२.२.1.ज्योति सुनीत चौधरी- यूके मे भेल 2011 के वार्षिक मिथिला सांस्कृतिक कार्यक्रम पर एक विवरण, 2.समाचार:मीना झा
२.३.जगदीश प्रसाद मण्डल- जगदीश प्रसाद मण्डल- विहनि कथा- गुहारि
२.४.जगदीश प्रसाद मण्डल- नाटक- कम्प्रोमाइज
२.५.जगदीश प्रसाद मण्डल- कथा- मायराम
२.६.प्रभात राय भट्ट - मिथिला गर्भपुत्र
२.७.राजदेव मण्डल- उपन्यास- हमर टोल
जितेन्द्र झा
अपने घरमे उपेक्षित मिथिला चित्रकला
मिथिलाञ्चलक घरक भितमे बनाओल जाएबला मिथिला लोकचित्रकला विश्वभरि ख्याति कमओने अछि । मुदा एखत अपने भूमिमे एकरा पहिचान खोजबाक स्थिति छैक । मिथिला चित्रकलाके सरकार बेवास्ता कएने अछि, तें ई व्यवसायिक रुप नहि लऽ सकल अछि । एकर व्यावसायिक प्रबद्र्धन नहि भऽ सकल अछि ।
ग्रामीण क्षेत्रक महिलाके जीवनस्तर सुधार करबाक लेल बडका साधन भऽ सकैत अछि ई चित्रकला । कियाक त खासकऽ मैथिल ललनेक हाथमे नुकाएल रहैत अछि ई चित्रकलाक जादुगरी । आर्थिक, सामाजिक आ सांस्कृतिक समृद्धिक अथाह सम्भावना अछि मिथिला चित्रकलामे । लोकचित्रकलाके व्यवसायिक स्वरुप देलासं आर्थिक आ सांस्कृतिक दुनू लाभ उठाओल जा सकैत अछि । परम्परागत मिथिला चित्रकला जीवनक अंग अछि मिथिलामे । लोकचित्रकला संस्कारक द्योतक सेहो अछि ।
मुदा बढैत आधुनिकताक कारणे विस्तार प्रभावित भेल छैक । राज्य मिथिला चित्रकलाके एखनधरि चिन्ह नई सकल आरोप चित्रकारसभक छन्हि । नेपाल सरकार कलाके बढावा देबालेल ललितकला प्रज्ञा प्रतिष्ठान खोलने अछि । जत्तऽके प्राज्ञ परिषद्मे मिथिला चित्रकलास सम्बद्ध एक्कहु गोटे नहि अछि । ई एकटा प्रमाण मात्र अछि, आन बहुतो ठाम मिथिला चित्रकलासंग सौतिनिञा व्यवहार होइत आएल छैक । एना ललितकला प्रज्ञा प्रतिष्ठानक कुलपति किरण मानन्धर कहैत छथि जे मिथिला चित्रकलाके विशेष स्थान देने छी । मिथिला चित्रकलामे विशेष दखल भेनिहारि महिलाके स्थान देल जाएत से कुलपतिक कहब छन्हि । हिनक कथनी आ करनीमे कतेक समानता अछि, आबऽ बला दिने बताओत ।
जत्तऽ समग्र कलाक उन्नतिक बात होइक ओत्तऽ मिथिला पेन्टिङक चित्रकार नईं अछि, एकरा विडम्बने कहबाक चाही ।
मिथिला चित्रकलासं सम्बद्ध चित्रकारके उचित अवसर भेटबाक चाही । नेपाल पर्यटन वर्ष २०११ मना रहल अछि, एहनमे मिथिला चित्रकलाक मादे सेहो पर्यटकके आकर्षक कएल जा सकैत अछि । एहिबीच काठमाण्डूक बबरमहलस्थित सिद्धार्थ आर्ट ग्यालरीमे एस. सी. सुमनक मिथिला चित्रकला प्रदर्शनी मिथिला कसमस हालहि सम्पन्न भेल अछि । एहि प्रदर्शनीमे कलाप्रेमी मिथिला चित्रकलाक आधुनिक आयामसभसं परिचित भेलथि । सिद्धार्थ आर्ट ग्यालरीमे हुनक ११ म् प्रदर्शनी छल ई । मिथिला क्षेत्रक जीवनशैलीक झल्काबऽ बला चित्रकलासभ देखलासं ग्यालरी मिथिलामय भऽ गेल छल । एस. सी. सुमन मिथिला चित्रकला क्षेत्रमे परिचित नाम छथि । हिनक चित्रकलासभ बेस प्रशंसा पओलक । मिथिला चित्रकला सम्बन्धमे अध्ययन अनुसन्धानक सेहो बहुत खगता छैक । मिथिला लोक चित्रकलाक कुनो खास नियम वा सिद्धान्त नहि होइत अछि । तें ई स्वच्छन्दताक पर्याय सेहो अछि । मिथिलाक समृद्ध संस्कृतिक परिचायक सेहो अछि ।
सरकार कएलक सौतिनिञा व्यवहार
एस.सी सुमन
चित्रकार, मिथिला चित्रकला
मिथिला पेन्टिङ परम्परागत कला अछि, ई कला कोनो पाठशालामे नहि सिखाओल जाइत अछि । पीढीदर पीढी ई अपने आप सिखबाक काज होइत छैक । हमहु“ अपन दाइस“ सिखल“हु । कतउ सासुस“ पुतोहु सिखैत अछि त कखनो मायस“ बेटी । ताहि परिवेशमे हमहुं अपन दाइस“ मिथिला चित्रकला सिखल“हु ।
मिथिला पेन्टिङके अन्तर्राष्ट्रिय बजारमे बहुत माग अछि । ई त हट केक अछि । कलाकारके कलाकारितामे निर्भर करैत छैक ओकर मोल । जेना हमर पेन्टिङ १७ हजारस“ लऽकऽ ८० हजारधरिक अछि । जे सहजे बिका जाइत अछि ।
मिथिला पेन्टिङ व्यावसायिक रुप लेबा दिस उन्मुख अछि । कमर्सियल मार्केटमे देखी त सेरामिकमे, ब्यागमे कपडा आदिमे एकर प्रयोग भऽ रहल अछि । तें नीक बजार छैक एकर । ज“ अपन बात करी त जहन हम बजारमे अबैत छी त प्रदर्शनी लऽ कऽ हमरा कोनो दिक्कति नई होइत अछि ।
मिथिला चित्रकलाक विकासके जे आधारसभ अछि से किछु कमजोर भऽ रहल अछि जेना पहिने माटिक घर होइत छलै । भितके घरमे मिथिला चित्रकलाके नीक अभ्यास होइत छलै । माटिक घरक ठाममे आब क्रंक्रिटके जंगल अछि भऽ गेल । सामाजिक संस्कार आदिमे सेहो भितमे लिखबाक चलन छलै । मुदा आब बच्चा ज“ पेन्सिलस“ देबाल पर किछु लिखि दैत छैक त मायबाप डांटिदैत छैक । तें भितमे लिखबाक चलन प्रभावित भेल अछि । तैइयो तराईक मुसहर वस्ती, थारु आ झांगड जातिक वस्तीमे माटिक घरमे मिथिला चित्रकला देखल जा सकैत छैक ।
नेपाल सरकार एखनधरि किछु नई कऽ सकल अछि, मिथिला पेन्टिङके लेल । मिथिला पेन्टिङ जत्तऽ अछि अपने बुतापर, अपन स्थान अपने बनौने अछि । मिथिला चित्रकलामे लागल कलाकारसभ अपने मेहनतिस“ आगु बढल अछि । ललितकला प्रज्ञा प्रतिष्ठानके गठन करैत काल प्राज्ञ परिषद्मे मिथिला चित्रकलास“ सम्बद्ध एक्कहु गोटेके नहि राखल गेल । नामके लेल सभामे मिथिला पेन्टिङसं जुडल एकगोटेके जगह देल गेलै, बादमे विवाद भेलै आ ओहो पद छोडि देलनि । व्यक्तिगत रुपमे हमरा पुछी त राज्य मिथिला चित्रकलाक लेल ने किछु कएने अछि आ ने किछु कऽ सकैया । (सुमनकसंग कएल गेल बातचीतमे आधारित)
प्रगतिक पथपर मिथिला चित्रकला
धीरेन्द्र प्रेमर्षि
साहित्यकार
गुणँत्मक दृष्टिकोणसं सेहो मिथिला पेन्टिङमे बहुत काज भऽ रहल अछि । परम्परा आ आधुनिकता दुनूके जोडिकऽ एच.सी सुमन मिथिला पेन्टिङके आगू बढा रहल छथि । मदनकला देवी कर्ण, श्यामसुन्दर यादवसहितके व्यक्तिसभ परिमाणात्मक आ गुणात्मक दुनू तरहें मिथिला पेन्टिंगके आगू बढा रहल छथि । सुमनक पेन्टिङ आधुनिकताक आकाशमे सेहो भरपुर उडान भरने अछि मुदा धर्ती बिन छोडने, जे एकदम महत्वपूर्ण बात अछि । मिथिला पेन्टिंगके साधनाके रुपमे लऽ कऽ आगु बढनिहार सभ अपने आप आगु बढि रहल छथि ।
राज्यके दिसस“ मिथिला पेन्टिङके लेल कोनो खास काज नहि भऽ सकल अछि । राष्ट्रिय स्तरमे चित्रकारसभके मूल्यांकन करैत काल मिथिला पेन्टिङस“ जुडल व्यक्तित्वके जे स्थान आ सम्मान देल जएबाक चाही, से नहि भऽ सकल अछि । जनस्तर आ अन्तर्राष्ट्रिय स्तरमे मिथिला पेन्टिङ नीक सम्मान पओने अछि ।
देशमे मिथिला पेन्टिङके स्थापित कएल जाए । खास कऽ महिला सभ एकरा जोगाकऽ रखने अछि । मैथिल महिलासभ किशोर अवस्थेसं अरिपन लिखब शुरु करैत अछि । तुसारी पावनि आदि सभ सेहो मिथिला पेन्टिङ सिखएबाक अवसर अछि । विविध पूजा–आजाक माध्यमे ओ सभ चित्रकलामे प्रवेश करैत छथि । राज्यके दिसस“ मिथिला पेन्टिङके स्वीकार्यता बढाएब, व्यावसायीक सम्भावनाके खुला करब, एहिमे लगनिहारसभके सम्मानके वातावरण बनएबाक काज करबाक चाही । तहन ई राष्ट्रिय स्तरमे स्थापित भऽ सकत । एहिमे अन्तरनिहीत वैशिष्टय जे अछि ताहिस“ ई अपने अन्तर्राष्ट्रिय रुपमे स्थापित भ जाएत, व्यापक भऽ जाएत । ं(बातचीतमे आधारित)
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1.ज्योति सुनीत चौधरी- यूके मे भेल 2011 के वार्षिक मिथिला सांस्कृतिक कार्यक्रम पर एक विवरण, 2.समाचार:मीना झा
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ज्योति सुनीत चौधरी
यूके मे भेल 2011 के वार्षिक मिथिला सांस्कृतिक कार्यक्रम पर एक विवरण :
बहुत गर्वक बात अछि जे अपन माटि सऽ दूर रहितो यू के मे रहैवला मैथिल सब. जाहिमे बेसीतर दम्पति कार्यरत छैथ. अपन कला आ संस्कृतिके प््राति सम्मानक भाव जीवित रखने छैथ।जाहि भव्य रूपे तेसर बेरक मैथिल वार्षिक समारोह 9 अप््िराल 2011 क स्लाऊमे सम्पन्न भेल हमरा सबके अपन संस्कृतिके स्वर्णिम युगक प््राारम्भ नजदीके बुझबाक चाही।
कार्यक्रमक प््राारम्भ कल्पनाजी. जे लॉयड्स बैंकमे कार्यरत छैथ के मधुर वाणी सऽ स्वागत सम्भाषण सऽ भेल।कल्पनाजी स्वयम् भागलपुरके छैथ आ मैथिली उच्चारणमे पारंगत नहिं छैथ मुदा हुन्कर प््रायास आ अभ्यास सऽ ओ कठिन शब्दके तेहेन सहजता सऽ बजली जाहि लऽ कऽ हुन्का मिथिला के ‘कैटरीना कैफ’ कहल जा सकैत छैन। तकरबाद डॉक्टर जी डी झा सबके आर्शीवचन के संग एक भजन “जनक नन्दिनी मॉं” सुनेलखिन।पारूलके गायत्रीमन्त्र पर भरतनाट्यम् आ पारूल आ वत्सलाके ‘सुनु सुनु रसिया’ पर राधाकिसनक रूपमे नृत्य बड़ मनमोहक छल।फेर मिथिला संस्कृति पर मधुबनी ्र मिथिला पेण्टिग के माध्यम सऽ एक पावरप्वाइंट प््रोजेन्टेशन प््रास्तुत कैल गेल।फेर सबसऽ गर्वक समय छल मुख्य अतिथि आदरणीया डॉक्टर शेफालिका वर्मा जीके परिचय।
किछु डॉक्टरसब अपन अपन अवैतनिक रूपसऽ कैल गेल सामाजिक कार्य आ चिकित्सा सुविधाक अभाव. विकासक आवश्यकता आ सम्भावना पर बहुत ज्ञानपूर्ण पावरप्वाइंट प््रास्तुतिकरण केलैन। डॉ अरूण झा ह्यसेण्ट अलबन्सहृ मानसिक रोग . सामान्य चिकित्सा तथा स्त्री शिक्षा पर बजला । डॉ रीता झा सबके मोन पारलखिन जे पानि. बिजली आ पौष्टिक आहारक उपलब्धता कतेक पैघ सौभाग्य अछि।हुन्कर प््रास्तुतिकरणमे गर्भावस्थामे होयवला मृत्युक कारण पर सेहो जोर देल गेल छल।डॉ रामभद्रजी शल्य चिकित्साक कौशल्य विकास पर सेहो बजला।
अध्यक्ष डॉ अरूण झा ह्यबर्नलेहृ मैथिल साहित्यिक संस्था यूके के आर्थिक दशा पर अपन वक्तव्य देला।नब सदस्यसबहक स्वपरिचय के बाद मुख्य अतिथि अपन सुभाषण के प््राारम्भ ‘हरसिंगार’ के पंक्ति स केली जाहिमे हुन्कर नाम ‘शेफालिका’ राखैके कारण व्यक्त छल।हुन्कर भाषणमे विदेहके सबसऽ प््राचलित आ लोकप््िराय मैथिली पत्रिकाके रूपमे चर्चा भेल।कहैके आवश्यकता नहिं जे अहि पत्रिका के सम्पादक महोदयके सेहो प््राशंसा भेलैन।मुख्य अतिथिके फूल आदि उपहार देलाक बाद “विदेशमे रहै वला नबका दोसर पीढ़ी अपन संस्कृति बिसरि रहल छैथ” ताहि विषय पर वार्द विवाद प््रातियोगिता भेल।भाषा मैथिली तक सीमित नहिं छल कारण किछु बुद्धिजीवी नब पीढ़ीक लोक मैथिली बाजैमे असमर्थ छलैथ आ हुन्कर सबहक विचार बहुत महत्वपूर्ण छल।बहुत नीक विचारविमर्श छल मुदा सबहक निष्कर्ष किछु हद तक निराशाजनक छल जे ठीके हमसब अपन संस्कृति बिसरि रहल छी।मुदा अन्तमे एकटा खट्टरकक्काके प््रासंग ‘मिथिला संस्कृति’ पर हास्य नाट्य प््रास्तुत कैल गेल जाहिके संवाद बहुत तर्कसंगत आ विषय स सम्बद्ध छल।
फेर नाच गान करैलेल बच्चा सबके मिथिला पेण्टिग सऽ बनल प््रामाणपत्र देलगेल।वाद विवाद जीतनाहरके मिथिला पेण्टिग छपल टी कप देल गेल। श्रीमती माला मिश्रा. डॉ वीणा झा. डॉ विभाष मिश्र. श्रीमती अनीता चौधरी द्वारा प््रास्तुत गीत नादक कार्यक्रम सेहो बड्ड मनोरंजक छल।कविता पाठ सेहो भेल। अध्यक्ष दम्पत्ति. सचिव दम्पत्ति. कोषाध्यक्ष दम्पत्ति के संग विभाषजी सपरिवार बड्ड प््रायास केने छलैथ अहि कार्यक्रमके सफल करैमे ताहि कारणे विशेष धन्यवादक पात्र छैथ। आशा करैत छी नब अध्यक्ष आ नब सदस्यगण अकरा आर ऊपर लऽ जेता ।कार्यक्रमके चित्र लेल www.maithili.co.uk वेब साइट देखू।
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समाचार:(मीना झा)
९.४.२०११
आइ लंदनक स्लौवक ४०० वर्ष पुरान ऐतिहासिक किला बेलिस हाउस ( Baylis House , Slough ) लंदनमे मैथिल समाज ऑफ़ यु. के. केर तेसर वार्षिक समारोह भेल। एहि समारोहमे भारतसँ मुख्य अतिथि मैथिलीक सुप्रतिष्ठित लेखिका एवं मैथिलीक महादेवी वर्मा डॉ. शेफालिका वर्मा आयल छलीह।
समारोहक आरम्भ बालिका पारुल क गायत्री मंत्रपर भारत नाट्यम नृत्यसँ भेल. डॉ. विभाष मिश्र संबोधन मे मैथिल समाज केर परिचय देलनि ,डॉ.. अरुण कुमार झा (बर्नली ) अध्यक्ष मैथिल समाज , उद्घाटन भाषण केलनि 'हम सब मैथिल समाजक स्थापना संयुक्त राज्य मे बसल मैथिल सब कोना अपन संस्कृतिक रक्षा क सकी. खास कय हमर ब्रिटिश युवा वर्ग अपन देस कोस के नै बिसरैथ, हम की छी से जानैथ, अपन परंपरा अपन संस्कृति के ज्ञान हुनका रहैक ,अपने सब देखैत छी जे कतेक ब्रिटिश युवा एहि मे आय भाग ल रहल छैथ...' . डॉ. कल्पना झा समारोहक विषय मे विस्तार से सब बात कहलनि. . श्रीमती ज्योति झा चौधरी मिथिलाक टूर पर अपन प्रोजेक्ट देखोलनी ,जाहि मे मिथिलाक संस्कार संस्कृतिक झलक छल. डॉ. रीता झा अपन प्रोजेक्ट स्त्रीक स्वास्थ्य एवं स्तिथि भारत मे कोन दयनीय अवस्था मे छैक से अपन प्रोजेक्ट से जाहिर केलनि, लोग के आह्वान केलनि जे एहि स्तिथिक रोक्वाक उपाय कयल जाय..डॉ अरुण कुमार झा (लन्दन ) अपन प्रोजेक्ट मे कन्या महाविद्यालय ,जनकपुर के देखोलनी ,जाहि मे स्कूल कोना चलि रहल अछ,कोना ओहि स्कूल के कंप्यूटर आदिक सुविधा उपलब्ध करोलनी. सब स आग्रह केलनि जे हम सब जे अपन लैपटॉप सब जे कनिको ख़राब होयत छैक टकरा फेकी दैत छी, से नहि क एकठाम जमा करी ओकरा अपन देस कोस मे भेजवाक प्रबंध करी...ठसाठस भरल हॉल मे सब मन्त्र मुग्ध सन सुनि रहल छलाह..डॉ. अरुण झा क पत्नी श्रीमती मीना झा जे स्वयं मैथिली मे लिखैत छैथ पूर्ण सहयोग द रहल छलीह समारोह मे डॉ. रामभद्र झा , डॉ. कौशलेन्द्र कर्ण, डॉ. मिथिलेश झा आदि सबहक सहयोग छल. ..तकर बाद, डॉ.नूतन मिश्र क आग्रह पर डॉ. कलाधर झा मुख्य अतिथि डॉ. शेफालिका वर्मा क परिचय करोलनी-- कोना हिनकर विषय मे केरला सरकार की सब लिखने छैक,कोना हिनक कविता सब यु.के. क पाठ्य क्रम मे छैक. ...' एहि से पहिने बालिका पारुल आ वत्सला ----- राधा कृष्ण पर बड सुन्दर नृत्य नाटिका प्रस्तुत केलनि .
समारोहक दोसर सत्र खुलल आकाशक नीचा बासंती उपवन मे मुख्य अतिथि डॉ शेफालिका वर्मा के भाषण स शुरू भेल. ओ अपन भाषण मे मिथिलांचलक अतीत केर परिचय दैत,बजलीह.. विदेशक एहि भावभूमि पर अपन मिथिला देश के देखि रहल छी.मैथिल समाजक ई ओ समारोह अछ जाहि ठाम ह्रदय ह्रदय स जुडैत अछ ,बुध्धि बुध्धि स, चिंतन चिंतन स ..सब स पहिने हम अपन हार्दिक आभार प्रकट करैत छी जे अपने सब ई सम्मान हमरा देलों. हम कत्तो मिथिला मैथिली शब्द देखैत छी ते हमर मोन प्राण अद्भुद रूप स झंकृत होम लगैत अछ. अपने सब विदेश मे रही अपन समाज के नै बिसरल छी..एहि लेल अपने सब के बेर बेर नमन...
सौँसे पृथ्वी पर यदी हम घूमी आबि ते सब ठाम कत्तो ने कत्तो एक टा छोट मोट मिथिला अवस्य भेटि जायत. मिथिलाक संस्कृति,मिथिलाक संस्कार हमरा बुझने विश्व मे स्एतते कत्तो होई. वास्तव मे मिथिला आधा बिहार मे छपल अछ,लागले पडोसी देश नेपाल ते मैथिली स महामंवित अछ..पहिने दरभंगा ,समस्तीपुर मुझफरपुर ,भागलपुर स लक सहरसा, सुपौल मधेपुरा कटिहार पुरनिया सब मिथिले
थीक..कहल जैत छैक जे चारि कोस पर पानि बदले, पांच कोस पर वाणी ...यानि सब ठाम मैथिलीक उच्चआरण अपन अपन क्षेत्र क अनुसार होइत अछ..जेना विश्व भाषा अंग्रेजी के मानल गेल छैक जाहि मे कतेको स्थान के अंग्रेजी उच्चारण समाहित अछ ..हं, ई आन गप थीक जे मुझफरपुर बज्जिका बनि गेल, ते भागलपुर अंगिका के जन्म द देलक,किन्तु, सबहक ह्रदय मे मैथिलीक संस्कार ओहिना अविरल रूप से प्रवाहित होइत रहैत अछ.. , पुनः ओ विद्यापति क गीत स मैथिलीक कव्यधारक उत्पति कहैत लोकप्रिय साहित्य बनेवा मे प. हरिमोहन झा के साहित्य रचना के बड़का योगदान कहलनि....आजुक वैचारिक क्रांति , वैज्ञानिक क्रांति क उल्लेख करैत ओ कहलनि जे संचार क्रांतिक एहि युग मे सओनसे विश्व एकटा गाम बनि गेल . हम सब देशक नै वरन विश्वक नागरिक बनि गेल छी. आय दुनियाक एक कोन स दोसर कोन धरि सोझे संवाद क लैत छी..एहि से मैथिली साहित्य के बहुत फायदा भेलैक ..नेट पर मैथिली पत्रिका सब अबी लागल ,मिथिलाक खबर अबए लागल.जाहि मे मिथिला मंथन ,मैथिल मिथिला , अनचिन्हार आखर, विदेह .कॉम आदि बहुतो पत्रिका नेट पर अवैत अछिमुदा, असगरे विदेह पत्रिका जे प्रसिद्ध साहित्यकार गजेन्द्र ठाकुर क सम्पादन मे शिव कुमार झा, उमेश मंडल आदिक संयोजन मे बंगला ,उड़िया, तमिल,तेलगु, कन्नड़, ,मलयालम, गुरुमुखी आदि लिपिमे छपैत अछ. एकटा सर्वेक्षण के अनुसार २००४ स आय धरि विदेह १०७ देश के १०७२६, ठाम स ५७,००० लोग ,२००९४९९० बेर एहि पत्रिका के देख्लनी, सब स पैघ गप छैक जे नव लेखनक प्रतिभा के उजागर कयल गेल ,आ सब जाती पातिक प्रतिभा के उजागर कयल गेल . दिल्ली स मिथिलांगन , अंतिका, कोलकाता स कर्नामृत ,मिथिला दर्शन, बम्बई स मिथिला दर्पण, आसाम स पूर्वोत्तर मैथिल, पटना स समय साल, घर बाहर, झारखंड स पक्षधर आदि आदि कतेको पत्रिका बहराय रहल अछ मुदा सब टा नेट स जुडल अछ.. हम हुनका सब के कहलों जे मैथिली पुस्तक एक से एक प्रकाशित भ रहल अछि मुदा बाज़ार नै छैक. सरकार nai ते विश्व विद्यालय के भरोसे छैक. अहाँ सब पुस्तक एहि ठाम मंगाऊ आ हिन्दीक पोथी पुस्तकालय मे एहिठाम अछिमैथिलीक पोथी किएक नै....मिथिला मैथिली बहुत तरहक समस्या स ग्रस्त अछ ओकर समाधान क सेहो सोचु....
