विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

फोंका-एक विहगावलोकन

डॉ. रमण झा · 2011-03-15 · अंक 78

डॉ. शेफालिका वर्मा
एकटा संस्मरण एकटा प्रश्न
आइ अखबार मे पढ्लों मृदुला गर्ग केर एकटा आलेख ' सेक्युलर के नाम पर सम्मान का धंधा '....ओ ते लिखलनि ..आप हमारी संस्था को दास हज़ार रुपये दो,मै आपको 'फ़लाने' सम्मान से सम्मानित करूँगा..'...ओ चमत्कृत भ गेल छलीह .केओ ते हमरा सम्मान योग्य बुझ्लनी ..पाछा जे ओ दस हज़ार क गप सामने आइल...
हमरो मोन पड़ी आइल . स्थायी रूप स हम दिल्ली आइल छलों स्यात २००९ क मार्च मे.. ....२ .३ मासक उपरांत एकटा बड पैघ इंटर नेशनल संसथान दिसि से हमरा बड़का लिफाफा भेटल . रंग विरंगी बेसकीमती कागज़ मे बड़का बड़का लोगक फोटो छपल , पुरस्कार लैत, दैत...भव्य मंच, सजावट....अंग्रेजी मे एकटा पत्र हमर नामे छपल छल ..जे साहित्य आ समाजक सेवा लेल हम अहाँ के सम्मानित करे चाहैत छी..अहाँ देखि लेब जे हम कतेक गोटा के सम्मानित केने छी ,सभक फोटो सेहो पठा रहल छी ..सांचे ओहि मे पूरा प्रोग्राम केर फोटो छल .सबटा आर्ट पेपर पर .....हमर जी थरथरा गेल ई कोन संस्था थीक जे दिल्ली अबितहि सम्मानित करे लेल अगुआय्ल अछ ...रोमांचित भ उठलों ..फेर सोच्लों ,अरे एतेक भाषाक ' हूज हु' मे नाम निकलल अछ ओहि से खोजी नेने होइत.लागले फोन आइल अहाँ के हमर लिफ़ाफ़ भेटल ..आमंत्रण भेटल.हम सब अहाँ के सम्मानित कर चाहैत छी .......हम सोचैत सोचैत ठीक छै बाजि देलों..सब टा गप्प अन्ग्रेजिये मे भेल..हमर नाम के , किएक प्रस्तावित केने हेताह , दूर दूर धरि अहि युग मे केओ नै बुझा पडल..देखा पडल .....१ लाख रुपैया मामूली गप नै थीक जे केकरो करेज होइत केओ आन के दय दी ..सभक जी अपना अपना ले ओनाय्ल अछ......बड देर धरि सोचैत रहलों ,अपन आन के गुनैत रहलों ..के भ सकैत अछ...ई कोन संस्था एतेक ठस्सा वाला थीक एतेक पाई वाला..!
तखन हम अपन जेठ बेटा राजीव के फोन लगेलों जे दिल्ली विश्व विद्यालय मे प्रोफेसर अछ आ आइ ३० बरिस से दिल्लीमे अछ --ओकरा जरुर बुझल हेतैक....हम सब बात ओकरा पढ़ी के सुना देलों....ओ ख़ुशी से गद गद भ गेल..मम्मी ,एहिठाम अबिते अहाँ मैथिली भोजपुरीक सेमिनार मे भाग लेलों...आब ई ...बहुत ख़ुशी क गप , हम बाजलों ..राजू मैथिली भोजपुरी मे ते सब अप्पन छल एहि मे ते देसी विदेसी भरल अछ...हमर नाम के कहलक ..ओ एतेक खुश छल जे --छोड़ू ई सब गप भगवन जे दै छथिन ख़ुशी ख़ुशी ग्रहण करु....हम आश्वस्त भ गेलों.....अपन सम्मान दुनिया मे केकरा ख़राब लगैत छैक....
दस दिन बाद क बात छी, हम बिसरी गेलों , दिल्ली मे नव नव किनल घर द्वार के ठीक करे लगलों .....अचक्के एक दिन फोन आइल.. आर यु डॉ. शेफालिका ...हम यस बाजलों...अहांके मोन ऐछ ने काल्हिये प्रोग्रम्म थीक. ..हम चोंकि उठलों ..हं हं किएक नै...मोन अछि...
तं काल्हि ५ बजे साँझ से प्रोग्राम होइत...अहाँ एतेक हज़ार रुपैया एकटा लिफ़ाफ़ मे नेने आइब, प्रोग्राम से एक घंटा पहिने.......
हम अव्चंक भ गेलों .कहियो ई सब जानि बुझि तखन ने , रूपया किएक ??? ई नियम थीक एहि संस्थाक दीप तर अन्हार , वो बाला मधुर स्वरे बजलीह एहि मे कोन बुराई, अहाँ के सम्मानक संग ट्को भेटत ..,,,,,कोनो लोस नै अछ खाली गेने गेन...हम सपाट स्वरे ब्ज्लों हमरा टका द क सम्मान नै चाही...
तखन मोन मे घुमड़ लागल कतेको प्रश्न जाहि मे एकटा प्रश्न जरैत बुझैत आगि जकां ठाढ़ छल ..की एहनो होइत छैक ....
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१.शिव कुमार झा "टिल्लू"- समीक्षा
मैथि‍ली कथाक वि‍कासमे गामक जि‍नगीक योगदान-
गामक जि‍नगी'क पहि‍ल कथा भैंटक लावा मि‍थि‍लाक बाढ़ि‍क दशाकेँ केन्‍द्रि‍त कऽ कऽ लि‍खल गेल अछि‍। भैंटक लावाक संदर्भमे हमरा सबहक गाम-गाममे एकटा कहबी चर्चित छैक- “बड़-बड़ जनकेँ भैंटक लाववा पदनोकेँ मि‍टाइ।‍” ऐसँ प्रमाणि‍त होइछ जे सोती, मुरदैया, पोखरि‍, धनखेतामे जलमग्‍नक परि‍णाम स्‍वरूप जनमल भैंटक- नि‍घृष्‍ठ भोज्‍य पदार्थ थि‍क। भोज्‍य पदार्थ मात्र समाजमे रहि‍तौं यायावरी जीवन व्‍यतीत करैबला लोक लेल। ऐ कथाकेँ पढ़ि‍ एकर प्रयोजन कनेक्शन वि‍स्‍मि‍त कर'बला परंच उपयोगी लागल। कथा मुसना ओकर अर्द्धांगि‍नी जीबछी आ दुनू बच्‍चाकेँ बाढ़ि‍क जीवन दशासँ जोड़ि‍ वि‍म्‍वि‍त कएल गेल अछि‍। अपना ऐठामक लोक संतान प्राप्‍ति‍क लेल जीबछ घाटमे मनौती मनैत अछि‍। जौं पुत्र लेलक तँ जीबछा आ जौं बेटी आएलि‍ तँ जीबछी। ऐ जीबछीक तँ नेनकाल नै देखाओल गेल, ओहेन मॉगल-चाॅगल छथि‍यो नै मुदा साहस देखनुक। मुसनाकेँ सर्पदंशक काल जीबछी साहस नै छोड़ली। झाड़-फूक सन भ्रांति‍केँ ऐ कथामे देखाओल गेल परंच परि‍णाम सकारात्‍मक- “मुदा ढोढ़ सॉप कटने रहए तेँ बि‍ख लगबे नहि‍ केलै।‍” ऐसँ रचनाकारक ग्राम्‍य जीवनक मनोदशाकेँ परि‍वर्तन करबाक उद्देश्‍य प्रमाणि‍त होइत अछि‍।
श्रीकान्‍त सन गामक छड़ीदारकेँ बाढ़ि‍ उद्देश्‍य पूरा नै करए देलक। जौं अन्न रहि‍तनि‍ तँ सूदि‍खोरी चैलतनि‍ मुदा अपने खएबाक लेल नै तँए आगाँ की सोचथि‍.....?
