३.४.१.उमेश मंडल किछु कविता २. राजेश मोहन झा- कविता- घुरना मोन पड़ैए
३.५.१.शिव कुमार झा-शिवकुमार झा टिल्लू २.मुन्नाजी-हाइकू ३.किशन कारीग़र
३.६.१.सतीश चन्द्र झा- सौंसे बिहार एखनो बेहाल २.रामविलास साहु- कविता-कोशीमे समाएल जिनगी
३.७.कालीकान्त झा बूच- अंतिम- कविता- कहिया धरि उदासी
३.८.गंगेश गुंजन- राधा- २६ म खेप
१.डॉ. नरेश कुमार ‘विकल’२. संस्कृति-कतऽ जाइ....३. गंगेश गुंजन- आउ हनुमान
डॉ. नरेश कुमार ‘विकल’
बाल गीत
अहींसँ गंगा-जमुना बहथिन
अहींसँ कमला धारा।
अहीं सुरूज ओ चान जरावी
अहींटा एक सहारा
आइ हिमालय देख रहल अछि
फेर अहींकेँ बौआ!
बाॅझ रहथु धरती बरू
पर उपज ने पाबए झौआ
कतेक दु:शासन खींचि रहल अछि
आइ द्रोपदीक चीर!
कनिको जीमे प्राण रहए तँ
रहब ने कनिको थीर!
बना कलम करूआरि अहाँ
छोड़ू वीणा केर तार!
रहू सदति तैयार अहाँ यौ
गरमी हो वा जाड़!!
(2)
सुनू बौआ मोर
कानमे बाजू बौआ जाएब ककरा कोर
आब ने भेटत बौआ तिरहुतमे तिलकोर
कतऽ गेलै करमी आ पटुआक झोर
साग आ पाग ने कोकटीक तौनी
डालाक भार आ ने सीकीक मौनी
महफाक ओहार उड़ल देखू कनियाँ गोर
स्नो आ पाउडरसँ करियो भेलै गोर
पण्डौलमे पाव रोटी भेटत चहुँ ओर
सौराठक सैण्डविच कएने अछि जोर
कपिलेश्वरमे कटलेट भेटत टटुआरमे टोस्ट
बुझि ने पड़त बौआकेँ गेस्ट आ होस्ट
लोहनाक लिपिस्टिकसँ रङल छैक ठोर
हाइ हिलक चप्पलमे नाचै चारू पोर
नेहरामे झकझक नायलान कएने अछि जोर
जार्जेट जनकपुरमे कतऽ अछि पटोर?
माय गेली मम्मी अएली टप-टप खसै नोर
डैडी ओ डार्लिंगकेँ भेटत ओर ने छोर।
२
संस्कृति वर्मा , क्लास ४था , क्विन मेरी स्कूल , मॉडल टाउन , दिल्ली
कतऽ जाइ....
हम करी तँ की
किछु ने फुरैत अछि.
हमहूँ बेदरा छी मोन नहि
पड़ैत अछि !
एक टा फ्लैटमे बन्द रहैत छी
ओहि कोठरीसँ ओहि कोठरी धरि
घुमैत रहैत छी.
टीवी खोलैत छी , केहेन केहेन दृश्य
आबि जाइत अछि
हमरो लाज लागि जाइत अछि.
कंप्यूटरपर जाइत छी , नेट पर
किछु कहाँ आबि जाइत छैक
लागले डैड सेहो पहुँचि जाइत छथि
ई की देखि रहल छेँ
डैड , हम की करी ,कते खेली आ
आ डैड न्यूज खोलि बैसि जाइत छथि.
न्यूज़ पर किछु सीन आबि जाइत छैक
आँखि गुरारि हमरा कोठरीसँ
बाहर निकालि दैत छथि ,जाऊ होम वर्क करू ............
एकटा डिब्बामे बन्न भऽ
बससँ स्कूल जाइत छी
अबैत छी ..................
