मैथिली कथा साहित्यक विकासमे राजकमलक योगदान ::(आगाँ)
सन् 1954 मे “अपराजिता” कथाक संग राजकमल जीक मैथिली कथा साहित्य जगतमे प्रवेश भेल। हिनक मूल नाओं मनीन्द्र नारायण चौधरी छन्हि। 1929मे जनमल ऐ साहित्यकारक लेखनीसँ मैथिली साहित्यकेँ लगभग 36 गोट कथा भेटल। मात्र 38 बरखक अपन जीवनकालमे राजकमल मैैथिली गद्य साहित्यकेँ किछु एहेन कृति दऽ देलनि जइसँ प्रयोगकेँ बादक धरातलपर प्रतिष्ठित करबाक श्रेय साहित्यक समालोचक लोकनि ऐ साहित्यकारकेँ िनर्विवाद रूपेँ दऽ रहल छथि।
हिनक तीन गोट कथा संग्रह ललका पाग, एक आन्हर एक रोगाह आ “िनमोही बालम हम्मर” पुस्तकाकार प्रकाशित छन्हि। एकर अतिरिक्त हिनक एक गोट पोथी “कृति राजकमलक” मैथिली अकादेमीसँ प्रकाशित भेल अछि जइमे 13 गोट कथा आ एकटा उपन्यास आन्दोलन संकलित अछि। ओना कृतिराजकमलक छओ गोट कथा “ललका पाग”मे सेहो छपल अछि।
रमानाथ झाक मतेँ राजकमलक कथा मूल उद्देश्य मनोविश्लेषणत्मक प्रणालीसँ आरोपित मर्यादा ओ आदर्शक पाछाँ नुकाएल आन्हरकेँ नाङट करब अछि। डॉ. डी.एन. झा सेहो ऐ मतसँ सहमत छथि।
“ललका पाग” कथा हिनक लिखल कथा सभमे अपन विशिष्ट स्थान रखैत छन्हि। ऐ कथाकेँ मैथिली साहित्यक किछु श्रेष्ठ कथामे स्थान देब सर्वथा न्यायोचित अछि। कथाक आरंभमे मैथिली स्त्रीक चिन्हबाक विश्लेषणमे कोनो अचरज नै। त्रिपुराक तुलना जइ वर्गक मैथिली नारिसँ कएल गेल कथाक भूमिकामे ओइ वर्गक स्पष्ट उल्लेख तँ नै कएल गेल मुदा ओ ब्राह्मण परिवारक कन्या छथि। अल्पायुमे पण्डित पिताक मृत्युक पश्चात् तिरू अपन माइक संग गाममे रहैत छलीह। अग्रज झिंगुरनाथ बाहर धन उपार्जन लेल चलि गेलाह। किछुए वर्षमे तिरू युवती वयसमे प्रवेश कऽ गेलीह। दस-एगारह वर्षक बाद जखन झिंगुरनाथ अपन गाम घुरि अएलनि तँ मातृसिनेहक संग-संग तिरूक हाथ पीअर करबाक जिम्मेदारीक आभास भेलनि। वास्तविकतो छैक जे जखन ई कथा 1955मे विदेह विशेषांकमे देल गेल ओइ कालकेँ के कहए वर्तमान समैमे सेहो अपना सबहक समाजमे कन्याक जन्म कालहिसँ बियाहक चिन्ता अभिभावककेँ सतबए लगैत छन्हि। तिरू तँ माघमे 14मे वर्षमे प्रवेश कऽ जेतीह। उद्देश्य जौं सार्थक हुअए तँ सफलता निश्चित भेटबे करैत अछि। चण्डीपुरक राम सागर चौधरीक सुपुत्र राधाकान्तसँ स्व. पण्डित हेकनाथ झाक पुत्री त्रिपुराक बियाह सम्पन्न भेल। सासुर आबि तिरू कनेको स्तब्ध नै छथि किएक तँ जीवन शैलीक कोनो ज्ञाने नै छन्हि। अज्ञानतामे बाड़ीक पछुआरमे पोखरि देखि अपन बेमात्र सासुसँ हेलबाक कलाक जिज्ञासा कएलनि। यएह जिज्ञासा