जीवछी हुनके आश्रममे कुटौनी करति‍ छलीह, श्रीकान्‍त बाबूकेँ सोगाएल देख जीबछीक कथन- “एक्केटा बाढ़ि‍मे चि‍न्‍ता करै छथि‍ कक्का, कनी नीक की कनी अधलाह, दि‍न तँ बि‍तबे करतनि‍।‍” मे साहसक संग-संग यथार्थबोध होइत अछि‍। अभावक नाहमे सवार व्‍यक्‍ति‍कें भासि‍ जएबाक कोनो चि‍न्‍ता नै, ओ तँ ई सोचि‍ कऽ जल-यात्रा करैत अछि‍ जे अथाह पानि‍मे नाह डूबबे करत। तँए हेलबाक कला पहि‍ने सीख लेल जाए। दीन-हीन आ साधन वि‍ि‍हन मानवीय जीवनमे वि‍चलन नै होइत छैक। मुसना अर्थात मकसूदन मूसक तीमन आ धुसरी चाउरक भातमे जीबछीक सि‍नेह आ दुखनीक आश देख अमृत मानि‍ कऽ ग्रहण कऽ लेलक। रातुक कोनो चि‍न्‍ता नै जीबछी साक्षात आर्या बनि‍ ठाढ़ छलीह- “ककरो कि‍छु होउ जकरा लूरि‍ रहतै ओ जीबे करत।” बाढ़ि‍सँ सभ क्‍यो तबाह कमला‍ महरानीकेँ दीप बाड़ि‍ अपन प्रभाव कम करबाक प्रार्थना सभ ि‍कयो करैत छल। यएह थि‍क मि‍थि‍लाक गामक जीवन केर मनोवैज्ञानि‍क रहस्‍य। हम-सभ भगवतीक आगाँ बलि‍ प्रदानो कऽ सकैत छी तँ कखनो प्रकृत पूजन सेहो। जखन पानि‍ कम भेल तँ सभ कि‍यो अपन डूबल खेत-पथारक गलल डाॅटकेँ गनऽ मे लागि‍ गेलाह मुदा जीबछीक पारखी दृष्‍टि‍ भैंटक कोखि‍केँ देखबामे मग्‍न छल। श्रीकान्‍त बाबूसँ आज्ञा लऽ कऽ हुनक खेतसँ भाँटि‍केँ उजाड़ि‍ अन्न नि‍का लऽ लगलीह। लावाक सुगंधसँ जीबछीक कल्‍पनामे चारि‍ चान लागि‍ गेल बाढ़ि‍केँ जीवनक उपहार मानि‍ कमला-कोसीकेँ धन्‍यवाद दि‍अ लगलीह। ऐ प्रकारक सोचसँ कि‍यो वि‍स्‍मि‍त भऽ सकैत अछि‍- बाढ़ि‍ कखनहुँ लाभकारी कोना होएत? मुदा जीबछीकेँ डूबैक लेल तँ कि‍छु रहबे नै करए धास-पातक घर फेर बनि‍ जाएत।‍ महींस नहि‍यो तँ गाइये कीनबाक योजना बनाबऽ लगलीह।
स्‍वाभावि‍क अछि‍ कर्मठ लोककेँ दुआरि‍ ताकए नै पड़ैत अछि‍। कथाक सभसँ नीक प्रसंग लागल जे पहि‍लुक भैंटक चाउर श्रीकान्‍त बाबूकेँ देबामे जीबछीक दृष्‍टि‍कोण। गरीब कखनहुँ वि‍श्‍वासधात नै कऽ सकैत अछि‍। संग-संग कथाक आकर्षण घटना चक्रक क्रममे जखन ठेंगी मुसनाक भरि‍ पोख खून पी लेलक तखन मुसनाक शंकाग्रस्‍त करब जे जीबछी हुनक मरबाक कामना करैत अछि‍ कि‍एक तँ दोसर पुरूष भेंट जेतनि‍। समाजक दाबल वर्गमे नारी शोषण नहि‍, कि‍एक तँ नारी पुरूषक संग-संग जीवनक वाहनकेँ गति‍ देवामे गति‍शील रहैत छथि‍। ओ दोसरो वि‍वाह करबाक लेल स्‍वतंत छथि‍। आगाँक जाति‍ तँ नारीकेँ आब अधि‍कार दि‍अ लागल पहि‍ने तँ अो अंगनक लक्ष्‍मी मात्र छलीह। ऐ कथाकेँ पढ़बाक कम सोचऽ मे अबैत अछि‍ जे अागाँ कि‍नका मानल जाए मुसना सन मुसहरकेँ वा हमरा सन......।
रचनाकारक एकटा आर दृष्‍टि‍कोण नीक मानल जाए जे समाजक दूटा अलग-अलग वर्गक कथा कहि‍तहुँ वर्ग संघर्ष नै वरन् सि‍नेहि‍ल भाव। श्रीकान्‍त लावा तँ स्‍वीकार करै छथि संगहि‍ जीबछीकेँ नव-वस्‍त्रक संग वि‍दाइ सेहो दै छथि‍ अइमे सामाजि‍क सामंजस्‍यकेँ बढ़ेबाक प्रयास देखऽ मे आएल।‍
क्रमश:
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किशन कारीगर
मोछ वाली माउगी।
होली पर हास्य कथा।
धनिक दोकान दिस सॅ अबैत रही कि रस्ते मे खरंजे पर बिकाउ दास भेंट भए गेलाह पूछलनि बच्चा ई कहू करिया के कतहू देखलियैअ। हम बजलहूॅ नहि यौ बाबा हम अहॉ पोता के एमहर कहॉ देखलहूॅ। बिकाउ दास बजलाह धू जी महराज हम कारी सॅ केस दारही कटाएब आ अहॉ हमरा पोताक भांज कहि रहल छी। लगैए जे आई होरी खेलेबाक निशा मे अहॅू मातले छी। हमरे खनदानी नौआ छल कारी ठााकुर एमहर बिकाउ दासक पोतक नाम सेहो कारी। दूनू गोटे नामक अनुरूप देखैयोअ में ततबेक कारी। कारी जतबाक देखबा में कारी ओतबाक उजर धब- धब आकेर मोछ । बड्ड ईमानदारी सॅ शाही अंदाज मे हजामत करैत छल। ओकरा मोछक आगू मे त राजा महराजक मोछ छुछूआन लगैए। बिकाउ दास के हम कहलियैन बाबा बुझहैए मे धोखा भए गेल कारी नौआ तए अपने बथान दिस भेटत ओम्हरे जाउ ने। ताबैत उतरभारी दिस सॅ कारी अपने मगन में झूमैत चलि अबैत रहैए। ओनाहियो फागुन मे सभ अपना धुन में मगन रहैए। कारी के देखैत मातर बिकाउ दास बजलाह अईं रौ करिया एहि बेर जोगिरा गबै लेल नहि एबहि रौ तोहर सिद्धप वाली भाउज खोज पूछारी क रहल छलखुन जे एहि बेर किर्तन मंडली होरी गीत गाबि जोगीरा खेलेताह कि नहि। कारी मोछ पिजबैत बाजल भैया अहॉ जाउ ने अहॉ भाउजी के कहबैन भांगक सरबत बना के रखतीह। हम सभ पहिने भगवति स्थान में होरी गीत गाबि अबीर चढ़ाएब तकरा बाद अंगने अंगने होरी खेलाएब।
कारी के गप सुनि त हमहूॅ राग मल्हार मे मोने मोन नाचए लगलहूॅ जे आई भंाग पीबि क कारी संगे खूम नाचब। एहि बिचार मे मगन रही की कारी बाजल जे बच्चा अहॅू चलि आएब एहि बेर झाइल बजौनिहार लोक कम छै त अहॉ गीत गाबि झाइलो बजाएब। गाम घर मे नाटक खेलाई त हमही गीत नाद गाबै सॅ ल के मंच संचालन तक करी। तहि द्वारे निधोखे हम बजलहॅू बेस जाउ हम भगवती स्ािान में भेंटइ भए जाएब । दूपहर दू बजे किर्तन मंडलीक सभ कलाकार आस्ते आस्ते जुटान होमए लगलयै। कारी अपना दरवज्जा पर बैसी के चिलम फूकै मे मगन रहैए एक सोंठ खिचनहियै रहै की केम्हरो सॅ मनोज क्रांतिकारी धरफराएल आएल आ कारी े देह पर धाई दिस खसल। बाजल हौ कारी कक्का आई तोरे संगे होरी खेलाएब। एतबाक मे कारी फनकैत बाजल कह त हनो खसान खसब होइत छैक एखने चिलमक आगि सॅ मोछ झरैक जाएत। फेर मनोज बाजल हौ कक्का हमरो स बेसी त डंफाक ओजन छै तही दुआरे धरफरा गेलहूॅ। तकरा बाद दूनू गोटे एक एक सोंठ चिलम खिचलक धुऑं नाक दए के फेकलकै की कारी बाजल रौ भातिज किर्तन मंडलीक कलाकार सभ कतए नुकाएल अछि।
एतबाक में हरेकृष्ण ढ़ोलकिया ढ़ोल ढ़ूम-ढ़ूमबैत बुद्धना हरमोनियम पिपयबैत आ रामअशीष झाइलि झनकबैत तीनू गोटे तीन दिसि सॅं एकसुरे बजबैत आएल। ताबैत मे मनोज डंफा डूग-डूगबैत बाजल हल्ला गुल्ला बंद करू आ सुनु कारी कक्का के वाणी जी नहि त भरू ढ़ोलकिया के पानि जी। कि एतबाक मे कारी कठझाइल झनकबैत बाजल जोगी जा सारा...रा...रा. त सभ गोटे एक सुरे बाजल सारा रा रा। बुद्धन बाजल रौ मनोजबा तेहेन शास्त्रीय राग मे पानि भरबाक लेल कहलीह जे दू-चारि टा छौंड़ा मारेर त डरे स भागी गेल। मनोज बाजल हौ भौया रंग घोरबाक लेल त पानि चाहि ने। रामअशीष बाजल हं रौ भजार ई त ठीके कहलीहि आब ई कह जे एहि बेर भाउजी के बनत। एतबाक में कारी मोछ पिजबैत बाजल रौ भातिज जूनि चिंता कर हम एखन जीवते छी।
होरी मे कारी सौंसे गौआक भाउजी बनैत छलैक की बुढ़-पुरान की छौंड़ा मारेर सभ गोटे हंसी खुशी सॅ गीत गाबि कारी संगे दिअर भाउज जेका होरी खेलाइत छल। मनोज बाजल हौ कक्का माउगी बनबहक से साड़ी बेलाउज कहॉ छह। कारी बाजल धूर रे बुरिबक जो ने तू अपने माए बला साड़ि नेने आ ने तोरे माए त हमरा भाउजे हेतीह। हौ कक्का तूं मारि टा खूएबह तोरा त बुझलेह छह हमर बाप मलेटी सॅ रिटायर आ हमर माए सेहो मलेटी। ज ई सारी मे लाल पीअर लागल देेखतैह त कतेक मुक्का मारत से कोनो ठीक नहि। अच्छा कक्का तू चिंता नहि करअ हम अपने कनियॉ वला नुऑ नेने अबैत छी। कारी बाजल रौ भातिज तू बुरहारी मे हमरा गंजन टा करेमेह। हम ससुर भए के पूतहॅू देहक नुऑ कोना पहिरब रौ राम-राम। लोक त साड़ी देखैते मातर चिन्हि जेतैए जे ई तोरे कनियॉक नुआ छै तब त लोको कोनो दसा बॉकि नहि राखत। बुद्धन कनेक बुझनुक ओ बाजल हौ तोरा डर किएक होइत छह कियो पूछतह त कहिअक जे ई त बुधनाक साउस के नुआं छियैक। हमर साउस एखन अपने गाम आएल छथहिन। कारि ई सुनि चौअनियॉ मुस्कान दैति एकसुरे दू गिलास देसी भांगक सरबत घोंटि गेल आ बाजल बुधन तूं हरमोनिया बजाअ ताबैत हम समधिन संगे होरी खेलेने अबैत छी जोगी जा सारा...रा....रा। कि फेर सभ एकसुरे गाबैए लागल जोगी जा सारा रा रा। हरेकृष्ण ढ़ोलकिया ढ़ोल धूम-धूमबैत बाजल होरी मे कक्का करै छथि बरजोरी बुरहोरी मे मोन होइत छनि थोरू थोरू जोगी जा सारा रा रा। मनोज डंफा डूग-डूगबैत बाजल हौ कारी कक्का एना किएक मोन लुपलुपाइत छह। कारी झाइलि झनकबैत बाजल रौ भातिज ई फगुआ होइते अछि रंगीन तोंही कह ने मलपुआ खेबाक लेल केकर मोने ने लुपलुपाइत छैक। हं हौ कक्का एनाहियो होरी मे नएका नएका भाउज सबहक गाल त मलपुए सन पुल पुल करैत रहैत छैक।
कारी साड़ी पहिर अनमन माउगी बनि गेल मुदा मोछक देखार चिनहार दुआरे घोघ तनने। कारी हाथ सॅ झाइलि ल हम गीत गाबि झाइलि बजबैत होरी गाबै लगलहूॅ रंग घोरू ने कनहैया हो खेलैए होरी रंग घोरू सभ गोटे गीत गबैत भगवति स्थान बिदा भेलहूॅ। भगवति के अबीर चढ़ा प्रणाम करैत मंडलीक सभ कलाकार अंगने अंगने होरी खेलेबाक लेल बिदा भेलहूॅ। जेहेन घर तेहेन सरबत कतहॅ छूछे रंग टा। मुदा लोक हॅसी खुशी स होरी खेलाई मे मगन होइत होइत बिकाउ दासक दरवज्जा पर पहुॅचलहॅू त होरी गीत शुरू केलहॅू हो हो किनका के हाथ कनक पिचकारी बुधना हरमोनियम पिपयबैत बाजल हो बिकाउ कक्का के हाथ कनक पिचकारी। एतबाक सुनितेह विकाउ दास अपना बेटा के हाक देलखिहिन हौ मांगनि जल्दी सॅ मंडली सभहक लेल दूध भांगक सरबत नेने आबह। ई सुनि हम सभ आर बेसी जोर सॅ जोगीरा गबै लगलहूॅं ताबैत मनोज एक आध बेर डंफा लेने धरफड़ा के खसि पड़ल। ओकरा उठेलहूॅ आ सभ गोटे भरि छाक भांगक सरबत पीबि होरी गबै मे मगन। एम्हर जोगीरा देखबाक लेल कनिया-पूतरा धिया-पूता सभ घूघरू लागल।
एतबाक मे सिद्धप वाली दाई अबीर उड़बैत एलीह आ हॅसैत बजलीह गे दाए गे दाए ई नचनिहार माउगी के छीयैक? सुखेत वाली कनिया बजलीह माए इहेए चिन्थुहुन ने। दाई बजलीह चिन्हबै की पहिने रंग अबीर स देह मुॅह छछारि दैति छियैक। दाई निधोखे रंग लगबै लगलीह की घिचा तिरी मे कारीक घोघ उघार भए गेलै। दाई बजलीह गे माए गे माए एहेन मोछ वाली कनियॉ त पहिनुक बेर देखलहूॅ। ताबैत कारी मुस्की मारैत बाजल भाउजी हम छी अहॉक दुलरूआ दिअर कारी। दाई एतबाक सुनि ठहक्का मारैत बजलीह अईं रौ मोछ वाली कनियॉ ला कनि तोहर मोछो कारीये रंग मे रंगि दैति छियौ। एकटा दिअर भाउज के निश्छल प्रेम त गामे घर में भेटत। तखने मनोज बाजल काकी ई कनियॉ पसीन भेल किने ? दाई बजलीह हं रौ मनोज बड्ड पसीन भेल 60 वर्षक अवस्था में पहिनुक बेर देखलहॅू एहेन सुनर मोछ वाली माउगी।
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1.राम प्रवेश मण्‍डल- विहनि कथा- आह मि‍थि‍ला! वाह मैथि‍ली! 2 सुमित आनन्द- भाव-भूमि रसवंत पुस्तकक लोकार्पण
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राम प्रवेश मण्‍डल
विहनि कथा
आह मि‍थि‍ला! वाह मैथि‍ली!
