विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मिथिला भाषाक अध्ययन आ डॉ. ग्रिअर्सन कृत मैथिली व्याकरण

डॉ रमानन्द झा "रमण" · 2011-07-15 · अंक 86

२.५.बिपिन झा- सहनशीलता मजबूरी अथवा कमजोरी?
२.६.बेचन ठाकुर-बाप भेल पित्ती
२.७.सुमित आनन्द- रिपोर्ट (अनुवाद कार्यशालाक आयोजन)
डॉ. राजीव कुमार वर्मा
कारी घटा बरसैत मेघ
तीस बरीख भ गेल दिल्ली मे I गामक जिनगी मोन पड़ैत अछि I शेफालिका जीक पोथी भावांजलि क कुच्छ पन्ना पलट लौं - हमर अपन गाम
सजीव भ गेल --
आम , लताम , सीसो, सपाटू, नारियल वृक्षक फुनगी सँ
धरती कें अशीशैत चान सुरुजक
किरण I
हेमंत-बसंतक सुन्नर प्रसून प्रसन्न I
कोसी कछेरक प्रार्थना सदृश मंद मंद सुगन्धित ,
शीतल बयार
हवा सँ अठखेली करैत खेत मे गहुमक बालि
अनगिन हीरक जोत पसारैत मोइनक
जलधार I
नाह पर बैसल हम अहाँ
पारिजात सुमन सन शुभ्र तारकक
ज्योत्सना परिधान
स्वर्गक मन्दाकिनी तीर सँ बरसावैत जीवन-दान
ब्रह्मक थान सँ अबैत कीर्तन-गान
प्राचीन ऋषि मुनिक आश्रम सन पावन
शुभ्र स्निग्ध हमर इ डुमरा गाम
बाबूजीक विश्वास माँ क ममत संभरल
इ सुन्दर शुचि- धाम I
हमरा मोन पड़ल गामक घनघोर मेघ I हथिया आ कान्हा नक्षत्र I चमकैत बिजुरि I मयूरक नाच I ऋतुक रानी वर्षा I मोन पड़ल ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्णन - मेघक गज्ज , आकाशक मेचकता , विदुल्लताक तरंग , कदम्बक सौरभ , विष धरक संसार , ददुरक कोलाहल , धाराक संताप , आदित्यक तुच्छता I
हम सभ ग्रीष्म ऋतुक ज्वालासं जखन मृतप्राय भ जायत छी तखन वर्षाक बूंद संजीवनिक काज करैत अछि I मोन पाडू भुवनेश्वर सिंह भुवनक शब्द -
आएल आषाढ़ , आएल आषाढ़ I
भए गेल तिरोहित ग्रीष्म गाढ़ I
झर-झर-झर -झर झहरय फुहार I
खुजि गेल प्रकृति-मंदिर-दुआर I
विश्वनाथ विषपायी जीक पंक्ति सेहो याद अवैत अछि --
पट पहिरि हरित नव प्रकृति नटी
पुनि गरा बान्हि कए बक्क माल I
झिंगुर नूपुर पिक गीत गाबि
फेकै अछि बिजुरिक नयन-जाल II
विद्यापतिक नायिका कारी नुआ पहिरि मुह झाँपि, पएरक कड़ा कें ऊपर ससारि, नूपुरक मुह बंद कए पिच्छर मे अभिसारक निमित्त स्थल पर जाइत छथि जबकि वर्षा भए रहल अछि , मेघ गरैज रहल अछि , सांप सह-सह कए रहल अछि I
दिल्ली मे वर्षाक इन्तजार मे आंखि मे दरद आ दिल मे बैचेनी I हथिया आ कान्हा क कोनो चर्चा नहि I झिन्गुरक गीत दुर्लभ आ मानव स्वयं विषधर I
रत्ती भरि बूंद आ बाट पर गाड़ीक लम्बा जाम I पाईने- पाइन, गड्ढे -गड्ढा I नालीक यमुना रोड पर I
नहि चाही हमरा दिल्ली मे हथिया आ कान्हा I दू बुन्न से काम चला लेब I गाम जायब ते हथिया - कान्हा देख लेब I खूब देखब कारी घटा आ बरसैत मेघ I
लेखनी क विराम द रहल छी शेफालिका जीक भावांजलि क गोटेक शब्द सं -
हमर हृदय मरुस्थल बनि जाइत अछि
अहाँ
मेघ बनि बरैस जाइत छी
हम कृतज्ञ भ जाइत छी II
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
जगदीश प्रसाद मण्‍डल‍

कथा
मातृभूमि
जि‍नगीक अंति‍म चरणमे आइ अपन मातृभूमि‍क दर्शन भेल। ओ भूमि‍ जइठामसँ माए सदति‍ नजरि‍ उठा-उठा देखैत रहैत, ओ प्‍यारी, सि‍नेही, प्रेमी, जीवनदायि‍नी, जीवन रक्‍छि‍नी भूमि‍-मातृभूमि‍। दर्शन पबि‍ते कमल मन कलपि‍ उठल मुदा असीम उत्‍साहक संग उमंग संचारि‍त भेल। काल्हि‍ धरि‍क जि‍नगी आँखसँ छि‍पए लागल, ओझल हुए लगल, मुँह नुकबए लगल। जइ दि‍न अपन जीवनदायि‍नी भूमि‍सँ वि‍दा हुअए लगल रही पूर्ण जुवा रही। नस-नसमे नव खूनक संचार होइत रहए। समुद्री जुआर जकाँ जुआनी उठैत रहए। आशा-अभि‍लासाक संग पकड़ैक लेल उत्‍साहि‍त रहए। बाट नहि‍ भेटने मातृभूमि‍क दर्शन लाखो कोस दूर दुर्गमे छि‍पल रहए। मुदा दर्शन पबि‍ते सत्-चि‍त्त-आनन्‍दसँ खेलैत दे‍ख, नमन केलि‍यनि‍।
डाक्‍टरीक डि‍ग्री प्राप्‍त करि‍ते वि‍याह भेल। नीक गाम, नीक कन्‍या नीक कुल-मूलक संग नीक दहेज भेटल। कोना नै भेटैत, जइ डि‍ग्रीक मांग देश-वि‍देशमे अछि‍ ओइमे बेकारी कतएसँ आओत। मुदा इंजि‍नि‍यर जकाँ तँ नै जे डि‍ग्री पेलोपर काज नै! तइले तँ साधनक जरूरत अछि‍ से अछि‍ कत्तऽ। जुआनीक उमंग उठि‍ते गेल। संयोगो नीक रहल जे बाइस बर्खक अवस्‍थामे ओइ फ्रान्‍समे जइमे महान्-महान् दार्शनि‍क, तत्‍व चि‍न्‍तक वैज्ञानि‍क, कलाकार, साहि‍त्‍यकार, देशभक्‍त जन्‍म लेने छथि‍, काज करैक अवसर भेटल। रंगीनी दुनि‍याँक स्‍वर्ग, जेहन ओतऽ सड़क तेहन एतऽ घर नै, ओइ पेरि‍समे। बि‍सरि‍ गेलौं अपन भूमि‍-अपन मातृभूमि‍। ओना सोलहन्नी वि‍सरि‍ नै गेल रही, मुदा वि‍चारक आलमारीक पोथी जाकमे, तर जरूर पड़ि‍ गेलैं। अखनो मन अछि‍, गामक वि‍द्यालयक देश वन्‍दना। हृदैमे नै पहुँचल छल गंगा सन पवि‍त्र जलधाराक सरि‍ता, नै जनैत छलौं माटि‍क सुगंध आ गाछी-वि‍रछीक फल-फूलक महमही।
अनुकूल हवा पाबि‍ मन मोहि‍त भऽ गेल। जी तोड़ि‍ जि‍नगीक पाछु पड़ि‍ गेलौं। करमेसँ जि‍नगी तँ हमरा कि‍अए नै। नीक स्‍तरक परि‍वार बनेलौं, नीक बैंक बैलेन्‍स अछि‍। अपनोसँ बेसी खुशी परि‍वारक सभ रहै छथि‍। कारणो स्‍पष्‍ट अछि‍। वाल-बच्‍चाक जनमे भेल, पत्नी अनके घरमे रहैवाली। मुदा आइ मन वेकल कि‍अए लगैए। बौराइ कि‍अए अछि‍? एकाग्रचि‍त्त सभ दि‍न रहलौं तखन बान्‍हल मन पड़ाए कतऽ चाहैए। कि‍ ‘आएल पानि‍ गेल पानि‍ बाटे-बि‍लाएल पाि‍न।’ जइ मातृभूमि‍क गुनगान बच्‍चा, वृद्ध सभ करै छथि,‍ तइठाम कतऽ छी। बढ़ैत-बढ़ैत जहि‍ना धन बढ़ैए, गाछ-वि‍रीछ बढ़ैए तहि‍ना ने वि‍चारो बढ़ैए। मुदा एना कि‍अए भऽ रहल अछि‍ जे आब ऐठाम- माने पेरि‍समे, नहि‍ रहब अपन मातृभूमि‍क रजकण बनब।
जहि‍ना बाइस बर्खक वएसमे अपन गाम, समाज, भूमि‍-मातृभूमि‍ छोड़ि‍ पेरि‍स आएल रही तहि‍ना आइ छोड़ि‍ अपन प्रेमी मातृभूमि‍, सि‍नेही मातृभूमि‍क कोरामे वि‍श्राम करब। मुदा नहि‍यो बुझैत रही तैयौ अबैकाल सभसँ असि‍रवाद लऽ लेने रही तहि‍ना तँ एतौसँ असीरवाद लइये लि‍अ पड़त। जरूर पड़त। मुदा ककरासँ? ककरोसँ नै! ने अपन गंगा-यमुनाक जलधारा, ने हि‍मालय-कैलाश सन पहार, ने गंगा-ब्रहमपुत्र सन धरती, ने समुद्र सदृश्‍य हृदए। जहि‍ना पत्नीक संग आएल रही तहि‍ना जाएब। जँ ओहो नइ जाथि‍ तखन? ओ नइ जाए चाहती तेकर कारणो तँ कहती।
“आब ऐठाम नै रहब।” हम पुछलयनि‍।
पत्नी बजलीह- “तखन?”
हम कहलि‍यनि‍- “अपन मातृभूमि‍क दर्शन भऽ गेल। ओतए जाएब।”
फेर पत्नी उत्तर देलनि‍- “सभ अपन-अपन मालि‍क होइए। जँ अहाँ जाएब तँ जाएब।”
पुन: पुछलि‍यनि‍- “अहाँ?”
पत्नी बजलीह- “अपन कारोवार अछि‍। बेटा-पुतोहू दुनू फ्रान्‍सक भऽ गेल। दुनि‍याँक स्‍वर्गमे रहि‍ रहल छी। तखन कि?”
मन पड़ल ओ दि‍न जइ दि‍न जि‍नगीक हि‍साब जोड़ि‍ आएल रही। पत्नी संगे रहथि‍। मुदा आइ? जुग बीत गेल। जि‍नका सभसँ असीरवाद लऽ आएल रही भरि‍सक मरि‍-हरि‍ गेल हेता, गेलापर के हृदए लगौताह। तखन? तखन कि‍? कि‍छु ने। मुदा जाधरि‍ पहुँचव ता धरि‍क तँ उपाए चाही। वि‍दा भऽ गेलाैं।
एक समुद्रसँ मि‍लैत दोसर समुद्रक वि‍शाल जलराशि‍क बीच जहाजसँ मद्रास पहुँचलौं। मद्रास बन्‍दरगाहमे उतड़ि‍ अपन धरती, अपन देश, अपन मातृभूमि‍केँ हृदैसँ नमन केलि‍यनि‍। मन पड़ल रामेश्वरम्। जखन मद्रास आबि‍ गेल छी तखन बि‍नु दर्शने जाएब बचपना...। वि‍दा भेलौं।
धरती-समुद्रक बीच बनल रामेश्वरमक मंदि‍र। एक दि‍स वि‍शाल जल-राशि‍क समुद्र तँ दोसर दि‍स खि‍लैत इठलाइत मातृभूमि‍। उपर शून्‍य अकास। समुद्रेक लहड़ि‍मे स्‍नान कऽ दर्शन केलौं। मंदि‍रसँ नि‍कलि‍ते खजुरीपर गबैत एकटा साधु मुँहे सुनलौं, “अवगुन चि‍त्त न धरो।” जना भूखकेँ अन्न, पि‍यासकेँ पानि‍ खेहाि‍र दैत, तहि‍ना मनमे भेल। जलखै कऽ गामक लेल गाड़ी पकड़लौं।
जंगल, पहाड़, नदी, मैदानकेँ चि‍ड़ैत गाड़ी गाम लग पहुँचल। जे गाम कहि‍यो नन्‍दन वन सदृश्‍य सजल छल- लहलहाइत खेत, रास्‍ता-पेरा वि‍द्यालयसँ सजल छल, धारक कटावसँ वि‍रान बनि‍ गेल अछि‍। ने एकोटा सतघरि‍या पोखरि‍ बचल अछि‍ आ ने पीपरक गाछक नि‍च्‍चाक वि‍द्यालय। घरारी, खेत बनि‍ गेल अछि‍ आ पोखरि‍-झाँखड़ि‍ घरारी। मुदा तँए कि‍, ने गामक परि‍वार कमल, ने लोक आ ने गामक नाअों।‍ गामक दछि‍नवरि‍या सीमापर पहुँचते एकटा नवयुवककेँ पुछलयनि‍- “बाउ की नाओं छी, अही गाम रहै छी?”
नवयुवक बालज- “हँ। रमेश नाम छी।”
हम पुछलयनि‍- “गामक की हाल-चाल अछि‍?”
प्रश्न सुनि‍ रमेश ठमकि‍ गेल। कि‍अए नै ठमकैत। लम्‍वाइ (नमती) भलहि‍ं नै बढ़ल हुअए मुदा रंग आ चौराइ तँ जरूर चतरि‍ये गेल अछि‍। भरि‍सक चेहरा देख डरा गेल अछि‍। मुदा डर तँ ओतऽ बढ़ैत जतऽ डरनि‍हारकेँ आरो डेराएल जाइत। से तँ नै अछि‍। मधुआएल मन मुस्‍कुराइत मुँह खोलि‍ नि‍कलल- “बौआ, चालीस बर्ख पूर्व अही माटि‍-पानि‍क बीच डॉक्‍टर बनि‍ वि‍देश गेलौं......।”
मधुर बोली सुनि‍ रमेश बाजल- “गाममे के सभ छथि‍?”
कहलि‍ऐ- “कि‍यो नै। जेहो हेताह, हुनको छोड़ि‍ देलि‍यनि‍। जखन छोड़ि‍ देलि‍यनि‍ तँ वएह कि‍अए पकड़ता।”
तखन रमेश पुछलक- “रहबै कतऽ.......।”
हम बजलौं- “सएह गुनधुनमे छी।”
रमेश बाजल- “हम तँ महि‍सवारि‍ करै छी, आन कि‍छु जनै नै छी। चलु वस्‍तीपर पहुँचा दइ छी।”
वस्‍तीपर पहुँचा रमेश चलि‍ गेल। हम ठमकि‍ गेलौं। पूवारि‍ भागक घरवारीक नजरि‍ पड़ि‍ते, ओतैसँ पुछलनि‍- “कतऽ जाएब?”
कहलि‍यनि‍- “ब्रह्मपुर।”
घरवारी कहलनि‍- “यएह छी। इमहर आउ।”
मनमे सवुर भेल। हूबा बढ़ल। अपन गामक चालि‍ बढ़ल। लफड़ि‍ कऽ दरबज्‍जापर पहुँचलौं। घरवारी कहलनि‍- “थाकल-ठहि‍आएल आएल छी, पहि‍ने पएर धोउ। चाह बनौने अबै छी, तावत कपड़ा बदलि‍ आराम करू। आइ भरि‍क तँ अभ्‍यागत भेलौं काल्हि‍क वि‍चार काल्हि‍ करब।”
कहि‍ आंगन जा चाह अनलक। दुनू गोटे पीबैत कहलि‍यनि‍- “हमहूँ अही गामक वासी छी। नोकरी करए बाहर गेल रही। अपन घरारि‍यो अछि‍ आ दस वीघा चासो।”
ओ बाजल- “हमहूँ आने गामक वासी छी। नानाक दोखतरीपर छी। तँए, ने गामक आँट-पेट जनै छी आ ने पुरना लोक सभकेँ।”
कहलि‍यनि‍- “हम डॉक्‍टर छी।”
ओ बजलाह- “तखन तँ गामक देवते भेलौं। जाबे अपन ठर नै बनि‍ जाइए ताबे एतै रहू। अति‍थि‍-अभ्‍यागतकेँ खुऔने आरो बढ़ै छै।”
ठौर पाबि‍ मन खुशी भेल। जीवैक आशा देख पत्नीकेँ फोन लगेलौं-
“हेलो..”
पत्नी उत्तर देलनि‍- “हँ, हँ, हेलो।”
हम कहलि‍यनि‍- “गामसँ बजै छी। पुन: घुरि‍ कऽ पेरि‍स नै आएब। अहाँ जँ आबए चाही तँ चलि‍ आउ।”
पत्नी कहलनि‍- “चूक भेल जे संगे नै गेलौं। जाधरि‍ अहाँ छलौं ताधरि‍ आ अखनमे जीवन-मृत्‍युक अन्‍तर आबि‍ गेल अछि‍।”
हम कहलि‍यनि‍- “जखने मन हुअए तखने चलि‍ आएब।”
ओ बजलीह- “फोन रखै छी..?”

