर्शन कवि‍ताक वि‍म्‍व तँ नीक लागल मुदा वि‍वेचन पक्ष दुर्वल भुझना गेल। मनुष्‍य आ ओकर भावनामे जीवनक वर्तमान रूपक अन्‍वेषण उद्धेश्‍यपूर्ण अछि‍। हम्‍मर गाम कवि‍तामे गामक जि‍नगीक जीत दर्शनीय अछि‍। वि‍कासमे मूल प्रकृति‍क रूपकेँ वैज्ञानि‍क दृष्‍टि‍सँ परि‍वर्तनक प्रयाससँ नि‍कलैत परि‍णामक वर्णन कएल गेल अछि‍। वालश्रम वर्तमान समाजमे कुष्‍टक रूप लऽ लेने अछि‍। साधनक अभावमे हम सभ नेनाक शैशव कालकेँ वि‍सरि‍ अवोधपर मानसि‍क आ शारीरि‍क अत्‍याचार करैत छी। मि‍थि‍लामे बाढ़ि‍क परि‍णाम आ प्रलयक रूप मेघक उत्‍पात आ वरखा तूँ कहि‍या जेवैं कवि‍तामे देखि‍ रहल छी। “‍ईशक अराधना” शीर्षक कवि‍तामे कर्म शक्‍ति‍क अवाहन कएल गेल अछि‍। एहि‍ कवि‍ताक वि‍म्‍व नीक, प्रवाह कलकल आ भाषा सरल अछि‍। एहि‍ प्रकारक शब्‍द वि‍न्‍यासक मैथि‍लीमे आवश्‍यकता अछि‍। “खरहाक भोज‍” शीर्षक कवि‍तामे आन जीवसँ मनुष्‍यक तुलना नीक लागल। वौद्धि‍क रूपसँ वि‍कसि‍त मानवकेँ कर्म आ धैर्यपर वि‍श्‍वास रखवाक चाही, आन जीवक जीवन-उद्धेश्‍य भोजन मात्र होइत अछि‍। कल्‍पना तखने साकार भऽ सकैत अछि‍ जखन शि‍क्षाक विकास हएत, एहि‍ प्रकार दृष्‍टि‍कोण कल्‍पना लोककेँ समृद्धि‍ दऽ सकैत अछि‍। कोशीक प्रकोप कवि‍ताक वि‍म्‍व वर्तमान कालक एकटा पैघ समस्‍याकेँ उद्घृत कऽ रहल अछि‍। “‍असल राज आ पतझड़क आगमन” कवि‍ताक वि‍षय वस्‍तु सामान्‍य मुदा नीक लागल। वृद्धक अभि‍लाषामे प्राकृति‍क संतुलनकेँ ध्‍यानमे राखि‍ नव पि‍रहीक लेल सृजनशीलताक क्रममे वृक्षारोपनपर वल देल गेल अछि‍।
“टेम्‍स धारमे नौका वि‍हार‍” कवयि‍त्रीक वास्‍तवि‍क जीवन रेखाक वि‍न्‍दु लंदनसँ अपन ठामक तुलनापर आधारि‍त अछि‍। टेम्‍सक धारमे नौका वि‍हार करऽ वालीकेँ अपन चनहा कोना मोन पड़ि‍ गेलनि‍, नि‍श्‍चय आन ठामक नीक व्‍यवस्‍था देखि‍ हमरा सभकेँ अपन पि‍छड़ल दशापर मर्म होइत अछि‍। कतहु-कतहु कि‍छु दुर्वल वि‍न्‍दु रहलाक वादो एहि‍ संग्रहकेँ खूब नीक मानल जा सकैत अछि‍। कवयि‍त्री कखनो द्वापर युगमे चलि‍ जाइत छथि‍ तँ कखनो चैटि‍ंग वि‍याहक अनुसंधानक आधुनि‍क युगमे। समग्र कवि‍ता संग्रहमे कि‍छु स्‍थानकेँ छोड़ि‍ वि‍षय वस्‍तु चयन नीक लागल। वर्तमान युगक नवतुरि‍या पि‍रहीसँ एतेक आश नहि‍ छल। नि‍श्‍चय ज्‍योति‍ जी धन्‍यवादक पात्र छथि‍।
शेष...अशेष
पोथीक नाम- अर्चिस
रचयि‍ता- श्रीमती ज्‍योति‍ सुनीत चौधरी
दाम- १५० टका
प्रकाशक- श्रुति‍ प्रकाशन
प्रकाशन वर्ष- २००९
२.
डॉ. शेफालिका वर्मा - प्रीति ठाकुर क मैथिली चित्रकथा
प्रत्येक भाषा में किछ एहेन रचनाकार होयत छथि, महिला वाकि पुरुष-वर्ग, अपन विलक्षण प्रतिभा के कारन सब से फराक बुझा पडैत छैथ . ई दोसर बात थीक की आलोचक वर्ग महिला लेखन के इतिहासक पन्ना के एकटा कोन द दैत छैथ . किछ भाग्यशाली लेखिका के किछ स्थानों भेटि जायत छैक ,मुदा ,समग्रता में नै. लेखन में महिला पुरुष नै होयत छैक, जे विषय पर लेखक लिखैत छैथ , ओहि पर लेखिका सेहो लिखैत छैथ, कखनो बेसी नीक,.बस, आब एकेटा प्रतीक्षा ऐछ जे कोनो सशक्त महिला आलोचक के देखी, जे महिला नै भै मात्र आलोचक रहैथ,पूर्वाग्रह से रहित नीक आलोचना के जन्म दैत. मैथिली साहित्यक इतिहास में चारि चान लगावैथ, हम जनैत छी एहेन विद्वान लेखिकाक कमी नै ऐछ......
आय प्रीति ठाकुर क मैथिली चित्रकथा, गोनुझा पर पोथी देखी चमत्कृत भ गेलों . पहिने ते हम मैथिलीक नेना भुटका लेल कोमिक्स बुझ्लों, मुदा पढे लगलों ते एकरा में डूबी गेलों. गागर में सागर===अद्भुद ..मैथिली लोकगाथा क विपुल संसार के शिव क जटाजूट जकां कोना समेटी लेने छैथ,ई पढला उप्रानते बुझा पडत. कतेक कथा क खाली नाम सुनने छलों , ओ सब एहि पोथी में साकार छल. जहिना आजुक समाज अकबर बीरबल के बिसरि रहल अछ ,ओहिना गोनू झा के.
प्रस्तुत पोथिक माध्यम स पाठक अपन समाज क सब वर्ग के आदर्श के चीन्ही सकैत छैथ
प्रीति जी के अशेष शुभकामना एतेक सुन्दर पोथी लेल , प्रीति जी आ गजेन्द्र जी से हम एकटा आग्रह करवैक जे कोसी नदी लेल बड खिस्सा कथा समाज में पसरल छैक, ओकरो चित्रकला में समेटी लैथ. कोसी नदीक रहस्यमय चरित्र, सिंघेश्वर बाबा से विवाह आदि, आदि खिस्सा सब.....जहिना समाज क प्रत्येक क्षेत्र में नारी आय निरंतर आगू बढ़ी रहल छथि , ओहिना मैथिली मिथिलाक विकास में आजुक नारी अपन अपन स्तर से अमूल्य योगदान द रहल छथि. अशेष साधुवाद, प्रीति जी ,असंख्य शुभाशंसा .........
३.राजदेव मंडल
मुसहरनि‍याँ, मधुबनी।
कुरूक्षेत्रम अन्‍तर्मनक लेल पत्र-
शेष अंश
कथा गुच्‍छ- (कथा संग्रह) कथा सभकेँ पढ़लहुँ जे गल्प गुच्‍छमे संग्रहि‍त अछि‍। पढ़ैत काल स्‍मरण भेल- एनसाइक्‍लोपीडि‍या ब्रि‍टेनि‍का कि‍छु शब्‍द- कथा स्‍वतंत्र वि‍धा अछि‍। एहिमे संक्षि‍प्‍ताक संगहि‍ अत्‍यधि‍क संगठि‍त तथा पूर्ण कथा रूप हेबाक चाही।
ओना जि‍नगी कथा अछि‍ आ कथा जीनगी अछि‍। आ जीनगी जे नि‍रन्‍तर नवीनताकेँ प्राप्‍त कऽ रहल अछि‍।
गप्‍ल गुच्‍छ पढ़ैत काल जे कथा वा पाँति‍ बेसी प्रभावि‍त कएलक ओहि‍ सबहक वि‍षयमे कहब आवश्‍यक बुझाइत अछि‍। नीक-अधलाह कहबाक अधि‍कार तँ पाठककेँ होइते अछि‍।
नव सामन्‍त- आब सामन्‍तबादी युग नहि‍ रहल। कि‍न्‍तु सामन्‍ती प्रवृति‍ एखनो जीअते अछि‍। हँ, ओकरा रूपमे परि‍र्वन भऽ गेल अछि‍। आ ओ भि‍न्न-भि‍न्न रूपे समाजमे आइयो दृष्‍टि‍गोचर भऽ गेल अछि‍। एहि‍ कथामे एकटा नव सामन्‍तक नवीन रूप लक्षि‍त भऽ रहल अछि‍।
सर्वशि‍क्षा अभि‍यान- कथाक माध्‍यमसँ दलि‍त आ गरीबक धीया-पुताकेँ पढ़ेबाक लेल उदासीनताक भावना व्‍यक्‍त भेल अछि‍। सरकार द्वारा मुफ्तमे देल गेल पोथी अदहरमे बेचि‍ लैत अछि‍। कथाक पाँति‍- “आ दुसाधटोली, चमरटोली आ धोवि‍याटोलीसँ सभटा कि‍ताव सहटि‍ कऽ नि‍कलि‍ गेल।‍”
थेथर मनुक्‍ख- एहि‍ कथासँ स्‍पष्‍ट होइत अछि‍ जे मनुक्‍खक पूर्ण अद्य:पतन भऽ गेल अछि‍। एतेक जे मनुक्‍ख चि‍ड़ई-चुनमुनी, परबा पौरकी धरि‍सँ नीचा उतरि‍ थेथर भऽ गेल अछि‍।
स्‍त्री-बेटा- एहि‍मे समाजमे स्‍त्रीगणक महत्‍वहीनता आ संगहि‍ करवट लैत सामाजि‍क स्‍थि‍ति‍-परि‍स्‍थि‍ति‍ चि‍त्रण भेल अछि‍।
वि‍आह आ गोरलागइ- झण-झणमे मनुक्‍खक बदलैत रँग गि‍रगि‍टा जकाँ...... आ दहेजक लोभी बेकती संतोषी सन बेवहार देखा कऽ स्‍वयं लज्‍जि‍त होइत छथि‍। आइयो कोन कोन रूपेँ दहेज लोभी दबकल अछि‍ समाजमे आ कोन-कोन प्रपंची चालि‍ चलि‍ रहल अछि‍। से एहि‍ कथासँ बुझाइत अछि‍। नीक चि‍त्रण भेल अछि‍।
प्रति‍भा- चालाकी आ प्रति‍भा दुनू अलग-अलग बात छैक। प्राप्‍ति‍क लेल दुनूमे सँ कोन महत्‍वपूर्ण सएह देखेबाक यत्‍न भेल अछि‍।
मि‍थि‍ला उद्योग- कि‍छु कथाक कोनो गप्‍प पाठककेँ दीर्घकाल तक झंकृत कएने रहैत अछि‍। एहि‍ कथामे गदहापर लादल जे संदेश भेटि‍ रहल अि‍छ से बहुत दि‍न धरि‍ पाठककेँ स्‍मरणमे रहत।
रकटल छलहुँ कोहबर लय- स्‍त्री-पुरूषक बीच बनैत-बि‍गड़ैत सम्‍बन्‍ध आ छल-प्रपंच अपने-आपकेँ ठकइ आ ठकाइबला गप्‍पक मार्मिक वि‍श्‍लेषण एहि‍ कथा द्वारा भेल।
हम नहि‍ जाएव वि‍देश- कोन बेकतीकेँ हृदयमे कतेक कष्‍ट-पीड़ा आ हँसी-खुशी भरल अछि‍। ओकरा पूर्णतया उत्‍खनन करनाइ सम्‍भवो नहि‍ अछि‍ तथापि‍ कथाकार तँ प्रयास करबे करता। एहि‍ कथामे द्वि‍जेन्‍द्रक मोनक व्‍यथाकेँ कथा पूर्णरूपेण उजागर भेल अछि‍।
एकटा पाँति‍- “कोन सरोकार माएसँ पैघ छल यौ लाल। जे अहाँ कहैत छी जे हम ककरोसँ सरोकार नहि‍ रखने छी।‍”
राग बैदेही भेरवी- एहि‍ कथामे एकटा कलाकारक जीनगीपर रोशनी देल गेल अछि‍। कोना एकटा साधारण गामक गबैया सुख-दुख, सफलता आ वि‍फलतासँ लड़ैत उच्‍चताकेँ प्राप्‍त कएलक तकर वि‍शद वर्णन भेटैत अछि‍।
बाढ़ि‍ भूख आ प्रवास- हास्‍य-व्‍यंग्‍यसँ पूर्ण कथा अछि‍। लघु आकारक रहि‍तहुँ ई कथा बहुत रास गप्‍पकेँ समेटने अछि‍। भूख आ भूखक कारणे उठैत मनक तरंग आ ओहि‍ कारणे बेकती कतऽ सँ कतए प्रवास करैले जाइत अछि‍। आ ओहो स्‍थानपर कोना आशापर तुषारपात होइत अछि‍। एहि‍ पाँति‍केँ पढ़लासँ स्‍वत: हास्‍य उपस्‍थि‍त भऽ जाइत अछि‍। “सरकार हम तँ ट्रेनसँ आएल छी मुदा अहाँ कोन सवारीसँ अएलहुँ जे हमरासँ पहि‍नहि‍सँ वि‍राजमान छी।‍”- बैदि‍क जी अल्‍हुआसँ हाथ जोड़ि‍ कहैत अछि‍।
नूतन मि‍डि‍या- आधुनि‍क मि‍डि‍या कोन तरहेँ चलि‍ रहल अि‍छ। से उजागर भेल अछि‍।
जाति‍-पाति‍- एहि‍ कथाकेँ पढ़लाक बाद पाँति‍ याद अबैत अछि‍- “देखनमे छोटन लागै जाति‍ पाति‍क दंश‍”
बहुपत्‍नी वि‍याह आ हि‍जड़ा- एहि‍ कथामे एकसँ अधि‍क पत्‍नी कएलासँ जे समाजमे सड़ांध पैदा भऽ रहल अछि‍। कोन-कोन रूपेँ ओकर बि‍कार नि‍कलैत अछि‍ तकर वर्णन भेल अछि‍। कि‍छु पाँति‍- “‍...भाति‍ज सभकेँ नहि‍ मानैत छि‍ऐक तैं भगवान बच्‍चा नहि‍ देलन्‍हि‍।”
बाणवीर- एहि‍ कथामे बाणवीरक मनोि‍वश्‍लेषण नीक जकाँ भेल अछि‍। समूहसँ कटल बाणवीर कतेक अथाह पीड़ामे संघर्ष करैत जीनगीक एक-एक पल कटैत रहैत अछि‍ से कथासँ स्‍पष्‍ट भऽ जाइत अछि‍। बाणवीरक एहि‍ कथनमे कतेक मर्म छि‍पल अछि‍- “माए बाबू! हमरा बुझल अछि‍ जे हमर बि‍याह दान नहि‍ होएत। मुदा अपन पेट तँ कोहुना हम गाममे भरि‍ए लैत छी। गुजर तँ कइए लैत छी। लोक सभ कहैत रहए जे तोहर माए-बाप तोरा बेचि‍ देलकउ। से ठीके अछि‍ की?‍”....कन्नारोहट उठि‍ गेल।
अनुकप्‍पाक नोकरी- लोककेँ बाप मरलापर नोकरी भेटैत छैक। हुनका भाएक मरलापर भेटलन्‍हि‍। एहि‍ कथाक सार अछि‍।
मृत्‍युदंड- कथाक द्वारा देखाओल गेल अछि‍ जे कोना बालि‍का आर्याकेँ मृत्‍युदंड मि‍ल जाइत अछि‍ जेकर कोनो दोष नहि‍ छल। बेगुनाहकेँ दण्‍ड। सेहो मृत्‍युदंड। एहेन अछि‍ एहि‍ठामक समाज। जेकरा सहजताक संग स्‍वीकारो कऽ लेल जाइत अछि‍। एखनुक समाजक दरपन जकाँ कथा लगैत अछि‍।
एहि‍ तरहेँ गल्‍प गुच्‍छक कथा सभकेँ बाद बुझाइत अछि‍ जे वर्तमान समस्‍याकेँ यर्थाथ रूप प्रगट भेल अछि‍। छोट-छोट दृश्‍य खंड काव्‍यात्‍मक रूपसँ सोझा आएल अछि‍। कथावस्‍तुमे मि‍थि‍लाक माट-पानि‍क गंध अछि‍। कि‍छु कथा अत्‍यन्‍त लघु तथापि‍ उदेश्‍य प्रकट भऽ गेल अछि‍ जे सम्‍पूर्ण देशक यथार्थनाकेँ समेटने अछि‍।
सहस्‍त्रबाढ़नि‍ (उपन्‍यास)- प्राचीनकालहि‍सँ सहस्‍त्रबाढ़नि‍क वि‍षयमे उत्‍सुकताक संगहि‍ अनुमान कएल जाइत रहल अछि‍। अनुमानि‍त व्‍याख्‍या आ समीक्षा होइत रहल अछि‍। वि‍ज्ञान द्वारा अलग ढंगसँ आ साहि‍त्‍य तथा अध्‍यात्‍म द्वारा अलग-अलग ढंगसँ। अहाँक उपन्‍यासक पात्र एहि‍ सम्‍बन्‍धमे कहैत अछि‍-
“खसैत लहास, कनैत हुनकर सबहक परि‍वार। सपनामे अबैत रहल ई सभ सहस्‍त्रबाढ़नि‍क रूप बनि‍ कए। हमरे सन कोनो शापि‍त आत्‍मा अछि‍ ओ सहस्‍त्रबाढ़नि‍ जे अपन संघर्ष अधखि‍ज्‍जू छोड़ि‍ मरि‍ गेल होएत आ आब ब्रहमाण्‍डमे घुरि‍या रहल अछि‍। आब देखू तीनू बच्‍चाक परीक्षा परि‍णाम सभदि‍न प्रथम करैत अबैत रहथि‍, आब की भऽ गेलन्‍हि‍। हम जे संघर्ष बीचमे छोड़लहुँ तकर छी ई परि‍णाम।‍” नन्‍द हबोढ़कार भऽ कानए लगलाह।
एहि‍ पाँति‍केँ जँ गम्‍भीरतासँ आत्‍मसात करए लगलहुँ तँ मात्र नामेटा नहि‍ संगहि‍ उपन्‍यासक सारतत्‍व एवं उदेश्‍यो प्रगट भऽ गेल। नन्‍दक चरि‍त्र आर हुनका द्वारा कएल गेल संघर्षक रूप तथा मनक मनोवि‍ज्ञान स्‍पष्‍ट भऽ जाइत अछि‍।
उपन्‍यासक भाषा शैली नवीन ढंगक अछि‍। वर्णात्‍मक शैलीमे आरम्‍भ भेल अछि‍। भाषामे चि‍त्रात्‍मकताक एकटा उदाहरण- “एकदि‍न कलि‍तकेँ देखलहुँ जे ठेहुनि‍याँ दैत आगू जा रहल छथि‍। आंगनसँ बाहर भेलापर जतए आँकर-पाथर देखलन्‍हि‍ ततए ठेहुन उठा कऽ मात्र हाथ आ पाएरपर आगू बढ़ए लगलाह।‍”
कि‍छु एहि‍ तरहक शब्‍दक प्रयोगसँ भाषामे आकर्षण आबि‍ गेल अछि‍। जेना थाम्‍ह-थोम्‍ह, कानब-खीजब, काज-उद्यम, जान-पहचान, बूढ़-पुरान, घुमब-फि‍रब, टोका-टोकी, संगी-साथी, झगड़ा-झाँटी, तंत्र-मंत्र, पढ़ाइ-लि‍खाइ इत्‍यादि‍। उपन्‍यासक भाषा मैथि‍ली पाठककेँ अनुकूल अछि‍ जहि‍ना लोक बजैत छथि‍ तहि‍ना सहज ढंगसँ वर्णित अछि‍।
झि‍ंगूर बाबू, नन्‍द आ नन्‍दक भैया, भाति‍ज, बेटा, नवल जी झा, आरूणि‍ आ हुनक माए-बाबू, बहि‍न, कलि‍त आ हुनक पत्‍नी, शशांक, मणीन्‍द, भौजी, शौभा बाबू बुचि‍या इत्‍यादि‍ पात्रक माध्‍यमसँ कथावस्‍तु संगहि‍ चरि‍त्रक वि‍कास भेल अछि‍। जाहि‍मे मौलि‍कताक संगहि‍ स्‍वाभावि‍कता अछि‍। नव दृष्‍टि‍कोणसँ सहजताक संग चरि‍त्र सबहक वि‍कास भेल अछि‍। जे उपन्‍यासक अनुकूल अछि‍।
मि‍थि‍लाक नदी-कमला, कोशी, बलान अादि‍क वर्णन भेल अछि‍। संगहि‍ एहि‍ठामक गाम घर- झंझारपुर, मेहथ, गढ़ि‍या, कनकुआर, कछवी आदि‍ वर्णनसँ सहजहि‍ कथामे मि‍थि‍लाक माटि‍-पानि‍क गंध आबि‍ गेल अछि‍।
कथोपकथनमे संक्षि‍प्‍ता आ सहजता अछि‍। उदाहरण स्‍वरूप कि‍छु अंश देखल जा सकैत अछि‍।
‍आरूणि‍ दू-तीन कौर खा कऽ उठि‍ गेलहा। हुनकर संगी करण पुछलखि‍न्‍ह-
“पता नहि‍। घबराहटि‍ भऽ रहल अछि‍।‍”
“काल्हि‍ ट्रेनि‍ंगपर जएबाक अछि‍ ने। ताहि‍ द्वारे।‍”
“पता नहि‍।‍”
ताबत भीतरसँ अबाज आएल। सभ क्‍यो दौगलाह।
कथोपकथन जीनगी आ पात्रानुकूल अछि‍।
“की बजलहुँ बेटा‍”- माए पुछलखि‍न्‍ह।
“नहि‍। ई कॉलोनी देखि‍ कऽ कि‍छु मोन पड़ि‍ गेल।‍”
“नहि‍ देखू ई पपि‍याह कॉलोनीकेँ।‍”
उपन्‍यास मनोवि‍श्‍लेषणक संगहि‍ दर्शनसँ सेहो पुष्‍ट अछि‍।
“पृथ्‍वी वि‍शाल अछि‍ आ काल नि‍स्‍सीम, अनंत। एहि‍ हेतु वि‍श्‍वास अछि‍ जे आइ नहि‍ तँ काल्हि‍ क्‍यो न क्‍यो हमर प्रयासकेँ सार्थक बनाएत।‍”
आशाक संचार करएबला ई वाक्‍य बारम्‍वार मनमे उठैत अछि‍। जीनगीक संचालि‍त करबाक लेल तँ आवश्‍यक अछि‍ जीनगीक रस। वएह रस थि‍क- आशा। जँ जीनगीमे आशा, अभीप्‍सा नहि‍ होइ तँ जीवन नि‍रर्थक।
“आरूणि‍केँ लगलन्‍हि‍ जे ओ झोंटाबला सहस्‍त्रबाढ़नि‍ झमारि‍ कए एहि‍ वि‍श्‍वमे फेक दैत छन्‍हि‍ हुनक।‍”
कथीले कि‍छु कि‍एक से प्रश्‍न उठैत अछि‍ मनमे। यएह प्रश्‍न पाठककेँ बेर-बेर सोचैले मजबूर करैत अछि‍- बहुत रास गप्‍प। आ एक प्रश्‍नसँ जन्‍मैत अछि‍ बहुत प्रश्‍न जे पाठककेँ एकटा अलग संसारमे लऽ जाइत अछि‍।
मनुष्‍यक प्रवृति‍केँ सम्‍बन्‍धमे ई पाँति‍ देखल जा सकैत अछि‍- “मनुष्‍यक प्रवृति‍ये होइछ, समानता आ तुलना करबाक साम्‍य आ वैषम्‍यक समालोचना आ वि‍वेचनामे कतेक गोटे अपन जीनगी बि‍ता दैत छथि‍। आरूणि‍ आ नन्‍दक बीच सेहो अनायासहि‍ं साम्‍य देखल जा सकैत अछि‍।‍”
उपरसँ मानव भि‍न्न-भि‍न्न प्रवृति‍केँ होइत अछि‍। कि‍न्‍तु मूलमे गहराइसँ अन्‍वेषण कएल जाए तँ कि‍छु तलप सभ मनुष्‍य लगभग साम्‍य होइत अछि‍। अन्‍त:मे वएह रस नि‍:सृत होइत रहैत अछि‍। कि‍न्‍तु ओतेक शान्‍त भाव आ ओतेक गम्‍भीरतासँ स्‍वंयकेँ देखनाइ सहज गप्‍प तँ नहि‍ थि‍क।
उपन्‍यासक आकार लघु रहि‍तहुँ कथा वस्‍तुक पूर्ण वि‍कास भेल अछि‍। कथाक अनुकूल अछि‍ भाषाक संतुलि‍त ढंगसँ प्रयोग भेल अछि‍। नव वस्‍तुक नवीन दृष्‍टि‍कोणसँ अभि‍व्‍यक्‍ति‍ भेल अछि‍। मौलि‍कतासँ पूर्ण अछि‍।
वर्तमानमे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक प्रगति‍क लेल अहाँ सन बेकतीकेँ आवश्‍यकता अछि‍। जे एकभगाह होइत मैथि‍लीकेँ संंतुलि‍त करता आ संगहि‍ स्‍वयं तँ अग्रसर होएबे करताह दोसरोकेँ आगू बढ़बाक सुअवसर देताह। एहि‍ दृष्‍टि‍कोणसँ अहाँक प्रयास अवर्ण्‍य अछि‍।
एकटा पाँति‍ स्‍मरण भऽ गेल-
अहीं सन मैि‍थली सेवकपर
अछि‍ हमरा सबहक आस
भरब भण्‍डार मैथि‍लीक
अछि‍ पूर्ण वि‍श्‍वास।
४.
धीरेन्‍द्र कुमार
प्री‍ति‍ ठाकुरक दुनू चि‍त्रकथापर धीरेन्‍द्र कुमार एक नजरि‍-
मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे पहि‍ल बेर श्रुति‍ प्रकाशन, नई दि‍ल्‍लीसँ प्रकाशि‍त ि‍चत्रकथा उमेश जीक माध्‍यमसँ भेटल। साहि‍त्‍य पूर्ण तखने होइत अछि‍ जखन साहि‍त्‍य सभ वि‍धामे लि‍खल जाए आ रचना प्रौढ़ होइ। हमर दृष्‍टि‍मे चि‍त्रकथामे प्रीति‍ ठाकुरक रचना मैथि‍ली लोक-कथा आ गोनु झा आन मैथि‍ली ि‍चत्रकथा, सफल रचना थीक।
लेखि‍का धन्‍यवादक पात्र छथि‍, एहि‍ कारणे जे मैथि‍ली दि‍सि‍ हुनक दृष्‍टि‍ गेलनि‍। दोसर कारण ई जे मैथि‍लीक वि‍रासतमे जे कथा लोकमुखमे सुरक्षि‍त अछि‍ तकरा ओ लेखनि‍क रूप प्रदान कऽ मैथि‍लीक चि‍त्रकथा वि‍धा जे नगण्‍य सन अि‍छ- ताहि‍केँ समृद्ध करक प्रयास केलनि‍ अछि‍।
मैथि‍ली चि‍त्रकथामे ‘मोती दाइ, राजा सजहेस, बोधि‍-कायस्‍थ, बहुरा गोढ़ि‍न नटुआ दयाल, अमता घरेन, दीना भदरी, जालि‍म सि‍ंह, नैका बनि‍जारा, रघुनी मरड़, वि‍द्यापति‍क आयु अवसान आ गोनु झा आ आन मैथि‍ली चि‍त्रकथामे प्रकाशि‍त अछि‍ ‘गोनु झा आ माँ दुर्गा, गोनु आ स्‍वर्ग, गोनु आ स्‍वर्ण चोर, गोनु झा आ वि‍लाड़ि‍, गोनु झाक दूटा बरद, गोनु झाक महीस, गोनु झाक अशर्फी, गोनु झा आ कर अधि‍कारीक दाढ़ी, गोनु झाक माए, रेशमा चूहड़मल, नैका बनि‍जारा, भगता ज्‍योति‍ पजि‍यार, महुआ घटबारि‍न, राजा सलहेस, छेछन महराज, राजा सलहेस आ कालि‍दास।
सभटा कथा मि‍थि‍लाक धरतीसँ सम्‍बद्ध अछि‍ आ एखन धरि‍ लोक मुखमे सुरक्षि‍त अछि‍। समैएक परि‍वर्तन संगे लोक रूचि‍ आ लोक संस्‍कारमे परि‍वर्त्तन सेहो होइत अछि‍। अपन देशक गप्‍प लिअऽ। आइ पोथीमे सुरक्षि‍त अछि‍ आयुर्वेद वि‍द्या, यूनानी वि‍द्या, होमयोपैथी आ कतेक रास ज्ञानसँ समर्पित वि‍द्या। जँ पोथीमे सुरक्षि‍त नहि‍ रहत तखन अगि‍ला पीढ़ी एहि‍ वि‍द्यासँ अनभि‍ज्ञ रहि‍ जाएत। तेँ हमर मि‍थि‍लामे जे कथा पसरल अछि‍ ओकरा पोथी स्‍वरूपमे प्रदान कऽ प्रीति‍ ठाकुर जी प्रशंसनीय काज केलनि‍ अछि‍। वीरवलक कथा भऽ सकै छल जे लोक वि‍सरि‍ जाइत मुदा पोथी स्‍वरूपमे रहलासँ आइ धरि‍ ओ लोक-मानसक रंजनक माध्‍यम बनल अछि‍।
चि‍त्रकथाक अपन महत्‍व होइत अछि‍। वाह्य-सँप्रेषणसँ जे प्रभाव वंचि‍त रहि‍ जाइत अछि‍ ओ सँप्रेषि‍त होइत अछि‍ चि‍त्रसँ। नाटकमे अभि‍नयसँ जे सँप्रेषि‍त नहि‍ होइत अछि‍ ओ सँप्रेषि‍त अछि‍ रंग, ध्‍वनि‍ आ प्रकाशसँ तहि‍ना चि‍त्रकथामे सेहो होइत अछि‍। प्रसुत आलोच्‍य पोथीक चि‍त्र सशकृ अछि‍।
वाल साहि‍त्‍य लेल ई काज प्रति‍ जीक सराहनीय छन्‍हि‍। चारि‍ वर्खक नेना जेकरा अक्षर बोध नहि‍यो छै सेहो कथाकेँ परेख सकैए। चि‍त्रक माध्‍यमसँ। वाल साहि‍त्‍यक जे अभाव अपना मैथि‍लीमे अछि‍ ताहि‍पर बड़का-बड़का वि‍द्वानक अछैत थोड़ेकवो ध्‍यान नहि‍ देल गेल छल आ खास कऽ एहि‍ तरहक।
पोथी आकर्षक, रूचि‍कर आ बालमनकेँ प्रभावि‍त करैत अछि‍। एहि‍ लेल हम फेर एक वेर श्रीमती प्रीति‍ ठाकुरकेँ धन्‍यवाद दैत छि‍एनि‍। संगे आशा करब जे आगाँ सेहो एहि‍ तरहक काज करथि‍।
धीरेन्‍द्र कुमार
नि‍र्मली, सुपौल, वि‍हार।
नवेन्दु कुमार झा १. राहुलक मिशन बिहारसँ बढ़ल सत्ता आ विपक्षक परेशानी:मिथिलांचलक भूमिसँ कांग्रेसक युवराज कएलनि चुनावी शंखनाद २. दू वर्ष पूरा कएलक मैथिली दैनिक मिथिला समाद
१.
राहुलक मिशन बिहारसँ बढ़ल सत्ता आ विपक्षक परेशानी:मिथिलांचलक भूमिसँ कांग्रेसक युवराज कएलनि चुनावी शंखनाद
अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटीक महासचिव राहुल गाँधी मिथिलांचलसँ कांग्रेसक चुनावी अभियान प्रारम्भ कऽ सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धनक घटक भाजपा आ जद यू तथा विपक्षी राजद-लोजपा गठबंधनक बेचैनीकेँ बढ़ा देलनि अछि। पछिला दू दशकसँ प्रदेशक राजनीतिमे कतिआएल कांग्रेसक युवराज श्री गाँधी मिशन बिहारक अन्तर्गत पार्टीक नेता सभकेँ सक्रिय कएने छथि। एहिसँ पहिनहु श्री गाँधी बिहारक दौरापर आएल छलाह तँ मिथिलांचलक हृदयस्थली दरभंगाक दौराक बिहार राजनीतिक हबा-बयार नेने छलाह। हुनक ओहि दौराक बाद प्रदेशमे कांग्रेसक प्रति आकर्षण बढ़ल अछि। संगहि युवा कांग्रेसक पदाधिकारीक मनोनयनक जे परम्परा छल ओकरा समाप्त कऽ सीधा चुनाव जे करौलनि एहिसँ प्रखण्ड स्तरसँ प्रदेश स्तर धरि युवा नेताक नव समूह ठाढ़ भेल अछि आ ई कांग्रेसक भविष्यक रूपमे अछि।
श्री गांधीक बिहार दौराक संगहि प्रदेशमे चुनाबी अभियान प्रारम्भ भऽ गेल। ओ अपन एक दिवसीय दौराक क्रममे कोसी क्षेत्रक सहरसा आ समस्तीपुरमे जनसभाकेँ संबोधित कएलनि। श्री गांधी एहि दरमियान पूरा तरहे युद्धक लेल तैयार बुझि पड़लाह। ओ एक दिस मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आ हुनक सरकारपर हमला कएलनि तँ दोसर दिस एहि बेरक चुनावमे महत्वपूर्ण भूमिकाक निर्वाह करबाक लेल तैयार युवा पीढ़ीकेँ संग जोड़बाक प्रयास सेहो कएलनि। ओ स्वीकार कएलनि जे बिहारमे एखन कांग्रेस कमजोर अछि। मुदा एहि लेल बेसी चिन्ता नहि करबाक अछि। ओ कहलनि जे उत्तरप्रदेशमे सेहो हम जखन प्रयास प्रारम्भ कएने छलहुँ तँ लोक हँसी उड़ौने छल। ओ जनताकेँ विश्वास देऔलनि जे किछु समए तँ जरूर लागत मुदा जमीनी स्तरक समस्या आ गाम घरक बात पटना धरि जरूर पहुँचत। ओ युवा दिस संकेत करैत कहलनि जे बिहारमे जे पछिला बीस वर्षसँ परिस्थिति बनल अछि ओकरा बदलबाक लेल आगाँ आबथि आ एकटा युवा सरकार बनाबथि। एहि लेल युवाकेँ आगाँ आनल जाएत आ थकल लोककेँ कतियाकऽ एकटा विकसित बिहार बनाओल जाएत।
कांग्रेस महासचिव एहि दौराक बाद राजनीतिक बजार गर्म होएब स्वाभाविक अछि। दरअसल एहि बेर राजनीतिक गठजोड़ आर मजगूत भऽ रहल अछि। ओना मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विकासक मुद्दापर चुनाव लड़बाक बात कहि रहल छथि मुदा ओ भीतरे-भीतर महादलित आ अति पिछड़ाक रूपमे एकटा नव वोट बैंक तैयार कऽ राजद आ लोजपा गठबंधनकेँ चुनौती दऽ रहल छथि तँ दोसर दिस राजद आ लोजपाक पी एम आर वाइ समीकरणक माध्यमसँ जद यू आ भाजपाक मोकाबला करबाक स्थितिमे अछि। एहि राजनीतिक समीकरणक मध्य जे सभसँ महत्वपूर्ण भऽ गेल अछि ओ अछि सवर्ण मतदाता, जाहिपर भाजपा-जद यू आ राजद-लोजपा दुनूक अछि आ कांग्रेसक एहि वर्गमे भऽ रहल घुसपैठ दुनू गठबंधनक लेल खतराक घंटी बनि गेल अछि।
राहुल गाँधीक किछु मास पहिने भेल बिहार दौराक केन्द्रमे युवा शक्ति छल आ ओ सभ ठाम युवा सभसँ सीधा संवाद कएलनि। एकर परिणाम सेहो सोझाँ आएल अछि। बिहारमे पछिला बीस वर्षसँ घेराएल पंजा छापबला झण्डा एखन गामे-गाम देखल जा रहल अछि। एकर अर्थ ई नहि जे कांग्रेस सरकार बनेबाक स्थितिमे आबि गेल अछि। मुदा वर्तमान राजनीतिक हवा जे चलि रहल अछि आ ई चलैत रहल तँ अगिला विधान सभाक चुनावमे कांग्रेस सत्ता सन्तुलन करबाक स्थितिमे अवश्य रहत। पार्टीक सूत्रसँ जे जनतब भेटि रहल अछि ओ संकेत करैत अछि जे पार्टी आलाकमान एहि बेर गोटेक १३० सीटपर गम्भीर रूपसँ चुनाव लड़त आ बाकी बाँचल ११३ सीटपर ओ अपन शक्ति बढ़ेबाक लेल चुनाव लड़त। कांग्रेसक ई रणनीति राजग आ राजद-=लोजपाक लेल खतरा बनि सकैत अछि। ओना बेसी खतरा भाजपा आ जद यू गठबन्धनकेँ अछि। एकर परिणाम सेहो सोझाँ आबि गेल अछि। लोकसभा चुनावमे कांग्रेस कतिया गेल छल मुदा ओकर बाद भेल विधानसभाक उप चुनावमे अठारह सीटपर एसगर लड़ि दूटा सीटपर विजय प्राप्त कऽ भाजपा-जद यू केँ कतिया देलक जकर लाभ राजद आ लोजपाकेँ भेल।
बिहार प्रदेश कांग्रेसक राहुल गाँधीपर भरोसा अछि तँ राहुलक नजरि बिहारक युवापर अछि। जातिक मजगूत राजनीतिबला एहि प्रदेशमे कांग्रेसक रणनीतिक अनुरूप जातीय हवा चलल तँ एहि बेरक विधान सभा चुनावमे बिहारक युवा राहुलक लेल आगाँक रस्ता तैयार कऽ सकैत छथि।