नीचा नै जाऊ , जमाना ख़राप छैक
छत पर नै जाऊ
नेनाकेँ उठा कऽ लऽ जाइत छैक
आब अहीं कहू हम बच्चा सभ
कतऽ जाऊ अवलम्ब पाऊ..........???
३.गंगेश गुंजन
आउ हनुमान
माथे पर
मैना चटक केलक
हाथे पर
लुधकल बगड़ा
टाटे पर
लुटकुन गेलाह
पोखरिक घाट
धोअ' अंगरखा
दहिना हाथ ।
चितङ खसल दोस्त
बाटे पर
पोथी भेटल घरे मे
कौपी भेटत हाटे पर
टुनमुन कहल संगी के
संग च’ल त कनिएं हाट
से नहि गेल तं
लेलनि ढौआ
चलला असकरे हाट
गोला कुकुर भेटल
बीच बाट
जए कि कहलखिन-
आऽ तू आऽ त ऽऽ
अएलनि लग
ध' लेलकनि संग
संगे संगे
चलल दोकान
कौपीक बदला कीनल
मखान .
खुशी सँ कुकुर
उठौलक तान
टोकल टुनटुन रह भ' चैन
तोहर बस्तु सुअदगर लाइ
आइ नहि किनबौ देबौ काल्हि
पाइ खतम छौ घुरि चल आइ
घुरती भेटल जिलेबी छनैत
ठामहि तै लए ओ अड़ि गेल
टुनटुन ओकरा फेर बुझाएल
कुकूर लेब' उधार जिदिआएल
बुझबैत कहलक टुनटुन बात-
सौदा नै ली कखनो उधार
नगदीएक राखी वेबहार
काल्हिए तं कहलनि बाबा,
भैया के सोझाँ क' ठाढ़
चरफर दोस्त कुकुर चलल
टुनमुन ओकर माथ चूमल
तखन दुनू फेर टोल घुरल
कौपीक बदला कीनि मखान
तइ गलती पर
भाय कन्हुआएल
करबौलक उठकी-बैसकी
अपनो गलतीक टुनटुन फेर
मललक झिटुके
अपने कान
मोने रहतै इहो दोकान
कौपीक बदला किनब-मखान
ओकरे देखसी करैत कुकूर
अपने चाँगुरे पकड़लक कान ।
राजदेव मंडलक किछु कविता
(1) गाछक हिस्सा
बिरिछपर कुड़हरि दन-दना रहल अछि
दुनू भाँइ भन-भना रहल अछि
यएह गाछ छिऐ झगड़ाक जड़ि
एकरा देबै आइये काटि
सभ किछ भए गेल भिन्ने
तँ एकरो लेबै आइये बाँटि
लगमे पहुँचल संच-मंच
बुझबए लगल गामक सरपंच
बैसू हकरू दुनू भाय
नहि हएत झगड़ा अछि उपाय
गाछमे छै दूटा फेंर
नहि लाबए पड़त तरजू-सेर
हिस्सामे भेल एक-एकटा मोटका डारि
भायक परेममे किएक पाड़ै छी दरारि
एकोटा गाछ रोपल भेल
किएक करै छी एहेन अधलाह खेल
जाहिपर जिनगीक आस
चलैत अछि साँस
तकरा कऽ रहल छी विनाश
जएह देने अछि कपारपर छाँह
तकरे कटै छी वाह-वाह
ई करम अहाँसँ भऽ रहल अनुचित
जे दऽ रहल जिनगी
तकरे सँगे एहेन अहित
करबै गाछक सेवा
भेटत सुन्दर मेवा
भेटत सुन्दर फल
एहिसँ बढ़त शरीर आ मनक बल
पंचक गप्प सुनि दुनू भाँइ कहलक
घर चल।
(2) लाल ज्योति
गन्तव्य दिश अग्रसर होइत
धप्प दऽ– हम खसि पड़लहुँ
अनभुआर कुपमे
