विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

भाग रौ: सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ आ आदर्शक उत्थान-यथार्थक पतन

रवि भूषण पाठक · 2011-03-01 · अंक 77

भाग रौ:सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ
साहित्यक प्रतिमान बदलैत रहैत अछि ,मुदा किछु तत्व क निरंतरता बनल रहैत अछि ।नाटक साहित्य मे दू तत्वक महत्व कमोबेश सब युग मे रहल अछि । प्रासंगिकता आ रंगमंचीयता एहने दू टा तत्व अछि ।पहिलक सम्बन्ध मोटामोटी विषयवस्तु आ दोसरक सम्बन्ध शिल्प सँ अछि ।विभा रानी लिखित ‘भाग रौ‘ क विश्लेषण ऐ दृष्टि सँ कएनए उचित अछि ।
विभा रानी द्वारा ऐ नाटक मे भीखमंगा बच्चाक जीवन आ समाजक क्रूर दृष्टि क चर्चा कएल गेल अछि ।लेखिका द्वारा चयनित विषय वस्तु मैथिलीए मे नइ बल्कि आनोआन भाषा मे विरल अछि ।भीखमंगा बच्चा सभ आपसी वार्ता मे समाज आ जिनगीक कतिपय क्रूर पक्ष सँ परिचय करबैत अछि ।समाज ,सरकारक साथेसाथ भगवानहुँ सँ उपेक्षित ई बच्चा भारतीय समाज आ राष्ट्रक महानता पर व्यंग्य करैत अछि ।
भीखमंगा बच्चा सभ अपन जिनगी क क्षतिपूर्ति गोविन्दा,रितिक रोशन,शाहरूख,अभिषेक आदि क चर्चा सँ करैत अछि आ अपन कथात्मक सन्दर्भ मे ई जेहन करूण साबित होइत अछि ,रंगमंचीय दृष्टि सँ ओहने कलात्मक ।यद्यपि विद्वान लोकनि कें हीरो हीरोइन क ई अतिचर्चा अनसोंहांत लागि सकैत छन्हि मुदा अपन संदर्भ क मध्य ई रूचिगर आ प्रासंगिक बुझाइत अछि ।
‘दानापुर माने दाना स‘ पूरम पूरा ‘ भाग रौ नाटकक कथा प्रसंग देशक एहने दाना दाना चुगए वला सबसँ वंचित आ कर्मठ वर्ग क कथा छैक ।
एहि वर्गक सबसँ अभीप्सित भूख,चाह आ गंध थिकए,रोटी क गंध ।पेट मे ‘मरल सनकिरबो‘क थाह नइ मिललइ ;देशक नीतिनिर्माता आ प्रभुवर्ग पर प्रचण्ड प्रहार अछि ।भूखल बच्चा ऐ समाज मे अपन स्तर आ महत्व सँ परिचित अछि,ताहि दुआरे बच्चा1 कहैत अछि ‘प्रधानमंत्री छें जे मरि जेबें त‘ देसक काजधंधा थम्हि जेतै ।
नाटकक भाषा विषयवस्तुक अनुरूप करू आ मारक अछि ।तद्भव आ देशज शब्द क बाहुल्य नाटक के रूचिगर आ रंगमंचीय बनेने रहैत अछि ।
‘सिटी स‘ साहेब भ‘ गेलै त‘ हमरा आओरक भूख-पियासक रंग बदलि गेलै की?‘ उपरोक्त वाक्यक प्रश्नवाचकता आ कथनगत असंभाव्यता एकटा तनाव के जन्म दैत अछि ।
भीखमंगा सभ आपसी गपशप मे दूटा महिला राजनीतिज्ञ क चर्चा सेहो करैत अछि आ विडंबना ई जे दूनू महिला परिवारवाद आ भारतीय राजनीति क अनुर्वरता क पोषक छथि ।बच्चा सभ कहैत अछि जे पढि के की बनब?ई या ई ,दुर्भाग्य देखु जे दूनू महिला अपन विद्वता आ नैतिक शक्ति सँ जनमन क नेतृत्व नइ कइलक ।
एहन समाज आ राजनीति एकटा खास तरहक भाषा क इस्तेमाल करैत अछि ।ई भाषा प्रथमदृष्टया अश्लील आ मूलतः असंवेदनशील होइत अछि ।
‘ई डंडा एमहर स‘ घुसतौ त‘ मुंह दने निकलतौ ‘
वर्चस्व ,आक्रमण आ यौनविद्वेष सँ भरल ई भाषा एकटा खास सामंती आ मर्दवादी समाजक मानसिकता के पोषित करैत अछि ।
ऐ समाजक बुद्धिजीवी एहन भाषाक उपयोग नै करैत अछि ,मुदा अपन अनुर्वरता मे इहो तेहने अछि । दू टा पत्रकार - युवक आ युवती अपन शिक्षा आ संस्कार मे किछु अलग अछि ,मुदा इहो वर्ग सृजनशीलता आ नवोन्मेष सँ पूर्णतः रहित अछि ।युवती मे किछु नया करबाक संभावना अछि ,मुदा अंधकारक विराट आकाश मे ई संभव नै भेल ।
ऐे वर्ग क भाषा मे एकटा खास किस्मक नफासत अछि । तत्सम बहुलता आ अंग्रेजी शब्द आ वाक्य क बाहुल्य सँ ई वर्ग अपन विशिष्ट अस्तित्व आ रूचि पर बल दैत अछि । ‘नॉट ए बैड आइडिया ‘ ही इज डफर ,बी पेशेंट सनक चालू वाक्य रंगमंचीय अछि ।
रंगमंचीय उपकरण क रूप मे किछु नव प्रयोग सेहो अछि ।नाटक मे समवेत स्वर मे गान या बलाघात सँ किछु खास कहबा क प्रयास कएल गेल अछि ।
‘हम सब किछु नय क सकैत छी‘

हमसब.......मात्र पुतली भरि
ई सब अपन संदर्भ मे बहुत अर्थवान अछि ,मुदा ऐ ठाम रंगमंचीय कौशल सेहो अपेक्षित अछि ,अन्यथा अंतिम प्रभाव उड़ियएबा क संभावना अछि ।
भाग रौ नाटकक असफलता सेहो स्पष्ट अछि । दोसर अंकक पहिल दृश्य मे मंगतू एक पृष्ठक स्वगत बाजैत अछि । ऐ दृश्यक उद्देश्य स्पष्ट रहितहुँ रंगमंचीयता संदिग्ध अछि ।दोसर अंक मे लेखिका क नियंत्रण नाटक पर कम अछि । भीखमंगा वला संदर्भ जतेक जीवंत अछि ,ओतेक पत्रकार आ प्रेस वला नै ।मध्यांतर क बाद ऐ गुरूत्वाकर्षण क कमी एकदम स्पष्ट अछि ।
नाटकक अंत एकटा कविता सँ होइत अछि ।संयोगवश ऐ कविताक समानता आ समरूपता हिन्दी कवि शमशेर बहादुर सिंह क कविता ‘काल, तुझसे होड़ है मेरी ‘सँ बहुत ज्यादा अछि ।
शमशेर- काल,
तुझसे होड़ है मेरी: अपराजित तू -
विभा -ओ काल...
अहीं स‘ हँ,अहीं स‘ अछि टक्कर हमर
शमशेर-भाव,भावोपरि
सुख,आनंदोपरि
सत्य,सत्यासत्योपरि
विभा-जे अछि सत्यो स‘ बढ़ि क‘ सत्य
शिवो स‘ बढ़ि क‘ शिव
अमरो स‘ अमर
सुंदरतो स‘ सुंदर.....