दिल्ली सरकार क मैथिली भोजपुरी अकादेमी से बहुत काज मैथिली लेल भ रहल छैक...यानी मैथिलीक चहुमुखी विकास भ रहल अछ. तैयो मिथिलांचल बाढ़ी,रौदी,दाही , बेरोजगारी आदि समस्या स ग्रस्त अछ..सब स पैघ बात ओ कहलनि जे नबका पीढ़ी अपन भाषा बिसरल जा रहल छथि देश विदेश सब ठाम ,.. ई एकटा गंभीर प्रश्न सभक सोझा मे छैक, एहेन नहि होई जे एकदिन अपन मूल गामो बिसरी जित हवाक वेग मे पानि मे हेलैत जडविहीन भाखन जकां हेलैत रही जाय...मिथिलाक नारी लेल सेहो ओ कहलनि कोना अपन अस्तित्व लेल छटपटा रहल छथि, स्त्री के सुरक्षित नै स्वरक्षित हेवाक चाही ,निर्णय लेवाक क्षमता हेवाक चाही. भाषण क अंत अपन कविता स केलनि..हमर घर कते हेरा गेल ; कतेको श्रोता क आंखी नोरा गेल .
एकर सब स मनोरंजक कार्यक्रम रहल विदेश मे रहल मैथिल बच्चा मैथिली कोना बाजत जकर बहुत नीक आ सटीक संचालन डॉ. अरुण झा ( लन्दन) केलनि. एकर आकर्षक पक्ष छल एक दिस पुरान पीढ़ी दोसर दिस नव पीढ़ी.. दुनूक समस्या आ समाधान क चेष्टा...डॉ. विभाष मिश्र ,डॉ. नूतन मिश्र आ श्रीमती ज्योति झा चौधरी तिनु हरिमोहन झा क खट्टर ककाक तरंग पर एकटा छोट सनक स्वर- रूपक प्रस्तुत केलनि ,समूचा हॉल ठाहक्का स गूंजी उठल.
एहि समारोहक विशेष आकर्षण रहल मैथिली पुस्तक आ मिथिला पेंटिंग क बिक्री ....
गीत संगीत मे श्रीमती अनीता चौधरी आ श्रीमती माला मिश्र ,डॉ. वीणा झा आ डॉ. विभाष मिश्र क गान पर समस्त हाल झूमी उठल , पुनः अंग्रेजी कविता डॉ. सीमा झा ,मैथिली कविता श्रीमती ज्योति झा चौधरी आ डॉ. शेफालिका वर्मा क कविता ,माय विलेज ' क पाठ हुनके नतिनी सुश्री अंकिता कर्ण केलनि . डॉ वंदना कर्ण मुख्य अतिथि डॉ शेफालिका वर्मा के हाथे पुरस्कार वितरण कयल गेल . सबहक समाप्ति डॉ. मिथिलेश झा क धन्यवाद ज्ञापन स भेल ....एहि समारोहक समापन क उपरांत लागले कार्यकारिणी समिति क मीटिंग भेल , जाहि मे समय पूर्ण हेवाक कारन नव कार्यकारिणी क गठन भेल .
पुरान कार्यकारिणी
अध्यक्ष ..डॉ. अरुण झा ( बर्नली ), सचिव एवं कोषाध्यक्ष - डॉ. मिथिलेश झा ,
कार्यकारिणी क सदस्य.--डॉ. रामभद्र झा, डॉ. डॉ. वंदना कर्ण , डॉ. पूनम झा , डॉ. कल्पना झा , डॉ. राजीव रंजन दास ,
वेब साईट रचयिता श्री अखिलेश कुमार
नव समिति ..
अध्यक्ष --डॉ. अरुण झा ( लन्दन )
सचिव डॉ वन्दना कर्ण ,
कोषाध्यक्ष--डॉ. मिथिलेश झा .
कार्यकारिणी क सदस्य--डॉ. विभाष मिश्र , डॉ. राहुल ठाकुर , डॉ. आलोक झा , श्री राजेन्द्र चौधरी, श्री राज झा , श्रीमती ज्योति झा चौधरी
२०१२ मे ३१ मार्च के तारीख अखन राखल गेल ऐछ अन्नुअल जेनेरल
मीटिंग के लेल.
बेसी जानवा लेले वेबसाइट www.maithili.co.uk देख सकैत छी.
.....
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जगदीश प्रसाद मण्डल
जगदीश प्रसाद मण्डल
विहनि कथा
गुहारि
कमला कातक नवटोलीक गहबर बड़ जगताजोर। सएह सुनि अपनो गुहारि करबैक विचार भेल। भाँज लगेलौं तँ पता चलल जे ओना तीनू वेरागन-सोम, बुध आ शुक्र- भक्ता भाव खेलाइत छथि मुदा शुक्र दिनकेँ तँ साक्षात् भगवतियेक आवाहन रहै छन्हि। मन थिर भेल। डाली लगबए पड़ै छै तँए ओरियौनक विचार भेल। मन भेल जे पत्नीकेँ डाली ओिरयौनक भार दियनि। मुदा बोलकेँ रोकि विचार कहलक- “देवालयक काज छी, एकोरत्ती कुभाँज भेने गुहारियो उनटे हएत। डालीक बौस बाजरसँ कीनै पड़त। मुदा सस्ता दुआरे जनिजाति उनटा-पुनटा बौसे कीन लेतीह।”
मन उनटि गेल। अपने हाथे किनैक िनर्णए केलौं।
बाजार पहुँच फुल काढ़ल सीकीक रँगर डालीक संग बेसिये दाम दऽ दऽ नीक-नीक बौस कीनलौं। मन पड़ल जे भरि दिन उपास करै पड़त। चाहो तक नै पीब सकै छी। जँ पीबैओक मन हएत तँ गोसाइ उगैसँ पहिने भलहिं पीब लेब।
तनावसँ भरि दिन मन उदिगने रहैए। ने काज करैक मन होइए आ ने कियो सोहाइए। एहेन तनाव दुिनयाँमे ककरो भरिसके हेतै।
कोन जालमे पड़ गेल छी। तहूमे एकटा रहए तब ने। जालक-जाल लागल अछि। जमीन-जत्थाक जाल, जन जाल, मन जाल, तन जाल, शब्द जाल, विचार जाल, वाक् जाल नै जानि कते जाल बनौनिहार कते जाल बना कऽ पसारि देने अछि। एक तँ ओहिना इचना माछ जकाँ लटपटाएल छी तइपरसँ जालक-जाल। गैंचीक नजरि नै जे ससरि-फसरि छछारी कटैत जान बचा सोलहन्नी जिनगी पाबि लेब। तँए नवटोलीक गहबरमे डाली लगेलौं।
गुहरियाक कमी नै। अकलबेरेसँ गुहरिया पहुँच पतियानी लगा बैस गेल। गहबरक भीतर भगत बैस धियान मग्न भऽ गेलाह। गहबरसँ उदेलित भाव भगतक हृदेकेँ कम्पित करैत। गुहारि करए बाहर निकलल। हाथमे जगरनथिया बेंतक छड़ी नेने। भगत गुहारि शुरू करैत कहलखिन- “भगत, अश्रमसँ श्रमक बाट पकड़ि चलि जाउ। आगू किछु ने हएत।”
भगतक पछाति डलिवाह कहथिन- “पाछु घुिर नै ताकब। कतबो जोगिन सभ कानि-कानि किअए ने बजए मुदा घुरि नै ताकब।”
हमरो नम्बर लगिचाइल। मुदा एक्के वाक् सुनि उत्सुकता ओते नहिये रहए जते नव वाक् सुनैक होइक। अनेरे मनमे तुलसीक विचार उठि गेल। कहने छथि जे जेकरा जंजाल रहै छै तेकरा ने चिन्ता होइ छै। जकरा नै छै?
तही बीच भगत सोझमे आबि गेलाह। पैछले बातकेँ दोहरबैत एकटा नव बात पुछलनि- “छुटि गेल किने?”
बिनु तारतमे बजा गेल- “हँ।”
विदा भेलौं। बाटमे विचारए लगलौं जे अश्रमक अर्थ कि होइ छै। मुदा कोनो अर्थे ने लागल। हारि कऽ ऐ निष्कर्षपर एलौं जे एक सोगे आएल छलौं दोसर नेने जाइ छी।
गाम अबिते टोल-पड़ोसक लोक भेँट करए आबए लगलाह। सभ एक्के बात पुछथि- “की भेल?”
किछु गोटेकेँ प्रश्ने बना कहलियनि- अश्रमक अर्थे ने बुझलौं। अहीं कहू। मुदा जते मुँह तते रँगक उत्तर भेटऽ लगल। सुनैत-सनैत मन घोर-मट्ठा भऽ गेल। पछाति जे कियो पूछथि तँ कहए लगलियनि- “जहिना छलौं तहिना छी।”
ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
जगदीश प्रसाद मण्डल
नाटक
कम्प्रोमाइज
पहिल दृश्य
(आसीन मास। रौदियाह समए)
सोनिया- अपनो नार सैध गेल। काल्हि मनोहर मामागामसँ आनए गेल। दुइयो-चारि बल्हीक ओरियान अपनो नै करब तँ माल-जालकेँ की खाइले देबै?
सुकदेव- मनमे तँ अपनो अछि मुदा छुछ हाथ थोड़े मुँहमे जाइ छै।
सोनिया- कोनो कि अन्न नै खाइ छी जे नै बुझब। मगर दुआरपर जेकरा गरदनिमे डोरी बन्हने छिऐ तेकर निमरजाना केकरा करए पड़तै।
सुकदेव- (मूड़ी डोलबैत) जेकरा पाइ छै उ आनो गामसँ कीन आनत। मुदा....?
सोनिया- मुदा कहने समए मानत। कोनो ओरियान तँ करैये पड़त।
सुकदेव- (तरहथ्थीसँ आँखि मलैत) ने एक्को मुट्ठी नार अछि, ने बाधमे घास अछि आ ने बाँसक पत्ता एक्कोटा हरियर अछि। आन साल अधियोपर तोड़ै छलौं तैयो कहुना कऽ काज चला लै छलौं। ऐबेर सेहो सभटा झड़ैकिये गेल......। देखियौ कि होइ छै?
सोनिया- ताबे ओहिना ठाढ़े रहत। दुआरपर लछमी कलपने प्रतबाए ककरो हेतै?
सुकदेव- गाममे ककरो देखबो कहाँ करै छिऐ जे दू मुट्ठी मांगियो लेब। जिनका सभकेँ बेसी होइतो छन्हि ओ तँ अपने पाछु तबाह छथि। जकरा छैहे नै ओ अपनो पैत नै बचा सकैए तँ दोसरकेँ की बचाओत। तहूमे दुइये-चारि दिनक बात रहैत तखैन ने। ऐबेर नै भेने अगिलो साल तेहने हएत।
सोनिया- छुछे सोग केने चिन्ता मेटाइ छै। जखैन दिने उनटा भऽ गेल तखैन सुनटा सोचने हएत।
सुकदेव- (वेवस) की उपाए करब। जखैन समैये संग छोड़ि देलक तखैन जीबैयेक कत्ते भरोस करब।
सोनिया- ई अहींटा बुझै छिऐ कि आउरो गोरे।
सुकदेव- की उपाए करब?
सोनिया- उपाए की करब! जेहेन समए बनल तेहेन बनि जाउ। तखने किछु पारो-घाट लागत। नै तँ......।
(सुकदेव सोनिया मुँह दिस, बघजर लागल जकाँ, टकटकी लगा तकैत सुकदेवक आँखि सोनिया पढ़ि)
चलु दुनू गोरे। मरहन्नाक जे बुट्टी-बाटी भेटत सेहो काटि लेब आ कतौ-कतौ जे चिचोर सभ छै सेहो काटि कऽ लऽ आनब।
सुकदेव- बेस कहलौं। जाबे बरतन ताबे बरतन। हाँसू नेने आउ। खोलियापर चुनौटी अछि सेहो नेने अाएब।
(सोनिया जाइत। मनचनक प्रवेश)
मनचन- भैया, जान बचाएब भारी भऽ गेल।
सुकदेव- से की?
मनचन- कलक पािन बन्न भऽ गेल। पानिये ने खसै छै।
सुकदेव- से की भेलह?
मनचन- पान-सात दिनसँ मटियाह पानि अबै छेलै। ओकरा जमा कऽ कहुना काज चलबै छलौं। काल्हिसँ ओहो बन्न भऽ गेल।
सुकदेव- दोसर कलसँ काज चलाबह?
मनचन- एहँ, कोनो कि एक्केटा कल बन्न भेल। टोलक सभ बन्न भऽ गेल।
सुकदेव- तखन पीबै की छह?
मनचन- पोखरिक पीबै छी। ओहो लटपटाएले अछि।
सुकदेव- बौआ कि करबहक। आखिर ऐ धरतीपर अपना सभ (मनुष्य) नै किछु करबहक तँ माल-जाल, चिड़ै-चुनमुनी बुत्ते हेतै। देखै नै छहक जे कते रंगक चिड़ै पड़ा गेल।
मनचन- भैया, तोरे सबहक मुँह देख जीबै छी। सबहक गति एक्के देखै छी। तामसो केकरापर करब। ऐ देहक कोनो ठेकान अछि। ने देहक ठेकान अछि आ ने देखिनिहारक ठेकान। तखैन तँ जाबे हाथ-पएर घिसिआइए घिसिअबै छी।
सुकदेव- अखैन जाह। निचेनमे कखनो गप करब। दू मुट्ठी मालक ओरियान करए जाइ छी। देखहक जे आसीन मास जकाँ एक्कोरत्ती लगै छै। अखुनका ओससँ खढ़-पातक डगडगी रहैत से केहेन उखड़ाह लगै छै।
मनचन- ऐसँ नीक ने जेठमे छेलै। जेठोसँ खरहर समए लगै छै। एकटा बात मन पड़ल।
सुकदेव- की?
मनचन- ऐसँ पैछला रौदी नमहर रहै कि छोट?
सुकदेव- तोरा की बुझि पड़ै छह?
मनचन- नमहर बुझि पड़ैए।
सुकदेव- ओ चारि सालक भेल रहए। एकरा तँ सालो नै लगलै।
मनचन- हमरा नमहर बुझि पड़ैए।
सुकदेव- दिन बीतने लोक दुखो बिसरि जाइ छै। तोरो सएह भेलह।
मनचन- नै भैया, से नै भेल। विधने मोटका कलमसँ लिख देने छथि तँए ने मन रहैए।
(मुस्की दैत)
मुदा एकटा बात कहै छिअह।
सुकदेव- की?
मनचन- हम सभ तँ जानिये कऽ गरीब छी तँए बुड़िवक छी। मुदा जेकरो महिक्का कलमसँ लिखलखिन ओहो तँ कोंकिआइते अछि।
सुकदेव- अखैन जाह। काजक बेर उनहि जाएत। एकटा बात मन राखिहह। पछुलका शताब्दीमे पच्चीसटा रौदी भेलै। एक सालक रौदी लोककेँ चारि बर्ख पाछु ठेलै छै।
(दूटा हाँसू नेने सोनियाक प्रवेश। सुकदेव चिन्तामग्न बैसल।)
सुकदेव- (स्वयं) कतऽ गेल पचास बर्खक जिनगी। पानिक दुआरे कोसी नहरि आ शक्तिक दुआरे पनिबिजली। जँ बनल रहैत तँ की औझके जकाँ मिथिलांचल वासीकेँ पड़ाइन लगितै। चिड़ै जकाँ उड़ैत-उड़ैत लोक चिड़ै बनि गेल। चिड़ै बनने मनुख-मनुख कहबैक जोग रहत। जकरा अपन बाप-दादाक बनाओल सुन्दर गाम-घर छै ओ घर-छोड़ि घुरमुरिया खेलाइए। खाइर.....।
(सोनियाकेँ देख)
तमाकुल अनलौं िक ओहो सठि गेल?
सोनिया- (मुँह चमका) सुआइत लोक कहै छै डोरी जरि गेल ऐंठन नै गेल। पेटक ओिरयान रहै कि नै रहै मुदा मुँहमे सुपारी चाहबे करी।
सुकदेव- सुपारीक मर्यादा की छै से अहीं बुझबै। सुपारी खेनाइक अंग छी जे खेलोपरान्त अतिथि-अभ्यागतकेँ विदाइ स्वरूप देल जाइ छै। सुपारीयो जोकर मान-मर्यादा जै पुरूखमे नै रहल ओहो पुरूखे भेल। हिजरोसँ बत्तर अछि।
सोनिया- बुझलौं, बुझलौं साँप फुसलबैक मनतर। (विचार बदलैत) एकटा बात पूछौं?
सुकदेव- एकटा किअए। एक हजार पूछू।
सोनिया- पेटक आशामे पेट काटि भरै छी आ घर अनैकाल टुटरूम-टुम भऽ जाइए। छोड़ि दिऔ बटाइ खेती?
(सोनियाक विचार सुनि सुकदेव ऊपरसँ निच्चाँ धरि सोनियाकेँ निहारि नजरि चेहरापर अँटका, अपन पैछला जिनगीपर दौड़बैत, अएना जकाँ देखए लगल। तड़पैत मने।)
सुकदेव- जखैन अपना धन-वित्त नै अछि तखैन....?
सोनिया- तखैन की?
सुकदेव- बटाइयो खेती केने अपन रोजगार तँ ठाढ़ केने छी। मारि-धुसि खटै छी, भरि पेट आकि आधा पेट खाइ तँ छी। जँ इहो छोड़ि देब तँ कि गोबर-गोइठा जकाँ कतौ पड़ल रहब।
सोनिया- बड़ीटा दुनियाँ छै। जतऽ पेट भरत ततऽ देह धुिन जिनगी बिताएब।
सुकदेव- ई तँ बुझै छी जे हाथ-पएर लारने कतौ पेट भरह। मुदा जे फुलबारी (गाम) बाप-दादाक लगाओल अछि, मनुक्ख जकाँ मनुक्ख बनि जीबैत एलौं, तकरा छोड़ि.....?
सोनिया- की आनठाम मनुक्ख नै रहै छै?
सुकदेव- हँ रहै छै। मुदा मनुक्ख मनुक्ख आ समाज समाजक बीच भुताहि गाछी, मरूभूमि पहाड़, समुद्र सदृश्य भाषा, काज बेवहारसँ जिनगी बदलि-बदलि गेल अछि। जइसँ एते खाधि मनुष्य-मनुष्यक बीच बनि गेल अछि। जइसँ कियो ककरो देखहि नै चाहैए। ऐहेन स्थितिमे.....।
सोनिया- कोनो कि खुटा गाड़ि सभदिन रहब जे अनेरे एत्ते माथा धुनि देहक हड्डी झकझकबैक कोन जरूरत अछि। बुझिते तँ छिऐ जे घरवाली घर लेती दाइ जेती छुछे।
सुकदेव- बाप-दादाक फुलबाड़ी ओ नै छिअनि जे मात्र समैया फुलक होय। बाप-दादाक फुलबाड़ी ओ छिअनि जइमे कुण्डली फुलक गाछक जड़िमे राखल अछि।
पटाक्षेप
दोसर दृश्य
(सुकदेव सोमन ऐठाम जाइत बाटमे...।)
सुकदेव- (उत्तेजित) पचास बर्खसँ किसान-बोनिहारक संग हमहूँ मिल कोसी नहरिक पानिसँ खेतिओ आ बिजलियोक सपना पुर्ति हएत तै आशामे रहलौं। मुदा आइ कि देखै छी? घरमे अन्न नै खेतमे पानि नै मशीनक नामो-निशान नै। यएह सोराज (स्वराज) साठि बर्खक छी। की हमसभ टकटकी लगौने मरि जय। मुदा ऐ उमेरमे कएले की हएत? भगवान बुढ़ाढ़ी दैते किअए छथिन। जँ दै छथिन तँ जीबैक जोगार किअए ने कए दै छथिन। की टकटकीसँ आँखि पथरा परान तियागि दी। उसैर रहल अछि गामक चास-बास, उसरि रहल अछि पशुधन, उसरि रहल अछि गामक खेत-खरिहान, उसरि रहल अछि गामक कला-संस्कृति।
(सोमनक घर। आंगनसँ निकलि सोमन देह खोलने कन्हापर धोती नेने नहाइले विदा भेल।)
सोमन- सबेरे-सबेरे केम्हर-केम्हर भैया?
सुकदेव- एलौं तँ तोरेसँ किछु विचार करए मुदा तोरा देखै छिअ जे कतौ जाइक सुर-सार करै छह।
सोमन- हँ भैया, कनी हाटपर जाएब। तँए धड़फड़ करै छी। मुदा जखैन आबि गेलह तँ किछु इशारोमे कहि दाए। जखैन भेँट भऽ गेलियह तखैन चुपे-चाप चलियो कन्ना जेबह?
सुकदेव- गप तँ गप छी, दोसरो घड़ी हएत। मुदा काजमे बाधा भेने तँ काज मारल जाएत। काज मरने जिनगी मरै छै। एक तँ समये तेहन दुरकाल भऽ गेल जे ओहिना सभ पटपटाइए। तहूपर जँ जोगारो बाधित हएत तखन तँ आरो तबाही बढ़त।
सोमन- गप जे कहि देने रहबह तँ रस्तो-पेरा सोचैत-विचारैत रहब। ओमहरसँ (हाट) घुरब तँ भेँट केने एबह।
सुकदेव- गप तँ नमहर अछि। मुदा तोरो बेर परक भदबा बनब नीक नै। अच्छा साँझमे भेँट हेबह किने?
सोमन- हाट जाएब अनठाइयो दैतिऐ। मुदा आइ सोमक हाट छी। कहैले तँ दूटा हाट लगै छै मुदा सोमक हाटक मोकाबला बरसपैतक हाट करतै।
सुकदेव- से की?