जे अछि बरिसों पुरान, सुखल
जलक नामपर
फाटल दरारि
राक्षसक मुँह सन
सधन-तमसँ भल छी भयभीत
अएबाक हेतु-ऊपर
कऽ रहल छी- यत्न पर यत्न
किन्तु सर्प सन ससरि ससरि खसैत छी
पुन: ओहिठाम
मकड़ाक जाल सभ
लटपटा रहल अछि- माथमे
आवेश वश फेंकि रहल छी माँटिक ढेपा
परन्तु ओहो लगैत अछि
ठाँहि दऽ अपनहि कपारपर
हथोड़ि रहल छी-नव राह
तखनहि तीक्ष्ण लाल प्रकाशमे
चौन्हिया जाइत अछि-चक्षु
कियो सहृदय साहस कऽ
देखा रहल अछि- मार्ग
बढ़ि रहल छी आब
शनै: शनै:
ओहि बिन्दु दिश।
(3) बीखक घैल
कतेको बरख पुरान
एहि बीखक घैलमे
तृण भरि छेद मात्र
बून-बून चुबैत
बीखसँ
भऽ रहल अछि
विषाक्त वसुन्धरा
भष्म भऽ गेल
मनवोचित गुण
तइयो तीब्र गतिसँ
आप्लावित करैत
खोजि रहल अछि
नव-नव आहार
प्राणी सभ अछि पड़ा रहल
सुड्डाह करैत अछि बढ़ि रहल
बीखक बाढ़ि
सभ अछि सशंक
खोजि रहल अछि निर्विध्न स्थान
पड़ाइत-पड़ाइत भेल अपस्याँत
किन्तु आब नहि होएत घात
बढ़ि रहल दूटा सशक्त हाथ
अहर्निश
ओहि कुम्भ दिश।
(4) पत्रोत्तर
अहाँक उपरागसँ बेधल अछि गतर-गतर
तैं दऽ रहल छी पत्रोत्तर
कतेक कएलहुँ परिश्रम
बनलहुँ निरलज टूटल धरम
तब बनेलहुँ सोनाक घर
सबकुछ सधि गेल भेलहुँ फक्कड़
मनोरथ तँ पूरा भेल
किन्तु यएह आइ जहल भऽ गेल
अहाँ लगसँ एतऽ धरि
जेना लगल अछि कोनो अदृश्य कड़ी
हवाक सँग अहाँक गन्ध आबि रहल अछि
से स्वर संगीत बनि गाबि रहल अछि
अहाँ अन्त: सँ सोर पाड़ै छी
हम अपना हृदयकेँ तरे-तर मारै छी
बीतैत अछि साल बीतैत मास
एहि जेलसँ निकलैक कऽ रहल छी प्रयास
आबैए जाड़ तँ अहाँ बिनु लगैए अन्हाड़
देहपर पड़ैए बून याद पाड़ैए अहाँक गुन-गुन
हवा बहै जब गरम लागै फूटल हमर करम
अबै जब बसन्त हमर हृदय करैत अछि हन्त
तइओ हम केहेन छी कंत
अहाँक बिसरि बनल छी संत
खोज कएलहुँ हम असली
आब बनल ओ नकली
असल परेम मुँह फेरि नहि सकैत अछि
ओकरा कियो धेर नहि सकैत अछि
नहि जानलहुँ तँ जानब
आब नहि हम मानब
एक-एक ईंटाकेँ फोड़ब
एहि स्वर्ण जेलकेँ तोड़ब
अन्तरमे मिलन पियास करै अनघोल
स्वर्णक होइत अछि बहुत मोल
पर परेमक मोल अमोल।
(5) अन्हारक खेल
ओहिठाम भऽ रहल छलै
एकटा हास्यास्पद खेल
एकत्रित दर्शकमे छलै
तत्कालीन बड्ड मेल
एकबेर आँखि मटकेलहुँ
कनेक धियान भटकेलहुँ
खेलाड़ी खेल आब की करता
देखैत छी ओहिठाम ठाढ़ छै भाषणकर्ता