झमेलि‍या वि‍याह
नाटक
जगदीश प्रसाद मण्‍डल
पात्र परि‍चय-
पुरूष पात्र-
(1) भागेसर- 45 बर्ख
(2) झमेलि‍या- 12 बर्ख
(3) यशोधर- 48 बर्ख
(4) राजदेव- 55 बर्ख
(5) श्‍याम, (राजदेवक पोता)- 8 बर्ख,
(6) कृष्‍णानन्‍द, (बी.ए. पास)- 25 बर्ख
(7) बालगोवि‍न्‍द, (लड़कीक पि‍ता)- 55 बर्ख
(8) राधेश्‍याम, (लड़कीक भाय)- 35 बर्ख
(9) घटकभाय- 60 बर्ख
(10) रूपलाल, (समाज)- 40 बर्ख
(11) गरीबलाल, (समाज)- 45 बर्ख
(12) धीरजलाल, (समाज)- 45 बर्ख
(13) पान-सात बच्‍चा- 7-15 बर्ख
स्‍त्री पात्र-
(1) सुशीला, (भागेसरक पत्नी)- 40 बर्ख
(2) दायरानी, (बालगोवि‍न्‍दक पत्नी)- 52 बर्ख
(3) घटक भाइक पत्नी- 55 बर्ख
(4) सुनीता, (कॉलेजमे पढ़ैत)- 20 बर्ख
पहि‍ल दृश्‍य
(भागेसर, सुशीला)
(रोग सज्‍जापर सुशीला। दवाइ आ पानि‍ नेने भागेसरक प्रवेश।)
भागेसर- केहेन मन लगैए?
सुशीला- की कहब। जखन ओछाइनेपर पड़ल छी, तखन भगवानेक हाथ छन्‍हि‍। राजा-दैवक कोन ठेकान?
भागेसर- से की?
सुशीला- उठि‍ कऽ ठाढ़ो भऽ सकै छी, सुतलो रहि‍ सकै छी।
भागेसर- एना कि‍अए बजै छी। कखनो मुँहसँ अवाच कथा नै नि‍काली। दुरभखो वि‍षाइ छै।
सुशीला- (ठहाका दऽ) बताह छी, अगर दुरभाखा पड़तै तँ सुभाखा कि‍अए ने पड़ै छै? सभ मन पति‍अबैक छी।
भागेसर- अच्‍छा पहि‍ने गोटी खा लि‍अ।
सुशीला- एते दि‍नसँ दवाइ करै छी कहाँ एकोरत्ती मन नीक होइए?
भागेसर- बदलि‍ कऽ डाॅक्‍टर सहाएब गोटी देलनि‍। हुनका बुझबेमे फेर भऽ गेल छलनि‍। सभ बात बुझा कऽ कहलनि‍।
(गोटी खा पानि‍ पीब पुन: सि‍रहौनीपर माथ रखि‍।)
सुशीला- की सभ बुझा कऽ कहलनि‍?
भागेसर- कहलनि‍ जे एक्के लक्षण-कर्मक कते रंगक बेमारी होइए। बुझैमे दुवि‍धा भऽ गेल। तँए आइसँ दोसर बेमारीक दवाइ दइ छी।
सुशीला- (दर्दक आगमन होइत पँजरा पकड़ि‍।) ओह, नै बाँचब। पेट बड़ दुखाइए।
भागेसर- हाथ घुसकाउ ससारि‍ दइ छी।
(सुशीला हाथ घुसकबैत। भागेसर पेट ससारए लगैत कनी कालक पछाति‍।)
सुशीला- हँ, हँ। कनी कऽ दर्द असान भेल। मन हल्‍लुक लगैए।
भागेसर- मनसँ सोग-पीड़ा हटाउ। रोगकेँ दवाइ छोड़ाओत। भरि‍सक दवाइ आ रोगक भि‍ड़ानी भेलै तँए दर्द उपकल।
सुशीला- भऽ सकैए। कि‍अए तँ देखै छि‍ऐ जे भुखल पेटमे छुछे पानि‍ पीलासँ पेट ढकर-ढकर करए लगैए। भरि‍सक सएह होइए।
भागेसर- भगवानक दया हेतनि‍ तँ सभ ठीक भऽ जाएत।
सुशीला- कि‍अए भगवानो लोके जकाँ वि‍चारि‍ कऽ काज करै छथि‍न।
भागेसर- अखैन तक एतबो नै बुझै छि‍ऐ।
सुशीला- हमरा मनमे सदि‍खन चि‍न्‍ते कि‍अए बैसल रहैए। खुशीकेँ कतए नुका कऽ राखि‍ देने छथि‍। आ कि‍.....?
भागेसर- कि‍, आ कि‍?
सुशीला- नै सएह कहलौं। कि‍यो ठहाका मारि‍ हँसैए आ हमरा सबहक हँसि‍ये हराएल अछि‍।
भागेसर- हराएल ककरो ने अछि‍। माइटि‍क तरमे तोपा गेल अछि‍।
सुशीला- ओ नि‍कलत केना?
भागेसर- खुनि‍ कऽ।
सुशीला- कथीसँ खुनबै?
भागेसर- से जे बुझि‍तौं तँ एहि‍ना थाल-पाि‍नमे जि‍नगी बीतैत।
सुशीला- जखन अहाँ एतबो नै बुझै छि‍ऐ तँ पुरूख कोन सपेतक भेलौं। अच्‍छा ऐले मनमे दुख नै करू। नीक-अधलाक बात-वि‍चार दुनू परानी नै करब तँ आनक आशासँ काज चलत।
भागेसर- (मूड़ी डोलबैत जना महसूस करैत, मुँह चि‍कुरि‍अबैत।) कहलौं तँ ओहन बात जे आइ धरि‍ हराएल छलै मुदा ई बुझब केना?
(भागेसरक मुँहसँ अगि‍ला दाँत सोझ आएल, जइसँ पत्नी हँसी बुझि‍।)
सुशीला- अहाँक खुशी देख अपनो मन खुशि‍या गेल।
भागेसर- मन कहाँ खुशि‍आएल अछि‍।
सुशीला- तखन?
भागेसर- बतीसयासँ सठि‍या गेल अछि‍। वएह कलपि‍-कलपि‍, कुहरि‍-कुहरि‍ कुकुआ रहल अि‍छ।
सुशीला- छोड़ू ऐ लट्टम-पट्टाकेँ। जेकरा पलखैत छै ओ करैत रहह। अपन दुख-सुखक गप करू।
भागेसर- कना दुख-सुखक गप अखैन करब। मन पीड़ाएल अछि‍ हुअए ने हुअए.......?
सुशीला- की?
भागेसर- पीड़ाएले मन ताउसँ बौराइ छै। पहि‍ने देहक रोग भगाउ तखैन नि‍चेनसँ वि‍चार करब।
सुशीला- बेस कहलौं। भि‍नसरेसँ झमेलि‍याकेँ नै देखलि‍ऐ हेन?
भागेसर- बाल-बोध छै कतौ खेलाइत हेतै। भुख लगतै अपने ने दौड़ल आओत।
सुशीला- ऐ देहक कोनो ठेकान नै अछि‍। तहूमे बेमारी ओछाइन धरौने अछि‍। जीता जि‍नगी पुतोहू देखा दि‍अए?
भागेसर- मन तँ अपनो तीन सालसँ होइए जे बेटा-बेटी करजासँ उरीन रहब तखन जे मरि‍यो जाएब तँ करजासँ उरीन मनकेँ मुक्‍ति‍ हएत।
सुशीला- सएह मनमे उपकल जे बेटीक वि‍याह कइये नेने छी। जँ परानो छुटि‍ जाएत तँ बि‍नु बरो-बरि‍यातीक लहछू करा अंगबला अंग लगा लेत। मुदा.....?
भागेसर- मुदा की?
सुशीला- यएह जे झमेलि‍योक वि‍याह कइये लइतौं।
भागेसर- अखन तँ लगनो-पाती नहि‍ये अछि‍। समए अबै छै तँ बुझल जेतै।
(झमेलि‍याक प्रवेश।)
झमेलि‍या- माए, माए मन नीक भेलौं कि‍ने?
सुशीला- बौआ, लाखो रोग मनसँ मेटा जाइए, जखने तोरा देखै ि‍छयह। भि‍नसरेसँ नै देखलि‍अ कतए गेल छेलहहेँ?
झमेलि‍या- इसकूलक फीलपर एकटा गुनी आएल छलै। बहुत रास कीदैन-कहाँ सभ झाेरामे रखने छलै। डमरूओ बजबै छलै आ गाबि‍-गाबि‍ कहबो करै छलै।
सुशीला- कि‍ गबै छलै?
झमेलि‍या- लाख दुखक एक दवाइ। पाँचे रूपैया दामो छलै।
सुशीला- एकटा कि‍अए नेने एहल?
झमेलि‍या- हमरा पाइ छलए?
सुशीला- केमहर गेलै?
झमेलि‍या- मारन बाध दि‍सक रस्‍ता पकड़ि‍ चलि‍ गेल।
सुशीला- बौआक वि‍याह कऽ दि‍यौ?
(वि‍याहक नाआंे सुनि‍ झमेलि‍याक मुँहसँ खुशी नि‍कलैत।)
भागेसर- वि‍याहैयो जोकर तँ भइये गेल अछि‍। कहुना-कहुना तँ बारहम बर्ख पार कऽ गेल हएत?
सुशीला- बड़का भुमकमकेँ कते दि‍न भेल हएत। ओही बेर ने जनमल?
भागेसर- सेहो कि‍ नीक जकाँ साल जोड़ल अछि‍। मुदा अपना झमेलि‍यासँ छोट-छोट सभकेँ वि‍याह भेलै तँ झमेलि‍यो भेइये गेल कि‍ने?
पटाक्षेप
दोसर दृश्‍य
(सुरूज डूबैक समए। बाढ़नि‍ लऽ झमेलि‍या आंगन बाहरए लगैत। सुशीला आबि‍ बाढ़नि‍ छि‍नैत।)
सुशीला- जाबे जीबै छी ताबे तोरा केना आंगन-घर बहारए दि‍औ।
झमेलि‍या- कि‍अए, ककरो अनकर छि‍ऐ? अपन घर-आंगन बहारब कोनो पाप छी।
सुशीला- धरम आ पाप नै बुझै छी। मुदा एते तँ जरूर बुझै छी जे भगवानेक बाँटल काज छि‍यनि‍ ने। पुरूख आ स्‍त्रीगणक काज फुट-फुट अछि‍।
झमेलि‍या- राजा-दैवक काज ऐसँ फुट अछि‍। सभ दि‍न कहाँ बहारए अबै छलौं। अखन तू दुखि‍त छेँ, जखन नीक भऽ जेमे तखन ने तोहर काज हेतौ।
सुशीला- सएह बुझै छि‍ही, ई नै बुझै छि‍ही जे काजे पुरूख-सत्रीगणक अन्‍तर कऽ ठाढ़ रखने अछि‍। भलहि‍ं बेटा छि‍ऐ एहेन-एहेन बेरमे तू नै देखमे तँ दोसर केकर आशा। मुदा.......?
झमेलि‍या- मुदा की?
सुशीला- यएह जे माए-बाप बेटा-बेटीक पहि‍ल गुरू होइ छै। हि‍नके सि‍खैलासँ बेटा-बेटी अपन जि‍नगीक रास्‍ता धड़ैए।
(माइयक मुँह झमेलि‍या ओहि‍ना देखैत अछि‍ जहि‍ना रोगसँ ग्रसि‍त गाए अपन दूधमुँह बच्‍चा देख हुकड़ैत अछि‍। तहि‍ना हाथक बाढ़नि‍ नि‍च्‍चा मुँहे केने सुशीला आँखि‍ झमेलि‍याक चेहरापर रखि‍ जना पढ़ि‍ रहल हुअए जे‍ ऐ कुल-खनदान आ परि‍वारक संग माइयो बापक तँ यएह माइटि‍क काँच दि‍आरी छी जे अबैत दोसर दि‍आरीकेँ लेसि‍ टि‍मटि‍माइत रहत। तइकाल भागेसर आ यशोधरक प्रवेश।)
भागेसर- (झमेलि‍यासँ) बौआ साँझ पड़ल जाइ छै, दुआर-दरवज्‍जाक काज देखहक।
झमेलि‍या- दरबज्‍जा बहारि‍ आंगन बहारए एलौं कि‍ माए बाढ़नि‍ छीन लेलक।
(बि‍ना कि‍छु बजनहि‍ भागेसर नीक-अधलाक वि‍चार करए लगल।)
(कनीकाल बाद।)
भागेसर- (पत्नीसँ) मन केहेन अछि‍?
सुशीला- अहूँ बुझि‍ते छी आ अपनो बुझि‍ते छी जे साल भरि‍ दवाइ खाइले डॉक्‍टर सहाएब कहलनि‍ से नि‍महत। जइठीन मथ-टनकीक एकटा गोटी नै भेटै छै तइठीन साल भरि‍ पथ-पानि‍क संग दवाइ खाएब पार लागत?
(बहि‍नक बात सुनि‍ यशोधरकेँ देह पसीज गेल। चाइनि‍क पसीना पोछैत।)
यशोधर- बहि‍न, भगवानो आ कानूनो ऐ परि‍वारक जबाबदेह बनौने छथि‍। जाबे जीबै छी ताबे एहेन बात कि‍अए बजै छह?
सुशीला- भैया, अहाँ कि‍अए.....? खाइर छोड़ू काजक की भेल?
यशोधर- बहि‍न, मने-मन हँसि‍यो लगैए आ मनो कचोटैए। मुदा.......?
सुशीला- मुदा की?
यशोधर- (मुस्‍की दैत) पनरह दि‍नमे पएरक तरबा खि‍आ गेल मुदा काजक गोरा नै बैसल। एकटा लड़कीक भाँज नवानीमे लागल। गेलौं। दरबज्‍जापर पहुँच घरवारीकेँ अवाज दैते आंगनसँ नि‍कललाह।
(बि‍चहि‍मे भागेसर मुस्‍की देलनि‍।)
सुशीला- कथो-कुटुमैतीकेँ हँसि‍येमे उड़ा दइ छऐ?
यशोधर- हँसीबला काजे भेल। तँए हँसी लगलनि‍।
सुशीला- की हँसीबला काज भेल?
यशोधर- दरबज्‍जापर बैस गप चलेलौं कि‍ जहि‍ना हवाक सि‍हकीमे पाकल आम भड़भड़ा जाइत तहि‍ना स्‍त्रीगण सभ आबए लगलीह।
सुशीला- स्‍त्रीगणे अबए लगली आ पुरूख नै?
यशोधर- स्‍त्रीगण बेसी पुरूख कम। एकटा स्‍त्रीगण बि‍चहि‍मे टभकि‍ गेलीह।
सुशीला- की टपकली?
यशोधर- (मुस्‍की दैत) हँसि‍यो लगैए आ छगुन्‍तो लगैए। बजली जे बर पेदार अछि‍ कि‍ जे आनठाम कन्‍यागत जाइत छथि‍ आ अहाँ......? सुनि‍ते मनमे नेसि‍ देलक। उठि‍ कऽ वि‍दा भऽ गेलौं।
सुशीला- स्‍त्रीगणेक बात सुनि‍ अगुता गेलौं। परि‍वारमे बेटा-बेटीक वि‍याह पैघ काज छि‍ऐ पैघ काजक रास्‍तामे छोट-छोट हुच्‍ची-फुच्‍चीपर नजरि‍ नै देबाक चाहि‍ऐ।
यशोधर- एतबे टा नै ने, गामो नीक नै बुझि‍ पड़ल। आमक गाछीसँ बेसी तरबोनी खजुर बोनी। एहेन गामक स्‍त्रीगण तँ भरि‍ दि‍न नहाइये आ झुटकेसँ पएरे-मजैमे बीता देत। तखन घर-आश्रमक काज केना हएत। सोझे उठि‍ कऽ रास्‍ता धेलौं।
सुशीला- आगू कतए गेलौं?
यशोधर- ननौर। गाम तँ नीक बुझाएल। मुदा राजस्‍थाने जकाँ पानि‍क दशा। खाइर कोनो कि‍ बेटीक वि‍याह करब। बेटाक करब। बैसि‍ते गप-सप्‍प चलल। घरवारी कुल-गोत्र पुछलनि‍। कहलि‍यनि‍। सोझे सुहरदे मुँहे कहलनि‍, कुटुमैती नै हएत। ‍
सुशीला- कि‍अए, से नै पुछलि‍यनि‍?
यशोधर- कि‍ पुछि‍ति‍यनि‍। उठि‍ कऽ वि‍दा भेलौं।
सुशीला- भैया, दि‍न-दुनि‍याँ एहने अछि‍। कते दि‍न छी आ कि‍ नै छी। मन लगले रहि‍ जाएत।
यशोधर- कोनो कि‍ बेटीक अकाल पड़ि‍ गेल जे भागि‍नक वि‍याह नै हएत।
सुशीला- डाॅक्‍टर सहाएब ऐठाम कते गोटे पेटक बच्‍चा जँचबए आएल रहए।
यशोधर- ओ सभ वि‍याहक दुआरे खुरछाँही कटैए। मुदा.....?
सुशीला- मुदा की?
यशोधर- माइयो-बापक सराध छोड़ि‍ देत। वि‍याहसँ कि‍ हल्‍लुक काज सराधक छै।
सुशीला- ठनका ठनकै छै तँ कियो अपना मत्‍थापर हाथ दइ छै। ई तँ बुझै छी जे, ‘गाए मारि‍ कऽ जूत्ता दान' करैए। मुदा बुझनहि‍ कि‍ हएत। आगूओ बढ़लौं?
यशोधर- छोड़ि‍ केना देब। तेसर ठाम गेलौं तँ पुछलनि‍ जे लड़का गोर अछि‍ कि‍ कारी?
सुशीला- कि‍अए एहेन बात पुछलनि‍?
यशोधर- लोकक माथमे भुस्‍सा भरि‍ गेल छै। एतबो बुझैले तैयार नै जे मनुक्‍खक मनुखता गुणमे छि‍पल छै नै कि‍ रंगमे।
सुशीला- (नि‍राश मने) कि‍ झमेलि‍या ओहि‍ना रहि‍ जाएत। सृष्‍टि‍ ठमकि‍ जाएत?
यशोधर- अखन लगन जोर नै केलकै हेन, तँए। जहि‍या संयोग आबि‍ जेतै तहि‍या सभ ओहि‍ना मुँह तकैत रहत आ वि‍याह भऽ जेतै।
सुशीला- भैया, दि‍न-राति‍ एहने अछि‍। कखन छी कखन नै छी।
यशोधर- बहि‍न, अइले मनमे दुख करैक काज नै । जखन काजमे भीड़ गेलौं तँ कइये कऽ अंत करब। ओना एकटा लगलगाउ बुझि‍ पड़ल।
सुशीला- की लगलगाउ?
यशोधर- ओ कहलनि‍ जे अहूठामक परि‍वारक काज देख लि‍यौ आ ओहूठामक देख कऽ, काज सम्‍हारि‍ लेब।
भागेसर- ई काज हेबे करत। अपनो ब्रह्म कहैए जे एक रंगाह परि‍वार (एक व्‍यवसायसँ जुड़ल)मे कुटुमैती भेने परि‍वारमे हड़हड़-खटखट कम हएत?
सुशीला- (मूड़ी डोलबैत) हँ, से तँ हएत। मुदा वि‍धाताकेँ चूक भेलनि‍ जे मनुक्‍खोकेँ सींघ-नाङरि‍ कि‍अए ने देलखि‍न।
पटाक्षेप
तेसर दृश्‍य
(राजदेवक घर। पोता श्‍यामकेँ पढ़बैत।)
राजदेव- बौआ, स्‍कूलमे कते शि‍क्षक छथि‍?
श्‍याम- थर्टिन गोरे।
राजदेव- ऐ बेर कोनमे जाएब?
श्‍याम- थ्रीमे।
(हाथमे अखवार नेने कृष्‍णानन्‍दक प्रवेश।)
कृष्‍णानन्‍द- कक्का, एकटा दुखद समाचार अपनो गामक अछि‍?
राजदेव- (जि‍ज्ञासासँ) से कि‍, से कि‍?
कृष्‍णानन्‍द- (अखवार उनटबैत। आंगुरसँ देखबैत।) देखि‍यौ। चि‍न्है छि‍ऐ एकरा?
राजदेव- (दुनू आँखि‍ तरहत्‍थीसँ पोछि‍ गौरसँ देखए लगैत।) ई तँ चि‍न्‍हरबे जकाँ बुझि‍ पड़ैए। कनी गौरसँ देखए दाए हाथमे तानल बन्‍दूक जकाँ बुझि‍ पड़ैए।
कृष्‍णानन्‍द- हँ, हँ कक्का, पुरानो आँखि‍ अछि‍ तैयो चि‍न्हि‍ गेलि‍ऐ।
राजदेव- कनी आरो नीक जकाँ देखए दाए। गामक तँ एक्के गोरे सीमा चौकीपर रहैए। ब्रह्मदेव।
कृष्‍णानन्‍द- (दुनू आँखि‍क नोर पोछैत।) हँ, हँ कक्का। हुनके छातीमे गोली लगलनि‍। मुँह देखै छि‍ऐ खुजल। देश भक्‍ति‍क नारा लगा रहलाहेँ।
राजदेव- (ति‍लमि‍लाइत।) बौआ, तोरे संगे ने पढ़ै छेलह।
कृष्‍णानन्‍द- संगि‍ये छेलाह। अपना क्‍लासमे सभ दि‍न फस्‍ट करै छलाह। हाइये स्‍कूलसँ मनमे रोपि‍ नेने छेलाह जे देश भक्‍त बनब। से नि‍माहि‍यो लेलनि‍।
राजदेव- बौआ, देश भक्‍तक अर्थ संकीर्ण दायरामे नै वि‍स्‍तृत दयरामे छै। ओना अपन-अपन पसन आ अपन-अपन वि‍चार सभकेँ छै।
कृष्‍णानन्‍द- कनी फरि‍छा कऽ कहि‍यौ?
राजदेव- देखहक, खेतमे पसीना चुबबैत खेति‍हर, सड़कपर पत्‍थर फोड़ैत बोनि‍हार, धारमे नाओ खेबैत खेबनि‍हार सभ देश सेवा करैत अछि‍, तँए देशभक्‍त भेलाह।
कृष्‍णानन्‍द- (नमहर साँस छोड़ैत।) अखन धरि‍ से नै बुझै छलि‍ऐ।
राजदेव- नहि‍यो बुझैक कारण अछि‍। ओना देशक सीमाक रक्षा बाहरी दुश्मनक (आन देशक) रक्षाक लेल होइत अछि‍। मुदा जँ मनुष्‍यमे एक-दोसराक संग प्रेम जगत तँ ओहुना रक्‍छा भऽ सकैए। मुदा से नै अछि‍।
कृष्‍णानन्‍द- (मूड़ी डोलबैत।) हँ से तँ नहि‍ये अछि‍।
राजदेव- मुदा देशक भीतरो कम दुश्‍मण नै अछि‍। एहेन-एहेन रूप बना मुँह-दुबर लोकक संग कम अत्‍याचार केनि‍हारोक कमी नै अछि‍।
कृष्‍णानन्‍द- से केना?
राजदेव- देखते छहक जे जइ देशमे खाइ बेतरे लोक मरैए, घर दवाइ, पढ़ै-लि‍खैक तँ बात छोड़ह। तइ देशमे ढोल पीटनि‍हार देश सेवक सभ अपन सम्‍पत्ति‍ चोरा-चोरा आन देशमे रखने अछि‍ ओकरा कि‍ बुझै छहक?
कृष्‍णानन्‍द- हँ, से तँ ठीके कहै छी।
राजदेव- केहेन नाटक ठाढ़ केने अछि‍ से देखै छहक। आजुक समैमे सभसँ पैघ आ सभसँ बि‍कराल समस्‍या देशक सोझा ई अछि‍ जे सभकेँ जीबै आ आगू बढ़ैक समान अवसर भेटै।
कृष्‍णानन्‍द- हँ, से तँ जरूरि‍ये अछि‍।
राजदेव- एक्के दि‍स एहेन बात नै ने अछि‍?
कृष्‍णानन्‍द- तब?
राजदेव- समाजोमे अछि‍। कनी गौर कऽ कऽ देखहक। पैछले बर्ख ने ब्रहमदेवक वि‍याह भेल छलै?
कृष्‍णानन्‍द- हँ। बरि‍याति‍यो गेल रही। बड़ आदर-सत्‍कार भेल रहए।
राजदेव- एक्कोटा सन्‍तान तँ नै भेलैक अछि‍।
कृष्‍णानन्‍द- नै। हमरा बुझने तँ भरि‍सक दुनू परानीक भेँटो-घाँट तेना भऽ कऽ नै भेल हेतै। कि‍अए तँ गाम अबि‍ते खबड़ि‍ भेलै जे सीमापर उपद्रव बढ़ि‍ गेल, तँए सबहक छुट्टी केन्‍सि‍ल भऽ गेल। बेचारा वि‍याहक भोरे बोरि‍या-वि‍स्‍तर समेटि‍ दौड़ल।
राजदेव- अखन तँ नव-धब घटना छै तँए जहाँ-तहाँ वाह-वाही हेतै। मुदा प्रश्न वाह-वाहीक नै प्रश्न जि‍नगीक अछि‍। बेटाक सोग माए-बापकेँ आ पति‍क दुख स्‍त्रीकेँ नै हेतै?
कृष्‍णानन्‍द- हेबे करतै।
राजदेव- एना कि‍अए कहै छह जे हेबे करतै। जहि‍ना एक दि‍स मनुष्‍य कल्‍याणक धरम हेतै तहि‍ना दोसर दि‍स माए-बाप अछैत बेटा मृत्‍युक दोष, समाज सेहो देतनि‍।
कृष्‍णानन्‍द- (गुम होइत मूड़ी डोलबए लगैत।)
राजदेव- चुप भेने नै हेतह। समस्‍याकेँ बुझए पड़तह। जे समाजमे केना समस्‍या ठाढ़ कएल जाइए। तोंही कहह जे ओइ दूध-मुँहाँ बच्‍चि‍याक कोन दोख भेलै।
कृष्‍णानन्‍द- से तँ कोनो नै भेलै।
राजदेव- समाज ओकरा कोन नजरि‍ये देखत?
कृष्‍णानन्‍द- (मूड़ी डोलबैत।) हूँ-अ-अ।
राजदेव- हुँहकारी भरने नै हेतह। भारी बखेरा समाज ठाढ़ केने अछि‍। ओइ, बच्‍चि‍याक भवि‍ष्‍य देखनि‍हार कि‍यो नै अछि‍, मुदा......?
कृष्‍णानन्‍द- मुदा की?
राजदेव- यएह जे, एक दि‍स कलंकक मोटरीसँ लादि‍ देत तँ दोसर दि‍स जीनाइ कठि‍न कऽ देत।
कृष्‍णानन्‍द- हँ, से तँ करबे करत।
राजदेव- तोही कहह, एहेन समाजमे लोकक इज्‍जत-आवरू केना बचत?
कृष्‍णानन्‍द- (मूड़ी डोलबैत। नमहर साँस छोड़ि‍।) समस्‍या तँ भारी अछि‍।
राजदेव- नै, कोनो भारी नै अछि‍। सामाजि‍क ढर्ड़ाकेँ बदलए पड़त। वि‍घटनकारी सोच आ काजकेँ रोकि‍ कल्‍याणकारी सोच आ काज करए पड़त। तखने हँसैत-खेलैत जि‍नगी आ मातृभूमि‍केँ देखत।
कृष्‍णानन्‍द- (मुस्‍की दैत।) संभव अछि‍।
राजदेव- ई काज केकर छि‍ऐ?
कृष्‍णानन्‍द- हँ, से तँ अपने सबहक छी।
राजदेव- हँ। ऐ दि‍शामे एक-एक आदमीकेँ डेग बढ़बैक जरूरत अछि‍।
पटाक्षेप
चारि‍म दृश्‍य
(भागेसर दरबज्‍जा सजबैत। बहाड़ि‍-सोहाड़ि‍ चारि‍टा कुरसी लगौलक। कुरसी सजा भागेसर चारूकात नि‍हारि‍-नि‍हारि‍ गौर करैत। तहीकाल बालगोवि‍न्‍द आ राधेश्‍यामक प्रवेश।)
भागेसर- आउ, आउ। कहू कुशल?
(कुरसीपर तीनू गोरे बैसैत।)
बालगोवि‍न्‍द- (राधेश्‍यामसँ।) बौआ, बेटी हमर छी, वहीन तँ तोरे छि‍अ। अखन समए अछि‍ तँए......?
भागेसर- अपने दुनू बापूत गप-सप्‍प करू।
(कहि‍, उठि‍ कऽ भीतर जाइत।)
राधेश्‍याम- अहाँक परोछ भेने ने......। जाबे अहाँ छि‍ऐ, ताबे हम.....।
भागेसर- नै, नै। परि‍वारमे सभकेँ अपन-अपन मनोरथ होइ छै। चाहे छोट भाए वा बेटाक वि‍याह होउ आकि‍ बेटी- बहि‍नक होउ।
राधेश्‍याम- हँ, से तँ होइते अछि‍। मुदा अहाँ अछैत जते भार अहाँपर अछि‍ ओते थोड़े अछि‍। तखन तँ बहि‍न छी, परि‍वारक काज छी, कोनो तरहक गड़बड़ भेने बदनामी तँ परि‍वारेक हएत।
बालगोवि‍न्‍द- जाधरि‍ अंजल नै केलौंहेँ ताधरि‍ दरबज्‍जा खुजल अछि‍। मुदा से भेलापर बान्ह पड़ि‍ जाइत अछि‍। तँए......?
राधेश्‍याम- हम तँ परदेश खटै छी। शहरक बेबहार दोसर रंगक अछि‍। गामक की बेबहार अछि‍ से नीक जकाँ थोड़े बुझै छी। मुदा तैयो......?
बालगोवि‍न्‍द- मुदा तैयो कि‍?
राधेश्‍याम- ओना तँ बहुत मि‍लानीक प्रश्न अछि‍ मुदा कि‍छु एहेन अछि‍ जेकर हएब आवश्यक अछि‍?
बालगोवि‍न्‍द- आब कि‍ तोहूँ बाल बोध छह, जे नै बुझबहक। मनमे जे छह से बाजह। मन जँचत कुटुमैती करब नै जँचत नै करब। यएह तँ गुण अछि‍ जे अल्‍पसंख्‍यक नै छी।
राधेश्‍याम- कि‍ अल्‍पसंख्‍यक?
बालगोवि‍न्‍द- जइ जाति‍क संख्‍या कम छै ओकरा संगे बहुत रंगक बि‍हंगरा ठाढ़ होइत अछि‍। मुदा जइ काजे एलौंहेँ तेकरा आगू बढ़ाबह। कि‍ कहलहक?
राधेश्‍याम- कहलौं यएह जे कमसँ कम तीनक मि‍लानी अवस होइ। पहि‍ल गामक दोसर परि‍वारक आ तेसर लड़का-लड़कीक।
बालगोवि‍न्‍द- जँ तीनूक नै होइ?
राधेश्‍याम- तँ दुइयोक।
बालगोवि‍न्‍द- जेहने अपन परि‍वारक बेबहार छह तेहने अहू परि‍वारक अछि‍। गामो एकरंगाहे बुझि‍ पड़ैए। लड़का-लड़की सोझेमे छह।
राधेश्‍याम- तखन कि‍अए काज रोकब?
(जगमे पानि‍ आ गि‍लास नेने भागेसर आबि‍, टेबुलपर गि‍लास रखि‍ पानि‍ आगू बढ़बैत। गि‍लास हाथमे लऽ।)
बालगोवि‍न्‍द- नीक होइत जे पहि‍ने काजक गप अगुआ लेतौं।
भागेसर- अखन धरि‍ अहूँ पुरने वि‍ध-बेबहारमे लटकल छी। कुटुमैती हुअए वा नै मुदा दरबज्‍जापर आबि‍ जँ पानि‍ नै पीब, ई केहन हएत?
(पानि‍ पीबैत। तहीकाल झमेलि‍या चाह नेने अबैत। पानि‍ पि‍आ दुनू गोटेकेँ चाहक कप दैत भागेसर अपनो कुससीपर बैस चाह पीबए लगैत।)
बालगोवि‍न्‍द- समए तेहन दुरकाल भऽ गेल जे आब कथा-कुटुमैतीमे कतौ लज्‍जति‍ नै रहैए। बेसीसँ बेसी चारि‍-आना कुटुमैती कुटुमैती जकाँ होइए। बारह आनामे झगड़े-झंझट होइए।
भागेसर- हँ, से तँ देखते छी। मुदा हवा-बि‍हाड़ि‍मे अपन जान नै बँचाएब तँ उड़ि‍ कऽ कतएसँ कतए चलि‍ जाएब, तेकर ठेकान रहत।
बालगोवि‍न्‍द- पैछला लगनक एकटा बात कहै छी। हमरे गामक छी। कुल-खनदान तँ दबे छन्‍हि‍‍ मुदा पढ़ि‍-लि‍ख परि‍वार एते उन्नति‍ केने अछि‍ जे इलाकामे कि‍यो कहबै छथि‍।
भागेसर- वाह।
बालगोवि‍न्‍द- लड़को-लड़की उपरा-उपरी। कमसँ कम पचास लाखक ि‍बयाहो भेल छलै। मुदा खाइ-पीबै बेरमे तते माि‍र-पीट भेल जे दुनूकेँ मन रहतनि‍।
भागेसर- मारि‍ कि‍अए भेल?
बालगोवि‍न्‍द- पुछलि‍यनि‍ ते कहलनि‍ जे वि‍याह-दानमे कोनो रसे नै रहि‍ गेल अछि‍। बरि‍याती सदि‍खन लड़कीबलाकेँ नि‍च्‍चा देखबए चाहैत तँ सरि‍याती बरि‍यातीकेँ। अही बीचमे रंग-वि‍रंगक बखेरा ठाढ़ कऽ मारि‍-पीट होइए।
भागेसर- एहेन बरि‍यातीमे जाएबो नीक नै‍।
बालगोवि‍न्‍द- सज्‍जन लोक सभ छोड़ि‍ देलनि‍। मुदा तैयो कि‍ बरि‍याती कम जाइए। तते ने गाड़ी-सवारी भऽ गेल जे हुहुऔने फि‍रैए।
भागेसर- खाइर, छोड़ू दुनि‍याँ-जहानक बात। अपन गप करू।
बालगोवि‍न्‍द- हमरेसँ पुछै छी। कन्‍यागत तँ सदति‍ चाहै छथि‍ जे एकटा ऋृण उताड़ैमे दोसर ऋृण ने चढ़ि‍ जाए। अपने लड़काबला छि‍ऐ। कोना दुनू परि‍वारक कल्‍याण हएत, से तँ......?
भागेसर- दुनि‍याँ केम्‍हरो गुड़ैक जाउ। मुदा अपनोले तँ कि‍छु करब। आइ जँ बेटा बेच लेब तँ मुइलापर आगि‍ के देत। बेचलाहा बेटासँ पैठ हएत।
बालगोवि‍न्‍द- कहलि‍ऐ तँ बड़बढ़ि‍या। मुदा समाजक जे कुकुड़चालि‍ छै से मानता दुनू परि‍वार मि‍ल-जुलि‍ काज ससारि‍ लेब। मुदा नढ़ि‍या जकाँ जे भूकत तेकर कि‍ करबै?
भागेसर- हँ से तँ ठीके, पैछलो नीक चलनि‍ आ अखुनको नीक चलनि‍ अपनाए कऽ अधला चलनि‍ छोड़ि‍ देब। कि‍अए कि‍यो भूकत। जँ भूकबो करत तँ अपन मुँह दुखाओत।
(बरक रूपमे झमेलि‍याक प्रवेश..)
बालगोवि‍न्‍द- बेटा-बेटीक वि‍याहमे समाजक पाँचो गोटे तँ रहैक चाहि‍ऐ ने?
भागेसर- भने मन पाड़ि‍ देलौं। घरे-अंगना आ दुआरे-दरबज्‍जापर तते काज बढ़ि‍ गेल जे समाज दि‍स नजरि‍ये ने गेल।
बालगोवि‍न्‍द- आबे कि‍ भेल, बजा लि‍औन। समाजकेँ तँ लड़का देखले छन्‍हि‍, हमहूँ दुनू बापूत देखि‍ये लेलौं।
भागेसर- केहन लड़का अछि‍?
बालगोवि‍न्‍द- एते काल बटोही छलौं तँए बटोहि‍क संबंध छल। मुदा आब संबंध जोड़ैक वि‍ध शुरू भऽ गेल तँए संबंधी भेल जा रहल छी।
भागेसर- कि‍ कहू बालगोवि‍न्‍दबाबू, जि‍नगि‍ये तते रि‍या-खि‍या गेल अछि‍ जे बेलक बेली जकाँ बनि‍ गेल छी।
बालगोवि‍न्‍द- (ठहाका मारि‍) समधि एक भग्‍गू कहलि‍ऐ। छोटोसँ पैघ बनैए आ पैघोसँ छोट बनैए। छोट-छोट कीड़ी-मकौरी समैक संग ससरैत-ससरैत नमहर बनि‍ जाइए। तहि‍ना कलकति‍या आकि‍ फैजली आम सरही होइत-होइत तेहन भऽ जाइए जे बि‍सवासे ने हएत जे ई फैजली बंशक बड़वड़ि‍या बीजू छी।
भागेसर- बालगोवि‍न्‍दबाबू, गप-सप्प चलि‍ते रहत समाजोकेँ बजा लइ छि‍यनि‍।(समाज दि‍स नजरि‍ दोड़बैत भागेसर आंगुरपर हि‍साब जोड़ैत..) ओह फल्‍लां दोगला अछि‍। (पुन: आंगुरपर जोड़ि‍) ओह फल्‍लां तँ दुष्‍ट छी दुष्‍ट। फल्‍लां पक्का दलाल छी। साला बेटी वि‍याहक बात बना रोजगार खोलने अछि‍। परि‍वारक बीच जाति‍ होइए आकि‍ समाजक बीच। जेकर वि‍चार नीक रस्‍ते चलए ओ कि‍अए ने समाज बनाबए।
बालगोवि‍न्‍द- समधि‍, कि‍अए अटकि‍ गेलौं?
भागेसर- बालगोवि‍न्‍दबाबू, लोक तँ समाजेमे रहि‍ समाजक संग चलत मुदा वि‍याह सन पारि‍वारि‍क यज्ञमे जँ समाजक लोक धोखा दइ तखन?
बालगोवि‍न्‍द- समधि‍ कहलौं तँ बेस बात, मुदा जहि‍ना ई समाज अछि‍ तहि‍ना हमरो अछि‍। ठीके कहलौं जे वि‍याह सन काज जइसँ समाजक एक अलंग ठाढ़ होइत तइमे उचक्का सभक उचकपन्नी आरो सुतरैए। बर-कनि‍याँक देखा-सुनीसँ लऽ कऽ सि‍नुरदान धरि‍ कि‍छु ने कि‍छु बि‍गाड़ैक कोशि‍श करबे करैए।
भागेसर- एकटा बात मन पड़ि‍ गेल। भाए-बहीनि‍क बीचक कहै छी। (भागेसरक बात सुनि‍ राधेश्‍याम चौंक गेल..)
राधेश्‍याम- कि‍ कहलखि‍न भाए-बहि‍न‍।
भागेसर- बाउ, अहाँक तँ बहि‍न छी। भाए-बहीनि‍क बीच बरावरीक जि‍नगी हेबाक चाही से तेहन-तेहन वंशक बतौर सभ जन्‍म लेने जाइऐ जे......?
राधेश्‍याम- की जे?
भागेसर- अपन पड़ोसीक कहै छी। सौ-बीघाक परि‍वारमे पाँच भाए-बहीनि‍क भैयारी। बीस बीघा माथपर भेल। बहि‍न सभसँ छोट। सौ बीघा स्‍तरक लड़कीकेँ दू बीघाबला परि‍वारमे भाए सभ वि‍याहि‍ देलक।
राधेश्‍याम- पि‍ता नै बुझलखि‍न?
भागेसर- सएह ने कहै छी। पि‍ता जँ पुत्रपर वि‍सवास नै करथि‍ तँ कि‍नकापर करथि‍। तते चढ़ा-उतड़ी चारू बेटा कहलकनि‍‍ जे पि‍ता अपन भारे सुमझा देलखि‍न। बेटा सभ केहन बेइमान जे बहीनि‍क कोढ़-करेज काटि‍ अपन कनतोड़ी सजबए लगल।
राधेश्‍याम- पछाति‍यो पि‍ता नै बुझलखि‍न?
भागेसर- बुझि‍ये कऽ कि‍ करि‍तथि‍न। मुइने एला बैद तँ कि‍दनकेँ के जेता।
राधेश्‍याम- बड़ अन्‍याय भेल!
भागेसर- अन्‍याय कि‍ भेल अन्‍याय जकाँ। ओही सोगे माए जे ओछाइन धेलखि‍न से धेनेहि‍ रहि‍ गेलखि‍न। पि‍तो बौरा कऽ वृन्‍दावन चलि‍ गेलखि‍न।
राधेश्‍याम- बाबू, जहि‍ना माए-बापक बेटी- छि‍यनि‍ तहि‍ना बहि‍न हमरो छी। ओना खाइ-पीबै आ लत्ता-कपड़ाक दुख अखन धरि‍ नहि‍ये भेलै, मुदा आगूक तँ नै कहि‍ सकै छि‍यनि‍। दि‍न-राति‍ माइयक संग काज उदममे रहैए। माइयक समकश तँ नै भेल मुदा दू-चारि‍ सालमे भइये जाएत। सभ सीख-लि‍ख माइयेक छै।
भागेसर- अहाँ कतऽ रहै छि‍ऐ?
राधेश्‍याम- ओना बाहरे रहै छी। मुदा आन बहरबैया जकाँ नै जे गाम-घर, सर-समाज छोड़ि‍ देलौं। जे कमाइ छी परि‍वारमे दइ छि‍ऐ।
बालगोवि‍न्‍द- समैध अबेर भऽ जाएत। कम-सँ-कम पाँचटा बच्‍चोकेँ शोर पाड़ि‍यौ। अदौसँ अपना ऐठामक चलनि‍ अछि‍। (गुरूकूलक अध्‍ययन समाजक काजक अनुकूल होएत)
(दरबज्‍जेपर सँ भागेसर बच्‍चा सभकेँ शोर पाड़लखि‍न..)
(पाँच-सातटा बच्‍चा अबैत अछि‍..)
एकटा बच्‍चा- झमेलि‍या भैयाक वि‍याह हेतै कक्का?
भागेसर- हँ।
बच्‍चा- बरि‍याती हमहू जेबे करब।
भागेसर- तोरो लऽ जाए पड़तौ।
बच्‍चा- लऽ जाएब।
पटाक्षेप
पाँचम दृश्‍य
(बालगोवि‍न्‍दक घर। पत्नी दायरानीक संग बालगोवि‍न्‍द बैसल..)
बालगोवि‍न्‍द- ओना जे बात भेल तइसँ कुटुमैती हेबे करत। मुदा समए-साल तेहन भऽ गेल जे वि‍याहो मड़बासँ लड़का रूसि‍-फुलि‍ कऽ चलि‍ जाइए।
दायरानी- हँ, से तँ होइए। मुदा जहि‍ना कुत्ता-बि‍लाइकेँ धि‍या-पुता खेनाइ देखा फुसला कऽ लऽ अनैए तहि‍ना मनुखो फुसलबैक ने.....?
बालगोवि‍न्‍द- नै बुझलौं। कनी फड़ि‍छा दि‍यौ।
दायरानी- कोन काज सि‍रपर अछि‍ आ कोन काज लधऽ चाहै छी। जखने सि‍रपड़क काज छोड़ि‍‍ दोसर काजमे लागब तखने घुरछी लगए लागत। जखने घुड़छी लागत तखने काज ओझरा-पोझरा जाएत।
बालगोवि‍न्‍द- तखन?
दायरानी- जतेटा आ जेहन काज रहए ओइ हि‍साबसँ काज सम्‍हारि‍ ली। अखन वि‍याहक काज अछि‍ तँए घटक भायकेँ बजा सभ गप कहि‍ दि‍यनु।