सोमन- सोमक हाटमे सीतामढ़ीक बेपारीसँ लऽ कऽ सुपौल फारविस गंज धरिक बेपारी अबै छै। छअ दिन ओकरा सभकेँ अबै जाइमे लगै छै। तहूमे गाए-बड़दक पएरे एनाइ-गेनाइ सेहो रहै छै।
सुकदेव- हँ, से तँ लगिते हेतै। तैओ ओही बेपारी सभकेँ धैनवाद दिऐ जे एते मेहनत करैए।
सोमन- अनठौने नै बनत भैया। बहरबैया बेपारी सभ मुइल-टुटल सभ उठा लइए।
सुकदेव- केहेन कारोवार ओकरा सबहक छै जे मुइल-टुटल सभ कीन लइए?
सोमन- छी हे औगताइल भाय-सहाएब, नै तँ सभ बात बुझा देतौं। एको मुट्ठी लार-पात नै रहने देहमे कछमछी लागल अछि। खढ़-पानिले जे हुकड़ैत देखै दिऐ तँ मन घोर-मट्ठा भऽ जाइए। ओना......?
सुकदेव- की ओना?
सोमन- बेर परक बात बजने बेसी नीक होइ छै। खाइर, कनी देरिये ने हएत। ओते लफड़ि कऽ चलि पुरा लेब। अपना गाममे हाटे ने होइए, नै तँ जीबैक एकटा बाट लोककेँ खुजि जैतै।
सुकदेव- हँ, से तँ होइतै। तोरो देरी हेतह।
सोमन- की करब भैया, चारू दिससँ घेरा गेल छी। तेहेन समए भऽ गेल अछि जे अपनो सबहक जान बचब कठिन भऽ गेलहेँ।
(दू डेग आगू बढ़ैत सुकदेव)
सुकदेव- कनी-मनी पूँजियो तोड़ि कऽ पहिने मनुक्खक जान बचाबह। बादमे बुझल जेतै।
सोमन- जाबे साँस अछि ताबे तँ आशामे हाथ-पएर लाड़बे-चाड़बे करब। अजगरो तँ अपन जिनगीक ओरियान करिते अछि।
पटाक्षेप
क्रमश:
तेसर दृश्य
(मवेशी हाट। माल-जालक संग अन्नो-पानि आ तीमनो-तरकारी।)
सोमन आ रामरूप
रामरूप- गोधियाँ, मालक मंदी आबि गेल अछि। दोसर कोनो बाटे नै सुझल तँए कनी घटो लगाकेँ बेच लेलौं। तोहर केहन रहलह?
सोमन- (मुस्कुराइत) सुतड़ल गोधियाँ। सुपौलिया बेपारी पकड़ाएल। अपन मन तँ झुझुआइते छलए।
सोमन- पौरूके तीन हजारमे बड़द कीनने छलौं। लार-पातक दुआरे अधो देह नै छलै। मनमे छलए जे पाँच बरख मारि-धुसि जोतबो करब आ तेकर बादो बेचब तैयो दाम आबिये जाएत मुदा की कहबह खूट्टा उसरन भऽ गेल।
रामरूप- अही दुआरे हमहूँ बेच लेलौं। तेहेन धन छलै जे मनसँ नै जाइ छलए मुदा रखबो करितौं तँ खाइले की दैतिऐ? महीना दिनसँ कपैच-कुपैच कऽ खाइले दै छेलिऐ। मुदा परसू आबि कऽ ओहो सैध गेल। गठूला घर उछेहलौं जे दू दिन चलल।
सोमन- घर उछेह खुआ लेलह तँ फेर घर?
रामरूप- खूट्टापर जेकरा बान्हि कऽ रखने छेलिऐ ओकरा जे अधो पेट खाइले नै दैतिऐ से केहेन होइत। जखने थैरमे जाइ छलौं आकि हुकड़ए लगै छलए। ओकर कलपैत मन देख अपनो मन कलैप जाइ छलए। तँए सोचलौं जे बरसात तँ अगिला साल आओत, बुझल जेतै।
सोमन- (मूड़ी डोलबैत) हँ से तँ ठीके। जैठीन एक दिन पार लगनाइ कठिन अछि तैठीन साल भरि आगूक सोचब बूड़िबक्किये ने हएत।
रामरूप- आब तँ गामे चलबह किने?
सोमन- हँ। चलब तँ गामे मुदा एकटा काज पछुआएल अछि। चलह एक फेरा लगाइयो लेब आ आधमन चाउरो कीन लेब।
रामरूप- मन तँ हमरो होइए। मुदा मालक पएरे एलौं से थाकि गेलौं। मोटरी उठबैक साहसे नै होइए।
सोमन- यएह हद करै छह तोहूँ। चलह ने कोनो दोकानपर बैस जलखैइयो चाह करब आ दस मिनट जिराइयो लेब। बुझै छहक जे कहुना पाँच रूपैया किलो सस्ता भेटतह।
(चाहक दोकान। बेंचपर चाउरक मोटरी रखि रघुवीर सेहो बैसल)
रामरूप- कनी मोटरी घुसका लिअ। की छी मोटरीमे भाय?
रघुवीर- की रहत। चाउर छी। आब िक कोनो भात खाइ छी कि दिन घीचै छी।
रामरूप- से की?
रघुवीर- अपना सबहक जे अगहनी चाउरक सुआद आ मस्ती छै से थोड़े ऐ चाउरमे छै। तखन तँ अपन हारल......।
रामरूप- की भाव देलक?
रघुवीर- तँए, कनी मन मानलक। अगहनी चाउरसँ पाँच रूपैया सस्ता अछि।
रामरूप- तब तँ गोधियाँ अपनो सभ अध-अध मन कऽ लऽ लेब, से नीके?
सोमन- हमहूँ तँ यएह सोचि कऽ कहलियह। अखन जदी कनी भीरे हएत तँ तीन दिनक सिदहामे चारि दिन कटि जाएत।
रामरूप- हम सभ पछुआएल छी तै बीच सठतै ते ने भाय?
रघुवीर- से कि अद्दी-गुद्दी बेपारी छी। पाँच गो ट्रक भिड़ौने अछि। मुदा खड़तुआ जकाँ लेबाल ढेरिअाएल अछि।
रामरूप- (मोटरी दिस देख) तरजू देखै छी। अहूँ कोनो चीज बेचैले अाएल छलौं?
रघुवीर- हँ। तरकारी उपजेबौ करै छी आ हाटमे बेचबो करै छी। भगवान दसे कट्ठा खेत देने छथि। ओकरे बीचमे कल गरा देने छिऐ आ बारहो मास तरकारीये उपजबै छी।
रामरूप- सभ किछु बिक जाइए?
रघुवीर- (कनी ठमकि) हँ बिक तँ जाइए मुदा.....?
रामरूप- मुदा की?
रघुवीर- यएह जे तेहेन चिक्कनिया लेबाल सभ भऽ गेल अछि जे चीज चिन्हबे ने करैए।
रामरूप- से की?
रघुवीर- की कहब। लहटगर देख चीज कीनैए। कीड़ी-फतिंगीक बेसी दवाइ हम नै दै छिऐ। तैसँ देखैमे समान कनी दब रहैए।
रामरूप- अहाँ किअए नै दवाइ दै छिऐ?
रघुवीर- अपनो खाइ छी किने। देखैमे ने दवाइ देल नीक लगैए मुदा जहरक अंश ओइमे रहिये जाइ छै किने। मुदा भगवान हमरो दिस देखै छथि?
रामरूप- से की?
रघुवीर- अखनो एहेन कीनिनिहार छथि जे हमरे चीजकेँ पसिन्न करै छथि। दू-पाइ महगे विकाइए। अहाँ सभ कतऽ आएल छलौं?
रघुवीर- (मिड़मिरा कऽ) की कहब भाय, रौदीक मारल डिरिआइ छी। बड़द-गाए बेचए आएल छलौं। खुट्टा उसरन भऽ गेल।
रघुवीर- (मूड़ी डोलबैत) दोसर उपाइये कि अछि। तेहेन दुरकाल समए भऽ गेल अछि जे लोकोक प्राण बँचव कठिन भऽ गेल अछि तैठाम माले-जाल गेल किने। पहिने मनुक्खक जान बचाउ। तखन बुझल जेतै।
रामरूप- अहाँ तँ हाटक तरी-घटी बुझैत हेबै। कहू जे एते-एते दूरसँ जे बेपारी सभ अबैए, से कना पार लगै छै?
रघुवीर- एकरा सबहक भाँज बड़ भारी छै। बड़का-बड़का बेपारी सभ छी। चरि-चरि, पॅच-पॅच बएच बनौने अछि। गामसँ हाट आ हाटसँ गाम एक बट्ट केने रहए। अड्डा बना-बना कारोबार पसारने अछि।
रामरूप- एकरा सभले रौदी-दाही नहिये छै।
रघुवीर- (अचंभित होइत) रौदी-दाही! हद करै छी अहूँ। सदिखन घैलापर पाइ चढ़ौने रहैए। जेना अपना सभले रौदी-दाही जनमारा छी तेना एकरा सबहक अगहन छी। एकबेर रौदी-दाही पौने सेठ बनि जाइए।
पटाक्षेप
चारिम दृश्य
(नसीबलालक घर। दरबज्जाक ओसारक कुरसीपर आँखि मूनि किछु सोचैत सोमनक संग सुकदेव अबैत)
सुकदेव- नीन छी यौ भाय?
(सुकदेवक बात सुनि आँखि ओलि धड़फड़ा कऽ)
नवीसवलाल- नै! नै! सुतल कहाँ छी। समैक फेरीसँ चिन्तित भऽ गेल छी। खेलहो अन्न देहमे नै लगैए। एक दिस जहिना पियास मेटा गेल तहिना आँखिक नीन्न सेहो। धैनवाद अहीं सभकेँ दी जे एहनो दुरकालमे हँसी-खुशीसँ जीबै छी।
सोमन- हद करै छी भाय! राँड़ कानए अहिवाती कानए तै लागल बरकुमारि कानए।
नसीवलाल- तोहर बात कटैबला नहिये छह सोमन मुदा......?
सोमन- मुदा की?
नसीवलाल- ओना, जे जते पछुआएल अछि ओ ओते समस्यासँ गरसित अछि। मुदा प्रकृतक विपैत सभपर पड़ै छै। तहूमे जे जते अगुआएल रहैए ओकरा ओते बेसी पड़ै छै।
सोमन- हँ, से तँ पड़िते छै।
नसीवलाल- बौअा, ओना तोहर उमेरो कम छह। एक गाममे रहितो कम सम्पर्कमे रहै छह। सुकदेव भाय बतरिया छथि। तहूमे बच्चेसँ दुनू गोरे गामसँ जहल तक संगे रहलौं। मुदा.....?
सोमन- मुदा की?
नसीवलाल- यएह जे आब बुझि पड़ैए जे जिनगिये ठका गेल।
सोमन- से की?
नसीवलाल- की कहबह आ कते कहबह। एकटा कोसिये नहैरिक बात सुनह। जहिया जुआने रही तहियेसँ कहै छिअह। बड़ लिलसा रहए जे कोसी नहैर बनत। डैम बनतै। नहरिक पानिसँ खेत पटत आ डैममे पनिबिजलीक यंत्र बैसतै। जैसँ तते बिजली हएत जे घर-दुआरक इजोतक संग करखन्नो चलत। मुदा सभ आशापर पानि हरा गेल। आइ जौं बिजली रहैत तँ गामो बजारे जकाँ भऽ गेल रहैत। मुदा......?
सोमन- मुदा की?
नसीवलाल- यएह जे ई बात मनसँ मेटा गेल छलए जे एहेन रौदीसँ भेँट हएत। मुदा.....!
सोमन- मुदा की?
नसीवलाल- अपन संग-संग गामोक कल्याण भऽ जाइत। खेती-पथारीक संग एते छोट-पैघ करखन्ना बनि गेल रहैत जे बेरोजगार ककरा कहै छै से तकनौसँ नै भेटैत। मुदा आइ देखै छी जे गाम-गामक लोक उजहि दिल्ली, कलकत्ता चलि गेल।
सोमन- हँ। से तँ भेल। मुदा माटियो फाँकि कऽ तँ मनुख नहिये रहि सकैए। जतऽ पेट भरतै ततऽ ने जाएत।
नसीवलाल- कहलह तँ बेस बात। मुदा गाम ताबे नै हरियाएत जाबे गामक बच्चा-बच्चा ठाढ़ भऽ अपन भविस दिस नै ताकत।
सोमन- एहेन समए भेने लोक केना ठाढ़ हएत?
नसीवलाल- सएह ने मनकेँ नचा रहल अछि। सभ माए-बाप बेटा-बेटीपर आशा लगौने रहैए जे हमरासँ नीक बनि धीया-पूता गुजरो करत आ नीक जकाँ आगूओ बढ़त। मुदा आँखि उठा दुनियाँ दिस तकै छी तँ चौन्ह आबि जाइए। बाल-बच्चाक कोन गप जे अपने बुढ़ाढ़ी भरिसक कनिते कटत।
सुकदेव- वएह बात मनमे औंढ़ मारलक भाय, तँए एलौंहेँ।
नसीवलाल- भाय, कि विचार करब। छुछ हाथ मुँहमे दैए कऽ की हएत। ने कियो गाम-घरक महौत बुझैए आ ने अपन शक्तिक उपयोग करए चाहैए। सभ अपन अमूल्य श्रम-मेहनत- दोसराक हाथे बेच बजारक चकचकीमे बौआइ-ए।
सुकदेव- यएह सभ देख ने मन उछटि गेलहेँ। मुदा ककरा कहबै, के सुनत। अहाँ तँ गुल्ली-डंटासँ अखनि धरिक संगी छी। जे तीत-मीठ भेल तैमे तँ दुनू गोरे संगे छी।
नसीवलाल- (चानि परक पसेना पोछैत) जहिना माटिक ईंटाकेँ वएह माटि पानिक संग मिल जोड़ि-साटि- दैत अछि तहिना ने मनुक्खोकेँ सिनेह साटि दैत अछि। मुदा सिनेह आओत केना? एक दिस धनक भरमार दोसर दिस भूखल पेट। तै बीच चोर-उचक्काक सघन बोन। केना लोकक परान बँचतै?
सुकदेव- सोझे चिन्ते केनौ तँ नहिये हएत। नै भगलाहाले तँ गामोमे रहनिहारले तँ सोच-विचारए पड़त। जँ से नै करब तँ एक लोटा पानि आ एकटा काठियो मुइलापर के देत।
नसीवलाल- भाय, जहिया घोड़-दौड़ करैबला छलौं तहिया तँ करबे ने केलौं, आब आइ बुढ़ाढ़ीमे की हएत? किछु करए लगै छी तँ हाथ-पएर थरथराए लगैए। जैसँ बुझलो काजमे धकचुका जाइ छी।
सुकदेव- भाय, असे तँ जिनगीक संगी छी। जै संग लोक जिनगीक रस चुसैत अछि। तेकरो छोड़ि देब......?
नसीवलाल- (सुकदेवपर आँखि गरा मूड़ी डोलबैत) भाय कहै तँ छी लाख टकाक गप। अपनो जोकर नै सोच-विचार करब तँ अकाल मरबो तँ नीक नहिये छी।
सुकदेव- नीक अधला कतऽ छै भाय! भलहिं लोक अपना जिनगीकेँ स्वार्थी बुझे मुदा जाबे धरि अपने निरोग नै रहब ताबे धरि दोसराक विषयमे कि सोच आ कि कऽ सकै छी।
नसीवलाल- हँ, से तँ ठीके। विचारोकेँ प्रभावित तँ जिनगिये करैत अछि। नीक-नीक भाषणे करब आ अपन चालि छुतहरक अछि तँ ओइ भाषणक महौते की? जहिना विज्ञान सिद्धान्त-थियोरीक- संग व्यवहारो-प्रेक्टिकलो- कऽ कऽ देखबैत अछि तहिना ने नीतिशास्त्र सेहो अछि।
सुकदेव- अखन धरि यएह बुझि ने जीबैत एलौं, मुदा.......?
नसीवलाल- हँ, समैक चक्र तँ प्रवल अछिये मुदा एहेन प्रबल तँ नै अछि जेकरासँ सामना नै कएल जा सकैत अछि। जीता-जिनगी हारियो मानि लेब, ओहो तँ......?
सुकदेव- हँ, से तँ उचित नहिये अछि। मुदा समनो तँ.......?
नसीवलाल- हँ, कठिन अछि। मुदा लंका सन राक्षसक बीच हनुमान केना.......?
सुकदेव- हँ, तहिना।
नसीवलाल- (अपसोच करैत) पाछू घुरि तकै छी तँ बुझि पड़ैए जे जरूर चूक भेल। जना कोसी नहरि आ पनिबिजली लेल सामािजक स्तरपर ठाढ़ भेलौं तेना व्यक्तिगत जीवनक बाट छुटि गेल।
सुकदेव- से की?
नसीवलाल- यएह जे जना मध्यम किसान छी। अपना खेत अछि। तेना ने खेतमे पानिक ओरियान केलौं आ ने परिवारो जोकर मशीन। जौं से केने रहितौं तँ भलहिं महग काज होइत मुदा जीबैक बाट जरूर धरौने रहैत।
सुकदेव- जखन चारि पएरबला हाथी चूकि जाइए तखन तँ मनुख दुइये पएरबला अछि। जै समए जे चूक भेल, आइ ने ओ समए बँचल अछि आ ने जिनगीक ओ अंश।
नसीवलाल- अखन धरि तँ हाले-चालमे समए निकलि गेल। काजक गप तँ छुटिये गेल। किमहर आएल छलौं?ऽ
सुकदेव- भाय, अहाँसँ नुकाएल नहिये छी। अखन तक जे जीबैक आस बटाइ खेत अछि ओ टुटि गेल। खेतबलाकेँ तँ खेत रहबे करै छन्हि मुदा बटेदारकेँ घरोक आँटा गील भऽ जाइ छै।
नसीवलाल- दुर्भाग्य अछि भाय।
सुकदेव- जकरा सोन छै ओकरा पहीनिनिहार नै छै आ जे पहीरिनिहार अछि ओकरा सोन नै छै।
नसीवलाल- से तँ अछिये। गामक बारहआना खेत नोकरिहाराक अछि। जे खेती नै करैत अछि। जखन कि बारहआना लोक खेतीपर जीबैत अछि। मुदा कोन दुख एहेन छै जेकर दवाइ नै छै।
सुकदेव- भारी बनर फाँसमे पड़ि गेल छी। अखन तक खेती छोड़ि दोसर लुरि नै सीखलौं। खांहिसो नै भेल। घरसँ बाहरो जाएब से कोन लुरि लऽ कऽ जाएब। भीख मांगि खाइसँ नीक अन्न-पानि बेतरे घरमे प्राण तियागि देब हएत। अगदिगमे पड़ि गेल छी।
नसीवलाल- अहूँसँ बेसी तँ अपने पड़ि गेल छी। अहाँ तँ नै ऐ गाम ओइ गाम जा कऽ कमाइयो-खा सकै छी मुदा.....।
सुकदेव- यएह बात मनमे अहुरिया काटि रहल अछि। जहिना संग-मिल एते दिन कटलौं तहिना आगूओ केना कटत, तेकर......?
नसीवलाल- कनितो जीब। सेहो नीक नहिये।
(कर्मदेव आ सोमनक प्रवेश)
नसीवलाज- भाय, मन तँ अखनो तेहेन हुड़कैए जे शेष जिनगी जहलेमे बिताएब मुदा बुढ़ाढ़ी.....। नवतुरियामे समाजक प्रति कोनो रूचिये नै अछि। रूचियो केना रहत। तहिना परचा पोस्टरमे परिवारक परिभाषा दैत अछि तहिना समाजक कोन बात जे माइयो-बापकेँ परिवारसँ लोक अलगे बुझैए।
कर्मदेव- काका, हमहूँ सएह पुछए एलौं जे एहेन समैमे घरसँ बिना भगने केना जीब?
नसीवलाल- बौआ, तोरे सभपर समाजक दारो-मदार अछि। मुदा जखन तोंही सभ चिड़ै जकाँ उड़ि पड़ा रहल छह तखन तँ समाजक-गामक- भगवाने मालिक।
सोमन- ककरापर करब सिंगार पिया मोरा आन्हर हे।
कर्मदेव- काका, जँ जीबैक बाट भेट जाएत तँ किअए भागब?
नसीवलाल- बौआ, तूँ तँ पढ़ल-लिखल नौजवान छह। तोरामे एते शक्ति छह जे किछु कऽ सकै छह। आशा जगाबह।
कर्मदेव- अखुनका समैसँ जे अपन तुलना करै छी तँ बुझि पड़ैए जे करिया बादल लटकल भादोक अमवसियाक बारह बजे रातिक बीच पड़ल छी।
नसीवलाल- पढ़ि-िलखि कऽ एते निराश किअए छह?
कर्मदेव- बुझि पड़ैए जे एहेन पढ़ाइ पढ़ि लेलौं जे ने घरक रहलौं आ ने घाटक।
नसीवलाल- ओना जीबैक बाट व्यक्ति-विशेष सेहो बनबैए आ बना सकैए। मुदा समाजकेँ बनने बिना जहेन हेबाक चाही से नै बनि सकैए। तँए बेगरता अछि जे दुनू संग-संग बनए। जइले तोरे सन-सन नवयुवक अपेकछा अछि। फाँड़ बान्हि मैदानमे कुदए पड़तह।
कर्मदेव- कियो तँ काजे देखि ने फाँड़ बान्हत?
नसीवलाल- (अर्द्ध हँसी हँसि) अइले समाजकेँ जगबए पड़तह। जखने समाज नीन तोड़ि सुनत तखने ओछाइन समेटि घरसँ बहरा रस्तापर आबि ठाढ़ भऽ जाएत। जखने ठाढ़ हएत तखने नव सुर्जक रोशनीमे अतीतक गौरव देखत।
कर्मदेव- की गौरव?
नसीवलाल- मिथिला दर्शनक गौरव देखैक लेल ओकर बनैक प्रक्रिया देखए पड़तह। संयुक्त परिवार बजनहि नै, बनैक आ चलैक ढंग घड़ए पड़तह। जहिना कोनो बाट कोनो स्थान धरि पहुँचबैत तहिना मिथिला दर्शन छी।
कर्मदेव- की दर्शन?
नसीवलाल- एते धड़फड़मे नै बुझि सकबहक। अखन हमहूँ औगताएल छी। मालो-चाजकेँ पानि नै पीयेलौंहेँ, हुकड़ैए।
कर्मदेव- तखन?
नसीवलाल- सौंसे समाजक बैसार ब्रह्मस्थानमे करह। सबहक विचारसँ एकटा रास्ता ताकि आगू डेग उठाबह।
कर्मदेव- आइये बैसार करब।
नसीवलाल- एते अगुतेने काज नहि चलतह। कौल्हुका समए बना काने-कान सभकेँ जना दहुन।
कर्मदेव- बेस।
पटाक्षेप।
पाँचम दृश्य
(बेरक समए। परतीपर बैसार।)
सुकदेव- (उठि कऽ) भाए-बहिन लोकनि, जते दिन अपना सबहक अजादीक भेल ओतेक उमेर हमरो भेल। किएक तँ कोसी नहरि लेल नसीवलाल भाइक संग सरकारी आॅफिसमे करीब पचास बर्खसँ धरना, प्रदर्शन सभाक संग जहलो जाइत-अबैत रहलौं। जे रौदी बिसरए लागल छलौं आ आशा एते जगि गेल छल जे रौदीसँ भेँट नै हएत। मुदा अइबेरक रौदी सिखा रहल अछि जे सभ केलाह पानिमे चलि गेल। जहिना सबहक जान अवग्रहमे पड़ल अछि तहिना तँ अपनो भऽ गेल अछि।
सोमन- (बैसले-बैसल) करबो तँ पानिये ले ने केलौं। पानि ले केलहा पानिमे गेल।
नसीवलाल- (ठाढ़ भऽ) लंगोटिया संगी सुकदेव भाय छथि। बच्चेसँ दुनू गोरे संगे रहलौं। दुनू गोटेक बीच अंतर एतबे अछि जे हमरा अपन खेत अछि आ हुनका अपन नै छन्हि। मुदा करै छी दुनू गोटे खेतिये। अपना खेत रहितौ आशा-आसीमे रहि गेलौं। तै बीच जिनगी ससरि गेल।
सोमन- एक दिस नहरि खुनाइ होइए आ दोसर ढहि-ढहि भरैए। बीचमे सरकार मदारी-नाॅच पसारने अछि।
नसीवलाल- खेतीले पानि ओहन जरूरी अछि जेहने मनुक्ख आ माल-जाल ले। बिना पानिये खेती भइये नै सकैए। जै हिसावसँ नहरि खुनाइ शुरू भेल जौं खुना गेल रहैत तँ अपना सभ बहुत अगुआ गेल रहितौं। मुदा की देखै छी?
