विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

बिदापत नाच

मधुपनाथ झा · 2012-05-01 · अंक 105

बिदापत नाच
विदापत-नाच एहि नाचक उत्पत्ति दरभंगा जिला मे भेलैक, एहन अंदाज़ कैल जाति छैक | लेकिन अपने मात्रि -भूमि मे इ कोन तरह के अवस्था मे अछि एकरा कहबाक जरूरत नय बुझैत अछि, परंच उत्तरी बिहार के किछु जिला आ भागलपुर, पूर्णिया आदि के गाम सब मे आइयो एकर 'क़द्र' छैक | ई छोटका लग सब के नाच बनि क रहि गेल अछि | तथाकथित भद्र समाज के लोग एकरा देखबाक मे अपन हेठी बुझैत छथि , लेकिन मुसहर, धाँगड़, दुसाध के ठाम---विवाह, मुंडन संगहि अन्य अवसरो पर एकर धूम मचल रहैत छैक | ऐ नाच मे साथ-आठ टा कलाकार रहैत छैक आ दुइए टा वाद्य यन्त्र-मृदंग और मजीरा रहैत छैक |

त चलू विदापत-नाच के आनंद उठाबि अपन भद्रता के किछ काल लेल....धृग धा, धृग धा तिन्ना --बाजि क मृदंग बौक भ गेल.....कुन कुन कुन कुन... मजीर स्वर मे संग देलकय.... गननायं फलदायकं पंडितं पतितं...' अहाँ सब हंसु जुनि इ मंगलाचरण छलैक, शुद्ध संस्कृत मे | 'किनकां, किनकां, किनकां, किनकां मजीर संग देलकय | नाचअ वाला चारू तरफ जेम्हर-जेम्हर समाज के लोग छल चक्कर देनाइ शुरू केलक | ओकर पाछु एक दोसर नर्तक सेहो घिरनी जकां चक्कर लगा रहल छल आ मुंह के रंग-बिरंग के बनबैत ओय -ओय -ओय -ओय बाजि रहल छल |

धिरिनांगी, धिरिनांगी, धिरिनांगी, धिरिनांगी-- मृदंग ताल बदल दोसर सुर निकाल लक... किनकां, किनकां...आब रहअ दिय बड नचौलौं... आब बाद मे नाचक कथा हेतैक |

आई अपना सब विदापत-नाच के आगू बढ़ाबय छी |

नाच करअ वाला एकेटा जगह पर जमा भ झूमअ लागल | धिरिनागि तनका, तिटक-तिटक ध, तिटकल मदगिन धा' | ताल समाप्त भेल आ नाचो शेष भ गेल आ नाचअ वाला सब घोघ तानि दर्शक मंडली मे जा बैसल | नाच मे विकटा बनल छल ओ नाच करनिहार के ताकअ लागल | धृगा-धृगा'...

'धिन-तिनक तिनक, धिन तिनक-तिनक'-- मृदंग बाजल

'हे समाजियों के सुर मे सुर मिलौलक |

'हे लेल परवेश परम सुकुमारि

हंस गमन वृषभान दुलारि....'

नचनिया सब उठी विकटा लग आबि गेल आ हर्षित भ विकटा ओय ओय ओय ओय केनाई शुरू क देलक |

'धिन-तिनक तिनक धिन-तिनक तिनक '

'हे ! तन मन बदन पापन सहजोर है दामिनी ऊपर उगलन्हि चाना...'

नाच अजुका बंद करैत छी फेर आनद उठायल जेतै.....

विदापत-नाच के आब आगूक आनंद उठाऊ... आ प्रितिक्रिया कृपया सेहो व्यक्त अवश्य करू .... जय मिथिला, जय मैथिल, जय मैथिलि, जय मिथिलांचल, जय मिथिलापन, जय मैथिलियता........

नाच करअ वाला सब घोघ हटा लेलकि आ चंद्रमुख ( घुटल दाढ़ी, मोंछ आर बेडोल केहने संके मुंह) देख दर्शको सब हँसैत-हँसैत निहाल भ जैत अछि | नचनिया निचाअ दिस ताकि रहल लाज सँ लज्जावती लता सन सिकुडल नाच क रहल छल वा छली | विकटा ओकरा अपना दिस आकर्षित करअ के कोशिश क रहल अछि | ' हे विहसि उठलि पिऊ दखि सुहागिनी लाज बदन लेल फेरि..' नचनिया विहंस क मुंह फेर लेलक | हंसअ काल मे तमाकुल सेवन सँ जे दांत सब कारि भेल छलय से चमकि उठल | कृपया अहाँ सब शांत भ जाऊ | जी, जी हं, विद्यापति के पदावली भ सकैत अछि, परंच इ छे 'विदापत नाच' |...... न्यू थियेटर्स, विद्यापति, कानन बाला. पहाड़ी सान्याल की... बक-बक बंद कराय जाऊ | आखिर अलाप शुरू कए देलौं, 'मोरे अंगना मे आये आली, मै चाल चलूँ मतवाली'.... अहाँ सब के कतेक बुझौ जे इ 'विदापत नाच' छय आ वो नाच करअ वाला टहलू पासवान, ओकर बाप बड़का डकैत छल | बाप के काला पानी के सजा भ गेलै.. माय केकरो आन सने चलि गेलै आ इ बच्चे सँ नाचअ लागल | अपन जवानी के दिन मे एकर धूम मचल रहित छलय... धूम मचबय छलय धूम | एकर आवभाव देखि त परबतिया अपन बसल बसायल गृहस्थी छोडि एकरा सने रातिये राति पड़ा आयल | हं त टहलू पासवान गाबि सकैत अछि जे...