बालगोवि‍न्‍द- अपनो वि‍चार छल भने अहूँ कहलौं।
दायरानी- युग-जमाना अकानि‍ कऽ चलैक चाही। जँ से नै करब तँ पाओल जाएब।
बालगोवि‍न्‍द- कहलौं तँ बेस बात मुदा एहनो तँ होइ छै जे गाममे जखन चोर चोरी करए अबैए तखन ठेकयौने रहैए कताै आ अपनेसँ हल्‍ला दोसर दि‍स करैए। लोक ओमहर गेल आ खाली पाबि‍ चोर ठेकि‍येलहा घरमे चोरी कऽ लइए।
दायरानी- हँ, से तँ होइए। मुदा बेसी पि‍ंगि‍ल पढ़ने तँ काजो पछुआइये जाइए। तँए ओते अगर-मगर नै करू। एतबो नै आँखि‍ अछि‍ जे देखबै।
बालगोवि‍न्‍द- कि‍ देखबै?
दायरानी- बि‍ना घटक्के केकर वि‍याह होइ छै। समाजमे जखन सभ करैए तखन अपनो नै करब तँ ओहो एकटा खोटि‍करमे हएत कि‍ने।
बालगोवि‍न्‍द- कि‍ खोटि‍करमा?
दायरानी- अनेरे लोक की-कहाँ बाजत। तहूमे जेकर जीवि‍का िछऐ ओ अपन मुँह कि‍अए चुप राखत। छोड़ू ऐ-सभ गपकेँ। जाउ अखने घटक भायकेँ हाथ जोड़ि‍ कहबनि‍ जे बेटी तँ समाजक होइ छै, कोनो तरहेँ समाजक काज पार लगाउ।
बालगोवि‍न्‍द- (बुदबुदाइत) कतऽ नै दलाली अछि‍। एक्के शब्‍दकेँ जगह-जगह बदलि‍-बदलि‍ सभ अपन-अपन हाथ सुतारैए। तखन तँ गरा ढोल पड़ल अछि‍, बजबै पड़त।
दायरानी- बजैत दुख होइए। अगर जँ लोक अपनो दि‍न-दुनि‍याँक बात बुझि‍ जाए तैयौ बहुत हेतइ। खाइर, देरी नै करू, बेरू पहर ओ सभ औता, अखुनका कहल नीक रहत। तँए अखने कहि‍ अबि‍यौन।
(घटक भाइक दलानपर बैस जोर-जोरसँ पत्नीकेँ कहै छथि‍। आंगनसँ पत्नी सुनति‍ छथि‍..।)
घटक भाय- समए कतऽ-सँ-कतऽ भागि‍ गेल आ डारि‍क बि‍ढ़नी छत्ता जकाँ समाज ओतै-कऽ-औते लटकल अछि‍। आब ओ जुग-जमाना अछि‍ जे बही-खाता लऽ बैसल रहू आ आमदनी कतऽ तँ सवा रूपैया। बाप रे, समैमे आगि‍ लागि‍ गेल।
पत्नी- (अंगनेसँ) ओहि‍ना डि‍रि‍आएब। रखने ने रहू बेटाकेँ चूड़ा-दही खाइले। जेकर बेटा कमासुत छै ओकरा देखै छि‍ऐ जे कतऽ-सँ-कतऽ आगू चलि‍ गेल। सपनोँ सपनाएल रही जे बड़दक संगे भरि‍ दि‍न बहैबलाक बेटा ट्रेक्‍टरक ड्राइवरी करतै। दू-सेरक जगह दू हजारक परि‍वार बना लेतै।
(बालगोवि‍न्‍दकेँ देख घटक भाय दमसि‍ कऽ खखास करैत। घटक भाइक खखास सुनि‍ पत्नी बुझि‍ गेलखि‍न। अपन बातकेँ ओतै रोकि‍ देलनि‍।)
बालगोवि‍न्‍द- गोड़ लगै छी भाय।
घटक भाय- जीबू-जीबू। भगवान खेत-खरि‍हान, घर-दुआर भरने रहथि‍। एहनो समैकेँ अहाँ नहि‍ये गुदानलि‍यनि‍। अहाँ सन-सन लोक जे समाजमे भऽ जाथि‍ तँ कतऽ-सँ-कतऽ समाज पहुँच जाएत।
बालगोवि‍न्‍द- भाय, सि‍रपर काज आबि‍ गेल। तँए बेसी नै अटकब।
घटक भाय- केहन काज?
बालगोवि‍न्‍द- बेटीक वि‍याह करब। उहए लड़की देखए बरपक्ष आबि‍ रहल छथि‍। तहीले....!
घटक भाय- अहाँकेँ नै बुझल अछि‍ जे अही समाज लेल खुन सुखा रहल छी। कि‍ पागल छी। जेकरा लूरि‍ ने भास छै से शहर-बजार जा-जा महंथ बनल अछि‍ आ हम समाज धेने छी।
बालगोवि‍न्‍द- हँ, से तँ देखते छी। तँए ने......।
घटक भाय- अच्‍छा बड़बढ़ि‍या। ओना हम अपनो कानपर राखब मुदा बुझि‍ते छी जे दस-दुआरी छी। जँ कहीं दोसर दि‍स लटपटेलौं तँ वि‍सरि‍यो जा सकै छी। तँए अबैसँ पहि‍ने ककरो पठा देबै।
बालगोवि‍न्‍द- बड़बढ़ि‍या। जाइ छी।
घटक भाय- ऐह, एहि‍ना कना चलि‍ जाएब। एते दि‍न ने लोक तमाकुले बीड़ीपपर दरबज्‍जाक इज्‍जत बनौने छलै मुदा आब ओइसँ काज थोड़बे चलत। िबना चाह-पीने कोना चलि‍ जाएब?
बालगोवि‍न्‍द- अहाँकेँ कि‍ अइले उपराग देब। बहुत काज अछि‍। तँए माफी मंगै छी अखन छुट्टि‍ये दि‍अ।
(बालगोवि‍न्‍द वि‍दा भऽ जाइत..)
घटक भाय- (स्‍वयं) भगवान बड़ीटा छथि‍न। जँ से नै रहि‍तथि‍ तँ पहाड़क खोहमे रहैबला कोना जीवैए। अजगरकेँ अहार कतऽ सँ अबै छै। घास-पातमे फूल-फड़ केना लगै छै....।
(बालगोवि‍न्‍दक दरब्‍ज्‍जा। चौकीपर ओछाइन ओ‍छाएल।
बालगोवि‍न्‍द- सभ कि‍छु तँ सुढ़ि‍या गेल। कने नजरि‍ उठा कऽ देखहक जे कि‍छु छुटल ने तँ...।
राधेश्‍याम- (चारू कात नजरि‍ खि‍ड़बैत..) नजरि‍पर तँ कि‍छु ने अबैए। (कने बि‍लमि‍) हँ, हँ, एकटा छुटल अछि‍। पएर धोइक बेबस्‍था नै भेल।
बालगोवि‍न्‍द- बेस मन पाड़ि‍ देलह। तँए ने नमहर काज (परि‍वारक अगि‍ला काज) मे बेसी लोकसँ वि‍चार करक चाही। दसेमे ने भगवान वसै छथि‍। जखने दसटा आँखि‍ दस दि‍स घुमै छै तखने ने दसो दि‍शा देख पड़ै छै।
(भागेसर आ यशोधरक आगमन..)
बालगोवि‍न्‍द- जहि‍ना समय देलौं तहि‍ना पहुँचि‍ओ गेलौं। पहि‍ने पएर-हाथ धो लि‍अ तखन नि‍चेनसँ बैसब।
भागेसर- तीन-कोस पएरे चलैमे मनो कि‍छु ठेहि‍या जाइ छै।
(दुनू गोटेकेँ पएर-हाथ‍ धोइतेकाल घटक भाइक प्रवेश..)
घटक भाय- पाहुन सभ कहाँ रहै छथि‍?
बालगोवि‍न्‍द- भाय, नवका कुटुम छथि‍। ओना अखन रीता (बेटी) वि‍याह करै जोकर नहि‍ये भेल छै, मुदा ऐ देहक कोनो ठेकान अछि‍। बेटा-बेटीक वि‍याह तँ माए-बापक कर्ज छी। अपना जीवैत कतौ अंग लगा देने भगवानो घरमे दोखी नै ने हएब।
घटक भाय- कुटुम, अपना एेठामक जे वुद्धि‍-वि‍चार अछि‍ ओ दुनि‍याँमे कतऽ अछि‍। एक-एक काज ओहन अछि‍ जेहन पत्‍थर-कोइलाक ताउमे धि‍पा लोहाक कोनो समान बनैत अछि‍।
भागेसर- हँ, से तँ अछि‍ये।
घटक भाय- अपने ऐठाम खरही आ ठेंगासँ लड़का-लड़की (वर-कन्‍या)केँ नापि‍ वि‍याह होइत अछि‍।
यशोधर- आब ओ बेबहार उठि‍ गेल।
घटक भाय- हँ, हँ, सएह कहै छी। बेबहार तँ उठि‍ गेल मुदा ओइ पाछु जे वि‍चार छल से नै ने मरि‍ गेल। वि‍चारवानक बखारीक अन्न तँ वएह ने छि‍यनि‍।
राधेश्‍याम- काका, कने फरि‍छा दि‍यौ। एक तँ नव कवरि‍या छी तहूमे परदेशी भेलौं।
घटक भाय- बौआ, तोहूँ बेटे-भतीजे भेलह। बहुत पढ़ल-लि‍खल नहि‍ये छी। लगमे बैसा-बैसा जे बाबा सि‍खौलनि‍ से कहै छि‍अ। तहूँमे बहुत वि‍सरि‍ये गेलौं।
राधेश्‍याम- जे बुझल अछि‍ सएह कहि‍यौ।
घटक भाय- समाजमे दुइओ आना एहन परि‍वार नै अछि‍ जि‍नका परि‍वारमे बच्‍चाक टि‍प्‍पणि‍ बनै छन्‍हि‍। बाकी तँ बाकि‍ये छथि‍। अदौसँ लड़का अपेक्षा लड़की उम्र कम मानल गेल। जकरा तारीख-मड़कूमामे नै नापमे मानल गेल।
राधेश्‍याम- जँ दुनूमे सँ कोनो बढ़नगर आ कोनो भुटारि‍ हुअए, तखन?
घटक भाय- बेस कहलह। तँए ने अव्‍यवहारि‍क भऽ गेल। सदि‍खन समाजकेँ आँखि‍ उठा अहि‍तपर नजरि‍ राखक चाहि‍ये।
भागेसर- हँ, से तँ चाहबे करी। मुदा वि‍चारलो बात तँ नहि‍ये होइ छै।
घटक भाय- बेस बजलौं। ऐमे दुनू दोख अछि‍। वि‍चारनि‍हारोकेँ वि‍चारैमे गड़बड़ होइ छन्‍हि‍ आ राजादैवक (प्रकृति‍ नि‍यम) दोख सेहो होइत अछि‍। अखने दे‍खि‍यौ गोर-कारी रंगक दुआरे कते संबंध नै बनि‍ पबैत अछि‍। एतबो बुझैले लोक तैयार नै जे मनुष्‍य रंगसँ नै गुणसँ बनैत अछि‍।
यशोधर- हँ, से तँ होइते अछि‍। हमरो गाममे हाथमे सि‍नुर लेल बरकेँ बरक बाप गट्टा पकड़ि‍ घि‍चने-घि‍चने गामे चलि‍ गेल।
घटक भाय- की कहू कुटुम नारायण देखैत-देखैत आँखि‍ पथरा रहल अछि‍। मुदा अछैते औरूदे उरीसक दवाइ पीब उरीसे जकाँ मरि‍ये जाएब से नीक हएत। तहि‍ना देखब जे कुल-गोत्रक चलैत कुटुमैती भङठि‍ जाइए।
यशोधर- हँ, से तँ होइए।
घटक भाय- देखि‍यौ, अपना बहुसंख्‍यक समाजमे अखनो धरि‍ मुँहजवानि‍येक कारोबार चलि‍ आबि‍ रहल अछि‍। जे नीक-अधला बेरबैक वि‍चार गड़बड़ा गेल। जते मुँह तते बात। जइठाम जे मुँहगर तइठाम तेकरे बात चलत। चाहे ओ नीक होय कि‍ अधला।
यशोधर- कनी नीक जकाँ बुझा कऽ कहि‍यौ?
घटक भाय- (बालगोवि‍न्‍द दि‍स देख..) बालगोवि‍न्‍द, आइ तँ कुटुम-नारायण सभ रहता कि‍ने?
बालगोवि‍न्‍द- एक तँ अबेर कऽ एलाहेन। तहूमे अखन धरि‍ तँ आने-आने गप-सप्‍प चलल। काज पछुआएले रहि‍ गेल अछि‍।
घटक भाय- आइ तँ कनि‍येँ देखा-सुनी हएत कि‍ने?
बालगोवि‍न्‍द- हँ। मुदा वि‍याहसँ तँ बि‍ध भारी होइए कि‍ने!
घटक भाय- हँ। से तँ होइते छै। अखन जाइ छी। काल्हि‍ सवेरे आएब। तखन जना-जे हेतइ से हेतइ।
भागेसर- काज जँ ससरि‍ जाइत तँ चलि‍ जैतौं।
घटक भाय- एहनो जाएब होइ छै। जखन कुटुमैती जोड़ि‍ रहल छी तखन एना धड़फड़ेने हएत।
पटाक्षेप
छठम दृश्‍य
(राजदेवक दरबज्‍जा। चद्दरि‍ ओढ़ि‍ राजदेव पड़ल)
सुनीता- बाबा, बाबा-यौ। आँखि‍ लागल अछि‍। (एक हाथमे लोटा दोसरमे गोटी)
राजदेव- नै। जगले छी। दवाइ अनलह।
सुनीता- हँ। लि‍अ।
राजदेव- (चौकि‍येपर बैस गोटी खा पानि‍ पीब कऽ) नाहकमे परान गमबै छी। कहू जे जानि‍ कऽ बेसाहब तँ मरब नै। मुदा करबे कि‍ करू। जानि‍ कऽ कि‍यो थोड़े कुत्ता बधि‍या करए जाइए। जखन कुकुड़चालि‍ नाकपर ठेक जाए छै तखने ने कि‍यो जान अबधारि‍ जाइए।
सुनीता- पाकल आम भेलौं। आबो जँ अपन पथ-परहेज नै राखब तँ कते दि‍न जीब?
राजदेव- बुच्‍च्‍ी, तोहूँ आब बच्‍चा नै छह जे बात टारि‍ देबह। मुदा कि‍ करब? जखन समाजमे रहै छी तखन जँ वि‍याहमे बरि‍याती नै जाएब, मरलापर कठि‍आरी नै जाएब, तँ समाज आगू मुँहेँ ससरत केना।
सुनीता- से तँ बुझलौं, मुदा.....?
राजदेव- मुदा यएह ने जे जे जुआन-जहान अछि ओ जाए। से अपना घरमे अछि‍। तोँ बेटि‍ये जाति‍ भेलह, श्‍याम बच्‍चे अछि‍ बाबू परदेशेमे छथुन तखन तोँही कहह जे कि‍ करब?
सुनीता- (कनी गुम्‍म भऽ) हँ, से तँ अछि‍। मुदा समाजो तँ नमहर अछि‍। बूढ़-पुरान जँ नहि‍यो जेताह तैयो कि‍नको काज थोड़े रूकतनि‍।
राजदेव- कहै तँ छह ठीके मुदा तेहेन-तेहेन ढोढ़ाइ-मंगनू सभ समाजमे फड़ि‍ गेल अछि‍ जे अपेक्षा (संबंध) जोड़त कि‍ तोड़ैये पाछू पील पड़ल अछि‍।
सुनीता- से कि‍?
राजदेव- बि‍नु-ि‍वधक वि‍ध सभ आबि‍ रहल अछि‍ आ नीक वि‍ध मेटा रहल अछि‍। देखै छी तँ तामसे शपथ खा लइ छी जे आब बरि‍याती नै जाएब। मुदा फेर सोचै छी जे नै जेवइ तँ अपना बेर के जाएत।
सुनीता- बरि‍याती जाएब कोनो अनि‍वार्ये छै?
राजदेव- छइहो आ नहि‍यो छै। समाजमे दुनू चलै छै। हमरे वि‍याहमे ममे टा बरि‍याती गेल रहथि‍। सेहो बरि‍याती नै घरवारी बनि‍ कऽ।
सुनीता- तखन फेर एते बरि‍याती कि‍अए जाइ छै?
राजदेव- सेहो कहाँ गलती भेलै। जही लग्‍नमे हमर वि‍याह भेल ओहीमे श्‍यामो दोसकेँ भेलनि‍। पचाससँ उपरे बरि‍याती गेल रहनि‍।
सुनीता- गोटी खेलौंहेँ। कनी काल कल मारि‍ लि‍अ। खाइयोक मन होइए?
राजदेव- अखन तँ नै होइए। मुदा गोटी खेलौं हेन तँए कि‍ कहबह?‍
सुनीता- जे मन फुरए सएह करब।
(कृष्‍णानन्‍दक आगमन)
कृष्‍णानन्‍द- बड़ अनखनाएल जकाँ देखै छी कक्का? चद्दरि‍ कि‍अए ओढ़ने छी?
राजदेव- कोनो कि‍ सुखे ओढ़ने छी। मन गड़बड़ अछि‍।
कृष्‍णानन्‍द- की भेल हन?
राजदेव- एक तँ पेट गड़बड़ भेने मन गड़बड़ लगैए। तोहूमे तेहन-तेहन कि‍रदानी सभ लोक करैए जे होइए अनेरे कि‍अए जीवै छी।
कृष्‍णानन्‍द- हँ, भने मन पड़ि‍ गेल। कामेसर भायकेँ पानि‍ चढ़ै छन्‍हि‍।
राजदेव- कि‍अए। केहन बढ़ि‍याँ तँ राति‍मे संगे बरि‍याती पुरलौं। तइ बीच कि‍ भऽ गेलइ।
कृष्‍णानन्‍द- अपने तँ नइ पुछलि‍यनि‍ मुदा कात-करोटसँ भाँज लागल जे बरि‍याती जाइसँ पहि‍ने खूब चढ़ा लेने रहथि‍। ओही नि‍साँमे अढ़ाइ-तीन सय रसगुल्‍ला आ कि‍लो चारि‍एक माछ देलखि‍न।
सुनीता- (खि‍सि‍या कऽ) जि‍नगीमे कहि‍यो देखने छेलखि‍न कि‍ बरि‍याति‍ये भरोसे ओरि‍आएल छलाह।
कृष्‍णानन्‍द- घरवारि‍यो सबहक दोख छै?
सुनीता- से कोना?
कृष्‍णानन्‍द- ओते ओरि‍यान कि‍अए करैए। जँ रहि‍ जे जेतइ तँ बरि‍याती कऽ सवारी कसत जे दुइर भऽ जाएत। तइसँ नीक ने जे दुइर नै हुअए दइ छै।
सुनीता- तखन तँ दवाइयो आ डाक्‍टरोक ओरि‍यान करए पड़तै कि‍ ने?
राजदेव- कोन बातमे ओझरा गेलह। अच्‍छा अखन कि‍ हालत छै?
कृष्‍णानन्‍द- आब तँ बहुत असान भेलनि‍। पहि‍ने तँ दमे नै धरए दैत छलनि‍। डाॅक्‍टर कहलखि‍न जे आँत फाटि‍ जइतनि‍। मुदा समहरलाह। गुण भेलनि‍ जे तीन-चारि‍ बेर छाँट भऽ गेलनि‍। ओहि‍ना सौंसे-सौंसे रसगुल्‍ला खसलनि‍।
सुनीता- ओहने-ओहने लोक समाजकेँ दुइर करैए।
कृष्‍णानन्‍द- से केना?
सुनीता- जे आदमी ओहन पेट बनौत ओ ओते पुराओत कतऽ सँ। जँ पुराइयो लेत तँ ओते पचवइयो लए ने ओते समए चाही। जँ खाइये-पचबैमे समए गमा लेत तँ काज कखन करत।
राजदेव- (कने गरमाइत..) अच्‍छा बुच्‍ची, कृष्‍णानन्‍द कक्काकेँ चाह पीआवहुन?
सुनीता- अहूँ पीबै?
राजदेव- कोना नै पीबै।
सुनीता- अहँूक पेट तँ गड़बड़े अछि‍। जँ कहीं आरो बेसी भऽ जाए?
राजदेव- से तँ ठीके कहै छह। मुदा ई केहन हएत जे दरबज्‍जापर असकरे कृष्‍णानन्‍द चाह पीता आ अपने संग नै दबनि‍।
सुनीता- भाँज पुरबैले कम्‍मे कऽ लेने आएब। सेहो सरा कऽ पीब।
(सुनीता चाह आनए जाइत..)
कृष्‍णानन्‍द- कक्का, जेहो काज लोक नीक बुझि‍ करैए, ओकरो तेना ने करए लगैए जे जते नीक बुझि‍ करैए ओइसँ बेसी अधले भऽ जाइ छै। तइपर सँ अचार जकाँ रंग-वि‍रंगक चहटगर नवका-नवका काज।
राजदेव- नै बुझि‍ सकलौं।
कृष्‍णानन्‍द- पहि‍ने दू संझू बरि‍याती होइत छलै। जँ कहीं पहि‍ल दि‍न अबेरो भऽ गेल आ कोनो तरहक गड़बड़ि‍यो होइत छलै तँ दोसर दि‍न सम्‍हारि‍ कऽ सभ समेटि‍ सरि‍या लैत छल।
राजेदव- जँ दू दि‍ना काज एक दि‍नमे भऽ जाए तँ नीके ने भेल।
कृष्‍णानन्‍द- यएह सोचि‍ ने एक संझू भेल। मुदा पाछूसँ तेहन हवा मारलक जे कोसो भरि‍ जाइबला बरि‍याती गाड़ी-सवारी दुआरे लग्‍नक समए टपा-टपा पहुँचैए।
राजदेव- हँ, से तँ होइए।
कृष्‍णानन्‍द- (सह पाबि‍ सहटि‍) एतबो बुझैले लोक तैयार नै जे कोस भरि‍ जाइमे अधा-पौन घंटा पएरे लगत। तइ टपैमे चरि‍-चरि घंटा‍ देरी भेल, कहू जे केहन भेल?
राजदेव- हौ, कि कहबह। ‘इसकी मुइला माघमे।’‍ तेहन-तेहन नवकवि‍रया मनुख सभ भऽ गेलहेँ, जे माघोमे गाम-गमाइत बि‍ना चद्दरि‍ये जाएत। आब कहह जे अपना ऐठामक वि‍चारधारा रहल जे कोनो वस्‍तुक उपयोग जरूरत भरि‍ करी। तइठाम जँ घरवैया अपन चद्दरि‍ दइ छन्‍हि‍ तँ अपने कठुएता, जँ नै दइ छन्‍हि‍ तँ आनकेँ दरबज्‍जापर कठुअाएब उचि‍त हएत।
कृष्‍णानन्‍द- हँ, से तँ देखै छि‍ऐ।
राजदेव- आब बरि‍याति‍येमे देखहक। पहि‍ने दू दि‍ना बरि‍यातीक चलनि‍ छल। जे एक संझू भऽ गेल। मूल प्रश्न अछि‍ जे दुनू पक्षक (बर आ कन्‍या पक्ष) कि‍ सभ क्रि‍या-कलाप (बि‍ध-बेबहार) छै। ककरा सुधारैक, ककरा तोड़ैक आ ककरा बचा कऽ रखैक जरूरत अछि‍ से नै बुझि‍, कवि‍काठी सभ समए नै बँचब वा समैक दुरूपयोग कहि‍ एक दि‍ना चलनि‍ चलौलक। मुदा.....।
कृष्‍णानन्‍द- मुदा की?
राजदेव- तोहू तँ आब बच्‍चा नहि‍ये छह। कते कठि‍आरी गेले हेबह।
कृष्‍णानन्‍द- कक्का, मुरदा जरबए कठि‍आरी जरूर गेलौंहेँ, मुदा मुरदा.....?
राजदेव- हँ, हँ, कठि‍आरी गेलह। मुरदा जरबए नै?
कृष्‍णानन्‍द- एते तँ जरूर करै छी जे शुरूमे खुहरी चढ़ेलौं आ पछाति‍ पँचकठि‍या फेक घरमुँहाँ भेलौं।
राजदेव- तइ बीच?
कृष्‍णानन्‍द- कने बगलि‍ कऽ बैस ताशो खेलाइ छी आ चाहो-पान करै छी।
राजदेव- मुदा, जे मुइलाह हुनकर जीता-जि‍नगीक चर्चक गवाह एकोटा नै रहै छी।
कृष्‍णानन्‍द- नै बुझलौं कक्का?
राजदेव- समाजमे ककरो मुइने लोककेँ सोग होइ छै। सोगक समए मन नीक-अधला बीचक सीमानपर रहैए। जहि‍ना ग्रह-नक्षत्रक बीचक सीमानपर कोनो नव चीज देख पड़ैत तहि‍ना होइए। एकठाम बैस जँ दस गोटेक बीच जीवन-मरणक चर्च भऽ गेल तँ ओ इति‍हास बनि‍ गेल। जइ अनुकूल आगू चर्च हएत।
कृष्‍णानन्‍द- मन थोड़े रहत।
राजदेव- मन रखए चाहबै तखन ने रहत। ओहुना तँ वि‍सरनहि‍ छी। अपना ऐठाम मौखि‍के ज्ञान बेसी अछि‍। जे नीको अछि‍ आ अधलो। अच्‍छा छोड़ह, बहकि‍ गेलह।
कृष्‍णानन्‍द- हँ, तँ मुरदा जरबैबला कहै छेलि‍अ?
राजदेव- मुरदा जरबैकाल देखबहक जे चेरा जारन‍ एक भागसँ चुल्हि‍ जकाँ नै लगाओल जाइत अछि‍, एक्के बेर सौंसे शरीरक तर-ऊपर लगाओल जाइए। मुदा मुर्दा सि‍कुड़ि‍-सि‍कुड़ि‍ छोट होइत अंतमे गेन जकाँ भऽ जाइए। जकरा कि‍छु जरौनि‍हार गेन जकाँ गुरका कऽ छोड़ि‍ दैत अछि‍ आ कि‍छु गोटे ओकरो जरा दैत अछि‍।
कृष्‍णानन्‍द- अखन काजे जाइ छलौं तँ सोचलौं जे कक्काकेँ समाचार सुनौने जाइ छि‍यनि‍। मुदा अहूँ तँ चहकल थारी जकाँ झनझनाइते छी।
पटाक्षेप
सातम दृश्‍य
(बालगोवि‍न्‍दक दरबज्‍जा। चाह-पान, सि‍गरेट चलैत। बालगोवि‍न्‍द आ राधेश्‍याम परसैत। भागेसर यशोधर एकठाम बैसल। बीचमे घटकभाय आ दोसर भाग समाजक रूपलाल, गरीबलाल, धीरजलाल बैसल।)
घटकभाय- कुटुम नारायण जकरा जे जुड़वन लि‍खल रहै छै से भइये कऽ रहै छै।
यशोधर- हँ, से तँ होइ- छै, मुदा.....?
रूपलाल- मुदा कि‍?
यशोधर- लि‍खि‍नि‍हार के छथि‍?
गरीबलाल- एना अनाड़ी जकाँ कि‍अए बजै छी। छठि‍हारे राति‍ वि‍धाता सभ कि‍छु लि‍ख दइ छथि‍न।
यशोधर- जँ वएह लि‍खै छथि‍न तँ एना उटपटांग कि‍अए लि‍खै छथि‍न।
धीरजलाल- कि‍ उटपटांग?
(चाहक गि‍लास आ पानक तसतरी लेने राधेश्‍याम जा रखि‍ पुन: आबि‍ बैसैत अछि‍)
यशोधर- एक तँ लेन-देन तते बढ़ि‍ गेल अछि‍ जे जहि‍ना चुमुक लोहा बीचक वस्‍तुकेँ नै पकड़ि‍ लोहेटाकेँ खि‍ंचैत अछि‍ तहि‍ना पाइयेबला नीक पाइ खर्च कऽ नीक घर (सुभ्‍यस्‍त) पकड़ैत अछि‍ भलहि‍ं लड़का-लड़कीक जोड़ा बैइसै कि‍ नै बैइसै।
घटकभाय- (मूड़ी डोलबैत) हँ, से तँ होइ छै। मुदा कि‍छु लाभो तँ होइ छै।
यशोधर- कि‍ लाभ होइ छै?
घटकभाय- जाति‍-पाजि‍‍क (कुल-खनदानक) दवाएल लोक अपनासँ नीक घरमे पाइक बले कुटमैती कऽ लैत अछि‍।
यशोधर- तइ काल वि‍धाता कि‍छु ने सोचलनि‍ जे कान्‍ही लगा जोड़ा लगवि‍‍तथि‍न। जइसँ जाति‍-पाँजि‍क रक्षा सेहो होइत।
घटकभाय- कुटुम नारायण जहि‍ना मनुक्‍खोक मन सदति‍काल एके रंग नै रहैए तहि‍ना ने हुनको (वि‍धतोक) होइत हेतनि‍। जखन असथि‍र रहैत हेता तखन नीक वि‍चार मनमे अबैत हेतनि‍ आ जखन टेन्‍शनमे रहैत हेता तखन कि‍छुसँ कि‍छु कऽ दैत हेताह।
गरीबलाल- घटकभाय, एहेन बात नै छै। कोनो ई औझुका वि‍चार छि‍ऐ कि‍ पुरना वि‍चार छि‍ऐ। कहलो गेल अछि‍- ‘अजा पुत्रं बलि‍ं दत्‍वा देवो दुर्बल घातक:।’
घटकभाय- छोड़ू ऐ सभ गपकेँ। ई सभ बैसारी कवि‍काठीक गप छी। जइ काजे एकठाम भेल छी पहि‍ने एकरा नि‍पटा लि‍अ। हमहूँ धड़फड़ाएल छी, बजौनि‍हार दुआरपर आशा बाट तकैत हेताह।
भागेसर- जि‍नगीमे पहि‍ल बेर बेटाक वि‍याह करै छी। ओना समाजमे बहुत काज देखलौंहेँ मुदा समाज कि‍ गामक सीमा भरि‍क अछि‍। जाति‍-जाति‍, कुल-खानदान, अड़ोसी-पड़ोसी, कते कहब। फाँकक-फाँक बनल अछि‍ जइसँ एक काज (वि‍याह) होइतो एक रंग बेबहार नै अछि‍। तइसँ सभ दि‍ना काज रहि‍तो अपन बि‍ध-बेबहार नीक-नहाँति‍ नै बुझि‍ पबै छी।
घटकभाय- हँ, से होइते अछि‍। अहाँ तँ अहीं भेलौं जे सालमे दस-बीस काजक अगुआइ करै छी तैयो कतेठाम भसि‍या जाइ छी। खाइर, ऐ सभकेँ छोड़ू।
यशोधर- हँ, हँ। अपने काज आगू बढ़ाउ।
घटकभाय- जहि‍ना शुभ-शुभ कऽ वि‍याहक चर्च उठल, आ अखन धरि‍ चलि‍ रहल अछि‍ तहि‍ना आगूओ चलैत रहए।
बालगोवि‍न्‍द- लाख टकाक गप कहलि‍ऐ घटकभाय। आगूक शुभारम्‍भ अहीं करि‍यौ।
घटकभाय- देखू कि‍छुए मास छोड़ि‍ वि‍याहक दि‍न सभ मास होइए। मुदा सभसँ नीक मास फागुन होइए।
रूपलाल- ठीके कहलि‍अ, शि‍वरात्रि‍क मास सेहो छी।
घटकभाय- कोनो कि‍ धड़फड़ा कऽ कहलौं, से बात नै अछि‍। कि‍छु सोचि‍ये कऽ कहलौं। खरमास (बैसाख-जेठ) मे आगि‍-छाइक डर रहै छै। जाड़मे जाड़ेक आ आन-आन मासमे सहो कि‍छु ने कि‍छु गड़वड़ रहि‍ते अछि‍।
यशोधर- जहि‍ना नीक मौसम रहैए तहि‍ना खेबो-पीवोक समान पर्याप्‍त रहैए। टेन्‍ट-समेनाक बदला गाछि‍यो-कलमसँ काज चलि‍ जाइत अछि‍।
घटकभाय- कि‍ सबहक वि‍चार अछि‍ कि‍ने?
(सभ- हँ-हँ)
एकटा काज सुढ़ि‍आएल। आब बरि‍यातीक गप उठबै छी। कि‍ बालगोवि‍न्‍द, कुटुम नारायणकेँ कते बरि‍याती अबैले कहै छि‍यनि‍?
बालगोवि‍न्‍द- पाँचो गोटेसँ वएह काज होइए जे पान सए गोटेसँ। तखन देखते छी हम्मर आँट-पेट। कौआसँ खइर लुटाएब तइसँ नीक जे ओते बेटि‍ए-जमाएकेँ अगुआ कऽ देब जे नइ सभ दि‍न तँ कि‍छुओ दि‍न सुख भोग करत।
यशोधर- बड़ सुन्नर बात बालगोवि‍न्‍द बाबूक छन्‍हि‍। मुदा....?
गरीबलाल- कनी खोलि‍ कऽ बजि‍औ।
यशोधर- अहाँ समाजक बात नै जनै छी मुदा हमरा समाजमे एहेन अछि‍ जे जाति‍मे घरही एक गोटे, परजाति‍मे हि‍त-अपेक्षि‍त आ परि‍वारक जे संबंधी छथि‍, से तँ एबे करताह।
बालगोवि‍न्‍द- एते तँ उचि‍ते भेल।
गरीबलाल- उचि‍त तँ कहि‍ देलि‍ऐ भाय, मुदा पैघ घोड़ाक पैघ छानो होइ छै। अहाँ पचघरा छी मुदा जइठाम सए-दू-सए घरक होय तइठाम?
यशोधर- ई तँ ठीके कहलि‍ऐ मुदा छोट-छीन काजक दुआरे समाज टुटि‍ जाए, सेहो नीक नहि‍ये।
घटकभाय- जेहने सवाल ओझराएल अछि‍ तेहने सोझराएलो अछि‍।
यशोधर- से कि‍?
घटकभाय- ओझरी दू रंगक होइ छै। एकटा, जहि‍ना टीक कि‍ झोंटामे चि‍ड़चि‍ड़ी लगने होइत अछि‍ आ दोसर, डोरीक भीड़ी जकाँ होइए। एकटा ओरी पकड़ि‍ लि‍अ काज करैत चलू। कखनो कथीले ओझराएत। चाहे तँ काजे सम्‍पन्न भऽ जाएत वा डोरि‍ये सठि‍ जाएत।
गरीबलाल- बालगोवि‍न्‍द भाय, उक्‍खरि‍मे मूड़ी देलौं तँ मुसराक डर। समाजक नीकक लेल जँ अपन प्राणो गमबए पड़ै तैयो नीके। वि‍याह तँ समाजक उत्‍सव छी।
घटकभाय- एक लाखक वि‍चार गरीबलालक छन्‍हि‍। एकठाम बैस खेलौं, रहलौं आ नीक-अधलाक गप-सप्‍प केलौं, ई उत्‍सव नै तँ कि‍ भेल।
यशोधर- घटकभाइक ि‍वचार टारैबला नै छन्‍हि‍।
(वि‍चहि‍मे)
धीरजलाल- जखन उत्‍सव छी तखन नीक तँ नीक भेल मुदा अधला गप-सप्‍प कि‍अए करत?
घटकभाय- (ठहाका मारि‍) तू अखैन अनाड़ी छह धीरज, मुदा जे बात उठौलह ओ आगूक लेल काज औतह। तँए पहि‍ने तोरे गप कहै छि‍अह।
(घटकभाइक वि‍चार सुनि‍ सभ साकांच भऽ घटकभाय दि‍स कतऽ लगैत..)
मुँह चटपटबैत धीरजलाल कि‍छु बाजए चाहैत कि‍ गरीबलालक नजरि पड़ल। मुँहक बाेल धीरजलाल रोकि‍ लैत)
गरीबलाल- पहि‍ने एकटा बात सुनि‍ लि‍अ, तखन दोसर पुछहुन।
घटकभाय- बौआ, जहि‍ना नीकक संग-संग अधलो चलैए तहि‍ना अधलाक संग नीको चलैए। तँए दुनू गप चललासँ साधल बात लोक बुझैए।
धीरजलाल- गप झपाएल रहि‍ गेल घटकभाय।
घटकभाय- अपना जनैत तँ कहि‍ देलि‍यह। भऽ सकैए तँू नै बुझने हुअ। देखहक पुरूष नारीक संयोगसँ सृष्‍टि‍क ि‍नर्माण होइए। जेकरा वि‍वेकी मनुष्‍य वि‍वाहक बंधनमे बन्‍हलनि‍। जे सृष्‍टि‍क वि‍कास आ कल्‍याणक लेल उचि‍त अछि‍।
धीरजलाल- हँ, से तँ अछि‍ये।
घटकभाय- मुदा एकरे दोसर भाग देखहक। जे, बंधनसँ बाहर अछि‍ ओकरा अधला बुझि‍ अंकुश लगाओल गेल। मुदा समाजेक लोक ओकरा राँइ-बाँइ कऽ कऽ तोड़ि‍ देलक।
धीरजलाल- नै बुझलौं भाय?
घटकभाय- पुरूष प्रधान बेबस्‍था ओकरा संग अन्‍याय केलक। एक दि‍स पुरूष कतेको नारीकेँ पत्नी बना, संग-संग समाजोमे कुचालि‍ आन-आन नारीक संग चलनि‍ शुरू केलक। जइसँ नरीक डाँड़, टूटि‍ गेल। कते नारी घरसँ ि‍नकालल गेल। जे रने-बने बौआइत अछि‍।
धीरजलाल- भाय, मन तँ आरो गप सुनैक होइए। मुदा जइ काजे एकत्रि‍क भेल छी से काज आगू बढ़ाउ।
राधेश्‍याम- मानि‍ लेलौं, जते बरि‍यातीक खगता होन्‍हि‍ तते लऽ कऽ औताह।
घटकभाय- बौआ राधेश्‍याम, नमहर काज करैमे नै औगताइ आ ने खि‍सि‍आइ। जखने अगुतेबह, खि‍सि‍एबह तखने काजमे खोंच-खाँच बनए लगतह। कोनो रोग असाध होइए तँ मनुखे ने ओकरो साधमे अनैए।
बालगोवि‍न्‍द- बौआ, अखन तँू समाजक तरी-घटी नै बुझबहक। एक तँ नवकवि‍रया छह दोसर गाम छोड़ि‍ परदेश खटै छह। जखन समाजक संग छी तखन वएह ने पारो-घाट लगौताह। बेटी कि‍ कोनो हमरे छी आकि‍ समाजक छि‍यनि‍।
घटकभाय- बालगोवि‍न्‍द भाय, हमरा जे धौंजनि‍ समाजमे होइए से ककरा होइ छै। जँ एहेन धौंजनि‍ दोसराकेँ होइतै तँ पड़ा कऽ जंगल चलि‍ जाइत। मुदा मोह अछि‍ कि‍ने।
बालगोवि‍न्‍द- कि‍ मोह?
घटकभाय- जइ काजे छी पहि‍ने से फड़ि‍आबह। एक समाजक दोसर समाजसँ मि‍लन समाराेह छी। तँए सामाजि‍क काज भेल। तइले समाजो अपन रस्‍ता बनौनहि‍ अछि‍। कि‍यो भार पूरि‍, तँ कि‍यो डाल पूरि‍, तँ कि‍यो असि‍रवादी दऽ काज पूरबैए।
भागेसर- ऐ लेल चि‍न्‍ता करैक नै अछि‍ घटकभाय। अपनो ऐठामसँ तँ डाला भार एबे करत कि‍ने। तइ लेल.....।
घटकभाय- सभ कि‍यो सुनि‍ लेलि‍ऐ कि‍ने जे बरपक्ष जते बरि‍याती अानए चहता से मंजूर केलि‍यनि‍।
(सभ हँ, हँ)
राधेश्‍याम- (उछलि‍ कऽ) मुदा एकटा बातक फड़ि‍छौट अखने भऽ जाए।
घटकभाय- कथीक?
राधेश्‍याम- जते खाइ-पीबैक ओरि‍यान करबनि‍ से खा-पी कऽ जाए पड़तनि‍।
गरीबलाल- से पहि‍ने ने कि‍अए बरि‍यातीक हि‍साब जोड़ि‍ लेब। जइ हि‍सावसँ बरि‍याती औताह तइ हि‍साबसँ ओरि‍यान करब। ने बाइस बचत ने कुत्ता खाएत।
राधेश्‍याम- कक्का, दोसर बात कहलौं।
गरीबलाल- कि‍?
राधेश्‍याम- तीन कोसपर गाम छन्‍हि‍। पाँच बजेमे जे पएरो चलताह तैयौ आठ बजे आबि‍ जेताह। सभ काज सम्‍हरल चलतनि‍।
घटकभाय- बेस बजलह। खाइ-पबैक जे समान दूइर हएत से मोटरी बान्‍हि‍ कन्‍हापर लादि‍ देबनि‍। अच्‍छा अखन एतै काजकेँ वि‍राम दि‍यौ।
यशोधर- बहुत समए लगि‍ रहल अछि‍, जते जल्‍दी काजक रूप रेखा बनि‍‍ जाएत तते नीक ि‍कने।
घटकभाय- हँ, हँ। से तँ नीक। मुदा जहि‍ना कोनो वस्‍तुक बोझसँ चानि‍ अगि‍या जाइत अछि‍‍ तहि‍ना ने वि‍चारोक बोझसँ अगि‍या जाइत अछि‍। तँए आगूक वि‍चार बढ़बैसँ पहि‍ने एक बेर चाह-पान भऽ जाए।
गरीबलाल- बेस कहलि‍ऐ घटकभाय।
बालगोवि‍न्‍द- बाउ राधे, चाह बनौने आबह।
(राधेश्‍याम चाह अानए जाइत अछि‍।)
गरीबलाल- (मुस्‍की दैत) तइ बीच कि‍छु रमन-चमन भऽ जाए। अँए-औ घटक भाय, मझौरा बरि‍यातीमे परूँका कि‍ भेल रहए?
घटकभाय- बि‍सरलो बात मन पाड़ै छी। नीकक चर्च लोक दोहरा-तेहरा करैए। अधला बात (काज) बि‍सरबे नीक।
गरीबलाल- अखन औपचारि‍क नै अनौपचारि‍क कि‍छु भऽ जाए।
घटकभाय- (मुस्‍की दैत) देखि‍यौ, सालमे दस-बीस वि‍याहक अगुआइ करि‍ते छी मुदा ओहन तँ नै छी जे लुत्ती लगा देव आ ससरि‍ जाएब। जइ काजमे हाथ दइ छी ओइ काजकेँ कइये कऽ छोड़ै छी।
यशोधर- कि‍ भेल रहए?
घटकभाय- जि‍नगीमे पहि‍ल बेर एहेन फेरा लागल। कछुबीक बरि‍याती मझौरा गेल। ठीक आठ बजे बरि‍याती पहुँचल। घरवारि‍यो सतर्क रहथि‍। दरबज्‍जापर पहुँचते शर्बत चलल। शर्बत चलि‍ते रहै कि‍ स्‍त्रीगण सभ चंगेरामे दूबि‍-धान दीप लेने गीत गबैत पहुँचलीह।
यशोधर- से तँ होइते अछि‍।
घटकभाय- एतबे भेल। एक दि‍स बैसारमे बरि‍याती सभ गि‍लासपर गि‍लास शर्बत चढ़बैत तँ दोसर दि‍स गीति‍हाइरो सभ गीतक वाण छोड़ैत। तखने एकटा परदेशि‍या करामात शुरू केलक।
यशोधर- कि‍ करामात?
घटकभाय- पहि‍ने तँ नै बुझलि‍ऐ मुदा पछाति‍ पता लागल जे ओ बरि‍याति‍ये रहए। केलक ई जे गीति‍हारि‍क बीचमे पाइ (एक-दू आ पाँचक सि‍क्का) लुटबए लगल। गीति‍हारि‍क बीच हुड़ भेल। एक्के-ुदुइये चारि‍ बेर पाइ फेकलक। झल-हन्‍हार रहबे करै।