दू वर्ष पूरा कएलक मैथिली दैनिक मिथिला समाद:
दू वर्ष पहिने कोसी क्षेत्रमे कुसहाक टूटल तटबन्धसँ भेल प्रलयक बाद एहि क्षेत्रक दशा-दिशा बदलि गेल छल तँ एहि दुर्दशाक अबाज बनि कऽ देशक पहिल मैथिली दैनिक “मिथिला समाद” सोझाँ आएल। ३१ अगस्त २००८ केँ प्रवासी मिथिला समाजक प्रयासक बाद एहि दैनिकक प्रकाशन मैथिली पत्रकारिताक एकटा नव अध्याय प्रारम्भ कएलक। एहि दैनिककेँ मैथिलीभाषीक भेटल स्नेहक बदौलति निर्बाध रूपेँ प्रकाशित होइत दू वर्ष पूरा करएमे सफलता भेटल। मैथिली पत्रकारिताक शून्यताकेँ तोड़ि मिथिलांचल आ प्रवासी मिथिला समाजक जन समस्याकेँ सोझाँ अनबाक लेल सतत प्रयत्नशील अछि। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी मैथिलीकेँ संविधानक अष्टम सूचीमे सम्मिलित कऽ सम्मान देलनि तँ पत्रकारितासँ जुड़ल कोलकाताक राजेन्द्र नारायण वाजपेयी मैथिली भाषामे ताराकान्त झाक सम्पादकीय दायित्व मिथिला समादक प्रकाशन कऽ एहि भाषाक मान बढ़ौलनि अछि।
मैथिलीमे दैनिक समाचार पत्रक प्रकाशन हो एहि लेल बिहारक राजधानी पटना आ मिथिलांचलमे कतेको बेर मंथन भेल मुदा ओकर कोनो सार्थक परिणाम एखन धरि सोझाँ नहि आएल अछि। आखिरकार प्रवासी मिथिला समाजक प्रयास सफल भेल आ मिथिला समाद डेगा-डेगी दैत दू वर्षक भऽ गेल। ओना कोनो भाषामे दैनिक पत्रक प्रकाशन कठिन काज अछि ओहूमे मैथिली भाषामे पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन कल्पना मात्र कएल जा सकैत अछि तथापि प्रवासी मैथिल हिम्मत देखौलनि अछि। प्रवासी मैथिलक प्रयाससँ कोलकातासँ प्रकाशित दैनिक मिथिला समाद आ नव दिल्लीसँ गजेन्द्र ठाकुरक सम्पादनमे उपलब्ध ई-पत्रिका “विदेह” मैथिली पत्रकारिताकेँ आक्सीजन दऽ जीवित रखने अछि।
अल्प संसाधन आ सीमित पाठक वर्ग होएबाक बादो मैथिली भाषी प्रबुद्ध पाठकक बले ठाढ़ भेल अछि। मैथिल समाजक सुधि पाठकक स्नेहक परिणाम अछि जे एकटा गएर मैथिल एहि दैनिकक लेल संसाधन उपलब्ध करा मैथिली पत्रकारिताक भोथ भेल धारकेँ तेज कएलनि अछि आ ई मिथिलांचल आ प्रवासी मैथिल समाजक सशक्त अबाज बनबाक प्रयास कऽ रहल अछि। ज्योँ एहिना पाठकक स्नेह आ सहयोग भेटैत रहल तँ लोकतंत्रक चारिम खम्भा मजगूत होएत आ मिथिलांचलक चतुर्दिक विकासक रस्ता निकलत। संगहि मैथिली पत्रकारिताक क्षेत्रमे एकटा नव युग प्रारम्भ होएत।
१.शिव कुमार झा‘‘टिल्लू”- हास्य-कथा- कब्‍जि‍यत दूर भगाउ २. गजेन्द्र ठाकुरक दूटा कथा- १. शब्दशास्त्रम् आ २. सिद्ध महावीर

