सामाजिक मूल्य मान्यताकें चोच मारैत ‘चिड़ै’
सुजीतक प्रायः कथासभ भावनाक धरातलपर बनल मानवीय सम्बन्ध आ सम्बेदनाकेँ कुरेदवाक प्रयास करैत अछि । प्रायः कथासभ स्त्री पुरुष सम्बन्धपर केन्द्रित अछि । ओना किछु कथा सभ पितापुत्र सम्बन्ध, बाबा पौत्रीक सम्बन्धपर सेहो आधारित अछि । सुजीत जी अहि अर्थमे धन्यवादक पात्र छथि जे ओ समाजिक धरातल सँ उपर उठि मानवीय भावना आ सम्बेदनाकेँ धरातलपर सम्बन्धकेँ समझबाक आ समझेबाक प्रयास करैत छथि । एकरा की कहल जाए जँ कोनो पति अपन पत्निकेँ मृत शरीर ओकर प्रेमीकेँ सोपि दैक ? किछु एहने सन कथावस्तु छैक ‘एकटा अधिकार’केँ जाहिमे एकटा पति एरोप्लेन एक्सीडेन्टममे छतविछत भेल अपन पत्निकेँ मृत शरीर उपरक अपन अधिकार अपन पत्निक प्रेमीकेँ हस्तान्तरण कऽ दैत अछि । निश्चित रुप सँ अहि कथाक पति मानविय भावनाकेँ सम्मान करैत छैक । ‘भौजी’ कथामे नायक राजन एकटा विधवा सँ प्रेम करैत अछि आ ओहि विधवा सँ विवाह सेहो करय चाहैत अछि । तहिना ‘चिडै’ कथामे अन्तर वैवाहिक सम्बन्धक कटु यर्थाथकेँ उजागर कएल गेल अछि । कथाकेँ नायिका उषा जखन ओकर विवाहित प्रेमी मनोज ओकरा गुण्डासभकेँ बीच छोडि लोक लाजककेँ कारणे परा जाइत छैक ।
सुजीतजीक कथासभ किछु एहन सम्बन्ध जकर अनुमति प्रायः मैथिल समाज नहि दैत छैक तकर विभिन्न पक्षकेँ देखार करैत अछि । निश्चित रुप सँ अन्तर वैवाहिक प्रेम आ सम्बन्ध आ विधवा विवाह एकटा समाजिक अपराध मानल जाइत छैक , मैथिल समाजमे । हुनक बहुत रास कथासभ समाजिक मूल्यमान्यताकेँ चाइलेन्ज करैत अछि ।
एहन बात नहि छैक जे कथाकार समाजिक व्यवस्था सँ बाहर वनल सम्बन्धक अध्ययन मात्र करैत छथि । ‘बाबाजी’ कथामे एकटा बृद्ध व्यक्तिक अन्तिम अवस्थाक कारुणीक विवरण अछि आ स्वार्थपर ठाढ सम्बन्धक यर्थाथ परक विश्लेषण सेहो कएने छथि । ‘वनैत विगरैत ’ कथा एकटा रिटाइर्ड व्यक्तिक व्यथा छैेक । पिताकेँ ठेस जखन लगैत छन्हि जखन हुनका बुझवामे अवैत छन्हि जे हुनक पुत्र नागेश्वर अपन पिता सँ बेसी सम्पति प्रति चिन्तित छथि । तहिना ‘ढोल’ कथा पति प्रेमक लेल व्याकुल पत्नीक मनोदशाक विश्लेषण अछि । हुनक प्राय कथा सँ सम्बन्धक बनैत बिगरैत अवस्थाकेँ विश्लेषण करैछ । समाजिक व्यवस्थाकेँ भितर होइक या वाहर सुजीतजीकेँ कथासभ सभ अर्थमे मानविय सम्वेदनाकेँ कुरेदैत अछि । समाज अपन मुल्य मान्यताक आधारपर नैतिकताक आ अनैतिकताक तराजु बनबैत अछि । समाजिक मुल्यकेँ अनुकूल कार्यकेँ नैतिकताक संज्ञा देल जाइत अछि आ प्रतिकूल कार्यकेँ अनैतिकताक । मुदा सूजीतजी समाजिक मूल्य सँ उपर उठि मानवीय मुल्यकेँ धरातलपर नैतिकताक परिभाषित करैत छथि । उषा एकटा विवाहित पुरुष सँ प्रेम करैत अछि , ओकरा सँ सम्बन्ध स्थापित करैत अछि । उषा अपन प्रेमीकेँ भावनाकेँ कदर करैत अछि । कथामे कतहुँ ओकर नैतिकतापर प्रश्न चिन्ह ठाड़ नहि कएल गेल अछि । मुदा मनोजक नैतिकतापर अवश्य प्रश्न चिन्ह ठाढ़ भऽ जाइत छैक । जखन ओ अपन प्रेमिका नलिनीकेँ गुण्डासभक बीच छोरि परा जाइत अछि आ घायल नलिनी होस्पीटलाइज भऽ जाइत अछि । सुजीतजीक कथासभ बदलैत मानविय सम्बन्धकेँ उजागर तऽ करैत अछि मुदा ओकर पाछा वदलैत राजनीतिक आर्थिक आ सामाजिक परिवेशकेँ समेटवाममे असफल देखल जाइत छथि ।
