विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली कथा साहित्यक विकासमे राजकमलक योगदान

शिवकुमार झा ‘टिल्लू’ · 2012-03-01 · अंक 101

मैथि‍ली कथा साहि‍त्‍यक वि‍कासमे राजकमलक योगदान ::
सन् 1954 मे “अपराजि‍ता” कथाक संग राजकमल जीक मैथि‍ली कथा साहि‍त्‍य जगतमे प्रवेश भेल। हि‍नक मूल नाओं मनीन्‍द्र नारायण चौधरी छन्‍हि‍। 1929मे जनमल ऐ साहि‍त्‍यकारक लेखनीसँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ लगभग 36 गोट कथा भेटल। मात्र 38 बरखक अपन जीवनकालमे राजकमल मैैथि‍ली गद्य साहि‍त्‍यकेँ कि‍छु एहेन कृति‍ दऽ देलनि‍ जइसँ प्रयोगकेँ बादक धरातलपर प्रति‍ष्‍ठि‍त करबाक श्रेय साहि‍त्‍यक समालोचक लोकनि‍ ऐ साहि‍त्‍यकारकेँ ि‍नर्विवाद रूपेँ दऽ रहल छथि‍‍।
हि‍नक तीन गोट कथा संग्रह ललका पाग, एक आन्‍हर एक रोगाह आ “ि‍नमोही बालम हम्‍मर” पुस्‍तकाकार प्रकाशि‍त छन्‍हि‍। एकर अति‍रि‍क्‍त हि‍नक एक गोट पोथी “कृति‍ राजकमलक” मैथि‍ली अकादेमीसँ प्रकाशि‍त भेल अछि‍ जइमे 13 गोट कथा आ एकटा उपन्‍यास आन्‍दोलन संकलि‍त अछि‍। ओना कृति‍राजकमलक छओ गोट कथा “ललका पाग”मे सेहो छपल अछि‍।
रमानाथ झाक मतेँ राजकमलक कथा मूल उद्देश्‍य मनोवि‍श्लेषणत्‍मक प्रणालीसँ आरोपि‍त मर्यादा ओ आदर्शक पाछाँ नुकाएल आन्‍हरकेँ नाङट करब अछि‍। डॉ. डी.एन. झा सेहो ऐ मतसँ सहमत छथि‍।
“ललका पाग” कथा हि‍नक लि‍खल कथा सभमे अपन वि‍शि‍ष्‍ट स्‍थान रखैत छन्‍हि‍। ऐ कथाकेँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक कि‍छु श्रेष्‍ठ कथामे स्‍थान देब सर्वथा न्‍यायोचि‍त अछि‍। कथाक आरंभमे मैथि‍ली स्‍त्रीक चि‍न्‍हबाक वि‍श्‍लेषणमे कोनो अचरज नै। त्रि‍पुराक तुलना जइ वर्गक मैथि‍ली नारि‍सँ कएल गेल कथाक भूमि‍कामे ओइ वर्गक स्‍पष्‍ट उल्‍लेख तँ नै कएल गेल मुदा ओ ब्राह्मण परि‍वारक कन्‍या छथि‍। अल्‍पायुमे पण्‍डि‍त पि‍ताक मृत्‍युक पश्चात् ति‍रू अपन माइक संग गाममे रहैत छलीह। अग्रज झि‍ंगुरनाथ बाहर धन उपार्जन लेल चलि‍ गेलाह। कि‍छुए वर्षमे ति‍रू युवती वयसमे प्रवेश कऽ गेलीह। दस-एगारह वर्षक बाद जखन झि‍ंगुरनाथ अपन गाम घुरि‍ अएलनि‍ तँ मातृसि‍नेहक संग-संग ति‍रूक हाथ पीअर करबाक जि‍म्‍मेदारीक आभास भेलनि‍। वास्‍तवि‍कतो छैक जे जखन ई कथा 1955मे वि‍देह वि‍शेषांकमे देल गेल ओइ कालकेँ के कहए वर्तमान समैमे सेहो अपना सबहक समाजमे कन्‍याक जन्‍म कालहि‍सँ बि‍याहक चि‍न्‍ता अभि‍भावककेँ सतबए लगैत छन्‍हि‍। ति‍रू तँ माघमे 14मे वर्षमे प्रवेश कऽ जेतीह। उद्देश्‍य जौं सार्थक हुअए तँ सफलता नि‍श्चि‍त भेटबे करैत अछि‍। चण्‍डीपुरक राम सागर चौधरीक सुपुत्र