शिव कुमार झा‘‘टिल्लू‘‘,
नाम : शिव कुमार झा, पिताक नाम: स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘, माताक नाम: स्व. चन्द्रकला देवी, जन्म तिथि : 11-12-1973, शिक्षा : स्नातक (प्रतिष्ठा), जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम + पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर, पिन: 848101, संप्रति : प्रबंधक, संग्रहण, जे. एम. ए. स्टोर्स लि., मेन रोड, बिस्टुपुर, जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि : वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार- प्रसार हेतु डा. नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चौधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्वमे संलग्न।
कब्‍जि‍यत दूर भगाउ
(शीर्षक श्री उमेश मंडलजीक सौजन्यसँ)
बड़की भौजी भोरेसँ आनंदक क्षीर-सागरमे गोता लगा रहल छलीह कि‍एक नहि‍, हुनक बावा जे आबि‍ रहल छथन्‍हि‍। दुरागमनक वाद पहि‍ल बेर बावाक अवाहनक आशमे रंग-वि‍रंगक पकमानक संग स्‍वागत करवाक लेल ओ आतुर....। हमरा समस्‍तीपुर जएवाक छल, मुदा बावूजी रोकि‍ लेलाह। “परम प्रि‍य समधि‍ आवि‍ रहल छथि‍‍, चौरासी बर्खक भऽ गेलाह, नहि‍ जानि‍ फेरि‍ आवि‍ सकताह वा......। अहाँ काल्‍हि‍ भरि‍ रूकि‍ जाऊ।” पि‍तृ आदेश सि‍रोधार्य, आर्द्रा नक्षत्रक बरखासँ दलानक परि‍सर बज-बज कऽ रहल छल तेँ पुनीतकेँ सुरखी छि‍टवाक लेल कहल गेल। हम कोदारि‍सँ चि‍क्कन कऽ रहल छलहुँ। एतवामे गुंजन वि‍हारि‍ जकाँ दोड़ल आबि‍ कऽ कहलक- “सरपंच सहाएब आवि‍ गेलाह, नि‍सहर भुइयाँ थान लग हम देखलहुँ।‍”
“‍हम पहि‍ने कहने छलहुँ समधि‍ भोरूक बससँ औताह मुदा, हमर के सुनए, भोज कालमे कुम्‍हर रोपू आव बाट साफ करवाक कोनो प्रयोजन नहि‍, दौड़ कऽ जाउ आ हुनका लए अवि‍यौ।‍” गुंजन खि‍सि‍आइत बाजल- “हुनका के आनत, बाए.... बाबा तँ आवि‍ गेलाह‍।”
समधि‍ मि‍लान भेल, तत्‍पश्‍चात बावूजी हुनक चरण स्‍पर्श कएलनि‍। बावा अशोकर्ज देखएवाक प्रयास करए लगलाह मुदा, व्‍यर्थ। अपने हमर समधिक‍ पि‍ता छी तेँ हमरो लेल पि‍तृतुल्‍य। बावू जीक तर्कक आगाँ सरपंच सहाएव मूक....। झट-झट सभ गोटे चरण स्‍पर्श करए लगलहुँ। असलानी चौकी, खराम, जल..... पूर्ण मि‍थि‍लाक संस्‍कृति‍सँ अभि‍नंदन। बावा गदगद होइत बजलाह- “कादम्‍बि‍नीक एहि‍ घर वि‍याह करबाक नि‍र्णए‍ हमर जीवनक सभसँ सोझ नि‍र्णए प्रमाणि‍त भेल अछि‍। मनुक्‍खकेँ अपन संस्‍कार नहि‍ छोड़वाक चाही।”
कुड़ा-अछमनि‍क पछाति‍ जलपान, चाह.....ओकरा वाद प्रसि‍द्ध पतैलीक प्रसि‍द्ध पान चि‍बवैत गुंजनकेँ बजौलनि‍- “बौआ, कोन कि‍लासमे पढ़ैत छी?‍”
गुंजन बाजल- “‍छठामे.....।” गुंजनक जबाव पूर्ण भेल नहि‍ की बि‍चहि‍मे हमरा मुँहसँ नि‍कलल- “‍मुदा, वि‍द्यासँ हि‍नक कोनो संबंध नहि‍, एखन धरि‍ वि‍चाराधीन होइत कक्षा पार कऽ रहल छथि‍।” ई बात सुनि‍ते बावू जी हमरा दि‍शि‍ आँखि‍ गुरडि़ कऽ वि‍द-वि‍देलाह- “देखि‍ लेब चारू भाँइमे छोटका सभसँ आगाँ जएत।”
सरपंच बा‍वूक मूक समर्थन। हँसी-ठ्ठाकक बाद बावाक आंगन प्रवेश भाव आ मर्मक अनुभूति‍क साक्षात दर्शन। भौजी बावाकेँ गोर लागि‍ अश्रुधारसँ नहा गेली। हमरा मुँहपर मंद मुस्‍की मुदा गुंजन दहोवहो। भौजी अपन भावनापर अंकुश लगा कऽ गुंजनकेँ पुचकारए लगलीह। सभ व्‍यक्‍ति‍ बूझि‍ रहल छल, मुदा सबहक ठोर जग्रनाथकक फाटक जकाँ बंद......। मातृ सुखसँ वंचि‍त नेेना ककरो आँखि‍पर नोर नहि‍ देखि‍ सकैछ। सरपंच सहाएव बजलाह- “नहि‍ हहरू, भौजीकेँ माएक रूपमे देखू।”
हम मोने-मन बजलहुँ‍- “कहव अासान मुदा, एना भऽ सकैत अछि‍। केओ कतवो मानए परंच मातृ प्रेमक आगाँ सभ अोछ।”
भौजीक सि‍नेहमे कोनो कमी नहि‍, ई गप्‍प हम बूझव गुंजन अवोध, माएक संग पि‍ठि‍या जकाँ लड़ैत छल ओहि‍ क्षणकेँ वि‍सरव असंभव तँ नहि‍, क्‍लि‍ष्‍ट अवश्‍य अछि‍। मझि‍नीक पश्‍चात बावा दलानपर आबि दि‍वस वि‍श्राम करए लगलाह। बावूजी शनि‍ पेठि‍या माँछ कि‍नवाक लेल ि‍वदा भऽ गेलनि‍।‍
एक मनुक्‍खक कतेक रूप भऽ सकैत अछि‍। अपने शाकाहारी परंच पाहुनक लेल मॉछ अपने आनव। पाहुन की? हमरो सबहक लेल ओ अपने मॉछ अनैत छथि‍। अपन संतति‍ लेल लोक की की नहि‍ करैत अछि‍, माटि‍क ढेपकेँ कुम्‍हार बनि‍ कऽ घैलक रूप दैत अछि‍। सुधा कोष बनाएवाक लेल अपन सकल मनोरथकेँ झाँपि‍ लैत अछि‍। सुधाकोष आगाँ कोन रूपक हएत ककरो वशमे नहि‍। ऑगन आबि‍ हम भौजीसँ चाह बनएबाक आग्रह कएलहुँ- “आइ भरि‍ हमरा छोड़ दि‍अ अपने स्‍टोप जड़ा कऽ बना लि‍अ।”
हमरो खराव नहि‍ लागल, अपन पि‍तृक प्रति‍ सि‍नेह स्‍वाभावि‍क अछि‍, मॉछ तड़ैत छलीह। मात्र बब्‍बेटा नहि‍ खएताह, हमहुँ खाएव। ‘गह-गट्ट रौ, गहगट्ट रौ......सुनि‍ते भागल दलान दि‍शि‍ अएलहुँ। दलानपर दसौत गामक भाट क्‍यो टाटक कए रहल छलाह। भाटक नाओ मोन नहि‍ मुदा सभ कि‍यो हुनका मुकेश कहैत छथि‍। ओ नकि‍या कऽ गीत सुनावए लगलाह- “सि‍नेहि‍या वि‍सरि‍ बैसल अछि‍ गाम....‍”
बावूजी भाटक संग समधि‍क साक्षात्‍कार करौलनि‍। हमर बड़का बालकक अजि‍या ससुर छथि‍, अपन गामक नि‍र्वि‍रोध सरपंच छलाह। सरपंच सहाएवक वि‍शुद्ध मैथि‍ली सुनि‍ भाट महाशय गावए लगलनि-
“‍रैनी-भैनी ओ रौति‍नि‍या
दीप गोधनपुर कैथि‍नि‍या
पाँच गाम पचही परगन्ना
उत्तम गाम ननौर
तेली-सूड़ी बसए मधेपुर
लंठक ठट्ठ लखनौर”
“‍सरपंच सहाएव, हम दस-दुआरि‍ छी तेँ नीक अधलाह बूझैत छी। अपने अपन पोतीक वि‍याह करि‍यन कएलहुँ.... इहो नीक गाम मुदा अछि‍ तँ दक्‍खि‍न। लेकि‍न अपनेक समधि‍ मूल रूपसँ कैथि‍नि‍या गामक वासी छथि‍.... झंझारपुर टीशनक सटल गाम- ‘कैथि‍नि‍या’। हि‍नका दछि‍नाहा नहि‍ कहल जा सकैत अछि‍ ई सुनि‍ते सरपंच सहाएवकेँ जेना वि‍रनी काटि‍ लेलक....। क्षमा करू मुदा हम तँ शुद्ध दछि‍नाहा छी। हसनपुर चीनी मि‍लक पॉजरि‍ लागल गाम शासन हमर जन्‍म आ कर्मभूमि‍।”
दू क्षणक लेल मुकेश जी मूक भऽ गेलाह। मुदा छथि‍ तँ सि‍द्धहस्‍त मैथि‍ल, क्षणहि‍मे भरवा बदलि‍ गेल। अहोभाग्‍य अपने सन महान व्‍यक्‍ति‍क दर्शन भेल। शासन गाम मि‍थि‍लाक चर्चित गाम अछि‍। ओहि‍ ठॉक सती माताक महि‍मा के नहि‍ जनैत अछि‍? बि‍ड़ला परि‍वारक द्वारा अपने गाममे सती माताक समृति‍ स्‍वरूप तोड़ण द्वारक नि‍र्माण कएल गेल अछि‍। एकटा बात पूछवाक दु:साहस कऽ रहल छी दक्‍खि‍न भरक रहि‍तहुँ अपने परि‍मार्जित मैथि‍ली बजैत छी..... से कोना? अवश्‍य अपनेक मातृक पंचगामक परि‍धि‍मे हएत।
“‍नहि‍ मातृक दक्षि‍णे अछि‍ आर सासुर तँ वि‍शुद्ध दक्षि‍ण मंझौल गाम, बेगूसरायमे अवस्‍थि‍त अछि‍।”
बाबाक व्‍यथा सुि‍न बावूजी अकचका गेलथि‍, मुकेश बावू दीर्धसूत्री जकाँ कि‍एक धमगि‍ज्‍जरि‍ केने छी। जौं औतुका मैथि‍ली सुनवै तँ बहुत भलमानुषकेँ वि‍सरि‍ जाएव। एहि‍ सबहक लेल अहॉंक कोनो दोष नहि‍ कि‍छु लोक एहि‍ प्रकारक भेद पैदा कऽ मातृभाषाकेँ हथि‍यावए चाहैत छथि‍ ई नहि‍ चलऽ देव। यात्रीक गामसँ उतरो कोनो गाम अछि‍ तँ हुनको दछि‍नाहा मानल जाए। प्रो. सुमन जी, प्रवासी जी, आरसी बावू, बुद्धि‍नाथ मि‍श्र, लाभ जी, हरि‍मोहन झा, हासमी जी, शेफालि‍का वर्मा इहो सभ दछि‍नाहा छथि‍ तेँ हि‍नका सभकेँ बारि‍ दि‍यौ। जाहि‍ महाकवि‍ वि‍द्यापति‍क नाओपर कूदैत छी ओ अपन महापरि‍ नि‍र्माण दक्‍खि‍नेमे कएलनि‍। पाप करैत छी ति‍रहुतमे आ पति‍या कटएवाक लेल गंगाकात सि‍मरि‍या दक्षि‍णे अबैत छी। जा.... मुकेश जी क्षमा करू, अपनेकेँ हम ई सभ कि‍एक कहि‍ रहल छी, अहूँ तँ दछि‍नाहे छी..... समस्‍तीपुर जि‍लाक दसौत ग्राम वासी।”
सरपंच सहाएवकेँ संतोखक अनुभूति‍ भेलनि‍, मुदा हम हुनक छोभक स्‍पष्‍ट दर्शन कऽ रहल छलहुँ। बावूजी सँ मुकेश जी क्षमा याचना करैत बजलाह- “‍हमर दोख नहि‍ एहेन मानसि‍कताक मध्‍य पैघ भेलहुँ।”
सरपंच सहाएव दीर्घ श्‍वास लैत बजलाह- “मैथि‍लीक मध्‍य एकटा वि‍डंबना अछि‍ अपनाकेँ श्रेष्‍ठ प्रमाणि‍त करवाक लेल दोसरकेँ मरोड़ि‍ देवाक। हमरा सबहक ब्रह्मण समाजमे पहि‍ने बेसी छल, आव सुधरि‍ रहल अछि‍। सुरगणेकेँ सुगरगणे कहल गेल अड़रि‍येक मॉथपर तँ पैघ कलंक-हुनका अनेड़ि‍ये कहल जाइत अछि‍। आन जाइतक कोन कथा हुनका सभकेँ मैथि‍ल बुझले नहि‍ गेल।”
एहि‍ दशापर कानी वा हँसी नि‍र्णए नहि‍ कऽ सकलहुँ। ऑगनसँ भोजनक नि‍मंत्रण आएल। मुकेश जी भात नहि‍ खएवाक इच्‍छा प्रकट कएलनि‍ कि‍एक तँ कब्‍जि‍यतक शि‍कार छथि‍। बावू जी अपन कवि‍ता पॉती जकाँ चि‍कि‍त्‍सा आयाम देखौलनि‍- “दस्‍त-दस्‍तावरं खाति‍र भक्‍क्षेत अमृतं फलं। (पेट साफ करबाक लेल लताम खाक)।”
सरपंच सहाएव तत्‍क्षण बजलाह- “यदि‍ अहूसँ नहि‍ ठीक हो तँ ताहूसँ दस्‍त नहि‍ होतं तँ कूथि‍-कूथि‍ मरीयते।‍”
दोसर दि‍न बाबा चलि‍ गेलाह मुदा हुनक “दछि‍नाहा व्‍यथा‍” हमर मोनमे जीवि‍त छल। आव ओ संसारमे नहि‍ छथि‍ परंच दि‍शा मोन पड़ि‍ते हुनक मर्मक अनुभूति‍ प्रासंगि‍क अछि‍।‍‍

गजेन्द्र ठाकुरक दूटा कथा- १. शब्दशास्त्रम् आ २. सिद्ध महावीर
गजेन्द्र ठाकुर
गजेन्द्र ठाकुर, पिता-स्वर्गीय कृपानन्द ठाकुर, माता-श्रीमती लक्ष्मी ठाकुर, जन्म-स्थान-भागलपुर ३० मार्च १९७१ ई., मूल-गाम-मेंहथ, भाया-झंझारपुर,जिला-मधुबनी।

लेखन: कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्ड- खण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना, खण्ड-२ उपन्यास-(सहस्रबाढ़नि), खण्ड-३ पद्य-संग्रह-(सहस्त्राब्दीक चौपड़पर), खण्ड-४ कथा-गल्प संग्रह (गल्प गुच्छ), खण्ड-५ नाटक-(संकर्षण), खण्ड-६ महाकाव्य- (१. त्वञ्चाहञ्च आ २. असञ्जाति मन ), खण्ड-७ बालमंडली किशोर-जगत कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नामसँ।

मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी-मैथिली शब्दकोशक ऑन लाइन आ प्रिंट संस्करणक सम्मिलित रूपेँ निर्माण। पञ्जी-प्रबन्धक सम्मिलित रूपेँ लेखन-शोध-सम्पादन आ मिथिलाक्षरसँ देवनागरी लिप्यंतरण "जीनोम मैपिंग (४५० ए.डी. सँ २००९ ए.डी.)-मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध" नामसँ।

मैथिलीसँ अंग्रेजीमे कएक टा कथा-कविताक अनुवाद आ कन्नड़, तेलुगु, गुजराती आ ओड़ियासँ अंग्रेजीक माध्यमसँ कएक टा कथा-कविताक मैथिलीमे अनुवाद।

उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) क अनुवाद १.अंग्रेजी ( द कॉमेट नामसँ), २.कोंकणी, ३.कन्नड़ आ ४.संस्कृतमे कएल गेल अछि; आ एहि उपन्यासक अनुवाद ५.मराठी आ ६.तुलुमे कएल जा रहल अछि, संगहि एहि उपन्यास सहस्रबाढ़निक मूल मैथिलीक ब्रेल संस्करण (मैथिलीक पहिल ब्रेल पुस्तक) सेहो उपलब्ध अछि।