मुनष्यक मनोदशा ओकर बनैत बिगरैत सम्बन्ध बहुत हदधरि समाजिक राजनीतिक आ आर्थिक परिवेशद्वारा निर्धारित होइत अछि । अहि पक्षसभदिस कोनो साहित्यकारकेँ अपन कला मार्फत इंगित करब ओतबे जरुरी होइत अछि । कथामे पात्रसभ एकटा खास परिवेशमे क्रिया आ प्रतिक्रिया करैत अछि । सुजीतजी ओहि प्रवेशकेँ नहि राखि पाएल छथि । हम अपन बात एकटा उदाहरणक माध्यम सँ प्रष्ट करय चाहैत छी ‘प्रियंका’ कथामे कथा वाचककेँ नायिका प्रियंका बसमे भेटलन्हि । बसमे तऽ आर लडकीसभ छल हैत । जखन बसपर सँ उतरलै तखनुका परिवेश केहन छलै ? की बस प्रियंकाकेँ ओकर मन्जिलधरि पहुँचेलकैक ? ओकर मोनमे सेहो बस चलैत छल
हैतै ? ंिप्रयंका निश्चित रुप सँ अपन मन्जिलधरि नहि पहुँच पबैत अछि । ओना ओकर वेग बड तेज छैक । बस, बसक वेग , वस स्टेण्ड, जीवन गाडी, वाट, सहयात्री आ जीवन लक्ष्य ई सभ चिजकेँ जँ कथाकार समायोजन कऽ पवितथि तऽ प्रियंका कथा आर मुखर भऽ अवितैक । वास्तवममे देखल जाए तऽ कथाकार प्राय कथासभमे बिम्बकेँ सही समायोजन नहि कऽ पाएल छथि । एकठाम मात्र हमरा भेटल जतय ठण्ढा हवा आ धुनि पिता आ पुत्रकेँ ठण्डाइत सम्बन्धकेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि ।
‘धधकैत आगि आ फुटैत कनोजरि’ कथामे कथाकार खण्डित करैत नजरि अबैत
छथि ।
स्वप्नमे स्वयंकेँ उपस्थिति अनिवार्य रहैत छैक । सम्पूर्ण कथाकेँ घटनाक्रम कथाक नायिका जयन्तिक सपनामे घटैत देखाओल गेल अछि । तखन कथाकेँ सुरुवात ड्राइवर आ खलाासी बीचक वार्तालाप सँ कोना भऽ सकैत अछि । ततबे नहि कथामे किछुदेरक बाद नायिकाकेँ प्रवेश कराएब की उचित अछि ? की सपनाक यर्थाथकेँ खण्डित नहि करैत
अछि ? कथा सेहो मानव जीवनककेँ कलात्मक अभिव्यक्ति छैक । कोनो कलामे ओकर गढनी महत्वपूर्ण बनि जाइत छै । शब्द, विम्ब, पात्र आ कथावस्तुकेँ सही संयोजन सँ मात्र कथा जिवन्त भऽ सकैत अछि । कथा एकटा मौलिक अभिव्यक्ति सेहो होइत अछि । कथाकार जीवन जगतकेँ एकटा नयाँ ढंग सँ देखबाक प्रयास करैत छथि । सुजीतजीक अहि दूनु अर्थमे आशिंक सफलता भेटल छन्हि ।
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दुर्गानन्द मण्डल
सहायक शिक्षक-
उ.वि.झिटकी बनगामा (मधुबनी)
पोथी समीक्षा-
मौलाइल गाछक फूल