यशोधर- से एना कि‍अए केलक?
घटकभाय- सएह ने, कतऽ सँ सीखि‍ कऽ आएल रहै से नै कहि‍। पाइ बीछैमे गीतो बन्न भऽ गेल। तइपर सँ तना ने तरा-उपरी लोको खसए लगल आ धक्का-ध्ुक्की सेहो हुअए लगल। दूवि‍-धान, दीपबला चंगेरा बरक उपरेमे खसल।
गरीबलाल- जे एहेन कि‍रदानी केने रहै तेकरा पकड़ि‍ कऽ धोलाइ नै देलक।
घटकभाय- ओहो कि‍ अनाड़ी-धुनाड़ी रहै। लुत्ती लगा ससरि‍ कऽ कातमे नुका रहल। घरवाली सभ जखन गीति‍हारि‍ सभकेँ पुछलकनि‍ तँ ओ सभ हरि‍यरका कुरताबला नाओं कहलखि‍न। ओ सभ भजि‍अबए लगल। मुदा कुत्ता कतौ आगि‍मे झरकै।
गरीबलाल- तइमे अहाँ कोना फँसि‍ गेलि‍ऐ?
घटकभाय- हमरो कुर्त्ता हरि‍यरे रहए। मुदा आब बुझै छी जे गलती कनी अपनो रहए।
गरीबलाल- कि‍ गलती अपन रहए?
घटकभाय- अपन गलती यएह रहै जे बरि‍यातीक बीचक नहि‍ कतका कुरसीपर बैसल रही। तीनि‍-चारि‍ गोटे कातेसँ हि‍यबैत रहै। हरि‍यर कुर्ता देख लगमे पहुँच गेल।
यशोधर- अहाँ नै बुझलि‍ऐ।
घटकभाय- से ि‍क कोनो देखि‍लि‍ऐ नै। भेल जे कि‍छु परसऽ आएल अछि‍।
यशोधर- कि‍दु पुछबो ने केलि‍ऐ?
घटकभाय- कि‍ पुछि‍ति‍ऐ, कोनो शंका रहए। ओहो सभ कि पुछलक। हाँइ-हाँइ कऽ ठुस्‍से चलबए लगल।
गरीबलाल- (ठहाका मारि‍..) बेसी ने तँ लागल।
घटकभाय- कोनो कि‍ अनाड़ी-ध्‍ुनाड़ीक ठुस्‍सा रहए। पाँचे-सात ठुस्‍सामे तँ बुझि‍ पड़ल जे दि‍नका तरेगन देखै छी।
यशोधर- बरि‍याती सभ खाइयेटाले गेल रहए।
घटकभाय- नै, परोछक बात छी, झूठ नै बाजब। बरि‍याति‍यो सभ तनलाह। मुदा हमहीं रोकलि‍यनि‍।
गरीबलाल- अहाँ कि‍अए रोकलि‍यनि‍?
घट‍कभाय- मारि‍-दंगा कोनो नीक छी। कोनो ठेकान छै जे कते हएत। जँ एहेन भऽ जाए जे काजे नाश भऽ जाए, तखन।
गरीबलाल- हँ, से तँ ठीके।
घटकभाय- ओना पाँचे-सात ठुस्‍सा ने लागल। जँ दोहराइत तँ बेसि‍यो लगि‍ सकै छलै। तहूमे जहि‍ना हौहटि‍-कलकैल साले-साल ओही आदमीक ऐठाम अबैत जेकरा ऐठाम खाइ-पीबैक आ सुतै-बैसैक नीक जोगार देखैत। तँए सोचलौं जे कनी सहि‍ये लेने नीक रहत।
(तस्‍तरीमे चाह लेने राधेश्‍याम आबि‍ चाह परसैत अछि‍..)
गरीबलाल- तरे-तर घटकभाय मुस्‍की मारैत छथि‍।
(गरीबलालक बात सुनि‍ सभ घटकभाय दि‍स तकए लगै छथि‍। अपना दि‍स तकैत देख घटकभाइक मुस्‍की-हँसीमे बदलि‍ गेलनि‍।
बालगोवि‍न्‍द- घटकभाय, कि‍छु बजताह।
घटकभाय- एकटा आरो घटना मन पड़ि‍ गेल। बरख पाँचे भेल हएत। तमोरि‍याक कुटुमैती अरड़ि‍यामे भेल रहए। दुनूक अगुआ रही। दुनू चि‍न्‍हार।
बालगोवि‍न्‍द- भेल कि‍ से कहि‍यौ।
घटकभाय- ओइ काजमे दोखी घरबैइये रहए। नाहकमे दोखी बनलौं।
गरीबलाल- कि‍ भेल रहए?
घटकभाय- गरीबलाल एक रत्ती तल-वि‍तल भेने काज वि‍गड़ि‍ कऽ कि‍-सँ-कि भऽ जाइए। एते दि‍न देखै छेलि‍ऐ जे दोकानदार सभ माथपर नूनक मोटरी आनि‍ जीबैले कारोवार करैत छल। आब देखै छी जे कारोवारि‍ये सभ राजा भऽ गेल। जे जना मन फुड़ै छे से तेना करैए।
गरीबलाल- जे बात कहै छेलि‍ऐ, से कहि‍यौ।
घटकभाय- ओइठीन देखौलक कोनो लड़की आ सि‍नुदानक बेर दोसर लड़कीकेँ आनि‍ सि‍नुरदान करबै लगल।
गरीबलाल- ओइठाम तँ बर पक्षक नै रहैत छथि‍ तखन कोना भाँज खुजल।
घटकभाय- सभ गप देखि‍नि‍हार तँ घरपर बाजि‍ चुकल छलाह ने। लड़कीक हुलि‍या भऽ गेल छलै ने। ओही अनुमानसँ लड़का पकड़ि‍ लेलक। कोनो लाथे नि‍कलल आ पि‍त्तीकेँ कहि‍ देलक।
गरीबलाल- तखन तँ बड़का सरेड़ा भेल हएत?
घटकभाय- सरेड़ा कि‍ सरेड़ा जकाँ भेल। मारि‍-पीट जे भेल से तँ भेवे कएल जे तीन बरख तक दुनू गामक सीमा रोका गेल। बि‍याह बेटा-बेटीक खेल नै दुनूक जि‍नगीक छी। ओना तेहन जुग-जमाना आबि‍ गेल अछि‍ जे खेलोसँ खेल जि‍नगी बनि‍ गेल अछि‍।
गरीबलाल- कनी फरि‍छा कऽ कहि‍यो घटकभाय?
घटकभाय- कि‍ फरि‍छा कऽ कहब। अंति‍म समए वि‍द्यापति‍यो लि‍खलनि‍- ‘माधव हम परि‍णाम ि‍नराश।’ तहि‍ना छातीपर हाथ रखि‍ आनो-आन बाजथि‍। अच्‍छा अखन एतै वि‍राम दि‍यौ। खाइ-पीबैक बेरो भऽ गेल आ देहो-हाथ अकड़ि‍ गेल।
राधेश्‍याम- तीमनो-तरकारी ठरि‍ कऽ पानि‍ भऽ गेल हएत।
घटकभाय- कुटुम नारायण तँ ठरलो खा कऽ पेट भरि‍ लेताह मुदा हमरा तँ कोनो गंजन गृहणी नहि‍ये रखतीह।
पटाक्षेप
आठम दृश्‍य
(बालगोवि‍न्‍दक दरबज्‍जा। बालगोवि‍न्‍द, भागेसर आ यशोधर बैस खेती-पथारीक गप करैत..)
बालगोवि‍न्‍द- देखले दि‍नमे दुनि‍याँ कतऽ-सँ-कतऽ भागि‍ गेल।
यशोधर- से कि‍?
बालगोवि‍न्‍द- अपना ऐठामक ि‍कसान खेती-गि‍रहस्‍तीक सभ कथूक बीआ अपने बनबै छलाह खेती करै छलाह। तीन सालसँ जे सुनै छी, से कि‍ कहू।
यशोधर- खोलि‍ कऽ कने कहि‍यौ?
बालगोवि‍न्‍द- तेसर साल हमरा गाममे बहुत गोरे तीन सए रूपैये कि‍लो मकैयोक आ धानोक बीआ, पँचगुना अपजा कहि‍ कऽ अनलनि‍। खेती केलनि‍। शुरूहेमे ढक-बखारी सभ बनबा-बनबा रखलनि‍। ले बलैया मकैमे बाइले ने लागल।
यशोधर- से ि‍क भेलै?
बालगोवि‍न्‍द- जहि‍ना रि‍नि‍या-महाजन अगर-मगर करैत रहताह तहि‍ना सभ गि‍रहस्‍त अपनेमे कहा-कही शुरू केलनि‍।
यशोधर- कि‍ कहा-कही शुरू केलनि‍?
बालगोवि‍न्‍द- कि‍यो कहथि‍न जे खाद जे देलि‍ऐ से माटि‍ जाँच करौलि‍ऐ? तँ कि‍यो बाजथि‍ जे जते पावरक दवाइ फसि‍लमे दइ छलि‍ऐ तइसँ बेसी पावरक देलि‍ऐ कि‍ कम? तँ कि‍यो बाजथि‍ जे बीआ बाग करैसँ पहि‍ने दवाइ मि‍लौलि‍ऐ। कि‍ कहब उपजाक बात वि‍सरि‍ सभ अपनेमे सालो भरि‍ रक्का-टोकी करैत रहलाह।
यशोधर- तब तँ बाढ़ि‍ रौदीक संग तेसरो आफत आबि‍ गेल।
बालगोवि‍न्‍द- तेसरे कि‍अए कहै ि‍छऐ। चारि‍मो ने कहि‍यो।
यशाेधर- चारि‍म की?
बालगोवि‍न्‍द- अहाँ सभ दि‍स नहरि‍ नइए, तँ ने नजरि‍पर आएल हेन। हमरा सभ दि‍स केहन खेल होइए से सुनू। जखन खूब बरखा हएत तखन नहरि‍क मुँह (फाटक) खोलि‍ देत आ जखन रौदी हएत तखन कहत जे नहरि‍मे पानि‍ये ने छइ।
यशोधर- जना अपना ऐठम पढ़ल-लि‍खल लोक छथि‍ तना जँ दसो प्रति‍शत बुधि‍क (ज्ञानक) उपयोग अपना क्षेत्रक लेल लगबि‍तथि‍ तँ कि‍-सँ-कि‍ देखि‍ति‍ऐ। मुदा जेकर कपारे फुटि‍ जाएत तेकर कते भरोस।
(राधेश्‍याम चाह लेने अबैत अछि‍। तहि‍काल गरीबलालक संग घटकभाय सेहो अबै छथि‍..)
भागेसर- घटकोभाय आबि‍ये गेलाह।
घटकभाय- चाहमे हमरो अंश छल तँए दुनूक मि‍लानी भेल। दाना-दानामे खेनि‍हारक अंश लि‍खल अछि‍ मुदा.....?
गरीबलाल- घटकभाय, अहाँमे यएह अवगुन अछि‍ जे करैले जाइ छी कोनो काज आ करए लगै छी कोनो काज। जइ काजे एलौं तेकरा पहि‍ने सोझराउ। दोसरो काज करए जाएब।
घटकभाय- अखन तँ सभ जुटबो ने केला अछि‍ तइ बीच काजक चर्च उठाएब नीक हएत।
गरीबलाल- जँ ओ लोकनि‍ नै आबथि‍ तँ छोड़ि‍ देब नीक हएत।
घटकभाय- (मूड़ी डोलबैत) कहलौं तँ बेस बात, मुदा जमात करए करामात।
गरीबलाल- ई तँ ठीके कहलि‍ऐ मुदा जमातसँ पहि‍ने जमात बनैक प्रक्रि‍यापर नजरि‍ दि‍अए पड़त।
घटकभाय- से कि‍?
गरीबलाल- जहि‍ना बड़का आम सरही होइत-होइत बीजू बड़बड़ि‍या भऽ जाइए। तहि‍ना बि‍ज्‍जुओ बनैत-बनैत बड़का फैजली-सजमनि‍या बनि‍ जाइए। तहि‍ना छी जमात। बनैत-बनैत बनत आ मेटाइत-मेटाइत मेटाएत। समाजि‍क काज छोड़ि‍ सभ अपना नून-रोटीमे लगि‍ समाजकेँ तहस-नहस कऽ देने अछि‍ तइठाम जमात तकने काज चलत।
घटकभाय- बेस बजलौं गरीबभाय। एकटा बात मन पड़ल। पड़ोसि‍या गाममे रामरूपक माए मरल। अज-गजबला लोक भोज केलक। गामे-गाम एकघरा-दूघरा जाति‍। एगारह गाममे तीन सए एगारह पंच भेल।
गरीबलाल- फेर अहाँ बौआए लगलौं।
घटकभाय- बौआइ कहाँ छी। अगि‍ला बात सुनि‍ ने लि‍यौ। गेलौं तमोरि‍या स्‍टेशनपर टहलए। रामरूपक बेटाकेँ आ गनोरक बेटाकेँ झगड़ा करैत देखलौं। बच्‍चा बुझि‍ दुनूकेँ छोड़बैत पुछलि‍ऐ जे कि‍अए झगड़ा करै छह। गनोरक दादीक सराधक भोज सेहो भेल। ओकाइत तँ एकरंगाहे दुनूक। ओ दुइये गामक भोज केने रहए। दुइये गाममे तोहर सए पंच भेल। तहीले झगड़ा।
गरीबलाल- (मुस्‍की दैत) अनकर झगड़ा अपना कपारपर लऽ लेलौं।
घटकभाय- लेलौं कि‍ लेला जकाँ। बकार बन्न भऽ गेल। भीतरे-भीतर मन खि‍सि‍या कऽ कहए जे अनेरे अनकर झगड़ा अपना सि‍र बेसाहि‍ लेलौं। भने अलकतरा बैसाएल प्‍लेट-फार्म छइहे दुनू फरि‍छा लि‍अ। मुदा सेहो आब केना हएत।
गरीबलाल- फेर केलि‍ऐ कि‍?
घटकभाय- कहलि‍ऐ जे बौआ ताबे थमहह। कनी बैंकक काज अछि‍। हूसि‍ जाएत। ई तँ कनी अगाति‍यो-पछाि‍त भऽ सकैए मुदा ओ (बैंक) तँ नै हएत।
गरीबलाल- मानि‍ लेलक दुनू?
घटकभाय- बानरक बटवारा (पनचैती) भऽ गेल। जहि‍ना रोटी बराबर करैमे सौंसे रोटी बानर खा गेल तहि‍ना हुअए लगल।
गरीबलाल- से कि‍?
घटकभाय- एक्के बात एक गोटे मानि‍ लि‍अए तँ दोसर तत्-मत् करैत अगर-मगर करैत, कोना-छि‍न्ना नि‍कालि‍ सवाल उठा दि‍अए। मुदा हमरो बहाना तँ भरि‍गर रहए तँए हड़बड़ करैत कि‍छु कहबो करि‍ऐ कि‍छु नहि‍यो कहि‍ऐ।
गरीबलाल- दुनूक नजरि‍ केहन रहए?
घटकभाय- दुनूक नजरि‍ जते चढ़ल बुझि‍ पड़ै ओतबे उतड़लो। तइसँ शंका हुअए जे परोछ भेलापर कहीं फेर ने फँसि‍ जाए। फेर हुअए जे पनचैती भेने सोलहो आना तँ नहि‍ये फरि‍आएत। ओ जँ फरि‍आएत तँ अपने दुनूसँ।
गरीबलाल- जे नीक होइत से ने कि‍रतौं।
घटकभाय- जाबत बरतन तावत बरतन।
गरीबलाल- से कि‍?
घटकभाय- जाधरि‍ धोती वा साड़ी सीवि‍यो कऽ काज चलैए ताधरि‍ एकटा समस्‍या (धोती कीनैक) तँ हटल रहैए।
गरीबलाल- मुदा धोतीक जरूरत तँ सबदि‍ना छी, कते दि‍न टारल जा सकैए।
घटकभाय- हँ, से तँ छी। मुदा कोनो काजो करैक (धोति‍यो कि‍नैक) तँ अनुकूल समए होइत अछि‍। अच्‍छा छोड़ू ऐ गपकेँ। ओ सभ जँ नहि‍यो एला तँ कि‍ हेतइ। नै पान तँ पानक डंटि‍येसँ तँ काज चलि‍ये जाइ छै। घुमा-फि‍रा कऽ सभ तँ छीहे।
गरीबलाल- हँ, से तँ छी मुदा दाउ-गीरकेँ कोनो गर भेटक चाही।
घटकभाय- से कि‍ कोनो तेहन काज छी। दुइये परि‍वारक काज छी जँ दुनू राजी-खुशी सहमत भऽ करथि‍ तँ तेसरकेँ कि‍ चलत।
भागेसर- हमरो समए बहुत लगि‍ गेल। एक घंटाक काजमे जे दि‍नक दि‍न लगा देब सेहो नीक नै। तहूमे काजक दौर छी सइयो रंगक जोगार-पाती करए पड़त। जँ एहि‍ना समए लगैत गेल तखन बान्‍हल दि‍न (ि‍नर्धारि‍त समए) मे काज केना हएत?
गरीबलाल- हँ, शुरूहे लग्‍नमे काज हेबाक चाही चि‍क्कन-चुनमुन तँ पछाति‍यो भऽ सकै छै। ओना अपनो चलैत-चलैत चि‍क्कन भऽ जाइए।
बालगोवि‍न्‍द- घटकभाय, जखन एते गप भइये गेल तखन एक संझू बरि‍याती रहता कि‍ दू संझू आकि‍ तीन संझू।
घटकभाय- (मूड़ी डोलबैत) हमर नजरि‍ये नै ओम्‍हर गेल छल मुदा इहो तँ दमगरे सवाल अछि‍।
राधेश्‍याम- जखन सगतरि‍ सभठाम एक संझू भऽ गेल तखन दू-संझू तीन संझू अनेरे चलाएब छी।
घटकभाय- बौआ कहलह तँ बड़ सुन्नर बात मुदा तोही कहअ जे जखन बरि‍याती पहुँचैए तखन शर्बत ठंढ़ा-गरम, चाह-पान, सि‍गरेट गुटका चलैए। तइपर सँ पतोरा बान्‍हल जलपान, तइपर सँ पलाउओ आ भातो, पूड़ि‍ओ आ कचौड़ि‍यो, तइपर सँ रंग-वि‍रंगक तरकारि‍यो आ अचारो, तइपर सँ मि‍ठाइयो आ माछो-मासु, तइपर दहि‍यो, सकड़ौड़ि‍ओ आ पनीरो चलैए।
राधेश्‍याम- कि‍अए एते जोड़बै छी?
घटकभाय- जोड़बै कहाँ छि‍अह। जे चलैए से कहै छि‍अह। आब तोहीं कहह जे एक दि‍नक खेनाइ एते भेल?
राधेश्‍याम- नै कोना भेल? कि‍यो कि‍ मोटरी बान्‍हि‍ घरपर लऽ जाइ छथि‍ आकि‍ पेटेमे दइ छथि‍न।
घटकभाय- दइ तँ छथि‍न पेटेमे मुदा जँ सभ दि‍न एहि‍ना देथि‍न तँ कोरोओ-बत्ती घरमे रहतनि‍ आकि‍ ओहो पेटेमे चलि‍ जेतनि‍। नै जँ एहने हाथी सन सभ भऽ जाए तँ हरबहना बड़द कतऽ सँ आनब। हाथीसँ बड़ काज लेब तँ देह-हाथ डोलबैत सवारी करब।
गरीबलाल- (मुस्‍कुराइत) सवारि‍यो तँ जरूरि‍ये अछि‍?
घटकभाय- (खि‍सि‍या कऽ मुदा हँसैत..) सवारि‍यो नीक लगै छै समैये पाबि‍ कऽ। भरि‍ दि‍न जँ खलासी-डरेबर जकाँ सवारि‍ये कसने रही तँ डरेबरे-खलासी हएब कि‍ यात्रा केनि‍हार यात्री।
गरीबलाल- कते दूर यात्रा करैक अछि‍ जे लोक यात्री बनि‍ चलत। ‘मि‍याँ दौर मसजि‍त।’
बालगोवि‍न्‍द- ‘गरीबलाल अहाँकेँ कचकचबै छथि‍ घटकभाय। अहूँ तेहने छी जे सभ गपकेँ धइये लइ छि‍ऐ। जइ काजे सभ एकत्रि‍त भेलौं तकरा आगू बढ़ाउ।
घटकभाय- (सह पाबि‍..) कतबो गरीबलाल कचकचेता तइसँ कि‍ हम कब-कबा जाएब। गरीबलाल एक घाटक पानि‍क सुआद बुझै छथि‍। हमरा जकाँ सत्तरह घाटक सुआद थोड़े बुझथि‍न।
राधेश्‍याम- एक संझू नीक कि‍ दू संझू आकि‍ ओइसँ बेसी।
घटकभाय- बौआ, संझूकेँ दि‍ना बना दहक। एक दि‍ना कि‍ दू दि‍ना ि‍क तीन दि‍ना। जँ तीन दि‍ना भेल तँ बहत्तरि‍ घंटाक चक्र भेल। चौवीस घंटाक दि‍न होइए तँ एक चक्रमे अनेक अछि‍। कि‍छु छोड़ि‍ कि‍छु जोड़ि‍ आ कि‍छु सुधारि‍ एक चक्रमे आनल जा सकैए।
गरीबलाल- आब कि‍ पहि‍लुका जकाँ लोककेँ ओते पलखति‍ छै जे पएरे बत्तीस-बत्तीस कोस भोज खाइले जाइत। एक दि‍ना बढ़ि‍याँ।
घटकभाय- गरीब लाल, साँपोसँ टेढ़-बौकली लोकक चालि‍ छै।
गरीबलाल- से कि‍?
घटकभाय- एक दि‍नोकेँ एक रौतुक बना देलक।
गरीबलाल- चौबीस घंटाकेँ बारहमे बाँटल जा सकैए कि‍ ने?
घटकभाय- बँटैक तराजुए ढील-ढि‍लाह अछि‍। कखनो कऽ डोरी ओझरा जाइ छै तँ बेसि‍ये जोखा जाइ छै आकि‍ कम्‍मे जोखाइ छै।
गरीबलाल- से कि‍?
घटकभाय- एक तँ भगवानेक काज आ बोलमे अन्‍तर छन्‍हि‍ दोसर मनुख तँ आरो पजि‍या कऽ लि‍ड़ी-बीड़ी करैए।
गरीबलाल- से कि‍?
घटकभाय- कनी नजरि‍ उठा कऽ देखबै तँ बुझि‍ पड़त जे कोनो मासक दि‍न नमहर भऽ जाइए आ कोनो मासक राति‍। तखन केना अधा-अधीमे बँटबै।
गरीबलाल- एकरा छोड़ू। दोसरपर आउ।
घटकभाय- (मुँह बि‍जकबैत..) मनुख तँ मनुखे छी। एतबो होश नै जे रौतुका यज्ञ संध्‍याक गीतसँ शुरू होइत अछि‍ आ दि‍नुका परातीसँ। से होइए कि‍ से तजबीज केलि‍ऐहेँ?
गरीबलाल- नै?
घटकभाय- तेज सवारी भेने तीन कोसक बरि‍याती तीन बजे भोरमे पहुँचैए। आब अहीं कहू जे पराती बेरमे संध्‍या होइ। तइपर सँ दि‍नका यज्ञ मानबै आकि‍ रौतुक।
गरीबलाल- एहन जंगल-पहाड़ काटि‍ सड़क बनाओल हएत।
घटकभाय- (मुस्‍की दैत) नै कि‍अए हएत। अनजान-सुनजान महाकल्‍याण। जे नीक बुझि‍मे आओत सएह ने नीक भेल। तहूमे असगर-दुसगरमे गड़बड़ाइयो सकैए मुदा पाँच गोटे बैस जँ वि‍चार करब तँ कनी-मनी झूस-झास भऽ सकैए।
राधेश्‍याम- जँ शुभ लग्‍नमे ि‍वयाह नै हएत तँ बरि‍याती सभ माि‍र खेता।
घटकभाय- जहि‍ना टायरगाड़ीक बड़दकेँ आनो-आनो गामक खच्‍चा-खुच्‍ची आ बान्‍ह-सड़क टपैक भाँज बुझल रहै छै तहि‍ना ने छी। खाइर शुभ-शुभ कऽ काज सम्‍पन्न हुअए।
गरीबलाल- घटकभाय, अपना सभ समाज छी कि‍ने? समाजि‍क बंधनमे बान्‍हि‍ जि‍नगीक अंग छी। मुदा परि‍वारक काजक भार तँ परि‍वारेपर रहतनि‍।
घटकभाय- रहबे करतनि‍ कि‍ने। समाज परि‍वारक बीच जे संबंध छै तेकरे पहरूदार छी कि‍ने? नीक करता नीक कहबनि‍ अधला कऽ अधलो कहबनि‍ आ सजाएओ देबनि‍।
बालगोवि‍न्‍द- (मुस्‍कुराइत) जहि‍ना अखन धरि‍ सभ काज शुभ-शुभ कऽ चलि‍ रहल अछि‍ तहि‍ना आगूओ चलैत रहए।
भागेसर- नचारि‍ये वि‍याह कऽ रहल छी। तँए......?
घटकभाय- कि‍ नचारि‍ये?
मनोहर- कते दि‍नसँ पत्नी बीमार चलि‍ रहल छथि‍। बाहरक काज अपने सम्‍हारि‍ लइ छी, मुदा घर-अंगनाक काज राइ-छि‍त्ती होइए।
घटकभाय- बालगोवि‍न्‍द, जहि‍ना संगीक काज नीक-अधलामे संग देब छी तहि‍ना ने सरो-समाज आ कुटुमो-परि‍वार छी। जते जल्‍दी सम्‍हारि‍ सकी ओते जल्‍दी सम्‍हारि‍ लि‍अ। आठम दि‍न सेहो नीक लग्‍न अछि‍‍। जँ सम्‍हरि‍ जाए तँ सम्‍हारि‍ लि‍अ।
बालगोवि‍न्‍द- बड़वढ़ि‍या।
पटाक्षेप
नवम दृश्‍य
(राजदेवक दरबज्‍जा। नजरि‍ नि‍च्‍चा केने कुरसीपर राजदेव मने-मन कि‍छु सोचबो करैत आ कखनो कऽ दहि‍ना हाथ उठा आंगुरपर हि‍साब जोड़ए लगैत। बजैत तँ नै मुदा ठोर पटपटबैत।)
सुनीता- बि‍नु दूधेक चाह छी। कहुना कऽ पीब लि‍अ।
राजदेव- दूध नै छेहल।
सुनीता- अमरस्‍साक समए छी, फाटि‍ गेल।
राजदेव- दूध फाटि‍ गेलह तँ नेबोए दऽ देलहक ने। अच्‍छा जे छह सएह नीक। एते दि‍न चाह पेय छल आब तँ अम्‍मल बनि‍ गेल। नै पीने मने ढील भऽ जाइये। उत्तरवारि‍ टोल दि‍ससँ जनीजाति‍क जेर अबैत देखने छेलि‍ऐ। से कतऽ सँ अबै छलइ?
सुनीता- हकार पुरि‍ कऽ।
राजदेव- कथीक हकार। ककरा अइठीनसँ।
सुनीता- भागेसर कक्काक बेटाक वि‍याह भेलनि‍, वएह कनि‍याँ देख-देख अबै छलइ।
राजदेव- वि‍याहै जोकर बेटा कहाँ भेल छलै?
सुनीता- वि‍याहोक कोनो सीमा-नाङरि‍ छै। देखबे करै छि‍ऐ जे कोनो-कोनो जाति‍ छेटगर बेटा-बेटी भेने वि‍याह करैए आ कोनो-कोनो जाति‍ बच्‍चेमे कऽ लइए।
राजदेव- हँ, से तँ देखै छि‍ऐ। तोहू तँ आब बच्‍चा नहि‍ये छह, कओलेजमे पढ़ै छह। दुनूमे नीक कोन?
सुनीता- दुनू नीको अछि‍ आ अधलो।
राजदेव- से केना?
सुनीता- जुआन बेटा-बेटीक वि‍याह ऐ दुआरे नीक अछि‍ जे अपन भार उठा चलै जोकर भेल रहैए।
राजदेव- हँ, से तँ रहैए। फेर अधला केना भेल?
सुनीता- जतेक जे भार उठा कऽ चलैक चाही से नै चलैए, तँए अधला।
राजदेव- तू तँ ि‍कताबक भाषामे बुझबै छह। कनी वि‍लगा कऽ कहह।
सुनीता- एक ध्रुवीय (एक सीमा) देश-दुनि‍याँक अछि‍ आ दोसर ध्रुवीय (दोसर सीमा) परि‍वार आ व्‍यक्‍ति‍क। आजुक जे परि‍वारक रूप-रेखा बनि‍ रहल अछि‍ ओइमे सभ छुटि‍ रहल अछि‍। सि‍कुड़ि‍ कऽ लोक तते छोट परि‍वार बनबए चाहैए जे मनुष्‍यक संबंधे चौराहापर ढेड़ि‍आएल गाड़ी-सवाड़ी जकाँ भेल जा रहल अछि‍।
राजदेव- फेर ि‍कताबेक भाषा बजए लगलह।
सुनीता- नै। परि‍वारमे मनुष्‍यक जन्‍म होइत अछि‍। माए-बाप जन्‍मदाता होइत छथि‍न। मुदा भऽ कि‍ रहल अछि‍ जे या तँ वि‍चारे वा लड़ि‍-झगड़ि‍ माए-बाप छोड़ि‍ परि‍वार फुटा लइए। जहि‍ना सोनक सूत मि‍ला कऽ सक्कत जौड़ बनि‍ जाइए। जइसँ भारी-भारी बोझ बान्‍हल जा सकैए ओइ जौड़केँ उधारि‍ वा तोड़ि‍ एक-एक रेशाकेँ बेड़वि‍तहि‍ एते कमजोर बनि‍ जाइत अछि‍ जे कोनो काजक नै रहैत। तहि‍ना भऽ रहल अछि‍।
राजदेव- (मूड़ी डोलबैत..) कहै तँ छह ठीके, मुदा.....?
सुनीता- मुदा-तुदा कि‍छु ने। सोझ रास्‍ता बनि‍ रहल अछि‍। जे बेटा-माए-बाप, परि‍वार छोड़ि‍ सकैए ओ समाज, देश-दुनि‍याँकेँ कोना पकड़ि‍ सकैए। जँ से तँ मातृभक्‍त, पि‍तृभक्‍त, समाजभक्‍त, देशभक्‍त बनि‍ कोना सकैए।
राजदेव- (मूड़ि‍यो डोलबैत आ कनडेरि‍ये आँखि‍ये सुनीताकेँ देखबो करैत..) ठीके कहै छह। अच्‍छा बाल-वि‍वाहकेँ केना-नीक आ केना अधला कहै छहक।
सुनीता- बाल-वि‍वाहक परि‍स्‍थि‍ति‍ भि‍न्न अछि‍। जे परि‍वार सम्‍पन्नताक (आर्थिक) दृष्‍टि‍ये जते अगुआएल अछि‍ ओ ओते बाल-वि‍वाहसँ दूरो अछि‍। मुदा जे परि‍वार जते पछुआएल (आर्थिक दृष्‍टि‍ये) अछि‍ ओइमे ओते बेसी छै।
राजदेव- कि‍अए?
सुनीता- अपना सबहक समाजो, परि‍वारो आ व्‍यक्‍ति‍यो वैदि‍क रीति‍-नीति‍सँ बनि‍ चलैत आबि‍ रहल अछि‍। जइमे ढेरो दाउ-घाउक संग हवो-वि‍हाड़ि‍ लगैत आएल अछि‍। बालो-वि‍वाहक पाछु सएह कारण अछि‍।
राजदेव- कनी बि‍लगा कऽ कहह।
सुनीता- जि‍नगीक उताड़-चढ़ाव होइत छै। जना बच्‍चाक सेवा माए-बाप करैत अछि‍ तखन ओ अपन जि‍नगी सम्‍हारै जोकर नै रहैए। जखन बेटा-बेटी जुआन (कमाइ-खटाइबला) होइत अछि‍ आ माए-बापक लौटानी अबैत अछि‍। तखन सहाराक जरूरत होइ छै। जहि‍ना दुनि‍याँमे मनुष्‍यकेँ एबाकाल (बच्‍चा) दोसराक सहाराक जरूरत होइत अछि‍ तहि‍ना जेबोकाल होइत अछि‍।
राजदेव- (मूड़ी डोलबैत..) हँ, से तँ होइते अछि‍। हमहीं छी जँ तू सभ नै देखबह तँ कतेक दि‍न जीब।
सुनीता- वएह माए-बाप अपन आचार-वि‍चार नि‍माहैत बेटा-बेटीकेँ दोसराक अंग (संगी) लगा अपन भार ढील कऽ लैत अपनाकेँ बेटा-बेटीक रीनसँ उरीन हुअए चाहैत।
राजदेव- एते धड़फड़ा कऽ कि‍अए उरीन हुअए चाहैत। जखन कि‍ दुनू अखन आश्रि‍ते अछि‍।
सुनीता- जइठाम जि‍नगी जीवैक ने साधन अछि‍ आ ने खोज-खबड़ि‍ लेनि‍हार तइठाम लोक अपनापर कते भरोस करत। कि‍यो सुखे (सुख रोग भेने) उपास कऽ देवमंदि‍रमे पूजा करए जाइए तँ कि‍यो दुखे (नइ रहने) साँझक-साँझ, दि‍नक-दि‍न उपास करैत भोलाबाबाकेँ नचारी सुनबैए। खाइर छोड़ू। अपन दुख-धंधा सोचू।
राजदेव- तेहू दुनू माए-धी जा कऽ देख अबि‍हह।
सुनीता- हकार अबैत तब ने जइतौं। बि‍नु हकारे.....। जँ पुछि‍ दि‍अए जे.....?
(कृष्‍णानन्‍दक प्रवेश)
कृष्‍णानन्‍द- कक्का, नजरि‍ उतड़ल (सोगाएल) बुझि‍ पड़ैए। कि‍छु होइए कि‍?
राजदेव- बौआ कृष्‍ण, ककरा कहबै के सुनत। अपने दुनू गोटेक परि‍वार अछि‍, सात पुस्‍तसँ अपेछा अछि‍। मन रखैबला एकोटा बात नै भेल। तोरा देख कऽ खुशी होइए। मुदा.....।
कृष्‍णानन्‍द- नि‍राश जकाँ कि‍अए बजै छी कक्का?
राजदेव- तीर जकाँ पोतीक बात छेदने अछि‍। मन कलपि‍ रहल अछि‍ जे आब कि‍छु करै जोकर नै रहलौं आ जखन करैबला छलौं तखन....।
कृष्‍णानन्‍द- कि‍ तखन?
राजदेव- कि‍ कहबह। एक्के बेर कहि‍ दइ छि‍अ जे अपन गाछी भुताहि‍ भऽ गेल।
कृष्‍णानन्‍द- कनी खोलि‍ कऽ कहबै तखन ने बुझबै। चि‍क्कारी तँ कबि‍काठीक भाषा छि‍ऐ। भलहि‍ं उनटे कि‍अए ने बुझि‍ऐ।
राजदेव- भागेसर बेटाक ि‍वयाह केलक। एते दि‍न कनि‍याँ देखैक हकार अांगनमे अबैत छलनि‍। जाइत छलीह आ असीरवादो दैत छेलखि‍न। कि‍यो तँ अपना भाग-तकदीरे जन्‍म लइए। तइ सूत्रे सामाजि‍क संबंध तँ छल। मुदा अनका-अनका हकार देलक आ......।
कृष्‍णानन्‍द- कक्का, भागेसर भैया कोनो सुखे बेटाक वि‍याह केलनि‍।
राजदेव- (धड़फड़ा कऽ) तँ......?
कृष्‍णान्‍नद- कते माससँ भौजी ओछाइन पकड़ने छथि‍न। भानसो-भातमे दि‍कते होइ छन्‍हि‍। ई तँ ओही बेचाराकेँ धन्‍यवाद दि‍यनि‍ जे भौजीकेँ जि‍आ कऽ रखने छथि‍। हमरा अहाँ घरमे होइत तँ टाँग पकड़ि‍ फेक गंगा लाभ कऽ अबि‍तौं।
राजदेव- जखन समाजसँ टुटि‍ रहल छी तखन.....।
(एकाएक चुप भऽ जाइत। आँखि‍ उठा कखनो सुनीतापर तँ कखनो कृष्‍णानन्‍दपर दैत। तहि‍ना कृष्‍णानन्‍दो कखनो राजदेवपर तँ कखनो सुनीतापर आ कखनो मेघ दि‍स ऊपर देखैत तँ कखनो नि‍च्‍चा दि‍स। तहि‍ना सुनीताे।)
सुनीता- बाबा, बाबा!!
(आँखि‍ उठा राजदेव सुनीतापर दऽ पुन: नि‍च्‍चा धरती दि‍स देखए लगैत। दुनू हाथसँ आँखि‍ पोछैत, भड़ि‍आएल अवाजमे..)
राजदेव- बुच्‍ची सुनीता आ बौआ कृष्‍ण, दुखे कि‍ सुखे जते दि‍नक दाना-पानी लि‍खल अछि‍ से तँ भोगबे करब। मुदा.....।
सुनीता- मुदा कि‍?
राजदेव- आन कि‍यो कि‍अए मन राखत मुदा तूँ दुनू गोरे तँ लगक भेलह। तँए कि‍छु कहि‍ दइ छि‍अह।
कृष्‍णानन्‍द- बि‍तलेहे जि‍नगीक कथा ने इति‍हास छी।
राजदेव- हमरा जकाँ बाबाकेँ एते अज-गज नै रहनि‍। मुदा समाजमे एहेन प्रति‍ष्‍ठा बनल रहनि‍ जे जहि‍ना कोनो पाखरि‍ वा इनारक पानि‍ सटल रहैए, तहि‍ना रहनि‍। खेत-पथार, बाड़ी-झाड़ीसँ काज कऽ आबथि‍ आ लोटा लेने मैदान दि‍स वि‍दा होथि‍। जइठाम जेत्तै कि‍यो भेट जान्‍हि‍ तेत्तै गामक चर्च उठा बैस जाि‍थ। जना सौंसे गाम इस्‍कूले होइ।
सुनीता- की चर्च उठबथि‍हि‍न।
राजदेव- से कि‍ बुझल अछि‍। ताबे हमर उदइयो-पड़लए भेल रहए कि‍ नहि‍।
सुनीता- तखन कना बुझलि‍ऐ।
राजदेव- साँझू पहरकेँ दादी अंगनामे बि‍छान बि‍‍छा दइ छेलखि‍न आ बाबाक खि‍स्‍सा कहै छेलखि‍न। एक दि‍न पूछि‍ देलि‍यनि‍ जे बाबी बाबासँ झगड़ो करि‍यनि‍?
सुनीता- की कहलनि‍?
राजदेव- पहि‍ने तँ भभा कऽ हँसली। मुदा जहि‍ना तेल वा दूध हरा जाइ छै जेकरा आंगुर-तरहस्‍थीसँ हि‍लोरि‍-हि‍लोरि‍ बासनमे राखल जाइए। तहि‍ना दादि‍यो हँसीकेँ ि‍हलोरि‍-हि‍लोरि‍ राखि‍ बजलीह।
सुनीता- बजैकाल मन केहन रहनि‍?
राजदेव- जहि‍ना सूर्यास्‍तक समए सुर्जक कि‍रि‍ण (रश्‍मि‍) बोरि‍या-वि‍स्‍तर समेटि‍-समेटि‍ समटाइत तहि‍ना दादीक दुनि‍याँ पाछू छुटि‍ गेलनि‍। बजलीह- बुरहामे आदति‍ रहनि‍ जे साँझू पहरकेँ जे लोटा लऽ कऽ वि‍दा होथि‍ तँ कखन धुरि‍ कऽ अवि‍तथि‍ तेकर ठीक नै।
सुनीता- कतऽ चलि‍ जाइ छेलखि‍न?
राजदेव- कतऽ जाइ छेलखि‍न से दादि‍योकेँ नै ने कहथि‍न।
सुनीता- तँए ने झगड़ा होन्‍हि?
कृष्‍णानन्‍द- नै, दुनू कारण भऽ सकैए।
सुनीता- कि?
कृष्‍णानन्‍द- जँ चारि‍ घंटा बोनाएल रहलापर जते काज भेल ओते जँ परि‍वारोमे दोहराओल जाए तँ ओतेक समए आरो चाही। जँ ओते आरो समए लगाओल जाए तँ परि‍वारक काज आ व्‍यक्‍ति‍गत जीवन (खेनाइ-सुनताइ) प्रभावि‍त हएत।
सुनीता- तखन तँ समाजोक (काज) बातसँ परि‍वारक सदस्‍य हटल रहत?
कृष्‍णानन्‍द- एक अर्थमे हटल रहबो नीक, आ दोसरमे नहि‍यो। व्‍यक्‍ति‍ आ समाजक बीच परि‍वारक सीमा अछि‍। जहि‍ना लोकक समूह परि‍वार होइत तहि‍ना परि‍वारक समूह समाज होइत।
सुनीता- हँ, से तँ होइत, मुदा एक दोसरमे सटल केना रहत। आकि‍ नल-नीलक पाथर जकाँ भसि‍आइत रहत।
कृष्‍णानन्‍द- जँ भसि‍आइत रहत तँ अनेरे हवा-वि‍हाड़ि‍मे एक-दोसरसँ टकरा-टकरा, फुटि‍-फुटि‍ पानि‍मे डूबैत रहत।
सुनीता- तखन, कि‍ उपाय छै?
कृष्‍णानन्‍द- यएह तँ प्रकृतक अद्भुत खेल अछि‍। जेतइ दुखक जनम होइत अछि‍ ओतइ सुखोक होइत। सुख-दुख जौंआ सहोदर छी।
सुनीता- नीक जकाँ नै बुझि‍ पाबि‍ रहल छी।
कृष्‍णानन्‍द- जहि‍ना धरती अकासकेँ शीतल-गर्म हवा जोड़ि‍ कऽ रखने अछि‍‍ तहि‍ना मनुष्‍य-परि‍वार आ समाजक बीच अछि‍।
समाप्‍त
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
रवि भूषण पाठक
निरालाःदेह विदेह
हिन्दी भाषा आ साहित्य क केन्द्रीयता स्वातंत्रयोत्तर भारतक एकटा महत्वपूर्ण सांस्कृतिक घटना ।एकर मूल कारण राजनीतिक आ वाणिज्यिक रहितहु परिणाम बहुआयामी अछि ।हिंदी साहित्यक आ विशेषतः कविता के सौंदर्यात्मक ,वैचारिक आ शैल्पिक वैविध्य सँ पूर्ण करबा मे कवि निराला क योगदान अप्रतिम ।ने केवल कविता बल्कि ईमानदारी मे सेहो निराला क व्यक्तित्व क चर्चा क सेहो कतिपय आयाम । आधुनिक साहित्यिक व्यक्तित्व मे निराला अग्रणी छथि ,जनिकर व्यक्तित्व आ कृतित्व क हरेक अंश सँ ईमानदारी,रचनात्मकता,आलोचना आ अफवाहक मार्ग प्रशस्त होइत अछि ।निराला काव्य क अनुवादक महत्व विभिन्न प्रसंग आ संदर्भ सँ अछि ।प्राचीन संस्कार आ आधुनिकता क आंदोलनमयी धारा कें आत्मसात करबाक जतेक सामर्थ्य निराला साहित्य मे अछि ,ओतेक अन्यत्र नइ ।दोसर बात ई जे निराला काव्य क माध्यम सँ हिन्दी साहित्य मैथिली आ बांग्ला सँ जुड़ैत अछि ।निराला पर विद्यापति आ रवीन्द्रनाथक प्रभाव अत्यंत स्पष्ट अछि ।हिंदी आलोचक निराला पर विद्यापतिक प्रभाव पर बहुत नइ लिखने छथि ,मुदा ई प्रभाव देखबा क हो तखन ‘वर दे वीणा वादिनी वर दे‘ क तुलना विद्यापति लिखित वसंत गीत ‘नव नव विकसित फूल ‘सँ करू ।