कथा-संग्रह(गल्प-गुच्छ) क अनुवाद संस्कृतमे।

अंतर्जाल लेल तिरहुता आ कैथी यूनीकोडक विकासमे योगदान आ मैथिलीभाषामे अंतर्जाल आ संगणकक शब्दावलीक विकास।
शीघ्र प्रकाश्य रचना सभ:-१.कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्डक बाद गजेन्द्र ठाकुरक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक-२ खण्ड-८ (प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना-२) क संग, २.सहस्रबाढ़नि क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर उपन्यास स॒हस्र॑ शीर्षा॒ , ३.सहस्राब्दीक चौपड़पर क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर पद्य-संग्रह स॑हस्रजित् ,४.गल्प गुच्छ क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर कथा-गल्प संग्रह शब्दशास्त्रम् ,५.संकर्षण क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर नाटक उल्कामुख ,६. त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन क बाद गजेन्द्र ठाकुरक तेसर गीत-प्रबन्ध नाराश‍ं॒सी , ७. नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक तीनटा नाटक- जलोदीप, ८.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक पद्य संग्रह- बाङक बङौरा , ९.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक खिस्सा-पिहानी संग्रह- अक्षरमुष्टिका ।
सम्पादन: अन्तर्जालपर विदेह ई-पत्रिका “विदेह” ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/ क सम्पादक जे आब प्रिंटमे (देवनागरी आ तिरहुतामे) सेहो मैथिली साहित्य आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि- विदेह: सदेह:१:२:३:४ (देवनागरी आ तिरहुता)।
ई-पत्र संकेत- ggajendra@gmail.com
२.१
शब्दशास्त्रम्
सिंह राशिमे सूर्य, मोटा-मोटी सोलह अगस्त सँ सोलह सितम्बर धरि। किछु सुखेबाक होअए तँ सभसँ कड़ा रौद। सिंह राशिमे मिलूक पिताक तालपत्र सभ पसरल रहैत छल, वार्षिक परिरक्षण योजना, जे एहि तालपत्र सभमे जान फुकैत छल। आनन्दा मिलूक पिताजीक एहि तालपत्र सभक परिरक्षण मनोयोगसँ करैत रहथि। कड़गर रौदमे तालपत्र पसारैत आनन्दा, मिलूकेँ ओहिना मोन छन्हि। मिलू संग जिनगी बीति गेलन्हि आनन्दाक। मुदा एहि बरखक सिंहराशि अएलासँ पूर्वहि आनन्दा चलि गेलीह... आ आब जखन ओ नहि छथि तखन जीवनक परिरक्षण कोना होएत। मिलूक आ ओहि तालपत्र सभक जीवनक..
भ्रम। शब्दक भ्रम। शब्दक अर्थ हम सभ गढ़ि लैत छी। आ फेर भ्रम शुरू भऽ जाइत अछि।
लुकेसरी अँगना चानन घन गछिया
तहि तर कोइली घऽमचान हे
कटबै चनन गाछ, बेढ़बै अँगनमा
छुटि जेतऽ कोइली घऽमचान हे
कानऽ लगली खीजऽ लागल, बोन के कोइलिया
टूटि गेलऽ कोइली घऽमचान हे
जानू कानू जानू की, जोबोन के कोइलिया
अहि जेतऽ कोइली घऽमचान हे
जहि बोन जेबऽ कोइली
रहि जेत तऽ निशनमा
जनू झरू नयना से लोर हे
सोने से मेढ़ायेब कोइली तोरो दुनू पँखिया
रूपे से मेरायेब दुनू ठोर हे
जाहे बोन जेबऽ कोइली रुनझुनु बालम
रहि जेतऽ रकतमाला के निशान हे
कोनो युवतीक अबाज चर्मकार टोलसँ अबैत बुझना गेल..आनन्दाक अबाज।
मुदा आनन्दा तँ चलि गेली, कनिये काल पहिने ओकर लहाश देखि आएल छथि बचलू। मिलूकेँ समाचार कहि डोमासी घुरि गेल छथि। आ आनन्दा, ओ तँ बूढ़ भऽ मरलीहेँ। तखन ई अबाज, युवती आनन्दाक। भ्रम। शब्दक भ्रम। कहैत रहथि मिलूक पिता श्रीधर मीमांसक मारते रास गप शब्दशास्त्रम् पर। शब्दक अर्थ हम सभ गढ़ि लैत छी। आ फेर भ्रम शुरू भऽ जाइत अछि।
I
शब्दशास्त्रम्
गर्दम गोल भेल छल।
अनघोल मचि गेल छलै। बलान धारमे कोनो लहाश बहल चलि जा रहल छल। धोबियाघाट लग कात लागल छल।
कतेक दूरसँ आएल छल से नहि जानि। कोनो बएसगर महिलाक लहाश छल। धोबिन लहाशकेँ चीन्हि गेल रहथि। गौआँकेँ कहि दै छथि ओकर नाम आ पता। गौआँ के, वैह गामक डोमासीक बचलूकेँ। मृतकक घरमे खबरि भऽ गेल छलै। एसकरे एकटा बुढ़ा रहैए ओहि घरमे...मिलू।
मिलूक टोलबैया गौँआ सभ लहाशकेँ डीहपर आनि लेने छल आ फेर मिलू ओकर दाह-संस्कार कऽ देने रहथि।
गाममे अही गपक चर्चा रहै। बचलू बुढ़ाकेँ बुझल छन्हि किछु आर गप। चिन्है छथि ओ ओहि लहाशक मनुक्खकेँ। नवका लोककेँ बहुत रास गप नै बुझल छै।
आनन्दाक लहाश..
-आनन्दा बड्ड नीक रहै। बुझनुक। ओकर बचिया सभ सभटा सुखितगर घरमे छै..बेटा सेहो विद्वान। मिलू, आनन्दाक वर सेहो उद्भट..श्रीकर मीमांसकक पुत्र..। मुदा कहियो मिलू आकि आनन्दा कोनो खगतामे ककरो आगाँ हाथ नहि पसारने छथि।
बचलू सेहो आब बूढ़ भऽ गेल छथि, झुनकुट बूढ़। हिनकासँ पैघ मात्र मिलू छथिन्ह। लोक सभ दुनू गोटेकेँ बुढ़ा कहि बजबै छन्हि।
आ एहि बचलू बुढ़ाकेँ बुझल छन्हि ढेर रास गप।
.....
मिलू आ श्रीधरक वार्तालाप। किछु बुझिऐ आ किछु नहि।
-मिलू। भामतीमे वाचस्पति कहै छथि जे अविद्या जीवपर आश्रित अछि आ विषय बनि गेल अछि। आत्मसाक्षात्कार लेल कोन विधि स्वीकार करब? असत्य कथूक कारण कोना भऽ सकत? कोनो बौस्तुक सत्ता ओकरा सत्य कोना बना देत, त्रिकालमे ओकर उपस्थिति कोना सिद्ध कऽ सकत? जे बौस्तु नहि तँ सत्य अछि आ नहिये असत्य आ नहि अछि एहि दुनूक युग्मरूप; सैह अछि अनिर्वाच्य। बिना कोनो वस्तु आ ओकर ज्ञान रखनिहारक शून्यक अवधारणा कोना बूझऽमे आओत?
-मिलू। कुमारिल कहै छथि आत्मा चैतन्य जड़ अछि, जागलमे बोध आ सूतलमे बोधरहित।
-मिलू। भामतीमे वाचस्पति कहै छथि जे आत्मसाक्षात्कारसँ रहित शास्त्रमे कुशल व्यक्ति सर-समाजसँ पशुवत व्यवहार करैत छथि, लाठी लैत अबैत व्यक्तिकेँ देखि भागि जाइ छथि, घास लैत अबैत व्यक्तिकेँ देखि लग जाइत छथि। माने डरसँ घबड़ाइ छथि।
“आत्मसाक्षात्कारसँ रहित शास्त्रमे कुशल व्यक्ति सर-समाजसँ पशुवत व्यवहार करैत छथि, लाठी लैत अबैत व्यक्तिकेँ देखि भागि जाइ छथि, घास लैत अबैत व्यक्तिकेँ देखि लग जाइत छथि। माने डरसँ घबड़ाइ छथि।” ई गप मुदा सरिया कऽ बूझबामे आएल रहए हमरा।
....
आमक मास रहै।
बानर आ बनगदहा खेत सभकेँ धांगने अछि आ पारा बारीकेँ।
“सभटा नाश कऽ देलकै बचलू। रातिमे तँ नञि सुझै छै। भोरे-भोर कलम जा कऽ देखै छी। बनगदहा सभटा फसिल खा लेलक आब ई बानर आमक पाछाँ लागल अछि।”
हमरा बुझल अछि जे आमक मासमे बानर आ बनगदहा ओहि बरख एक्के संग आएल छलै।
आमेक मास रहै। से मिलू ओगरबाहीमे लागत आब। आमक टिकुला पैघ भऽ रहल छै। मचान बान्हबाक रहै मिलूकेँ। हमहूँ संगमे रहियै। बाँस काटि कऽ अबैत रही।
डबरा कात दऽ कऽ अबि रहल छलहुँ। भोरहरबा छल। अकास मध्य लाल रेख कनेक पिरौँछ भेल बुझना गेल छल।
-लीख दऽ कऽ चलू बचलू।
खेतक बीचमे लीख देने आगाँ बढ़ऽ लागलहुँ।
तखने हम शोणित देखलहुँ। हमर देह शोनित देखि सर्द भऽ गेल।
मुदा निशाँस छोड़लहुँ। बाँसक तीक्ष्ण पात एकटा बालिकाक हाथ आ मुँहकेँ नोछड़ैत गेल रहै। मिलूक बाँसक नोछाड़ ओकरा लागल रहै।
मिलू हाथसँ बाँस फेकि कऽ ओहि बालिका लग चलि गेल छल।
नोराएल आँखिक ओहि बालिकाक शोणित पोछि मिलू ओकर नोछारपर माटि रगड़ि देने रहै।
-की कऽ रहल छी।
-शोनित बन्न भऽ जाएत।
बालिका लीखपर आगाँ दौगि गेल छलीह।
-की नाम छी अहाँक।
-आनन्दा।
-कोन गामक छी।
-अही गामक।
-अही गामक?
हम दुनू गोटे संगे बाजल रही।
हँ, आनन्दा नाम रहै ओकर। आ मिलूक पहिल भेँट वैह रहै।
...
मचानो बन्हा गेल रहए। मुदा आनन्दा फेर नहि भेटल रहए।
मिलू पुछैत रहए।
-कोन टोलक छी ओ। नहिये मिसरटोलीक अछि, नहिये पछिमाटोलीक आ नहिये ठकुरटोलीक।
-डोमासीक रहितए तँ हम चिन्हिते रहितिऐ।
-तखन कोना अछि ओ अपन गामक। आ अपन गामक अछि तँ आइ धरि भेँट किए नहि भेल रहए ओकरासँ।
मुदा बिच्चेमे संयोग भेल छल। मिलूक टोलमे फुदे भाइक बेटाक उपनयन रहै। बँसकट्टी दिन पिपहीबलाकेँ बजबैले हम गामक बाहर चर्मकार टोल गेल रही।
-हिरू भाइ, हिरुआ भाइ।
-आबै छथि।
कोनो बालिकाक अबाज आएल रहए। अबाज चिन्हल सन।
-अहाँ के छी।
-हम हिरूक बेटी। की काज अछि?
-पिपही लऽ कऽ एखन धरि अहाँक बाबू नहि पहुँचल छथि। बजबैले आएल छियन्हि।
-तही ओरियानमे लागल छथि।
-अहाँक नाम की छी?
तखने टाट परक लत्तीकेँ हँटबैत वैह बालिका सोझाँ आबि गेलि।
-हम आनन्दा। हम अहाँकेँ चीन्हि गेल रही। अहाँक की नाम छी?
हम तँ सर्द भेल जाइत रही। मुदा उत्तर देबाके छल।
-बचलू।
-आ अहाँक संगीक।
-मिलू, पंडित श्रीधरक बेटा।
मिलूक पिताक नाम सेहो हम आनन्दाकेँ बता देलिऐ। पुछने तँ नहि छलि ओ, मुदा नहि जानि किएक..कहि देलिऐ।
तखने हिरुआ पिपही लेने आबि गेल रहथि। हुनका संगे हम अपन टोल आबि गेलहुँ।
रस्तामे हिरुआकेँ पुछलियन्हि- आनन्दा अहाँक बेटी छथि। मुदा कहियो देखलियन्हि नहि।
-मामागाममे बेशी दिन रहै छलै। मुदा आब चेतनगर भऽ गेल छै। से गाम लऽ अनने छिऐ।
-फेर मामागाम कहिया जएतीह।
-नञि, आब ओ चेतनगर भऽ गेल अछि। आब संगे रहत।
पंडितजीक बेटा मिलू, हमर संगी मिलू, ई गप सुनि की होएतैक ओकरा मोनपर। कैक दिनसँ ओकर पुछारी कऽ रहल छल। हम सोचने रही जे भने मामागाम चलि जाए आनन्दा आ कनेक दिनमे मिलूक पुछारीसँ हम बाँचि जाएब।
मुदा आब तँ आनन्दा गामेमे रहत आ पंडित श्रीधरक बेटा मिलू..
धुर..हमहीं उनटा-पुनटा सोचि लेने छी। ओहिना दू-चारि बेर मिलू आनन्दाक विषयमे पुछारी केने अछि। तकर माने ई थोड़बेक भेलै जे..
मुदा जे सैह भेलै तखन ?..
पंडितक बेटा आ चर्मकारक बेटी..
पंडित श्रीधर मानताह?..गौआँ घरुआ मानत?
धुर। फेर हम उनटा-पुनटा सोचि रहल छी। पिपही बाजए लागल रहए आ लीखपर देने हम आ मिलू, भरि टोलक स्त्रीगण-पुरुषक संगे बँसबिट्टी पहुँचि गेल रही। रस्तामे ओहि स्थलकेँ अकानने रही। मिलू आ आनन्दाक पहिल मिलनक स्थलकेँ- कोनो अबाज लागल अबैत..मात्र संगीत..स्वर नहि।
बरुआ बाँस सभपर थप्पा दऽ देने रहै आ सभ बाँस कटनाइ शुरू कऽ देने रहथि। मड़बठट्ठी आइये छै। घामे-पसीने भेने कनेक मोन तोषित भेल। कन्हापर बाँस लेने हम आ मिलू ओही रस्ते बिदा भेल रही..ओही लीख देने।