अंगना आएत जब रसिया

पलट चलब हम इषत हंसिया

कान्ह जातां बहु करयिन्ह

लेकिन मोरे अंगना मे आये आली ' से बेचारा की जाने ? धृन्ना धृगा, तिन्ना-तिन्ना -मृदंग आब दोसर ताल बदलि धृन्ना धिग- धृन्ना- धिग- धिरिनंगि- धिरिनंगि- धिरिनंगि- धिरिनंगि...| किन्ना- किन्ना मंजीर सेहो टटल बदलअक |

'सखि हे...

सखि हे, कि पूछसि अनुभव मोहे

जनम अवधि हम रूप निहारलौं,

तबहु न तिरपित भेल |"

आब नाचक दृश्य दोसर सीरीज मे ... जय मिथिलांचल.....

जय मिथिला, जय मैथिलि, जय मैथिल, जय मैथिलियता आ जय मैथिलिपन के हमरा सब के अनुसरण के बीच विदापत-नाच कवि कोकिल विद्यापति के स्मरण मे प्रस्तुत करबाक चाहि....

'अरे ? चुप ! चुप !!'--विकटा खिसिया क चुप करा रहल अछि | एक टा समाजी गमछा के कोड़ा बनेनाइ शुरू केलक | विकटा कहनाय आरम्भ केलक जे ओकरा पीट क अनेरे समय बर्बाद कैल जा रहल अछि | जमींदार के जूता खाइत -खाइत ओकर पीठ के चमरी मोट भ गेल छय | ओ अइ लेल मात्र चुप करा रहल छल.. 'कि जन्म भरि केकर रूप निहारैत रहल'... जखन ओकरा बुझावल गेलय जे ओकरे रूप, त ख़ुशी भ तुरंत पॉकेट सँ एकटा छोटका एना निकालि सगर्व सँ अपन मुंह देखअ लागल |

गीत समाप्त भेल, आब विकटा महादेव के बारी छैन |

'हे नेक जी (नायक जी); |

हूँ |

'आब हमसे सुनू' |

'बाप रे, |

बाप रे कोन दुर्गति नहिं भेल |

सात साल हम सूद चुकाओल,

तबहुं उरनि नहिं भेलौं |

कोल्हुक बरद सब खटलौं

कारज बाढ़त हि गेल |

बारी बेच पटवारी के देलियेंन्ह,

लुटा बेच चौकीदारी | बकरी बेच सिपाही के देलियेंन्ह

'फाटक नाव गिरधारी |' आब आगू वाला सीरीज मे ... जय मिथिलांचल

विदापत-नाच के चारिम सीरीज के आगू बढबैत हम अपना के बड आनंदित अनुभव के रहल छी | हमर अंदाज ठीक अछि से पसंद के क्लिक देखि क बुझ पडैत अछि जे अहुं सब आनंद उठा रहल छी | अस्तु ! नाच शुरू भ गेल अछि किछ बुझलीय अहाँ सब .. अहुं सब पूरा के पूरा फटकनाथ गिरधारी छी | कने दर्शक के देखियोन ने जे ओ सब की बुझलैन जे हँसैत-हँसैत पेट मे दर्द हुअ लगलैन |

'धृगा-धृगा, धिधिना तिन्ना '....

सखी हे !

सखी हे,

इ माह भादर, भरल बादर,

शुन्य मंदिर मोर |...

सुन्दर ! सुन्दर !!ठीके विद्यापति मैथिल कोकिल....

अहाँ सब फेर भसिया लगलौं, अहुं सब विकटा स कम ने छी | कतबो मना कैल जाय ओकरा जकां सब गीत पर किछ ने किछ सुनाबैय लागै छी | इ लिय विकटा महोदय फेर टपकला...

