छठिमाइके आसि आ लोकजीवनमे हिनक महत्व
व्रत उपवास आ पावनि –तिहारस’ लोकक जीवनमे आनन्द–उत्साह एवं आस्था–निष्ठाक बाढ़ि–बड़कैतस’ जीवन आनद्यमय बनि जाइत अछि । मिथिलाक अप्पन पावनि–तिहारस’ लोकक जीवनधारा राग–रंगस’ भरि जाइते अछि । एतुका परम्परागत पावनि सबमे छैठक आसि आ महिमा सर्वोपरि रहने आ एकर विध–विधानमे, ओरिआओन बस्तु–जुटानमे स्वच्छता आ शूद्धतापर अधिक ध्यान देने ई पावनि सबस’ बढ़का अछि । परम ईश्वरके शास्त्रे–पुराण आ ज्ञानीए–धर्मी लोक अधिकतर चिन्हैत जनैत अछि, आम अछरकटू लोक छैठपरमेश्वरीएके अधिक जनैत छथिन आ ईह्े ममतामयी एहि लोकके लेल सबकिछु छथिन, सर्वोपरि छथिन ।
छैठपावनि किथिलामे लोकपूजाक रुपमे विख्यात अछि सेहो मुख्यतः स्त्रीगणद्वारा कएल जाइत अछि आ हिनकास’ सम्वन्धित अनेको राग–भावक गीतसब अछि जे लोकमन्त्रक रुपमे प्रयुक्त होइत रहल अछि । छैठक लोकगीत छठिक अर्ध जकाँ निछुन आ अपरिवत्र्तनीयसनके अछि, परम्परागत अछि आ एहिमे रिमिक्स वा प्रयोगधर्मिता आँकड़ बातर जकाँ छँटा, थुकड़िक’ अलग कए देल जाइत अछि । एकर पाछू एकर सबस’ कहत्वपूर्ण आ मूल कारण ई लगैत अछि जे ई लोकगीत परम्परा सिद्ध अछि आ आधुनिकगीत जा धरि एहन सिद्धिप्राप्त नहि कएल लेत तावत ई प्रचलनके मूलधारमे समाहित भइए ने सकैछ ।
छैठपावनिमे आदिेदेव भगवान सूर्य आ छैठपरमेश्वरीक पूजा एकहि दिन– षष्ठी–तिथिके, एकहि ठाम, एकहि अर्ध आ एकहि विधि–विधानस’ भेने ईपूजा छैठपूजा, त’ कहबैत अछि मुदा बहुतोलोक भगवती छैठमाइस’ अनभिज्ञ रहने, एहन बूझि भूूूूलियो क’ लैत अछि । एहि लोकपूजामे दिनस’ अधिक सन्ध्या आ रात्रिक महत्व अधिक अछि आ तएँ किछु लोक एकरा डुबैत सूर्य तथा विहान भेने उगैत सूर्यक अर्धस’ जोड़िक’ देखैत छथिन । सूर्यके जलक अर्ध बड़ पसिन्न छैन आ सबस’ बेसी प्रसन्न जलार्ध देनिहारस’ होइत छथिन्ह तथापि छैठदिन जे हिनक पूजा विभिन्न पकवानसबस’ होइत छन् िताहिस’ ई अछिक तिरपित होइत लोकके लहदह बरदान दैत छथिन्ह एहन शास्त्र वचन आ लोक मान्यता रहल अछि । सूर्यके एक दिन सासुरमे यन्त्र–छापस’ साँचल ठकुआ तान्त्रिक रहस्यस’ भरÞल भुसबा खिअएलकनि आ ई पकवान आ विन्यास हिनका बड़ पियरगर लगलनि आ तएँ हिनका ईहे पकवान अरवसिक’ चढ़ाओले जाइत छनि ।
छैठपावनि मिथिलामे लोकपरम्पराक पूजा रहल होइतोमे एकर प्रचलनक पौराणिक महत्वक अछि आ ब्रह्मवैवर्तपुराणक प्रकृति खण्डमे बहुत विस्तृत रुपमे वर्णन कएल गेल अछि । भगवती षष्ठीदेवीके शिशुसबक अधिष्ठात्री देवी निरुपित कएल गेल अछि । धीयापूताके दीर्घायु बनाएब, हुनक रक्षण एवं भरण–पोषण कएनाइ षष्ठीक स्वाभाविक गुण अछि । पुराणसबमे षष्ठी देवीके बहुत महिमा–मण्डित कएल गेल अछि । मूल प्रकृतिक छठम् अंशस’ प्रकट भेनेस’ हिनक ’षष्ठी’ पड़ल छन्हि । संस्कृतक षष्ठ शब्द मैथिली छठम् अर्थमे प्रयुक्त अछि आ तए हिनका छैठ, छठि मैया कहल जाइत अछि ।
