बेचन ठाकुरजीक नाटक छीनरदेवी
ऐ नाटकक मादें किछु कहबासँ पहिने ओ गप्प कही जे प्रायः-प्रायः अंतमे कहल जाइत छैक। श्रुति प्रकाशन एकटा बड़का काज ठानि लेने अछि- हीरा-मोती-माणिककेँ चुनबाक। आ ऐ मे ई कतेक सफल भेल तकर निर्धारण भविष्य करत, वर्तमान नै कारण वर्तमान समयक नीति-निर्धारकक इमान शून्य स्तरपर पहुँचि गेल अछि। मुदा एहन-एहन समस्याक अछैतो हमर शुभकामना ऐ प्रकाशनक संग अछि आ विश्वास अछि जे जेना ई धारक दूरी पार केलक अछि तेनाहिते आब ई समुद्रक दूरी पार करत। आ संगहि-संग ऐ नाटककेँ उपर अनबामे जनिकर कनेकबो योगदान छन्हि से अशेष धन्यवादक पात्र छथि।
जहिआ सनातन धर्ममे पुराण-उपनिषद् के आगमन भेल रहैक, तहिआ देवी-देवताक संख्या ३३ करोड़ रहैक। आजुक समयमे जखन कि पौराणिक समय बितला बहुत दिन भए गेल तखन देवी देवताक संख्या कतेक हएत ? हमरा बुझने ३३ करोड़सँ बेसिए। तथापि सुविधाक लेल एकरा यथावत् मानू। आ एतेक देवी-देवताक अछैतो छीनरदेवीक आविर्भाव किएक?
उत्तर हम नै देब कारण ई गप्प सभ जनैत छथि मुदा लोक ऐ उत्तरकेँ नुका कऽ रखैत अछि। आ संभवतः छीनरदेवीक ऐ रूपकेँ छिनरधत्त कहल जाइत छैक। ओना एकरा बादमे हम निरुपित करब। ओइसँ पहिने एकटा आरो महत्वपूर्ण प्रश्नपर चली। जँ अहाँ श्री बेचन ठाकुर कृत ऐ नाटककेँ नीकसँ पढ़ब तँ ई बुझबामे कोनो भाँगठ नै रहत जे ऐ नाटकक मूल स्वर अंधविश्वासपर चोट करब छैक। आ जखने अहाँ ऐ निषकर्षपर पहुँचब, अहाँकेँ तुरंते प्रो. हरिमोहन झा मोन पड़ि जेताह से उम्मेद अछि। आ जखने अहाँकेँ प्रो. झा मोन पड़ताह तखने हमरा मोनमे ई प्रश्न उठत जे प्रो. झा जइ प्रबलतासँ अंधविश्वासपर कलम चलेने छलाह तकरा बाबजूदो ६०-७० साल बाद बेचन जीकेँ ऐ पर कलम चलेबाक जरूरति किएक पड़लनि ? एकर दूटा कारण भऽ सकैत अछि पहिल जे प्रो. झाक प्रहारक बाबजूदो अंधविश्वास मेटाएल नै ( हम ई नै कहि रहल छी जे ई प्रो. झाक हारि थिक कारण हरेक लेखकक एकटा सीमा होइत छैक) आ दोसर कारण भऽ सकैत अछि जे बेचन जीकेँ कोनो बिषए नै भेटल होइन्ह आ मजबूरीमे ओ ऐ पर कलम उठेने होथि। मुदा आइ बर्ख २०-११ मे जखन गामे-गाम घूमै छी आ ओकर आंतरिक स्थितिकेँ परखैत छी तँ दोसर कारण अपने-आप खत्म भऽ जाइत अछि। आइयो गाम आ अर्धशहरी इलाकामे एलोपैथीक संगे-संग भस्म-विभूति आ ब्रम्हथानक माटि उपचारमे लाएल जाइत अछि। आ एकरा संगे ईहो स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे प्रो. झाक बादो ई अंधविश्वास मरल नै। आ एहने समयमे हमरा लग ई प्रश्न बिकराल रूप धऽ आबि जाइत अछि जे प्रो. झाक बाद जे नाटककार भेलाह ( चूँकि बेचन ठाकुर जीक विधा नाटक छन्हि तँए हम नाटकेक दृष्टिसँ गप्प करब) से एतेक दिन धरि की करैत छलाह ?