मुदा मिलू हमरा सदिखन टोकारा देमए लागल। कारण कोनो काज हम एतेक देरीसँ नञि केने रहिऐ। ओ हमर राम रहए आ हम ओकर हनुमान।
मचानपर एहिना एक दिन हम मिलूकेँ कहि देलिऐ-
-मिलू, बिसरि जो ओकरा। कथी लेल बदनामी करबिहीं ओकर। हिरुआक बेटी छिऐ आनन्दा। ओना तोहर नाम हमरासँ ओ पुछलक तँ हम तोहर नाम आ तोहर पिताजीक नाम सेहो कहि देलिऐ।
-हमर पिताजीक नाम ओ पुछने रहौ?
-नहि पुछने रहए। मुदा..
-तखन किए कहलहीं?
-आइ ने काल्हि तँ पता लागबे करतै..
-जहिया लगितै तहिया लगितै..आब ओ हमरासँ कटत..हमर मेहनति तूँ बढ़ा देलेँ..
-कोन मेहनति। तूँ पंडित श्रीधरक बेटा आ ओ हिरुआ चर्मकारक बेटी। कथीले बदनामी करबिहीं ओकर।
-बियाह करबै रौ। बदनामी किए करबै।
-ककरा ठकै छिहीं ?
-ककरो नै रौ।
एहिना अनचोक्केमे निर्णय लैत छल मिलू। श्रीधर मीमांसकक बेटा मिलू नैय्यायिक। ओकरा घरमे तालपत्र सभ पसरल रहैत देखने छलिऐ। से भरोस नै भऽ रहल छल।
-गाममे कहियो देखलिऐ नै ओकरा।
-तूँ गाममे रहलेँ कहिया। गुरुजीक पाठशालासँ पौरुकेँ तँ आएल छेँ।
-मुदा तूँहीं कोन देखने रहीं।
-मामा गाम रहै छल ओ।
-फेर मामा गाम घुरि कऽ तँ नहि चलि जाएत।
-नै, से पुछि लेलिऐ। आब गामेमे रहत।
पौरुकाँ गामेमे मिलूक माएक देहान्त भऽ गेल छलन्हि।
श्रीधर मीमांसक सेहो खटबताह सन भऽ गेल छथि- ई गप हुनकर टोलबैय्या सभ करैत छल। तालपत्र सभक परिरक्षण कोना हएत एहि सिंह राशिमे? यैह चिन्ता रहन्हि श्रीधरक, आ तेँ ओ खटबताह सन करए लागल रहथि.. ईहो गप हुनकर टोलबैय्या सभ करैत छल।
...
हिर्र..हिर्र…हिर्र....
डोमासीसँ सूगरक पाछू हम आ मिलू हिर्र-हिर्र करैत चर्मकार टोल पहुँचि जाइ छी। आनन्दा मुदा सोझाँमे भेटि गेलीह। सुग्गर संगे हम आगाँ बढ़ि जाइ छी। घुमै छी तँ आनन्दा आ मिलूक गप सुनैले कान पाथै छी।
हिर्र..हिर्र
एहि बेर आनन्दा हिर्र कहैत अछि आ हम मुस्की दैत सूगरक आगाँ बढ़ि जाइ छी।
ई घटना कैक बेर भेल आ ई गप सगरे पसरि गेल। हिरू कताक बेर हमरा लग आएल रहथि।
हीरू उद्वेलित रहए लागल रहथि। हीरूक पत्नी बेटीक भाग्यक लेल गोहारि करए लगलीह।
कए कोस माँ मन्दिलबा
कए कोस लुकेसरी मन्दिलबा
कए कोस पड़ल दोहाइ
कनी तकबै हे माइ
कए कोस पड़ल दोहाइ
कनी तकबै हे माइ
दुइ कोस मन्दिलबा
चारि कोस लुकेसरी मन्दिलबा
पाँचे कोस पड़ल दोहाइ
कनी तकबै हे माइ
पाँचे कोस पड़ल दोहाइ
कोन फूल माँ मन्दिलबा
कोन फूल बन्दी मन्दिलबा
कोन फूल पर पड़ल दोहाइ
कनी तकबै हे माइ
कोन फूल पर पड़ल दोहाइ
कनी तकबै हे माइ
ऐली फूल माँ मन्दिलबा
बेली फूल लुकेसरी मन्दिलबा
गेन्दे फूल पड़ल दोहाइ
कनी तकबै हे माइ
गेन्दे फूल पड़ल दोहाइ
कनी तकबै हे माइ
.........
हिरू डोमासी आबए लागल रहथि।
-की हेतै, कोना हेतै।
-झुट्ठे..
हम गछलियन्हि जे हम हिरु संगे श्रीधर पंडित लग जाएब।
आ हम हिरूकेँ श्रीधर मीमांसक लग लऽ गेल रहियन्हि। श्रीधरक पत्नीक मृत्यु गत बरखक सिंह राशिक बाद भऽ गेल छलन्हि। आ तकर बाद हिरू मीमांसक खटबताह भऽ गेल छथि- लोक कहैत छलन्हि। लोक के? वैह टोलबैय्या सभ। गामक लोक, परोपट्टाक विद्वान लोक सभ तँ बड्ड इज्जत दै छलन्हि हुनका। आँखिक देखल गप कहै छी..
“आउ बचलू। हिरू, आउ बैसू..। ”- गुम्म भऽ जाइत छथि श्रीधर। पत्नीक मृत्युक बाद एहिना, रहैत रहथि, रहैत रहथि आकि गुम्म भऽ जाइत रहथि।
“कक्का, आँगन सुन्न रहैत अछि। कतेक दिन एना रहत। मिलूक बियाह किए नै करा दै छियन्हि”?
“मिलू तँ बियाह ठीक कऽ लेने छथि”।
“कत्तऽ?” -हम घबड़ाइत पुछै छियन्हि। हिरू हमरा दिस निश्चिन्त भावसँ देखै छथि।
“आनन्दासँ, समधि हीरू तँ अहाँक संग आएल छथिये।”
हाय रे श्रीधर पंडित।
आ बाह रे मिलू। पहिनहिये बापकेँ पटिया लेने छल। मुदा बान्हपर जाइत कोनो टोलबैय्याक कान एहि गपकेँ अकानि लेने छल।
हम सभ बैसले रही आकि ओ किछु आर गोटेकेँ लऽ कऽ दलानपर जुमि गेल छल। श्रीधर मीमांसकसँ हुनकर सभक शास्त्रार्थ शुरू भेल। शब्दक काट शब्दसँ।
“श्रीधर, अहाँ कोन कोटिक अधम काज कऽ रहल छी”।
“कोन अधम काज”।
“छोट-पैघक कोनो विचार नहि रहल अहाँकेँ मीमांसक?”
“विद्वान् जन। ई छोट-पैघ की छिऐ? मात्र शब्द। एहि शब्दकेँ सुनलाक पश्चात् ओकर शब्दार्थ अहाँक माथमे एक वा दोसर तरहेँ ढुकि गेल अछि। पद बना कऽ ओहिमे अपन स्वार्थ मिज्झर कऽ...”।
“माने छोट-पैघ अछि शब्दार्थ मात्र। आ तकर विश्लेषण जे पद बना कऽ केलहुँ से भऽ गेल स्वार्थपरक”।
“विश्वास नहि होए तँ ओहि पदमे सँ स्वार्थक समर्पण कऽ कए देखू। सभ भ्रम भागि जाएत”।
“माने अहाँ मिलू आ आनन्दाक बियाह करेबाले अडिग छी”।
“विद्वान् जन। रस्सीकेँ साँप हम अही द्वारे बुझै छी जे दुनूक पृथक अस्तित्व छै। आँखि घोकचा कऽ दूटा चन्द्रमा देखै छी तँ तखनो अकाशक दूटा वास्तविक भागमे चन्द्रमाकेँ प्रत्यारोपित करै छी। भ्रमक कारण विषय नहि संसर्ग छै, ओना उद्देश्य आ विधेय दुनू सत्य छै। आ एतए सभ विषयक ज्ञान सेहो आत्माक ज्ञान नहि दऽ सकैए। आत्माक विचारसँ अहंवृत्ति- अपन एहि तथ्यक बोध होइत अछि। आत्मा ज्ञानक कर्ता आ कर्म दुनू अछि। पदार्थक अर्थ संसर्गसँ भेटैत अछि। शब्द सुनलाक बाद ओकर अर्थ अनुमानसँ लग होइत अछि”।
“अहाँ शब्दक भ्रम उत्पन्न कऽ रहल छी। हम सभ एहिमे मिलू आ आनन्दाक बियाहक अहाँक इच्छा देखै छी”।
“संकल्प भेल इच्छा आ तकर पूर्ति नहि हो से भेल द्वेष”।
“तँ ई हम सभ द्वेषवश कहि रहल छी। अहाँक नजरिमे जातिक कोनो महत्व नहि?”
“देखू, आनन्दा सर्वगुणसम्पन्न छथि आ हुनकर आ हमर एक जाति अछि आ से अछि अनुवृत्त आ सर्वलोक प्रत्यक्ष। ओ हमर धरोहरक रक्षण कऽ सकतीह, से हमर विश्वास अछि। आ ई हमर निर्णय अछि”।
“आ ई हमर निर्णय अछि।”- ई शब्द हमर आ हिरूक कानमे एक्के बेर नै पैसल रहए। हम तँ हिरु आ मिलूकेँ चिन्हैत रहियन्हि, एहिना अनचोक्के निर्णय सुनबाक अभ्यासी भऽ गेल रही। मुदा हिरु कनेक कालक बाद एहि शब्द सभक प्रतिध्वनि सुनलन्हि जेना। हुनकर अचम्भित नजरि हमरा दिस घुमि गेल छलन्हि।
फेर श्रीधर मीमांसक ओहि शास्त्रार्थी सभमेसँ एक ज्योतिषी दिस आंगुर देखबै छथि-
“ज्योतिषीजी, अहाँ एकटा नीक दिन ताकू। अही शुद्धमे ई पावन विवाह सम्पन्न भऽ जाए। सिंह राशि आबैबला छै, ओहिसँ पूर्व। किनको कोनो आपत्ति?”
सभ माथ झुका ठाढ़ भऽ जाइ छथि। श्रीधर मीमांसकक विरोधमे के ठाढ़ होएत?
“हम सभ तँ अहाँकेँ बुझबए लेल आएल छलहुँ। मुदा जखन अहाँ निर्णय लैये लेने छी तखन...।”
मीमांसकजीक हाथ उठै छन्हि आ सभ फेर शान्त भऽ जाइ छथि।
हम आ हीरू सेहो ओतएसँ बिदा भऽ जाइ छी।
हीरू निसाँस लेने रहथि, से हम अनुभव केने रही।
...
ई नहि जे कोनो आर बाधा नहि आएल।
मुदा ओ खटबताह विद्वान तँ छले। से आनन्दा हुनकर पुतोहु बनि गेलीह। आ हुनक छुअल पानि हमर टोल की परोपट्टाक विद्वान् क बीचमे चलए लागल।
.....
आनन्दाक नैहरमे विवाह सम्पन्न भेल छल। ओतुक्का गीतनाद हम सुनने रही, उल्लासपूर्ण, एखनो मोन अछि-
पर्वत ऊपर भमरा जे सूतल,
मालिन बेटी सूतल फुलवारि हे
उठू मालिन राखू गिरिमल हार हे
पर्वत ऊपर भमरा जे सूतल,
मालिन बेटी सूतल फुलवारि हे
उठू मालिन राखू गिरिमल हार हे
कोन फूल ओढ़ब लुकेसरि के
कोन फूल पहिरन
कोन फूल बान्धिके सिंगार हे
उठू मालिन राखू गिरिमल हार हे
बेली फूल ओढ़ब बन्दी
चमेली फूल पहिरन
अरहुल फूल लुकेसरि के सिंगार हे
उठू मालिन गाँथू गिरिमल हार हे
उठू मालिन गाँथू गिरिमल हार हे
....
श्रीधर मीमांसक आनन्दाकेँ तालपत्र सभक परिरक्षणक भार दऽ निश्चिन्त भऽ गेल रहथि। पत्नीक मृत्युक बाद बेचारे आशंकित रहथि।
दैवीय हस्तक्षेप, आनन्दा जेना ओहि तालपत्र सभक परिरक्षण लेल आएल रहथि हुनकर घर। अनचोक्के..
मिलू कहि देलक हमरा जे कोना ओ श्रीधर पंडितकेँ पटिया लेने रहए। ब्राह्मणक बेटी सराइ कटोरा आ माटिक महादेव बनबैत रहत आ तालपत्र सभमे घून लागि जाएत..
नै घून लागए देथिन तालपत्र सभमे, आनन्दा आएत एहि घर। श्रीधर मीमांसक निर्णय कऽ लेने रहथि।
मिलू तँ जेना जीवन भरि अपन लेल एहि निर्णयक प्रति कृतज्ञ छलाह।
श्रीधरक आयु जेन बढ़ि गेल छलन्हि। श्रीधर आ आनन्दाक मध्य गप होइते रहै छल ओहि घरमे।
आनन्दा बजिते रहै छलीह आ गबिते रहै छलीह।
बारहे बरिस जब बीतल तेरहम चढ़ि गेल हे
बारहे बरिस जब बीतल तेरह चहरि गेल हे
ललना सासु मोरा कहथिन बघिनियाँ
बघिनियाँ घरसे निकालब हे
ललना सासु मोरा कहथिन बघिनियाँ
बघिनियाँ घरसे निकालब हे
अंगना जे बाहर तोहि छलखिन रिनियाँ गे
ललना गे आनि दियौ आक धथूर फर पीसि हम पीयब रे
ललना रे आनी दियौ आक धथूर फर पीसि हम पीयब रे
बहर से आओल बालुम पलंग चढ़ि बैसल रे
बहर से आओल बालुम पलंग चढ़ि बैसल रे
ललना रे कहि दियौ दिल केर बात की तब माहुर पीयब रे
ललना रे कहि दियौ दिल केर बात की तब माहुर पीयब रे
बारह हे बरिस जब बीतल तेरह चहरि गेल रे
ललना रे सासु मोरा कहथिन बघिनियाँ
बघिनिया घरसे निकालब रे
सासु मोरा मारथिन अनूप धय ननदो ठुनुक धय रे
सासु मोरा मारथि अनूप धय ननदो ठुनुक धय रे
ललना रे गोटनो खुशी घर जाओल सभ धन हमरे हेतै हे
ललना रे गोटनऽ खुशी घर जाओल सभ धन हमरे हेतै हे
चुप रहू, चुप रहू धनी की तोहीँ महधनी छिअ हे
चुप रहू, चुप रहू धनी की तोहीँ महधनी छिअ हे
धनी हे करबै हे तुलसी के जाग, की धन सभ लुटा देबऽ हे
ललना हे करबै मे पोखरि के जाग, की सभ धन लुटाएब हे
श्रीधर मीमांसक हँसी करथिन- आनन्दा, अहाँकेँ तँ सासु अछि नहि, तखन ओ बेचारी अहाँकेँ बघिनियाँ कोना कहतीह?
-तेँ ने गबै छी, सभ चीज तँ भरल-पूरल मुदा..।
आँखि नोरा गेल छलन्हि आनन्दाक। हमरा अखनो मोन अछि।
-हम अहाँकेँ दुःख देलहुँ ई गप कहि कऽ।
-कोन दुःख? सासु नै छथि तँ ससुर तँ छथि।
श्रीधरकेँ प्रसन्न देखि मिलूकेँ आत्मतोष होइन्ह।
.......
आ श्रीधर मीमांसकक मृत्युक बादो आनन्दा तालपत्र सभमे जान फुकैत रहैत छलीह।
फेर मिलूकेँ दूटा बेटी भेलन्हि वल्लभा आ मेधा।
आनन्दाक खुशी हम देखने छी। नैहर गेल रहथि ओ। ओतहि दुनू जौँआ बेटी भेल छलन्हि-
लाल परी हे गुलाब परी
लाल परी हे गुलाब परी
हे गगनपर नाचत इन्द्र परी
हे गुलाबपर नाचत इन्द्र परी
आ फेर भेलन्हि बेटा। पैघ भेलापर बेटा मेघकेँ पढ़बा लेल बनारस पठेने रहथि मिलू।
आ दिन बितैत गेल, बेटी सभ पैघ भेलन्हि आ दुनू बेटी, मेधा आ वल्लभाक बियाह दान कऽ निश्चिन्त भऽ गेल छलाह मिलू।
बेटाक परवरिश आ बियाह दान सेहो केलन्हि। मेघ बनारसमे पाठन करए लगलाह। मेघ, मेधा आ वल्लभा तीनू गोटे सालमे एक मास आबथि धरि अवश्य।
लोक बिसरि गेल मारते रास गप सभ।
II
भामती प्रस्थानम्
आनन्दा मिलूक पिताजीक एहि तालपत्र सभक परिरक्षण मनोयोगसँ कऽ रहल छथि। कड़गर रौद, मिलूकेँ ओहिना मोन छन्हि।
मिलू संग जिनगी बीति गेलन्हि आनन्दाक। आ आब जखन ओ नहि छथि तखन मिलूक जीवनक परिरक्षण कोना होएत।.. मिलू प्रवचनक बीचमे कतहु भँसिया जाइ छथि।
प्रवचन चलि रहल अछि। मिलू गरुड़ पुराण नहि सुनताह। मिलू मंडनक ब्रह्मसिद्धि सुनताह, वाचस्पतिक भामती सुनताह, जे सुनबो करताह तँ। जँ बेटी सभक जिद्द छन्हिये तँ आत्मा विषयपर कुमारिलक दर्शन सुनताह। आ सैह प्रवचन चलि रहल अछि।
भ्रम। शब्दक भ्रम। कहैत रहथि श्रीधर मारते रास गप शब्दशास्त्रम् पर। भामती प्रस्थानम् पर। शब्दक अर्थ हम गढ़ि लैत छी। आ फेर भ्रम शुरू भऽ जाइत अछि।
-गुरुजी। हम पत्नीक मृत्युक बाद घोर निराशामे छी। की छिऐ ई जीवन। कतए होएत आनन्दा।
- मिलू। धीरज राखू। ब्रह्मसिद्धिक हमर ई पाठ अहाँक सभ भ्रमक निवारण करत। ब्रह्मसिद्धिमे चारि काण्ड छै। ब्रह्म, तर्क, नियोग आ सिद्धि काण्ड। ब्रह्मकाण्डमे ब्रह्मक रूपपर, तर्ककाण्डमे प्रमाणपर, नियोगकाण्डमे जीवक मुक्तिपर आ सिद्धिकाण्डमे उपनिषदक वाक्यक प्रमाणपर विवेचन अछि।
- मिलू। मुक्ति ज्ञानसँ पृथक् कोनो बौस्तु नहि अछि। मुक्ति स्वयं ज्ञान भेल। मानवक क्षुद्र बुद्धिक कतहु उपेक्षा मंडन नहि केने छथि। कर्मक महत्व ओ बुझैत छथि। मुदा ताहिटा सँ मुक्ति नहि भेटत। स्फोटकेँ ध्वनि-शब्दक रूपमे अर्थ दैत मंडन देखलन्हि। से शंकरसँ ओ एहि अर्थेँ भिन्न छथि जे एहि स्फोटक तादात्म्य ओ बनबैत छथि मुदा शंकर ब्रह्मसँ कम कोनो तादात्म्य नहि मानै छथि। से मंडन शंकरसँ बेशी शुद्ध अद्वैतवादी भेलाह।
-मिलू। मंडन क्षमता आ अक्षमताक एक संग भेनाइकेँ विरोधी तत्व नहि मानैत छथि। ई कखनो अर्थक्रियाकृत भेद होइत अछि, मुदा ओ भेद मूल तत्व कोना भऽ गेल। से ई ब्रह्म सभ भेदमे रहलोपर सभ काज कऽ सकैए।
-देखू। वाचस्पतिक भामती प्रस्थानक विचार मंडन मिश्रक विचारसँ मेल खाइत अछि। मंडन मिश्रक ब्रह्मसिद्धिपर वाचस्पति तत्वसमीक्षा लिखने छथि। ओना तत्वसमीक्षा आब उपलब्ध नै छै।
-तखन तत्व समीक्षाक चर्चा कोना आएल।
-वाचस्पतिक भामतीमे एकर चर्चा छै।
-मुदा मंडनक विचार जानबासँ पूर्व हमरा मोनमे आबि रहल अछि जे जखन ओ शंकराचार्यसँ हारि गेलाह तखन हुनकर हारल सिद्धान्तक पारायणसँ हमरा मोनकेँ कोना शान्ति भेटत।
-देखियौ, मंडन हारि गेल छलाह तकर प्रमाण मंडनक लेखनीमे नहि अछि। मंडन स्फोटवादक समर्थक रहथि, मुदा शंकराचार्य स्फोटवादक खण्डन करैत छथि। मंडन कुमारिल भट्टक विपरीत ख्यातिक समर्थक रहथि, मुदा शंकराचार्यक जाहि शिष्य सुरेश्वराचार्यकेँ लोक मंडन मिश्र बुझै छथि ओ एकर खण्डन करै छथि।
-से तँ ठीके। मंडन हारि गेल रहितथि तँ हुनकर दर्शन शंकराचार्यक अनुकरण करितन्हि।
-आब कहू जे जाहि सुरेश्वराचार्यकेँ शंकराचार्य श्रृंगेरी मठक मठाधीश बनेलन्हि से अविद्याक दू तरहक हेबाक विरोधी छथि मुदा मंडन अपन ग्रन्थ ब्रह्मसिद्धिमे अग्रहण आ अन्यथाग्रहण नामसँ अविद्याक दूटा रूप कहने छथि। मंडन जीवकेँ अविद्याक आश्रय आ ब्रह्मकेँ अविद्याक विषय कहै छथि मुदा सुरेश्वराचार्य से नै मानै छथि। शंकराचार्यक विचारक मंडन विरोधी छथि मुदा सुरेश्वराचार्य हुनकर मतक समर्थनमे छथि।
.......
बानर आ बनगदहा खेत सभकेँ धांगने अछि आ पारा बारीकेँ। आब हमरा दुआरे गामक लोक महीस पोसनाइ तँ नहि छोड़ि देत। बानर आ बनगदहा बड्ड नोकसान कऽ रहल अछि।
“चारिटा बानर कलममे अछि। धऽ कऽ आम सभकेँ दकड़ि देलक। हम गेल रही। साँझ भऽ गेलै तँ आब सभटा बानर गाछक छिप्पी धऽ लेने अछि। साँझ धरि दुनू बापुत कलम ओगरने रही, झठहा मारि भगेलहुँ, मुदा तखन अहाँक कलम दिस चलि गेल”।–- हम मिलूकेँ हम कहै छियन्हि।
“सभटा नाश कऽ देलकै बचलू। रातिमे तँ नञि सुझै छै। भोरे-भोर कलम जा कऽ देखै छी। बनगदहा सभटा फसिल खा लेलक आब ई बानर आमक पाछाँ लागल अछि। करऽ दियौ जखन...”।
“बनगदहा सभ तँ साफ कऽ उपटि गेल छलै। नहि जानि फेर कत्तऽ सँ आबि गेल छै। गजपटहा गाममे जाग भेल छलै, ओम्हरेसँ राता-राती धार टपा दै गेल छै”।
“से नै छै। ई बनगदहा सभ धारमे भसिया कऽ नेपाल दिसनसँ आएल छै। आबऽ दियौ जखन...”।
“हम बानर सभ दिया कहने रही”।
“से हेतै”।
“हेतै भाइज, तखन जाइ छी”। हमरा बुझल अछि जे आमक मासमे बानर आ बनगदहा ओहि बरख एक्के संग निपत्ता भऽ गेल रहै जाहि बरख आनन्दा आ मिलूक भेँट भेल रहै। आ आनन्दाक गेलाक बाद बानर आ बनगदहा नहि जानि कत्तऽ सँ फेर आबि गेल छै, आनन्दाक मृत्युक पन्द्रहो दिन नै बीतल छै...
.......
बचलू गेलाह आ मिलूक कपारपर चिन्ताक मोट कएकटा रेख ऊपर नीचाँ होमए लगलन्हि, हिलकोरक तरंग सन, एक दोसरापर आच्छादित होइत, पुरान तरंग नव बनैत आ बढ़ैत जाइत। अंगनामे सोर करै छथि। “बुच्ची, बुचिया। जयकर आ विश्वनाथ आइ गाछी गेल रहए। आबि गेल अछि ने दुनू गोड़े। सुनलिऐ नै जे बानर सभक उपद्रव भऽ गेल छै। काल्हिसँ नै जाइ जाएत गाछी, से कहि दियौ। आइ बानर सभ कलम आएल छल, से कहबो नै केलहुँ। कहिये कऽ की होएत जखन...”।
“कहि तँ रहल छलहुँ बाबूजी मुदा अहाँ तँ अपने धुनमे रहै छी, बाजैत मुँह दुखा गेल तँ चुप रहि गेलहुँ”।
हँ, धुनिमे तँ छथिये मिलू। ई आम सेहो आनन्दाक मृत्युक बाद पकनाइ शुरू भऽ गेल अछि। आ एतेक दिनुका बाद फेर ई बानर आ बनगदहा कोन गप मोन पारबा लेल फेरसँ जुमि आएल अछि।
...
जयकरक माए वल्लभा आ विश्वनाथक माए मेधा। दुनू बहीन कतेक दिनपर आएल छथि नैहर। कतेक दिनपर भेँट भेल छन्हि एक दोसरासँ। आनन्दाक दुनू बेटी आ दुनू जमाए आएल छथि। वल्लभाक पति विशो आ मेधाक पति कान्ह। मेघ अपन पत्नी आ बच्चा सभक संगे आएल छथि।
मिलू पत्नीकेँ आनन्दा कहि बजा रहल छथि। फेर मोन पड़ै छन्हि जे ओ आब कत्तऽ भेटतीह। फेर कत्तऽ छी वल्लभा, कत्तऽ छी मेधा, जयकर आ विश्वनाथ कतए छथि..सोर करए लागै छथि।
वल्लभा आ मेधा अबै छथि आ मिलू गीत गबए लगै छथि। आनन्दाक गीत। आनन्दा जे गबै छलीह वल्लभा आ मेधा लेल-
लाल परी हे गुलाब परी
लाल परी हे गुलाब परी
हे गगनपर नाचत इन्द्र परी
हे गुलाबपर नाचत इन्द्र परी
रकतमाला दुआरपर निरधन खड़ी
हे रकतमाला दुआरपर निरधन खड़ी
माँ हे निरधनकेँ धन यै देने परी
माँ हे निरधनकेँ धन जे देने परी
लाल परी हे गुलाब परी
माँ हे रकतमाला दुआरपर अन्धरा खड़ी
माँ हे अन्धराकेँ नयन दियौ जलदी
माँ हे अन्धराकेँ नयन दियौ जलदी
बाप आ दुनू बेटी भोकार पाड़ए लगै छथि।
...
-मिलू। आनन्दाक मृत्यु अहाँ लेल विपदा बनि आएल अछि। अहाँ ब्राह्मण जातिक आ आनन्दा चर्मकारिणी। मुदा दुनू गोटेक प्रेम अतुलनीय। हुनकर मृत्यु लेल दुःखी नहि होउ। ब्रह्म बिना दुखक छथि। ब्रह्मक भावरूप आनन्द छियन्हि। से आनन्दा लेल अहाँक दुःखी होएब अनुचित। ब्रह्म द्रष्टा छथि। दृश्य तँ परिवर्तित होइत रहैए, ओहिसँ द्रष्टाकेँ कोन सरोकार। ई जगत-प्रपंच मात्र भ्रम नहि अछि, एकर व्यावहारिक सत्ता तँ छै। मुदा ई व्यावहारिक सत्ता सत्य नहि अछि।
-मिलू। चेतन आ अचेतनक बीच अन्तर छै मुदा से सत्य नै छै। जीवक कएकटा प्रकार छै, आ अविद्याक सेहो कएकटा प्रकार छै। अविद्या एकटा दोष भेल मुदा तकर आश्रय ब्रह्म कोना होएत, पूर्ण जीव कोना होएत। ओकर आश्रय होएत एकटा अपूर्ण जीव। अविद्या तखन सत्य नहि अछि मुदा खूब असत्य सेहो नहि अछि।
-मिलू। एहि अविद्याकेँ दूर करू आ तकरे मोक्ष कहल जाइत अछि। वैह मोक्ष जे आनन्दा प्राप्त केने छथि।
आ मिलूक मुखपर जेना शान्ति पसरि जाइ छन्हि।
........
मिलू जेना भेँट करबा लेल जा रहल छथि।
मोन पड़ि जाइ छन्हि आनन्दा संग प्रेमालाप।
-आनन्दा। अहाँसँ गप करैत-करैत हमरा कनीटा डर मोनमे आबि गेल अछि। पिताक सभसँ प्रधान कमजोरी छन्हि हुनकर तालपत्र सभक परिरक्षण। से ई सभ मोन राखू। पिता जे पुछताह जे ताल पत्रक परिरक्षण कोना होएत तँ कहबन्हि- पुस्तककेँ जलसँ तेलसँ आ स्थूल बन्धनसँ बचा कऽ। छाहरिमे सुखा कऽ। ५००-६०० पातक पोथी सभ। हम कोनो दिन देखा देब। एक पात एक हाथ नाम आ चारि आंगुर चाकर होइ छै। ऊपर आ नीचाँ काठक गत्ता लागल रहै छै। वाम भागमे छिद्र कऽ सुतरीसँ बान्हल रहै छै।
-पिता मानताह।
-नै मानताह किएक। ब्राह्मणक बेटीसँ बियाह कराबैक औकाति छन्हि? हम एक गोटेकेँ दू टाका बएना देने रहियै खेतिहर जमीन किनबा लेल। मुदा पिता जा कऽ बएना घुरा आनलन्हि। एक-एक दू-दू टाका जमा कऽ रहल छथि। ७०० टाका लड़कीबलाकेँ देताह तखन बेटाक विवाह हेतन्हि आ पाँजि बनतन्हि। आ से ब्राह्मणी अओतन्हि तँ तालपत्रक रक्षा करतन्हि?
मिलूक माएक मृत्युक बाद श्रीधर खटबताह भऽ गेल छलाह। टोलबैय्या सभ कहै छथि।
आ फेर बेमारी अएलै, प्लेग। गामक दूटा टोल उपटिये गेल, मिसरटोली आ पछिमाटोली। परोपट्टाक बहुत रास गाममे कतेक लोक मुइल से नै जानि।
मिलू पिताकेँ आनन्दासँ भेँट करा देलखिन्ह। श्रीधर तालपत्र परिरक्षणक ज्ञानसँ परिपूर्ण आनन्दामे नै जानि की देखि लेलन्हि।
मिलू जीति गेल। नैय्यायिक मिलू मीमांसक श्रीधरसँ जीति गेल आ मीमांसक श्रीधर अपन टोलबैय्या सभकेँ पराजित कऽ देलन्हि।
आ आनन्दा आ मिलूक विवाह सम्पन्न भेल।
मोन पड़ि जाइ छन्हि आनन्दा संग प्रेमालाप। मिलू जेना भेँट करबा लेल जा रहल छथि। आनन्दाक मृत्यु भऽ गेल अछि। बलानमे पएर पिछड़ि गेलन्हि आनन्दाक। ओहिना पिछड़ैक चिन्हासी देखबामे आबि रहल अछि।
मिलू ओहि चिन्हासीकेँ देखै छथि आ हुनकर मोन हुलसि जाइ छन्हि, पिछड़ि जाइ छथि भावनाक हिलकोरमे..
आनन्दा आ मिलूक एक दोसरासँ भेँट-घाँट बढ़ए लागल छल, खेत, कल्लम-गाछी, चौरी आ धारक कातक एहि एथलपर। आ दुनू गोटे पिछड़ैत छलाह, खेतमे, कल्लम-गाछीमे, चौरीमे आ धारक कातमे सेहो।
धारमे फाँगैत नै छलाह मिलू। यएह ढलुआ पिच्छड़ स्थल जे आइ-काल्हिक छौड़ा सभ बनेने अछि, से मिलूक बनाओल अछि। एहिपर पोन रोपैत छलाह आ सुर्रसँ मिलू धारमे पानि कटैत आगाँ बढ़ि जाइत छलाह।
“हे, कने नै पिछड़ि कऽ तँ देखा।”
“से कोन बड़का गप भेलै।”
“देखा तखन ने बुझबै।”
आनन्दा अस्थिरसँ आगाँ बढ़बाक प्रयास करथि मुदा..हे.हे..हे..
नै रोकि सकलथि ओ अपनाकेँ, नहिये केतमे, नहिये कल्लम-गाछीमे, नहिये चौरीमे आ नहिये एहि धारक कातमे..
आ की करए आएल होएतीह आनन्दा एतए..जे पिछड़ि गेलीह आ डूमि गेलीह..
कोनो स्मृतिकेँ मोन पड़बा लेल आएल होएतीह..
-
हँ आनन्दा आएल अछि बचलू। देखियौ ई गीत सुनू-
घर पछुवरबामे अरहुल फूल गछिया हे
फरे-फूले लुबुधल गाछ हे
उतरे राजसए सुगा एक आओल
बैसल सूगा अरहुल फूल गाछ हे
फरबो ने खाइ छऽ सुगबा, फुलहो ने खाइ छऽ हे
डाढ़ि-पाति केलक कचून हे
फुलबो ने खाइ छऽ सुगबा, फरहु ने खाइ छऽ हे
डाढ़ि-पाति केलक कचून हे
घर पछुवरबामे बसै सर नढ़िआ हे
बैसल सूगा दिअ ने बझाइ हे
एकसर जोड़ल सोनरिया
दुइसर जोड़ल हे
तेसर सर सूगा उड़ि जाइ हे
सुगबो ने छिऐ भगतिया
तितिरो ने छिऐ
येहो छिऐ गोरैय्या के बाहान हे
-भाइ अहाँ ई गीत नहि सुनि पाबि रहल छी की?
-भाइ सुनि रहल छी। देखियो रहल छी। आनन्दा भौजी छथि।
जहिया ओ मुइल छलीह तहियो सुनने रही- वएह रहथि- गाबै रहथि-
लुकेसरी अँगना चानन घन गछिया
तहि तर कोइली घऽमचान हे
-शब्द भ्रम नहि छल ओ।
माँछ-मौस आ सत्यनारायण पूजाक बाद अगिले दिनक गप अछि। ने चानन गाछ कटेने रहथि आ ने अँगना बेढ़ने रहथि आनन्दा।
दोसर दिन ओहि चानन गाछक नीचाँ चर्मकारटोलमे गौआँ सभ दुनू गोटेक लहाश देखलन्हि। आ ईहो शब्द गगनमे पसरि गेल, सौँसे गौँआ सुनलक- आनन्दाक अबाजमे-
जाहे बोन जेबऽ कोइली रुनझुनु बालम
रहि जेतऽ रकतमाला के निशान हे
शब्द भ्रम नहि छल ओ।
(ई कथा “शब्दशास्त्रम्” श्री उमेश मंडल गाम-बेरमा लेल।)
२.२.
सिद्ध महावीर
१.
बान्हक कातमे अनमना दीदीक घर।
घर नहि झोपड़ी कहू। गामक मोटामोटी सभ अँगनामे एकटा विधवाक घर रहैत छै। मुदा जखने परिवार पैघ होइत अछि तँ क्यो अपन घरक मुँह घुमा लैत अछि तँ क्यो बेढ़ बना दैत अछि। आ कखनो काल ओहि राँड़-मसोमातक घरक स्थान परिवर्तन भऽ जाइत अछि, आ से तेहने सन स्थिति छल अनमना दीदीक घरक।
मुदा अनमना दीदीक घर बान्हक कातमे छन्हि। सोझाँक मजकोठिया टोलक छथि मुदा घुसकि कऽ हमर घर लग आबि गेल छथि।समङगर लोक सभ। आस-पड़ोसक धी-बेटी दिनमे, दुपहरियामे जाइत छथि। ढील-लीख बिछबाक लेल। ककर ओ लगक छथि, से मरलाक बाद पता चलत। श्राद्धक समए जे लगक अछि से आगि देत आ तकरा घरारी भेटतैक। मुदा सेहो सम्भावना आब नहि। झंझारपुरमे सासुर छलन्हि अनमना दीदीक। ओतए अपन बहिनिक बेटाकेँ अपन बेटा बना राखि लेने छथि। मुदा नैहरक मोह नहि छूटल छन्हि।
खोपड़ीमे अबैत छथि। मासमे एक बेर तँ अवश्ये। अपनेसँ खेनाइ-पिनाइ, भानस-भात। मुदा झंझारपुरमे बेस पैघ घर, आँगन। बेटा-पुतोहुकेँ कहियो मुदा एतए नहि आनलन्हि।
सौँसे गाम विधवाकेँ दीदी कहैत अछि जे ओ नैहरमे रहैत छथि। आ फलना गाम बाली काकी जे ओ सासुरमे रहैत छथि।
से सौँसे गाम हुनका अनमना दीदी कहैत छलन्हि।
खोपड़ीक कातमे एकटा भगवानक मन्दिर बनेने छथि। महावीर बजरंगबलीक। शुरुहेसँ ई कोठाक रहै से नहि, मुदा बना देलन्हि ओकरा कोठाक। अन्न-पानि बेचि कऽ। पहिने तँ खोपड़िये रहै। जहिया अनमना दीदी झंझारपुर जाइत रहथि, अपन खोपड़ीक फड़की भिरका कऽ जाइत रहथि। बादमे ताला आ सिक्कड़िसँ बन्न सेहो करए लागल रहथि। मुदा बजरंगबलीक मन्दिर ओहिना खुजल रहैत छल। लोक सभक लेल..चौपहर। धी-बेटी गामक, साफ-सफाई, झाड़ू-बहारू करैत रहथि। पक्काक मुदा बादमे भेल, छात ढलाइ आर बादमे। पिटुआ रहए पहिने। जमीनक प्लास्टर करबए चाहैत रहथि, मुदा एस्टीमेट बेशी भऽ गेलन्हि। भगवानक घर चुबैत रहत? मुदा ढलाई आ प्लास्टर लेल पाइ कतएसँ आओत?
आइ हमरा लगैए जे हम सभ खूब मेहनति करैत छी। ककरोसँ सरोकार नहि अछि। ओह, समैए नहि भेटैत अछि। मुदा अनमाना दीदीक दिनचर्या, भोरसँ साँझ भगवान लेल समर्पित। मुदा पोसपुत्र लेल सेहो समए निकालैत छथि। बीच-बीचमे झंझारपुर बजार लग स्थित अपन गाम जाइत छथि। ओतुक्को ब्योँत लगबैत छथि। फेर गाम अबैत छथि..नैहर। देखू..गीता पढ़ि स्थितप्रज्ञ बनबाक अहाँक प्रयास। मुदा अनमना दीदी। गोर लगै छी दीदी। निकेना रहू। नहिये खुशी, नहिये कोनो दुखे। ने कोनो आवभगतक लालसा आ ने कोनो तरहक सहयोग प्राप्तिक आकांक्षा।
जोन ताकै लेल जाइत छथि धनुकटोली, दुसधटोली। ओतुक्का लोक इज्जतियो दै छन्हि, कोन हुनकर घरारी लेबाक छन्हि हिनका सभकेँ। ओतए हँसितो देखै छियन्हि। अपन टोलक लोकसँ हट्ठे कोनो काज लेल कहितो नहि छथि। एकटा काज करत आ कनियाँकेँ जा कऽ कहत। आ फेर दस साल धरि ओकर कनियाँ सुनबैत रहत।
-दीदी, हनुमान जीक काज छै, सड़कक कातमे छथि। हमहूँ सभ तँ जाइत-अबैत माथ झुका कऽ पुजबे करबन्हि। से बिनु बोनि लेने हम ई काज करब।
- नै यौ तीर्थ-बर्त आ भगवानक काज मँगनीमे नहि करबाक-करेबाक चाही। हम कोनो रानी-महरानी छी जे बेगारी खटा कऽ मन्दिर बनबाएब आ पोखरि खुनाएब।
मुदा ढलैय्या आ प्लास्टर!