शब्दार्थचिंतामणिकार अनुवादक दू टा अर्थ लिखैत छथिन्ह ।प्रथम ‘प्राप्तस्य पुनःकथने ’आ दोसर ‘ज्ञातार्थस्य प्रतिपादने ‘ एकर अर्थ भेल पहिले कहल गेल कथन के फेर सँ कहनए आ ज्ञात अर्थ के प्रतिपादित केनए ।प्रसिद्ध भाषावैज्ञानिक रोमन याकोबसन एकरा ‘एक भाषा के शाब्दिक प्रतीक के अन्य भाषा के शाब्दिक प्रतीक के द्वारा व्याख्या‘ मानैत छथिन्ह ।नाइडा आ टेबर कनेक विस्तृत करैत कहैत छथिन्ह कि ई मूल भाषा क संदेशक समतूल्य संदेश के लक्ष्य भाषा मे प्रस्तुत करबा क क्रिया अछि जाहि मे संदेशक सममूल्यता पहिले अर्थ आ फेर शैली क दृष्टिकोण सँ निकटतम आ स्वाभाविक होइत अछि ।

भाषिक प्रक्रिया होएबा क कारणें अनुवाद क सम्बन्ध भाषेटा सँ नइ बल्कि भाषाविज्ञानो सँ अछि ।ध्वनि ,शब्द,रूप,वाक्य आदि विभिन्न स्तर मिलि के अर्थक संसार रचैत अछि ,ताहि दुआरे ऐ सब स्तर क प्रति सजगता अनिवार्य अछि ।प्रत्येक भाषाक अपन विशिष्ट ध्वनि ,शब्द भंडार आ रूप व्यवस्था होइत अछि ,ताहि दुआरे ऐ स्तर मे निहित अंतर के कारणें समान लागए वला प्रसंग सेहो वास्तविक अर्थ मे अर्थान्तर क संभावना सँ युक्त होइत अछि ।

