विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

निराला: देह विदेह

रवि भूषण पाठक · 2011-07-15 · अंक 86

निरालाःदेह विदेह
हिन्दी भाषा आ साहित्य क केन्द्रीयता स्वातंत्रयोत्तर भारतक एकटा महत्वपूर्ण सांस्कृतिक घटना ।एकर मूल कारण राजनीतिक आ वाणिज्यिक रहितहु परिणाम बहुआयामी अछि ।हिंदी साहित्यक आ विशेषतः कविता के सौंदर्यात्मक ,वैचारिक आ शैल्पिक वैविध्य सँ पूर्ण करबा मे कवि निराला क योगदान अप्रतिम ।ने केवल कविता बल्कि ईमानदारी मे सेहो निराला क व्यक्तित्व क चर्चा क सेहो कतिपय आयाम । आधुनिक साहित्यिक व्यक्तित्व मे निराला अग्रणी छथि ,जनिकर व्यक्तित्व आ कृतित्व क हरेक अंश सँ ईमानदारी,रचनात्मकता,आलोचना आ अफवाहक मार्ग प्रशस्त होइत अछि ।निराला काव्य क अनुवादक महत्व विभिन्न प्रसंग आ संदर्भ सँ अछि ।प्राचीन संस्कार आ आधुनिकता क आंदोलनमयी धारा कें आत्मसात करबाक जतेक सामर्थ्य निराला साहित्य मे अछि ,ओतेक अन्यत्र नइ ।दोसर बात ई जे निराला काव्य क माध्यम सँ हिन्दी साहित्य मैथिली आ बांग्ला सँ जुड़ैत अछि ।निराला पर विद्यापति आ रवीन्द्रनाथक प्रभाव अत्यंत स्पष्ट अछि ।हिंदी आलोचक निराला पर विद्यापतिक प्रभाव पर बहुत नइ लिखने छथि ,मुदा ई प्रभाव देखबा क हो तखन ‘वर दे वीणा वादिनी वर दे‘ क तुलना विद्यापति लिखित वसंत गीत ‘नव नव विकसित फूल ‘सँ करू ।

शब्दार्थचिंतामणिकार अनुवादक दू टा अर्थ लिखैत छथिन्ह ।प्रथम ‘प्राप्तस्य पुनःकथने ’आ दोसर ‘ज्ञातार्थस्य प्रतिपादने ‘ एकर अर्थ भेल पहिले कहल गेल कथन के फेर सँ कहनए आ ज्ञात अर्थ के प्रतिपादित केनए ।प्रसिद्ध भाषावैज्ञानिक रोमन याकोबसन एकरा ‘एक भाषा के शाब्दिक प्रतीक के अन्य भाषा के शाब्दिक प्रतीक के द्वारा व्याख्या‘ मानैत छथिन्ह ।नाइडा आ टेबर कनेक विस्तृत करैत कहैत छथिन्ह कि ई मूल भाषा क संदेशक समतूल्य संदेश के लक्ष्य भाषा मे प्रस्तुत करबा क क्रिया अछि जाहि मे संदेशक सममूल्यता पहिले अर्थ आ फेर शैली क दृष्टिकोण सँ निकटतम आ स्वाभाविक होइत अछि ।

भाषिक प्रक्रिया होएबा क कारणें अनुवाद क सम्बन्ध भाषेटा सँ नइ बल्कि भाषाविज्ञानो सँ अछि ।ध्वनि ,शब्द,रूप,वाक्य आदि विभिन्न स्तर मिलि के अर्थक संसार रचैत अछि ,ताहि दुआरे ऐ सब स्तर क प्रति सजगता अनिवार्य अछि ।प्रत्येक भाषाक अपन विशिष्ट ध्वनि ,शब्द भंडार आ रूप व्यवस्था होइत अछि ,ताहि दुआरे ऐ स्तर मे निहित अंतर के कारणें समान लागए वला प्रसंग सेहो वास्तविक अर्थ मे अर्थान्तर क संभावना सँ युक्त होइत अछि ।