इ माह भादर, बरिसे बादर,

चुअत छप्पर मोर |'

'हहा-हहा ...!!' दर्शक मंडली हँसैत-हँसैत लोट-पोत भ रहल अछि | हँ एक टा बात कह्नाय बिसरि गेलौं जे विकटा अपना के कृष्ण बुझैत अछि आ परदेशी साजन सेहो, लेकिन संगहि इहो बात ने बिसरैत अछि जे कि वो कालरू मुसहर अछि,हलहुलिया के रहनिहार आ मनुष्यों रहैत ओ बुझैत छैक जे कोल्हू के बरद सँ बेसी ओकर हैसियत नए छय | नाचअ वाला सब जखन ओकर गर्दन मे बांहि मान- अभिमान सँ प्रेम के प्रदर्शन करैत बुझबैत छय कि ---माधव तजि के चललौं विदेश |' तखनि ओ बिसरि जैत अछि जे वो कृष्ण अछि आ गोकुल सँ मथुरा जा रहल अछि | ओकरा सामने जीवन के विषमता मूर्त रूप भ नाचि उठैत छय आर वो बुझबैत छैक --'नहिं बरसल अदरा (आद्रा नक्षत्र) नहिं अशरेस,

चारु दिस देखय छी बुढ़िया के केश ....

माछ काछू सब गेल पाताल,

अब की सखि महा अकाल ,

दिन भरि खटि के एक सेर धान,

एकरा से कैसे बचत परान,

छोडि- छोडि सजनि जाइछि विदेश, फेर दोसरे क्षण जखन दर्शक सब गाबअ लागैत छय तेकर दृश्य आगू..............

पैघ के संझुका चरण स्पर्श आ समवयस्क वा कनि-मनि छोट-पैघ के नमस्कार.............. जय मिथिला, जय मैथिलि, जय मैथिल, जय मैथिलियता आ जय मिथिलापन..... विदापत नाच चरम पर पहुँच रहल अछि...सबटा नचनिया इ गीत गेनाय शुरू क देलक.......

'गोद ले बलमा चललि बाजार

हटिया के लोग पूछे, के लागे तोहार |

सासू जी के लड़िका, ननद के जेठ भाय,

पूर्व के लिखल स्वामी छिक हमार !'

आब विकटा बच्चा जकां जिलेबी, बताशा आर खिलौना लेल छिरिया लागल..

अखने एकटा नचनिया गीत गेलक--

'राति जखन भिनसरवा रे ,

पहूं (स्वामी) आयल हमार

कर कौशल कर कपंइत रे

हरवा उर डार

कर पंकज उर थपइत रे

मुखचन्द्र निहार

विकटा बीचे मे रोकि कअ एकटा समाजी सँ एकर अर्थ बुझबई लेल कहैत छैक आ समाजी खुलि क अय गीत पर टीका करअ लागल | केना नायिका पुआल पर अपन झोपड़ी मे सुतल छलय आ विकटा आयल छल...

आब नाचक आ गीतक कथा आगू लिखब आशा अछि जे समापन दिस अग्रसर विदापतक नाच के अहाँ सब पहिने जकां पसिन करब...

विदापत-नाच के आब अंतिम दृश्य---------

चलु दर्शक सब के बीच मे... कारी-कारी मोटगर आ गठ्गर देह वाला नवयौवना मंद-मंद मुसकिके दबा आ एक दोसर के केहुनिया-केहुनिया क कनफुसकी करअ मे आनंदित भ विकटा के दिस एक टक निहार रहल छल | अधेड़ उम्र के मौगी सब बनावटी तामस व्यक्त क युवती सब के रोकय चाहैत छैक लेकिन दबल हंसी आ गुद्गुदायल ह्रदय कखन मानय छय.. एम्हर नचनिया सब आलाप क उठल------

'चलु मन, चलु मन ... ससुरालि

जइबै हो रामा,

कि आहो रामा, नैहरा मे

अगिया लगाइब रे कि...

युवती चंचल भ जाइत छय आ युवक लोकनि के नस मे बिजली दौरअ लगलैन | नाच आब ख़त्म हुअ वाला छैक --

'चलु मन, चलु मन.

धिन.धिनक धिनक, धिन- धिनक धिनक

कि आहो रामा, नैहरा मे अगिया लगाइब रे कि ...!

डिग डिमिक डिमिक, डिम डिमिक डिमिक ...

अरे इ की ? ओहो चेत्हरू गुंसाई जी छथि | गुंसाई जी कबीर के भक्त छथि | दस-पंद्रह साल पहिने जमींदार साहब के कहला पर ओ झूठ गवाही नय देलकय अय पर जमींदार खिसिया क बेघर गुंसाई जी के कअ देल गेलैन आ तखने सँ 'स=स्ट्रीक बैरागी भ गेला | खंजरी, झोरा और चिमटा, जटा और लम्बा दादी... इ लिय गुंसाई जी खंजरी बजा बजा नचनिया संगे नाच करअ लागल...