कर्मदेव- कनी फरिछा कऽ कहियौ काका?
नसीवलाल- (हँसैत) बौआ गामक बात बड़ नमहर अछि तँए ओते नै कहि अपन बात बजै छी। दस बीघा जोत जमीन आ बाँकी गाछ बेख, खरहोरि इत्यादिमे बरदाएल अछि। बाहर मासक सालमे तीनटा मौसम जाड़, गरमी, बरसात होइए। मौनसुनी बरखासँ बरसातमे काज चलैए। बाँकी सालक आठ मास (दू मौसम) ओहिना रहैए।
सोमन- गोटे-गोटे बेर झाँटो आ पथरो खसैए।
नसीवलाल- हँ, हँ, सेहो होइए। अपन देश मूलत: किसानक देश छी। खेती-पथारी मूल्य व्यवसाय छी जे अदौसँ अखन धरि चलि अबैत अछि। समैपर बरखा भेल तँ किसानक मन हरियाएल रहल नै तँ सालो भरि मरचुन्नी रहल। प्रश्न अछि पान खाएल मुँह मुस्कियाइत रहए। जइठीन लोक पानिक जोगार केने अछि ओइठीन हरियरी अछि। उन्नतिक रास्ता पकड़ि आगू मुँहेँ ससरि रहल अछि। खेतक बले रंग-विरंगक करखन्नो ठाढ़ केने अछि। अपना सबहक जड़िये सुखाएल अछि तँ ऊपर केना पोनगत?
कर्मदेव- समस्या तँ भारी अछि?
नसीवलाल- जुगक अनुकूल भारी नै अिछ। किएक तँ आइ हम सभ ओइ जुगमे पहुँच गेल छी जइ जुगमे एहेन-एहेन समस्या धीया-पूता खेल सदृस अछि। मुदा.......?
कर्मदेव- मुदा की?
नसीवलाल- मुदा यएह जे जेकरा हाथमे काज करैक भार छै ओकर नेते भंगठल छै। कोन काज केना हएत तइ दिस नजरिये नै छै। नजरि छै जे कोन-काज केना दुइर हएत तइ दिस।
कर्मदेव- तखन की करब?
नसीवलाल- अखन बहुत बात बजैक समए नै अछि। जइ काज ले सभ एकठाम बैसलौं तइपर विचार करू। गामक लोक आ गामक सम्पत्तिमे केना संबंध स्थापित हएत तइपर िवचार करू।
कर्मदेव- हम सभ तँ नवतुरिया छी नीक-नहाँति नहिये बुझै छी तँए कनी अपने रस्ता बता दियौ?
नसीवलाल- अखन इतिहास-भूगोल देखैक काज नै अछि। अखन एतबे विचार करैक अछि जे गाममे जते जमीन अछि आ जते लोक छी ओकर हिसाब बुझैक। बारह आना जमीन हुनकर छन्हि जे खेती छोड़ि अन्तए जा नाैकरी करै छथि। चारि आना गाममे रहनिहारकेँ छन्हि। हुनके सबहक जमीन लोक बटाइ कऽ कऽ कोनो धरानी जीबै छथि। तँए जरूरी अछि ऐ खाधिकेँ भरैक। जाबे से नै हएत ताबे समस्या बनले रहल।
(कहि बैस जाइत)
कर्मदेव- बेरा-बेरी अपन-अपन विचार रखै जाइ जाउ?
सोमन- कहैले हमहूँ किसाने छी मुदा ने अपना खेत अिछ आ ने हर-बड़द। जनेपर हरो कीनै छी आ अनके खेतमे खेतियो करै छी। जेना-तेना जिनगी घिसियबै छी। आगू-पाछूक बात सेहो नहिये बुझै छी। तँए अपने-लोकनिक जे विचार हएत ओइसँ बहार हमहँू नै रहब।
(सोमन बैस जाइत। आभा उठि कऽ ठाढ़ होइत)
आभा- (जोरसँ) जँ देश अपन छी तँ देशक सम्पत्तियो अपन छी। जरूरत अछि सबहक-सुख-दुखमे सबहक भागीदारीक। जे गाममे रहि खेत जोतै छथि गामक खेत हुनका जिम्मा हेबाक चाही। जँ से नै हएत तँ जहिना मार-काटसँ इतिहास भरल अछि तहिना नव पन्ना आरो जाड़ाएत?
शान्ती- आभा बहिनक बात कटैबला नहिये छन्हि किएक तँ साले-साल पनरह अगस्तकेँ हमहूँ सभ स्वराजक झंडा फहराबै छी। मुदा की स्वराज अछि? मुदा समाजक सदस्यक संग सरकारक अंग सेहो छी तँए शान्तीसँ सभ काज करैत चलू। नसीवलाल कक्का आ सुकदेव कक्का जहिना उमेरगर छथि तहिना अनुभवी। तँए जेना-जे विचार दथि हम सभ ओ करी।
सुकदेव- जेहने नवकवरिया आभा छथि तेहने शान्ती। मुदा दुनूक विचार सुनि हृदए शान्त भऽ गेल। खुशीसँ मन भरि गेल। सबहक विचारसँ एकटा रास्ता तँइ हुअए। जेकरा मानि सभ आगू बढ़ी।
नसीवलाल- दौड़-बड़हा करैबला उमेर तँ नहिये अछि मुदा मेहौता बड़द जकाँ संग-संग बहैले तैयारे छी। अखन गाममे पढ़ल-लिखल नौजवान कर्मदेव अछि। चाहब जे दौड़-धूप करैक भार ओकरे देल जाए।
कर्मदेव- जँ समाज भार देताह तँ जहाँ धरि सकब इमानदारीसँ सम्हारब।
नसीवलाल- जते नोकरिया छथि हुनकासँ सम्पर्क कऽ सभ बात कहियनु। समाजक िनर्माण सभ मिल करब, सर्वोत्तम।
पटाक्षेप
छठम दृश्य
(कृष्णदेवक डेरा। सूर्यास्तक समए। पनरह बर्खक बेटा दिनेश आ तेरह बर्खक बेटी सुधा दरवज्जापर बैस परीक्षाक गप-सप्प करैत।)
सुधा- भायजी, अहाँ सबहक परीक्षा तँ लगिचा गेल?
दिनेश- हँ। अगिला महीना आठ तारीखसँ हएत।
सुधा- सुनै छी, अइबेर चोरि-तोरि नै चलत?
दिनेश- चोरि बन्न भेनाइ ओते असान अछि जे नै चलत। भलहिं सेन्टरपर नै होउ मुदा आरो जगह बन्न हएब साधारण अछि।
सुधा- (जिज्ञासासँ) आरो ठाम होइ छै?
दिनेश- होइ छै भेला जकाँ खूब होइ छै। जएह भोजैतनी सहए चटैतनी। जेकरे उपर चोरि रोकैक भार छै सएह सभ करैए। जेकरे फलाफल छी जे नीक विद्यार्थीक रिजल्ट अधला होइ छै। आ अधला विद्यार्थीक रिजल्ट नीक होइ छै।
सुधा- से एना किअए होइ छै?
(कृष्णदेवक प्रवेश)
दिनेश- हम तँ सभ बात बुझबो ने करै छी पापाकेँ सभ बुझल हेतन।
सुधा- पापा, परीक्षामे चाेरि कतऽ-कतऽ होइ छै?
कृष्णदेव- बुच्ची, ओना पुछलह तँ कहबे करबह। मुदा अधला गप सुनैमे समए नहिये लगावी, सएह नीक।
सुधा- जँ अधला गप नै सुनब तँ फेर नीक-अधला बुझबै केना?
कृष्णदेव- (मुस्की दैत) कहलह तँ ठीके। देखहक ओना लोक परीक्षाकेन्द्रपर जे किताब-चिट-पुरजी लऽ कऽ लिखैए ततबे बुझै छै। मुदा ऐ सभसँ नमहर-नमहर चारि दोसर होइए। जखन कापी एकत्रिक भऽ परीक्षक ओइठाम पठौल जाइ छै तखन कापी बदैल-बदैल लेल जाइए।
सुधा- नै बुझलिऐ। कनी नीक जकाँ फरिछा कऽ कहियौ?
कृष्णदेव- परीक्षाभवनसँ बाहर काँपी लिखाइत अछि आ जमा करैकाल बदलि लेल जाइत अछि।
सुधा- (आश्चर्यसँ) तखन तँ ओकरा बहुत नम्बर अबैत हेतै?
कृष्णदेव- अबिते अछि। कोनो कि एतबे होइए। एकर उपरान्तो जइठाम काँपी जमा होइए आ मार्क-सीट तैयार होइए असली करामात तइठीन होइए। बनियाँक कारोवार जकाँ रूपैयाक बरखा होइए।
सुधा- तखन तँ रूपैयेबलाक विद्यार्थीक रिजल्ट नीक होइत हेतै?
कृष्णदवे- होइते अछि।
(कर्मदेवक प्रवेश)
कर्मदेव- गोड़ लगै छी कक्का।
कृष्णदेव- नीके रहह। गाम-घरक की हाल-चाल छह?
(भीतरसँ कृष्णदेवक पत्नीक अबाज- गौआँ-घरूआ दुआरे रहब कठिन भऽ गेल। ककरो असपतालक काज होउ, आकि कोट-कचहरीक दौड़ल चलि आएत। जना सबहक तोरा एतै गारल होइ।
कान घुमा कर्मदेव सुनि ग्लानिसँ भरि गेल। मुदा समाजक प्रतिनिधि बुझि सभ सहैक लेल तैयार।)
कर्मदेव- काका, आइ धरि एहेन रौदी नै देखने छलौं। ओना उमेरे कते अछि मुदा जहियासँ गियान-परान भेल तहियासँ एहेन समैसँ भेँट नै भेल छलए।
कृष्णदेव- (सुधासँ) बुच्ची कर्मदेव भाय एलखुन। चाह नेने आबह।
(दुनू भाए-बहिन जाइत अछि)
कर्मदेव- अपना दिसक कि हाल-चाल अछि?
कृष्णदेव- नीक नहिये कहक चाही। तखन तँ कौबलाक छागर बनल छी। कखनो काल सोचए लगै छी तँ लाज हुअए लगैए जे एते दरमाहा पावियो कऽ पेंइच-उधार करए पड़ैए।
कर्मदेव- किअए?
कृष्णदेव- छअ-छअ मासक दरमाहा पछुआ जाइए। मुदा घरक खर्च तँ हेबे करैए। एते दिन मकानक पाछू तबाह छलौं मुदा पैछला महिना निवृत्ति भेलौं।
कर्मदेव- बड़का चिन्ता पाड़ केलौं।
कृष्णदेव- की पाड़ केलौं। आगू दिस तकै छी तँ ओहूसँ नमहर-नमहर चिन्ता घेरने अछि।
कर्मदेव- से की?
कृष्णदेव- दू बर्खक बाद बेटाकेँ मेडीकलमे नाअों लिखाएब तइपरसँ बेटी सेहो विआहे जोकर भइये जाएत।
कर्मदेव- हँ, से तँ हेबे करत।
कृष्णदेव- पढ़ौनाइ-लिखौनाइ आब हल्लुक रहल। लाखक तँ कोनो मोजरे नै छै। अपन कमाइ हजारमे अछि आ खर्च लाखमे अछि तखन चिन्ता किअए ने पछुऔत।
कर्मदेव- अहाँकेँ की कमाइये टा अछि, गामोमे तते अछि जे.......?
कृष्णदेव- सएह कखनोकाल सोचै छी जे गामक खेत बेच बैंकेमे रखि ली। जइसँ मौका-कुमौका काजो करब आ सुदियो हएत।
कर्मदेव- (आँखि गड़ा कृष्णदेवकेँ देखैत) कक्का, परिवार माया-जाल छिऐ किने? जे गरीब अछि ओकरा छोटका माया पकड़ै छै आ जे जते नमहर हुनका ओते नमहर पकड़ै छन्हि।
कृष्णदेव- ठीके कहै छह। राज दुखी परजा दुखी, जोगीकेँ दुख दूना। अपने बात कहै छिअ, गाममे कते खेत अछि जे देखते छहक। समए सुभ्यस्त होइए तँ सालो भरिक बुतातो आ किछु बेचियो-बिकीन लइ छी। अइबेर सेहो नै हएत।
कर्मदेव- अहाँ सभ पढ़ल-लिखल छी तखन........?
कृष्णदेव- (मुस्कुराइत) ब्रह्मफाँसमे पड़ि गेल छी। जहिना बाबाकेँ तहिना बाबूकेँ चौगामा लोक मालिक कहै छलनि, मलिकाना निमाहितो छलाह। हमरो लोक तहिना बुझै छथि। मुदा ब्रह्मफाँस केहन लागल अछि जे ओ मान-प्रतिष्ठा सम्पत्तिमे सन्हिया गेल अिछ। जँ एको धुर बेचब तँ सोझे प्रतिष्ठा प्रभावित हएत।
कर्मदेव- खाइर, छोड़ू खिस्सा-पिहानी। अपनेसँ भेँट करैले समाज पठौलनिहेँ।
कृष्णदेव- (अकचका कऽ) समाज पठौलखुनहेँ? की बात, की बात, बाजह।
कर्मदेव- ऐ दुआरे पठौलनिहेँ जे गाममे खेत-पथारबला तँ अहीं सभ छिऐ तँए सभकियो एकठाम बैस गामक कल्याणक विचार करी। बेर-बेर रौदी-दाही भऽ जाइए तेकर कोनो स्थायी समाधानक विचार करी।
कृष्णदेव- बहरबैया सभ रहताह?
कर्मदेव- ओहीक जानकारी देवाले पठौलनिहेँ। अहीं लगसँ काज शुरू केलौंहेँ। एेठामसँ घनश्यामकाका ऐठाम होइत रघुनाथकाका ऐठाम जाएब। हुनका ऐठामसँ मोहनकाकाकेँ भेँट करैत गाम जाएब।
कृष्णदेव- अखन घनश्यामक दिन-दुनियाँ दोसर भऽ गेल अछि। एक तँ जमीन-जत्थाबला लोक पहिनेसँ रहलाह तइपरसँ बैंकक नोकरी।
कर्मदेव- हुनकर सोभावो किछु आने ढंगक छन्हि।
कृष्णदेव- सोलहन्नी बनियाँक चालि पकड़ने अछि। खाइर, जुगो-जमाना तँ ओकरे सबहक छिऐ।
कर्मदेव- आठम दिन रविकेँ बैसार छी। से अपने समैपर पहुँच जाइऐ।
कृष्णदेव- बड़बढ़ियाँ। परसू तक तँ तोहूँ घुरि जेबह?
कर्मदेव- हँ, हँ। जते जल्दी भऽ सकत ओते जल्दी घुमैक कोशिक करब।
कृष्णदेव- चारिम दिन हमहूँ फोनपर सभसँ सम्पर्क करब। एहेन नै जे एक गोटे जाय आ दोसर पहुँचबे ने करी।
कर्मदेव- हँ, हँ, सभ कियो विचारी लेब। आखिर समाजक तँ अहींसभ बुझनुक भेलिऐ कि ने?
पटाक्षेप।
सातम दृश्य
(घनश्यामक घर। एजेंट शिवशंकरक संग।)
शिवशंकर- मैनेजर सहाएब, हमर कम्पनीक इतिहास सए बर्खक अछि। वस्तुक गुणवत्ता आ व्यापारिक साख एहेन अछि जेकर बाँहि पकड़ैबला दुनियाँमे एकोटा कम्पनी नै अछि। जे पाइप (बोरिंगक) आ इंजन (दमकल) हम देब ओ दोसर कियो नै दऽ सकैए।
घनश्याम- बैंक की कोनो अप्पन छी। मात्र एक ब्रान्चक मनेजर छी। जाबे काज करै छी ततबे धरि। सरकारक नजरि कनी गामक खेत दिस उठल तँए ई अवसर आएल। तइ अवसरसँ..........?
शिवशंकर- हँ, हँ। हमहूँ कहाँ चाहैक छी जे अवसरक लाभ नै हुअए।
घनश्याम- परसुए एक गोटे (दोसर कम्पनीक एजेंट) आएल रहथि ओ पाँच प्रतिशत कमीशनक बात केने छलाह। ओना अखन धरि हमरो स्पष्ट आदेश उपरसँ नहिये आएल अछि। मुदा पैछला मिटिंगमे बाजाप्ता चर्चा भेल रहए। यएह बात हुनको कहि पनरह दिनक वाद भेँट करैले कहलियनि।
शिवशंकर- अहाँ, भलहिं ओइ कम्पनीक बात नीक जकाँ नै बुझैत होइऐ मुदा हम तँ रत्ती-बत्तीक बात बुझै छी। केहन घटिया माल बना-बना सप्लाइ करैए। ओ दोसर-दोसर बैंकसँ पता लगा लेब। हमर पाइप जँ ओकरापर पटैक देतै तँ थौआ-थाकर कऽ देतै। अहूँ तँ जनिते छी जे नीक वस्तुक उत्पादनमे नीक खरचो बैइसै छै।
घनश्याम- खरचा बेसी बैइसै छै तँ दामो बेसी होइ छै किने?
शिवशंकर- हँ, से तँ होइ छै। मुदा घटिया माल कते दिन चलत सेहो ने देखबै?
घनश्याम- से तँ बेस कहलौं मुदा जे आदेश हएत सएह ने करब।
शिवशंकर- ऐठामक सक्षम किसानक रिपोट देबै तँ किअए घटिया मालक आदेश हएत। जइठाम पछुआएल किसान अछि, पहिने-पहिल बोरिंग देखते ओ किआने गेल नीक-अधला।
घनश्याम- हँ, से तँ मानलौं। मुदा सोलहो आना नेत बिगाड़ियो लेब सेहो तँ नै।
शिवशंकर- (बात लपकि) हँ, एह विचार हमरो कम्पनीक अछि। जे आॅनर छथि हुनकामे ई भावना कूट-कूट भरल छन्हि। मुदा बीचमे जे घटिया कारोवारी सभ अछि वएह सभ ने नीको मालक बजारकेँ घेर घटिया बजार बना दइए। दू-पाइ बेसियो लगने जँ उपभोक्ताकेँ नीक वस्तु भेटै छै तँ ओकर उपयोगो बेसी दिन करैए।
घनश्याम- मानलौं, जे अहाँक समान तेज अछि मुदा सभकेँ ने अपन-अपन कारोवार अछि। पद आ प्रतिष्ठाक लोभ ककरा नै छै। जे ब्रान्च जते लाभ बैंककेँ देखाओत ओते ने ओइ स्टापकेँ आगू बढ़ैक अवसर भेटतै।
शिवशंकर- हँ, से तँ मानै छी। मुदा हमर ओहन कम्पनी अछि जे देशे नै विदेशोमे सप्लाइ दैत अछि। दू-साल बीतैत-बीतैत घटिया कम्पनी सभकेँ बजारसँ भगा दैत अछि। भलहिं नव बजार ठाढ़ भेने शुरूमे किछु कमाए लिअए मुदा कते दिन।
घनश्याम- खाइर, छोड़ू ओइ सभकेँ। मोट गाछक मोट मुसरो होइ छै। मुदा जहिना अहाँ तहिना हम। अपना दुनू गोटेक बीच संबंध केना बनत, तइपर विचार करू।
शिवशंकर- (ठहाका मारि) आब रास्ताक बात भेल ने। अखन ने अहाँ सोचै छी जे एक्के भागक आमदनी अछि मुदा से नै। दुनू भाग अछि।
घनश्याम- से केना?
शिवशंकर- हमहूँ गामेसँ आएल छी। पिताजी कर्मचारी छलाह। जखन लगमे बैसै छलियनि तखन जमीन-जत्थाक खेरहा करै छलाह।
घनश्याम- (मुस्की दैत) की कहै छलाह?
शिवशंकर- (हँसैत) कहै छलाह जे जखन जमीन्दारी चार्ज सरकार लेलक तखन हमरा सभकेँ अगहन आबि गेल। खेत-खरिहानसँ लऽ कऽ आँगनि-कोठी धरि धाने-धान।
घनश्याम- नै बुझलौं?
शिवशंकर- गाममे कत्ते किसान छथि जिनका जमीनक सही-सलामत सबूत छन्हि। एक तँ पहिनहिसँ जाल-फरेबी, तइपर बाढ़ि घर-दुआरक संग कागजो पत्तर ने लऽ जाइ छलै।
घनश्याम- (मुस्कुराइत) हँ, से तँ अछि।
शिवशंकर- सरकारक सुविधा तँ बैंके माध्यमसँ ने हएत। असल कार्यालय तँ बैंक हएत। जे किछु िकसानकेँ भेटत ओइले तँ बैंकेमे ने बौण्ड बनबए पड़त। बौण्डक लेल तँ ताजा सबूत (करेंट कागजात) चाही। ई तँ अहीं हाथक भेल।
घनश्याम- (हँसैत) एक प्रतिशत कम कऽ देब।
शिवशंकर- बड़बढ़ियाँ। कारोबारक गप भइये गेल। चलै छी।
घनश्याम- ओहिना जाएब उचित हएत। हम सभ मिथिलांचलक ने छी। अतिथिकेँ देवता बुझैत छी। किछु रस-पानी केने बिना........?
शिवशंकर- आब कि ओ जुग रहल जे सुरा-सुन्दरीसँ अतिथिक सेवा होइत छल। हम सभ तँ तेहेन जुगमे आबि गेलौं जे ने खाइक ठेकान आ ने आराम करैक।
घनश्याम- (नोकरकेँ सोर पाड़ि) बहादुर, बहादुर?
(पहाड़ी नौकरक प्रवेश)
आँखिक इशारा घनश्याम देलनि। भीतर जा दूटा गिलास आ सनतोला रंगक शीशी नेने आबि टेबुलपर रखि चलि जाइत। शीशी खोलि दुनू गिलासमे लऽ गोटे पीलनि।)
शिवशंकर- आब आदेश होइ। (कहि उठि कऽ ठाढ़ होइत। घनश्यामो ठाढ़ होइत तखने कर्मदेवक प्रवेश। अबिते कर्मदेव पएर छुबैत)
घनश्याम- बौआ, हिनका विदा कऽ दै छियनि। निचेनसँ गप-सप्प करब।
कर्मदेव- हँ, हँ, कक्का। हमहूँ किछु विचारे करए एलौंहेँ।
(हाथमे हाथ मिला धनश्याम सड़क तक अबैत छथि। घुरि कऽ आबि)
घनश्याम- आब कहह बौआ, गाम घरक हाल-चाल। मुदा पहिने कपड़ा खोलि फ्रेश भऽ चाह पीब लाए। तखन निचेनसँ गप-सप्प हेतै।
(चाह अबैत। कमदेवक हाथमे कप धड़बैत घनश्याम अपन चाह आपस करैत।)
कर्मदेव- अहाँ किअए चाह घुमा देलिऐ?