आब हम ऐ प्रश्न सबहक उत्तर ऐ ठाम नै लिखब। एकर कारण अछि जे हमरा सदासँ विश्वास रहल अछि जे साहित्यिक संदर्भमे वर्तमान समयक उत्तर जँ भविष्यमे प्राप्त हुअए तँ ओ बेसी सटीक आ सार्थक होइत छैक।अस्तु श्री बेचन ठाकुर जीसँ मैथिली मंचकेँ बड्ड आस छैक आ तइ आसकेँ पूरा करबाक तागति भगवान हुनका देथिन्ह तइ आसाक संग चली हम प्रेक्षक समूहमे।
कोनो नाटक पहिने लिखल जाइए आ तकर बाद ओ टाइप होइए वा सोझे टाइप कएल जाइए आ तकर बाद कखन छपैए, मंचनक बाद वा मंचनक पहिने; ऐ सभमे आब कोनो अन्तर नै रहलै। जॉर्ज बर्नार्ड सॉ शॉर्टहैण्डमे लिखै छलाह आ हुनकर स्टेनो ओकरा लौंगहैण्डमे टाइप करै छलीह। बिनु छपने मैथिली धूर्तसमागम मैथिलीक पहिल पोस्ट मॉडर्न अबसर्ड नाटक अछि। ई तर्क जे छपलाक पहिने मंचन भेलासँ बहुत रास कमी दूर भऽ जाइए, ऐ सन्दर्भमे मलयालम कथाकार बशीरक उदाहरण अछि जे सभ नव छपल संस्करणमे अपन कथामे नीक तत्व अनबाक दृष्टिसँ संशोधन करै छलाह, ई कथामे सम्भव तँ नाटकमे तँ आर सम्भव। तँ सिद्ध भेल जे लिखल जेबाक वा छपि गेलाक बादे नाटकक मंचन हएत आ मंचनक बाद लिखल वा छपल दुनूमे सुधार सम्भव। बेचन ठाकुरजी रंगमंच निर्देशक सेहो छथि आ विगत २५ बर्खसँ अपन गाममे मैथिली रंगमंचकेँ जियेने छथि बिना कोनो संस्थागत (सरकारी वा गएर सरकारी) सहयोगक। हिनकर रंगमंचपर हिनकर दर्जनसँ बेसी नाटकक अतिरिक्त गजेन्द्र ठाकुर आ जगदीश प्रसाद मण्डलक नाटक, एकांकी आ बाल नाटकक मंचन सेहो भेल अछि।
(जारी....)
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विरेन्द्र यादव
कथा
बाबा गाछी
आमक फलसँ लदल गाछ। बिनु ओगरबाहक बाबा गाछी, तुलसीया चाँपक कछेरमे। तुलसिया गाममे अभिजातवर्गक लोक सबहक संगहि एक घर अछोप छल।
राजू डोम पढ़ल-लिखल छल। सरकार आरक्षणक पक्षमे ओइ ग्राम-पंचायतकेँ आरक्षित कए देलक।
गामक प्रमुख लोक सभ मिल विचार कए राजूकेँ मुखिया आ मोहिनीकेँ प्रतिनिधि चुनलक। मोहिनी ओइ गामक पैघ शशिबाबूक पुत्रवधु छलीह। मोहिनीक पति दिन-राति गाजा-भाँग पीब, बिनु धीया-पुता जनमोनहि स्वर्ग चलि गेल।
प्रतिनिधि सबहक सम्मेलनि भेल। जइमे पहिल बेर मोहिनी आ राजूक भेँट भेल। ई भेँट दुनू गोटेक छातीमे मीलक पाथर जकाँ गड़ि गेल। दुनूक मोनमे एक दोसरकेँ अपनेबाक आगि सुनगए लगल। पिपरीतक आतुरतामे मोहिनी चेतक वेसाखक रौदमे पियासल हिरणी जकाँ बाबा गाछीक रास्ता पकड़ि लेलक।