राधाकान्‍तसँ स्‍व. पण्‍डि‍त हेकनाथ झाक पुत्री त्रि‍पुराक बि‍याह सम्‍पन्न भेल। सासुर आबि‍ ति‍रू कनेको स्‍तब्‍ध नै छथि‍ कि‍एक तँ जीवन शैलीक कोनो ज्ञाने नै छन्‍हि‍। अज्ञानतामे बाड़ीक पछुआरमे पोखरि‍ देखि‍ अपन बेमात्र सासुसँ हेलबाक कलाक जि‍ज्ञासा कएलनि‍। यएह जि‍ज्ञासा हुनक जीवनक लेल काल भऽ गेलनि‍। चननपुरवाली सासु भोरे-भोर समस्‍त गाममे अफवाह पसारि‍ देलखि‍न जे राति‍मे नवकी कनि‍याँ पोखरि‍मे चुभकि‍ रहल छलीह। राधाकान्‍त ऐ घटनासँ मर्माहि‍त भऽ गेलाह। आब प्रश्‍न उठैत अछि‍ जे चननपुरवाली एना कि‍अए कएलीह? ओ अपन पि‍ति‍औत भाय डाॅ. शंभूनाथ मि‍सरक सुपत्रीसँ राधाकान्‍तक बि‍याह करबए चाहैत छलीह। ऐठाम कथाकार कनेक चुकि‍ गेल छथि‍। ऐ उद्देश्‍यकेँ कतौ स्‍पष्‍ट नै कएल गेल। माए जौं अपन बेटाक बि‍याह कोनोठाम करबए चाहैत छलीह तँ त्रि‍पुरासँ कोना भऽ गेलनि‍। जखन की चननपुरवाली परि‍वारक अभि‍भावि‍का छलखि‍न। हुनक पति‍क हुनकापर कोनो वि‍शेष अनुशासन सेहो नै छलनि‍ आ ने राधाकान्‍त त्रि‍पुरासँ प्रेम बि‍याह केलखि‍न तँ कथानकमे एहेन परि‍वर्त्तनकेँ सोझे-सोझ आत्‍मसात् करब कनेक कठि‍न लागि‍ रहल अछि‍। गाममे तँ कूटनीति‍ चलि‍ते अछि‍ कि‍एक तँ छद्म रोजी रोजगारपर बेरोजगारी भारी। तँए भोलामास्‍टर आ बंगट चौधरी सन परि‍वार वि‍ध्‍वंसक केँ राधाकान्‍त सन संवेदनशील लोककेँ दोसर बि‍याह करबाक प्रेरणा देबएमे यथार्थ बोध होइत अछि‍। ई सभ घटना चक्रसँ कथा रोचक होइत अछि‍। मुदा कथाकेँ आकर्षक बनेबाक क्रममे राजकमल बि‍सरि‍ गेलाह जे त्रि‍पुरा मात्र 13-14 वर्षक बालि‍का छथि‍। जखन पोखरि‍मे चुभकबाक जि‍ज्ञासा सासुरोमे छन्‍हि‍ तखन सौति‍न अएबाक संभावनाक मध्‍य अपन सकल गृहस्‍थ कार्यमे कोना लागल रहलीह? एक दि‍स चंचल रूपक उद्बोधन आ दोसरा रूपमे परि‍पक्‍व नारी, एकरा प्रयोगवाद तँ कहल जा सकैत अछि‍ मुदा प्रयोगात्‍मक रूपसँ वास्‍तवि‍कतासँ बहुत दूर। राधाकान्‍त सेहो शि‍क्षि‍त छथि‍, मात्र अपन स्‍त्रीकेँ पोखरि‍मे स्‍नान करबाक सजाक रूपेँ दोसर बि‍याह। ओना मि‍थि‍लामे पहि‍ने गप्‍पे-गप्‍पमे बि‍याह करबाक इति‍हास रहल अछि‍ परंच ऐ प्रकारक बि‍याहक कारण समीचीन नै लागल। अंतमे अपन बि‍याह कालक राखल ललका पाग जखन त्रि‍पुरा राधाकान्‍तकेँ दोसर बि‍याहक लेल प्रस्‍थानकालमे दैत छथि‍न तँ राधाकान्‍तक हृदए परि‍वर्तन भऽ जाइत अछि‍ आ पहि‍लुक ललका पागक मर्यादा रखबाक लेल ओ चुप्‍प भऽ आंगनमे आबि‍ कुर्सीपर बैस जाइत छथि‍। एहू घटनकाक्रममे कथा वास्‍तवि‍कतासँ बेसी कल्‍पवृक्षक पुष्‍प प्रतीत होइत अछि‍। जे राधाकान्‍त मात्र पोखरि‍ स्‍नानक दंडमे त्रि‍पुरासँ नारीक अधि‍कार