घनश्याम- देखबे केलहक। चाह पीबैत-पीबैत पेट भरिया गेल अछि। खाली शीशी आ गिलास देख...।)
कर्मदेव- (मुस्की दैत) कक्का, की कुशल गामक रहत। एक तँ अोहिना सभतरहेँ खाधिमे खसल छी तइपरसँ तेहेन रौदी भऽ गेल जे परान बँचब लोकक कठिन भऽ गेल अछि।
घनश्याम- जे बात कहलह ओ नान्हिटा नै अछि। मुदा बिना केनौं तँ नहिये कल्याण हएत। भने छुट्टीक दिन रहने मनो हल्लुक अछि। मुदा तैयो एक दिनमे सभ बात कहलाे नै जा सकैए। ओना तू पढ़ल-लिखल नवयुवक छह तँए कम्मो कहने बेसी बुझबहक।
कर्मनाथ- अहाँ सभकेँ व्यवहारिक ज्ञान अछि काका। हम तँ हालेमे कॉलेज छोड़लौंहेँ। गामक लेल तँ सोलहो आना अनाड़िये छी।
घनश्याम- गाम तँ तेहेन भऽ गेल अछि जे दू-चारि गोटे, एकठाम बैस अपन सुख-दुख निवारणक गप करब, सेहो ने अछि। सभ अपने ताले बेताल। कियो अपनाकेँ कम बुझैले तैयारे नै होइत अछि। सबहक मन घेराएल अछि जे हमरासँ बुद्धियार दोसर के अछि?
कर्मदेव- एना किअए अछि?
घनश्याम- अखन धरिक जे बेबस्था रहल ओ संस्कारे बिगाड़ि देने अछि। मुदा अखन ऐ बातकेँ छोड़ह। अखन जे दुरकाल उपस्थित भऽ गेल अछि ओइपर गप करह।
कर्मदेव- हँ, सएह बढ़ियाँ।
घनश्याम- अखन दुइये गोटे छी। तहूमे भने डेरेमे छी। तँए अखन दुइये परिवारक गप करह। देखते छह जे गाममे सभसँ बेसी खेत अछि। बाबाक अमलदारीमे एकटा मुनहर आ तीनटा बखारीक संग हाथियो छलनि। तखन नोकरी करैक जरूरत हमरा किअए भेल?
कर्मदेव- (किछु सोचैत) किअए भेल?
घनश्याम- यएह सोचै आ बुझैक बात छी। हमरा सम्पत्ति छलए, घरसँ बाहर जा पढ़लौं। मुदा जेकरा खाइयोक उपाए नै छै ओकर बाल-बच्चा स्कूल आँखि देखत? खिस्सा तँ सभ कहतह जे बहिन रहितो लछमी-सरस्वतीक बास एकठाम नै होइत छन्हि।
कर्मदेव- (जिज्ञासा करैत) छातीपर हाथ रखि कहै छी जे ने अपने मनमे अखन धरि ई बात उठल आ ने कियो कहलनि।
घनश्याम- ई तँ मात्र पढ़ै-लिखैक बात कहलियह। पढ़नाइ-लिखनाइसँ जरूरी अछि खेनाइ, रहनाइ आ बर-बेगारीसँ बचैक उपाए। आँखि उठा अपने देखह जे कि अछि?
कर्मदेव- (आँखि उठा उपर-निच्चा देख) ठीके कहै छी काका। मुदा हएत केना? अहाँ सभ सन बुझिनिहार गामे छोड़ि देने छी तखन अबूझ केना सबूझ बनत। जाधरि बुझबे ने करत ताधरि आगू डेग केना उठाओत?
घनश्याम- यएह बात बुझैक जरूरत अछि।
कर्मदेव- जाधरि बुझत नै ताधरि ओहिना पाछु मुँहे गुड़कैत जाएत।
घनश्याम- (दुनू हाथसँ दुनू आँखि मलैत) बौआ, सच पुछह तँ अपना सभ स्वतंत्र देशक गुलाम छी। किसानक देश पूँजीपतिसँ हारि गेल छी। भलहिं एकरा पछुअाएब कहि अपन प्रतिष्ठा बचा ली मुदा शासनसँ बाहर छी।
कर्मदेव- सरिया कऽ कहियौ कक्का। नीक नहाँति नै बुझलौं।
घनश्याम- सत बात बजैमे कनियो धड़ी-धोखा नै होइए। जइ परिवारक सम्पत्तिसँ चालिस-पचास परिवार चलै छल तइ परिवारकेँ नोकरी करए पड़ै, कते लाजिमी छी। मुदा.....?
कर्मदेव- काका, अहाँ लगसँ चाइक मन नै होइए। मुदा काजक भार बैइसै ने दिअए चाहैए। किएक तँ एक निश्चित सीमामे काजक सम्पादन नै भेने, गड़बड़ाइये जाएत। अखन समाजक काजमे बन्हाएल छी। निचेनमे दोसर दिन आरो बुझब।
घनश्याम- हँ, हँ। से तँ ठीके कहै छह। मुदा आइ बुझि पड़ि रहल अछि जे एकटा संगी भेटल, जे पेटक बात पेटमे लिअए चाहैए। कोन चीजक कमी अछि।
कर्मदेव- से तँ नहिये अछि।
घनश्याम- ओना लोकक बुद्धि विपत्तिक मारिसँ घटैत-घटैत एते घटि गेल अछि जे समयक संग पकड़ि नै पबैत अछि। खाइर छोड़ह। काजक बात कहह?
कर्मदेव- गामक दशा बदसँ बदतर भऽ गेल अछि। माल-जाल उपैट रहल अछि। लोक भागि रहल अछि। चलन्त सम्पत्ति (खेत) पाछु मुँहे ससरि रहल अछि। यएह सभ देख समाज विचार केलनि जे अगिला रविकेँ सभ मिल बैसार करी जइमे गामक कल्याणक बाट ताकी।
घनश्याम- (अध हँसी हँसि) हृदए गामक संग अछि। तँए जते संभव हएत ओते समाजक सहयोग करब।
कर्मदेव- जखने अहाँ सभ तैयार हेबै तखने समाजक कल्याण निश्चित हएत। आब जाइ छी।
घनश्याम- तोरा जइ चीजक जरूरत हुअ, आन नै बुझिहह। बड़बढ़ियाँ जाह।
पटाक्षेप।
अाठम दृश्य
(इंजीनियर मनमोहनक डेरा। दोसरि साँझ। मनमोहन आ संतोष गप-सप्प करैत)
मनमोहन- बाउ, पहिल ज्वानिंग छिअह, तँए पहिने घोसिया जाह। पछाति बदलीक जोगार लगा देबह।
संतोष- बाबू, भलहिं अहाँ सभ दिन शहरमे रहलौं मुदा गाम गाम छी।
मनमोहन- से की?
संतोष- डेरासँ ऑफिस आ आॅफिससँ डेरा करैत रहलौं, ऑफिसमे बैस घरसँ सड़क धरिक नक्शा कागजपर बनबैत रहलौं जइसँ काजक दायरा सिकुड़ गेल। मुदा हम तँ चारि बर्खमे माटिये-पानिक गुण-अवगुन बुझलौं। अपार धन माटि-पानिमे छिपल अछि।
मनमोहन- से केना?
संतोष- अपना ऐठामक जे माटि-पानि आ मौसम अछि, ओ दुनियाँमे कतौ ने अछि। नान्हिटा देश जापान, जे ऐशिये महादेशमे अछि, देखियौ ओकरा।
मनमोहन- की अछि, केहेन अछि।
संतोष- ओना ओकर आन बात तँ नै पढ़लौंहेँ। मुदा ओकर भौगौिलक बनाबटि आ उन्नति जरूर पढ़लौंहेँ। अपना देशक (अखुनका, पहिलुका एक राज्य) दूटा राज्यक बराबरि ओकर लम्बाइओ-चौड़ाइ छै आ जनसंख्यो छै। मुदा दुनियाँक अगुआएल देश अछि।
मनमोहन- एतबे टा अछि?
संतोष- एतबेटा किअए कहै छिऐ। ओहूमे दुनियाँक सभ देशसँ बेसी भूमकमो होइ छै।
मनमोहन- भूमकम किअए होइ छै?
संतोष- ओइठाम ज्वालामुखी बेसी अछि। खाइर, ऐ बातकेँ छोड़ू। छोट देश आ कम आबादी रहितो ओ ओते अगुआ किअए गेल अछि।
मनमोहन- किअए अगुआएल अछि?
संतोष- जहिना ओकर खेती अगुआएल अछि तहिना कल-कारखाना। दुनियाँक बाजारमे ओकर माल पटने अछि। तहिना खेतिओक छै। जते उपज (रकबा हिसाबे) ओकरा होइ छै आते ककरा होइ छै।
मनमोहन- केना एते उन्नति खेती केलक?
संतोष- ओइसँ बेसी अपनो सभ कऽ सकै छी। मुदा ऐठाम सभसँ पैघ कारण अछि जे साठि बर्ख आजादीक उपरान्तो ऐठामक लोक गुलामीक जिनगी जीब रहल अछि। स्वतंत्र नागरिकक संस्कार आ गुलामीक संस्कारमे अकास-पातालक अन्तर होइ छै। ओना अपनो देश उद्योग-धंधामे जते अगुआएल अछि ओते खेती-पथारीमे नै अछि। जे भारी खाधि दुनूक बीच बनल अछि।
मनमोहन- एहेन बात अछि?
संतोष- अपने बात लिअ। अखनो गाममे खेतबला परिवार अपन अछि। मुदा खेती करै छी? सभटा बटाइ लगौने छी। बटेदारो सभ तेहेन अछि जे ने आेकरा खेत जोतैक उचित साधन छै आ ने खेती करैक आन साधन। सोलहो आना मौनसूनपर िनर्भर रहैत अछि। एक तँ साधन नै दोसर करैक ऊहियो ओहन नै जइसँ दुनियाँक खेतीक बराबरीमे आैत।
मनमोहन- ओते मत्था-पच्ची करैक कोन जरूरी छह। खाइत-पीबैत रामलला। जहुना जिनगी चलै छह तहुना जे निमाहि लेबह, ओहो कम भेल।
संतोष- नै बाबू, जिनगीक सार्थकता होइत अपनासँ आगू बढ़ि करैक। सरकारोक आँखि गाम दिस उठलहेँ, तँए ओकर उपयोग हेबाक चाही। जहिना बाबा अमलदारीमे बखारीक शोभा छल तहिना फेर हएत?
मनमोहन- अखन जते असानीसँ शहरक लोक जीबैत अछि ओते गाममे थोड़े हएत?
संतोष- ओइसँ बेसी हएत। हँ अखन नै अछि। मुदा केना हएत ई तँ गामेक लोककेँ सोचए पड़तै। अपने बात लिअ, हजार-बजारक नोकरी खुसीसँ करै छी मुदा ई बुझै छिऐ जे जँ अपन खेतकेँ समुचित सुविधा बना कएल जाएत तँ करोड़ोक आमदनी हएत?
मनमोहन- हमरो नोकरी लगिचाइले अछि, संगे शरीरो एते भरिआ गेल अछि जे किछु करै जोकर नहिये रहलौं। एहना स्थितिमे केना जीब?
संतोष- केना की जीब? जहिना गाम छोड़ि नोकरी करए शरहल गेलौं तहिना शहर छोड़ि गाम चलब। हमहूँ ओतबे दिन नोकरी करब जाबे तक अपन समुचित खेतीक रूप नै पकड़ि लेत। अहाँ नै देखै छिऐ जे पँच-पँच-सत-सत सए रूपैये किलो अन्नक बीआ, आन-आन देशबला बेचैए। कनी गौर कऽ कऽ देखियौ जे किलो भरि अन्नक दाम कते अछि।
मनमोहन- की हम अपने ओहन बीआ तैयार नै कऽ सकै छी। जरूर कऽ सकै छी। तहिना नीक बना पशुपालन, नीक किस्म बना माछ आ आरो कते कहब। हाथसँ करैक हिम्मत आ माथसँ सोचैक शक्तिक जरूरत अछि।
(कर्मदेवक प्रवेश)
मनमोहन- आ-हा-हा, बाउ कर्मदेव?
कर्मदेव- (दुनू हाथ छातीपर रखि) प्रणाम, चाचाजी।
मनमोहन- बाउ (संतोष) लोटामे पानि नेने आबह। बाटक झमाड़ल छथि। तेकरा बाद चाह-पान चलतै।
(संतोष भीतर जाइत अछि आ लोटामे पानि आनि, कर्मदेवक आगूमे ठाढ़ भऽ)
संतोष- होउ, पहिने पएर धोउ?
कर्मदेव- अच्छा पछाति धो लेब। कोनो कि पएरे चललौंहेँ। सड़कपर सवारीसँ उतड़लौंहेँ।
मनमोहन- चाह नेने आबह। (संतोष भीतर जाइत अछि।) आकि पहिने किछु खेबह?
कर्मदेव- नै, अखैन किछु ने खाएब। मन गदगड़ल अछि। चाह पीब लेब।
(दू कप चाह नेने संतोष अबैत अछि।)
मनमोहन- (चाहक चुस्की लैत) अब कहह गामक हाल-चाह?
कर्मदेव- गामक हाल-चाह की कहब चच्चाजी। नरकंकाल जकाँ गामक हाड़ झक-झक करैए।
(कर्मदेवक बात सुनि मनमोहन बेउत्तर होइत मुँहपर हाथ लऽ मूड़ी झुका कऽ सोचए लगै छथि। बीचमे ठाढ़ संतोष कखनो पिता दिस देखैत तँ कखनो कर्मदेव दिस। मुदा किछु बजैत नै। दुनू गोटेकेँ चुप देख।)
संतोष- हम जेठ छी की कर्मदेव, बाबूजी?
मनमोहन- कर्मदेवक तँ नै बुझल अछि मुदा तोहर एक्कैसम लगिचाएल छह।
कर्मदेव- हमरो एक्कैसम चलि रहल अछि।
मनमोहन- तखन तँ किछुए मासक कम-बेसी हेतह। एक बतरिये भेलह।
कर्मदेव- चाचाजी, जौआँ बच्चाक अंतर पाँचे-दिस मिनट होइ छै मुदा ओहूमे जेठाइ-छोटाइ होइ छै?
मनमोहन- हँ, से तँ होइ छै। मुदा ई तँ सर्टिफिकेटसँ फरिएतह।
कर्मदेव- ओहूसँ नीक जकाँ (इमानदरीसँ) नहिये फड़िआएत? किएक तँ अहाँ घरमे भलहिं जन्म टिप्पणि हुअए मुदा हमरा घरमे नहिये अछि। टिप्पणि देख स्कूलमे नाओं लिखौने होय, मुदा हमर तँ अनठेकानी लिखाएल अछि।
मनमोहन- भैयारी बनब पेंचगर छह। दुनू गाेरे दोस्ती कऽ लाए। संतोषोक विचार गामेमे रहैक छै आ तहूँ गामेमे रहै छह।
कर्मदेव- (मुस्की दैत) चाचाजी, अहाँ तँ अमृत फल खुआ देलौं। मित्र तँ नरकोसँ उद्धार करैत अछि।
(तीनू गोटेक ठहाका)
हम केमहर एलौं से तँ पुछबे ने केलौं?
मनमोहन- गामसँ हटि भलहिं रहै छी, तँए कि समाजक सभ किछु छोड़ि देलौं। दुआरपर आएल अतिथिकेँ पुछल जाइ छै जे केमहर एलौं? अतिथियेक सेवा तँ धर्मखातामे लिखाइत अछि।
कर्मदेव- (मुस्की दैत) अपने कहै छी। अखन धड़फड़ीमे छी तँए बेसी गप-सप्पमे समए नै दऽ सकब। जते समए गमाएब तते काज पछुआएत।
(मनमोहन आ संतोषो सुनैक इच्छासँ कर्मदेव दिस तकए लगैत।)
रवि दिन सामाजिक बैसार छी, सएह कहए एलौं।
मनमोहन- कनी फरिछा कऽ बाजह?
कर्मदेव- गामक मूल पूँजी (उत्पादित) खेत छी। खेतेक उपजापर गामक लोक ठाढ़ भऽ जिनगी चलबैत अछि। समाज तँ बनि गेल मुदा सामाजिक पूँजी नै बनि सकल। जइसँ एते भारी खाधि (दूरी) दुनूक बीच बनि गेल जे अछैते पूँजिये लोक पूँजी विहीन भऽ गेल अछि। अही सबहक विचारक लेल बैसार भऽ रहल अछि।
मनमोहन- (मूड़ी डोलबैत) उद्देश्य तँ जवरदस अछि, मुदा......?
कर्मदेव- मुदा की। ऐ धरतीपर सभसँ अगुआएल मनुष्य अछि, तखन?
संतोष- कर्मदेव भाय, अहूँ हालेमे काओलेज छोड़लौंहेँ आ हमहूँ हालेमे। व्यवहारिक दौरमे दुनू गोरे अनािड़ये छी। किएक तँ जइ गाममे रहै छी ओ जमीनक एक नििश्चत सीमाक अन्तर्गत निर्धारित अिछ। जहिना जमीन तहिना बसल लोक। मुदा.....।
कर्मदेव- मुदा की?
संतोष- जमीनकेँ जाल कहल जाइ छै। जाल फँसबैक वस्तु छी। जहिना मछवार जाल फेक माछ फँसबैत, शिकारी शिकार फँसबैत, तेहने शिकारी सभ जमीनक जाल फेक जमीनकेँ फँसा नेने अछि, तँ........?
(आँखि विथाड़ि मनमोहन संतोषपर देने। तहिना कर्मदेव सेहो संतोषक आँखिपर आँखि अटकौने।)
कर्मदेव- तँए की?
संतोष- छोटका जालमे छोट माछ आ छोट शिकार फँसैत मुदा जेना-जेना जाल नमहर होइत तेना-तेना नमहर माछो आ शिकारो फँसैए। जखन कि महजालमे छोट-पैघ सभ फँसैए। तहिना अखन सम्पत्तिक दौड़मे विश्व-जाल पसरल अछि।
कर्मदेव- नीक जकाँ हमरो नै बुझल अछि। मुदा इशारा रूपमे ओइ दिन सुनलौं जइ दिन कओलेज दीक्षाक सटिफिकेट समारोहमे शिक्षक लोकनि विदा केलनि।
कर्मदेव- दीक्षाक अर्थ?
संतोष- सेहो ओही दिन बुझलौं। कान फूकि दीक्षा मंत्र देनिहार जेरक-जेर घुमैत अछि। मुदा दीक्षाक अर्थ होइत प्राप्ति। अहाँ कओलेजसँ निकलैक सर्टिफिकेट नै लेलौंहेँ?
कर्मदेव- हँ, ऑफिससँ तँ जरूर भेटल मुदा दीक्षान्त समारोह कऽ कऽ नै।
संतोष- किअए?
कर्मदेव- नीक जकाँ तँ नै बुझल अछि मुदा दस-पनरह बर्खसँ कहाँ दीक्षान्त समारोह भेलहेँ।
संतोष- साले-साल हेबाक चाहियेक।
कर्मदेव- भने भाय अहूँ गामेमे रहि मोटर साइकिलसँ आॅफिसो करब आ गामोक काज देखब।
संतोष- बेसी समए गामेक काजमे लागत।
कर्मदेव- बहुत बढ़िया, बहुत बढ़िया।
पटाक्षेप
नवम दृश्य
(डॉ. रघुनाथक घर। ओसारक कुरसीपर बैसल, माथपर हाथ दऽ आँखि मूनि सोचैत। चाह नेने पत्नी अनुराधा अबैत।)
अनुराधा- आँखि लगल अछि। चाह पीबू।
रघुनाथ- आँखि कि लागत कपार। अनेरे आँखि बन्न भऽ रहल अछि।
अनुराधा- अपने डॉक्टर छी तखन......?
रघुनाथ- अपने डाॅक्टर छी तकर माने.......?
अनुराधा- तखन किअए रोग......?
रघुनाथ- रोगक सीमा-नाङरि अछि। मनुक्खे जकाँ बिना सींघ-नाङरिक जानवर जकाँ अछि। देहक रोगक डॉक्टर ने छी, मनक रोगक थोड़े छी।
अनुराधा- से की?
रघुनाथ- कोनो कि देहेटा मे रोग होइए। मुदा मनोक तँ देहे जकाँ ने सभ किछु छै।
अनुराधा- तखन तँ आरो नीके किने। जहिना थर्मामीटरसँ बोखार परखल जाइ छै, तहिना ने मनोक बोखार परखैक यंत्र हेतइ। तइसँ नापि दवाइ खा लिअ।
रघुनाथ- विधाता ऐठाम जखन बुइधिक बँटवारा हुअए लगल तखन सभकेँ चम्मछ लऽ लऽ देलखिन आ अहाँ बेरमे बरतने उझैल देलनि।
अनुराधा- एना बताह जकाँ किअए बजै छी? जखन मन गड़बर भऽ गेल तखन ओकर प्रतिकार करब। हमहूँ सहयोगी छी, सहयोग करब आकि सभकेँ भगा अपने पगलखन्नाक हरीमे ठोकाएब। मन थीर करू। चाह पीबू सिगरेट नेने अबै छी।
(अनुराधा भीतर जाइत। रघुनाथ एक-एक चुस्की चाह पीबैत आ कखनो अकास दिस तँ कखनो निच्चा दिस तकैत।)
रघुनाथ- (बड़बड़ाइत) भूमकम भेलापर उनटनो होइत। जहिना अकासक गाछ-जमीनपर खसैत तहिना ने जमीनो अकास दिस चढ़ैत। मुदा पाबस तँ अकासक अमृतसँ सीचैत।
(रघुनाथकेँ बड़बराइत देख अनुराधा मुहथरिपर ठाढ़ भऽ सुनए लगली।)
आ-हा-हा कि सुन्दरता पाबसोक होइत। करोड़ो-अरबो जीब जन्तुकेँ सृजनो करैत, अमृतेसँ स्नानो करबैत, पीबोक लेल दैत आ दुनूक (अकास-जमीन) बीच अमृतेक बाटो बनबैत।
अनुराधा- (मने-मन उदास भऽ) भरिसक बुद्धिक बीमारी पकड़ि लेलकनि। (आगू बढ़ैत) लिअ सिगरेट-सलाइ नेने एलौं। चाहो तँ नहिये पीलौंहेँ?
रघुनाथ- हमरे नै सुझैए आकि........। मन भरि गेल अहाँ कहै छी चाहो ने पीलौं।
(रघुनाथक मुँहक सुरखी उदास होइत जाइत)
अनुराघा- मुँहक सुरखी बदलि रहल अछि?
रघुनाथ- लाउ, सिगरेट पीब तखन चुहचुही आओत। की भकुआएल जकाँ बुझि पड़ै छी? (सलाइ खरड़ि सिगरेट धड़ा कस खींच उपर मुँहे धुआँ फेकैत।) देखिऔ धुँआ केना उपर मुँहे जाइए।
अनुराधा- ओछाइन ओछा दै छी। आराम करू।
रघुनाथ- कहलौं तँ विधाता बुइधिक बरतने अहाँ आगूमे उझैल देलनि। जागलमे जइ रोगकेँ भगाओल (इलाज) नै हएत सुतलमे केना हएत?
अनुराधा- कि सभ होइए?
रघुनाथ- बैसू, कहै छी। ब्रज कन्या तँ अहींटा छी तँए अपन दिलक-दुख अहाँकेँ नै कहब तँ दोसराकेँ कहने कि हएत?
