विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

इन्द्रधनुषी अकासमे सामाजिक विमर्श

शिवकुमार झा ‘टिल्लू’ · 2012-03-15 · अंक 102

इन्‍द्रधनुषी अकासमे सामाजि‍क वि‍मर्श ::
“इंद्रधनुषी अकास” आधुनि‍क मैथि‍लीक चर्चित गद्यकार श्री जगदीश प्रसाद मण्‍डलक पहि‍ल पद्य संग्रह अछि‍‍। जगदीशजी सन् 2008सँ पूर्व मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल अनचि‍न्‍ह नाओं छलाह, मुदा गत तीन-चारि‍ बरखक भीतर हि‍नक वि‍वि‍ध बि‍म्‍बक उपन्‍यास, कथा संग्रह, नाटक, बाल गद्य साहि‍त्‍य आदि‍सँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ उतर आधुनि‍क युगमे प्रवेशक अवसरि‍ भेटि‍ गेलनि‍।
मूलत: कथाकार आ उपन्‍यासकार जगदीश प्रसाद मण्‍डल कोनो चन्‍दा झा सन प्राचीनता ओ नवीनताक सन्‍धि‍क कवि‍ नै आ ने हि‍नक रचनामे परम्‍परावादी प्रीति‍क कतहु दर्शन होइछ। भुवनेश्वर सिंह भुवन जकाँ ने जगदीश नवीन प्रगीत काव्‍यक व्‍याख्‍याता छथि‍ आ ने आरसी प्रसाद सिंह जकाँ आशु कवि‍।
110 कवि‍ताक संग्रह “इंद्रधनुषी अकास”मे जे ई वैशि‍ष्‍ट्यता प्रमाणि‍त कएलनि‍ ओ अछि‍ सम्‍पूर्ण समाजक लेल समन्‍वयवादी दृष्‍टि‍कोणक दार्शनि‍क अवलोकन आ अर्थनीति‍क सम्‍यक वि‍श्लेषण। अनचोकेमे कवि‍ता सबहक रूपेँ हि‍नक वि‍राट सरल जीवन दर्शन प्रदर्शित होइत अछि‍।
“मणि‍” वि‍षधर साँपकेँ सेहो मनोरम बना दैत जकर लोभमे सपेरा सबहक अंत भऽ जाइछ। ओ मणि‍ तँ वैज्ञानि‍क दृष्‍टि‍कोणसँ काल्‍पनि‍क थि‍क, मुदा मणि‍ कवि‍तामे कवि‍ अपन मनक मनोभावकेँ मढ़ि‍-मढ़ि‍ मणि‍’क रूप रेखाक संदेश दैत छथि‍। भाववाचक संज्ञा थि‍क-मणि‍ मुदा जाति‍ आ व्‍यक्‍ति‍क रचनाक लेल भावक आवश्‍यकता प्रासांगि‍क होइछ। जखन अर्न्‍तमनमे दि‍व्‍य ज्‍योति‍ जागत तँ तन अवश्‍य प्रज्‍जवलि‍त हएत। लक्ष्‍मी तखने औतीह जखन कर्मपथ उज्‍ज्‍वल हएत। कर्मपथकेँ प्रकाशि‍त करबाक लेल स्‍वस्‍थ मोनक आवश्‍यक्‍ता होइत छैक। पहि‍ने ई अवधारना छल जे स्‍वस्‍थ शरीरमे स्‍वस्‍थ मनक नि‍वास होइत छैक, मुदा आधुनि‍क वैज्ञानि‍क दृष्‍टकोणे ई मि‍थ्‍या प्रमाणि‍त भ्‍ाऽ रहलैक। व्‍यस्‍त जीवन शैलीमे मोन अस्‍थि‍र भऽ गेल छैक। बि‍नु कर्मक अधि‍क प्राप्‍ति‍क तृष्‍णासँ मनमे वि‍चलन स्‍वाभावि‍क जइसँ मोन अस्‍वस्‍थ। जखन मोन अस्‍वस्‍थ तँ शरीरक अस्‍वस्‍थ हएब कोनो अजगुत नै। ‘चि‍न्ह बि‍ना औषधि‍ भारी’ वैज्ञानि‍क दृष्‍टि‍कोणसँ अक्षरश: सत्‍य मानल जाए। सोडि‍यम कार्बोनेट धोवि‍या सोडर थि‍क आ सोडि‍यम बाइकार्वोनेट पेटक अम्‍लीयताकेँ दूर करैत अछि‍। मात्र ‘वाइ’ शब्‍द हटलासँ जौं उलटा सेवन हएत तँ जीवन वाइ-वाइ भऽ सकैत अछि‍।
