मैथिली बाललोककथा : स्थिति आ अपेक्षा
आगाँ-
एगो रहथि राजा-
मैथिली बाललोककथाक अकृत्रिम संग्रहक दृष्टिए निरक्षर किसुन कामति द्वारा कहल ओ प्रो. हंसराज द्वारा सम्पादित संग्रह 'एगो रहथि राजा' अत्यन्त महत्वपूर्ण अछि, कारण ऐमे खिस्सा कहनिहारक भाषाकेँ यथावत् रखबाक प्रयास भेल अछि। ऐ संग्रहमे तीन गोट कथा अन्तर्भुक्त अछि क्रमश: एक लालसँ सात लाल, तूरक घोड़ा आ दलिदरा जोग। एक लालसँ सात लाल दीर्घ कथा थिक जइमे चारि गोट उपकथा सेहो अन्तर्भुक्त अछि। संग्रहक तीनू कथा उत्सुकता अो कुतूहलसँ युक्त मनोरंजक ओ ज्ञानवर्द्धक प्रकृतिक बाललोककथा थिक।
बाल- प्रसून
किरणजीक बाल प्रसून कथासंग्रह यद्यपि नेना सभकेँ धियानमे राखि ऐतिहासिक महाभारतीय कथानकक पुन: व्याख्या थिक। शैली शास्त्रीय होइतो अपन उद्देश्यक कारणे एकरो बाललाेककथाक संग्रह मानल जा सकैछ।
कथा-कहानी
ई डाॅ. शैलेन्द्र माेहन झा द्वारा संग्रहीत चौदह गोट बाल-लोककथाक संग्रह थिक। एकर कथा सभ नातिदीर्घ आकारक अछि। अधिकांश कथामे पशु-पक्षीकेँ आधार बना कऽ कोनो ने कोनो नैतिक शिक्षा प्रदान करब कथा सबहक उद्देश्य अछि जे बालमनकेँ प्रभावित करैबला अछि। लोक जगतक सुख-दु:ख, आशा-निराशा, भावानुभाव, हर्ष-विषाद, आचार-व्यवहार आदिक सहज ओ अकृत्रिम अभिव्यंजनाक कारणे मैथिली बाल-लोककथाक संग्रहक दृष्टिए ई नियामक ओ मार्गदर्शी संग्रह सिद्ध भेल। ऐ संग्रहमे किछु कथा हास्य-विनोदपरक तँ किछु लोकजीवनक अकृत्रिम झाँकीसँ सम्बद्ध अछि। एकर भाषा सेहो नेना-भुटकाक हेतुओ सरल, सहज ओ औत्सुक्यकेँ जगबैबला अछि।
मैथिली लोककथा
मैथिली लोककथाक सर्वाधिक प्रशस्त प्रकाशित संचयनक दृष्टिए श्री रामलोचन ठाकुरक मैथिली लोककथा अद्वितीय अछि। एकर प्रथम प्रकाशित संस्करण 1983 ईं.मे भेल जाइमे अठारह गोट कथा मात्र संकलित छलैक मुदा 2006 मे भेल द्वितीय परिवर्द्धित संस्करणमे ठीक दुन्ना अर्थात छत्तीस गोट कथा संग्रहीत छैक। लेखकक कहब छन्हि जे ओ ई कथा सभ अपन नानी, माँ आ लालमामासँ सूनि क' संग्रहीत केने छलाह तँए एकर सबहक अकृत्रिमता असंदिग्ध छैक। लेखक कथाभाषाकेँ सेहो सहजता प्रदान केने छथि तथापि कतौ-कतौ शास्त्रीयताक प्रभाव अवश्ये गछारने छन्हि। एकर अधिकांश कथा अपन रोचकताक कारणें बाल-लोककथा मध्य परिगणित कएल जा सकैछ।
अष्टदल
