महाकवि विद्यापति अक्षयकोष । एहिकोषक दयनीय अबस्था बयान कऽरहल अछि जे सरकारी संयन्त्र कतेक संवेदनशील अछि नेपालमे सभसं बेशी बाजल जाएबला दोसर भाषा मैथिलीक लेल ।
नेपाल सरकारे गत आर्थिक वर्ष व़ि स़ ०६६/०६७ क बजेटमे १ करोड टका अलग कएलक विद्यापति अक्षयकोषलेल । जकर उद्देश्य छल अक्षयकोषक स्थापना आ मैथिली भाषाक विकासमे योगदान कएनिहारके पुरस्कृत करब ।
नेपाल सरकार पहिल बेर बजेट भाषण मार्फत विद्यापतिक सम्मानमे एहि तरहक कोष स्थापनाक घोषणा कएने छल । मूदा बजेट भाषणक १७ महिना बितिगेलाकबादो अक्षयकोषक स्थापना नईं होब सकल अछि । संस्कृति मन्त्रालय अक्षय कोषक भार टारऽ लेल १ करोड राशि बृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद्क जिम्मा लगा देने अछि । बृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद् संस्कृति मन्त्रालय अन्तर्गतके एकटा कार्यालय अछि जे धनुषा आ महोत्तरी जिलाक धार्मिक तथा ऐतिहासिक सम्पदा संरक्षण करबाक उद्देश्यसं स्थापित अछि ।
संस्कृति मन्त्रालय अक्षयकोषक काज बृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद् करत से कहैत कानमे रुइतेल धऽ कऽ सूतिरहल अछि । भाषा संस्कृतिक विकासक सरकारी ठेकेदार संस्कृति मन्त्रालयक अकर्मन्यतासं अक्षयकोष स्वरुप नईं ल सकल अछि ।
संगीत तथा नाट्य प्रज्ञा प्रतिष्ठानक प्राज्ञ रमेश रञ्जन कहैत छथि र्अक्षयकोषक राशि फ्रिज होएवाक अबस्थामे पहुंचलाकवाद मन्त्रालय बृहत्तर जनकपुर परिषद्क खातामे पाई पठओलक । एखन बृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद् आ संस्कृति मन्त्रालयक सझिया खातामे कोषक राशि राखल अछि ।
सिमित दायरा रहल जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद्मे कोषक राशि पठाओल जएबाक आलोचना सेहो भऽ रहल अछि । परिषद् समग्र मैथिली भाषीक प्रतिनिधित्व नहि करैत अछि कहैत छथि कोषक पूर्व अध्यक्ष रामचन्द्र झा । झा कहैत छथि परिषद् सभक भावनाके नहि समेटि सकैत अछि । विद्यापति अक्षयकोषक उद्देश्य मैथिली भाषामे योगदान कएनिहारके पुरस्कृत करबाक अछि । बृहत्तर दू जिलामे लक्षित कार्यक्रम करैत अछि, एहनमे बृहत्तरके अक्षयकोष स्थापनाक जिम्मा देनाइ औचित्यहीन रहल भाषा संस्कृतिविद्सभ कहैत छथि ।
परिषद् भ्रष्टाचारमे डुबिगेल आरोप लागि रहल समयमे कोष मूर्त रुप लऽ सकत या नहि कहब कठिन अछि । कोष आकार ग्रहण करए ताहिके लेल संस्कृति मन्त्रालयके कार्यविधि बनाबऽ पडतै, जाहिलेल एखनधरि कोनो काज शुरु नहि भेल अछि । कोषक कार्यविधि आ निर्देशिका नईं भेलाक कारणें कोषक पाई सरकारी खाताक शोभा मात्र बढा रहल अछि । कोषक १ करोड राशि बैंकमे रखैत काल बेशी ब्याज देनिहार बैंकके नहि चुनल गेल कहैत छथि प्राज्ञ रञ्जन । बैंकसभमे पाइके अभाव रहल अबस्थामे बेशी ब्याज लेल बार्गेनिंग हएबाक चाही छल, मुदा मन्त्रालय मनमौजी काठमाण्डू स्थित एक निजी बैंकके शाखामे पाइ राखिदेलक ।
