“यू.पी.एस.सी. (मैथिली) प्रथम पत्रक परीक्षार्थी हेतु उपयोगी संकलन”
संकलनकर्ता: डॉ. शंभु कुमार सिंह
मिथिलाक परम्परागत सीमा बृहदविष्णुपुराण (5म शताब्दी)क मिथिलामहात्म्य खंड मे वर्णित अछि जकर अनुवाद कवीश्वर चन्दा झा एहि प्रकारेँ कएने छथि:
“गंगा बहथि जनिक दक्षिण दिसि पूर्व कौशिकी धारा
पश्चिम बहथि गण्डकी उत्तर हिमवत बल विस्तारा
कमला त्रियुगा अमृता धेमुड़ा बागमती कृतसारा
मध्य बहथि लक्ष्मणा प्रभृति से मिथिला विद्यासारा।”
बृहदविष्णुपुराण मे मिथिलाक बारह गोट नामक उल्लेख भेटैत अछि:
मिथिला तीरभुक्तिश्च वैदेहीनैमिकाननम।
ज्ञानशीलं कृपापीठं स्वर्णलांगलपद्धतिः।।
जानकी जन्मभूमिश्च निरपेक्षा विकल्मषा।
रामानन्दकरी विश्वभाविनी नित्यमंगला।।
मिथिलाक आदि शासक विदेहक नामपर मिथिलाक नाम ‘विदेह’ पड़ल।
‘तिरहुत’ नामक उल्लेख सर्वप्रथम पुरूषोत्तमदेवक ‘त्रिकाण्डकोश’ (12म शताब्दी) मे भेल अछि।
विदेह राज्यकुलक मिथिला पर शासनक समय 3000 ई.पू. सँ 600 ई.पू. धरि अनुमानित अछि।
मिथिलामे पञ्जी व्यवस्थाक सम्पादन कर्णाटवंशीय नरपति हरिसिंहदेवक द्वारा प्रारंभ भेल।
सप्तरत्नाकरक रचयिता छलाह चण्डेश्वर ठाकुर।
मिथिलाक प्रथम कर्णाटवंशीय शासक छलाह ‘नान्यदेव’ (1097 ई.)।
खण्डवला राजकुलक स्थापना म.म. महेश ठाकुर द्वारा 1557 मे भेल।
मिथिला पर ओइनवार राज्यवंशक शासन चौदहम शताब्दीक मध्यमे आरंभ भेल।
मिथिलामे भस्मसँ अंकित त्रिपुण्ड शिवभक्तिक,लम्बाकार श्रीखंडक टीका विष्णुभक्ति एवं सिन्दूरक ठोप शाक्त भावनाक प्रतीक मानल जाइत अछि।
मिथिलाक्षरक विकास तान्त्रिक यन्त्रसँ मान्य अछि। ई मानल जाइत अछि जे तिरहुताक्षरक आरंभ जाहि मंगल चिह्न ‘आँजी’ सँ होइत अछि से तान्त्रिक कुण्डलनीक बोधक थिक।
मिथिलामे विवाहक अवसर पर गाओल जायबला ‘जोग’ तन्त्रसँ सम्बद्ध मानल गेल अछि।
मिथिलाक धार्मिक जीवनक मुख्यधारा शिव ओ शक्तिमूलक थिक।
मैथिलीय रागरागिनीक प्राचीनतम उल्लेख सिद्ध लोकनिक ‘चर्यापद’ मे उपलब्ध होइत अछि।
कर्णाटनरपति म. नान्यदेव (1097 ई.पू.) मिथिलामे अपन राज्य स्थापित करबाक पश्चात् ‘सरस्वती हृदयालंकार’ नामक संगीतग्रंथ लिखल जाहिमे सर्वप्रथम ओ मैथिलीय रागरागिनीक उल्लेख क्रमबद्ध रीतिएँ कएल।
मैथिलीय संगीतक सक्रिय गतिविधि ओ विकास-प्रसारक दृष्टिसँ म. हरिसिंहदेव (1296-1326)क राज्यकाल विशेष रूपेँ उल्लेखनीय अछि।