अहाँ घर आंगनसँ नि‍कलि‍ संसारमे पसरि‍ गेलौं। संसार गाम जकाँ भऽ रहल अछि‍। सकेंडोमे वि‍श्वक कोनोठाम रहैबला परि‍जनसँ गप्‍प कऽ सकै छी। हुनक छाया देख‍ सकै छी। जइसँ हृदए आनंदि‍त, अह्लादि‍त भऽ जाइछ।
ऐ आनन्‍दमे हमहुँ साझी हएब, इच्‍छा भेल। साठि‍ वसंत पार कऽ रहल छी। नूनूकेँ कहलि‍यनि‍- “हओ, एकटा मोवाइल कीन लैह। वि‍ज्ञान आ वैज्ञानि‍कक ऐ चमत्‍कारक लाभ हमहुँ सभ उठाबी।‍”
नूनू एकटा नीक-दामी मोवाइल कीनलक आ हाथमे दैत कहलक- “लि‍अ अहूँ अपन इच्‍छाकेँ पूरा कऽ लि‍अ।‍”
हम कहलि‍ऐ‍- “हओ, मॉरि‍ससमे सुन्‍दरलाल अर्थोपार्जनक लेल गेल अछि‍। हुनकासँ गप्‍प कराबह।‍”
नूनू नम्‍बर टीपलक आ हमरा हाथकेँ देलक। गप्‍प हुअए लगल। हम पुन: मोवाइल नूनू हाथकेँ दैत कहलि‍यनि‍- “हओ नूनू, सुन्‍दरलाल तँ दोसर भाषामे बजै छै। गाममे तँ मैथि‍ली बजै छलै। एतेक ल्‍दी ई परि‍वर्तन केना भेलै? नम्वरकेँ जाँचि‍ अपन मातृभाषा मैथि‍लीमे गप्‍प कराबह। सुनै छी जे मोवाइलमे सभ भाषा रहै छै?‍”
नूनू आगा कि‍छु नै बाजि‍ हमरापर ऑंखि‍ ला-पीयर करए लागल।
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सुमित आनन्द

भाव-भूमि रसवंत पुस्तकक लोकार्पण
जखन-तखन द्वारा ललितनारायण मिथिला विष्वविद्यालयक संगीत एवं नाट्य विभागमे डॉ भीमनाथ झाक समग्र मूल्यांकन ‘भाव-भूमि रसवंत’ पुस्तकक लोकार्पण समारोह दिनांक 06 03 2011 के ँ अपराह्ण 03 बजे दिनमे मनाओल गेल। एहि 512 पृष्ठक पुस्तकक लोकार्पण करैत बहुभाषाविद् पं गोविंद झा कहलनि जे डॉ भीमनाथ झाक भाषा सर्वजन सुलभ अछि। ओ चिंता व्यक्त कयलनि जे वर्तमान समयमे भावना मरि रहल अछि संगहि कवि लोकनिके ँ दोसरक हेतु जीबाक परामर्ष देलनि।
पुस्तकक समीक्षा करैत मैथिलीक सुप्रसिद्ध समीक्षक श्री मोहन भारद्वाज हिनक एहि पोथीके ँ साहित्यिक दस्तावेज कहलनि। ओ हिनक छन्दोबद्ध एवं तुकान्त रचनाक भूरि-भूरि प्रषंसा कयलनि संगहि ईहो कहलनि जे छन्दोबद्ध रचना स्थायी महत्वक थिक। बच्चा सभक पाठ्यक्रममे सम्मिलित करबाले हुनका अर्वाचीन कविक छन्दोबद्ध रचना नहि भेटैत छनि। श्री भारद्वाज हिनका एकसरे एहन लेखक मानैत छथि जे लगभग 150 साहित्यकारपर लिखि चुकल होथि। कार्यक्रमक अध्यक्षता करैत वयोवृद्ध साहित्यकार पं चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ डॉ झाक लेखनकेँ महत्वपूर्ण अवदान कहलनि। ज्योत्स्ना चन्द्रमक संचालन एवं डॉ अषोक मेहताक धन्यवाद ज्ञापनसँ सम्पन्न समारोहमे डॉ झा अपन लेखनक संबंधमे कहलनि जे ओ जे किछु कए सकलाह से अक्षरपुरुष लोकनिक सान्निध्य आ स्नेहभाजनक कारणसँ। कार्यक्रमक ष्षुभारम्भ श्री हीरेन्द्र कुमार झाक स्वागत भाषण एवं अंजली मेहता द्वारा ‘‘वाणी हेरू, कृपा दृग फेरू’’ कविताक गायनसँ भेल जे डॉ झाक लिखल थिक। पुस्तकक सुन्दर प्रस्तुतीकरणक हेतु प्रायः सभ वक्ता लोकनि डॉ विभूति आनन्दक प्रयासक प्रषंसा कयलनि।
एहि अवसरपर पटना सहित आसपासक जिलाक पर्याप्त संख्यामे साहित्यकार लोकनिक उपस्थिति छल जाहिमे प्रमुख छलाह-डॉ सुरेष्वर झा, डॉ गणपति मिश्र, श्री कमला कान्त झा, प्रो अजीत वर्मा, डॉ शिवाकान्त पाठक डॉ देवनारायण यादव, डॉ षषिनाथ झा, डॉ नीता झा, डॉ रमण झा डॉ नरेन्द्र नारायण निराला, डॉ आषा मिश्र, डॉ नरेष मोहन झा, डॉ बुचरू पासवान, डॉ धीरेन्द्र नाथ मिश्र, डॉ पुष्पम नारायण, श्री अमलेन्दु शेखर पाठक इत्यादि।
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याेगानन्‍द झा
इसवी सन 2010 : मैथि‍लीक गति‍वि‍धि‍
वर्ष 2003क अन्‍ति‍म मासमे जखन मैथि‍ली भाषाकेँ संवि‍धानक अष्‍टम अनुसूचि‍मे स्‍थान प्राप्‍त भेलैक तँ आवासी-प्रवासी मैथि‍ल जनसमुदाय तत्‍कालीन प्रधानमंत्री मान्‍यवार श्री अटल बि‍हारी बाजपेयी ओ गृहमंत्री मान्‍यवर श्री लालकृष्‍ण आडवाणीक प्रति‍ अभि‍भूत भेल अपन चि‍र आकांक्षाक प्रति‍पूर्तिसँ हर्षोल्‍लासमे नि‍मग्‍न प्रतीत भेल। ज्‍योति‍रीश्‍वर ओ वि‍द्यापति‍ ठाकुरक देसि‍ल वयना, ब्रजकि‍शोर ठाकुर आ कर्पूरी ठाकुरक सत्‍यप्रयाससँ आ अन्‍तत: मान्‍यवर डा. श्री सी.पी. ठाकुरक प्रयत्‍ने राष्‍ट्रीय क्षि‍ति‍जपर अपन उचि‍त स्‍थान पओलक। सुमन, मधुप, कि‍रण, मणि‍पद्म, प्रबोध, देवनारायण, यात्री आदि‍क आत्‍मा जुड़ा उठल हेतनि‍। सर्वश्री अमर, प्रदीप, वैद्यनाथ चौधरी आदि‍ गोटाक एकटा यज्ञ पूर्णाहुति‍ दि‍स अग्रसर भेलनि‍। हि‍नकालोकनि‍क संघर्ष सफलता प्राप्‍त कएलक आ एकबेर फेर नव स्‍पन्‍दन मैथि‍ली जगतमे अएलैक।
मैथि‍ली पत्रकारि‍ता जगतमे ई स्‍पन्‍दन मि‍थि‍ला दर्शन, पूर्वोत्त मैथि‍ल, वि‍द्यापति‍ टाइम्‍स, समय-साल, आँकुर, पक्षधर, पूर्वोत्तर मैथि‍ल समाज, कर्णामृत, जखन-तखन, मि‍थि‍ला-दर्पण, सांध्‍य गोष्‍ठी, मि‍थि‍लायतन, गामधर, आङन ओ ई-पत्रि‍का वि‍देह आदि‍क माध्‍यमे वि‍गत वर्षमे मैथि‍ली गति‍वि‍धि‍केँ समंजि‍त-संयोजि‍ करैत रहल अछि‍। कलकत्तासँ प्रकाशि‍त मैथि‍लीक एकमात्र दैनि‍क मि‍थि‍ला समाद, स्‍वदेशक सरणि‍पर मैथली दैनि‍कक अवधारणाकेँ सम्‍पुष्‍ट करबामे लागल रहल अछि‍। पक्षधर (स. श्रीसीतांशु कश्‍यप, राँची) आ मि‍थि‍ला सृजन (स. श्रीऋृषि‍वशि‍ष्‍ठ, मधुबनी) एही वर्षक देन थि‍क।
पोथी प्रणयन ओ प्रकाशनक दि‍शामे सेहो क्षि‍प्र गति‍त्‍व वि‍गत 2010क उपलब्‍धि‍ मानल जा सकैछ। प्रकाशक ओ वि‍तरकक सर्वथा अभाव रहतौं मैथि‍ली लेखकलोकनि‍ ग्राहकक परवाहि‍ बि‍नु केने स्‍वयं अपन-अपन रचनावलीक प्रकाशनसँ मैथि‍लीक समृद्धि‍ हेतु प्रति‍बद्ध देख पड़लाह। दि‍ल्‍लीक श्रुति‍ प्रकाशन, सरि‍सबक साहि‍त्‍यि‍की, दरभंगाक जखन-तखन, पटनाक चेतना समि‍ति‍ ओ शेखर प्रकाशन, एत' धरि‍ जे वि‍द्यापति‍ टाइम‍सो प्रकाशन आ मि‍थि‍ला रि‍सर्च सोसाइटी आदि‍ ऐ यज्ञमे लेखकलोकनि‍क सहायता-संवर्द्धनामे जुटल देख पड़ल। प्रकाशनक दृष्‍टि‍ये ऐ‍ वर्षक महत्वपूर्ण प्रकाशन अछि‍ पाँच खण्‍डमे प्रकाशि‍त रमानाथझा समग्र जकर सम्‍पादन कएलनि‍ अछि‍ श्रीमोहन भारद्वाज। पाँच हजार मूल्‍य ई बेछप रचना संचयन मैथि‍लीक गौरव ग्रन्‍थ थि‍क। पूर्वमे श्री गजेन्‍द्र ठाकुर पाँच हजार टाका मूल्‍यक जीनोम मैपि‍ंग एक्के खण्‍डमे प्रकाशि‍त कएने छथि‍।