भाषण झाड़ि रहल अछि
अमृत वाणी ढारि रहल अछि
छलिया भाषण
नहि दैत छलै राशन
लोग पीबै छलै अश्वासन
नहि सुनै गेल देखै लेल
गेल छलै लाेग
सेहो भेल अभोग
करऽ लगल आपसी रगड़ा
थप्पर-मुक्का आ झगड़ा
पुछए चाहलक भाषणक अता-पत्ता
आकि ओहो भऽ गेल निपत्ता
ओहि जगहपर भेल ठाढ़
सौंसे मनुक्खक हाड़
जहिमे सँ निकलि रहल छूछे अन्हार
डूबि गेल सभ ओहिमे कानए जार-जार
औनाए कऽ खसए बारम्बार
ओ अन्हार सबहक देहकेँ बना देलक हाड़े-हाड़
एक दोसराकेँ देखि सभ भऽ रहल भयभीत
बढ़बऽ पड़त एकताक गीत
मारऽ पड़त छड़पनियाँ
काटऽ पड़त गुड़कुनियाँ
आगूमे छै इजोत
जे दऽ रहल छै नोत
लगबऽ पड़त कोनो ब्योंत।
(6) नाचक बिखाद
लोग मनहि मन करै छल जाँच
हम करै छलहुँ नाँगटे नाच
आँखि देखैत छल
मुँह हँसैत छल
जखैन लोग केलक दुर छी-दुर छी
धियान गेल तब अपना दिश
अपने नाँगट देह देखि
मोनमे आबि गेल रिश
कहैत छी आब-लाउ कोनो नुआँ
होइत अछि लाज
बजैत अछि समाज-
“अलगे रहू अहाँसँ नहि अछि कोनो काज”
एहूसँ बेसी घिना जाएत
स्वजन-परिजन जब सोझा आएत
गप्प चारूभर गिन-गिना जाएत
हेओ कएलहुँ जेना
नहि करब एना
नाचैत-नाचैत कखनहुँ काल
नहि रहै छै सुधि-बुधि बिगैड़ जाइछै चाल
एहो तँ छिऐ एकटा नवका ताल
किछ लोक तँ कहै छै एकरो कमाल
ओमहर लोगकेँ भले लगो नीक ई नाच
एहिठाम नहि सोहाइत छै ई गप्प अछि साँच
एतुक्का लेल नहि छै अनुकूल ई नाच
हे यौ भाय
करू कोनो उपाय।
(7) आँखिक प्रतीक्षा
बन्न अछि अहाँक आँखि
जेना नान्हिटा चिड़इ पसारने पाँखि
आगुमे दुनू ठेहुनकेँ मोड़ने
संगहि दुनू हाथ जोड़ने
हम टक-टकी लगा कऽ रहल छी ताकि
कखैन खुगत अहाँक आँखि
एकबेर जाहिमे लेब हम झाँकि
हमरासँ की भेल भूल
चढ़ा रहल छी मनक फूल
अधरतिया भऽ गेल साइत
शरद पूर्णिमाक ई राति
प्रकृतिपर झहरैत अछि चानी
मधुर रस घोरैत कोइलीक वाणी
मन्द-मन्द सिहकैत बसात
केना रहब अहाँसँ भऽ कात
एकोबेर तँ बोलू
आबो आँखि खोलू
निकलए नेह वा धिक्कार
हमरा दुनू अछि स्वीकार
देखबाक अछि उत्कट इच्छा
हम करैत रहब जिनगी भरि प्रतीक्षा।
ज्योति सुनीत चौधरी