ई कविता नाटक ‘भाग रौ ‘ क महत्वपूर्ण भाग नै अछि ।तें एकर शमशेर क कविता सँ समानता क कोनो खास महत्व नै अछि ।मैथिली नाटकक इतिहास मे विभारानी अपन ऐ नाटक क संग विशेष महत्व क उत्तराधिकारिणी छथि ।विषयवस्तु मे नवोन्मेष क संगेसंग ट्रीटमेंट क अभिनवता ‘भाग रौ ‘नाटक के उल्लेखनीय बनबैत अछि ।

आदर्श क उत्थान आ यथार्थ क पतन: उत्थान -पतन
जगदीश प्रसाद मंडल जी क एहि उपन्यास मे आदर्श क प्रति एकटा खास दृष्टि अछि ।लेखकीय विजन मे आदर्श अछि ।ओ मानवीय स्वभाव क उच्चादर्श मे विश्वास करैत छथिन्ह ।मानवीय वृत्ति क नीक पक्ष पर ओ झूमैत ंछथिन्ह आ अधलाह पक्ष पर कानैत छथिन्ह ,मुदा एहि हर्ष आ विषाद क लेल आवश्यक संघर्ष उपन्यास मे समवितरित नहि अछि ।उपन्यास क प्रारम्भ गंगानन्द क कथा सँ होइत अछि आ प्रारम्भिक किछु पृष्ठ तक कथा क विकास ,चरित्र क विकास,मिथिला क्षेत्रक रंग आ मनोवैज्ञानिकता क चित्रण मे लेखक के अतीव सफलता भेटैत अछि ।लेखक क ई नियंत्रण संपूर्ण उपन्या स मे एके रंग नहि भेटत । जाहि ठाम लेखक कथा क अनियंत्रित जंगल मे भ्रमण कर‘ लागैत छथि,ओहि ठाम पाठकीयता प्रभावित होइत अछि ।तहिना लेखक चरित्र क विकास मे हस्तक्षेप करैत छथिन्ह आ पात्र कठपुतली जँका लेखक सँ नियंत्रित होइत अछि ।
गंगानन्द,विसेसर सनक सब प्रमुख पात्र एहि आदर्शवादी ढ़ंग आ रंग सँ निर्मित अछि । वास्तव मे ई कवि जगदीश प्रसाद मंडल क जीत अछि आ लेखक जगदीश प्रसाद मंडल क हारि ।पात्र क व्यक्तित्व क विकास मिथिला क तत्कालीन सामाजिक राजनीतिक स्थिति सँ कम आ लेखक क आदर्शवाद सँ बेशी होइत अछि ।ताहि दुआरे जत‘ पाठक लाठी आ भाला चलबा क अनुमान लगबैत अछि,ओहि ठाम ह्रदय परिवर्तन सब काज क‘ दैेत छैक ।विसेसर कें खेत एकटा मामूली सिपाही सँ मिलि जाइत छैक ।वास्तविक जिन्दगी मे ई विरल घटना संभव अछि,मुदा ई समाजक प्रतिनिधि घटना नहि अछि ।विरल घटना सेहो साहित्य क अंग भ‘ सकैत अछि ,मुदा ओकर अंकन अनुभवक भट्टी सँ अनिवार्य अछि ।
ई उपन्यास स्वतंत्रता पूर्व क समय सँ सम्बन्धित अछि ।बीसम सदी क पूर्वार्द्ध क किछु घटना क उल्लेख उपन्यास मे अछि ।स्वाभाविक अछि जे उपन्यास क तुलना ‘बलचनमा‘ आ ‘मैला आँचल‘ सँ हो । उपन्यास मे ऐतिहासिकता क बलाघात क कतहु प्रयास नहि अछि । ताहि दुआरे अतीत क कालखण्ड क उपन्यास होएबा क बावजूद ई सामाजिक उपन्यास अछि । उपन्यास मे मिथिला क सामाजिक आ आर्थिक पिछड़ापन के विशेष चिह्नित कएल गेल अछि ।मिथिला क सर्वांगीन विकास लेखकक अभीष्ट अछि ।लेखकक ई लक्ष्य एतेक महत्वपूर्ण भ गेल छैक जे यथार्थ सँ आदर्श क पटरी बैसेनए अत्यंत कठिन भ गेल छैक ।
आधुनिक काल मे उपन्यास विधा एकटा खास उद्देश्य सँ साहित्य मे विकसित भेल आ क्रमशः प्रधान होइत चलि गेल ।सामंती युग आ समाज क उत्कृष्टता आ भव्यता सँ परिचय करेनए महाकाव्य विधा क काज छल । आधुनिक युगक वर्ग संरचना आ वर्गवृत्ति बदललए आ युगक उद्देश्य सेहो बदलि गेलए । एहि युग क वैशिष्ट्य के प्रकट करबा मे महाकाव्य विधा क कमजोरी प्रकट भेल,फलतः पद्य आ महाकाव्य क स्वीकार्यता कम भेल ।नवयुग के व्यक्त करबा क लेल गद्य,नाटक आ उपन्यास सनक विधा पर जोर पड़लए ।महाकाव्य क स्थान पर किछु खास मकसद सँ उपन्यास क आसन लाग‘ लागलए ।एहि विस्थापनक सबसँ मुख्य कारण छल उपन्यास विधाक सर्वसमावेशिता ।उपन्यास क प्रत्यास्थ शिल्प सबकिछु के अपना मे समाविष्ट क लेलक ।विद्वान लोकनि क बीच ऐ बात पर सर्वसम्मति भेल कि नवयुगक प्रवृत्ति के महाकाव्यात्मक गहराई सँ प्रकट करबा मे उपन्यास सक्षम अछि ।‘उत्थान-पतन‘ क लेखक उपन्यास विधाक महाकाव्यात्मक आयाम सँ परिचित छथि ।हम ई नहि कहि रहल छी जे ई महाकाव्यात्मक उपन्यास अछि ,मुदा जाहि भाषा मे महाकाव्यात्मक उपन्यास लिखल जाइत छैक,ओहि भाषा मे पहिले एहने सामाजिक उपन्यास सब मिलि के एकटा रचनात्मक वातावरण क निर्माण करैत अछि । ई हमर सौभाग्य अछि जे हमरा समय मे जगदीश प्रसाद मंडल सनक स्पष्ट सामाजिक बोध वला उपन्यासकार मैथिली मे छथि ।
।‘उत्थान-पतन‘ क संरचना यदि भारतीय उपन्यास क संदर्भ मे कएल जाए तखन ओएह प्रेमचंदीय आ शरतचंद्रीय विजन क स्पर्श अछि । गाम पर आ गाम क लोक क प्रति प्रेमचंद सँ किछु बेसिए अपनत्व क भाव । ई व्यक्ति क स्वभाव सँ ल के घर क संरचना तक स्पष्ट अछि ।
‘कँचके ईंटाक आ खढ़क छारल दरवज्जा ।नीक कारीगर क जोड़ल देबाल आ नीक छाड़निहार छाड़ने ,तें दरवज्जा सुन्दर ।दरवज्जा क ओसार मे एक भाग एकटा कोठली बनल ‘।
प्रेमचंद क उपन्यास मे अहाँ के खोजला पर गाम क प्रति प्रशंसाक भाव नहि मिलत । हँ गाम क प्रति दया क भाव प्रेमचंद मे जरूर अछि ।गाम क दलित-शोषित जन क प्रति प्रेमचंद मे विशेष पक्षधरता क दृष्टि मिलत,मुदा गाम क प्रति एकटा नास्टेल्जिक भाव जे आंचलिक आंदोलनक विशेषता अछि से अनुपलब्ध अछि । ‘उत्थान-पतन‘क लेखकीय दृष्टि मे किछु किछु रेणु क गा्रम्य प्रेम अछि ।मुदा एहि ठाम रेणु वला विराट व्यंग्य अनुपलब्ध अछि ।
लेखकक दृष्टि क रूप मे एकटा खास प्रगतिशीलता उपन्यास मे व्याप्त अछि ।ई दृष्टि अछि पिछड़ल मनुष्य के आगू बढ़एबा क उपक्रम । एकठाम विसेसर कहैत छथिन्ह-
’हमरा तोरा सन जे पछुआइल परिवार आ लोक अछि,ओकरा मे किछु एहेन दुरगुन अछि जकरा सुधारने बिना अगुआइब कठिन अछि ‘
उत्थान-पतन क भाषा पर विचार कएल जाए एकर भाषा मे कतहु बिहाड़ि नहि भेंटत एकदम आत्मीय वार्तालाप क भाषा-
‘बीघा भरि मकइ ।पँच-पँच हाथक हरियर हरियर फुलायल गाछ।तीनि-तीनि,चारिटा बाइल गाछ मे झूमैत।जेना जुआन कनियाँ अपन जुआनी क गुण सँ झूमैत तहिना मकइ क गाछ झूमि झूमि एक दोसर सँ लट्टा पट्टी सेहो करैत ‘।
यदि ‘उत्थान-पतन‘ क त्रुटि क बात करी,त किछु मुख्य दोष अछि-
1 संवाद मे स्फीति ।जखन विसेसर अपन सासुर मे अमृतलाल सँ घर बनएबा क आग्रह सुनैत छथिन्ह तखन विसेसर एकटा लम्बा अनुच्छेद मे कालदेवता क महात्म्य बताबैत छथिन्ह ।श्यामानंद बोरिंग खुनएबा क बाद विसेसर के सामने एकटा नमहर भाषण मे क्रियाशील पूंजी आ गतिहीन पूूंजी क चर्चा करैत छथिन्ह ।
2उपदेश क भाव कतहु कतहु नाटकीयता आ रोचकता क भंग करैत अछि । एहि ठाम लेखक अपन विचार घुसएबा क लेल आदर्श क चाशनी सँ कतहु आवश्यक आ कतहु अनावश्यक विस्तार करैत छथि । पृष्ठ 41-42 मे ज्ञानचंद एकटा नमहर अनुच्छेद मे सामाजिकता पर बजैत छथि ।
3उपन्यास मे एक साथ एकाधिक कथा विद्यमान अछि ।विसेसर क कथा, गंगानन्द तीनू भाए क कथा,डाक्टर नीलमणि क कथा ।मुदा एहि कथा क बीच मे कोनो गंभीर संपर्कसूत्र अनुपस्थित अछि ।कखनो कखनो लागैत अछि जे एक उपन्यास मे कतेको टा कहानी एक साथ चलि रहल अछि ।
पाश्चात्य विद्वान लोंजाइनस कहैत छथिन्ह जे महान रचना निर्दोष नहि होइत छैक ,निर्दोष रचना क फेरा मे क्षुद्रता बढ़बा क संभावना बढ़ि जाइत अछि ।‘उत्थान-पतन‘ क कतिपय दोष एहने दोष अछि जे विराट सामाजिकता क आवाहन क क्रम मे बाई-प्रोडक्ट जँका प्राप्त होइत अछि ।मैथिली क ऐ महान लेखक सँ हमरा आरो आर महान कृति क अपेक्षा आ आर्शीवाद चाही जे हमरा मे पढ़बा-गुनबाक सामर्थ्य विकसित हो ।
ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.शेफालिका वर्मा- रेत आ रेत
२. सुजित कुमार झा-कथा- बंश

शेफालिका वर्मा
रेत आ रेत
‘भौजीकेँ की भ’ गेलि छैक पायल?’