सड़कक कातक भगवानक एहि मन्दिरक सटल एक बीघा खेत, सभटा अनमना दीदीक। ढलैय्या भऽ गेलाक बाद भगवानक नामसँ लिखि देतीह। जे अन्न-पानि होएतैक ओहिसँ भगवानक घरक चून-पोचारा आ सफाई होइत रहत।
कतेक दिनसँ पड़ोसी पछोड़ धेने छन्हि।
“दीदी। तोहर सभसँ लगक भातिज हमहीं छियौ। ई जमीन हमर घरसँ सटल अछि। पहिलुका लोक बान्ह-सड़कक कातमे छोट जाति आ मसोमातकेँ घर बना दैत रहै। मुदा आब जमाना बदलि गेल छै।आब तँ सड़कक कातक घर आ जमीनक मोल बढ़ि गेल छै। तूँ आइ ने काल्हि मरि जएमे। तखन ई जमीन हमरा सभ पटीदार लेल झगड़ाक कारण बनत। ”
तूँ आइ ने काल्हि मरि जएमे- कहि कऽ देखियौक कोनो सधवाकेँ। मुदा मसोमातसँ कहि सकै छिऐ- भने ओकर पोसपुत्र- पुतोहु- नैत-नातिन होइ। ठीक छै बाबू।
“भगवानक लेल निहुछल अछि ई जमीन। अहीसँ तँ हमर गुजर चलैए। जे किछु पेट काटि कऽ बचबैत छी से कोशिल्या- भगवानक घरक ढलैया आ प्लास्टर लेल। झंझारपुरक जमीन-जालक पाइ सभ बेटा पुतोहुक छन्हि। से हम कोना.. ”
“फेर दीदी। तूँ गप बुझबे नहि कएलेँ। जा जिबै छेँ राख ने। कर ने गुजर। हम तँ कहै छियौ जे तोरा मरलाक बाद जे पटीदार सभ आपसमे लड़त से तोरा नीक लगतौ। आ हम तोहर सभसँ आप्त भातिज...।”
देखियौ, कहै छै जे। भातिज बाहरमे नोकरी करै छथि। जे गाममे रहैए से तँ भेँट करएमे संकोच करैए जे किछु देमए नहि पड़ए। ई मुदा जहिया गाममे अबैए आ हम गाममे रहै छी तँ भेँट करबाक लेल अबिते अछि। आ एहि बेर तँ हम झंझारपुरमे रही तँ ओतहु आएल रहए। सैह तँ कहलियै जे ई कोना कऽ फुरेलै। से आब बुझलिऐ। मुदा ई ढलैय्या कोना कऽ होएत। प्लास्टर तँ बादोमे करबा देबै। ततेक चुबैए, एहि साल तँ आरो बेशी चुबए लागल अछि। पिटुआ छत, दुइयो साल नहि चलल। ओकरा ओदारि कऽ ढ़लैय्या करत करीम मियाँ आ लछमी मिस्त्री, तखने ठीक होएत। देखै छी।
भातिजक आबाजाही बढ़ि गेल अछि आइ-काल्हि।
“ठीक छै दीदी, अदहे जमीन दऽ दिअ। दस कट्ठामे अहाँक भातिजक बसोबासक संग भगवानक लेल सेहो जमीन बचि जाएत।”
“मुदा बान्हपर अहाँक घरारीक लागि तँ नहिए होएत। तखन की फएदा होएत अहाँकेँ।”
“छोड़ू ने। एखनो तँ टोल दऽ कऽ अबिते ने छी। चौक-चौबटिया आ बान्हक कातमे घर बनेबाक तँ आब ने चलन भेल अछि। आ आब चौबटिया आ बान्हक कातमे तँ भगवानेक घर ने शोभतन्हि। दस कट्ठाक दस हजार जहिया कहब हम दऽ देब। रजिस्ट्री बादेमे बरु होएत।”
“ठीक छै। तखन हम सोचि कऽ कहब। एक बेर बेटा पुतोहुसँ पूछि लैत छी।”
कोन उपाए। भगवानक घरक देबाल सभमे कजरी लागि गेल अछि। देबाल छोड़ू, बजरंगबलीक मूर्तिमे सेहो कजरी लागि गेल अछि। अनमना दीदी सोचिते रहि गेलथि। आ सोचिते-सोचिते भोर भऽ गेलन्हि।
दऽ दै छिऐ जमीन। आर उपाय की। नञि।
बेटा-पुतोहु कहलखिन्ह जे माए। ओतुक्का जमीन तँ भगवानक छन्हि। आ हम सभ से शुरुहे सँ बुझै छी। मुदा देखब। ओ कोनो चालि तँ नहि चलि रहल अछि।
“कोन चालि। पाइ तँ किछु बेशीए दऽ रहल अछि।”
भगवानक मन्दिरक लेल, दस कट्ठा कम थोड़बेक होइ छै। पाइ जुटबैत-जुटबैत मरि गेलहुँ। ई अधखरु मन्दिर ओहिने रहि जाएत ? गप करै छी लछमी मिस्त्री आ करीम मिआँ सँ।
दस हजारमे ढलैय्या, प्लास्टरक संग चहरदिवारी सेहो बनि जाएत। एस्टीमेट बनि गेल। रजिस्ट्रीक अगिले दिनसँ काज आरम्भ। आ भादवक पहिने समापन।

चलू रजिस्ट्री भऽ गेल। दासजी कागज-पत्तरमे बड्ड माहिर लोक। पुछबाक काज छै! - धुर। पकिया कागज बनल हएत।
“भगवानक लेल कागज बनेबाक पहिल अवसर भेटल अछि दीदी”- दासजीक गपसँ अनमना दीदी दासोदास भऽ गेलीह।
लोक कहै छै झुट्ठे जे लोकक श्रद्धा भगवानपर सँ कम भेल जाइ छै। ई दासजी। कहियो ने भेँट आ ने जान पहिचान। दू टा रजिस्ट्रीक कागत- एकटा दसकठिया भातिजक नाम आ दोसर भगवानक नाम, मुदा एक्के फीसमे बना रहल छथि। साफे कहि देलखिन्ह- दीदी भगवानक जमीनक रजिस्ट्रीक पाइ हम एकदम्मे नहि लेब। जे बेर-बखतपर काज आबए सैह ने अप्पन लोक। ठीके बूढ़-पुरान कहि गेल छथि। यैह सभ देखि कऽ ने कहने छथि।
अनमना दीदी बाइमे छथि। पएरे गाम अएलीह।सोहमे किछु नहि फुराइत छन्हि। मन्दिरकेँ अजबारू, काल्हिसँ काजक आरम्भ अछि। लछमी मिस्त्री अपन तेगारी, डोरी, करणी सभ राखि गेल अछि। डब्बुक सभ पानि भरबाक लेल अनमना दीदी जोगा कऽ राखनहिये छथि। पोखरि बगलेमे अछि। लीढ़सँ भरल, मुदा कातमे महीस सभकेँ पानि पिएबाक लेल लोक सभ कनेक साफ कइए देने अछि।
मुदा भोरेमे घोल-फुचुक्का। करीम मिआँकेँ काज करबासँ रोकि देल गेल। के रोकलक? भातिजकेँ खबरि दियौक। मुदा ओ तँ काल्हि झंझारपुरसँ सोझे नोकरीपर चलि गेलाह। रजिस्ट्रीक कागत ओना तँ अनमाना दीदी लग सेहो छन्हि। भातिजक सार रोकने अछि काज। चहारदिबारी नहि बनबए देत। मुदा काल्हि रजिस्ट्री काल तँ रहए ईहो। तखन? कहैत अछि जे बान्हक कातबला जमीन मेहमानक छियन्हि, ऐँ यौ। तखन तँ ई मन्दिरो ओकरे हिस्सामे भऽ गेलै। कोनो बुझबामे गलती तँ नहि कऽ रहल अछि। भातिज मासक शुरुहेमे जा कऽ तँ अओताह, दरमाहा लैए कऽ ने। मास भरि अनमाना दीदी गाम आ झंझारपुर करैत रहलीह। बेटा पुतोहु कहन्हि जे ई भातिजेक चालि तँ नहि अछि। नञि, से नहि कहू। दासजी तँ नीक लोक रहए। देखू।