जन्म तिथि -३० दिसम्बर १९७८; जन्म स्थान -बेल्हवार, मधुबनी ; शिक्षा- स्वामी विवेकानन्द मिडिल स्कूल़ टिस्को साकची गर्ल्स हाई स्कूल़, मिसेज के एम पी एम इन्टर कालेज़, इन्दिरा गान्धी ओपन यूनिवर्सिटी, आइ सी डबल्यू ए आइ (कॉस्ट एकाउण्टेन्सी); निवास स्थान- लन्दन, यू.के.; पिता- श्री शुभंकर झा, ज़मशेदपुर; माता- श्रीमती सुधा झा, शिवीपट्टी। ज्योतिकेँwww.poetry.comसँ संपादकक चॉयस अवार्ड (अंग्रेजी पद्यक हेतु) भेटल छन्हि। हुनकर अंग्रेजी पद्य किछु दिन धरि www.poetrysoup.com केर मुख्य पृष्ठ पर सेहो रहल अछि। ज्योति मिथिला चित्रकलामे सेहो पारंगत छथि आ हिनकर मिथिला चित्रकलाक प्रदर्शनी ईलिंग आर्ट ग्रुप केर अंतर्गत ईलिंग ब्रॊडवे, लंडनमे प्रदर्शित कएल गेल अछि। कविता संग्रह ’अर्चिस्’ प्रकाशित।
मिथिला चित्रकला
एकटा कैनवास पड़ल उज्जर रिक्त
ताकैत छल मुँह बड्ड जिज्ञासा सऽ
तूलिका उठेलहुँ रंग सऽ कऽ सिक्त
घाेर मनन करय लगलहुँ तल्लीन भऽ
अनकर पन्ना सेहाे केलहुँ अंगीकृत
प्रेरणा लऽ नीक करक अभिलाषा सऽ।।
लियोनादो बढ़िया कलाकारी गढ़ि गेला
मो
नालिसा के प्रसिद्ध रहस्यमयी मुखाकृति
तर्क वितर्क करैत रहल छबिकारक मेला
इतिहास के ललकार बनल ओ कलाकृति
ईश्वरक कृति बच्चाक निश्छल मुस्कान देखल
ओ
हि सऽ अद्भुत आर कोन अभिव्यक्ति।।
ध्यान आयल एब्सट्रैक्ट के नब पैटर्नक
मो
न भेल किछु करी आधुनिक ढ़ंगमे
भेटल अमूर्त एब्सटै्रक्ट रूप चित्रक
उड़ैत भागैत रंग बिरंग तितलीक पंखमे
विचार आयल जखन विधा फैशनक
शानदार सज्जा छल सीप आ शंखमे।।
किछु नवीन करक इच्छा रूकि जाइ छल
जखन देखै छलहुँ अपन चारू कात
ईश्वरक बनाआेल अहि दुनिया मे भेटल
सब तरहक उपलब्ध छल सर्वश्रेष्ठ करामात
स्वयं ईश्वरक विवाहमे जे सजायल रहल
साेचलहुँ मिथिला कला के करी आत्मसात।
१.उमेश मंडल किछु कविता २. राजेश मोहन झा- कविता- घुरना मोन पड़ैए
१.उमेश मंडल
किछु कविता
हँसैत लहास
लहास माने मुइल
मुइल माने लहास
ई के नहि बुझत हठात्
गुम-सुम भेल छल जँए ओ
बुझाइत छल लहास तँए ओ
मुदा,
आब ओ बाजत
बजैत-बजैत हँसत
अहाँक कृतिपर
बनल संस्कृतिपर।
कविता
हम नइ बिसरब
अपन सनातन आ संस्कार
नहि बिसरक चाही अहुँकेँ अपन आचार
दोस बनब वा दियाद-बेहाल
आकि करब खाली हाल-चाल
तैयार भए गेल अछि सबालक महाल
अहाँ नै बुझै छिऐ
बनि जाउ दियाद
अहाँ करू किछु रियाज
पाँति राखू चारि याद
यौ दोस अहाँ आनू अपन होश
कए लिअ स्वीकार
हे यौ दियाद
हिया गुनि भरल