अनुराधा- (मुस्की दैत) से की, से की?
रघुनाथ- अहाँ जे भकुआएल बुझै छी से ठीके बुझै छी। मुदा नीनक भक्क नै जिनगीक रास्ताक भक्क लागल अछि! किमहर जाएब से चौरासापर बुझिये नै पबै छी।
अनुराधा- बीचमे ठाढ़ भऽ कऽ देखियौ जे कोन बाटक दुभि (खढ़-पात) पएरक रगड़सँ उड़ि गेल छै आ कोन दुभियाह अछि।
रघुनाथ- कहलौं तँ बेस बात, मुदा भकुआएल मने दुखबो करिऐ तखन ने। आन्हरे जकाँ सभ अन्हारे बुझि पड़ैए। (दुनू आँखि दुनू हाथसँ मलैत)
कि सपना छल आ की देख रहल छी।
अनुराधा- से की? से की?
रघुनाथ- सभ किछु समाप्त भऽ रहल अछि। आकि जिनगिये समाप्त भऽ रहल अछि से बुझिये ने पाबि रहल छी।
अनुराधा- से की?
रघुनाथ- परसु रिटायर करब।
अनुराधा- सभ रिटायर करैत अछि आकि अहींटा करब?
रघुनाथ- खाली नोकरियेटा सँ नै ने रिटायर करब। देहोक रोग (ब्लड प्रेशरो) किछु बढ़ि गेल अछि जइसँ रोगी सबहक शिकाइत आबि रहल अछि।
अनुराधा- से तँ आब उमेरो भेल किने?
रघुनाथ- उमेरक असर शरीरपर पड़ै छै आकि ब्रेनपर। आमक आठी जकाँ कोइलीसँ पकुआ बनत आकि पकुआसँ कोइली।
अनुराधा- तखन किअए एना भेल?
रघुनाथ- ब्रेने छिड़िया गेल। एकरा केना समटब।
अनुराधा- आबो समटू।
रघुनाथ- छिड़िआएल बौस बीछ-बीछि समटल जा सकैए। छिड़िआएल मन केना समटल जाएत? पाछु उनटि तकै छी तँ कतौ गड़बड़ नै देखै छी। मुदा आगू तकै छी तँ नोकरीक संग प्राइवेट कमाइयोकेँ जाइत देखै छी।
अनुराधा- से केना?
रघुनाथ- चढ़त छल तखन मकान बनेलौं, क्लीनिक बनेलौं। रेस्ट-हाउसक संग जाँच-पड़ताल करैक यंत्र कीनलौं। मुदा आइ की देखै छी?
अनुराधा- की नै देखै छी, कोन चीजक कमी अछि?
रघुनाथ- अपने मुइने जग मुअए। जइठीन रोगीक भीड़ लागल रहै छलए तइठीन गोटि-पङरा आबि रहल अछि। तहिना रेस्ट-हाउस ढन-ढन करैए। सप्ताहक-सप्ताह जाँच मशीन बैसले रहैए। अपनो दरमाहा अधियाइये जाएत। मुदा खर्च.......?
अनुराधा- एना किअए भेल?
रघुनाथ- समए कते आगू बढ़ि गेल, से नै देखै छी। सभ चीज पुरान पड़ि गेल।
अनुराधा- ऐ सभ दिस नजरि नै गेल छल?
रघुनाथ- नजरि कोना जाएत। नजरि तँ शान्तचित्तमे टहलैत अछि। से कहियो कहाँ भेल। दिन-राित एकबट्ट कऽ काजमे लागल रहलौं। जिनगीक विषयमे सोचैक पलखतिये कहिया भेल।
अनुराधा- चिन्तो केने तँ नहिये हएत।
रघुनाथ- से तँ नहिये हएत। मुदा अनहरिया राति जकाँ अन्हार तँ बढ़ले जाइए।
(कर्मदेवक प्रवेश।)
कर्मदेव- (दुनू हाथ जोड़ि) गोड़ लगै छी चच्चाजी। (अनुराधाक पएर छुबि) गोड़ लगै छी चाचीजी।
रघुनाथ- गाम-घरक हाल-चाल कहह?
कर्मदेव- गाम-घरक कि हाल-चाल रहत। रद्दी कागज जकाँ गामोक दशा भऽ गेल अछि। पैछला साल तँ कनी-मनी नीको छल जे ऐ बेरक रौदी तँ उजाड़ि लगा देलक।
रघुनाथ- बौआ, अपनो दशा ओहने भऽ गेल। मुदा कहबो ककरा करबै। अपन हारल बजितो लाज होइए। मुदा.......?
कर्मदेव- मुदा की?
रघुनाथ- यएह जे गामक समाजमे अखनो बेर-बिपत्ति पड़लापर एक-दोसरकेँ सहारा दैत। मुदा बजारक समाज तँ ठीक उल्टा अछि। सभ अपने ताले-बेताल अछि। ककरा एते छुट्टी छै जे अनको हाल-चाल पूछत।
कर्मदेव- चाचाजी, अखन हमहूँ औगताइले छी। कहियो निचेनसँ गप-सप्प करब। अखन जइ काजे एलौं से गप करू।
रघुनाथ- केहेन काजे धड़फराएल छह?
कर्मदेव- गामक दशा देख समाजक (गौआँक) विचार भेलनिहेँ जे जेहो सभ बाहर नोकरी-चाकरी करै छथि हुनको सभकेँ बजा समाजक कल्याण केना हएत? तइले एकठाम बैस रास्ता निकाली। सएह कहए एलौंहेँ।
रघुनाथ- छाँहो-छुहो तँ किछु कहह?
कर्मदेव- चाचाजी, गाममे जे छथि हुनका दूधक डाढ़ी जकाँ अपन खेत छन्हि। जखन कि जे बाहर रहै छथि, बेसी जमीन हुनके सबहक छन्हि। तइले बैसार भऽ रहल अछि।
रघुनाथ- विचार तँ बड़ दिव्य अछि, मुदा........?
कर्मदेव- मुदा की?
रघुनाथ- थाके पॉव पलंग भेल भारी, आब की लादब हौ बेपारी।' सोझे आगूमे देखै छह। धानक खखड़ियोसँ बत्तर हालत भऽ गेल अछि। जेहो जिनगी बाकी (बँचल) अछि ओहो पहाड़ जकाँ बुझि पड़ैए।
कर्मदेव- से किअए, चाचाजी?
रघुनाथ- बौआ, डाॅक्टरी छोड़ि आन चीज तँ पढ़लौं नै जइसँ दुनियो-दारीक बात बुझितौं। ऐ अवस्थामे आब बुझि पड़ैए जे जिनगिये ओझरा गेल।
कर्मदेव- जखने सभ मिल एकठाम विचार करब तखने ने अहूँक ओझरी छुटि जाएत।
रघुनाथ- (कने गुम रहि, किछु सोचि) बहरबैया सभ रहताह?
कर्मदेव- आश्वासन तँ सभ देलनि। तखन तँ........?
रघुनाथ- कहियाक समए बनौलनि?
कर्मदेव- समए तँ समाजे बनौने छथि। अहाँकेँ जानकारी दिअ एलौं। रवि दिन दू बजेसँ बैसार छी।
रघुनाथ- बड़बढ़िया। जरूर भाग लेब। परसुए सेवा-निवृत्ति सेहो भऽ रहल छी।
कर्मदेव- परसुए सेवा-निवृत्त भऽ रहल छी?
रघुनाथ- (मिड़मिड़ा कऽ) हँ, बौआ।
कर्मदेव- (मुस्की दैत।) चाचाजी, अहीं सन-सन लोकक जरूरत समाजकेँ छै।
रघुनाथ- से की?
कर्मनाथ- ऐठामक काज ने हरा गेल। मुदा गाममे अहाँ सभले ओते काज अछि जे कएले ने पाड़ लागत।
रघुनाथ- (किछु सोचि, मुस्कुराइत) बेस कहै छह बौआ।
पटाक्षेप
दसम दृश्य
(कृष्णदेव, घनश्याम, मनमोहन आ रघुनाथ। घनश्याम घर। चाह-पान, सिगरेट चलैत)
घनश्याम- कर्मदेव जे किछु कहलनि, तइपर तँ अपनो सभ विचारि लेब।
कृष्णदेव- अबस-अबस।
घनश्याम- एक तँ बैंकक नोकरी, तहूमे ब्रान्चक जबावदेही। भरि दिन लोकक चरबाहि करैत-करैत परेशान रहै छी। जइसँ गाम-समाजक कुशलो-क्षेम नै बुझि पबै छी। तँए अपने दिशा-िनर्देश दियौ।
मनमोहन- बहुत बढ़िया, बहुत बढ़िया घनश्याम भाय बजलाह।
कृष्णदेव- कहलौं तँ बड़बढ़िया, मुदा जे चकचकी अहाँ सबहक अछि ओ थोड़े अछि।
रघुनाथ- मनक बात अहाँ बुझि गेलौं।
कृष्णदेव- अहाँ सभ कागज-पत्रक बीच रहै छी। हम कितावक बीच अन्तर एतबे अछि। मुदा रहै छी तँ सभ कागजेक बीच।
रघुनाथ- कहलिऐ तँ बड़बढ़िया, मुदा हम सभ सादा कागजक बीच रहै छी अहाँ सजाैल कागजक बीच।
कृष्णदेव- सभकेँ अपन-अपन बुझैक दायरा होइ छै, तँए अहूँ सबहक विचारकेँ नकारि नहिये सकब। मुदा किछु छिपा कऽ बाजब उचित नै, तँए.......?
रघुनाथ- तँए की? जखने अपन-अपन विचार सभ व्यक्त करब तखने ने चारि परिवारक तीत-मीठ सोझामे औत। जखने तीत-मीठ सोझामे औत तखने ने किछु........?
कृष्णदेव- ई बात तँ सभ बुझै छिऐ जे गामक-समाजक- पढ़ल लिखक अपने सभ छिऐ। मुदा अपनो सबहक बीच तँ चारि रँगक जिनगियो अछि। जइठाम अहाँ सभकेँ दरमाहाक संग आनो आमदनी अछि तइठाम हमरा तँ मात्र दरमेहेटा अछि।
मनमोहन- (मूड़ी डोलबैत) हँ, ई तँ अछि।
कृष्णदेव- मुदा परिवार तँ जहिना अहाँ सबहक अछि तहिना अछि। खेनाइ-पीनाइ, कपड़ा-लत्ता, पढ़ाइ-लिखाइ तँ सभकेँ अछि। कनी सोचि कऽ देखियौ जे हम अहाँ सभसँ पछुआएल छी किने।
रघुनाथ- मानै छी। मुदा गामक बैसारमे गामक चर्च हएत किने। तइ हिसाबसँ तँ सभ जमीनदारे (अधिक जमीनबला, नै कि मालगुजारीबला) छी। गामक बारह आना जमीनक मालिक तँ अपने सभ छिऐ किने।
कृष्णदेव- हँ, से तँ छिऐहे। मुदा ओझरियो तँ असान नै अछि। जइ तरहक जिनगी बनि गेल अछि ओते कमाइ-दरमाहा-सँ पूरा नै पबै छी। अपने गाममे नै रहै छी जे खेतियो करब। तइपर सँ जँ एको धुर बेचब तँ प्रतिष्ठा माटिमे मिलत।
मनमोहन- तखन?
कृष्णदेव- जँ सबुर कऽ छोड़ियो देब सेहो नै हएत।
मनमोहन- ई तँ िवचित्र ओझरीमे फँसि गेल छी?
कृष्णदेव- बाल-बच्चाकेँ नीक स्कूल-कओलेजमे नै पढ़ाएब सेहो नै हएत। किछुए दिनक उपरान्त रिटायर करब तखन औझुका जकाँ दरमहो नै रहत। तीन-तीनटा कन्यादान अछि।
रघुनाथ- अच्छा, गामक बैसार संबंधमे विचार रखियौ।
कृष्णदेव- की विचार राखब, किछु फुड़बे ने करैए।
घनश्याम- आब अपन विचार दियौ डाॅक्टर सहाएब?
रघुनाथ- कृष्णदेव बाबूसँ कनियो नीक नै छी।
घनश्याम- से किअए? हुनके जकाँ बेतनेटा पर तँ नै छी?
रघुनाथ- बेस कहलौं। दुरसक ढोल सोहनगर लगै छै। मुदा लगमे.......।
मनमोहन- जँ लग तबला हाथ बजौल जाए, तखन.......?
रघुनाथ- बेस कहै छी। तबले जकाँ ढोलोक मुँह छोट आ पॉलिस कएल होइए। रिटायर भेने पेन्शन (अधा दरमाहा) पर आबि गेलौं। जते जाँच-जुच करैक यंत्र कीनने छी ओ पैछला खाढ़िक भऽ गेल। नवका ठाढ़ भऽ गेल। अपन जे इलाजक प्रक्रिया छल ओ पछड़ि गेल।
मनमोहन- आगूक कि साचै छिऐ?
रघुनाथ- रोग-रोगी आ इलाज छोड़ि सोचलौं कहिया जे आन बात सोचब।
मनमोहन- जीब केना?
रघुनाथ- जे भाेग-पारसमे हएत से थोड़े िकयो बाँटि लेत। जाबे सुखक दिन छल सुख केलाैं, दुखक दिन औत दुख करब। यएह ने भगवानक लीला छियनि।
घनश्याम- अपने सभ जे एना सोचबै तखन समाज केना आगू बढ़त? समुद्रक ज्वार जकाँ तँ समाजक गति नै छैक।
रघुनाथ- (कने गुम्म भऽ, मूड़ी डोलबैत) प्रश्न तँ विचारणीय अछि। मुदा आगूक स्पष्ट रास्ता कहाँ देख पबै छी। कनी समए िदअ, पछाति कहब।
मनमोहन- भाय सहाएब, अहाँ अहाँसँ कनियो नीक नै छी।
घनश्याम- (मुस्कुराइत) से की। से की?
मनमोहन- ओना पाँच बर्ख नोकरी बँचल अछि। मुदा जे रूखि देख रहल छी ओइसँ बुझि पड़ैए जे आगूमे बनरफाँस लटकल अछि।
घनश्याम- से केना?
मनमोहन- अपने इंजीनियर बनि गामसँ शहर एलौं आ बेटा एग्रीकल्चर पढ़ि गामेक ब्लौकमे जुआइन केलक।
घनश्याम- ई तँ बढ़ियाँ बात।
मनमोहन- अपने कतऽ रहब। सभ दिन शहरमे रहलौं आब गाममे नीक लागत?
घनश्याम- शहरेमे रहब।
मनमोहन- कहलौं तँ बड़बढ़िया। अपन बेटा-पुतोहू गाममे रहत। रिटायर भेलापर सरकारिये अमिला-फमिला रँगगर कपड़ा पहिरा विदा कऽ देत। तखन.......?
घनश्याम- तखन की?
मनमोहन- बुढ़ाढ़ीमे एक गिलास पानियो के देत।
घनश्याम- गामे चलि आएब।
मनमोहन- (मजबूरी हँसी) सभ दिन पढ़ल-लिखल लोकक बीच प्रतिष्ठा बना रहि रहल छी। मुदा गामक कोन लूरि अछि जे बुद्धिक उपयोग करब।
घनश्याम- नै बुझलौं?
मनमोहन- जेकरा जइ काजक लूरि रहल ओ ओहीमे ने बुद्धियार अछि। मुदा हम?
रघुनाथ- तीनू गोटेक बात तँ सभ सुनबे केलौं। अहीं (घनश्याम) आब विचार िदयौ।
घनश्याम- भाय सहाएब, अपने बिगड़ि गेलिऐ।
रघुनाथ- बिगड़ब किअए। मुदा.......।
घनश्याम- मुदा की?
रघुनाथ- बिनु बुझल पैघ रोग रहितो जँ रोगीकेँ रोगक जनतब नै दऽ रोगमुक्त होइले दवाइ खाइले कहबै तँ हँसी-खुशी खाइए।
घनश्याम- हँ से तँ खाइए। मुदा इहो तँ होइ छै जे समुचित ढंगसँ रोगक जनतब दऽ इलाजोक प्रक्रियाक जनतब देल जाए तँ आरो खुशीसँ दवाइ खाइए।
मनमोहन- हँ, इहो तँ होइए।
घनश्याम- मनमोहन भाय, जहिना रोगक निदान डॉक्टर, इंजीनिक निदान इंजीनियर करैत छथि तहिना समाज कल्याणक निदान समाजशास्त्री करै छथि। मुदा.......?
मनमोहन- मुदा की?
कृष्णदेव- (बिचहिमे) समाजशास्त्री तँ हमहूँ छी। जिनगी भरि समाजशास्त्रे पढ़लौं। मुदा......।
घनश्याम- भाय सहाएब, अपने अधिकारी विद्वान छिऐ, तँए........?
कृष्णदेव- तँए की?
घनश्याम- हम बैंकर नै छी, मुदा बैंकक काज केने समाज आ धनक संबंध थोड़-थाड़ बुझए लगलौं। तँए कृष्णदेव भायसँ आग्रह करबनि जे जँ आदेश दथि तँ किछु कहबनि।
कृष्णदेव- जखन सभ एक प्रश्नपर बैसल छी तखन आदेशक कोन प्रश्न। अखन तँ सभ अपन-अपन सुझिक अनुसार सुझाव राखि रहल छी।
घनश्याम- अपने तँ किताबमे लिखल पढ़ै छी मुदा किताबी बात ताधरि ठमकल रहत जाधरि समाजक गतिक अनुकूल चलैत नै रहत।
कृष्णदेव- (साँस छोड़ि) हूँ......।
घनश्याम- अखन जइ काजे बैसलौं तइपर विचार करू। कोनो काज करैक जेहेन इच्छा शक्ति लोकमे रहै छै ओ ओते आगू बढ़ि कऽ सकैए। तँ कोनो ऐहेन समस्या नै छै जेकर समाधान नै भऽ सकैए। सभ कियो आदेश दी तँ.......?
(तीनू गोटे)
तीनू गोटे- (कृष्णदेव, रघुनाथ आ मनमोहन) आदेशे-आदेश। खुलि कऽ बाजू।
घनश्याम- रघुनाथ भाय छथि, शहरमे पछड़ि रहला अछि मुदा गाम तँ ओइ जगहपर ठाढ़ अछि जइ जगहपर रोगक इलाजक लेल अखनो झाड़-फूक आ टोना-टापर होइए।
रघुनाथ- (मुस्की दैत) बेस कहलौं।
घनश्याम- एहिना सभ समस्या अछि। जरूरत अछि एक-एक समस्यामे एक-एक आदमीकेँ सटाएब। जखने समस्यासँ आदमी सटत तखने......।
रघुनाथ- ठीके कहै छी घनश्याम। गामक संबंधमे.......?
घनश्याम- भाय, एक तँ ओहिना बाढ़ि-रौदीक चपेटमे पड़ि गाम अधमरू भऽ गेल अछि, तइपर लोकोक किरदानी एहेन रहैए जे आरो गर्तमे ठेल रहल अछि।
कृष्णदेव- ऐठाम चारिये गोटे छी, तँए सबहक (सौंसे गौआँक) बीचमे बैस जे विचार करब ओ ओते अधिक नीक हएत।
पटाक्षेप
एगारहम दृश्य
(नसीवलालक दरबज्जा। कर्मदेव आ नसीवलाल गप-सप्प करैत।)
नसीवलाल- काजक की समाचार अछि बौआ कर्मदेव?
कर्मदेव- तीत-मीठ दुनू अछि।
नसीवलाल- (मुस्कुराइत) तीत-मीठ दुनू अछि। बेसी कोन अछि?
कर्मदेव- स्पष्ट कहाँ बुझि पौलौ। जँ स्पष्ट रहैत तँ दुनूकेँ मिला कहितौं।
नसीवलाल- ओ मिलबो मोसकिल अछि।
कर्मदेव- ओ कोना मिलत?
नसीवलाल- प्रकृतिक अद्भुत खेल अछि। किछु वस्तु एहेन होइए जे अपन सुआद आरो गाढ़ बनबैए। तँ किछु अपने सुआदे बदलि लैत अछि। तीतसँ मीठ आ मीठसँ तीत भऽ जाइए। किछु एहनो अछि जे ने तीते अछि आ ने मीठे। दुनूक बीच अछि।
कर्मदेव- एहेन पेंचगर स्थितिमे सोझराएब कठिन अछि।
नसीवलाल- एहेन कोन दुख अछि जेकर दवाइ नइए। भलहिं ओ दवाइ समझसँ बाहर किअए ने हुअए।
कर्मदेव- तखन?
नसीवलाल- सभ खेल जिनगीये ले चलैए। ऐ प्रश्नक उत्तर दू गोटेक बीच नै भेटत। प्रश्नो ओझराएल-ए। एहेन ओझरी लगल अछि जेहन अमती आ तेतरिक सुआद बेराएब।
कर्मदेव- (विहुँसैत) आगू कि करब?
नसीवलाल- जानकारी (बैसारक) भेलापर कि कहलनि?
कर्मदेव- बैसारमे भाग लेबाक आश्वासन तँ सभ देलनि।
(आभा आ शान्तीक प्रवेश)
नसीवलाल- आभा आ शान्ती तँ आबिये गेलीह। चारि गोटे सेहो भेलौं। कनी पहिने कि कनी पाछू ओहो सभ एबे करताह।
कर्मदेव- हुनका सभकेँ बजौने आबी।
नसीवलाल- नै जरूरी अछि। जिनगी दू रस्ते चलैत अछि। एक काजक सवारीसँ दोसक खाली-खाली।
कर्मदेव- की मतलब?
नसीवलाल- काजक सवारी कतबो उभर-खाभर होइत किअए ने चलए मुदा सुरो-सुन्दरीसँ बेसी सोहनगर होइए। जइसँ समैक ठेकाने बिला जाइत अछि।
कर्मदेव- तखन?
नसीवलाल- एबे करताह। काजक अपन महत्व होइए। जे महत्व सभ समान दृष्टिये नै बुझैत छथि। जेकर फल समए पाबि नीकसँ बेसी अधले भऽ जाइए।
आभा- हमहूँ घरपर सँ सोझे कहाँ एलौं। जलखै खा कऽ जे निकललौं से निकलले छी।
कर्मदेव- कतौ बाहर गेल छलौं?
आभा- गामसँ कहाँ बहराएल छलौं। मुदा गामोमे तँ रँग-विरँगक सरोवर, झील, जंगल, पहाड़ अछि। जेकरा पार करैमे किछु अधिक समए, सरपट रास्तासँ, बेसी लगिते अछि।
कर्मदेव- कि मतलब?
आभा- मतलब यएह जे एक तँ ओहिना कुम्मकर्णी नीनमे अधासँ बेसी सुतल अछि। तइपर सँ दुखक दर्द सेहो सुता रहल अछि।
नसीवलाल- ई तँ होइते अछि जे जइ खेतकेँ जोत-कोड़ नै होइ छै ओ रौद-वरसात पाबि परती बनि जाइए। मुदा पृथ्वी पुत्र ओकरो उपजाउ बनाइये लइए।
कर्मदेव- (मूड़ी डोलबैत) हूँ-अ-अ।
नसीवलाल- जे जिबटगर अछि ओकरा परतिये तोड़ब बेसी नीक लगै छै।
शान्ती- चाचाजी, कनी काल सोचए लगै छी तँ छगुन्तामे पड़ि जाइ छी जे हम सभ केहेन स्वतंत्र देशक जिम्मेदार नागरिक छी। जिम्मेदारी की छी आ कतऽ अछि।
नसीवलाल- प्रश्न तँ गंभीर अछि। मुदा बेहद खुशी भऽ रहल अछि जे एहेन प्रश्नपर नजरि जा रहल अछि। धन्यवाद।
शान्ती- (उत्साहित होइत) चाचाजी जहिना गहबरकेँ आँचरसँ पोछि नोरसँ नीप भक्तिनि एकटंगा दऽ शक्तिसँ शक्ति पबैत तहिना मन हुअए लगैए।
नसीवलाल- विचार तँ बहुत पैघ अछि। मुदा ओइले धरतीमे जमि कऽ पएर रोपए पड़त।
शान्ती- कि मतलब?