मैिथली लोककथाक ऐ संग्रहक संग्रहकर्त्ता छथि डॉ. श्री अमरनाथ झा। ऐमे आठ गोट लोककथा क्रमश: नीक-बेजाए, पुनर्जन्मक कथा, चरबाहक न्याय, सन्तोषी ओ हाहुति, हंसराज, मोहन कमार, चक्रवर्ती राजा ओ झोड़ाक माहात्म्य संकलित अछि। कथा सभ पैघ-पैघ अछि तथा शिष्ट साहित्यिक भाषाक प्रयोगक कारणे कृत्रिम प्रकृतिक भ' गेल अछि। तथापि ऐ संग्रहक मोहन कमार ओ झोड़ाक माहात्म्य कथा बाल-लोककथा मध्य परिभाषित हेबाक योग्य नीक नमूना थिक। अवश्ये ई दुनू बाल-लोककथाक किंचित परिवर्त्तनक संग पूर्व वर्णित मैथिली लोककथामे सेहो अछि।
एकटा छला गोनू झा-
धूर्त्त शिरोमणि गोनू झा मिथिलाक हास्य-विनोदपरक कतोक लोक कथाक नायक छथि। हिनक चरित्रपर आधारित कथा सबहक संग्रह अनेक संकलनकर्त्ता लोकनि करैत ऐलाह अछि जइमे हिन्दीमे डॉ. वीरेन्द्र झाक संग्रह राजकमल प्रकाशन (पटना, नई दिल्ली) सँ प्रकाशित भ' बेस प्रचलित भेल। एहने चौबीस गोट कथा सभकेँ मैथिलीमे डाॅ. विभूति आनन्द ’एकटा छला गोनू झा' नामे प्रकाशित करौलनि। बुद्धि ओ विवेकक प्रयोग, मनोरंजकता ओ सहजताक कारणे ई सभ मिथिलाक बाललोककथाक उत्कृष्ट दृष्टान्त तँ अछि मुदा बालमनक निश्छलता एकर शिक्षण-पद्धतिसँ कालुष्ये दिस जा सकैत छैक। कृत्रिम भाषा-प्रयोगक कारणे एकटा छला गोनू झा लोककथाक मर्यादाक पालन नै क' सकल अछि, तेहन प्रतीत होइत अछि। मैथिलीमे ऐ कोटिक कथाक अन्य संग्रह थिक श्री गोपीकान्त झा 'उमापति' द्वारा सम्पादित संकलन 'गोनू झाक चटनी' जे लोक जगतमे मैथिलीक प्रसारक दृष्टये महत्वपूर्ण मानल जा सकैछ।
प्रेत कथा-
ई हंसराज रचित छओ गोट प्रेतकथा संग्रह थिक। एकर अधिकांश कथा शिष्ट साहित्यक भाषासँ सम्पन्न अछि तथापि प्रेत विवाह पद्धति आ यावत् पढ़बह रूद्रकेँ अवश्ये बाललोक कथा मध्य परिगणित कएल जा सकैछ।
कुरूक्षेत्रम् अन्तर्मनक
ई पोथी श्री गजेन्द्र ठाकुरक विभिन्न विधाक रचनाक संकलन थिक। एकर सातम खंडमे बालकथाक रूपमे तेइस गोट कथा संग्रहीत अछि। ऐ कथा सभमे अधिकांश मिथिलाक लोकनायक सबहक कथा िथक तथापि अाधा दर्जनक लगभग कथाकेँ बाल-लोककथा कहल जा सकैछ, यद्यपि ओकरो सबहक भाषा पूर्णत: शास्त्रीय प्रकृतिक अछि। बाललोक कथाक संकलनक क्षेत्रमे चलैत प्रयास सबहक नमूनाक रूपमे एकरा महत्वपूर्ण कहल जा सकैछ।
क्षमाक जीत
महिलालोकनि द्वारा बाललोकथाकेँ संरक्षित करबाक प्रयास क्रमश: कण्ठसँ अक्षर दिस प्रवहमान भ' रहल अछि, से ऐ पोथीसँ भान होइत अछि। एकर लेखिका थिकीह श्रीमती पुष्पा कुमारी। ऐमे कएकटा स्रोतसँ उपलब्ध पाँच गोट कथा संग्रहीत अछि जकरा सभकेँ बाललोककथा मध्य परिगणित कएल जा सकैछ। एकरो भाषापर शास्त्रीय भाषाक प्रभाव अत्यधिक देखि पड़ैछ।
पिलपिलहा गाछ