दियाद सुनि पड़ल
फाँट बीचमे आबि धूनि पड़ल
हट, हट, हट नै तँ घसक
फाँट करए उद्घोस
दुनू अपन ठाम बेहोश
मुदा,
तैयार भेल सोर-पोर
कल्याणले नहि जोर
अपन फाँटले ताबरतोड़।
बाधा-
विदा भेल मंगला पूभर
कान्हपर टँगने अछि साइकिल बाउलपर
कहुना कऽ लगिचेलक
लटपटाइत पहुँचल
धारक कछेरमे
बिनु पानिक अछि धार
चक-चक करैत अछि बाउल चारूकात
नाउ नहि बाउल देखि भेलै
मंगलाकेँ थोड़े होश एलै
अपन छूछ जेबीपर भरोस भेलै
आब टपैमे कोनो नइ हएत बाधा
पहुँचबे करब सरायगढ़क ओइपार
मुदा,
मंगला लसैक गेल घाटपर
नजरि दौड़ौलक अपन कोनो लाटपर
अपन जेबीमे देने हाथ
तकैए चारू कात
आब की करबै हौ बाप
ई तँ लेबे करतै घाटी
जेना लगैए एकरा उठल छै आँति
सुखलौ घाटक लेतै खेबाइ
नै देबै तँ देत ई रेबाड़ि
सहए भेल मंगला घुरि गेल
पछिमे मुरि गेल।
भोगी
नाच कराए बानर
चाउर खाए बबाजी
बीचमे तँए अछि सरोकारी
विकासक नाओपर भऽ रहल अछि नाच
मानसिकता, मानसिकता, मानसिकता
पसरल अछि चारूकात
नीक बात
किएक नै हुअए विकास
बिक रहल अछि चारूकात
ब्लड प्रेशर आ डायबिटीजक गोली
संगे-संग
तैयो बबे बनल छथि तियागी
भरि जीवन भोजन केलनि बैसारी
ऊपरसँ दवाइयोकेँ बढ़ौलनि बेपारी
भोग करैत-करैत भेल छथि अघोर
तइपरसँ रटना लगेने छथि ताबड़तोर
स्वर्ग जाए चाहैत छथि सोरपोर
हमरा बीचमे हुअए कोनो नै बाधा
हम सबदिन रहलौं मधुशाला
बनलै तँ अछि विचारशाला
जइमे लटकल अछि बड़का ताला।
छठि
पोखैरक चारूकात
बनौलक गौआँ घाट
भरल पथिया लऽ धेलक सभ बाट
पहुँचल सभ हाली
सजेलथि अपन-अपन डाली
जरबाक लेल तैयार भेल दिआरी
हाथिओ केलक अपन तैयारी
जरैत कुरनीपर दीप धेलक माथपर
अछि आथी बैसल आइ घाटपर
टौकना, खमरूआ, सुथनी, हरदी, आदी
सभ पुराओत अपन-अपन फर्ज
चुकाबए चाहैत अछि अपन कर्ज
सूर्यकेँ देत सभ अर्घ।
फंदा
जखने करब नखरा
सभ कहबे करत हमर दऽ दिअ बखरा
जँ अहाँ रहब शांतचित
भेटत अपन सभ परचित
करब अहाँ कल्याणक काज
सभकेँ हेतै अपने-आपपर लाज
लाज सिखबैत अछि काज
आ मुँहो मोड़ैत अछि हठात्
भऽ जाइत अछि कोनादन
धऽ लैत अछि अमती काँटसन।
धर्मात्मा
धर्मात्मा होइ छथि तियागी
तियागी कहल केकरा जाए यौ भैयारी
वएह ने
जे केलनि तियाग
आकि ओ
जे भाेग केलनि वेसुमार।
मजदूर, हरबाह
भिनसरसँ साँझ धरि
सभ देह धुनैए
उचित बोनि मात्र दू सेर पबैए