हुनक जीवनक लेल काल भऽ गेलनि। चननपुरवाली सासु भोरे-भोर समस्त गाममे अफवाह पसारि देलखिन जे रातिमे नवकी कनियाँ पोखरिमे चुभकि रहल छलीह। राधाकान्त ऐ घटनासँ मर्माहित भऽ गेलाह। आब प्रश्न उठैत अछि जे चननपुरवाली एना किअए कएलीह? ओ अपन पितिऔत भाय डाॅ. शंभूनाथ मिसरक सुपत्रीसँ राधाकान्तक बियाह करबए चाहैत छलीह। ऐठाम कथाकार कनेक चुकि गेल छथि। ऐ उद्देश्यकेँ कतौ स्पष्ट नै कएल गेल। माए जौं अपन बेटाक बियाह कोनोठाम करबए चाहैत छलीह तँ त्रिपुरासँ कोना भऽ गेलनि। जखन की चननपुरवाली परिवारक अभिभाविका छलखिन। हुनक पतिक हुनकापर कोनो विशेष अनुशासन सेहो नै छलनि आ ने राधाकान्त त्रिपुरासँ प्रेम बियाह केलखिन तँ कथानकमे एहेन परिवर्त्तनकेँ सोझे-सोझ आत्मसात् करब कनेक कठिन लागि रहल अछि। गाममे तँ कूटनीति चलिते अछि किएक तँ छद्म रोजी रोजगारपर बेरोजगारी भारी। तँए भोलामास्टर आ बंगट चौधरी सन परिवार विध्वंसक केँ राधाकान्त सन संवेदनशील लोककेँ दोसर बियाह करबाक प्रेरणा देबएमे यथार्थ बोध होइत अछि। ई सभ घटना चक्रसँ कथा रोचक होइत अछि। मुदा कथाकेँ आकर्षक बनेबाक क्रममे राजकमल बिसरि गेलाह जे त्रिपुरा मात्र 13-14 वर्षक बालिका छथि। जखन पोखरिमे चुभकबाक जिज्ञासा सासुरोमे छन्हि तखन सौतिन अएबाक संभावनाक मध्य अपन सकल गृहस्थ कार्यमे कोना लागल रहलीह? एक दिस चंचल रूपक उद्बोधन आ दोसरा रूपमे परिपक्व नारी, एकरा प्रयोगवाद तँ कहल जा सकैत अछि मुदा प्रयोगात्मक रूपसँ वास्तविकतासँ बहुत दूर। राधाकान्त सेहो शिक्षित छथि, मात्र अपन स्त्रीकेँ पोखरिमे स्नान करबाक सजाक रूपेँ दोसर बियाह। ओना मिथिलामे पहिने गप्पे-गप्पमे बियाह करबाक इतिहास रहल अछि परंच ऐ प्रकारक बियाहक कारण समीचीन नै लागल। अंतमे अपन बियाह कालक राखल ललका पाग जखन त्रिपुरा राधाकान्तकेँ दोसर बियाहक लेल प्रस्थानकालमे दैत छथिन तँ राधाकान्तक हृदए परिवर्तन भऽ जाइत अछि आ पहिलुक ललका पागक मर्यादा रखबाक लेल ओ चुप्प भऽ आंगनमे आबि कुर्सीपर बैस जाइत छथि। एहू घटनकाक्रममे कथा वास्तविकतासँ बेसी कल्पवृक्षक पुष्प प्रतीत होइत अछि। जे राधाकान्त मात्र पोखरि स्नानक दंडमे त्रिपुरासँ नारीक अधिकार छीनि लेबाक िनर्णए केलनि ओ अंगुलिमाल जकाँ क्षणहिमे कोना बदलि गेलाह। ई ध्रुव सत्य अछि जे मैथिल ब्राह्मण परिवारमे ललका पागक स्थान विशेष छैक आ ओइ पागकेँ सहेजि कऽ त्रिपुरा धएने छलीह। भगवत परीक्षा जकाँ सौतिन अनबाक लेल पतिक हाथमे पाग देबाक िनर्णएमे अंगुलिमाल रूपी राधाकान्तकेँ बुद्धसँ दर्शन