विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

उत्तराखण्डक नन्दा-राजजात

डॉ. कैलाश कुमार मिश्र · 2011-02-01 · अंक 75

उत्तराखण्‍डक नन्‍दा-राजजात
गाम बद्द याद अबैत अछि दिल्ली में हमरा मुदा गाम अत्बो नजदीक त नहि अछि जे चट दनी बिदा भ जाएब! ताहि जखन कखनहु दिल्ली स मों औने लागैत अछि त हम ऋषिकेश चलि जीत छी। एक दू दिन गंगाक कट में आनंद स रही फेर दिल्ली में कर्म धुन चैल अबैत छी। हिमालय केर विभिन्न भाग में जेबक आ कार्य करबाक अवसर भेटल अछि- कखनो सिक्किम में जा कन्चंजनघक दर्शन, भूटिया आ लेपचा जनजातिक जीबंक अध्ययन एवं सांस्कृतिक विश्लेषण त कखनहु अरुणाचल प्रदेशक तवांग में जा ओते केर परम्परक अवलोकन। अनुभव हमेश उत्तम। हिमालय दर्शन केर क्रम में काटको बेर हिमाचल प्रदेश, कश्मीर आ उत्तराखंड सेहो गेल छी. अह्ने साल छल 2005 जखन हम उत्तराखंड गेल रही। ओतए स वापस एलक बाद 2005 ई. मे हम नन्‍दा-राजजातपर एकटा लेख हि‍न्‍दीमे अपन मानवशास्‍त्रीय सर्वेक्षण केर आधारपर लीखने रही। ओ लेख इन्‍दि‍रा गान्‍धी राष्‍ट्रीय कला केन्‍द्र केर वेवसाइटपर प्रकाशि‍त भेलैक। कि‍छु दि‍नक बाद हमरा उतराखण्‍डसँ बहुत लोक सभ लेख लीखबाक हेतु साधुवाद देअए लगलाह। कतेको लोकनि‍ ओइ लेखक लि‍ंककेँ अपन ब्‍लॉगसँ जोड़लनि‍। हालहि‍ंमे एक उतराखण्‍डक नवयुक अपन माटि‍ आ पहाड़सँ सि‍नेह देखबैत एकटा पद्यमय पत्र लि‍खलनि‍। पत्र कि‍छु एना लीखल छल-
“‍आँखो के आगे वनश्री के खुलते पट न्‍यारे-न्‍यारे हैं,
छोटे-छोटे खेत और आड़ू सेबों के बगीचे,
देवदार वन, जो नभ तक
अपनी छवि‍ जाल पसारे हैं।
मुझको तो हि‍म से भड़े
अपने पहाड़ ही प्‍यारे हैं।‍”
ऐ कवि‍तामय चि‍ट्ठीकेँ पढ़लाक बाद मोन भेल जे उत्तराखण्‍डक नन्‍दा राजजातके मैथि‍ली पाठक लोकनि‍ केर लेल मैथि‍लीमे सेहो अपन यायावरीक माध्‍यमसँ लीख ली।
नन्‍दाराज-जातक अर्थ भेल नन्‍दादेवीक यात्रा। लोक इति‍हासमे जाइ आ ि‍स्‍थति‍केँ अध्‍ययन करी तँ पता लगैत अछि जे नन्‍दा गढ़वालक राजा लोकनि‍क संग-संग कुँमाऊ केर कत्‍युरी राजवंशक ईस्‍टदेवी छलीह। ईष्‍टदेवी हेबाक कारणें नन्‍दादेवीकेँ राजराजेश्‍वरीकेँ रूपमे सेहो सम्‍बोधि‍त कएल जाइत छन्‍हि‍। नन्‍दाकेँ लोक ओना पार्वतीक बहि‍न सेहो मानैत छथि‍। समस्‍त उत्तराखण्‍डमे समान रूपें पूजि‍त हेबाक कारणे नन्‍दादेवी समस्‍त प्रदेशमे धार्मिक एकता केर सूत्र सांस्‍कृति‍क रूपसँ मानल जाइत छथि‍। अर्थात हि‍नकासँ समस्‍त प्रदेश एक सूत्रमे जेना बन्‍हा जाइत हो!
