मैथिल नारि केर समस्याक समाधान तकै कालमे ई दूनू महत्वपूर्ण काज संगहि-संग कोना होमय, मैथिलक सनातनी सभ्यता, संस्कृतिक आ विश्वासक रक्षा आ आधुनिक उपयोगी मूल्यक समावेश। विधवा-विवाहक लेल मानसिक परिवर्तन जरूरी छैक, खास कऽ कऽ आइ-काल्हि जखन की परिवार छोट भऽ रहल छैक, जीवन-यात्रामे पाइक अहम महत्व छैक आ पाइ-कौड़ी एकत्रित करैमे भतेरो दिक्कतक सामना छैक, नीक आ सुखमय जीवन जीअएमे मानवीय मूल्यक प्रति लोकक श्रद्धा कम भऽ रहल छैक, भाइ-बहीन, चचा-चाची आ एतए तक कि माय-बाबूसँ आत्मीय संबंध सेहो घटि रहल छैक, लोकमे भगवानक प्रति विश्वास आ डर कम भऽ रहल छैक, सनातनी सभ्यता, संस्कृतिक आ विश्वासक रक्षा लोकक द्वितीयक लक्ष्य छैक आ विलासी-सुखमय जीवन जीनाइ प्राथमिक लक्ष्य भऽ गेलैकहेँ...तखन तँ पहाड़ सन जिनगी लऽ कऽ बाल-विधवा बेचारीक जीनाइ बड्ड मुश्किल छैक। संयुक्त पलिवार तेँ आब छैक नै, बड़का बेटा कलकत्ता, छोटका चेन्नै आ मझिला बनारसमे अपन अपन बाल-बच्चा केँ लऽ कऽ एकटा वा दू टा कोठलीक घरमे कोहुना कऽ रहैत छथि। बाल-विधवा बेचारी जँ सासुरमे रह्ती तैयो वा नैहरमे रहती तैयो पलिवारमे लोकक कमी छैक। जे संजुक्त पलिवार काल्हि तक अपन दुखिता धीया-पूताकेँ मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक, आर्थिक आ मनोरंजनात्मक बल दैत रहैक ओ आब अपनहि अस्तित्वक अंतिम साँस लऽ रहल छैक। तखन एकटा बाल-विधवा बेचारी अस्करे भूत जकाँ गाममे कोना रहतीह। एक तँ मानसिक असकरू आपनक स्थिती आ दोसर जे जँ हुनका देहमे कनिओटा सुखायल यौवन-रस बचल छैक तँ बड़का-बड़का ठोप वाला भुखायल गिद्ध सभ हुनकापर लक्क लगोने रहैत छथि। स्त्रित्व तँ आब अपनो घरमे असुरक्षित छैक तँ सर-संबंधिक गप्पे छोड़ू। तेँ विधवा-विवाह आइ बेसी प्रासांगिक छैक। मुदा प्रश्न छैक जे आब सनातनी मैथिलक सभ्यता, संस्कृतिक आ विश्वासक रक्षा कोना हेतैक। मैथिल समाजमे नारीक जे जगह छैक ओइमे परिवर्तनसँ मैथिल समाज कोना समावेश करतैक। कियो ककरो ’हाफ-ब्रदर’(अर्ध-भाइ) होएतैक, कियो ’हाफ-सिस्टर’ (आधा-बहीन), कियो ककरो पहिलका दिअर-भौज हैतैक तँ कियो ककरो पहिलका ननद-ननदोइस। एखन तक मैथिल समाजमे ऐ सभ संबंध केर की रूप हैतैक आ हिनका बीच केहेन हेम-क्षेम रहतैक से स्पष्ट नै छैक। ऐ संबंध निर्धारण केर आवश्यकता एतए सेहो बुझना जाइत छैक। पुनः आइ जे मैथिल समाज ई विश्वासक दावा करैत छैक जे पति-पत्नीक सम्बन्ध जन्म-जन्मान्तरक, सीता-सावित्रीक उपाख्यान केर समजोर नय, मैथिलक घर-घरमे पुजिता गौरीक आदर्श-वाक्य वर होइहो तँ शंभू नै तँ रहों कुमारी, तकरो विकल्पमे तार्किक आदर्श-विचारक स्थापना करए पड़तैक। तखन मैथिल समाजक समक्ष अपन पुरातनी सभ्यता-संस्कृतिसँ विलगावक प्रश्न सेहो ठाढ़ भऽ सकैत छैक। हमरा बुझनासँ मैथिल समाज लग एकटा आओर रस्ता छैक जे अपन बाल-बच्चाक वियाह बचपनमे नै करी, ओकरा पढ़ा-लिखा कऽ बेसीसँ बेसी समय दिऐक। व्यस्क भेला उत्तर वियाहसँ जतए हुनका अपन शैक्षिक आ आर्थिक स्वावलम्बनक अवसर भेटतैक ओतै अपन मनोनुकूल वियाह करै मे सेहो मददि भेटतैक। व्यस्क वियाहसँ बाल-विधवा सनक दारूण समस्यासँ मैथिल समाजकेँ नै गुजरे पड़तैक किएक तँ व्यस्क विधवाक समस्यासँ ई बेशी कष्टप्रद छैक। विधवा-वियाह तेँ एखनो कमो-बेस सभ समाजमे होइतै छै, मैथिल समाज ऐ सँ अछूत नै छैक। मुदा ई वियाह एकटा "good marriage" (आदर्श विवाह) केर रूपमे नैय भऽ कऽ एकटा "bad marriage" (खराप विवाह) केर रूपमे होइत छैक। ऐपर बेसी हंगामा नै करियौक। जे होइत छैक से होमए दियौक। आब केवल ई तय करियौक जे आधुनिक जीवन आ सनातनी जीवनकेँ देश, काल, पात्रक अनुकूल कोना जीअल जाय।
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रवि भूषण पाठक