बादलक स्वर सुनि चौंकि भाइ दिस तकलक पायलμ‘सदिखन एकटा स्वप्न-लोकमे डूबल आँखि, व्यथा-वेदनाक जीवंत
रूप, भौजी जखन बात करैत छथि तँ चारू दिस जलतरगक अपूर्व ध्वनि पसरि जाइछ! जेना कोनो दीयाक ‘लौ’ हुनक पानी पर, गालपर
दहकि रहल हो पायल, काल्हि राति ओ जखन पफोनपर गप्प करैत छलीह तँ लगैत छल जेना पफोन छोड़बाक हुनका मोन नहि होनि,
कतेक तन्मयता, कतेक आत्मीयता...’
एकटा साँस लैत बाजल-‘अपना सभकेँ हुनक मदति करबाक चाही...’
μ‘मदति.....?’ पायल चौंकि गेल।
μह! पायल, भौजी हमरा माए जकाँ पोसने छथि। हम माएक अभाब कहियो नहि अनुभव कयलहुँ। ओएहा मातृतुल्य भौजी
हमर कतेक उदास, कतेक परेशान.....आखिर किएक.....?
‘μएहि वयसमे हिनका एहि तरहक-हमरा जेना कोना दन लगैत अछि। दुइ बच्चाक माए भौजी तखनμ! स्वयंकेँ मारि देतीह,
अपन इच्छाक गराँ घोंटि देतीह, मुदा हारि मान’ वाली नहि छथि’
μ‘नहिए, पायल हमरा तँ होइए, भौजी स्वयं नहि जनैत छथि जे ओ ककरो अथाह प्रेममे डूबलि छथि। एहि तरहक आदमी
स्वयंकेँ पुफसियबैत अछि। अपनोकेँ स्वयंसँ नुकबैत अछि। हृदयक अन्तरतम गहींरंइसँ पुफटैत कामनाकेँ थकुचि दैत अछि।’
μहमरा बुझबामे किछु अबैत अछि भैया, अहाँ की बाजि रहल छी?
μ‘हमरा होइछ, भौजी ककरो चाहैत छथि। मुदा एहि वयसमे पहुँचि कोनो स्त्राीक सतीत्बकेँ ई स्वीकार नहि होइत अछि।
अपनापर अधिकार क’ अपन इच्छाक अरथी निकालि दैत छथि। जनैत छीμ
झाड़ि बहारि पथ नित राखब
कृष्ण भेला परम कठोर...
एतेक उदासीμएतेक व्यथा-वेदना-आघगनसँ भौजीक गीतक स्वर जेना बादल आ पायलकेँ मूक क’ गेल। भौजीकँ गीत
गयबाक बड़ स’ख छलनि। ओ सदिखन किछु ने किछु गुनगुनाइत रहैत छलीहμसभटा उदासीक गीत। कनेक कालक लेल गीतक स्वर
रुकि गेल। प्रायः भौजी अपन नोर पोछि रहल छलीहμ
अपन सनेस छोड़ि जायब सखिया
इहो दूनू नयन चकोर
एक-एक आखन जेना कराहि रहल छल, एक-एक स्वर आहत भ’ छटपटा रहल छल......!!
बादल अपन सोचमे ओझरायल रहल। भौजी किएक एना बदलि गेलीह? नहि जानि, ककर खियालमे भौजी कटल गुîóी सन
बेबस जकाँ पहुँचि जाइत छथि? बैसलि-बैसलि गुम-गुम! गप्प करैत-करैत जेना हेरा जाइत छथि। हमरा होइत अछि, भौजी स्वयं नहि
बुझैत छथि। ओ ककरो चाहैत छथि एहि वयसमे खास क’ धर्मभीरु, दुई जुआन बच्चाक माए ककरो चाहबाक कल्पनो नहि क’ सकैत
अछि। कहियो अपन दुर्बलता स्वीकार नहि क’ सकैत अछि। तैयो भावनाक बिहाड़ि कखनो-कखनो हुनका अद्वेलित क’ दैत छनि।
हुनक अधरपर खेलाइत एकटा जादुइ मुस्की, हुनक व्यवहारमे कखनो चंचलता आबि जाइछ। भौजीक हृदयमे कोनो दबल-दबल
पुफलझड़ी अछि। हुनक तीतल पलक कँपैत अवर आ बाझर स्वर जेना हुनक बेबसीक चेन्ह थिक। ओह! बादलक माथक नस सभ
चरचरमराय लगलैक
यदि ई बात सत्य होयत तँ भौजी कहियो अपन लोकसँ, अपन परम्परागत रास्तासँ हटि नहि सकैत छथि? नहि जानि एहि
तरहँ कतेक जीवन अमावस्याक चिर अंधकारमे डूबि जाइछμनोन जकाँ पानिमे चुपचाप घुलैत.....
ओहि दिन कोनो बातपर तमसा क’ भैया आपिफस चल गेलाह। भौजी किछु नहि बजलीह। भैयाक भयंकर गर्जन-तर्जनमे डूबल
भौजी मौन-मूक ठाढ़ि रहि गेलाह-भैयामे इएह एकटा खराबी छनि जे तामसमे हुनका समय-असमय, निर्दोष-दोषी-कथूक ख्याल नहि
रहैत छनि। भैयाक आपिफस गेलाक बाद भौजी चुपचाप बादल आ पायलकेँ जलखै करब’ लगलीह! बादल कतेक आग्रह कयलक
भौजीसँ खयवा लेल-पायल भौजीसँ प्रार्थना करैत रहलीह, मुदा भौजी!... नहि जानि हुनका की भ’ गेलनि? उदास-उदास,
कानल-कानल, चिन्तामे डूबल। जेना कनबाक कोनो बहाना ताकि रहलि छथि। जेना हुनक किछु हेरा गेल हो, खाली-खाली आँखियेँ
शून्य मे ताकि रहल छलीह। नहि ककरो माए, नहि ककरो पत्नी, नहि ककरो भौजीμकिछुत’ नहि छलीह ओμओहि काल। भौजीक
ओहि रूपकेँ देखि पायल कानय लगलीहμअहा!केँ की भ’ गेल भौजी? की भ’ गेल? बादलक समस्त तन, रोम रोम जेना भौजीसँ प्रश्न
क’ रहल छल। मुदा, सभटा प्रश्नकेँ अनुत्तरित घुरबैत भौजी चलि गेलीह, बाथ रुममे। नहा धो क’ निकललीह आ पेफर ओएह भौजी!