एक सेर बेच लऽ दोकान जाइए
नोन, तेल, हरदी, गोटी किनैए
बचलाहा एक सेरसँ सभो परानी पेट चलबैए
भरि दिन तँ ओहो खटबे करैए
अहीं कहू,
ई केहेन मशीन एले
हिसाब जोड़ैकाल
ऊपरे-ऊपर नजरि दौड़ौलकै
एकर तियागपर नजरि नै खिड़ैलकै
भागीकेँ धर्मात्मा कहि गेलै।
खास
खास जगहक खास आदमी
खास जिनगीमे खास बात
देशक नामपर भऽ रहल अछि ई खास
मुदा
जखने देश एक परिवार
सभकेँ चाही रोजगार
खुशी चाही सबहक घर-द्वार
आकि इहोमे करबै बेपार
गुजरि गेल मध्यकाल आ भक्तिकाल
मुदा
पाछु मुँहे लुढ़कल किएक जाइ छी यौ महराज।
लघु कविता-
प्रकाश
ज्ञानक परकाश
जाइत अछि ओत्त तक
जत्त कियो नहि जा सकत हठात्
मुदा
ज्ञानो भऽ जाइत अछि गुलाम
सांकृत्यायन पड़ै छथि मोन घराम।
(2)
हनहनाइत, भनभनाइत ओइ स्वरकेँ
सुनैले नहि छथि कियो तैयार
जाहिमे मात्र ओ मात्र गाओल जाइत अछि
सनातन गीत
कियो नहि बनए चाहैत छथि मीत
करए जे पड़तनि हुनक दर्दसँ प्रीति।
(3)
भकोभन ओइ अन्हार कोठरीमे
जइमे काजर सन कारी राति दिनो कऽ बुझाइत
अहीं कहु यौ भाय
तखन शीशामे कोना देखाएत
ओकर चित्र कोना अएत?
श्रोता
भागवत वाचन शुरू भेल
श्रोता सभ आबि-आबि जगह लेल
चारि तरहक श्रोता बैसल छथि
अपन-अपन काज-ध्यानमे मग्न छथि
बाचको आ श्रोतो
एक तरहक श्रोता
भागवत सुनि नीकक प्रचार करै छथि
दोसरोकेँ नव गप्पसँ अवगत करबै छथि
मुदा दोसर
दोसर श्रोता अंगीकार करै छथि
मुदा बजै नहि छथि बिना पुछने
तेसर श्रोताक देखियो
बैसल छथि भागवत प्रबचनमे
मुदा ध्यान छन्हि व्यापार मंडलमे
घुरिआइत-नुरिआइत
स्पष्ट अिछ जे किछु नै पेला ई
प्रसादटा खेला ई
चारिम श्रोतापर करू विचार
ई छथि मुदा सदाचार
सुनितो छथि आ गबितो छथि
अपन जिनगीक क्रियासँ मिलैबतो छथि
ओतबे नहि
डेन पकड़ि पछुएलहाकेँ खिचितो छथि
आ
ठमकलहाकेँ धक्का सेहो लगबैत छथि।
कल्याणी
कल्याणी नाओसँ लगैत अछि जेना
केने हेती ई किछु एहेन काज
जहिसँ भेल हएत कल्याण
वा हेतै कल्याण
मुदा से भेल आकि नहि भेल
एत्ते धरि जरूर भेल
भाग्य-तकदीर सभसँ पैघ होइत अछि
से कहि जरूर गेलि।
देश
हमर देश
किछु लोक खेल रहल छथि धुरखेल
खुट्टीसँ आगाँ पड़ल बड़का देवाल
देवालक भीतरे लागल अछि मड़कड़ी चारूकात
इजोत चकचकाइत अछि
दिने जकाँ राइतो बुझाइत अछि
चुट्टी-पिपड़ी छोड़ि सभ किछु देखाइत अछि
