विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

कलौ चण्डी महेश्वरौ

बिपिन कुमार झा · 2011-07-01 · अंक 85

कलौ चण्डी महेश्वरौ
Bipin Kumar Jha
Senior Research Fellow, Teaching Assistant
Cell for Indian Science and Technology in Sanskrit
HSS, IIT, Bombay
https://sites.google.com/site/bipinsnjha/home
मिथिलांचल सतत सर्वदेवोपासक रहल अछि एतय कोनो देवता के कम महत्त्व नहिं देल जाइत छन्हि चाहे ओ अग्नि होइथ अथवा लक्ष्मी। एहि लीक सँऽ किछु हटि के हम दुर्गा आ महादेब के किछु विशेष स्थान भेटल छन्हि। कदाचित् कलयुग ई दुनू देवता जनसामान्य के पीडा जल्दी दूर करैत छथिन्ह। खैर जे हो ई तऽ बच्चहिं सँ सुनैत रहल छी “पढो भई चण्डी जैह से हण्डी” मैथिली साहित्यो एकर बहुत नीक टिप्पणी केने अछि-“जे सभ दुर्गापाठ अशुद्धो रटि कें गेल कलकत्ता, गाम अबैत देरी ओ लगबय लागल कित्ता॥” एहि संग गाम में माटिक महादेब केर पूजा तऽ कदाचिते कोनो एहेन घर होयत जत नहिं होइत हो।
हम एतय मधुबनी जिला केर लखनौर गाम में बस्ती सँऽ लगभग डेढ कि०मी० दूर निर्जन में लगभग चौदह सीढी नींचा में करमहे झांझारपुर मूलक वत्सगोत्रीय मैथिलश्रोत्रिय सभक आराध्यदेव अंकुशी महादेब केर चर्चा कय रहल छी। ई स्थान आब तऽ सडक मार्ग सऽ जुडि गेल अछि मुदा अखनहु ओतय सायंकाल देबाक समय पंडा केर अतिरिक्त कोई नहि भेटैत अछि।
एहि महादेब के योगीश्वर बाबा लक्ष्मीनाथ गोसाईं लखनौर में राधाकृष्ण मन्दिर प्रांगण में स्थापित करय चाहैत छलाह अस्तु ओहि निर्जन सँ शिवलिंग के उखारबाक प्रयास करय लगलाह। भरि हाथ कोरथि मुदा महादेब पीडी भरि मात्र। फेर कोरथि फेर ओहने हाल। ओ अन्त में लगभग १०-१५ हाथ कोरने हेता कि महादेब कहलखिन्ह जुनि कोर हम त निर्जन में रहनहार छी हम एतहि संऽ गामक रक्षा करबह।
ओहि दिन सँऽ लखनौर गाम पूर्व स राधाकृष्ण पश्चिम स बाबा डिहबार दक्षिण स अंकुशी महादेब केर द्वारा सतत सुरक्षित अछि। बहुत बेर आपात स्थिति आयल (बाढि आदि) मुदा गामक बस्ती सुरक्षित रहल। ई गप्प अलग अछि जे नव पीढी के “विशेष पुण्य” केर प्रभावक कारण देवतो के गामक संरक्षणकार्य कदाचित भारे बुझना जाइत हेतन्हि।
करमहे झांझारपुर मूलक वत्सगोत्रीय मैथिलश्रोत्रिय केर समस्त परिवारक पुरुष बच्चा के मूडन आइयो अही महादेब कें सामने होइत अछि चाहे ओ विदेश में कियाक नहिं हो।
आस्था एवं तर्क दूनू केर देखि ई कहल जा सकैत अछि जे एहि प्रोफेशनल युग में सेहो त्रैलोक्य जननी भगवती दुर्गा आ अढरंढरन आशुतोष भोलेनाथ अपन प्रासंगिकता बनाके रखबाक मशक्कत करैत सफलता प्राप्त कयलथि।
पुष्पदन्त अनुचित नहिं कहने छथि- जे असितगिरि समान काजर लय, समुद्ररूपी पात्र लय, देवतरुशाखा केर कलम लय, समस्त पृथ्वी रूपी पत्र पर यदि साक्षात सरस्वती सदिखनि अहाँ केर गुणगान करथि तैयो अहाँ के पार नहिं पाओल जा सकैत अछि।
(आस्था आ तर्क केर अन्तर्द्वंद्व में देवताक प्रति श्रद्धाऽभाव नहिं बुझल जाय)

Suggested citation: बिपिन कुमार झा. “कलौ चण्डी महेश्वरौ.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 85, 2011-07-01. https://www.videha.co.in/research/2011/85/कलौ-चण्डी-महेश्वरौ.htm

मूल विदेह अंक / Original issue