बादल पायलक अवरपर मुस्कीक किरण चमकि गेलैक। सभ केओ जलखै करवालेल बैसलाह। बादल कोनो अवसादमे डूबल चुपचाप
भौजीक मुँह देख रहल छलाह। खिड़की पारसँ रहल छल! बादल जेना अभिभूत भ’ उठल। सिन्दूरी रंगमे डूबल भौजीक तेजोमय सौन्दर्य
देखि.....ओकर आँखि एहि महान देवीक समक्ष नमित भ’ रत्तिफम किरणमे अछि, ओतबे अहाँक आत्मामे। तखन अहाँ एतेक उदास
किएक छी? एतेक दुखी किएकμ? मुदा बादलक प्रत्येक प्रश्नकेँ भौजी अपन तिलस्मी हँसीसँ बिच्चे पगडंडीमे भटका दैत छलीह।
बादल चुपचाप सोचक एकटा नमहर रास्तापर निकलि जाइत छल। ओ एहन बाट छल जाहिमे कतेको भटकाव, कतेको घुरची छल।
एहि घुरचीकेँ सोझरयबामे अनेक क्षण मिलि मिनटक स्वरूप लेलेक आ अनेक मिनट मिलि घंटा। अचक्के ओकर सोचक ई क्रम टूटि
कानमे दूरसँ अबैत कोनो आबाज सुनाय पड़लैकμ‘की बात छैक बाउ, एना ठाढ़ भ’ की सोचि रहल छी?’
बादल हड़बड़ा गेलμ‘किछु त’ नहि भौजीμकिछु नहि।’
भौजी ओकर बाँहि पकड़ि लेलक ‘किछु बात अछि बाउ, अहाँकेँ कथीक सोच अछि?
भौजीक प्रश्न सुनि ओ आँखि उठा क’ हुनका दिसि तकलक। ओह! भौजीक ओ नजरि बादलक अंतरकेँ जेना प्रकप्मित क’
गेल। ओ चुप नहि रहि सकल- ‘अहाँकेँ कखनो कखनो की भ’ जाइत अछि भौजी? सभ सुख प्राप्त रहितो भौजी कखनो लगैछ भौतिक
सुख उपलब्धिक एतेक जयघोषक मध्य जेना अहाँ विराट् शून्यमे हेरा जायत छी। किएक भौजी किएक?’
जेना बादलक प्रश्न भौजीक समस्त अस्तित्वकेँ झकझोरि देलक। किछु अकचका क’ ओ एकटा निसाँस छोड़लनि। एक तोड़
पानि-बिहारिक बाद वातावरणमे एकटा विचित्रा शांति रोम जाइछ, तहिना कतेक काल धरि भौजीक चेहरा सपाट रहल आ पुनः दोसर
तोड़ पानि बिहाड़ि उठल। कनेक काल पहिने धरि जे चेहरा सपाट छल, से कतेक मनोभावनासँ भीजि-तीति गेल।
μभौजी, बाजू ने भौजी! कोन करणेँ अहाँ एतेक आत्मपीड़न भोगि रहल छी? कखनो लगैछ अहाँ एकटा कली छी गुमसुम,
चुपचुप! जखन अहाँ हँसैत छी तँ कली पूफल भ’ जाइछ। अहाँक संपर्कमे आयल सभ केओ एहि सौरभसँ सुरभित भ’ उठैछ। अपन
दुःख अपन पीड़ा बिसरि जाइछ। भैयो तँ बजैत छथि जे अहाँक भौजी एकटा ‘टॉनिक’ छथि, हँसीक ‘टॉनिक’, सौरभक ‘टॉनिक’।
आ’ पेफर लगैछ हवाक कोनो तीव्र झोँक आयल आ पूफलक सभटा पंखुरी धूरामे छिड़िया गेल! पूफल-पूफल नहि रहैछ, अहाँ-अहाँ नहि
रहैत छी? भौजी, ई कोन बयार थिकμकोन पीड़ा थिक?μ बादल आवेशसँ हाँपफ’ लागल।
भौजी ता घरि अपनाकेँ सहज क’ लेने छलीह? किछु बाजबा लेल हुनक अधर खुजल की पफोनक घंटी टनटनाय लागल।
ओ दौड़लि ‘ड्राइंग-रुम’ चल गेलीह! बादलक कानमे भौजीक म(िम स्वर पड़लμ‘हेलो की हाल छैक? हम? जीबैत छीμ हँ,
जीबैत-जीबैत थााकि गेल छीμहम जीब’ नहि चाहैत छीμ जीब’ नहि चाहैत छीμबड़ कठोर यात्रा अछि एहि जीवनक.....’
बादलक कानमे भौजीक दर्द भरल स्वर घुमरैत रहल। पफोनपरकेँ छल? भौजीकेँ कोन दुःख छनि? के अछि जकरा दुःख नहि
छैक? ककर जीवन सर्वथा क्लेश, व्यथासँ रिक्त अछि! मुदा ओहि दुःख, क्लेश, व्यथाकेँ अभिव्यक्त करबाक लेल सभ केओ
कोनो-ने-कोनो रूपमे माध्यम ताकि लैत अछि। प्रकृति धरि एहिसँ छटल नहि अछि। आकाशक हृदयक व्याकुलताकेँ अभिव्यक्त नहि
करैत अछि? आ’ सोचक ई सीमा असीम भ’ उठैत अछि,μ जखन आकाशक छटपटी एकटा बिजुरी .....?????? कौंधि जाइत अछि!
मेघक ई स्वर.....आकाश जखन अपन वेदनाकेँ सहाजकरबामे असमर्थ भ’ जाइछμत! वेदनाक ईं चीत्कार समस्त संसारकेँ कँपा दैत अछि।
आकाश तँ सरिपों एतेक कमजोर, एतेक असमर्थ भ’ जाइछ जे आँखिसँ अविरल अश्रुकरण खस’ लगैछ। मुदा भौजीकेँ कनितो तँ नहि
देखैत छियनि! सभटा नोर ओ पीबि लेने छथि......तावत भौजीक खनखनाइत हँसी ड्राइंग-रुमसँ पेफर सुनाइ पड़ल। परदा हँटाक’ चुपचाप
बादल देखलक। मोहल्लाक चारि-पाँचटा छौड़ा भीजीकेँ घेरने-‘चाची, सरस्वती पूजाक चंदा चाहीμचाची, बिना अहाँक मदतिक कोनो
भ’ सकैछμ‘आँटी आप हमलोगों को सलाह देती रहेंμ‘सभक स्वरक जयमाल पहिरने भौजी मुस्कियाइत रहलीहμ‘बेस, अहाँ सभ
निश्चिन्त रहू, एहि बेर एहि मोहल्लामे एहेन सरस्वती पूजा होयत जेहन कहियो नहि भेल अछि।
μ‘चाची जिन्दाबादμअ!टी जिन्दाबाद’ नाराक संग छौड़ा सभ चल गेल। समयक सागरमे ज्वार-भाटा अबैत रहल आ एक दिन
डाकिया चिट्टòी ल’ क’ आयल। साइकिल घंटी बजबाक संगे भौजी पागल जकाँ दौड़लीह। डाकिया एकटा लिपफापफ द’ चल गेल।
भौजी छटपटाक’ चिट्टðी पढ’ लगलीह। हुनक चेहरापर अबैत-जाइत रंगकेँ खिड़कीसँ बादल चुपचाप देखैत रहल! तखन बादलक मोनमे
हल्लुक सन संदेहक साँप पफन काढ़लक।μ ककर चिट्टðी भौजी एतेक प्रेमसँ पढ़ि अपन कोठलीमे ओछाओनतरमे राखि देलनि? बादलक
निः शब्द आँखि भौजीक पाछाँ क’ रहल छल। ओकर हृदयमे एकटा आवेग उठलμएकटा भनसा घरमे छलीह। अपन कोठली बंद क’
आशंकित मोन आ अव्यक्त भयक संगे ओ चिट्टðी पढ’ लागलμ
‘प्रिय नेहा! .....’ आ नेहाμभौजीक नामक संबोधन ओकरा कोनादन लगलैक। एहिठाम केओ भौजीक नाम नहि कहैत छलनि।
खाली भौजी, चाची, काकी, माँ इएह सभ रूप हुनक छलनि! खैर, बादल आगाँ बढ़लμ‘पत्रा, ‘अहाँक भावमय पत्रा भेटल। हम ओकरा
एकबेर दुइ बेर, अनेक बेर पढ़लहुँ। ओह! कतेक भावमयी अहाँ छी! लगैछ ईश्वर अहाँकेँ, अहाँक मोन-प्राणकेँ कोनो रेशमक मुलायम,
सुकुमार, ‘मासूम’ तारक ताना-बानासँ बुनने अछि, जाहिमे सलोनी पूखणमाक स्निग्ध, चन्द्रिकाक रस निचोड़ि राखल.....’ओ पत्रा पढ़ैत
जाइत छल आ बादलक माथपर आबि रहल छलμभौजीक रहस्य जेना खुजि रहल छलμ‘एहि मोन-प्राणमे मानसरोवरक हँसक शुभ्रता
आ मयूरपंखक चित्रामयता अछि। कतेक रंग, कतेक सम्मोहन भरि देल गेल अछि अहाँक अन्तरक नीलाभ आकाशमे? साओनक घटाक
करुण कोमल व्याप्ति आ बिजलीक तड़ित लयसँ अपन सपनाक सिंगार कयने छी अहाँ।’ बादल अपन हृदयक धड़कन स्वयं सुनि
रहल छल। भौजीक प्रत्येक हाव-भाव, एक-एक रहस्य ओकरा रोमांचित क’ रहल छल...‘एहि विशाल विश्वमे जाहि ठाम हमरा लेल
कोनो विशेष आकर्षण आ सम्मोहन नहि अछि, जाहि ठाम हमरा जीवामे कि मरि जयबामे कोनो अन्तर नहि अछि ओहिठाम अहाँक
पत्रा एकटा पुलक, एकटा भोरक किरण, एकटा शरदकालीन ओसक चमक आ बसन्ती बयार बनि अबैछ, हम अपन ऊपर रसवंती
केतकी वा चमेली वा किछु आरक अनुभूति करैत छी.....’ बादलकेँ लगलैक, भाभी कतेक ‘Úॉड’ अछि? कतेक ‘भोला-भाला’ कतेक
नीरक्षीर सन पावन मुदा असलमेμ? ओकरा मोन भेलैक, तुरत भौयाकेँ जाक’ पत्रा देखा दी। तुरत भौजीसँ पुछी। पेफर सोचलक, कने
आर आगाँ पढ़ि लीμ अहाँक मोनमे किछु घुमरैत रहैत अछि। हम बुझैत छी, अपन भाइपर विश्वास नहि अछि?’ भाइ-बहिन?
