विमलक गजल आ सुजितक कथा
साहित्यकार डा. राजेन्द्र विमलक मैथिली गजल संग्रह सूर्यास्तस“ पहिने भादव १० गते शनिदिन राजधानी काठमाण्डूमे आयोजित एक कार्यक्रममे विमोचित भेल । राष्ट्रकवि माधव घिमिरे गजल संग्रह विमोचन कएने रहथि । विमलके सिद्धहस्त साहित्यकार कहैत ओ हुनक लेखनीक प्रशंसा कएने रहथि । विमलक एहि नव कृतिमे एक सयटा गजल संग्रह कएल गेल अछि ।
संगीत तथा नाट्य प्रज्ञाप्रतिष्ठानक प्राज्ञ रमेशरञ्जन झा, प्राज्ञ बुद्धि राना, रोचक घिमिरे, प्रहलाद पोखरेल, प्रा. परमेश्वर कापडी, धीरेन्द्र प्रेमषि सहितके साहित्यकार विमलक कृति सम्बन्धमे मन्तव्य व्यक्त कएने रहथि । गजल संग्रहक प्रकाशक पृथु प्रकाशन जनकपुधाम अछि । विमल २०६६ सालक जगदम्बाश्री पुरस्कारसं सम्मानित भेल छथि ।
दोसर दिस सञ्चारकर्मी सुजित कुमार झाक कथा संग्रह चिडै भादव १३ गते जनकपुरमे आयोजित एक कार्यक्रममे विमोचित भेल । ७८
पृष्ठको कथा संग्रहमे ११ टा कथा समेटल गेल अछि । साहित्यकार रोशन जनकपुरी, अबधेश पोखरेल, श्यामसुन्दर शशि, अशोक दत्त, सहितके व्यक्ति कथा संग्रहके प्रशंसा कएने रहथि । रामानन्द युवा क्लब मैथिली भाषामे एहिसं पहिने सेहो विभिन्न पोथी प्रकाशन क चुकल अछि ।
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१. जगदीश प्रसाद मण्डलक चारि गोट विहनि कथ २.
बेचन ठाकुरक दू टा विहनि कथा
१
जगदीश प्रसाद मण्डलक
चारि गोट
विहनि कथा-
शिवजीक डाक-बाक्
चौदहो भुवन भ्रमणमे काग-भुशुंडी बौराएल रहथि कि तइ बीच शिवजीक संग गुरूओजी पहुँचलथि। सज्जा सजल शव जकाँ काग-भुशुंडी, ने गुरूएजी आ ने शिवजीए दिस तकलनि। मणिक जोहमे अपने समुद्रमे डूबकी लगबैत। दलदल पानि सदृश्य गुरूजी, तॅँए कोनो आनि-पीड़ा नै भेलनि। मुदा पाछु पिछड़ैत काग-भुशंुडीकेँ देख शिवजीक क्रोध सीमा तोड़ि बहरा गेलनि। जहिना हुकड़ैत ढेनुआर गाए चुकड़ैत बच्चाकेँ देख मलकार (पोसिनिहार) जँ नै दुहै तँ कि गाए कोकणि नै जाएत। के दोखी? शिवजीक बाक-डाक नै। काग-भुशुंडीक लेल धैन-सन। चाँकि नै देख काग-भुशुंडीकेँ शिवजी कहलखिन- “जा रे अभगला, अजेगरोक कान कटलह।”
सोग
आने दिन जकाँ तड़गरे प्रोफेसर लीलाधरक नीक टुटलनि। जना आन दिन नीन टुटिते ओछाइन छोड़ि टहलए विदा भऽ जाइ छलाह से आइ नै भेलनि। ओछाइन छोड़ैसँ पहिने मनमे उठि गेलनि एक्कैसम मार्च। पचास बर्ख पूरि एकावनममे प्रवेश कऽ रहल छी। प्रश्न उठलनि जिनगीक पचास बर्ख। जँ सइये बर्खक अधार बनबै छी तैयो अधा टपि गेलौं। मुदा से केना हएत? जिनगी तँ विभाजित अछि। तँए एकक बाद दोसरमे प्रवेश आ पैछलाक नीक-अधलाक समीक्षा। मुदा हिसाबे उकड़ूमे पड़ि गेल अछि। सए बर्ख जीबे करब तेकर कोनो गारंटी अछि..। तखन अधा केना मानब। लगले नजरि नोकरी दिस बढ़लनि। जइ दिन नोकरी शुरू केने रही तइ दिन बतीस बर्खक जोड़ने रही। गुन भेल जे तीन बर्ख बढ़ि गेल। पेइतीस बर्खक नोकरी भऽ गेल जइमे पच्चीस बर्ख पूरि गेल अछि। दसे बर्खक बचल अछि। अहू पच्चीस बर्खमे आठ बर्ख ओझे-गुनी खेलक सत्तरह बर्खक नोकरीकेँ नोकरी बुझलौं, जखन कओलेज सरकारी भेल। एकाएक बीस गुना जिनगीमे उछाल आएल। साठि हजारक नोकरी कोनो मामूली छी, जइठाम अखनो कते पेटेपर खटैए। मुदा जहिना तीआरि जालक ओझरी जे छोड़बै दुआरे लोक पूँजिओ गमा फेकिये दैत अछि। मुदा से तँ लीलाधरकेँ नै भऽ पाइब रहलनिए। जत्ते छोड़बए चाहथि तते अमती काँट जकाँ धोतीमे ओझराइते जाइत छलनि।
तखने पत्नी ओछाइन छोड़ि, कपड़ासँ पौछैत मुँह, एेनामे देख, कटोरिया धोंधि नेने फुदकैत विजयक खुशीसँ मुस्की दैत लीलाधरक ओछाइन लग पहुँच मुँह दिस तकलनि।
टक-टक आँखि तकैत लीलाधर पत्नीकेँ नै देखलनि। मनुष्य कि चिड़ै आकि कौछ छी जे अंडा दऽ पड़ा जाए। पड़ाएल कि पड़ाओल गेल एे प्रश्नमे लीलाधर ओझराएल।
टकटकी देख पत्नी डरि गेलीह। मुदा तैयो अपन अर्ज निमाहैत बजली- “कथीक सोग...?”