एकरे सबहक परि‍णामस्‍वरूप मैथि‍ली कथा आन्‍दोलनकेँ समर्पित सगर राति‍ दीप जरय आन्‍दोलन वर्ष 2010क चारू कि‍स्‍त, जकर आयोजन क्रमश: श्रीरमाकान्‍त राय रमा'क संयोजकत्‍वमे नरहन, समस्‍तीपुरमे, डा. योगानन्‍दझाक संयोजकत्‍वमे कबि‍लपुर, लहेरि‍यासराय, दरभंगामे, श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल'क संयोजकत्‍वमे बेरमा झंझारपुर, मधुबनीमे आ श्रीअरवि‍न्‍द ठाकुर'क संयोजकत्‍वमे सुपौल (कोशी क्षेत्र)मे सफलतापूर्वक सम्‍पन्न भेल आ ऐ‍‍ अवसरपर पोथीक लोकार्पण-प्रक्रि‍यामे नि‍रन्‍तरता बनौने रहल जइमे कबि‍लपुरक मि‍थि‍ला रि‍सर्च सोसाइटीक तत्‍वावधानमे सत्रह गोट पोथी आ एकटा सी.डी.क लोकार्पण कीर्तिमान स्‍थापि‍त करबा योग्‍य ऐति‍हासि‍क प्रकृति‍क रहल। ऐ अवसरपर लोकार्पित पोथीमे श्रीमती प्रीति‍ ठाकुरक- दू गोट चि‍त्रकथा संग्रह, श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डल'क दूटा उपन्‍यास (जि‍नगीक जीत आ उत्‍थान-पतन) आ एकटा कथा संग्रह गामक जि‍नगी, श्री गजेन्‍द्र ठाकुर कृत मि‍थि‍लाक पंजी प्रबंध (तारपत्र आदि‍क डि‍जि‍टल इमेजि‍ंग, डी.भी.डी), डॉ. प्रेमशंकर सि‍ंह'क मैथि‍ली भाषा साहि‍त्‍य: बीसम शताब्‍दी (अलोचनात्‍मक नि‍बंध संग्रह) डा. वीणा ठाकुरक भारती उपन्‍यास, डॉ. मुरलीधर झाक पि‍लपि‍लहा गाछ बालकथा संग्रह, डॉ. धीरेन्‍द्रनाथ मि‍श्रक समाचार कथा कथा संग्रह, डॉ. अमरनाथ चौधरीक हमरो लेने चलू, कथा संग्रह, डॉ. योगानन्‍दझाक कथा-लोककथा कथा संग्रह आदि‍ उल्‍लेखनीय अछि‍। तहि‍ना बेरमाक 71म सगर राति‍ दीप जरय'क आयोजनक अवसरपर छह गोट पोथी आ दू गोट सी.डी-डी.भी.डी.क लोकार्पण भेल। जइमे श्री जगदीश प्रसाद मंडलक तीन गोट पोथी- जीवन-मरण आ जीवन संघर्ष उपन्‍यास, बाल-कि‍शोर प्रेरक कथा संग्रह तरेगन, कमलकान्‍त झा अलका, डाॅ. तारानन्‍द वि‍योगीक, प्रलय रहस्‍य (कवि‍ता संग्रह), श्रीपति‍ सि‍ंह नि‍बंध-तरंग (नि‍बंध संग्रह)क लोकार्पण भेल।
स्‍वतंत्रो रूपेँ पोथीक लोकार्पण बरसात होइत रहल जइमे पं. श्रीचन्‍द्रनाथमि‍श्र अमर'क अतीत मन्‍थन ओ पं. श्रीगोवि‍न्‍द्रझाक जनम अवधि‍ हम आत्‍मसंस्‍मरण, डॉ. नीता झाक देश-काल कथा संग्रह, डॉ. महेन्‍द्र नारायण रामक लोकदर्शन आलोचना, स्‍व. गोवि‍न्‍द चौधरीक गोवि‍न्‍द रचनावली (रचना-संचय), प्रो. उमानाथझाक मैथि‍ली नवीन साहि‍त्‍य संग्रह, श्रीप्रदीप मैथि‍लीपुत्रक श्रीसीतावतरण महाकाव्‍य प्रबन्‍धक द्वि‍तीय संस्‍करण, श्रीमकलाकान्‍त झाक फोँका कवि‍ता संग्रह, डाॅ. सुरेन्‍द्र कुमार सुमनक राधाकृष्‍ण चौधरीक व्‍यक्‍ति‍त्‍व ओ कृति‍त्‍व शोध-ग्रंथ, प्रो. राजाराम प्रसादक मैथि‍ली लोकनाट्य शोधग्रंथ, डॉ. देवकान्‍त मि‍श्रक बेनीपुर अनुमंडलमे मैथि‍ली शोधग्रंथ आिदक संगहि‍ अनेकानेक लेखकलोकनि‍क पोथि‍क आयोजनपरक लोकार्पण होइत रहल। हरि‍मोहन झाक सरणि‍पर गप्‍प श्रेणीक वस्‍तुि‍नर्माण कऽ डाॅ. राम कि‍शोर झा 'वि‍भाकर' एही वर्ष मनीषा मामाक मीमांसा नामक ग्रन्‍थ प्रकाशि‍त करौलनि‍।
नेपालमे श्रीराम भरेस कापड़ि‍ 'भ्रमर' द्वारा सम्‍पादि‍त मैथि‍ली नाटक संग्रह ओ स्‍वरचि‍त नओ गोट एकांकीक संग्रह भैया अएलै अपन सोराज मैथि‍ली नाट्यवि‍धाकेँ युगानुकूल प्रस्‍तुति‍क दृष्‍टि‍ऍं महत्‍वपूर्ण सावि‍त भेल।
सामान्‍य अनुवाद प्रणालीसँ हटि‍ कऽ बि‍ना कोनो अनुबन्‍धक अनुवादकारि‍ताक दृष्‍टि‍ऍं ऐ वर्षक उपलब्‍धि‍मे रेमि‍का थापा कृत कवि‍ता संग्रह देश र अन्‍य कवि‍ताहरूक मैथि‍ली अनुवाद देश आ अन्‍य कवि‍ता सभ दृष्‍टि‍पथपर आबि‍ सकल अछि‍ जे श्रीमती मेनका मल्‍लि‍कक कृति‍ थि‍क आ स्‍वतंत्र रूपेँ अनुवादकारि‍ताक महत्‍वपूर्ण दि‍शाबोधक अछि‍।
मैथि‍ली लेखन-प्रकाशनकेँ सम्‍वर्द्धित करबामे श्री गजेन्‍द्र ठाकुर प्रयोजि‍त ई-प्रत्रि‍का वि‍देह अन्‍यतम मानल जाए लागल अछि‍, जकर सदेह (हार्ड काँपी) अंक दू, तीन आ चारि‍ पत्रि‍काक चयनि‍त रचना सभसँ कथा, कवि‍ता आ प्रबन्‍ध-समालोचनाकेँ पुस्‍तकाकार प्रकाशि‍त कऽ ऐ वर्षक प्रारंभमे अपन सामार्थ्‍यक परि‍चय दऽ देने छल। महि‍ला सशक्‍ति‍करणक प्रतीक पत्रि‍का जानकी अपन अस्‍ति‍त्‍व अहू वर्ष बनौने रहल। मि‍थि‍ला दर्पण, बम्‍बइ, समय-साल ओ घर-बाहर, पटना तथा पक्षधर, राँची अपन अवधि‍ सोपेक्षाताक ि‍नर्वाह कएने रहल। मि‍थि‍ला दर्पणकेँ श्री हीरेन्‍द्र कुमार झाक ऊर्जाक लाभ भेटलैक।
ऐ‍‍ वर्ष जे सर्वाधि‍क प्रशस्‍त सम्‍मान मैथि‍लीकेँ भेटलैक अछि‍ से थि‍क मैथि‍लीक वरेण्‍य कवि‍ ओ महारथी पं. श्रीचन्‍द्रनाथ मि‍श्र 'अमर'केँ साहि‍त्‍य अकादेमी, नई दि‍ल्‍ली द्वारा फेलोशि‍प प्रदान करब। मैथि‍लीक पालामे ई सम्‍मान पहि‍ले बेर आएल बूझल जएबाक चाही, जइसँ मि‍थि‍ला-मैथि‍ली गौवान्‍वि‍त अनुभव कएलक। श्री अमरकेँ भेटल ई सम्‍मान हुनका हि‍न्‍दीक केदारनाथ सि‍ंह आ अंग्रेजीक खुशवंत सि‍ंहक संगे प्रदान कएल गेलनि‍ अि‍छ जइसँ मैथि‍लीकेँ राष्‍ट्रीय क्षि‍ति‍जपर आत्‍मतोषात्‍मक अनुभूति‍ भेलैक। ओना ऐसँ पूर्व हि‍न्‍दी-मैथि‍लीक जनकवि‍ नागार्जुन-यात्रीकेँ 1955मे ई सम्‍मान भेटल छलनि‍ मुदा सुच्‍चा मैथि‍ली लेखक ओ सेवककेँ प्राप्‍त ऐ बेरूक उपलब्‍धि‍ मैथि‍ली प्रेमीलोकनि‍ द्वारा मानल गेल।
ऐ वर्ष मैथि‍ली-संस्‍कृति‍क वि‍द्वान ओ हि‍न्‍दी-मैथि‍लीक बहुआयामी लेखक डाॅ. तारानन्‍द वि‍योगीकेँ साहि‍त्‍य अकादेमी द्वारा बाल साहि‍त्‍य 'ई भेटल तँ की भेटल' पर पुरस्‍कृत कएल गेलनि‍। जइसँ अभि‍नव प्रकृति‍ ओ अनुसन्‍धानात्‍मक बाल साहि‍त्‍य लेखन दि‍स मैथि‍ली साहि‍त्‍यकारलोकनि‍ प्रेरि‍त भेलाह अछि‍ आ युवा लेखन नव उत्‍साहक संचारसँ उत्‍फुलल अछि‍। हि‍नक प्रलय-रहस्‍य कवि‍ता संग्रह एही वर्ष प्रकाशि‍त भेलनि‍। साहि‍त्‍य अकादेमी द्वारा फूलचन्‍द्र मि‍श्र 'रमण' कृत मैथि‍ली वि‍नि‍बन्‍ध बुद्धि‍धारी सि‍ंह 'रमाकर' एही वर्ष प्रकाशमे आबि‍ सहल। डाॅ. रमानन्‍द झा रमण खोजी पत्रकार जकाँ जर्मन पत्रि‍कासँ ग्रि‍यसर्न संकलि‍त गीत दीनाभद्रीक ओ गीत नेवारककेँ ताकि‍-हेरि‍ उद्धार कऽ पं. गोवि‍न्‍दझाक सानुवाद प्रकाशि‍त करौलनि‍।