“दीदी। अहाँकेँ कोनो धोखा भऽ रहल अछि।”
“तखन तँ ई मन्दिरो अहींक भेल ने।”
“नञि दीदी। ई मन्दिर तँ भगवानक छियन्हि। हुनके रहतन्हि। आ पाछूक जमीनक मालिक सेहो भगवाने।”
“आ तखन तँ हमर ई खोपड़ी सेहो अहींक भेल ने।”
“नञि दीदी। अहाँ जहिया धरि जीब तहिया धरि रहू। के मना करत? ”
“बौआ बड्ड उपकार अहाँक। आ पाछू दिसका जमीनक लागि तँ नञि बान्ह दिससँ अछि आ नहिये टोल दिससँ।”
“दीदी। अहाँ हमरा जमीन बाटे जाऊ ने के मना करत? आ आरिपर बाटे खेतमे सभ जाइते अछि। जकर खेत बान्हक कातमे नहि छै से की अपन खेतपर नहि जा सकैए। अहाँ तँ नबका लोकक भिन्न-भिनाउज बला गप कऽ रहल छी।”
“मुदा ई सभ अहाँ पहिने कहाँ कहने रही।”
“दीदी, अहाँकेँ सभटा कहने रही। मुदा लगैत अछि जे अहाँकेँ धोखा भऽ रहल अछि। नहि विश्वास होइए तँ दासजीकेँ बजा दैत छी। ओ तँ तेहल्ला अछि।”
“अच्छा तँ ओहो मिलल अछि।”
“दू रजिस्ट्रीक कागत बना कऽ बेचारा एक रजिस्ट्रीक पाइ लेलक आ अहाँ कहि रहल छी जे मिलल अछि।”- भातिजक स्वर तीव्र भऽ गेलन्हि। हाँफए लगलाह आ जोर-जोरसँ बजैत बिदा भऽ गेलाह।

अनमाना दीदीक लेल नैहरक ई भोर सासुरक ओहि भोर जेकाँ रहन्हि जाहि दिन ओ विधवा भेल रहथि। आइ गामक धी-बेटी ढ़ील-लीख बिछबा लेल नहि अएलीह। अनमाना दीदीक राति भरिक वार्तालाप- बजरंग बलीक संग। एखने एहि भोरमे खतम भेल अछि। लोक सभ अँगनामे बच्चाकेँ ठोकि कऽ सुता रहल रहए। भोरमे किछु गोटे आबि पंचैती करेबाक सुझाव दए गेलन्हि। मुदा अनमाना दीदीक रोष तँ बजरंगबलीसँ छलन्हि।
“भगवानक जमीन अदहा बेचि कऽ भगवानक घर बनबितहुँ, मुदा मन्दिरक सटल जमीन रजिस्ट्री करा लेलक आ जे जमीन बचल ओहिसँ मन्दिरक लागिये नहि रहल। लागि तँ छोड़ू ओहि पर जएबाक रस्ते बन्न कऽ देलक। आ ई बजरंगबली। महावीर। कोन शक्ति छैक एकरामे ? चालीस साल पेट काटि कऽ हिनका खोपड़ीसँ पक्काक घरमे अनलहुँ। ढलैय्या भऽ जइतए, चहरदिवारी बनि जइतए सैह टा मनोरथ रहए, आ सेहो हिनके लेल। हा... ”

एहि भोरमे भातिजक द्वारिपर ठाढ़ अनमाना दीदी। लोक सभक मोने जे आब आर बाझत झगड़ा। मुदा ई की भऽ रहल अछि। लछमियाँक भाए रिक्शा अनलक अछि। अनमाना दीदी भातिजक संग झंझारपुर जा रहल छथि। के कहलक? हुनकासँ तँ ककरो गपो नहि भेल रहै। हम कहनहियो रहियन्हि पंचैती कराऊ, मुदा मना जेकाँ कऽ देने रहथि। अच्छा, लछमीक भाए कहलक। हँ, रिक्शा बजबै लेल जे गेल रहए, से कहने हएत जे झंझारपुर जेबाक अछि।
दासजीकेँ एकटा आर रजिस्ट्रीक कागत बनबए पड़लन्हि। अनमाना दीदीकेँ देखि ओ सर्द भऽ गेल रहथि जे जानि नहि बूढ़ी की सभ सुनओथिन्ह। मुदा अनमाना दीदी ततेक ने तामसमे छलीह जे किछु नहि बजलीह। तामस पीबि गेलीह। ओहो पाछू बला जमीन भातिजकेँ रजिस्ट्री कऽ देलन्हि। आ झंझारपुर-स्टेशनसँ घुरि कऽ झंझारपुर बजार दिस बेटा पुतोहु लग पएरे बिदा भेलीह।
लछमीक भाए घुरि आएल। दू सवारीकेँ लऽ गेल रहए मुदा मात्र एक सवारी लऽ कऽ घुरि आएल। संगमे संदेश लेने गेल। लछमी मिस्त्री आ करीम मिआँ लेल संदेश। काल्हि भोरेसँ काज आरम्भ। फेरसँ?

चहरदेबाली बनल। भगवानक मन्दिर आ अनमाना दीदीक घरकेँ बारि कऽ। कहि देने छियन्हि दीदी केँ। हुनका जिबैत क्यो छूतन्हि नहि हुनकर घर।
घर आकि खोपड़ी, एक साल कनेक टूटल। दोसर भदबरियामे खुट्टा सरि कऽ खसि पड़ल। मुदा अनमाना दीदी नहि अएलीह। समाद देने रहन्हि नैहरक एक गोटे। ढलैया नहिये भेलन्हि बजरंगबलीक। अनमना दीदी हरिद्वारसँ घुरि अएलीह। लोक पुछलकन्हि- की माँगलहुँ गंगा माएसँ।
“यएह जे अंधविश्वास हमरा मोनसँ हटा दिअ”।
“आ की देलियन्हि गंगा माएकेँ ?”
“अपन तामस दऽ देलियन्हि”।
अनमाना दीदी यएह कहथि- की करबन्हि। कोनो शक्तिये नहि छन्हि बजरंगबलीमे। खसए दियौक खोपड़ी। सोंगर लागल घर कतेक दिन काज देत।

कैक बरख बीतल। कैक बरख नहि पाँचमे साल तँ। भातिज गामपर आएल रहथि। दरमाहा उठा कऽ। पोखरि दिससँ चप्पाकलपर। लोटा लेने बैसलाह आकि छातीमे दर्द उठलन्हि। नहि बचि सकलाह। लोक सभ कहए, देखू अनमाना दीदीक श्राप, बड्ड कानल रहथि दीदी ओहि दिन। ओहिसँ पहिने बजरंगबलीक मूर्तिमे ठीके शक्ति नहि रहए। मुदा हृदयसँ देल श्राप लागै छै। ओही दिन जागृत भऽ गेल रहथि बजरंगबली। आ आइ शक्ति देखा देलखिन्ह।
मुदा समदियाकेँ अनमाना दीदी कहलखिन्ह जे पाथरोमे जान होइ छै। हर्ट अटैक भेल होएतैक। परसू एतहि एकटा मारवाड़ीकेँ अटैक भेल रहै। चिन्ता-फिकिरसँ होइत छैक एकर अटैक। एतए डाकडर सभ रहै, मारवाड़ी बाँचि गेल। गाममे देरी भेने जान नहि बचै छै। तेँ ने हमहूँ एहि बुढ़ारीमे बेटे पुतोहु लग झंझारपुरमे रहि रहल छी।

गाम अछि महिसबार ब्राह्मणक गाम। सुखरातिक दिन हूड़ा-हूड़ीक खेल जे एहि महिसबाड़ ब्राह्मण सभक देखलहुँ तँ पोलोक खेलमे कोनो रुचि नहि रहल। समियाक डोमसँ कीनल सुग्गरकेँ भाँग पिआए मातल महीस द्वारा हूड़ा लेब।
चरबाह जे महीसक पहुलाठ पकड़ि कलाकारीसँ बैसल छल सेहो अद्भुते। डोमक काज पाबनि-तिहारमे तँ होइते अछि। पेटार बनेबासँ सूप, बीअनि सभ किछु बनेबामे डोमक काज आ पाहुन परख लेल आ बरियाती लेल जे खस्सी काटल जाएत ताहि लेल मिआँटोलीक काज। खस्सीक मूड़ा दुर्गापूजाक बलिमे कमिटी लऽ लैत अछि।
धुर कतए भाँसि गेलहुँ।
से मिआँ जे खस्सी काटैत अछि से हलाल कऽ कऽ। गरदनि अदहा लटकले रहैत छै, मुदा माउस बना-सोना कऽ गरदनि लऽ जाइये आ खलरा सेहो। तखन महिसबार ब्राह्मणमे सँ जे हनुमानजी मन्दिरपर भजन आ अष्टजाम करैत छथि से ओही खलरासँ बनल ढोलक किनैत छथि। आ से कीर्तन भइयो रहल छल।
सिद्ध महावीरजीक मन्दिरक आगाँ। रामनवमी दिन गाड़ल बड़का धुजा। टनटनाइत घड़ीघण्ट आकि आर किछु। हनुमानजीक धूजा फहरा रहल अछि। साँझक काल। महिसबार सभक आगम भऽ गेल अछि। कोनो पाबनि हुअए, हूड़ाहूड़ी आकि रामनवमी सिद्ध हनुमानजीक आगाँ कीर्तन होइते अछि। से बाबू गौँआक श्रद्धाक गप छिऐ। से आइयो भऽ रहल अछि।
घूरक धुँआ माल बिठौरीकेँ मालक देहसँ अलग करबाक प्रयासमे अछि। एक गोटेक संग दोसर गोटे अएल छथि, सप्पत खएबाक लेल। हनुमानजीक मन्दिर गौँआ सभ प्लास्टर करबा देने छथि। ढलैय्या सेहो भऽ गेल अछि। मन्दिरक बरण्डा छूबि कऽ ऋण पचेनहारक संख्या नगण्य, तैयो एकटा अपवाद तँ अछिये- ओ कहै छथि- सप्पत तँ तोड़बा लेल खाएल जाइ छै। हँ भाइ, एक बेर सप्पत खेने जे ऋणसँ विमुक्ति भेटि जाए तँ हर्जे कोन। मुदा एकेटा अपवाद। अनमाना दीदीकेँ आब सभ अनमाना बाबा सेहो कहैत छन्हि। कएक बरख भेल मुइना हुनकर। घुरि कऽ नहिये अएलीह। भातिजक घरारीक दोष निवारणार्थ कोनो पंडितक कहलापर खुट्टापर एकटा गाए बान्हि देल गेल छै, जकरा एनहार-गेनहार सदिखन घास खाइत देखैत छथि, तहिसँ घरारीकेँ नजरि-गुजरि नहि लगतैक।
हनुमानजीक धुजा फहरा रहल अछि। साँझक काल। गोनर भाए कीर्तनमे ढोलकक थापपर थाप लगा रहल छथि।
अनमाना बाबाक गप आब किछु लोको सभ मानलक। ठीके। हनुमानजीक मूर्तिक आगाँ भक्त दूटा गोल बनि गेल अछि। एक गोलक विचार कनेक वैज्ञानिक छैक- अनमाना दीदी जे बाँचल दस कट्ठाक रजिस्ट्री कऽ देलखिन्ह सएह ने पैसा देलकै चिन्ता-फिकिर भातिजक छातीमे। नहि सम्हारि सकल अनमाना दीदीक ई आक्रमण ओ। ठीके पाथरमे कोनो शक्ति थोड़बेक होइ छै। मुदा दोसर गोल महावीर हनुमानजीक सिद्ध आ जागृत होएबामे विश्वास कऽ रहल अछि- यौ, चुट्टीकेँ माटि दऽ दियौ तँ ओहो मड़ि जाएत मुदा बिकुटि कऽ जे काटत से छोड़त नहि। आ ई माटि अनमना दीदी महावीरजी केँ देलखिन्ह तँ ओ कोना छोड़ि दितथिन्ह।
गोनर भाए कीर्तनमे ढोलकपर थापपर थाप लगा रहल छथि, बुझू सिद्ध महाबीरजीकेँ मनाइये कऽ छोड़ताह, भाँगक गोला असरि कऽ रहल छन्हि, आँखि तँ चढ़ले छन्हि, हाथ सेहो रुकै कऽ नाम नै लऽ रहल छन्हि, आ हुनकर नजरिसँ देखी तँ सिद्ध महावीरक पाथरक मुरुत जागृत भऽ गेल देखा पड़त, जेना ओहिमे जान आबि गेल हो!
१.जगदीश प्रसाद मंडलक एकटा दीर्ध कथा-मइटुग्‍गर २. बिपिन कुमार झा- विरासत केर संरक्षण केकर उत्तरदायित्व ? ३.बसंत झा-उगना