प्रो. लीलाधर- “किछु ने?”
जिनगीक सोग। मरैइयो बेर तक पत्नी सिरे चढ़ि खेती, काल्हि धरि केलौं? यएह ने जे तते हित-अपेछित बना लेलौं जे सालक दस प्रतिशत कमाइ भोज-भातमे चलि जाइए। तइपर अपनो सभ दिन अनके खेबै, से केहेन हएत। मुदा सभ दिन जँ भोजे खेबै तँ विद्यापति हिसाव (अधा जनम हम नीन गमाओल)केँ कि करब। ने किछुओ पाइ जमा कऽ राखि सकलौं आ जेहो केलौं ओ दस बर्ख बादे भेटत। कि तीनू बच्चाक आगूक शिक्षा दऽ पाएब।
पनचैती
परसूसँ सौंसे गाम यएह चरचा जे ई पनचैती केना हएत। एक दिस सोनेलाल बाबा आ दाेसर दिस विधायक जीक प्रतिनिधि। तहूमे खासे मसियौत सेहो छियनि।
विधायकजी भिन्ने गजुआइत जे एक जाइतिक वोट प्रभावित हएत। मुदा अपनो आदमी तँ किछु नै कहत सेहो बात तँ नै। नीक हएत अस्पताल धऽ ली। भेँट करए सभ एबे करत, ओतइ सँ फरिया देब।
सोनेलाल बाबाक दियाद-वाद, जाति-समाज इन्दिरा अावासक भाँजमे। तँए या तँ गबदी मािर देत या तँ सोझा एबे ने करत। पुतोहूक दुआरे बेटोसँ मिलान नहिये जकाँ। मुदा बिना फड़िओने तँ टूटल गाड़ीक पहिया जकाँ गेबे करत। ‘काँकोड़-रोटी।’
चेहरासँ सोनेलाल बाबा अस्सी बर्खक बुझि पड़ै छथि मुदा छथि छियासठिये बर्खक। जरल मनमे आगि उठलनि। तीन साल पहिने इन्दिरा आवास वएह प्रतिनिधि विधायक जीक सोझमे गछलखिन। सोनेलाल बाबा तही दिनसँ बौआइ छथि। मुदा अखन धरि नै भेटलनि। बेचाराक मनक धधड़ा ओइ दिन भभकि उठल जइ दिन सोनेलाल बाबा पुछलखिन- “नेताजी, दौगैत-दौगैत टाँग टुटि गेल। आबो कहू?”
प्रतिनिधि- “आइक युगमे बिना खुऔने-पीऔने काज चलै छै?”
सोनेलाल बाबा- “ई बात ओइ दिन किअए ने कहलौं जइ दिन हमरो हाथमे भोट छल।”
“अखन एते छुट्टी नइए, दोसर दिन बात करब।”
पगलाएल सोनेलाल बाबा कि केलनि से अपनो नै बुझलखिन।
कचोट
आजादीक चौसठिम वर्षगाँठ मनबए खुशीक समुद्रमे आबाल-वृद्ध डूबल। चौदह अगस्तक निसभेर राति। अचानक पत्नीक छातीमे टनक उठलनि। दू बजैत। बारहे बजे रातिसँ जहाँ-तहाँ रबासि-फटाका फुटैत। अधिक धिया-पुता भेने बेसीकाल घरवाली खन-खनाएले रहै छथि। अपनो अभ्यस्त भऽ गेल छी। जइसँ ने डाॅक्टर ओइठाम जाइमे अबूह लगैए आ ने लसुन-तेला बना मािलस करैमे। घरक अनिवार्य खर्चमे दवाइयो-दारू आबि गेल अछि। तँए कखनो मनमे चिन्ता-फिकिर नहिये जकाँ रहैए।
एक तँ सौन-भादबक अन्हार, तइपर मेघडम्बर जकाँ मेघौन। एत्ती रातिमे की करब? ने गाममे डाक्टर छथि जे लालटेनो हाथे बजा अनबनि, थाल-खिचारक रस्ता, चारि किलोमीटरपर डाॅक्टरक घर। जहिना कोनो फनिगा मकड़जालमे फँसि छटपटाइत तहिना मन छटपटाए लगल। मन पड़ल दुनू प्राणीक जिनगी। समाजमे अपना सन कते जोड़ा अछि जे दोहरा कऽ सिनूर भरने हएत। जीता-जिनगी विश्वासघाती नै बनब। जे बनि पड़त तइमे पाछू नै हटब। उत्साह जगल।
घरक जते टँगर रही सेवामे जुटि गेलौं। कियो तेलक मालिस तँ कियो सुखले ऐँठुआ ससार करए लगलनि। अपने रिक्सा भजियबए विदा भेलौं। मझिली बेटी माएक आंगुर फोड़ि-फोड़ि रोग जाँचए लगलि। जहिना थर्मामीटर लगा डाॅक्टर बोखारक जाँच करैत तहिना ने मलकारो मालक पाउज गनि रोगक जाँच करैए।
तीन बजे भोरमे रिक्सा नेने पहुँचलौं। माएकेँ उठा बेटा-बेटी रिक्सापर चढ़ौलक। जेठका बेटाकेँ संग केने डॉक्टर ओइठाम विदा होइत तेसर बेटाकेँ कहलिऐ- “बौआ दिनेश, माल-जालक तकतान करब।”
गामेक मिड्ल स्कूलक पाँचमा क्लाशमे पढ़ैत दिनेश। फस्ट करैए। शिक्षककेँ जहिना गुरूक आदर करैए तहिना अपनो दुनू बेकतीक लेल श्रवणे-कुमार छी।
साढ़े एगारह बजे घुमि कऽ एलौं। एक तँ रौद तइपर कठगुमारी। पियासे मन तबधल। दरबज्जापर रिक्सा देखिते देनेश लोटामे पानि नेने पहुँचल। लोटाक पानि देख हृदए उमड़ि गेल। अनायास मुँहसँ निकलल- “बौआ, इस्कूल...।”
अखन धरि दिनेश बिसरि गेल छल पनरह अगस्त, स्वतंत्रता दिवस। बिसरि गेल छल झंडाक संग मिल चलब, बिसरि गेल छल नव वर्षक उपहार।
दिनेश बाजल- “नै। केना जेतौं।”
मनमे असहनीय कचोट भेल। मुदा बात बहलबैत बजलौं- “बौआ, एहेन फेड़ा जिनगीमे कहियो ने भेल छल। मुदा सभ शुभ-शुभ सम्पन्न भेल।”
२
बेचन ठाकुर
विहनि कथा-
चल आइये
आश्चर्यचकित भऽ राम बाजल- “रहीम भाय, एक्को महीना मुंबइ एना नै भेल आकि फेर गाम जाइ छेँ। की कारण छै?”
रहीम हँसि कऽ बजला- “राम भाय, नाझलुहु। गाममे एलेक्शन हइ न। जोगी मुखिया गामपर खूद आबि कहि गेल ह, बाहरबलाकेँ भोँट खसाबै लऽ गाम एबाक लेल अबै-जाइक भाड़ा आ दारू फ्री।”
कनीकाल गुम्म भऽ आ किछु सोचि कऽ राम बाजल- “भाय, हमरा मुंबइ एना एक सप्ताह भेल। ई बात हमरा नै बुझल छल। जौं ई बात छै तँ चलह आइये।”
डाक डकोबलि
मुस्की दैत मुखियाजी- “की हौ फेकन भैया। काल्हि नोमिनेशनमे चलैक छै।”
ऐपर खीसिया कऽ फेकन बाजल- “कोन सपेत-के यौ?”
आश्चर्यमे पड़ि मुखियाजी बाजला- “बिसरि गेलहक। काल्हि साँझमे जे पोलीथिन लेल दूटा नमरी देने रहियह।”
ऐपर मुस्का कऽ फेकन जबाक देलक- “से तँ मने अछि मुदा लुटनबाबूकेँ कोना बिसरि जेबै जे आइ भोरे भोर नोमीनेशनमे जाइ लेल आ खाइ-पीये लेल पाँच सए टाका अपने दऽ गेला। हुनकामे मार्शलक व्यवस्था सेहो छै।”
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
दुर्गानन्द मण्डल