विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

रचनात्मक विमर्शक अयनामे ‘चिड़ै’

चन्द्रेश · 2011-09-15 · अंक 90

रचनात्मक बिमर्शक अयनामे ‘चिड़ै’
सुजीत कुमार झाक कथा संग्रह ‘चिड़ै’ पढलहुँ । जुआनीक उन्मादमे भावुक रोमानीपनक गन्ध नेने कतिपय कथा आएल अछि । अल्हड़ जुआनी आ प्रेमक उन्मादमे लिखल गेल कथा अबस्से युवा मोनकेँ गुदगुदी लगबैत छुवैत अछि, तन–मनकेँ झंकृत करैत अछि । सहज सहानुभूतिमे उपजैत हृदयक टीस मोनमे उभरि अवैत अछि । एक दिस व्यथा–कथाक उपजामे टीसैत करुणा अछि तँ दोसर दिस पीड़ित ताप । खौंझाइत मोनक बौद्धिक चेतना जाग्रतावस्थामे अपन दम–खम रखैत अछि । मानबीय मूल्य बोधक प्रति कथाकार सतर्क, सचढ ओ सम्वेदनशील छथि । निस्सन्देह कथाक दुआरि पर सुजीतकुमार झा क ‘चिड़ै’ कथा–संग्रहक स्वागत अछि ।
स्वागत एहि द्वारे नहि जे ओ भावुक मोनक कथाकार छथि । ओ अवस्से भावुक मोनक कथाकार छथि । भावुकतामे प्रवहित होइत हिनक कथा आवेशी स्वर नेने अछि । मुदा, जतेक दूर धरि ओ भाव प्रवणतामे संवेदनशील मोनक संवेदनाकेँ छुवैत छथि से हमरा नीक लगैत अछि । संगहि, सरलता ओ सहजतामे वैचारिक भाव–भूमि पर उतरैत स्त्री–पुरुष दूनु वर्गक संकुचित दृष्टिकोणकेँ बेरबैत छथि से विशेष कऽ आह्लादित करैत अछि । भनहि हिनक अजोह मोनमे भोगबादी दृष्टिकोणक प्रति आक्रोशक ज्वारि किएक नेँ वेसिए छिटकैत होअय ।
ओ लिखैत छथि सिखवाक चाही । अहिमे परिपक्वता चाहवे करी । जेना जेना लेखन–संसारमे ओ कलम चलओताह तेना–तेना शिल्प आ कथ्यमे तालमेल होयवे करत, ठोस बैचारिकतामे सूक्ष्मताक संगे नव दृष्टि प्रदान करवे करत । सुप्रसिद्ध साहित्यकार डा. धीरेन्द्र सँ प्रभावित भऽ नेपालक आधुनिक मैथिली साहित्य अवश्य भरखार भऽ रहल अछि ।
अहिमे निर्विवाद रुपे कथाक क्षेत्रमे सर्वश्री रामभरोस कापडि ‘भ्रमर’, डा. रेवती रमण लाल, डा. राजेन्द्र प्रसाद ‘बिमल’, अयोध्यानाथ चौधरी, भुवनेश्वर पाथेय आदि अपन औकादि देखा चुकल छथि । इ हम गछि ली जे डा. धीरेन्द्रक दू कोटिक रचना अछि । उत्मकोटी आ निम्न कोटीक । ओ जँ निम्नकोटीक रचना करवो कएलन्हि तँ ओहनो रचना आइ रचनाकारक हेतु चुनौती थिक । डा धीरेन्द्रक रचना संसारकेँ कखनो अवडेरल नहि जा सकैत अछि । जेकी सुजीत कुमार झाक कथाकार विशेषतः प्रेम ओ काम वासना विषयक कथावस्तुकँे आधार बनौलन्हि अछि से हिनक डा. धीरेन्द्र ओ हुनक परवर्ती कथाकार भ्रमर, विमल आ थोड़ अंशमे रेवती रमण