मुदा सामाजि‍क जीवनमे धोवि‍यो सोडर अनि‍वार्य कि‍एक तँ मात्र पेटक अम्‍लीयता दूर कएलासँ शरीरक मोइल नै धोअल जा सकैछ। तँए जीवनमे सबहक लेल समायुसार स्‍थान देल जाए। ‘श्रेष्‍ठ जीवन मानव कहबै छै मानवता उद्देश्‍य जकर’ ऐ पॉति‍सँ रचनात्‍मक समन्‍वयवादी न्‍याय दर्शन प्रदर्शित होइत छैक। समाजक आगाँ पॉति‍क लोक जखन कात लागल वर्गकेँ मर्मािहत करैत अछि‍, तखन कातक लोक सेहो उग्रता प्रदर्शित करैत अछि‍। ऐ प्रकारक अदला-बदलाक भाव जगदीश जीक ऐ कवि‍तामे नै भेटल। ई तँ सकारात्‍मक सोचक आशावादी दार्शनि‍क जकाँ अपन कवि‍ताक इति‍ श्री करैत छथि‍-
‘मनुखक भेद वि‍भेद
मेटबैक छी धर्म ओकर’
संभवत: ब्रह्माक वरद पूत सभकेँ आदर्शवादी बनबाक संदेश देलनि‍ अछि‍। ओना अलंकार मि‍लएबाक क्रममे एकठाम चूकि‍ गेल छथि‍
जखने मन मणि‍ बनत छि‍टकत ज्‍योति‍ धरतीपर
अपने बाट अपने देखब हँसैत चलब पृथ्‍वीपर
ऐठाम पृथ्‍वी परक स्‍थानपर ‘परतीपर’ जौं लि‍खल रहि‍तए तँ शब्‍द सामंजस्‍य भऽ सकैत छल। ओना कवि‍क दृष्‍टि‍कोण भऽ सकैत छैक जे कि‍छु आर होन्‍हि‍।
गंभीर आशु काव्‍यक मान्‍यता समाप्‍त होइत मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे वि‍चार मूलक पद्य बि‍रले भेटैत अछि‍। जीवन आ आध्‍यात्‍मक संबंध चलन्‍त समाजक बीच देखैमे आबि‍ रहल छैक। सभ दि‍श भागमभाग सोचबाक लेल फुरसत नै। मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे छायावादक काल ि‍नर्धारण तँ नै कएल गेल अछि‍, मुदा अनचोकेमे कि‍छु साहि‍त्‍यकार ऐ काव्‍य वि‍धापर समए-समैपर रचना कऽ दैत छथि‍। ‘चल रे जीवन’ कवि‍ता आध्‍यात्‍मि‍क दर्शनसँ कर्मशील जीवनक संधि‍ करबामे पूर्णत: सफल मानल जा सकैछ। महाकवि‍ आरसीक कहब छलन्‍हि‍ जे सभ लोकमे आशुत्‍व होइत छैक मुदा लेखनीसँ अभि‍व्‍यक्‍त करबाक लेल अर्न्‍तमन आ आत्‍माक मि‍लन जि‍नकामे हएत वएह ‘आशु कवि‍’ मानल जएताह। जगदीश तँ आशुकवि‍ नै छथि‍, मुदा ‘चल रे जीवन’ हि‍नक क्षणि‍क अर्न्‍तमन आ आत्‍मीय मि‍लनक परि‍णामे आशु कवि‍ता अवश्‍य भऽ गेल। जीवनमे गति‍ सर्वाधि‍क उपयोगी आ सम्‍प्रभु-सर्वशक्‍ति‍ मान तत्‍व थि‍क। जइ वसुन्‍धराक माथपर हमर अस्‍ति‍त्‍व अछि‍ ओ कखनो ने रुकैत छथि‍। ग्रह-नक्षण सभ सदि‍खन गति‍मान, अंति‍म काल धरि‍ जीवन गति‍मान, मुइलापर प्राण गति‍मान होइत अदृश्‍य चक्रमे प्रवेश कऽ जाइत अछि‍।
“यात्रीकेँ आराम कहाँ छै
यात्रा पथ वि‍श्राम कहाँ छै।”
जे अभागल छथि‍ ओ सुतले रहथि‍ मुदा हुनको शरीरमे क्षि‍ति‍, जल, पावक, समीर, रुधि‍रक संग सभ अंग मौलि‍क रुपसँ गति‍मान रहैत अछि‍। ‘सूर्य-तरेगन सेहो चलै छै’ वैज्ञानि‍क मान्‍यतासँ सर्वथा अनुचि‍त मानल जाइत अछि‍। सूर्य नै तँ उगैत अछि‍ आ ने डुमैत अछि‍। तँए कवि‍क एक पाॅति‍केँ मात्र उत्‍साह वर्धनक लेल कवि‍त्‍वक कि‍छु मंद वात मानल जाए। वास्‍तवि‍क रूपसँ ई असत्‍य मात्र कवि‍तेमे क्षम्‍य जौं कथा रहि‍तए तँ अप्रासंगि‍क मानल जा सकैत छल।