उक्‍त अकादेमी द्वारा तंत्रनाथ झा ओ सुभद्रझाक जन्‍मशताब्‍दी सरि‍सवमे इशनाथ झा, लक्ष्‍मीपति‍ सि‍ंह ओ भुवनेश्‍वर सि‍ंह भुवनक जन्‍म शताब्‍दी मधुबनीमे तथा यात्री ओ आरसी प्रसाद सि‍ंहक जन्‍म शताब्‍दीक अवसरपर राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठीक आयोजन क्रमश: पटनाक चेतना समि‍ति‍ ओ मुजफ्फरपुरक स्‍नातकोत्तर मैथि‍ली वि‍भागक तत्‍वाधानमे सम्‍पन्न भेल। एही क्रममे प्रगति‍शी लेखक संघ द्वारा नागार्जुन-यात्रीक जन्‍मशती समारोह उल्‍लेखनीय अछि‍। अकादेमीक वर्तमान मैथि‍ली प्रति‍नि‍धि‍ डॉ. वि‍द्यानाथ झा 'वि‍दि‍त' एही अवधि‍मे अपन औपन्‍यासि‍क कृति‍ सभ करपुरि‍या, अनामि‍काक चि‍ट्ठी, मात्र तीन घंटाक समय आदि‍क नि‍रन्‍तरता ओ वि‍पुलता-बहुसंख्‍यकताक कारणे प्रति‍ष्‍ठापि‍त भेलाह अछि‍। पूर्वमे पं. श्री गोवि‍न्‍दझा, पं. श्रीचन्‍द्रनाथ मि‍श्र 'अमर' श्री मायानन्‍द मि‍श्र, डॉ. रामदेव झा एवं मार्कण्‍डेय प्रवासीकेँ प्रदत्त 'ऑथर ऐट रेसि‍डेन्‍स' सुनबामे आएल जे एही वर्ष डॉ. सुरेश्वर झाकेँ भेटलनि‍ अछि‍। तुषारपात ई जे मार्कण्‍डेय प्रवासी सदृश मनीषी कवि‍, राष्‍ट्रीयता ओ गीतकाव्‍यक प्रति‍ समर्पित व्‍यक्‍ति‍त्‍व एही वर्षकेँ अपन महाप्रयाणक हेतु चुनि‍ मैथि‍लीसँ एक गोट सशक्‍त रचनाकारकेँ छीन‍ लेलखि‍न। डॉ. जयकान्‍त मि‍श्र ओ पं. जयमन्‍त मि‍श्रक नि‍धन सेहो असह्य अशनि‍पात रहल।
ऐ‍‍ वर्षक अन्‍यतम उपलब्‍धि‍ अछि‍ गति‍वि‍धि‍येँ मृतप्राय मैथि‍ली अकादमी, पटनाक पुनर्जागरण। बि‍हार सरकार ऐ संस्‍थाक पुनर्गठन कऽ एकर बहुत दि‍नसँ रि‍क्‍त अध्‍यक्ष पद एक गोट वि‍शि‍ष्‍ट सेवी श्री कमलाकान्‍त झाक सशक्‍त हाथमे प्रदान कएलनि‍ जइसँ मैथि‍ली जगत प्रफुल्‍लि‍त अनुभव कएलक। श्री झाक अबि‍ते मैथि‍ली अकादमी कायाकल्‍पक अनुभव कएलक आ अनेको वर्षसँ दबल-पड़ल आधा दर्जन व्‍याख्‍यानमालाकेँ ओ पटना आ दरभंगामे आयोजि‍त कए, पुस्‍तक प्रदर्शनी लगाए लोककेँ एकबेर फेर अकादमीक सुगबुगाहटि‍सँ परि‍चय करा देलखि‍न। अकादमीक खर्चपर चेतना परि‍सरमे 'पारि‍जातहरण' नाटकक मंचन एकटा अलगे संदेश दऽ सकल। मैथि‍ली साहि‍त्‍यक उत्‍कृष्‍ट सेवाक हेतु वि‍द्वानलोकनि‍केँ सम्‍मानि‍त करबाक परम्‍पराकेँ जगजि‍यार करैत अकादेमी एम.एल.एस.एम. काओलेजक मैथि‍ली, ल.ना.मि‍थि‍ला.वि‍श्ववि‍द्यालयक श्री वि‍भूति‍ आनन्‍दक हाथेँ सम्‍मानि‍त कऽ नूतन अध्‍याय जोड़लक अछि‍। कीर्तिनारायण मि‍श्र पुरस्‍कार ऐबेर महाप्रकाशकेँ प्रदान कएल गेलनि‍ अछि‍।
भारतीय भाषा संस्‍थान, मैसूर सेहो ऐ वर्ष मैथि‍लीक कार्यशालाक आयोजन कऽ मैथि‍ली अनुवादक माध्‍यमे ऐ भाषाकेँ राष्‍ट्रीय-अन्‍तर्राष्‍ट्रीय क्षि‍ति‍जपर प्रक्षेपि‍त करबाक प्रयास कएलक अछि‍। एकरा द्वारा वि‍भि‍न्न पत्रि‍काक पोषण ओ अनेक पोथीक क्रय सेहो मैि‍थली क्षेत्रमे उत्‍साहक कारण बनल रहल अछि‍।
ऐ वर्ष स्‍व. हरि‍वंश 'तरूण', समस्‍तीपुर संस्‍थापि‍त ओ अखि‍ल भारतीय साहि‍त्य-सेवाकेँ समर्पित साहि‍त्‍यक संस्‍था भारतीय साहि‍त्‍यकार संसद जै मैथि‍ली रचनाकार-पत्रकारकेँ सम्‍मानि‍त करबाक ि‍नर्णय लेलक अछि‍ तइमे श्रीवि‍जयनाथ झा, डाॅ. सुरेन्‍द्र कुमार 'सुमन' ओ ि‍वद्यापति‍ टाइम्‍सक सम्‍पादक आ अधि‍ष्‍ठाता श्री वि‍नोद कुमारक नाम उल्‍लेखनीय अछि‍। ज्ञातव्‍य जे श्री वि‍जयनाथ झाकेँ ऐ वर्ष वि‍हार राष्‍ट्रभाषा परि‍षद, पटना सात हजारक लोकभाषा पुरस्‍कारसँ सम्‍मानि‍त कए मैथि‍लीक प्रति‍ अपन आत्‍मीयताक परि‍चय अनेक वर्षोपरान्‍त सम्‍मानि‍त कए मैथि‍लीक प्रति‍ अपन आत्‍मीयताक परि‍चय अनेक वर्षोपरान्‍त प्रस्‍तुत कऽ सकल। वि‍द्यापति‍ सेवा संस्‍थान, दरभंगा ओ चेतना समि‍ति‍, पटना अहू वर्ष परम्‍परि‍ते रूपमे विद्यापति‍ स्‍मृति‍-पर्वक आयोजन कऽ संतुष्‍ट देखल गेल।
ऐ वर्ष श्री सोमदेवक रचनावलीपर डाॅ. सुधाकर चौधरीक 'बहुआयामी जनकवि‍ सोमदेव' समालोचनात्‍मक ग्रन्‍थ प्रकाशि‍त भेल जे जीवि‍त रचनाकारर लि‍खल जाइत वि‍रल पोथीक परम्‍परामे समादृत भेल आ सोमदेवजीकेँ स्‍वस्‍ति‍ फाउण्‍डेशन, सहरसा लाइफ टाइम एचि‍भमेन्‍टक आधारपर प्रबोध साहि‍त्‍य सम्‍मानक रूपमे एक लाख टाकाक पुरस्‍कारसँ सम्‍मानि‍त करबाक हेतु चयनि‍त केलकनि‍ जकर मैथि‍ली साहि‍त्‍य जगतमे स्‍वागत भेल अछि‍। साहि‍त्‍य अकादेमी, नई दि‍ल्‍ली ऐ वर्ष मैथि‍लीक हेतु मौलि‍क पुरस्‍कारक उद्घोषणा तकनीकी व्‍यवधानक कारणे नै कऽ सकल छल जे आब डॉ. श्रीमती उषा कि‍रण खानकेँ हुनक पोथी भामती नामक उपन्‍यासपर प्राप्‍त होएबाक सूचना अछि‍।
मैथि‍लीक गति‍वि‍धि‍क दृष्‍टि‍ऍं ऐ वर्ष दि‍सम्‍बर बाइस-तेइसकेँ श्री रामभरोस कापड़ि‍ 'भ्रमर'क संयोजकत्‍वमे काठमांडूमे आयोजि‍त अन्‍तर्राष्‍ट्रीय मैथि‍ली सम्‍मेलन सेहो ऐति‍हासि‍क प्रकृति‍क कहल जा रहल अछि‍ जइमे नेपालक सम्‍पूर्ण सत्ता एतए धरि‍ जे राष्‍ट्रपति‍, उपराष्‍ट्रपति‍ सेहो समुपस्‍थि‍त भऽ मैथि‍लीक उत्‍थान-मार्गकेँ प्रशस्‍त करबाक आश्‍वासन देलनि‍। ऐ सम्‍मेलनमे भारतीय साहि‍त्‍यकार-कलाकारलोकनि‍क सेहो पर्याप्‍त सहभागि‍ता रहल जइमे सर्वश्री वैद्यनाथ चौधरी 'बैजू' चन्‍द्रेश, कमलकान्‍त, फुलचन्‍द्र झा 'प्रवीण' नलि‍नी चौधरी, कुंजबि‍हारी ि‍मश्र, रंजना झा, जय प्रकाश चौधरी 'जनक' उषा पासवान आदि‍क नाओं उल्‍लेखनीय अछि‍। नेपाल मैथि‍लीक ति‍रहुता लि‍पि‍केँ यूनीकोडमे समाहि‍त करेबाक हेतु दत्तचि‍त अछि‍, से अलगे प्रसन्नताक वि‍षय थि‍क।
तथापि‍, भारतीय संवि‍धान, बि‍हार लोक सेवा आयोग, भारतीय संघ लोकसेवा आयोग सदृश संस्‍थामे मान्‍यताप्राप्‍त मैथि‍ली आइयो प्राथमि‍क शि‍क्षामे उपेक्षि‍त अपन आयामक मौलि‍कता ओ व्‍यापकताक बाट ताकि‍ये रहल छथि‍। तँए ने मैथि‍ली-मनीषी पं. श्री अमरजीकेँ लि‍खए पड़ि‍ रहलनि‍ अछि‍-
फुनगीये दि‍स ताकि‍ रहल छथि‍
मैथि‍लीक सभ प्रेमी।
घरमे डि‍बि‍या मि‍झा रहल अछि‍
के उकसाओत टेमी?
ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
सुजित कुमार झा-
जंगलमे होरी
एखन होरीकेँ मिथिलाञ्चलमे धुम अछि । जतय जाउ ओकरे चर्चा रहैत अछि । वैवाहिक कार्यक्रमसभमे तऽ रंग अविर श्रीपञ्चमीए दिन सँ शुरु भऽ गेल अछि । जे केउ सासुर जाइत छथि वा सम्धियनामे रंग अविर सँ स्वागत हेवे करैत छन्हि ।
साँझ होइते होरैया सभकेँ गीत गवैत लोक गाम गाममे देख सकैत अछि । जनकपुरमे होरीकेँ विशेष कार्यक्रम होइत अछि । मिथिला नाट्यकला परिषद प्रत्येक वर्ष अहि अवसरपर महामूर्ख सम्मेलन आयोजना करैत अछि । परिक्रमामे सहभागीसभ कञ्चनवनमे होरी तऽ एक हप्ता पहिने खेल चुकल अछि ।
कञ्चनवनमे होरी
वनमे वा जंगलमे होरी हैत इ सुनलापर वहुतो लोककेँ आश्चर्य लागल हैत । मुदा सत्य इहे अछि । जनकपुर क्षेत्रक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल कञ्चनवनमे फागुन २७ गते होरी सम्पन्न भेल अछि । ओ स्थलपर के बाबाजी के महिला पुरुष सभ होरी नहि हुरदंग तक खेललन्हि अछि । परिक्रमा डोला कञ्चनवनमे पहुँचलापर प्रत्येक वर्ष होरी होइत अछि जानकी मन्दिरक महन्थ रामतपेश्वर दास वैष्णव कहैत छथि । ओ होरीमे जनकपुरक अधिकांश मठ मन्दिरक महन्थ, समाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक क्षेत्र सँ आवद्ध व्यक्ति सहभागि होइत अछि ओ जानकारी देलन्हि ।
यतेक रंग अविर होइत अछि जे जंगल सेहो रंगा जाइत अछि । रामनगरवाली नामक महिला कहैत छथि हमसभ कञ्चनेवनमे होरी खेलाइत छी पूर्णिमा दिन पुवा पुरी मात्र खाइत छी ।
कहल जाइत छैक त्रेता युगमे भगवान राम जानकी चारुभाइ आ चारु वहिन संगे कञ्चनवनमे होरी खेलायल छली । ओहिकेँ संस्मरणमे कञ्चनवनमे होरी खेलायल जाइत अछि । ‘जंगलमे होरीकेँ आनन्दे किछ आओर अछि’ , नेपाल ललितकला प्रज्ञा प्रतिष्ठानक प्राज्ञ रमेश रञ्जन झा कहैत छथि—‘जनकपुर क्षेत्रमे सही होरी तऽ कञ्चने वनमे होइत अछि । कञ्चनवनक होरीकेँ प्रसिद्धीकेँ देखैत नेपाल सरकारक वृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद ओ होरीकेँ अगिला वर्ष सँ विशेष होरी बनावयकेँ निर्णय कएने परिषदक अध्यक्ष दिगम्वर राय जानकारी दैत छथि ।
महामूर्ख सम्मेलनक सेहो धुम
पुवा माउस खायवलासभ वा पूर्णिमा दिन रंग अविर खेलायवलासभ वहुतो स्थानपर होरीकेँ आंगुरपर गनैत हेता । मुदा जनकपुरमे सभ सँ वेसी केकरो प्रतिक्षा भऽ रहल अछि तऽ ओ अछि होरी नहि महामुर्ख सम्मेलनकेँ । मैथिली भाषा, साहित्य, कला, सांस्कृतिक उत्थानकलेल काज करयवला नेपालक अग्रणी संस्था मिथिला नाट्यकला परिषद ओ सम्मेलनकेँ जनकपुरमे प्रत्येक बर्ष आयोजना करैत अछि । ओ सम्मेलनमे विभिन्न विशिष्ठ व्यक्तिकेँ व्यंङ्गयात्मक उपाधि वितरण कएल जाइत अछि । महामूर्खक उपाधि केकरा वितरण कएल जाए अहिकेँ मिनाप विशेष तयारी कऽ रहल मिनापक अध्यक्ष सुनिल मल्लिक कहैत छथि ।
इम्हर महामूर्ख बनवाकलेल सेहो भारी प्रतिस्पर्धा देखल जा रहल अछि । अहिवेर साहित्यिक क्षेत्रक, राजनीतिक क्षेत्रक वा समाजिक क्षेत्रक हातमे महामूर्खक उपाधि भेटैत अछि तेकरो प्रतिक्षा भऽ रहल अछि । २०६५ सालक महामूर्खक उपाधि प्राप्त कर्ता एवं मैथिलीक बरिष्ठ साहित्यकार डा. राजेन्द्र प्रसाद विमल कहैत छथि ‘उपाधि प्राप्त करब अपनामे बडका बात होइत अछि , प्रेम सँ लोक किछ पिब लैत अछि । तखन महामूर्ख पाएब बडका भारी बात नहि ।
जनकपुरमे २०६१ साल सँ महामूर्ख सम्मेलन होइत आएल अछि । २०६१ सालक महामूर्ख मैथिली कवि नरेश ठाकुर , २०६२ कें एमाले नेता शीतल झा , २०६३ कें जनकपुर नगरपालिकाक तत्कालीन मेयर हरि बहादुर बिसी, २०६४ कें सदभावना नेता ओमकुमार झा , २०६५ कें बरिष्ठ साहित्यकार डा. राजेन्द्र विमल आ २०६६ केँ पूर्व मन्त्री एवं एमाले नेता रामचन्द्र झा कें पदबी देल गेल ।

महामूर्खक नामपर बहुतो गीत बनल
कोनो चिज जखन लोकप्रिय होइत अछि तखन ओकरा सभ क्यास करय लगैत अछि । महामूर्ख सम्मेलन सँ जोडिकऽ बहुत गीतकार सभ गीत लिखलन्हि अछि । मैथिलीक चर्चित गीतकार कालीकान्त झा त्रिषितक गीत खुब चर्चित भेल अछि । हुनक गीत .....