संस्कृति मन्त्रालयक सचिव मोदराज डोटेल कोषक राशि बैंकमे सुरक्षित रहल प्रतिक्रिया देलनि । अक्षयकोषलेल कार्यविधि बनबाक प्रकृया शुरु भऽ गेल डोटेल जनतब देलनि ।
मैथिली भाषाक महाकवि विद्यापति नेपालक राष्ट्रिय विभूति भेलाकबादो हूनक परिचय स्थापित नहि होब सकल अछि । मैथिली भाषा आ संस्कृति लेल बजेटक अभाव रहल समयमे विद्यापति कोष सेहो अनिर्णयके बन्दी भऽ गेल अछि ।
विद्यापति स्मृति पर्वपर मैथिली भाषा संस्कृति उत्थानक भाषण त बहुत देल करैत छथि कथित बौद्धिक वर्ग । एहिबेरके स्मृति पर्व सेहो ओहने भाषणसभसं बितिगेल ।
महोत्तरी जिलाक बनौलीमे बर्षोसं निर्माणाधीन विद्यापतिद्वार एखनोधरि टकटकी लगौने ठाढ अछि । विद्यापति स्मृति दिवसमे जनकपुरक विदापति चौकपर रहल विद्यापति स्मारकमे घडी रखवाक भाषण सबनेता देलकरैत अछि ,मुदा दशो वर्षक अन्तरालमे घडी लगेवाक कुवत किनको नईं भेलन्हि अछि । भोटक समयमें मैथिली भाषा संस्कृतिक रक्षा एवं विकासक वाचा केनिहार नेतासब मात्र नइभ विद्यापतिक नामपर पेट पोसनिहार सेहो दोषी अछि एहिमे । विद्यापति स्म्ृत्ति पर्व पिण्डदानक पर्व मात्र बनिक रहिगेल अछि ।
बेचन ठाकुर
नाटक- बेटीक अपमान
(अंक तेसर, दृश्य पहिल)
(स्थान- दीपक चौधरीक घर। दीपक रोगग्रस्त अवस्थामे माथपर हाथ लेने बैस कऽ खांसि रहल छथि।)
दीपक : (खासैत) आह! ओह! दुनियाँमे कियो ककरो नहि कियो देखनिहार। जा धरि पैरूख छल, ताधरि झूठ-फूस, एम्हर ओम्हर कए बेटा बियाहलहुँ। मुदा आब कतौ कियो नहि। (खांसैत छथि)
(महेन्द्र पंडितक प्रवेश)
महेन्द्र : दोस, बड गड़बड़ स्थितिमे देखि रहल छी अहाँकेँ। एना किएक? की भए रहल गेल?
दीपक : की हएत दोस? कप्पारमे जे धँसल अछि। सएह ने होएत। (खांसैत छथि)
महेन्द्र : बड खाेंखी होइत अछि।
दीपक : की कहु दोस, दम्मा जोर कए देलक। एक्को रत्ती सक्क नहि लगैत अछि। ताहिपर सँ भनसा-भात अपने केनाइ।
महेन्द्र : (आश्चर्यसँ) से किएक? आ पुतौह?
दीपक : पुतौह गेलीह डिल्ली। बेटा नहि मानलक हमर बात।
महेन्द्र : कहु दुनियाँ केहेन छैक? बेटा-बेटी जनमाबैत अदि लोक सुख लए आ आगू दिन लए।
दीपक : मुदा हमर बेटा स्वार्थमे लीन छथि। आब हम ओकर के? दुश्मने ने।
महेन्द्र : एगो गप्प कहु दाेस।
दीपक : अवस्स कहुँ।
महेन्द्र : झांपि-तोपि कऽ दोसर बियाह कए लिअ।
दीपक : मोन तँ होइत अछि दोस। मुदा आब एहि उमरमे लोक की कहत?
महेन्द्र : लोक की कहत? कियो एक्को सांझ भनसा बनाए देतीह की?
दीपक : ई तँ सपनोमे नहि देखि सकैत छी। अपन जनमल तँ अपन होइते नहि अछि आ दोसरक कोन आशा?
महेन्द्र : छोड़ू ई सभ लटारम। दोसर बियाह कए लिअ सभ अपना-अपना लेल हरान अछि।
दीपक : (मुँह चटपटबैत आ खांसैत) दोस, मोन तँ बड्ड होइत अिछ। मुदा नहि, बाबाजी थिकहुँ। लोक की कहत? हम सरस्वती माताक समक्ष सत्त कएने रही। सत्तकेँ हम तोड़िओ सकैत छी। मुदा नहि नहि नहि।
महेन्द्र : नहि तँ दोसर बेटेकेँ बियाहि लिअ।
दीपक : हँ, ई भए सकैत अछि। मोहना तँ गेल आब सोहना जे करए। अहाँक नजरिमे दोस, कोनो लैड़की अछि?