'डिग डिमिक डिमिक, डिग डिमिक डिमिक

कि आहो रामा. नैहरा मे अगिया..

बात इ छय चेत्हरू गुंसाई जी अय गीत के पूरा निर्गुण मानय छैक |

अहा ! ओकर धसल आंखि मे नोर चमकि उठय छय आ नाच समाप्त भ गेल.... जय मिथिला, जय मैथिलि. जय मैथिल, जय मैथिलियता. जय मिथिलापन...
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
१.वनीता कुमारी- विहनि कथा- पुनर्न्वेषण २.ओमप्रकाश झा- विहनि कथा- कपारक लिखल ३.जगदानन्द झा 'मनु' - ५टा विहनि कथा ४. चन्दन कुमार झा- विहनि कथा
१.
वनीता कुमारी
पुनरन्वेषण
कनिक देर भऽ गेल छल अन्वेषिका (अन्वी ) के काज पर पहुँचय मे असलमे पहिल बेर तऽ बेसिये पहिने आबि गेल छली से भेलैन जे बाहर नास्ता कऽ क आबि जाथि। कॉलेज के पढ़ाई अखन पूरे भेल छलैन से एकटा सांस्कृतिक परिषद् मे स्टीवार्डक काज पकड़ि लेने छली। कस्टमर सर्विस के अनुभवक संगे मंगनी मे मनोरंजन सेहो होयत छलैन। गेट पर बैसर्ल बैसल लोकक गिनती वा टिकट चेक करू. ककरो किछु जानकारी चाही होय तऽ से दियऊ आ कार्यक्रमक आनन्द लीय।कखनो भारतीय संगीत समरोह तऽ कखनो डायमण्ड जुबली मनाबैत जैज बैण्ड के शो. कखनो आइरिस नृत्य तऽ कखनो जाइव. कखनो बच्चा सबहक नाटक मण्डली तऽ कखनो वृद्ध सबलेल पुरान फिल्म। आहि बॉलीवुड नृत्य सिखाबई वला संस्थानके वार्षिक पुरस्कार वितरण समारोह छल।
बाहर सैण्डविच कीनली आ बसे के भोजनालय बूझैत काज दिस भगली तैयो कनी देर भऽ गेलैन।मुदा ई असगर नहिं छली जे देर छली। एकटा आर बालिका जकर पैर में मोच आबि गेल छलै सेहो कातमे बैसल छल।ओ जखन लोक सब अन्दर चलि जैतई तखन गेट लग जाय क बैसतई। अन्वी के मैनेजर ओकरे संगे काज दऽ देलकैन। कार्यक्रम शुरू भेल।मैनेजर कहलकैन जे अहॉं सब बालकोनी के सीट पर बैसू आ लोक सबपर नजरि राखू।अन्वी ओहि रोमन बालिका संगे बालकोनी मे जा कऽ बैसि गेली। ओ बालिका वैशाखी पर छलै।
कनिये देर मे सबटा शान्त भऽ गेल आ कार्यक्रम शुरू भेल।इम्हर अन्वीजी के ओहि शान्त बालिका सऽ बातचीत सेहो शुरू भेल।स्वभाविक छलै जे अन्वीजी अपन बात ओकर पैरक स्थितिक कारण पूछैत केलखिन आ ओ होली जे अखने बीतल छल के विषय मे बात करै लागल।ओकर किछु नब सहेली भारतीय छलै जकरा संगे ओ भारतीय अन्दाज मे बात केनाई सीखने छल।ओ होलीमे अपन मित्र सब संगे खूब होली खेलायल छल।बातचीत सऽ अन्वीजीके ज्ञात भेलैेन जे ओकर चेहरा के उदासी मात्र पैरक दर्द सऽ नहिं आयल छहि वरन् ओकरा अपन पुरूषमित्र सऽ दू सालक गड़बड़ायल दोस्ती के कारण सऽसेहो छल। आ एहन समय मे ओकरा अपन नब संगी सब बड़ सहयोगी लागैत छल।
ओहि बालिका के भारतीय विशेषतः बॉलीवुड संगीत बड़ रूचिगर लागैत छलै।से ओ बहुत आनन्द लऽ रहल छल संगीत के। बीच बीचमे अपन मायके प्रति कृत्रिम रोष सेहो प्रदर्षित कऽ रहल छल आ ओहि सब अदाकारी मे अन्वेषिकाजीके अपन देशक सुगन्ध आबि रहल छलैन।अतेक विविधता सऽ भरल शहरमे सेहो आइ फेर अन्वीजीके अपन जीवनशैली उत्कृष्ट लागि रहल छलैन। जीवन मे ऊँच नीच तऽ होयते रहैत अछि मुदा ओहि के कोन संस्कृतिमे सबसऽ बढ़िया समाधान छहि से ताक अन्वीजीके उड़ानक सीमा फेर छोट कऽ देलकैन।