जेना लगातार पाँच-सात सालक प्रचंड रौदी भेलाक बाद जौं रोहनि नक्षत्रमे एकटा कसगर अछार हुअए तँ गिरहत सभहक मोन फूलकोका जकाँ खिल उठैत छैक। सभ कियो खेत-पथार जोति, तामि-कोरि, खढ़-पतार सभ बाले-बच्चा मिल ओलि-पालि कऽ देबे सेबे बिहनि खसबैत छैक। गोर दसे दिनक पछाति हरिअरकंच बिहैनक टेम बिरारमे निकलए लगैत अछि। गिरहत सभ पोखरि-झाखरि दिस दिसा-मैदान करैत बॉसक उभ्भीबला दतमनि करैत लोटा नेनहि बिरार दिस चल जाइत छथि। बिरारमे उपजल हरियरकंच बिहैन देख आत्मा जुड़बैत छथि। देखते-देखते बिहैन पैघ भऽ जाइत अछि। गिरहत सभ ऐ आशामे पाँच-सात सालसँ बर्खो नै भेल जौं ऐबेर समए संग देत तँ बाले-बच्चा मिल खूब जतनसँ खेती करब आ ऐ रौदीसँ छुटकारा भेट जाएत।
दिन दसे-पनरेहक बाद अारदारा चढ़िते खूब कसगर बर्खा भेल। आ गिरहत सभक आत्मा गूलाबक फूल जकाँ खिल उठल। किनको खुशीक कोनो सिमा नै। सभ बाले-बच्चे लाठी-बहिंगा (पटै), हर-कोदारि, चौकी आदि लऽ खेती करए लेल खेत दिस चललाह। आ कृपा महादेवक जे ऐ साल समए नीक रहल, संग देलक आ मनसंम्फे उपजा भेल। सभ आनंदित छथि। एकटा नव उत्साह आ आनंदक संग दोहाइ दै छथिन परमपिता परमात्माकेँ।
ठीक तहिना उपन्यासकार जगदीश प्रसाद मंडल जीक द्वारा लिखल उपन्यास “मौलाइल गाछक फूल”सँ पाप्त भेल खुशी आत्माकेँ तृप्ति कऽ देलक। प्रो. हरिमोहन झा जीक बाद बुझू जे मैथिली साहित्याकासमे बड़का रौदी नै अपितु अकाल पड़ि गेल छल। पाठक-बन्धु हक्कोपरास छलाह, उपन्यास नामक वस्तु पाठककेँ हेरने नै भेटैत छलनि। आत्मा तँ उपन्यास पढ़ए लेल सदिखन व्याकुल रहैत छल। जइ कमीकेँ मण्डलजी दूर कऽ देलनि। लगातार एक-सँ-एक चिक्कन-चूनमुन उपन्यास लिख ने मात्र भारते उपितु आनो-आन देशमे रहएबला मैथिली भाषीक नजरिमे ख्याति पौलन्हि। अपन देशक कथे कोन नेपालक जनकपुरसँ लऽ तराइ क्षेत्रमे सेहो हिनक लिखल पोथी, उपन्यास, कथा संग्रह, कविता संग्रह, नाटक, एकांकी इत्यादि साहित्यक सभ विधा केर पोथी सहजताक संग उपलब्ध अइ। पोथी उपलब्ध सेहो मैथिली साहित्य लेल एक नवीन बात थिक। ओना ऐ लेल हम श्रुति प्रकाशनकेँ अलगसँ धन्यवाद देत छियन्हि।
प्रस्तुत उपन्यासमे अपने अपना अनुसारे कतौ कोनो तरहक कोनो तरहक कमी नै रखने छी। अपितु सागरमे गागर भरि समाजक सभ वर्ग, सभ जाति, स्त्री-पुरूष, ऊँच-नीच, छोट-पैघ, नीक-बेजाए, धनीक-गरीब, नेना-भुटका, जवान-जुआनक लेल एकटा अलग संदेस छोड़एमे कतौ कमी नै रखलनि। जे पाठककेँ एक सांसमे उपन्यास पढ़ि जेबाक लेल बाघ्य कऽ दैत अछि। हमरा अनुसारे ई एकटा बड्ड पैघ उपन्यासकारक सार्थकता सिद्ध भऽ रहल अछि। यर्थाथवादी रूपमे गाममे रहितौं उपन्यास पढ़ए काल एहन लगैत अछि जे हम गाम नै अपितु मद्रासमे छी। मुदा मद्रासक चािल-वाणि, रहब-सुतब, लोक सबहक बाजब-भुकब, पैघ-पैघ कोठा-सोफा, अतिआधुनिक पैखाना घर आदि रहलाक बादो अपने अपना गामक माटिक यादि नै बिसरि सकलौं। जे रामाकान्त बाबू अपन गामक सोन्हगर मािटक सुगंधक सिनेहकेँ स्पष्ट करैत कहैत छथि- “हौ जुगे, बिना माटिये हाथ कोना मटियाएब?”
