२.६.विरेन्द्र कुमार यादव- कथा- नाह आओर जिनगी
२.७.जितेन्द्र झा- महाकवि विद्यापति अक्षयकोष
२.८.बेचन ठाकुर- नाटक- बेटीक अपमान
श्रीमती शेफालिका वर्मा- आखर-आखर प्रीत (पत्रात्मक आत्मकथा)- आगाँ
जन्म:९ अगस्त, १९४३, जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा: एम.ए., पी.एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय),ए. एन. कालेज, पटनामे हिन्दीक प्राध्यापिका (अवकाशप्राप्त)। नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित रचना: झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर, विप्रलब्धा कविता संग्रह, स्मृति रेखा संस्मरण संग्रह, एकटा आकाश कथा संग्रह, यायावरी यात्रावृत्तान्त, भावाञ्जलि काव्यप्रगीत, किस्त-किस्त जीवन (आत्मकथा)। ठहरे हुए पल हिन्दीसंग्रह। २००४ई. मे यात्री-चेतना पुरस्कार।
शेफालिकाजी पत्राचारकेँ संजोगि कऽ "आखर-आखर प्रीत" बनेने छथि। विदेह गौरवान्वित अछि हुनकर एहि संकलनकेँ धारावाहिक रूपेँ प्रकाशित कऽ। - सम्पादक
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सस्नेह- केदारनाथ लाभ, राजेन्द्र कॉलेज, छपरा।
एखन धरि हुनका सँ हमरा भेंट नहि भेल छल। ई पत्र हमरा ओ सहरसाक पतासँ देलनि-हम डुमरा मे छलौं।
प्रिय रजनी
मेरे स्नेह ।
राखी का त्योहार आने के बहुत पहले से तुम्हारी स्नेहिल स्मृतियाँ घनीभूत होने लगती हैं और मैं राखी की तुम्हारी राखी की प्रतीक्षा करने लगता हँू । और हर वर्ष की भाँति इस वर्ष भी सही समय पर तुम्हारी राखी-तुम्हारी स्नेह-सुगंध से महमहाती - आ गयी । हृदय जुड़ा गया मन-प्राण आप्यापित हो उठे आँखे हर्ष-उल्लास से फैल गयी ।
सलोनी पूर्णिमा को वह राखी मेरी कलाई मे बाँधकर मानो दो प्राणों को जोड़ गयी । यह सलोनी पूर्णिमा भी क्या गजब का दिन है। भाई-बहनों को स्नेह-सूत्र मे बाँधकर आनन्द की ज्योत्सना उड़ेल देती है उस दिन की हर घड़ी । राखी के सूखे धागे मे स्नेह का काव्य-रस छलक उठता है छूट उठती है किसी दूर से आनेवाले संगीत की मादक स्वर लहरी नाच उठता है प्रसन्नता से मन का मयूर और राखी भेजनेवाली बहन को मेरा हृदय अशीषने लगता है। तुम्हारा जीवन सुख शान्ति और समृद्धियों के संगीत से गूँजता रहे, तुम शतायु होकर अपनी साहित्य-साधना से लोक मंगल करती रहो - यही इस भाई की अशेष कामना है।
विश्वास है तुम सबके सब सानन्द हो । वर्मा जी को मेरा स्नेह निवेदित हैं। शुभकामनाओं
सहित।
तुम्हारा भाई
केदार नाथ लाभ
भारत छोड़ो स्वर्ण जयंती
9 अगस्त 93
आदरणीया शेफालिका जी
यथोचित
भाई नीरज से और आपके पत्र से भी यह विश्वास जगा कि आप जैसी सशक्त लेखिकाओं के मन-मस्तिष्क मे भी निशांत के प्रति किसी न किसी अनुपात मे जगह हैं । बस इसी समर्थन भाव के बल पर ही तो निशांत धारा के प्रतिकूल जूझता हुआ अपने महान उद्देश्यों की प्राप्ति की ओर बढ़ रहा है। अतः आपलोगों का यह समर्थन हमारे लिए काफी बहुमूल्य है। और इस समर्थन भाव के प्रति आप जैसी महानुभावों का निशांत सदा ऋणी रहेगा ।
पत्र-पत्रिकाओं के जरिये शायद पता चला हो कि पिछले महिने 19 जनवरी 1960 को महान
साहित्यकार व चिन्तक माननीय आनन्द शंकर माधवन जी के संरक्षकत्व तथा श्री रामाधिकारी शर्मा की अध्यक्षता मे लेखकों के हितों की रक्षा एवं उनके मूलभूत उद्देश्यों की पूर्ति के उद्देश्य से भारतीय राष्ट्रीय लेखक संघ को स्थापना की गई है।