ऐ ठाम ई तथ्य उल्लेखनीय अछि कि मैथिली आ खड़ीबोली हिन्दी कोनो दू ध्रुवीय भाषा नइ अछि ।दूनू दू टा प्रादेशिक अपभ्रंशक संतान आ ताहि दुआरे संस्कृत ,पालि आ प्राकृतिक विरासत पर समान रूप सँ अधिकारिणी अछि ।ध्वनि ,शब्द आ रूप क स्तर पर अनगिन साम्य अछि ।संस्कृत क रात्रि मैथिलीए टा मे नइ अवधी,ब्रजभाषा,भोजपुरी सहित कतेको उत्तर भारतीय भाषा मे ‘राति‘ अछि आ ‘दिन‘ त‘ सर्वत्र ‘दिन‘े अछि ।तहिना भोर आ दुपहर अपन विभिन्न ध्वनिभेद क संग विद्यमान अछि ।उदाहरण केवल एक या दू शब्दक नइ अछि ,सुधी पाठक ऐ उभयनिष्ठ आधारक जटिल उपस्थिति सँ परिचित छथि ।

ई उभयनिष्ठ आधार अनुवाद मे सुविधा लऽ के आबैत अछि,मुदा ऐ ठाम आलस्य आ अनुकरण क खतरा मौलिक अनुवाद के समक्ष चुनौती दैत अछि ।सबसँ बेशी शब्द तद्भव के आ ओहि पर सब भाषा क तेहनें अधिकार तखन ई नबका शब्द कत‘ सँ आनी ,देशज शब्दक प्रयोग प्रचलन आ स्वीकृति क आधारे पर स्वीकार्य होयत ।मिथिला क व्यापक भूभाग मे पजेबा सँ बेशी स्वीकृत शब्द ईंटा अछि तखन ककर व्यवहार करी आ ककर नइ करी ?
वैज्ञानिक तथ्य वा गद्यात्मक सूचना क प्रस्थापन अभिधात्मक भाषा मे सुगमता मे संभव अछि ,मुदा भावप्रधान रचना मे अर्थ क अनेक स्तर आ कथनक बहुविधि व्यंजना होइछ,परिणामतः प्रत्यक्ष भाषिक प्रतिस्थापन संभव नइ, ताहि दुआरे अनुवादक के परकाय प्रवेश करऽ पड़ैत अछि ।अनुवादक मूल कृति आ रचनाकार क मनोजगत मे घुसि के भाव आ ओकर अर्थच्छाया के समझैत अछि तथा फेर ओइ भाव के यथासंभव लक्ष्यकृति मे अभिव्यक्त करैत अछि ।कलाकृति के एहन समझ आ फेर ओकर कलात्मक संप्रेषण क लेल सर्जनात्मक प्रज्ञा क विद्यमानता अनिवार्य अछि ।ई प्रज्ञा सर्वत्र एकरूप मे उपस्थित नइ अछि ,ई देखबा क अछि तखन उमर खय्याम क रूबाई क अनुवाद क्रमशः फिट्जराल्ड (अंग्रेजी) आ मैथिली शरण गुप्त, बच्चन जी ,केशव प्रसाद पाठक आ सुमित्रा नंदन पंत(सब हिंदी)क अनुवाद मे निहित भावभंगिमा आ गुणवत्ता क अंतर देखि सकैत छी ।गीतांजलि क अनुवाद मैथिली मे सुमन जी केने छथि आ हिंदी मे अज्ञेय आ अन्य कतेको विद्वान मुदा बांग्ला विद्वानजन सुमन जी द्वारा अनुदित ‘अनुगीतांजलि‘ के ह्रदय खोलि के प्रशंसा केने छथि ।

