पाग, मिथिला आ जातिवादक राजनीति-
असममे एहि बीच चलि रहल बिहू पर्व कोनो जाति वा धर्मसँ बान्हल नहि अछि। कहि सकैत छी एहि पावनिक अवसर पर सम्पूर्ण असामबासीक मोनमे एकेटा शब्दक संचार होइछ आ से थिक प्रेम। प्रेम छैक प्रकृतिसँ, लोकसँ, सभ जीव-जन्तुसँ। एहिमे ने कतहु कोनो बान्ह छैक आ ने कोनो सीमा। सभगोटए एहि पुनीत अवसर पर अपन निष्ठा आ सिनेहकेँ एहि रूपें उपस्थापित करैछ, जे लोकक मोनमे ई अभिलाषा वर्षोभरि जोर मारैत रहैत छैक जे बिहू कहिआ आओत आ हम सभ फेर एहि पाबनिकेँ प्रेम-भावसँ मनायब। हुनका लोकनिक मोनमे कतहु एहि विषयक चर्चा नहि जे बिहू कत’ सँ आयल, ई ककर छी, ओ सभ तँ मात्र एतबे जनैत छथि जे ई प्रेमक पाबनि थिक। जापी,गमोछा, बिहू गीत ई किनकर, एहि पर कोनो माथापच्ची नहि, मात्र पावनिक ई सरंजाम असमियाक प्रतीक थिक।
एहि प्रसंगकेँ एतए उठएबासँ हमर मतलब अछि जे आइ काल्हि, खासकए मिथिलामे, किछु युवा तुर्क लोकनि विषय बिना बुझने अपन ज्ञान झाक उपयोग प्रारम्भ कए दैत छथि। एम्हर देखल गेल अछि जे किछु गोटे पागकेँ एकटा जाति सँ बान्हि मिथिलाक अस्मिता पर चोट क रहल छथि, प्राय: हुनका अस्मिताक महत्ता ज्ञात नहि छनि। किछु दिन पूर्व पागक मादे मनोज कर्ण उर्फ मुन्नाजी कहलनि जे ई ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक उपयोगक छी। मुदा, एतए हमर कहब अछि जे ओ आजुक गुटबाजीसँ प्रभावित भए ई व्यथा व्यक्त कएलनि, हुनका प्राय: खूब नीक जकाँ बूझल हेतनि जे पाग सम्पूर्ण मिथिलाक गौरवक प्रतीक थिक, प्राय: हुनका देखल होएतनि जे मिथिलाक सभ जातिक लोक अपन बिआहमे एकर उपयोग करैत छथि, से चाहे घुनेसक भीतरमे हो वा मौरक। सत्य पूछी तँ एहन-एहन सोचक कारणेँ हमरा कखनो-कखनो डर लगैत अछि जे ई सभ कखनो इहो कहि सकैत छथि जे विद्यापति मात्र जाति विशेषक साहित्यकार थिकाह, मखान मात्र जाति विशेषक उपयोगक वस्तु थिक, धोती पहिरब तँ जाति विशेष कर्त्तव्य थिक आदि-आदि।
एहि विषय पर सोचला पर लगैछ जे जखन सामंत अपनहिंमे लड़ि कमजोर हुअए लगैत छथि तँ ओसभ एकटा नव कूटनीतिक चालि चलि शोषितक नेता बनि हुनका माध्यमे अपन काज सुतारबाक प्रयास प्रारम्भ कए दैत छथि आ तेँ इहो सोच हमरा जनैत ओही नव धाराक सामंती सोचक उपजा छी। किन्तु हुनका लोकनिकेँ आब सावधान भ जएबाक चाहियैन्ह जे अपने कतबो फुटक राजनीति करब, अपन काज सुतारबाक लेल हाथ-पएर मारब, मुदा कार्यसिद्धि असम्भव। आब मिथिलाक आमजन अपन अधिकार आ अस्मिताक प्रति सचेत-सचेष्ट भए गेल छथि। तैँ ई पाग, मखान, माछ कोनो जाति विशेषक संपत्तिक घोषणा करबासँ पूर्व ई सोचि लेब आवश्यक जे ई मिथिलाक अस्मिता छी आ एहि पर सभ मैथिलक अधिकार छैक। अन्तमे मिथिलामध्य जुड़-शीतल चलि रहल अछि , गाछ-बीरिछ क जड़िमे पानि देल जा रहल अछि, सभ अपन पूर्वज आ अपनासँ छोटकेँ जुड़ा रहल छथि आ एहने समयमे हमरा मोन पड़ैत अछि युवा साहित्यकार धीरेन्द्र प्रेमर्षिक लिखल ओ आखर –
