कोजग्रा धूमधाम संग मनाअोल जा रहल
पान एलैए । मखान एलैए । धिया पूताके खायके सामान एलैए ।
आई कोजाग्रत पूर्णिमा । नव दम्पतिक घरमे हर्ष वधाई भ रहल अछि । पान मखान आ मिष्ठान्नक खर्च बढि गेल अछि । सन्ध्या वतासा लुटाओल जाएत ।
एहि अवसरपर जानकी मन्दिरमे एक सय एक भाड आएल । असलमे रतौलीक महेन्द्रप्रसाद ठाकुरके परिवार विगत एक सय छ वर्षस‘ कोजाग्रत पूर्णीमाक दिन जानकी मन्दिरमे भाड पठवैत आएल छथि । असलमे ठाकुर परिवार भगवती सीताके बेटी मानैत अछि आ बेटिए जकॉ आजुक दिन पान,मखान,मिष्ठान्न आ कपडा लत्ताक भाड पठवैत आएल छथि ।
आई सन्ध्या जानकी मन्दिरमे सेहो भव्यताकसग कोजाग्रत पूर्णिमा मनाओल जाएत । मैथिलानीलोकनि राम सीताक चुमाओन करौतीह । महन्थ रामतपेश्वर दास वैष्णव सीताक पिताक रुपमे मखान आ बतासा लूटौताह ।
(चित्र श्यामसुन्दर शशि)
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
जगदीश प्रसाद मण्डल- १.वीरांगना
तामक तमघैल
१
वीरांगना
एकांकी
जगदीश प्रसाद मण्डल
पहिल दृश्य-
(अपन-अपन आंगनसँ निकलि रस्ताक भकमोड़ीपर ठाढ़ भऽ...)
सोमना काका : सुनै छी जे रमफलबा आएल हेन?
रूपनी दादी : सएह ते सुनलौं मुदा तेहन लोकक मुँहे सुनलौ जे सुनियो कऽ अनविसवासे अछि। तँए दोसर गोटेसँ भाँज लगबए विदा भेलौं।
चेथरू : नै-नै बात ठीके छिऐ।
सोनमा काका : से तूँ केना बुझै छहक?
चेथरू : ओहन लेाकक मुँहे सुनलौं जेकरा मुँहसँ असत् बात निकलिते ने छै।
सोनमा काका : जेकरा मुँहे ओ सुनने हएत वएह जँ असत् कहने होय, तखन?
रूपनी दादी : से तँ भऽ सकै छै। मुदा तहूमे भाँज छै।
सोनमा काका : से की भाँज छै?
चेथरू : से अहाँ नै बुझै छिऐ काका, जे देखलाहा बजैए ओ सत होइ ैछ आ जे सुनलाहा रहै छै ओइमे दुनू होइ छै।
सोनमा काका : हँ से भऽ सकैए। केहेन लोकक मुँहे सुनने छेलह?
चेथरू : दूधवाली मुँहे सुनने छलौं। वएह जे दूध बेचि कऽ ओइ टोलसँ आएल छलै, बाजलि रहए।
सोनमा काका : उ ते दूध बेचैमे लागल हएत आकि बात बुझै पाछू।
चेथरू : ओकरा अहाँ नीक जकाँ नै चिन्है छिऐ। कोनो की माछ-कौछ बेचैवाली छी जे पएरक औंठासँ पलड़ा दाबि उठा देबै आ घट्टी जोखि देबै।
सोनमा काका : दूधो बेचैवाली तँ पोखरिक पानिये मिला दै छै, से।
चेथरू : हँ, से तँ होइ छै। मुदा ओकर कारोवार रहै छै कएक दिन। बाढ़िक पानि जकाँ आएल आ पड़ाएल।
रूपनी दादी : हँ, से तँ देखै छिऐ जे जहियासँ काज धेलक तहियासँ ने ओकर दूध नप्पा फुच्ची फुटल आ ने नाप-जोखक बदनामी कहियो लगलै।
चेथरू : (अपन पक्ष मजबूत होइत देखि, मुसकिया..) दादी, बुढ़िया देखैमे ने एक चेराक बुझि पड़ैए मुदा गामेक नै, घर-घरक रत्ती-बत्ती बात बुझैए।
सोनमा काका : की सभ कहलकह?