जेना जगदीश कथामे शब्‍द समंजन कऽ लैत छथि‍ ओना कवि‍तामे कतहु-कतहु ओझरा जाइत छथि‍न्‍ह।
“समए संग चल, ऋूतु संग चल
गति‍ संग चल मति‍ संग चल।”
सभठाम ‘संग’ उदेश्‍य आ कथोपकथनक लेल सर्वथा उचि‍त, मुदा स्‍वरात्‍मक पद्यमे कथोपकथनक संग-संग अलंकार आ छंदक सम्‍मि‍लन सेहो आवश्‍यक होइत अछि‍। ई कवि‍ता कोनो अतुकांत कवि‍ता नै तँए छंदमे आबद्घ करबाक लेल कवि‍केँ वि‍शेष धि‍यान देबाक छलनि‍। जगदीशक शब्‍द-कोषमे मैथि‍लीक खॉटी शब्‍द सभ भरल छन्‍हि‍ तँए हि‍नकासँ आर आशा कएल जा सकैत अछि‍।
बाल मनोवि‍ज्ञानक दृष्‍टि‍सँ ई पद्य उपयुक्‍त मानल जाए। जे बाल आ युवावस्‍थाक संधि‍ भऽ सकैत अछि‍ कि‍एक तँ ऐ अवधि‍मे जीवनक गति‍-चक्रकेँ बूझब वि‍शेष अनि‍वार्य होइछ। ऐसँ भाषा-साहि‍त्‍य वि‍कास सेहो होइत छैक। आरसी प्रसाद सि‍ंह, सोहन लाल द्वि‍वेदी, सुमि‍त्रा नंदन पंत आ हरि‍वंश राय बच्‍चन सन हि‍न्‍दी साहि‍त्‍यक ‘आशुकवि‍’ लोकनि‍क ऐ प्रकारक पद्य प्रारंभि‍क आ माध्‍यमि‍क शि‍क्षामे वि‍शेष लोकप्रि‍यता प्राप्‍त कएने अछि‍।
“टुटए ने कहि‍यो सुर-तार
हुअए ने कहि‍यो जि‍नगी बेहाल।”
जखने जीवनमे गति‍ मति‍ आ नि‍यति‍क त्रि‍वेणी अलग-अलग भऽ जाइत अछि‍ तँ जीवन उदासीन आ परि‍णाम कष्‍टदायी, तँए कवि‍क ऐ उक्‍ति‍केँ वि‍चारक संग-संग शि‍क्षा मूलक सेहो मानल जाए। गति‍ बि‍नु पहि‍ने जि‍नगी अक्रि‍य फेर अकर्मण्‍यता आ परि‍णाम जि‍नगी बेहाल, अंकगणि‍तीय आधारपर दृष्‍टि‍कोणकेँ प्रमाणि‍त कएल गेल जे सर्वथा उपयुक्‍त लगैत अछि‍।
जीवन जीवाक कलासँ संबंध काव्‍यमे प्राय: कवि‍ लोकनि‍ स्‍वयंकेँ नायक बना कऽ कवि‍ता लि‍खैत छथि‍। हि‍न्‍दी साहि‍त्‍यमे जानकी वल्‍लभ शास्‍त्री आध्‍यात्‍म दर्शनक सम्‍मि‍लन- “मेरे पथ में न वि‍राम रहा” सँ कएलनि‍ तँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे कालीकान्‍त झा बूच- “मृगी जकाँ हम कॉपि‍ रहल छी, झॉखुरसँ तन झॉपि‍ रहल छी” रूपेँ समाजक रुग्‍न दशासँ बचि‍ कऽ जीबए चाहैत छथि‍। मुदा जगदीश ऐ समाजक मैलकेँ साफ करबाक लेल उद्वि‍ग्‍न छथि‍। ‘धोब घाट’ कवि‍ता कोनो मैल वस्‍त्रक मूल नै, वरन समाजक कृत-कृत्‍यपर लागल कुचक्रकेँ साफ कऽ कऽ ऐ सँ वचबाक प्रेरणा थि‍क-
“धोइब घाट ओ घाट छी,
पाप धुआ पुन बनैत रहैत
अज्ञान-ज्ञान राति‍ दि‍न
रगड़ि‍ सान चढ़बैत रहैत”
मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे रीति‍क त्रि‍भाषीय नाटक, प्रीति‍क महाकाव्‍य अर्थहीन वैरागी काव्‍य शास्‍त्र कखनो वि‍नोदी, कखनो चलन्‍त कवि‍ता आ कखनो नाम-गाम आ ठामक पद्यसँ भरल पद्य संग्रहक प्रधानता अछि‍ कि‍एक तँ भलमानुस जे लि‍खत वएह कोसक पाथर मानल जाएत। तँए अभावक ऐ साहि‍त्‍यमे नीति‍शास्‍त्रसँ सन्नि‍हि‍त पद्याभावकेँ ‘धोब घाट’ सन कवि‍ता पूरा करैत अछि‍-
