विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

‘महाराज महेश ठाकुर ओ कंकाली भगवती’ ग्रन्थ समीक्षा

बिपिन कुमार झा · 2011-04-15 · अंक 80

महाराज महेश ठाकुर ओ कंकाली भगवती'
लेखक- डा० शान्ति सिंह ठाकुर
प्रकाशक- कंकाली संघ राजग्राम
प्रकाशन वर्ष- २०१०
विभाग-
आशीर्वचन- श्री जगदीश मिश्र
सम्मति- डा० किशोरनाथ झा
पोथीक प्रसंग- लेखक स्वयं
१. महाराज महेश ठाकुर ो हुनक गाम
२. म.म. महेश ठाकुर क पारिवारिक ो शैक्षिक परुष्टभूमि
३. महेश ठाकुरक जीवन सं सम्बद्ध तथ्य
४. राज्यप्राप्तिक ेवं कंकाली भगवतीक ाविर्भाव
५. कंकाली माहात्म्य
६. राजग्रामस्थित कंकाली परिसर
परिशिष्ट
दरिभंगास्थ महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह स्मारक महाविद्यालयीय मैथिली समाराधनतत्पर खण्डवलाकुलसमुद्भूत डा० श्री शान्तिनाथ सिंह ठाकुर द्वारा निबद्धग्रन्थ अछि -'महाराज महेश्वर सिंह ओ कंकालीभगवती|
ई ग्रन्थ वर्ष २०१० में कंकाली संघ राजग्राम द्वारा प्रकाशित एकटा ऐतिहासिक ग्रन्थ अछि जे स्वरूपतः त& 'भौर' ग्राम आ मैथिल राजवंश केर गौरवमयी आभाक परिचय दैत अछि प्रच्छन्नरूप स ई ग्रन्थ आस्था ओ तर्क केर मंजुल प्रयोगक दर्शन करवैत प्रातःकालीन भगवान भाष्कर समान मिथिलाराजवंश केर सांस्कृतिक स्वर्णिम युगक केर दर्शन करवैत नीतिशतक केर पद्य 'कालक्रमेण जगतः परिवर्तमाना...'' के चरितार्थ करवैत प्रत्यक्षानुलम्बी, इतरप्रमाणविस्मरुत मूल्यविहीन आधुनिक समाज सँऽ अस्ताचलरूपिणी संस्करुति कें नवजीवन प्रदान करवाक हेतु अनुनय करैत बुझना जाइत अछि जे चीत्कार कय ई कहि रहल अछि जे हे मनुज स्मरण करू ओहि कीर्तिस्तम्भ के जेकर समक्ष भारतवर्षक राष्ट्राधीश सेहो नतमस्तक रहल अछि, आगू बढाउ ओहि गरिमा के मिथिला के इतिहास लिखत | ई त ध्रुव सत्य अछि जे एक दिन सभकिछु काल केर गाल मे विलीन भय जायत | एहि भौतिक जगत मे कोनो वस्तु संस्था अथवा कोनो समाज शाश्वत नहिं कहल जा सकैत अछि। ओ डायनासोर हो अथवा हडप्पा, मेसोपोटामिया अथवा कोनो लुप्तप्राय सम्प्रदाय सभ एक न एक दिन कालक गाल मे विलीन भय जायत ई ध्रुव सत्य अछि।
एहि प्रसंग मे यक्ष-युधिष्ठिर संवाद समीचीन प्रतीत होइत अछि-
यक्ष-युधिष्ठिर सम्वाद मे कहल गेल अछि जे- प्रतिदिन जीव मृत्यु कॆं प्राप्त करैत अछि मुदा ओतहि अन्य लोक ई बुझितो एतहि रहबाक इच्छा करैत अछि। एहि सँऽ आश्चर्य की भय सकैत छैक?
समीक्षा केर संकल्प, उद्देश्य आ विषयवस्तु-
संकल्प-
सतत अध्यवसायरत रहबाक क्रम में यदि कोनो नीक ग्रन्थ अनायास सुलभ भय जाय त& आनन्द स्वाभाविक छैक तहू में एहेन ग्रन्थ जे आस्था केर समक्ष तर्क के अथवा तर्कक समक्ष आस्था केर अवहेलना नहिं करैत हो| एहि ग्रन्थक प्रसंगशः उद्धरण, समुचित सन्दर्भ आदि एकर विश्वसनीयता केर प्रमाण अछि| ई सभ किछु कारण छल जे एहि ग्रन्थ दिस विशेष रुचि भेल|
उद्देश्य-
काव्यप्रकाश में कहल गेल अछि प्रयोजनमनुद्दिश्य मन्दो&पि न प्रवर्तते अस्तु समीक्षा केर उद्देश्य लिखब उचित बुझनाजाइत अछि- एकटा अभिनव ओ विश्वसनीय स्रोत केर जानकारी अधेyता केर समक्ष प्रस्तुत करब| आ संगहि अपन किछु मूल भूत प्रश्न केर उत्तर प्राप्त करबाक प्रयास[1]|
विषयवस्तु-
एहि समीक्षा में जेकर अंगीकार कयल जा रहल अछि ओ विषय वस्तु अछि-
१.ग्रन्थक विभागश: संक्षिप्त परिचय
२. ग्रन्थक वैशिष्ट्य
२.१ ास्थागत -
२.२ तर्कगत (शोध) -
३. ग्रन्थक न्यूनता
३.१ ास्थागत -
३.२ तर्कगत (शोध) -
४. ग्रन्थक ुपादेयता व्यावहारिक रूप में
अन्य विविध पक्ष
५. दोषपरिहाराथ सम्भव ुपाय ा ौकित्यविमर्श|
शुभमस्तु