राष्ट्रीय स्तर के इस संघ का विभिन्न राज्यों तथा जिलों मे शाखाएँ तेजी से खोली जा रहीं है। बिहार के बतीसो जिलों मे से अधिकांश मे तथा कुछ राज्यों मे यथाशीघ्र इसकी शाखाएँ खोलकर एक जबर्दस्त अधिवेशन आहूत करने की घोषणा है।
आप भी संभवतः इस बात से सहमत हों कि वर्त्तमान समय मे बिना एकजुट हुए लेखक अपने अस्तिव की रक्षा नहीं कर सकते । इन्हीं सब महत्त्वपूर्ण उदेश्यों की पुर्त्ति के लिए
'writers club' की स्थापना की गई है। जिसमे आप जैसे सशक्त और समृद्ध लेखिकाओं का योगदान अपेक्षणीय है। चाहता हँू आप भारतीय राष्ट्रीय लेखक संघ के संयोजन का भार स्वीकार कर सहरसा मे इसकी जिला शाखा खोलकर अपना महत्पूर्ण योगदान दें । निश्चय ही आपका ऐसा समर्थन हमारे लिए एक गौरव की बात होगी । आप इस सम्बन्ध् मे वहाँ के अन्य लेखक-लेखिकाओं से संपर्क साध कर हमे सूचित करें । फिर मैं आपको विवरण सहित संयोजक मनोनयन पत्र डाक से भेज दूँगा । कार्यकारिणी गठन के पश्चात आपके सुविधानुसार भा॰आनन्द शंकर माधवन जी के द्वारा इसका उद्घाटन समारोह भी सम्पन्न कराया जा सकता है। जिससे भारतीय राष्ट्रीय लेखक संघ के सम्पूर्ण
उद्देश्यों की जानकारी वहाँ के लेखकों तथा बुद्विजीवियों को मिल जायेगी ।
हमलोगों को भी आपसे मिलकर प्रसन्नता होगी । तत्काल मैं परीक्षा मे व्यस्त हँू फिर भी
आपको इस सम्बन्ध मे पत्र लिखते हुए रा ले सं की शाखाएँ खुल चुकी है आशा करता हँू आपका भी हमे भरपूर सहयोग समर्थन प्राप्त होगा।
इन्हीं आशाओं के साथ ।
शुभकामनाओं सहित
विकास पाण्डेय
मंत्री भारतीय राष्ट्रीय लेखक संघ
भागलपुर 25 7 79
मान्यवर शेफालिका जी
बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर से हम अभयुक्ति मैथिली गीतिकाव्य मे प्रगतिशील चेतना पर शोध क रहल छी। प्रगतिशील एवं मैथिली गीतक संदर्भ मे हमरा अपने सँ किछु जिज्ञासा अछि। अपने सन प्रसिद्ध साहित्यकार विद्वान आ महान लेखिका हमर जिज्ञासा केँ सिद्ध क सकथि। इएह सोचि किछु प्रश्नावली अपनेक सेवा मे प्रस्तुत क रहल छी कृपया पन्द्रह दिनक अनन्तर एकर उत्तर लिखिक कृतार्थ कएल जाए। हमरा आशा नहि पूर्ण विश्वास अछि जे अपने हमर कार्य सिद्धिक श्रेय अवश्य लेब।
अपनेक
पूनम कुमार बर्मा
द्वारा डा शान्ति सुमन
मिठनपुरा मुजफ्फरपुर
महोदया शेफालिका जी
फगुआ आबि रहल अछि। फगुआ मे तीत मीठक अनुभव लेने होयब। किछु घटना एहनो
भेल होयत जे फगुआ के नामे सुनला सँ मानस पटल पर नाचऽ लगैत होयत। किछु मनलगगु होयत तँ किछु अनसोहांत आ किछु तँ निठ्ठाहे जोगरक एहने सन किछु अविस्मरणीय घटना मिहिरक पाठककें सुनाबी से आग्रह
भवदीय
दिलीप कुमार सिंह झा
मिथिला मिहिर 7 2 89
ई पत्र पढ़ि मोन पड़ि जाइत अछि डुमरा बाबू जी संग केओ होली नहि खेलि सकैत छल लेकिन सूकू बाबूजीक मुँह मे अबीर आ देह मे रंग दय खूब थपड़ी पारैत छली। पाछा पाछा पींकी लीली-दादाजी हम्मु-बाबूजी खिलखिलाके हँसैत छलाह। ब्याहक बाद एक बेर फगुआ मे वर्मा जी अपन जिगरी दोस्त कहु वा कि लंगोटिया यार बच्ची बाबूक संग भांगक लोटा लय पहुँचि गेलैथ रंग अबीरक नशा मे मातल - हमरा सँ भांग पीबाक आग्रह केलन्हि। आय धरि कहियो हम वर्मा जी के भांग पीबैत नहि देखने छलौं। भरि दिन सीरा आगुक पूआ पकवान बनवैत गौआं संग रंग खेलैत हम एकदम थाकि गेल रही! आब अबीर खेलय बलाक टोली देओर ननदि सभ बाँचले छल! चूँकि ब्याहक तीन चारि बरीस बाद होली मे रहबाक अवसर भेटल छल! पढ़ैत छलौं तँ होलीक छुट्टी एक हफ्ताक मात्रा होइत छल-पटना सँ डुमरा काशी जकाँ त्रिशूल पर छल!