उला-पका राति‍केँ
साले साल सूर्ज सुड़कैए
सुख आरामक पहर छीि‍न
हँसि‍-हँसि‍ राति‍ दि‍न झाड़ैए।
कोनो आवश्‍यक नै जे जाज्‍वल्‍यमान नक्षत्रक कर्मसँ नि‍कसैत प्रभावक सभटा परि‍णाम उत्तमे हएत। सूर्य ज्‍योति‍क प्रतीक छथि‍, मुदा कखनो तँ हि‍नको कि‍रण जीव-अजीवकेँ उला-पका दैत अछि‍ तत्‍पश्चात् अन्‍हार। हि‍नक प्रति‍भा आ कर्मपर कवि‍केँ कोनो संदेह नै तँए भलमानुसोक अधलाह कर्मक वि‍रोध करबाक चाही। ऐसँ समाजमे दृष्‍टि‍कोणक वि‍जय प्रासंगि‍क हएत। वृक्ष मात्र गगनगामी..... एकर एक दृष्‍टि‍ एकटा उद्देश्‍य होइछ परंच शोर वि‍चलनसँ भरल लक्षण रखैत अछि‍। एक ध्‍वनि‍ अकास आ दोसर पताल प्रकृति‍क रंग बॉसक गि‍रह जकाँ प्रत्‍येक दृश्‍यपर पटाक्षेप। नाटकक अंकमे एकसँ बेसी दृश्‍य होएबाक चाही, मुदा प्रकृति‍ अर्थात् वि‍धाता अपन प्रत्‍येक अंककेँ अलग-अलग दृष्‍यसँ आबद्घ कऽ वि‍वि‍ध नाटकीय परि‍दृश्‍यक मंचन करैत अछि‍। ऐ पद्यक प्रत्‍येक छंदमे वि‍शेष अर्थ झॉपल अछि‍ जे पाठकक मस्‍ति‍ष्कपर ज्‍यामि‍ति‍क दबाब अवश्‍य बनाएत-
जहि‍ना डारि‍ करोटन लीची
खोंधि‍‍ते खोंइचा पकड़ैए
नि‍च्‍चाँ-ऊपर ससरि‍-ससरि‍
अपन-अपन बाट पबैए
भारतीय संस्‍कृति‍क संग ई दुर्भाग्‍य रहल जे परम्‍परावादी दृष्‍टि‍कोणक कि‍छु अवांक्षि‍त तत्‍वसँ लोक परेशान तँ छथि‍ मुदा कि‍यो ओकरा समाप्‍त होमए देबए नै चाहैत छथि‍। ‘काटर प्रथा’ ऐ रूपेमे सभसँ ि‍नर्घिष्‍ठ मानल जाए। ‘सासु-पुतोहु वार्ता’मे कवि‍ ओना स्‍पष्‍ट रूपेँ काटरक परि‍णाम स्‍वरूपक उद्वोधन नै कएने छथि‍, मुदा परक बेटीकेँ बेटीक रूपमे स्‍वीकार करब सुसंस्‍कृत समाजक नारी लेल असहज होइछ। ई वि‍डंवना जे अपन संतानक संग जे सि‍नेह रहैछ ओ दोसराक संतान जे आब आत्‍मसात भऽ गेल छथि‍ ति‍नका लेल असंभव। ओना एकरा स्‍वार्थ सेहो नै मानल जा सकैछ कि‍एक तँ पुतोहुक आवश्‍यकता व्‍याहुत बेटीसँ बेसी होइत छैक। ऐमे प्रति‍द्वन्‍द्वताक भाव रहैत अछि‍‍। मनुक्‍खकेँ अपन अधि‍कार तँ मोन रहैत अछि‍ मुदा कर्त्तव्‍यवोधक ज्ञान जि‍नकामे नै रहत हुनका पारि‍वारि‍क शांति‍क स्‍पप्‍न देखनाइ सर्वता अनुचि‍त आ भ्रामक।
प्रति‍द्वन्‍द्वि‍ता ऐ खेलमे सासु-पुतोहु दुनू दोषी मुदा सासुक दोख बेसी कि‍एक तँ आनक बेटी अपन घरमे अनलाक बाद हास-परि‍हास सासुएक मुखसँ पहि‍ने नि‍कलबाक संभावना रहैत छैक-
ओसार पुवरि‍या बैस सासु
पड़ल पुतोहुकेँ देल धाही
अकड़ि‍ कऽ मकड़ि‍ बाजलि‍
देहक पानि‍ लऽ गेल हाही।
ककरोपर जौं झूटका फेंकब तँ प्रत्‍युत्तरमे पाथर अवश्‍य भेटत, कि‍एक तँ कि‍यो-ककरोसँ कम नै। अधलाह देखौंस संस्‍कार मनुक्‍खमे पहि‍ने अबैछ तँ नवकी कनि‍याँ कोना चुप रहतीह-