बढ़का पौराणिक घर–परिवारक ई भगवती छथिन्ह । ई ब्रह्माक मानसपुत्री एवं शिव–पार्वतीक जेठकी पुतौह आ स्कन्दक प्राणप्रिया छथिन्ह । हिनका देवसेना सेहो कहल जाइत छन्हि, सएह नहि विष्णुमाया आ बालदा से कहल जाइत छन्हि । ई माता भगवतीक सोलह मातृका सबमे परिगणित छथि आ अपना समाजमे ई लड़िकोड़ी माताक रुपमे सेहो चिन्हल जाइत छथिन्ह । ई अपन योगक प्रभावस’ शिशुक सङे सदैव बुढ़ियामाइके रुपमे विद्यमान रहैत छथिन्ह आ हुनक रक्षा एवं भरण–पोषण करैत रहैत छथिन्ह । धीयापूताजे सपनामे खियबैत, दुलारैत, हँसबैत एवं अभूतपूर्व वात्सल्य प्रदान करैत रहैत छथिन्ह । ईएह कारण अछि जे सबशिशु अधिकांश समय सुतनाइए पसिन करैत अछि । निन्ह टुटिते बालकक नजरि भगवति परस’ हटने आ हुनकाकोरास’ अलग लगने ओ कान–खिज लगैत अछि । र्ईएह भगवती निनियाँरानी, निन्नवाली बुढ़िया छथिन्ह आ लोरीस’ पड़िकल धीयापूता जावत निनियाँगीत गाबिक’ बजाओल नहि जाइत अछि तावत सुतिते नहि अछि । लोरीक लरमे सुखनिनियाँक अपूर्व स्वर राग आ वात्सल्य भावसहित निनियाँ बुढ़ियाक उपस्थित रहैत अछि ।
मैथिलीमे निनियाँगीत सुताब’लेल आ घुघुआ झुलुआ गीत हँसाब’–खेलाब’ आ भुलाब’ लेल प्रयुक्त होइत अछि । एहि शिशुगीतके बाल–मन्त्र सेहो अछि, कहल जा’सकैछ । एकर प्रचलन अत्यन्त प्राचिन आ अटुट रुपस’ अछि ।
—आगे निनियाँ आ’ । बौआके सुतो
सात बड़दके निनला’
आगे निनियाँ जनकपुरस’
खटिया मङा देवौ पटनास’
आगे निनियाँ खजन चिड़ैया
अण्डा पारि–पारि जो
तोरा अण्डाके आगि लगतौ
बौआ सुतो ।
०००
—आगे निनियाँ कटबोै कान
बौआला’ लबिहे फोंका मखान
आगे निनियाँ कटबौ कान
बौआला’ अबिहे पीरे लताम
आगे निनियाँ,
अबैछी !
बौआला’ निन लबैछी ।।
निनवाली बुढ़ियाके अर्थात छठि मैयाके अनेको तरहे अरोधिक’ बजाक’ बौआ–बुच्ची सबके सुतएबाक अनुरोध कएल जाइत अछि । लोरी आ सुखनिनियाँबीचमे इएह निनबाली बुढ़िया आ लोरी गीतक मधुर रस–भावरहने एकर प्रभाव उत्तम संस्कार सनके जीवनपर गम्भीर रुपस’ पड़ैत अछि ।
वैदिक विधि अनुसार भगवती षष्ठीक ध्यान एना कएल जाइछ—
—देवी मञ्जनसङकाशा चन्द्राधकृतशेखराम् ।
सिंहारुढां जगद्धात्रीं कौमारीं भक्तवत्सलाम् ।।
खड़गं खेतं च विभ्राणाममयं वरदां तथा ।
तारकाहार भूषाढयां चिन्तयामि नवांशुकाम् ।।
ध्यान अराधनामे हिनका इहो कहल गेल छन्हि जे सुन्दर पुत्र, कल्याण तथा दया–प्रदान करएबाली ई प्रकृतिक छठम् अंशस’ उत्पन्न जगत्माता छथि । श्वेत चम्पक–पुष्पक समान हिनक वर्ण अछि । ई रत्नमय आभूषणस’ अलंकृत छथि । एहि परम चित्स्वरुपपिणी भगवती देवसेना षष्ठी देवीके आराधना करैत छी—
—षष्ठांशा प्रकृतेः शुद्धां सुप्रातिष्ठाश्च सुव्रताम् ।
सुपुत्रदाञ्च शुभदां दयारुपां जगतप्रसून ।।
श्वेत चम्पक वर्णाभां रत्नभूषणभूषिताम् ।
पवित्ररुपां परमां देवसेनां परां भजे ।।
—व्रह्मवैवत्र्तपुराण, प्रकृतिखण्ड ४३÷४९ पृ.