छीनि‍ लेबाक ि‍नर्णए केलनि‍ ओ अंगुलि‍माल जकाँ क्षणहि‍मे कोना बदलि‍ गेलाह। ई ध्रुव सत्‍य अछि‍ जे मैथि‍ल ब्राह्मण परि‍वारमे ललका पागक स्‍थान वि‍शेष छैक आ ओइ पागकेँ सहेजि‍ कऽ त्रि‍पुरा धएने छलीह। भगवत परीक्षा जकाँ सौति‍न अनबाक लेल पति‍क हाथमे पाग देबाक ि‍नर्णएमे अंगुलि‍माल रूपी राधाकान्‍तकेँ बुद्धसँ दर्शन भेलनि‍। जौं एकरा संभवो मानल जाए तैयो कनेक कमी ई जे राधाकान्‍त त्रि‍पुराक तुलनामे कामाख्‍या दाइक संस्‍कारकेँ सोचि‍-वि‍चारि‍ वि‍शि‍ष्‍ट मानि‍ दोसर बि‍याह करबाक ि‍नर्णए कएलनि‍। कोनो क्षणहि‍मे नै। ऐ बि‍याहक सूत्रधार हुनक बेमात्र माए छलथि‍न। चननपुरवालीकेँ अछैत राधाकान्‍त माथपर बि‍नु पाग धएने कोना वि‍दा भऽ रहल छलाह, ई तँ सद्य: कथाक बहुत कमजोर पक्ष अछि‍।
भाषा वि‍ज्ञानक आधारपर जौं मूल्‍यांकन कएल जाए तँ कथाकार परम्‍परावादी मैथि‍ल साहि‍त्‍यकार जकाँ गद्यकेँ अधोषि‍त श्रृंगारक रूप देबाक प्रयास कएलनि‍।
ति‍रूक तुलना वाण भट्टक श्‍यामांगी नायि‍कासँ करए काल ई उद्देश्‍य स्‍पष्‍ट भऽ जाइत अछि‍। मुदा जखन लि‍खैत छथि‍ जे “मि‍थि‍लाक छौड़ी सभ अहि‍ना करैत अछि‍।” तँ स्‍पष्‍ट भऽ जाइत छन्‍हि‍ आत्‍मि‍क रूपसँ कि‍छु आर कहए चाहैत छथि‍। ऐठाम छौड़ीक स्‍थानपर ‘कन्‍या‘ शब्‍दक प्रयोग सेहो कएल जा सकैत छल जे बेसी नीक लगि‍तए। कामाख्‍या दाइक वि‍षयमे राधाकान्‍तक मौन सि‍नेहमे मि‍आ आ आ जाऽ....... लि‍खबाक उद्देश्‍य स्‍पष्‍ट नै भऽ सकल।
ई सत्‍य अछि‍ जे राजकमल मैथि‍लीक संग-संग हि‍न्‍दीमे सेहो लि‍खैत छलाह, मुदा हि‍न्‍दीक प्रति‍ झॉपल सि‍नेह मैथि‍ली कथामे परि‍लक्षि‍त भऽ गेल‍। ई मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल दुर्भाग्‍यक गप्‍प जे ऐ भाषाकेँ दुभाषी रचनाकार मात्र अपन नाओं-गाओंक लेल हथि‍यार बनेलनि‍ मातृभाषा सि‍नेहसँ साहि‍त्‍यि‍क रचनाक कोनो संबंध नै। ओना ऐ प्रकारक कथ्‍य यात्री आ आरसीक रचनामे नै भेटैत अछि‍। कथोपकथनमे वि‍रोधाभास देखलाक बादो एकरा नीक रचना मानल जा सकैछ कि‍एक तँ कथा बड्ड आकर्षक छन्‍हि‍। जौं बि‍म्‍बक वि‍श्लेषणकेँ शि‍ल्‍पक रूपमे देखल जाए तँ राजकमलजी स्‍थापि‍त शि‍ल्‍पी छथि‍ ई ललका पाग प्रकट भऽ गेल।
क्रमश:
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।

Suggested citation: शिवकुमार झा ‘टिल्लू’. “मैथिली कथा साहित्यक विकासमे राजकमलक योगदान.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 101, 2012-03-01. https://www.videha.co.in/research/2012/101/मैथिली-कथा-साहित्यक-विकासमे-राजकमलक-योगदान.htm

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