चेथरू : बाजलि जे दिल्लीसँ मालिक अपना गाड़ीपर लादि कऽ पहुूँचा गेलहेँ।
सोनमा काका : एतबे कहलकह आकि आगूओ किछु बजलह?
चेथरू : एतबे बजैमे तँ ओ अपन डाबासँ दूध नापि लोटामे दऽ“” देलक आ उठि कऽ“”विदा भेिल।
सोनमा काका : एहेन-एहेन बात तँ सरिया कऽ ने बुझि लेबाक चाही।
चेथरू : जाइत काल एते बात भनभनाइत सुनलिऐ जे एकटा टाँग काटि कऽ पठा देलकै आ पान साउ रूपैयासँ नोइस हेतै?
सोनमा काका : एते पैघ बात आ कनियो अॅटका कऽ नै पुछि लेलहक?
चेथरू : काका, ओइ बुढ़ियाकेँ की बुझै छिऐ, कोनो की हमरे ऐठामटा अबैए जे निचेनसँ गप-सप्प करब।
सोनमा काका : तखन?
चेथरू : ओ बुढ़िया फुच्चिये-फुच्ची दूधेटा लोककेँ दइ छै आकि मिसरियो घोड़ै छै।
सोनमा काका : से की?
चेथरू : हम की ओते बूझै छी जे तेना भऽ कऽ बुढ़ियाक सभ बात बुझि लेबै, तखन तँ जते काज रहैए ओते तँ भइये जाइए दादी लगमे सभ दिन बैसैत देखै छिऐ।
रूपनी दादी : हँ, से तँ बैसबो करैए आ गामक तीत-मीठ गपो कहैए। मुदा घुरैकाल बैसैए, तँए अखन भेँट नै केलकहेँ।
सोनमा काका : ऐ तत-मतीसँ नीक जे ओकरा घरेपर पहुँच मुँहा-मुँही गप कऽ ली।
चेथरू : काका, तइले तीनू गोरे किअए जाएब। असकरे जाइ छी, सभ बात बुझि कऽ सुनाओ देब?
रूपनी दादी : सभ दिन तोँ चेथरू-के-चेथरूऐ रहि गेलेँ। पोता-पोती भेलौ से होश नै छौ।
चेथरू : दादी, एक ढाकीक के कहए जे सत्तरह ढाकी पोता-पोती भऽ जाएत तैयो अहाँ लगमे चेथरूए रहब। कोनो बात-विचारक जे जरूरत हएत तँ अहाँसँ नै पुछब, सोनमा काकासँ नै पुछबनि तँ की बगुरक गाछ आ पसीद काँटक गाछसँ पुछबै?
रूपनी दादी : देखहक चेथरू, हम अपना नजरिये देखबो करब आ पुछबो करबै, तहिना तोहूँ सोनाइ भेलह किने?
चेथरू : तइ नजरिये कहाँ कहलौं। तीनू गोटे जे एकेटा काजमे बड़दैतौं, तइ दुआरे कहलौं।
रूपनी दादी : से बड़ बेस। मुदा काजक आँट-पेट नै बुझै छहक। कहैले सभ काजे छी, मुदा ओहूमे छोट-पैघ, नीक-अधला होइ छै।
चेथरू : कनी परिछा कऽ कहियौ?
सोनमा काका : ठीके चेथरू, तूँ कहियो पुरूख नै हेबह?
चेथरू : काका, अहाँ सने जे कोनो पुरूखपना काज करबै तइसँ पुरूख नै हेबै।
सोनमा काका : पुरूखक संगी हेबहक। पुरूख तखन हेबह जखन अपने ठाढ़ भऽ आगूक डेग बढ़ेबह। अखन दोसर-तेसर बात छोड़ह आ रमरूपाक भाँज नीक-नहाँति लगावह।
चेथरू : जखन अहाँ सबहक विचार अछि तखन तीनू गोरे चलू।
(तहीकाल आगूसँ जुगेसर अबैत..)