ऐ ठाम हम परकायप्रवेशक वांछित योग्यता क साथ उपस्थित नइ छी ।हम निराला काव्य मे निहित व्यंजना क महान शक्ति के स्वीकार करैत छी आ निराला काव्य मे ,ओकर शब्द आ शब्द योजना मे निहित उदात्त के मानैत छी ।ई उदात्त किछ किछ संस्कृतक तत्सम शब्द,सघन वर्णमैत्री,वर्णक ध्वन्यात्मकता मे निहित अछि ,ताहि दुआरे मैथिली पाठक के हम शब्द आ अर्थक अइ स्वर्गिक संसार सँ वंचित नइ करऽ चाहैत छी ।हम अपन अनुवादक सीमा के सहज स्वीकारैत छी

अनुवादक एकाधिक रूप मे प्रचलित अछि ।शब्दानुवाद(लिटरल) या मूलनिष्ठ अनुवाद सामान्यतः अभिधात्मक होइत अछि ,ऐ अनुवाद मे श्रोत भाषाक प्रत्येक शब्द आ अभिव्यक्ति क प्रतिस्थापन लक्ष्यकृति क शब्दावली,अभिव्यक्ति तथा संरचना मे होइछ ।
भावानुवाद मे मूल भाषा क अभिव्यक्ति क स्थान पर ओइ मे निहित आशय के स्पष्ट कएल जाइत अछि ।ई मूलकृति क ढ़ाँचा सँ स्वतंत्र होइत अछि,ताहि दुआरे लक्ष्यकृति क दृष्टि सँ ई बेशी सहज आ स्वाभाविक होइत अछि ।सुरेन्द्र झा सुमन द्वारा ‘गीतांजलि‘ क अनुवाद ‘अनुगीतांजलि‘ भावानुवादक श्रेष्ठ उदाहरण अछि ।
रूपांतरण कथा साहित्य क क्षेत्र मे लोकप्रिय अछि ।अइ मे अनुवादक मूलकृति क परिवेश ,चरित्र ,आदि के देश-कालानुसार परिवर्तित करैत अछि ।शेक्सपीयर रचित ‘द मर्चेंट ऑफ वेनिस‘ क हिंदी अनुवाद भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ‘दुर्लभ बन्धु‘ नाम सँ केलाह ।एइ मे एंटोनियो क नाम अनंत ,बसानियो क नाम वसंत आ शायलॉक क नाम शैलाक्ष अछि ।घटना वेनिस नगरक स्थान पर काशी(भारत) मे घटैत अछि ।

‘छायानुवाद‘रूपांतरणक एकटा प्रकार अछि ,अइ मे मूलकृति क आधार पर मूल कथ्य के संप्रेषित करबा क लेल स्वतंत्र कृति क निर्माण संपन्न होइत अछि ।अइ मे बिंब विधान ,प्रस्तुतिकरण आदि मूलकृति क प्रतिबिंब होइत अछि ।भगवती चरण वर्मा क उपन्यास चित्रलेखा अनातोले फ्रांस क उपन्यास ‘थाया‘ पर आधारित अछि ।विदेशी फिल्म आ साहित्य क अनधिकृत अनुवाद आ रूपांतरणक लेल अइ विधि क बहुत प्रयोग होइत अछि ।
‘सारानुवाद‘ मे मूलकृति क सार लक्ष्य भाषा मे प्रस्तुत कयल जायत अछि ।संप्रेषण केंद्रित अनुवाद क्लासिकी रचना के बच्चा आ किशोर सब के पढ़बा क लेल रूपांतरण मे सहयोगी होइत अछि ।जेना महाभारत वा रामायण पर आधारित संक्षिप्त कथा ।
‘टीकापरक अनुवाद‘ मे अनुवाद क साथ ओकर व्याख्या रहैत अछि ।गीताप्रेस क किताब मे एहन अनुवाद प्रचूर मात्रा मे उपलब्ध अछि ।किछु दिन पहिले विद्यापति पदावली क किछु पदक अनुवाद यात्री जी द्वारा कयल गेल दिल्ली विश्वविद्यालयक प्रोफेसर प्रभात रंजन जी क ब्लॉग पर उपलब्ध छल ।

अंत मे फेर काव्यानुवाद पर आबी ।कविता क अनुवाद नमहर चुनौती अइ दुआरे छैक कि कविता मात्र शब्दार्थ तक नइ सीमित छैक ।ई शब्द सँ आगू वाक्यगठन,लय,छंद,बिंब,प्रतीक,अलंकारयोजना,शैली आदि क मिल जुलल परिणामी काव्यात्मक पर्यावरण पर आधारित अछि ।ताहि दुआरे दाँते आ सर फिलीप सिडनी सन विद्वान काव्यानुवाद के असंभव मानैत छथिन्ह ।कविता क समग्र प्रभाव वा व्यंग्यार्थ ध्वनि ,लय ,बलाघात आ बिंब योजना के माध्यम सँ अभिव्यक्त होइत अछि ।ताहि दुआरे निराला क शब्द चयन ‘विजन-वन वल्लरी‘‘पुलिन पर प्रियतमा‘मैथिली मे यथावत अछि ।

कविता क दृश्य आ श्रव्य बिंब बहुधा शब्द क नादात्मकता सँ नियंत्रित होइत अछि ।एहिना शब्दालंकार आ अर्थालंकार क विकल्प लक्ष्यभाषा मे सृजित कएनए कठिन अछि ।काव्यानुवाद क सबसँ नमहर समस्या छंद आ लय अछि ।मूल रचना क लेल प्रभावी छंद आ लय के खोजनए अनुवादक लेल सबसँ पैघ समस्या अछि ।यदि कविता क अनुवाद गद्य मे आबैत अछि तखन अनुवाद मात्र शब्दार्थ तक सीमित रहत आ अइ मे कविता क पूरा अर्थ निकलि के बाहर नइ आयत ।अनुवाद सम्बन्धी अइ अवधारणा क लेल हम सर्वश्री/सुश्री रवीन्द्र नाथ श्रीवास्तव ,कृष्ण कुमार गोस्वामी ,कुसुम बांठिया ,गजेन्द्र ठाकुर ,रवीन्द्र कुमार दास जी क आभारी छी ।मैथिलीःदेह-विदेह क अइ पहिल किश्त मे निराला जी क दू टा लोकप्रिय कविता क अनुवाद प्रस्तुत क‘ रहल छी ।सहज सँ जटिल आ जटिल सँ जटिलतर दिश
‘‘क्रम क्रम सँ भेल पार राघवक पंचदिवस
चक्र सँ चक्र चढ़ि गेेल भेल उर्ध्व निरलस ‘‘(रामक शक्ति पूजा)