बहिन-भाई? बादलक दिमाग जेना चक्कर काट’ लगलैक... ओकर बनाओल रेतक सभटा रेखा बिहाड़िमे लुप्त भ’ गेलैक। ओकर ऊपर
साँस जेना नीचाँ आयल? भौजी-ओह! कतेक बात ओ सोचि गेल? जेना भयंकर सपना देखिक’ ओ उठल होअयμजेना कोनो अनर्थ
होइत-होइत बाँचि गेलैकμ‘अहाँ हमरा राखी बन्हने छी। तखन अहाँकेँ हमरापर विश्वास नहि अछि? राखीक अर्थें थिक बहिनक रक्षाक
भार!’ μबादलक मानस-जेना पानि बरसि आकाश निरभ्र भ’ जाइत छैकμ एकटा पैघ ‘एक्सीडेंट, होइत-होइतμएकटा भयंकर ‘ट्रैजेडी’
होइत-होइत बचि गेल। मुदा की ‘ट्रेजेडी’ होइत-होइत बचल? की भयंकर ‘एक्सीडेंट’ नहि भ’ गेल? ओहि भाग्यहीन दिवसक रेत
बादलक आँखिमे गड़’ लागलμएहि तरहक ओझराहटि आ भौजीक पाछाँ बेहाल बादलक प्रकृति एकदम रूक्ष भ’ गेल छल। अपन
पढ़ाई-लिखाइ सभ बिसरि गेल छल! मेडिकलमे एडमिशन टाकाक तंगीक कारण नहि भ’ रहल छलैक! ओ चुप भ’ नियतिक खेल
देख रहल छल। एम्हर भौजीक प्रवंचनाμह!, प्रवंचने तँ छलीह-दोसर लोक लग कतेक उत्पुफल्ल, कतेक उन्मुक्त, कतेक सहज, मुदा
अपने घरमे कतेक निराश, कतेक बंदिनी, कतेक दुरुह। समस्त शहरमे भौजीक बड़ाइ, छोट-पैघ, बूढ़-बेदरा स्त्राी-पुरुष सभ केओ मुक्त
कंठेँ करैत छल! ओएह भौजी भरल घर, लोक रहितो, कतेक असम्पृक्त भ’ जाइत छलीह।
जखन भैयाकेँ कोनो गरजे नहि छनि तँ हम कथी लेल भौजीक पाछाँ तबाह भेल छी। आ’ कॉलेज जयबा लेल बादल तैयार
होब’ लागल। ड्राइंग रूममे पेफर पफोन घंटी टनटना उठल? आ पुनः भौजीक स्वर स्थिरसँ तीब्र। पुनः एकटा खनखनाइत हँसी.....आ’
बादलक कानमे जेना काँच पिघलैत रहलμ दस मिनट बीतल, बीस मिनट बीतलμभौजीक गप्पक कतहु अन्त नहि छलμबादलक
दिमाग साँय-साँय क’ रहल छल।
ई कोन गप भेलै पफोनपर! गप करैत छी, हँसैत जा रहल छीμई की भेलैक? हम जलखै करबा लेल ठाढ़ छी, कालेज जाक’
पता लगौनाइा अछि आ भौजीμएकटा नम्हर गपमेडुबल, बात-बातमे ठहाका...गप किछु सुनाइ नहि पड़ैत छल, मुदा स्वरसँ बादलक
समस्त तनमे लहरि पूफकि देने छल! ओ तामसे कालेजदिस विदा भेल......गेट लग पहुँचल कि भौजी पाछाँसँ दौड़लि ओकर बाँहि पकड़ि
लेलकैμ‘‘जलखै क’ लिय’ बाउ!’μ‘‘नहि बड़ अबेर भ’ गेल, हमरा कॉलेजमे किछु काज अछि।’ तिक स्वरेँ बाजल बादल। ओकर
स्वर पर भौजी चौंकि उठलीह!
‘बाउ, अहाँक दुआरे हमहूँ नहि करब’ किछु अप्रतिभ होइत भौजी बजलीह।
‘हमरासँ कोन मतलब अछि अहाँकेँ? अपन जाक’ खा लिय’μ उपेक्षासँ बादल बाजल।
‘हम नहि जाय देब, जा धरि अहाँ जलखै नहि करब।’ बासी मुँहेँ हम नजि जाय देबμभौजी ओकर बाँहि घिचने भनसा घर
दिस ल’ जाय लगलीह।
‘हम एक बेर कहि देलहुँ, नहि खायब’।
अपन जगहपर अडिग छल ओ। भौजीक लेल बादलक ई रूप अकल्पनीय छल, अकथनीय छल। ओ अवाक् छलीह! वेदनाक
एकटा ज्वार हुनका आँखिमे उठल, मुदा तुरते अपन कौशलसँ ओहि ज्वारकेँ उपेक्षित क’ देलनि। एकटा दर्द भरल मुस्कीक संग
बजलीहμ‘हे यौ, केओ किछु कहि देने अछि? अहाँ एना किएक क’ रहल छी? हमरा सँ कोनो गलती भेल अछि? की बात अछि?
चलू हमरा भूख लागि गेल अछि रविक प्रात थिक।’
‘रविक प्रात...जा क’ अहाँ खा लिय’? हमरा की कहैत छीμएतेक कालसँ जे अहाँ निहोरा करबा रहल छी एतेकमे त’ अहाँ
कैक बेर खा लितहुँ।’ बादलक सभ उपेक्षाकेँ अनदेखन सन क’ भौजी कहैत रहलीहμ‘हम अहाँ बिना खाइत छी?’ अनुनय करैत
बजलीह। बादलकेँ विवेक जेना कतहु हेरा गेल छलμ‘एतेक बहाना नहि करु भौजी! अहाँकेँ हम खूब चीन्हैत छी।’
‘बा...द...ल....’ बादलक विद्रूप हँसीसँ भौजी जेना विवश भ’ गेलीह।
‘अहाँ अपनाकेँ की बुझैत छी? छोड़ू हमर हाथ!’
‘बादल...! भौजीक हाथ ओकर गट्टðा पर आर मजगूत भ’ गेल।’
‘बी बात छैक बादल जी? अहाँकेँ...’
बादलकेँ जेना अपन होश हवास पर कोनो कब्जा नहि रहलैकμनहि छोड़ब? त’ लिय’...।’ भौजीक हाथ बामा हाथसँ कसि
क’ मोचड़ि देलकμअपन हाथ उन्मुत्तफ क’ लेलक। भौजीक मुँहसँ एकटा पीड़ा निकलल ‘ओह!’ आ हुनक सौँसे चेहरा रक्तिम भ’
गेल। बादलकेँ की भ’ गेल छैक?