पानि‍ये तँ पसरि‍ देहमे
पीब गेल सभटा पाणि‍
की करब, फुरि‍ते कहाँ अछि‍
कहाँ पड़ल छी जानि‍....।
ऐ प्रकारक आरोप-प्रत्‍यारोप ग्रामीण समाजमे बरोबरि‍ देखए मे अबैत अछि‍। परि‍णाम परि‍हासक संग-संग अपन दैनन्‍दि‍नीमे लागलि‍ पुतोहु सासुरमे बसलि‍ ननदि‍केँ बीचमे सेहो लऽ अबैत छथि‍।
कवि‍क कहबाक उद्देश्‍य छन्‍हि‍ जे स्‍वस्‍थ जड़ि‍सँ स्‍वस्‍थ वृक्षक वि‍कास हएब प्रासंगि‍क तँए सासुकेँ अपन मर्यादाक स्‍मरण राखि‍ पुतोहुक संग ओहने बेबहार करबाक चाहि‍यनि‍ जेना बेटीक संग करैत छथि‍। पुतोहुकेँ सेहो सासुमे अपन माइक छबि‍ देखबाक आवश्‍यकता छैक।
प्रयोगात्‍मक रूपेँ आब ऐ प्रकारक अनटेटल क्रि‍या-कलापक संभावना क्षीण भऽ रहलैक कि‍एक तँ पलायनवादी समाजमे सासु-पुतोहु एक संग रहतीह, बि‍रले अवसरि‍ भेटैछ। जगदीशजी गाममे रहि‍ कऽ साहि‍त्‍य साधना कऽ रहल छथि‍ तँए ऐ प्रकारक घटना गाम-घरमे घटि‍त होइत देखानाइ कवि‍क लेल कोनो अजगुत नै। कवि‍ताक बि‍म्‍ब आ शि‍ल्‍पसँ बेसी महत्‍वपूर्ण अछि‍ कवि‍क उद्देश्‍य। एे दृष्‍टि‍सँ जौं देखल जाए तँ कवि‍ता नीक छैक। भाषा वि‍ज्ञानक रूपमे अद्भुत कि‍एक तँ अपन गद्य जकाँ एेठाम जगदीश धाही, अकड़ि‍, मकड़ि‍, हाही, लसि‍या, नि‍चेन सन लुप्‍त होइत शब्‍द सभसँ पद्यकेँ वांछि‍त रूपेँ बोरि‍ कवि‍ता श्रवणीय बना देलनि‍‍।
“बौड़ाएल बटोही” शीर्षक कवि‍ता ऐ संग्रहक सभसँ नीक बि‍म्‍बकेँ केन्‍द्रि‍त कऽ कऽ लि‍खल गेल अछि‍। जीवन दर्शन आ आध्‍यात्‍मक तात्वि‍क वि‍वेचन अत्‍यन्‍त वि‍स्‍मयकारी छायावादसँ भरल मानल जा सकैछ। ‘परदा’मे ओझराएल जि‍नगी जकाँ वर्त्तमान मनुक्‍खक जीवन भऽ गेल अदि‍। प्रयोगात्‍मक रूपेँ आब कोवरक कनि‍याँक ओ रूप कतए जकर कल्‍पना कवि‍ कएने छथि‍, मुदा गामक समाजमे एखनो कोवरमे नुकाएल कनि‍याँ भेटैत अछि‍। कोवरक कनि‍याँ तँ मर्यादाक अनुपालनक लेल नुकाएल छथि‍ मुदा कर्म पथपर वि‍चरण करैबला मनुक्‍ख कटि‍ कऽ कि‍एक रहि‍ रहल अछि‍? जे कि‍छु नै जानि‍ रहल अर्थात् अशि‍क्षि‍त मूक अनभुआरसँ सामर्थ्‍यशील मनुक्‍ख कि‍एक तकरार कऽ रहल छथि‍? अपन-अपन कर्मक संग-संग माए-बापक कर्म ओ धर्म संतानक सफलताक बाट उज्‍ज्वल करैत अछि‍। ऐठाम धर्मक भाव संप्रदाय नै अपि‍तु मानवीय मूल्‍यक सम्‍यक अनुपालन मानल जाए। वि‍लगि‍त पथपर जौं चरण राखल जाए तँ बुइध बि‍‍लेनाइ स्‍वाभावि‍क आ जखन बुइध बि‍ला जाएत तँ बाट कलुष अवश्‍य भऽ जाएत-
बाटे बि‍ला वुइध
बाटे बि‍सरि‍ गेल
जेम्‍हर जे चलल
तेम्‍हरे पहुँचि‍ गेल...।
कर्मक बीआ जाैं सत्‍व तम ओ रज रस रससँ बोरल नै जाएत तँ ‘मनोकामना’ भ्रम बनि‍ अपन सि‍द्धि‍क आशमे लुप्‍त अवश्‍य भऽ जाएत।