मुदा
देवालक अंतिम खुट्टीसँ ओम्हरे
भऽ रहल अछि मनोरंजन
हेबक सेहो चाही
जरूरतसँ ऊपर उठि गेलापर
स्वभाविक अछि
मुदा देवालसँ इम्हर
बोन-झार सदृश्य मनुक्खक जरल रूपक
खेखनैत स्वर कियो सुनैबला नहि
चारि तरहक नाओ रचैबला लोक
देशक भीतरेमे बड़का देवाल ठाढ़ करैमे
अपनो उड़ैलनि होश
कऽ रहल छथि किलोल
हमर देश अछि अनमोल
एक्कैसमी शदीमे चलि रहल अछि ताबड़तोर
आश्चर्य
चहारदेवालीक भीतर मात्र ई गनगनाइत अछि बोल
भऽ रहल अछि भोजक बदला भोज
मात्र ओम्हरे अछि ई गरदमगोल
माने चहारदेवालीक ओहि पार
पुंगबैत अछि अपनाकेँ मनोरंजन योग
परती-पराँतमे रहएबला दिनकट्टू
जनमे काल भेल छल मइटूगर
छेँटगर होएबासँ पहिने
ई कहबैत छल दूधकट्टू
आइ दुनू हाथ जोड़ि
दू साए फीट एन.एच. सड़कक कातमे
हजारक-हजार कहबैत अछि दिनकट्टू
पएरमे चट्टी नहि छै पहिरैले
चलऽ मुदा पड़तै पक्की सड़कपर
शीशा-काँटी पसरल सड़कपर
खाइ-पीबैक नहि छै जोगार एकरा
आ नै छै कोनो रोजगार
चारूभरसँ खाली सुनै छै
- जल्दी जोड़ि लैह सरोकार तूँ
एक्केस्मी सदीक समाज तूँ।
भाषा भेद
हमरा सबहक माथपर
पसरल अछि मरलत्ती जकाँ किछु
कियो सुचिंतक नहि जे
चिंतन करता एहिपर
ई कथी लतड़ल अछि सभपर
मुदा दुर्भाग्य
एहिमे छिपल अछि किछु बात
जाहिमे अछि नहि एक्कोटा पात
सबहक कहब छन्हि
“ई आगाँ चलि कऽ
करत प्रदूसन साफ
जीबैक लेल स्वच्छ हवा-बसातक
अछि जहिना खगता
करत ई दूर सबहक बेगरता।”
देखा चाही ई दूर करत प्रदूसन
आकि करत सभकेँ निपत्ता।
२
राजेश मोहन झा 1981-
उपनाम- गुंजन, जन्मस्थान- गाम+पत्रालय- करियन, जिला- समस्तीपुर, हास्य कविताक माध्यमसँ समाजक विगलित दशाक वर्णन। बाल साहित्यमे विशेष रुचि।
कविता
घुरना मोन पड़ैए
घुरना मोन पड़ैए रौ उगना मोन पड़ैए।
भागल बौरहबा खेत-पथार दिश,
नहि देखलक हमर अश्रुधार दिश,
कंठ पियासे सूखि रहल अछि
केओ दरस नहि दैए
कतऽ पड़ा गेलैं रौ बतहा
आनि कऽ कुरता पहिरा दे
एखनहिं समाद पठौलनि खलीफा
भांगक आश लगैए
रौ घुरना हमर बात तोँ माने
दौड़ चङेरी चूड़ा भरि आने
कहेँ झटहीकेँ भूजि देथि
भूखक आभास लगैए
राति भेल जुिन होउ निपत्ता
बुन्न झड़ै अछि आनू छत्ता
नहिं छूटत हथियाक ई झपसी
सभटा धान डूबैए।।
१.शिव कुमार झा-शिवकुमार झा टिल्लू २.मुन्नाजी-हाइकू ३.किशन कारीग़र