सोनमा काका : जुगे किमहर-किमहरसँ एलह?
जुगेसर : काका, की कहब (गुम्म होइत...)
चेथरू : मुँहक बात दबलह किअए? किछु भेलौं तँ हम सभ समाज भेलौं। न्यायालय भेलौं। अगर हमरा समाजक अंगक संग कोनो अन्याय दोसर समाज करत तँ ओ बरदाससँ बाहर अछि। की सोनमा काका..?
सोनमा काका : चेथरू जे बात तूँ बजलह वएह गामक प्रतिष्ठा छी। मुदा, पाकल आम भेलियह, सभ दारो-मदार तँ तोरे सभपर छह।
चेथरू : जुगे भाय, अहाँ तँ आँखिक देखल बाजब। रामरूपक कि...?
जुगेसर : देखैबला दृश्य नइए। अपने रामरूप ओछाइनपर ओंघराएल अछि आ घरवाली ओछाइनिक निच्चाँमे ओंघरनिया दऽ रहल अछि। तीन सालक बच्चा झाँपल कपड़ा हटा-हटा पएर तकैए।
रूपनी दादी : बाप रे बाप! समाजक एकटा घर उजड़ि गेल।
जुगेसर : दादी, अहाँ नै जाउ। सोनमा काका अहूँ नै जाउ।
सोनमा काका : किअए?
जुगेसर : ओहन दृश्य देखैक करेज आब नै रहल। हो-न-हो पहिलुके नजरिमे ने अपने...?
चेथरू : दादी, कहने तँ पहिने छलौं, मुदा हमरा गपक मोजरे ने देलौं। आब कहू जे कोनो अनरगल कहने रही?
सोनमा काका : हँ, से तँ बात मिलिऐ गेलह। मुदा एते बात बुझि कऽ तँ नै बाजल छलह?अच्छा, एतै बैस कऽ सभ बात कहह।
जुगेसर : एतए तँ लोकक करमान लागल छै। तहूमे धिया-पूता आ आ झोटहा भरि देने अछि। चुट्टी ससरैक जगह नै छै।
सोनमा काका : गप किछु कहह ने?
जुगेसर : कोनो बात की सोझ डारिये चलए दइए। एक तँ कारकौआक जेर जकाँ धिया-पूता काँइ-काँइ करैए तइपर सँ जनिजाति भिन्ने छाती पीटैए।
चेथरू : तैयो तँ भाँजपर किछु गप चढ़ले हेतह?
जुगेसर : हँ, एते उड़नतिये सुनलौं जे डरेवर जाइ काल बाजल जे कारखाना मालिक इलाजमे तीन लाख रूपैया खर्च केलखिन। पाँच सए खाइ-पीऐले, आ लत्ता-कपड़ा सेहो देलखिन।
रूपनी दादी : पान सए रूपैआ कते दिन चलतै। तहूमे सभटा लोथे भेल। जहिना रामरूप तहिना बच्चाक संग बच्चाक माइयो। केना बेचारी दुनूकेँ छोड़ बोनि-दुख करए जाएत।
चेथरू : से तँ ठीके। मुदा दादी झोटहा सबहक विसवास कोन। बेटाकेँ जहर-माहूर खुआ देत आ घरबलाकेँ छोड़ि पड़ा दोसर घर चलि जाएत।
रूपनी दादी : सेहो होइए चेथरू। तोरो बात कटैबला नहिये छह मुदा एक्के दाबिये केना खिचड़ियो रान्हवह आ खीरो। एकटामे नून पड़त एकटामे चिन्नी।
चेथरू : से तँ ठीके कहै छिऐ दादी। एहिना ने भालेसरोकेँ भेल। ओहो जे जौमक गाछपर सँ खसि जाँघ तोड़लक आ डाक्टरो बुट्टी भिड़ा कऽ काटि देलकै। फेर ओ बेचारी (भालेसरक पत्नी) केना छह मसुआ बेटीक संग रहि ता जिनगी घरबलाक सेवा केलक।
सोनमा काका : सोझे सभ गप खिस्सा जकाँ सुनने नै हेतह चेथरू। ओना जुगेसर ठीके कहलकह। अखन छोड़ि दहक। बेरू पहरमे चलब।
रूपनी दादी : हँ, हँ, एहेन-एहेन जगहपर नै गेने समाजक रसे की रहत। समाज तँ तखने ने समाज जखन सबहक सुख-दुख सेगे पोखरिमे नहाइ।
चेथरू : कनिये-कनिये जे सोचै छी दादी तँ बुझि पड़ैए जे समाजपर एकटा भार पड़ि गेल।
(())
क्रमशः..