‘ई कुहरब काहरब नकल हमरा ल’ग किछु नहि चलत।’ बादल क्रोधावशमे माहुर भ’ गेल छलμओकर कंठ स्वर सौंसे
आंगनकेँ प्रकम्पित क’ रहल छलμओ बिसरि गेल छल, हमर ई भौजी थिकीह, कोमल मसृण ओस सन मातृ तुल्य-ओ भैया छथि
जे वर्दाश्त करैत छथि। हमरा सभ-आ आवेशसँ ओकर स्वर रु( भ’ गेलैक।
‘अहाँ की करितहुँ?’ भौजी पुछैत रहलीह।
‘हमμ? पूछू, की नहि करतहुँ? आन आन लोक संग टेलीपफोन पर एतेक हँसी, एतेक ठट्ठाμभैया नहि जनैत छथि तेँ ने?
अहाँ भैयाक आँखि मे धूरा नहि झोँकेत छी की?μ अहाँ अपना केँ......
तावत बादलक गालपर पाछासँ दू-चारि चाट लागलμ‘बदतमीज बेहाया, अपन मातृतुल्य भौजीसँ उकटा पैंची क’ रहल छें?
कोम्हर दनसँ भैया आबि गेल छलाह। थापड़ लगिते बादलक आँखि मे तरेगन नाचि गेलैक। बीचमे भैयाक हाथ पकड़ि भौजी बाजि
उठलीहμ‘ई की करैत छी? बेटा सन छोट भाइ पर हाथ उठबैत छी’?
‘जे बेटा अपन माए पर कलंक लगबैक ओहि बेटासँ बेटा नहि रहनाइ नीक थिक।’
मुदा बादल, ओकर दिमाग जेना पगला गेल छलμ‘भैया, अहाँ भौजीसँ पूछू। एखन किछु काल पहिने ओ पफोन पर ककरासँ
हँसि-हँसि गप्प करैत छलीह’?
‘अरे निर्लज्ज, मोन होइछ जाहि जुबानसँ ई प्रश्न निकलल, ओहि जुबानकेँ पकड़ि क’ खींचि ली.....।
अहाँ के हमर सप्पत थिक। आब अहाँ शान्त भ’ जाउ। हमरा बेटा नहि अछि। हम बादलकेँ बेटासँ बढ़ि क’ मानैत छी। बेटा
माएके किछु कहैत छैक त’ ओ कलंक नहि होइत छैक।’ आ भौजी पफपफकि-पफपफकि कान’ लगलीह। मुदा, भैया तमसायले स्वरमे
बाज’ लगलाहμ ‘किछु काल पहिने तोहर भौजी हमरेसँ गप्प करैत छलीह। बुझलही, खाली तोहर विषयमे’!
बादल अवाक् छल। ‘कहैत छलहु तोहर भौजी जे मेडिकल कॉलेजमे जेना होयत बौआक नाम अवश्य लिखायब। कम्पिटीशनमे
नहि अयला त’ की होयतैक? जेना होयत, हम सभ टाका-पैसाक इंतिजाम क’ हुनका डॉक्टर बनायब।’
भैया दाँत पींसैत एक-एक शब्द पर जोर दैत बजैत रहलाह। ‘हम कहलियनि एतेक टाकाक इंतिजाम मुश्किल अछि! तोहर
भौजी की जबाब देलकौ से बुझलही?μ अहाँक बैंक में पाँच हजार जमा अछिए। हमर गहना जेबर बन्हकी राखि दस हजारसँ उपर
भ’ जायत। हम कतेक विरोध कयलहुँ जे बन्हकी नहि लगायब। अहाँक गहना पर हमर कोन अधिकार अछि? मुदा हमर सभ बातकेँ
ओ हँसैत-हँसैत काटि देलनि-नाम लिखयबामे मात्रा दुइए दिन बाँचल छै! हम सभ गप्प क’ रहल छी बंधकी लगयबा लेल! एखन
तुरंत अहाँ चल आऊ-।’ भैयाक गर बोझिल भ’ गेलनि।...‘आ एहिठाम तोँμबड़ नीक प्रतिदान प्रेमक दैत छलाह? तो ठीके पैघ आदमी
बनबह।
आ बादलकेँ काटू त खून नहि। रेतक ढेर...ढेर बिरहो ओकर आँखि कान, नाकमे भरि गेल आ बादलक दम औना रहल हो,
घुटि रहल हो...
‘बाउ, चलू जलखै करबा लेल’
μओएह स्नेहिल स्पर्श....

सुजित कुमार झा-
कथा

बंश

हमर दृष्टि तीव्र गती सँ पत्रिकामे प्रकाशित परिणाममे अपन रोल नम्बर ताकि रहल छल ।
अपन रोल नम्बर पर नजरि पड़िते हमर मोनमे ओहने खुशी भेल जेना कोनो सातदिनक भुखाएलकेँ आगामे छप्पन प्रकारक व्यंजन पड़ोसि कऽ कियो धऽ देने होइ । समिपमे बाबुओ जी आ माँ ठाढ़ रहथि ।
हुनको आँखिमे खुशीकँे सागर हिलोर मारैत कियो देख सकैत छल । मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास कऽ गेल छलहुँ, एहि क्षणकँे प्रतिक्षो एक—एक पल एक—एक वर्ष जकाँ बितौने छलहुँ हम ।
सम्भवतः हमरोसँ बेसी एहि क्षणकेँ प्रतिक्षा माँ कँे छल । तएँ अनायासे ओकरोे मुँहसँ निकलि पडल ‘हमर बेटी कोनो बेटासँ कम अछि ? हाकिम बनि हमर खनदानकेँ नाम रोशन करत ।’
आखिर ई हमर सपना सकार कइए कऽ देखौलक !
ओकर एहि कथनमे खुशी छलैक रहल छल आ की खुशीसँ बेसी पीडा । हमर माँ कँे मनोभावकेँ बुझि बावुजी प्रेम सँ ओकर बाहि थपथपा देलन्हि ।
हमरा मेडिकलमे चयनकेँ खुशीमे बाबुजी सभकेँ मँुह मिठ करएबाक लेल मिठाइ लाबय बजार चलि गेलाह । माँ भानस घरमे चलि गेल । शायद ओ कोनो निक जलपान बना हमरासभकँे खुआ अपन खुशी व्यक्त करय चाहैत छल । हम अतितक पुस्तककेँ पन्ना उलटाबय लगलहुँ ।
जहिएसँ हम होशगर अर्थात बुझय बला भेलहुँ । अपन मायकँे दाइद्वारा प्रताडित होइत देखने छलहुँ । पहिने तऽ हमरा बुझबामे नहि आबय । आखिर हमर माँ हुनकर की बिगाड़ने छल , कोन कमी वा अपराधक कारण सदिखन दाइ आ पिसीकेँ व्यंग्य वाणक मारि झेलैत अछि माँ ?
धीरे—धीरे हम बड़का होइत गेलहुँ आ पारिवारिक तथा समाजिक परिस्थितिकेँ बुझय लगलहुँ । दाइक आक्रोशक कारण हमरा बुझयमे आबय लागल ।
हम तीन बहिन छी । हमरा कोनो भाइ नहि अछि । दाइकँे दृष्टिमे माँकेँ कोनो बेटा नहि होएब सबसँ बड़का अपराध छैक । तेसर बेटी यानी हमर जन्म भेलाक बाद तऽ घरमे हंगामे ठाड़ भऽ गेल छल । दाइकेँ पुरा उम्मीद छलन्हि की अहिबेर लड़कँे हेतै, मुदा से भेल नहि । फेर लड़कीए होएबाक खबर सुनि ओ हमर मुँह देखब तऽ दूर, माँ कँे छठिहार दिनक बिध तक नहि करओलन्हि । बाबुजी अस्पतालसँ किछु दिनक बाद हमरा आ माँकँे घर अनने रहथि । माँ कँे दुःख जखन कखनो बाबुजी बाँटय चाहथि, हिम्मत नइ हारबाक बात कहथि हँसय हँसाबय कँे बात करथि, ओ दाइ कँे पसिन नहि पड़ैक आ मुँह बिचुका कऽ दाइ बाजल करथि, ‘ई जोरुकँे गुलाम अछि ।’
माँ एखन तनमनक पीडा सँ उवरलो नहि रहथि की दाइ अपन बेटा यानी हमर बाबुजी पर दोसर विवाहक दबाबक बात शुरु कऽ देलन्हि । दाइयक कहब छल, ‘आखिर बेटा बिना वंश कोना चलतै ?’