हालहिमे डॉ. श्री मुरलीधर झाक बाल कथा संग्रह पिलपिलहा गाछ प्रकाशित भेलनि अछि जइमे एक्कैस गोट कथा संग्रहीत कएल गेल अछि। ऐमे पशु-पक्षीक कृत्यपर आधारित दुष्ट खिखिर, सिनेहक सिन्दूर तथा धूर्त्ततापर आधारित ठक्क कथा बाललोककथाक दृष्टान्त स्वरूप अछि। एकरा सबहक कथाभाषा पूर्णत: परिमार्जित साहित्यिक भाषा थिक।
बाललोक कथाक संकलन-प्रकाशनक दिशामे मैथिली साहित्यकार लोकनिक उपर्युक्त प्रयास सभ श्लाध्य अछि मुदा एतबे धरिकेँ संतोषप्रद नै मानल जा सकैछ। ऐ हेतु क्षेत्र-कार्य करबाक आवश्यकता छैक जै दिस अनुसंधित्सुलोकनि प्रयास क' सकैत छथि आ मैथिलीक ऐ विधाकेँ जिया क' राखि सकैत छथि, ओकर मौलिकताक क्षरणकेँ रोकि सकैत छथि।
अन्यान्य भाषामे उपलब्ध लोककथा सबहक मैथिली रूपान्तरणक माध्यमे सेहो कतोक बाललोक कथा मैथिलीक ऐ विधाक अभिवृद्धिमे सहायक भेल अछि आ एकरो आयाम पर्याप्त छैक। ऐ दिशामे कृत प्रयास सभमे पं. श्री गोविन्द झाक 'अओ बाबा : की बौआ, डा. इन्द्रकान्त झाक िवश्व प्रसिद्ध मैिथली लोककथा, डॉ. योगानन्द झाक 'बिहारक लोककथा', विजयनाथ ठाकुरक लोककथा आदि लोककथा संग्रह उल्लेखनीय अछि। मैथिली पत्र-पत्रिका सेहो बाललोककथाक प्रकाशन यदा-कदा करैत रहला अछि। एम्हर ऋृषि वशिष्ठ कृत 'कोढ़िया घर स्वाहा' शीर्षकसँ मात्र एक गोट बाललोककथाक प्रकाशन पुस्तकाकार कराओल गेल अछि जइमे विद्यापतिक अलस कथाकेँ उत्सक रूपमे ल' बाललोक कथा शैलीक प्रति सचेष्टता देख पड़ैछ। ई ऐ दिशामे एकटा अभिनव प्रयास आ दूरदृष्टिपूर्ण संकेत बुझना जाइछ।
नेनालोकनिमे अपन भाषाक प्रति अनुराग जगाएबाक दृष्टिये सम्प्रति बाललोककथाकेँ चित्रकथाक माध्यमे प्रस्तुत करबाक दिस किछु अग्रसोची साहित्यकारक धियान गेलनि अछि। ऐ दिशामे संभवत: पुस्तकाकार प्रथम प्रयास भेल अछि श्रीमती प्रीति ठाकुर द्वारा, जनिक 'गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा', श्रुति प्रकाशन दिल्ली द्वारा भव्य साज-सज्जाक संग प्रकाशित भेल अछि। ऐमे गोनू झासँ सम्बद्ध नओ गोट हास्य-विनोदपरक कथा तथा मिथिलाक किछु लोककथा यथा रेशमा-चुहड़मल, नैका-बनिजारा, भगत ज्योति पँजियार, महुआ घटबािरन, राजा सलहेस, छैछन महाराज ओ कालिदासक कथाकेँ चित्रावली द्वारा प्रस्तुत कएल गेल अछि। मैथिली बाललोक कथा प्रकाशनकेँ युगानुरूप अग्रनीत करबाक दिशामे श्रीमती ठाकुरक ई प्रयास अन्यतम कहल जा सकैछ।