ऐ ठाम ई तथ्य उल्लेखनीय अछि कि मैथिली आ खड़ीबोली हिन्दी कोनो दू ध्रुवीय भाषा नइ अछि ।दूनू दू टा प्रादेशिक अपभ्रंशक संतान आ ताहि दुआरे संस्कृत ,पालि आ प्राकृतिक विरासत पर समान रूप सँ अधिकारिणी अछि ।ध्वनि ,शब्द आ रूप क स्तर पर अनगिन साम्य अछि ।संस्कृत क रात्रि मैथिलीए टा मे नइ अवधी,ब्रजभाषा,भोजपुरी सहित कतेको उत्तर भारतीय भाषा मे ‘राति‘ अछि आ ‘दिन‘ त‘ सर्वत्र ‘दिन‘े अछि ।तहिना भोर आ दुपहर अपन विभिन्न ध्वनिभेद क संग विद्यमान अछि ।उदाहरण केवल एक या दू शब्दक नइ अछि ,सुधी पाठक ऐ उभयनिष्ठ आधारक जटिल उपस्थिति सँ परिचित छथि ।

ई उभयनिष्ठ आधार अनुवाद मे सुविधा लऽ के आबैत अछि,मुदा ऐ ठाम आलस्य आ अनुकरण क खतरा मौलिक अनुवाद के समक्ष चुनौती दैत अछि ।सबसँ बेशी शब्द तद्भव के आ ओहि पर सब भाषा क तेहनें अधिकार तखन ई नबका शब्द कत‘ सँ आनी ,देशज शब्दक प्रयोग प्रचलन आ स्वीकृति क आधारे पर स्वीकार्य होयत ।मिथिला क व्यापक भूभाग मे पजेबा सँ बेशी स्वीकृत शब्द ईंटा अछि तखन ककर व्यवहार करी आ ककर नइ करी ?
वैज्ञानिक तथ्य वा गद्यात्मक सूचना क प्रस्थापन अभिधात्मक भाषा मे सुगमता मे संभव अछि ,मुदा भावप्रधान रचना मे अर्थ क अनेक स्तर आ कथनक बहुविधि व्यंजना होइछ,परिणामतः प्रत्यक्ष भाषिक प्रतिस्थापन संभव नइ, ताहि दुआरे अनुवादक के परकाय प्रवेश करऽ पड़ैत अछि ।अनुवादक मूल कृति आ रचनाकार क मनोजगत मे घुसि के भाव आ ओकर अर्थच्छाया के समझैत अछि तथा फेर ओइ भाव के यथासंभव लक्ष्यकृति मे अभिव्यक्त करैत अछि ।कलाकृति के एहन समझ आ फेर ओकर कलात्मक संप्रेषण क लेल सर्जनात्मक प्रज्ञा क विद्यमानता अनिवार्य अछि ।ई प्रज्ञा सर्वत्र एकरूप मे उपस्थित नइ अछि ,ई देखबा क अछि तखन उमर खय्याम क रूबाई क अनुवाद क्रमशः फिट्जराल्ड (अंग्रेजी) आ मैथिली शरण गुप्त, बच्चन जी ,केशव प्रसाद पाठक आ सुमित्रा नंदन पंत(सब हिंदी)क अनुवाद मे निहित भावभंगिमा आ गुणवत्ता क अंतर देखि सकैत छी ।गीतांजलि क अनुवाद मैथिली मे सुमन जी केने छथि आ हिंदी मे अज्ञेय आ अन्य कतेको विद्वान मुदा बांग्ला विद्वानजन सुमन जी द्वारा अनुदित ‘अनुगीतांजलि‘ के ह्रदय खोलि के प्रशंसा केने छथि ।