ओमप्रकाश झा
विहनि कथा
कपारक लिखल
शर्माजीक आफिस शनि आओर रवि सप्ताह मे दू दिन बन्न रहै छैन्हि। आइ शनि छल। आफिस बन्न छल आ शर्माजी दरबज्जा पर बैसल छलाह। तावत एकटा भिखमंगा दरबज्जा पर आएल आ बाजल- "मालिक दस टाका दियौ। बड्ड भूख लागलए।" शर्माजी बजलाह- "लाज नै होइ छौ। हाथ पएर दुरूस्त छौ। भीख माँगै छैं। छी छी छी।" भिखमंगा बाजल- "यौ मालिक, पाई नै देबाक हुए तँ नै दियऽ, एना दुर्दशा किएक करै छी। हम जाइ छी।" ओकरा गेलाक बाद शर्माजी खूब बडबडयला। देशक खराप स्थित सँ लऽ कऽ भिखमंगाक अधिकताक कारण आ नै जानि की की, सब विषय पर अपन मुख्य श्रोता कनियाँ केँ सुनबैत रहलाह।
दुपहर मे भोजन कएलाक उपरान्त आराम करै छला की कियो गेट ठकठकाबऽ लगलै। निकलि कऽ देखैत छथि एकटा त्रिपुण्ड धारी बबाजी ठाढ छल। हिनका देखैत ओ बबाजी बाजऽ लागल- "जय हो जजमान। दरिभंगा मे एकटा यज्ञक आयोजन अछि। अपन सहयोगक राशि पाँच सय टाका दऽ दियौक।" शर्माजी- "हम किया देब?" बबाजी- "राम राम एना नै बाजी। पुण्यक भागी बनू। फलाँ बाबू सेहो पाँच सय देलखिन्ह। अहूँ पुण्यक भागी लेल टाका दियौ।" शर्मा जी- "हमरा पुण्य नै चाही। हम नरक जाइ चाहै छी। अहाँ केँ कोनो दिक्कत? बडका ने एला हमरा पुण्य दियाबैबला।" ओ बबाजी बूझि गेल जे किछु नै भेंटत आ ओतय सँ पडा गेल।
साँझ मे शर्माजी लाउन मे टहलै छलाह। सामने सँ तीन टा खद्दरधारी ढुकल आ हुनका प्रणाम कऽ कहलक- "विधान सभाक चुनाव छैक। दिल्ली सँ फलाँ बाबू एकटा रैली निकालबाक लेल आबि रहल छथि। ऐ मे बड्ड खरचा छैक। अपने सँ निवेदन जे दस हजार टाकाक सहयोग करियौक।" शर्माजी बिदकैत बाजलाह- "एहि लाउन मे टाकाक एकटा गाछ छै। अहाँ सब ओहि मे सँ टाका झारि लियऽ।" एकटा खद्दरधारी बाजल- "हम सब मजाक नै कऽ रहल छी आ आइ कोनो बहन्ना नै चलत। टाका दियौ अहाँ। अहाँक बूझल अछि ने जे हमरे सभक पार्टीक सरकार छै। अहाँक बदली तेहन ठाम भऽ जायत जे माथ धुनबाक अलावा कोनो काज नै रहत।" शर्माजी गरमाइत बाजलाह- "ठीक छै हम माथ धुनबा लेल तैयार छी। अहाँ सब जाउ आ बदली करबा दियऽ। निकलै छी की पुलिस बजाबी।" खद्दरधारी सब धमकी दैत ओतय सँ भागि गेल।
रातिक तेसर पहर छल। शर्माजी निसभेर सुतल छलाह। एकाएक हुनकर निन्न ठकठक आवाज पर उचटि गेलैन्हि। कनियाँ केँ उठा कऽ कहलखिन्ह जे कियो दरबज्जाक गेट तोडि रहल अछि। दुनू परानी डरे ओछाओन मे दुबकि गेलैथ। तावत गेट टूटबाक आवाज भेलै आ टूटलहा गेट दऽ कऽ सात टा मोस्चंड शर्माजी केँ गरियाबैत भीतर ढुकि गेलै। सब अपन मूँह गमछी सँ लपेटने छल। एकटाक हाथ मे नलकटुआ सेहो छलै। बाकी दराती, कुरहरि, कचिया आ लाठी रखने छल। एकटा लाठी बला आबि कऽ हुनका जोरगर लाठी पीठ पर दैत कहलकन्हि- "सार, सबटा टाका आ गहना निकालि कऽ सामने राख। नै तँ परान लैत देरी नै लगतौ।" शर्माजी गोंगयाइत बजलाह- "हमरा नै मारै जाउ। हम हार्टक पेशेन्ट छी। इ लियऽ चाबी आ आलमीरा मे सँ सब लऽ जाउ।" ओ सब पूरा घर हसौथि लेलक। पचास हजार टाका आ दस भरि गहना भेंटलै। फेर हिनकर घेंट धरैत डकूबाक सरदार बाजल- "तौं तँ परम कंजूस थीकैं। कतौ खरचो तक नै करै छैं। एतबी टाका छौ। सत बाज, नै तँ नलकटुआ मूँह मे ढुका कऽ फायर कऽ देबौ।" इ कहैत ओ नलकटुआ हुनकर मूँह मे ढुकेलक। ओ थर थर काँपैत बाजऽ लगलाह लैट्रिनक उपरका दूछत्ती मे दू लाख टाका आ बीस भरि गहना राखल छै। लऽ लियऽ आ हमरा छोडि दियऽ। सरदार दू जोरगर थापर दैत कहलकैन्हि आब लैन पर एले ने, आर कतऽ छौ बाज। शर्माजी किरिया खाइत बजलाह आब किछो नै छै बाबू, छोडि दियऽ हमरा। डकैत सब सबटा सामान समटि कऽ विदा भऽ गेल। थोडेक कालक बाद हिम्मति कऽ कऽ ओ चिचियाबऽ लगलाह- "बचाबू, बचाबू डकूबा........।" अडोसी पडोसी दौगल एलथि। कियो पुलिस बजा लेलक। पुलिस खानापूर्ति कऽ कऽ चारि बजे भोरबा मे चलि गेलै। शर्माजी अपन माथ पीटैत बाजै छलाह- "आइ भोरे सँ शनिक कुदृष्टि पडि गेल छल। कतेको सँ लुटाई सँ बचलौं, मुदा कपारक लिखल छल लुटेनाई से लुटाइये गेलौं।"