आब मैथिली बाललोक कथाक किछु बैशिष्ट्यपर विचार कएल जाए। मैथिली बाललोककथामे राजा, राजकुमार, मंत्री, साधु, ब्राह्मण, नौका, सेठ, तेली, धोबि, मालिन, रानी आदि विभिन्न वर्गक पात्र, सियार, सपनौर, हाथी, धोड़ा, साप, गाए, बाध, सिंह, पशु पात्र, सुग्गा, कौआ, मैना, फुद्दी, मुर्गा आदि पक्षी पात्र, विध-िवधाता, शंकर-पार्वती, डाइन-जोगिन, परी, भूत-प्रेत, देवी-देवता आदि अलौकिक पात्र ओ हुनकालोकनिक कृत्य समाहित रहैत अछि। ओ लोकनि पारस्परिक ओ मनुष्यक संग व्यवहार ओहिना करैत छथि, बोलीयो तहिना बजैत छथि जेना मानव-मात्र। अतिमानवीय पात्रलोकनि असंभवो कार्यकेँ संभव करैत देख पड़ै छथि आ अलौकिक क्षमतासँ पूर्ण देखल जाइत छथि। हिनका लोकनिक कार्य-व्यापार नेनालोकनिकेँ चमत्कृत ओ आश्चर्यचकित क' दैत छन्हि। ऐसँ मनोरंजनक संगहि नेनालोकनिमे अद्भुत पराक्रम प्रदर्शित करबाक भावनाक उदय होइत छन्हि तथा कथाक प्रति हुनका लोकनिक उत्सुकता बनल रहैत छन्हि।
मैथिली बाललोककथा सामान्यत: सुखान्त होइत अछि। ऐमे नायक बहुधा विभिन्न विघ्न-बाधाकेँ पार क' अपन अभीष्टक सिद्धिमे सफल देखाओल जाइत छथि जइसँ नेना लोकनिक मन उत्फुल्ल भ' उठैत छन्हि आ परिश्रम ओ प्रयास द्वारा कोनो प्रकारक अभीष्ट प्राप्त कएल जा सकैत अछि, से भावना हुनका लोकनिक मनमे जमैत जाइत छन्हि।
मैथिली बाल लोककथा सभमे लोकमानसक उदार ओ व्यापक चित्र-वृत्तिक निदर्शन भेटैत अछि। परदु:ख कातरता ओ सहानुभूति, सहिष्णुता अेा वीरत्व तथा जीवमात्रक प्रति प्रेम भावना बाल लोककथाक अन्यतम विशिष्टता थिक जइमे नेनालोकनिक मनपर धनात्मक प्रभाव पड़ैत छन्हि।
मैथिली बाल लोककथा सभमे धटनाक वर्णन अत्यन्त सहजताक संग कएल रहैत अछि। स्वभावत: कोनो घटनाकेँ बालमन स्वभाविक रूपसँ ग्रहण क' लैत अछि। ऐ प्रकारक लोककथा सभमे औत्सुक्य जगैबाक अद्भुत झमता रहैत छैक। जइसँ नेनालोकनि एहन कथा अत्यन्त मनोयोगसँ सुनैत छथि आ बेर-बेर सुनबाक हेतु लुसफुसाइत रहैत छथि। एतए धरि जे कथा श्रवणक क्रममे हुनकालोकनिक निन्नो अलोपित भ' जाइत छन्हि। ओ सभ ऐ प्रकारक कथामे तेना भ' क' रमि जाइत छथि जे हुनकालोकनिक सुधि-बुधि पर्यन्त हेरा जाइत छन्हि।
मैथिली बाललोककथा वस्तुत: लोकमानसक अभिव्यक्ति थिक। तँए ऐमे उड़नखटोला ओ उड़ैबला घोड़ाक कल्पना कएल गेल अछि, पशु-पक्षीकेँ राजकुमारीक रूपमे परिवर्तित होइत देखाअोल गेल अछि, पक्षीकेँ मारि देलासँ राक्षसक मरि जाएबाक कल्पना कएल गेल अछि, देवनदी गंगा ओ अन्यान्यो देवता-पितरक प्रति आस्था देखाओल गेल अछि, विध-विधाता द्वारा ककरोपर असीम कृपा करबाक प्रवृत्तिक वर्णन भेल अछि, भूत-प्रेत अद्भुत कृत्यक कल्पना कएल गेल अछि। आधुनिकताक कसौटीपर एहन कथा सभमे अतिरंजनाक पराकाष्ठामे देख पड़ैछ मुदा लोकमानस एहन कथ्यक प्रति आस्थावान अछि आ एहन वर्णन सभसँ कनेको असहजताक अनुभव नै करैछ।