जखन बाबुजी दाइकेँ बातकँे अनसुना कऽ दैथ तऽ ओ हमर माँ पर तामस उतारथि ‘३÷३ बेटीकेँ जन्म देलक, एकटा बेटा जन्माओल नहि भेलन्हि ।’ तऽ कहियो कहथि ‘ई नहि होइ छन्हि की हमर बेटाकँे पिण्ड छोड़ि दैथ जहिसँ हम दोसर पुतहुँ लऽ आउ, पता नहि केहन सँ पाला पड़ल अछि ।
दोसर पुतौहँु बेटा जन्माबयकँे सर्टिफिकेट अपन संग लऽ कऽ औती ? अहि सभ गप्प सँ माँ भितरे—भितर टुटय लागल, मुदा बाबुजीकेँ दृढताक कारणे दाइकेँ एक्को नहि चललन्हि , एहि मादे ।
माँ बाबुजी कँे कतेकोबेर बतिआइत आ दुःखी होइत सुनने आ देखन छी ।
एखन तक हम बहुत सम्झदार भऽ गेल छलहुँ , पढाइमे हमर रुचिकेँ देख बाबूजी हमरा विज्ञान विषयसँ इन्टर करेलाक बाद मेडिकलकँे प्रवेश परीक्षामे बैसौलथि, जखन की हमर दूनु बहिनकेँ दाइक हस्तक्षेपक कारण माध्यमिक कँे बाद घरेमे बैसय पड़ल छल ।
दाइकँे माँ सँ कोनो सहानुभूति नहि छलैक, विवाह कएलाक बाद सासुर अयलापर माँ कँे नाम दाइ बौअसिन रखने छल । मुदा हमरा जन्म भेलाक बाद तऽ हुनकर नजरिमे अलक्ष्नी बाहेक किछु नहि रहि गेल छल । ओ अपन आक्रोश कोनो ने कोनो बहन्ना लगा कऽ उताडैÞत रहैत छली ।
आ माँ अपन व्यथा छातीमे दबा नोर पीबैत रहैत छल ।
माँ पर होइत अत्याचारकँे देख हम मनेमन एक संकल्प लेलहुँ आ ओकरा पुरा करबाक लेल जि जान सँ पढाइमे जुटि गेलहुँ । हमर मेहनत आ लगन सफल भेल आ आइ हमरा मेडिकलमे चयन भऽ गेल ।
हमरा चयनमे माँ केँ बड़का हाथ छलैक, जेकरा हम शब्दमे व्यक्त नहि कऽ सकैत छी ।
बाबुजी हाथमे कए प्रकारक मिठाइ लऽ कऽ एला आ खुशीसँ झुमैत कहलन्हि, ‘आइ हम अपन संगी साथी करकुटुम्बसभकँे मिठाई खुएबै । मीनाकँे जन्मपर तऽ घरमे मिठाइकेँ एकटा टुकड़ियो तक नहि आएल ।’
डाक्टरीमे हमरा चयन भऽ गेल ई सुनि दाइ सेहो अचंभित छली । हुनकर दृष्टिमे तऽ लड़कीकँे अधिक पढय सँ की लाभ ? आखिर लड़कीकेँ तऽ चुल्हे फुकयकेँ छैक । जे होइक , हम धरान मेडिकल कलेजमे पढय चलि गेलहुँ ।
छुट्टीमे जखन हम आवी तऽ दाइसँ विशेष रुपसँ भेटैत छलहुँ । धीरे—धीरे हम अनुभव केलहुँ जे लड़कीकँे प्रति दाइकँे धारणामे परिवर्तन आवि रहल छलैक ।
हमरा एकर किछु—किछु अनुमान तऽ छल, मुदा तइयो हम एकर कारण माँ सँ जानय चाहैत छलहुँ । ओ कहलक कि हमर पिसीकेँ लड़काकँे लालसामे एककेँ बाद एक करैत ५ टा लड़की भेलन्हि । छठममे लड़का भेलन्हि । एतेक ने लाड प्यार ओकरा देल गेल जे ओ बिगरि गेल । बड़का भेलापर ओ अपराधी प्रवृतिको निकलल । ओकर आदत आ व्यवहार सँ मायबाबुकँे ओकरा बेटा कहयमे लाज होबय लागल छैक ।
पाँच बरखकँे बाद जखन हम एमविविएस कँे डिग्री लऽ कऽ घर एलहुँ तऽ मायबाबुकँे सँग—सँग दाइकँे आँखिमे सेहो खुशी देख हम पुलकित भऽ उठलहुँ ।
एखन हमर संघर्ष जारीए अछि । आगा आओर पढिलिख कऽ सर्जन बनय चाहैत छी । दूनु दिदीकँे विवाह भऽ गेल अछि । आब बाबुजी हमर विवाह कऽ अपन उत्तरदायित्वसँ मुक्त होबय चाहैत छथि, मुदा हमरा सर्जन बनबाक इच्छाकेँ देखैत हमर माँ मात्र नहि दाइ सेहो हमरा आगा पढावयकेँ लेल बाबुजीकँे मनौने छल ।
आइ कठिन परिश्रमक बाद हम एक कुशल सर्जन बनि गेल छी । दाइकँे अल्सरक अपरेशन हम स्वयं अपने हाथसँ कएलहुँ अछि ।
आब हमर दाइ बेटाकँे वकालत नहि करैत अछि । आब तऽ ओ कहल करैया बेटा हो वा बेटी कूलकँे मर्यादा हेतु शिक्षा आ संस्कार आवश्यक अछि । एकर अर्थ हम बढिया जकाँ बुझैत छी, मुदा जखन दाइ बजैत अछि तऽ खुशीकेँ ठेकान नहि रहैत अछि ।
ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
हम पुछैत छी: मुन्नाजी
पुरनके जमानासँ लि‍खैत, नव कालमे देखार भेल दि‍ग्‍गज कथाकार श्री धीरेन्‍द्र कुमार जीसँ मुन्नाजी पुछलनि‍ हुनक संपूर्ण कथा यात्राक तीत-मीठ अनुभव जे प्रस्‍तुत अछि‍ अपने सबहक सोझा-
(1) मुन्नाजी- धीरेन्‍द्रजी प्रणाम! अहाँ आइसँ कतेक दशक पहि‍ने “मि‍थि‍ला मि‍हि‍र‍”क माध्‍यमे कथा-यात्रा प्रारम्‍भ केलौं। पहि‍ल कथा कोन आ कहि‍या छपल?
धीरेन्‍द्र कुमार- नमस्‍कार मुन्नाजी, हम सतरि‍ दशकसँ लि‍खब शुरू केने रही। रमानंद रेणुक सानि‍ध्‍य भेटल छल। मि‍थि‍ला मि‍हि‍रक सम्‍पादक भीमनाथ झा पहि‍ल पहि‍ल कथा प्रकाशि‍त केने छलाह। पहि‍ल कथा कोन अछि‍ से मोन नै अछि‍।
(2) मुन्नाजी- एतेक पहि‍ने प्रारम्‍भ भेल कथायात्रा आगू चलि‍ कि‍एक ठमकि‍ गेल ओकर कोनो वि‍शेष कारण तँ नै?
धीरेन्‍द्र कुमार- 92क बाद हमरा लागल छल हम जे लि‍खै छी ओकर पढ़ुआ कम लोक छथि‍ आ कथामे जे कथ्‍य होइ छै ओ समाजक प्रत्‍यक्ष स्‍तर कम अबैत अछि‍। ओकर बाद भारतीय कम्‍युनि‍ष्‍ट पार्टीसँ प्रभावि‍त भेलौं आ ए.आइ.टी.सी.सँ सम्‍बद्ध भ' जमीनपर काज करए लगलौं। 1995-96मे आकाशवाणीसँ कथा-वाचनक आमंत्रण भेटल छलए, जत' अधि‍कारीसँ वाद-वि‍वाद भ' गेल। ओ अधि‍कारी के छलाह मोन नहि‍ अछि‍। हँ, सीताराम शर्माजी ऐ गप्‍पक संकेत पहि‍ने द' देने छलाह। हमरा प्रतीत भेल छल जे अन्‍याय आ भ्रष्‍टाचारक वि‍रूद्ध जँ कि‍छु क' सकी सएह सार्थक।
(3) मुन्नाजी- अहाँ जहि‍या कथा लि‍खब शुरू केलौं तहि‍या आओर आजुक कथा रचनाक तुलनात्‍मक परि‍वेश केहेन देखना जाइछ?
धीरेन्‍द्र कुमार- भाषा जीवंत होइ छै। तै समैमे अधुनातन प्रयोगक आभाव छल मुदा आइ साहि‍त्‍य समाजक संगे ताल मि‍ला क' चलि‍ रहल अछि‍। तै लेल आजुक रचना सभ दृष्‍टव्‍य अछि‍।
(4) मुन्नाजी- अहाँ एखन धरि‍ कतेक कथा लि‍खलौं आ कतए-कतए छपल, पुन: रचनात्‍मक मुख्‍यधारामे जुड़बाक सुत्र की छल?