भेलनि। जौं एकरा संभवो मानल जाए तैयो कनेक कमी ई जे राधाकान्त त्रिपुराक तुलनामे कामाख्या दाइक संस्कारकेँ सोचि-विचारि विशिष्ट मानि दोसर बियाह करबाक िनर्णए कएलनि। कोनो क्षणहिमे नै। ऐ बियाहक सूत्रधार हुनक बेमात्र माए छलथिन। चननपुरवालीकेँ अछैत राधाकान्त माथपर बिनु पाग धएने कोना विदा भऽ रहल छलाह, ई तँ सद्य: कथाक बहुत कमजोर पक्ष अछि।
भाषा विज्ञानक आधारपर जौं मूल्यांकन कएल जाए तँ कथाकार परम्परावादी मैथिल साहित्यकार जकाँ गद्यकेँ अधोषित श्रृंगारक रूप देबाक प्रयास कएलनि।
तिरूक तुलना वाण भट्टक श्यामांगी नायिकासँ करए काल ई उद्देश्य स्पष्ट भऽ जाइत अछि। मुदा जखन लिखैत छथि जे “मिथिलाक छौड़ी सभ अहिना करैत अछि।” तँ स्पष्ट भऽ जाइत छन्हि आत्मिक रूपसँ किछु आर कहए चाहैत छथि। ऐठाम छौड़ीक स्थानपर ‘कन्या‘ शब्दक प्रयोग सेहो कएल जा सकैत छल जे बेसी नीक लगितए। कामाख्या दाइक विषयमे राधाकान्तक मौन सिनेहमे मिआ आ आ जाऽ....... लिखबाक उद्देश्य स्पष्ट नै भऽ सकल।
ई सत्य अछि जे राजकमल मैथिलीक संग-संग हिन्दीमे सेहो लिखैत छलाह, मुदा हिन्दीक प्रति झॉपल सिनेह मैथिली कथामे परिलक्षित भऽ गेल। ई मैथिली साहित्यक लेल दुर्भाग्यक गप्प जे ऐ भाषाकेँ दुभाषी रचनाकार मात्र अपन नाओं-गाओंक लेल हथियार बनेलनि मातृभाषा सिनेहसँ साहित्यिक रचनाक कोनो संबंध नै। ओना ऐ प्रकारक कथ्य यात्री आ आरसीक रचनामे नै भेटैत अछि। कथोपकथनमे विरोधाभास देखलाक बादो एकरा नीक रचना मानल जा सकैछ किएक तँ कथा बड्ड आकर्षक छन्हि। जौं बिम्बक विश्लेषणकेँ शिल्पक रूपमे देखल जाए तँ राजकमलजी स्थापित शिल्पी छथि ई ललका पाग प्रकट भऽ गेल।
दमयन्ती हरण- ‘दमयन्ती हरण’ भरल सभामे कोनो विवश नारीक चिर-हरणक वृत्ति चित्र नै। ई तँ समाजक पाग-चानन- ठोपधारी किछु कथाकथिक भलमानुषक वास्तविक झाॅपल चरित्रकेँ नाङट करबाक कथा थिक। कथा नायिका छथि तेइस-चौबीस बरखक- दमयन्ती दुलरैतिन दम्मो अथवा समाजक कोप भाजन बनलि दमिआँ। ऐ नायिकाकेँ गामक रक्षक लोकनि खलनायिका बना देलनि, जे दोसरक शोषण तँ नै करैत अछि मुदा अपन चरित्र हनन कऽ ग्राम्य समाजकेँ विगलित कऽ रहलीह जे कोनो अर्थमे उचित नै। ऐ लेल दोष ककरा देल जाए? सामर्थ्यहीन मायकेँ वा ओहि लेल दोष ककरा देल जाए? सामर्थ्यहीन मायकेँ वा ओहि समाजकेँ जकर छाहरिमे नेनपनसँ सोझे अग्राह्य नारीक अवस्थामे प्रवेश कऽ गेली- दमियाँ।