जूनि बान्ह नाव ऐ ठाम बन्धु
(बाँधो न नाव इस ठाँव,बन्धु!)
जूनि बान्ह नाव ऐ ठाम बन्ध
पूछतओ पूरा गाम बन्धु
ई घाट छलए जइ पर हँसि के
ओ रहए नहाबति रे! धसि के
रहि जाइत छलए आँखि फसि के
कांपैत रहए दूनू पैर बन्धु !
ओ हँसी बहुत किछु कहए छलए
तैयो अपने मे रहए छलए
सबके सुनैत सबके सहैत
दैत ओ सबके दाँव बन्धु ।
हमरा सँ किनारा केने जा रहल छथि
(किनारा वह हमसे किये जा रहे हैं ।)
हमरा सँ किनारा केने जा रहल छथि
दिखाबे टा दर्शन देेेने जा रहल छथि
जुड़ल छल सुहागिन केर मोती क दाना
ओएह सूत तोड़ने लेने जा रहल छथि
छिपल चोट के बात पूछलउं त बजलीह
निराशा क डोरी सीने जा रहल छथि
ई दुनिया के चक्कर मे केहन अन्हर
मरल जा रहल छथि जियल जा रहल छथि
खुलल भेद एहि ठां ,जे विजयी कहायल।
ओ खूं दोसरा के ,पीने जा रहल छथि ।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
डॉ रमानन्द झा "रमण"
मिथिला भाषाक अध्ययन आ डॉ. ग्रिअर्सन कृत मैथिली व्याकरण
मैथिलीमे साहित्य-सर्जनाक परम्परा सुदीर्घ एवं अविच्छिन्न अछि। एक भाषाक रूपमे मैथिलीक अध्ययनक इतिहास सुदीर्घ नहि अछि। सन् 1801 ई. मे एच.टी. कोलब्रृूक भाषाक रूपमे ‘मैथिली’ शब्दक पहिले पहिल प्रयोग कएलनि। संगहि, ओ इहो लिखल जे व्यापक क्षेत्रामे मैथिलीक प्रयोग नहि अछि। कोनो महान कवि नहि भेलाह अछि। एहिसँ बेसी लिखब अनावश्यक अछि। जॉन बिम्स2(1872 ई.) एवं हॉर्नल3े3 (1880 ई.) भाषाक लेल मैथिली शब्दक प्रयोग करैत, हिन्दीक एक भाषिकाक रूपमे मैथिलीक विवेचन कएलनि। सर जॉर्ज कैम्पबेल, सन् 1874 ई. मे भारतक विभिन्न भाषा कुलक नमूनाक संकलन करैत बिहारक भाषा (Dialects of Behar)समूहमे Vernacular of Patna, vernacular of Gya,vernacular of Champaran, vernacular of West Tirhoot, vernacular of East Tirhoot, vernacular of West Purnea (Hindee), तथा vernacular of East Purnea (Bengali) 4 राखल। संकलित प्रत्येक शब्द एवं मोहाबराक अङरेजी पर्याय देखि प्रतीत होइछ जे हुनक लक्ष्य भारतक भाषाक अध्ययन नहि छल। अपितु, स्थानीय भाषासँ अपरिचित अङरेज पदाधिकारी सभके ँ दैनिक जीवनमे सुविधाक हेतु विभिन्न क्षेत्राीय भाषाक शब्द आ’ मोहाबरासँ
परिचय एवं अभ्यास कराएब छलनि। अतएव, कैम्पबेलक संकलनके ँभाषाक अध्ययन मानब उचित नहि होएत। बेसीसँ बेसी नमूना संकलन कहि सकैत छी। एस.एच. केलौग5 तिरहुतक भाषाक उल्लेख पूर्वी हिन्दीक एक बोलीक रूपमे प्रसंगात कएने छथि। ओ अपन व्याकरणमे मैथिलीक क्रियापद-रूपावली विस्तारपूर्वक देखऔने छथि।
हॉर्नले ई अनुभव कएल जे पश्चिमी एवं पूर्वी हिन्दी एक नहि थिक, दूनूमे पर्याप्त अन्तर छकै । हानॅ र्ल े पर्वू ी हिन्दीक आठ टा भाषिका मानल जाहिम े सातम स्थानपर मैि थली6 अछि। हुनक स्पष्ट मत अछि जे पूर्वी हिन्दीक अपेक्षा मैथिलीमे अपन पड़ोसी बंगला एवं नेपालीसँ बेसी समानता छैक, भूतकालक निर्माणमे मैथिली विशेषतः बंगलाक अत्यन्त सन्निकट अछि।7 एहि प्रकारसँ कहि सकैत छी जे मैथिली भाषाक अध्ययन कएनिहार पहिल व्यक्ति जॉन बिम्स आ’ दोसर हॉर्नले भेलाह अछि। जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सन एक स्वतन्त्रा भाषाक रूपमे मैथिलीक विस्तृत अध्ययन एवं स्थापना कएलनि। मैथिलीक व्याकरण लिखल। एहिमे हिनका जॉन बिम्सक क्रियारूपाली पर्याप्त सहायक भेल छनि।मैथिलीमे साहित्य-सर्जनाक परम्परा सुदीर्घ एवं अविच्छिन्न रहितहु तिरहुतक भाषा, मिथिला भाषा वा मैथिलीक अध्ययन नहि होएबाक की कारण छल होएत, ओहि पर दृष्टिपात करबासँ पूर्व किछु अन्य भाषाक भेल अध्ययनक स्थिति पर नजरि देब अपेक्षित अछि। ए. एच. सेसीक8 अनुसार आधुनिक भारतीय आर्यभाषाक व्याकरण 1872 ई., बंगला भाषाक व्याकरण 1862 ई, ओड़िआ भाषाक व्याकरण 1831 ई., सिन्धी भाषाक व्याकरण 1872 ई., पंजाबी भाषाक व्याकरण 1851 ई., गुजरातीक व्याकरण 1867 ई., मराठीक व्याकरण 1868 ई. तथा हिन्दुस्तानीक व्याकरण 1845 ई. मे लिखल गेल। विश्वम्भर विद्यासागर 1841 ई. मे ओड़ियामे ओड़ियाक पहिल व्याकरण प्रकाशित कएल। BANGLAPEDIA: Grammar9 9 क अनुसार बंगलाक पहिल व्याकरण पुर्तगीज मिशनरी द्वारा पुर्तगालीमे1734 एवं 1742क बीच लिखाएल तथा लिबसनसँ प्रकाशित भेल। बंगलामे पहिल व्याकरण कलकत्ता स्कूल सोसाइटीक सदस्य राधाकान्त देव लिखल जकर दोसर संस्करण 1821 ई. मे भेलैक। असमीक पहिल व्याकरण मिशनरी नाथ ब्राउन 1848 ई. मे प्रकाशित कएलनि। पछाति असमी भाषा पर हुनक विस्तृत पोथी आएल। असमी भाषी पर राजकाजक भाषाक रूपमे थोपल गेल बंगलाक स्थान पर असमीके ँ कामकाजक भाषा होएबामे मिशनरी नाथ ब्राउनक उक्त पोथी बहुत सहायक भेल छलैक। भाषाक लेल ‘नेपाली’ शब्दक प्रयोग पहिले पहिल आयटोन ; (Ayton) 1820 ई. मे कएलनि आ’ । A Grammar of the Nepali Language लिखल। एहि परिप्रेक्षमे मैथिलीक व्याकरण-लेखनक इतिहास पर दृष्टिपात कएल जाए। यद्यपि मैथिलीक सान्दर्भिक चर्चा किछु-किछु रूपसँ पहिनहिसँ होइत छल, किन्तु एक स्वतन्त्रा भाषाक रूपमे मैथिलीक पहिल व्याकरण ; (An Introduction To The Maithili Dialect Of The Bihari Language As Spoken In North Bihar) एक विदेशी विद्वान जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सन 1881 ई. मे लिखलनि। हली झा द्वारा मैथिली व्याकरण लिखल जएबाक जे उल्लेख अम्बिकादत्त व्यास कएने छथि, तकर कोनहु पता नहि अछि। मैथिली व्याकरण सम्बन्धी छिट-फुट लेख ‘मिथिलामोद’क किछु आरम्भिक अंकमे भेटैत अछि। पण्डित जीवनाथ रायक लिखल ‘मैथिलीक स्वरूप ओ लेख शैली’ ‘मिथिला मिहिर’ मे प्रकाशित होइत छल10 जे पछाति अखिल भारतीय मैथिली साहित्य परिषद द्वारा पुस्तकाकार भेल। मैथिलीक पहिल व्याकरण टंकनाथ मैथिली व्याख्याता गंगापति सिंह ‘बाल व्याकरण’ लिखि 1922 ई. मे प्रकाशित कएल जकर दोसर संस्करण मैथिली साहित्य परिषद द्वारा 1937 ई. मे भेलैक। एकर बाद हीरालाल झा ‘हेम’ लिखित ‘मैथिली भाषा व्याकरण भास्कर’ लिखल जएबाक उल्लेख भेटैत अछि जकर प्रकाशन 1926 ई. मे श्रीरमेश्वर प्रेस, दरभंगासँ भेल। एहि इतिवृत्तिसँ स्पष्ट अछि जे भारोपीय आर्यभाषाक मागधी अपभ्रंशक प्राच्य समूहक एक प्रमुख भाषा मैथिलीमे साहित्य-सर्जनाक सुदीर्घ परम्पराक पर्याप्त साक्ष्य रहितहु सबसँ पछाति एकर व्याकरण लिखल गेल। तकर कारण की? भाषा प्रयोजन सिद्धिक माध्यम थिक। अतएव, भाषाक महत्त्व एहि बात पर निर्भर अछि जे ओ कतेक प्रक्षेत्रामे समाजक प्रयोजनक सिद्धिक माध्यम अछि। एकर परिमापनक दू टा आधार अछि - कार्यभार ; (Functional load) आ’ कार्य पारदर्शिता, ; (Functional Transparency) अर्थात् कार्यमे अपेक्षित स्पष्ट अभिव्यक्ति-क्षमता। भाषाक कार्यभार कम अछि वा अधिक, तकर निर्धारण एहि बातपर होइछ जे ओ कतेक प्रक्षेत्रामे कार्यशील अछि। उदाहरणार्थ अङरेजीके ँ देखि सकैत छी। ओ प्रायः सभ पैघ सार्वजनिक प्रक्षेत्रा जेना व्यापार, शिक्षा, राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय संवाद, प्रौद्योगिकी, सरकार, कानून आदि मे पसरल अछि। अतएव, मिथिला भाषाक अध्ययन ध्1 मिथिला भाषाक अध्ययन- मिथिला भाषाक अध्ययन एवं डा. ग्रिअर्सनकृत मैथिली व्याकरण डा. रमानन्द झा ‘रमण’अङरेजीक कार्यभार बेसी मानल जाएत। कार्य पारदर्शिता एहि बात पर निर्भर अछि जे भाषाक खास प्रक्षेत्रामे ओकर स्वायत्तता आ’ नियन्त्राण छैक वा नहि। यदि एकभाषा दोसर भाषाक प्रयोगक आरि छंटैत अछि तँ ओहि भाषाक कार्यभार उच्च मानल जाइत छैक। दोसर शब्दमे, भाषा कार्यमे पारदर्शी बूझल जाइत अछि, यदि ओ अत्यधिक नीक जकाँ खास कार्य करैत अछि। जेना, संस्कृत भारतीय सस्ं कृि त एव ं हिन्दुत्वक व्याख्या करबाम े अत्यधिक पारदर्शी रूपे ँ कार्य करतै अछि। मुदा आधुनिकताक कार्यमे पारदर्शी नहि अछि। ओहिना मैथिलीक कतेको प्रक्षेत्रामे हिन्दी सन्हिआ गेल अछि, जाहिसँ मैथिलीक कार्यभार एवं पारदर्शिता - दूनू घटि गेलैक अछि। कमल जाइत अछि। कहि सकैत छी भाषा आ’ कार्यमे स्थिर साहचार्य छैक। पारदर्शिता घटल तँ कार्यभार कमल आ’ प्रक्षेत्राक संख्या बेसी, तँ कार्यभार उच्च। कार्यभार आ’ कार्यपारदर्शिताक दृष्टिसँ मैथिली पर विचार कएल जाए। ई अनेकहु अभिलेखसँ प्रमाणित अछि जे भारोपीय आर्यभाषाक मागधी अपभ्रंशक प्राच्य समूहक भाषामे अन्यतम स्थान प्राप्त मैथिलीमे साहित्य-सर्जनाक सुदीर्घ एवं अविच्छिन्न परम्परा छैक। सिम्रौनगढ़क कर्णाटवंशक सभ राजालोकनि मैथिली भाषाके ँप्रोत्साहन देलनि एवं ओहिठामक राजा रामसिंहदेवक समयक प्राप्त शिलालेखक आधार पर इतिहासज्ञ डा. हरिकान्त लाल दासक11 निष्कर्ष अछि जे कर्णाट शासन कालमे राजकाजक भाषा मैथिली छल। प्रो. दासक इहो निष्कर्ष अछि जे मोरंग, मकवानपुर, विजयपुर, पाल्पा आदि राजालोकनिक समयक अभिलेख, स्याहा मोहर, जमीनक हस्तान्तरण सम्बर्न्धी अिभलेखसँ सेन राजालोकनिक राजकाजक भाषा मैथिली होएब प्रमाणित हाइे छ।12 एहि एेि तहासिक तथ्यस ँ निष्पन्न हाइे छ ज े मैि थलीक पय्र ागे विभिन्न पक्ष््र ात्रे ाम े हाइे त छल।
साहित्य-सर्जना, दैनिक व्यावहारिक जीवन एवं राजकाजक भाषा रहने मैथिली उच्च कार्यभारक भाषा छल। किन्तु, नेपालमे राणाशाही स्थापित भेलाक बादसँ मैथिलीक प्रक्षेत्रा क्रमशः घटैत गेल। मिथिलामे तुर्क, अफगानक आक्रमण एवं आधिपत्यक बाद जखन मुगल बादशाहसँ खंडबला कुलके ँ मिथिलाक राज प्राप्त भेलनि तँ जैतुकमे अरबी, फारसी एवं उर्दू सेहो अएलैक। संगहि, लोकनि×ाा सभ सेहो मैथिली भाषीक्षेत्रामे बसय लागल। एहिसँ मैथिलीक प्रक्षेत्रापर संघातिक आघात भेलैक। मैथिलीक प्रयोगक प्रक्षेत्रा घोंकचए लागल। मैथिली भाषीक घनत्व तरल होइत गेल। कोलब्रूकक अभिमतसँ स्पष्टे अछि जे साहित्य-सर्जनाक क्षेत्रामे सक्रियता ठमकल छल। परिणामतः मैथिलीक प्रक्षेत्रा दैनिक जीवन आ’ मनोरंजक साहित्यक सर्जना धरि सीमित रहल।
अतएव, जखन ईस्ट इन्डिया कम्पनीक हाथमे तिरहुतक शासन-सूत्रा अएलैक, तँ कम्पनी सरकारक लेल मैथिली कोनो समस्या नहि बनल। तखन समाधानक चिन्ता ओ किएक करैत? जेना आन कतेको भारतीय भाषाक पढ़ौनीक व्यवस्था अपन कर्मचारी-अधिकारी वा सेना-सिपाही लेल ओ कएलक, से मैथिलीक लेल किएक करैत? लार्ड मेकाले (1835 ई.) प्रायः एहनहि स्थितिमे रिपोर्ट कएने छल होएताह जे जाहि भाषासँ (अरबी, फारसी एवं संस्कृतक सन्दर्भमे लिखल) ने हमर प्रशासनके ँकोनो लाभ छैक आ’ ने ओहि भाषाके ँ केओ बिना सरकारी पाइक पढ़ेबाक लेल तैआर छथि, ताहि भाषापर किएक खर्च कएल जाए?13
भारतक प्रथम स्वाधीनता संग्रामक असफलताक उपरान्त 1857 ई. मे भारतक शासन-सूत्र ईस्ट इंडिया कम्पनीक हाथसँ ब्रिटिश साम्राज्ञीक हाथमे आएल तँ ओ अपन उपनिवेशक लोक सभसँ सामीप्य स्थापित करबाक हेतु क्षेत्रा विशेषक भाषाक अध्ययन एवं विकासक प्रसंग नीतिगत निर्णय कएलनि। भारत सहित ब्रिटिशक विभिन्न उपनिवेशक भाषाक शिक्षणक व्यवस्था भेल। व्याकरण लिखाएल। शब्द एवं लोक-साहित्यक संग्रह आरम्भ भेल। अध्ययन तथा प्रकाशन होअए लागल तथा अधिकारी सभके ँ स्थानीय भाषामे प्रवीणता प्राप्त करबाक हेतु ओहिना प्रोत्साहित कएल गेलनि14, जेना भारत सरकार सम्प्रति अपन कर्मचारी-अधिकारीके ँ हिन्दीक कार्यसाधक ज्ञान अर्जित करेबाक लेल प्रोत्साहित करैत अछि। जाहि भाषाक कार्यभार बेसी छलैक, ओहि भाषामे काज पहिने आरम्भ भेल। मैथिलीक कार्यभार अल्पतम छल। ध्यान पछाति गेलैक। जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सन मैथिलीके ँ भारोपीय आर्यभाषाक मागधी अपभ्रंशक प्राच्य समूहक एक भाषा मानैत छथि। हिनक प्राच्य समूहमे 1. ओड़िआ, 2. बिहारी (मैथिली, मगही एवं भोजपुरी), 3. बंगला, आ’ 4. असमिआ अछि। हॉर्नले उपयुक्त नामकरणक अभावमे संस्कृतसँ सवं द्ध भाषाक े सँ ुविधाक हते ु गाैि डअन 15 कहलनि। सम्भव थिक हानॅ र्ल के मागर्क अनुसरण करतै उपयुक्त नामकरणक अभावमे ग्रिअर्सन सेहो बिहारक भाषा मैथिली, मगही एवं भोजपुरीक लेल
‘बिहारी’ नामकरण कए देने होथि। ओना ओहिसँ पहिने राममोहन राय बंगलामे बंगलाक पूर्ण व्याकरण ‘गौड़ीय व्याकरण’ 1833 ई.मे लिखने छलाह। ग्रिअर्सनक ई वर्गीकरण, विशेषतः बिहारक भाषा मैथिली, मगही एवं भोजपुरीक लेल ‘बिहारी’ नामकरण, पर्याप्त विवादक कारण भेल अछि। ओना साम्प्रतिक राजनीतिक परिदृश्यमे जँ एकर विवेचन करी तँ कहि सकैत छी जे ‘बिहारी अस्मिता’क पहिल उद्भावक जॉर्ज अब्राहम ग्रिअर्सन भेलाह।
मैथिलीक औपभाषिक विभाजन सेहो विवादक कारण भेल अछि। जार्ज ग्रिअर्सन र्मैिथलीक औपभाषिक विभाजन छओ भागमे कएने छथि -1. मानक मैथिली, 2. दक्षिणी मानक मैथिली, 3. पूर्बी मैथिली वा गॅंवारी, 4. छिकाछिकी बोली, 5. पश्चिमी मैथिली एवं 6. जोलहा बोली। पण्डित गोविन्द झा16 वर्गीकरणक तीन आधार मानल अछि- 1. क्षेत्रा, 2. सामाजिक वा शैक्षणिक स्तर तथा 3. जाति। क्षेत्राक अनुसार ओ 1. पूर्वी( नव क्षेत्राीय नामकरण अंगिका, ग्रिअर्सन - छिकाछिकी एवं गँवारी), 2. दक्षिणी, पश्चिर्मी (नव क्षेत्राीय नामकरण बज्जिका, ग्रिअर्सन - पश्चिमी मैथिली), 4. उत्तरी वा नेपाल तथा 5. केन्द्रीय। एहि विभाजनक आधार अछि मैथिलीक भाषायिक चौहद्दी। पूर्बमे बंगला, पश्चिममे भोजपुरी, दक्षिणमे मगही आ’ उत्तरमे नेपाली। अभिसरण ; (Convergence) सिद्धान्तक अनुसार सम्पर्कसँ भाषा प्रभावित होइत छैक। एहि हेतु केन्द्रीय मैथिलीके ँछोड़ि चारू कातक मैथिली अपन समीपस्थ भाषा सभसँ प्रभावित भेल आ’ जे अप्रभावित रहल मानक मैथिली कहल गेल अछि। भाषा वैज्ञानिक तथ्यक आधार पर एहि तथ्यके ँ फरिछबैत डा. रामावतार यादव17 बिहारमे मधुबनी तथा नेपालमे राजबिराजमे बाजल जाइत मैथिलीके ँमानक मैथिली कहल अछि।
सामाजिक स्तरक अनुसार सभ क्षेत्रामे मैथिलीक दू स्वरूप गोविन्द झा मानैत छथि - शिक्षित एवं सुसंस्कृत उच्चवर्गक आ’ दोसर समाजक अशिक्षित एवं निम्नस्तरक लोकक भाषिका। शिक्षित वर्गक अभिरुचि मैथिलीक मानक स्वरूपक दिशि होइत छनि एवं परिष्कृत भाषा बजबामे ओ गौरवक अनुभव करैत छथि। अशिक्षित वा नीचला स्तरक लोकक भाषिकामे स्थानीय एवं जातीय विशेषता विशेष सुरक्षित रहैत अछि। जातिक अनुसार मैथिलीक तीन स्वरूप पण्डित मिथिला भाषाक अध्ययन ध्3 मिथिला भाषाक अध्ययन 4गोविन्द झा मानल अछि - 1. विद्याजीवीक भाषिका, 2. कृषिजीवी जातिक भाषिका तथा 3. व्यवसाय जीवीक भाषिका। कोन परिस्थितिमे विभिन्न भाषा-भाषी एवं सांस्कृतिक समुदायक लोकक स्थायी निवास मिथिला बनैत गेल तकर चर्च ऊपर कएलहुँ अछि। मिथिलाक प्रशासनिक क्षेत्रामे ओहि वर्गक वर्चस्व, सेहो घटैत-बढ़ैत रहल। भारतक कतेको प्रान्तमे भाषाक प्रयोगजन्य जे समरूपता देखैत छी एवं प्रयोगजन्य समरूपताक कारणे ँभाषाक नामपर जे एकजुटता अनुभव होइत अछि, तकर घोर अभाव मिथिलामे उक्त कारण सभसँ छल एवं अद्यावधि अछि। एहन कोनो केन्द्रीय राजनीतिक शक्ति वा सामाजिक संगठन नहि छलैक जे मैथिलीक प्रचार-प्रसार वा मैथिलीक पठन-पाठनक मार्गमे अबैत अवरोधक तत्त्वक निराकरण कए, सर्वव्यापी प्रभावकारी निर्णय लए सकैत छल।
मैथिलीक औपभाषिक विभाजन सर्वग्राह्य तँ नहिएं भेलैक, अपितु किछु अंश धरि दूरत्वक ओ कारण सेहो भए गेल। एहि दूरत्वके ँबढ़ेबामे बिहार विभाजनक अगुआ एवं पटना विश्वविद्यालयक पूर्व उपकुलपति डा. सच्चिदानन्द सिंहा सन लोकक मैथिली भाषा-संस्कृति विरोधी मानसिकता सहायक भेलैक। पटना विश्वविद्यालयक पाठ्यक्रममे मैथिलीक स्वीकृतिक प्रस्तावक समय ओ बाबू भोलालाल दासके ँकहने छलथिन्ह -‘बंगालसँ बिहारके ँअलग कएल हम अपना सभक निमित्त, अहाँलोकनिक लेल नहि। मैथिलीके ँस्वीकृत कएने मिथिला जीबि उठत। मिथिला जीबि उठत तँ हमरालोकनिके ँयू. पी. चल जाए पड़त। ते ँजावत हम जीअब मैथिलीके ँस्वीकृत नहि होअए देब।’18 जखन मैथिलीक अध्ययन-अध्यापने नहि, तखन व्याकरण कोना लिखाइत? प्रयोजनक दृष्टिसँ व्याकरणक दू कोटि अछि19 - पारम्परिक एवं शिक्षा शास्त्राीय व्याकरण; (Traditional and Pedagogical Grammar)A। पारम्परिक व्याकरणक आधार साहित्य होइत अछि। ओ पोथी तथा अन्य उपलब्ध साहित्यक आधार पर भाषाक संरचनात्मक परिचय करबैत अछि। ओ इहो सुझबैत अछि जे कोना लिखी आ’ कोना नहि लिखी। कोना बाजी आ’ कोना नहि बाजी। तदनुसार, ई अनुशासनात्मक व्याकरण ; (Prescriptive) सेहो कहबैत अछि।
पारम्परिक व्याकरण वर्तमान एवं भविष्य - दूनूक लेल मार्ग-दर्शक होइत अछि।
एकर विपरीत, शिक्षा शास्त्राीय व्याकरण मानक भाषिका एवं लिखित समकालीन भाषाक संरचनात्मक स्वरूपक परिचय करबैत अछि। मानक भाषा लिखब आ’ बाजबमे व्याकरणक कोन नियमक कखन प्रयोजन होइत छैक आ’ तकर अनुसरण कोना कएल जाए, शिक्षा शास्त्राीय व्याकरण सीखबैत अछि। कहि सकैत छी जे भाषा विशेषक लोकक बीच उक्त समूहक भाषा कोना बाजल जाए, जाहिसँ वक्ताक अभिप्रायक सम्प्रेषण वाधित नहि रहए, वक्ता की कहैत छथि, से उक्त भाषा समूहक लोक बूझि जाथि। एकरा सम्वाद-भाषा सेहो कहि सकैत छी। पारम्परिक व्याकरणक नियम बेसी कठोर होइत अछि किन्तु शिक्षा शास्त्राीय व्याकरण वा सम्वाद-भाषाक व्याकरणमे तारता होइत छैक। ओ भाषाक विभिन्न स्वरूपक प्रयोग सफल सम्वाद-स्थापन लेल करैत अछि। ठाम-ठाम जँ व्याकरणिक नियम भंगो होइत रहैछ तँ ओहि पर ध्यान नहि दैत अछि।
भाषाक परिचयमे शिक्षा शास्त्राीय व्याकरण पाँच स्तर पर सहायक होइत अछि -

Suggested citation: डॉ रमानन्द झा "रमण". “मिथिला भाषाक अध्ययन आ डॉ. ग्रिअर्सन कृत मैथिली व्याकरण.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 86, 2011-07-15. https://www.videha.co.in/research/2011/86/मिथिला-भाषाक-अध्ययन-आ-डॉ-ग्रिअर्सन-कृत-मैथिली-व्याकरण.htm

मूल विदेह अंक / Original issue