जगदीश प्रसाद मंडल
.जगदीश प्रसाद मंडलक एकटा दीर्ध कथा-
मइटुग्‍गर
जहि‍ना सरयुग नदीमे नहा भक्‍त मंदि‍रमे प्रवेश करि‍तहि‍ भगवान रामक दर्शन करैत तहि‍ना तपेसर काका अंगनाक मेहमे आेंगठि‍ सामि‍ल भोज समाजकेँ खुअबैक ओरि‍यान देखि‍ रहल छथि‍। पोखरि‍क पानि‍ जकाँ शीतल, शान्‍त समतल मन अंगनाक सुगंधमे मस्‍त छनि‍। तहि‍ बीच बेटी सुभद्रा चमकैत स्‍टीलक छि‍पलीमे पनरह-बीसटा सुखल बरी एकटा बर आ गि‍लासक पानि‍ आगूमे रखि‍ कहलकनि‍- “कनी चीख कऽ देखि‍यौ जे नीक भेलि‍ कि‍ नहि‍?‍”
मुस्‍कुराइत बेटी आ छि‍पलीमे सजल बर-बरी देखि‍ तपेसर काका हेरा गेलाह। मन पड़लनि‍ मइटुग्‍गर। मुदा चुल्हि‍पर चढ़ल लोहि‍या छोड़ि‍ अँटकब उचि‍त नहि‍ बुझि‍ सुभद्रा चुल्हि‍ लग पहुँच गेली। कमलक फड़ सन एकटा बरी मुँहमे लइते मन पड़लनि‍ परि‍वारमे अपन कएल काज।
साओन मास। भोरहरबामे मेघ फटि‍ बरखो भेल आ अधरति‍येसँ जे पूर्वा उठल उठले रहि‍ गेल। कखनो काल झकसि‍यो अबि‍ते रहल। जेना-जेना दि‍न उठैत गेल तेना-तेना पूरबाक लपेट सेहो बढ़ि‍ते गेल। प्रसवक दर्दक आगम सुशीलाकेँ कहलनि‍। पुतोहूक बात सुनि‍ सुनयना बेटा तपेसरकेँ पलहनि‍ बजबए कहलखि‍न।
ओसारक ओछाइनपर आेंघराएल सुशीलाक मनमे लड़ाइ पसरि‍ गेलनि‍। एक दि‍स प्रसवक पीड़ा अपन दल-बलक संग अंगक पोर-पोरपर चढ़ाइ करैत तँ दोसर दि‍स जि‍नगीक कठि‍न दुर्गमे फॅॅसल मन खुशीक लहड़ि‍मे झि‍लहोरि‍ खेलाइत। नारी जि‍नगीक श्रेष्‍ठतम काजक भार। जेहने भरि‍गर काज तेहने मुँहमंगा मातृत्‍वक उपहार। पूर्वाक लपेट देखि‍ सुनयनाकेँ ठकमूड़ी लगल रहनि‍। आइ धरि‍ प्रसव गढूलामे होइत रहल अछि‍। जहि‍ घरक टाटा हवाक वेगकेँ नहि‍ रोकैत। आश्रमक घर जकाँ टाटमे लेब नहि‍ पड़ैत। मुदा बोनक बच्‍चाकेँ कोन घर रक्‍छा करैत अछि‍! गठुला छोड़ि‍ मालक घरमे ओछाइन ओछा देलखि‍न। ओछाइन ओछा हि‍यासए लगलीह जे अगि‍यासी भइये गेल, फाट-पुरान लइये अनलौं। मालक घरसँ हुलकी मारि‍ पुतोहू दि‍स देखलनि‍ तँ चैन बुझि‍ पड़लनि‍। मन असथि‍र भेलनि‍।
पहलनि‍ ऐठाम जाइत तपेसरक मनमे अपन काजक भार उठलनि‍। एहेन भारी काजमे पुरूखक काज की अछि‍? डेग भरि‍ हटल पलहनि‍क घर अछि‍ तेकर बाद? मचकीपर झुलैत झुलनि‍हार जकाँ तपेसर झुलैत पलहनि‍ ऐठाम पहुँच जनतब देलखि‍न। अपन उगैत लछमीकेँ देखि‍ मुस्‍की दैत पलहनि‍ कहलकनि‍- “अहाँ आगू बढ़ू माइयक थैर खरड़ि‍ पीठेपर दौड़ल अबै छी।‍”
पाँचो मि‍नट पलहनि‍केँ पहुँचला नहि‍ भेलि‍ कि‍ बेटाक जन्‍म भेल। धरतीपर बेटाकेँ पदार्पण करि‍तहि‍ बि‍जलोका जकाँ परि‍वारमे खुशी पसरि‍ गेल। देह पोछैत पलहनि‍क मन चालीस तम्‍मा नि‍छौर, तइपरसँ नि‍पनौन, लाढ़ि‍-पुरनि‍ कटाइक संग उपहार, पसारी छी तेँ मंगवोक अधि‍कार अछि‍ये जाइकाल एकटा सजमनि‍यो मांगि‍ लेब। सि‍दहा तँ देबे करतीह। हि‍साबमे मन बौआ गेलनि‍। समाजमे भगवान ककरो सनतान दइ छथि‍न तइमे सझि‍या कऽ दैत छथि‍ ने। बच्‍चाक जि‍नगी हमरा हाथमे अछि‍, तहि‍ना ने अपनो जि‍नगी दोसराक हाथमे अछि‍। तरे-तर मन खुशी भऽ गेलनि‍। मुस्‍की दैत सुनयनाकेँ टोनलनि‍- “काकी, पहि‍ल पोता छि‍अनि‍, रेशमी पटोर पहीरि‍बनि‍?‍”
धारक बेगमे दहलाइत दादीक मन, मूड़ी डोलबैत बजलीह- “एकटाकेँ के कहै सातटा पहि‍रेबह।‍”
पलहनि‍- “बच्‍चा मुँह, एन-मेन तपेसरे बौआ जकाँ छै।‍”
पलहनि‍क बात सुनि‍ ओछाइनपर पड़ल सुशीलाक दर्द भरल देहक मनमे अपन सतीत्‍वक आभास भेल। मुदा अवसरकेँ हाथसँ नहि‍ जाए दि‍अए चाहि‍ बुदबुदाएल- “केहेन सपरती जकाँ बजै-ए।‍” मुदा पलहनि‍ सुनलक नहि‍। जहि‍सँ आगू कि‍छु नहि‍ बाजलि‍।
पोखरि‍क पानि‍ जकाँ तपेसरक मन असथि‍र। सामान्‍य परि‍स्‍थि‍ति‍ तेँ सामान्‍य मनक वि‍चार। जहि‍ना कठि‍नसँ कठि‍न, उकड़ूसँ उकड़ू काजपर लूरि‍ डटल रहैत तहि‍ना जि‍नगी काजपर नजरि‍ दौड़ैत मन डटल। मन कहैत बीस-एक्कैस बर्खक उम्रो छेबे करनि‍, रोगो व्‍याधि‍क छुति‍ देहमे नहि‍ये छन्‍हि‍। बेटापर नजरि‍ पहुँचते पुत्र सन सम्‍पत्ति‍क आगमनसँ मन फुला गेलनि‍। जहि‍ना लगौल गाछमे पहि‍ल फूल वा फड़ लगलापर बेरि‍-बेरि‍ देखैक इच्‍छा होइत तहि‍ना तपेसरक मनमे उठैत। बर्जित जगह बुझि‍ परहेज केने रहथि‍। मुदा तइयो जहि‍ना डॉट टुटल कमल हवाक संग पोखरि‍मे दहलाइत तहि‍ना खुशीक हि‍लकोरमे तपेसरक मन तड़-ऊपर करैत। मनमे उठलनि‍, पुरूष-नारी बीचक संबंधमे बच्‍चो पैघ शर्त्त छी। परि‍वारमे (संबंधमे) वि‍खंडनक संभावना बनल रहैत अछि‍। लगले मन अपनासँ आगू उड़ि‍ माए-बापपर गेलनि‍। हृदए वि‍हुँसि‍ गेलनि‍। जहि‍ना मातृत्‍व प्राप्‍त केलापर नारीक सौन्‍दर्य बढ़ि‍ जाइत तहि‍ना ने पि‍तृत्‍व प्राप्‍त केलापर पुरूषोकेँ होइत। लगले सि‍नेमा रील जकाँ बेटाक जन्‍मसँ अंति‍म समए धरि‍क जि‍नगी नाचि‍ उठलनि‍।
कि‍छुए समए बाद सुशीलाकेँ पुन: दर्द शुरू भेलनि‍। समएक संग दर्दो बढ़ए लगलनि‍। दुखक संग छटपटाएव शुरू भेलनि‍। सुशीलाक छटपटाहटि‍ देखि‍ सुनयना पलनि‍केँ कहलखि‍न- “कनि‍याँ, अहाँ देखि‍अनु ता बच्‍चा सम्‍हारि‍ दइ छी।‍”
पेटपर हाथ दइते पलहनि‍ बुझि‍ गेली जे दोसर बच्‍चा हेतनि‍। बजलीह- “काकी, एकटा बच्‍चा आरो हेतनि‍?‍”
पलहनि‍क बात सुि‍न, जहि‍ना मेघ तड़कैत तहि‍ना सुनयनाकेँ भेलनि‍। जोरसँ तपेसरकेँ कहलखि‍न- “बौआ, बौआ।‍”
अकचका कऽ तपेसर बाजल- “हँ, माए।‍”
“हँ, अंगनेमे रहह।‍”
करीब बीस मि‍नट पछाति‍ बेटीक जन्‍म भेलनि‍। अखन धरि‍ जहि‍ना खुशीक सुगंध अंगनामे पसरल छल एकाएक ठमकि‍ गेल। बच्‍चाक जन्‍म होइतहि‍ सुशीलाक देह लर-तांगर भऽ गेलनि‍। पलहनि‍ सुनयनाकेँ कहलनि‍- “काकी, पुरबा लपटै छै। अगि‍यासी नीक-नहाँति‍ जगा देथुन ओना तँ सभ भगवानक हाथमे छनि‍ मुदा जहाँ तलि‍क पार लागत से तँ करबे करबनि‍। जानि‍ये कऽ तँ भगवान दुख बढ़ा देलखि‍नहेँ। अइ (पहि‍ल)‍ बच्‍चापर इ नजि‍र राखथु अइपर हम रखै छी।” कहि‍ बच्‍चाक पोछ-पाछ करए लगली। साँस मन्‍द देखि‍ मुँहमे मुँह सटा फूकि‍ साँसक गति‍ ठीक केलनि‍। बच्‍चाक लक्षण देखि‍ पलहनि‍क मन बाजि‍ उठल। जरूर दुनू बच्‍चा ठहबे करत। नजरि‍ पैछला काजपर पड़ल। एहेन कि‍ पहि‍ल-पहि‍ल बेरि‍ भेलि‍। कतेकोकेँ भेलनि‍। कि‍दु गोटेक दुनू बँचलनि‍, कि‍छु गोटेक एकटा बँचलनि‍ आ कि‍छु गोटेक जच्‍चा-बच्‍चाक संग चलि‍ गेलीह। ओना काज तँ अनि‍श्‍चि‍त अछि‍ मुदा अपना भरि‍ तँ ति‍या-पछा करवे करबनि‍। सुशीलाकेँ सुनयना पुछलखि‍न- “कनि‍याँ मन केहन लगै-ए?‍”
अर्ध-चेत अवस्‍थामे सुशीला अपन टूटैत जि‍नगी हाथक इशारासँ कहलकनि‍। मुँहक सुरखी कहैत जे नइ बँचब। सुशीलाक इशारासँ सुनयना बुझलनि‍ जे तपेसर भारी वि‍पत्ति‍मे पड़ि‍ गेल। भगवानपर खींझ उठलनि‍। बेचारा फट्टो-फनमे पड़ि‍ जाएत। हम बूढ़े भेलौं, जएह कएल हएत ततवे ने सम्‍हारि‍ देबइ। मुदा वि‍पत्ति‍ तँ ततबेटा नइ ने छै। खेती-पथारी, माल-जाल, दसटा कुटुम-परि‍वार छै तइपर सँ दू-दूटा चि‍ल्‍का भेलइ। कना सम्‍हारि‍ पाओत। ने स्‍त्री बँचतै आ ने एक्कोटा बच्‍चा। हमहूँ कते दि‍न जीि‍व। सभ ि‍कछु बेचाराकेँ हरा जेतइ। हे भगवान, तोरा केहन दुरमति‍या चढ़लह जे एहेन गनजन बेचाराकेँ केलहक।
आंगनमे बैसल तपेसरक मनमे उठैत जे जतेटा मोटरी माथपर उठत ततबे ने उठाएव। नमहर मोटरी कते काल क्‍यो माथपर सम्‍हारि‍ कऽ रखि‍ सकैए। मुदा तेँ कि? जीत्ता जि‍नगी हारि‍यो मानि‍ लेब उचि‍त नहि‍। करैत-करैत-लड़ैत-लड़ैत जे हेतइ से देखल जेतइ।
जहि‍ना रणभूमि‍मे दू दलक बीच लड़ाइ अंति‍म दौड़मे अबि‍तहि‍ दुनू दलक मन मानि‍ लैत जे के जीतत के हारत। मुदा हरलोहोक बीच रंग कते रंगक वि‍चार उठैत। कि‍छु गोटे रणभूमि‍सँ भागए चाहैत तँ कि‍दु गोटे अढ़ भजि‍या नुकाए जाहैत। मुदा कि‍छु एहनो होइत जे अपन बलि‍ देखि‍ स्‍वेच्‍छासँ अंति‍म समए धरि‍ हथि‍यार उठौने रहैत अछि‍। कोना नहि‍ उठाओत? अपन जि‍नगीक संगी, जे कौआ-कुकुड़क पेट भरि‍ अपन मनोरथ पूरा करत, आ हम गुलाम बनि‍ दुश्‍मनक जहलमे सड़ब।
अपन अंति‍म बात सुशीला पलहनि‍यो, सासुओ आ पति‍योकेँ कहलक- “हम नइ बँचव। दुनि‍याँक सभसँ पैघ पापी छी जे अपनो रक्‍छा नै कऽ सकलौं। दुनू बच्‍चाकेँ अहाँ सभ देखबै।‍” कहि‍तहि‍ आँखि‍ बन्न भऽ गेलनि‍। प्राण तँ बँचल रहनि‍ मुदा चेतन-शुन्‍य भऽ गेलीह।
क्रमश:

बिपिन कुमार झा
विरासत केर संरक्षण केकर उत्तरदायित्व?
अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम्।
अपरे स्थातुमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्॥
यक्ष-युधिष्ठिर सम्वाद मे कहल गेल अछि जे- प्रतिदिन जीव मृत्यु कॆं प्राप्त करैत अछि मुदा ओतहि अन्य लोक ई बुझितो एतहि रहबाक इच्छा करैत अछि। एहि सँऽ आश्चर्य की भय सकैत छैक?
एहि भौतिक जगत मे कोनो वस्तु संस्था अथवा कोनो समाज शाश्वत नहिं कहल जा सकैत अछि। ओ डायनासोर हो अथवा हडप्पा, मेसोपोटामिया अथवा कोनो लुप्तप्राय सम्प्रदाय सभ एक न एक दिन कालक गाल मे विलीन भय जायत ई ध्रुव सत्य अछि।
हमर संकेत मिथिलाक सिरमौर अपन श्रोत्रिय समाज दिस अछि। प्रश्न अछि श्रोत्रिय समाज के सदस्य होयवा मे गर्व कियाक अनुभूत होइत अछि? की ई समाज कोनो अन्य समाज सँ भिन्न नहिं? यदि भिन्न तऽ कोन आधार पर? रहन सहन-खानपान आकि बात व्यवहारक कारण एकरा पृथक देखल गेल अथवा कोनो अन्तर्निहित गुण अन्य समुदाय सँऽ एकरा पृथक कयल?
एहि ठाम पृथकतावादी नीतिक अनुसरण नहिं कयल जा रहल अछि अपितु अपन श्रोत्रिय समाज के अभ्युत्थान दिस एकटा सामान्य दृष्टिपात कयल जारहल अछि जे एकरा अभिलिखित करबा मे मदद करत अन्यथा ई समाज काल केर गाल मे समा गेलाक बाद इतिहासो सँ कोशो दूर भय जायत।
एहि समाजक आरम्भ के कयलथि? ई समाज कियाक अस्तित्व मे आयल? एकर संस्कृति की अछि? एकर विधि व्यवहार आदि शास्त्रसम्मत अछि अथवा मात्र परम्परा केर निर्वहण अभिप्राय रहि गेल? यदि शास्त्रसम्मत अछि तऽ कोन ग्रन्थ मे एकर चर्चा अछि? ओहि ग्रन्थ केर प्रामाणिकता निर्विवाद अछि अथवा नहिं? जाति, कुल, पाँजि, मूल, गोत्र की थीक? एकर की औचित्य छल? यदि औचित्य छल तऽ आब एकर अनौचित्य कोना निर्धारित भेल जा रहल अछि?
श्रोत्रिय समाज सँ सन्दर्भित उक्त चर्चित किछु एहेन मूलभूत प्रश्न अछि जे आवश्यक अछि एहि समाजक Documentation हेतु। ई कार्य एतेक सहज नहिं। हम किछु ग्रन्थ देखल मुदा ओ एहि मे स किछु प्रश्नक चर्चा तऽ अवश्य करैत छथि मुदा मूल सन्दर्भ देबा मे असमर्थ छथि।
’सारस्वत-निकेतनम्’ जे कि संस्कृत आ अपन संस्कृतिक अभ्युत्थान हेतु सतत् समर्पित अछि, अपन श्रोत्रिय समाज सन्दर्भित मूल स्रोतक आ एकर अक्षुण्ण संस्कृति केर विविध पक्षक Documentation करय जा रहल अछि। एहि कार्य मे अपनें सभ सँऽ विशेषकर एहि समाजक इतिहासक ज्ञाता बुजुर्ग आ सक्रिय युवा कें सहयोगक सर्वथा अपेक्षा अछि।
यदि उक्त सन्दर्भ मे कोनो जानकारी उपलब्ध करा (kumarvipin.jha@gmail.com) सकी तऽ एहि विशाल यज्ञ मे एकटा आहूति सदृश होयत। एहि सन्दर्भ मे सूचित करब उचित होयत जे एहि दिशा मे एकटा साइट बनि कें तैयार अछि जेकर URL केर औपचारिक घोषणा यथाशीघ्र कयल जायत।
शुभमस्तु
३.
बसंत झा
उगना
इ कहानी १३४८-१४५२ के बिचक अछि जाही मे महा कवी विद्यापति के जन्म बिस्फी गाम मे भेलानी और ओ मैथिलीक बहुत पैघ कवी भेला जिनका कबी कोकिल के उपाधि देल गेलनी और ओ महादेव के बहुत पैघ भक्त सेहो छला
कवी विद्यापतिक रचना एतेक प्रभाबी होईत छलनी जे जखन ओ आपण रचना के गबैत छला त कैलाश पर बईसल भगबान महादेव प्रशन्न भ जाईत छला और हरदम हुनक रचना सुनबाक इच्छा राखैत छला, ई इच्छा एतेक बड़ी गेलनि जे ओ एक दिन माता पार्वती के कहलखिन " हे देवी सुनु, हम मृत्युलोक जा रहल छी कवी विद्यापतिक रचना हमरा बहुत नीक लागैत अछि और हमर मोन भ रहल अछि जे हम हुनका संगे रही क' हुनक रचना सुनी, त अहां अही ठाम कैलाश मे रहू और हम जा रहल छी मृत्युलो" और रचना सुनबाक लेल धरती पर आबी गेला, और विद्यापति के ओतै नौकर बनी क उगना के नाम स काज कर लागला ओ विद्यापतिक चाकरी मे लागी गेला ओ हुनकर सब काज करथिन हुनका पूजक लेल फूल और बेलपत्र तोरी क आनैथ बरद के चरबैथ सब चाकरी करैत और राइत मे सुत्बा काल मे हुनकर पैर सेहो दबबैथ (धन्य ओ विद्यापति जिनक पैर देवक देव महादेव दबबैथ) अहि प्रकारे जखन बहुत दीन बीत गेल, ओम्हर माता पार्बती बहुत चिंतित भ गेली हुनका लगलैन जे आब महादेब मृत्यु लोक स वापस नै एता, और ओ हुनका बापस अनबाक प्रयास मे लैग गेली, ओ क्रोध के आदेश देलखिन जे आहा जाऊ और विद्यापतिक पत्नी सुधीरा मे प्रवेश क जाऊ जाही स उगना द्वारा कोनो गलत काज भेला पर सुधीरा हुनका मारी क भगा देती, लेकिन माता पार्वती के इ प्रयाश सफल नै भेलैन तखन ओ दोसर प्रयाश केलि ओ प्याश के कबी विद्यापतिक ऊपर तखन सवार क देलखिन जखन ओ एकटा जंगल के रास्ता स उगना संगे राजा शिव शिंह के ओतै जारहल छला ओ घोर जंगल छलाई ओत दूर दूर तक ज'लक कोनो आस नै छलाई और ओही बिच मे कवी विद्यापति प्याश स तरपअ लागला "रे उगना जल्दी सँ पाइन ला रउ नै ता हम मइर जेबउ बर जोर स प्यास लागी गेलौ" कहैत जमीन पर ओन्घ्रे लगला, आब उगना की करता ओ परेशान भ गेला एम्हर उम्हर पाइन के तलाश मे भट्क' लगला हुनका पाइन नै भेटलैन, तखन ओ एकटा गाछक पाछू मे नुका गेला और अपण असली रूप धारण क' अपन जटा सँ गंगाजल निकालला' और फेर उगनाक रूप धारण क विद्यापति के ज'ल देलखिन, विद्यापति जल पिबैते देरी चौक गेला ओ उगना स पूछ' लागला " रे उगना इ त गंगाजल छऊ, बता एता गंगाजल कत स अन्लाए" आब उगना की करता ओ कतबो बहाना बनेला लेकिन हुनकर एको नै चलल, ओ कि करता हुनका विबश भ अपन रूप देखाब' परलानी और ओ अपन असली रूपक दर्शन कवी विद्यापति के देलखिन, विद्यापति महादेवक अशली रूपक दर्शन करिते देरी चकित रही गेला और हुनक चरण पर खसी क हुनका स छमाँ माँग' लागला "प्रभु हमरा छमाँ करू हम अहां के चिन्ह नै सकलौं हमरा स पहुत पैघ अपराध भ गेल" तखन हुनका उठाबैत महादेव कहलखिन "हम आहा संगे एखन और रहब, लेकिन हमर एकता शर्त अछि जे आहा इ बात केकरो स नै कहबनी और जखने आहा इ बात केकरो लंग बाजब ओही छन हम अहाँ लंग स चली जायब" विद्यापति शर्त के मंजूर करैत और दुनु गोटे राजदरबार के तरफ चली गेला, माता पार्बती के इहो प्रयाश सफल नै भेलैन. तखन एक दिन उगन के बेलपत्र लावय मे कनिक देरी भ गेलनि ताहि पर सुधीरा एतेक क्रोधित भ गेली कि ओ चुल्हा मे जरैत एकटा लकड़ी निकली क हुनका मारबाक लेल उठेल्खिन "सर'धुआ आय तोरा नै छोर्बाऊ तू बड शैतान भ गेला हन हमर बच्चा सब भूख स बिलाय्प रहल अछि और तू एतेक देर स बेलपत्र ल' क' एलै हन" कहैत हुनका दिश बढ़लखिन, तखन विद्यापति स देखल नै गेलन्हि और ओ बजला "हे हे इ की करैत छि इ त साक्छात महादेव छैथ" और एतबे कहिते महादेव गायब भ गेलखिन, फेर विद्यापति हुनका जंगले जंगले तक' लगला और "उगना रे मोर कतै गेला" गबैत रहला लेकिन उगना फेर हुनका नै भेटलखिन, और ओ अपन प्राण तियैग देलखिन I
ओ स्थान जाहि ठाम देवक देव महादेव कवी-कोकिल विद्यापति के अपन अशली रूपक दर्शन देने छलखिन ओही ठाम "बाबा उगना" के मंदिर छैन और ओहिमे शिवलिंग जे छाई से अंकुरित छाई, जेकर कहानी किछु एहन, छाई जे एक बेर गामक एक बुजुर्ग ब्यक्ति के महादेव सपना देलखिन की "हम एकता गाछक जैर मे छी" और ओतै बहुत पैघ जंगल छलई तखन गामक लोक सब तैयार भ क ओय ठाम गेला और पहुँच क जखन खुदाई केला त देखलखिन की एकटा बहुत सुन्दर शिवलिंग छाई, सब गेटे बहुत खुश भेला और विचार भेलय की हिनका बस्ती पर ल चलू ओय ठाम मंदिर बना क हिनक स्थापना करब और हुनका उठेबाक लेल जखने हाथ लगेलखिन की ओ फेर स जमीन के भीतर चली गेला, फेर स कोरल गेल और हुनका निकलवाक प्रयाश कैल गेलई, इ प्रयाश दू तीन बेर कैल गेल मुदा सब बेर ओ जमीन के भीतर चली जायत छला, तखन सब गोटे के बुझबा मे एलईन जे इ अहि ठाम रहता और अय ठाम स नै जेता, तखन ओही ठाम साफ सफाए कैल गेल और तत्काल मंडप बनैल गेल और बाद मे मंदिरक निर्माण सुरु भेल जे १९३२ मे जा क तैयार भेल और अहि मंदिरक परिसर मे ओ अस्थान सेहो अछि जाहि ठाम महादेव अपना जटा स गंगाजल निकलने छला और आय ओ इनारक रूप मे अछि जेकरा "च्न्द्रकुप" के नाम स जानल जैत छाई और एखनो ओकर जल शुद्ध गंगाजल छाई, जे लैब टेस्टेड छाई !
दरभंगा के एकटा बहुत प्रशिद्ध डॉक्टर अपना मेडिकल लैब मे एकर टेस्ट केने छलखिन और ओ अय बात के सुचना ग्रामीण सब के देलखिन जे अय मे पूरा गंगाजल के तत्व बिद्यमान अछि, और इ दोसर रुपे सेहो टेस्टेड छाई, अय जल के यदि अहां बोतल मे राखि देबय ता इ ख़राब नै होइत छाई
इ स्थान मधुबनी जिलाक भवानी पुर गाम मे स्थित अछि
एत' सब गेटे एकबेर जरुर आबी, एही स्थानक कुनु तरहक जानकारिक लेल अहां हमरा स संपर्क क सकैत छि
"जय बाबा उग्रनाथ"
हमर इ सोभाग्य अछि कि हमर जन्म एही गाम मे भेल अछि और हमर बचपन अय स्थान पर बीतल अछि,

Suggested citation: शम्भु कुमार सिंह. “मैथिलीक प्रमुख उपभाषाक क्षेत्र आ ओकर प्रमुख विशेषता.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 66, 2010-09-15. https://www.videha.co.in/research/2010/66/मैथिलीक-प्रमुख-उपभाषाक-क्षेत्र-आ-ओकर-प्रमुख-विशेषता.htm

मूल विदेह अंक / Original issue