मिथिला समाजक वर्णन कोनो कवितामे जतेक घृतगन्धा हुअए मुदा ई अक्षरश: सत्य अछि जे जइ समैमे ई कथा लिखल गेल ओइ समैमे परीक्षा समाप्ति आ नव कक्षामे प्रवेशक मध्यक समय छात्रक लेल मस्ताएल साँढ़सँ बेशी किछु नै छल। जौं रहितए तँ फूलबाबू रामपुरमे किअए बौआइत रहितथि। “फूल भैया ओइपार जएबह?” वेदव्यासक मत्स्यगंधा इत्यादि संवादसँ नारी विमर्शक विह्वल ररूप प्रदर्शित होइत छैक। कथाकार तँ कथाक प्रारंभेमे अवश्ये ई निश्चय केने हेताह की कथा नायिकाकेँ वैश्याक रूपमे प्रदर्शित कऽ कथाक इतिश्री कएल जाए। मुदा आदर्शवादी विचारधारासँ एकटा वैश्याक भूमिका वॉधव बड़ कठिन कार्य भेल हएत। शनै:-शनै: ‘गाड़ीमे भीख मांगैत छौड़ी’ सदृश दमयन्तीक रूपक विश्लेषणमे नारी जातिक अपमानसँ बेशी समाजक कटु सत्य इजोतमे आबि गेल।
स्वेच्छासँ अमर्यादित आचरणक आवरणमे दमियाँ नै गेलीह। ‘हे महादेव, चारिदिनसँ हमरा ऑगनमे चूल्हा नहि जरल अछि’ सन संवारसँ ई परिलक्षित होइत छैक।
गूढ़ मंथन कएलासँ कथामे किछु विशेष नै।
अपन बेटीक भरण-पोषणक लेल देह व्यापारकेँ केन्द्र विन्दु बना कऽ लिखल गेल कथामे कोनो सम्यक समाज विमर्श नै। कोनो आदर्श पथ नै मात्र मथभ्रष्ट समाजकेँ पाठक धरि परसल गेल। यायावरी जीवन चक्रमे घुमैत जयद्रय आ कथाकारक संवाद कोनो समाजक लेल आदर्श प्रस्तुत नै कएलाक। देलक तँ समाजकेँ ई संदेश जे जौं कोनो अवला मिथिलाक गाममे रामबाबू सन दु:खिता पतिताक कथाकथिक रक्षक लग अपन आत्मरक्षाक ऑचर पसारतीह तँ ओ ऑचर खींच लेबामे कोनो संकोच नै करतथि।
’मायसँ कोन काज अछि’- नायिका कथाकारकेँ देखि हुनको ग्राहके बुझली। ई कोनो भ्रम नै। अस्तत्व विहीन नारी लग देहलोलुपे मनुक्ख पहुँचैत छथि।
‘हम स्त्री नै छी, फूल भैया। हम तँ माटिक फूटलि हाँड़ी छी। हमरापर दया करबाक कोनो प्रयोजन नहि’- मर्माहित करबाक लेल चेतनाशील मनुक्खकेँ ई वाक्य भारी पड़त। छप्पन बरख पूर्व ई कथा लिखल गेल। ओइ समैमे समाजक ई दशा छल? तखन तँ वर्त्तमानकालक जीवन शैलीकेँ दोष देब उचित नै। जखन जड़िए पथभ्रष्ट तँ छीपक विषयमे नीक कल्पना करब सेहो भ्रामक अछि।
सम्पूर्णकथामे झाजी आ चौधरीजी, मात्र पंचैती कालमे स्कूलक प्रधानाध्यापक यादबजी आ एकठाम खबास कुंजा धानुक अन्या वर्गक पात्र छथि। तखन ‘ब्रह्मो जानति ब्राहण:’ कोना कलियुगमे प्रासंगिक मानल जाए। समाजमे नीति शिक्षाक आचार्य जौं कुनीतिक प्रधानाचार्य भऽ जाथि तँ व्यवस्थे चौपट्ट किएक नै हएत।
बेर-बेर जखन-जखन नारी वा शूद्रक चर्च होइत अछि तँ तुलसीदासक ‘टोल गॅवार शूद्र पशु नारीक’ उद्धरण देल जाइत अछि। महाकाव्यक रचनामे कोनो विषेष पागक मुखसँ निकसल ऐ वाणी द्वारा मानस पुरुषक चरित्र..