महेन्द्र : एखन नहि अछि। ओना लैड़कीक बड्ड अभावो भए गेल अछि। जदि नजरिमे आबि जाएत तँ अवस्स कहब। एखन जए रहल छी अपन समधीयौर। समधीनकेँ शंकरजी जनम लेलथिन।
दीपक : बेस, तहन जाउ, शंकर जीकेँ दरशन करू गे।
(महेन्द्रक प्रस्थान। दीपक खांसैत-खांसैत बेदम भए जाइत छथि।)
पटाक्षेप
दृश्य- दोसर
(स्थान- दिल्ली। मोहन ओ मंजू बिछौनपर आराम करैत छथि। मुर्गाक बाङ सुनि मंजू उठि कऽ अपन पतिक सेवा कए रहल छथि आ किछु गप-सप्प सेहो कए रहल छथि।)
मंजू : (चिट्ठी निकालि कऽ दैत) स्वामी जी, पिताजीक चिट्ठी काल्हि सांक्षमे अएल छल। लिअ।
मोहन : कने पढ़ियौक ने, की लिखलन्हि अछि।
मंजू : (चिट्ठी पढ़ैत छथि) चिरंजीवी बौआ मोहन, शुभ आशीर्वाद। हमरा बेटा जनमा कऽ की भेल? दम्मासँ तबाह छी। कियो पूछैबला नहि। सोहना ओ गोपला सदिखन नरहेर जकाँ एम्हर-ओम्हर करैत रहैत अछि। तोरा बियाहि कऽ हमरा की भेटल। हँ, एकटा चीज अवस्स भेटल, चिन्ता। खाइर कतउ रहू, नीके रहु।
मोहन : (मंजूसँ चिट्ठी लऽ कऽ फंेकैत) जेहेन करनी तेहन भरनी। देखैत छेलिएनि जे भरि दिनमे एक-एक मुट्ठा बीड़ी पीबि जाइत छथि। तहिपर सँ गांजा सेहो धुकैत छथि। एकर फल हुनका नहि भेटतनि तँ ककरा भेटतनि।
मंजू : स्वीमी, मुदा छथिन्ह तँ ओ जनम दाता। की कहबैन आब हुनका। बुढ़े जकाँ छथि। तहुपर सँ दम्माक तबाही। स्वामीजी, हमर विचार अछि जे दुइ-चारि दिन लेल गाम चलू आ पिता जीकेँ देखि आबी। हुनको मोनमे संतोष हेतन्हि।
मोहन : भोरहि भोर हमरा मोन नहि खिसीआउ। गाम जेबामे माल-पानी खरचा होइत छैक की नहि। बापबला रखने छी तँ चलू।
मंजू : (शांत भऽ) जे कहलहुँ से गलती कएलहुँ।
मोहन : एखन गाम नहि जाएब। एक्के बेर सोहनक बियाहमे।
मंजू : जे मोन हुअए, सहए करू स्वामी।
(संजू कुमारीक प्रवेश। संजू अपन पाहुन ओ बहिनकेँ पएर छुबि प्रणाम करैत छथि। दुनू माथपर हाथ दए आशीर्वाद दैत दथिन्हि)
मोहन : (संजूसँ) आइ शीताहल नढ़िया जकाँ अहाँ? कोना एतए धरि अहाँ पहुँच पाओलहुँ संजू?
संजू : किएक पाहुन, हमरा अहाँ बुरबक बुझैत छी की? अहुँसँ हम काबिल छी, से बुझि लिअ।
मोहन : हँ हँ, से तँ अहाँ छी। कहु असगरे कोना-कोना एलहुँ?
संजू : गामपर बस धएलहुँ पटना अएलहुँ आ पटनामे राजधानी मकड़ि दिल्ली अएलहुँ। दिल्लीमे टेक्सी पकड़ि अहाँ लग अएलहुँ। नम्बर-पता अहाँ हमरा देनहि रही।
मोहन : खाइर एतेक अचानक अहाँक अएबाक कारण?