षष्ठी मैयाक पूजा छठियारी पूजा दिन होइत अछि आ ई पूजा प्रत्येक बच्चाक जन्मक छठम्दिनमे विध्नेश, जीवन्तिको देवीक संगहि कएले जाइत अछि । जन्मौटी धीयापूताक भाग्य, आरोग्य आ औरदादि लेख ओहि दिन लिखाइत होइतोमे चैती छैठ आ कैतकी छैठके परम्परा बहुत प्रचलित अछि ।
हिनक महिमाके गुणगाण ऋषिमुनि एहि मन्त्रमय शब्द–भावमे कएने अछि–
— नमो देव्यै महादेव्यै सिद्धियै शान्त्यै नमो नमः
शुभायै देवसेनायै षष्ठीदेव्यै नमो नमः
देवरक्षणकारिण्यै षष्ठी देव्यै नमो नमः
शुद्धस्त्वस्वरुपायै वन्दितायै नृणं सदा ।।
— ब्रह्म.प्र.ख.— ४३÷५७–६६
भगवती सिद्धि एवं शान्तिके नमस्कार अछि ! शुभा, देवसेना एवं भगवती षष्ठीके बेर–बेर नमस्कार । वरदान देनिहारि, पुत्र देनिहारि, धन देनिहारि, सुख–प्रदान कएनिहार एवं मोक्षदात्री भगवती षष्ठीके बेर–बेर नमस्कार ।
मूलप्रकृतिक छठम् अंशस’ प्रकट शक्तिस्वरुपां भगवती सिद्धिके नमस्कार । माया, सिद्धि योगिनी, स्वयं मुक्त एवं मुक्तिदात्री, सारा, शारदा आ परादेवी नामस’ शोभा पौनिहारि भगवतीके नमस्कार अछि । बालकक अधिष्ठात्री, कल्याणदात्री, कल्याण स्वरुपिणी एवं कर्मक फल देनिहारि देवी षष्ठीके नमस्कार अछि ।
अपन भक्तके प्रत्यक्ष दर्शन देनिहारि तथा सबकेलेल सम्पूर्ण कार्यमे पूजा प्राप्त करबाक अधिकारिणी स्वामी कात्र्तिकेयक प्राणप्रिया देवी षष्ठीके बेर–बेर नमस्कार अछि । मनुष्य जिनकर नित्य वन्दना करैत अछि आ देवतालोकनिके रक्षामे जे तत्पर रहैत छथि ओहि शुद्धसत्व स्वरुपा देवी षष्ठीके नमस्कार अछि । हिंसा आ क्रोधस’ रहित देवी षष्ठीके नमस्कार ! हे सुरेश्वरी ! अपने हमरा धन दिअ, प्रिय पत्नी दिअ, पुत दिअ, धर्म दिअ, यश दिअ । हे सुपूजिते ! अपने हमरा भूमि दिअ, प्रजा दिअ, विद्या दिअ आ कल्याण एवं जय प्रदान करु ।
सोइरीघरमे निवास कएनिहारि षष्ठीदेवी ! परम भक्तिस’ पूजित हुअ’बाली अपने हमरा दीर्धायु प्रदान करु । अपने जन्मसम्बन्धी सुखके जननी छी ! धन–सम्पत्तिके वृद्धि कएनिहारि छी, सब प्राणीके उत्पत्ति स्वरुपा छी !
भगवती षष्ठीदेवीक वात्सल्य–महिमा एवं असीम अनुकम्पाक ई विलक्षण कथा सर्वप्रथक नारदजी, भगवान नारायणस’ सूनने रहथि, जकर विस्तृत वर्णन ब्रह्मवैवर्तपुराण, प्रकृति–खण्डक ४३म् अध्यायमे तथा श्रीमद्देवीभागवतक नवम् स्कन्धमे उलेख अछि ।
०००
२
अतुलेश्वर