उपन्यासक पात्रक नामक अनुसार गुणक विलक्षण समाबेस करब अपने कतौ नै बिसरलौं। नामक अनुसारे कामकेँ अपने स्पष्ट देखौने छी। समाजक जे जेहन लोक जेहन पदपर पदस्थापित छथि। ओइ कार्यक लेल समर्पण उपन्यासक विशेषता बतबैत अछि। ठाम-ठाम अध्यात्म, दर्शन, अपना संस्कृति आदिकेँ दर्शादा देब सभ पाठकक लेल मोन राखक योग्य बुझना गेल। यथा- “ई भूमि जनकक राज मिथिला थिक। तेँ मिथिलावासीकेँ जनकक रास्ता पकड़ि हमरा लोकनिकेँ चलक चाही, जाहिसँ प्रतिष्ठा सभ दिन बरकरार रहत।”
ऐ उपन्यासक प्राय: सभ पात्रक चरित्र अति पवित्र, सामजिक समरसतासँ भरल बुझना जाइत अछि। हुनका लोकनिक सहज सज्जनता प्रकृत प्रदत्त बुझाइत अछि। समाज सुधारक जौं कोनो कथा हुअए तँ प्राय: सभ एक-दोसराक प्रति ओतबे जिम्मेवार स्वभावत: बुझना गेल जे एकटा सुसभ्य समाजक सामाजिक चिंतनक प्रति कर्त्तव्यनिष्ठ बुझना जाइत छथि। उपन्यासक केन्द्रीय पात्र रामाकान्त बाबू छथि। जे एकटा नीक जमीनदार होइतो सामाजिक कर्त्तव्यपरायणता, इमानदारी, समाजक सभ जातिक प्रति सिनेह, उदारचित्त विचारधारा, वास्तविक मानवतावादक चित्र, मानवक प्रति कर्त्तव्य ओकर दुख-सुख, मरनी-हरनीमे संग पुरब, हिनक चारित्रिक विशिष्टता स्पष्ट देखबा योग्य अछि।
उपन्यासक आरम्भहिंमे जखन कि गाममे अकाल पड़ि जाइत छैक। लोक सभ अन्न बेतरे मरए लगैत अछि। जनकेँ काज कतौ नै भेटैत छै, खेती-खोलाक कतौ थाह-पथाह नै, लोकक घरमे दिनक-दिन चुल्हि नै पजरै छै। इनारोक पानि ससरि ततेक निचाँ चल गेलैक जे उगहनियो सभ छोट भऽ गेलैक। आ एम्हर बौएलालक प्राण भुखसँ छुटै-छुटैपर छल। तेहने दुरूह समैमे रामाकान्त बाबू द्वारा बड़की पोखरि उराहब, समाजक प्रति साहानुभूति हुनक हृदैक महानता देखल जाइत अछि। ऐ तरहेँ एक तँ लोककेँ विभिन्न प्रकारक अकर्मणयतासँ बचा कऽ दोसर दिस, अन्नाभावसँ ग्रस्त लोकक मरबासँ सेहो बचबैत छथि। रमाकान्तबाबूक अवधारणा ई जे ‘सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग भवेत्’क ‘‘अथवा सबए भूमि गोपाल की’’ सपष्ट कऽ दैत अछि। तँए रामाकान्तबाबू सामाजिक समरसता लेल ितयागक मिशाल स्वरूप अपन दू सय विधा जमीन गामक भूमिहीन परिवारक बीच वितरण करबा दैत छथिन। ठीक ओहिना जहिना चीम राजा चेन्पौ कएने रहथि। जइसँ गामक सभ व्यक्ति सुखी भऽ जाइ छथि, आ गाधीवादी विचारधारकेँ आरो मजगूती भेट जाइत अछि। अर्थात् व्यक्तिगत खुशी वा सुख-शांतिसँ एकटा समाज सुखी नै भऽ सकैत अछि। बल्कि सामाजिक सुख-शांतिक लेल व्यक्तिगत सुख-शांतिक तियाग करब मनुष्यक अहम कर्त्तव्य थिक। स्पष्ट अछि।