संजू : 26 जनवरी नजदीक छैक। ओहिमे परेड देखए हेतु प्रोग्राम अचानक बनि गेल।
मंजू : एहि बीिच लाल किला, इंडिया गेट, ताजमहल, लोटस टेम्पल, चिड़िया घर इत्यादि पाहुन सेहो देखाए आनथुन्ह। आब बुच्ची अहाँ कहिया आएब कहिया नहि।
मोहन : संजू, आब अहाँ बड़ीटा भए गेलहुँ। बियाहमे कनिएटा रही।
संजू : अहाँक विचारसँ हम सभ िदन कनिएटा रही?
मोहन : हँ हँ सएह बुझु। नमहर भेलासँ अहुँकेँ दीदी जकाँ बियाह करए पड़त। बाप-माएकेँ बड्ड खरचा करए पड़त। तैयो बाप-माएकेँ छोड़ि परघर चलि जाएब। नहि तँ हमरे लग सभ दिन रहि जाउ ने संजू।
संजू : एगोमे सुखए कऽ संठी भए गेलहुँ आ दोसरकेँ राखैत छी। डाँरमे दम अछि पहिने? केहेन-केहेन गेल्ला तँ मोंछबला एल्ला। एक्के ठुस्सी मारब तँ मुँह भसकि कऽ पेटमे चलि जाएत।
मंजू : छोड़ू बुच्ची मजाक-तजाक। काल्हि अहाँ पाहुन संगे घुमै लए चलि जाएब।
पटाक्षेप
दृश्य- तेसर
(स्थान- दीपक चौधरीक घर। दीपक खांसी करैत आ हकमैत बैसल छथि।)
दीपक : बेटा, बड़का बेटा चिट्ठीक कोनो जबाबो नहि पठेलन्हि। हमर आब कोनो ठेकान नहि। कखन छी, कखन नहि। बेमारी बड जोर कएने जा रहल अछि। (खांसी करैत-करैत बेदम भए जाइ छथि फेर ओ बीड़ी पीबैत छथि।)
सोचने रही जे मझिला बेटाक बियाह कए ली जीबतहि। मुदा हएत की नहि, से कहब कठिन।
(प्रदीप कुमार ठाकुरक प्रवेश)
प्रदीप : दीपक बाबू, अहाँक हालत बड खराब देखै छी।
दीपक : (कलपि कऽ) सर परणाम।
प्रदीप : प्रणाम-प्रणाम।
दीपक : सर, हम सोचैत रही जे अपना जीबैत बेटा सभकेँ बियाहि ली। मुदा लगैत अछि जे हएत नहि।
प्रदीप : से किएक नहि होएत? हिम्मत जुनि हारू।
दीपक : हिम्मत की हारब सर। अहु अवस्थामे लड़िकी लेल घुमैत-घुमैत, बौआइत-बौआइत, छिछिआइत-छिछिआइत नवका जूताक शोल खिआ गेल जत्तऽ जाउ बेटो, जत्तऽ जाउ बेटे।
प्रदीप : हँ, ई तँ बड़का समस्या अछि लड़िका तँ लड़िकासँ बियाह नहि करत आ लड़िकी भेटैत नहि अछि। दीपक बाबू, बुझैत छिऐक ई किएक भए रहल अछि? दहेज करणे। दहेज दुिनयाक संतुलनकेँ बिगारि देलक आ बिगारि देत। जुग अल्ट्रासाउण्डक भए गेलैए लोक अल्ट्रासाउण्ड करा कऽ बेटीकेँ जेना-तेना नष्ट कऽ दैत छथि। तहन बेटी वा लड़िकी कत्तसँ कत्तसँ आओत? की लड़िकी बरखामे खसत?
दीपक : सर, हमहुँ ओहि अल्ट्रासाउण्डक मारल छी। कोनो लड़िकी अहाँक नजरिमे नहि अछि।
प्रदीप : हँ यौ।
दीपक : जय भगवान, जाय भगवती। कहु कत्त?