नसीवलाल- मतलबसँ पहिने ई कहू जे जेकर प्रतिनिधित्व (अगुआइ) करै छिऐ ओ कतऽ ठाढ़ अछि?
शान्ती- ठाढ़ तँ कम्मे देखै छी। बेसीकेँ तँ जहिना मुइल नढ़ियाकेँ कुत्ता लिड़ी-बिड़ी कऽ खाइत अछि तहिना समस्या खा रहल अछि।
नसीवलाल- समस्याक रँग-रूप केहेन अछि?
शान्ती- कते कहब।
नसीवलाल- किछुओ जँ बाजब नै तँ आन केना बुझत?
शान्ती- चाचाजी, (माथक घाम पोछैत) कियो खोपड़ी ले तरसैए तँ कियो ताजमहल ले, कियो दूधक धारमे नहाइए तँ कियो एक घोंट लेल।
(सुकदेव, सोमन आ मनचनक प्रवेश)
आभा- जहिना मनचन भायकेँ पछुआ रोटी भौजी खुअबैत छथिन तहिना गामोक काजमे।
मनचन- (विहुँसैत) भरि दिन अहूँ बाल-बोधकेँ सिखबैत हेबै जे खाइमे (भोजमे) आगू आ काजमे पाछू रही।
आभा- से कहाँ सिखबै िछऐ। सिखबै छिऐ जे पहिने करू तखन खाउ। ककहारामे जहिना डारि-पात छुटैत जाइए तहिना।
मनचन- (अधहँसी) भूखे भजन ने होइ गोपाला।
आभा- कठिया लाड़निक कोन काज होइ छै, से तँ......?
मनचन- हँ, से तँ जिनगीमे कते पँचकठिया देखलौं आ आगूओ देखब।
सुकदेव- (दमसैत) रे बूड़िवाण, सभ दिन एक्के रंग रहमे। उमेरक ठेकान नै छौ।
मनचन- भैया, दुनू हाथ उठा भगवानोकेँ यएह करै छियनि जे जहिना जिनगी भरि गाए दूधे दैत रहि जाइए, आमक गाछ आमे तहिना हँसते-खेलते दिवस काटि ली। की लऽ एलौं आ कि लऽ जाएब।
नसीवलाल- अखन जइ काजे सभ एकठाम छी से काज करै जाइ जाउ?
सुकदेव- की बाउ कर्मदेव, जिनका सभ ऐठाम गेल छलौं ओ सभ औता कि नै?
कर्मदेव- कहलनि तँ सभ। मुदा.....?
सुकदेव- मुदा की?
कर्मदेव- पढ़ल-लिखल लोकक कोन ठेकान। एक-एकटा बातक सत्तरह-सत्तरहटा अर्थ अगर-मगर करैत बुझैत छथि। तँए....?
सुकदेव- तँए की?
कर्मदेव- यएह जे हमरा गप्पक कि माने लगौलनि। से थोड़े बुझै छी।
सुकदेव- गामक-समाजक- प्रति किनकर केहेन आकर्षण छन्हि?
कर्मदेव- ओना सबहक उपरा-उपरी छन्हि। मुदा घनश्याम कक्काक किछु विशेष छन्हि।
सुकदेव- आरो गोटेक?
कर्मदेव- सभ अपने बेथे बेथाएल छथि। मुदा घनश्याम कक्काक जेहने बेवहार छन्हि तेहने आगू देखैक विचार। असकरो जँ ओ आबि जाथि तैयौ बहुत-किछु भऽ सकैए।
नसीवलाल- जँ चौथाइयो बल बाहरसँ भेट जाए तैयौ उठि कऽ ठाढ़ होइमे सूहलियत हएत।
मनचन- नसीवलाल भैया, जहिना पानिमे डूबैत चुट्टीकेँ साधारनो खढ़ भेटने जान बचै छै तहिना जँ कनियो आस भेटत तैयौ कदमक गाछमे मचकी लगा झूलि लेब। चारियो आनासँ कम भोट पौने एम.एल.ए. एम.पी. बनि मुर्गी दकड़ैए आ हम सभ भातो-रोटी नै खा सकै छी।
आभा- अहाँ भोट दै छिऐ की नै?
मनचन- किअए ने देबै।
आभा- ककरा दै छिऐ।
मनचन- जेकरा जीतैत देखै छिऐ तेकरा।
अाभा- से पहिने केना बुझै छऐ?
मनचन- हद करै छी। जखन जीतक घोषणा होइ छै तखन जा कऽ माला पहिरा दै छिऐ।
आभा- ओ मानि लइए?
मनचन- किअए नै मानत। जे अपने सात घाटक पानि पीब गरिथानि जकाँ बजैए आ पतिवरता कहबैए, ओ किअए ने मानत।
आभा- तब ते अहाँ ठकोसँ नमहर ठक छी।
मनचन- से केना?
आभा- ठक तँ ओ भेल जे निरीह, मुँहदुब्बर, सोझमतियाकेँ ठकैत अछि आ अहाँ तँ ठकक ठक भेलौं।
मनचन- एहिना ने उनटल गंगामे लोक नहा गंगा-स्नानक फल गंगासँ मंगैत छन्हि।
आभा- गंगा दै छथिन?
मनचन- किअए ने देथिन। भलहिं सुनटाक फल देथिन वा नै नहि उनटाक फल किअए ने देथिन।
आभा- कोना दै छथिन?
मनचन- साँपक केचुआ देखलिऐहेँ?
आभा- किअए ने देखबै?
मनचन- की ओइ केचुआमे साँपे जकाँ मुँहसँ नांगड़ि तक नै रहै छै?
आभा- हँ, से तँ रहै छै।
मनचन- तखन।
आभा- मुदा?
मनचन- मुदा तुदा किछु नै। अहाँकेँ बुझैमे फेर अछि। देखै छिऐ िकने जे गामक सभ कहत जे एकोटा आॅफिसमे बिना घुस नेने काज नै चलैए।
अाभा- हँ से तँ अछिये।
मनचन- मुदा पाइ लऽ लऽ भोँट दै छिऐ सेहो कहियो।
आभा- यएह बुझैक बात अछि, जखैन भोटरसँ भोँट लेनिहार धरि घुसेक बेपार करए लगत तखैन जुग बदलतै।
पटाक्षेप
बारहम दृश्य
(गामक विद्यालयक आंगन। बच्चा सभ फील्डपर खेलैत। रस्ता धऽ कऽ राही सभ चलैत। गोल-मोल बैसार। एकठाम कृष्णदेव, मनमोहन आ रघुनाथ बैसल। बगलमे घनश्याम, नसीवलाल, सुकदेव आ गामक लोक बैसल।)
क्रमश:
ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
जगदीश प्रसाद मण्डल
कथा
मायराम
अमावास्याक राति, बारहसँ उपर भऽ गेल मुदा एक नै बाजल। डंडी-तराजू माथसँ निच्चा उतड़ि गेल। सन-सन करैत अन्हार।नअ बजेमे निन्न पड़ैवाली मायरामकेँ आँखिक नीन निपत्ता। कछमछ करैत ओछाइनपर एक करसँ दोसर कर उनटैत-पुनटैत, अकछि केबार खोलि बाहर निकलली तँ काजर घोराएल रातिमे अपनो हाथ-पएर नै सुझन्हि। जहिना करिछौंह दुनियाँ आँखिसँ नै देखथि तहिना दसो दुआरि बन्न मन खलिआएल बुझि पड़लनि। पुन: घुरि कऽ ओछाइनपर आबि आेंघरा गेलीह। दिन-रातिक बोध-वहीन मन तड़पि उठलनि- “नैहर।”
पहिल सन्तान भेलोपरान्त सुदामा (मायराम) बाइसे बर्खमे विधवा भऽ गेलीह। गत्र-गत्रसँ जुआनी, फुलझड़ीक लुत्ती जकाँ, छिटकैत! ओना सरकारी रजिष्टरमे जुआन भऽ गेल छलीह मुदा बत्तीसीक अंतिम दना नै उगल रहनि। साँपक बीखसँ करिआएल देह देख अपनो मरनासन भऽ गेलीह। पथराएल आँखि टक-टक टकैत मुदा अन्हारसँ अन्हराएल। बगलमे डेढ़ बर्खक बेटा उठैत-खसैत अंगना-घर घुमैत-फिड़ैत। तइ बीच हहाएल-फुहाएल शंकरदेव (भाय) आँखिमे यमुनाक धार नेने पहुँचलाह। बहीन बहिनोइक रूप देख अपन आँखिक नोर पोछि भागिनकेँ उठा छाती सटा, बहिन (सुदामा)केँ कहलखिन- “बुच्ची होश करू। दुनियाँक यएह खेल छिऐ। अहीं जकाँ नानियोकेँ भेल रहनि। मुदा आइ केहन भरल-पूरल्ा परिवार छन्हि। एक ने एक दिन, ओहिना अहूँक परिवार दुनियाँक फुलवाड़ीमे फुलाएल।”
शंकरदेवक बात सुनि सुदामाक आँखि खुजल मुदा बकार नै फुटलनि। मुदा नर-नारीक करेजो तँ दू धारक दू माइटिक सदृश्य होइत बहिनोइक जरबैक ओरियानमे आंगनसँ निकलि शंकर समाजक दिस बढ़लाह।
पनरहम दिन बहिनकेँ संग नेने अपना गाम विदा भेला। गामक सीमानपर अबिते गाममे कन्नारोहट शुरू भेल। बच्चासँ बूढ़ि धरि सुदामाकेँ छाती लगबए आगू बढ़ल। बेचारी निसहाय भेल पड़ल। जहिना चांगरा परक घर खसैत, तहिना। मुदा ताधरि गामक धरोहिक अगिला अंक पहुँच गेल। एक्के-दुइये ढेरो छाती सुदामाक छातीमे सटि, चारू दिससँ पकड़ि टोल दिस बढ़ल। सुदामाक मनमे उठलनि जँ अपने कानब तँ समाजक कानब केना सुनबै। सं नै तँ समाजेक कानब सुनि जे आगूक जिनगी केना जीब। बीच आंगनमे माय ओंघरनिया दैत आ दरबज्जापर पिता भुइयेँ पेटअकान देने। अपन-अपन अथाह समुद्रमे सभ डूबल। के ककर नोर पोछत। पएर भतीजी धाेय गाराजोरी केने आंगन बढ़लि। दुरखापर पएर दैतै सुदामाक रूदनसँ निकलल- “हे मइया...।”
जहिना धड़सँ कटल अंग छटपटाइत तहिना कामिनीक (माए) मन छटपटाइत-छटपटाइत मनमे प्रश्नपर प्रश्न उठए लगलनि। मुदा कोनो प्रश्नक सोझ रास्ता नै देख काँटक ओझरी जकाँ मन ओझराए लगलनि। एक ओझरी छोड़बथि बीचेमे दोसर लगि जाइन।
.....कि आगूक जिनगीक लेल बेटीकेँ दोसर वियाह कऽ देब। फेर उनटि, जिनगीक लेल सहचर तँ आवश्यक अछि?
.....कि सहचरक लेल पति आवश्यक अछि? मुदा जते असानीसँ गुंथी खोलए चाहथि ओते असानीसँ खुजबे ने करनि। तइ बीच दोसर प्रश्न अकुर जाइन। बेटीक संग नातियो अछि। जँ बेटी दोसर घरकेँ अपन घर बनाओत तँ नातिक.....?
पुत्र हत्याक पाप ककर कपार चढ़त? कि कुत्ता जकाँ पछिलग्गू एहेन सुकुमार फुलकेँ बना देब। अखन ओ दूधमुँह अछि, कि बुझत? अपन भूमि आ आनक भूमिक मरजादा एक्के रँग होइत। कि दोसरो घरमे ओहने ममता माइक भेटतै? मनुक्खेक क्रिया-कलाप ने कुल-खनदानक जड़िमे पानि ढारैत अछि। घुरियाएल मनकेँ राह भेटलनि। सुफल नारी जिनगी तँ वएह ने छी जेकरा आँचरक लाल मातृत्व प्रदान करैत अछि। जइसँ वीणाक झंकृत मधुर स्वर हृदेकेँ कम्पित करैत अछि। से तँ भेटिये गेल छै। मुदा जहिना ठनकैत आकाशसँ ठनका खसैत तहिना मनमे खसलनि- “मुदा समाज?”
कि मनुष्य-पोनगैक स्थिति समाजमे जीवित अछि।
सुदामाक सम्पन्न पितृ परिवार। अदौसँ श्रम-संस्कृतिक बीच पुष्पित-पल्लवित परिवार। जइसँ रग-रगमे समाएल अपन संस्कृति। ओना सम्पन्नताक सीमा असीमित अछि मुदा अपन आँट-पेट देख अपन (परिवार) जिनगीक स्तर बना चलब सम्पन्नताक अनेको कारणमे एक प्रमुख छी। तँए सम्पन्न परिवार। ओना आर्थिक दृष्टिये सुदामाक वियाह दब परिवारमे भेल छलनि मुदा व्यवहारिक दृष्टिये बराबरीमे छलनि। कम रहितो गोरहा खेत छलनि जइसँ खाइ-पीबैक कोताही नै। किछु आगुओ बढ़ि ससरैत। सालक तेरहम मासमे घरक कोठी-भरली झाड़ि इजोरिया दुतियासँ भागवत कथाक संग हरिवंश कथा सुनि, भोज-भनडारा कऽ सामा-चकेवा जकाँ आगू दिस बढ़ैत।
बेटाक पालन आ धरमक काज देख अपनो गाम आ चौबगलियो गामक लोक सुदामक नाओं मायराम रखि देलकनि। बच्चासँ बूढ़ धरि माइयेराम कहए लगलनि।
सुदामाक पिता रविशंकर परिवारमे चुल्हि नै पजड़ल। जखन सुदामा आइलि तखन जे कन्नारोहट शुरू भेल, से भरि दिन होइते रहि गेल। कखनो बेसी तँ कखनो कम। चुल्हि नै पजड़ने टोल-पड़ोसक परिवारसँ थारी-थारी भात-दालि एते आएल जे राति धरि चलैत रहल।
सायंकाल रविशंकर, आंगन ओसरपर बैस, सुदामाक भावी जिनगीक लेल पत्नियो आ बेटो-पुतोहूकेँ बैसाए विचार करए लगलाह। विचारोत्तर िनर्णए भेल जे काल्हिये शंकरदेव ओइठाम-सुदामाक सासुर- जा खेती-गिरहस्ती ताधरि सम्हारथि जाधरि बच्चा-सुदामाक बेटा जुआन नै भऽ जाए। संग-इहो भेल जे छह मास सुदामा सासुर आ छह मास नैहरमे रहत।
अठारह बर्ख पुरिते राहुलक वियाह भऽ गेल। नव परिवार बनि ठाढ़ भेल। शंकरदेव अपना ऐठाम चलि एलाह।
तीन साल बाद पिता रविशंकर आ पाँच साल बाद माए शंकरदेवक मरि गेलनि। मुदा दुनूठामक परिवारमे कोनो कमी नै रहल। हवाइ-जहाज जकाँ तेज गतिये तँ नै मुदा असथिर सवारी-टायरगाड़ी जकाँ परिवार आगू मुँहे ससरए लगल।
मायरामक प्रति समाजक नजरिया सेहो बदलल। समाजक आन विधवा जकाँ नै। जे कियो अशुभ बुझि कनछी कटैत तँ कियो पशुवत बेबहार लेल मरड़ाइत।
तीर्थस्थान जकाँ मायरामक परिवार बनि गेलनि। साले-साल भागवत कथाक संग हरिवंश कथा आ भोज-भनडारा कऽ समाजकेँ खुआ सालक विसर्जन मायराम करए लगलीह।
पाँच बर्ख पछाति मायरामक भरल-पुरल नैहर-शंकरदेवक परिवार- कोशीक कटनियासँ धार बनि गेल। गामक बीचो-बीच सनमुख धार बहए लगल।
घटनो अजीव घटल। चारि बजे करीब बाढ़िक हल्ला गाममे भेल। किरिण डुबैत-डुबैत धारक कटनिया शुरू भेल। गामक सभ बाध नदिया गेल। उत्तरसँ दछिन मुँहे बहए लगल। बाढ़िक बिकराल रूप देख गामक लोक माल-जाल, बक्सा-पेटीक संग ऊँचगर-ऊँचगर जमीनपर पहुँचल। नट-मघैया जकाँ नव बास बनि गेल।
बाढ़िक गूंगूआहट सुनि-सुनि सभ किछु बिसरि परान बचबैक बात सोचए लगल। चारू कात बाढ़ि पसरल। जइसँ इहो डर होइत जे जँ कहीं अहूपर पानि चढ़त तखन कि हएत? अन्हरिया राति, हाथ-हाथ नै सुझैत। जीवन-मरनक मचकीपर सभ झुलए लगल। भूख-पियास मेटा गेल। जहिना दुखित नव विआएल गाए-महीस व्यथित आँखिये बच्चाकेँ देखैत रहैत अछि तहिना सभ माए-बापक आँखि बाल-बच्चापर। मुदा मनुख तँ मनुख छी नहि कि जानवर। जेना जानवर हरियर घास देख बच्चो आगूक लुझि कऽ खा लैत अछि तेना मनुक्खो करत? बाल-बच्चाक लेल तँ मनुक्ख अपन खूनकेँ पानि बनबैत, अपन सुआदकेँ छोलनी धिपा दगैत, अपन मनोरथ बच्चामे देखैत अछि। अपन जिनगीकेँ बलिवेदीमे आहूत दैत अछि।
भोरहरबामे हल्ला भेल जे बीस नमरी पुल कटि कऽ दहा गेल। पुलक समाचार सुनि सबहक छाती डोलए लगल। पूव दिसक रास्ता बन्न भऽ गेल। किछुए काल पछाति पुन: हल्ला भेल जे बेटा संग रोगही पानिमे डूबि गेल। किछु काल धरि तँ हल्लामे बाते नै फुटैत मुदा तोड़मारि हल्लामे विहिआित-विहिआति समाचार विहिआ गेल। भासि कऽ कते दूर गेल हएत तेकर ठेकान नै तँए कियो आगू बढ़ैक हूबे ने केलक। जहिना एक टाँग टुटने गनगुआरि नै नेङराइत तहिना एक गोटे मुइने समाज थोड़े नेङराएत। सभ दिन होइत एलै आ होइत रहतै।
हल्ला शान्त होइते शंकरदेव पत्नीकेँ कहलखिन- “आब जान नै बँचत।”
पत्नी- “एते अन्हारमे कतऽ जाएब। भने ऐठाम छी।”
पति- “जँ अहूपर बाढ़ि चढ़ि जाएत?”
“सभ तूर संगे कोसीमे डूबि जाएब। कियो बँचब तखन ने दुख हएत। जँ दुख केनिहारे नै रहब तँ दुख ककरा हएत।”
पौरूकी घुटकल। आन-आन चिड़ै सुतले रहए। पौरूकी आवाज सुनि शंकरदेवक, दुभीक नव मूड़ी जकाँ, मनमे नव चेतना जगलनि। बजलाह- “भिनसर होइमे देरी नै अछि। जँए एते काल तँए कनी काल आरो। दिन-देखार तँ असगरो लोक अमेरिया चलि जाइए। अपना सभ तँ बाधक थोड़े रास्ता काटब।”
किरिण उगैसँ पहिनहि ऊँचकापर पानि चढ़ए लगल। चढ़ैत पानि देख हरविरड़ो भेल। गाए-महीस, बक्सा-पेटी छोड़ि सभ अपन जान बँचबए विदा भेल। जहिना बेरागी दुनियाँकेँ मायाजाल मानि, छोड़ि, आत्मचिन्तनमे लगि जाइत तहिना माल-असबाव छोड़ि सभ विदा भेल। तही बीच बाँसक झोंझमे मैनाक झौहरि भेल। जना ककरो बनबिलाड़ पकड़ि नेने होउ, तहिना।
पूब दिस फीक्का गुलावी जकाँ अकासमे पसरए लगल। मुदा बिलटैत जिनगी आ डुबैत सम्पत्तिक सोग अन्हारकेँ आरो बढ़बैत। सुखल जमीनपर पहुँचते छोट-छीन आशा शंकरदेवक मनमे जगलनि। मुदा चारू बच्चो आ पत्नियोक मनमे दुधाएल चाटल दानाक खखरी जकाँ। बेर-बेर शंका खेहारैत जे हो-न-हो फेर ने आगूएसँ बाढ़ि चलि आबए। मिरमिरा कऽ पत्नी शंकरदेवकेँ कहलनि- “एते लोकक गाममे एक्कोटा संगी नै देख रहल छी।”
“सभ अपने जान बँचबै पाछु अछि तखन के केकरा देखत।”
“जाबे लोक, भरल-पूरल रहैए ताबे दुनियाँ हरियर बुझि पड़ै छै। मुदा......।”
“हँ, से तँ होइते छै। मुदा......।”
“हँ इहो होइ छै। अखन माए जीबैए, कतऽ बौआएब। बच्चो सबहक मात्रिके भेल, अपनो नैहरे भेल आ अहूँक सासुरे।”
पत्नीक बात सुनि शंकरदेव गुम भऽ गेलाह। मनमे चुल्हिपर खौलैत पानि जकाँ विचार तर-उपर हुअ लगलनि। बजलाह- “कहलौं तँ बड़बढ़ियाँ। मुदा सासुरसँ नीक बहीन ऐठाम हएत।”
“केना?”