‘तिरहुति’ श्रृंगाररसक मधुरगीत थिक, जाहिमे नायक-नायिकाक संयोग-वियोगक रागात्मक वर्णन होइत अछि।
‘बटगवनी’ मे सखी सभक संग समागम-गृहमे पतिसँ अभिसारक हेतु जाइत नायिकाक वर्णन होइत अछि।
‘गोआलरी’ क विषयवस्तु होइत अछि गोपी सभक संग कृष्णक नोंक-झोंक एवं केलिकौतुक।
‘रास’ मे गोपी सभक संग कृष्णक रासलीलाक वर्णन होइत अछि।
रासक सर्वप्रथम रचयिता छथि ‘साहेबरामदास’।
मिथिलाक लोकवाणी हेतु ‘मैथिली’ शब्दक प्रयोग सर्वप्रथम कोलब्रुक 1801 ई. मे कएल, परन्तु एहि नामकेँ प्रसिद्ध करबाक श्रेय मैथिली भाषासाहित्यक आदि उन्नायक ग्रियर्सन महोदयकेँ छन्हि।
कालानुसारेँ मूल भारोपीय भाषाक समय 2500 ई.पू. मानल जाइत अछि।
प्राचीन भारतीय आर्यभाषाक इतिहास 1200 ई.पू. सँ मानल जाइत अछि।
बौद्धधर्मक सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘ललितविस्तार’मे “वैदेहीलिपि”क उल्लेख अछि जकरा मैथिली लिपिक प्राचीनतम स्वरूप कहल जा सकैत अछि।
कोनहुँ युगमे शिष्ट ओ परिनिष्ठित साहित्यसँ भिन्न जे रचना होहत अछि से ओहि युगक लोक-साहित्य कहबैत अछि।
दीर्घ आख्यान पर आधारित गेयात्मक कथा ‘लोकगाथा’ कहल जाइत अछि।
मैथिलीक किछु प्रमुख लोकगाथा काव्य थिक— लोरिकाइन, सलहेस, अनंगकुसुमा, दुलरादयाल, नैका बनिजारा, दीनाभद्री, रईया रणपाल आदि।
‘वर्णरत्नाकर’ निर्विवाद रूपसँ मैथिली साहित्यक प्रथम उपलब्ध गद्य ग्रंथ थिक।
विद्यापतिक ‘पुरूषपरीक्षा’, पंचतंत्र, हितोपदेश आदि परंपराक संस्कृत नीतिकथा थिक।
विद्यापतिक ‘कीर्तिलता’ अवहट्टक गद्यपद्यमय ग्रंथ थिक।
‘गोरक्षविजय’ विद्यापतिक संस्कृत नाटक थिक, जाहिमे मैथिली पद सेहो प्रयुक्त भेल अछि।
‘विशुद्ध विद्यापति पदावली’ विद्यापतिसँ कम सँ कम एक शताब्दीक पश्चातक संकलन थिक।
1879 ई.मे दरभंगा राज हाई स्कूलक स्थापना भेल छल।
1966 ई. मे मैथिली भारतक प्रमुख साहित्यिक भाषाक रूपमे साहित्य अकादेमी, दिल्ली द्वारा स्वीकृत भेल।
मैथिली अकादमीक स्थापना 1976 ई. मे भेल।
नाटकमे आंगिक, वाचिक, आहार्य, तथा सात्विक चारू प्रकारक अभिनय आवश्यक होइत छैक।
‘अंकियानाट’क आदि रचयिता छलाह शंकरदेव (1449-1569)।
मिथिलामे ‘कीर्तनिञानाच’क परिपाटीक आरंभ नवद्वीपक कीर्तनमंडलीक प्रभावसँ भेल 17म शताब्दीक आदिमे।
(स्रोत: मैथिली साहित्यक इतिहास, डॉ. दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’)