प्रदीप : (मोन पाड़ैत) यौ बेलौकमे एक दिन कियो कहने रहथि जे एगो हमरा बियाहैवाली बेटी अछि। (नाक छुबैत) हँ हँ, आब मोन पड़ि गेल। ओ छलाह- हरिश्चन्द्र चौधरी। हुनका एक्केटा बेटीए छनि, बेटा-तेटा नहि।
दीपक : सर, तहन जल्दी बुझिऔक ने। सर, तहन तँ ओ माल-पानी बढ़िया खरच करताह।
प्रदीप : अहाँ बड लोभी छी। सदिखन माल-पानीक जुगारमे रहैत छी। पहिने हमरा बुझऽ दिअ जे लड़िकी छन्हिेँ वा उठि गेलीह। अच्छा रूकु हम घर जाकऽ झामलाल महतोकेँ हुनका ओहिठाम पठबैत छी। हँ की नहि, से हुनके दिया समाद पठा दैत छी। अहाँ असथिर रहु।
(प्रदीपक प्रस्थान दीपक खूब खांसैत-खासैत परेशान छथि।)
दीपक : बड़का बेटामे तँ सोलहन्नी ठकाए गेलहुँ। मुदा मझिलामे सुधि-मुरि ओसुलि लेब। आखिर एक्केटा बेटी छनि आ बेटा छन्हिें नहि हुनका। हुनक सभटा संपत्ति हमरे होएबाक चाही। (खांसैत-खांसैत परेशान)
(झामलालक प्रवेश)
झामलाल : दीपक बाबू, प्रदीप भैया हमरा हिरश्चन्द्रक ओहिठाम लड़िकीक संबंधमे पठौने रहथि। हरिश्चन्द्र बाबूक एखन धरि कुमारिए छथि। मुदा हरिश्चन्द्र बाबूक मोन बड्ड अगघाएल देखलियन्हि। पाँचटा कुटुमकेँ गप-सप्प करैत सेहो देखलिएन्हि। ओ हमरा कहलनि जे हुनका जरूरी हेतनि तँ ओ हमरहि एहिठाम आबि गप-सप्प करताह। हमरा भरि सएओ कुटुम आबैत छथि। हमरा पानि छोड़ि कऽ किछु नहि लगैत अछि। सभटा कुटुमे लेने आबैत छथि।
दीपक : एहेन बात कहलनि ओ?
झामलाल : हँ यौ दीपक बाबू, हम अहाँकेँ फुसि किएक कहब? हमरा ओहिसँ की फेदा? अन्तमे ओ कहलनि जे पियासल इनार लग जाइत अछि, इनार पियासल लग नहि।
दीपक : हारल नटुआ झुटका बिछए। काल्हि हमरा लोकनि हुनका ओहिठाम जाएब। नऽ छऽ कएने आएब। कम्मो-सम्मोमे पटटैक तँ हमरा केनाइ परम आवश्यक अछि।
पटाक्षेप
दृश्य- चारिम
(स्थान- हरिश्चन्द्रक चौधरीक घर। हरिश्चन्द्र चौधरी ओ रमण कुमार दलानपर कुर्सीपर बैसि शालिनीक बयाहक संबंधमे गप-सप्प करैत छथि। रमण कुमार हरिश्चन्द्रक मुखिया छथि।)
हरिश्चन्द्रक : मुखिया जी, शालिनीक बियाह हेतु लड़िकाबला सभ हमरा नाकोदम कए देने छथि। एखन धरि सैकड़ौ लड़िकाबला हमरा एहिठाम आबि कऽ गेलाह। मुदा हँ किनको नहि कहलियन्हि।
रमण- हरिश्चन्द्र जी, सभ दिन होत न एक समाना। कोनो समए छल जाहिमे लड़ककीबला लड़िकाबलाकेँ खुशामद करैत छलाह। मुदा आब एहेन समए आबि गेल अछि जाहिमे लड़िकाबला लड़िकीबलाकेॅँ खुशामद करैत छथि। आ एखन किछु नहि भेल। आगु देखब की-की होइत अछि?
(दीपक चाधरी, प्रदीप कुमार ठाकुर, सुरेश कामत, महेन्द्र पंडित अो झामलाल महतोक प्रवेश। हरिश्चन्द्र ओ रमण ठाढ़ भऽ कऽ हिनका लोकनिकेँ बैसाबैत छथि। दुनू पक्षसँ नमस्कार पाती होइत छनि। सभ िकयो बैस कऽ गप-सप्प करैत छथि।)
रमण : (प्रदीपसँ) प्रदीप बाबू, कहु की हाल-चाल?
प्रदीप : सरस्वती माताक कृपासँ बड़-बढ़िया हाल-चाल अछि आओर अपनेक हाल-चाल?