“जइ दिन वेचारिक उपर विपत्ति आएल छलै तइ दिन यएह देह अपन घर-परिवार छोड़ि ठाढ़ भेल छलै। आइ कि हमरे गाम-घर मेटा रहल अछि आकि ओकरो नैहर।”
“अहाँकेँ जे विचार हुअए।”
“विचारे नै, विपत्तिमे लोकक बुद्धि हरा जाइ छै। जइसँ नीक-अधलाक विचार नै कऽ पबैत अछि। मुदा अहीं कहूँ जे सासुरमे कान्हपर कोदारि लऽ कऽ खेत-पथार जाएब से केहेन हएत। अपन जे दुरगति हएत से तँ हेबे करत मुदा दुनू परिवारक-सासुर-नैहर- की गति हएत।”
बाढ़िक समाचार इलाकामे पसरि गेल। मायरामक कानमे सेहो पड़लनि। भाय-भौजाइक आशा-बाट तकैत मायराम बेटा राहुलकेँ संग केने आगू बढ़लीह। मुदा किछु दूर बढ़लापर सोगसँ पथराएल पएर उठबे ने करनि। बाटक बगलक गाछक निच्चा बैस बेटाकेँ कहलखिन- “बौआ, पएर तँ उठबे ने करैए। केना आगू जाएब? तू आगू बढ़ि कऽ देखहक।”
छबो तूर शंकरदेव ऐ आशासँ झटकल अबैत जे जते जल्दी पहुँचब ओते जल्दी बच्चा सभकेँ अन्न-पानिसँ भेँट हेतै। रौतुको सभ भुखले अछि। तइ बीच राहुलक नजरि मामपर आ मामक नजरि भागिनपर पड़ल। नजरि पड़िते राहुल दौड़ कऽ ठाढ़े मामाकेँ गोड़ लागि मामीक कोराक बच्चाकेँ लऽ बाजल- “माइयो अबैए मुदा डेगे ने उठै छलै। आगूमे बैसल अछि।”
राहुलक बात सुनि मामी बच्चा सभकेँ कहलखिन- “भैयाकेँ गोड़ लगहुन।”
बच्चाकेँ कोरामे नेने आगू-आगू आ पाछु-पाछु सभ कियो विदा भेला। सभसँ पाछु शंकरदेव अपने। मन पड़लनि रौतुका दृश्य। केना छनमे छनाक भऽ गेल। जिनगी भरिक जोड़िआएल घरक वस्तु-जात आगि लगने आकि बाढ़ि एने केना लगले नास भऽ जाइ छै। मान-प्रतिष्ठा, गुण-अवगुण, केना छनेमे कतएसँ कतऽ चलि जाइ छै। ठीके लोक बजैए जे दिन धराबे तीन नाम। अपने छी जे एक दिन बहीनक रक्षक बनि ऐ गाममे छलौं आ आइ......। एक दिन गाड़ीपर नाह आ एक दिन नाहपर गाड़ी। माटि-पानिक खेल छी। गंगा-यमुनाक बीच कतौ माटिओ छै अाकि पानिये-पानि छै।
किछु फरिक्केसँ भाय-भौजाइकेँ अबैत देख मायरामक मन ओइ धरतीपर पहुँच गेलनि जे सात समुद्रक बीच अछि। एक ओद्रक रहितो एक भिखारी दोसर राजा। परोपट्टाक लोक सिनेहसँ मायराम कहै छथि मुदा भैयाकेँ कि कहतनि। कि भैयाक कर्म विगड़ल छन्हि। एक परिवारक बचाओल कर्म छन्हि। चान, सुरूज, धरती, ग्रह-नक्षत्र इत्यादि तँ अपना गतिये करोड़ो बर्खसँ नियमित चलि रहल अछि आ चलैत रहत कि मनुक्खोक गति ओहन भऽ सकैए। आकि चाने-सुरूज जकाँ मनुक्खोक चलैक एकबटिये अछि। ब्रह्मक अंश जीवि रहितो कि फुलझड़ीक लुत्ती जकाँ नै अछि? जतऽ जेहेन जलवायु ततऽ तेहेन उपजा-बाड़ी। जँ कतौ वायु प्राणक रूपमे घट-घटकेँ आगू बढ़ैक प्रेरणा दैत तँ वएह विषाक्त बनि प्राण नै लैत। गोलाक चोटसँ जहिना पोखरिक पानिमे हिलकोर उठैत आ आस्ते-आस्ते असथिर होइत चिक्कन आंगन जकाँ सहीट बनि जाइत तहिना मायरामक मन सहीट भऽ गेलनि। मुदा लगले नजरि उड़ि भतीजीपर गेलनि। भतीजीपर पहुँचते मन तड़पए लगलनि। बाप रे बाप, एहेन दुरकालमे भैया केना इज्जत बचौताह। अपनो लग जमा किछु तँ नहिये अछि साले-साल हिसाव फरिया लइ छी। हे भगवान जँ ककरो दुखे दइ छऐ आकि सुखे दइ छिऐ तँ तुलसी पात आकि दूबिक मूड़ी जकाँ खोंटि-खाेंटि किअए ने दइ छिऐ जे गुलाब-गेन्दा तोड़िये कऽ दऽ दइ छिऐ। लगले नजरि मायराम छिपा जकाँ छिहलि अपन मातृत्वपर पहुँच गेलनि। केना बेटाकेँ पोसि-पालि ठाढ़ केलौं आ ई सभ.........। लुधकी लागल एकटा गाछ फड़बे करत तइसँ गामक सबहक मुँहमे थोड़े जाएत। जते मनुख अछि ओकरा तँ धरतीसँ अकास धरि चाहये। तखन ने जीबैक आजादी भेटतै। मुदा लगले जहिना पानि ठंढ़ेने बरकक रूप लिअए लगैत तहिना दूधसँ उपजैत दही जकाँ मायरामक मन सकताए लगलनि। साँस सुषुमा गेलनि। मनमे खौललनि। नैहर मेटा गेल तँए कि सासुरो मेटा गेल। जहिना भैया नैहरमे भैया छलाह तहिना अहूठाम भैया रहताह। भगवान अपन कोखि अगते लऽ लेलनि तँए कि ओकरा-भतीजी- अपन कोखिक नै बुझबै। ऐठाम जे अछि ओ कि भैयाक नै छियनि। खेत-पथार, घर-दुआरि चलि गेलनि आकि हाथे-पएर चलि गेलनि।
गुमे-गुम, जहिना मृत्युक अवसरपर गुम भऽ असमरन कऽ निराकरणक बाट जोहल जाइत, तहिना सभ घरपर पहुँचलाह। ताधरि पुतोहू-रोहितक पत्नी- हाँइ-हाँइ कऽ खिचैड़ आ अल्लूक सन्ना बना, बाट तकैत रहथि। सबहक आँखि सभ दिस हुलैक-हुलैक बौआइत। तइ बीच राहुलक कोरक छोटका बच्चा, घर देखिते, बाजल- “दीदी, बड़ भूख लागल ऐछ?”
बच्चाक बात सुनि मायरामक भक्क टुटलनि। अनायास मन पड़लनि बटोहीकेँ जहिना इनारपर ठाढ़े-ठाढ़ पानि पिऔल जाइत तहिना ने अखन इहो सभ छथि। नहाय-धोयमे अनेरे देरी िकअए लगाएब। बजलीह- “कनियाँ, भरि रातिक थाकल-ठेहियाएल सभ छथि तँए पहिने किछु खुआ कऽ आराम करए दिअनु। गप-सप्प पछातियो हेतै। भोजन बादेक आराम तँ सोग कम करैक उपाए छी।”
ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
प्रभात राय भट्ट
मिथिला गर्भपुत्र
माँ हम अहाक गर्भ मे पलिरहल्छी,मुदा जन्म लेबS पहिले हम अपन मोनक बात किछ आहा के सुनाब चाहैत छि!
यी हमर पुनर्जन्म अछी हमअहि मिथिलांचल के जनकपुरधाम मे जन्मलरहलौ ताहि समय मे विदेह एकटा समृद्ध राष्ट्र रहैक जेकर अपन भाषा अपन भेष बिदेह के गौरव रहैक,कोशी स गण्डकी तक गंगा स हिमालय के पट यी सम्पूर्ण भूमि मिथिलांचल रहैक जतय कोशी कमला विल्वती यमुनी भूयसी गेरुका जलाधीका दुधमती व्याघ्र्मती विरजा मांडवी इछावती लक्ष्मणा वाग्मती गण्डकी अर्थात गंगा
आर हिमालय के मध्य भाग मे यी पंद्रहनदी के अंतर्गत परम पवन तिरहुत
देश विख्यात छल ! जतये कोशी कमला क वेग स संगीत उत्पन होइत्छल दुधमतीस
दूध बहथी नारायणी मे स्नान कैयलास स्वस्थ
काया भेटैत छल, गण्डकी के वेग स प्रेरित कवी गंडक काव्यसुधा रचित छल,कवी कौशकी कोशी तट बईस काव्यवाचन
करैत छल !
अनमोलसंस्कृति आर अनुपम प्रकृति केर उद्गमस्थल याह मिथिलाधाम छल बागबगीचा मे कोइली मीठ मीठ संगीत गबै छल !
शुभ-प्रभातक लाली स मिथिलाक जनजीवन स्वर्णिम छल !हर घर मंदिर आ लोग इह के साधू संत छल चाहे कोनो मौसम होइक सद्खन ईहाबहैत बसंत छल ! पग पग पोखईर माछ मखान मीठ मीठ बोली मुह मे पान इ छल मिथिलाक पहिचान, अहि ठाम जन्म लेलैथ पैघ पैघ विद्वान वाचस्पति, विद्यापति, गौतम, कपिल, कणाद, जौमिनी, शतानंद, श्रृंगी, ऋषि याज्ञवल्क्य, सांडिल, मंडन मिश्र, कुमारिल भट्ट, नागार्जुन, वाल्मीकि, कवी कौशकी, कवी गंडक, कालिदास,
कवीर दास, महावीर यी सब छलैथ मिथिलापुत्र एतही जन्म लेलैथ माँ जानकी राजर्षि जनक के पुत्रीक रूप मे !एतही भगवान शिव उगना महादेव
के रुपमे महा कवी विद्यापति के चाकर बनलाह ! मिथिला भूमि से अवतरित होइत छल ऋषि मुनि साधू संत भगवान ताहि स
कहलगेल की यी मिथिलाभूमिअछि वसुधा के
हृदय !
मिथिलाक मान समान स्वाभिमान भाषा भेष
प्रेम स्नेह ज्ञान विज्ञान विश्व बिख्यात छल! अहि ठाम जन्म लेबक लेल देवी देबता सबलालायित होइत छल ! तायहेतु हमहू पूर्व जन्म मे माँ जानकी s
कमाना कयने रहलू जे हे माता जाऊ हम फेर
मानव कोइख मे जन्म ली ता हमरा मिथिले मेजन्म देव !
ताहि स हम अपनेक
कोइख मे पली रहल छि! मुदा आजुक
मिथिलाक दुर्दशा देखिक हम संकोचित भगेल्हू,विस्वास नए bh हरहाल अछि जे यी वाह्य
मिथिला छई राजर्षि जनक के नगरी वैदेहिक गाम की कोनो दोसर ?सब किछ बदलल बदलल जिका लगैय,कियो कहिय हम नेपाल
के मिथिला मे छि ता कियो कहैय हम
विहार के मिथिला मे छि यी विदेह
नगरी दू भाग मे विभक्त कोना भगेलई माए? राजा प्रजा
शाषक जनता भाषा भेष व्यबहार व्यापार ज्ञान विज्ञान सब किछ बदलल बुझाईय !मिथिलाक अस्तित्व विलीन आ परतंत्र शासन
के आधीन मे हमर मिथिला कोना आबिगेल माए ? मैथिल भाषा कियो नए बाजैय, धोती कुरता फाग के उपहास भरह्लय,महा कवी
विद्यापति क गीत कियो नए गबैय ! मिथिलाक संस्कृति लोप के स्थिति मे कोना आबिगेल माए ?समां चकेवा ,जट जटिन,झिझिया,
झूमर,झंडा निर्त्य,सल्हेश कुमार्विर्ज्वान,आल्हा उदल,कजरी मल्हार यी नाट्यकला सब कतय चलिगेल ? मिथिलाक एतिहासिक स्थल
सब एतेक जरजट कोना भगेल ?माए हम त पुनर्जन्म मांगने छलु मिथिला राज्य मे मुदा आहा अछि विहार मे,माए हम त पुनर्जन्म
मांगने छलु मिथिला राज्य मे मुदा आहा अछि नेपाल मे ,माए हमर विदेह राज्य कतय चलिगेल ?माए हम त अपन मिथिला राज्य
मे जन्म लेब चाहैत छि मिथिला माए क कोरा सन निश्छल आ बत्सल प्रेम खोजलो स नए भेटत चहुओरा मे !हम अपन मोनक सबटा
जिज्ञासा ब्यक्त केनु आब आहा किछ मार्गदर्शन करू माए !हम मजधार मे फसल छि हमर करूणा सुनी हमर सपना साकार करू माए !!!
ऐ रचनापर अपन मतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
राजदेव मण्डल
उपन्यास
हमर टोल
(गतांषसँ आगाँ)
ढेरूवा नै नाचै छै असलमे जागेसरक मन नाचै छै। सुतरी कटा रहल छै- कतौ मोट कतौ पातर। मन थिर रहै तब ने। मनकेँ थिर राखब बड्ड कठिन। ई तँ कियो साधक कऽ सकैत छै। सभ जँ साधक भऽ जेतै तँ देश दुनियाँकेँ कोन गति हेतइ। तँए पहिने मन उड़ै छै तब तन।
जागेसरक मन धारक थौकड़ा जकाँ उपला रहल अछि।
आइ तँ भुटायौ वैध जबाब दऽ देलकै- “धर्मडीहीवालीकेँ सन्तान नै हेतौ। विधाता कलम मारि देने छौ। एकर कोखि ऐ जनममे नै भरतौ।”
हौ बा आब कोन उपाय हेतै हो। पहिने तँ लोक खोंखीबाला कहै छलै। आब मुँह दाबि कऽ कहै छै- “निरवंश।”
दुआरिपर जगेसरा ढेरूआकेँ गिनगिना रहल अछि। सँगे ओकर माथा घूमि रहल अछि आ माथामे घूमि रहल अछि- धर्मडीहीवाली। किन्तु पछिला फूइसक घर थिर अछि।
ठीके कहै छलै- उचितवक्ता- “हटा ऐ ठाँठ गाएकेँ। कर दोसर वियाह। ला टटका माल। नीक नसल देख-सुनि कऽ। पुरहिया लऽ आन। चाइरे-पान सालमे छौड़ा-छौड़ीसँ खोभारी भरि जेतौा।”
नसल तँ एकरो खराब नहिए छै। नमगर-छरहर काजा, भरल-पूरल सीना। जखनी सिंगार कऽ कए निकलै छै तँ संगी-साथीकेँ कहए पड़ै छै- “जगेसरा भागशाली अछि। अपना तँ कमजोर करिआएल बेमरियाह अछि। किन्तु ओकरा मौगीकेँ देखियौ। जँ आगूसँ निकलै छै तँ मन फुरफुरा उठै छै।”
भाग्यशाली कतऽ। भाग्य कतएसँ नीक हएत। सुन्दर तँ अछि लेकिन बाँझ। जँ निपूतर रहब तँ पिण्डदान के करत। हमरा बाद सम्पतिकेँ के भोगत? बुढ़ारीमे सहारा के बनत?
ओह ऐ औरतियाकेँ भगबहि पड़त। ठीके कहै छलै- उचितवक्ता। लेकिन भगेबै केना? छै तँ ई बड़ जब्बर।
ओइदिन खेलावन भगतसँ झाड़फूँक करबैले गेलिये। एके झापटमे भगतकेँ दाँत चियाइर कऽ खसा देलकै। महतो बाबाकेँ थानसँ भभूत लाबि देलिऐ। छाउर बुझि कऽ मूतनारमे फेक देलकै। यएह भोंसड़ीकेँ बिसबासे नै छै किछोपर। फल कतएसँ भेटतै?
आब एकरा डेँगा-ठेठा कऽ भगबहि पड़तै। लेकिन केना कऽ आँखि उनटा कऽ जँ हमरा दिस तकै छै तँ हमरा लघी लगि जाइत अछि। तैयो हम तँ मरद छी, देह तानहि पड़त।
हम जँ मौगा बनल रहबै तँ उ बेहया बनि जेतै। संभार तँ हमरहि करए पड़तै। कतेक दिनसँ एकर चालि-चलन देख रहल छी। नकोरबा बनियाँसँ कतेक सटिया कऽ गप्प करैत रहै छै। छनमाकेँ अँगनामे ढुकै छै तँ निकलैक मने नै होइ छै जेना। हम भूखल रहि जाइयो कोनो बात नै लेकिन ई भोरे निकलि जाएत- टोल चक्कर लगेबाक लेल। टोलक चक्कर थोड़बे लगबै छै ई तँ दोसरे चक्करमे लगल रहै छै। कतेक बेर भऽ गेलै। भूखसँ पेट दुखा रहल अछि। हमरा दिस धियान रहै तब ने। धियान तँ आओर ककरोपर रहै छै।
धर्मडीहीवाली अँगनासँ निकलि कऽ टोल दिस जा रहल अछि। जागेसराक ढेरूआ रूकि गेलै।
“ऐ- कतऽ जा रहल छी? छूछे कूद फन? ऐ अँगनासँ ओइ अँगना? जेना कोनो काजे नै छै। एके लाठीमे टाँग तोड़ि देबौ। अपने घरमे बैठल रहबेँ।”
धर्मडीहीवालीकेँ टाँग रूकि गेलै। उनटि कऽ बजल- “देहमे तागद तँ छै नै आ टाँग तोड़ता? देखै नै छी केहेन बेमारी ढुकल छौ, तोरा देहमे। कोढ़ि फुट्टा कहीं कऽ।”
झगड़ा बढ़तै। जागेसरकेँ बढ़िया चांस भेँट गेल छै। उ झगड़ाकेँ बढ़ाबए चाहैत अछि।
“मुँहसँ गारि निकलतौ तँ थुथुन तोड़ि देबौ।”
“गारि नै देबौ तँ असिरवाद देबौ?”
“यएह बड़का आएल अछि- असिरवाद देनिहारि। निपूतरी, बाँझिन। गे भौंसरी, एकटा मूसोकेँ जन्मा कऽ देखही। तोरी माइकेँ।”
“खबरदार, हमरा माइक नाम नै ले। पूछलीही नै अपना माएसँ। कतऽ कतऽ मुँह मारलकौ तब ने तोरा सन बेटा पैदा केलकौ। बेमरियाहा.......।”
जागेसर ढेरूआ फेकैत लग चलि गेल अछि। करोधसँ थरथरा रहल अछि।
“मुँह बन्न राखबें आकि देबौ चमेटा।”
धर्मडीहीवालीकेँ आँखि तामसे ललिया गेलै। उ आओर लग आबि गेलै। देह अड़ि कऽ बाजलि- “ले मार। असल बापक बेटा छी तँ मारि कऽ देखही। बापसँ भेँट करबा देबो।”
चटाक, चटाक। मुँहपर थप्पर पड़ल।
“तु थप्पर मारलें-हमरा। आइ हम जे न से कऽ देबो। आओर बखतमे टिटही जकाँ पड़ल रहैत छै आ मारै कालमे कतएसँ गरमी चढ़ि जाइ छै।”
ओ जगेसरा िदस हुड़कैत अछि। ओ डाँड़क डोरा आ झाँपल अंग मे लटकए चहैत अछि। लेकिन जगेसरा तँ लाठी लऽ कऽ तैयार भऽ गेल अछि।
“निकल हमरा घरसँ- छिनरिया। कोन-कोन कुकरम कऽ के तब हमरा घर अएलें। पता नै। भागबें अइठामसँ आकि चलेबाै डंटा?”
“ले मार। आओर मार हमरा। अहिना भागि जेबो तोरा सात पुरखाकेँ घिना देबो। पूरा समाजमे उकैट देबो-सबकुछो।”
उ कानि-कािन कऽ फाेंफिया रहल अछि। हाथ चमकाबैत जगेसराक लग सटल जा रहल अछि।
“भगा देबही। छातीपर छिपाठी रोपि कऽ रहबो। बहुते बल भऽ गेलो, हाथेमे। थप्पर मारबें।” कहैत जागेसरकेँ धकेल देलक। आसाकेँ विपरीत जागेसर धड़फड़ा कऽ गिर पड़ल आगि नेस देलक- जगेसरकाकेँ। तामसे काँपैत ओ लाठी लेने उठल।
“तोरी माँ की.........। आइ तोहर हड्डी तोड़ि देबो। परान लऽ लेबो।”
फटाक-फटाक।
धर्मडीहीवालीक पीठ आर जाँघपर लाठी बरिस रहल अछि।
“गे माइ गे माइ। मारि देलक रेऽऽऽ। दौड़ रेऽऽऽ। कोढ़िफुट्टा बेदरादा, रे लकवाबला। गे माइ, मरि गेलियौ गेऽऽऽ।”
दूरेसँ टोलक लोक चिचिया रहल छै।
“रे जगेसरा- रूकि जो। मरि जेतै बेचारी। गलत बात। गाए-भैंस जकाँ पीटै छी।”
“एना मारबें तँ कोनो दिन लंका कांड भऽ जेतौ।”
“आखिर कोन झगड़ाकेँ निपटारा नै होइ छै।”
“ई औरतियो बड्ड झगड़ालू अछि। छुलही कहीं के, आबो अइठामसँ जेबें की अड़ल छँए।”
लोक सभ बीच-बचाव करऽ रहल अछि। धर्मडीहीवाली दस पन्द्रह डेगपर ठाढ़ भऽ गेल अछि। आ ओइठामनसँ गरिया रहल अछि।
“हम छुलही? झगड़ाउ? केकरा घरमे सतबरती बैसल छै? हम सबटा जानै छी। सबहक बात सुनै छी। ऐ खुनिया, बेदरदाक कारने। रे अनजनुआँ जनमल, देहमे कोढ़ि फुटतौ रेऽऽ। हाथमे घुन लगतौ।”
जागेसर गरजैत अछि-
“ऐ बीचमे नै आबै कोइ। ई औरतिया सनैक गेल छै। दुसमन सभ एकटा सिखा-पढ़ा कऽ तुल-तैयार कऽ देने छै।”
कातमे ठाढ़ भेल लोक सभकेँ बाजए पड़ैत अछि- “हमरा बुझि पड़ैत अछि मरदे सभ सनकल अछि। दू-चारि दिनपर एहिना पिटाइ प्रोग्राम चलैत रहैत छै।”
“पिटाइ नै करब तँ पूजा करू। कपारपर चढ़ा कऽ राखू।”
“से कहाँ कहै छी हम। सभ किछुकेँ एगो रास्ता होइ छै ने। आकि किछु बुझे ने सुझे फरमा दिया फाँसी।”
“ठीके कहै छै। सबहक औरतिया कोनो बाँझिन छै आकि छुलाहीए छै, ऐँ?”
औरतियो सभ चुप नै रहि सकैत अछि।
“हे यौ बउआ मरद भेल सोना। ओकर सभ गलती माफ। औरतियो भेलै टलहा। ओकर की गिनती छै।”
“चुप रहु अहूँ तँ अपना पुतहूकेँ खोरनीसँ खांेचारैते रहै छिऐ। की बजब।”
“केकरापर करब सिंगार-पिया मोरा आन्हरे हे...।”
धिया-पुता कातमे डेराएल सन मुँह कएने ठाढ़ अछि।
धर्मडीहीवाली चौबटियापर ठाढ़ भऽ कऽ सात पुरखाकेँ गरिया रहल अछि। जगेसारा लाठी लऽ कऽ लेबाड़ैत अछि।
“ठाढ़ रह भोंसरी। आइ चौबटियेपर बेदशा करबौ।”
चोटक मोन पड़िते धर्मडीहीवाली भागैत अछि। पाछुसँ बाघ जकाँ गरजैत जागेसर। लोक तमाशा देख रहल अछि।
कनेके दूर दौगलापर जागेसर हककऽ लगैत अछि।
“जो अपना बापक पास। एमहर जँ घुरि कऽ एबें तँ प्राण लऽ लेबौ।”
कानैत-खीजैत धर्मडीहीवाली जा रहल अछि- नैहर दिस। नुआ-बस्तरक कोनो ठेकान नै। जेना सुइध-बुइध हेरा गेल हो।
ओ कानैत अछि। किन्तु भीतरसँ बोल फूटि रहल अछि।
“हमरा तँ बापसँ मोलाकात करबा देलही रे निवंशा। तोरो छोड़बो नै। अठगामा मैनजन-पंच जमा कऽ देबौ- तोरा दुआरिपर। आठो गामक लाेकसँ थू-थू करबा देबौ।”
जागेसर ओहीठाम बैस कऽ खांेखिया रहल अछि।
“खों...... खों...... खों....... आक थू.....।”
पता नै ओ थूक केकरापर पड़ल। समाजपर गामपर आइ स्थानपर, धर्मडीहीवालीपर, आकि अपनहि आपपर। पता नै......।
कमश:
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