सकैत छथि। चौधरीजी बजलाह ‘घोर कलियुग आबि गेल अछि तुलसीदास ठीके लिखने छथि...’ ई उचित नै लागल। तुलसीदास तँ एकठाम लिखने छथि जे ‘धीरज धर्म मित्र अरू नारी, आफत काल परेखहुँ चारी’ एकर उल्लेख किएक नै कएल जाइत छैक? ओना ऐ कथामे नारी आ धर्ममे सहचरी बनेबाक कोनो गुंजाइश नै छल। मुदा तुलसीक विषयमे लिखबाक काल ई धियान रखबाक चाही जे रामचरित मानस जनभाषाक कृति अछि जइसँ सम्पूर्ण हिन्दू संस्कृति प्रभावित भऽ रहल, कोनो विषेष जातिक आधिकारिक भाषा संस्कृतिमे लिखल नै गेल। तँए बाल्मिकि रामायणसँ बेशी पाठक धरि एकर पहुँच रहल।
कथाक बिम्ब विश्लेषण रूचिगर लागल, जे राजकमलक विशेष कथा लिखबाक कलाक परिणाम मानल जाए। हिनक कथामे कोनो हास्य समागम नै रहितहुँ जनप्रिय रहल। तकर मौलिक कारण थिक गद्य काव्यात्मक विश्लेषण। वाणिज्यक छात्र रहितहुँ राजकमल अंकगणितीय वा सांख्यिक लेखा जोखामे नै पड़लाह किएक तँ ‘आशुकथाकार’ छथि। कथाक अंतमे वएह पंचैतीक िनर्णए जे हमरा सबहक समाजक व्याधि छल। कानूनकेँ चनौती देबाक लेल पंच परमेश्वर बनि किछु लोक पान चिबा कऽ इतिश्री कऽ रहल छलाह। वर्त्तमान समैमे ई संभव नै छैक किएक तँ मनुख सेहो ‘चेतनाशील भऽ रहल आ प्रजातंत्र दीर्घ सूत्री समाजक पागधारीसँ भरिगर भऽ गेल। मुदा अंतमे कथाकार बिसरि जाइत छथि आ मत्स्यगंधाक हँसि प्रश्ने रहि गेल। राजकमलक प्रश्नसँ कथाक इतिश्री करब पाठकेँ भ्रमित कऽ दैत अछि, मुदा रूचिपूर्ण। िनर्णए तँ हमरा सबहक समाजमे ओझराएले रहि गेल छल तँए संभवत: प्रश्नेसँ कथाक इतिश्री कएल गेल भऽ सकैत अछि ।
अाकाश गंगा- मैथिली साहित्यक संग सदिखन ई भ्रांति रहल जे जौं कोनो साहित्यकारक एक गोट कृति साहित्यकेँ आर सुवासित कऽ देने अछि तँ आगाँक रचनामे कथ्य ओ शिल्पसँ बेशी कथाकारक नाओं मूल्यांकन केन्द्र बिन्दु भऽ जाइछ। ऐ अन्तद्वन्द्वसँ राजकमल सेहो नै अछोप रहलाहेँ। ‘आकाश गंगा’ श्रैगांरिक बिन्दुकेँ स्पर्श करैत समाजक अंतव्यथाक चित्रण करबामे सफल कथा थिक, ऐमे कोनो संदेह नै। मुदा जौं अंत:करणसँ अवलोकन एकल जाए तँ ‘बऽर दुआरिपर उतरल नहि की छींकक ध्वनि’ जकाँ कथाक प्रारंभे छायावादी शैलीमे कएल