मनुष्य एक समाजिक प्राणी थिक, जे सोनेलाककेँ विपति पड़लापर फुदिया द्वारा कहल गपसँ स्पष्ट होइत अछि। जे “भाय, तोरा जे हमर खूनक काज हेतह, हम सेहो देबह।” स्पष्ट अछि जे समाजमे एहिना सबहक काज सभकेँ होइत छैक। उपन्यासक मध्यमे मण्डलजी गाम-घरमे पसरल धर्मभिरूताक चित्रण करब सेहो नै बिसरलाह। जे सोनेलालक आंगनवालीकेँ बिमारीसँ ठीक भेलापर आयोजित भंडारामे दू साधू दलक द्वारा जे एकटा वैष्णम आ कबीरपंथसँ सोनेलाल कोना लुटल जाइत अछि। उपन्यासकार एहन समस्याक प्रति समाजकेँ सचेत करै छथि।
आजुक मशीनक युग हमरा समाजकेँ कोन तरहेँ जोंक जकाँ पकड़ने अछि जे तरे-तर शोणित पीब रहल अछि मुदा पता तक नै चलै छै। ई स्पष्ट करबामे शत-प्रतिशत सफल छथि। कोन तरहेँ खून अपना खूनकेँ चिन्हबामे असमर्थ अछि एकदम स्पष्ट अछि जे महिन्द्रक पुत्र रमेश होस्टलसँ आबि अपन पिताकेँ गोड़ लागि ठकुआ कऽ आगाँमे ठाढ़ भऽ जाइत अछि, बाबा-दादीकेँ नै चिन्हैत अछि। बादमे पिताक कहलापर रमेश तीनू गोटेकेँ गोड़ लगलकनि। ऐ तरहेँ संयुक्त परिवारक महत्व जे मिथिलाक धरोहरि छल। ओकरा एकल परिवार बूझु जे झकझौरि कऽ राखि देलक। जे मानवीय सिनेहक नष्ट होइत स्वरूप थिक।
एे प्रकारेँ उपन्यास “मौलाइल गाछक फूल”मे सामाजिक जिनगीक विभिन्न प्रकारक समस्या आ ओकर समुचित समाधान तकबाक पूर्ण प्रयत्न केलनि अछि। “मनुष्यसँ परिवार बनैत अछि आ परिवारसँ समाज। जँ परिवार ठाढ़ भऽ जाए तँ समाज स्वत: आगू बढ़ए लागत।” मण्डलजीक सामाजिक भावना आदर्शवादी भावनाक रूपमे परिलक्षित होइत अछि। जकरा धियानमे रखैत मद्रासमे डाक्टरी करैत डॉ. महेन्द्रकेँ गाममे एकटा स्वास्थ्य केन्द्रक स्थापनाक विचार गामवासीक सेवा लेल देखाओल गेल अछि। उपन्यासमे जाति-पाति, धर्म-सम्प्रादयमे खंिडत भेल गाम-समाजमे छूआ-छूत, ऊँच-नीचक खाधिकेँ रामाकान्तबाबू द्वारा भजुआ डोमक ऐठाम जा कऽ भोजन करब समाजक बीच समरसता स्थापना आ छूआ-छूतक अंत कऽ एकटा आदर्शवादी पूर्ण समाधान देखौलनि अछि। जेकरा अशिक्षासँ उत्पन्न लाइलाज बिमारीकेँ विचार मात्रमे परिवर्त्तन कऽ एकसूत्रमे बन्हबाक प्रयास, वरदान सावित भेल अछि।
उपन्यासक समस्त नारी पात्र यथा- रधिया, श्यामा, सुगिया, सोनेलालक बहिन आदिमे पतिपरायणता सुख-दुखमे संग साथ देब। भारतीय नारीक मर्यादा स्पष्ट चित्र उपस्थित करबामे पूर्णत: सफल भेल छथि। सुमित्राक पढ़ि-लिख नीक नर्स बनब आ सुजाताकेँ पढ़ि-लिख नीक डाक्टर बनब, नारीक अबला नै अपितु सबला रूप देखबामे अबैत अछि। एतबे नै, उपन्यासक मादे मण्डलजी स्पष्ट दर्शा देलनि अछि जे गरीबो-गुरबामे ओ क्षमता छै जेकरा जँ कनिको सहयोग भेट जाए तँ ओ बहुत आगाँ बढ़ि सकैत अछि। नारीक एकटा अलग स्वरूप काली-दुगाँ आदि शक्तिक रूप सितिया केर चरित्र देखेबामे सफल रहलाह अछि। जखन आवारा छौड़ा ललबा ओकरा इज्जति लुटए चाहै छै तखन सितिया ललबाकेँ लाते-मुक्के थुरि-थारि कऽ राखि दैत छै। बात ओतइ नै खतम होइछ अपितु जखन ललबाक गौआँ सभ हसेरी बान्हि सितिया गामपर हमला करैत अछि तखन सितिया झांसीक रानी बनि सभकेँ परास्त कऽ दैत छै।
ऐ तरहेँ