रमण : सभ आनन्द अछि। प्रदीप बाबू, लड़िकाक बाप के छथि?
प्रदीप : (दीपक दिशि इशारा करैत) ओ छथि, दीपक चौधरी।
दीपक : हम छी सरकार, नमस्कार।
रमण : नमस्कार, नमस्कार। दीपक बाबू, अहाँकेँ लड़िकी पसीन छथि?
दीपक : हँ, हम एगो विश्वसनीय सूत्रसँ बुझि लड़िकीसँ संतुष्ट छी।
रमण : हरिशचन्द्रजी, अपनेकेँ लड़िका पसीन छथि?
हरिश्चन्द्र : हँ, हमरो बेलॉकमे प्रदीपे बाबू कहने छलाह जे दीपक बाबूकेँ लड़िका बड नीक छथि। हम हिनकेपर पूर्ण विश्वास राखि लड़िकाकेँ बड नीक मानलहुँ।
रमण : यानी दुनू तरफसँ लड़िका-लड़िकी पसीन छथि। तहन दीपक बाबू, बाजू केना की बियाह-दान करब। बेचारा हरिश्चन्द्र बड गरीब छथि। कौहना कऽ ई बेटीकेँ पढ़ौलनि।
सुरेश : तैयो किछु बजताह ने हरिश्चनद्र बाबू जे की केना ख्रच करब?
हरिश्चन्द्र : हम किछु नहि बाजब। बजताह मुखिए जी। हमरा संबंधमे हुनका सभ किछु बुझल छन्हि।
रमण : हरिश्चन्द्र बाबू खरच करताह। जदि अपने लोकनि ई बुझि कऽ आएल छी तहन अपने सभकेँ ई गरीबक कुटमैती नहि भेल। दीपक बाबू, अपन बेटाक बियाहमे की केना खरच करताह से बाजथु।
सुरेश: दीपक बाबू की बजताह? ओ तँ अपने सबहक सवाल सुनि दंग छथि।
महेन्द्र : यौ सुरेश बाबू, हरिश्चन्द्र बाबू छिरहारा खेलाइ छथि। डुबि कऽ पानि पीबै छथि।
हरिश्चन्द्र : हरिश्चन्द्र बाबू डुबि कऽ पानि की पीताह? रहए तँ छपाए नहि, नहि रहए तँ बिकाइ नहि।
महेन्द्र : नहि रहए तँ बेटी बियाहए लेल किएक चललहुँ।
झामलाल : महेन्द्र बाबू ठीक कहैत छथि। बेटीक बियाह टिटकारीसँ नहि होइत अछि। डाँर मजगूत चाही।
हरिश्चन्द्र : जदि अहींक डाँर मजगूत अछि तँ बेटा बियाहि लिअ आनठाम। (बिगरि कऽ)
प्रदीप : अपने सभ शांत रहु। हल्ला-गुल्ला जुनि करू। मुखियाजी, अपने किछु साकारात्मक बात बाजू।
रमण : हमरा समएक बड अभाव अछि। हम एक बेर बाजि दैत छी- जदि दीपक बाबू गोटेक लाख टका खरच करताह तहन ई लड़की हिनका होएतन्हि। नहि तँ असंभव। एहि अल्ट्रासाउण्डक जुगमे बेटीक बड बेसी अभाव अछि आ बेटाक कोनो अभाव नहि अछि।
प्रदीप : मुखियाजी, हमरा लोकनि एक मिनटमे विचारि कऽ कहि दैत छी।
(प्रदीप, दीपक ओ सुरेश अन्दरमे जा कऽ गप-सप्प करैत छथि।)
सुरेश : आब ओ जमाना नहि रहि गेल जहिमे बेटीबलाकेँ बेटाबला दहेजमे कुहरा दैत छलाह। अल्ट्रासाउण्डक युगमे बेटीक बड अभाव भऽ गेल अछि आओर बेटाबलाकेँ बिआहनाइ मजबूरी अछि तेँ भागीन, हरिश्चन्द्र बाबू कमसँ कम एकाबन हजार टाका तोरासँ लेबे करथुन।
प्रदीप : दीपक बाबू, मामाश्री ठीके कहैत छथि। एकाबनमे ई कुटमैती फाइनल कऽ लिअ।
दीपक : सर, अपने सभ जे जेना कहबैक से हमरा मान्य होएत। चलु फाइनल कऽ लिअ।
(प्रदीप, दीपक, ओ सुरेशक प्रवेश।)
रमण : बाजल जाउ प्रदीप बाबू, की केना विचर भेलैक।द्य
प्रदीप : दीपक बाबूक ओतेक बढ़िया नहि अछि। ओ मात्र अहाँकेँ एकतीस हजार टाका देताह।
रमण : तहन ई कुटमैती अपने सभकेँ नहि भेल। जदि एकावन हजार टाका अपने सभ दऽ सकबनि हतन कुटमैती होएत नहि तँ जय रामजी की।
सुरेश : बेस हमरा लोकनि मािन लेलहुँ।
रमण : मानि लेलहुँ तँ एखन लड़िकीकेँ चढेबैक की बादमे?