गेल। ‘विवेकानन्द चौधरी नहि मिथ्या कहलहुँ, आब जमीन्दार नहि साधारण नागरिक। नागरिको नहि साधारण गामीण’ सन शब्दकोशसँ वाक्य बनाएब अप्रासंगिक मानल जाए। कथाकार स्वयं दृग्भ्रमित तँ नै छथि किएक तँ हिनक प्रतिभापर संदेह नै। तखन पाठककेँ दृग्भ्रमित करबाक उद्देश्य स्पष्ट नै। कथाकारकेँ एकबेर स्पष्ट कऽ देबाक चाही जे विवेकानंद की छथि? जौं ई काव्य रहितए तँ क्षम्य छल, मुदा कथाक ऐ रूपकेँ की मानल जाए? सचार तखने नीक लगैत छैक जखन मूल खाद्य पदार्थ अक्षत हुए। मङुआक संग गाही साग तरकारी परसबाक बादो भोजनमे विशेष स्वाद नै भेटत। कथोपकथनपर शिल्पक भार एक निश्चित सीमाने तक शोभायमान लगैछ। विवेकानंद चौधरी अपन अर्द्धांगिनी मदालसासँ संबंध समाप्त भऽ गेलनि। विवेकानन्द अपन बेटी अन्नपूर्णा संग रहए लगलाह। एकटा जमीन्दारक बेटी अन्नपूर्णा पितृ आशाक विपरीत गरीब बालक राधाकान्तक संग विआह कऽ लैत छथि। बाप-बेटीक संबंध समाप्त भऽ गेलनि। कालान्तरमे बेटी अन्नपूर्णा एक बालक अशोकक माए भऽ गेलीह। पतिक देहावसानक बाद दरिद्रासँ लड़ैत माय अन्नपूर्णाक चरित्र चित्रणमे कथाकारक सबल दृष्टिकोण झलकैत अछि। नारी-विमर्शक दृष्टिसँ कथा रोचक मुदा नारीक जीवन दशा समाजमे उदासी छैक, ई प्रमाणित करब उचित मुदा अगिला पीढ़ीक लेल उदासीन तँए रचनाकारकेँ ऐमे परिवर्त्तन करबाक चाही छल। अंतमे विवेकानन्दक हृदए पझिजैत अछि आ ओ बेटीक विदागरीक लेल उद्यत भऽ जाइत छथि। ललका पाग जकाँ अहू कथामे परिणाम स्पष्ट नै भऽ सकल। श्रैंगारिक जीवनक परिधिमे घुमैत कथा परिणाम विहीन, एेसँ एकटा कथाकारक पलायनवादी वैरागी प्रवृत्तिक द्योतक मानल जा सकैत अछि।
कादम्री उपकथा- वैधव्य जीवनक अविरल चित्रणसँ भरल ऐ कथामे नायिका ‘कादम्बरी’ विधवा छथि। पति वश्वनाथक मरलाक बाद नैहर चलि जाइत छथि। किछु दिनक बाद देओर दुखित भऽ गेलखिन तखन सासुर आबि गेलीह। सासुरक लोकक कल्पना छल जे कादम्बरी ब्राह्मण संस्कृतिक अनुकूल श्वेत वस्त्र धारिणी अवला बनि अएलीह। मुदा सौन्दर्य सुन्नरि कादम्बरी अंग-वस्त्रसँ विपदा-मारलि नै अएलीह। फेर धमगिज्जरि। अपन केओ नै किएक तँ जीवनक एक पहिया धसि गेल