साँझ भऽ गेल छल! जल्दी जल्दी गोसाँय कें साँझ देलौं। समस्त वातावरण सिनुरिया भऽ गेल छल! सभ अलमस्त ताहि पर बेर-बेर हिनक आग्रह भाँग पीबाक! तामस बड़जोर छल जकरा पान बीड़ी सिगरेट सुपारी चाह काफी पीबाक हिस्सक नहि छल ओ एकदम सँ सीधे भांग पर उतरि गेल छलाह। अनटोटल कथा सुनिते बिथा- हमरा हिनक जिद बड़ विचित्र लागि रहल छल- पता नहि भांग पीबाक बाद हमर की दुर्गत होयत हम निहोरा करैत बाजलौं- हम सासुर मे छी पटना मे नहि कोनो उच्छृंखलता भऽ जाइत तँ अन्हेर भऽ जाइत।
और मुँह फुलाय कोना मे बैसि गेलाह-
सोचैत रही हमहुँ रूसि सकितहुँ मुदा तुर्रा तँ ई छल गलतीयो वएह करैत छलाह आ मनाब हमरे पड़ैत छल। ओ तँ तामसे कबाब जकाँ जरल जरल रहैत छलाह। नहि जानि ई पति नामधारी जीव किएक अपन पत्नी पर एतेक रोब झाड़ैत छथि जेना हुनक जन्मसिद्ध अधिकार होय-
आ आइ फगुआक राति ई अप्रसन्न भऽ जेताह तँ हमही अपन प्रसन्नता लय की करब, हमर प्रतिष्ठा आब अहाँक हाथ अछि। जँ बाबूजी जानि जेताह तँ नहि जानि कोन अनर्थ भऽ जाइत। हम हिनका समक्ष विवश भऽ गेलौं, एक दिसि बाबूजीक धियान अबैत छल जे अपना जमानाक प्रभुत्व सम्पन्न जमींदार मुखिया आ हिमालय सन व्यक्तित्वक स्वामी छलाह जिनका सँ बात करबाक अपन बेटा सभकें साहस नहि होयत छल दोसर दिसि ललित लवंग लतापरिशीलन सन अपन सुन्दर पति देवताक निर्दोष प्रेममय पहिलुक आग्रह-
जीत हुनक भऽ गेल! हमरा एक गिलास दूध सँ भरल शरबत पीआय एकटा विजयिनी मुस्कीक संगे यार दोस्तक टोली मे कचहरी पर चलि गेलाह।
सासुर मे पर्दाप्रथा तँ कठोर रूपें लागू छल। हवेली सँ बाहर नहि निकलि सकैत छलौं। दलान पर नहि बैसि सकैत छलौं। गामक इजोरिया पूर्णिमाक इजोरिया अंगनाक कोन कोन मे पसरि गेल छल मदमस्त भऽ। गामक टोली पर टोली ढोल झाल मृदंग हरमुनिया लऽ कऽ फाग गबैत निसाँ मे चूर अबैत छल-जल कैसे रे भरी जमुना गहरी-नामी नामी केसिया भुंइयाँ मे लोटै हे पिया परदेश मोरा दीयरा लुभेलक गीतक समवेत स्वर लहरी पर आसमान झूमि रहल छल धरती नाचि रहल छल-चान निमिमेष ताकि रहल छल-
अचक्के हमर कान मे सन्न-सन्न स्वर अबय लागल! जेना कतेको माईकक स्वर कतेको घड़ी घंटक स्वर गूँजित भ रहल होय। हमर माथ घूम लागल आ अचक्के लागल जे हम एकमद हल्लुक भऽ गेल छी। हम अपना के जाँचवा लेल उठि के ठाड़ भऽ गेलौं। एक डेग धरती पर राखलौं कि हम धरती पर छी वा कि हवा मे! फेर दोसर डेग आस्ते सँ राखलौं- डेगा डेगी नपैत हम किछ दूर चलैत रहलौं आ लागल जेना हवा सँ हल्लुक हम भऽ गेल छी- हम अन्तरिक्ष मे परी जकाँ उड़ि रहल छी। चारू कात निस्तब्धता पसरल छल। रात्रि तीति भीजि अलसाय सूतल छल इजोरियाक कोरमे।
नहि जानि कोन ज्वार उठल हम एहिना डेगा डेगी दैत उड़ैत दलान पर पहुँचि गेलौं जे पुतौह सभ लेल वर्जित स्थान छल! हमर आँचर अस्त व्यस्त दलान एकदम सून्न इजोरियाक शुभ्र वसन समूचा प्रकृति कें धवल बना देने छल। ओसाराक पाया पकड़ि हम खूब हँसय लागलौं। हमर अचेतन मे ई भाव स्पष्ट छल जे हम अनुचित कऽ रहल छी मुदा चेतन मे अपना कें संभारि नहि पबैत रही।
अचानक बाबूजी गाम दिस सँ घूमैत दलान पर आबि गेलाह। हमरा ओहि अवस्था मे देखि निश्चित रूप सँ ओ अचंभित भऽ गेल हेताह। हमरा लागल जे दूर सँ आँखि फाड़ि-फाड़ि देखि रहल छलाह जे ई कनिये थीकिह ने हम तँ भांगक मस्ती मे छलौं। हुनका देखि आर जोर सँ ठहाका लगबए लगलौं। मुदा हम जानि रहल छलौं जे हम गलत काज कय रहल छी। तावत बाबूजीक पाछा पाछा ई अपने आबि गेलैथ।
दलान पर हमरा एसगरे देखि बताहि जकाँ ठहाका लगबैत देखि हिनका बहुत जोर तामस उठि गेलैक ताहि पर बाबूजीकें ठाड़ देखि- अचक्के हिनका अपन करनीक धियान एलैक त भागि कें अंगना चलि एलैथ- पाछू पाछू बाबूजी धीर गंभीर चालि सँ चलि गेलैथ। राति कछमछी मे हिनकर बीति गेल- अहाँ हमर करनी सभ कें तँ नइ कहि देलीयैक हम आय धरि सोचि रहल छी - बाबूजी
अपना मने की सोचैत हेथीन- किएक ककरो लग एकर जिज्ञासा नहि केलखिन- कहीं बाबूजी सेहो तँ नहि भाँग सँ मातल रहथीन- मुदा ई सत्य छैक जे हमरा मे एखनो ई घटना एकटा अपराध बोध जगा जाइत अछि-
सेवा मे
चिर सौभाग्यवती श्रीमती शेफालिका जी
अशेष आशीष ।
अहाँक पत्र भेटल । श्री गोपी बाबू अहाँक सम्बन्ध मे वड़ आकुल छथि । स्थिति सँ अवगत भेलहु । अहांक जे व्यवधान से किन्नहु नहि रहत माँ भगवती श्री 108 उग्रतारा माइ अहांक समस्त व्याकुलता के हरण कै लेती । हम दिसम्बर कें वनगामक हेतु चलब आ 3 दिसम्बर के वनगाम पहँुचि जायब । अहाँ कृप्या 2 से 3 दिसम्बर धरि वनगाम हमरा से सम्पर्क करी । 2 कै सम्पर्क करी ते सर्वश्रेष्ठ । हम अहाँ क ल क उग्रतारा माईक शरण मे जायब संग मे ओकिल साहेब रहथि तै आर नीक । कृपया एकटा श्वेत शंख एकटा रूद्राक्ष आ नौ टा मूंगाक प्रबन्ध कै के राखव। एकटा
आर अनुरोध। कृप्या कोनो प्रकारक भोजनक आग्रह नहि करव । मात्रा हम चायटा पीयव । अहि प्रक्रिया लेल आवश्यक छैक । त अहाँ गुगल लौहवान जटामसी सड़ड़ चन्दन कर्पूरक मिश्रण से अपना घर मे साँझ भोर धूप देव ।
भगवती अहाँक कल्याण करथि ।
कोनो तरहक चिन्ता नहि करब । माय चिन्तामणि छथि ।
सस्नेह
मणिपद्यम
बहेड़ा 5 11 82
(क्रमशः)