कोनाे रचनाकार जौं स्‍वयं नायक बनि‍ कवि‍ता लि‍खैत छथि‍ तँ कोनो अचरज नै, मुदा बेसीठाम कवि‍ स्‍वयंकेँ रीति‍ ओ प्रीति‍क नायक बना कऽ कवि‍ता लि‍खलाहेँ ई बरोबरि‍ मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे देखएमे अबैत अछि‍। अपन आलोचना करब सबहक लेल संभव नै, ओना कतौ-कतौ हास्‍य रसक कवि‍तामे कवि‍ लोकनि‍ अपन मजाक अवश्‍य उड़बैत छथि‍ मुदा एना करब कवि‍ताकेँ लोकप्रि‍य बनाएब मात्र मानल जाए। ‘अपनेपर हँसै छी’ शीर्षक कवि‍ता मूलत: वर्त्तमान शि‍क्षा प्रणालीपर कविक‍ आलोचनात्‍मक काव्‍य शैलीमे प्रहार थि‍क। स्‍वयंकेँ नायक बना कऽ चोरि‍क डि‍ग्रीक आधारपर ‘शि‍क्षा मि‍त्र’क नौकरी प्राप्‍त करबामे हेर-फेर देखाओल गेल अछि‍। गाममे रहि‍ कऽ बि‍हारक शैक्षणि‍क प्रणालीपर कटु टि‍प्‍पणी न्‍यायोचि‍त। शासन तंत्र कतबो मजगूत मानल जाए मुदा जखन बेबस्‍थे भ्रष्‍ट, तखन इमानदारीक दाबा केनाइ भ्रामक सि‍द्ध होइत छैक। साम्‍यवादी वि‍चारधाराक अक्षरश: सम्‍पोषक कवि‍ कोनो राजनैति‍क दल वि‍शेषपर टि‍प्‍पणी नै केने छथि‍। अर्थनीति‍ जौं भ्रामक हुअए तँ ऐ लेल सम्‍पूर्ण समाजकेँ दोख देल जाए। लोक जखन स्‍वयं भ्रष्‍ट भऽ गेल छथि‍ तँ प्रजातंत्र वा शासन तंत्रपर दोख देब अनुचि‍त-
लाखे रूपैयामे
दशो कट्ठा जमीन गमेलौं
गुरु दक्षि‍ना देने बि‍ना
गुरु भाइक भार उठेलौं....।
ओना भारतीय परि‍दृश्‍यमे बि‍हारक राज्‍य बेबस्‍था भलहि‍ं स्‍तरीय मानल जा रहल मुदा शैक्षणि‍क बहालीमे योग्‍यतमक उत्तरजीवि‍कामे धन बल आ कुचक्रबल बेसी भारी पड़लैक, ज्ञानक मोजर एखनों नै भेटि‍ रहल। पाँच हजारक नौकरीक लेल मूल्‍यवान वसुन्‍धराकेँ बेचि‍ लोक लौटरी लगा रहल छथि‍। एकर दू गोट कुपरि‍णाम- पहि‍ल कृषि‍ कार्य जे हमरा समाजक रीढ थि‍क तकर महत्‍व समाप्‍त भऽ रहलैक आ दोसर प्रति‍भाक पलायन अवश्‍यभावी कि‍एक तँ साधनहीन प्रति‍भा सम्‍पन्न व्‍यक्‍ति‍ ऐ भ्रष्‍ट मंचपर कोना आसीन होथि‍-
बि‍नु धनक धनि‍क जहि‍ना
ताम-झाम देखबैए
देखि‍-देखि‍ आँखि‍ करूआए
लाजे आँखि‍ मुनै छी
अपने पर हँसै छी.....।
वि‍चारमूलक पद्य देशकालक दशाक एक रूपेँ सत्‍यश: चि‍त्रण करैत अछि‍। चारूकातक परि‍दृश्‍य हेहर भऽ गेलैक, ऐ दशामे सोझ बाट अकल्‍याणकारी लगनाइ कोनो अनुचि‍त नै। चोटगर तीक्ष्‍ण वान चला कऽ भ्रष्‍ट लोक अपनाकेँ सत्‍य साबि‍त करबामे कोनो अर्थे नै हुसैत अछि‍ कि‍एक तँ धनक संग गालक जमाना एक तँ चोरि‍ आ दोसर सीना जोरि‍। ऐ कटु सत्‍यकेँ साहि‍त्‍यमे कोना स्‍वीकार कएल जाए ई तँ भवि‍ष्‍यक गप्‍प मुदा यात्री आ आरसी जकाँ अपन लेखनीक संग जीवनमे सम्‍यक साम्‍यवादी जगदीशक ई कवि‍ता समाजक लेल दि‍शा ि‍नर्देश कऽ रहलैक‍। ओना ई अलग बात जे वर्त्तमान परि‍दृश्‍य फ्रांसक राज्‍यक्रांति‍ जकाँ नै जखन रूसो आ वाल्‍टेयरक आखर-आखरसँ समाजमे क्रांति‍ आबि‍ गेल छल।