बापक हुरकुचनिपर राजू बाबा-गाछीक बगल चाँपमे सुगर टहलाबए गेल छलए। मोहिनीक नजरि राजूपर पड़ितहि पीरीतक लहरि उमड़ि पड़ल। ओ राजूकेँ कहलक- “एम्हर गाछक छाँहमे आउ, ओतय रौदमे किअए खून सुखबै छी?” एतेक बात सुनितहि राजू गाछक लग आबि गेल। मोहिनी अपन पीरीतक पियास बुझाबए लेल झपटि कऽ राजूकेँ पकड़ि लेलक मुदा राजू अपनाकेँ अछूत बुझि मोहनीसँ हाथ छोड़ौलक।
मोहनी पकरा पढ़ैत बाजल- “ओ राजू...।”
पियासल मानय धोबी घाट आ प्रीत नै बुझए ओछी जात। राजूक देहपर मोहनीक हाथक स्पर्शसँ हृदए शीतल भऽ गेल आ मोनमे भेल जे ई चमत्कारिक बात छी जे एतेक पैघ घरक पुत्रवधुक लगमे हम बैसल छी। मोहनी बाजल- “ऐ राजू अहाँ हमरा हृदेमे छी, हम अहाँकेँ इश्वरसँ आगा मानै छी। हमर जिनगीक संगी बनबाक लेल......।”
एतेक बात सुनितहि राजू बाजल- “ई केना हएत? अहाँ पैघ लोक छी आ हम अछूत। ओना तँ अहाँपर नजरि पड़िते हमहुँ ई सुधि बिसरि गेलौं जे हम अछूत छी।”
मोहनी बाजल- “इंसान अछूत नै होइछ। कर्मसँ लोक ऊँच-नीच होइत अछि। मनुक्खक जिनगीमे शिक्षा आ व्यवहारक महत्व छैक। डाॅ. भीमराव अम्बेदकर जातिसँ अछोप छल मुदा अपन शिक्षा आ कर्मसँ ऐ समाजकेँ देखौलनि जे समाजक आगूक श्रेणीमे हुनक स्थान छन्हि।”
मोहनी आ राजूक प्रेम पंसंगक बीचेमे कलुआ, जे शशिबाबूक मुँहलगुआ आ चालिसँ चुगला छल, किछु दूरसँ ई खेला देखैत पोखरि दिस जाइ छल। कलुआपर नजरि पड़ितहि राजू डेराय गेल आ नुकएबाक चेष्टा कएलक। मोहनी राजूकेँ हिम्मत बन्हैत अलग भऽ गेलि आ फेर दोसर बेर भेटबाक निश्चय कएलक।
ऐ प्रेम प्रसंगक बीया सौंसे गाम छीटैत कलुआ शशिबाबूक दलानपर आबि गेल आ सकपकाइत शिशिबाबूकेँ कहि बैसल। गामक पैघ लोक सभ शशिबाबूक दलानपर आबए लगल। हिम्मत बान्हि कलुआ मोहनी आ राजूक प्रेम प्रसंगक चर्चा शशिबाबूकेँ पुन: सुनौलक। गामक लोक सभ चढ़ाव-उतारक बात बाजए लागल। मुदा अधहा जीभे, किएक तँ शशिबाबू ओइ जमानाक ग्रेजुएट छथि जइ समैमे बड़ थोड़ लोकसभ पढ़ैत-लिखैत छल। शशिबाबूक समझदारी आ जमींदारीक दाओ-चाप ओइ इलाकामे छल।
शशिबाबू बाजलाह- “राजूक बाप रामा डोमकेँ बोलाओल जाए।”
धीरू पहलवान रामा ओइठाम पहुँच रामाकेँ सभटा बात बताबैत, रामाकेँ संगे मालिकक दलानपर आएल। रामा डोम दारू पीब मस्त छल। दुनू हाथ जोड़ि बाजल- “मालिक जे हुकुम।”
कलुआ बाजल- “रे रामा, दुइ दिनमे ऐ गामसँ चलि जो। फेर धुमि कऽ ऐ गाममे नै अबिहेँ।”