लालक परम्परामे लऽ अवैत अछि । ओना सुजीत कुमार झा सँ पूर्वक पीढीक कथाकार यथा सुरेन्द्र लाभ, श्यामसुन्दर कामति ‘शशि’ रमेश रञ्जन आदिक रचनात्मक धारा निर्विवाद रुपे डा. धीरेन्द्रक परम्परा सँ प्रभावित होइतो अछिए किछ हटि कऽ अपन विषय बस्तुकेँ प्रतिपादित करैत अछि जे भरिसक भुवनेश्वर पाथेयक परम्परामे कहि सकैत छी जे अनैत अछि । जेकी सुजीत कुमार झा संघर्षरत कथाकार छथि । तएँ हिनक ठोस आ सूक्ष्म दृष्टिक प्रतीक्षा अछि जे कोन धार लऽ भविष्यमे अपनाकेँ प्रतिष्ठापित करताह । ओना परम्परा सँ उद्धृत भऽ आधुनिकताक संग नव दिशा दृष्टि सँ कऽ आयव अवश्य स्वागत योग्य थिक ।
आजुक युगमे कथा वेस पढल जाइत अछि । कथा लिखब ततेक सहज ओ सरल नहि अछि । आर किछु नहि तँ कथाकारकेँ एतेक ध्यान रखैये पडैत अछि जे कथा मूल्यबोध बनय । मुदा, देखवाक थिक जे मूल्य सोझे कथ्य पर ने हावी भऽ जाय । तएँ परिवेश ओ वातावरणक माध्यमे कालगत चेतनाक संग जँ मूल्यबोध कथ्यमे रचि–पचि कऽ आवय तँ निश्चिते कथाक चमक किछ खास होयत अछि । एकर अर्थ ईहो नहि लेवाक अछि जे परिवेश ओ वातावरणक धोन्हि लगा कऽ तेनाकऽ बोझिल बनाओल जाय जे ओहि तरमे कथ्य दवि कऽ रहि जाय अर्थात खुजि ने पावय ।
प्रेम जीवनक अहम हिस्सा थिक जकरा नकारब सरासर बेइमानी होयत । प्रेमक दंश ततेक मारुक होयत अछि जे आत्महत्या धरि करबाक लेल लोक उद्यत भऽ जाइत अछि, करितो अछि । अर्थात अहि दंशमे पीड़ित लोककेँ एको घोंट जलो पीबक सुअवसर नहि भेटैत अछि । कतिपय प्रेम परक कथा उदाहरण परक थिक । तएँ प्रेम अमर थिक । प्रेमक अनुभूति स्वतः होइत अछि । प्रेम ओ बासना दूनु दू बस्तु थिक, एक दोसर सँ अलगहे फराक । एहि बातकेँ सुजीत कुमार झाक कथाकार नीक जकाँ जनैत–बुझैत अछि । ओ ‘चिड़ै’ कथामे प्रेमक सार्थक अनुभूति करवैत अछि । एहिमे त्रिशंकु बनल ‘मनोज’ क चित्रण कऽ प्रेमक रुपकेँ बासना सँ फुटकाओल अछि । मोनकेँ बहटारबाक हेतु मोन मिलानी करब फरक बात थिक तएँ सिद्धान्तकेँ व्यावहारिकतामे उतारब दोसर बात । कारण, सामाजिक मर्यादा ओ व्यवस्थाक अंकुश लगले रहैत अछि । तएँ तऽ उषाक कामुकताकेँ अनदेख कऽ ‘नलिनी’ क मर्यादित छविमे अपनाकेँ समंजस्य स्थापित कऽ मनोजक व्यवहारिक वुद्धि जे अपन असली छवि प्रकट कयलक अछि से अवस्से उषा सन नारीक लेल सबक थिक । ‘प्रियंका’ मे दैहिक भोग आ नाम ओ यशक लेल ‘प्रियंका’क मृग मरीचिकामे बौआइत – भटकैत रहब अवस्से नारीक चरित्रगत सामाजिक पतन थिक । ‘बरखीक भोज’ मे माधुरीक अपन पिता सदृश बुढकेँ खुआयव से पिताक बरखी पर आत्मतृप्ति मूलक थिक । ‘बाबाजी’ मे अपन माय–बापक जीवैतमे तिरस्कार आ मृत्योपरान्त बेटा–पुतहुक नोर चुआवय आम बात थिक । एकरे कथाकार आधार बना कऽ ‘रुवी’ अर्थात पोतीक सूक्ष्म दृष्टि ओ बुद्धिक माध्यमे अपन बातकेँ आगा रखलन्हि अछि । रुवी सभ किछ जनै बुझैत अछि तएँ बजैत अछि जे ‘बेकारमे सभ गोटे अपन नोर बरवाद कऽ रहल अछि ’ । ‘बंश’ मे बेटीक महत्ता पर जोर दऽ चरित्रगत संस्कार पर विशेष बल देलगेल अछि । एहिमे कथाकार ओहि बनल–बनाओल धारणाकेँ तोड़ल अछि जे आजुक समाजमे जतय बेटी आभिशाप बनल अछि से बात शत–प्रतिशत असत्य थिक । नारीक चेतनापरक कथाकेँ उभारल गेल अछि । ‘बनैत–बिगरैत’ मे शिक्षक ‘महेन्द्र बाबु’ क माध्यमे हिनक स्थिति–परिस्थितिगत चित्रण कऽ मानसिक ऊहा पोहकेँ उभारल गेल अछि । हिनक दूनु पुत्र ‘नागेश्वर’ आ ‘सुरेश्वर’क बीचक भैयारीगत मनोमालिन्यकेँ उभारैत बीचक सम्वन्ध देखाओल गेल अछि । जेठ पुत्र ‘नागेश्वर’ केँ महत्वकाँक्षा कहैत छैक तँ सुरेश्वरक व्यवहारिक वुद्धि फलित होइत छैक तकर चित्रण भेल अछि ।
नागेश्वरक स्त्री ‘हिरा’ केँ तीक्ष्ण बुद्धि ओ चातुरीक कुशलताक संग चित्रित कऽ कथाकार कोनो परिवारमे सामंजस्य राखवामे नारीक वुद्धि ओ कौशलक महता प्रतिपादित कयल अछि । ‘ढोल’ मे तएँ नारी व्यथाक चिक्कन–चुनमुन चित्रण भेल अछि । इज्जतिक खातिर डलीक
स्थानपर ‘प्रतिमा’ कनियाँ बनलि ओहि कर्नलक जे जीवन भरि पतिक गारि–मारि सहैत रहलि । नारीक विवशताकेँ उदघाटिक कऽ ओकर औनाइत–छटपटाइत मोनक भावकेँ प्रकट कएल अछि । ‘शुन्यताक प्रवेश’ मे आत्मग्लानिवोध देखाओल गेल अछि । ‘भौजी’ मे नारी मोनक पीडा उभरि कऽ ओकर मोनक सार्थक परिणिति देखाओल गेल अछि । ‘धधकैत आगि ः फुटैत कनोजरि’ मे बलात्कारक रंगीन सपना देखव–देखयवाक माध्ययमे सपनाक सत्यता पर प्रश्न चिन्ह लगवैत सपनाकेँ पूmसि मानल गेल अछि । ‘एकटा अधिकार’ मे प्रेमक महता देखा कऽ ओहि अनुभूतिक आँच सँ जीबन आ संघर्षकेँ देखाओल गेल अछि । खास कऽ अन्तिम परिणतिमे देहक रोइया भुटका की दैत अछि जे स्वभाव, बुद्धि आ ऐन्द्रिकताक संगम धरि पहुँचा कऽ अमिट प्रभाव छोडि जाइत अछि । जँ कथाकार कनेक साकांक्ष रहितथि आ साधल कलम सँ लिखल जाइत तँ निश्चिते इ कथा रोमानीयपन चेतनाक उदाहरण बनि अपन स्वरुप महत्तम ऊँचाइ धरि अनबामे सफल होइतय जकर बीज तत्व अहिमे सन्निहित अछि । तैयो ई कथा अबस्से अपन दम–खमक बुत्ता पर फराक स्थान ठमिअवैत अछि । इहो कहि सकैत छी जे हमरा जनैत संग्रहक ई नीक कथा थिक जे नेपालीय मैथिली कथा–साहित्यमे अपन भूमिका निःसन्देह निमाहत ।
आइ जखन की नेपालमे राजनीतिक उथल–पाथल मचल अछि, हिसां ओ जनक्रान्तिक इतिहास रचल गेल अछि ताहि संकटापन्न विषम परिस्थितिमे सुजीत कुमार झाक कथाकार जे पे्रम ओ सिनेहकेँ जोगा कऽ रखवाक प्रयास भेल अछि से प्रशंसनीय थिक । कारण स्थिति–परिस्थिगत विषम दुःस्थितिमे एहि परिवेशक साहित्यकार क्रान्ति विशेष कऽ रचनामे तल्लीन भऽ एकरे मुख्य धाराक विषय बनयबामे सक्रिय छथि ततय हिनक कथाकार मानवीय प्रेमकेँ बचयबाक प्रयासमे समानान्तर धारा रचवामे तल्लीन भऽ ‘चिड़ै’ कथा संग्रह सृजित कयल अछि ।
मात्र आशा नहि विश्वास अछि जे सुजीत कुमार झा नेपालक आधुनिक मौथिली साहित्यक एकटा एहन युवा हस्ताक्षर छथि जे समयक संग अनुभवक परिपथ्तामे निश्चिते जटिल यथार्थकेँ आरो गतिशील बना कऽ पाठकक सोझामे प्रस्तुत करताह । निश्चिते भविष्य हिनक छन्हि आ कथाक कुन्जी हाथहिमे छन्हि ।
हमरा तँ सुजीत कुमार झाक कथाकार पर खौँझी उठैत अछि जे ‘एकटा अधिकार’ सन कथा लिख कऽ कनेक हडवडी किएक केलन्हि ? एहन कथा कहियो काल लिखाइत अछि जे नेपालीय मैथिली कथा साहित्यमे प्रेम जगतक निम्मन उदाहरण बनितय आ बनिते अछि । हमरा जनैत एही एक कथाक बुता पर सुजीत कुमार झा कथाकारक रुपमे जानल –पहचानल जयताह । जखन की हिनकामे जे ऊर्जा छन्हि से आरो कथा लिखवाक उत्स जोगाओले छन्हि ।
तैयो जाहिया कहियो वा जखन कखनो नेपाली मैथिली कथा साहित्यक चर्चा होयत, कथा जगतक विमर्श होयत, हठात् सुजीत कुमार झाक कथा कोनो ने कोनो रुपमे चर्चाक केन्द्र विन्दु बनवे करत । ओ अपन संगतुरिया कथाकारक रुपमे तँ सहजहि जे अग्रिम पीढीक कथाकारक रुपमे भनहि आइ अचर्चित छथि से अहि पोथी ‘चिड़ै’ केँ लऽ कऽ अपन सार्थक भूमिका निमाहवे करताह । अहि आशा ओ विश्वासक संग हम एतेक अवश्य कहबन्हि जे सीमित अनुभव क्षेत्रकेँ विस्तृत बना कऽ युगक आहटिमे बेस परिपक्वता ओ सन्तुलित ढङ्गे कथा–सृजन करथि । कथा लिखायत, चर्च होयवे करत आ दोसर पोथी नीक, आरो नीक भऽ प्रकाशित होयत । एखन तँ जीरा खसवे कएल अछि, हिलकोर उठवे कएल अछि आ विस्तृत आकाशकेँ हिलोरित करवाक अछिए तँ किएक ने जटिल यथार्थक युगमे नव सनेष लेने सत्यताक दस्तावेज प्रस्तुत कऽ कथा साहित्यक दस्तावेजी साक्ष्य बनी ? यैह बनवाक जे सम्भावना एहि संग्रहमे आएल अछि तएँ हमरा विशेष आह्लादित करैत अछि ।
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विनीत उत्पल
कथा- बेसिक इंस्टिंक्ट
मामला तँ तखने तूल पकड़ि लेलक जखन ग्वालियरक एकटा बाभन फेसबुकपर कबीरक एकटा दोहा पोस्ट कऽ देलक, "एक बूंद, एकै मलमूतर, एक चाम, एक गूदा/ एक रकत से सबहीं बने हैं को बाभन को सूदा'। मुदा गप पोस्ट करबे टाक नै छल। गप छल जातिवादकेँ लऽ कऽ झगड़ाक। यएह ओ दौर छल जखन कारगिल युद्ध भेल छल आ बरखा दत्त नामक पत्रकार राइते-राति युद्धक रिर्पोटिंग कऽ सभ छौड़ींक 'आइडियल" बनि गेल छल। ओहिनो पत्रकार बनाबैक लेल सभ कोनटामे कुकुरमुत्ता सन मीडिया संस्थान खुजि गेल अछि आ सभटा लड़की ओतएसँ डिग्री लेबाक लेल परेशान रहैत अछि। ई ओ काल अछि जखन नोएडामे आयल अप्पन बरियातीकेँ निशा दहेजक लेल घुरा दैत अछि। ऐ कालमे झारखंडक कोडरमाक रहैवाली पत्रकार निरुपमाक मरब हत्या वा आत्महत्याक बीच झुलले रहि जाइत अछि। फेर मंडल आयोगकेँ लागू करएबला प्रधानमंत्री कैंसरसँ लड़ैत दम तँ तोड़ि दैत अछि मुदा तखन धरि समाजक लोक जागि गेल छल। मंडल-कमंडलक नामपर कतेक लोक मरि गेल मुदा लोकक सपना देखबासँ आ ओकरा यथार्थमे बदलबाक मेहनत करबासँ कियो रोकि नै सकल।
ऐ कालमे कतेक सवर्ण एहन आएल जे सार्वजनिक जीवनमे दलितक हिमायती, स्त्रीगणक पैरोकार बनैत छल मुदा वास्तविक धरातलसँ ओ एहन मामलासँ दूरे रहैत छल। नै तँ एहन कखनो नै होइए जे हम जइ संस्कारक गप करैत छी आ कहैत छी जे ई संस्कार घरसँ अबैत अछि आ ओ ओइ घरमे नै हुअए। यएह हाल तँ ओइ छौड़ीक छल जकर बहनोइ सभटा तामझामक संग दलितक पैरोकार बनैत छल। ओकरो सपना 'बरखा दत्त-टू" बनैक छल आ लंदनमे रहैबला लड़कासँ शादीक लेल मना कऽ ओ दिल्ली भागि कऽ आबि गेल छल। दिल्ली तँ ओ अप्पन करियरकेँ नव मंजिल दै लेल आएल छल। पूरा खिस्सा तँ हमरा पतो नै चलतिऐ जौँ ओइ दिन ओकर पागल हइक खबर राष्ट्रीय अखबारमे नै पढ़ितिऐ। फेर दिल्ली राजधानीसँ करीब १५०० किलोमीटर दूर जखन हम मिथिलामे अप्पन खेतमे काज कऽ रहल छी तखन दिल्लीक गप एतए कतएसँ आबि सकैत अछि। हमहू कहियो बड़ पैघ-पैघ सपना देखने रही आ दिल्ली आएल छलहुँ मुदा ओतुक्का रौनक, मंडी हाउस, मेट्रो ट्रेन, कनॉट प्लेस, हैबिटेट सेंटर, प्रेस क्लब सन जगह हमरा प्रभावित नै कऽ सकल। आ फेर हमरा सनक लोककेँ ठामे-ठाम धोखा भेटब, ई कतएसँ बान्हि कऽ राखि सकैत छल। फेर 'बेसिक इंस्टिंक्स" केँ कियो नकारि सकैत अछि की?
ओ नवम्बरक मास छल जखन दिल्ली विश्वविद्यालयक दक्षिणी परिसरमे तीन दिनक मीडिया वर्कशॉप भेल छल आ ओइमे हम सेहो हिस्सा लऽ रहल रही। ओ वएह तँ छौड़ी छल जे दरबज्जाक कोनटा लग ठाढ़ि छल, पीयर रंगक टी-शर्टमे ओ गुड़िया जेहन लागैत छल। हमर मित्र कमलनाथ सिंह हमरा ओकरासँ भेँट करौने छल। फेर तँ कखन हम सभ एक-दोसराक दोस्त बनि गेलौं, से पतो नै चलल। गप-शप, भेँट-घाँट रोज हुअए लागल। एक दिन पता चलल जे ओ 'राष्ट्रीय उदय" मे इंटर्नशिप कऽ रहल अछि मुदा ताधरि हम एकटा राष्ट्रीय अखबारमे नोकरी करै लेल अजमेर जा चुकल रही। हँ, हम तँ ओकर नाम बताबैक गप बिसरि गेलौं। छोड़ू, ओहिनो नाममे राखल की अछि? मुदा खिस्साकेँ आगू बढ़ाबैक लेल तँ ओकर नाम बताबैये पड़त। अहाँ सभ किछु सोचै लेल स्वतंत्र छी मुदा हम ओकर असली नाम नै बताएब। एतबेटा जानि लिअ जे ओकर मोबाइलमे हमर नंबर 'परेशान आत्मा" आ हमर मोबाइलमे ओकर नंबर 'हाइली टेंपर" क नामसँ सुरक्षित छल।
तँ साहेबान, कद्रदान, पूरा मामला “परेशान आत्मा" आ “हाइली टेंपर" क बीचक गप छल आ सौंसे दिल्लीक मीडिया हुनका दुनूकेँ देखि रहल छल। एक दिन “परेशान आत्मा" केँ मालूम चलल जे ओकर गर्ल फ्रेंड जे ताधरि फ्रेंड टा छल, रांचीसँ छपैबला छोट-सन अखबारमे काज करए लागल अछि। ओ ओतए 'अंगूठीबला बाबा" क पैरवीसँ नोकरीपर लागल छल आ हुनका कहै तँ ओ 'सर" छल मुदा दुनूक सरसँ कतेक कोसीक पानि बहि चुकल छलै। दरभंगासँ आएल ओ छौड़ी दिल्लीक चकाचौंधमे डुमि चुकल छल, सांझसँ देर राति धरि इंडिया गेटपर “अप्पन सर"क संग आइसक्रीम खाएब ओकरा बड़ नीक लगैत छलै। आफिसमे ओकर भेँट रामेंद्र अशेषसँ भेल छल। ओ बड़ शांत छल आ सुसंस्कारवान सेहो। संगहि साहित्यक अनुरागी सेहो छल। “हाइली टेंपर"क नजरि ओकरापर पड़ल आ ओ सोचि लेलक जे ओ अशेषक कान्हपर चढ़ि कऽ दिल्लीक जत्रा पूरा करत।
रामेंद्र अशेष अत्ते भद्र पुरुख छल जे ओकरा पते नै चलैत छलै जे के ओकरा यूज कऽ रहल अछि आ के नै। अशेषजी चुपचाप ओकर “लेख”क शब्दकेँ ठीक कऽ दैत छल आ लोक “हाइली टेंपर" क वाहवाही करैत छल। ओकर एवजमे ओ प्यारक झांसा दैत छल। तइसँ जहिया जोशीजीक निधनपर गांधी शांति प्रतिष्ठानमे दिल्ली जर्नलिस्ट एसोसिएशन एकटा सभा आयोजिक केने छल तँ रामेंद्र ओइ छौड़ी लग ताधरि नै बैसल जाधरि ओकर बहनोइ ओकरा लग बैसल रहल। ओकर बहनोइ जहिना बीच सभामे लघुशंका लेल हॉलसँ बाहर गेल तखने हाइली टेंपरक दोसर कातक खाली कुर्सीपर ओ अप्पन आसन जमा लेलक। जखन ओकर बहनोइ अबैत अछि तखन नमस्ते करैत अछि आ कहैत अछि जे अखने आयल छी।
हमहूँ अलग लोक छी। कतएसँ कतए चलि अएलहुँ आ अहाँसँ कोन गप करए लगलहुँ। रांचीक लोकल अखबारक ई दफ्तर दिल्लीक कनाट प्लेसक एकटा बिल्डिंगक पाँचम तल्लापर छल। ओकर आगूमे दैनिक भारतक बिल्डिंग अप्पन चमक-दमकक संग लोककेँ आकर्षित कऽ रहल छल। मुदा ओतए बाभन सभक बड़ रास भीड़ छल। ओतए जाइतक नाम देखि कऽ लोककेँ राखल जाइत छल आकि फेर ओकरा जे कोनो पैघ अधिकारीक थूक चाटैत छल। एहनामे परेशान आत्माकेँ नोकरी भेटबामे मुश्किल नै भेलै किएकि अजमेरमे जइ पैघ पत्रकारसँ ओकरा भेँट भेल छलै ओ दैनिक भारतमे पैघ पोस्टपर आएल छल। मुदा आब हाइली टेंपरकेँ लगलै जे जौं ओतए ओकरा नोकरी नै भेटत तँ ई बड्ड पैघ हारि हएत। ओ अप्पन परिवारकेँ ई देखाबैले चाहैत छल जे ओ अप्पन भरोसे किछु कऽ सकैत अछि। किएकि ओकरा दर्द छलै जे राष्ट्रीय उदयमे इंटर्नशिपक लेल ओकर बहनोइ बड़ पैरवी केने छल, तकर बाद ओकरा इंटर्नशिप भेटल छलै।
अन्तमे ओ दिन आबि गेलै जखन नवसिखुआ स्त्रीवादी लेखिकाक चोंगा पहीर कऽ ओ छौंड़ी, बाइस मंजिलक ओइ बिल्डिंगमे आएल, ई वएह स्था रहै जतए ओ बाबाक संग नोकरी ताकऽ लेल आएल छल , ई वएह “बाबा"छल जकरा ओ “सर" कहैत छल। ऐ बाबाक जीवनक परिभाषा “बाभन आपन करैं बड़ाई, गागर छुअन न देहिं/वैस्या के पायन तर सोवैं, यह देखो हिंदुआई” दोहामे सिमटल छल। एतय "परेशान आत्मा” ओकरा लेल आधार तैयार कऽ चुकल छल आ बिना टेस्ट, बिना रिज्यूमे जमा केने ओकरा नौकरी भेट गेलै। पहिने तँ कहल गेल जे अहाँ दुनू गोटेकेँ जूनियर कॉपी एडिटर बनाओल जाएत मुदा जखन पत्र भेटलै तँ ओइमे "स्ट्रींगर' लिखल छलै।
कहल गेल छल जे सात हजार टका सेलरी भेटत मुदा पत्रमे लिखल छल पाँच हजार। आपत्ति केलापर बॉस कहलक जे अहाँ सभ गोटे फीचर सेहो लिखू आ ओइ लेल अहाँ सभकेँ दू हजार टका भेट जाएत। ओइ काल परेशान आत्माक संग हाइली टेंपर सेहो छल मुदा बादमे हाइली टेंपर ओकरा धोखामे राखि कऽ ज्वाइनिंग लेटर राखि लेलक। मीडिया भलहि दोसरक खामीकेँ लोकक आगू राखैत अछि मुदा एकर खामीकेँ कियो कोना आगू राखत? ओइ कालमे “मोहल्ला" आकि “भड़ास"क जन्म नै भेल छल जे मीडियामे काज करैबला लोकक दर्दकेँ आगू राखि सकए।
अहिनामे जतए उच्च पदपर काज करैबला तेरह टा पदपर बाभन अप्पन आसन जमौने छल ओतए निचला स्तरपर कतेक के होएत एकर अंदाजा केकरो नै छलै। अहिनामे दलित, स्त्रीवादीक खोल “हाइली टेंपर" उतारि कऽ फेंकि देलक आ सभ लोकक आगू कहि देलक जे हमहूँ तँ “'ब्राह्मण" छी। फेर तँ किछु ने किछु छल-प्रपंच करब आवश्यक छल। अहिमे कोनो संदेह नै छल जे ओकरा अप्पन दलित आ स्त्रीवादीक खोलसाकेँ उतारबाक छलै, अप्पन भेदियाकेँ सेहो खत्म करबाक छलै। अहाँ तँ जनिते छिऐ जे भेदिया वएह “परेशान आत्मा" छल। तेँ ओ अप्पन मोबाइलमे ओकर नंबर अहि नामसँ सुरक्षित राखने छल। ओकरा डर छलै जे कहियो ओ ओकर पोल ने खोलि दिअए। एनामे एक दिस ओ परेशान आत्माक संग प्रेम बढ़ेबाक ढोंग करए लागल आ दोसर दिस लोक लग ई कहैमे कनियो टा नै सकुचाएल जे परेशान आत्मा ओकरा परेशान कऽ रहल अछि।
जखन कखनो परेशान आत्मा कोनो काजसेँ ओकरा फोन करैत छल तँ ओ अप्पन मोबाइल दोसर गोटेकेँ पकड़ा दैत छल आ ई देखेबाक प्रयत्न करैत छल जे ओ ओकरा परेशान करैत अछि। ओतए असगरे भेटलापर परेशान आत्मासँ कहैत छल, “अहां कतेक भागमन्त छी जे गर्लफ्रेंड अहाँक संग अछि, संगे-संग ऑफिसमे काज करैत अछि आ फेर एकहि संग सांझमे घर दिस अहाँ सभ घुरैत छी।" अहिनामे एक दिन दुनू अंग्रेजी फिल्म “बेसिक इंस्टिंक्ट" देखऽ गेल छल। हम एना नै कहि सकैत छी जे ओइ छौरामे हृदए नै छलै, ओ तँ एहन चिक्कन-चुनमुन गपमे रहि जाइत छल मुदा ओकरा लगैत छलै जे कत्तौ ने कत्तौ कोनो गड़बड़ जरूर अछि।
क्रमश:
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शांतिलक्ष्मी चौधरी (शांति), ग्राम गोविन्दपुर, जिला सुपौल निवासी आ राजेन्द्र मिश्र महाविद्यालय, सहरसा मे कार्यरत पुस्तकालयाध्यक्ष श्री श्यामानन्द झाक जेष्ठ सुपुत्री, आओर ग्राम महिषी (पुनर्वास आरापट्टी), जिला सहरसा निवासी आ दिल्ली स्कूल ऑफ इकानोमिक्स सँ जुड़ल अन्वेषक आ समाजशास्त्री श्री अक्षय कुमार चौधरीक अर्धांगिनी छथि। प्राणीशास्त्र सँ स्नातकोत्तर रहितो शिक्षाशास्त्रक स्नातक शिक्षार्थी आ एकटा समाजशास्त्री सँ सानिध्यक चलिते आम जीवनक सामाजिक बिषय-बौस्तु आ खास कऽ महिलाजन्य सामाजिक समस्या आ प्रघटनामे हिनक विशेष अभिरूचि स्वभाविक।

Suggested citation: चन्द्रेश. “रचनात्मक विमर्शक अयनामे ‘चिड़ै’.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 90, 2011-09-15. https://www.videha.co.in/research/2011/90/रचनात्मक-विमर्शक-अयनामे-चिड़ै.htm

मूल विदेह अंक / Original issue