सुरेश : बियाहेमे चढ़ए लेब।
रमण : दीपक बाबू, बात पक्का।
दीकप : हँ यौ मुखियाजी पक्का नहि तँ कच्चा।
रमण : प्रदीप बाबू गाइरेन्टर अहींक होमए पड़त।
प्रदीप : बेस, हम तँ छिहे।
रमण : तहन हरिश्चन्द्र बाबू, चाय-पान-नास्ताक ओरिआन जल्दी करू।
(हरिश्चन्द्र अन्दरसँ चाय-पान-नास्ता अनैत छथि। सभ कियो नास्ता, चाय, पान करैत छथि। फेर हाथ मुँह धोइ कऽ सभ कियो अंतीम गप-सप्प करै छथि।)
बियाह कहिया करब दीपक बाबू?
दीपक : जल्दीए राखू। फेर टकोक इन्तजाम करए पड़त ने? दू-चारि दिनमे राखु। आब मुखियाजी चलबाक आज्ञा देल जाउ।
रमण : किएक, समधीन अहाँक प्रतीक्षा करैत हेतीह?
दीपक : ओ हमरा सनक हजारोकेँ प्रतिदिन प्रतीक्षा करैत छथिन। तहन जय रामजी की, मुखियाजी।
रमण : जय रामजी की।
(प्रदीप, सुरेश आ दीपकक प्रस्थान नवस्कार-पातीक पश्चात)
पटाक्षेप
दृश्य- पाँचिम
(स्थान- हरिश्चन्द्र चौधरीक घर। शालिनीक बियाहक पूर्ण तैयारी अछि। जयमालाक मंच सजल अछि। मंचपर बाल्टीनमे जल-लोटा राखल अछि। हरिश्चन्द्रक भाए सुरेन्द्र चौधरी असगरे कुरसीपर बैसि कऽ ओङहाइत छथि आ खैनी खा कऽ छीकैत छथि। मुँहसँ खैनी निकलि जाइत अछि। फेर खैनी खा कऽ नोइस लऽ छीकैत छथि।)
महेन्द्र : आ ऽ ऽ ऽ छी। धूर सार खैनी। बड़ खच्चर छेँ। बाप लागल छौक। आ ऽ ऽ ऽ छीं। कोन खैनी अछि कोन नहि। शायद बापक जनमल खैनी नहि अछि, मएक जनमल अछि। आऽ ऽ ऽ छीं। हमरा किएक तङ करैत छेँ, बौहकेँ कर गे। एखनहि हमर मुँह नानीए दादीएकेँ उकटि देतौक। आऽ ऽ ऽ छीं। बुझि पड़ैत अछि बरियाती दुआरे एना करैत छें। सार खैनी नहितन। बापक बियाह पितीयाक सगाइ देखेबौक। आऽ ऽ ऽ छीं। लागि रहल अछि जे लड़िकाक माए चलितर बुढवाक संग उरहैर गेल। हम तेरा खेबौक नहि सार। मुदा नहि खेबौक तँ तों कानबें तहन। आऽ ऽ ऽ छीं। खैनीक पितीआइननहि तन। माएसँ बियाह कऽ लेबौक। नहि तँ अपन चालि छोड। आऽ ऽ ऽ छीं। सार खैनी मुँहे दाबि देबौक आ गरदनिमे फँसरी लगाए देबौक। मरलें तँ नॉङ साथी, जीलें तँ नाॅङ साथी। आऽ ऽ ऽ ऽ छीं। हे हे गोर लगैत छिऔक सार पाएर पकड़ैत छऔक सार आब एना करिहें। बेज्जैत भए जाएब। बरयाती आबैत होएत। आऽ ऽ ऽ छीं। हे हे, एक्के बेर छिऔक ने। अन्तिमे ने। हे हे, एकटा पौआ देबौक आइ। गांंजा देबौक। लुङिया मिरचाइ देबौक। कनियाले सुति देबौक। इज्जत बचाह। प्रतिष्ठा राख। तोरा बगैर हम नहि रहि सकैत छी। हे सार खैनी, तोरा बगैर हमर कनियां एक्को क्षण नहि रहि सकैत छथि। हँ, आब सार मानलक। कतेक कौबला-पाती कएलाक बाद। सार खैनी बड बुधियार अछि। मुदा बापसँ भेँट आइ भेलैक। एतेक दिन बापक साँएसँ होइत छेलैक।