“भेल प्रेमक रौदी एहि जगमे
तेँ धधकए सभतरि दावानल
जुड़शीतलक जल-थपकीसन
बरिसाउ प्रिये कने प्रेमक जल.....।”
(मौर कोढ़िलाक बनैत अछि आ पागसँ फराक अछि। कर्ण कायस्थमे सेहो सिद्धान्त कुमरम आदिमे मात्र पाग पहीरि कऽ विध होइत अछि, ओहो सभ बियाह करऽ पाग नै मौर पहीरि कऽ जाइत छथि। पूर्णियाँक ब्राह्मणमे नव-विवाहिता बरसाइतमे मौर पहीरि कऽ वटवृक्ष धरि जाइत छथि। पाग मात्र आ मात्र मैथिल ब्राह्मणक बियाहक विध-बाधक प्रतीक अछि। विजय कुमार ठाकुर लिखै छथि: "मिथिलाक धार्मिक क्षेत्रमे एहि सामन्तवादी युगीन धार्मिक विचारधाराक प्रभाव एहन सर्वव्यापी छल जे एखनहुँ एहि परम्पराक निम्नलिखित अवशेष समाजमे विद्यमान अछि: ...(घ) पाग सेहो तांत्रिक विचारधारासँ सम्बद्ध अछि।" (मध्यकालीन मिथिला पृ.२६) - सम्पादक)
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
रवि भूषण पाठक
ओक्कर तोहर हम्मर सपना- ३
जेठक पोखरि सभ प्राय: सूखि जाइत छैक ,मुदा एकदम सूखले बूझि यदि पोखरि कें पार कर’ लागब ,तखन पएर कनि कनि धस’ लागत आ एक क्षण रूकि कें अपन दूनू हाथ सँ एक कोबा माटि हटा के देखिअओ .....तुरत्ते जलक धार अपन उपस्थिति सँ अवगत करा देत..... भिजा के , गरमी सोखि के आ अहांक भ्रांत धारणा मे अपन विनम्र हस्तक्षेप करैत ,तें अओ बाबू भैया सत्य ओएह नइ थिकइ जे आंखिक समक्ष हो ....सत्य कने उद्योगक मांग सेहो करैत छैक ।तें हम अपन गामक परिचय कोना दी ,बड्ड अशौकर्य मे पड़ल छी ।
ई गाम मिथिलाक ,भारतक आ ब्रह्मांडक एकटा सधारण ग्राम .....अपन खेती-बाड़ी ,खान-पान ,गीत-नाद ,बोली-वाणी ,सामूहिकता क’ विभिन्न कसौटी पर ...एकटा सधारण ग्राम ।एकर चर्चा कोना शुरू कएल जाए , टोल सँ ,जाति सँ ,खेत-पथार सँ ,बड़का लोकक स्वघोषित महानता वा छोटका लोक पर आरोपित ओछपन सँ...... सब मिलाके एके बात छैक ।पहिले टोल सॅं शुरू कएल जाए ।चारू दिशा क’ नाम पर चारि टोल ,उत्तरवारी ,दक्षिणवारी ,पूवारी ,पछवारी अथवा डीह टोल ।दिशाधारित ऐ विभाजनक अलावे बभनटोली ,गुअरटोली ,चमरटोली ,दुसधटोली आ राजपूतक एकटा अलगे टोल ।दुसाधक तीनटा बिखरल बिखरल टोल ,तहिना चमार सभ सेहो दू ठाम समटल.....।