आकारक दृष्टिये मैथिली बाललोककथाक दुइ गोट प्रकार देख पड़ैत अछि- दीर्घ आ लघु। दीर्घ कथा सभमे एके कथामे अनेक उपकथा सभ अन्तर्मुक्त रहैत अछि मुदा लघु आकारक बाल लोककथामे एकेटा छोट घटनापर आधारित विवरण रहैत अछि।
मैथिली बाललोककथा सामान्यत: गद्यात्मक होइत अछि मुदा अनेक कथामे चम्पू शैलीक आश्रय लैत पद्योग समाहार बीच-बीचमे देख पड़ैत अछि यथा-
एकटा बाललोककथामे जखन एकटा मृतक स्त्रीक सारापर गाछ जनमि जाइत छैक आ ओकर पुष्पपर मुग्ध भ' ओकर ससुर ओ फूल तोड़ए चाहैत छैक तँ गाछतरसँ आवाज अबैत छैक-
“ससुरजी, ससुरजी
डारि जुनि छूबू, पात जुनि छूबू
भैया मारलनि, कूड़ खेत गाड़लनि
चुनरी रंगौलनि, बहु पहिरौलनि
हमरा देल वनवास
डारि-पात लागू अकास।”
एहिना अनेक मैथिली बाललोककथाक पद्य कथ्य दोसरो भाषामे यथा हिन्दी, भोजपुरी, बंगला आदिमे सेहो देख पड़ैछ, उदाहरणार्थ-
“आजा माजा कान में समा जा।”
“की खाओं की पियओँ, की लए परदेस जाओँ। आदि।”
एेठाम ई तथ्य ज्ञातव्य अछि जे जै बाललोककथामे जतेक लहरदार भाषाक प्रयोग रहैत अछि, से ततबे आकर्षक होइत अछि।
मैथिली बाललोककथाक भाषा अत्यन्त सरल, बोधगम्य ओ प्रवाहपूर्ण होइत अछि। एकर वाक्य संरचना अत्यन्त छोट-छोट रहैत छैक तँए जटिल ओ मिश्रवाक्यसँ ऐमे परहेज रहैत छैक। एकर पात्रक भाषा जकरा आलाप भाग कहल जा सकैछ सर्वथा लोकमुखी होइत अछि जइमे कर्तृवाच्य ओ वक्ताक अवक्र शब्दावलीक प्रयोग देख पड़ैछ। एकर कथातत्वकेँ आगू बढ़ौनिहार भाषाकेँ आख्यान भाषा कहल जा सकैछ। ई भाषा अत्यन्त परिवर्त्तनशील रहैत अछि। लोककथाक ऐ भाषापर कहनिहारक वएस, परिवेश, शिक्षा, लिंग आदिक प्रभाव देख पड़ैछ। लोककथा जखन श्रुत साहित्यसँ लिखित साहित्यमे परिणत होइछ, तखन एके कथाक रूप बहुलता, लिखित भाषाक रूप आदिमे संकलन कर्त्ताक भाषाक पर्याप्त प्रभाव पड़ैत छैक। यएह कारण थिकैक जे कथा समानो रहलापर ओकर स्वरूप विभिन्न लेखक-सम्पादक भिन्न रूपमे प्रस्तुत करैत देखल जाइत छथि। शास्त्रीयतासँ आछन्न लोककथाक क्रियापदमे छैक, छलाह, गोट, जाइत आदि पदक प्रयोग होइछ जखन कि रूपमे छै, छला, गो, जाइ आदि लघु स्वरूप देख पड़ैत अछि। ऐ विधामे भाववाचक संज्ञाक अत्यल्प प्रयोग भेल अछि आ तकर स्थानपर विशेषणे शब्दक प्रयोग वांछित बुझना जाइत रहलैक अछि।
एतावता मैथिली बाललोककथा मैिथली लोकसाहित्यक अमूल्य निधि िथक जकर संकलन-प्रकाशन आे अध्ययनक आवश्यकता अछि जइसँ ई सम्पदा अन्यान्य भाषाक समक्ष आबि सकए आ अनन्तकाल धरि नेनालोकनिक मनाेरंजन कऽ सकए।
क्रमश:
सुजित कुमार झा-