२
गतांशसँ आगाँ...
एकांकी
तामक तमघैल
जगदीश प्रसाद मण्डल
दोसर दृश्य-
(खैर-चून मिला, रागिनी अल्मुनियम डेकचीक पेनमे लगबैत..)
रागिनी : कपार फुटने लोकक सभ किछु फुटए लगै छै आ जुटने सभ किछु जुटए लगै छै। जखन नूनो-तेल जोड़ैमे भीड़ पड़ैए तखन डेकची कीनब असान अछि। कत्ते दिन चून-खैर साटि काज चलत। जखन फुटि गेल तखन आरो बेसिये होइत जाएत की दढ़ हएत।
(बाड़िये देने झटकल बलाटवाली अबैत...)
रागिनी : किअए सिताएल नढ़िया जकाँ बाड़िये-बाड़ी पड़ाएल एलह हेन?
बलाटवाली : (हँफैत) की कहबनि दीदी, ई की कोनो नै जनै छथिन जे जेहने बेटा अछि तेहने पुतोहू। बीचमे हम दुश्मन।
रागिनी : की करबहक, जखन बेटे माएकेँ नै चिन्हलक, जेकरा नअ मास पेटमे रखलक तखन पुतोहू तँ सहजहि दोसराक बेटी छी।
बलाटवाली : कहै तँ दीदी ठीके छथिन, मुदा होइए इहए कहथु जे ओइ घर-दुआरमे हमर किछाे ने अछि। हम कतौसँ दहा-भसा कऽ आएल छी।
रागिनी : से के कहै छह! लोकक मतिये मरा गेल अछि। जे माए-बाप दादा-दादी एतेटा जिनगी बिता एते देखलक ओ किछु ने आ छौड़ा-छौड़ी किछु ने देखलक ओ बुिद्धयार भऽ गेल अछि। से नै देखै छहक।
बलाटवाली : हँ, से तँ देखै छिऐ। सभ कहैए जे जुग-जमाना बदलि गेल आ किछो देखबे ने करै छिऐ तँ केना विसवास हएत।
रागिनी : जहिना दिशांस लगने लोक पूबकेँ पछिम आ उत्तरकेँ दछिन बुझए लगैए तहिना भऽ गेल अछि।
बलाटवाली : नै बुझलियनि?
रागिनी : जुग-जमाना बदलल नै आगू डेग बढ़ौलक हेन। बदलैक माने होइ छै एकटाकेँ हटा दोसर आनब। से नै भेलहेँ। जँ से होइते तँ देखतहक सभ किछु आगिमे जड़ि गेल आ बाढ़िमे दहा गेल आ फेरसँ सभ किछु नवका भऽ गेल।
बलाटवाली : छोड़थु ऐ मगजमारी गपकेँ। अपन बात विसरि जाएब। अनकर गप सुनने मगज भरियेबे करै छै। जाबे अपन बात नै बुझब ताबे माथ हल्लुक केना हएत?
रागिनी : की भेलह हेन जे एते....?
बलाटवाली : िक कहबनि खेलरा-खेलरीक गप, दुनू एके रंग अछि। एते दिन मौगीक गप नीक लगै छलै, आब जे हुकुम चलबए लगलै तँ बकछुहुल लगै छै।
रागिनी : तूँ तँ केहन बढ़िया जीबै छह। दुनू पहर दू पथिया घास अनै छह आ दुनू साँझ खाइ छह। बेटा-पुतोहू जे घर दफानिये लेलक तँ आते जाने हल्लुक केलकह किने?
बलाटवाली : हँ, से तँ भेल। मुदा से देखल जाइए। जते काल बाधमे रहै छी ततबे काल ने, जखन अंगनामे रहै छी तखैन केना देखल जाएत।
(तही बीच सुनरलाल ललकैत अबैए..)
सुनरलाल : दादी, ऐ बुझ़ियाकेँ पूछियौ जे किअए छिटकल घुरैए।
बलाटवाली : दीदी, ऐ छौड़बाकेँ पूछियौ जे हमरा माए बुझैए। तखन ते अपन बनाओल घर छी, लछमीक (गाए) सेवा करै छी वएह पार लगौताह।
सुनरलाल : हम तोरा माए नै बुझलियौ आकि अपने पुतोहूकेँ कपारपर चढ़ा लेलेँ। जे तोरा कपारपर चढलौ ओ कुदि कऽ हमरा कपारपर नै चढ़ि जाएत।
बलाटवाली : हँ रौ, चारू कातसँ हारलेँ हेँ तखैन तूँ हमरा बुझबै छेँ। आइ तक एक्को दिन भेलौ जे माएकेँ कोनो तीरथ करा दिऐ। ई तँ धैन दीदी जे लाटमे जनाकोपुर, सिंहेसरो आ कुशेसरो देखलौं।
रागिनी : (बलाटवालीकेँ चोहटैत) तोहूँ बेड़े बजै छह, अखैन तक अपन उमेरोक ठेकान नै छह। किअए बुढ़ियापर बिगड़ल छहक बौआ?
सुनरलाल : माएपर किअए बिगड़ब। देखियौ जे हाथपर ओते पाइ नइए जे पनरहम दिन बेटाक नाआें कोचिंगमे लिखाएब तइपर सँ कन्यादानी नौत सासुरसँ चलि आएल हेन?
बलाटवाली : दीदी, बात छिपा कऽ बजै छन्हि। ई दुनूटा चाहैए जे गाए बेचि भोज खा आबी।
रागिनी : कनी फरिछा कऽ कहह?
बलाटवाली : ऐ धड़कटहाकेँ पुछथुन जे मात्रिक उसरि गेल आकि अछि। इज्जत बँचबै दुआरे भातिज सभकेँ कहि देलिऐ जे बौआ, आब ओते चलि-फिर नै होइए जे आएब-जाएब करब। ओहो सभ परदेशिया, गाम अबैए तँ दस-बीस रूपैइयौ आ लत्तो-कपड़ा दऽ जाइए। एकरा पुछथुन जे एक बीत नुओ कीन कऽ दइए।
रागिनी : तोहूँ बड़ रगड़ी छह बलाटवाली। कनी फरिछा कऽ कहह बौआ?
सुनरलाल : दादी, ननौरवालीक बहीन बेटीक बेटीकेँ विआह छी। सभटा परदेशिया भऽ गेल नवका-नवका विधि बेबहार सभ करैए। पुरना गामक लोक लए छोड़ि देने अछि। रमेशक सभ संगी झंझारपुर कोचिंगमे नाअों लिखाओत, ओकरा हम नै लिखेबै से केहेन हएत?
रागिनी : ऐ काजमे के मुहछी मारतह। भगवान करथुन चारियो अक्षर जे पढ़ि लेतह ओते नीके हेतह किने। अहूना लोक बजैए जे पढ़ल-लिखल हरो जोतत तँ सिरौर सोझ हेतै। कनियाँक की विचार छन्हि?
सुनरलाल : ओ कहैए जे सबहक ठाठ-बाठ बजरूआ रहतै तइठीन जे हम जाएब से केना जाएब। हमरा देख ओ सभ हँसत नै।
रागिनी : बौआ, जाबे असथिर मनसँ घरक नीक-अधला नै बुझबहक ताबे एहिना हेतह। तोरा जे कहबह से अपने नै देखै छह। बेटा-पुतोहू शरहमे खेत कीनलहेँ। घर बनाओत। आ हम ऐठाम नून-तेल ले मरै छी।
सुनरलाल : अखनो जे एक रती चुहचुही अछि से अही बुढ़ियापर। खेत-पथारक कोनो लज्जति अछि। गोटे बेर बाढ़िये चलि अबैए तँ गोटे बेर रौदिये भऽ जाइए। गोटे साल हबे तेहेन बहैए जे दने भौर भऽ जाइ छै। कीड़ी-फतीगिंक चरचे कोन।
रागिनी : बौआ, घरक पुरूख तँ तोंही ने छहक? तोंही ने गारजन भेलहक?