स्वागत वागत मूर्ख महान
महामूर्ख सम्मेलन के अछि
अपनेही पर अभिमान
निप्पट मूर्ख चौपट्ट भट्ट
अही आयब भेल प्रमाण
छल प्रपंच पाखण्ड भरल जग
सत्यक नहि पहिचान
ई सम्मेलन कय प्रमाणित मूर्ख सकल विद्वान
बनी प्रतिनिधि संसद सुनैत
मूर्ख शिरोमणि शान
पेन्ट पहिरि ठाडे भऽ मुतैत
कुकुर सभक राग
कुर्सी चढि लक्ष्मीके बाहन
मूर्ख बनय विद्वान
हा कुर्सी हे कुर्सी
कुर्सी पक्ष विपक्षक प्राण
स्वागत वागत मूर्ख महान
ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
राजदेव मण्‍डल
उपन्‍यास' आगाँ
हमर टोल
गहवरक अँगनीमे जेना ललका इजोत उतरि‍ गेल छै। अन्‍हारक कोरामे लहुआएल लाल चि‍ल्हका खेला रहल हो, तहि‍ना सन लगैत अछि‍।
धधकैत आहुत, चौमुख जरैत दीप, अड़हुलक लाल फूल, लाल सि‍नूर, ललका डाली। सबहक मुँह जेना ओही लालीसँ ढौंरल हो। लाल टुह-टुह भेल भगतकेँ आँखि‍ सपनामे डूबि‍-उगि‍ रहल हो। पहि‍ले कहि‍ देल गेल छलै। मरद सभ एककात आ औरति‍या सभ एककात। बात के सुनतै? ढीठ सभ मरदक झोंझि‍मे ढुकि‍ कऽ बैसल छै।
दोसरो दि‍स तँ थेथरे सभ अछि‍। मौगि‍याह जकाँ दोगमे ढुकि‍ कनफुसकी कऽ रहल छै।
पता नै चलै छै औरत आ मरदक। एक तँ इजोत तेजगर नै छै। दोसर साड़ीसँ आधा मुँह झँपने छै। आँखि‍क भाग देखलासँ केना ि‍चन्‍हत लोक। दसगरदा जगहपर सभ चलै छै।
सभ की चलतै। उतरबरि‍या कातसँ औरति‍या सभकेँ नै बैठबाक चाही। उत्तरसँ देवताक आवाहन होय छै। गि‍यान तँ छौ नै।
आबि‍ गेलौ संुघहा धान।
सुंधाय मड़रकेँ सभ सुंघहाधान कहै छै। सुंघहाधान छूबि‍ते हाथमे गड़ि‍ जाए छै। टोकैते देरी सुंघाय मड़रकेँ बकटेटी शुरू।
फेर कि‍यो सुंघहाघान बाजि‍ नै सकैत अछि‍। देख लि‍औ लाठीक हुड़ाठ। मुँह भाँगि‍ देबै, कि‍यो बजत तँ। मुँहकेँ चुप्‍प राख।
तेरहे बरखक उचि‍तवक्‍ता छै तइसँ की। ओकरासँ गप्‍पमे के जीतत। उचि‍त बात फट्ट द' बजल- “गोहारि‍, गोसांय सब बन्न। सुंघाय बाबा कहि‍ देलक। कि‍यो मुँहसँ बाजि‍ नै सकैत छी। भगतो वाक केनाक देत। चलै चलू आब ि‍कछ ै हएत। के बतीसी लाठीसँ झड़ाएत।‍”
भगतकेँ नवसि‍खुआ चेला फनका रपटैत बजल- “देहपर नै लत्ता-चौधरी बोलत्ता। ऐ गामक मालि‍क सुंघाय छि‍यो की जे ओकर औडर चलतौ। अखने सुंघबाकेँ कंठ पकड़ि‍ बाहर दि‍स ठोंठि‍या देबो। बुझि‍ले तोरो कोनो बाप नै बचेतौ।‍”
उचि‍तवक्‍ताकेँ कपारपर तामस नाचि‍ उठल। सुंघाय मड़र पाछूसँ डाँड़मे लाठी लगौने ठाढ़ छै। बूढ़ देहक भार लाठीपर देने आँखि‍ मूनि‍ देवता-पि‍त्तरकेँ सुमरि‍ रहल अछि‍।
गहवरक सीमामे बकटेटी नै करबाक चाही। हम पपि‍याहा। हमरा छेमा क' दि‍अ।
“एहेन गप्‍प कहत।‍” उचि‍तवक्‍ता फोंफि‍या कऽ उठल आ सुंघाय मड़रकेँ पाछूसँ लाठी खैंच लेलक। लाठी चमकाबैत फनकापर हुड़कल।
सुंघाय मड़र धाँय द' डाँड़ भरे खसल। कुहरैत बाजल- “हौ बाप, मारि‍ देलक। ऐ लुकड़बाकेँ जन्‍मे भेल छै मरचायसँ। तब ने एकर बात आ बानि‍ मरचाय जकाँ लगै छै। एकर बाप सभ साल लंगी मरचायकेँ खेती करै छलै। ओहीसँ जोड़ा बरद कीनलकै। ओइसँ की। दारू पी क' सि‍रजल चीज केहेन हेतै।‍”
उचि‍तवक्‍ताकेँ हाथसँ लाठी छि‍ना गेल छै। महुराइत बजल- “अपना बेटा दि‍स नै तकै छहक। टूटलो डाँड़पर अनकर आड़ि‍ कोदारि‍सँ नै छाँटबहक तँ जलखै नै भेटतह। केहेन कुकरमी छहक, खेलि‍ देबै सभटा बात।‍”
“नै गौ बाबू, कल जोड़ै छि‍यौ। हमरा उठा क' पहुँचा दे।‍”
“‍अच्‍छा चुप रहू। शान्‍त भ' जाऊ। देखि‍यो ओने गोहारि‍ शुरू भ' रहल छै।‍”
पहि‍लुका डाली जागेसरक लगल छै। डाली दौड़ क' अपने आगू चलि‍ गेलै। सभटा देवताक कि‍रपा छै। देव कि‍रपा बि‍नु डोले नै पात।
आपसी फुसुर-फुसुर भ' रहल छै। ओकर पति‍ जागेसर गहवर घर दि‍स टकटकी लगौने।
“एहेन जवानीसँ भरल देह आ तब बाल-बच्‍चा नै होइ छै।‍”
“जागेसरक बाछी एहेने बनल छै। एेबेर गाभ टेकतै की नै?‍”
“‍खेलावन भगत एे काजमे माहि‍र छै। आब देखि‍यो तँ....।‍”
स्‍त्रीगण दि‍ससँ कने मन्‍द स्‍वर नि‍कलै छै।
“भैयाखौकीकेँ लाज-धाक होइ छै की नै। अपने दहकेँ अपने जे करै छै। छि‍नरि‍या....।‍”
“अइठाम अबि‍ते सभ देवी-देवा चढ़ि‍ जाइ छै। आ नैहरा जाइते सभटा छूटि‍ जाइ छै।‍”
“सुनै छि‍ऐ जे नैहरासँ एकटा छौड़ा आठे दि‍नपर भेँट करए अबै छै। पछोड़ धेने रहै छै।‍”
“ई सभ तँ होइते रहै छै। तोरो मन होइ छौ की।‍”
एक दोसरकेँ मुक्का मारैत औरति‍या सभ एकसंग हँसैत अछि‍।
“चुप। सभ मुँह बन्न क' ले। भगतकेँ भाव आबि‍ गेलै।‍”
“कारणीकेँ एमहर लाबह।‍”
भगति‍याक भगैत जोर-शोरसँ शुरू भ' गेल छै।
“जय हौ देव। कनी नीकसँ देखि‍यो। माथ आ पेट दुनूमे दरद छै।‍”
खेलावन भगत देह-हाथकेँ ऐंचैत धर्मडीहीवालीक आगूमे बैसैत अछि‍।
मंतर पढ़ि‍ माथ हाथ द' रहल छै। माथपर सँ हाथ ओकरा छातीपर गि‍रबैत अछि‍। फेर पेटकेँ हँसोति‍ दै छै‍। पेटपर सँ हाथ ससरि‍ पुन: माथपर। धर्मडीहीवाली चौंक उठै छै। ओकर देह सि‍हरि‍ उठै छै। भगत फेर माथपर हाथ रखैत काजकेँ दोहरौलक।
“चटाक।‍” धर्मडीहीवालीक चमेटा भगतकेँ मुँहपर लगल। संगहि‍ कंठ पकड़ि‍ धकेल देलक।
आशा नै छलै से भेल। भगत ओंधरा गेल। तामसे थर-थर काँपैत। लोगमे हड़कम्‍प भ' गेल। कि‍छु ठाढ़ आ कि‍दु बैसल अछि‍। स्‍त्रीगणक आँखि‍ आश्चर्यमे डूबल।
“गे माइ गे माइ। आब की हेतै।‍”
“आगि‍ बरि‍स जेतै। ठनका गि‍रतै।‍”
उचि‍तवक्‍ताकेँ नै रहल गेल तँ बजल- “भगतकेँ असल भूतसँ पाला पड़ि‍ गेल छै। सभ गुण-मंतर अखन भीतर भ' गेल छै। टाँग केना असमान दि‍स ठाढ़ केने छै। लगै छै जेना टि‍टही होइ।‍”
फड़फड़ा क' उठैत अछि‍- भगत। बेंत ल' क' धर्मडीीवालीकेँ पीठपर तड़-तड़ा दैत अछि‍।
“आइ हमसभ भूतकेँ भगा देबै।‍”
धर्मडीहीवाली भागैत अछि‍।
“रे खुनि‍याँ सभ। रे कोढ़ी फूटतौ रे बेईमनमा। गे माइ गेऽऽऽ‍।”
जगेसरा आगूसँ घेर लै अछि‍। एक्के धक्कामे जगेसराकेँ गि‍रबैत धर्मडीहीवाली पड़ाइत अछि‍। भगत देहसँ गरदा झाड़ि‍ रहल अछि।‍ जगेसरा हाथ जोड़ि‍ थर-थर काँपि‍ रहल छै।
“आब की हेतै यौ भगतजी। कोनो उपाए लगाऊ। जे कही अहाँ।‍”
“‍हेतैक सभ उपाए लगतैक। भगतसँ भूत नै जीत सकै छै। कोखि‍या गोहारि‍ हेतै। तू परसू आबि‍ क' भेँट कर। हमरे नाम छि‍ऐ रामखेलावन भगत।
पछुआरक अन्‍हारमे कि‍छु करूण क्रदन सन भेल। भगत छड़पि‍ क' गहवरमे ढुकि‍ गेल। हवाक झोंक अाएल। कि‍छु दीप मुझा गेल।
लोक सभ पीठपर डरकेँ लादने एका-एकी ससरि‍ रहल अछि‍।
......। क्रमश:
ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
डॉ. रमण झा
फोंका-एक विहगावलोकन

काव्य वैह थिक जे रसिकक हृदयके ँ रसाप्लावित करय, गृहिणी वैह थिक जे अपन पतिके ँ अपन प्रेमपासमे जकरने रहय, भक्त वैह थिक जे भगवानके ँ अपन वषमे कयने रहय आ षत्रु वैह थिक जे मरितो दमधरि ष्षत्रुता नहि छोड़ए। अरसिक वा गँवारके ँ कविता सुनाके ँ की लाभ ? ते ँ ने संस्कृत साहित्यक प्रसिद्ध विद्वान एवं महाकवि वाणभट्ट कहने छथि-अरसिकस्तेषु काव्य निवेदनं षिरसि मा लिख! मा लिख! मा लिख!!