विभिन्न टोलक प्रति आन टोलक नवीन नवीन रूख ,नवीन दृष्टि आ ओकर चर्चा मे एकटा अपमानजनक टोन ।जेना उत्तरवारी टोल अपना मूने सबसॅं बेशी सुसभ्य ,दक्षिणवारी टोल सबसँ बेशी लंठ ,पूवारी टोल सबसँ बेशी एडवांस आ डीह टोल सबसँ बेशी जेनुइन छलै ओ दोसर टोलक हिसाबें उत्तरवारी टोल मे सबसँ बेशी बतहपन ,दछिनवारी टोल मे मूर्खता ,पूवारी टोल मे दिखाबा आ डीह टोल मे उत्थरपन भरल रहै । आ एहिना मूल ,गोत्र आ बैसारी क’ हिसाबें सेहो अपना के नीक ,सभ्य आ दोसर के ओछ ,असभ्य मानबा के बहुत रास घटना ,कहबी ,वृतांत......आ जखन एक जाति मे एते बखरा तखन पूरा गाम मे कतेक .........ओना आपुसी गपशप मे पूरा गाम गामे छलै आ नीक-खराप दूनू साथे चलैत छलै.......
उमा बाबू भूगोल पढ़ाथिन त’ टंगड़ी हिलबैत रहथिन आ मोटका करची क’ सटक्की सँ अपन तरवा पर हरदम चलाबैत रहथिन जेना कि केओ मजूर अपन हांसू के पिजबैत छैक ....ओ कहथिन जे आबादी बसै आ घरक समूहक गठन एकटा खास पैटर्न पर होए छैक आ विश्वक विभिन्न भागक लोक सब अलग-अलग पैटर्न पर अपन निवास बनबैत छैक ,उमा बाबू ईहो कहथिन जे यदि केवल भारते के देखल जाए त’ उत्तर भारत आ दक्षिण मे असंख्य पैटर्न ........गंगा ,गोदावरी ,रावी,गंडक ,कोशी सभक पेट मे अलग अलग श्रृंगार ।केवल मिथिले नइ मिथिलो मे समस्तीपुर के देखियौ उत्तर मे अलग आ दक्षिण मे अलग ।उत्तर मे घर पर घर आ सटल सटल टोल ,जखन कि दक्षिण मे हटल हटल घर ।विशाल खेत आ तखन एकटा दूटा घर ,खूब फैलल गाछी बिरछी तखन किछुए टा घर ।आ घरक अवस्थिति केहन त’ पोखरि ,रोड वा मंदिरक आस-पास ।अपने गामक विचार करियै त’ पूरा ब्राह्मणक आबादी नबकी पोखरि ,नौला आ बरी पोखरिक चारू कात वा फेर डीह पर कचहरी ,इसकूलक चारू कात आ रोसड़ा-बहेड़ी मार्ग पर । आ सबसँ उस्सर ,बंजर ,सक्कत जमीन पर चमार आ दुसाधक आबादी ,एकदम बबूर जँका ,कत्तउ जनमि जाइत हो ,खेतक आडि़ पर ,पोखरिक मोहार पर ,गाछीक खत्ता मे लोकपरिया पर ,पीचरोडक दूनू कात आ श्मशान मे सेहो........ने खाद देबाक काज आ ने पानि देबाक चिंता।मुदा सबसँ सक्कत , सूर्य भगवान आ सभ्यताक समस्त गरमी के सोखैत जहिना के तहिना ......एकदम हरियर पत्ती .......बाभनक दांत पर घुस्सा मारैत ,भोर सांझ.......आ जखन सभ हरियरका जजाति सूखि जाइत हो तखन बबूरक पत्ती आ ओकर फअर सभक जान बचाबैत........तहिना चमार आ दुसाध सेहो अपन छोट दुनिया मे एकदम मस्त आ हरियर ।
गामक सब सरल गेन्हायल पानि ,गनगी बरसा आ बिना बरसा के पूबरिया ढ़लान होयत चमरटोली दिस चलि जायत ।आ चमरटोली जे गामक पूबरिया सीमान पर बसाएल गेल छलै ,समस्त अग्राह्य सेवा क’ लेल ,जत’ के लोक सभ के ई कहबाक अधिकार नइ छलै जे अओ बाबू अपन देहक ,घरक ई दुर्गन्ध हमरा दिसि किएक बहा रहल छी \ ई आबादी जेकर पेट ,देह आ मोनक चर्चा तक अश्पृश्य छलै .....देहे नइ मोन तक छुआ जाए वला .....गंगा जल ,नइ गंगो जल नइ पवित्र करत ,हड्डी तक छुआए वला गनगी.........स्मृति आ वर्णगत विभिन्न श्लोक ,कहबी ,हवा-पानि ,भूत-प्रेत पर्यंत तक फैलल......