धीरेन्‍द्र कुमार- करीब पचास कथा प्रकाशि‍त अछि‍। मि‍थि‍ला मि‍हि‍र, मि‍थि‍ला दर्शन वैदेही आदिमे‍। वि‍भूति‍ आनंदक तगेदा आ उमेश मण्‍डलजीक सम्‍पर्क हमरा कलम पकड़ा देलक।
(5) मुन्नाजी- अहाँक कथाक रचनात्‍मक प्रक्रि‍या केहेन कथानकपर केन्‍द्रि‍त रहैछ आ तकर की कारण?
धीरेन्‍द्र कुमार- उदात-प्रेम आ समाजक छोट-छोट दुख जे प्रत्‍यक्षत: देखबामे कम अबैत अछि‍। हम समाजक नि‍म्नवर्गमे तथाकथि‍त समाजसँ गि‍नल जाइ छी ओहो गरीब परि‍वारमे जन्‍म। गरीब संगे उठनाइ-बैसनाइ। ऐमे ग्‍लानि‍ नै आनि‍ कमजोर बुझै छी।
(6) मुन्नाजी- अहाँ मैथि‍ली रचना आन्‍दोलनमे जाति‍वादी वा समूहवाजी फाँटकेँ कोन नजरि‍ये देखै छी, की ऐसँ प्रभावि‍त भऽ अहाँक रचनात्‍मक धारासँ पुन: हेरा जेबाक वा बि‍ला जेबाक संभावना तँ नै देखाइछ?
धीरेन्‍द्र कुमार- मैथि‍ली रचनामे आ प्रोत्‍साहनमे गुटबंदी, राजनीति‍ अवस्‍य अछि‍। हि‍ंदी साहि‍त्‍योकेँ इति‍हास देखल जा सकैत अछि‍। मुदा हम ऐ गुटबंदीसँ प्रभावि‍त कहि‍यो नै भेलाैं। हमरा संगे, अग्‍नि‍ पुष्‍प, नरेन्‍द्र झा, उदय मि‍श्र, वि‍भूति‍ आनंद, शैलेन्‍द्र, रति‍नाथ, साकेतानंद, प्रभास कुमार चौधरी, मोहन भारद्वाज, ज्‍योति‍वर्द्धन, शैवाल सभ संगे रहलौं। रचनात्‍मक स्‍तर आ व्‍यक्‍ति‍गत स्‍तरपर हम कहि‍यो उपेक्षि‍त नै भेलाैं।
दमदार रचना आत्‍मतोष अवस्‍स पहुँचबैत अछि‍। ओकरा कोनो गुटबंद सदाक लेल झांपि‍ नै सकैत अछि‍। हँ तखन कि‍छु समए तँ जरूर अपना प्रभावमे दाबि‍ वा कति‍या सकैत अछि‍ जे बेबस्‍थाक दोष भेल। ओना हमरा एकर कोनो भय नै अछि‍। रचना हमरा लेल स्‍वांत:सुखाय अछि‍।
(7) मुन्नाजी- गएर बाभनक रचनाकारक समूहक सक्रि‍य उपस्‍थि‍ति‍सँ अहाँ अपनाकेँ कतेक प्रभावि‍त मानै छी, ओकरा माध्‍यमे अपन गातक मजगुती देखाइछ वा प्रति‍द्वन्‍दि‍ता?
धीरेन्‍द्र कुमार- एे प्रश्‍नक जबाब ऊपर आबि‍ गेल अछि‍।
(8) मुन्नाजी- कथाक अति‍रि‍क्‍त आओर की सभ लि‍खै छी, तकर की कारण?
धीरेन्‍द्र कुमार- रचनाकार कोनो वि‍धा कि‍ए लि‍खै छथि‍ ई ि‍नर्भर अछि‍ अभ्‍यास, कुशलता आ सहजतापर। जँ कौशल अछि‍ तँ कि‍छु लि‍ख सकैत। एम्‍हर नाट्य वि‍द्यालय दि‍ल्‍लीसँ सम्‍पर्क भेलापर नाटक दि‍स रूझान भेल। नाटकमे परि‍स्‍थि‍ति‍जन्‍य गीत होइत छैक- तँए कवि‍ता।
(9) मुन्नाजी- नवतुरक रचनाकारक प्रति‍ केहेन अभि‍व्‍यक्‍ति‍ रखैत छी ऐसँ केहेन आशा देखाइछ?
धीरेन्‍द्र कुमार- नवतुरि‍या रचनाकारसँ आशा अछि‍। पहि‍ने ज्ञानवर्द्धन, शास्‍त्रक ज्ञान, समाजक अनुभव, जटि‍ल मनोवृत्ति‍क अध्‍ययन आ अन्‍य भाषाक साहि‍त्‍यक ज्ञान प्राप्‍त करताह। जि‍ज्ञासु हृदेसँ दुनि‍याकेँ देखताह, नवीन प्रयोगसँ कथ्‍यक प्रस्‍तुि‍तकरण करताह। तै दि‍स नवतुरक रचनाकारमे कि‍छु प्रयत्‍नशील छथि‍।
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मुन्ना जी
मुन्नाजीक दूटा विहनि कथा
नियंत्रण
माइकल घरमे वापिस अबिते छितराएल चीज सभ देखि चित्कारि उठल-
“ ओह गॉड!
द्रौपदी, जकर सबहक किरदानीक फल छौ ई तीनटा बच्चा ओकरे सभ लग ऐ तीनूकेँ छोड़ि कऽ आएल कर काज करबाक वास्ते। नाइ जानि कतेक दुरखा लागि जनमओने हएत एतेक बच्चा!”
“ चुप्प रहू मालिक, बहुत बजलौं। हमर सबहक घरबला एखनो धरि मुट्ठीयेमे रखै छै हमरा सभकेँ। मालकिन जकाँ छुट्टा हम सभ नै छिऐ।“
“गै, देखै छीही अपन मलकीनीकेँ एकेटा बेटीमे प्रसन्न! इएह तँ फाँट देखबैए बड़कबा आ छोट घरक बेटी-पुतौहमे।”
“नै मालिक, दुनू घरक पुतौह, पुतौह जकाँ नै र्है छै। अन्तर छै दुनूमे- छोटकाक पुतौह जन्मा लै छै आ बड़काक पुतौह खसा लै छै।”
टकटकी
बेरा-बेरी लोकक जमा भेल भीड़क सोझाँ ठोहि पारि कऽ कानए लागल छल ओ छौड़ी। कियो किछु पुछै तँ उतारा नै दऽ सबहक दिस टुकुर-टुकुर तकैत रहैत छल।
भीड़ बढ़ैत जा रहल छल...मुदा सभ मूक दर्शक बनल।
निःशब्द भीड़मेसँ आब शब्द बहरेलै- “गै, ई कह जे तोहर नाम ठेकान की छौ?”
-यौ, छोड़ू, की करब नाम ठेकान बुझि।
-तोरा घर तक पहुँचा देबौ।
-यौ, हमर नै आब कियो सहारा बचल आ ने कोनो ठेकाना। हम तँ दंगा पीड़ित शिविरमे सँ भागि एलौं अछि।
-किए भगलीही, अपन जान बचेबा लेल?
-नै यौ। अपन सम्पत्ति बचेबा लेल।
-आँए, तहन तोँ अपन गाम-घर जो ने अपन संपत्तिक रक्षार्थ।
-गाममे किछु कहाँ बाँचल अछि, जे किछु संपत्ति शेष अछि ओ तँ हमरे लग अछि आ तकरे बचेबा लेल तँ गामसँ भगलौं।
-कत्तौ कियो रक्षक नै देखाएल!
-के पुरुख राखत तोरा, जे राखत ओहो बदनाम भऽ जाएत।
ठठा कऽ हँसैत-
-यौ, जँ पुरुख सभकेँ बदनामीक कनिको डर होइतै तँ गामसँ परदेश धरि हमर संपत्तिक नोचा-नोची नै ने करतै?
भीड़ उछहि गेल।
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Suggested citation: रवि भूषण पाठक. “भाग रौ: सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ आ आदर्शक उत्थान-यथार्थक पतन.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 77, 2011-03-01. https://www.videha.co.in/research/2011/77/भाग-रौ-सामाजिक-राजनीतिक-निहितार्थ-आ-आदर्शक-उत्थान-यथार्थक-पतन.htm

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