जगदानन्द झा 'मनु'
ग्राम पोस्ट- हरिपुर डिह्टोंल, मधुबनी
विहनि कथा
1- बलिक छागर
बिवाहक मंडप, चारू-कात हँसी- मजाक, हर्ष-उल्लासक वातावरण, मुदा दूल्हा चूप,शांत |
बराती में सँ एक दोस्त दोसर सँ -"बताऊ एतेक खुशिक वातावरण में सब प्रसन्य अछि परञ्च वरक मुँह पर खुसी नहि देखा रहल अछि किएक ?"
दोसर दोस्त भांगक नसा में हिलैत-डूलैत -"भाई बलि सँ पूर्व छागर कएतौ प्रसन्य रहलैए |"
2-जगह
महानगरीय जिवन के अव्यवस्थित आ व्यस्त जिवन में समाय के आगु लचार आजुक जिवन शैली |
रामप्रकाश के माय अपन बेटा-पुतौह आ पाञ्च बर्खक पोता कए दर्शन आ किछु दिन हुनक संग बिताबैक लोभ में अपन गाम सँ दिल्ली रामप्रकाश लग एलथि |
रामप्रकाश एहिठाम सरकारी दू कोठलीक मकान में रहै छथि | माय कए आगमनक बाद, जगह कें दिक्कत कारणे हुनकर ओछैन बालकोनी में एकटा फोल्डिंग खाट पर लगाएल गेल |
राति में एसगर निन्द कें अभाबे करट बदलैत, माय कें मन में ओहि दिनक सुमरण आबि गेलैन्ह, जखन गामक फुश कें एक कोठलीक घर में केना ओ दुनु बियक्ति अपन तिनटा बच्चा संगे गुजारा करैत छलथि, मुदा आई एहिठाम ओ बच्चा दू कोठलीक घर में मायक निर्वाह में असमर्थ बालकोनी में ओछैन केलक |
माय कें आँखि सँ नोरक बूंद टपकैत, नै जानि केखन आँखि लाइग गेलैन्ह |
3-खुसी
कलुआही, बुध दिनक हटिया, चारुकात भीर-भार, बेपारी आ खरीदारक हल्ला-गुल्ला, कियो बेचै में व्यस्त तs कियो कीनै में मस्त |
दीनानाथजी अपन कनियाँ संगे हटिया में प्रबेश कएलथि | हाटक मुँहे पर एकटा सात-आठ बर्खक बच्चिया हाथ में धनी-पात लेने हल्ला करैत -"एक रुपैया कें दू मुठ्ठी, एक रुपैया कें दू मुठ्ठी"
मुदा सब कियोक ओकर बातकें अनसुना करैत हाटक भीर में बिलीन भेल जाएत | दीनानाथजी सेहो ओकर बात कें सुनैत हाटक भीर में मिल गेलाह |
दू घंटा बाद, जखन दीनानाथजी अपन खरीदारी पूरा केलाक बाद हाटक मुँह पर वापस एला तs देखला, धनी-पात बाली बच्चिया पूर्ववत असगरे हल्ला करैत | दू मिनट मोन भय ओहिठाम ठार भेला | हुनक कनियाँ -"चलून धनी-पात तs अपने बारी में बड्ड अछि "
दीनानाथजी -"कनी रुकू ", कहैत आगु धनी-पात बाली बच्चिया सँ -"कोना दै छिही बुच्ची"
बुच्ची-" बाबु एक रुपैया कें दू मुठ्ठी, मुदा एखन तक किच्छो नै बिकेल, अहाँ एक रुपैया कें तिन मुठ्ठी लय लिय "
दीनानाथजी -"सबटा कतेक छौ"
बुच्ची गनैत -"एक,दू,- - सात, आठ - - - बारह,तेरह - - - उनैस, बीस, बीस मुठ्ठी बाबूजी "
दीनानाथजी -"सबटा दय दे "
कनियाँ -"हे-हे की करब ?"
दीनानाथजी कनियाँ कए इशारा सँ चुप करैत, अपन कुर्ताक जेबी सँ एकटा दस रुपैयाक नोट निकालि कs बुच्ची कें देला बाद धनी-पात लैत, ओहिठाम सँ बिदा भय गेला |
घर अबैत, दलान पर बान्हल जोड भैर बरद, हुनक आहटे सँ अपन-अपन कान उठा कय मानु सलामी देबअ लागल | ओहो आगु आबि कs स्नेह सँ दुनु कें माथ सहलाबैत,अपन झोरी सँ धनी-पात निकालि नाईद में दय देलखिन्ह |
कनियाँ-"ई की कएलहुँ दस रुपैयाक धनी-पात बरद कए दय देलियै, एतेक कए घास लैतहुँ तs बरद भैर दिन खैतए "
दीनानाथजी -"कोनो बात नहि दस रुपैया तs सभ कें देखाई छैक मुदा ओई धनी-पात बाली बच्चिया कें मुँह पर जे असंतोस,निरासा आ दुखक भाब रहैक ओ केकरो नै देखाई | आ देखलीयै बिकेला बादक खुसी, ओई खुसिक मोल कतौ दस रुपैया सँ बेसी हेतैक |"
4- आठलाखक कार
कलुआही जयनगर राजमार्ग, बरखाक समय, पिचक काते-कात खधिया सब में पानि भडल | दीनानाथजी आ हुनक जिगरी दोस्त रामखेलाबनजी, दुनू गोटा अपन-अपन साईकिल पर उज्जर चमचमाईत धोती-कूर्ता पहिर, पान खाइत, मौसमक आनन्द लैत बतियाइत चैल जाइत रहथि | कि पाछु सँ एकटा नव चमचमाईत बड्डका एसी बुलेरो कार दीनानाथजी कें उज्जर धोती-कूर्ता पर थाल-पानि उड़बैत दनदनाईत आगु निकैल गेल |
दुनु दोस्तक साईकिल एका-एक रुकल | रामखेलाबनजी हल्ला करैत कारबलाकें गरिएनाई शुरू केलैन्ह |
दीनानाथजी- "रहए दियौ दोस्त किएक अपन मुँह खराप करै छी, एसी कार में बंद कि सुनत, भागि गेल | ओनाहो ओ आठ लाखक कार पर चलैत अछि, हम आठ सय कें साईकिल पर छी तs पानि- थालक छीत्ता तs हमरे परत |"
5- कुण्ठित मानवता
घर में मुरारीजिक कनियाँ अपन आठ बर्खक बेटा आ पाञ्च बर्खक बेटी कें कोनोना सम्हारै में लागल, मुदा हुनक मोनक भाव सँ साफ देखा रहल छल जे हुनकर मोन पुर्णतः मुरारीजी पर लागल छलैन, जे की रातिक दस बजला बादो एखन तक नोकरी सँ घर नहि एलथि |
कोनोना दुनु बच्चाकें सुतेलथि | समयक सुई सेहो आगु वरहल | दस सँ एगारह बाजल | हुनक मोन में संका सबहक आक्रमण भेनाई स्वभाबिक छल | इना त एतेक राति पहिले कहियोक नहि भेलै | सहास करैत घर सँ बाहर निकैल, अपन भैंसुरक अंगना पहुँचली | हुनका सब कें कहला बाद शुरू भेल युद्धस्तर पर मुरारीजिक खोज | मुदा सब मेहनत खाली मुरारीजिक कोनो पता नहि | हुनक आडामिल जाहिठाम ओ काज करैत छलथि सँ ज्ञात भेल जे हुनक छुट्टी तs साँझु पहर पाँचे बजए भs गेल रहैन आ ओ अपन साईकिल सँ एहिठाम सँ बिदा सेहो भय गेल रहथि |
तकैत-तकैत भोरे चारि बजे हुनक मृत-देह पिपरा घाटक सतघारा बला धूरि पर भेटल | देखते मातर सबहक हाथ-पएर सुन्न | कनाहोर मचल | बाद में स्थानीय प्रतक्षदर्शी सँ ज्ञात भेल की ओ एहिठाम साँझ कए साते बजे सँ छथि, किछु गोटे हुनका हाथ-पएर मारैत देखि बजैत रहेजे -'बेसी शराब पि क' ड्रामा कय रहल अछि |'
मुदा हाय रे कुण्ठित मानवता कियोक हुनक बास्तबीक कारण बुझहक प्रयास नहि कएलक, नहि तs ओ एखन जिबैत रहितथि | हुनका तs एपेडेंसीक दर्दक बेग रहैन आ समय पर उपचार नहि हेबाक कारणे ओ चलि बसला |
४.
चंदन कुमार झा
सररा, मदनेश्वर स्थान
मधुबनी, बिहार
विहनि-कथा -बुच्चू भइया
करमान लागल लोक..अनघोल भेल सौंसे गाम..जकरे देखू तकरे आँखि मे नोर..सगरो संताप पसरल..नहि रहलथि बुच्चू भैया आब एहि दुनिया मे.पचासी बरखक अवस्था भ गेल रहन्हि तइयो सभ बुच्चू भइये कहैत छलन्हि. नेना-भुटका, जर-जवान, बुढ-पुरान,स्त्री-पुरूख..सभक भैया..बुच्चू भैया छलाह. अनकर कोन कथा अपनो बेटा-पोता सभ त' बुच्चू भइये कहैत छलन्हि.कोनो बेशी पढल-लिखल नहि छलाह मुदा बेबहारिक गेयान सँ परिपूर्ण.समाज मे घुलल-मिलल लोक.ककरो-कहियो कोनोटा खराप नहि सोचलखिन्ह जीवन भरि.सभके हरदम नीके रस्ता देखबैत रहलाह.भरि गाम मे ककरो ओहिठाम कोनो तरहक दसगरदा काज मे बिन-बजौनहु पहुँचि जाइत रहैत.कोनो तरहक राग-द्वेश नहि.एकदम शुद्ध-मना.एही गुण सभ दुआरे तऽ एतेक सम्मान भेटै छलन्हि सभठाँ.अनकर कोन कथा बड़का पण्डिजी सेहो हिनकर मान करै छलखिन्ह.उमेर मे नमहर रहितौ ओहो बुच्चुए भइया कहैत छलखिन्ह.
दलान पर कुरसी लगा बैसल बुच्चू भइया...अबैत जाइत लोक..के छोट..के पैघ..सब बइस रहैत छल हुनका सँ दू आखर सुनबा लय..... जिनगीक उँच-नीच गुनबा लय.....खिस्सा-पिहानी सुनबा लय.कल्ला तर पान..ठहक्का मारैत बुच्चू भइया नजरि के सोझाँ ओहिना नाचि रहल छथि.आँखि हमरो नोरा गेल.
माँझ अँगना उत्तर मूँहे सूतल छथि बुच्चू भइया.मूँह पर एखनो हँसी पसरल..दिव्य ललाट. गौदान-वैतरनी भ' गेल...बाँसक रथ सवार बुच्चू भइया विदाह भेल छथि अंतिम यात्रा पर...कन्नारोहट उठल सगरो..शांत बुच्चू भइया ..आइ नहि पोछलखिन्ह ककरो नोर.सिरहौना-पोछौना..आमक लकड़ी बोझल गेल..सभ काठी चढौलक श्रद्धांजलि-सवरूप.मुखाग्नि पड़ल..सरर..धुमन..गमकथि बुच्चू भइया.चर्चा-परिचर्चा..केयो बजलइ-"एकबेर बुच्चू भइया के कोनो बात लेल तामश उठि गेलनि.बौसति कियो कहलकन्हि -अहूँ के बड्ड तामश उठैत अछि. हमरा त़ऽ हरदम तामश उठले रहैत अछि, चट्ट दऽ कहने रहथिन्ह बुच्चू भइया"-सभ हँसऽ लागल...धधरा जोर भऽ गेलइ..हँसैत बुच्चू भइया.
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अतुलेश्वर

Suggested citation: मधुपनाथ झा. “बिदापत नाच.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 105, 2012-05-01. https://www.videha.co.in/research/2012/105/बिदापत-नाच.htm

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