(भटक्का आबाज करैत छथि। बरयाती सभ अन्दरमे। ई अबाज सुनि महेन्द्र तीन-तीन हाथ छरपैत छथि। डरसँ कोने-कोन नुकाइत छथि। बाप रऔ, माए गै करैत छथि। बाल्टीन माथपर राखैत छथि। एहि तरहेँ बरियातीक प्रवेश होइत छनि। सभकेँ बाप रअौ, माए गै करैत पाएर छुबि प्रणाम करैत छथि। बरयातीमे छथिन्ह- दीपक चौधरी, प्रदीप कुमार ठाकुर, झाामलाल महतो, सुरेश चौधरी, सोहन चौधरी, मोहन चौधरी आओर गोपल चौधरी। चाय-पान-नास्ताक बाद शिघ्र जयमालाक तैयारी होइत अछि।
सुरेश : (सुरेन्द्रसँ) सरकार, जय माला शिघ्र करू।
महेन्द्र : सरकार, हम सरकार नहि थिकहुँ सरकार सभ अन्दर छथि।
मोहन : सरकार सभकेँ बजाए अनियौन्हि।
सुरेन्द्र : बेस, बजाए अनैत छिअनि। (अन्दर जा कऽ आबि।)
सभ कियो आबि रहला अछि।
(हरिश्चन्द्र चौधरी ओ रमण कुमारक प्रवेश। दुनू पक्षसँ नमस्कार पाती भेलनि।)
मोहन : (मुखियाजी सँ) मुखियाजी, जय-मालामे किएक बिलंब भए रहल अछि?
रमण : हमरा लोकनिक कोनो बिलंब नहि। अहीं सभकेँ बिलंब अछथ्।
मोहन : की बिलंब?
रमण : यएह जे दीपक बाबू एखन धरि एकावन हजार टाका हरिश्चन्द्र बाबूकेँ नहि देलथिन्ह।
दीपक : हइए लिअ एकावन हजार टाका।
(प्रदीप दीपकसँ एकावन हजार टाका गिनि कऽ मुखिया जीक हाथमे दऽ दैत छथिन्ह।)
रमण : हँ, आब वादा पूर्ण भेल। आब जय-माला अतिशिघ्र होएत।
(हरिश्चन्द्र आ रमण अंदर जाइत अछि। पुन: अन्दरसँ जनानी सभ जय-माला कराबए अबैत छथि। समूहमे शालिनी कुमारी, राधा देवी आओर चारि-पाँच गोट अन्य जनानी छथि। ओ सभ परिछन कऽ जय-माला करौलन्हि। शालिनी, सोहनकेँ पाएर छुबि प्रणाम केलनि। सभ जनानी अन्दर जाइत छथि। तहन सुरेन्द्र चौधरीक प्रवेश।)
सुरेन्द्र : बरयाती सभ, आऽ ऽ ऽ छीं। (खैनी खा कऽ) सार फेरो आबि गेल। सार निरलज आऽ ऽ ऽ छीं। पतित आऽ ऽ छीं। हे सार, कुटुम स्ीा हँसैत होएत। हे सार प्रतिष्ठा आऽ ऽ ऽ छीं। बचा बचा आऽ ऽ ऽ छीं। हे हे गोर लागऽ दैत छिऔक। हे हे आइ राति नवकी समधीन लग लऽ जेबौक। बात मान। (छींक रूकि जाइत अछि।) हँ सार समधीनक लोभमे बात मानलक। बरियाती सभ भोजन सराए रहल अछि। चलै चलू भोजनमे।
(सबहक प्रस्थान)
पटाक्षेप
क्रमश: