श्रोत्रिय समाजमे रक्तबीजक जन्म
[एहि लेख केर लेखक बिपिन कुमार झा (Senior Research Fellow), IIT मुम्बई मे संगणकीय भाषाविज्ञान (संस्कृत) क्षेत्र मे शोध (Ph. D.) कऽ रहल छथि। ई लेख हिनक वैयक्तिक विचार छन्हि जाहि पर टिप्पणी सादर आमेन्त्रित अछि- kumarvipin.jha@gmail.com ]
श्रोत्रिय समाज कर्तव्यपरायणता, शुचिता आदि केर कारण विशेषरूप स मिथिला में सर्वथा आदरणीय एवं सिरमौर रहल अछि। किछु घर सँऽ प्रारंभ ई समाज यद्यपि आइयो उँगरी पर गिनल परिबार केर समूह अछि किन्तु ई समाज आनुपातिक दृष्टि स जतेक भारतीय ज्ञानपरम्परा के उत्कर्ष में योगदान देलक ओ अनुपमे अछि। संगहि ई समाज व्यावहारिक रूप सँ अपन शुचिता कायमे रखलक।
काल सभ स पैघ होइत अछि। समाज केर निर्माण आ नाश दूनू ओहि समाजक सदस्ये द्वारा होइत छैक। जे समाज अखनहु आधुनिक आ वैश्विक धरातल सँऽ आ स्वयं के वैश्विक गतिविधि सँ समाजक उत्थान कय राष्ट्र केर उत्थान केर दिशा में अग्रसर रहल अछि ओतहि किछु अनचिनहार कारणवश ओ समाज अपन अस्तित्व मेटेबाक हेतु कटिबद्ध जकां बुझना जाइत अछि।
हमेर एहि लेखन केर औचित्य ई अछि जे समाज के कोना बचायल जाय एहि पर लोकक ध्यानाकर्षित करब। ई एहेन समाज अछि जतय अखनहु बहुत रास कुरीति अन्य समाज सँ उधारी नहि लेल गेल अछि। मुदा समेसामेयिक परिप्रेक्ष्य में आनुपातिक दृष्टि सँऽ पारिवारिक विखण्डन आ अशान्ति एहि समाज में रक्तबीज तुल्य प्रसरित अछि!!
कियाक??? कदाचित ई प्रश्न बुजुर्ग आ युवावर्ग दुनू कें कटूक्ति लगतन्हि मुदा समाजक उत्कर्ष हेतु दुनू के ध्यान देनाई आत्यावश्यक छन्हि। विवाह केर प्राचीन स्वरूप सामान्य रूप स 'पूर्वनियोजित ' छल कालान्तर में ई दूटा भय गेल 'पूर्वनियोजित' आ 'स्वैच्छिक’। समेस्या वाइरस जका दुनू में प्रवेश कय गेल अछि। कारण अछि मेहत्त्वाकांक्षा, संवादहीनता, संवेदनहीनता आ नैतिकता केर पतन आदि।
१. स्वेच्छाचारिता-
ई कोनो युवा/युवती द्वारा कियाक कयल जाइत अछि ई प्रश्न कठिन मुदा उत्तर सरल अछि- मेहत्त्वाकांक्षा, सामाजिकचेतना केर अभाव, संवेदनहीनता, आत्मेसुखक वरीयता, नैतिकता केर ह्रास।
स्वेच्छाचारिता उचित अथवा अनुचित?
जाहि समाज रूपी वृक्ष के हमेर पूर्वज संस्कार रूपी जल स अभिसिंचित कयलथि ओकरा अक्षुण्ण रखबाक हेतु ई अवश्य घातक अछि। मुदा जे व्यक्ति एहि तथाकथित संकुचित विचार सं ऊपर उठि चुकल छथि हुनका हेतु उचित। कियाक त ओहि सर्वोच्च स्तर पर नहि त कोनो विवाह रूपी संस्था के आवश्यकता छैक न देश काल पात्र के बन्धन।
समेस्या कतय अछि?
समेस्या अछि वैचारिक संकरता में। कोनो एक पक्ष स्वीकार करबाक चाही। सुर्सुर-मुरमुर दुनू त उचित नहि। यदि हमे एतेक तथाकथित सभ्य आ शिक्षित भय गेलहुं कि समाजक संस्कार संकीर्ण लगैत अछि त पूर्णतः पाश्चात्य विचार केर अनुगमेन करब उचित।
एतय हमे बुजुर्ग के पूछय चाहैत छियन्हि जे सामान्यतया स्त्री के सन्दर्भ में अपन सामाजिक विवशता के दुहाई आ पुरुष के विषय में उदारवादी प्रवृत्ति कियाक?? एकदीस सोलहमे सदी दोसर दीस बाइसमे सदी कियाक?
२. पूर्वनियोजित विवाह-
सामान्यतया एहेन देखल जा रहल अछि जे पूर्वनियोजित विवाह पर सेहो प्रश्नचिह्न लागि जाइत अछि जेकर परिणति होइत अछि विच्छेद, विच्छेदक स्थिति अथवा आजन्मे केर लेल पश्चात्ताप आ समाज सँ शिकायत।
कारण-
बुजुर्ग द्वारा अपन सन्तान के व्यावहारिकतया नैतिकता ओकर पसन्द नापसन्द के प्रति अनवधानता।, वाल्यावस्था स बच्चा के समाज स दूर राखब।, नैतिकता केर व्यावहारिक प्रयोग नहिं होयब।, मेहत्त्वाकांक्षा आ वस्तुस्थिति में असामंजस्य होयब।, अनावश्यक प्रदर्शन अर्थात् बाह्याडम्बर।, अपन सामाजिक स्थिति के भावी दम्पति पर प्रक्षेपण।, समाज स दूर रहब फलतः समाजक मेहत्व के नहि बुझब अस्तु शारीरिक/आर्थिक/मेहत्वाकांक्षीय कारक के मेहत्व देब।, अपन पक्ष में रखबा में संकोच।, अपन अन्तर्मेनक अपेक्षा तथाकथित सभ्य समाजक गप्प सुनब।, दम्पतिक आपसी सम्बन्ध में अन्य/परिवारक हस्तक्षेप करब।, संवेदनशून्यता केर परिचय।
ई लेख यद्यपि कोनो परिवर्तन नहिं आनत मुदा सूतल समाज के एकटा अलार्मे अवश्य देत ।जे ई अलार्मे सुनि उठब त ठीक नहि उठब त कोनो बात नहिं आठ बजे त उठबे करब। तावत धरि बहुत देरी भय चुकल रहत।
(आलेखमेे देल विचार लेखकक निजी विचार छन्हि।- सम्पादक)
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राजदेव मण्डल
हमर टोल
उपन्यास
गतांशसँ आगू....
गतांश आगाँ...
‘ठक-ठक-ठक’
गाछ कटि रहल छै। झमटगर आमक गाछ। कटबा रहल छै- झटकलाल मड़र। कुरहैड़क चोटसँ डारि-पात थर-थर काँपि रहल अछि। चिड़ई-चुनमुनी फड़फड़ा कऽ उड़ि रहल छै। जार-जार कानैत जेना कहि रहल छै-गाछ।
“हौ, हमरा नै काटह। हमर कोनो दोख नै। हम तँ तोहर सहायक छीयह। मीठ-मीठ फल, पवित्तर हवा, शीतल छाँह दैतै रहए छी। बरखा बूनीमे हमर सहयोग देखते छी। तैयो हमर जान लऽ रहल छी। आह... हमरा बहैत खूनकेँ कियो नै देख रहल अछि- हौ......।”
जल्लाद जकाँ दू गोटे चला रहल अछि-कुरहैड़। गाँजाक निसाँसँ दुनू आँखि लाल। घामसँ नहाएल। चाहै छै- जलदीसँ जल्दी गाछकेँ गिरा दी। मौतक निन्न सुता दी।
किछु दूर हटि कऽ झटकलाल मड़र ठाढ़ अछि। जल्दी गाछ कटबाक आग्रह कऽ रहल छै। जेना गाछ नै कोनो भरिगर बोझ ओकरहि कपारपर लाधल छै।
झटकलाल मड़रक छोटका बेटा अजय जेना गाछक करूण क्रन्दन सुनि लेलक। ओकरा पाएरमे तेजी आबि गेलै।
“बाबूजी! आमक गाछ किएक कटबा रहल छिऐ?”
झटकलाल मड़र घुरि कऽ देखलक आ कने गम्भीर होइत बजल- “ई अपन गाछ नै छी अजय। ऐपर जीबू बाबूक अधिकार छन्हि।”
“जीबू बाबूकेँ?”
“हँ, हुनके दक्षिणामे देल गेल छै। बरिसोपूर्व ताेहर दादाजी केँ श्राद्ध-कर्ममे आत्माक शांति आ मुक्तिक लेल। दान-दक्षिणामे देलाक बादसँ हम सिरिफ रखबारि करै छिऐ।”
अजयक व्यंग्यसँ भरल स्वर निकललै- “आ आम पकलापर अहाँ घर पहुँचा दैत छिऐ- वाह..।”
“हँ हौ। ब्राह्मण देवता छथि। हमरा ईमानदारीपर गाछ छोड़ने अछि। हुनके सबहक हाथमे तँ मुक्ति छै। ओ जँ हमरापर विश्वास करै छथि तँ हमरो कर्तव्य निमाहए पड़तै किने...।”
“अहाँ बताह भऽ गेल छी बाबूजी। हम गाछ नै काटय देब।”
“फेर, अहाँ पढ़ि-लिख कऽ की बजै छी। आगिसँ खेल करए चाहै छी। सराप दऽ देत तँ अगिला जनम तक पड़ि जाएत। जिनगीकेँ सफल करबाक लेल बहुत बात सहए पड़ै छै।”
“गाछ केकरो। रखबारि कोइ आर करए। डरे फल दोसरठाम पहुँच जाए। अहाँ डेराएल छी। आन्हर छी।”
झटकलाल मड़र तमसा गेल।
“दू अछर अँग्रेजी पढ़ि लेलहक तँ हमरा आन्हर बुझै छहक। पात्रकेँ देल दान छिऐ। तेकरा हम बैमानी कऽ ली। अधरमी कहीं कऽ।”
नै सुनने छहक- ‘जो जस करहि सो तस फल चाखा।’
“हँ, हँ बुझलौं। गाछक सेवा अहाँ करै छी। फलक रखबारि अहाँ करै छी। ओ फल खाइत अछि- जीबू झा। ई छिऐ कर्मक फल।”
“हमरा फलक चिन्ता नै अछि। असलमे गाछ हमर नै छी। हुनका लकड़ीक जरूरत छन्हि। अपन गाछ कटबा कऽ लऽ जा रहल छथि। दान-दक्षिणामे देल गेल छन्हि तेकरा हम केना रोकि देबनि। एहन जुलुम हमरा बुत्ते नै हएत।”
“बाबूजी, जुलुम तँ अहाँसँ भऽ रहल अछि। जीअत गाछकेँ काटनाइ पाप करम छिऐ। अपराध छी। पर्यावरण दूषित भऽ रहल छै। गाछ-बिरिछक अभावसँ प्रदूषण फैल रहल छै। अहाँ गन्दगी फैलाबैमे मदति कऽ रहल छिऐ।”
“हम गन्दगी फैला रहल छिऐ की? अधरमी जकाँ बात तू करै छहक। पाप-पुण्यक गियान नै छह तोरा। तोरे सन लोकक संख्या जँ धरतीपर बढ़ि जेतै तँ ई धरती थरथर काँपए लगतै।”
अजय अपन केश नोचैत धुनधुना कऽ बजल- “भैंसक आगाँ बीन बजेलासँ की फैदा। किन्तु गाछ तँ नै काटए देबनि।”
फानि कऽ आगू गेल आ लपकि कऽ कुरहैड़ पकड़ैत बजल- “रूकि जा। गाछ नै काटि सकै छह।”