आशावादी दृष्‍टि‍सँ जौं सोचल जाए तँ साहि‍त्‍य समाजक दर्पण अवश्‍य प्रतीत हएत, मुदा प्रत्‍येक पाठक एकर सम्‍यक् तत्‍वकेँ जौं अपन जीवनमे उतारि‍ लेथि‍ तखने ई संभव मानल जा सकैछ।
समाजक माने सबहक दृष्‍टि‍कोण आ आचार-वि‍चारक सभ गोट रूप व्‍यापक अर्थमे मंथन कएल जाए। जगदीशजी ‘धोब घाट’ कवि‍ताक बाद ‘धोबि‍ घाट’ कवि‍ता सेहो लि‍खने छथि‍। ‘दर्शन’ कोनो पोथी पढ़ि‍ नै उत्पन्न कएल जा सकैछ, ई तँ जीवनकेँ देखबाक अपन दृष्‍टकोण होइत अछि‍। उदयनाचार्य कोनो काशी आ प्रयागमे रहि‍ ‘न्‍याय कुसुमांजलि‍’ सन पोथी नै लि‍खने रहथि‍। राजपूत कालक ‘करि‍यन’ हुनक साहि‍त्‍य सृज्‍नताक गहवर छलनि‍। तँए जगदीशसँ टेम्‍स नदीक सभ्‍यताक आधुनि‍क बि‍म्‍बक आश केनाइ सर्वथा अनुचि‍त हएत कि‍एक तँ मि‍थि‍लाक खॉटी गाम ‘बेरमा’ हि‍नक साहि‍त्‍य साधनाक केन्‍द्र बि‍न्‍दु छन्‍हि‍। दर्शनक तीन वयस होइत अछि‍- नीति‍, श्रृंगार ओ वैराग्‍य। सामाजि‍क जीवनमे रहनि‍हार मनुक्‍खक लेल तीनूक सम्‍यक काल ओ भाव होइत छैक। जीवन क्रममे संतुलन बनएबाक लेल तीनू वयससँ अलग-अलग सत्‍व रज ओ तमो गुण टपकैछ। ‘सात्‍वि‍क भाव’ कवि‍ता सत्‍व गुणकेँ आधार बना कऽ लि‍खल गेल अछि‍। सात्‍वि‍क भाव वि‍रासतपर आधारि‍त होइत छैक। जाहि‍ ठामक भूमि‍ सात्‍वि‍क, हवा पानि‍ सात्‍वि‍क माने नैसगि‍क संस्‍कार सात्‍वकतासँ भरल होइछ ओइठाम एकर प्रभाव अवश्‍यंभावी होइत छैक। लक्ष्‍य, संकल्‍प आ दृष्‍ता सेहो मनुक्‍खकेँ सम्‍यक शाश्‍वत कर्म दि‍श लऽ जाइछ, मुदा ऐ लेल संस्‍कार अनुवंशि‍की आदि‍पर व्‍यक्‍ति‍त्‍वक वि‍चार ि‍नर्भर होइछ। सुभाव-कुभाव आदि‍ संगहि‍ चलैत अछि‍ मुदा ऐ लेल दृष्‍टि‍कोणकेँ जाहि‍ रूपसँ देखल जाए वएह रूप दृष्‍टि‍गोचर हएत। कवि‍ताक भाव दर्शनपर आधारि‍त सरल शब्‍दमे मुदा वि‍चार बोधक लेल गूढ़ अछि‍ तँए एकरा बेशी लोकप्रि‍य नै मानल जाए परंच साहि‍त्‍यि‍क वि‍कासक लेल आ जीवन-दर्शनक लेल युक्‍ति‍संगत कवि‍ता थि‍क।
दि‍व्‍य पुरुष ओ जे सोलह कलासँ परि‍पूर्ण होथि‍। ‘दि‍व्‍य शक्‍ति‍’ शीर्षक पद्य सरल रूपेँ पढ़लाक बाद कि‍छु वि‍शेष नै देखबामे अबैछ मुदा जेना कवि‍क व्‍यक्‍ति‍त्‍व अर्न्‍तमुखी तहि‍ना पद्यमे गूढ़ रहस्‍य झॉपल छैक। दि‍व्‍य शक्‍ति‍सँ पूर्ण होएबाक बाद मनुजमे प्रखर ज्‍योति‍क आवरण पनकि‍ जाइत अछि‍। नीक-अधलाह वि‍चार संस्‍कारसँ उत्‍पन्न होइत अछि‍ मुदा गंगा माने पवि‍त्रताक परि‍चायक संस्‍कृति‍सँ आबद्घ् जलधाराक कोखि‍मे सबहक लेल समान स्‍थान। जइ भूमि‍पर वसुदेव वि‍राजथि‍ वएह वसुधा.......।
नन्‍द आ वसुदेवक प्रसंग तँ वर्तमान सामाजि‍क परि‍दृश्‍यमे ‘उपहास’ जकाँ भऽ गेल अछि‍ मुदा कवि‍ आशावादी छथि‍.....
पाँचम कला बनि‍ जे बीआ
मनुज मन वि‍रजैए
डेगे-डेगे डगरि‍-डगरि‍
सोलहम कला पबैए...