ऐ ठाम हम परकायप्रवेशक वांछित योग्यता क साथ उपस्थित नइ छी ।हम निराला काव्य मे निहित व्यंजना क महान शक्ति के स्वीकार करैत छी आ निराला काव्य मे ,ओकर शब्द आ शब्द योजना मे निहित उदात्त के मानैत छी ।ई उदात्त किछ किछ संस्कृतक तत्सम शब्द,सघन वर्णमैत्री,वर्णक ध्वन्यात्मकता मे निहित अछि ,ताहि दुआरे मैथिली पाठक के हम शब्द आ अर्थक अइ स्वर्गिक संसार सँ वंचित नइ करऽ चाहैत छी ।हम अपन अनुवादक सीमा के सहज स्वीकारैत छी

अनुवादक एकाधिक रूप मे प्रचलित अछि ।शब्दानुवाद(लिटरल) या मूलनिष्ठ अनुवाद सामान्यतः अभिधात्मक होइत अछि ,ऐ अनुवाद मे श्रोत भाषाक प्रत्येक शब्द आ अभिव्यक्ति क प्रतिस्थापन लक्ष्यकृति क शब्दावली,अभिव्यक्ति तथा संरचना मे होइछ ।
भावानुवाद मे मूल भाषा क अभिव्यक्ति क स्थान पर ओइ मे निहित आशय के स्पष्ट कएल जाइत अछि ।ई मूलकृति क ढ़ाँचा सँ स्वतंत्र होइत अछि,ताहि दुआरे लक्ष्यकृति क दृष्टि सँ ई बेशी सहज आ स्वाभाविक होइत अछि ।सुरेन्द्र झा सुमन द्वारा ‘गीतांजलि‘ क अनुवाद ‘अनुगीतांजलि‘ भावानुवादक श्रेष्ठ उदाहरण अछि ।
रूपांतरण कथा साहित्य क क्षेत्र मे लोकप्रिय अछि ।अइ मे अनुवादक मूलकृति क परिवेश ,चरित्र ,आदि के देश-कालानुसार परिवर्तित करैत अछि ।शेक्सपीयर रचित ‘द मर्चेंट ऑफ वेनिस‘ क हिंदी अनुवाद भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ‘दुर्लभ बन्धु‘ नाम सँ केलाह ।एइ मे एंटोनियो क नाम अनंत ,बसानियो क नाम वसंत आ शायलॉक क नाम शैलाक्ष अछि ।घटना वेनिस नगरक स्थान पर काशी(भारत) मे घटैत अछि ।

‘छायानुवाद‘रूपांतरणक एकटा प्रकार अछि ,अइ मे मूलकृति क आधार पर मूल कथ्य के संप्रेषित करबा क लेल स्वतंत्र कृति क निर्माण संपन्न होइत अछि ।अइ मे बिंब विधान ,प्रस्तुतिकरण आदि मूलकृति क प्रतिबिंब होइत अछि ।भगवती चरण वर्मा क उपन्यास चित्रलेखा अनातोले फ्रांस क उपन्यास ‘थाया‘ पर आधारित अछि ।विदेशी फिल्म आ साहित्य क अनधिकृत अनुवाद आ रूपांतरणक लेल अइ विधि क बहुत प्रयोग होइत अछि ।
‘सारानुवाद‘ मे मूलकृति क सार लक्ष्य भाषा मे प्रस्तुत कयल जायत अछि ।संप्रेषण केंद्रित अनुवाद क्लासिकी रचना के बच्चा आ किशोर सब के पढ़बा क लेल रूपांतरण मे सहयोगी होइत अछि ।जेना महाभारत वा रामायण पर आधारित संक्षिप्त कथा ।
‘टीकापरक अनुवाद‘ मे अनुवाद क साथ ओकर व्याख्या रहैत अछि ।गीताप्रेस क किताब मे एहन अनुवाद प्रचूर मात्रा मे उपलब्ध अछि ।किछु दिन पहिले विद्यापति पदावली क किछु पदक अनुवाद यात्री जी द्वारा कयल गेल दिल्ली विश्वविद्यालयक प्रोफेसर प्रभात रंजन जी क ब्लॉग पर उपलब्ध छल ।