कनेक दूरपर धर्मानन्द बाबू आ ढोढ़ाइ गुरूजी दुनू गोटेसँ गप्प कऽ रहल अछि।
झटकलाल मड़र जोरसँ शोर पाड़ैत अछि- “यौ धर्मानन्द बाबू सभ गोटे एम्हर आउ। देखियौ हमर बेटा पागल जकाँ करैए। गाछ नै काटए दइए। कहू जे जीबूबाबूकेँ की जबाब देबनि। कोनो तरहेँ एकरा ऐठामसँ हटाउ।”
धर्मानन्द लग आबैत बजल- “जीबूबाबू तँ हमरे दुआरिपर छथि। हमरे टाएर गाड़ीसँ हुनकर लकड़ी जेतै। बहलमानक खोजमे आएल छलौं। घोंचाय तँ गाड़ी चलबैमे माहिर छै। ओकरे ताकि रहल छी।”
फेर फुसफुसाइत स्वरमे आगू बजल- “अहाँ तँ जानिते छिऐ मड़र। टाएरगाड़ी तँ घोंचायकेँ नाओंसँ उठल छलै। ऑफिसमे ओकरे नाम दरज छै। ओइ दिन- हम तँ चलाकीसँ आनि लेलौं। संदेह होइत अछि आब। कहीं बुझि जाएत तँ गाड़ी घेर लेत।”
झटकलाल मुड़ी झुलबैत कहलकै- “धुर, ओकरा केना मालूम पड़तै। मुरूख-चपाट छै। एम्हर जीबूबाबू अपना सबहक संग छथि। किछो नै हेतै। लेकिन पहिले हमरा ऐ झंझटसँ निकालू। अजयकेँ ऐठामसँ ठेल-ठालि कऽ हटाउ।”
ढोंढ़ाय गुरूजीकेँ संगे आओर दू गोटे आबि गेल।
झटकलाल मड़रक इशारा पाबि सभ गोटे एक्केबेर अजयकेँ पकड़ि लेलक। घिंचैत-ठेलियबैत ओइठामसँ दूर लऽ जेाक प्रयास करए लगल।
“अइठामसँ चलह। तूँ पढ़ूआ बाबू छहक। तोरा समाजक सभ गप्प नै बूझल छह। जीबूबाबू साधारण लोक नै छथि। पैघ पैरवीबला बेकती छथि। हमरा सभकेँ कतेक बेर नीक-अधलामे बचौने छथि।”
अजय ओइठामसँ घुस कऽ नै चाहैत छै। विरोध कऽ रहल छै। ओकरा सबहक बन्धनमे छटपटा रहल अछि। किन्तु बन्धन ढील पड़ै तब ने।
“कहै छी हम। हमरा छोड़ि दिअ। नै तँ बड्ड खराब बात भऽ जाएत। पाछू हमरा दोख नै देब।”
झटकलाल मड़र ठेलैत कहलक- “चहल अजय चलह। काज नै रोकहक। सुनह- धरम करैत जँ हुए हािन, तैयो नै छोड़ी धरमक बानि।”
अजय जालमे फँसल चिड़ै जकाँ फरफरा रहल अछि। जाल तोड़बाक बारम्बार प्रयास कऽ रहल अछि। असोथकित भेलापर देह थिर भऽ गेल। मुदा बुइध तेजीसँ दौड़ए लगल। घर-दुआरि-गाम-शहर-राज्य-देश आओर आगू दिस.....।
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शांतिलक्ष्मी चौधरी (शांति), पिता: श्री श्यामानन्द झा, ग्राम+पोस्ट: गोविन्दपुर, भाया: प्रतापगंज, जिला: सुपौल।