जगदीश जीक जे काव्‍य सृजनता ओ व्‍यंगनाक वि‍शेषता छन्‍हि‍ ओ थि‍क हि‍नक आशावादी सकारात्‍मक दृष्‍टि‍कोण। अपन पद्यमे कतौ कवि‍ सामाजि‍क दशासँ नि‍राश नै छथि‍। कालक अकालकेँ अपन पद्यमे देखबैत तँ छथि‍ मुदा ओहि‍सँ उदि‍ग्‍न नै।
‘उड़ि‍आएल चि‍ड़ै’ कवि‍तामे वर्त्तमान मानवक मनोवृत्ति उझलि‍ लेखनीसँ कवि‍ताक रूपेँ उद्धृत कऽ कवि‍ पलायनवादपर तीक्ष्‍ण प्रहार कएलनि‍ अछि‍। ऐ पलायनमे मात्र अपन माि‍टसँ पलायन नै अपि‍तु संस्‍कार आ मानवीयमूल्‍यक पड़ाइन सेहो देखाएल गेल अछि‍। ‘चि‍ड़ै’क उदाहरण मात्र कवि‍क छायावादी दृष्‍टि‍कोण छन्‍हि‍, कचोट तँ संस्‍कृति‍क पराभवकेँ मानल जाए। जे चि‍ड़ै अपन डीहो-डबरकेँ बि‍सरि‍ स्‍वार्थ आ कृत्रि‍मताक लहरि‍मे जतऽ घोघ भरतै ओतहि‍ रास करत ओहि‍ चि‍ड़ैक मधुर स्‍वरसँ मूल समाजकेँ कोन काज-
ओहन स्‍मृति‍ स्‍मृते की
जे मने मन घुरि‍आइत रहैत
पसरि‍ नै पबैत जे कहि‍यो
तरे-तर खि‍आइत रहैत....।
कवि‍सँ बेशी समाजक लेल वि‍डंबना जे बाटसँ भटकल बाटोही अपन मूल बाटपर श्रद्धा तँ व्‍यक्‍त करैत अछि‍, मुदा जइ पथमे पहि‍ल बेर उदयायल आदि‍ि‍लक दर्शन होइत अछि‍ ओइ पथपर फेर धुरब पथ भ्रष्‍टक लेल असंभव जकाँ लगैत अछि‍। अपन मूल संस्‍कारक पराभव करब उचि‍त नै मात्र स्‍मृति‍सँ मूल माटि‍मे मातृत्‍व कोना उत्पन्न हएत। तँए ‘पलायन’ कोनो रूपेँ उचि‍त नै।
मि‍थि‍लाक माटि‍-पानि‍सँ फलैत-फूलैत हि‍न्‍दीक चर्चित उपन्‍यासकार फनीश्वर नाथ रेणु आंचलि‍क बनि‍ गेलनि‍। जौं मैथि‍लीक गप्‍प करी तँ कथाकार तँ कथा जगतमे ललि‍त, राजकमल, धूमकेतु, कुमार पवन आ कमला चौधरी सन प्रांजल आंचलि‍क कथाकार भेल छथि‍ मुदा आंचलि‍क काव्‍य जगतमे समग्र सामाजि‍क दैनन्‍दि‍नीककेँ छूबैत कवि‍मे यात्री (चि‍त्रा) ओ आरसी प्रसाद सिंह (सूर्यमुखी)क पश्चात् जगदीश प्रसाद मण्‍डलकेँ मानल जाए। ‘सान-धार-धारा’ कवि‍ता कोनो कैंचीक शानपर आधारि‍त काव्‍य बून नहि‍ ई तँ मानवीय मूल्‍य ओ संवेदनाक शानपर आधारि‍त पद्य अछि‍-
जे धारा सि‍रजए गंगा
कमला कोशी ओ महानन्‍दा
ओ धार कहि‍या धरि‍ ठमकि‍
मानैत रहत फंदा?
गंगा, कमला आ कोसीक कि‍छेरमे बसल गाम सभ मि‍थि‍लाक परि‍धि‍क भीतर अबैछ ऐ तरहक उल्‍लेख तँ बहुत रास कवि‍तामे भेटैत अछि‍, मुदा ऐठाम ‘महानन्‍दा’क चर्च कऽ कवि‍ पुबरि‍या बि‍हारक क्षेत्र कि‍शनगंजसँ आगाँ धरि‍क लोककेँ आश्वस्‍त कऽ देलन्‍हि‍ जे अहूँ मैथि‍ले थि‍कौं? मात्र पद्यमे लयात्‍मकता भरबाक लेल एना नै कएल गेल। कवि‍ मोन भावुक होइत छैक, भावमे बहनाइ कवि‍क प्रवृत्ति‍ मुदा मि‍थि‍लाक संस्‍कारसँ भरल रहलाक बादो ई क्षेत्र साहि‍त्‍यमे अपच जकाँ छल, तँए कवि‍क भावनाकेँ सम्‍मान करबाक चाही।
’जहाँ न जाए रवि‍ वहाँ जाए कवि‍’- ई वाक्‍य जे कि‍यो लि‍खने होथि‍ मुदा ई सर्वथा वि‍चारमूलक अछि‍। ऐ संग्रहक कि‍छु पद्य जेना पपीहाक गीत, वि‍खधरक बीख, नंगरकट घोड़ा आदि‍ पढ़लासँ स्‍पष्‍टत: बुझना गेल जे छायावादी दृष्‍टि‍कोण रचनाकारकेँ छोड़ि‍ सबहक लेल पूर्णत: बुझबामे नै अबैत छैक। ‘कोइली’ शीर्षक कवि‍तामे कवि‍ चन्‍द्रभानु सिंह ‘मैथि‍ली’क सरसताकेँ स्‍पष्‍ट रूपेँ पाठक वा श्रोता लग परसि‍ देने छथि‍ मुदा पपीहा गीत शीर्षक पद्य कोनो चि‍ड़ै-चुन्‍मुन्नीक स्‍वरपर आधारि‍त संस्‍कृति‍ गीत नै ई तँ सम्‍पूर्ण दर्शन थि‍क- जीवन-मरणक दर्शन। धरती अकाश, जल-थल कानि‍-अकानि‍ सन सहचाी विपरीतार्थक जीवन दर्शन.........‍
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
शि‍वकुमार झा ‘टि‍ल्‍लू’

Suggested citation: शिवकुमार झा ‘टिल्लू’. “इन्द्रधनुषी अकासमे सामाजिक विमर्श.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 102, 2012-03-15. https://www.videha.co.in/research/2012/102/इन्द्रधनुषी-अकासमे-सामाजिक-विमर्श.htm

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