सुनरलाल : हँ, से तँ छिऐ मुदा कियो मोजर देत तखैन ने। ई बुढ़िया अखनो बेदरे बुझैए तँ घरवाली की बुझत?
बलाटवाली : थूक देथुन एहेन छौंड़बाकेँ?
रागिनी : दुनियाँमे माइयक सेवा बेटाक लेल ओहन होइत जेकर जोड़ा नै छै। तखन रंग-बिरंगक माए-बाप, बेटा-बेटी भऽ गेल अछि। तँए दुनियाँ दिस नै देख अपन ऐनामे माएकेँ देखि हृदैमे समुचित जगह देबाक चाही।
बलाटवाली : दीदी, पैघ फड़क पैघ लत्ती होइ छै, मुदा छोटक तँ छोटे होइ छै।
रागिनी : हँ से तँ होइ छै। अच्छा बौआ, एते दूरक लत्ती केना पकड़ि लेलकह। नैरह-सासुर धरिक लत्ती तँ ठीक छै मुदा नोनी साग जकाँ केना एते चतरि गेलह।
सुनरलाल : दादी, की कहब। ई सार मोबाइल जे ने करए। मोबाइलेपर नौत-पिहान, ए.टी.एम.सँ लेन-देन तेहन रस्ता धड़ा देलक हेन जे फुदियोसँ बेसी लोक उड़ए लगल हेन।
रागिनी : बौआ, अनकर की कहबह, अपना पोताकेँ दस बर्ख भऽ गेल अछि, अखैन तक एक नैन देखलौं तक नै। तखन ते छातीमे मुक्का मारनहि छी जे जखैन बेटे नै तखन पुतोहुए आ पोते-पोती कतए।
सुनरलाल : तखन की करी दादी?
रागिनी : बौआ, किछु जे धाँइ दे कहि देबह से नीक नै हएत। किअए तँ घरमे (परिवारमे कते) कते रंगक लोक रहैए। अपना रंगे सभ देखै छै। तँए एके बात एककेँ नीक लगै छै दोसरकेँ अधला। जेकरा अधला लगतै ओ तँ अधले कहत।
सुनरलाल : दादी, अहाँक बात माइयो मानैए। अहाँ जे कहब सएह करब।
रागिनी : बौआ, देखहक जखने कमाएत कोइ आ खर्च करत कोइ तखने किछु-ने-किछु गड़बड़ हेबे करत।
सुनरलाल : तखन?
रागिनी : यएह जे परिवारकेँ सभ संस्था बुझि इमनदारीसँ जीबाक चाही।
सुनरलाल : ननौरवाली केना सुढ़िआएत?
रागिनी : बौआ, बेटा तोरे नै ननौरोवालीक छिऐक। स्कूलमे की खर्च होइ छै से तँ तूँ बुझै छहक। मुदा माए नै बुझै छै। तँए कहक जे रमेशक नाओं स्कूल जा लिखा दिऔ।
बलाटवाली : बेस कहलिऐ दीदी। बैसल-बैसल देह पोसैए आ बात गढ़ैए। भने कहलिऐ?
सुनरलाल : कहने थोड़े चलि जाएत। कहत जे बुझले ने अछि बौआ जाएब।
रागिनी : (मुस्कुराइत) बौआ, यएह बात सभकेँ बुझए पड़तै। सोझे कौआ जकाँ अकासमे कुचड़ने नै हेतै।
बलाटवाली : दादी कहथुन ने, जे हाटपर दू सेर सीम भट्टा कीनत तँ सेगे दुनू गोरे जाएत। आ स्कूलमे जा कऽ नाओं लिखा देतै, से नै हेतै। तइकाल पाग उतड़ि जेतै।
रागिनी : बेस तँ कहलहक।
(())
क्रमश: .......
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
नवेंदु कुमार झा
१.