वस्तुतः बानर नारिकेरक स्वाद की बूझत ? गँवार रत्नक महत्वके ँ की परखत ? तहिना अरसिक किंवा गँवारके ँ जँ कोनो कविता सुनयबैक तँ ओ अरण्यरोदने कहाओत, मुर्दाक शरीरपर उबटने लगायब होयत, स्थलपर कमल रोपबे सदृष कहाओत, ऊसर जमीनपर बेस काल धरि वर्षा करबे तुल्य होयत, कुकुरक नाडÛरिके ँ सोझे करब सदृष बुझाओत, बहिरक कानमे जपे करब तुल्य प्रतीत होयत अथवा आन्हरक आगाँमे दर्पणे रखबा सन भान होयत-
अरण्य रुदितं कृतं षवषरीरमुद्वर्तितम्।
स्थलेमारोपितं सुचिरमूसरे वर्षितम्।।
स्वपुच्छमवनावितं वधिरकर्ण जापः कृतो।
धृतोन्धमुखदर्पणः यद्वुधो जनः सेवितः।। (निदर्षनालंकार)
जेना धनंजय नामक पाथरपर घसिकय सोनाक परीक्षा होइत अछि, रणक्षेत्रमे धनुर्धरक परीक्षा होइत अछि, विपत्तिक समयमे गृहिणीक परीक्षा होइत अछि आ श्रीमद्भागवतक अर्थ लगयबामे पण्डितक परीक्षा होइत अछि-
धनंजये हाटक सम्परीक्षा रणांगनां षस्त्रभृतां परीक्षा।
विपत्तिकाले गृहिणी परीक्षा विद्यावतां भागवते परीक्षा।।
तहिना काव्यक परीक्षा काव्यषास्त्र रूपी कसौटीपर कयल जाइत अछि। प्रायः तथाकथित नव कविता लिखनिहार कवि लोकनि हमर एहि मतसँ सहमत नहियो होयताह मुदा वनस्पति कतबो शुद्ध रहय ओ शुद्ध घीक समता नहि कए सकैत अछि।
वस्तुतः श्री कमलाकान्त झाजीक फोंका कविता संग्रह पढ़ि हमरा काव्यषास्त्रक अन्तर्गत पढ़ल शब्दषक्तिक भेद- लक्षणा-व्यंजनाक स्मरण कराए दैत अछि। एहि फोंकामे कुल 89 गोट कविता संगृहीत अछि जाहिमे अधिकांष कवितामे समाजक कोनो ने कोनो विरूपतापर प्रहार कयल गेल अछि, परषासनक कोनो ने कोनो अंगपर निषान साधल गेल अछि आ नेता लोकनिक भ्रष्ट चरित्रके ँ जगजियार कयल गेल अछि-एक शब्दमे जँ कही तऽ चारूकात पसरल भ्रष्टाचारपर व्यंग्यवाणक बौछार कयल गेल अछि। जँ एहि प्रकारक अवघात अभिधामे कयल जाय तँ मारि-पीट, पर-पंचैती, केस-मोकदमा सभ किछु भए जायत मुदा लक्षणा आ व्यंजनाक वाणसँ विद्ध लक्ष्य जालमे फँसल माछ सन छटपटाय लगैत अछि, आहुति युत होमक अग्नि जकाँ धधकि उठैत अछि आ चोटाओल नाग जकाँ फुफकार काटय लगैत अछि मुदा पलटवार नहि कए सकैत अछि। लक्षणा आ व्यंजनाक वाण लोकके ँ कतोक दिन धरि भीतरे भीतर दग्ध करैत रहैत अछि जेना सम्पूर्ण गात्रपर क ड़कल तेल वा घीक पड़ने भेल फोंका लोककें कतोक दिन धरि कुहरबैत रहैत छैक।
कविश्रेष्ठ श्री कमलाकान्त झाजीक कवितामे कोन प्रकारक व्यंग्य निहित अछि से हुनक पंक्तिक अवलोकन विनु कयने अनुभव करब असंभव अछि। हिनक परिचय-नवरत्न शीर्षकमे समाजक प्रसिद्ध नओ पेषाक लोकपर जे व्यंग्य कयल गेल अछि ताहिमेसँ किछु द्रष्टव्य थिक-
डाक्टर-
पैघ डाक्टर वैह थिक चिन्हय सभटा रोग।
अदलि - बदलि औषधि दिअए बाँचि सकए नहि लोग।।
कवि-
असली कवि थिक वैह जे कविता करए अनर्थ।
लाम-काफ बेसी होअए श्रोता बुझए ने अर्थ।।
अफसर-
अफसर बड़का वैह थिक, जनिक पैध हो पेट।
लेट-सेट कखनो पहुँचि, काटथि अनकर घे ँट।।
गायक-
असली गायक वैह थिक, जकर पैध हो तान।
श्रोता सभ उठि हो विदा, बन्द होअए नहि गान।। फोंका-पृ. 40,41
कवि अपन काव्यमे सभसँ पैध निषान सधने छथि भ्रष्ट नेता लोकनिपर। किछु पंक्तिक उल्लेख करब आवष्यक बुझि पडै़त अछि-
राजनीति हुनका लेल वरदान अछि
प्हिने झोपड़ीमे रहैत छलाह
आइ आलीषान मकान अछि।
पुनष्च-
ओ हस्ताक्षरक बदला
अँउठा लगबैत छथि
राजनेता छथि ते ँ
विद्वान कहबैत छथि। फोंका -पृ. 51
राजनेतापर व्यंग्य करैत श्री झा मंत्रीजीकेँ कुकुर धरि कहि देबामे नहि हिचकैत छथि। हिनकहि शब्दमे द्रष्टव्य थिक-
दिल्लीक अषोक पथपर मंत्रीक डेरासँ
एक कुकुर
नालीमे स्वयं जा खसि पड़ल
हल्ला भेल
लोक दौड़ल
कुकुरके ँ निकालल गेल
साबुन, तेल आ सेंट लगाओल गेल।
कुकुरके ँ बैसा पुछल गेल
मंत्रीक आवासक सुख त्यागि
नालीमे बेर-बेर किएक?
कुकुर सहज भावसँ बाजल-
एक बंगलामे एकेटा कुकुर नीक। फोंका पृ.-93
कवि भविष्यद्रष्टा होइत छथि, समाज सुधारक होइत छथि आ सबसँ बेसी निर्भीक होइत छथि। हिनक निर्भीकताक पराकाष्ठा निम्नांकित पंक्तिमे व्यंजित अछि-
मैडमजी पुछलनि
सरदारजी
अहाँ यू. पी. ए.क अर्थ जनैत छी-
ओहिमे हमर
की हैसियत मानैत छी ?
सरदारजी बजलाह
मैडम
यू. पी. ए.क मतलब साफ छै
एहिमे पी. ए. हम छी
बाँकी सभ यू(अहाँ छी) फोंका-पृ.-6
हिनक एहि कविता संग्रहमे एहि प्रकारक व्यंग्य समाजक प्रत्येक वर्गपर अछि जतय कतहु हिनका व्यभिचार, अनाचार आ भ्रष्टाचारक अनुभूति होइत छनि।
हिनक कविता संग्रहमे वक्रोक्ति(अलंकार)क माध्यमे सामान्यो गप्पके ँ तेनाने उपस्थापित कयल गेल अछि जे सुनितहि एक क्षणक हेतु अचंभित भए जाएब, हृदयमे गुदगुदी उठत आ मुहपर स्मितहास अवष्ये टपकि पड़त। अवलोकनीय थिक-
एकटा मित्र पत्नीसँ पुछलथिन
सुनैछी ?
तुलसीदास कहने छथिन
‘ढ़ोल गँवार शूद्र पषु नारी
ई सभ तारण के अधिकारी’
अर्थ बुझै छियै कि बुझाउ
पत्नी बजलथिन
एकर अर्थ तँ एकदम स्पष्ट छै
एहिमे हम छी एक ठाम
आ अहाँ छी चारि ठाम। फोंका-पृ.-44
श्री कमलाकान्त झाजीक कविता संग्रहमे जँ कतहु शृंगारिको वर्णन भेल अछि तऽ ओतहु व्यंग्येक माध्यमसँ। कने एहि अंषपर दृष्टिपात कयल जाय-
क्रुद्ध वॉसक विनती करैत
बजली घिघिया क’
पूर्वाह्नमे लेट एैल रही
कम्पन्सेट क’ देब
खराब नै मानी तँ
साँझमे लेट क’ जैब। फोंका-पृ.-110
हिनक कविता सभमे ठाम-ठाम अलंकारक प्रयोग सेहो भेटैत अछि। एतय उत्प्रेक्षाक मालाक अवलोकन कयल जाय-
तऽन मल-मल जकाँ, मोन मखमल जकाँ
मूँह चाने जकाँ, दाँत मोती जकाँ । फोंका-पृ.-26
विनोक्ति अलंकार द्रष्टव्य थिक-
बिनु चीनी केर चाह नहि, बिनु जलखइ केर प्लेट।
बिनु सरिसो केर माँछ नहि, बिना धोधि केर सेठ।। फोंका-पृ.-41
पुनरुक्तिप्रकाष-
एक आँखि स्वप्न-मिलन मेला लगौने
एक आँखि विरही चकोर
एक आँखि अपना लए जागल रहैए
एक आँखि हुनका घर चोर। फोंका -पृ.-38
हिनक एहि संग्रहमे एक दिस जँ किछु मात्रिक छंदमे लिखल गेल कविता सभ अछि तऽ दोसर दिस आधुनिक कविक डेगमे डेग मिलबैत पूर्णतः अतुकान्त कविता सेहो अछि। किछु छन्दोबद्ध कविताक उल्लेख एतय कयल जा रहल अछि-
कुण्डलिया-एहि छन्दमे दोहा एवं रोलाक मिश्रण एकटा शर्तक संग रहैत छैक जे दोहाक अंतिम पाद रोलाक आरम्भक पाद बनि जाइत अछि। एतबे नहि दोहा छन्दक आदि भागमे जे पद रहत से रोलाक अंतमे निष्चय देल जायत। एकर पूर्णतः निर्वाह कवि कयने छथि। कने देखल तऽ जाउ-
खादीमे गुण बहुत छै, सभ दिन झॉपय अंग।
छै उज्जर तँ की भेलै, एहिमे सातो रंग।।
एहिमे सातो रंग दाममे सस्ते सस्ता
सभठाँ छै उपलब्ध भेटै भरि बस्ता-बस्ता।
कविगण बाजि उठथि सुनू औ भौतिकवादी
बर्बादीसँ बचू मङा कऽ पहिरू खादी।।
पुचष्च-
खादी केर अछि बढ़ि रहल दिन- दिन दूना रेट।
एकरा अंदरमे दबल भारी भरकम पेट।।
भारी भरकम पेट देषके काला धंधा
भ्रष्टाचारी चोर बजारिक बनल सुगन्धा।
नैयायिक केर न्याय देहपर चढ़िते खादी
सभटा नुका लैछ ई बापू केर खादी।। फोंका-पृ.-108
निष्कर्षतः यैह कहल जा सकैत अछि जे फोंका कविता संग्रह एकटा सफल काव्य संग्रह थिक जकर पाठक किंवा श्रोताके ँ धैर्य आ साहसक संग पारायण व श्रवण करबाक प्रयोजन छनि। फोंका पढ़ि एक बेरि अवष्ये लोकक देह सिहरि उठतैक, मोन उद्वेलित होयतैक आ कुमार्गके ँ छोड़ि सन्मार्गपर चलबाक प्रेरणा भेटतैक। हम एकर कविसँ आग्रह करबनि जे एहने सरस, सुन्दर आ संग्रहणीय रचनासँ मैथिली साहित्यक उद्यानके ँ सुरभित करैत रहथि। इत्यलम्।

Suggested citation: डॉ. रमण झा. “फोंका-एक विहगावलोकन.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 78, 2011-03-15. https://www.videha.co.in/research/2011/78/फोंका-एक-विहगावलोकन.htm

मूल विदेह अंक / Original issue