[1] श्रोत्रिय समाजक आरम्भ के कयलथि? ई समाज कियाक अस्तित्व मे आयल? एकर संस्कृति की अछि? एकर विधि व्यवहार आदि शास्त्रसम्मत अछि अथवा मात्र परम्परा केर निर्वहण अभिप्राय रहि गेल? यदि शास्त्रसम्मत अछि तऽ कोन ग्रन्थ मे एकर चर्चा अछि? ओहि ग्रन्थ केर प्रामाणिकता निर्विवाद अछि अथवा नहिं? जाति, कुल, पाँजि, मूल, गोत्र की थीक? एकर की औचित्य छल? यदि औचित्य छल तऽ आब एकर अनौचित्य कोना निर्धारित भेल जा रहल अछि? श्रोत्रिय समाज सँ सन्दर्भित उक्त चर्चित किछु एहेन मूलभूत प्रश्न अछि जे आवश्यक अछि एहि समाजक Documentation हेतु।’सारस्वत-निकेतनम्’ जे कि संस्कृत आ अपन संस्कृतिक अभ्युत्थान हेतु सतत् समर्पित अछि, अपन श्रोत्रिय समाज सन्दर्भित मूल स्रोतक आ एकर अक्षुण्ण संस्कृति केर विविध पक्षक Documentation करय जा रहल अछि। एहि कार्य मे अपनें सभ सँऽ विशेषकर एहि समाजक इतिहासक ज्ञाता बुजुर्ग आ सक्रिय युवा कें सहयोगक सर्वथा अपेक्षा अछि। यदि उक्त सन्दर्भ मे कोनो जानकारी उपलब्ध करा (kumarvipin.jha@gmail.com) सकी तऽ एहि विशाल यज्ञ मे एकटा आहूति सदृश होयत।
ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
सन्तोष कुमार मिश्र
एकटा पत्र
ज्योतीकें चिट्ठी
काठमाण्डू
२१–२–२०११
प्रिय ज्योती,
हम खुशीसँ आनन्दमय जीवन वितारहल छी । हँ, ई सच्च आ अवश्य समाजिक रुपे ठिक बात नइ छैक जे अहाँ हमरा लग नइ छी मुदा ई सुनि अहाँ आश्र्यचकित भऽजाएब जे हमर रक्तचापके अवस्था ठिक भऽगेल अछि । डाक्टरबाबु कहै छलाह जे अहिना परहेज कऽकऽ जँ रहब त बेशी दिन जीयब ।
अहाँके बुझल अछि, जे आइकाल्हि हम अफिस समयेपर पहुँच जाइछी । कोनो प्रकारक तनाब सेहो नहि रहैय । हाकिम कें त कि छैक, सहि समय पर सहि काज भऽजाय, बस, आओर कि ? आ हम अखन अहिमे सक्षम सेहो छी । काल्हि हाकिमसाहेब कहैत छलाह जे हमरामे एकटा परिवर्तण महसुश भऽरहल छैन्हि । हमर बनाओल रिर्पोटमे गल्ती त रैहते नइ छैक ।
आब ककरो पर कोनो प्रकारक आश नहि रहवाक कारण लगभग सबहे काज सहि समयपर ठिक–ठिक तरिकासँ हम अपने कऽ लैछी । अपना जते पाइ चाहि ताहिस बेशी कमालैछी । ते किछु बचत सेहो भऽजाइय आ घर एकटा होटल भऽगेल अछि तकर अनुभूति सेहो नइ होइय । घरमे अपन बाहेक आन कमे रहैय ते उधारक आश नहि रहैय । कनिञा, स्त्री आ घरवाली शब्दक अर्थ जे नहि बुझैत हुवे ओ कहियो नहि ओकर लायक भऽसकैय ।
वाथरुमसँ लऽकऽ भन्साघर धरि हम अपने करैछी मुदा सबहेकाज समय पर भऽजाइछैक । आ, अखन दिन २८ घन्टाक सेहो नहि होइछैक । एकटा आओर आश्र्यक बात सुनबैछी अहाँके; हम कपड़ा पर आइरण सेहो बड़ निकसँ कऽलैछी । शुरुवातके दू–दूटा क्रिच बनिजाइछल मुदा एखन एकदम फिट ।
डाक्टर जेहने कहैछलाह, ओहने भोजन बनालैछी । एकटा शल्लाह त अहाँके सेहो देबऽचाहब, कृप्या अहाँ सेहो तरकारीमे मिरचाइ आ नोन बेशी नहि खाउ, ई नोक्सानटा मात्र करैछ ।
हमरा साँझक समयमे पढ़के समय सेहो भेट जाइए तें हम फेरसँ कोचिङ्गमे पढ़ाबऽ सेहो लगलिए । हमर पढ़ाबऽके तरिका तऽ अहाँके बुझले अछि; कमेन्टके कोनो चान्स नहि । आ, आब आओर निक किए त एखन हमरा मेन्टल आ सेन्टिमेन्टल टर्चर नहि रहैए ।
हम खुश छि, मुदा आओर विषेश खुशीक आवश्यक्ता अछि । किछु हुए लोक कहैछ –बिना घरनि घरे नहि । बिषेश कि, बुद्धिमानकें लेल इशारा काफि होइछ ।
सदैब अहाँक प्रतिक्षामे, मात्र अहाँके
सन्तोष
ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

Suggested citation: बिपिन कुमार झा. “‘महाराज महेश ठाकुर ओ कंकाली भगवती’ ग्रन्थ समीक्षा.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 80, 2011-04-15. https://www.videha.co.in/research/2011/80/महाराज-महेश-ठाकुर-ओ-कंकाली-भगवती-ग्रन्थ-समीक्षा.htm

मूल विदेह अंक / Original issue