अंत मे फेर काव्यानुवाद पर आबी ।कविता क अनुवाद नमहर चुनौती अइ दुआरे छैक कि कविता मात्र शब्दार्थ तक नइ सीमित छैक ।ई शब्द सँ आगू वाक्यगठन,लय,छंद,बिंब,प्रतीक,अलंकारयोजना,शैली आदि क मिल जुलल परिणामी काव्यात्मक पर्यावरण पर आधारित अछि ।ताहि दुआरे दाँते आ सर फिलीप सिडनी सन विद्वान काव्यानुवाद के असंभव मानैत छथिन्ह ।कविता क समग्र प्रभाव वा व्यंग्यार्थ ध्वनि ,लय ,बलाघात आ बिंब योजना के माध्यम सँ अभिव्यक्त होइत अछि ।ताहि दुआरे निराला क शब्द चयन ‘विजन-वन वल्लरी‘‘पुलिन पर प्रियतमा‘मैथिली मे यथावत अछि ।

कविता क दृश्य आ श्रव्य बिंब बहुधा शब्द क नादात्मकता सँ नियंत्रित होइत अछि ।एहिना शब्दालंकार आ अर्थालंकार क विकल्प लक्ष्यभाषा मे सृजित कएनए कठिन अछि ।काव्यानुवाद क सबसँ नमहर समस्या छंद आ लय अछि ।मूल रचना क लेल प्रभावी छंद आ लय के खोजनए अनुवादक लेल सबसँ पैघ समस्या अछि ।यदि कविता क अनुवाद गद्य मे आबैत अछि तखन अनुवाद मात्र शब्दार्थ तक सीमित रहत आ अइ मे कविता क पूरा अर्थ निकलि के बाहर नइ आयत ।अनुवाद सम्बन्धी अइ अवधारणा क लेल हम सर्वश्री/सुश्री रवीन्द्र नाथ श्रीवास्तव ,कृष्ण कुमार गोस्वामी ,कुसुम बांठिया ,गजेन्द्र ठाकुर ,रवीन्द्र कुमार दास जी क आभारी छी ।मैथिलीःदेह-विदेह क अइ पहिल किश्त मे निराला जी क दू टा लोकप्रिय कविता क अनुवाद प्रस्तुत क‘ रहल छी ।सहज सँ जटिल आ जटिल सँ जटिलतर दिश
‘‘क्रम क्रम सँ भेल पार राघवक पंचदिवस
चक्र सँ चक्र चढ़ि गेेल भेल उर्ध्व निरलस ‘‘(रामक शक्ति पूजा)

जूनि बान्ह नाव ऐ ठाम बन्धु
(बाँधो न नाव इस ठाँव,बन्धु!)
जूनि बान्ह नाव ऐ ठाम बन्ध
पूछतओ पूरा गाम बन्धु
ई घाट छलए जइ पर हँसि के
ओ रहए नहाबति रे! धसि के
रहि जाइत छलए आँखि फसि के
कांपैत रहए दूनू पैर बन्धु !
ओ हँसी बहुत किछु कहए छलए
तैयो अपने मे रहए छलए
सबके सुनैत सबके सहैत
दैत ओ सबके दाँव बन्धु ।
हमरा सँ किनारा केने जा रहल छथि
(किनारा वह हमसे किये जा रहे हैं ।)
हमरा सँ किनारा केने जा रहल छथि
दिखाबे टा दर्शन देेेने जा रहल छथि
जुड़ल छल सुहागिन केर मोती क दाना
ओएह सूत तोड़ने लेने जा रहल छथि
छिपल चोट के बात पूछलउं त बजलीह
निराशा क डोरी सीने जा रहल छथि
ई दुनिया के चक्कर मे केहन अन्हर
मरल जा रहल छथि जियल जा रहल छथि
खुलल भेद एहि ठां ,जे विजयी कहायल।
ओ खूं दोसरा के ,पीने जा रहल छथि ।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
डॉ रमानन्द झा "रमण"

Suggested citation: रवि भूषण पाठक. “निराला: देह विदेह.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 86, 2011-07-15. https://www.videha.co.in/research/2011/86/निराला-देह-विदेह.htm

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