रामा मालिकक आदेश सुनि बाजल- “अहाँक हुकुमक पालन करब।” कहि ओइठामसँ विदा भऽ गेल। घर पहुँच रामा, राजूकेँ थप्पड़ मारैत कहलक- “तोरा होश-हबास नै। एतेक भारी जुलुम किएक केलँह।”
राजू बाजल- “बाउ, हमर कोनो दोख नै छौ।” रामाक गोसा शांत भेल।
भोरहरबाक चारि बजिते, बगगलक गामसँ अजानक आबाज सुनिते मोहनी घरसँ बहार भऽ बाबा गाछी आएलि, ओतए राजू सेहो छल। दुनू गोटे गाम छोड़ि पड़ाए गेल।
भिनसर होइते ई खबरि आगि जकाँ सौंसे गाम पसरि गेल। शशिबाबू गामक लोकसँ विचार करैत थानामे अपहरणक रपट दर्ज करबौलक जइमे राजूआ रामाक नाम देलक।
ओम्हर राजू, मोहनीक संगे कोर्ट मैरिज कएलक आ किछु दिन अनतय रहबाक निश्चय कएलक। तइ बीच गामक लोक सभ रामा डोमकेँ पुलिस पकड़ि, मारबो-पिटबो केलक आ जहल पठा देलक।
राजू ई खबरि सुनिते मोहनीक संगे कोर्ट गेल। बाप रामासँ भेँट कएलाक उपरान्त कोर्टमे हाजिर भेल। रामाक जमानत करौलक आ तीनू गोटे गाम दिस विदा भेल। रातिमे रामा, राजू आ मोहनी गाम आएल। भोर होइते सौंसे गामक लोक शशिबाबूक दलानपर आबए लगल। कियो बाजए- “ई डोमरा छातीपर मुँह दररि देलक।”
कियो कहए- “एहन जुलुम कहियो नै भेल छल।”
ऐ तरहेँ चुपचाप शशिबाबू सबहक बात सुनैत रहल। किछु कालक बाद बाजल- “हे यौ समाज परिवर्तन दुनियाँक नियम थिक। काल्हिक ऊँच आइ गहींर, काल्हिक पैघ आ बरोबरि। बदलैत कालचक्रसँ किछु सिखबाक चाही। आब अपना सभकेँ ऐ तथ्यकेँ स्वीकार करबाक अलाबा कोनो चारा नै अिछ। मोहनी विधवा पुत्रवधु छी, जन प्रतिनिधि सेहो बना देलयनि। समाजकेँ सही आ नव दिशा देबाक लेल प्रतिनिधि होइछ। अपना सभ रूढ़िवादी विचारक तियाग करू। विधवा विवाह होएबाक चाही। संगहि ऊँच-नीचक भेद भाव छोड़ू। सभलोक इश्वरक संतान छी। कियो ऊँच-नीक भेद-भाव छोड़ू। सभ लोक इश्वरक संतान छी। अंतरजातीय वियाहकेँ सरकार प्रश्रय दैत अछि। ऐ अवसरपर अहाँ सभकेँ हम आमंत्रित करै छी जे सांझमे सामाजिक रिति-रिबाजक अनुसार मोहनी आ राजूक वियाह होएत।” एतेक बजैत शशिबाबू उठि गेलाह आ कलुआक संगे रामा डोमक घर दिस विदा भेलाह।
साँझमे राजू दुल्हा बनि बरियातीक संगे गाजा-बाजाक संग शशिबाबूक दलानपर पहुँचल। मोहनी आ राजूक िवयाह भेल। िवयाहक अवसरपर शशिबाबू घोषणा केलथि जे- दोसर टोल गरही कामत परक घर-दुआरि आ चालीस एकड़ जमीन माेहनी आ राजूक भेल।
ऐ तरहेँ आधुनिक समाजवादी समाजक लोक जकाँ राजू आ मोहनी जीवन-बसर करैत ग्राम पंचायत प्रतिनिधित्व करए लगलाह।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।