स्‍थानीय दंतकथा तँ ई कहैत अछि‍ जे नन्‍दादेवी दक्ष प्रजापति‍ केर सात कन्‍यामे सँ एक छलीह। एहेन मानल जाइत अछि‍ जे हि‍नकर वि‍आह भगवान महादेवसँ भेल रहनि‍। भगवान महादेवक संग ऊँच आ हि‍मसँ आच्‍छादि‍त पहाड़पर नन्‍दा देवी रहैत छथि‍। पति‍सँ एहेन सि‍नेह जकर वर्णन असंभव! पति‍ जखन संग रहैत छथि‍न तँ सुखक बदलामे धोरसँ धोर कष्‍टकेँ नन्‍दा दाइ सहि‍ लैत छथि‍। कुनो-कुनोठाम तँ नन्‍दादेवीकेँ पार्वतीक साक्षात् रूप मानल जाइत छन्‍हि‍। नन्‍दाकेँ बहुत नामसँ जानल जाइत छन्‍हि‍- शि‍वा, सुनन्‍दा, शुभानन्‍दा, नन्‍दि‍नी इत्‍यादि‍।
उतराखण्‍डमे देवी-देवताक स्‍तुति‍ या स्‍मरणमे दि‍न-राति‍ जागि‍ कऽ गाबैबला गीत अथवा कीर्तनकेँ जागर कहल जाइत छै। तहि‍ना जेना अपना मि‍थि‍लामे अष्‍टयाम होइत अछि‍। नन्‍दा देवीक बारेमे अनेक जागरक अनुसार भांति‍-भाति‍क दन्‍तकथा भेटैत छै। एहने एक कथामे नन्‍दा दाइकेँ नन्‍द महराजक बेटी मानल जाइत छन्‍हि‍। नन्‍द महराजक ई बेटी भगवान श्री कृष्‍णक जन्‍मसँ पहि‍ने कंसक हाथसँ छहरि‍ कऽ आकाशमे उड़ैत नागाधि‍राज हि‍मवंतक पत्नी मैनाक कोरामे पहुँच गेलीह।
एक दोसर जागरमे नन्‍दा दाइकेँ चान्‍दपुर गढ़केँ राजा भानुप्रतापक पुत्री कहल जाइत छन्‍हि‍। एक जागरमे लोक सभसँ पता चलल जे नन्‍दा देवीक जन्‍म ऋृषि‍ हि‍मवंत आओर हुनकर पत्नी मैनाक घरपर भेल छलनि‍।
मुदा तमाम तरहक अलग-अलग धारणा भेलाक बादो पर्वतीय अंचलमे रहनि‍हार लोकनि‍ नन्‍दादेवीकेँ लोक मानस केर एक दृढ़ आस्‍थाक प्रतीक मानैत छन्‍हि‍। संगहि‍ नन्‍दा राजजातकेँ परम्‍परा केर अभि‍न्न हि‍स्‍सा मानैत प्रत्‍येक बारह बर्षमे राजजातक भव्‍य आयोजन करैत छथि‍।
राजजात किंवा नन्‍दाजातक अर्थ भेल राज राजेश्‍वरी नन्‍दादेवीक यात्रा। गढ़वाल क्षेत्रमे देवी-देवताक जात अथवा यात्रा खूब धूमधामसँ मनाएल जाइत छै। अर्थात एतऽ ऐ क्षेत्रक लोकक दृष्‍टि‍मे जातक अर्थ भेल देवयात्रा।
लोक वि‍श्‍वास इहो छै जे नन्‍दा देवी भादवक अन्‍हरि‍या पक्षमे अपन नैहर अबैत छथि‍। कि‍छु दि‍नक बाद अष्‍टमी दि‍न हुनका नैहरसँ सासुर वि‍दा कएल जाइत छन्‍हि‍। राजजात या नन्‍दाजात नन्‍दा दाइकेँ अपन नैहरसँ एक बनल-ठनल, वस्‍त्र आ गहनासँ सुसज्‍जि‍त नव व्‍याहि‍ता कनि‍याँ जकाँ सासुर जेबाक यात्रा छन्‍हि‍। सासुर के स्‍थानीय भाषामे सौरास कहल जाइत छै। ऐ अवसर पर नन्‍दादेवीकेँ सजा कऽ बना ठना कऽ महफामे बैसा तथा वस्‍त्र, आभूषण, खाद्यान्न, पैसा, मि‍ठाइ इत्‍यादि‍ सनेस दऽ गढ़वालक परम्‍पराक अनुसारे वि‍दा कराएल जाइत छन्‍हि‍।