यद्यपि चमार सब पूरबिये सीमान पर समटि गेल छलै ,मुदा दुसाध सब जीयत रहै ,डीहक सक्कत जमीन पर ...आ जेकरा जीन मे घुसल रहै संकट निवारण लेल साहस ,उद्योग ,आ ओ सप्पत खेने रहै अपन राजा जी के .....राजा जी हुनकर कुल देवता नइ रहथिन ,ओकर अप्पन राजा जी ,हँ मिथिलाक आदिवासी दुसाधक राजा जी .....आ राजा जी पहिले महल ,गद्दी ,दरबार छोड़लखिन आ किताब ,पुरातत्व सँ सेहो हुनकर निशानी मिटि जाइत रहल.....मुदा राजा जी बसल रहलखिन दुसाध सभक करेज मे -
कते घोड़ा तोहर राजा
कते दुश्मनमा के
धरती चलै अकाश हो........
आ राजा जी आ राजा जी क· घोड़ा दूनू अपन मूल स्वरूप के पानि जँका छोडि़ देने रहै आ राजा जी मने घोड़ा आ घोड़ा मने राजा जी ,तें घोड़ा चढ़एबा क पूजा बेशी धूमधाम सँ होइत छलै आ राजा जी वला उत्सव दुसाध सभ मे एकटा खास उत्साह,आत्मविश्वास जनमाबैत छलै ,मुदा राजा जीक मन्दिर कोन ठाम बनै,विद्यालय पर ,आचार्यक डीह पर वा दुसधटोली मे ......ई खिस्सा कनेक बाद.........
अपन गामक चर्चा कोना करी ,खूब मीठ प्रशंसा सँ .....जेना कि केवल मीठे-मीठ अनुभव होए ।केवल मीठ अनुभव तखने संभव ,जखन कि एक-दू दिनक लेल पिकनिक पर आयल जाए ,मुदा जखन जिनगीए बिताबै के अछि तखन केवल मैथिली शरण गुप्त क भंगिमा ल· के कोना जीयब आ बात बात मे ग्रामीण जीवन ,भारतक प्राचीनता आ महानता क पाठ कोना कएल जाए .....आ मैथिली मे सेहो गुप्त जी नइ मैथिली शरण सभक कमी नइ ,जे बात बात मे मिथिलाक महानताक बखान करैत रहता ,हुनकर ग्रामीण जीवन क फॉर्मेट पहिले सँ सुनिश्चित रहै छैक ,केवल विवरण भरबाक काज......छोड़ू ऐ सब कें.......चलू हम अप्प्न डायरीक ई पाठ अहींक कविता सँ प्रारंभ करैत छी ।
(आगूक तीन-चारि टा पन्ना फाटल अछि)
क्रमश:
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
श्यामसुन्दर शशि