छलनि। तँए ने दोसरक नेनामे शिक्षाक दिव्य संस्कार जगएबाक क्रममे परिहासक पात्र भऽ गेलीह। गायत्री देवी छोट दिआदिनी छलीह। शिक्षित नारी कादम्बरीक महत नेना-सभक मध्य बेसी छल। किएक तँ हुनकामे संतानहीन रहितो मातृत्व छलनि। नेना आ मूक पालतू पशु सिनेहक भुक्खल होइत अछि। ई सभ गायत्रीकेँ सोहाइत नै छलनि। अपना तँ ऊक देबाक लेल एकटा अल्लुओ पेटसँ नै उखड़लनि’ गायत्रीक ऐ प्रतिघातसँ कादम्बरी पाषाण भऽ गेलीह। आङनक पाठशाला बन्न कऽ देलखिन किएक तँ गायत्रीक छोटकी बेटी निरमलाक मृत्यु भेलापर ‘डाइन’ शब्दसँ सेहो विभूषित कएल गेलीह। जखन की निरमला सर्प दंशसँ जहान छोड़ि विदा भेलीह।
कथाक अंतिम चक्र बड़ नीक अछि। लुब्धा खबासक स्त्री प्रसव पीड़ासँ व्यथित कादम्बरीक आङनमे छटपटाइत छथि। एकटा गरीब समाजक कात लागल वर्गक नारीक व्यथा कादम्बरीकेँ कर्त्तव्य परायणताक भावुक प्रवाहमे लऽ गेलनि। हास-परिहास आ परितापक भयसँ मुक्त भऽ ओइ नारीक संग-संग संसारमे आबए बला नेनाक लेल भगवतीसँ छागर कबुला केलखिन। जखन ई गप्प बादमे गायत्री कादम्बरीक मुखसँ सुनलनि एवं प्रायश्चितमे अश्रुकण बाहर भऽ गेलनि। ग्लानि भरल समाजक वैधव्य जीवनक वृति चित्र अंतमे सिनेहसँ समाप्त भेल।
आकार्षणमे कथा चुम्बकीय प्रभाव जकाँ पाठककेँ झपटि लैत अछि, मुदा की समाजक ऐ अनिश्चयवादी बेवस्थाकेँ ‘नारी-विमर्शक’ दृष्टिसँ उचित मानल जाए। जइ कालमे ई कथा लिखल गेल, भारतवर्षमे सेहो धर्म सुधार आन्दोलन भऽ रहल छल, मुदा मैथिल ब्राह्मण समाज ओहिकालकेँ के कहए एखन धरि ‘वैधव्य जीवन’सँ मुक्तिक आन्दोलनकेँ जाति-संस्कार विरोधी मानैत अछि। ऐ मतेँ ई कथा लिखब कोनो अनुचित नै। मुदा प्रयोगधर्मितिक रूपेँ जौं धियान देल जाए तँ राजकमल क्रान्तिदूत भऽ सकैत छलाह। परिणाम मिश्रित देखए सकैत छलथि परंच ‘कादम्बरी’केँ रूढ़िवादितासँ मुक्ति करबाक प्रयास कथाकारकेँ ओइ शिखरपर स्थापित कऽ सकैत छल जतए धरि मैथिली साहित्य एखन तक नै पहुँचल अछि।
निष्कर्षत: व्यवस्था फेर नाङट भेल से उचित किएक तँ संकीर्ण मानसिकताक समाजक मध्य ई कथा घुमैत अछि।
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