ओना तँ हरेक साल नन्‍दाजात आयोजन करबाक प्रथा छै परन्‍तु बारह वर्षमे भव्‍य आओर मनोरंजक राजजातक आयोजन कएल जाइत छै। आयोजन एहेन जकरा शब्‍दमे नै कहल जा सकैत अछि‍। केबल अनुभव कएल जा सकैत अछि‍। नन्‍दाजात प्रति‍ वर्ष इजोरि‍या पक्षक अष्‍ठमीक दि‍न मनाएल जाइत अि‍छ। तही दि‍न नन्‍दा दाइकेँ महफामे बैसा कऽ वि‍दा कएल जाइत छन्‍हि‍।
नैनीताल, बैजानाथ आ अल्‍मोड़ामे वि‍शेष धूमधामसँ ऐ महापावनि‍केँ मनाएल जाइत अछि‍।
नैनीतालमे प्रति‍वर्ष नन्‍दा-सुनन्‍दा मेलाक आयोजन कएल जाइत छै। ऐ अवसरपर नन्‍दा आओर सुनन्‍दा दुनू बहि‍नकेँ वि‍शि‍ष्‍ट रूपेँ केराक गाछसँ बनल मूर्तिकेँ महफामे बैसा चारू तरफ घुमाएल जाइत छन्‍हि‍। केराक एहेन आकर्षक मूर्ति कुमाऊँकेँ अति‍रि‍क्‍त अन्‍यत्र नै बनाएल जाइत छै। आ सभसँ अन्‍तमे मूर्तिक वि‍सर्जन नैनी झीलमे कऽ देल जाइत छै।
कुमाऊँ क्षेत्रक बात भऽ रहल अछि‍ तँ एक बात आरो स्‍पष्‍ट कऽ दी। कुमाऊँमे नन्‍दाक एक वि‍शेष बात ई छन्‍हि‍ जे गरूड़केँ कोट भ्रामरी मन्‍दि‍रमे नन्‍दादेवीक अवतार एक पुरूषक शरीरमे होइत छन्‍हि‍ जखन कि‍ उतराखण्‍डक अन्‍य क्षेत्रमे देवीक अवतार स्‍त्रीक शरीरमे आ देवता लोकनि‍क अवतार पुरूषक शरीरमे होइत छन्‍हि‍।
प्रसि‍द्ध इति‍हासकार एटकि‍ंसन महोदय हि‍मालयन गजेटि‍यरमे प्रत्‍येक बारह बर्षपर नन्‍दा राजजात मनेबाक वि‍स्‍तृत वर्णन करैत छथि‍। ऐ यात्रामे करीब 250 कि‍लोमीटर दूरी- नौटीसँ होमकुण्‍ड धरि‍ पैदल करए पड़ैत छै। ऐ यात्राक मध्‍य धनधोर जंगल, दुर्गम चोटी आ बर्फसँ झाँपल पहाड़केँ पार करए पड़ैत छै। यात्राक कठि‍नता आ दुरूहताक कल्‍पना अहाँ ऐ बातसँ लागालीय बाण गांवसँ आगाँ रि‍णकीधारसँ यात्री सभकेँ पएरे- बि‍ना जूत्ता-चप्‍पलकेँ ज्‍यूगरालीदार देसी करीब 18000 फीटक ऊँचाइ पार करए पड़ैत छै। यात्रा जखन रि‍णकीधारसँ आगाँ बढ़ैत छै तँ नाना तरहक प्रति‍बन्‍धक पालन केनाइ अनि‍वार्य भऽ जाइत छै जेना स्‍त्रीगण, बच्‍चा, अभक्ष्‍य ग्रहण करैबला जाति‍क लोक चामक बनल वस्‍तु- गाजा बाजा इत्‍यादि‍ नि‍षि‍द्ध भऽ जाइत छै।
सम्‍भवत: ई यात्रा संसारक सभसँ पैघ, दुर्गम आ कठि‍न धर्मयात्रा थीक। ऐ यात्राकेँ केबल समर्पित तथा नि‍ष्‍ठावान भक्‍त लोकनि‍केँ सकैत छथि‍। हजारोक संख्‍यामे श्रद्धालु लोकनि‍, धर्म तथा परम्‍परामे वि‍श्‍वास करैबला आइयो केर धोर कलि‍युगमे ऐ यात्राकेँ श्रद्धापूर्वक पूरा करैत छथि‍।

रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"

Suggested citation: डॉ. कैलाश कुमार मिश्र. “उत्तराखण्डक नन्दा-राजजात.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 75, 2011-02-01. https://www.videha.co.in/research/2011/75/उत्तराखण्डक-नन्दा-राजजात.htm

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